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आखिर कहां हैं गूगल और फेसबुक के देसी विकल्प

एक दौर था जब आईटी सैक्टर में भारत की तूती बोलती थी. दावा किया जाता था कि आईटी यानी सूचना तकनीक की मशीनी दुनिया में भारतीय युवा प्रतिभाओं ने जो कमाल किया है, उस के दम पर भारत पूरे विश्व का ग्रोथ इंजन बना हुआ है. इस की 2 वजहें थीं, पहली-कंप्यूटर, इंटरनैट विषयों को समझने की सही वक्त पर शुरुआत और दूसरी, युवाओं का अंगरेजी ज्ञान.

इन 2 वजहों से भारतीय युवा देखतेदेखते पूरी दुनिया पर छा गया, लेकिन यह कमाल सिर्फ सर्विस सैक्टर में हुआ यानी हम ने जो ज्ञान हासिल किया वह अमेरिका, ब्रिटेन आदि मुल्कों में नौकरी पाने में लगाया. कुछ मानो में यह कमाल आज तक जारी है. गूगल के सीईओ के रूप में सुंदर पिचाई की मौजूदगी यह बात साबित करती है.

लेकिन ऐसा चमत्कार भारत और भारतीय प्रतिभाएं वहां नहीं कर सकतीं, जहां चीन ने बाजी मार ली. यह मामला गूगल, फेसबुक, ट्विटर, अलीबाबा और माइक्रोसौफ्ट जैसी इंटरनैट सेवाएं विकसित करने का है. इन ज्यादातर चीजों में किसी न किसी स्तर पर भारतीय आईटी पेशेवरों ने अपना योगदान दिया है, लेकिन ऐसा ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कोई कारनामा भारतीय जमीन पर नहीं हो सका. इस के लिए जहां एक ओर हमारे देश के नीतिनिर्धारक नेता जिम्मेदार हैं जो देश और समाज को ऐसे मामलों में कोई नई दृष्टि व योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वैसा मंच नहीं दे पाते हैं, तो दूसरी ओर बड़ी समस्या जनता के स्तर पर है.

भारत की जनता एक ओर तो भेड़चाल में विश्वास करती है, विदेशी चीजों के विकल्प के रूप में किसी नए प्रयोग को आजमाने में नाकभौं सिकोड़ती है तो दूसरी तरफ, देश की भलाई के लिए कोई पाबंदी लगाई जाएगी, तो लोकतंत्र की दुहाई दे कर वह सरकार को कोसने में जुट जाती है.

दिक्कतें देसी, हल भी हों देसी

देश में गूगल, फेसबुक आदि के देसी विकल्प बनाने का इस संबंध में एक उदाहरण हो सकता है. इस की बात देश में गाहेबगाहे उठती रही है. दिसंबर 2017 में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री जयंत सिन्हा ने ऐसी ही एक बात पुणे में आयोजित कार्यक्रम ‘इंडिया आइडियाज कौन्क्लेव’ में कही थी. भारतीय उद्यमियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर समस्याएं देसी हैं, तो उन के समाधान भी देसी होने चाहिए. इस के लिए भारत को गूगल, फेसबुक, अलीबाबा जैसी अंतर्राष्ट्रीय महारथी कंपनियों जैसी कामयाबी के समकक्ष अपना मौडल खड़ा करना चाहिए. ताकि जब देसी समस्याओं के समाधान की बात उठे, तो उन्हें हल करने के तरीके हमारे अपने हों.

उल्लेखनीय है कि हमारी सरकारें इस मसले को ले कर लगातार चिंता व्यक्त करती रही हैं. प्रकाश जावड़ेकर भी वर्ष 2017 में लोकसभा में फेसबुक, ट्विटर, गूगल और माइक्रोसौफ्ट आदि के देसी विकल्प बनाने की बात कह चुके हैं.

लोकसभा में आईआईआईटी बिल (प्राइवेटपब्लिक मोड) 2017 पेश करते वक्त केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने यह अफसोस जताया था कि भारतीय आईटी प्रतिभाओं को भले ही दुनिया सलाम ठोकती हो, लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस में कई कमियां और विसंगतियां हैं, जिन का खमियाजा आईटी सैक्टर भुगत रहा है. सब से बड़ी खामी यह है कि भारत आज तक न तो अपना माइक्रोसौफ्ट बना पाया, न फेसबुक, न ट्विटर, न गूगल. ऊपर से विडंबना यह है कि इन सारी कंपनियों में भारतीय पेशेवर ही नौकरी कर रहे हैं और शीर्ष पदों पर काबिज हैं. ये प्रतिभाएं भी उन अमेरिकी, यूरोपीय चुनौतियों का विकल्प नहीं पेश कर पाईं जिन का आज दुनिया में सिक्का चल रहा है.

पिछली यूपीए सरकार के समय तत्कालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने भी इंटरनैट के लिए गूगल की तरह स्वदेशी सर्च इंजन की जरूरत बताई थी.

मालिक नहीं महज ग्राहक हैं हम

यह सच है कि आईटी सैक्टर के अगुआ देश (भारत) के लोग अभी भी इंटरनैट के उपभोक्ता बने हुए हैं, आविष्कारक नहीं. इस से रोजगार, कमाई, बौद्धिक संपदा अधिकार आदि कई मुद्दों पर देश को पिछड़ना पड़ रहा है. हम सिर्फ बाजार, ग्राहक हैं. यह बात इस से साबित होती है कि देश में सामान और सेवाएं बेचने वाले ई-कौमर्स सरीखे काफी इंतजाम हुए हैं, जैसे फ्लिपकार्ट, मिंत्रा, जबौंग, बिग बास्केट और शादीडौटकौम जैसी वैबसाइटों की भरमार है. लेकिन ये सभी सामान और सेवाएं खरीदनेबेचने के प्रबंधों से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

ये अमेजोन और इसी तरह की अन्य विदेशी ई-कौमर्स कंपनियों की नकल पर खड़ी की गई हैं. इन में आविष्कार वाली कोई बात नहीं है. इन से कुछ रोजगार तो अवश्य मिले पर देश की आविष्कार वाली वह छवि नहीं बनी, जो हमारी कथित पूरब का ज्ञान वाली इमेज के हिसाब से बौद्धिक अधिकारों (पेटैंट) की फीस से मिलने वाली बेशुमार पूंजी पैदा करती. यह काम तभी हो सकता था जब भारत में ही गूगल, फेसबुक जैसी चीजों के देसी मौडल खड़े किए जाते और उन्हें अपनाया जाता.

देश को इंटरनैट के ऐसे देसी विकल्प सिर्फ इसलिए नहीं चाहिए कि इसी मामले में हम अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे, बल्कि इस की जरूरत कई अन्य वजहों से है, जिस का एक खुलासा वर्ष 2017 में पीडब्ल्यूसी ग्लोबल 100 सौफ्टवेयर लीडर्स के चयन वाली रिपोर्ट से हो चुका है. इस रिपोर्ट में दुनिया की शीर्ष 100 आईटी कंपनियों का वैश्विक चयन किया गया था, जिस में भारत की 16 कंपनियां स्थान बना सकती थीं.

