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बुलेट की गति में ब्रेक

चीन के बीसियों शहर बुलेट ट्रेन जैसी तेज गति से चलने वाली रेलों से जुड़ चुके हैं जबकि भारत में पहली बुलेट ट्रेन, जो अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलनी है, खतरे में है. मोदी सरकार ने सपने तो दिखाए पर अब पगपग पर बाधाएं आ रही हैं.

बुलेट ट्रेन के लिए नई पटरियां नए मार्ग पर बिछाई जानी हैं. किसान इस नए रेलमार्ग के लिए अपनी जमीन आसानी से देने को तैयार नहीं हैं. अदालतों में मामले जाने लगे हैं. हो सकता है किसानों से जमीन लेने में ही दसियों साल लग जाएं.

योजना के क्रियान्वयन में जितनी देरी होगी, उतना खर्च बढ़ता जाएगा, क्योंकि महंगाई की दर बढ़ती ही जा रही है. हालांकि बहुत सा पैसा जापान को सस्ते ब्याज पर देना है पर शेष पैसा देश में महंगे ब्याज पर लेना पड़ेगा. सरकार का खजाना अब खाली सा है और रेल मंत्रालय से साफ कह दिया गया है कि वह बुलेट ट्रेन के लिए बाजारभाव पर बैंकों या बौंडों से पैसा उगाहे.

ये दिक्कतें तकनीकी नहीं, मानसिक हैं. अहमदाबाद मुंबई रेलमार्ग में गनीमत है कि न पहाड़ हैं और न समुद्र. चीन ने तो कई पहाड़ों को भेदा है. जापान ने सघन बस्तियों के बीच बुलेट ट्रेन चलाई है. यहां मामला असल में यह है कि सिवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के, किसी और की इस में रुचि नहीं है.

आम लोगों को मालूम है कि बुलेट ट्रेन का प्लेटफौर्म भी अलग होगा, रास्ता भी अलग. किराया कई गुना ज्यादा होगा. आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता अगर दोचार घंटे का समय कम भी लगा. यहां तो लोग एक पाखंड के लिए लाइन में लग कर 10 घंटे इंतजार करने को तैयार रहते हैं. यहां लोगों के पास समय ही समय है.

बुलेट ट्रेनों की वहां जरूरत है जहां लोगों को अपने और दूसरों के वक्त की कीमत मालूम हो. जहां देश की तीनचौथाई जनता निठल्लीनिकम्मी हो वहां तो बुलेट भी चींटी की चाल चलेगी. अपने यहां की हवाई सेवाओं को ही देख लें. हर एयरपोर्ट पर समय की बरबादी की जाती है. एयरलाइन कहती है कि डेढ़ घंटे पहले पहुंचो ताकि 45 मिनट की यात्रा कर सको. ज्यादातर एयरपोर्टों पर हर काम धीरेधीरे होता है. शहर से एयरपोर्ट जाने के रास्तों पर अतिक्रमण के कारण ट्रैफिक जाम रहता है.

बुलेट ट्रेन तकनीकी कारणों से नहीं, दूसरे कारणों से न तीव्र गति से बनेगी, न ही तीव्र गति से चलेगी, यह तय है.

गर्लफ्रैंड : हां में भी तकलीफ, न में भी

रचित और सिद्धि में गहरी दोस्ती है. दोनों बाइक पर साथसाथ बेरोकटोक घूमतेफिरते हैं. रचित की मां सुधा कहती हैं, ‘‘अगर उन का बेटा अपनी गर्लफ्रैंड को घर ला कर मिलाए तो वे उस से मिलने से कैसे मना कर सकती हैं. आज की पीढ़ी के बच्चों को आप मना नहीं कर सकते?’’

लेकिन दुनियादारी की सीमाएं हैं. कोई भी मां नहीं चाहेगी कि उस का किशोर बेटा अपनी गर्लफ्रैंड के संग हाथ में हाथ डाले उस के सामने आ खड़ा हो.

बच्चों की आजादी पर मां को बाहरी टोकाटोकी का भी सामना करना पड़ता है. इसलिए ज्यादातर मांएं जानना चाहती हैं कि उन का बेटा किस से मिल रहा है? उस की गर्लफ्रैंड कैसी है? शायद यही कारण है कि मांएं अपने बेटे की शादी जल्दी और अपनी पसंद की युवती से करना चाहती हैं. मगर हर मां के लिए कुछ खास बातों पर ध्यान देना जरूरी है:

बेटे की पसंद

यदि आप के बेटे को कोई युवती बहुत पसंद है और वह उसे जीवनसाथी बनाना चाहता है, लेकिन आप उस की गर्लफ्रैंड को पसंद नहीं करतीं तो यह फीलिंग अपने तक ही रखें. अपने बेटे की गर्लफ्रैंड को गुलाब का कांटा न मानें. कांटे मां को नुकसान तो नहीं पहुंचाते हैं लेकिन चुभते जरूर हैं. बेटे पर एकाधिकार छिन जाने का भय मां को कुछकुछ सताने लगता है.

देख कर भी इग्नोर करें

अकसर जब बेटा अपनी मां को अपनी पसंद की युवती से मिलवाता है, तब आजकल की आधुनिक मां बाहरी मन से हां तो करती है लेकिन अंदर ही अंदर बेटे के हाथ से निकलने का डर उसे सताता है.

एक काउंसलर और पेरैंटल एडवाइजर का कहना है कि आप को मालूम होगा कि आप के बेटे के लिए क्या सही है और क्या गलत. आप अपने बेटे पर पूरी तरह से विश्वास भी करती हैं, लेकिन ऐसी कोई हरकत न करें जिस से आप के बेटे को लगे कि आप उस की दोस्त को नापसंद करती हैं. उसे उसी की गर्लफ्रैंड में लगने वाली नौनकंपीटिबल चीज के बारे में खुद न बता कर, उसे खुद एहसास होने दें. यदि आप का बेटा टीनएजर है और आप से अपनी रिलेशनशिप की बात छिपाता है, तो पहले थोड़ा इंतजार करें, फिर उस से खुद बात करें.

