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वीडियो : जब ब्रेट ली के बाउंसर ने निकाला था द्रविड़ के कान से खून

दुनिया में सबसे तेज गेंदबाजों का जब भी जिक्र होता है तो दो नाम जरूर लिए जाते हैं एक पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर और दूसरा पूर्व आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ब्रेट ली का.

ब्रेट ली का खौफ बल्लेबाजों में हमेशा रहा है. मैदान पर आने वाले बल्लेबाज इसी कोशिश में रहते थे कि उन्हें ब्रेट ली की कम से कम गेंदों का सामना करना पड़े. ब्रेट ली की गेंदों की रफ्तार इतनी होती थी कि वह पलक झपकते ही बल्लेबाज की गिल्लियां उड़ा देते थे. ब्रेट ली अपने बाउंसर्स के लिए जाने जाते थे.

अगर कोई बल्लेबाज उनकी गेंदों पर चौका या छक्का जड़ता तो वह बाउंसर्स से उसका जवाब देते थे. लेकिन उनके बाउंसर्स कई बार इतने खतरनाक साबित होते थे कि अच्छे-अच्छे बल्लेबाजों को मैदान छोड़कर बाहर जाना पड़ता था. आज ही के दिन इस दिग्गज गेंदबाज का जन्म 1976 के न्यू साउथ वेल्स में हुआ था. ब्रेट ली आज 41 साल के हो गए हैं.

ब्रेट ली ने अपने क्रिकेट करियर में कुछ ऐसे बाउंसर्स डाले जिसने अच्छे-खासे बल्लेबाजों को पवेलियन भेजने का काम किया. इन बल्लेबाजों की लिस्ट में केन्या, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, साउथ-अफ्रीका के साथ-साथ भारत के खिलाड़ी भी शामिल हैं.

भारतीय क्रिकेट टीम में सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली से लेकर महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली जैसे दिग्गज बल्लेबाजों को ली अपनी गेंदबाजी से परेशान कर चुके हैं. ब्रेट ली ने अपने बाउंसर से तेंदुलकर को परेशान किया है तो उन्होंने अपने कवर ड्राइव से ली को शानदार जवाब भी दिया है. ब्रेट ली की एक खतरनाक गेंद हर भारतीय फैन को याद होगी, जब उन्होंने राहुल द्रविड़ के कान से खून निकाल दिया था.

दरअसल, सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर 2004 में बार्डर-गावस्कर सीरीज का मैच खेला जा रहा था. पहली पारी में भारत ने 705 रन बनाए थे और आस्ट्रेलियाई पारी 474 रनों पर सिमट गई थी. दूसरी पारी में टीम इंडिया ने 2 विकेट पर 211 रन बना लिए थे और राहुल द्रविड़ 91 रन बनाकर खेल रहे थे. तभी ब्रेट ली ने एक बाउंसर करवाया, जो द्रविड़ के कान पर जा लगी और कान से खून निकलने लगा.

इसके आलावा एक तेज बाउंसर द्रविड़ के सिर पर लगा इसके बाद द्रविड़ ने तुरंत हेलमेट खोला और सिर दबाना शुरू किया और बिना देरी किए मैदान से बाहर चले गए. तभी कप्तान सौरव गांगुली ने उस समय पारी घोषित कर दी थी. अंत में यह मैच ड्रा पर खत्म हुआ था.

ब्रेट ली का क्रिकेट करियर

ब्रेट ली ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत पाकिस्तान के खिलाफ 1999 में की थी. उन्होंने अपने क्रिकेट करियर के दौरान कई ऐतहासिक रिकार्ड अपने नाम किए. साथ ही आस्ट्रेलिया के साथ-साथ दुनिया के भी सबसे घातक गेंदबाजों की फेहरिस्त में खुद को शामिल किया. पाकिस्तान के शोएब अख्तर के बाद तेज गेंदबाजी में दूसरे नंबर पर ब्रेट ली का नंबर ही आता है.

बता दें कि ब्रेट ली ने 76 टेस्‍ट में 310 विकेट हासिल किए हैं, वहीं 221 वनडे में उनके नाम 380 विकेट दर्ज हैं. इसके अलावा ब्रेट ली ने 25 टी20 मैच भी खेले हैं जिसमें उन्‍होंने 28 विकेट लिए हैं. ब्रेट ली 2012 में वनडे जबकि 2015 में टी-20 क्रिकेट से संन्यास ले लिया था.

मेसी के बंगले के उपर से प्लेन का जाना है सख्त मना, ऐसा क्यों

फुटबौल की दुनिया के कई महान खिलाड़ी हुए हैं लेकिन इन सबमें से एक नाम ऐसा भी है जिसे आज दुनिया का बच्चा बच्चा जानता है, लियोनेल मेसी. मेसी दुनिया के सबसे महान फुटबौल खिलाड़ियों की लिस्ट में शामिल हैं.

इंटरनेशनल फुटबौल खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेस्सी अपने जादुई खेल के लिए तो जाने ही जाते हैं. साथ ही अपनी आलीशान लाइफस्टाइल के लिए भी मैसी दुनियाभर में पहचाने जाते हैं. अपने खेल से दुनिया को दीवाना बनाने वाले मैसी के शौक भी कम नहीं है. क्या आप जानते हैं, दुनिया में मैसी इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनके बंगले के ऊपर से प्लेन गुजरने पर पाबंदी है.

घर के ऊपर से फ्लाइट गुजरने पर है पाबंदी

स्पैनिश एयरलाइन्स के मुताबिक बार्सिलोना के हवाई अड्‌डे का विस्तार संभव नहीं है, क्योंकि उस जगह पर उड़ान भरना संभव नहीं है. हालांकि ऐसा पर्यावरण के नियमों के कारण हैं. लेकिन एयरलाइन्स इसके लिए मेसी को ही दोषी मानती हैं.

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प्रतिबंधित इलाके में है मैसी का घर

बार्सिलोना के गावा में जहां फुटबौल स्टार मेसी रहते हैं, वो इलाका पर्यावरण के लिहाज से प्रतिबंधित एरिया है. इस इलाके में प्लेन के उड़ने पर पाबंदी है.

फुटबौल मैदान के शेप का है मैसी का घर

मेसी का ये घर ऊपर से देखने में फुटबौल के शेप का नजर आता है. मेसी का ये घर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है. उनका ये घर पूरी तरह से इन्वायरमेंट फ्रेंडली है. जिसे ऊपर से देखने पर चारों तरफ हरियाली ही नजर आती है.

2017में बचपन की दोस्त से की थी शादी

अर्जेंटीना के खिलाड़ी लियोनेल मेसी ने साल 2017 में अपनी बचपन की दोस्त और गर्लफ्रेंड एंटोनेला रोकोजो से शादी कर ली थी. मैसी और रोकुजो बचपन में पड़ोसी थी. 5साल की उम्र में मैसी ने पहली बार रोकोजो को देखा था. इसके बाद वे 13 साल की उम्र में स्पेन चले गए,जहां उन्होंने फुटबौल क्लब बर्सिलोना को ज्वाइन किया, लेकिन दोनों हमेशा कौन्टेक्ट में रहते थे. जल्द ही ये दोस्ती प्यार में बदल गई और 2008 में मेसी और रोकोजो साथ रहने लगे उनके शादी से पहले दो बेटे भी हैं.

बीमार व्यक्ति कब तक रह सकता है जिंदा, बताएगी गूगल की नई खोज

आज पूरी दुनिया भर में आधुनिकता का बोलबाला है और टेक्नोलोजी के इस दौर में आए दिन नये नये आविष्कार होते ही रहते हैं जिनमें से कुछ लोगों के लिये फायदमंद तथा कुछ लोगों के लिये नुकसानदेय भी होता है. इसी बीच गूगल जल्द ही एक ऐसी तकनीक पेश करने की तैयारी कर रहा है जिसके जरिए यह पता चल सकेगा कि बीमार इंसान के जिंदा रहने की कितनी संभावना है. इस तकनीक को लेकर गूगल ने रिसर्च भी की है. इस तकनीक के आ जाने के बाद डौक्टर तथा मरीज के परिजनों को इस बात का पता चल सकेगा की बीमार व्यक्ति आखिर कब तक जिंदा रहने वाला है. इस तकनीक का इस्तेमाल वैज्ञानिक अपने प्रयोगों के लिये भी कर सकते हैं.

क्या है रिसर्च में

यह रिसर्च जिस महिला के उपर की गई वह महिला पहले से ही स्तन कैंसर से पीड़ित थी. इस दौरान डौक्टर्स की टीम ने महिला का रेडियोलौजी स्कैन किया जिसमें उसके मरने का जोखिम 9.3 फीसद था. जबकि गूगल ऐप से पूछने पर यह संख्या 19.9 फीसद थी. इस रिसर्च के कुछ दिन बाद ही महिला की मौत हो गई. स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर निगम शाह के मुताबिक, फिलहाल यह तकनीक अनुमानित जानकारी देती है. लेकिन जल्द ही इससे सटीक संख्या का पता लगाया जा सकेगा. इस तकनीक पर अभी काम किया जा रहा है.

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आपको बता दें कि इस तकनीक पर आर्टिफशल इंटेलिजेंस के चीफ जेफ डीन की कंपनी मेडिकल ब्रेन काम कर रही है. यह तकनीक बीमार व्यक्ति की बीमारी की जांच कर निष्कर्ष बताएगी. रिसर्च में गूगल की तरफ से महिला के बचने की संभावना को लेकर दिए गए आंकड़ों से विशेषज्ञ हैरान रह गए. विशेषज्ञों ने कहा कि जिन आंकड़ों और रिपोर्ट तक वो नहीं पहुंच पाए वहां तक गूगल पहुंचा और इससे संबंधित रिपोर्ट भी गूगल ने दी.