रिपोर्ट के मुताबिक, आईटी सैक्टर में कमाई के मामले में साल 2011 में उभरते बाजार में भारत की 5वीं रैंकिंग थी, जबकि सौफ्टवेयर रैवेन्यू के मामले में 2,738 मिलियन डौलर की कमाई के साथ चीन इस लिस्ट में सब से ऊपर था. चीन के बाद इसराईल, रूस, ब्राजील का नंबर था और उस के बाद भारत का. 100 देशों की लिस्ट में 5वीं रैंकिंग बहुत बुरी नहीं मानी जा सकती, लेकिन यह उपलब्धि हमारे लिए गौरव का विषय नहीं है. कुछ समय पहले तक युवा प्रतिभाओं के बल पर भारत ने अमेरिका की सिलिकौन वैली से ले कर दुनिया के कई विकसित देशों में जिस तरह आईटी सैक्टर में अपनी योग्यता का परचम लहराया था, उस से लगता था कि दशकों तक भारत को कम से कम इस मामले में कोई चुनौती नहीं मिल सकेगी.

भारत में पिछले 2 दशकों में जो बीपीओ इंडस्ट्री खड़ी हुई, कहा जाता था कि उस में उसे कोई चुनौती नहीं है. लेकिन न सिर्फ इस सैक्टर में भारत धीरेधीरे अपनी चमक खो रहा है, बल्कि इनोवेशन (नवाचार) के मामले में भी भारत पिछड़ गया है.

हालात यह है कि आज हम माइक्रोसौफ्ट विंडोज, गूगल, फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसी तमाम चीजों के ग्राहक या उपभोक्ता मात्र बन कर रह गए हैं. इस मामले में हमारे आविष्कार जरा भी नहीं हैं. हालांकि, यहां एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि भारतीय आईटी उद्योग में ऐसी क्या समस्याएं पैदा हुईं जिन्होंने उसे ऐसे सैक्टर में आगे बढ़ने से रोक दिया, जिस में कभी उस की तूती बोलती थी.

गूगल की नहीं चलने दी चीन ने

आईटी तकनीक के साथसाथ अंगरेजी सीख कर इस क्षेत्र में भी अब चीन, फिलीपींस जैसे देश भी प्रतिस्पर्धा देने की हैसियत में आ गए हैं. ये देश कभी अंगरेजी बोलचाल की शैली और लहजे में कमियों के कारण काफी पिछड़े हुए थे. आईटी संबंधी ग्लोबल कामकाज में उन का दखल अब आईटी ज्ञान की बदौलत बढ़ा है. चीन जैसे मुल्क सौफ्टवेयर में ही नहीं, बल्कि हार्डवेयर के कामकाज में कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं. ये मुल्क ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि इन्होंने न केवल भारत जैसे देशों को उन क्षेत्रों मेें कड़ी टक्कर दी जिन का इन्हें विशेषज्ञ माना जाता था बल्कि उन्होंने आईटी के सभी क्षेत्रों में नए अवसरों को तलाशा और उन का दोहन किया.

उल्लेखनीय यह भी है कि चीन ने दुनिया के अग्रणी ब्रैंडों को अपने यहां हावी नहीं होने दिया और उन के बेहतरीन देसी विकल्पों को पेश कर के दिखा दिया कि न तो वह अपने बाजार का किसी अन्य देश या विदेशी कंपनी को दोहन करने देगा और न ही खुद होड़ में बने रहने का कोई मौका गंवाएगा. चीन ने अपने यहां न तो गूगल की एक चलने दी और न ही ट्विटरफेसबुक की. इन के विकल्प उस ने पेश कर दिए हैं और वे बेहद प्रचलित हैं.

एक इलाज है पाबंदी

आतंकी गतिविधियों पर रोक, साइबर सुरक्षा, खोज की नई तकनीक विकसित करने और कमाई जैसे कुछ कारण हैं जिन के आधार पर देसी फेसबुक, ट्विटर और सर्च इंजन गूगल की इस जरूरत को वाजिब ठहराया जा सकता है. हमारे देश में इस आवश्यकता को परखने का एक प्रमुख नजरिया यह भी हो सकता है कि चीन की तरह भारत में इंटरनैट एक दायरे में रह कर काम करे. इसलिए बहुत से लोग इस हदबंदी के पैरोकार होंगे.

आतंकी गतिविधियों से ले कर अश्लील सामग्रियों के प्रसार तक कई ऐसी आपत्तिजनक बातें और चीजें भारत जैसे लोकतांत्रिक  देश में भी इंटरनैट के लिए कुछ बंदिशों और कायदेकानूनों की मांग करते हैं. पर इंटरनैट पर जैसी लगाम पड़ोसी मुल्क चीन में लगाई गई है, क्या वैसा सबकुछ भारत में मुमकिन है? फिलहाल नहीं.

चीन इंटरनैट पर ऐसी पाबंदी इसलिए लगा पा रहा है क्योंकि वहां इन चीजों के विकल्प बनाए गए हैं. वहां अगर गूगल को काम नहीं करने दिया जाए, तो उस का बेहतर विकल्प बायदु डौटकौम हाजिर है. इसी तरह  यदि ट्विटर बंद कर दिया जाता है तो चीन उस के बदले वेईबो पर वही सेवा देने लगता है. यही नहीं, चीन की सरकार इंटरनैट के हर डाटा कोे संचालित करने वाले विशालकाय सर्वर भी बीजिंग में स्थापित करना चाहती है ताकि सारे डाटा को जब चाहे रोका और खंगाला जा सके.

साफ है कि यदि भारत को चीन जैसा नियंत्रित इंटरनैट चाहिए तो उसे गूगल, ट्विटर और फेसबुक जैसी चीजों का विकल्प देना होगा क्योंकि अब इन के बिना दुनिया चल नहीं सकती. पर देसी इंटरनैट विकल्पों की मांग का अकेला यही औचित्य नहीं है. कहने को तो इस के लिए सीधे गूगल, ट्विटर, फेसबुक से बात की जा सकती है कि वे हमारे देश के लिए अलग से गूगल आदि ला दें. चीन में ऐसा प्रयोग किया जा चुका है.

चीनी सरकार की बंदिशों के आगे झुकते हुए गूगल ने 2006 में चीन में अपना सैल्फ सैंसर्ड सर्च इंजन लौंच किया था. तब उस ने चीन सरकार के कुछ दिशानिर्देशों का पालन करने की हामी भरी थी, लेकिन इस से काम नहीं चला. लिहाजा, विशुद्ध चीनी सर्च इंजन बायदु डौटकौम लाया गया, जो उसी तरह काम करता है जैसा चीनी सरकार चाहती है.

हैकिंग का मसला भी सुलझेगा

देसी विकल्पों की खोज का दूसरा मकसद साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाना है. अभी साइबर सिक्योरिटी का आलम यह है कि सरकारी संस्थानों की वैबसाइटों को तो जब चाहे, जो चाहे हैक कर लेता है. वहां से डाटा चुराना कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन सरकार भी जानती है कि इन चुनौतियों के मद्देनजर माइक्रोसौफ्ट जैसे एक स्वदेशी औपरेटिंग सिस्टम  (ओएस) को विकसित करने की जरूरत है. हालांकि दावा किया जाता रहा है कि इस मोरचे पर अपने देश में काम शुरू हो चुका है.

डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के करीब 150 कंप्यूटर इंजीनियर विंडोज और लाइनैक्स जैसे विदेशी व आयातित ओएस जितना ही सक्षम व ताकतवर औपरेटिंग सिस्टम विकसित कर रहे हैें.

इंटरनैट की किसी उपयोगिता के देसी अवतार के बारे में विचार करने के साथसाथ जरूरी यह भी है कि उस की व्यावहारिकता के पहलू पर भी गौर किया जाए. कहीं ऐसा न हो कि सरकारी मदद से विकसित होने और चलने वाली अन्य परियोजनाओं की तरह देसी इंटरनैट, आईटी के विकास का काम सरकारी गति से ही आगे बढे़ और सिर्फ जनता से वसूले गए टैक्स की बरबादी का सबब बन जाए.

सरकार को ऐसी किसी भी परियोजना में हाथ डालने से पहले यह गौर करना चाहिए कि वे योजनाएं आम जनता को आकर्षित करने वाली और देश के आईटी उद्योग को मजबूत करने वाली साबित हों. जनता को भी इस में सहयोग करना होगा. कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन सरकार अपनी ओर से गूगलफेसबुक पर प्रतिबंध लगाते हुए उन के बेहतर औप्शन पेश करे, तो जनता उन्हें आजमाए बिना ही सरकार की लानतमलामत में जुट जाए.

आजकल तो यह ट्रैंड भी खूब चल निकला है कि देश के फायदे की किसी भी सरकारी बात पर जनता बिना जांचेपरखे टीकाटिप्पणी करने लगती है और टीवी चैनल वाले 8-10 लोगों को स्टूडियो में बिठा कर दिनरात आलोचना का कीर्त चालू कर देते हैं. ऐसे में सरकार को जनमत के दबाव में अपना फैसला बदलना पड़ता है क्योंकि सत्ता में बैठी पार्टी को लगता है कि  उसे आगे भी सरकार बनानी है, तो जनता जैसा चाहती है, वैसा ही करना होगा.

इस में नेताओं का दोष यह है कि वे जनता को समझा नहीं पाते हैं कि सरकार जो फैसला कर रही है, वह आखिरकार पूरे देश के लिए अच्छा होगा.

चीन ने कब क्या बैन किया

चीनी सरकार की यह नीति रही है कि विदेश से आने वाली कोई भी सूचना उस के नागरिकों तक सीधे नहीं पहुंच सकती. यह पहले विदेशी कंपनियों के स्वामित्व वाली सभी चीजों को फिल्टर करती है ताकि पता लगाया जा सके कि कहीं कोई चीन की आलोचना तो नहीं कर रहा है. इस के लिए चीन की सरकार ने पूरी दुनिया में मशहूर कई ऐप्स (अप्लीकेशंस) अपने यहां प्रतिबंधित कर रखे हैं.

चीन ने अपने बेहद कड़े साइबर सुरक्षा कानूनों का हवाला देते हुए मुफ्त में औनलाइन बातचीत और मैसेजिंग की सुविधा देने वाले स्काइप पर अक्तूबर 2017 में रोक लगा दी थी. दावा किया गया कि इस के स्वामित्व वाली कंपनी माइक्रोसौफ्ट ऐप्पल के चीन स्थित ऐप स्टोरों से स्काइप को पूरी तरह हटा दिया गया था.

स्काइप जैसे ऐप पर पाबंदी वर्ष 2017 की शुरुआत में ही वहां लग चुकी है. चीन में व्हाट्सऐप की जगह उस के चीनी विकल्प वीचैट को पेश किया गया, जिस के वहां करीब 9 करोड़ उपभोक्ता हैं.

वर्ष 2014 में जब युवाओं के कुछ संगठनों ने हौंगकौंग में बेहद चर्चित आंदोलन ‘अंबे्रला रिवोल्यूशन’ चलाया तो इस के लिए फोटो शेयरिंग ऐप इंस्टाग्राम को अपने आंदोलन का जरिया बनाया. यह देखते हुए चीन ने अपने यहां इस ऐप को बैन कर दिया.

कुछ ऐसा ही नजारा तब दिखा जब जुलाई 2009 में चीन के शिंजिंयाग प्रांत में हुए उरुमक्वी दंगों में फेसबुक के बढ़चढ़ कर इस्तेमाल की बात पता चली. इस के बाद चीन ने तुरंत फेसबुक पर रोक लगा दी, हालांकि हौंगकौंग और मकाऊ के कुछ इलाकों में कुछ शर्तों के साथ इस के प्रयोग की छूट दी गई.

चीन ने जून 2009 में ट्विटर के साथसाथ ब्लौगिंग के प्लेटफौर्म ब्लौगर और वर्डप्रैस पर भी रोक लगा दी थी. हालांकि, कुछ चीनियों ने इस पाबंदी को धता बताते हुए जुगाड़ के जरिए इन का इस्तेमाल जारी रखा.

यूट्यूब पर भी चीन में सब से पहले 2007-08 के कुछ महीनों के लिए रोक लगाई गई थी, पर इस पर बाद में पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई. अब यूट्यूब सिर्फ हौंगकौंग, मकाऊ, शंघाई फ्री टे्रड जोन में ही देखा जा सकता है.

चीन में सब से ज्यादा चर्चा वर्ष 2014 में गूगल व जीमेल पर रोक लगाने की हुई. असल में गूगल और चीन के रिश्तों में हर समय उतारचढ़ाव आता रहा है. फिलहाल वहां इस पर पाबंदी है. लेकिन वर्ष 2010 से गूगल ने अपना कामकाज हौंगकौंग की ओर शिफ्ट कर दिया जहां इस पर सैंसर की कोई पाबंदी नहीं है.

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फिल्मों और हौकी के बारे में बता रही हैं चित्रांशी रावत

एक हौकी खिलाड़ी मैदान छोड़ कर फिल्मों में कैसे आ गईं?

सच बताऊं, तो मेरे अंदर बचपन से एक प्लेयर रहा है, आर्टिस्ट कभी नहीं. मैं जब उत्तरांचल की जूनियर टीम में खेलती थी तब जूनियर नैशनल टूरनामैंट के लिए जबलपुर आई थी. उस समय वहां फिल्म ‘चक दे इंडिया’ की टीम महिला हौकी खिलाडि़यों का अपनी फिल्म के लिए औडीशन ले रही थी. मैं ने भी अपनी फ्रैंड्स के साथ यह सोच कर औडीशन दे दिया कि शाहरुख खान के नाम का झूठा उपयोग कर ये लोग कोई टैलीफिल्म बना रहे हैं. मजाकमजाक में दिया मेरा औडीशन निर्देशक को पसंद आ गया और मुझे मुंबई बुला लिया गया.

ऐक्टिंग के लिए क्या तैयारी की थी?

शुरुआत में तो 6 महीने मैं ने सिर्फ हौकी ही खेली, लेकिन जब पता चला कि हौकी के साथ ऐक्टिंग भी करनी है तब जरूर सोच में पड़ गई. लेकिन फिर यह सोच कर कि सिर्फ यही फिल्म करनी है सीरियस नहीं हुई. जब फिल्म ‘सुपरडुपर’ हिट हुई तो साथ में हम लोग भी हिट हो गए. तब सोचा चलो अब ऐक्टिंग में ही सीरियस हो कर कैरियर बनाया जाए.