सैल्फ रैफ्लैक्ट

‘‘पता नहीं कैसी लड़की पसंद की है, मैं होती तो इस से भी अच्छी ढूंढ़ती. मान मेरी, गर्लफ्रैंड ही तो है, छोड़, पत्नी किसी और युवती को बना लेना.’’

अगर आप अपने बेटे की गर्लफ्रैंड की किसी आदत को पसंद नहीं करती हैं, तो आप की जिम्मेदारी है कि आप इस बात को इग्नोर करें. खुद की सोच में मौजूद नैगेटिविटी दूर करने की कोशिश करें. यह स्वीकार करना मुश्किल है, लेकिन जरूरी नहीं कि जो आप की नापसंद हो, वह दूसरे की भी नापसंद हो.

आप एक बार खुद की रिलेशनशिप में इन समस्याओं को झांक कर देखें. उस समय शायद आप दोनों पतिपत्नी भी विद्रोही स्वभाव के रहे होंगे. ऐसा ही आप का बेटा और उस की गर्लफ्रैंड है. इस बात का ध्यान रखें कि दोनों बच्चे हैं और आप ऐसे में उस लड़की से परफैक्ट होने की उम्मीद नहीं कर सकतीं. दुनिया में कोई भी व्यक्ति परफैक्ट नहीं हो सकता.

एक मौका दें

कई बार जब मां अपने बेटे की गर्लफ्रैंड से मिलती है तो मन में उस की खराब छवि ले कर आती है और बेटे के बारबार पूछे जाने या समझाने पर एक ही जवाब देती है, ‘रहने दे, मैं उसे अच्छी तरह से पहचान गई.’

यह इसलिए होता है क्योंकि शायद उस का आप पर पहला इंप्रैशन अच्छा नहीं रहा या फिर आप अभी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आप के बेटे की भी कोई गर्लफ्रैंड हो सकती है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप उस की छोटीछोटी गलतियों पर बारबार बेटे से शिकायत करती रहें. उसे एक मौका दें. साथ ही खुद भी उस की पौजिटिव क्वालिटी को देखें. आप खुद सरप्राइज्ड होंगी जब उसे जानने की कोशिश करेंगी.

बात करें

‘अरे, वह तो बहुत बोलती है या जोर से हंसती है,’ इस तरह की बातें बेटे से न करें. बात करनी है तो उस की रिलेशनशिप के बारे में करें. लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि बातों के दौरान आप उस की गर्लफ्रैंड के बारे में शिकायत न करने लग जाएं. इस से वह आप से बात करना बंद कर सकता है.

इस के विपरीत यदि आप को पता चले कि बेटे और गर्लफ्रैंड के बीच कोई समस्या है तो उसे उस बात को सौल्व करने को कहें. इस से वह आप पर विश्वास कर रिलेशनशिप से जुड़ी सारी बातें आप को बताएगा. कई बार मां अनावश्यक रूप से बेटे पर दबाव बनाती है. इस से माहौल काफी घुटनभरा हो जाता है.

दोस्तों के साथ एंजौय या बाहर घूमनेफिरने पर भी मां की नजर रहती है. ऐसे में मां को अपने आचरण पर भी विचार करना होगा कि क्या सच में वे इस तरह का व्यवहार कर रही हैं? यदि सच में ऐसा है तो इस तरह के आचरण से किसी का भी भला नहीं होने वाला.

वक्त की जरूरत है कि हम सिर्फ मां बन कर नहीं बल्कि बेटे की दोस्त बन कर उस के साथ समय बिताएं.

आजकल अगर किसी लड़के की कोई गर्लफ्रैंड नहीं है तो भी उसे एक समस्या माना जाता है.

अभिभावक परेशान

अभिभावकों को जब यह एहसास होता है कि उन के किशोरवय बेटे की कोई गर्लफ्रैंड नहीं है तो उन के मन में अपने बच्चे के सैक्सुअल रुझान को ले कर तमाम खयाल उभरने लगते हैं. खासतौर से ऐसे समय पर जब समलैंगिक संबंधों को समाज स्वीकृति देने लगा हो.

डिप्रैशन में आ जाते हैं युवक

मेरी सहेली सीमा का बेटा मुंबई के एक होस्टल में रहता है. वह फाइनल ईयर का स्टूडैंट है. इस बार जब वह घर आया तो काफी परेशान दिखा. कारण सिर्फ यह था कि स्मार्ट और पढ़ाई में अच्छा होते हुए भी उस की कोई गर्लफ्रैंड नहीं थी. और जब वह क्लास खत्म होने के बाद होस्टल में लौटता तो अलगथलग पड़ जाता था. लगभग सारे ही लड़के अपनीअपनी गर्लफ्रैंड से चैट करने में लग जाते थे.

कई लड़के तो इस बात के लिए उस का मजाक भी बनाते थे. उस में अब हीनभावना घर करने लगी थी. वह इसे अपनी कोई कमी मानने लगा था. मुझे जब इस बात का पता चला तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा. इतनी मामूली सी बात के लिए वह इतना परेशान था. उस के डिप्रैशन का असर उस के व्यवहार और बात करने के तरीके पर स्पष्ट दिख रहा था. ज्यादा बोलने के बजाय वह चुप और गुमसुम रहने लगा था.

ऐसी स्थिति में एक मां ही बेटे के करीब होती है जो समझदारी से काम ले कर उसे डिप्रैशन में जाने से रोक सकती है. गर्लफ्रैंड होना स्टेटस सिंबल नहीं. दोस्ती करना या प्यार करना स्वाभाविक फीलिंग्स हैं. इसलिए यह सोच कर परेशान रहना कि लोग क्या कहेंगे या दोस्त क्या सोचेंगे कि कितना बैकवर्ड है, आज तक कोई गर्लफ्रैंड नहीं, गलत है. स्वस्थ रहो, मस्त रहो, खुद को पढ़ाई में या किसीकाम में व्यस्त रखो.