स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफेसर निगम शाह और गूगल के रीसर्च पेपर के सह-लेखक ने कहा, “आज के अनुमानित मौडल में लगने वाला 80 फीसद टाइम डाटा को प्रेजेंटेबल बनाने में चला जाता है, लेकिन गूगल की यह नई अप्रोच इससे बचाती है।”

बैंक के इन नियमों को नहीं जानते होंगे आप

अगर आपको आपके घर के पास कहीं सेल दिख जाए, तो आपको कितनी खुशी होती है. चाहे वो किसी सलॉन में हो या किसी ग्रोसरी स्टोर में. न चाहते हुए भी और बिना किसी जरूरत के भी आप कुछ जरूरत की और ढेर सारी गैर जरूरती सामान भी उठा लाते हैं. आदतन मजबूरी है या आपकी बेवकूफी इसका फैसला आप खुद ही करें. गौर करने वाली बात यह की इन ‘लुट सके तो लुट’ वाले ऑफर के झांसे में आप बड़ी ही आसानी से फंस जाते हैं. ये भी ध्यान नहीं देते की यहां आपके लुटने की बात लिखी होती है न की ‘लूटने’ की. ये कोई मजाक नहीं पर कई दुकानों की हकीकत है. अगली बार जरा सावधानी से काम लीजिएगा.

आज हम आपको इन दुकानों से सावधानी बरतने का ज्ञान नहीं देंगे, बल्कि कुछ ऐसी बैंकिंग सुविधाओं के बारे में बताएंगे जहां आपका होगा पहले से भी ज्यादा फायदा. बैंक भी सलॉन से ज्यादा दूर तो है नहीं, तो अगली बार जब बैंक का दरवाजा खटखटाएं तो इन सुविधाओं को ध्यान में जरूर रखें.

1. अकाउंट ट्रांसफर करवाने में नहीं लगता कोई शुल्क

कई बार तबादले या फिर नौकरी बदलने के कारण लोगों को शहर भी बदलना पड़ता है. भाग-दौड़ के साथ साथ बैंक के चक्कर भी कई बार काटने पड़ते हैं. पर आरबीआई के नियमों के अनुसार अकाउंट ट्रांसफर करवाना आसाना है. अगर आपको अपना अकाउंट एक ब्रांच से दूसरे ब्रांच में ट्रांसफर करना है, तो इसके लिए आपको कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा. केवाईसी प्रक्रिया पूरी करने पर ही आपको यह सुविधा मिलेगी. अगर कोई बैंककर्मी आपको नया अकाउंट खुलवाने की हिदायत दे तो आप बैंक अकाउंट ट्रांसफर करने की डिमांड कर सकते हैं.

2. हिन्दी या स्थानीय भाषा में भी भर सकते हैं चेक

कई बार कम पढ़े-लिखे लोग बैंकों में अंग्रेजी भाषा को लेकर परेशान हो जाते हैं. ऐसे लोग बैंक में मौजूद अन्य लोगों से मदद मांगते मिल जाते हैं. पर आरबीआई के नियमों के अनुसार चैक को हिन्दी या स्थानीय भाषा में भी भरा जा सकता है. बहुत से लोगों को इस नियम के बारे में पता ही नहीं होता. आप बैंक से स्थानीय भाषा में छपी चैकबुक की भी मांग कर सकते हैं.

3. बैंक के पास होने चाहिए तीन भाषाओं वाले फॉर्म

बैंक फॉर्म भरने में बहुत से लोगों को दिक्कत होती है. बहुत से क्षेत्रों में अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषायें ही नहीं बोली जाती. कई बार भाषा की समस्या के कारण भी लोग बैंक आने से कतराते हैं क्योंकि ज्यादातर बैंकों में द्विभाषीय फॉर्म ही मिलते हैं. पर आरबीआई ने स्थानीय निवासियों की सहूलियत के लिए यह साफ तौर पर कहा है कि बैंक के सभी फॉर्म तीन भाषाओं में होने चाहिए.

4. आपकी पर्सनल इनफॉरमेशन का इस्तेमाल करना है गैरकानूनी

बहुत से लोगों को बैंक की अतिरिक्त सेवाओं से जुड़े फोन कॉल आते हैं. कई बार तो फोन करने वाले व्यक्ति के पास आपके अकाउंट से जुड़ी बहुत सारी जानकारियां होती हैं. पर यह गैरकानूनी है. अपनी सर्विसेस के प्रचार के लिए बैंक आपकी निजी जानकारियों का इस्तमाल नहीं कर सकते. अगर अगली बार आपके पास ऐसा कोई फोन कॉल आए तो आपके पास कोर्ट का रास्ता है.

5. एटीएम से जुड़ी समस्या को 7 दिनों के अंदर सुलझाना

आरबीआई की नियमावली के अनुसार आपके एटीएम से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान 7 दिनों के अंदर होना चाहिए. अगर बैंक ने शिकायत दर्ज करने के दिन से 7 दिनों के अंदर आपकी समस्या का समाधान नहीं किया तो बैंक आपको 100 रुपए प्रति दिन के हिसाब से मुआवजा देगा.

6. चैकबुक न मिलना भी है बैंक की जिम्मेदारी

अगर आपको किसी कारणवश चैकबुक नहीं मिला है तो इसकी जिम्मेदारी भी बैंक की होगी न की ग्राहक की. अगर बैंक आपसे चैकबुक खोने पर नए चैकबुक के लिए अतिरिक्त शुल्क मांगे तो आप उन्हें आरबीआई के नियम याद दिला सकते हैं.

बैंकिंग की सुविधा आपके लिए बहुत आवश्यक है. पर उससे भी ज्यादा आवश्यक है कि आप बैंक के नियमों को बारीकि से समझें. फॉर्म वगैरह को अच्छे से पढ़े, जिससे आपके ठगे जाने के आसार कम हो जाएंगे.

यूट्यूब वीडियो डाउनलाडिंग की बेहतरीन साइट्स

वेब पर नियमित आने वालों के लिए और ऑनलाइन वीडियो देखने के लिए यूट्यूब सबसे महत्वपूर्ण साधन है. यूट्यूब न केवल गीत-संगीत बल्कि डॉक्यूमेंट्री, प्रोग्राम ट्यूटोरियल और व्यक्तिगत जानकारियों को शेयर करने के लिए किसी भी दूसरे सोशल नेटवर्क की अपेक्षा अपने यूजर्स को अधिक सुविधाएं देता है.

लेकिन समस्या तब आती है जब हमारे पास नेटवर्क कनेक्शन ना हो और हमें यूट्यूब पर पहले पब्लिश हो चुके वीडियो को फिर से देखना या दिखाना हो और मजे लेना हो. इसका हल आसान नहीं है. चाहे वो हार्ड डिस्क पर यूट्यूब वीडियो डाउनलोड करना हो या अपने पसंदीदा प्लेयर के जरिए इसे विजुअलाइज करना.

कुछ ऐसे उपयोगी सॉफ्टवेयर हैं, जिन्हें आराम से अपने कंप्यूटर पर इंस्टॉल कर यूट्यूब की विडियो आसानी से डाउनलोड सकते है.

1. ट्यूब कैचर: यह वर्तमान में बहुत लोकप्रिय साइट है, हालांकि अपने पीसी पर इसे इंस्टॉल करते समय यह कुछ अतिरिक्त टूल्स का सुझाव देता है उसे लेकर सावधान रहने की जरूरत है. इसकी मदद से यूट्यूब, डेलीमोशन और दूसरे कई विशिष्ट साइट्स से वीडियो डाउनलोड कर सकते हैं. आप चाहे तो अपने पसंद का फॉरमैट चुन सकते हैं.

2. वाइज वीडियो डाउनलोडर: यह इस्तेमाल करने में बहुत आसान है. आपको बस उस वीडियो का ऐड्रेस मालूम करना है जिसे आप डाउनलोड करना या देखना चाहते हैं. यह वीडियो सर्च सेक्शन बनाता है जिससे आपको उस वीडियो के क्लिप्स, जिसे आप पसंद करते हो, वह आसानी से मिल जाएं और आपको किसी ब्राउजर की जरूरत ना पड़े.

3. आईट्यूब स्टूडियो: इसकी मदद से आप तेज गति से यूट्यूब सामग्री को डाउनलोड कर सकते हैं. और जो कनेक्शन में गड़बड़ी के कारण रुक हो गए थे उन्हें फिर से देख सकते हैं. इसमें एक ब्राउजर होता है जिसकी मदद से आप दूसरे वीडियो पोर्टल और अपना पसंदीदा बुकमार्क एक्सप्लोर कर सकते हैं.

4. फ्री यूट्यूब एमपी3 कन्वर्टर: यह सबसे अच्छा विकल्प है क्योंकि जब आप कुछ सुनने में, चाहे यूट्यूब पर पब्लिश किया हुआ संगीत हो, बातचीत या कॉन्फ्रेंस में रुचि रखते हैं. तो यह प्रोग्राम आपके वीडियो को एमपी4 म्यूजिक फाइल के रूप में डाउनलोड करता है.

अब मालिशवाली से भी प्रेरणा अरोड़ा का हुआ विवाद

फिल्म निर्माता और ‘क्रियाज इंटरटेनमेंट’ कंपनी की मालकिन प्रेरणा अरोड़ा धन के मामले में निरंतर लोगों के साथ पंगा लेती जा रही हैं. हाल ही में फिल्म ‘‘परमाणुः ए स्टोरी आफ पोखरण’’ को लेकर प्रेरणा अरोड़ा का जान अब्राहम के साथ जबरदस्त विवाद हुआ था. अंततः अदालत ने प्रेरणा अरोडा के खिलाफ निर्णय सुनाया. जान अब्राहम से मुंह की खाने के बाद प्रेरणा अरोड़ा का अभिषेक कपूर की फिल्म ‘केदारनाथ’ को लेकर विवाद हुआ. अंततः यह फिल्म भी उनके पास से चली गयी. इसी के साथ टी सीरीज की फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ को लेकर भी प्रेरणा अरोड़ा के संग विवाद हुआ और अब यह फिल्म भी उनके पास नहीं रही. इन सभी फिल्मों के विवादों में कहीं न कहीं मुख्य मुद्दा धन/पैसा ही रहा.

