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अब किसी भी मोबाइल नंबर का लोकेशन कुछ ऐसे करें पता

इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइट्स हैं जो अनजान नंबर की जानकारी लेने में मदद करती हैं. इन वेबसाइट्स का काम करने का तरीका बेहद आसान है. यहां आपको केवल नंबर एंटर करना होता है जिसकी जानकारी आप चाहते हैं. इसके बाद उस नंबर की पूरी जानकारी आपकी स्क्रीन पर आ जाती है. यहां हम आपको दो ऐसी ही वेबसाइट्स के बारे में बताने जा रहे हैं.

MobileNumberTrackr.com:

सबसे लोकप्रिय फ्री मोबाइल नंबर ट्रैकर में से एक MobileNumberTrackr.com है. यह ट्रैकिंग वेबसाइट भारत की है. यहां से आप केवल मोबाइल नंबर ही नहीं बल्कि लैंडलाइन नंबर भी ट्रेस कर सकते हैं. यह वेबसाइट नोकिया, ब्लैकबैरी, एंड्रौइड और आईफोन डिवासेज के लिए काम करती है. इसमें किसी तरह का कोई चार्ज नहीं लिया जाता है. इससे लैंडलाइन, मोबाइल और व्हीकल नंबर्स की जानकारी ली जा सकती है. इसका इंटरफेस यूजर फ्रेंडली है. इस वेबसाइट्स से केवल भारत के नंबर्स को ही ट्रेस किया जाता है.

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जानें कैसे करें इस्तेमाल:

  • इसके लिए आपको com की वेबसाइट पर जाना होगा.
  • यहां आपको मोबाइल नंबर, व्हीकल नंबर, लैंडलाइन, एसटीडी कोड, आईएसडी कोड और बल्क एसएमएस सेंडर की जानकारी मिलेगी.
  • उदाहरण के लिए: अगर आपको मोबाइल नंबर की जानकारी लेनी है तो आपको Locate Mobile Number में अनजान नंबर एंटर करना होगा. इसके बाद Trace पर क्लिक करें.
  • इसके बाद एक पेज ओपन होगा जिसमें टेलिकौम प्रोवाइडर, सर्कल और सिगनलिंग की जानकारी मिल जाएगी.

Trace Phone Number:

Trace Phone Number भी एक ऐसी वेबसाइट है जो किसी भी नंबर की जानकारी आसानी से उपलब्ध करा देता है. यहां से यूजर्स लैंडलाइन और मोबाइल नंबर्स की जानकारी ली जा सकती है. इसका इंटरफेस भी यूजर फ्रेंडली है. यहां फोन नंबर्स का एक बड़ा डाटाबेस है. यहां से किसी भी नंबर की लोकेशन, उसके मालिक और नेटवर्क प्रोडवाइडर की जानकारी मिल जाती है. यह भी फ्री वेबसाइट है. इस वेबसाइट से पुराने, नए और रिप्लेस्ड फोन नंबर्स की जानकारी नहीं मिलती है.

जानें कैसे करें इस्तेमाल:

  • इसके लिए आपको Trace Phone Number की वेबसाइट पर जान होगा.
  • यहां आपको मोबाइल नंबर एंटर करने के लिए कहा जाए. नंबर एंटर करें.
  • इसके बाद Locate पर क्लिक करें. अब जो पेज ओपन होगा वहां आपको नंबर की जानकारी मिल जाएगी.

फेसबुक पर होगा स्पेनिश फुटबौल लीग का लाइव प्रसारण

अब भारत में फेसबुक पर स्पेनिश फुटबौल लीग मैचों का लाइव प्रसारण किया जाएगा. जी हां, यह सच है, खबर है कि फेसबुक ने स्पेनिश फुटबौल लीग के भारत में प्रसारण अधिकार हासिल कर लिए हैं. दोनों पक्षों ने इस सौदे की पुष्टि की है. इस सौदे के साथ स्पेनिश लीग पहली ऐसी यूरोपीय फुटबौल लीग बन जाएगी, जिसका प्रसारण विशेष रूप से भारत में फेसबुक पर लाइव किया जाएगा. स्पेनिश लीग का प्रसारण भारत, भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मालद्वीप, पाकिस्तान और श्रीलंका में फेसबुक पर नि:शुल्क मिलेगा. भारत में इस चैम्पियनशिप के प्रबंधक जोस कजाका ने इस जानकारी का खुलासा किया. दोनों पक्षों के बीच यह सौदा तीन सीजन के लिए हुआ है और इसकी शुरुआत 17 अगस्त से हो रही है. ‘ग्लोबल लाइव स्पोर्ट्स’ कार्यक्रम में फेसबुक के प्रमुख पीटर हुटोन ने इसकी जानकारी दी.

