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पीरियड्स लज्जा का विषय क्यों, इन विचारों से उबरने में कितना समय लगेगा

देशदुनिया में इतनी प्रगति के बावजूद मासिकधर्म को ले कर तरहतरह के पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और दुराव की भावना से समाज ग्रस्त है. हालांकि एक हद तक युवतियों की सोच बदली है, लेकिन आज भी पीरियड्स के दौरान युवतियों को अछूत माना जाता है. यह स्थिति हमारे देश की ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की है.

पश्चिम बंगाल के स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन के वितरण और इस्तेमाल को ले कर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है. दरअसल, स्कूल ड्रौप आउट पर लगाम लगाने के लिए राज्य शिक्षा विभाग से स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन निशुल्क उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई थी, लेकिन विभाग इस में आनाकानी कर रहा है. दिल्ली समेत राजस्थान, बिहार, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्य छात्राओं को यह सुविधा मुहैया करा रहे हैं. लेकिन प्रगतिशील बंगाल में युवतियां यह सुविधा पाने से वंचित हैं जाहिर है मासिक धर्म को ले कर समाज में छूआछूत की भावना ही इस के लिए जिम्मेदार है.

गौरतलब है कि देश में मेघालय, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और असम के बाद पश्चिम बंगाल 5वां ऐसा राज्य है जहां स्कूल ड्रौप आउट बच्चों की संख्या काफी ज्यादा है. एनुअल स्टेटस औफ ऐजुकेशन रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में 6 से 14 साल की उम्र वाले ड्रौप आउट बच्चों का प्रतिशत साढ़े 4 है जबकि देश में यह प्रतिशत साढ़े 3 है.

बहरहाल, राज्य में ड्रौप आउट का आंकड़ा चिंताजनक है. लड़कियों को स्कूल तक लाने के लिए राज्य सरकार ने कन्याश्री योजना की भी शुरुआत की. बंगाल में धन की कमी के कारण बीच में ही पढ़ाई छुड़ा कर कम उम्र में शादी किए जाने का चलन रहा है. जाहिर है इस योजना का मकसद बाल विवाह पर रोक लगाना है, इसीलिए इस योजना का लाभ 8वीं से ले कर 12वीं कक्षा तक की छात्राओं को ही मिल पाता है. 14 साल तक की उम्र की छात्राओं की स्कूल ड्रौप आउट समस्या का समाधान शिक्षा आयोग ने सैनिटरी नैपकिन में ढूंढ़ा.

कुछ समय पहले आयोग ने स्कूल ड्रौप आउट समस्या के समाधान के मद्देनजर स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन के वितरण की सिफारिश की थी. लेकिन राज्य के शिक्षा मंत्री इसे लागू करने में आनाकानी कर रहे हैं. शिक्षा आयोग के चेयरमैन समीर ब्रह्मचारी लंबे समय से केंद्र में काउंसिल औफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च से जुड़े रहे हैं. वे कहते हैं कि राज्य में लड़कियों के स्कूल ड्रौप आउट की समस्या के अलावा गर्भाशय कैंसर भी एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है. इसीलिए सैनिटरी नैपकिन वितरण के जरिए छात्राओं में पढ़ाई के अलावा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने की कोशिश भी की गई है. वे बताते हैं कि दिल्ली और हरियाणा समेत कई राज्यों में लड़कियों को यह सुविधा मुहैया कराई जाती है. एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि पीरियड्स के दिनों में लड़कियां स्कूल नहीं जाती हैं.

राज्य के गांवदेहातों में तो मासिकधर्म शुरू होने के बाद लड़कियों का स्कूल छुड़ा दिया जाता है, लेकिन स्कूल अगर सैनिटरी नैपकिन मुहैया करा दे तो उन की समस्या का कुछ समाधान हो जाएगा. दूसरा सैनिटरी नैपकिन से सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, साथ ही संक्रमण का खतरा भी नहीं रहेगा. शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के  अनुसार सरकार को इस में प्रति छात्रा 18-20 रुपए का खर्च आएगा. सरकार बंगाल में सरकारी योजना के तहत चलाए जा रहे आत्मनिर्भर समूह द्वारा कम कीमत पर सैनिटरी नैपकिन तैयार करती है. ऐसी ही एक संस्था है, ‘एकता,’ जो एक पंथ दो काज में जुटी हुई है. यह संस्था सरकार से 3 लाख 79 हजार रुपए का कर्ज ले कर सैनिटरी नैपकिन बना कर उन्हें कम कीमत पर बेच रही है. वहीं स्थानीय स्तर पर महिलाओं के रोजगार का भी जुगाड़ हो रहा है.

गौरतलब है कि पुराने जमाने से गांवदेहातों में मासिकधर्म के उन 5-6 दिन के दौरान होने वाले रक्तस्राव के प्रबंधन के लिए कई घरेलू उपाय किए जाते हैं. कभी पुराने कपड़े तो कभी फटीपुरानी बोरी के टुकड़े, कभी सूखी घास तो कभी लकड़ी का बुरादा, यहां तक कि कोयले की राख का पैड बना कर भी इस्तेमाल किया जाता है. जाहिर है ऐसी चीजों के पैड का इस्तेमाल कर चलनाफिरना तकलीफदेह होता है. इसीलिए महीने के इन कुछ दिनों में लड़कियां स्कूल नहीं जातीं. लेकिन राज्य का शिक्षा विभाग स्कूलों में शौचालय निर्माण की सिफारिश को खुले मन से स्वीकार नहीं कर पा रहा है. इस संबंध में राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री से पूछने पर उन्होंने माना था कि शिक्षा आयोग की तरफ से ऐसी सिफारिश आई थी, लेकिन इस पर अभी फैसला नहीं लिया जा सका, क्योंकि गांवदेहात में मासिकधर्म को ले कर कई तरह की रोकटोक है. ऐसे में इसे लागू करने में बड़ी दिक्कत होगी, इसीलिए इस के तमाम पक्षों को ले कर सोचविचार किया जा रहा है.

यह बड़ी अजीब बात है कि स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन के वितरण को ले कर मंथन चल रहा है, वहीं राज्य के कालेजविश्वविद्यालयों में भी कुछ ही महीने पहले वैंडिंग मशीन लगाने का प्रस्ताव रखा गया था. इस बीच कुछ कालेजविश्वविद्यालयों में तो सैनिटरी नैपकिन की वैंडिंग मशीनें लगाई जा चुकी हैं. हालांकि इस के लिए भी बड़ी लड़ाई लड़ी गई. यादवपुर में छेड़खानी का विरोध सैनिटरी नैपकिन आंदोलन के जरिए किया गया. विरोध व आंदोलन से जुड़े नारे सैनिटरी नैपकिन पर लिखे गए. इस पर भी सवाल उठाए गए.

हाल ही में टोरेंटो से रूपी कौर ने इंस्टाग्राम पर मासिक स्राव से संबंधित एक तसवीर पोस्ट की जिस में बिस्तर पर सोई एक लड़की की जींस पर पीछे की तरफ से मासिक स्राव के धब्बे दिख रहे थे. इंस्टाग्राम ने इन तसवीरों को सैंसर कर दिया था, पूरे कपड़ों में सोई लड़की की तसवीर को आखिर क्यों सैंसर किया गया? इस के बाद एक जरमन लड़की ने प्रोजैक्ट शुरू किया, जिस से जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र काफी प्रभावित हुए. दरअसल, 19 साल की एक जरमन लड़की ईलोना कास्ट्राटी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर बलात्कार  और महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव के विरोध के लिए सैनिटरी नैपकिन को चुना था. ईलोना ने सैनिटरी नैपकिन पर बलात्कार और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ नारे लिख कर अपने पूरे शहर भर में चिपकाए थे. इस की तसवीर उस ने इंस्टाग्राम पर भी पोस्ट की. ईलोना के इस अभियान का समर्थन करते हुए जामिया मिलिया इस्लामिया के एक छात्र मजाजुल हक ने इंस्टाग्राम और ईमेल द्वारा उस से संपर्क कर के अभियान को पूरा समर्थन दिया.

