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सिंगल्स को घर मिलना आसान नहीं

अरुणाचल प्रदेश से रिनी मुंबई पढ़ने आई. उसे अंदाजा नहीं था कि मुंबई में पेइंगगैस्ट बन कर रहना इतना कठिन होगा. वह अपना अनुभव शेयर करते हुए बताती है, ‘‘मैं अकेली रह रही थी. शहर में किसी को भी नहीं जानती थी. मुझे किचन के इस्तेमाल करने की मनाही थी और फ्रिज लौक्ड रहता था. लैंडलेडी की बेटी कभी भी गैस मीटर, बाथरूम, अलमारी चैक करने आ जाती थी. मैं अपने किसी भी फ्रैंड को कमरे में नहीं बुला सकती थी. कमरे में टीवी, वाईफाई कुछ नहीं था.

‘‘मैं काफी बोर होती थी. मैं ने अपने पापा से लैपटौप भेजने को कहा. एक दिन मेरे पिता के फ्रैंड ही मुझे लैपटौप देने मुंबई आ गए और मुझे डिनर के लिए ले गए. उस के बाद जो हुआ, मैं कभी भूल नहीं पाऊंगी. उस लेडी ब्रोकर ने, जिस ने मुझे यह घर दिलवाया था, फोन कर के कहा, ‘तेरे जैसी लड़कियों को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं. किस आदमी को घर पर बुलाया था. यह इज्जतदार लोगों का घर है. धंधा ही करना है तो कहीं और जाओ.’ उस के ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं और मैं बहुत तकलीफ महसूस करती हूं.’’

सिंगल लोगों को चाहे वे पढ़ने आए हों या नौकरी करने, अपने सिंगल होने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है. ‘भले ही हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं, लेकिन इस समाज में महिलाओं को घर ढूंढ़ने से ज्यादा आसान है कोई नौकरी ढूंढ़ लेना.’

एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम करने वाली ऋचा शर्मा कहती हैं,

‘‘4 साल से जब भी किराए पर मकान देखने जाती हूं, हाउसिंग सोसायटी के लोग मेरे प्रोफैशन पर अजीब प्रतिक्रिया देते हैं. मैं मीडिया इंडस्ट्री से हूं, इसलिए उन्हें यही लगता है कि मैं सिगरेट, ड्रिंक, ड्रग्स का सेवन करती हूं और लड़के भी मेरे घर आते होंगे आदि. यह हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं?’’

सिंगल और यंग वर्किंग वीमन को ही घर मिलने में कठिनाई नहीं होती, आश्चर्य इस बात का है कि बुजुर्ग लोगों को भी घर मिलना आसान नहीं है.

नासिक निवासी श्रेया हासे बताती हैं, ‘‘उन की 55 वर्षीय मां को उन की उम्र ‘ठीक’ न बताते हुए घर के अंदर जाने ही नहीं दिया गया.

‘‘मेरी मां 30 सालों से टीचर हैं. मुंबई के अंधेरी इलाके में उन्होंने ब्रोकर से बात कर ली थी. उन्हें 3 अन्य लड़कियों के साथ घर शेयर करना था. वे लड़कियां भी अपनी मां की उम्र जैसी महिला के साथ रूम शेयर करने में खुश थीं. मेरी मां ने पूरी पेमैंट कर दी थी, लेकिन घर पहुंचने पर ब्रोकर ने उन्हें घर में नहीं घुसने दिया. उस ने कहा कि वे उम्र के मापदंड पर खरी नहीं उतरतीं और दूसरी लड़कियों को बिगाड़ सकती हैं. वे अपना पूरा सामान लिए घर के बाहर ही खड़ी रहीं. आखिर में उन्हें अपनी किसी फ्रैंड के घर जाना पड़ा.’’

घर ढूंढ़ने की परेशानी सिर्फ महिलाओं को ही नहीं होती, 30 वर्षीय विनोद निगम, जो मार्केटिंग मैनेजर हैं, का अनुभव भी कुछ अलग ही है. वे कहते हैं, ‘‘घर देखने जाएं तो इतने पर्सनल सवाल कौन पूछता है. जब मैं घर ढूंढ़ रहा था, मकानमालिक ने तो मुझ से यह भी पूछ लिया कि मैं पोर्न तो नहीं देखता या लड़कियां घर पर तो नहीं आएंगी. मैं नौनवेज तो नहीं खाता क्योंकि मेरी ये आदतें सोसायटी के बच्चों को बिगाड़ सकती हैं.’’

सिंगल होना या दूसरे धर्म का होना भी मुश्किल बढ़ा देता है. सना शेख दिल्ली व बेंगलुरु में रहने के बाद अभी हाल ही में मुंबई शिफ्ट हुई हैं. लेकिन अभी तक उन्हें घर नहीं मिल पाया है. कारण? वह सिर्फ सिंगल वर्किंग लेडी ही नहीं बल्कि मुसलिम भी हैं.

society

सना कहती हैं, ‘‘मैं ने कई घर औनलाइन देखे पर मकानमालिक ने बड़ी रुखाई से कहा कि वे अपना घर किसी मुसलिम को नहीं दे सकते.’’

आजम, जो आईटी फर्म में काम करते हैं, पिछले साल ही कुवैत से मुंबई आए थे. उन्हें लगता था कि शहर में यंग पौपुलेशन बहुत बड़ी संख्या में है, पर यहां अकेले रहने वालों के लिए घर की परेशानी देख कर बहुत हैरान हुए. वे कहते हैं, ‘‘सिंगल और ऊपर से मुसलिम, यह देख कर बड़ी कोफ्त हुई कि मकान किराए पर देने में मेरे धर्म से क्या आपत्ति हो सकती है.’’

आज की युवापीढ़ी चाहे लड़का हो या लड़की, दूसरे शहरों में जा कर अकेले रह कर पढ़ने या जौब करने की हिम्मत रखती है, वह समाज के ढांचे में फिट नहीं बैठ पाती. छोटे शहर हों या महानगर, स्थिति तकरीबन सब जगह एकसी ही है. समाज को इस के प्रति अपना रवैया बदलने की जरूरत है.

अग्निपरीक्षा

तुम तो मर्यादा पुरुषोत्तम हो

तुम ने सरेआम

सीता की अग्निपरीक्षा ले कर

क्या सीता की मर्यादा पर

प्रश्नचिह्न नहीं लगाया?

तुम क्या साबित करना चाहते थे

क्या जनता की आंखों के

प्रश्नभरे बाणों से बचना चाहते थे

या कहीं न कहीं स्वयं को भी

आश्वस्त करना चाहते थे?