अब प्रेरणा अरोड़ा का नया विवाद पैसे को लेकर एक साठ वर्षीय मालिशवाली के साथ सामने आया है. मुंबई के सांताक्रूज इलाके में रह रही 60 वर्षीय मालिशवाली खैरून मुख्तार अहमद ने प्रेरणा अरोड़ा के खिलाफ मेघवाड़ी पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 323 और सेक्शन 504 के तहत एक शिकायत दर्ज करायी है. इस शिकायत के दर्ज होने के बाद प्रेरणा अरोड़ा ने खैरून मुख्तार अहमद पर चोरी का इल्जाम लगा दिया है.

खैरून की शिकायत के अनुसार प्रेरणा अरोड़ा के बुलावे पर वह हर दिन रात में आठ बजे के बाद प्रेरणा के जोगेश्वरी के घर पर मालिश करने जाया करती थीं. वह अपनी उम्र को देखते हुए हर दिन आटोरिक्शे से ही आया जाया करती थी और आटो रिक्षा का किराया खैरुन खुद ही दिया करती थी. प्रेरणा अरोडा ने उन्हें घर पर आकर मालिश करने के लिए 75000 रूपए प्रति माह देने की बात कही थी. लेकिन पिछले 5 माह से प्रेरणा अरोड़ा ने खैरुन को एक भी पैसा नहीं दिया. इस तरह प्रेरणा अरोडा पर खैरुन का 3 लाख 75 हजार रूपए बाकी हो गए. जब पैसे के लिए खैरून ने दबाव बनाया तो प्रेरणा अरोडा ने उसे 1 लाख 25 हजार का चेक दिया. लेकिन वह चेक भी बाउंस हो गया. 9 जून को जब खैरून मुख्तार अहमद ने प्रेरणा अरोडा के घर जाकर इस बारे में बात की, तो प्रेरणा अरोड़ा ने उसे गंदी गंदी गालियां देने के साथ ही उसकी पिटाई कर घर से बाहर निकालकर दरवाजा बंद कर लिया.

प्रेरणा अरोड़ा के हाथों पिटने के बाद खैरुन मुख्तार अहमद ने मेघवाड़ी पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज करायी. पुलिस ने एफआयआर लिखने की बजाए सेक्शन 504 और आईपीसी की धारा 323 के तहत ‘एन ओ सी’ लिखने के बाद कहा कि वह प्रेरणा अरोड़ा से पूछताछ करेगी. पर अब तक कुछ नहीं हुआ.

इधर प्रेरणा अरोड़ा का दावा है कि खैरून मुख्तार अहमद ने उनके घर पर 56000 रूपए चुराने की कोशिश की. उनके बाडीगार्ड ने उसे चोरी करते हुए पकड़ा. तब से उन्होंने खैरून के अपने घर आने पर पाबंदी लगा दी है.

खैरुन के बकाया पैसे के मसले पर प्रेरणा अरोड़ा कहती हैं-‘‘ वह तो न के बराबर छोटी राशि होगी. पर यदि खैरून के पास कोई बिल है, तो लेकर आएं, मैं तुरंत बिल की राशि दे दूंगी.’’

अब सवाल यह है कि मालिश करने वाली बाई खैरून के पास बिल कहां से आएगा? बहरहाल,देखना यह है कि पुलिस इस मामले में क्या कारवाही करती है. तथा धीरे धीरे प्रेरणा अरोड़ा के और कितने विवाद सामने आते हैं.

आनंदी बेन की नजर में कुंवारे हैं नरेंद्र मोदी, देखिए वीडियो

देश का बच्चा बच्चा जानता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शादीशुदा हैं जिनकी शादी साल 1968 में गुजरात की ही जसोदा बेन से हुई थी. 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त चुनाव आयोग को दी गई जानकारी में खुद नरेंद्र मोदी ने जसोदा बेन से अपनी शादी की बात मानी थी. देश का बच्चा बच्चा खासतौर से मोदी भक्त तो और बेहतर जानते हैं कि देश सेवा की खातिर उन्होंने अपनी पत्नी को छोड़ दिया था.

प्रधानमंत्री बनने के बाद अक्सर नरेंद्र मोदी की शादी और पत्नी को छोड़ने को लेकर आरोप प्रत्यारोप होते रहे हैं. मोदी की हर मुमकिन कोशिश जिन दो बातों से बचने की होती है उनमें पहला उनकी डिग्री विवाद और दूसरी शादी है. उलट इसके जसोदा बेन हर कभी पति को याद करते जज्बाती हो उठती हैं और उनकी सलामती और कामयाबी के लिए व्रत, उपवास और पूजा पाठ भी करती रहती हैं. यह उनकी समझदारी और बड़प्पन ही कहा जाएगा कि उन्होंने कभी छोडने के बाबत नरेंद्र मोदी को कोसा और न ही कोई इल्जाम उन पर लगाया.

कई इंटरव्यू में जसोदा बेन बता चुकी हैं की शादी के बाद वे कुछ महीने ही ससुराल रही थीं और पति के साथ तो उन्होंने कुल तीन दिन ही गुजारे. अपने ससुराल वालों की भलमनसाहत की भी वे तारीफ करती हैं और यह भी बता चुकी हैं कि नरेंद्र मोदी ने उनसे कहा था कि तुम अभी छोटी हो अपनी पढ़ाई जारी रखो,  मैं देश सेवा के लिए जा रहा हूं और इसके बाद वे हिमालय की तरफ चले भी गए थे. बाद में वे आरएसएस से जुड़ गए और फिर कभी पत्नी की सुध नहीं ली कि वह किस हाल में हैं.

इधर परित्यक्ता जसोदा बेन को समझ आ गया था कि पति, घर गृहस्थी और बाल बच्चों का सुख उनके भाग्य में ही नहीं है तो उन्होंने गुजरात के धोलका में पढ़ाई पूरी की और फिर सरकारी स्कूल में टीचर बन गईं. साल 2010 में रिटायर होने के बाद उनका पूरा वक्त भजन पूजन में गुजरने लगा.

पति के प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने खुशी ही जताई थी लेकिन बाद में कई परेशानियों से भी उन्हें रुबरु होना पड़ा था. प्रधानमंत्री की पत्नी होने के नाते उन्हे जबरन सिक्योरटी दे दी गई तो वे एक दफा इस बात पर सार्वजनिक रूप से झल्लाईं थीं कि अक्सर सुरक्षाकर्मियों का खर्च भी उन्हे ही उठाना पड़ता है.

कई मौकों पर भावुक होकर उन्होने मीरा की तर्ज पर पति को भक्ति भाव से याद किया लेकिन नरेंद्र मोदी हमेशा खामोशी ओढ़े रहे तो यह उनकी जिद, मजबूरी और आत्मग्लानि (अगर हो तो) ही कही जाएगी लेकिन जसोदा बेन के अपनी पत्नी होने से वे कभी मुकर नहीं पाये. इस बाबत कई लोग उन्हें क्रूर पतियों की श्रेणी में रखने से भी नहीं चूकते. पिछले साल सर्दियों में जसोदा बेन राजस्थान में एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुईं थीं तब भी मोदी ने उनके हालचाल पूछने या जानने की औपचारिकता या शिष्टाचार नहीं दिखाया था.

पर ये कहती हैं …. – पिछले दिनों मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन ने मध्यप्रदेश के हरदा जिले के टिमरनी में यह कहते सनाका सा खींच दिया कि नरेंद्र मोदी अविवाहित हैं और उन्होंने कभी शादी ही नहीं की. आनंदी बेन का वह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है जिसमें एक सरकारी कार्यक्रम में वे मौजूद महिलाओं से यह कहती नजर आ रहीं हैं कि, पूरी दुनिया जानती है कि आपके और आपके बच्चों के लिए नरेंद्र भाई ने शादी नहीं की. लेकिन उन्हें यह पता है कि डिलेवरी के वक्त और बाद में महिलाओं और बच्चों को क्या क्या परेशानियां होती हैं, इसलिए उन्होंने महिलाओं के लिए इतनी योजनाएं बनाई हैं.

हर कोई जानता है कि आनंदी बेन नरेंद्र मोदी की चहेती नेताओं में से एक हैं, जिन्हें मोदी ने दिल्ली जाने से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंपी थी. आनंदी बेन का यह सफेद झूठ किसी को हजम नहीं हो रहा है कि जो बात पूरी दुनिया जानती है उसे वे नहीं जानतीं कि नरेंद्र मोदी शादीशुदा हैं. अगर सब कुछ जानते हुये भी वे ऐसा कह रहीं हैं तो मान लेना चाहिए कि सूर्य पश्चिम से उगता है पूर्व से नहीं.

हैरानी इस बात की भी है कि इस झूठ पर हर कोई चुप रहा, यहां तक कि विपक्ष ने भी सुनहरी मौका नहीं भुनाया, जबकि मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. अगर आनंदी बेन के कहने से नरेंद्र मोदी शादीशुदा से कुंवारे हो जाते हैं तो सोचना लाजिमी है कि वे क्यों नरेंद्र मोदी की वैवाहिक स्थिति या सच हजम नहीं कर पा रहीं. सार्वजनिक रूप से कही इस बात के अगर कोई व्यक्तिगत माने नहीं हैं तो तकाजा तो यह है कि आनंदी बेन खेद व्यक्त करते लोगों और जसोदा बेन से माफी मांगे और वीडियो अगर फर्जी है जिसकी उम्मीद न के बराबर है तो तो उसकी जांच की मांग करें.

ऐसे शक अक्सर पौराणिक पात्रों को लेकर रहते हैं कि किसकी शादी किससे हुई थी और हुई भी थी या नहीं.  अगर आनदी बेन की मंशा और मकसद नरेंद्र मोदी को भगवान टाइप का आदमी साबित करने की है तो एक जोरदार सेल्यूट की हकदार तो वे हैं. वैसे भी नरेंद्र मोदी की ज़िंदगी से ताल्लुक रखते इस बाकिए के जिक्र का न कोई मौसम था न दस्तूर था बस एक मौका जरूर था जिसे आनदी बेन  चूकीं नहीं.