उस का कहना था कि मासिकधर्म के दौरान युवतियों को काफी घृणित नजर से देखा जाता है. अकेले मजाजुल हक ही नहीं, बल्कि समीरा मुद्गल, कायनात खान और मोहित जोसेफ ने भी इस का समर्थन किया. अब यह आंदोलन जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय तक फैल गया. ‘मैंस्ट्रुएशन इज नैचुरल, रेप इज नौट’, ‘कन्या कुमारी, गंदी सोच तुम्हारी’ जैसे नारे सैनिटरी नैपकिन पर लिख कर विश्वविद्यालय परिसर से बाहर मैट्रो रेल, बस स्टैंड पर लगवाए गए. सैनिटरी नैपकिन बलात्कार और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ लड़ने का हथियार बन गया.

हालांकि विश्वविद्यालय परिसर में सैनिटरी नैपकिन के जरिए विरोधप्रदर्शन का विरोध भी हुआ. लेकिन असल मुद्दा है पीरियड को ले कर सामाजिक टैबू का. महिलाओं को चूंकि सैक्स की वस्तु के रूप में देखा जाता है, इसलिए समाज में पीरियड्स को ले कर टैबू भी इसी तरह का है. 

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जीवन खुशहाल बनाने के ये हैं 9 आसान टिप्स, आप भी आजमाइये

बचपन से सुनते आए हैं कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और दुख बांटने से घटता है. जब छोटे थे तो यह बात समझ नहीं आती थी, लेकिन बड़े होने के बाद इसे बड़ी शिद्दत से महसूस किया. मन पर कितना भी भारी बोझ क्यों न हो अगर आप उसे किसी अपने से कह देते हैं, तो आप का मन हलका हो जाता है. जीवन में खुशियों को निमंत्रित करने के लिए इन बातों पर करें अमल:

पौजिटिव थिंकिंग रखें

सकारात्मक सोच न केवल बीमारियों को दूर रखती है वरन इस से कार्यक्षमता में भी बढ़ोतरी होती है. व्यक्ति सब से ज्यादा दुखी अपने कैरियर को ले कर रहता है. उस के मन में हमेशा इस बात का भय रहता है कि कहीं मैं अपनी खराब परफौरमैंस की वजह से अपनी नौकरी न खो दूं या फिर पता नहीं मेरी प्रमोशन होगी या नहीं. इस तरह की सोच उस की वर्क ऐफिशिएंसी को कम करती है. अगर आप चाहते हैं कि आप को अपने काम में सफलता मिले और नौकरी में आप को प्रमोशन मिले, तो इस के लिए यह जरूरी है कि आप हमेशा खुश रहें और अपनी सोच को सकारात्मक रख कर सिर्फ अपने काम पर फोकस करें यकीनन आप को सफलता मिलेगी. जिंदगी में कुछ भी पाने के लिए किसी किस्म का पूर्वाग्रह पालने के बजाय सिर्फ अपनी सोच को सकारात्मक रखने की जरूरत है. एक बार अच्छा सोच कर और बुराई में अच्छाई खोजने की कोशिश कर के देखिए यकीनन आप के जीवन में खुशियो की बरसात होगी और सफलता आप के कदम चूमेगी.

नकारात्मक सोच को निकाल फेंकें

अगर अपने आसपास नजर दौड़ाएं, तो आप को ऐसे बहुत सारे लोग देखने को मिल जाएंगे, जो अपने आसपास नकारात्मक सोच का जाल सा बना कर रखते हैं. हर तरह की सुखसुविधा मौजूद रहने के बावजूद उन के चेहरे पर मायूसी ही नजर आती है, इस का कारण उन की सोच में नकारात्मक भावों की प्रधानता है, जिन की वजह से वे अच्छी बातों पर भी खुश नहीं हो पाते हैं. अगर आप जीवन में खुश रहना चाहते हैं, तो सब से पहले अगर आप के आसपास ऐसे लोगों का जमावड़ा है, तो उन से उचित दूरी बनाएं. उस के बाद अपने अंदर के नैगेटिव थौट को निकाल बाहर करें. मैडरिड यूनिवर्सिटी ने अपने एक शोध में यह बताया कि अपने मन के नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने का सब से आसान तरीका अपनी नकारात्मक सोच को एक सादे कागज पर लिख कर उसे फाड़ देना है. इस से आप के नकारात्मक भाव स्वत: समाप्त हो जाते हैं.

खूब ऐक्सरसाइज करें

जीवन में खुश रहने के लिए स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है. इस संबंध में यूनिवर्सिटी औफ टोरंटो ने 25 से अधिक बार रिसर्च किया है. उस के द्वारा किए गए शोधों में यह सिद्ध हो चुका है कि ऐक्सरसाइज करने से मूड अच्छा होता है. इस से न केवल आप का तनाव खत्म होता है वरन नियमित व्यायाम से आप डिप्रैशन से भी दूर रहते हैं. जब आप अपने पास के पार्क के 2-4 चक्कर लगा कर आते हैं, तो अंदर से खुशी महसूस होती है. इस का कारण यह है कि जब आप अपने घर से बाहर जाते हैं, तो फिर आप की मुलाकात बहुत सारे नए लोगों से होती है. पार्क में जाते हैं, तो वहां खेलते बच्चों को देख कर आप अपना सारा तनाव भूल जाते हैं. आप को अपने बचपन के दिन याद आने लगते हैं, जो यकीनन खुश करने वाले होते हैं.

गहरी नींद

समयसमय पर हुए विभिन्न सर्वेक्षणों में यह सिद्ध हुआ है कि गहरी नींद न केवल स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है वरन इस से आप के अंदर की नकारात्मकता भी समाप्त होती है. जब आप सो कर उठते हैं, तो आप पूरी तरह तरोताजा होते हैं. उस समय आप के अंदर अपने काम को बेहतर तरीके से करने की इच्छा जाग्रत होती है जोकि आप को अपने काम को अच्छी तरह करने की ऐनर्जी प्रदान करती है. जब आप किसी काम को बेहतर तरीके से अंजाम देते हैं, तो आप के अंदर स्वत: ही अद्भुत खुशी का संचार होता है. अत: गहरी नींद लें, क्योंकि गहरी नींद से आप के अंदर की सारी नैगेटिविटी खत्म हो जाती है.

अच्छी यादों को सहेजें

हमेशा खुश रहने के लिए अपनी अच्छी यादों को सहेज कर रखें. अगर आप के साथ कुछ बुरा हुआ है, तो उसे भूल कर अच्छी बातों को याद करने की कोशिश करें. इस संबंध में कौरनेल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक थौमस गिलोविच ने एक शोध किया था, जिस में यह बात सामने आई कि आप को महंगी चीजों की शौपिंग कर के भी वह खुशी नहीं मिलेगी, जो अपने अच्छे लमहों को याद कर के और उन लोगों के साथ समय बिता कर मिलेगी, जो आप के दिल के करीब हैं और जिन के साथ आप अपनी भावनाओं और विचारों को बांट सकते हैं. सच तो यह है कि अच्छी यादों से मिलने वाली खुशी का कभी अंत नहीं होता है. खुद को तरोताजा रखने के लिए अपने पुराने दोस्तों से मिल कर उन के साथ बीते दिनों की यादों को ताजा कर के तो देखिए, आप को असीम आनंद की प्राप्ति होगी.

थोड़ी सी मदद ढेर सी खुशी

कभी किसी की मदद कर के देखिए, आप को ऐसी अद्भुत खुशी मिलेगी कि आप का मन हमेशा किसी मदद को तैयार रहेगा. सच तो यह है कि किसी के चेहरे पर थोड़ी सी मुसकान लाने में जो आनंद और सुकून मिलता है वह आप को बेशुमार दौलत और बड़ा घर खरीदने पर भी नहीं मिलेगा. समयसमय पर किए गए विभिन्न सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा सा समय निकाल कर किसी की मदद करने पर अपार खुशी का एहसास है.

अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें

आप के जीवन में खुशियों का समावेश तभी हो सकता है, जब आप अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं और सामाजिक रूप से सक्रिय हैं. अपने काम में सफलता पाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप बेकार की बकवास के बजाय आप वह करेें, जो आप की प्राथमिकता हो. अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर के न केवल आप अपनी नौकरी और व्यवसाय में सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं वरन अपने लिए खुशियों के संसार की भी संरचना कर सकते हैं.

खुद से करें प्यार

आमतौर पर आप अपने बारे में, अपनी खुशियों के बारे में सोचने के बजाय दूसरों के बारे में सोच कर ही अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा बरबाद कर देते हैं. खुश रहने के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बारे में सोचें, अपनेआप से प्यार करें. आप दूसरों के बारे सोचने के साथसाथ अपने बारे में भी सोचें. यह ठीक है कि जिम्मेदारियों का निर्वाह करना जरूरी होता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब आप अपनेआप को संतुष्ट रखेंगे, तभी अपने जीवन में खुशियां ला पाएंगे. अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल कर अपना मनपसंद काम करे आप अपनेआप से प्यार करें तभी आप स्वयं भी खुश रह पाएंगे और दूसरों को भी प्यार कर पाएंगे.

विकसित करें लेट गो की प्रवृत्ति

आमतौर पर लोगों की यह आदत होती है कि वे अपने जीवन की बुरी बातों को आसानी से भूल नहीं पाते हैं. यह सच है कि किसी ने आप के साथ बुरा किया है, तो उस की कसक हमेशा बनी रहती है. लेकिन जीवन में खुश रहने की मूलमंत्र है कि आप बीती बातों को भूल कर आगे बढ़ने की कला सीखें. अपने अंदर लेट गो की प्रवत्ति डैवलप करें और दूसरों को माफ कर के जीवन मे आगे बढ़ने का प्रयास करें. आप के अंदर जो हुआ उसे भूल जा की भावना आएगी, तो आप उन्हीं बातों का याद रखेगें, जो आप को खुशी प्रदान करती हैं.

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उपचुनाव में टूट गया ‘मोदी-योगी’ का करिश्मा

उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 3 और विधानसभा की 2 सीटों के लिये हुये उपचुनाव में भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश की 2 लोकसभा सीटों में गोरखपुर और फूलपुर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य साल 2014 में सांसद बने थे. उस समय फूलपुर में केशव मौर्य को 52 फीसदी और योगी आदित्यनाथ को 51 फीसदी वोट मिले थे.

बिहार में अरहरिया लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल यानि आरजेडी के तस्लीमुददीन सांसद बने थे. बिहार की भभुवा और जहानाबाद में विधानसभा के उपचुनाव थे. जहानाबाद में मुद्रिका सिंह यादव आरजेडी से जीते थे और भभुवा से भाजपा के आनंद भूषण पांडेय चुनाव जीते थे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद यहां उपचुनाव हुये. जबकि बिहार में तीनों सीटों से चुने गये प्रत्याशियों के न रहने से सीटे खाली हुई थी.

भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर सीट सबसे खास थी. गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र था. फूलपुर उपमुख्यमंत्री का क्षेत्र था. ऐसे में किसी को यह गुमान नहीं था कि भाजपा की यह हालत हो जायेगी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भाजपा की जीत पर किसी को कोई सुबहा नहीं रह गया था. 2017 में विधानसभा में मिली जीत के बाद भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में भी भाजपा ने सरकार में शामिल होने के बाद खराब प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश और बिहार के इन उपचुनावों के संकेत बड़े हैं. इनका असर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. उपचुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि ‘मोदी-योगी मैजिक’ अब अपनी चमक खो रहा है.

इसके लिये भाजपा की नीतियां, भाजपा नेताओं की हठधर्मिता, केवल धर्म का प्रचार जिम्मेदार है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने विकास की बात कही थी. चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार अपनी बात पर कायम न रह कर केवल धर्म को बेचने लगी. धर्म का सहारा लेकर केवल मंदिर, आश्रम, बाबा सरकार पर हावी होने लगे. उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री ही बना दिया. उनकी योग्यता धार्मिक चेहरा होना ही था. भाजपा दलित और पिछड़ों को साथ लेकर नहीं चल पाई. खासकर दलितों को लेकर जो माहौल बना, उसने दलित पिछड़ों को एकजुट होने पर विवश कर दिया. ऐसे में जब बसपा और सपा करीब आये, तो भाजपा के लिये मुश्किल हो गया.

हिन्दू रक्षा के नाम पर जिस तरह गुंडे तत्व सक्रिय हुये उससे प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ गई. लोगों ने कानून की परवाह करनी बंद कर दी. दीवार से लेकर हर तरफ भगवा रंग फैलने लगा. जिस विकास की बात करके 2014 का लोकसभा चुनाव जीता वह दरकिनार हो गया. देश में बेरोजगारी फैलने लगी. जीएसटी और नोटबंदी ने लोगों को भुखमरी के करीब ला खड़ा किया. इसका गुस्सा अब बाहर आने लगा है. भाजपा पार्टी में लोकतंत्र की जगह पर तानाशाही फैल गई, जिससे परेशान भाजपा के लोगों ने उपचुनाव में वोट डालने और डलवाने का काम नहीं किया. जिसकी वजह से मतदाता वोट के लिये नहीं गया और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा.

गूगल मैप्स बताएगा और सटीक रास्ता, जोड़े गए प्लस कोड

गूगल मैप का इस्तेमाल कर किसी भी जगह को ढूंढना अब आपके लिए और भी आसान हो गया है. गूगल मैप्स ने दिल्ली में आयोजित एक इवेंट में प्लस कोड (Plus Code) लौन्च किया है. यह प्लस कोड गूगल मैप्स पर काम करेगा. कंपनी के मुताबिक हफ्ते भर पहले गूगल ने चुपके से इस फीचर को लोगों के लिए जारी कर दिया था और अब यह आधिकारिक किया गया है. इस फीचर के अलावा गूगल मैप्स वौयस नेविगेशन में छह भारतीय भाषाओं को भी जोड़ा गया है.

गूगल मैप्स नेक्स्ट बिलियन यूजर्स के डायरेक्टर सुरेन रूहेला ने इस इवेंट के दौरान कहा है, ‘गूगल मैप्स में हमारा मकसद हमेशा से लोकेशन से जुड़ी जानकारियों को और्गनाइज करना रहा है और इसे भारतीय यूजर्स के लिए आसान भी बनाया जा रहा है. इस मिशन के लिए ऐड्रेस सर्चिंग ज्यादा अहम है.’

क्या है Plus Code?

अमेरिका जैसे देशों में ऐड्रेस छोटे और आसान होते हैं, जबकि आमतौर पर भारत में ऐड्रेस काफी लंबे होते हैं जिनमें गली नंबर, लैंडमार्क, अपार्टमेंट नंबर और फ्लैट नंबर जैसी जानकारियां होती हैं. इसी तर्ज पर गूगल ने आसानी से ऐड्रेस को ढूंढने के लिए प्लस कोड की शुरुआत की है.

प्लस कोड एक ओपन सोर्स सल्यूशन है यानी आप खुद से अपने घर के ऐड्रेस का प्लस कोड जेनेरेट कर सकते हैं. यह फ्री है और आप इसे आसानी से बना सकते हैं.

https://plus.codes/map/ लिंक पर क्लिक करके आप अपना ऐड्रेस ढूंढ सकते हैं. अगर आपको अपने घर या औफिस का प्लस कोड नहीं मिलता है तो यहां से आप उस जगह का पता लिख कर दर्ज गूगल में सबमिट कर सकते हैं. अप्रूवल मिलते ही आपके घर का प्लस कोड तैयार हो जाएगा जिसे आप किसी को भी दे सकते हैं.