माना कि लोगों ने सीता के

सतीत्व पर प्रश्नचिह्न लगाया

पर वे तो पराए थे

तुम्हारा क्या, तुम तो अपने थे

तुम्हारा विश्वास क्यों डगमगाया

तुम ने भोली जनता को

क्यों नहीं समझाया?

तुम्हारे पौरुष और शौर्य की गाथा

तो सब ने सुनी थी

फिर साहस तुम्हारा कहां गया?

अच्छा तुम राजा थे

माना कि सीता

दुश्मनों के पास

अधीन रहीं, अकेली रहीं

इसीलिए संदेह के घेरे में आईं

परंतु उस ने तुम्हारे सम्मान के लिए

अग्निपरीक्षा दी और

निष्कलंक सफलता पाई

और तुम भी तो

सीता की तरह रहे अकेले

वह भी मुक्त और स्वच्छंद

फिर किसी ने तुम्हारी

अग्निपरीक्षा क्यों नहीं ली?

या फिर स्वयं तुम ने

मर्यादा की रक्षा हेतु

लोकहित में अग्निपरीक्षा

क्यों नहीं दी?

उत्तर दो

तुम तो मर्यादा पुरुषोत्तम हो.

छोटे छोटे कामों से बड़ी पहचान बनाती महिलाएं

‘कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता’, ‘रईस’ फिल्म के इस डायलौग को सच साबित कर रही हैं आज की पावरफुल महिलाएं.

आज के महंगाई के जमाने में महिलाओं के लिए भी कमाना जरूरी हो गया है. ज्यादातर शिक्षित महिलाएं टेबलवर्क करना पसंद करती हैं. पर जो महिलाएं कम पढ़ीलिखी होती हैं उन के पास मजदूरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता.

गोलगप्पे का नाम सुनते ही मुंह से पानी आने लगता है. कहा जाता है कि गोलगप्पे बेचने का काम पुरुष ही करते हैं, मगर अब अहमदाबाद शहर की खुद्दार महिलाएं इस बात को गलत साबित करती दिख रही हैं. हम ने ऐसी ही कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए गोलगप्पे बेचने की शुरुआत करने वाली कुछ महिलाओं से उन के संघर्ष से जुड़ी रोचक बातचीत की.

ख्याति

अहमदाबाद के रायपुर की निवासी ख्याति गुज्जर सिर्फ 12 क्लास तक पढ़ी हैं. 35 साल की ख्याति 2 बच्चों की मां हैं. पति कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय करते हैं.

family selfmade working indian womens

वे शादी के बाद अपने जीवन में कुछ करना चाहती थीं, अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थीं. पर शादी के बाद उन्होंने अपने शौक और कुछ करने की ख्वाहिश पर विराम लगा दिया था. जैसेजैसे वक्त आगे बढ़ा उन के शौक और ख्वाहिश ने करवट बदली. ख्याति के पति भी चाहते थे कि उन की पत्नी स्वनिर्भर बने. ख्याति ने मणीनगर के रामबाग विस्तार में गोलगप्पों का ठेला लगाना शुरू किया. शुरू में ठेला चलाने और खड़े रहने में हिचकिचाहट होती थी, फिर भी काम चालू रखा.

ख्याति 2 सालों से गोलगप्पों का ठेला लगा रही हैं. वे गोलगप्पे घर पर ही बनाती हैं. वे दिन में 800 तक कमा लेती है. उन के अनुसार, आज के वक्त में 1 कमाने वाला और 4 खाने वाले हों तो एक की कमाई से घर चलाना मुश्किल हो जाता है. इसीलिए हर महिला को चाहिए कि वह अपने बलबूते पर कोई न कोई काम करे ताकि उस का आत्मविश्वास और काम करने की इच्छा बढ़े.

वर्षा त्रिवेदी

सिर्फ 9वीं कक्षा पास मणिनगर की वर्षा त्रिवेदी की शादी को 23 साल हो गए हैं. वे 42 साल की हैं. फैमिली में पति और 2 बेटिया हैं. पति शहर में काम करते हैं. बड़ी बेटी जौब करती है और छोटी 10वीं कक्षा में पढ़ रही है.

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वर्षा शादी के बाद परिवार में आर्थिक तंगी के चलते जौब करती थीं, पर जौब से संतुष्ट नहीं थीं. कम पगार में घर चलाने में बड़ी परेशानी हो रही थी. अत: नौकरी छोड़ने के 6 महीने तक घर पर बिना काम बैठी रहीं. फिर सोचा कि ऐसे ही घर बैठी रहेगी तो 2 बेटियों का भविष्य खराब हो जाएगा.

फिर अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा देने के लिए वर्षा ने 5 साल पहले गोलगप्पों का ठेला लगाना शुरू करने की सोची. पर इस के लिए उन के पास पैसे नहीं थे. इन तंग हालात में भी वर्षा ने हार नहीं मानी और पैसे उधार ले कर गोलगप्पों का ठेला लगाना शुरू किया. वर्षा की मेहनत धीरेधीरे रंग लाने लगी. उन के यहां गोलगप्पे खाने वालों की लाइन लगने लगी. हमें वर्षा से बात करने के लिए तो खासतौर पर अपौइंटमैंट लेनी पड़ी. वर्षा शाम के 4:30 बजे से ले कर रात के 10:30 बजे तक गोलगप्पों का ठेला लगाती हैं और आराम से 1500 प्रतिदिन मुनाफा कमा लेती हैं.

अपने इसी काम से वर्षा त्रिवेदी ने अपनी बड़ी बेटी को इंटीरियर डिजाइनर बनाया और दूसरी 10वीं कक्षा में पढ़ रही है, जिसे वर्षा होटल मैनेजमैंट का कोर्स कराना चाहती हैं.

दीपिका

दीपिका चेतनभाई सोलंकी अहमदाबाद में पिछले करीब 3 सालों से गोलगप्पों का बिजनैस चला रही हैं. स्नातक दीपिका इस से पहले इंश्योरैंस ऐडवाइजर और बिरला सनलाइफ में एजेंसी मैनेजर की पोस्ट पर काम कर चुकी हैं. पतिपत्नी दोनों मिल कर सुबह के वक्त सारी तैयारी कर लेते हैं.

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दीपिका भारती बताती हैं, ‘‘मेरी मां सरपंच थीं और पिताजी के भी अच्छी पोस्ट पर होने के बावजूद मैं ने खुद का कुछ काम करने की सोची. आज युवाओं को ज्यादा दिनों तक जौब के पीछे न भाग कर अपना कोई काम करने की सोचना चाहिए. मुझे कभी अपना काम छोटा नहीं लगा. मुझे पता है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता.’’