पीटर ने कहा, “स्पेनिश लीग के दर्शक विश्व स्तर पर फैले हुए हैं और इसमें दो क्लब रियल मेड्रिड और बार्सिलोना को सबसे अधिक समर्थन प्राप्त है. ऐसे में प्रशंसक फेसबुक के स्पेनिश लीग (ला लीगा) पेज पर जाकर किसी भी मैच को देख सकते हैं या फेसबुक पर अपने पसंदीदा क्लब के पेज पर जाकर मैच देख सकते हैं. इसमें किसी भी प्रकार के सब्सक्रिप्शन की जरूरत नहीं होगी.”

लाइव प्रसारण के दौरान प्रशंसकों को विश्व भर में एक ही क्लब के साथी प्रशंसकों के साथ चर्चा का मौका भी मिलेगा, जो सबसे अच्छा फीचर है. पीटर ने कहा, “हम भारत में स्पेनिश लीग की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए मिले अवसर से बेहद खुश हैं. लाइव मैचों के अलावा, प्रशंसकों के स्टूडियो की चर्चा, प्रीव्यू शो और हाईलाइट्स देखने का भी मौका मिलेगा.”

इससे पहले, भारत में स्पेनिश लीग के प्रसारण अधिकार सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्‍स इंडिया के पास थे. सूत्रों के अनुसार, फेसबुक द्वारा दिए गए आंकड़ों से टक्कर के लिए सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्‍स तैयार नहीं है.

स्पेनिश लीग में डिजिटल रणनीति विभाग के प्रमुख अल्फ्रेडो बेरमेजो ने कहा, “हमारे लिए भारत हमारे सबसे अहम बाजारों में से एक है और फेसबुक डिजिटल जगत में फेसबुक सबसे महत्वपूर्ण और पुराने साझेदारों में शामिल है. हम सबसे बड़े मंच के साथ अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचना चाहते हैं.”

अल्फ्रेडो ने कहा, “हम प्रोद्यौगिकी के साथ अपनी प्रसारण रणनीति में सुधार करना चाहते हैं. इसमें प्रोडक्शन, नए कैमरे, नए एंगल और फुटबौल देखने के नए तरीके शामिल हैं. 27 करोड़ लोग फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं और छह करोड़ लोग फुटबौल में रुचि रखते हैं. ऐसे में हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए फेसबुक के रूप में सबसे बेहतरीन फीचर मिला है.”

कहाजा ने कहा, “हमारे लिए भारत में फुटबौल प्रशंसकों को स्पेनिश लीग मैचों के नि:शुल्क प्रसारण देने का इससे बेहतरीन अवसर नहीं मिल सकता. भारत में डिजिटल मंच हमसे जुड़ने के इच्छुक हैं. हमने भारत में डिजिटल मंच का प्रसार देखा है फिर चाहे वह फीफा विश्व कप हो या कोई और भारतीय प्रीमियर लीग. आईपीएल के चार में से एक दर्शक डिजिटल मंच के जरिए मैच देखने में रुचि रखता है. उन्होंने कहा, हम समय से आगे चलना चाहते हैं. ऐसे में हमारा मानना है कि हमारी अपनी जनता तक पहुंचने के लिए यह सबसे बढ़िया तरीका है.”

असफलता आपको अधिक सिखाती है : राजकुमार राव

फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता राजकुमार राव ने लीक से हटकर फिल्में की और अपनी जगह बनायीं, आज हर निर्देशक उन्हें अपने फिल्म में लेना पसंद करते हैं, हालांकि इसे करने में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. कई बार रिजेक्शन का भी सामना करना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी, क्योंकि उन्हें सिद्ध करना था कि वे एक कलाकार हैं और अच्छा अभिनय कर सकते हैं.

मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे राजकुमार राव को दसवीं कक्षा पास करने के बाद ही अभिनय का कीड़ा लग चुका था. उन्होंने स्कूल और कौलेज में जमकर थिएटर किया और पुणे आकर एफटीआईआई में अभिनय का प्रशिक्षण भी लिया. इसके बावजूद भी उन्हें औफर मिलना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने धीरज धरा और आज मुकाम हासिल किया. इस संघर्ष में उनके माता-पिता और प्रेमिका पत्रलेखा का बहुत साथ रहा, जिन्होंने उनकी हमेशा हौसलाअफजाई की. इस समय राजकुमार राव फिल्म ‘स्त्री’ के प्रमोशन पर हैं, उनसे बात करना रोचक था. पेश है अंश.

प्र. आपने पहले भी इस तरह की फिल्में की हैं, उससे ये कितना अलग है?

ये एक हौरर कौमेडी और अलग कहानी है, साथ ही एक संदेश भी देती है, जो आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत जरुरी है. ये दर्शकों को हंसाएगी भी.

प्र. आपकी जिंदगी की ऐसी कौन सी स्त्री है जिससे आपको डर लगता है और आपको दर्द भी दिया है?