इसमें छह डिजिट का एक कोड होता है जिसके साथ शहर का कोड जुड़ा होता है. इसे आप खुद से जेनेरेट करके किसी को भी भेज सकते हैं. इस कोड को गूगल मैप्स पर डाल कर कोई भी आपके लोकेशन तक आ सकता है. आप सोच रहे होंगे कि क्यों न हम सीधे गूगल मैप्स के जरिए लोकेशन शेयर कर दें. लेकिन अगर आपके पास इंटरनेट नहीं है तो ऐसी स्थिति में भी आप कोड को भेज सकते हैं.

इस कोड का फायदा ये है कि गूगल मैप्स पर आपके घर की एक पहचान होगी और इसे आप अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी डिलीवरी, कूरियर, फूड सर्विस या फिर अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ शेयर कर सकते हैं. इस कोड को गूगल मैप्स के सर्च फील्ड में डालना है और वो सीधे आपके घर तक नेविगेट कर देगा. इसे आप स्मार्टफोन या डेस्कटौप से इस्तेमाल कर सकते हैं.

गूगल के मुताबिक इस प्लस कोड को आप कई मौकों पर जैसे अस्थाई इवेंट, इमरजेंसी सर्विस और जटिल ऐड्रेस को आसान बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

क्यों खास है Plus Code

-यह फ्री है और ओपन सोर्स है आप खुद अपना ऐड्रेस जोड़ सकते हैं.

-इसे औफलाइन भी यूज किया जा सकता है.

-प्लस कोड को पोस्टर्स, साइन बोर्ड या पेपर पर प्रिंट कराया जा सकता है. इसके तहत लोग बिना मोबाइल के भी इसे यूज कर सकते हैं.

-प्लस कोड गूगल पर उन जगहों के लिए भी काम करता है जिसे मैप नहीं किया गया है.

-आपात स्थिति में आप यह कोड को इमरजेंसी सर्विस के साथ शेयर कर सकते हैं ताकि आपकी जगह पहचान कर वो आप तक पहुंच सकें.

-गूगल मैप्स पर ऐड्रेस ऐड कर सकते हैं

-गूगल ने गूगल मैप्स पर ऐड्रेस जोड़ने के लिए Add an address का विकल्प दिया है. इस फीचर के जरिए यूजर्स गूगल मैप्स में अपना योगदान दे सकते हैं. यह उसी तरह से है जैसे पहले से ही यूजर्स किसी बिजनेस ऐड्रेस ऐड करते हैं.

बता दें कि इससे पहले गूगल ने मैप्स में एक नया फीचर लांच किया था, जो किसी भी यात्रा को एक रोमांचक यात्रा में बदल सकता है क्योंकि अब यूजर्स ऐप का इस्तेमाल करते हुए नेविगेशन इंटरफेस में मारियो कार्ट को जोड़ सकते हैं. इसे शुरू करने के लिए यूजर्स को पहले गूगल प्ले या ऐप स्टोर पर जाकर गूगल मैप को अपडेट करना होगा. उसके बाद गूगल मैप ऐप खोलकर स्क्रीन की दायीं तरफ निचले हिस्से में पीले आइकौन पर क्लिक करना होगा, उसके बाद मैप आपसे पूछेगा कि क्या आप मारियो टाइम को सक्रिय करना चाहते हैं.

इसकी पुष्टि करते ही मारियो सक्रिय हो जाएगा और सामान्य तौर पर दिखनेवाले नेविगेशन एरो की जगह पर ‘1990 के दशक का सबसे लोकप्रिय वीडियो गेम चरित्र’ मारियो दिखने लगेगा.

VIDEO : ये हेयरस्टाइल है बड़ी मस्त

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शमी की पत्नी ने मीडिया से की बदसुलूकी, तोड़ दिया कैमरा

भारतीय टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी पर गंभीर आरोप लगाकर सनसनी फैला देने वाली उनकी पत्नी हसीन जहां ने मंगलवार को पत्रकारों के साथ न सिर्फ बदसुलूकी की, बल्कि एक फोटोग्राफर का वीडियो कैमरा भी तोड़ दिया. यह घटना दक्षिण कोलकाता में सेंट जोसेफ स्कूल के निकट हुई, जहां पत्रकार के एक सवाल पूछने पर हसीन इतना भड़क गईं.

बता दें कि जादवपुर स्थित आवास से हसीन जहां अपनी गाड़ी से निकलीं और स्कूल के निकट पहुंचीं तो पत्रकारों ने सवाल किया. इस पर वह मीडिया पर इतना भड़क गईं कि उन्होंने एक कैमरामैन का वीडियो कैमरा तोड़ दिया. इसके बाद वह अपनी कार में बैठीं और वहां से निकल गईं. मीडिया पर हमले के साथ ही ये बात तो साबित हो गई है कि हसीन जहां को गुस्सा बहुत आता है. माना कि हसीन जहां इन दिनों परेशानियों से गुजर रही हैं लेकिन किसी से इस तरह की बदसलूकी करना भी जायज नहीं.

वैसे आपको बता दें मीडिया में शमी की पत्नी के कई विवाद पहले भी सामने आए हैं. खबरें थी कि गौतम गंभीर, अजिंक्य रहाणे और आर अश्विन की पत्नियों के साथ हसीन जहां का झगड़ा हो चुका है. हसीन जहां ने ये भी दावा किया था कि वो एम एस धोनी की पत्नी साक्षी की करीबी दोस्त हैं. हालांकि साक्षी धोनी ने कभी इस बात की पुष्टि नहीं की.

पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों पर मुहम्मद शमी लगातार अपने बचाव में बयान दे रहे हैं. उन्होंने बयान जारी कर कहा था कि वह अपनी पत्नी और उनके परिवार से इस मसले पर बात करना चाहते हैं. शमी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख इस मुश्किल घड़ी में उनका साथ देने वाले फैंस को शुक्रिया कहा.

मालूम हो कि हसीन जहां ने अपने पति मुहम्मद शमी पर अवैध रिश्ते, घरेलू हिंसा और जान से मारने की कोशिश जैसे बेहद संगीन आरोप लगाए हैं. हसीन ने इस मामले में पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी है. 19 मार्च को उन्हें अपना बयान अलीपुर कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज करवाना है. शमी पर उनकी पत्नी ने जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उसके बाद कोलकाता पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. कोलकाता पुलिस ने सोमवार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) को पत्र लिखकर शमी के दक्षिण अफ्रीका दौरे से जुड़ी जानकारी मांगी है.

इन विवादों के बीच क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी ने मुहम्मद शमी का समर्थन किया है. धोनी ने कहा है कि शमी एक बेहतरीन इंसान हैं और वह ऐसे शख्स नहीं हैं जो अपनी पत्नी और अपने देश को धोखा दें. मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक धोनी ने कहा कि वह इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं बोलना चाहते, क्योंकि यह एक पारिवारिक मसला है और शमी की निजी जिंदगी से जुड़ा है. धोनी के अलावा हसीन जहां के पिता ने भी शमी का समर्थन किया है.

VIDEO : चलिए आज ट्राई करें नेल आर्ट का ये खूबसूरत तरीका

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मन के मालिक थे नरेंद्र झा, पसंद आए तभी करते थे फिल्में

2018 की शुरुआत से ही बौलीवुड से अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं. आज सुबह पांच बजे बौलीवुड व टीवी अभिनेता नरेंद्र झा का मुंबई से 100 किलोमीटर दूर वाड़ा स्थित उनके अपने फार्म हाउस में हार्ट अटैक से निधन हो गया. अफसोस यह वही फार्म हाउस है, जिसे नरेंद्र झा ने सुकून की जिंदगी जीने के लिए बनाया था.