महिलाओं को मैसेज देते हुए दीपिका कहती हैं कि हर महिला को सकारात्मक सोचना चाहिए. हर महिला में कोई न कोई टेलैंट जरूर होता है. बस जरूरत होती है खुद के टेलैंट को पहचान कर आगे बढ़ने की.

आनंदी

सिर्फ 24 साल की आनंदी बीकौम पास हैं. कैफे में मैनेजर पति के प्रोत्साहन पर आनंदी ने गोलगप्पे बिजनैस शुरू किया. शुरू में थोड़ी दिक्कतें आईं पर फिर धीरेधीरे सब सही हो गया. आनंदी 2 महीनों से दिन के 3 बजे से ले कर रात के 8 बजे तक अहमदाबाद के गांधी आश्रम रोड पर गोलगप्पे बेच रही हैं.

आनंदी दिन में 300 की लागत से ज्यादा से ज्यादा 800 और कम से कम 600 तक की कमाई कर लेती हैं. उन का मानना है कि लड़कियों को खाली बैठे रहने के बजाय कुछ न कुछ काम जरूर करते रहना चाहिए.

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आनंदी बताती हैं, ‘‘मैं ने रिलेशनशिप मैनेजर की पोस्ट पर भी काम किया है, परंतु मुझे वहां इतना कंफर्टेबल काम करने को नहीं मिला. जौब में नकारात्मक अनुभव भी रहे हैं. जौब करने पर घर में उतना वक्त नहीं दे पाती थी. बाहर का गुस्सा घर में उतरता था. कम लागत में अच्छी कमाई करने का यह बेहतर जरीया है. हर लड़की को अपना कोई काम करना चाहिए. मैं आगे चल कर खुद का कैफे शुरू करने के साथसाथ गोलगप्पों के इस काम को भी बड़े पैमाने पर करूंगी.’’

भारती

सिर्फ क्लास 9 तक पढ़ी हुई ओघाणी भारती सागरभाई के परिवार में 2 बेटियां और पति हैं. भारती के पति सागरभाई फोटोग्राफी का काम करते हैं. मगर आज के महंगाई के युग में एक की कमाई से घर नहीं चलता.

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अत: आर्थिक मुश्किलों के चलते भारती ने गोलगप्पों का छोटे पैमाने पर बिजनैस शुरू करने की सोची. अब वे 3 सालों से अखबार नगर सर्कल के पास दिन के 4 बजे से ले कर रात 9 बजे तक गोलगप्पे बेचती हैं. इस काम में उन की बेटी डिंपल भी उन की मदद करती है. भारती दिन भर में 800 से ले कर 1 हजार तक कमाई कर लेती हैं. इन से बात करने पर पता चला कि उन के नियमित ग्राहक भी हैं. उन के आसपास कई पुरुष भी गोलगप्पे का बिजनैस कर रहे हैं, पर भारती के बिजनैस की खासीयत है कि उन के यहां सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है. इसीलिए इन के यहां गोलगप्पे खाने वालों की भीड़ लगी रहती है.

3 साल से भारती के यहां गोलगप्पे खाती आ रहीं मितल रामी बताती हैं, ‘‘मैं भारतीजी की नियमित ग्राहक हूं. मुझे यहां की सफाई अच्छी लगती है और गोलगप्पे भी बिलकुल फ्रैश होते हैं. कोई भी बासी चीज यहां नहीं होती.’’

भारती का बिजनैस इतना अच्छा चल रहा है कि उन्हें शादीब्याह के भी और्डर मिलते हैं.

मोदी मैजिक पर ग्रहण, आखिर क्या हैं इसके मायने

देश के 10 राज्यों में लोकसभा की 4 और विधानसभा की 10 सीटों के लिए हुए उपचुनावों के नतीजे केंद्र सरकार के कार्यों पर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सरीखे हैं. 14 उपचुनावों से साफ संकेत मिल गया है कि अब देश में मोदी मैजिक खत्म हो रहा है. रामायण की तर्ज पर भाजपा के ‘अश्वमेघ यज्ञ’ का घोड़ा कर्नाटक में विपक्ष ने रोक लिया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में भी भाजपा को मात खानी पड़ी. जीत की जंग में भाजपा का प्रदर्शन सब से खराब रहा. भाजपा के लिए सब से बड़ी शर्मनाक हार ‘राम के प्रदेश’ उत्तर प्रदेश में रही.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एकतरफा मैदान मारने वाली भाजपा का उपचुनावों में हार का सिलसिला जारी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की लोकसभा सीटें क्रमश: गोरखपुर व फूलपुर हारने के बाद भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट भी हार गई. कैराना सीट का महत्त्व भी गोरखपुर और फूलपुर से कम नहीं है. कैराना से हिंदुओं के पलायन का बनावटी मुद्दा बना कर भाजपा ने 2014 में लोकसभा सीट जीती थी. चुनावी जीत के बाद भाजपा कैराना से पलायन की बात को भूल गई, क्योंकि फिर साबित करना पड़ता कि कितने कहां क्यों गए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नूरपुर विधानसभा सीट सहारनपुर जिले में आती है और हिंदुओं के पलायन का मुद्दा वहां भी मददगार रहा पर अब उपचुनाव में नूरपुर सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई.

अविजित नहीं शाह-मोदी उपचुनावों में भाजपा की हार से साफ हो गया है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी अविजित नहीं है. उस को हराया जा सकता है. राजनीतिक समीक्षक हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘भाजपा की जीत का सफर विरोधी दलों के मनोबल को तोड़ चुका था. विपक्षी एक तरह से पस्त हो गए थे लेकिन कर्नाटक में भाजपा के प्रबंधन को तोड़ने के बाद विपक्षी एकता का मनोबल बढ़ गया है. अब उन को एहसास हो चुका है कि राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह का प्रबंधन भी फेल हो सकता है.

यह बात न केवल विपक्षी दल बल्कि भाजपा के कार्यकर्ता और नेता भी समझने लगे थे कि शाहमोदी की जोड़ी हर हाल में उन्हें जीत दिलाती रहेगी, लेकिन अब यह भ्रम टूट गया है. ऐसे में आने वाले दिनों में 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पडे़गा. शाहमोदी की जोड़ी के सामने पस्त पडे़ भाजपा नेता भी अब विरोध में उठने वाले स्वरों को हवा देने का काम करेंगे. भाजपा को प्रदेशदरप्रदेश मिल रही जीत से पार्टी की टौप लीडरशिप में हेकड़ी का भाव आ चुका था. अपनी किसी भी योजना को वह फेल मानने को तैयार नहीं थी. विपक्षी दलों से ले कर जनता या दूसरे जानकार लोगों की राय उस के लिए बेमानी हो चुकी थी. पार्टी अपनी आलोचना को विरोध मानने लगी थी. पार्टी में अंदर और बाहर दोनों तरफ तानाशाही का बोलबाला था. मीडिया के सवालों का उन का एजेंडा बता कर सरेआम जवाब देने से मना कर दिया जाता था. इस तरह की तानाशाही कांग्रेस में भी इमरजैंसी के दौर में दिखी थी. जो तानाशाही कांग्रेस में 28 साल सरकार चलाने के बाद आई थी वह भाजपा में मात्र 4 साल में ही दिखाई देने लगी है.