तमिलनाडु की अनुकृति ने जीता मिस इंडिया 2018 का खिताब

इस साल भारत में मिस इंडिया 2018 के प्रतियोगिता हुए जिसके रिजल्ट्स का इंतजार कर रहे लोगों का इंतजार खत्म हो गया है. फेमिना मिस इंडिया 2018 का खिताब तमिलनाडु की अनुकृति वास ने अपने नाम किया. अनुकृति ने 29 प्रतियोगियों को हरा कर इस खिताब को जीता. सबसे अच्छी बात तो ये रही की मिस वर्ल्ड 2017 की विजेता मानुषी छिल्लर ने देर रात तक चली इस प्रतियोगिता में अनुकृति को ताज पहनाया.

इसका आयोजन मुंबई में किया गया था, इस कौन्टेस्ट में हरियाणा की रहने वाली मीनाक्षी चौधरी फर्स्ट रनर-अप बनीं और सेकेंड रनर-अप आंध्र प्रदेश की रहने वाली श्रेया राव बनीं. वहीं दिल्ली की रहने वाली गायत्री भारद्वाज, झारखंड की रहने वाली स्टेफी पटेल टौप 5 में शामिल थीं.

फेमिना मिस इंडिया 2018 की यह शाम सितारों से सजी रही. इस दौरान देशभर से चुनकर आईं खूबसूरत कंटेस्टेंट्स ने ताज के अपनी दावेदारी पेश की लेकिन सबको पीछे छो़ड़ते हुए अनुकृति ने ताज अपने नाम किया. अनुकृति पेशे से खिलाड़ी और डांसर हैं. अनुकृति अपनी मां का सपना पूरा करने के लिए फ्रेंच में बीए कर रही हैं. अनुकृति बाइक चलाना पसंद करती हैं और सुपरमौडल बनना चाहती हैं.

आपको बता दें कि कौन्टेस्ट में जज पैनल में बौलीवुड एक्ट्रेस मलाइका अरोड़ा, एक्टर बौबी देओल, कुनाल कपूर, क्रिकेटर इरफान पठान और के.एल राहुल शामिल हुए थे. इसके अलावा 2017 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीतने वालीं मानुषी छिल्लर भी यहां मौजूद थीं. इस कार्यक्रम को बौलीवुड के मशहूर फिल्ममेकर करण जौहर और एक्टर आयुष्मान खुराना ने होस्ट किया. वहीं माधुरी दीक्षित, करीना कपूर और जैकलीन फर्नांडीज ने इवेंट में जबरदस्त डांस परफौर्मेंस से समा बांधा. आपको बता दें कि अनुकृति 2018 में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी.

अच्छे रिजल्ट पर रोजगार कहां

प्रोफैसर अमर्त्य सेन ने एक बार कहा था, ‘‘भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अशिक्षित व स्वास्थ्यहीन श्रमबल के आधार पर वैश्विक आर्थिक शक्ति होने की कोशिश कर रहा है. ऐसा किसी देश में कभी नहीं हुआ. यह असंभव है.’’ अमर्त्य सेन का यह तंज समझने की जरूरत है और सरकार को कोरी लफ्फाजी वाले वादों, दावों, 56 इंच का सीना, विश्वगुरु का सपना और पौराणिक काल की संस्कृति व धर्म के बखान व सब्जबाग दिखाने के बजाय शिक्षा व रोजगार की मूलभूत कमियों को दूर कर नए सार्थक, स्वस्थ रोजगार के अवसर मुहैया कराने पर जोर देने की जरूरत है.

मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के नतीजे इस साल चौंका देने वाले थे. हर किसी को यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि इस साल 10वीं में 65.54 और 12वीं में 68.07 फीसदी छात्र उत्तीर्ण हुए. केवल एक साल में कुल कामयाब छात्रों की संख्या 12 लाख 54 हजार 920 के लगभग है. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस दौर के युवा पढ़ाई पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इन छात्रों को कम उम्र में समझ आ  गया है कि अगर अच्छी नौकरी चाहिए तो लगन और मेहनत से पढ़ाई करनी जरूरी है.

हर साल की तरह इस साल भी मैरिट में आए छात्रछात्राओं के इंटरव्यू न्यूज चैनल्स व अखबारों ने दिखाए व छापे. शिवपुरी जैसे पिछड़े जिले से टौप पर रहे 12वीं के ललित पचौरी की इच्छा सिविल सेवा में जाने की है तो 10वीं की टौपर रही विदिशा की अनामिका साध सौफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहती है. मोटी तनख्वाह वाली प्राइवेट या रसूखदार सरकारी नौकरी मैरिट से चूक गए छात्रों का भी ख्वाब है. इस के लिए उन्हें समझ आ गया है कि आइंदा और ज्यादा मेहनत से पढ़ना है.

अच्छे नतीजे देने में घटिया क्वालिटी की पढ़ाई के लिए बदनाम सरकारी स्कूलों के छात्र भी पीछे नहीं रहे. 300 के लगभग बनी विभिन्न संकायों की मैरिट में 43 छात्र सरकारी स्कूलों के थे. उन का परीक्षा परिणाम भी 50 फीसदी के लगभग रहा.

इन आंकड़ों को देखते हुए यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि छात्र चाहे वे गांवदेहात के हों या शहरों के, किसी भी कीमत पर प्रतिस्पर्धा से पिछड़ना नहीं चाहते. उन्हें यह एहसास है कि अच्छे जौब का रास्ता अच्छे नंबरों से हो कर जाता है, इसलिए 10वीं और 12वीं जैसे बोर्ड के इम्तिहानों में फेल होना मंजिल तक पहुंचने में अड़ंगा ही है.

पर मंजिल है कहां

छात्रों की मेहनत और कामयाबी वाकई बेमिसाल है जिस पर फख्र करना स्वाभाविक बात है. लेकिन यह बात, कामयाब छात्रों का आंकड़ा देखते व उन के भविष्य के लिहाज से कम चिंताजनक भी नहीं कही जा सकती.

मिसाल मध्य प्रदेश की ही लें, वहां पहले से ही डेढ़ करोड़ के लगभग बेरोजगार युवा धूल फांक रहे हैं. मिसाल देशभर की लें, तो बेरोजगारों की तादाद 18 करोड़ का चिंताजनक आंकड़ा छू रही है. इन में पढ़ेलिखे युवाओं की तादाद ज्यादा है.

मोदी सरकार काफी समय से विश्वभर की आर्थिक एजेंसियों के हवाले से भारत में बढ़ते रोजगार व जीडीपी ग्रोथ का ढोल पीटती रही है. लेकिन विश्वबैंक की एक रिपोर्ट ‘जौबलैस ग्रोथ-2018’ मोदी सरकार के कथन से परदा हटा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश की आर्थिक व्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए हर साल करीब 80 लाख नौकरियों की जरूरत है. अगर यह आंकड़ा पूरा नहीं हुआ तो देश बेरोजगारों की हताशा व तादाद से टूट जाएगा.

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रिपोर्ट की मानें तो 2015 में भारत की रोजगार दर 52 प्रतिशत थी, जबकि नेपाल (81 प्रतिशत), मालदीव (66 प्रतिशत), भूटान (65 प्रतिशत) और बंगलादेश जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में थे. इस सूची में भारत से सब ऊपर व बेहतर थे. साल 2017 में करीब 18.3 लाख भारतीय बेरोजगारों का यह आंकड़ा 2019 तक 189 लाख हो जाएगा.

ऐसे में 10वीं, 12वीं या स्नातक स्तर पर कामयाब हो रहे लाखों छात्रों की फौज इस तादाद में और इजाफा करेगी. उत्तीर्ण हुए युवाओं के चेहरों की मासूमियत, जिस में नौकरी और बेहतर जिंदगी के ख्वाब झलकते हैं, के साथ क्या न्याय हो पाएगा? जाहिर है, नहीं. ऐसे में इस अन्याय का जिम्मेदार कौन है, इस सवाल का स्पष्ट जवाब ढूंढ़ पाना टेड़ी खीर है.

यह भी एक स्थापित तथ्य है कि बोर्ड इम्तिहानों में हर साल छात्रों की भागीदारी बढ़ती है जिसे स्पष्ट शब्दों में कहें तो देशभर में हर साल 2 करोड़ के लगभग बेरोजगार स्कूलों और कालेजों से किसी बेकार प्रौडक्ट की तरह निकलते हैं.

देश में इस वक्त बेरोजगारों की संख्या 18 करोड़ है. इस मेंलगभग 12 करोड़ शिक्षित बेरोजगार हैं. दरअसल, बेरोजगारों की समस्या से नजात पाने के लिए सरकार को स्किल डैवलपमैंट व लघु उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. युवाओं को नौकरी लायक बनाने के लिए वोकेशनल प्रशिक्षण के जरिए इन कीस्किल डैवलप करने के बजाय सरकार विज्ञापनबाजी में ही उलझी दिखती है. हालांकि रोजगार का सीधा संबंध शिक्षा से है लेकिन बेहतरीन नतीजों के बीच छिपी शिक्षा जगत की कमियों की अनदेखी करने के चलते नौकरियां कम हो रही हैं.

उद्योग संगठन एसोचैम व यस इंस्टिट्यूट की जौइंट स्टडी के मुताबिक, भारत की महज 16 प्रतिशत कंपनियां संस्थान के भीतर प्रशिक्षण देती हैं जबकि चीन में यह काम 80 प्रतिशत कंपनियां कर रही हैं. यहां तक कि विश्व के 200 शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत के सिर्फ 2 शिक्षण संस्थान (आईआईटी दिल्ली व दिल्ली विश्वविद्यालय) जगह बना पाते हैं.