खुद नरेंद्र झा ने गत वर्ष हमसे बात करते हुए अपने इस फार्म हाउस के बारे में कहा था – ‘‘मैंने मुंबई से सौ किलोमीटर दूर अपना छोटा सा होलीडे होम बना रखा है. जब शूटिंग नहीं होती हैं. तो मैं वहीं रहने के लिए चला जाता हूं, यहां से वहां पहुंचने में डेढ़ घंटे लगते हैं. वहां शांत मन से कुछ लेखन करता रहता हूं. ईश्वर की अनुकंपा से मेरी जिंदगी ठीकठाक चल रही है. मुझे इस बात की फिक्र नहीं है कि किसने कितने करोड़ कमा लिए हैं.’’

मधुबनी बिहार में जन्में और जेएनयू के छात्र रहे नरेंद्र झा ने से हमारी पहली मुलाकात सीरियल ‘‘कैप्टन हाउस’’ के सेट पर हुई थी. यह उनका शायद पहला या दूसरा सीरियल था. इसके बाद हमने उन्हें लगातार अभिनय के क्षेत्र में नित नए आयाम स्थापित करते तथा आगे बढ़ते हुए देखा. नरेंद्र झा ने सिर्फ बौलीवुड व भारतीय टीवी पर ही नहीं, मास्को टीवी और इंडोनेशियन टीवी पर भी काफी काम किया. नरेंद्र झा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वह टीवी और फिल्म दोनों माध्यमों में काम करते रहें. नरेद्र झा सिर्फ बौलीवुड तक ही सीमित नही थे. उन्होंने फिल्मकार जी वी अय्यर के साथ दो कन्नड़ फिल्में भी की थी.

उन्होंने हमेशा अच्छा काम करने की कोशिश की, खुद नरेंद्र झा ने हमसे कहा था – ‘‘यह सच है कि जिन फिल्मों में दो या तीन दृश्यों का किरदार होता है, उनसे बचने की कोशिश जरूर कर रहा हूं. क्योंकि मैं सिर्फ पैसे के लिए काम नहीं करता. मैं अपने आपको मनोरंजन देने के लिए भी काम करता हूं. मैं काम इंज्वाय करने के लिए करता हूं. मैं समझता हूं कि 2 या 3 दृश्यों का जो औफर लेकर आते हैं, उन्हें खुद यकीन नहीं होता है कि अंततः वह दृश्य फिल्म में रहेंगे भी या नहीं. मैं ईश्वर का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे दैनिक रूप से पैसा बटोरने की मजबूरी नहीं दी है. फिल्म ‘काबिल’ और ‘रईस’ में मैं हीरो नहीं था, पर इन दोनों फिल्मों में लोगों ने मेरे किरदारों और मेरी प्रतिभा को पहचाना. दोनों फिल्मों के किरदार महत्वपूर्ण हैं. मैं कभी यह नही सोचता कि मेरा करियर किस तरफ जा रहा है. मैं यह नही कहता कि ‘बेगर्स आर नौट चूजर्स’, पर कलाकार रूपी बेगर्स ऐसा है, जिनके पास अच्छा मकान व गाड़ी है. जिंदगी अच्छी चल रही हैं.’’

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नरेंद्र झा ने टीवी से फिल्मों तक का लंबा सफर अपनी अभिनय प्रतिभा, मेहनत, लगन के बलबूते पर तय करते हुए सफलता के नए आयाम स्थापित किए थे. वह ‘हैदर’, ‘हमारी अधूरी कहानी’, ‘घायल वंस अगेन’,  ‘मोहनजो दाड़ो’, ‘रईस’, ‘‘काबिल’’ सहित कई फिल्मों में स्टार कलाकारों के साथ महत्वपूर्ण किरदारों में नजर आए थें. 2017 में वह सोलो हीरो के रूप में फिल्म ‘‘विराम’’ में नजर आए थें, जिसका 2017 के ‘‘कौन्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ में वर्ल्ड प्रीमियर हुआ. जबकि इससे पहले 2005 में सुधांशु झा की फिल्म ‘एक दस्तक’ में और ‘माइ फादर इकबाल’ में भी वह हीरो थें.

नरेंद्र झा ने ‘‘कलर्स’’ पर प्रसारित हो चुके सीरियल ‘‘हवन’’ में आध्यात्मिक गुरू बापजी का किरदार निभाया था. जबकि निजी जिंदगी में वह किसी आध्यत्मिक गुरू को नहीं मानते थे. इस संबंध में उन्होंने एक बार हमसे कहा था – ‘‘मैं निजी जीवन में किसी आध्यात्मिक गुरू का नहीं, बल्कि अपने पिता का अनुयायी हूं. मेरे लिए मेरे पिता ही आध्यात्मिक गुरू हैं. मेरे पिता हाईस्कूल में प्रिंसिपल थे. उन्होंने मुझे जीवन में बहुत सी अच्छी शिक्षाएं दी हैं.

मैं मिथिला का ब्राम्हण हूं. दैनिक पूजा का कर्म करता हूं. एक कलाकार होने और शूटिंग की वजहों से मैं कई चीजें ऐसी हैं, जो नहीं कर पा रहा हूं. मसलन, मैं ब्राम्हण हूं और ब्राम्हण होने के नाते मुझे जनेउ धारण करना चाहिए. मगर जनेउ धारण करने और उसे अशुद्ध होने से बचाने के कुछ नियम हैं. पर मैं एक कलाकार होने के नाते उन नियमों का पालन नहीं कर पाता, इसलिए मैं जनेउ नहीं पहनता. ’’

सिनेमा में आए बदलाव के साथ जिस तरह उनका करियर आगे बढ़ना चाहिए था, उस तरह नहीं बढ़ा. उन्हें इस बात का गम भी था. कुछ माह पहले जब उनसे हमारी मुलाकात हुई थी, तो उन्होंने कहा था-‘‘सिनेमा बड़ी तेजी से बदल रहा है. लेकिन हालात कुछ ऐसे हो गए हैं कि सब कुछ कलाकार के हाथ में नहीं रह गया है. सिर्फ फिल्म कलाकार ही क्यों, आम जीवन में भी देखें तो बहुत सी चीजें इंसान के हाथ में नहीं रह गयी हैं. अब हालात ऐसे हैं कि बहुत सी चीजों को आप अपना जामा नही पहना सकते. कुछ चीजें अपने आप होती रहती हैं. कई बार मेरे दिमाग में यह सवाल उठता है कि मेरे करियर में इस तरह के किरदार आ रहे हैं. क्या मुझे स्वीकार करना चाहिए? क्या कम डिग्निटी वाले या छोटे किरदार निभाने चाहिए. यह सारे सवाल ऐसे हैं, जो मायने रखते हैं.’’

अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए नरेंद्र झा ने कहा था – ‘‘मैं ऐसा मानता हूं. मैं मानकर चलता हूं कि निर्देशक के विजन के हिसाब से वह मुझे जिस किरदार के लिए उचित समझता है, उसी किरदार के लिए लेगा. मेरे कहने पर दूसरे किरदार के लिए नहीं लेगा. मैं इस बात पर भी यकीन करता हूं कि फिल्म एक निर्देशक का बच्चा होता है और निर्देशक को अपने विजन, अपनी सोच के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. यदि मैं एक वाक्य में कहूं तो हमारे हिस्से जो सम्मानजनक व अच्छा किरदार आता है, मैं उसे स्वीकार कर लेता हूं. फिर उसे परदे पर बेहतर तरीके से पेश करने की पूरी कोशिश करता हूं.’’