1975 से 1977 तक इमरजैंसी के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विपक्ष को नेस्तनाबूत करने का संकल्प ले कर अपने फैसले लागू करने शुरू किए. कांग्रेसमुक्त भारत के अपने अभियान में यही काम भाजपा करने लगी. ऐसे में जनता के मन में स्वाभाविक तौर पर विरोधी दलों के प्रति एक सहानुभूति पैदा हो गई. यही वह लहर थी जिस ने कांग्रेस के खिलाफ इमरजैंसी के बाद विरोधी दलों का साथ दिया था. भाजपा के खिलाफ बहुत सारे दलों का गठबंधन भले ही बहुत लंबा सफर तय न कर सके लेकिन भाजपा को कुरसी से उतारने में अवश्य सफल हो सकता है. शाहमोदी की जोड़ी की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगने शुरू हो गए हैं.

कांग्रेस फिर मैदान में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दल नहीं कर सकते हैं. क्षेत्रीय दलों के सहयोग से कांग्रेस भाजपा का मुकाबला करने के लिए मैदान में है. कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस और दूसरे दलों का यह तालमेल साफतौर पर दिखा. इस का असर भाजपा के रणनीतिकारों पर भी हुआ, मंच पर सोनिया गांधी और मायावती की गले मिलती फोटो देख कर भाजपाई खेमे के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. यही नहीं, सोनिया व मायावती की इस जोड़ी को ले कर सोशल मीडिया पर भी गहमागहमी रही. कुछ मैसेज काफी कटाक्ष वाले थे.

भाजपा को यह मालूम है कि 2014 में उस की सफलता कम, कांग्रेस की असफलता ज्यादा थी. अब भाजपा और कांग्रेस का फर्क बहुत सारे मामलों में खत्म हो गया है. केवल धर्म की कट्टरता को छोड़ दें तो भाजपा और कांग्रेस में कोई भेद नहीं रह गया है. कई बार तो भाजपा कांग्रेस के पुराने कामों का उदाहरण दे कर अपना बचाव भी करने लगी है. राज्यों में राज्यपाल की ताकत का प्रयोग करना हो, जोड़तोड़ कर के सरकार बनानी हो, जनता पर टैक्स लगाना हो, ये सब वैसे ही होने लगा है जैसे कांग्रेस के राज में होता था. अब कांग्रेस अपने को बदल कर भाजपा का मुकाबला करने के लिए मैदान में उतर चुकी है. बीमार होने के बावजूद कर्नाटक में सोनिया गांधी ने मंच पर खडे़ हो कर विपक्षी दलों को ताकत दी और भाजपा को चुनौती दे दी.

14 उपचुनावों के बाद अगली परीक्षा 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा लंबे समय से सत्ता में है. वहां हमेशा भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला होता रहा है. तीनों ही प्रदेशों में कोई क्षेत्रीय दल मुकाबले में नहीं होता था. हाल के कुछ सालों में तीनों ही प्रदेशों में बहुजन समाज पार्टी की दखल बढ़ी है. यही वजह है कि अब कांग्रेस के लिए मायावती की दोस्ती अहम हो चुकी है. धार्मिक एजेंडा फिस

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘भाजपा को लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह लगने लगा था कि धार्मिक एजेंडा ही उस की जीत का एकमात्र फार्मूला है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले भले ही पार्टी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से बच रही थी पर जीत के बाद उस ने योगी को ही मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठा दिया. भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश बेहद महत्त्वपूर्ण था. लोकसभा चुनाव में उसे 2014 की तरह अब 73 सीटें मिलनी बेहद मुश्किल हैं. ‘‘भाजपा धर्म को आगे कर के यह चुनाव जीतना चाहती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भाजपा ने अपना ब्रैंड ऐंबैसेडर सा बना लिया. चुनावीप्रचार में भाजपा में योगी का कद मोदी और शाह के बाद माना जाने लगा. हर चुनाव में उन को स्टारप्रचारक बना कर पेश किया जाने लगा. गुजरात और हिमाचल में जीत के लिए योगी के प्रचार को सराहा गया था. कर्नाटक में भी योगी को चुनावीप्रचार में रखा गया.’’

भाजपा योगी को पूरे भारत में चुनावीप्रचार का हिस्सा बना चुकी है. परेशानी वाली बात यह है कि पूरे देश में ब्रैंड ऐंबैसेडर बने योगी उत्तर प्रदेश में ही चुनावी जीत नहीं दिला पा रहे हैं. योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश के 3 लोकसभा उपचुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. इस में खुद मुख्यमंत्री योगी की गोरखपुर सीट शामिल है. इस के अलावा फूलपुर और कैराना में भी योगी ने प्रचार अभियान चलाया था. उत्तर प्रदेश में योगी धार्मिक एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं. पर्यटन में केवल धार्मिक महत्त्व के शहरों का विकास हो रहा है. परिवहन की सुविधाओं में भी धार्मिक पहचान वाले शहरों को प्राथमिकता दी जा रही है. विकास के दूसरे कामों में भी धार्मिक शहरों को महत्त्व मिल रहा है. गौरक्षा के नाम पर शहर से गांव तक छुट्टा जानवरोंं का आतंक बढ़ता जा रहा है. उत्तर प्रदेश और बाकी प्रदेशों में भाजपा को मिली हार से साफ हो गया है कि जनता को भाजपा का धार्मिक एजेंडा पसंद नहीं आ रहा है. धार्मिक एजेंडा फिस होने से भाजपा की हार तय हो गई है. कैराना और नूरपुर में जिन्ना विवाद काम नहीं आया. ऐसे में साफ है कि लोग अब जागरूक हो रहे हैं.