स्टडी के मुताबिक, देश की मेधावी प्रतिभाएं रिसर्च व स्टडी के लिए विकसित देशों में चली जाती हैं. करीब 6 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं और वहां 20 अरब डौलर सालाना खर्च करते हैं. जाहिर है जो प्रतिभाएं बचती हैं वे स्किल में कमजोर होती हैं. ऐसे लोग अव्वल नंबर ला कर भी देश में कुछ उल्लेखनीय व प्रोडक्टिव कार्य नहीं कर पाते.

इसी स्टडी के अनुसार, भारतीय उच्चशिक्षा क्षेत्र रोजगार के अल्पस्तर, रिसर्च की कमी व उद्यमिता के सीमित विकल्पों का शिकार है. जाहिर है इस से नजात पाने के लिए उच्चशिक्षा सिस्टम को विश्वस्तर का बनाने व भविष्य आधारित तकनीकी शैक्षणिक रूपरेखा बनाने की दरकार है. सरकार इस मोरचे पर भी पूरी तरह से फेल नजर आती है.

इसीलिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बेरोजगारों की फौज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. वजह साफ है कि मोदी सरकार का ध्यान विस्फोटक होती इस समस्या पर है ही नहीं. प्रसंगवश यह उल्लेखनीय है कि इन्हीं नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था जिसे ले कर वे युवाओं के भी निशाने पर हैं.

मध्य प्रदेश के ललित पचौरी और अनामिका साध का सरकारी या अच्छी प्राइवेट नौकरी करने का ख्वाब पूरा होगा, इस का उन के मैरिट में होने से कोई संबंध नहीं. फिर बाकी लाखों छात्रों के भविष्य के बारे में सोच कर दहशत ही होती है. यह सोचना एकदम बेमानी या निरर्थक नहीं कि, क्या फायदा ऐसी पढ़ाई से जो एक ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था और सिस्टम में पलबढ़ रही है जो खुद कैंसर जैसी घातक व जानलेवा बीमारी सरीखी है.

बेरोजगार युवाओं के साथ छलकपट और उन्हें सब्जबाग दिखाना क्या गुनाह नहीं, इस सवाल का जवाब बहुत पेचीदा नहीं है. यह सच है कि सरकार सभी युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस के पास नौकरियां सीमित हैं लेकिन परेशानी और अफसोस की बात यह है कि वह प्राइवेट सैक्टर से भी रोजगार के मौके छीन रही है और ऐसा वह खुद मानती भी है.

मध्य प्रदेश बेरोजगार सेना के एक पदाधिकारी राज ठाकुर की मानें तो लोकतंत्र में नौकरी, रोजगार या व्यवसाय के मौके उपलब्ध कराना सीधेतौर पर सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए. युवाओं का काम तो पढ़लिख कर डिगरी या सर्टिफिकेट हासिल करना होता है.

यह आक्रोशित जवाब मुमकिन है सरकार के प्रति ज्यादती लगे, लेकिन सरकार और दूसरी एजेंसियों के बयानों और आंकड़ों पर गौर करें तो साफ लगता है कि पढ़ाने की जिम्मेदारी तो वह ठीकठाक तरीके से निभा रही है, लेकिन रोजगार के मोरचे पर मुंह छिपाती रहती है.

भयावह हैं हालात

लाख कोशिशों के बाद भी सरकार बेरोजगारी पर अपनी असफलता को छिपा नहीं पा रही है जिस से युवाओं में सुखद भविष्य को ले कर एक अजीब सी बेचैनी और आशंका है.

यह बेचैनी अगर वक्त रहते दूर नहीं हुई तो सरकार को बड़े पैमाने पर युवाओं का हिंसक आक्रोश झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह बात अपनी जगह ठीक है कि सरकार सभी बेरोजगारों को नौकरी नहीं दे सकती लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि सरकार प्राइवेट सैक्टर में रोजगार के मौके बजाय पैदा करने के, उन्हें खत्म कर रही है. ऐसा करने के पीछे उस के राजनीतिक, आर्थिक और दीगर स्वार्थ हो सकते हैं लेकिन शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद कर लेने से मुसीबत टलने वाली नहीं.

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 50 के दशक के उत्तरार्ध में लखनऊ में एक आयोजन में साफतौर पर माना था कि हर साल 10 लाख पढे़लिखे युवा शिक्षण संस्थानों से निकल रहे हैं लेकिन सरकार के पास देने के लिए 10 हजार नौकरियां भी नहीं हैं.

तब देश नयानया आजाद हुआ था और आबादी 40 करोड़ के लगभग थी. अब हालत यह है कि आबादी 130 करोड़ के लगभग है जिस में से 18 करोड़ लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं यानी बेरोजगार हैं. इन में भी युवाओं की संख्या तकरीबन 14 करोड़ है. तब देशभर के कुल स्नातकों की संख्या भी उतनी नहीं थी जितने आज एक साल में निकलते हैं.

भारत की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र के युवाओं का है यानी दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र होने के नाते हमारे पास सब से ज्यादा रोजगार पैदा करने के अवसर हैं. लेकिन हम फिर भी फेल हो रहे हैं.

दूसरी एजेंसियों की रिपोर्ट्स के अलावा खुद सरकार का श्रम विभाग यह स्वीकार कर चुका है कि देश में 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. जिन के चलते भारत दुनिया के सब से ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है. श्रम विभाग ने यह भी माना है कि साल 2015-16 में बेरोजगारी की दर 5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंची.

दिलचस्प बात सरकार की यह स्वीकारोक्ति थी कि इन 12 करोड़ बेरोजगारों में से वह महज 1 लाख 35 हजार लोगों को ही नौकरी दे पाई है. श्रम विभाग की एक रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि स्वरोजगार के मौके घटे हैं और नौकरियां कम हुई हैं.

वित्तीय वर्ष 2012 से 2016 के बीच रोजगार के लिए 8.41 करोड़ लोग आए लेकिन श्रमशक्ति में बढ़ोतरी केवल 2.01 करोड़ की रही. इस में भी कामकाजी उम्र वाली आबादी का 24 प्रतिशत हिस्सा श्रमशक्ति से जुड़ा, वहीं 76 प्रतिशत इस से बाहर रहा.

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में पहले ही यह चेतावनी दी जा चुकी है कि साल 2018 में भारत में बेरोजगारी और बढ़ सकती है जो बेरोजगार युवाओं के लिए खतरे की घंटी है.

वर्तमान सरकार सिर्फ नए रोजगार पैदा करने के मामले में फेल नहीं है, बल्कि लाखों की संख्या में रिक्त पदों को भरने में भी वह नाकाम नजर आती है. सरकारी व गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में लगभग 14 लाख डाक्टरों की कमी है, करीब 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हजार से भी ज्यादा पद खाली हैं, आईआईटी, आईआईएम व एनआईटी में हजारों पद खाली हैं. वहीं शेष इंजीनियरिंग कालेजों में 27 प्रतिशत शिक्षकों की जरूरत है और करीब 12 लाख स्कूली शिक्षकों के पद खाली हैं. अगर ये तमाम खाली पद भी सरकार युवाओं से भर दे तो बेरोजगारी पर किसी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.

नोटबंदी ने निगलीं नौकरियां

कांग्रेस के शासनकाल में भी बेरोजगारी थी और आज भी है, लेकिन यह अचानक हैरतअंगेज तरीके से बढ़ी है तो इस के लिए मौजूदा सरकार द्वारा लिए गए कुछ जिद्दी व अदूरदर्शी फैसले हैं, जिन में से पहला नोटबंदी और दूसरा जीएसटी लागू करना है.

सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी यानी सीएमआईई के एक सर्वे की मानें तो 8 नवंबर, 2016 से लागू नोटबंदी के बाद जनवरी 2017 से ले कर अप्रैल 2017 तक तकरीबन 15 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था यानी हर रोज 450 लोगों की नौकरियां गईं. 4 महीने के इस सर्वे में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र शामिल किए गए थे.

कहां तो 2014 के लोकसभा चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने हर साल एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था और कहां अब हर साल लाखों की लगीलगाई नौकरियां भी जा रही हैं. हालांकि बेरोजगारी की भयावह बदहाली को सरकार कौशल विकास जैसी योजनाओं से ढकने की कोशिश कर रही है पर वह उस में कामयाब नहीं हो पा रही है.

नोटबंदी के बाद जीएसटी के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया. किराने के छोटे दुकानदारों से ले कर बड़ी नामी कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दी तो इस के पीछे उन की अपनी मजबूरियां थीं जो इस फैसले से पैदा हुई थीं. व्यापारियों और कंपनियों को अपने खर्चे कम करने के लिए भी मजबूर होना पड़ा तो इस की गाज हर किसी पर गिरी.

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नोटबंदी और जीएसटी की जुगलबंदी से प्राइवेट सैक्टर में नौकरियां घटीं जिस का खमियाजा रोजगार छिनने की शक्ल में सामने आया और हर नियोक्ता ने कर्मचारी हटाए जिस के काम का भार दूसरे कर्मचारियों पर पड़ा यानी नौकरी करने की शर्त अब गधे की तरह बोझ ढोते रहने की भी हो गई है.

इन फैसलों से किसी को कोई फायदा हुआ होता तो भी एकदफा बात समझ आती, लेकिन बेरोजगारी बढ़ने का नुकसान साफसाफ दिख रहा है.

मौजूदा सरकार ने रोजगारपरक योजनाओं की झड़ी लगाई तो लगा कि देश के युवाओं को रोजगार मिल जाएगा लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात वाला ही रहा. ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए नौकरियां पैदा करने की बड़ीबड़ी बातें की गईं. इस के जरिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों व महिलाओं में उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने का वादा था. लेकिन आज देश के सफल स्टार्टअप्स में इन तबकों की मौजूदगी शून्य है.

स्किल इंडिया भी रोजगार मूलक योजना के तौर पर प्रचारित की गई. कहा गया कि 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी लेकिन सच सब के सामने है.