ऐक्टिंग के बाद हौकी खेलना छोड़ दिया क्या?

मैं अभी भी अपनेआप को एक खिलाड़ी ही मानती हूं. अगर उस समय ‘चक दे इंडिया’ फिल्म न साइन की होती तो आज नैशनल टीम में जरूर होती, क्योंकि जब मेरा औडीशन हुआ तो उस समय मैं नैशनल की ही तैयारी कर रही थी. मेरे साथ की कई लड़कियां आज नैशनल टीम में खेल रही हैं. मुंबई में मैं जैसे ही काम से फ्री होती हूं हौकी ले कर मैदान में पहुंच जाती हूं.

फिल्मों से खेलों को बढ़ावा मिलता है?

जरूर मिलता है. जब ‘भाग मिल्खा भाग,’ ‘चक दे इंडिया,’ ‘मैरी कौम’ फिल्में आईं तब लोगों ने जाना कि इन खिलाडि़यों ने यहां तक पहुंचने के लिए कितना संघर्ष किया. हौकी के जादूगर ध्यानचंद की बायोपिक भी बनने वाली है. यकीनन ऐसी फिल्में लोगों को खेलों के प्रति आकर्षित करती हैं.

मेरा पीआर बहुत खराब है

खबरों में कम आने के सवाल पर चित्रांशी कहती हैं कि मैं ने काम तो बहुत किया है पर क्या करूं उस की पब्लिसिटी करना मुझे नहीं आता. मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैं लोगों से ज्यादा नहीं मिलती. मेरा मानना है कि चेहरा दिखाने से अच्छा है अपना काम दिखाओ.

घूमना पसंद है

मैं बहुत घुमंतू मूड की हूं, इसलिए उस प्रोजैक्ट को नहीं करती, जिस में बंध जाऊं. तभी मैं टीवी पर काम कम करती हूं. आज टीवी पर 12 से 16 घंटे शूटिंग की होती है और शो कई महीने चलते हैं. थिएटर करने की एक वजह यह भी है, क्योंकि हमारा ग्रुप विदेशों में भी कई शो कर चुका है.

थिएटर का शौक

शुरुआत में तो थिएटर के नाम से ही मेरे हाथपांव फूल जाते थे, लेकिन जब लोगों ने सलाह दी कि अगर ऐक्टिंग करनी है तो स्टेज पर जाना ही होगा. तब थिएटर करने लगी. मैं ने 2 साल तो सिर्फ थिएटर ही किया. कोई और काम नहीं. मैं एक प्रयास थिएटर ग्रुप में हूं और पद्मिनी कोल्हापुरे, असरानीजी के साथ कई शो कर चुकी हूं.

शाहरुख मेरे मैंटोर हैं

उत्तरांचल की रहने वाली चित्रांशी रावत स्कूल के दिनों से ही हौकी की बेहतरीन प्लेयर रही हैं. 17 साल की उम्र में ही वह उत्तरांचल की महिला हौकी टीम में खेलने लगी थी. शाहरुख को अपना मैंटोर बताने वाली चित्रांशी ने फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में ठेठ हरियाणवी लड़की कोमल चौटाला का रोल निभाया था.

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माइक्रोसौफ्ट का यह सौफ्टवेयर कर सकता है बिल्कुल सही अनुवाद

माइक्रोसौफ्ट के शोधार्थियों ने एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) विकसित की है, जो खबरों का चीनी भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद उतनी ही सटीकता और गुणवत्ता के साथ कर सकती है जैसा कि कोई इंसान करता है. शोधार्थियों ने कहा कि उनकी प्रणाली ने खबरों पर इंसान की तरह ही अनुवाद किया.

इसे उद्दोग और अकादमिक साझेदारों के एक समूह ने विकसित किया है. नतीजों को सटीक और मानव के कार्य के समान सुनिश्चित करने के लिए टीम ने बाहरी द्विभाषी मानव मूल्यांकनकर्ताओं को काम पर लगाया, जिन्होंने माइक्रोसौफ्ट के नतीजों की दो स्वतंत्र रूप से निर्मित ह्यूमन रेफ्रेंस अनुवादकों से तुलना की.

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माइक्रोसौफ्ट स्पीच, प्राकृतिक भाषा और मशीन कोशिशों के एक तकनीकी फेलो प्रभारी शुदोंग हुआंग ने इसे इस दिशा में एक मील का पत्थर बताया. मशीनी अनुवाद एक समस्या है जिस पर शोधार्थियों ने दशकों तक काम किया है और काफी समय से यह माना जाता था कि इंसान के समान यह कार्य नहीं किया जा सकता है. हालांकि, माइक्रोसाफ्ट रिसर्च एशिया के सहायक प्रबंध निदेशक मिंग झोउ ने आगाह किया कि आगे कई चुनौतियां हैं जैसे कि ‘रियल टाइम न्यूज स्टोरी’ पर प्रणाली की जांच करना आदि.

माइक्रोसौफ्ट की इस सफलता से अन्य भाषाओं में कहीं अधिक सटीक अनुवाद का रास्ता खुलेगा. झोउ ने बताया कि शोधार्थियों ने अपने अनुवाद की सटीकता को बेहतर करने के लिए दो नयी तकनीक भी विकसित की है. उन्होंने कहा कि इनका इस्तेमाल अनुवाद के अलावा भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कार्यों में किया जा सकेगा.

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रेड : अजय देवगन नहीं सौरभ शुक्ला की वजह से देखिए ये फिल्म

‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्मों के सर्जक राज कुमार गुप्ता इस बार 1980 के लखनऊ के हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर आधारित फिल्म ‘‘रेड’’ लेकर आए हैं. फिल्म को यथार्थ परक बनाते समय फिल्मकार यह भूल गए कि फिल्म में मनोरंजन भी चाहिए. फिल्म‘‘रेड’’ देखकर इस बात का अहसास होता है कि यह फिल्म एक अतीत की सत्य कथा को पेश करने के नाम पर सरकारी एजेंडे का प्रचार करने के साथ ही खास सरकार को खुश करने का भी प्रयास है. परिणामतः फिल्म नीरस व शुष्क हो गयी है.

फिल्म की कहानी 1981 के लखनऊ में पड़े हाई प्रोफाइल इनकम टैक्स छापे पर सच्ची कथा है, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी. आयकर विभाग में कार्यरत औफिसर अमय पटनायक (अजय देवगन)  का तबादला लखनऊ हो जाता है. अमय पटनायक ना सिर्फ ईमानदार बल्कि अति आदर्शवादी हैं. सुबह साढ़े चार बजे उठना, घड़ी देखकर हर काम को पूरी मुस्तैदी के साथ अंजाम देना. अब तक 49 बार उनका तबादला हो चुका है और अमय पटनायक को इसकी आदत पड़ चुकी है. लेकिन इससे उनकी पत्नी मालिनी (इलियाना डिक्रूज) कभी खुश नहीं होती.