नरेंद्र झा ने मन माफिक काम करने के मकसद से ही अपनी प्रोक्डक्शन कंपनी शुरू की थी, जिसके तहत उन्होने कुछ लघु फिल्में बनायीं. पर वह फिल्में अब तक दर्शकों तक नहीं पहुंच पायी. इन फिल्मों का जिक्र करते हुए नरेंद्र झा ने हमसे कहा था – ‘‘मैंने कुछ लघु फिल्में बनायी हैं. मैं कुछ फिल्में बनाना चाहता हूं. मैं जिस जगह से आया हूं, वहां से जुड़ी हुई चीजों को लेकर मैं कुछ काम करना चाहता हूं. आप बहुत जल्द देखेंगे कि मैंने कुछ लघु फिल्मों का निर्माण किया है, जो कि मेरे इलाके से जुड़ी हुई हैं.’’ अफसोस कि नरेंद्र झा के आसामायिक निधन से उनका यह सपना अधूरा ही रह गया.

नरेद्र झा की अधूरी फिल्में

नरेंद्र झा के असामायिक निधन से उनकी कुछ फिल्में अधूरी रह गयी हैं. वह संग्राम सिंह के साथ एक फिल्म कर रहे थें, जो कि अधूरी है. इसके अलावा नरेंद्र झा ने श्रद्धा कपूर व प्रभाष के साथ फिल्म ‘‘साहो’’ कर रहे थे. इतना ही नही सलमान खान के साथ नरेंद्र झा ने फिल्म ‘‘रेस 3’’ भी अनुबंधित की थी, जिसकी वह शूटिंग ही शुरू नहीं कर पाए.

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नरेंद्र झा का निधन, बौलीवुड में शोक की लहर

बौलीवुड में इस साल एक के बाद एक कलाकारों की मौत की खबर मिल रही है. श्रीदेवी, शम्मी आंटी और वडाली ब्रदर्स के छोटे भाई प्यारेलाल के निधन के बाद अब खबर है कि बौलीवुड और टीवी के जाने मानें कलाकार नरेंद्र झा अब हमारे बीच नहीं रहे. खबर है कि ‘घायल वंस अगेन’ में विलेन का किरदार निभाने वाले 55 साल के अभिनेता नरेंद्र झा ने आज तड़के सुबह पांच बजे अपने फार्म हाउस पर अंतिम सांस ली. बताया जा रहा है कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ है.

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विज्ञापनों से अपने करियर की शुरुआत करने वाले नरेंद्र झा टीवी और फिल्मों में अब एक जाना-पहचाना नाम हैं. उन्होंने रईस, हमारी अधूरी कहानी, मोहनजोदारो, शोरगुल और फोर्स-2 के अलावा करीब दो दर्जन से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है. नरेंद्र ‘रेस 3’ का भी हिस्सा थे. उन्होंने हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु आदि भाषाओं में भी फिल्में की हैं.

टीवी सीरियल्स की बात करें तो उन्होंने ‘बेगुसराय’, ‘छूना है आसमान’, ‘संविधान’ जैसे कई टीवी धारावाहिकों में काम किया है. नरेंद्र झा ने टेलीविजन पर आए पौराणिक सीरियल ‘रावण’  में भी लीड किरदार निभाया था और उनके रोल को खूब पसंद भी किया गया था.

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बिहार के जन्में नरेंद्र झा बहुत ही मस्तमौला फितरत के शख्स थे, और बहुत ही मृदुभाषी भी थे. उन्होंने एक बार बातचीत में कहा था कि उनके घरवाले भी चाहते थे कि वे आईएएस बनें क्योंकि बिहार के अधिकतर युवाओं का यही टारगेट भी होता है. मैं भी शुरू में कुछ ऐसा ही सोचता था लेकिन एक्टिंग में मन रमता था तो मैंने उसी राह पर चलने का फैसला किया.

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इस गेंदबाज को सिर में लगी चोट, खुद शेयर की तस्वीर

औस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज मिचेल जौनसन सोमवार को ट्रेनिंग के दौरान जिम में हुए एक हादसे में जबरदस्त रूप से घायल हो गए हैं. दरअसल, जौनसन का सिर लोहे की एक छड़ से टकरा गया, जिससे उनका सिर फट गया. इसके तुरंत बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया. जौनसन को सिर में 16 टांके लगे हैं. फिलहाल वह ठीक हैं.

बता दें कि मिचेल जौनसन आगामी आईपीएल की तैयारियों में लगे हैं, जिसमें वह कोलकाता नाइटराइडर्स की ओर से खेलते नजर आएंगे. कोलकाता की टीम ने जनवरी में हुई नीलामी के दौरान जौनसन को 2 करोड़ रुपए में खरीदा था. इससे पहले जौनसन किंग्स इलेवन पंजाब और मुंबई इंडियंस जैसी टीमों के साथ खेल चुके हैं. मिचेल जौनसन पाकिस्तान सुपर लीग (पीएसएल) का भी हिस्सा हैं, लेकिन निजी कारणों से वह इस लीग में नहीं खेल रहे हैं.

खुद किया खुलासा: 36 वर्षीय इस धुरंधर गेंदबाज ने अपनी चोट के बारे में खुद ही खुलासा किया है. दरअसल, जौनसन ने अपनी चोट की जानकारी इंस्टाग्राम पर दी है और इसकी तस्वीर भी साझा की है. तस्वीर साझा करते हुए जौनसन ने लिखा – ‘अगर आपको खून, घाव पसंद नहीं हैं तो इस तस्वीर को ना देखें! जो मैंने अपने साथ की हैं, उनमें से यह बेस्ट चीज नहीं है, लेकिन मैं अब ठीक हूं.’ जौनसन ने अपनी तस्वीर के साथ #toohardtoexplain #dontfightchinupbar #stilldontknowhowitspossible जैसे कैप्शन भी दिए हैं.

जौनसन की चोट गंभीर नहीं है और आईपीएल में उनके भाग लेने को लेकर कोई अंदेशा नहीं है. जौनसन इस बार नई टीम कोलकाता नाइटराइडर्स और नए कप्तान दिनेश कार्तिक के साथ खेलते नजर आएंगे. उल्लेखनीय है कि जौनसन साल 2015 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं. अपने करियर के दौरान जौनसन ने 73 टेस्ट, 153 वनडे, और 30 टी20 मैच खेले.

रिटायरमेंट के बाद अब जौनसन विभिन्न क्रिकेट लीग में खेलते नजर आते हैं. इनमें बिगबैश लीग और आईपीएल प्रमुख हैं. साल 2013-14 में एशेज सीरीज के दौरान जौनसन ने अपनी यादगार खतरनाक गेंदबाजी से इंग्लैंड के बल्लेबाजों की हालत पतली कर दी थी.

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एसबीआई ने बंद किये 41 लाख बैंक अकाउंट, कहीं आपका तो नहीं

सूचना के अधिकार (RTI) से खुलासा हुआ है कि न्यूनतम जमा राशि नहीं रखने पर ग्राहकों से जुर्माना वसूली के प्रावधान के कारण मौजूदा वित्तीय वर्ष के शुरुआती 10 महीनों (अप्रैल-जनवरी) के दौरान देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई में करीब 41.16 लाख खाते बंद कर दिये गये हैं.

मध्यप्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने बताया कि उनकी आरटीआई अर्जी पर एसबीआई के एक आला अधिकारी ने उन्हें 28 फरवरी को भेजे पत्र में यह जानकारी दी. इस पत्र में बताया गया कि न्यूनतम जमा राशि उपलब्ध नहीं होने पर दंड शुल्क लगाने के प्रावधान के कारण स्टेट बैंक औफ इंडिया द्वारा वित्तीय वर्ष 2017-18 में 31 जनवरी तक बंद किये गये बचत खातों की संख्या लगभग 41.16 लाख है.

चौंकाने वाली जानकारी सामने आई

न्यूनतम जमा राशि नहीं रखे जाने पर जुर्माना वसूली के कारण एसबीआई में बहुत बड़ी तादाद में बचत खातों के बंद होने की चौंकाने वाली जानकारी उस वक्त सामने आयी, जब देश के सबसे बड़े बैंक ने इस में पेनाल्टी को एक अप्रैल से 75 प्रतिशत तक घटाने का अहम फैसला किया है. देश में गरीब तबके के लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने के सरकार के महत्वाकांक्षी अभियान के बीच खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा इस मद में जुर्माना वसूली को लेकर लम्बे समय से बहस चल रही है.