पढ़ाई का फायदा क्या

विश्वबैंक की एक रिपोर्ट, ‘वर्ल्ड डैवलपमैंट रिपोर्ट 2018 : लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशंस प्रौमिस’ में बताया गया है कि भारत उन 12 देशों की सूची में नंबर 2 पर आता है जहां दूसरी कक्षा के छात्र एक छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाते. वहीं, 5वीं कक्षा के आधे छात्र दूसरी क्लास के पाठ्यक्रम के लैवल की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं.

शिक्षा, ज्ञान का यह संकट सिर्फ नैतिक स्तर पर शर्मनाक नहीं है, आर्थिक संकट पर भी है, क्योंकि इसी लचर शिक्षा ढांचे से निकले छात्र बड़े हो कर नौकरियों के लिए भटकेंगे और देश का आर्थिक विकास चौपट कर देंगे.

साल 2011 की जनगणना के बाद तत्कालीन सरकार ने बेरोजगारी पर जो आंकड़े जारी किए थे उन के मुताबिक 20 से 29 साल की उम्र तक के 42 फीसदी युवा बेरोजगार थे. नई सरकार का एक साल में एक करोड़ नौकरियां देने का वादा तो छलावा साबित हुआ ही, हर साल एक करोड़ बेरोजगारों का बढ़ना नीम चढ़े करेले जैसी बात है.

ऐसे में क्या मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षाओं में पास हुए 12 लाख से भी ज्यादा छात्रों या अन्य सीबीएसई व दूसरे राज्यों के बोर्ड्स से उत्तीर्ण हुए छात्रों की कामयाबी पर खुश होना चाहिए. देशभर के छोटेबड़े सभी राज्यों के माध्यमिक शिक्षा मंडलों सहित सीबीएसई के उत्तीर्ण छात्रों की संख्या मिला कर देखा जाए तो इस साल कोई 2 करोड़ युवाओं ने 10वीं और 12वीं के इम्तिहान पास किए हैं, इन में से लगभग 50 लाख स्नातक स्तर की पढ़ाई करेंगे.

यानी देश में इस साल डेढ़ करोड़ नए शिक्षित बेरोजगार पैदा हो गए हैं. उन की पीठ यह कहते ईमानदारी से थपथपाई नहीं जा सकती कि पढ़ोगेलिखोगे तो बनोगे नवाब या पढ़लिख कर कुछ बन जाओगे.

यह सोच कर दहशत होना स्वाभाविक है कि ये युवा क्या करेंगे और इन के अंधकारमय भविष्य का जिम्मेदार कौन है. अगर सरकार या मौजूदा सिस्टम इस की जिम्मेदारी नहीं लेता तो पढ़ाईलिखाई का फायदा क्या. तसवीर उम्मीद से ज्यादा भयावह है कि ये युवा अपने ख्वाब दफन करते पैंटशर्ट में मजदूरी करते नजर आएंगे.

देश का भविष्य कहे जाने वाले इन युवाओं को अगर मजदूरी ही करनी थी या फिर पकौड़े ही बेचने थे तो इन की पढ़ाईलिखाई के माने क्या? इस पर हर कोई खामोश है. खामोश तो अभी युवा भी हैं जो कभी गुस्से या भड़ास में फट पड़ें तो हालात किसी सरकार के काबू में आने वाले नहीं.

युवाओं के नजरिए से देखें तो उन की पहली प्राथमिकता सरकारी नौकरी होती है, क्योंकि वह एक व्यवस्थित जीवन व भविष्य की गारंटी होती है पर दिक्कत यह है कि सरकार के पास कुल 2 फीसदी नौकरियां हैं जिस के लिए विकट की मारामारी मची रहती है.

सब से ज्यादा 53 फीसदी युवाओं को रोजगार कृषि क्षेत्र से मिलता है लेकिन वह अस्थायी होता है. अलावा इस के, खेतीकिसानी भी तेजी से चौपट हो रही है. गांवदेहात के लोग खेत और जायदाद बेच कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं. इस के पीछे उन की एक बड़ी मंशा बच्चों को पढ़ालिखा कर कुछ बना देने की है.

उन्हें नहीं मालूम कि अब पढ़ाईलिखाई रोजगार की गारंटी नहीं रही. हो सिर्फ इतना रहा है कि ग्रामीणों की दूसरी पीढ़ी थोड़ा पढ़लिख कर शहरों की मजदूर बनती जा रही है.

ठीक यही हाल दूसरी तरह से प्राइवेट सैक्टर का है जो 36 फीसदी नौकरियां देता है. जो युवा सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते वे प्राइवेट कंपनियों में नौकरी कर लेते हैं. इन में व्यावसायिक और तकनीकी स्नातकों की संख्या ज्यादा है. ये प्राइवेट नौकरियां भी अनिश्चितता की शिकार हैं और पहले की तरह आकर्षक तनख्वाह वाली अब नहीं रह गई हैं.

जैसेजैसे बेरोजगारों की भीड़ बढ़ी वैसेवैसे इन प्राइवेट कंपनियों, जिन में आईटी कंपनियां ज्यादा हैं, ने पैकेज का आकार घटाना शुरू कर दिया. जिस पद पर नियुक्त कर्मचारी को पहले एक लाख रुपए महीना दिए जा रहे थे उस पर 4 लोगों को रख कर 25-25 हजार रुपए दिए जाने लगे. इस से बेरोजगारी तो घटी पर पगार भी कम हुई. सरकारें चाहें तो इस फार्मूले से सबक ले सकती है कि भारीभरकम पगार वाली नौकरियां खत्म करें और फिक्स पे का सिद्धांत लागू करें. हालांकि यह शोषण ही है लेकिन बेरोजगारी से तो अच्छा है.

मुद्दे की बात शिक्षा का उद्देश्य क्या है, यह जानना है तो जवाब साफ है कि कोई भी युवा कोई ज्ञानी, महर्षि या पंडित बनने के लिए पढ़ाईलिखाई नहीं करता. वह सिर्फ और सिर्फ अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई करता है. वह भी न मिले तो विश्वगुरु और आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहे देश में पीएचडीधारक भी पेट पालने के लिए अपना शोध भूलभाल कर चपरासी, माली व ड्राइवर तक बनने को तैयार रहते हैं.

छोटे पदों के लिए बड़ी मारामारी

इस साल मुंबई में 1,137 पुलिस कौंस्टेबल्स की नौकरियां निकलीं तो आवेदकों की संख्या 2 लाख हो गई. आश्चर्य व दुख की बात यह है कि इन आवेदनों में योग्यता से ऊपर के आवेदक बहुत थे. इन में 423 इंजीनियरिंग, 167 उम्मीदवार एमबीए और 543 पोस्टग्रेजुएट थे, हालांकि योग्य उम्मीदवार 12वीं पास पर्याप्त था. अगर ये तमाम डिगरीधारी अपनी काबिलीयत से कम स्तर की नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं तो साफ है कि शिक्षित तबके में बेरोजगारी कितने चरम पर है.

‘जौबलैस ग्रोथ’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2005 से 2015 के बीच भारत में पुरुष रोजगार दर में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है. जाहिर है यह गिरावट इन्हीं पढ़ेलिखे, बेहतर रिजल्टधारी युवाओं पर भारी पड़ी.

हर महीने 13 लाख नए लोग कामकाज करने की उम्र में प्रवेश कर जाते हैं. यानी एक करोड़ 56 लाख नए युवा हर साल रोजगार के लिए कतारों में खड़े दिखते हैं.

इस की पहली बड़ी मिसाल सितंबर 2015 के तीसरे सप्ताह में देखने में आई जब उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में चपरासी के 368 पद निकले थे. भरती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 5वीं पास थी.

उम्मीद से परे इन पदों के लिए 23 लाख आवेदन आए थे. साथ ही 5वीं पास आवेदकों की संख्या महज 53,420 थी जबकि 2 लाख के लगभग उच्चशिक्षित युवाओं को सरकारी दफ्तर का चपरासी बनना मंजूर था. जब इंटरव्यू देने वाले बेरोजगारों की भीड़ कतार में लगी तो सरकार को समझ आया कि 23 लाख इंटरव्यू लेतेलेते तो 4 साल निकल जाएंगे और इस दौरान कई उम्मीदवार नौकरी की उम्र पार कर चुके होंगे. अलावा इस के अच्छाखासा प्रशासनिक अमला अपने कामधाम छोड़ कर इंटरव्यू ही लेता रहेगा. नतीजतन, ये भरतियां रद्द कर दी गई थीं.

पर युवाओं के लिहाज से यह वाकेआ शर्मनाक था, क्योंकि कोई भी युवा चपरासी जैसी छोटी नौकरी के लिए अपनी जवानी पढ़ाई में नहीं झोंक देता और न ही कोई पीएचडी इसलिए करता कि बहुत सा ज्ञान बटोरने व शोध करने के बाद वह टेबल साफ करे, दफ्तर में झाड़ूपोंछा करे और साहबों को चाय, कौफी, पानी व पानसिगरेट ला कर दे.

यहां बात छोटेबड़े काम की अहमियत की नहीं, बल्कि युवाओं के स्वाभिमान की है जिस से समझौता करने के लिए किस हद तक जा कर उन्हें झुकना पड़ रहा है. प्रसंगवश लौर्ड मैकाले को कोसते रहने का रिवाज उल्लेखनीय है कि उस ने शिक्षाव्यवस्था ऐसी बना दी थी जो सिर्फ बाबू यानी क्लर्क पैदा करती है. अंगरेज शासन करने भारत आए थे, उन का असल मकसद प्राकृतिक संपदा और संसाधनों का दोहन था. वे चूंकि व्यापारी थे, इसलिए उन्हें सामान ढोने वाले और उस की गिनती कर हिसाबकिताब करने वाले युवा चाहिए थे.