मुझे किसी स्त्री से डर नहीं हमेशा प्यार मिला है फिर चाहे वह मेरी मां हो, पत्रलेखा हो या मेरी टीचर्स. दर्द तो कभी भी नहीं मिला. मुझे खुशी है कि आज की महिलाएं आगे आ रही हैं और वे हर काम को कर रही हैं. आये दिन जो हम अखबारों में देखते है, वह भी धीरे-धीरे कम अवश्य होगा, पर थोड़ा समय लगेगा, क्योंकि लोगों का माइंड सेट को बदलने में थोड़ा समय लगता है.

प्र. आप एक साधारण शक्ल सूरत के साथ आउटसाइडर होने पर भी अपनी एक मंजिल बनायी है, इसे कैसे देखते हैं? कितना मुश्किल था?

संघर्ष बहुत था, स्कूल के समय से मुझे अभिनय की इच्छा थी. उसके लिए मैंने मेहनत भी की. तीन साल कौलेज में और उसके बाहर थिएटर किया. अभिनय की ट्रेनिंग भी ली. उसके बाद दो साल मुंबई में संघर्ष किया, बहुत लोगों ने रिजेक्ट किया. जहां भी औडिशन होता था, मैं जाता था, पता चलता था कि मुझे लीड में नहीं, किसी छोटे से चरित्र के लिए कास्ट कर रहे है, क्योंकि मेरी शक्ल हीरो जैसी नहीं है. मायूस होता था, पर मैंने उसे कभी नकारात्मक रूप में नहीं लिया. लगता था कि कोई तो ऐसी फिल्म होगी जिसमें मैं लीड काम कर सकूंगा और हुआ भी, दिबाकर ने मुझे वैसा पाया और पहली फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ मिली. ये सब आसान नहीं था, लेकिन उसमें मजा भी था. बहुत कुछ सीखने को मिला. असफलता आपको अधिक सिखाती है. मैं इस प्रोफेशन को प्यार करता हूं. अभी मेरी पहचान एक अभिनेता के तौर पर हो चुकी है और मैं चाहता हूं कि लोग मुझे उसी रूप में हमेशा देखे अपना प्यार दें.

प्र. पहला ब्रेक आपको कैसे मिला था?

अतुल मोंगिया कास्टिंग कर रहे थे. मैंने उनको अपनी पिक्चर्स भेजे. पहले तो उन्होंने बुलाया नहीं. मैंने दोबारा फोटो भेजे, कई बार औडिशन हुआ और फिल्म मिली. मैं बहुत खुश था कि मुझे दिबाकर बैनर्जी की फिल्म करने को मिल रही है. इस दौरान डरा हुआ भी था कि अगर मुझे मौका नहीं मिला, तो फिर से जीरो लेवल से मुझे मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन अंत में मुझे मौका मिला.

प्र. आपने पहली कमाई को कैसे खर्च किया?

इतना कुछ मिला ही नहीं था कि मैं कहूं कि कैसे खर्च किया, लेकिन हां जितना मिला उससे मुझे खुशी बहुत अधिक मिली थी.

प्र. आपके यहां तक पहुंचने में परिवार का कितना सहयोग था?

सहयोग परिवार का ही था. मेरी मां को विश्वास था कि एक दिन मैं सफल होऊंगा. वित्तीय और मानसिक रूप से उन्होंने बहुत सहयोग दिया है. मेरी मां ने कभी ये नहीं कहा कि तुम कैसे भी पैसे कमाओं. दो साल तक उन्होंने सहयोग दिया. तभी मैं यहां तक पहुंच पाया हूं.

प्र. आपने कई बड़े-बड़े निर्देशकों के साथ काम किया है, क्या इसे आप चुनते हैं या मिल जाता है?

अभी मैं चुन सकता हूं, पहले ऐसा नहीं था. असल में मैं निर्देशक से अधिक कहानियों के साथ काम करता हूं. उसके साथ लोग जुड़ते है. इससे मुझे ग्रो करने का बहुत मौका मिला.

प्र. किस फिल्म ने आपकी इमेज को बदला?

फिल्म ‘बरेली की बर्फी’ ने मेरी इमेज को बदला. उस फिल्म ने यह दिखा दिया कि मैं कौमेडी फिल्म भी कर सकता हूं, जबकि इससे पहले लोग मेरे सीरियस लुक से ही परिचित थे. अलग-अलग चरित्र मैं निभाना पसंद करता हूं और कर रहा हूं.

प्र. आप कितने फूडी हैं?

मुझे इंडियन फूड बहुत पसंद है. जिसमें घर का खाना मैं अधिक खाता हूं.

प्र. स्टारडम को आप कैसे लेते हैं?

मैं इसलिए अभिनय के क्षेत्र में आया, क्योंकि मैं इस प्रोफेशन से प्यार करता हूं. मैं यहां अपने आपको बदलने नहीं आया. इसे करने में मुझे बहुत मजा आता है और मैं अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक कैमरे के सामने रहना चाहता हूं.

प्र. सोशल मीडिया पर कितना एक्टिव हैं?

मैं सोशल मीडिया पर अधिक एक्टिव नहीं, पर ये एक पावरफुल मीडियम है, जिसके द्वारा कोई भी अपनी बात रख सकता है और ये अच्छा माध्यम है.