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चालू रह सकते थे 41.16 लाख खाते

गौड़ ने कहा, ‘अगर एसबीआई इस मद में जुर्माने की रकम को घटाने का निर्णय समय रहते कर लेता, तो उसे 41.16 लाख बचत खातों से हाथ नहीं धोना पड़ता. इसके साथ ही, इन खाताधारकों को परेशानी नहीं होती जिनमें बड़ी तादाद में गरीब लोग शामिल रहे होंगे.’ एसबीआई की तरफ अकाउंट में बैलेंस मेंटेन नहीं करने पर मेट्रो और शहरी इलाकों में मिनिमम बैलेंस नहीं रखने पर चार्ज 50 रुपए से घटाकर 15 रुपए कर दिया गया है.

40 रुपये से घटाकर 12 रुपए किया

दूसरी तरफ छोटे शहरों में चार्ज को 40 रुपये से घटाकर 12 रुपए कर दिया गया है. इसी तरह ग्रामीण इलाकों में मिनिमम बैलेंस नहीं रखने पर अब 40 रुपए के बदले 10 रुपए ही चार्ज लगेगा. इन चार्ज में जीएसटी अलग से लगेगा. बैंक के रिटेल और डिजिटल बैंकिंग के एमडी पीके गुप्ता ने कहा कि हमारे ग्राहकों की भावना और उनके फीडबैक को लेने के बाद हमने ये कदम उठाया है. उनके मुताबिक बैंक अपने ग्राहकों के हितों का ध्यान पहले रखता है.

25 करोड़ लोगों को होगा फायदा

बैंक के इस कदम से 25 करोड़ खाताधारकों को फायदा होगा. अभी एसबीआई में करीब 41 करोड़ सेविंग अकाउंट हैं. इसमें 16 करोड़ खाते प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खोले गए हैं. बैंक ने ग्राहकों को मुफ्त में रेगुलर सेविंग अकाउंट को बेसिक सेविंग अकाउंट में बदलने की सुविधा भी दी है.

लोन किए थे महंगे

SBI ने हाल ही में डिपौजिट रेट और लेंडिंग रेट में बढ़ोतरी की थी. हाल ही में एसबीआई ने लोन की दरें 0.25 फीसदी तक बढ़ा दी थी. एसबीआई ने MCLR (मार्जिनल कौस्ट औफ फंड आधारित लेंडिंग रेट) की दरों में बढ़ोतरी की थी. इसी दर को आधार बनाकर बैंक लोन देते हैं. इसके चलते होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन जैसे सभी लोन महंगे हो गए.

कितनी बढ़ी थी दरें

एसबीआई ने 3 साल की एमसीएलआर दरों को 8.10 फीसदी से बढ़ाकर 8.35 फीसदी किया था. इसी तरह दो साल की MCLR दरों को 8.05 फीसदी से बढ़ाकर 8.25 फीसदी कर दिया था. एक साल की एमसीएलआर दर 7.95 फीसदी से बढ़कर 8.15 फीसदी हो गई है. अप्रैल 2016 के बाद पहले बार SBI ने दरों में बढ़ोतरी की थी.

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साप्ताहिक बाजार ग्राहक और दुकानदार का जलाए चूल्हा

भारतीय जनता पार्टी की पौलिसियां ऐसी हैं कि बड़े अमीर उद्दोगपतियों के दिन अच्छे आ रहे हैं पर छोटे व्यापारियों पर गाज गिर रही है. शेयर मार्केट में जबरदस्त उछाल आ रहा है पर साधारण बाजारों व साप्ताहिक बाजारों में ठंडक बढ़ रही है. यह सरकार की जीएसटी, नोटबंदी, सीलिंग, औनलाइन अनुमतियों, कैशलैस व्यापार जैसी नीतियों की वजह से हो रहा है.

इन सब बातों से तमाम सवाल दिलोदिमाग पर गहरा असर करते हैं जैसे क्या कोई आदमी कम जमापूंजी लगा कर 10-12 कामगारों को अपने पास रख कर मोबाइल फोन बना सकता है और अगर ऐसा हो भी जाए तो क्या वह अपने बनाए गए मोबाइल फोन बाजार में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है?

ऐसा मुमकिन सा नहीं लगता है, क्योंकि बाजार में कम दामों पर नई टैक्नोलौजी वाले मोबाइल फोन मुहैया हैं. मुहैया क्या उन की भरमार है जो बड़े पैमाने पर बनते हैं जिन में सैकड़ों लोग काम करते हैं और अरबों की पूंजी लगी होती है-धन्ना सेठों की.

दूसरा सवाल. क्या कोई आदमी कम पूंजी लगा कर 10-12 कामगारों को अपने पास रख कर अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने का कारोबार कर के मुनाफा कमा सकता है, चाहे उस का बनाया गया सामान ब्रांडेड न भी हो. हां, ऐसा हो सकता है और हो भी रहा है. वजह, ऐसे घरेलू सामान बनाने और उसे बेचने के लिए बड़े बाजार या किसी मौल की जरूरत नहीं होती है बल्कि अगर उन्हें अलगअलग शहरों, कसबों और यहां तक कि गांवों के साप्ताहिक बाजारों में भी बेचा जाए तो ग्राहक खूब मिल सकते हैं.

साप्ताहिक बाजरों की रौनक ही अलग होती है. वहां छोटेछोटे दुकानदारों का जमावड़ा होता है. वहां लोग अपनी दैनिक जिंदगी से जुड़ी चीजें खरीदते हैं. तकरीबन दोपहर को लगने वाले ऐसे बाजार शाम का अंधेरा होने के बाद धीरेधीरे उठने लगते हैं. कुछ तो रात के 10-11 बजे तक भी रौनक बनाए रखते हैं.

ऐसे बाजारों में सबकुछ बिकता है जैसे सब्जियां, कपड़े, मसाले, फल, रसोई के दूसरे सामान, बच्चों के खिलौने, कपड़े व नकली चमचमाते गहने तक. कहींकहीं पर तो पुराने मोबाइल फोन, बिजली का सामान, मिठाइयां, नमकीन व खानेपीने के दूसरे सामान भी मिल जाते हैं. मोलभाव करो. एक चीज पसंद न आए तो दूसरी चीज खरीद लो.

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ऐसे साप्ताहिक बाजार महंगाई की मार से बचने के उपाय लगते हैं. इन में सस्ती चीजें आसानी से मिल जाती हैं. यहां तक कि दालचावल, मसाले किलो के हिसाब से तो मिलते ही हैं, साथ ही अगर कोई 100 ग्राम या पाव, किलो भी खरीदना चाहे तो उसे मायूसी हाथ नहीं लगती है.

22 साल का रमेश पिछले 4 साल से अपने पिता के साथ साप्ताहिक बाजार में दुकान लगाता है. रमेश रहता तो दिल्ली के नांगलोई इलाके में है लेकिन उस की दुकान हर दिन अपनी जगह बदल लेती है. कभी दक्षिणपुरी में तो कभी कल्याणपुरी में. कभी चिराग दिल्ली में तो कभी मालवीय नगर में. इसी तरह दूसरी तमाम जगहों पर भी.

रमेश की दुकान इन साप्ताहिक बाजारों में उस की साइकिल पर लगती है जिस में वह औरतों और बच्चों के कपड़े बेचता है. इस साइकिल पर साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट और बच्चों के कपड़े टांगे जाते हैं और ग्राहकों को लुभाने के लिए रमेश अजीब तरह की आवाज दे कर उन्हें अपने पास बुलाता है.