पर आजाद भारत के कर्ताधर्ताओं ने कौन सा तीर मार लिया और शिक्षापद्धति में कौन सी उल्लेखनीय क्रांति ला दी कि उस में शैक्षणिक योग्यता के हिसाब से नौकरी मिलने लगी. उलटे, बाबू की जगह शासक, चपरासी, ड्राइवर, माली और दूसरे छोटे पदों पर नौकरी करने के लिए युवाओं को विवश कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, न ही इस के थमने के आसार नजर आ रहे हैं. पिछले साल नवंबरदिसंबर में मध्य प्रदेश की अदालतों में भी छोटे पदों पर भरती के लिए खासे पढ़ेलिखे, उच्चशिक्षित जब मुंह लटकाए लाइन लगाए नजर आए तो नए पढ़ेलिखे के भविष्य का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है. इन हालात को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को पास कर चुके युवाओं को बधाई देने से पहले यह सोचनेसमझने की जरूरत है कि कहीं उन्हें बेवकूफ तो नहीं बनाया जा रहा.

बढ़ती और विकराल होती बेरोजगारी का संभावित विस्फोट सरकार से छिपा नहीं है पर उस के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही करोड़ों युवाओं को रातोंरात वह नौकरी दे सके या रोजगार के मौके पैदा कर सके.

हर कोई इस बात को समझ रहा था कि जब पहले की कांग्रेसी सरकारें युवाओं के लिए कुछ खास नौकरी या रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर पाईं तो मोदी सरकार से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाना उस से ज्यादती होगी. इसलिए बेरोजगारी को ले कर कभी किसी ने मोदी सरकार को न तो जरूरत के मुताबिक कोसा और न ही उस की खिल्ली उड़ाई.

हालांकि मनमोहन सिंह की सरकार के आखिरी 2 सालों यानी 2012-13 में 7.41 लाख नए रोजगार आए जबकि श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 में रोजगार सृजन मात्र 1.55-2.13 लाख रहा. तुलना करिए और समझ जाइए कि हम आगे बढ़े या खाई में गिरे.

लेकिन एक मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह कहा कि युवा पकौड़े तलें तो उन की हंसी अब तक लोग उड़ाते रहते हैं. नरेंद्र मोदी की यह सलाह उन के भक्तों के गले भी नहीं उतरी थी कि वे इस में कौन सा जीवनदर्शन ढूंढें.

पकौड़े बेच कर पेट भरना कतई जिल्लत या जलालत की बात नहीं पर नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ने की असल वजह यह थी कि वे युवाओं से बड़े सपने देखने की बात नहीं कर रहे थे. वे यह नहीं कह रहे थे कि युवा डाक्टर, अफसर, इंजीनियर या साइंटिस्ट बनें या फिर अपनी कंपनियां और फैक्टरियां शुरू करें जिस से दूसरे युवाओं को भी रोजगार मिले.

प्रधानमंत्री के मुख से पकौड़े को पेशा बनाने की राय व्यक्त की गई तो युवाओं का तिलमिलाना स्वाभाविक बात थी कि उन्होंने इतनी पढ़ाई कोई खोमचा या ठेला लगाने के लिए नहीं की और पढ़ाई पर उन के अभिभावकों ने इसलिए लाखों रुपए नहीं खर्चे थे कि उन की संतानें चौराहों पर पकौड़े तलती नजर आएं.

विपक्ष ने जगहजगह पकौड़े बना कर विरोधप्रदर्शन किया, यह एक अनिवार्य राजनीतिक प्रतिक्रिया थी. लेकिन देश का प्रधानमंत्री युवाओं को पकौड़े बेचने का मशवरा दे, इस से युवाओं का स्वाभिमान आहत हुआ था और नरेंद्र मोदी की छवि को गहरा धक्का भी लगा था.

घाटे में अभिभावक

पढ़ाईलिखाई जरूरत से ज्यादा महंगी हो चली है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है और न ही यह कि शिक्षा अब, वजहें जो भी हों, पूरी तरह कारोबार हो चली है.

शिक्षा का भारीभरकम खर्च अधिकतर अभिभावक उठा भी रहे हैं तो इस के पीछे उन की मंशा समाज को एक अच्छा नागरिक देने की ही होती है जो शिक्षित हो कर कहीं अच्छी नौकरी कर देश की तरक्की में अपना योगदान देते सम्मानजनक जीवन जी रहा होता है. यह कितना बड़ा भ्रम था, यह बात जब साबित होती है तो मांबाप पर क्या गुजरती है, यह तो वही जानते हैं. अपने बेरोजगार युवा बेटे या बेटी की हालत देखते हुए उन का कलेजा मुंह को आने लगता है.

सच तो यह है कि सरकार से बदतर और विस्फोटक होते हालात संभल नहीं रहे हैं. एक बारूद भीतर ही भीतर युवाओं के दिलोदिमाग में रोजगार और नौकरी को ले कर सुलग रहा है जो कब फट पड़े, कहा नहीं जा सकता.

बेरोजगारी की मौजूदा हालत तो चिंताजनक है ही, लेकिन सब से बड़ी चिंता इस बात की है कि जिस तरह हर माह/साल युवाओं की लाखोंकरोड़ों की नई फौजें नौकरियों के लिए कतारों में लग रही हैं उसे आने वाले समय में सरकार कैसे संभालेगी. अब तक तो युवा गांवकसबों में बेरोजगारी के दिन काट रहे थे पर अब शिक्षित व संपन्न होतेहोते ये शहरों की तरफ कूच कर रहे हैं, जबकि शहर पहले से ही बेरोजगारों से गले तक डूबे हुए हैं. ऐसे में इन की भारी भीड़ देश में उठापटक या कहें हिंसक विद्रोह पैदा कर सकती है.

यह सवाल सिर्फ मोदी सरकार के लिए ही नहीं है, बल्कि कोई भी सरकार भला इतनी बड़ी आबादी वाले देश के करोड़ों युवा बेरोजगारों से कैसे निबटेगी? कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में यही बेरोजगार व शिक्षित युवा देश में अशांति का माहौल पैदा करें. और जिस तरह राजनीतिक दल इन की ऊर्जा, शक्ति व बेरोजगारी का इस्तेमाल अपने राजनीतिक एजेंडों को साधने के लिए कर रहे हैं, उस से भी युवाओं को बहुत दिनों तक बहलायाफुसलाया नहीं जा सकेगा. हाल यह होगा कि एक दिन

यही परेशान, हिंसक व खालीजेब युवा अपना आक्रोश देश के संसाधनों, व्यवस्था व शांति पर उतारेगा. यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

– साथ में राजेश कुमार

ऐसे करें रेलवे परीक्षा की तैयारी

भारत का प्रथम रेल मंत्री कौन था और 400 का 36 प्रतिशत कितना होगा? अगर ऐसे आसान से सवालों के जवाब आप को नहीं मालूम हैं और आप रेलवे की गु्रप डी परीक्षा का फौर्म भरने यानी लगभग 2 करोड़ उम्मीदवारों में से एक हैं तो तय है आप के चुने जाने की उम्मीद न के बराबर है. लेकिन अभी भी अगस्तसितंबर तक का वक्त है कि आप इस कठिन परीक्षा को पास कर रेलवे में नौकरी करने का अपना ख्वाब पूरा कर सकते हैं.

इस साल रेलवे ने ग्रुप सी और डी की बंपर करीब 1 लाख रिक्तियां निकाली हैं जिन के लिए 2 करोड़ से भी ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया है यानी अगर आप को रेलवे की नौकरी चाहिए तो औसतन 200 उम्मीदवारों को पछाड़ना पड़ेगा. इस के लिए जरूरी है कि इस परीक्षा की सारी जानकारी आप को हो और लिखित परीक्षा, जिसे सीबीटी यानी कंप्यूटर बेस्ड टैस्ट कहा जाता है, की तैयारी और विषयों की भी जानकारी हो.

समझें परीक्षा का तरीका

सीबीटी परीक्षा की पहली सीढ़ी है जिस में डेढ़ घंटे के पेपर में उम्मीदवारों को 100 सवालों के जवाब देने हैं. हरेक सवाल के 4 उत्तर दिए जाएंगे, जिन में से उम्मीदवार को सही जवाब पर निशान लगाना है.

इस औनलाइन परीक्षा में गणित के 25 सवाल, तर्कशक्ति यानी जनरल इंटैलीजैंस के 25, जनरल साइंस के 30, सामान्य जागरूकता यानी जनरल अवेयरनैस के 20 सवाल होंगे. हर सवाल 1 नंबर का होगा. गलत उत्तर देने पर नकारात्मक मूल्यांकन होगा यानी नंबर कम हो जाएंगे. 1 गलत जवाब पर उम्मीदवार के 1/3 नंबर कटेंगे.

परीक्षा की दूसरी सीढ़ी शारीरिक क्षमता यानी फिजिकल टैस्ट होगी. इस में उम्मीदवारों को बुलाया जाएगा जो सीबीटी की मैरिट में जगह हासिल कर पाएंगे. सीबीटी में पास होने के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को कम से कम 40 प्रतिशत नंबर लाने जरूरी हैं, जबकि ओबीसी, एससी और एसटी कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 30 नंबर लाना जरूरी होगा.

इतने नंबर लाने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार ने पहली सीढ़ी पार कर ली है. ये न्यूनतम नंबर हैं जिन से आप पास हुए कहलाएंगे लेकिन अगली सीढ़ी चढ़नी जरूरी है कि आप मैरिट में हों, इस के लिए अहम है कि सीबीटी में ज्यादा से ज्यादा नंबर हासिल किए जाएं. अगर 1 लाख पदों के लिए परीक्षा हो रही है तो मैरिटलिस्ट में उन 2 लाख लोगों को जगह मिलेगी जिन के नंबर सब से ज्यादा होंगे.

बेरोजगार युवाओं में इस परीक्षा को ले कर खासा जोश है और सभी तैयारियों में जुटे हुए हैं. उम्मीदवारों की भारी तादाद के चलते परीक्षा आसान नहीं होगी. साफ है, पास वही होगा जो बेहतर पढ़ाई करेगा.