प्र. छोटे शहर से आने वाले यूथ को क्या मेसेज देना चाहते हैं?

उनके लिए इतना ही कहना चाहूंगा कि इंडस्ट्री बहुत बड़ी है, यहां सबको काम मिलता है, पर मेहनत अधिक करनी पड़ती है और धीरज रखना पड़ता है. अगर आप में प्रतिभा है, तो काम अवश्य मिलता है.

रवि शास्त्री ने भारतीय टीम को निराशा से उबरने के दिये टिप्स

टीम इंडिया के इंग्लैंड दौरे की टेस्ट सीरीज का तीसरा मैच शनिवार को नौटिंघम में शुरू हो रहा है. पहले दो मैचों में हार झेल कर आलोचकों के निशाने पर आने वाली भारतीय क्रिकेट टीम को मुख्य कोच रवि शास्त्री ने गुरुवार को अपने साथियों को खुद को भरोसा रखने की सलाह दी. भारत इस समय इंग्लैंड के दौरे पर पांच मैचों की टेस्ट सीरीज में हिस्सा ले रही है जिसके शुरुआती दो मैचों में उसे हार का सामना करना पड़ा है.

अभी तक खेले दो मैचों में सिर्फ कप्तान विराट कोहली ही बल्ले से अपना जौहर दिखा पाए हैं बाकी बल्लेबाज पूरी तरह से विफल रहे हैं. शास्त्री का हालांकि मानना है कि हालात के कारण दोनों टीमों के बल्लेबाजों को परेशानी हुई है. शास्त्री कुछ भी कहें लेकिन टीम इंडिया की बल्लेबाजी की कमजोरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इतना तो वे भी बखूबी समझते होंगे.

बल्लेबाजों को करना पड़ा है संघर्ष

यहां एक संवाददाता सम्मेलन में शास्त्री ने कहा, “किसी एक खिलाड़ी के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. दोनों टीमों के बल्लेबाजों को संघर्ष करना पड़ा है.” उन्होंने कहा, “यह मानसिक तौर पर तैयारी करने की बात है. आप इस मामले पर दिमागी तौर पर कैसे सोचते हो और आने वाले टेस्ट मैचों में जहां तक बल्लेबाजों की बात है तो मानसिक अनुशासन की बेहद जरूरत है.” शास्त्री ने कहा कि उनकी टीम को अगले मैच में वापसी करनी है तो खिलाड़ियों को मानसिक अनुशासन की जरूरत है.

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शास्त्री ने कहा, “अभी तक सीरीज में परिस्थतियां काफी मुश्किल रही हैं, लेकिन यहीं आपकी परीक्षा होती है और मानसिक अनुशासन काम में आता है. आपको पता होना चाहिए की आपका औफ स्टम्प कहां है. कौन सी गेंदें छोड़नी हैं.” शास्त्री ने कहा, “टीम को अपने आप में विश्वास रखने की जरूरत है. आप इस तरह की स्थिति में पहले भी कई बार फंसे हो और अच्छी प्रतिक्रिया दी है. एक चीज साफ है, टीम में किसी प्रकार की नकारात्मकता नहीं है. लौर्ड्स में हालात पक्ष में थे लेकिन हार के लिए कोई बहाना नहीं. यह किसी भी टीम के साथ हो सकता है. इस टीम में कोई नकारात्मकता नहीं है.”

यह हाल रहा था बल्लेबाजों का

कप्तान विराट कोहली को छोड़कर शीर्ष और मध्य क्रम की बुरी नाकामी इस समय टीम प्रबंधन के लिए चिंता का विषय जरूर होगा. टीम प्रबंधन के पास चयन को लेकर भारी दुविधा होगी क्योंकि उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. पहले टेस्ट में  26 और 13 रन बनाने वाले शिखर धवन की जगह चेतेश्वर पुजारा टीम में शामिल किए गए तो वे भी नाकाम ही रहे. पुजारा लौर्ड्स टेस्ट में केवल 11 और 17 रन ही बना सके. वहीं केएल राहुल जो हैं, पहली बार इंग्लैंड में कोई टेस्ट सीरीज खेल रहे है, इंग्लैंड में चार पारियों में 4,13, 8 और 10 ही बना सके. प्रबंधन ने राहुल पर काफी भरोसा जताया था. वहीं 2014 की सीरीज में इंग्लैंड में पहले ही  टेस्ट में 146 रनों की पारी खेलने वाले मुरली विजय दूसरे टेस्ट की दोनों ही पारियों में शून्य पर आउट हो गए जबकि पहले टेस्ट में वे 26 और 6 रन ही बना सके थे.