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मालिनी को बार बार सामान बांधकर एक शहर से दूसरे शहर में भटकना पसंद नहीं. मालिनी अपने पति को समझाती है कि बहुत ज्यादाईमानदार न बनो, पर अंत में वह एक आज्ञाकारी पत्नी की ही तरह काम करती है. लखनऊ पहुंचते ही अमय को जानकारी मिलती है कि एक सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला)  ने जबरदस्त टैक्स चोरी की है. रामेश्वर सिंह के घर में उनकी मां, भाई, बहन, भाभी सहित परिवार का लंबा चौड़ा कुनबा है. रामेश्वर सिंह ताकतवर हैं. उन पर कोई हाथ नहीं डालता. पर अमय अपने सहयोगियों के साथ रामेश्वर सिंह के घर पर छापा मारते हैं.

रामेश्वर सिंह भी खुद को ईमानदार समझते हैं, इसलिए वह कहते है कि मैं एक ही जगह पर बैठा हूं, जाकर तलाशी ले लो. कुछ नहीं मिलेगा. पहले तो कुछ नहीं मिलता है. पर अचानक मकान की छत पर अमय के हाथ एक कागज आता है और उस कागज में बने नक्शे के आधार पर नए सिरे से तलाशी लेने पर 420 करोड़ की नकदी व जेवर आदि मिलते हैं. उसके बाद अमय पर कई तरह के दबाव आते हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री खुद अमय को फोन करके कहती हैं कि मामले को रफा दफा कर दें, पर अमय किसी की सुनते नहीं हैं.

अमय अपनी जांच जारी रखते हैं, पर अंत में जब सच सामने आता है, तो कुछ अलग ही होता है.

इनकम टैक्स औफिसर के किरदार में अजय देवगन के अभिनय में उनकी पिछली कई फिल्मों का दोहराव ही है. वह एक ही तरह के मैनेरिज्म के साथ परदे पर नजर आते हैं. अजय देवगन ‘गंगाजल’, ‘सिंघम’ सहित कई फिल्मों में सिस्टम के खिलाफ जाकर एक ईमानदार अफसर के किरदार निभा चुके हैं. ‘रेड’ में कुछ भी नया नहीं कर पाए. हर सीन में वह महज फिल्मी हीरो के रूप में ही नजर आते हैं. उनका किरदार स्थिर सा लगता है.

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इलियाना डिक्रूज के हिस्से करने को कुछ है ही नहीं. निर्देशक ने उनकी प्रतिभा का बेजा इस्तेमाल किया है. कथानक मे इलियाना डिकूजा के किरदार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सौरभ शुक्ला ने साबित कर दिखाया कि उनके अभिनय का कोई सानी नहीं है. अमित सयाल, गायत्री अय्यर सहित बाकी सभी कलाकारों की प्रतिभा का दुरुपयोग ही किया गया है.

पटकथा व निर्देशन के स्तर पर भी काफी कमियां हैं. एक सत्य कथा को भी नाटकीय ढंग से पेश नहीं कर पाए राज कुमार गुप्ता. फिल्म बेवजह लंबी, रबर की तह खींची गयी है. फिल्म की कहानी लखनऊ शहर की है, मगर फिल्म से लखनऊ गायब है. चंद पुरानी इमारतें दिखाकर यह कहना कि यह लखनऊ शहर है, अजीब सा लगता है. लखनऊ की संस्कृति तहजीब कुछ भी फिल्म का हिस्सा नहीं है. ‘आमिर’ व ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी धारदार फिल्में बना चुके राज कुमार गुप्ता की इस फिल्म में कोई धार नहीं है. यह फिल्म मनोरंजन के नाम पर भी शून्य है. राज कुमार गुप्ता को नहीं भूलना चाहिए कि इनकम टैक्स रेड पर ही बनी फिल्म ‘स्पेशल 26’ में नाटकीयता के साथ साथ रोमांच व मनोरंजन भी था.

फिल्म का गीत संगीत भी कमजोर है. यहां तक कि फिल्म का पार्श्व संगीत भी फिल्म को नाटकीय नहीं बना पाता.

119 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रेड’’ का निर्माण अभिषेक पाठक, कुमार मंगत पाठक, भूषण कुमार, किशन कुमार ने किया है. निर्देशक राज कुमार गुप्ता, कहानीकार रितेश शाह, पटकथा लेखक राज कुमार गुप्ता व रितेश शाह, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन अल्फांसो राय तथा कलाकार हैं – अजय देवगन, इलियाना डिक्रूज, सौरभ शुक्ला, गायत्री अय्यर, अमित सयाल, अक्षय वर्मा, अमित बिमोरेट व अन्य.

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भारतीय टीम के स्पिनर्स की टोली में शामिल हो रहा है यह मजबूत नाम

विराट कोहली समेत कई बड़े खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी में टी-20 ट्राएंगुलर सीरीज में भारत की शुरूआत तो खराब रही, लेकिन श्रीलंका से पहले मैच में हारने के बाद भारतीय टीम संभली और अगले तीनों मैच में उसने जीत हासिल की. बता दें कि भारत ने श्रीलंका को अगले मैच में 6 विकेट से हराया. इसके अलावा बांग्लादेश को पहले मैच में 6 विकेट से और दूसरे मैच में 17 रन से हराकर टीम इंडिया ने टूर्नामेंट के फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली है. अब शुक्रवार को बांग्लादेश या श्रीलंका में से जो टीम जीतेगी वो फाइनल में टीम इंडिया के सामने होगी.

टीम इंडिया को मिली पिछली दोनों जीत में स्पिनर वाशिंगटन सुंदर का रोल अहम रहा. देसी भाषा में कहा जाता है कि टी-20 में गेंदबाजी करने वाले स्पिनर के पास जिगरा होना चाहिए. भारतीय टीम की जीत के बाद हर किसी को अब इस बात पर विश्वास हो गया कि वाशिंगटन सुंदर के पास वही मजबूत जिगरा है. सुंदर ने इस सीरीज में अब तक भारत की तरफ से सबसे ज्यादा 7 विकेट लिए हैं.

क्या है वाशिंगटन सुंदर की खासियत

टी-20 फौर्मेट में स्पिन गेंदबाजों की सफलता का मूलमंत्र है उनकी हिम्मत. वाशिंगटन सुंदर ने अब तक सीरीज में यही हिम्मत दिखाई है. उनका ध्यान बल्लेबाज को आउट करने पर रहा है. वो बल्लेबाज को ललचाते हैं. इस बात से कतई नहीं डरते कि कहीं बल्लेबाज उनकी धुनाई ना कर दे. बड़ी बात ये है कि उनका इकौनमी रेट सिर्फ 5.87 का है, जो बताता है कि टी-20 जैसे मुश्किल फौर्मेट में वाशिंगटन सुंदर ने कितनी किफायती गेंदबाजी की है. इस ट्राएंगुलर सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने के साथ साथ वो टीम इंडिया के सबसे किफायती गेंदबाज भी रहे हैं.

इस सीरीज में उन्हें पावरप्ले में गेंदबाजी कराई गई. पावरप्ले में बल्लेबाज स्पिन गेंदबाज पर ‘अटैक’ की पूरी कोशिश करता है, वाशिंगटन सुंदर ने इस बात से बगैर घबराए अपनी रणनीति से गेंदबाजी की और हर मैच के नतीजे में उनका रोल रहा.