वाडेकर ने दिलाई थी भारत को विदेश में पहली जीत

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और कप्तान अजित वाडेकर का बुधवार को निधन हो गया. वह 77 साल के थे और काफी समय से बीमार चल रहे थे. 1 अप्रैल, 1941 को मुंबई में जन्मे अजित वाडेकर ने करीब 25 साल की आयु में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट करियर शुरू किया था.

वाडेकर की कप्तानी में भारत ने पहली बार विदेश में जीत हासिल की थी. यह कारनामा उन्होंने 1971 में किया, जब टीम वेस्टइंडीज और इंग्लैंड दौरे पर गई थी. भारतीय टीम ने 6 मार्च को पोर्ट ऑफ स्पेन में वेस्टइंडीज को सात विकेट से हराकर विदेशी धरती पर पहली जीत दर्ज की थी.

इसके बाद भारत ने इंग्लैंड को उसके घर में पहली बार शिकस्त दी.लॉर्ड्स और ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए पहले दो टेस्ट मैच ड्रॉ हो जाने के बाद भारत ने ओवल टेस्ट में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. इसके अलावा उन्हें पहली बार भारतीय वनडे टीम का कप्तान भी बनाया गया था. उन्होंने 1966 से 1974 तक क्रिकेट खेला और उसके बाद संन्यास लिया. अजित वाडेकर ने 37 टेस्ट मैचों में 31.07 की औसत से 2,113 रन बनाए थे. वह 90 के दशक में भारतीय टीम के मैनेजर भी रहे.

इसके अलावा इन्होंने 2 वनडे मैचों में भी शिरकत की जिसमें इनके नाम 73 रन दर्ज हैं. टेस्ट मैचों में इन्होंने एक शतक और 14 अर्धशतक जमाए थे. उन्होंने 1974 जुलाई में इंग्लैंड के खिलाफ आखिरी टेस्ट और वनडे खेला.

डाकघर में निवेश से मिलेगी बेहतर रिटर्न के साथ कर में छूट

छोटे निवेशकों के लिए डाकघर की बचत योजनाओं में निवेश हमेशा से बेहतर विकल्प रहा है. इन योजनाओं में बिना जोखिम निवेश के साथ बैंकों की बचत योजनाओं के मुकाबले न सिर्फ ज्यादा रिटर्न मिलता है, बल्कि आयकर में छूट भी मिलती है.

हाल के दिनों में म्यूचुअल फंड्स में निवेश तेजी से बढ़ने के बावजूद छोटे निवेशकों के बीच डाकघर की बचत योजनाएं काफी पसंद की जाती हैं. अलग-अलग उम्र वर्ग के हिसाब से इन योजनाओं निवेश कर आप भी रिटर्न और टैक्स छूट पा सकते हैं.

पब्लिक प्रोविडेंट फंड

7.5 फीसदी की दर से वर्तमान में इसमें मिल रहा है ब्याज

500 रुपये के न्यूनतम निवेश से योजना शुरू कर सकते हैं

वरिष्ठ नागरिक बचत योजना

8.3 फीसदी की दर से इसमें मिल रहा है ब्याज

15 लाख रुपए तक इसमें निवेश की अधिकतम सीमा है

सुकन्या समृद्धि योजना

8.1 फीसदी है जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए ब्याज दर

250 रुपये से निवेश शुरू किया जा सकता है योजना में

इस योजना के तहत 0 से 10 वर्ष की आयु तक की कन्याओं के नाम खाता खोला जा सकता है. 21 साल की उम्र पूरी होने पर ही इस योजना से राशि की पूरी निकासी संभव है.

राष्ट्रीय बचत पत्र

7.6 फीसदी की दर से सालाना चक्रवृद्धि ब्याज अभी

100  निवेश शुरू किया जा सकता है योजना में

एनएससी में निवेश की समय सीमा वर्तमान में पांच साल है. ब्याज हर छह महीने बाद जमा धनराशि में जुड़कर चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से बढ़ता है. 1.5 लाख रुपये तक कर छूट है.

मुझे चुनौतीपूर्ण किरदार ही निभाने हैं : अली फजल

फिल्म ‘‘थ्री इडियट्स’’ में एक छोटा सा कैमियो करके अपने करियर की शुरुआत करने वाले अली फजल ने जूडी डेंच के संग फिल्म ‘‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’’ में मेन लीड करके अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अपनी एक मजबूत पकड़ बना ली है. इसी के चलते उन्हे ‘आस्कर अवार्ड’’ यानी कि अकादमी का सदस्य भी चुना गया है. फिलहाल वह बालीवुड में अपनी फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ को लेकर चर्चा में हैं. आनंद एल राय निर्मित और मुदस्सर अजीज निर्देशित यह फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी’ की सिक्वअल फिल्म है.

फिल्म ‘‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’’ को लेकर अब क्या कहना चाहेंगे?

इस फिल्म को करने का अनुभव बहुत अच्छा रहा. हालीवुड के अति मशहूर निर्देशक के साथ काम करने का अवसर मिला. इस तरह की फिल्म का हिस्सा बनना किसी भी कलाकार के लिए गौरव की बात होती है. अब हालात यह हैं कि एक तरफ मैं बालीवुड में व्यस्त हूं, तो दूसरी तरफ अमेरिका में काम कर रहा हूं. अक्टूबर या नवंबर माह में हालीवुड की एक फिल्म की शूटिंग शुरू करूंगा. बालीवुड में किसी भी कलाकार को अब तक हालीवुड में इतना बड़ा काम करने का मौका नहीं मिला है. अब तक हालीवुड में किसी भी भारतीय कलाकार ने लीड रोल नहीं किया है. मैंने पहली बार ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ में लीड किरदार निभाया है.

आप पहली बार आस्कर फिल्म फेस्टिवल में ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ की वजह से गए थे. क्या अनुभव रहे?