विराट की फिटनेस पर शुक्रवार को हो सकता है फैसला

विराट के सामने पहले अपनी फिटनेस की चुनौती है, पीठ दर्द से निपटने की चुनैती है. लौर्ड्स टेस्ट के चौथे दिन विराट पहले सत्र में मैदान में दिखाई नहीं दिए थे. तभी उनके पीठ दर्द के बारे में पता चला था. दूसरे सत्र में वे बल्लेबाजी करने जरूर आए लेकिन केवल 17 रन बनाकर चल दिए थे. अभी तक उनके तीसरे टेस्ट के लिए फिट होने की पुष्टि नहीं की गई है.

वि‍देश यात्रा पर जाने से पहले कराएं ट्रेवल इंश्योरेंस, होंगे यह फायदे

वि‍देश यात्रा पर जाने से पहले लोग काफी तैयारियां करते हैं.यह समय कितना भी रोमांचक क्यों न हो, पर्यटकों को अपनी विदेश की यात्रा की योजना बनाते समय पहले से अधिक सावधान रहने और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है. विदेश में परेशानी से बचने के लिए एक अच्छा ट्रेवल इंश्योरेंस आपकी सूची का एक अ‍हम हिस्सा होना चाहिए. ट्रेवल इंश्‍योरेंस को नजर अंदाज ना करे, यह एक अतिरिक्‍त खर्च नहीं बल्‍क‍ि आपकी विदेश की यात्रा के लिए बहुत जरूरी है.

मेडिकल इमरजेंसी

आप अपनी यात्रा के दौरान कम से कम किसी गंभीर परेशानी के कारण उसके इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होने के खर्च के अलावा अन्य मेडिकल खर्च को आप अक्सर अपनी यात्रा सूची में शामिल नहीं करते होंगे. लेकिन अगर ऐसा होता है और आपने इंश्योरेंस लिया है तो इंश्योरेंस कंपनी इंश्योरेंस की रकम तक इस तरह के खर्च उठा लेगी. कुछ वीजा जैसे शेनजेन के लिए आपको एक मेडिकल इंश्योरेंस लेना जरूरी है. मेडिकल इमरजेंसी इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि विदेश में मेडिकल खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है.

ट्रांसपोर्ट संबंधी संकट

यात्रा के दौरान के लिए इंश्योरेंस लेने का शायद सबसे महत्‍वपूर्ण कारण ट्रांसपोर्ट संबंधी संकट है. कम लागत वाली फ्लाइटों और हमेशा जाम रहने वाली एयर ट्रैफिक अनुसूचियों के कारण, कैंसलेशन और देरी एक आम घटना बन गई है. इस तरह के संकट के लिए मुआवजा पाने के लिए, एक ऐसा ट्रेवल इंश्योरेंस लेना जरूरी है जो इस तरह के खर्च को कवर करता हो. हम आपको बता दें कि जबकि अधिकांश प्लान सिर्फ फ्लाइटों के लिए भुगतान करते हैं, लेकिन कुछ प्लान ऐसे भी हैं जो ट्रेन और फेरी संबंधी देरी और कैंसलेशन को भी कवर करती है.

किसी तरह का सामान गुम जाएं तो

यदि आपका पासपोर्ट गुम हो जाय तो आपको विदेश में जारी किया गया एक डुप्लीकेट पासपोर्ट हासिल करना पड़ेगा और उस देश की मुद्रा में उसके लिए भुगतान भी करना पड़ेगा. आपके इंश्योरेंस द्वारा कवर किए जाने पर, इस तरह के खर्च को आपकी इंश्योरेंस कंपनी संभाल लेगी. इसके अलावा, यदि आपका सामान गुम हो जाता है या मिलने में देरी होती है और आपके पास एक भी कपड़ा नहीं है तो कुछ प्लान में आपको काफी मदद किया जाता है और यदि यह स्थायी रूप से गुम हो जाता है तो आपको एक निश्चित राशि तक इसका मुआवजा भी दिया जाएंगा.

इमरजेंसी के दौरान

दूरदराज के स्थानों से गंभीर मेडिकल सहायता या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान निकासी के मामले में इमरजेंसी निकासी काफी महंगा साबित हो सकता है. बता दें कि कुछ प्लान, राजनीतिक अस्थिरता के दौरान निकासी को भी कवर करते हैं लेकिन युद्ध या आतंकवाद के परिणामस्वरूप कोई दुर्घटना होने पर उसे कवर नहीं किया जाएगा.

इन बातों पर ध्‍यान दें

इंश्‍योरेंस कंपनी का चयन करते समय कुछ बातों का ध्‍यान देना बाकई बहुत जरूरी है.

सिर्फ पौलिसी लेने वाले व्यक्ति को ही कवर किया जाएगा. तो बता दें यदि आप अपने परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं तो आपको अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए इंश्योरेंस लेना अनिवार्य है.

हमेशा इस बात की जांच कर लें कि किन-किन एयरलाइनों और ट्रेनों को इंश्योरेंस कंपनी के कवरेज से बाहर रखा गया है.

वहीं इस बात से भी अवगत करा दें कि ट्रेवल इंश्योरेंस किसी भी देश के लिए किसी ऐसे प्रकार के खर्च को भी कवर नहीं करेगा जिसे सरकार द्वारा एक नो विजिट जोन या डेंजर जोन घोषित किया गया है.