अंधसमर्थक व्यापारी स्तब्ध भाजपा की हार से सब से अधिक स्तब्ध अंधसमर्थक व्यापारी हैं. नोटबंदी, ईवे बिल, महंगाई, बैंकों की परेशानी और जीएसटी से परेशानी के बाद भी ये समर्थक भाजपा की गलती मानने को तैयार नहीं थे. उन को लगता था कि भाजपा को ऐसे ही जनता का समर्थन मिलता रहेगा. असल में ये समर्थक बड़ी संख्या में ऊंची जातियों के थे. इस के साथ ही साथ, इस जमात में कुछ पिछड़ी जातियां और दलित भी शामिल हो चुके थे.

केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद भाजपा में दलितों की उपेक्षा होने लगी. उन पर जातीय अत्याचार शुरू हो गया. उत्तर प्रदेश के सहानपुर व महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा ने भाजपा की पोल खोल दी. मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर अत्याचार ने दलितों और पिछड़ों को यह बता दिया कि भाजपा अभी भी ऊंची जातियों की पार्टी है. भाजपा के समर्थक यह चाहते थे कि दलितपिछडे़ पार्टी को वोट तो दें पर ये पार्टी में अपना हक न मांगें. भाजपा के अंधभक्त व्यापारी समर्थकों को अब लग रहा है कि आगे के चुनाव में भी दलित, पिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ बना रहा तो भाजपा का सत्ता में कायम रहना मुश्किल हो जाएगा.

उत्तर प्रदेश में दलित, पिछड़े और मुसलिम गठजोड़ ने कैराना व नूरपुर के उपचुनाव में भाजपा को हराने में सब से बड़ी भूमिका निभाई. इस जीत ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाशिये पर चले गए अजित सिंह के लोकदल में जानफूंकदी है. नए गठबंधन की तलाश

एनडीए के सहयोगी दलों के साथ भाजपा का व्यवहार हेकड़ी वाला होता जा रहा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के सहयोगी ओमप्रकाश राजभर नाराज चल रहे हैं. अपना दल के बारे में भी अंदर खाने चर्चा है कि लोकसभा चुनाव वह भाजपा के साथ नहीं लड़ेगा. रामविलास पासवान, उदित राज और रामदास अठावले जैसे नेता पार्टी में दलित मुद्दों को ले कर मुखर हैं. भाजपा सांसद ज्योतिबा फूले आरक्षण और संविधान के मुददे पर भाजपा के साथ खड़ी नहीं हैं. ऐसे में भाजपा गठबंधन की कमजोर होती ताकत ने सहयोगी दलों को दूसरा रास्ता देखने पर मजबूर कर दिया है. बिहार में जदयू और भाजपा की सरकार भले ही चल रही हो पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहज भाव से काम नहीं कर रहे हैं. वे जौकीहाट सीट बुरी तरह हारने से पहले ही नोटबंदी पर कटाक्ष कर चुके थे कि लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को कहना पड़ा था कि अब नीतीश कुमार के पुराने गठबंधन में लौटने के दरवाजे बंद हो चुके हैं.

बिहार की जौकीहाट विधानसभा सीट लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ने ही जीती है. यहां पर भाजपाजदयू गठबंधन का मुकाबला राजद से था. यहां भाजपा की हार से साफ लगता है कि केवल विपक्षी एकता के सामने ही नहीं, आमनेसामने के मुकाबले में भी भाजपा चुनाव हार जाएगी. कांग्रेस के नेता सुरेंद्र सिंह राजपूतकहते हैं, ‘‘भाजपा की जुमलेबाजी अब जनता समझ चुकी है. उसे केवल हवाई जुमलों से नहीं संभाला जा सकता. कांग्रेस की राजनीति देश के विकास और समाज को एकजुट रखने की रही है, देश के लोग इस बात को समझ रहे हैं. 3 राज्यों के चुनावों के पहले ही 14 उपचुनावों में भाजपा की हार से साफ हो गया है कि अब भाजपा की जुमलेबाजी काम नहीं आएगी.’’

देश को केवल विरोध की राजनीति नहीं चाहिए. देश के लोग विश्वास की राजनीति को महत्त्व देते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से देश की जनता ने भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के शहद में डूबे बयानों के प्रभाव में वोट दे दिया. लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र सरकार की नीतियां जनता के सुखदुख और विकास की नहीं रहीं. नोटबंदी, बैंकों की परेशानी, बेरोजगारी को केंद्र सरकार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया. भाजपा के नेता और कार्यकर्ता जहां मोदी मैजिक के टूटने से स्तब्ध हैं वहीं विरोधी दलों में आत्मविश्वास भर चुका है.

कर्नाटक का जनसमर्थन

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की किरकिरी हुई. हालांकि वह चुनाव में हारी नहीं है, बल्कि सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी है. पर इतनी बात साफ है कि यदि अपनी गायों के लिए भाजपा के पास चारा कम होगा तो वह अब दूसरों से झटकने की कोशिश सोचसमझ कर ही करेगी ताकि फिर से किरकिरी न होने पाए. सरकार बनाने में उस के गच्चा खा जाने के बाद अब जो पलायन दूसरी पार्टियों से भाजपा की ओर हो रहा था, वह बंद हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी के गौरक्षक गायों के लिए दूसरों को मारनेपीटने को तो हर समय तैयार रहते हैं पर गायों के लिए चारा उगाने की कोशिश उन्होंने कभी नहीं की. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, ईज औफ डूइंग बिजनैस उसी तरह के मंत्र हैं जैसे आयुष्मान भव:, सौभाग्यवती भव:, अतिथि देवो भव: जो बोले तो जाते हैं लेकिन उन के लिए किया कुछ नहीं जाता.

अब वोटरों को भी दिखने लगा है और नेताओं को भी कि भाजपा हर हालत में सत्ता में रहेगी, ऐसी गारंटी नहीं है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल के उपचुनावों में हार, गुजरात में ढीले प्रदर्शन और कर्नाटक में बहुमत न पा सकने से भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा हिंदू समाज के उन स्वयंभू ठेकेदारों के तेवर ढीले हुए हैं जो सोच रहे थे कि रामराज्य आ ही गया है जिस में पिछड़े हनुमान दास को पूजते रहेंगे व शंबूकों को पढ़ने से मना किया जाता रहेगा और ब्राह्मण श्रेष्ठों की ही चलेगी चाहे उस के लिए पत्नी सीता को फिर वनवास देना पड़े.