सीबीटी पर ध्यान दें

सीबीटी को पास करने और अच्छे नंबर ला कर मैरिट लिस्ट में जगह बनाने के लिए जरूरी है कि उम्मीदवार अभी से खुद को तैयारी में झोंक दें.

सब से पहले गणित पर ध्यान दें जिस में लाभहानि, प्रतिशत, गुणाभाग और दूसरे सवाल पूछे जाते हैं. ये सवाल आमतौर पर आसान होते हैं, लेकिन गणित में कमजोर उम्मीदवारों को काफी कठिन लगते हैं. गणित में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने जरूरी हैं. उम्मीदवार पहली से ले कर 8वीं क्लास तक की गणित की किताबें खंगालें और ज्यादातर तैयारी उन से ही करें. अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, ज्यामिति और त्रिकोणमिति के सवालों की प्रैक्टिस ही नैया पार लगा सकती है.

गणित के बाद जनरल साइंस पर ध्यान दें जिस में विज्ञान के आसान सवाल पूछे जाते हैं, मसलन शरीर में कितनी हड्डियां होती हैं, मनुष्य एक मिनट में कितनी बार सांस लेता है और विटामिन ‘ए’ का रासायनिक नाम क्या है. ऐसे हजारों सवालों में से कोई भी 30 पूछे जा सकते हैं.

गणित की तरह विज्ञान भी बहुत बड़ा विषय है, जिस में 30 नंबरों के लिए हजारोंलाखों सवालों के जवाब आने चाहिए. अगर पढ़ा जाए तो जनरल साइंस बेहद दिलचस्प विषय है जिस के बारे में यह सोच कर हथियार नहीं डालने चाहिए कि इतने सवालों के जवाब कैसे याद रखें.

यही हाल जनरल नौलेज का है, जिस के समंदर में कितने ही गोते लगाओ, मोती नहीं मिलते. धर्म, खेल, राजनीति, कृषि, साहित्य, मनोरंजन जगत, भूगोल, इतिहास जैसे दर्जनों विषयों की पढ़ाई जनरल नौलेज के लिए करनी पड़ती है. तब कहीं जा कर उम्मीदवार को लगता है कि वह कुछ जानने लगा है.

तर्कशक्ति से उम्मीदवार की सामान्य बुद्धि परखी जाती है, मसलन आम, केला, गोभी और अमरूद में से कौन सा आइटम अलग है. जाहिर है इस सवाल का जवाब गोभी होगा क्योंकि बाकी आइटम फलों में आते हैं.

society

ये आसान उदाहरण महज समझाने की गरज से दिए गए हैं ताकि आप को समझ आए कि तैयारी कैसे करनी है.

पहली सीढ़ी

गणित छोड़ कर सभी विषयों के पेपर्स में अधिकांश सवाल करंट विषयों पर पूछे जाते हैं. इसलिए पिछले एक साल की जनरल नौलेज यानी घटनाओं की जानकारी होनी बहुत जरूरी है. इस के लिए बेहतर होगा कि उम्मीदवार समाचारपत्र और पत्रिकाएं पढ़ें तथा पिछले दिनों की घटनाओं को इकट्ठा करें. रामनाथ कोविंद से पहले भारत का राष्ट्रपति कौन था, जैसे सवालों के जवाब आने जरूरी हैं. मौजूदा मंत्रिमंडल की जानकारी के अलावा सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के नाम मालूम होने भी जरूरी हैं.

केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि खेलों में क्याक्या हो रहा है, इस की जानकारी भी जरूरी है, मसलन, साल 2007 में विंबलडन का खिताब किस ने जीता था या फिर हालिया कौमनवैल्थ गेम्स में भारत ने कितने पदक जीते थे.

ये सब पढ़ना अगर आसान नहीं है तो कठिन भी नहीं है. वजह, अधिकतर उम्मीदवारों की हालत और जानकारी लगभग एकजैसी होती है. इसलिए अभी से जो पढ़ाई में जुट जाएगा वही फायदे में रहेगा. इसलिए इन बातों पर गौर करते हुए पढ़ाई करें :

  • अगर वाकई आप नौकरी हासिल करना चाहते हैं तो रोजाना कम से कम 8 घंटे पढ़ाई करें.
  • बाजार में तरहतरह की किताबें मौजूद हैं, उन सभी को बारबार पढ़ें.
  • समाचारपत्र पढ़ना तो बेहद जरूरी है जिस से नईर्पुरानी सभी जानकारियां मिलती हैं. समाचारपत्रों में छपे लेख व रिपोर्ट भी गौर से पढ़ें.
  • पत्रिकाएं पढ़ने से भी तरहतरह की उपयोगी जानकारियां मिलती है, इसलिए अच्छी पत्रिकाएं इकट्ठा करें. पुरानी मिल जाएं तो उन्हें भी पढ़ें.
  • लगातार पढ़ाई करने के बजाय टुकड़ों में पढ़ें, इस के लिए टाइमटेबल बना कर पढ़ना बेहतर होता है कि कितने घंटे कौन सा विषय पढ़ना है.
  • जिस विषय में कमजोर हैं उस पर ज्यादा ध्यान व समय दें.
  • पढ़ाई को तनाव के बजाय चुनौतीभरा मनोरंजन समझें.
  • मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टैलीविजन, गपशप, मौजमस्ती एकदम छोड़ दें.
  • पिछले 5 वर्षों के पेपर हल करें या फिर हल किए हुए पेपर पढ़ें.
  • प्रतियोगी परीक्षा में रटने से कोई खास फायदा नहीं होता, बल्कि एक नजर जितने ज्यादा सवालों और उन के जवाबों पर डालेंगे उतना ज्यादा फायदा होता है.
  • अपनेआप को कमजोर न समझें और आत्मविश्वास बनाए रखें.
  • परीक्षा में शांत दिमाग से सवालों के जवाब दें.
  • तुक्का मारने की कोशिश न करें क्योंकि गलत जवाब पर नंबर कटेंगे.
  • वक्त का खास खयाल रखें क्योंकि आप के पास एक सवाल का जवाब देने के लिए एक मिनट से भी कम समय होता है. जिस सवाल का जवाब बिलकुल समझ नहीं आ रहा हो उसे छोड़ दें, उस पर अड़ें नहीं.
  • प्रश्नपत्र को बीच में से हल करने की गलती न करें, बल्कि पहले सवाल से शुरू करें और आखिर तक एक के बाद एक जवाब दें.

पढ़ाई के अलावा आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत ही आप को कामयाबी दिला सकती है. यह न सोचें कि मैं कुछ नहीं जानता. अधिकतर उम्मीदवार प्रतियोगी परीक्षाओं की लड़ाई निराशा के चलते लड़ने से पहले ही हार जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि एक फीसदी उम्मीदवारों को छोड़ कर बाकी 97 फीसदी की हालत एकसी होती है.

रेलवे से संबंध रखते हुए कुछ सवाल जरूर पूछे जाते हैं, मसलन देश में पहली रेल कब और कहां चली थी, मैट्रो की शुरुआत कब हुई थी और सब से छोटी व बड़ी रेललाइन कहां हैं. आमतौर पर एक बार ध्यान से पढ़ने पर इन सवालों के जवाब याद हो जाते है. इसलिए उन्हें सिरदर्द या कठिन नहीं समझना चाहिए. हां, बारबार पढ़ने से जरूर फायदा होता है.

दूसरी सीढ़ी

सीबीटी के बाद रेलवे बोर्ड चुने हुए उम्मीदवारों का फिजिकल टैस्ट लेता है. इसलिए पढ़ाई के साथसाथ इस की भी तैयारी जरूरी है. आमतौर पर 1 हजार मीटर की दौड़ रेलवे करवाता है जिस से यह पता चले कि उम्मीदवार में कितना दमखम है. इस बार की परीक्षा में उम्मीदवारों को वजन दे कर दौड़ाया जाएगा. लड़कों को 35 किलो वजन उठा कर 2 मिनट में 100 मीटर की दूरी तय करनी होगी और 1 हजार मीटर की दूरी 4 मिनट 15 सैकंड में तय करनी पड़ेगी.

लड़कियों को 20 किलो वजन उठा कर 100 मीटर की दूरी 2 मिनट में पूरी करनी होगी और 1 हजार मीटर की दूरी 5 मिनट 40 सैकंड में पूरी करनी होगी.

इस फिजिकल टैस्ट की अभी से प्रैक्टिस शुरू करें तो परीक्षा के दौरान आसानी रहेगी. कोशिश यह होनी चाहिए कि तयशुदा से कम वक्त में दौड़ पूरी कर ली जाए, जिस से चुनाव करने वालों पर अच्छा असर पड़े.

इस के अलावा यह भी ध्यान रखें कि आप की नजर ठीक हो, रंगों की पहचान भी रेलवे में जरूरी होती है. इस की भी प्रैक्टिस करें. अगर कोई दिक्कत पेश आए तो तुरंत आंखों के डाक्टर से मिल कर सलाह व इलाज कराएं.

तीसरी सीढ़ी

जो उम्मीदवार पहली दोनों सीढि़यां पार कर लेंगे, उन की नौकरी एक तरह से पक्की है लेकिन तीसरे दौर में आप के द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों की जांच होती है. गलत या झूठे दस्तावेज आप की मेहनत पर पानी फेर सकते हैं. इसलिए ऐसे दस्तावेज न लगाएं और हरेक दस्तावेज की मूल प्रति एक फाइल में जमा कर के ले जाएं जिस से जांच में आसानी हो.

ग्रुप सी और डी की नौकरी की पगार 18 हजार रुपए से शुरू होती है जिस में भत्ते जुड़ कर यह तकरीबन 25 हजार रुपए मासिक तक हो जाती है और जिंदगीभर की बेफिक्री भी हो जाती है.

यह बेफिक्री सिर्फ मेहनत और लगन से ही मिलनी मुमकिन है, इसलिए वक्त न गंवाते हुए अभी से जुट जाएंगे तो कामयाबी मिलनी कोई मुश्किल नहीं.

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