हमारी यह फिल्म आस्कर के अलावा ग्लोब सहित कई फिल्म समारोहों में गयी थी. इन फेस्टिवल का हिस्सा बनने का मेरा अनुभव ‘वंस इन ए लाइफ टाइम’ रहा. हमारी फिल्म कास्ट्यूम और मेकअप के लिए नामीनेटेड थी. अभी मुझे इसी फिल्म के लिए रशिया के सोची फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है. 25 मिलियन की लागत से बनी इस फिल्म ने 100 मिलियन से ज्यादा कमा लिया है.

आस्कर में हमारी फिल्म कास्ट्यूम व मेकअप के लिए नामीनेटेड थी. पर हम सभी टीम के लोगों ने वहां जाकर अपनी फिल्म को प्रमोट किया. हमें विश्व के कई दिग्गज कलाकारों व निर्देशकों के साथ बात करने का मौका मिला. गैरी ओल्डमैन से तो मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गयी है. उनके साथ तो हम आस्कर के अलावा टोरंटो व वैनिस भी गए थे. हम लोग पूरे छह माह तक एक साथ घूमते रहे. उम्मीद है कि एक दिन मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा. एंजिला जाली, मेरिल स्ट्रिप सहित सभी ने मेरे काम की तारीफ की है.

विश्व की सर्वाधिक सफल और स्टेज से लेकर फिल्म तक सारे पुरस्कार जीत चुकी अदाकारा जुडी डेंच ने मुझसे कहा था कि,‘तुम्हारे अंदर ऐसा इन्नोसेंस है और जो ग्रेस है, वह बहुत कम कलाकारों में नजर आता है. तुम इसे संभाल कर रखना.’ उनकी यह बात मेरे लिए बहुत बड़े अवार्ड की तरह है.

अब आपकी जिंदगी में क्या बदलाव आया?

अब मेरी सोच काफी विकसित हो गयी है. अब मैं कुएं का मेढक नहीं रहा. अब मेरी समझ में आ गया है कि मेरे लिए कलाकार होने का अर्थ सिर्फ परदे पर जाकर अभिनय करना नहीं है. अब मेरी कुछ समाजिक जिम्मेदारियां भी हैं. इसी के साथ एक कलाकार को लिखना, पढ़ना, गायन, संगीत की समझ, नृत्य व निर्देशन करने सहित सब कुछ करना आना चाहिए. मुझे अच्छी तरह पता है कि एक दिन वह आएगा, जब मैं एक फिल्म निर्देशित करूंगा. फिलहाल तो मैं अभिनय से खेल रहा हूं. पर सही समय पर निर्देशन में भी कदम रखूंगा. कुछ पटकथाएं भी लिख रहा हूं. हमारे यहां सोच है कि आपने पढ़ाई नहीं की, तो आप अभिनेता बन जाओ. इस सोच को बदलने की बहुत ज्यादा जरूरत है. क्योंकि एक कलाकार को फिल्म विधा से जुड़े हर विभाग की जानकारी होनी चाहिए.

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं फिल्म ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ के अपने किरदार अब्दुल के लिए तैयारी कर रहा था, तब हमें कोई रिफ्रेंस मटेरियल नहीं मिला. उस वक्त का कोई वीडियो वगैरह भी मौजूद नहीं है. तब मैंने इतिहास पर कम से कम 11 किताबें पढ़ीं. उसके बाद मैंने इस किरदार की कल्पना की थी.

फिल्म ‘‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’’ के बाद आपको लेकर बालीवुड के फिल्मकारों की सोच बदली या नही?

अब लोग मुझे इज्जत देने लगे हैं. अब मुझे भी आस्कर अवार्ड अकादमी का सदस्य बनाया गया है. इस सम्मान को पाने वाला मैं सबसे कम उम्र का कलाकार हूं. यह सम्मान मेरे साथ दस भारतीयों को मिला है, जिसमें शाहरुख खान व माधुरी दीक्षित भी हैं. तो चीजें काफी बदली हैं. अब लोग मुझे याद करने लगे हैं.

‘हैप्पी भाग जाएगी’ और ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ में क्या फर्क है?

केवल फिर का अंतर है. यह मजेदार फ्रेंचाइजी है. पहली फ्रेंचाइजी में भी लोगों ने मुझे बहुत पसंद किया था. और इसमें भी पसंद करेंगे. इस बार ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ में तो सोनाक्षी सिन्हा और जस्सी गिल भी आ गए हैं. इस फिल्म के लिए मैंने और डायना पेंटी ने सिर्फ 15 दिन काम किया होगा. पर किरदार जबरदस्त है. निर्देशक मुदस्सर अजीज ने बड़े अच्छे ढंग से मुझे फिल्म में पेश किया है. यह फन फिल्म है. पिछली बार पाकिस्तान में हंगामा मचा था, इस बार चीन में मचा है. मगर बिना दिमाग वाली फिल्म नहीं है.

इसके जोक्स अच्छे हैं. मेरा किरदार गुड्डू का ही है, पर थोड़ा सा बदला गया है. वास्तव में जब मैं वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ की शूटिंग कर रहा था, तो मेरा हुलिया थोड़ा बदला हुआ था. उसी समय इस फिल्म के लिए शूटिंग करनी पड़ी, इसीलिए इस फिल्म में हुलिया थोड़ा बदला हुआ नजर आएगा.

अब अंतरराष्ट्रीय सिनेमा को लेकर आपकी समझ क्या हुई? हमारा बालीवुड अंतरराष्ट्रीय सिनेमा से पीछे क्यों है?

बालीवुड कभी अंतरराष्ट्रीय या हालीवुड सिनेमा से पीछे था, पर अब पीछे नहीं है. वैसे भी हालीवुड सिनेमा हमसे 30 साल पहले शुरू हुआ था. तो हमें उनसे सीखने को मिला है. तकनीकी स्तर पर हम उनसे थोड़ा पीछे चल रहे हैं. अब तो हमारा वीएफएक्स बहुत अच्छा हो गया है. आनंद एल राय ने फिल्म ‘जीरो’ में शाहरुख खान को बौने के किरदार में पेश किया है. इसका स्पेशल स्फेक्ट्स बहुत जबरदस्त है. हां! हम लोग दौर में फंस जाते हैं कि यह चला तो फिर यही चलेगा. कभी रोमांस का दौर, तो कभी एक्शन न का तो कभी कामेडी का दौर. पर अब दर्शकों को मूर्ख नहीं बना सकते. दर्शक हालीवुड फिल्में भी देख रहा है. अब दर्शक सलीके वाली फिल्म मांगता है.