बांग्लादेश के खिलाफ पिछले मैच में उन्होंने 4 ओवर में 22 रन देकर 3 विकेट लिए. वाशिंगटन सुंदर ने बांग्लादेश के टौप और्डर के तीन बल्लेबाज तमीम इकबाल, लिटान दास और सौम्य सरकार को पवेलियन भेजा. सुंदर के प्रदर्शन को देखते हुए फाइनल में एक बार फिर उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है.

बढ़ रही है भारतीय स्पिन आक्रमण की ताकत

वाशिंगटन सुंदर की कामयाबी का एक मतलब ये भी है कि भारतीय स्पिन आक्रमण की ताकत और मजबूत हो रही है. टीम इंडिया में आर अश्विन, यजुवेंद्र चहल, कुलदीप यादव, रवींद्र जडेजा जैसे स्पिन गेंदबाज पहले से ही हैं. हाल के दिनों में आर अश्विन और रवींद्र जडेजा को टेस्ट मैचों में जबकि यजुवेंद्र चहल और कुलदीप यादव को वनडे मैचों में ज्यादा मौका दिया गया है. टीम इंडिया के नियमित कप्तान विराट कोहली ने अपने स्पिन गेंदबाजों को ये भरोसा भी दिया है कि वो गेंदबाजी करते वक्त विकेट लेने पर ध्यान दें. रन अगर बनते हैं तो बनने दें. उनके इस विश्वास का ही असर है कि दक्षिण अफ्रीका में चहल और कुलदीप यादव की जोड़ी ने धूम मचाई. पूरी सीरीज में दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाजों के पास इन दोनों गेंदबाजों का कोई तोड़ नहीं था. वाशिंगटन सुंदर भी इसी लिस्ट में जुड़ गए हैं. वो भी इसी रणनीति के तहत गेंदबाजी करते हैं.

इन स्पिनर्स के अलावा अक्षर पटेल भी हैं टीम इंडिया के साथ

इन सभी स्पिनर्स के अलावा अक्षर पटेल भी टीम इंडिया के साथ हैं. उन्हें प्लेइंग 11 में ज्यादा मौका नहीं मिल पा रहा है लेकिन वो भी अपनी स्पिन का जादू दिखाने को तैयार हैं. इन सभी स्पिनर्स के फिट रहने और फौर्म में रहने का सबसे बड़ा फायदा है कि अगले साल विश्व कप के लिए टीम इंडिया के पास स्पिनर्स की अद्भुत ‘वेराइटी’ है.

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बेहतरीन पारी के बावजूद रोहित शर्मा ने पांचवी बार बनाया यह खराब रिकौर्ड

‘मैन औफ द मैच’ रोहित शर्मा (89) और सुरेश रैना (47) के बीच हुई शतकीय साझेदारी के बाद वौशिंगटन सुंदर (22-3) के दम पर भारत ने बुधवार (14 मार्च) को निदास ट्रौफी ट्राई सीरीज के पांचवें मैच में बांग्लादेश को 17 रनों से मात देते हुए फाइनल में जगह पक्की कर ली हैं. भारत ने आर. प्रेमदासा स्टेडियम में खेले गए मैच में बांग्लादेश के सामने 177 रनों की चुनौती रखी थी. बांग्लादेश की टीम मुश्फीकुर रहीम की नाबाद 72 रनों की पारी के बावजूद लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई और पूरे 20 ओवर खेलने के बाद छह विकेट के नुकसान पर 159 रन ही बना सकी. वाशिंगटन सुंदर के अलावा भारत के लिए शार्दुल ठाकुर, मोहम्मद सिराज और युजवेंद्र चहल ने एक-एक विकेट लिए.

बांग्लादेश के खिलाफ खेले गए इस मैच में रोहित शर्मा काफी लंबे वक्त बाद अपने रंग में लौटते नजर आए. उन्होंने 61 गेंदों में 5 चौके और 5 छक्कों की मदद से 89 रनों की शानदार पारी खेली. बता दें कि 2017 में ही रोहित ने वनडे क्रिकेट में अपना तीसरा दोहरा शतक जड़ा और साथ ही टी-20 में सबसे तेज शतक जड़ने वाले क्रिकेटर भी बने थे, लेकिन 2018 की शुरुआत से ही रोहित शर्मा का बल्ला खामोश रहा है. पहले दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ और फिर श्रीलंका में चल रही निदास ट्रौफी में भी अब तक रोहित शर्मा अपना असर छोड़ने में नाकाम रहे थे.

इस मैच से पहले तक की पिछली पांच टी-20 अंतरराष्ट्रीय पारियों में रोहित शर्मा का स्कोर 17, 0, 11, 0 और 21 रहा, लेकिन बांग्लादेश के खिलाफ रोहित शर्मा का फौर्म वापस लौट आया. इस मैच में रोहित शर्मा ने अपने टी-20 करियर का 13वां अर्धशतक जड़ा.

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रोहित शर्मा ने शानदार 89 रनों की पारी खेलकर एक और अर्धशतक तो अपने नाम किया, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक अनचाहा रिकौर्ड भी अपने नाम कर लिया. दरअसल, रोहित शर्मा ने यह अर्धशतक 42 गेंदों में जड़ा. यह रोहित शर्मा के करियर का पांचवां सबसे धीमा अर्धशतक रहा. इससे पहले भी रोहित 4 बार धीमा अर्धशतक बना चुके हैं.

टी-20 क्रिकेट में रोहित शर्मा के सबसे धीमे अर्धशतक

  • 44 बौल, वेस्टइंडीज (2014)
  • 44 बौल, आयरलैंड (2009)
  • 42 बौल, न्यूजीलैंड (2017)
  • 42 बौल,  बांग्लादेश (2016)
  • 42 बौल, बांग्लादेश (2018)

टी-20 में सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में वौर्नर को छोड़ा पीछे

टी-20 इंटरनेशनल मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में रोहित शर्मा अब आठवें स्थान पर पहुंच गए हैं. उन्होंने पाकिस्तान के उमर अकमल (1690) के साथ औस्ट्रेलिया के डेविड वौर्नर (1792) को पीछे छोड़ा है. अब रोहित शर्मा के टी-20 इंटरनेशनल रन (1796) हैं. टी-20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाजों की लिस्ट में विराट कोहली 1983 रनों के साथ तीसरे नंबर पर हैं. इस लिस्ट में पहले नंबर पर न्यूजीलैंड के मार्टिन गुप्टिल (2271) और दूसरे नंबर पर बैंडम मैक्कुलम (2140) हैं.

टी-20 में सबसे तेज शतक बनाने का रिकौर्ड

टी-20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे तेज शतक बनाने का रिकौर्ड रोहित शर्मा के नाम है. 2017 के आखिर में श्रीलंका के खिलाफ टी-20 मैच में रोहित शर्मा ने यह कारनामा किया था. रोहित ने श्रीलंका के खिलाफ 43 गेंदों में 118 रनों की पारी खेली थी. इस दौरान उन्होंने अपना शतक 35 गेंदों में पूरा किया. इसी के साथ वह टी-20 में सबसे तेज शतक लगाने के मामले में मिलर के साथ संयुक्त रूप से पहले स्थान पर आ गए.