इंश्योरेंस कंपनियां संभवतः ऐसे देशों के लिए इंश्योरेंस के लिए आवेदन को अस्वीकार कर देंगी.

मेडिकल और निकासी का खर्च, कैशलेश तरीके से प्राप्त नहीं हो सकता है. इसके प्रतिपूर्ति तब की जाएगी जब आप अपने देश वापस लौटने के बाद संबंधित बिल दिखाएंगे.

रुपये में हो रही गिरावट चिंता का विषय नहीं : नीति आयोग

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि डौलर के मुकाबले रुपये में गिरावट को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि रुपया अपनी स्वाभाविक मूल्य स्थिति में लौट रहा है. वह यहां नाबार्ड के एक कार्यक्रम से अलग पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे. कुमार ने कहा कि पिछले तीन साल में रुपया 17 प्रतिशत बढ़ा है.

जबकि इस साल की शुरुआत से रुपया 9.8 प्रतिशत गिरा है. इसलिये यह अपने स्वाभाविक मूल्य की तरफ लौट रहा है. राजीव कुमार ने कहा कि रुपये का मूल्य वास्तविक तौर पर तय होना चाहिए न कि इसे अत्याधिक बढ़ा दिया जाना चाहिए.

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सबसे निचले स्तर पर पहुंचा रुपया

विनिमय दर वह मानक है जो मांग और आपूर्ति के बीच सही संतुलन को दर्शाता है. कुमार ने कहा कि लोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि रुपये में मजबूती बेहतर अर्थव्यवस्था का संकेत है. जब उनसे पूछा गया कि रुपये में गिरावट चिंता का विषय है या नहीं तो उन्होंने कहा, ‘एक हद तक नहीं.’ गौरतलब है कि गिरावट के दौर को जारी रखते हुए डौलर के मुकाबले रुपया गुरुवार को 43 पैसे और गिरकर 70.32 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया.

हालात 2013 के मुकाबले काफी अच्छे

इससे पहले आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में रुपये की गिरावट पर कहा कि रुपये में गिरावट चिंता का विषय नहीं है. उन्होंने कहा कि एमर्जिंग मार्केट्स के हालात 2013 के मुकाबले काफी अच्छे हैं. इसलिए रुपये के गिरने से कोई खतरा नहीं है. दरअसल, भारत में महंगाई दर दुनिया के मुकाबले ज्यादा है, ऐसे में रुपये में थोड़ी और कमजोरी देखने को मिल सकती है. उन्होंने कहा कि हालात बेहतर होने के लिए रुपये में और कमजोरी आनी चाहिए.

औनर किलिंग की भेंट चढ़ते प्रेमी युगल

‘‘तुम चिंता मत करो, पोन्नी. तुम्हारे परिवार वाले क्या कर सकते हैं. अधिक से अधिक वे थोड़ी मारपीट ही तो करेंगे, मगर फिर कुछ दिनों बाद हमारे रिश्ते को स्वीकार कर लेंगे. तुम कल सुबह मुझे 6 बजे तक जरूर उठा देना,’’ ये अंतिम शब्द थे केविन जोसेफ के, जो उस ने 27 मई की रात को अपनी गर्लफ्रैंड नीनू से कहे थे. इस के बाद केविन ने फोन ही नहीं उठाया. कई घंटे बाद नीनू को पता चला कि उस के घर वालों ने केविन का अपहरण कर लिया है. 28 मई की सुबह उस की तैरती हुई लाश एक नहर से बरामद हुई. स्थानीय लोगों की मदद से निकाले गए केविन के शव पर चोटों के कई गंभीर निशान थे. साफ था कि केविन की मौत डूबने से नहीं, बल्कि उस की हत्या की गई थी. इस तरह 23 साल का एक दलित ईसाई युवा, औनर किलिंग की भेंट चढ़ गया. वैसे केरल में इस तरह के मामले कम ही देखने को मिलते हैं मगर बात जब जाति और रुतबे की हो तो केरल जैसा साक्षर राज्य भी इस में पीछे नहीं रहता.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 की तुलना में 2015 में औनर किलिंग के मामलों में 796 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया. देश में हुईं कुल 251 औनर किलिंग की घटनाओं में उत्तर प्रदेश 168 मामलों के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि केरल में सिर्फ 5 मामले ही प्रकाश में आए. नीनू और केविन का प्यार जाति, धर्म, रुतबे सब से ऊपर था. उन्होंने एकदूसरे का दिल देख कर रिश्ता जोड़ा था, खुशहाल जिंदगी के सपने संजोए थे, पर उन्हें नहीं मालूम था कि उन की खुशी के दुश्मन उन के अपने ही बन जाएंगे.