आपसे पहले किसी भारतीय कलाकार को हालीवुड में बड़े किरदार क्यों नहीं मिल पाए. इसकी वजह आपकी समझ में आयी?

पहले हालीवुड में भी एक ही ढर्रे की फिल्में बन रहीं थी. विविधता की कमी थी. 1971 में जब मार्लन ब्रांडो को आस्कर में सर्वश्रेष्ठ कलाकार का पुरस्कार मिला, तो उन्होंने एक भारतीय लड़की को पुरस्कार लेने के लिए भेजकर एक मुद्दा उठाया था. तब मार्लन ब्रांडो को काफी गालियां मिली थी. उन दिनों हालीवुड फिल्मों में रेड इंडियन की धज्जियां उड़ायी जा रही थीं. पर अब चीजें बदली हैं. पहले हालीवुड रंगभेद का शिकार था. तो उन्हें बदलने में वक्त लगा है. देखिए, बालीवुड में भी पहले टाइप कास्ट हुआ करते थे. पहले हालीवुड में माना जाता था कि यदि बालीवुड का कलाकार होगा, तो वह फिल्म में पढ़ाकू होगा. पर अब हालीवुड के स्टूडियो मानने लगे हैं कि भारतीय कलाकार भी सिनेमा में सुपर स्टार हो सकता है.

‘‘3 इडियट्स’’ से अब तक के आपके करियर के टर्निंग प्वाइंट क्या रहे?

मैंने तो काम करते हुए सब कुछ सीखा है. फिल्म के असफल होने पर लोग गायब हो जाते हैं. पर मैंने ऐसे मौके पर भी खुद को खड़ा रखना सीखा. ‘3 इडियट्स’ में मैंने एक छोटा सा कैमियो किया था. तो मेरा मानना है कि आप मुझे उससे तो नीचे गिरा नहीं सकते. उसके बाद मैंने शाहरुख खान प्रोडक्शंस की फिल्म ‘‘आलवेस कभी कभी’’ में लीड रोल किया था. पर बाक्स आफिस पर फिल्म एकदम गिर गयी थी. तब मुझे लगा था कि यहां ऐसा भी हो सकता है. हम कभी भी धड़ाम से नीचे गिर सकते हैं.

उस वक्त आमिर खान ने मुझे एक अच्छी सलाह दी थी कि फिल्म में निर्माता से लेखक निर्देशक कलाकार सभी लोग जुड़े रहते हैं और एक टीम वर्क होता है. अब उस टीम में कहां क्या गड़बड़ हो जाए, कह नहीं सकते. इसलिए फिल्म के असफल होने पर निराश नहीं होना चाहिए. उसके बाद मेरा करियर धीरे धीरे आगे बढ़ा. हां! कुछ लोगों के फिल्म इंडस्ट्री में अपने ताल्लुकात हैं, तो उन्हें जल्दी काम मिल गया. पर जो भी मेरे करियर में हो रहा है, उससे मैं खुशू हूं.

देखिए, यदि टैलेंट नहीं है, तो आप फिल्मी परिवार से होंगे, तो भी आपका कुछ नहीं हो सकता. आज की तारीख में बालीवुड में एक मात्र बेहतरीन कलाकार  रणबीर कपूर हैं. मैं तो उनका बहुत बड़ा फैन हूं. पर उनकी भी फिल्में नहीं चली. उनकी कुछ फिल्में समय से आगे थी, जो लोगों की समझ में नहीं आयी. उनकी फिल्म ‘‘जग्गा जासूस’’ एक संगीत प्रधान फिल्म थी. हमारे यहां इस तरह की फिल्मों का कांसेप्ट विकसित नहीं हुआ है. अब देखिए, ‘जग्गा जासूस’ के फ्लाप होने के एक साल बाद संगीत प्रधान फिल्म ‘लाला लैंड” को आस्कर अवार्ड मिला. पर हमारे यहां अभी भी गाना बैकग्राउंड में ही चलेगा.

‘फुकरे’ की सिक्वअल ‘फुकरे 2’ भी बाक्स आफिस पर नहीं चली?

ऐसा होता है. पहली फिल्म की सफलता के साथ मैच करना बड़ा मुश्किल काम होता है. पहले भाग में जो इन्नोसेंस था, वह दूसरे भाग में मौजूद नहीं था. जबकि यह ऐसी फिल्म थी कि दर्शक हमें हमारे किरदारों के नाम से जानती थी. मैंने उनसे कहा कि पार्ट 3 मत बनाओ.

अब किस तरह के किरदार निभाना चाहते हैं?

इस वक्त तो मैं दो महत्वपूर्ण फिल्मों ‘मिलन टाकीज’ और ‘प्रस्थानम’ में व्यस्त हूं. दोनों में लीड रोल हैं. फिल्म ‘‘प्रस्थानम’’ में पिता पुत्र की कहानी है. यह दक्षिण भारत की इसी नाम की फिल्म का हिंदी रीमेक है. इसमें मेरे साथ संजय दत्त हैं. राजनीति की पृष्ठभूमि है. मेरे पास रोमांस व एक्शन वाली फिल्में ही आ रही हैं. वेबसीरीज ‘मिर्जापुर’ में सिर्फ एक्शन ही है. मिर्जापुर में कुछ सत्य घटनाक्रम भी है. इसमें अभिनय करना मेरे लिए जीवन बदलने जैसा रहा. जब मुझे कुछ चुनौतीपूर्ण काम करने का मौका मिलता है, तो मैं तुरंत लपक लेता हूं. आगे भी ऐसा ही कुछ करने का इरादा है.