बता दें कि दक्षिण अफ्रीका के डेविड मिलर ने 29 अक्टूबर 2017 को बांग्लादेश के खिलाफ 35 गेंदों में शतक जमाया था. मिलर ने इस मैच में 35 गेंदों में शतक जड़ अपनी ही टीम के रिचर्ड लेवी के टी-20 में सबसे तेज शतक के रिकौर्ड को तोड़ा था. लेवी ने 2012 में न्यूजीलैंड के खिलाफ 45 गेंदों में शतक जड़ा था.

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इलेक्ट्रोनिक सामान ही नहीं अब ब्रांडेड कपड़े भी खरीदें EMI पर

आपने अक्सर इलेक्ट्रौनिक सामान या मोबाइल ईएमआई पर खरीदा होगा लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि ईएमआई पर कपड़े भी खरीदे जा सकते हैं. जी हां, अब ऐसा संभव है, क्योंकि मिंत्रा एक ऐसा औफर लेकर आया है जिसमें 51 रुपए प्रति महीने की ईएमआई पर आप ब्रांडेड कपड़े खरीद सकते हैं. हालांकि इसका लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा जो क्रेडिट कार्ड से खरीददारी करेंगे. औनलाइन फैशन रिटेलर कंपनी मिंत्रा ने फिलहाल देश भर में अपने इस औफर को शुरू किया है. मिंत्रा ई-कौमर्स सेक्टर में देश की पहली ऐसी कंपनी बन गई है जो कि इतनी कम कीमत पर ब्रांडेड कपड़े खरीदने का मौका लोगों को दे रही है.

1300 रुपये से कम कीमत के कपड़ों पर मिलेगा औफर

यह औफर मिंत्रा पर उन ब्रांडेड कपड़ों पर दिया जा रहा है, जिनकी कीमत 1,300 रुपए या उससे कम है. मिंत्रा ने इस पहल पर ईमेल से पूछे गए सवालों पर कोई जवाब नहीं दिया है. हालांकि, इस औफर को अमल में लाने वालों में शामिल एक शख्स ने बताया कि यह सुविधा उन उपभोक्ताओं के लिए शुरू की गई है, जो प्रौडक्ट पहले खरीद सकते हैं, लेकिन भुगतान बाद में करना चाहते हैं.

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कंपनी ने इसके लिए विभिन्न बैंकों से भी टाईअप किया है, जिनके क्रेडिट कार्ड पर यह औफर मिलेगा. हालांकि इस पर ग्राहकों को 13 से 15 फीसदी अलग से इंटरेस्ट देना होगा.

इन बैंकों से किया टाईअप

फ्लिपकार्ट के स्वामित्व वाली इस कंपनी ने एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, सिटी बैंक, एसबीआई, कोटक बैंक, एमेक्स, एचएसबीसी जैसे प्रमुख बैंकों के साथ करार किया है. ये बैंक प्रौडक्ट्स की क्रेडिट कार्ड से खरीद पर 3-24 महीनों के लिए 13 से 15 पर्सेंट ब्याज लेंगे.

कंपनी का कहना है उसके इस औफर का लाभ 30 साल से कम उम्र वाले ग्राहक लेंगे जो कि फैशन के प्रति जागरूक रहते हैं और उन पर जिम्मेदारियां भी कम होती हैं. इससे ऐसे ग्राहक ज्यादा खरीददारी कर सकेंगे. अभी 10 फीसदी लोग इंटरनेट पर खरीददारी करते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह औफर 2 टियर और 3 टियर शहरों के उपभोक्ताओं के लिए अच्छा साबित हो सकता है, जहां के लोग एक समय के बाद अपने खर्च बढ़ाना चाहते हैं.

70 बिलियन डौलर से ज्यादा की है इंडस्ट्री

अभी भारत में फैशन मार्केट 70 बिलियन डौलर का है, जिसमें 30 बिलियन डौलर का अनुमान केवल औनलाइन से होने का है. लेकिन फिर भी लोग ज्यादातर स्टोर पर जाकर के कपड़े खरीदते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन साल में डिजिटल माध्यमों का प्रयोग तीन गुना बढ़ गया है.

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हर दिन चार घंटे तलवारबाजी सीख रहे हैं सोनू सूद

योगा और मार्शल आर्ट में माहिर अभिनेता सोनू सूद इन दिनों ऐतिहासिक फिल्म ‘‘मणिकर्णिका’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं. इस फिल्म में अपने अभिनय का जलवा दिखाने के लिए ही इन दिनों वह हर दिन चार घंटे तलवार बाजी सीख रहे हैं. उनके करीबी सूत्रों का दावा है कि इसके लिए सोनू सूद ने खासतौर पर 5 किलो वजन की तलवार बनवायी है. वैसे वह तलवार बाजी में भी माहिर हैं, क्योंकि वह आशुतोष गोवारीकर के निर्देशन में फिल्म ‘‘जोधा अकबर’’ में इसी तरह की भूमिका निभा चुके हैं.

बौलीवुड में रोमांटिक, कौमेडी, विलेन कई तरह का किरदार अदा करने वाले खुद सोनू सूद कहते हैं- ‘‘मुझे तलवार बाजी सीखने की जरुरत इसलिए पड़ी, क्योंकि ‘मणिकर्णिका’ में तलवार बाजी के कई अलग अलग कौशल देखने को मिलेंगे. फिलहाल वजनदार तलवार के साथ तलवार बाजी का अभ्यास करते हुए मैं काफी उत्साहित हूं. मैं चीन की नई निन्जा मार्शल आर्ट का भी अभ्यास करता रहता हूं.’’

बता दें कि इंजीनियर बनने के बाद सोनू ने मौडलिंग की भी शुरुआत की और मिस्टर इंडिया कौन्टेस्ट में भी प्रतियोगी रहे. सोनू ने एक्टिंग करियर की शुरुआत 1999 की तमिल फिल्म ‘कल्लाझागर’ से की थी. उन्होंने 2010 में रिलीज हुई फिल्म ‘दबंग’ में नेगेटिव रोल के लिए उस साल का आईफा अवार्ड से भी नवाजा गया. इस फिल्म में सोनू ने सलमान खान के अपोजिट विलेन का किरदार निभाया था. इसके अलावा उन्होंने फिल्म ‘शूटआउट एट वडाला’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में भी अहम किरदार निभाए हैं. सोनू ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी और पंजाबी भाषाओं में भी फिल्में की हैं.

सोनू सूद के एक्टिंग को लोग काफी पसंद करते हैं अब देखना दिलचस्प होगा कि ‘‘मणिकर्णिका’’ में सोनू सूद का जादू किस कदर लोगों पर अपनी छाप छोड़ता है.

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दमदार इंजन और धांसू फीचर्स के साथ लौन्च हुई टीवीएस अपाचे

TVS ने Apache RTR 160 का नया वेरिएंट लौन्च कर दिया है, इस बाइक को पहले के मुकाबले ज्यादा स्टाइलिश बनाया गया है. इसके अलावा इसके इंजन को भी पहले से ज्यादा पावरफुल बनाया गया है. इसकी डिलिवरी अगले हफ्ते से शुरू कर दी जाएंगी. TVS ने नई अपाचे RTR 160 को बिल्कुल नए 4-वाल्व प्लैटफौर्म पर बनाया है और नई अपाचे 3 वेरिएंट्स में उपलब्ध होगी. TVS ने 2018 अपाचे RTR 160 को पूरी तरह अपडेट किया है. इसमें बाइक की स्टाइल और डिजाइन से लेकर सस्पेंशन के साथ नया चेसिस और अपडेटेड इंजन शामिल हैं.