पहली मुलाकात वर्ष 2016 में नीनू ने कोट्टायम में अमलगिरी के बी के कालेज में जिओलौजी और वाटर मैनेजमैंट के ग्रैजुएशन कोर्स के लिए दाखिला लिया था. यह कालेज उस के घर से 100 किलोमीटर दूर था. कोर्स जौइन करने के 2 महीने बाद उस की केविन से मुलाकात हुई. केविन प्रोफैशनली एक मैकेनिक था. केएसआरटीसी के बसस्टैंड पर दोनों की नजरें मिलीं. नीनू अपनी सहेली के साथ कोल्लम के लिए बस लेने पहुंची थी जबकि केविन अपने दोस्त के साथ वहां आया था. केविन का दोस्त नीनू की सहेली को सीऔफ करने पहुंचा था.

इस मुलाकात के बाद नीनू और केविन को आपस में एक कनैक्शन महसूस हुआ और वे फोन पर बातें करने लगे. जल्दी ही उन की इतनी गहरी दोस्ती हो गई कि वे घंटों एकदूसरे से फोन पर बातें करते रहते. इसी दौरान केविन ने उसे प्रोपोज कर दिया तो नीनू को लगा जैसे अब उस का सपना सच हो जाएगा. हालांकि दिल ही दिल में वह डर भी रही थी. उसे मालूम था कि इस रिश्ते को ले कर उस के परिवार वाले बेहद नाराज होंगे.

3 वर्षों तक केविन और नीनू एकदूसरे के साथ प्यार के खूबसूरत बंधन में बंधे रहे. वे जब भी मिलते, सुनहरे जीवन के सपने देखते. इस साल मई में उन के जीवन में तब उथलपुथल मची जब नीनू के अभिभावकों ने उस की प्रोफाइल एक मैट्रिमोनियल साइट पर डाल दी ताकि जल्द से जल्द उस के लिए वर की तलाश की जा सके. इस के बाद नीनू और केविन ने तय किया कि वे अब एकदूसरे से दूर नहीं रहेंगे और जल्दी ही शादी कर लेंगे. 26 मई को इन की जिंदगी की कहानी में नया मोड़ आया जब नीनू के अभिभावक गांधीनगर पुलिस स्टेशन पहुंचे और बेटी की गुमशुदगी का मामला दर्ज करा दिया. एक अजीब सा माहौल पैदा हो गया. धोखे से नीनू और केविन को पुलिसस्टेशन बुलाया गया. नीनू के पेरैंट्स जोरजबरदस्ती नीनू को खींच कर घर ले जाने लगे. काफी जद्दोजेहद और स्थानीय लोगों के बीचबचाव से मामला थोड़ा ठंडा हुआ.

नीनू ने अपने पेरैंट्स से दृढ़ता से कहा कि वह 21 साल की हो गई है और उस की मरजी के खिलाफ घर वाले उसे कहीं नहीं ले जा सकते. पुलिस ने समझौता कराते हुए केविन से एक कागज पर साइन कराया. नीनू को वापस होस्टल भेज दिया गया जबकि केविन को रिश्तेदारों के पास जाने की इजाजत दी गई. उस रात नीनू ने फोन पर केविन से आखिरी बार बातचीत की. बाद में पता चला कि नीनू के रिश्तेदारों द्वारा भेजे गए 10 लोगों के ग्रुप, जिस में उस का अपना भाई शानू भी शामिल था, ने केविन और उस के दोस्त का अपहरण कर लिया. दोस्त 2-3 घंटे के अंदर किसी तरह निकल आया, मगर केविन का कोईर् पता नहीं चला. नीनू, केविन के परिजनों और दोस्तों ने उसे पागलों की तरह हर जगह ढूंढ़ा. फिर वे उस की गुमशुदगी का केस दर्ज कराने पुलिसस्टेशन गए. मगर यहां भी निराशा ही हाथ लगी. पुलिस ने उदासीनता दिखाते हुए उन्हें इंतजार करने को कहा.

उस दिन जिले में राज्य के मुख्यमंत्री के दौरे की वजह से पुलिस वाले व्यस्त थे. नीनू ने जब एक टैलीविजन चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में पुलिस की इस लापरवाही का जिक्र किया तो लोगों में आक्रोश की आग फैल गई. लोगों ने गांधीनगर थाने को घेर लिया. तब जा कर सरकार की नींद टूटी और इस पर तुरंत कार्यवाही शुरू की गई. 12 घंटे के अंदर केविन का शव बरामद कर लिया गया. नीनू का जीवन लुट चुका था. उस की आंखों से बहते आंसुओं में दर्द इस बात को ले कर भी था कि मुख्यमंत्री को सुरक्षा प्रदान करने के नाम पर पुलिस ने लापरवाही न की होती तो शायद केविन को जिंदा खोजा जा सकता था.