हालीवुड को लेकर आपकी समझ क्या विकसित हुई?

हम सोचते हैं कि हालीवुड की सभी फिल्में सफल हैं. पर हकीकत यह है कि हालीवुड में भी सिर्फ दो कलाकार ही ऐसे हैं, जो अपनी फिल्मों को सफल बना रहे हैं. टाम क्रूज जैसे कलाकार भी असफल हैं. इसीलिए अब टाम क्रूज सिर्फ फ्रेंचाइजी वाली फिल्में ही कर रहे हैं. अपने बलबूते पर सिर्फ डेंजिल वाशिंगटन और मैथ्यू पैज डमान उर्फ मैट डमानमैग डेमिन ही फिल्में चला रहे है. बाकी हौलीवुड में भी सुपर हीरो वाली फिल्में ही चल रही हैं. इसकी वजह यह है कि हालीवुड में नेटफ्लिक्स व अमैजान छाए हुए हैं. अगले तीन साल में नेटफ्लिक्स व अमैजान की वजह से भारतीय सिनेमा का भी नक्शा बदलने वाला है.

रिचा चड्ढा के साथ अपने रिष्तों को लेकर क्या कुछ कहना चाहेंगे?

बहुत निजी मसला है. मैं हर रिश्ते को सम्मान देना चाहता हूं. मैं बहुत शर्मीला हूं. रिचा में खूबी बहुत है. वह बहुत अच्छी कलाकार हैं. मैं तो उनका फैन था. मैंने उनकी सारी फिल्में देखी हैं. परदे पर जितनी वह कड़क नजर आती हैं, निजी जिंदगी में उतनी ही कोमल हैं. उन्हें इंसानों के साथ साथ जानवरों से भी प्यार है.

प्यार को लेकर क्या सोच है?

प्यार पर तो शेरो शायरी लिखी जा चुकी हैं. मैं तो नौसीखिया हूं. मेरे लिए प्यार एक शिद्दत है.

आप क्या लिखते हैं?

मैं जो कुछ देखता हूं,उसे कागज पर उतारता हूं. कविताएं बहुत लिखी हैं. पर मैं कविताएं छपवाना नहीं चाहता. दो फिल्मों की पटकथाए लिख रहा हूं. दो तीन माह में एक लघु फिल्म निर्देशित करने वाला हूं, जिसका निर्माण हालीवुड प्रोडक्शन के साथ करुंगा.

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग बहुत होती है. उसको लेकर क्या कहेंगे?

यह वह लोग हैं, जिन्हें ट्रोलिंग के लिए पैसे मिलते हैं, अब कौन उन्हें पैसे देता है, पता नहीं. यह ट्रोलिंग इतनी घटिया स्तर पर होती हैं कि घिन्न आती है. जरूरत है कि सोशल मीडिया यानी कि ट्वीटर आदि के जो कर्ताधर्ता हैं, वह कुछ तो सेंसरशिप लागू करें. यदि वाट्सअप ग्रुप में आप अफवाह फैला रहे हैं, तो कितनी गलत बात है? गलत अफवाह के चलते लोग मर रहे हैं.

सिम स्वैप कर चोर खाली कर रहे आपका बैंक अकाउंट

सिम स्वैपिंग की कई सारी घटनाएं आपने सुनी होगी. हाल ही में सिम स्वैप करके कई लोगों को लाखों रूपये का चूना लगाया गया है. अब सवाल यह है कि आखिर सिम स्वैपिंग क्या है और इसके जरिए किस तरह लोगों को चोर ठग रहे हैं. तो आइए जानते हैं इसके बारे में.

सिम स्वैप का मतलब सीधा सा है कि सिम कार्ड को नए सिम से बदल दिया जाए. आपकी टेलीकौम कंपनी को एक मैसेज करके आपके मौजूदा सिम को निष्क्रिय किया जा सकता है और नए सिम के जरिए आपको ठगा जा सकता है.

चोर ऐसे करते हैं आपके सिम का इस्तेमाल

सबसे पहले ठग आपको एक नए नंबर से कौल करते हैं और खुद को आपकी टेलीकौम कंपनी का कर्मचारी बताते हैं. ये ठग आपको फोन पर कौल ड्रौप और इंटरनेट चलाने में आने वाली समस्याओं के समाधान का भरोसा दिलाते हैं. ये आपको 4जी सिम घर पर पहुंचाने का भी वादा करते हैं. अपनी बातों में फंसाकर ये ठग आपसे सिम कार्ड का 20 अंकों वाला एक खास नंबर पूछते हैं जो कि सिम कार्ड के पीछे लिखा होता है.

20 अंकों वाला सिम नंबर बताने के बाद…

20 अंकों वाला सिम नंबर बताने के बाद आपके सिम स्वैप के लिए एक मैसेज आता है. अब आपसे ये ठग पुष्टि के लिए 1 दबाने को कहते हैं. इसके बाद असली खेल शुरू होता है, क्योंकि कंपनी को लगता है कि आपने ही नए सिम के लिए आवेदन किया है.

इसके बाद आपका सिम काम करना बंद कर देता है और नेटवर्क चला जाता है. खास बात यह है कि जैसे ही आपके नंबर से नेटवर्क गायब होता है, ठीक उसी समय ठग के पास मौजूद आपके नंबर के नए सिम पर नेटवर्क आ जाता है.

दरअसल इस तरह की ठगी में ठग के पास आपका बैंक अकाउंट नंबर या एटीएम कार्ड नंबर पहले से होता है, बस जरूरत होती है तो एक ओटीपी की और यह ओटीपी उसके सिम स्वैप करने से मिल जाता है. इसके बाद वह आपके नंबर पर ओटीपी मंगाता है. और इस तरह से आपको हजारों लाखों का चूना एक झटके में लग जाता है. कई परिस्थितियों वे धोखेबाज आपसे मोबाइल नंबर के साथ आधार नंबर भी मांगते हैं.