भारतीय जनता पार्टी की 2014 के बाद की चुनावी जीतें सामाजिक परिवर्तन ला रही थीं जो एकदम उलट दिशा में जा रहा था. उदारता, विभिन्नता, आधुनिकता, तार्किकता को छोड़ा जा रहा था और मंदिरों, यज्ञों, हवनों, तिलिस्मी तावीजों, तीर्थयात्राओं का युग लौट रहा था. भारत की आर्थिक प्रगति बनी हुई है क्योंकि उस सब के बावजूद देश की कानून व्यवस्था चरमरा नहीं गई थी. देश पश्चिम एशिया की तरह गृहयुद्धों की चपेट में नहीं आया था पर धर्म और जाति को ले कर दूषित माहौल बनने लगा था. कर्नाटक और 15 उपचुनावों के नतीजे शायद इस पर रोक लगाएंगे और भाजपाई सरकारों को अपना कांग्रेसीकरण करना होगा जिस में सब को अपनी इच्छा के हिसाब से चलने की इजाजत होगी. नरेंद्र मोदी की सरकार के अच्छेबुरे फैसले वैसे ही हैं जैसे किसी भी सरकार के होते हैं. देश में एक चुनी सरकार ही होनी चाहिए जिस के सिर पर चुनावों में जनसमर्थन की तलवार लटकी रहे. परिणामों ने साबित कर दिया है कि इस तलवार पर सरकार या पार्टी का कब्जा नहीं हुआ है.

आपकी छोटी सी गलती से हो सकता है आपका स्मार्टफोन हैक

दुनिया में स्मार्टफोन उपभोक्ताओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, इस बढ़ते हुए तादाद और इंटरनेट के इस्तेमाल की वजह से फोन हैक या डाटा चोरी होने जैसी तमाम प्रकार की घटनाएं भी बढ़ती जा रही है. वक्त के साथ स्मार्टफोन वाकई में स्मार्ट होता चला जा रहा है और आज के युग में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लोग केवल बात करने या फिर सोशल मीडिया पर चैट करने के लिए ही नहीं करते हैं, आजकल स्मार्टफोन लोगों की जरूरत बनती जा रही है. लोग अपने बैंकिग, औनलाइन पेमेंट, खरीदारी आदि भी स्मार्टफोन से करने लगे हैं. ऐसे में स्मार्टफोन का हैक होना या जानकारी लीक होना यूजर्स के लिए परेशानी पैदा कर सकती है.

आज हम अपने कुछ खास लोगों के द्वारा एकत्रित किये गए जानकारी के माध्यम से हम आपको बताएंगे की आखिर आप किस तरीके से अपने स्मार्टफोन को हैक होने से बचा सकते हैं. ”जब भी आप कोई ऐप अपने स्मार्टफोन में इंस्टौल करते हैं तो पहले चेक कर लें कि वो ऐप गूगल प्ले स्टोर पर वेरिफाइड हैं कि नहीं. इसके अलावा आप थर्ड पार्टी एप अपने स्मार्टफोन में भूल कर भी इंस्टौल करने से बचें. साथ ही किसी ऐप को गैर-जरूरी परमिशन न दें, क्योंकि अगर आप किसी ऐप को गैर-जरूरी परमिशन देते हैं तो ये आपके लोकेशन, कौन्टैक्ट्स, आपकी रूचि, फोटो आदि की जानकारी इकठ्ठा कर लेते हैं, जिससे आपकी निजी जानकारी हैकर्स के पास जाने का खतरा बना रहता है.” जिस प्रकार कुछ वक्त पहले अमेरिका में फेसबुक के मामले में देखने को मिला था तो किसी भी ऐप को अपने डाटा को एक्सेस करने की अनुमति देने से पहले 10 बार सोच विचार ले की क्या ये सही है या नहीं.

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गलती से भी ना करें थर्ड पार्टी ऐप को इंस्टौल

सबसे पहले आप अपने एंड्रौयड स्मार्टफोन में कभी भी किसी थर्ड पार्टी ऐप को इंस्टौल करने से बचें. थर्ड पार्टी ऐप के जरिए हैकर्स आसानी से आपके स्मार्टफोन का डाटा चुरा सकते हैं. इसलिए हमेंशा वेरिफाइड ऐप ही गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करें, क्योंकि ये ऐप ज्यादातर सुरक्षित होते हैं और इनसे कोई खतरा आमतौर पर होता नहीं है.

किसी भी ऐप को परमिशन देने से पहले सोच विचार लें

आप किसी ऐप को इंस्टौल करते समय उसे अपने कौन्टैक्ट, फोटो, कैमरा आदि का एक्सेस न दें, किसी ऐप में अगर जरूरत हो तब ही उसमें एक्सेस दे. इसके अलावा अपने एंड्रौयड फोन में गूगल प्ले प्रोटेक्ट को इनेबल कर लें. अन्यथा आपका डाटा आपकी अनुमित देने की आदतो की वजह से गलत हाथों में भी लग सकता है जिसका कोई भी चाहे अपने इच्छानुसार गलत इस्तेमाल कर सकता है.

काम के ऐप तथा वेरिफाईड ऐप को अनुमित देने से काफी हद तक आपका स्मार्टफोन सुरक्षित रहेगा और हैक होने की संभावना नहीं के बराबर रहेगा. अगर आप चाहते हैं तो एंटी वायरस भी इंस्टौल कर सकते हैं.

स्मार्टफोन में गूगल प्ले प्रोटेक्ट सर्विस को कैसे करें इनेबल

  • सबसे पहले आप अपने स्मार्टफोन में सेटिंग्स के औप्शन पर टैप करें.
  • स्क्रौल करने के बाद यहां आपको मोर सेटिंग्स आइकन दिखाई देगा, उसपर टैप करें.
  • यहां आपको सिक्योरिटी औप्शन दिखाई देगा, अब आप यहां टैप करें.
  • सिक्योरिटी पर टैप करते हुए सबसे ऊपर आपको गूगल प्ले प्रोटेक्ट औप्शन दिखाई देगा, उसपर टैप करें.
  • यहां आपको स्कैन डिवाइस फौर सिक्योरिटी थ्रेट्स और इंप्रूव हार्मफुल एप डिटेक्शन औप्शन दिखाई देगा.
  • इसे इनेबल करते ही आपके डिवाइस की सिक्योरिटी बढ़ जाती है और इन वायरस के अटैक का खतरा कम हो जाता है.

आप अपने स्मार्टफोन को पूरी तरह से सिक्योर रखने के लिए अपने स्मार्टफोन में कभी भी थर्ड पार्टी ऐप इंस्टौल न करें.