इंजन की बात करें तो इसमें 159.7cc का इंजन दिया गया है. इसका इंजन 16.5bHP की पावर जेनरेट करता है. 6,500 आरपीएम पर यह इंजन मैक्सिमम 14.8 न्यूटन मीटर का टार्क जेनरेट कर करता है. टीवीएस की इस नई अपाचे की टौप स्पीड 114 किलोमीटर प्रति घंटा की है. इंजन को 5 स्पीड गियरबौक्स से लैस किया गया है.

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न्यू-जेन TVS अपाचे RTR 160 की कीमत की बात करें तो इसकी शुरुआती कीमत 81,490 रुपए है. वहीं इसके डबल डिस्क ब्रेक वाले वेरिएंट की कीतम 84,490 रुपए है. वहीं इसके टौप वेरिएंट Efi की कीमत 89,990 रुपए रखी गई है. यह सभी कीमतें दिल्ली में एक्स शोरूम हैं. कंपनी ने भारत में 2005 में पहली बार अपाचे फैमिली को लौन्च किया था. भारत में नई अपाचे RTR 160 का मुकाबला सुजुकी जिक्सर, यामाहा FZ-S FI, होंडा CB हौर्नेट 160 और बजाज पल्सर NS जैसी बाइक्स से होगा.

कंपनी ने पिछले दो साल में दो नई बाइक अपाचे RTR 200 4V और अपाचे RR 310 लौन्च की हैं. TVS मोटर कंपनी की नई बाइक अपाचे RTR 160 पहले भी कई बार टेस्टिंग के दौरान भारत में स्पौट हो चुकी है. कंपनी ने बाइक को अपडेटेड डिजाइन और स्टाइल दिया है जो अपाचे RTR 200 4V से प्रेरित होकर दी गई है. नई अपाचे में कौस्मैटिक बदलावों के साथ कंपनी ने इसमें कई नए फीचर्स दिए हैं और नई अपाचे के इंजन में भी कुछ तकनीकी बदलाव किए हैं.

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आपके स्मार्टफोन को और भी स्मार्ट बना देंगे ये सिक्योरिटी फीचर्स

स्मार्टफोन पर सिर्फ एक पासवर्ड लगाकर आप समझते हैं कि आपका फोन सुरक्षित हो गया है, जाबकि वाकई में ऐसा नहीं है. दिनोंदिन बदलती तकनीक के चलते अब कठिन से कठिन पासवर्ड भी आसानी से हैक हो जाते हैं. इसलिए अब आपके पास पासवर्ड के अलावा कई और ‘सुरक्षा कवच’ भी हैं. स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों ने पारंपरिक पासवर्ड को बायोमेट्रिक पासवर्ड में तब्दील कर दिया है, जैसे- फिंगरप्रिंट स्कैनर, फेशियल रिकौग्निशन, आईरिस स्कैनर, वौयस रिकौग्निशन आदि. इसके अलावा फोन पर नौन बायोमेट्रिक में पिन और पासवर्ड आते हैं. यदि आपने फोन में इन सिक्योरिटी फीचर्स को इनेबल कर रखा है, तो कोई भी आपकी इजाजत के बिना आपके फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकता.

वौयस रिकौग्निशन

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‘वौयस रिकौग्निशन’ को स्पीच रिकौग्निशन भी कहा जाता है. यह फीचर व्यक्ति द्वारा बोले गए शब्दों को इनपुट की तरह लेता है और उन शब्दों को डिजिटल फौर्म में बदल कर उसके ऊपर काम करता है. इस तकनीक का प्रयोग मोबाइल फोन चलाने, कमांड देने और आवाज के माध्यम से सर्च करने के लिए किया जाता है. इसमें कीबोर्ड के बटन दबाने की जरूरत नहीं होती है. वौयस रिकौग्निशन में आवाज को बहुत से जटिल चरणों से गुजरना पड़ता है. कुछ बोलने पर कंपन पैदा होता है, जिसे एनालौग सिग्नल्स कहते हैं. इस एनालौग वेब को मोबाइल और कंप्यूटर डिजिटल में बदलने के लिए ADC Translator का प्रयोग करते हैं.

फेशियल रिकौग्निशन

यह फीचर लोगों को पसंद भी आ रहा है. इसकी मदद से यूजर स्मार्टफोन को देखकर ही अनलौक कर सकता है. बता दें कि फेशियल रिकौग्निशन सिस्टम एक मोबाइल फीचर है, जो किसी शख्स को डिजिटल इमेज के तौर पर वेरिफाई कर सकता है और फेशियल फीचर डाटाबेस में फीड यूजर की 3डी तस्वीर के साथ यूजर के चेहरे का डिजिटली मिलान कराता है. आमतौर पर इसे सिक्योरिटी सिस्टम में इस्तेमाल किया जाता है.

अगर आप सोशल मीडिया का यूज करते हैं, तो आपको पता होगा कि कैसे फेसबुक आपके दोस्तों के चेहरे के आधार पर फोटो टैग करने का विकल्प देता है. वह भी एक तरह का फेशियल रिकौग्निशन ही है.

फिंगरप्रिंट स्कैनर

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स्मार्टफोन में फिंगरप्रिंट स्कैनर होने से हमारे मोबाइल की सिक्योरिटी काफी हद तक बढ़ जाती है. जब यूजर अपने इस विकल्प को औन करता है, तो स्मार्टफोन में मौजूद औप्टिकल स्कैनर यूजर के फिंगरप्रिंट्स की डिजिटल इमेज कैप्चर कर लेता है. यह डिजिटल इमेज आगे के वेरिफिकेशन के लिए स्मार्टफोन में फीड हो जाती है. यदि फोन में फिंगरप्रिंट सिक्योरिटी औन है, तो यूजर के अलावा कोई दूसरा फोन को अनलौक नहीं कर सकता है. जब हम फोन को ओपन करने या अन्य किसी काम के लिए अनलौक करते हैं, तो यह हमारे फिंगरप्रिंट्स की इमेज लेकर पहले से स्टोर इमेज से मिलान करता है. यदि इमेज मैच कर जाती है, तो फोन अनलौक हो जाता है. यदि फिंगरप्रिंट मैच नहीं होते हैं, तो फोन पर ‘Try Again’ का संदेश आता है.

आईरिस स्कैन

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आईरिस पैटर्न और रेटिना ब्लड वेसल्स, प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग और अनूठे होते हैं. रेटिनल स्कैनिंग एक बायोमेट्रिक तकनीक है, जिसमें रेटिना में मौजूद ब्लड वेसल्स का अनोखा पैटर्न होने की वजह से व्यक्ति को पहचाना जाता है. ज्यादातर यूजर आईरिस पैटर्न और रेटिना ब्लड वेसल्स के पैटर्न में गड़बड़ा जाते हैं. स्मार्टफोन में मौजूद फ्रंट कैमरे की मदद से यूजर अपने रेटिना को स्कैन करता है, जिसके बाद ही फोन अनलौक होता है. वर्तमान में फिंगरप्रिंट और आईरिस स्कैनर, बायोमेट्रिक टेक्नौलोजी तेजी से आगे बढ़ रही है.

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