कई बार ये ठग आपको इतना परेशान कर देते हैं कि आप गुस्से में आकर फोन ही बंद कर देते हैं और इसी का वे इंतजार करते हैं ताकि लेनदेन होने पर आपके नंबर पर मैसेज ना आए और आपको कुछ पता ही ना चले. ऐसे में अपना मोबाइल किसी भी कीमत पर बंद ना करें.

घर खरीदने से पहले जरूरी है इन 7 चीजों की जानकारी

बहुत से लोगों के लिये घर या अपार्टमेंट खरीदना सपने सच होने जैसा है. कई व्यक्तियों के लिए, यह उनकी जिंदगी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है. कई लोग अपने डाउन पेमेंट के लिए राशि बचाने का हर संभव प्रयास करते हैं. लेकिन बहुत कम व्यक्तियों को पता होगा कि घर खरीदने में डाउन पेमेंट के अलावा कई अन्य लागत और शुल्क शामिल होते हैं. शुल्क और लागत आपकी संपत्ति के मूल्य के आधार पर अलग-अलग होगी क्योंकि यह प्रतिशत के मुताबिक चार्ज की जाती है.

जो लोग घर खरीदने की योजना बना रहे हैं उन्हें इन लागतों के बारे में और उन्हें भुगतान करने के तरीके के बारे में जानकारी होनी चाहिए क्योंकि ज्यादातर भुगतान एक बार में ही किये जाते हैं.

होम लोन

अगर आप होम लोन ले रहे हैं तो इस मामले में, ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्कों की जांच करें. ब्याज दरों में 0.05 प्रतिशत की एक छोटी सी भिन्नता का मतलब बहुत हो सकता है, क्योंकि ये बड़े साइज के लोन होते हैं.

रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) लागत

रजिस्ट्रेशन की लागत संपत्ति के मूल्य पर निर्भर करेगी. आमतौर पर, रजिस्ट्रेशन शुल्क और स्टाम्प ड्यूटी 7-10 प्रतिशत के बीच रहती है. ज्यादातर समय स्टैम्प ड्यूटी का भुगतान करने के लिए लगभग 5-7 प्रतिशत माना जाता है, बाकी को रजिस्ट्रेशन शुल्क माना जाता है और यह अदालत में देय होता है. इसके अलावा वकील की फीस, नोटरी फीस इत्यादि जैसे अन्य कई खर्चे भी हैं.

इंटीरियर्स की लागत

बिल्डर्स आपको सिर्फ खाली मकान ही देगा. इंटीरियर डिजाइनिंग और घर के सामान के लिये आपको अतिरिक्त राशि का भुगतान करने के लिए तैयार रहना होगा. इंटीरियर की लागत आपके द्वारा चुने गए सामान की गुणवत्ता और डिजाइन पर निर्भर करेगी.

रखरखाव के लिए जमा एक अपार्टमेंट

कई बिल्डर्स रखरखाव की एडवांस जमा राशि लेते हैं. अब यह भिन्न हो सकता है. ऐसी खबरें थीं कि आजकल बिल्डर्स 10 साल तक रखरखाव अग्रिम शुल्क लेते हैं. जबकि आम तौर पर इसकी प्रवृत्ति 1-2 साल होती है, और हम यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि रिपोर्ट सही है या नहीं. यदि बिल्डर द्वारा प्रदान की जाने वाली उच्च सुविधाएं हैं तो यह एक बड़ी राशि हो सकती है.

किस फ्लोर पर घर है जांच लें

अक्सर जब बिल्डर्स मकान बेचते हैं, तो वे बेस्ट प्राइस पर घर देने की बात करते हैं. हालांकि आपको इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि आप किस फ्लोर पर घर खरीद रहे हैं, क्योंकि आमतौर पर ऊपर के मंजिल के घर नीचे के मंजिल से महंगे होते हैं और इसका पता आपको बाद में चलता है.

पार्किंग क्षेत्र

हां, एक अपार्टमेंट के पार्किंग क्षेत्र को संपत्ति की राशि के साथ नहीं माना जाता है. कुछ बिल्डर्स का कहना है कि पार्किंग क्षेत्र के लिए अलग से भुगतना करना पड़ेगा. इसलिये घर खरीदने से पहले इस बात की पुष्टि कर लें कि पार्किंग क्षेत्र घर के लिये दी गई राशि में शामिल होगा या उसके लिये आपको अलग से भुगतान करना होगा.

प्रोजेक्ट्स में देरी के कारण नुकसान

प्रोजेक्ट्स में देर होना आम बात है, लेकिन इससे ना सिर्फ आपकी चिंता बढ़ेगी बल्कि आपके खर्चे भी बढ़ सकते हैं. यदि संपत्ति लोन पर खरीदी जाती है, तो आप होम लोन पर लागू कर छूट के लिए योग्य नहीं होंगे. आपको संपत्ति किराए पर देने और उस पर आय अर्जित करने के लिए इंतजार करना होगा.

बिना फोन फॉर्मेट किए पाएं वायरस से छुटकारा

आप अपने स्मार्टफोन में न जाने कितने एप्लिकेशन इंस्टॉल करते हैं लेकिन कई बार इनके साथ वायरस को भी बुलावा दे देते हैं. वायरस को फोन से डिलीट करने के ऑप्शन्स तो हैं जिनमें से एक फैक्ट्री रीसेट भी है लेकिन इससे आपके फोन का सारा डेटा डिलीट हो जाता है. लेकिन अब एक ट्रिक है, जिसे फॉलो करके वायरस की वजह से आपको फोन का सारा डेटा नहीं खोना पड़ेगा.
– सबसे पहले फोन में सेफ मोड ऑन करें. इसके लिए फोन ऑफ करें और इस दौरान पावर बटन को दबाकर रखें. जैसे ही फोन का नाम स्क्रीन पर दिखाई देने लगे पावर बटन रिलीज कर दें. इसके तुरंत बाद वॉल्यूम डाउन बटन प्रेस करें और डिवाइस रिस्टार्ट होने के बाद ही वॉल्यूम डाउन बटन छोड़ें. इसके बाद फोन में सेफ मोड दिखाई पड़ने लगेगा.