रांची में नीलाम होने वाला है धोनी का घर, क्या है इसकी वजह

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान, विकेटकीपर और बल्लेबाज महेंद्र सिंह धोनी के रांची स्थित फ्लैट अब नीलाम होंने वाले हैं. 900 वर्गफीट और 1100 वर्गफीट के धोनी के दो फ्लैट कमर्शियल हैं. धोनी के ये दोनों फ्लैट रांची के डोरंडा में शिवम प्लाजा नामक बिल्डिंग में हैं. बिल्डर दुर्गा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड पर हुडको का लोन नहीं चुका पाने का आरोप है जिसके कारण हुडको यानि हाउसिंग अर्बन डेवलपमेंट कौर्पोरेशन ये फ्लैट नीलाम करने जा रहा है और इसलिये जौ के साथ घून यानि इसका खामियाजा महेंद्र सिंह धोनी को भी उठाना पड़ रहा है.

रांची के बेहद पौश इलाके में स्थित एस प्लाजा के चौथी और पहली मंजिल पर महेंद्र सिंह धोनी के दो कौमर्शियल फ्लैट्स हैं. लेकिन इसी कड़ी में हुडको ने इसकी नीलामी की तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसके लिए भवन परिसंपत्ति का दो बार मूल्यांकन अलग-अलग कराया गया है. इलाहाबाद स्थित कर्ज वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण में नीलाम की आधार राशि तय करने की अपील की है.

न्यायाधिकरण की ओर से छह करोड़ कर्ज की राशि के लिए उचित ब्याज और हर्जाने की राशि के मुताबिक नीलाम की आधार राशि तय होगी. नीलामी से मिली राशि में से इतना हुडको अपने खाते में ले लेगा. नीलामी लोन वाली पूरी परियोजना यानी बिल्डिंग की होगी. यानि उसमें बिक चुके फ्लैट भी इसमें शामिल होंगे. हालांकि, दुर्गा डेवलपर्स के निदेशक निलय झा मानते हैं कि हुडको के साथ उनका लोन को लेकर विवाद जरुर है लेकिन वे महेंद्र सिंह धोनी के दो फ्लैट का सेटलमेंट दूसरे जगह कर चुके हैं, जहां तक ग्राउंड फ्लोर में धोनी के फ्लैट की बात है उसका 3 करोड़ का भुगतान हुडको को कर दिया गया है. वहीं, वे हुडको के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

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दुर्गा डेवलपर्स ने इस बिल्डिंग को बनाने के लिये हुडको से 12 करोड़ 95 लाख लोन लिया था. इसे जी+10 फ्लोर का बनना था. लेकिन कुछ आगे हो पाता इसी बीच जमीन के मालिक से दुर्गा डेवलपर्स का किसी वजह को लेकर विवाद हो गया. इस कारण छह करोड़ देने के बाद हुडको ने दुर्गा डेवलपर्स के लोन का बाकी हिस्सा रोक दिया. भवन जी+6 फ्लोर बनने के बाद ही रुक गया. लोन चुकाने में देरी के कारण हुडको ने कंपनी को डिफौल्टर घोषित कर दिया. धोनी ग्राउंड फ्लोर पर स्थित अपने दोनों फ्लैटों के लिए डेढ़ करोड़ रुपए दे चुके हैं. इसके बाद भी इस परिसंपत्ति का उनके हाथ से निकलना तय माना जा रहा है.

इस मामले में माही के बड़े भाई नरेंद्र सिंह धोनी ने हुडको पर आरोप लगाते हुए कहा है कि हुडको की साजिश के कारण यह प्रोजेक्ट खत्म हुआ है. हमने तीन करोड़ चुका दिए हैं, लेकिन हुडको ने दुर्गा डेवलपर को लोन दिया था तो इसका नोटिस बिल्डिंग में क्यों नहीं लगाया. हमें कैसे पता लगेगा कि बिल्डिंग लोन में बनाई गई है. बिल्डर और हुडको ने मिलकर हमें फंसा दिया.

बहरहाल इस मामले में हुडको की तरफ से कोई भी अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि अगर शिवम प्लाजा नीलाम हुई तो बिल्डर और हुडको के आपसी विवाद तथा उनकी गलती का खामियाजा टीम इंडिया के खिलाडी महेंद्र सिंह धोनी को भी चुकाना पड़ेगा.

बौलीवुड में हो सकती है एक और पोर्न स्टार की एंट्री

बौलीवुड सनसनी सनी लियोनी को जिस टीवी शो ने एक अलग पहचान दिलाई, जिस टीवी शो के बाद सनी को बौलीवुड में एंट्री मिली उसी टीवी शो में एक और एडल्ट स्टार की एंट्री हो सकती है. यह सब जानते हैं कि सनी एक एडल्ट स्टार रह चुकी हैं. सनी लियोनी आज बौलीवुड की मशहूर नामों में से एक हैं. सलमान से लेकर संजय दत्त की फिल्मों में इन्होंने काम किया है.

सनी का शुरुआत से विवादों से नाता रहा है. सनी लियोनी शुरु में रिएलिटी शो बिग-बौस का हिस्सा बनीं. शो में सनी को काफी पसंद किया गया क्योंकि अपनी विवादित छवि के कारण सनी का यहां अलग ही अंदाज नजर आया.

अभी तक सनी लियोनी अपने जलवों से बौलीवुड में धमाल मचा रही हैं, लेकिन अब सनी को मिल सकती है बड़ी टक्कर. ऐसी खबरें है कि टीवी स्क्रीन पर एक और एडल्ट स्टार डायनामाइट का धमाका होने वाला है. बता दें कि टीवी रिएलिटी शो बिग बौस में एडल्ट मूवी स्टार शांति डायनामाइट को शो का हिस्सा बनाने की खबरें काफी गर्म है.

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छोटे परदे पर सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहना वाला रिएलिटी शो ‘बिग बौस’ का नया सीजन जल्द ही आने वाला है. अब हाल ही में ये खबर आ रही है कि इस बार शो में शांति डायनामाइट ‘बिग बौस-12’ में बतौर कंटेस्टेंट नजर आ सकती हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो अगर ऐसा होता है तो सनी लियोनी के बाद शांति दूसरी पोर्न स्टार होंगी, जो इस शो में कंटेस्टेंट के तौर पर नजर आएंगी.

आपको यह भी बता दें कि शांति भारतीय मूल की ब्रिटिश पोर्न स्टार हैं. उनका रियल नेम सोफिया वासिलिएडु है. खबरों के मुताबिक इस बार मेकर्स शो में बोल्ड कंटेंट लाने के बारे में सोच रहे हैं. पिछले साल ‘बिग बौस’ की टीआरपी कुछ खास नहीं थी. इसलिए टीआरपी के लिए शो में बोल्ड कंटेंट दिखाने के चर्चा जोरों पर है.