कुछ थोड़े बड़े दुकानदार भी होते हैं. उन में से एक हैं 51 साल के ज्ञानीदास. उन की दुकान लकड़ी के तख्तों पर सजती है. वे चादरें बेचते हैं. उन की दुकान पर चादरों की भरमार रहती है. ज्ञानीदास बड़े दुकानदार हैं. वे गल्ले पर बैठते हैं जबकि उन के 2 बेटे और 3 नौकर ग्राहकों से रूबरू होते हैं, पर हरदम उन की पैनी नजर हर ग्राहक पर रहती है.

तीनों नौकरों का काम है हाथ हिलाहिला कर और शोर मचा कर लोगों को अपनी दुकान की ओर खींचना. ज्ञानीदास की नजर अपने गल्ले के अलावा नौकरों पर भी रहती है कि कहीं वे कामचोरी तो नहीं कर रहे हैं.

अपनी दुकान के बारे में ज्ञानीदास ने बताया, ‘‘मैं पिछले 28 साल से इस धंधे में हूं. साप्ताहिक बाजार में ग्राहक को यह यकीन दिलाना बड़ा जरूरी होता है कि वह जो सामान हम से खरीद रहा है वह सही है या नहीं. चादर बेचने के धंधे में सब से बड़ी मुसीबत यह होती है कि ग्राहक को चादर के छोटी होने, धो कर सिकुड़ने या रंग निकल जाने का डर रहता है.

‘‘हमारे पास कुछ चादरें ऐसी होती हैं जिन की हम गारंटी नहीं लेते हैं, पर जरूरी नहीं है कि वे खराब ही निकलें. ऐसी चादरें अमूमन सस्ती होती हैं जिन्हें मजदूर तबका ज्यादा खरीदता है. थोड़ी महंगी चादरों का हमें पता होता है कि वे ग्राहक को धोखा नहीं देंगी.’’

ऐसे साप्ताहिक बाजारों में कुछ लोगों की रोजीरोटी दुकानदारों से भी होती है. पूर्वी दिल्ली इलाके में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में 49 साल के मोहम्मद अब्दुल पिछले कई सालों से दुकानदारों को बैटरी से चलने वाली ऐसी लाइटें किराए पर देते हैं जो शाम के बाद उन के बहुत काम आती हैं.

इस बारे में मोहम्मद अब्दुल ने बताया, ‘‘मैं यहां के दुकानदारों को 10 रुपए रोजाना के हिसाब से एक बैटरी लाइट किराए पर देता हूं. मेरी तकरीबन 150 ऐसी लाइटें किराए पर चढ़ती हैं. इस से फायदा यह होता है कि बहुत से दुकानदारों को बिजली की समस्या से नहीं जूझना पड़ता है. हमारी बैटरी लाइटें दूसरे साप्ताहिक बाजारों में भी किराए पर भेजी जाती हैं.’’

नमकीन बिस्कुट और बेकरी में बनने वाली खाने की दूसरी चीजें बेचने वाले श्यामचरण ‘बिसकुट वाले’ बताते हैं, ‘‘जिस भी साप्ताहिक बाजार में हम दुकान लगाते हैं, वहां पर कई ग्राहक तो हमारे परमानैंट ग्राहक बन जाते हैं. हमारा माल लोकल बेकरी का बना होता है. लेकिन हमारी कोशिश यही रहती है कि ग्राहक को चीज अच्छी मिले ताकि वह बारबार हम से ही सामान खरीदे.

‘‘लेकिन इन साप्ताहिक बाजारों में कुछ समस्याएं भी होती हैं. सरकारी आदमी दुकान लगाने की परची तो हम से काट लेते हैं, पर सुविधाओं के नाम पर हमें ज्यादा कुछ नहीं मिलता है. साफसफाई की जिम्मेदारी भी हम पर आ जाती है. सुरक्षा के इंतजाम भी खास नहीं रहते हैं. जेब काटने की वारदातें भी आएदिन होती रहती हैं. ग्राहक सामान खरीदने से ज्यादा अपनी जेब में रखे बटुए के लिए फिक्रमंद रहते हैं.

‘‘चूंकि ऐसे साप्ताहिक बाजार हमारी रोजीरोटी हैं, इसलिए सरकार को चाहिए कि वह हमें दुकान लगाने के लिए शैड वगैरह मुहैया करा दे जिस से हर मौसम में हम बेखौफ अपनी दुकान चला सकें. इस से ग्राहकों को भी किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.’’

सवाल उठता है कि अगर ऐसे किसी साप्ताहिक बाजार में किसी नए आदमी को दुकान लगा कर अपना कारोबार जमाना है तो वह क्या करे?

दरअसल, कहने को ये चलते फिरते सातों दिन के बाजार होते हैं, पर इन में दुकान लगाने वाले लोगों की जगह धीरेधीरे पक्की होती जाती है. नगर निगम इन से 15 रुपए रोजाना की परची काट कर शुल्क वसूल करता है. एक बार जम जाने के बाद दुकानदार चाहे तो अपनी जगह को बेच सकता है या फिर किराए पर भी दे सकता है जिस से कोई नया दुकानदार उस जगह का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन कोई नया दुकानदार कहीं भी किसी भी जगह पर अपनी दुकान सजा कर नहीं बैठ सकता है क्योंकि हर साप्ताहिक बाजार में बैठने वाले दुकानदारों की एक तय संख्या होती है. नगरनिगम वाले और पुराने दुकानदार नए लोगों को आने नहीं देते.

बहरहाल, गांवकसबों और शहरों में लगने वाले ऐसे साप्ताहिक बाजार बहुत से लोगों के लिए जीवनरेखा बन गए हैं. दुकानदार अलगअलग इलाकों में जा कर सामूहिक दुकानें लगाते हैं और रोजमर्रा की चीजों को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं. इस से ग्राहकों को अपने बजट के हिसाब से सस्ता सामान मिल जाता है, साथ ही दुकानदारों के घरों में भी दोनों समय का चूल्हा आसानी से जलता रहता है.

कानून को ऐसे दिखाते हैं ठेंगा

भोगलजंगपुरा मार्केट एसोसिएशन की एक याचिका के मद्देनजर हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने अपने आदेश में दक्षिणी दिल्ली नगरनिगम को यह तय करने का निर्देश दिया था कि भोगलजंगपुरा इलाके में चल रहा साप्ताहिक मंगल बाजार अब वहां हर दिन सोमवार को लगे.

हाईकोर्ट ने कहा कि जब नगरनिगम कानून में प्रावधान है कि किसी इलाके में अवकाश होगा उसी दिन वहां साप्ताहिक बाजार लगेगा, तो इस कानून का पालन क्यों नहीं हो रहा है. जब भोगलजंगपुरा इलाके में साप्ताहिक अवकाश सोमवार को होता है तो किस आधार पर वहां पटरी पर लगने वाले साप्ताहिक बाजार को मंगलवार को लगाने की इजाजत दी गई.

इस के अलावा साप्ताहिक बाजारों में दूसरी कमियां भी देखी जाती हैं. वहां कितने दुकानदार बैठेंगे और कितनों का हिसाब रखा जाता है, इस में भी गड़बड़ी की जाती है. दुकानदार ज्यादा होते हैं जबकि रिकौर्ड में उन्हें कम दिखाया जाता है. उन से वसूले जाने वाले शुल्क में भी गड़बड़ी होती है. अगर किसी वार्ड में 3 से 4 साप्ताहिक बाजार लगते हैं तो वहां नगरनिगम के रिकौर्ड में एक ही साप्ताहिक बाजार दिखाया जाता है.

साथ ही, साप्ताहिक बाजारों से गैरकानूनी वसूली करने वाले गुंडों का भी आतंक कम नहीं है. नगरनिगम भी जानता है कि दुकानदारों से जबरन वूसली होती है जिस से नगरनिगम को नुकसान होता है, क्योंकि जमीन तो उस की होती है. नगरनिगम इस सिलसिले में सही फैसले करने का आश्वासन तो दुकानदारों को देता है, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आता है.

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