– इस तरह सेफ मोड ऑन करने के बाद फोन के सेटिंग में जाएं, यहां एप के डाउनलोड ऑप्शन पर जाएं.

– यहां डाउनलोडेड ऐप्स लिस्ट में ऐसी कोई ऐप दिखाई दे रही है जो आपने डाउनलोड नहीं की थी. तो यह वायरस हो सकता है. इस एप को अनइंस्टॉल कर लें.

– अगर इसके बाद भी एप डिलीट न हो तो पहले सेटिंग सिक्योरिटी में डिवाइड एडमिनिस्ट्रेशन में जाकर ऐप एक्टिवेट करें फिर पहले की तरह अनइंस्टॉल करें. आपके फोन से वायरस चला जाएगा.

नहीं रहे पूर्व भारतीय कप्तान अजीत वाडेकर

पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजित वाडेकर (77 वर्ष) का बुधवार रात मुंबई के जसलोक अस्पताल में निधन हो गया. वह लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. वाडेकर की कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में पहली बार टेस्ट मैच और पहली बार टेस्ट सीरीज जीती थी. वाडेकर ने मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी के दौरान भारतीय टीम के मैनेजर के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई थी. बाद में वह मुख्य चयनकर्ता भी बने.

आठ साल के अंतरराष्ट्रीय करियर में बायें हाथ के बल्लेबाज वाडेकर ने कुल 37 टेस्ट मैच खेले. 1971 से 1974 के दौरान उन्होंने 16 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की, जिसमें से चार मैच जीते, चार हारे, जबकि आठ मैच ड्रा रहे. उन्होंने दो वनडे मैच भी खेले और दोनों में भारतीय टीम की कमान संभाली. वनडे क्रिकेट में वह भारतीय टीम के पहले कप्तान थे. हालांकि वनडे कप्तान के रूप में उन्हें दोनों मैचों में हार का सामना करना पड़ा.

उन्होंने टेस्ट में 46, वनडे में एक और प्रथम श्रेणी करियर में 271 कैच लपके. टेस्ट करियर में उन्होंने एकमात्र शतक न्यूजीलैंड के खिलाफ 1968 में वेलिंगटन में लगाया. इस टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने 143 रन बनाए थे. भारत ने यह टेस्ट आठ विकेट से जीता था. वाडेकर चार बार नर्वस नाइंटीज का भी शिकार बने, जिसमें एक बार वह 99 रन पर आउट हुए थे. रणजी ट्राफी में 17 वर्षो के करियर में उन्होंने 73 मैचों में कुल 4288 रन बनाए जिनमें उनका औसत 57.94 था. उन्होंने 1966-67 में मैसूर के खिलाफ रणजी ट्राफी मैच में 323 का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया. उन्होंने 18 दलीप ट्राफी मैच खेले, छह में वह पश्चिम क्षेत्र के कप्तान रहे.

वाडेकर की उपलब्धियां : अजित वाडेकर भारतीय क्रिकेट टीम के पहले कप्तान थे जिन्होंने लगातार तीन टेस्ट सीरीज जीती थीं. इनमें से एक सीरीज वेस्टइंडीज में, एक इंग्लैंड में और एक इंग्लैंड के खिलाफ भारत में खेली गई थी. अजित वाडेकर खिलाड़ी, कप्तान, कोच या मैनेजर और चयन समिति के अध्यक्ष पद पर रहने वाले चुनिंदा लोगों में शामिल थे. उनसे पहले लाला अमरनाथ और चंदू बोर्डे ही यह मुकाम हासिल कर सके थे.

वाडेकर ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का इकलौता शतक (143) न्यूजीलैंड के खिलाफ 1968 के वेलिंगटन टेस्ट में बनाया था. उस टेस्ट में भारत को जीत हासिल हुई थी. अर्जुन अवार्ड और पद्मश्री सम्मान के अलावा उन्हें बीसीसीआइ द्वारा सीके नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया. वाडेकर की कप्तानी में भारत ने जो वेस्टइंडीज में पहली टेस्ट जीत हासिल की थी वह दिग्गज बल्लेबाज सुनील गावस्कर के करियर का पदार्पण टेस्ट था.

यूट्यूब पर छाया ‘पटाखा’ का ट्रेलर, आप भी हो जाएंगे दीवाने

हाल ही में विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘पटाखा’ का ट्रेलर रिलीज किया गया है. यह ट्रेलर इनदिनों काफी चर्चा में है और इंटरनेट पर धूम मचा रहा है. इसमें आपको एंटरटेनमेंट का अच्छा डोज मिलेगा. बता दें कि देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा ने पहले इस फिल्म का पोस्टर शेयर किया था और अब इसका मजेदार ट्रेलर भी शेयर किया है. ट्रेलर को शेयर करते हुए प्रियंका ने लिखा है, ‘मुझे विश्वास नहीं होता कि यह दो सगी बहनों की कहानी है. मैं इनसे मिलना चाहती हूं.’

यह फिल्म दो बहनों की कहानी पर आधारित है, जो हरदम झगड़ा करती रहती हैं. बड़की और छुटकी के रूप में सान्या मल्होत्रा और राधिका मदन की परफौर्मेंस जबरदस्त है. कहानी राजस्थान के एक छोटे से गांव की है. बड़की और छुटकी हमेशा एक-दूसरे से झगड़ा करती हैं, गालियां देती हैं और एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाती हैं. लेकिन जब इनमें से एक की शादी तय हो जाती है तब ये एक हो जाती हैं.

लीड ऐक्टर्स के अलावा इस फिल्म में सुनील ग्रोवर और विजय राज भी हैं. यह मशहूर लेखक चरण सिंह की एक लघु कहानी पर आधारित है. ‘पटाखा’ 28 सिंतबर को सिनेमाघरों में आ रही है

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