पिछले कई सीजनों की तरह सलमान खान एक बार ‘बिग बौस 12’ को होस्ट करेंगे. वहीं शांति ने एक बार अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि सलमान उनके फेवरेट एक्टर हैं. वैसे ये पहला मौका नहीं है जब शांति डायनामाइट के बिग बौस का हिस्सा बनने को लेकर चर्चा हो रही है. इससे पहले ‘बिग बौस’ के 8 वें सीजन में भी ऐसा कहा जा रहा था कि वो इस रिऐलिटी टीवी शो में शामिल हो सकती हैं.

सनी और शांति दोनों ही एडल्ट फिल्म स्टार रही हैं. सनी ने अब अपनी छवि को तोड़ते हुए, बौलीवुड में खास पहचान बना ली है. क्या शांति डायानामाइट टीवी शो नजर आएंगी और क्या वो सनी को टक्कर दे पाएंगी. ये आनेवाला वक्त ही बताएगा.

लेकिन इसमें एक बात तो तय हो गई है की बौलीवुड का रास्ता हर किसी के लिये खुला हुआ है, सबसे पहले सनी लियोनी उसके बाद मिया मालकोवा और इन सबके बाद अब इस नई पोर्न स्टार को बौलीवुड में एंट्री मिलने वाली है.

पेट्रोल, डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती हो सकती है नुकसानदायक : जेटली

केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने पेट्रोल, डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती की संभावना को सोमवार को एक तरह से खारिज करते हुए कहा कि इस तरह का कोई भी कदम नुकसानदायक हो सकता है. साथ ही उन्होंने नागरिकों से कहा कि वे अपने हिस्से के करों का ‘ईमानदारी’ से भुगतान करें, जिससे पेट्रोलियम पदार्थों पर राजस्व के स्रोत के रूप में निर्भरता कम हो सके.

फेसबुक पोस्ट में जेटली ने लिखा, ‘सिर्फ वेतनभोगी वर्ग ही अपने हिस्से का कर अदा करता है. जबकि ज्यादातर अन्य लोगों को अपने कर भुगतान के रिकौर्ड को सुधारने की जरूरत है. यही वजह है कि भारत अभी तक एक कर अनुपालन वाला समाज नहीं बन पाया है.’

जीडीपी अनुपात सुधरकर 11.5 प्रतिशत हुआ

जेटली ने कहा, ‘मेरी राजनीतिज्ञों और टिप्पणीकारों से अपील है कि गैर – तेल कर श्रेणी में अपवंचना रुकना चाहिए. अगर लोग ईमानदारी से कर अदा करेंगे तो कराधान के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता को कम किया जा सकेगा. बहरहाल, मध्य से दीर्घावधि में राजकोषीय गणित में कोई भी बदलाव प्रतिकूल साबित हो सकता है.’ उन्होंने कहा कि पिछले चार साल के दौरान केंद्र सरकार का कर – जीडीपी अनुपात 10 प्रतिशत से सुधरकर 11.5 प्रतिशत हो गया है. इसमें से करीब आधी (जीडीपी का 0.72 प्रतिशत) वृद्धि गैर- तेल कर जीडीपी अनुपात से हुई है.

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जीडीपी अनुपात 2017-18 में 9.8 प्रतिशत

जेटली ने कहा कि गैर तेल कर से जीडीपी अनुपात 2017-18 में 9.8 प्रतिशत था. यह 2007-08 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है. उस साल हमारे राजस्व की स्थिति अनुकूल अंतरराष्ट्रीय वातावरण की वजह से सुधरी थी. उन्होंने कहा कि इस सरकार ने राजकोषीय मजबूती और वृहद आर्थिक दायित्व व्यवहार को लेकर मजबूत प्रतिष्ठा कायम की है. राजकोषीय रूप से अनुशासन नहीं बरतने से अधिक कर्ज लेना पड़ता है जिससे ऋण की लागत बढ़ जाती है.

जेटली ने कहा, ‘उपभोक्ताओं को राहत सिर्फ राजकोषीय रूप से जिम्मेदार और वित्तीय दृष्टि से मजबूत केंद्र सरकार और वे राज्य दे सकते हैं जिनको तेल कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी की वजह से अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है. उन्होंने कहा कि नई प्रणाली में अनुपालन के ऊंचे स्तर के बावजूद गैर – तेल कर के मामले में भारत अभी भी कर अनुपालन वाला समाज नहीं बन पाया है.

उन्होंने कहा, ‘वेतनभोगी वर्ग कर अनुपालन वाला है. अन्य वर्गों को अभी इस बारे में अपना रिकौर्ड सुधारने की जरूरत है.’ जेटली ने कहा कि ईमानदार करदाताओं को न केवल अपने हिस्से के करों का भुगतान करना पड़ता है बल्कि उन्होंने कर अपवंचना करने वालों के हिस्से की भी भरपाई करनी पड़ती है.

खिताब बचाने उतरी इन टीमों को भी मिली है पहले मुकाबले में हार

रविवार को फीफा वर्ल्ड कप 2018 में सबसे बड़ा उलटफेर तब देखने को मिला जब मेक्सिको ने मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन जर्मनी को 1-0 से मात दे दी. हालांकि यह पहला मौका नहीं था जब किसी मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन को वर्ल्ड कप के पहले मुकाबले में ही हार का सामना करना पड़ा हो.

स्पेन की टीम ने 2010 में अपना पहला फीफा वर्ल्ड कप जीता था. लेकिन जब स्पेन की टीम 2014 में अपना खिताब बचाने के लिए मैदान में उतरी तो उसे नीदरलैंड के हाथों 5-1 से करारी हार का सामना करना पड़ा था.

ऐसा ही 2002 में फ्रांस की टीम के साथ भी हुआ था. 1998 में जिदेन के जादू से वर्ल्ड चैंपियन बनने वाली फ्रांस को 2002 वर्ल्ड कप के पहले मुकाबले में सेनेगल ने 1-0 से मात दी थी.

1986 में अर्जेंटीना की टीम ने अपना दूसरा वर्ल्ड कप खिताब जीता था. लेकिन जब अर्जेंटिना 1990 के फीफा वर्ल्ड कप में अपना खिताब बचाने के लिए उतरी तो उसके कैमरून ने 1-0 से पटखनी दे दी.

1982 में भी अर्जेंटीना को बेल्जियम के हाथों पहले मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था. 1978 में खेले गए फीफा वर्ल्ड कप को अर्जेंटीना ने पहली बार जीता था.

1938 में इटली ने दूसरी बार वर्ल्ड कप का खिताब जीता था. 12 साल के अंतराल के बाद जब इटली की टीम अपने खिताब को बचाने उतरी तो उसके स्वीडन के हाथों 2-3 से हार का सामना करना पड़ा था.

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