इस घटना के मद्देनजर कोट्टायम पुलिस अधीक्षक मोहम्मद रफीक का ट्रांसफर कर दिया गया और गांधीनगर पुलिसस्टेशन के उपनिरीक्षक एम एस शिबू को सस्पैंड कर दिया गया. मैं अपने इचा के लिए लडं़ूगी

नीनू प्यार से केविन को इचा पुकारती थी तो केविन उसे पोन्नी कहता था. फिलहाल नीनू का भविष्य अनिश्चित है. वह अभी भी गम में डूबी हुई है और इस बात को ले कर पसोपेश में है कि उसे वापस कालेज जाना है या नहीं. मगर एक बात जो उस ने मजबूती से तय कर रखी है वह है इंसाफ के लिए लड़ाई. वह उन लोगों के खिलाफ कानूनी जंग जारी रखेगी जिन्होंने उस के सपनों के राजकुमार को मौत की नींद सुलाया. वह कहती है, ‘‘अब मैं उन्हें अपने मातापिता के रूप में नहीं देखती. वे मुझे बुलाएंगे तो भी वापस नहीं जाऊंगी. मेरे केविन के लिए यह मेरी लड़ाई है. केविन के मांबाप और बहन का खयाल रखूंगी और उन के साथ ही रहूंगी. उन्होंने खुलेदिल से मेरा स्वागत किया और मैं उन के साथ ही सुरक्षित महसूस करती हूं. भले ही आधिकारिक तौर पर हम ने शादी नहीं की थी मगर मैं उसे अपना पति मानती हूं और उस के परिवार को अपना परिवार.’’

सितम और भी हैं चाको, नीनू के पिता जो फिलहाल जूडिशियल कस्टडी में हैं, ने कोर्ट से कहा कि उस की बेटी को शैल्टर होम भेज दिया जाए. उस ने अपनी याचिका में इस बात का दावा किया कि उस की बेटी का मानसिक इलाज तिरुअनंतपुरम के अनंतपुरी अस्पताल में चलता रहा है, इसलिए उसे एक अजनबी के घर से तुरंत शिफ्ट करने की जरूरत है. मगर नीनू ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है.

नीनू कहती है, ‘‘मेरे पिता कैसे कह सकते हैं कि मैं मानसिक रूप से बीमार हूं? मैं ने कभी यह उम्मीद नहीं की थी. जब मैं 9वीं कक्षा में थी तो मुझे वे एक काउंसलर के पास ले गए थे. मुझ से बात करने के बाद काउंसलर ने कहा कि यह तो बिलकुल ठीक है, काउंसलिंग की जरूरत तो आप लोगों को है.’’ नीनू याद करते हुई बताती है कि उस के घर की दीवारों ने उस के मातापिता के बीच की लड़ाइयां सालों देखी हैं. वे अकसर गुस्से में रहते थे और कई दफा नीनू को भी चोट पहुंचाते. उसे छड़ी से बुरी तरह पीटा जाता. समय के साथ जब नीनू ने इस के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की तो वे उसे काउंसलर के पास

ले गए. नीनू को कोल्लम में बचपन में अपने दादा के घर बिताए दिनों की यादें भी ताजा हो आती हैं. उस दौरान कई दूसरे जोड़ों की तरह उस के मातापिता भी मध्यपूर्व में काम करते थे, जबकि नीनू और उस का भाई शानू अपने दादादादी के साथ रहते थे. दादादादी उन्हें बहुत प्यार करते थे. तब वह अपने भाई के भी बहुत करीब थी. जब नीनू 5वीं कक्षा में थी तो उस की मां वापस आई और दोनों भाईबहनों को अपने साथ ले गई.

धीरेधीरे घर में कलह शुरू हुई और उस का भाई शानू भी उस के लिए अजनबी बनता गया. स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद वह उच्चशिक्षा के लिए दूसरी जगह चला गया, फिर नौकरी भी वह दूसरे शहर में करने लगा. उसे नीनू के सपनों और केविन के साथ रिश्ते की पहले से कोई खबर नहीं थी. जाति और रुतबा

नीनूकेविन मामले में खास बात यह है कि नीनू के मातापिता ने खुद लवमैरिज की थी. अलगअलग धर्मों के होने के बावजूद उन्होंने प्यार किया और फिर शादी भी की. मगर अपनी बेटी के प्यार को ले कर वे कट्टर हो गए. नीनू के पिता चाको ने उस की मां राहना, जो एक मुसलिम महिला थी, से शादी करने की खातिर अपना परिवार भी छोड़ दिया था. हैरत की बात यह है कि नीनू का भाई और केविन की हत्या का मुख्य आरोपी शानू ने भी लवमैरिज ही की थी. जाहिर है कि नीनू का परिवार लवमैरिज के विरोध में नहीं था. एकमात्र वजह थी, जाति और आर्थिक स्तर में अंतर. केविन के पिता चेरामार यानी दलित ईसाई हैं जिन्हें धर्म परिवर्तन करा कर ईसाई बनाया गया. वे आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं जबकि नीनू के पिता ऊंची जाति के रईस ईसाई हैं.

नीनू को अपने पिता के प्रोफैशन के बारे में पूरी तरह से मालूम नहीं है. उस के पिता कई साल खाड़ी देश में रह आए थे. उन की कोट्टायम में बहुत संपत्ति है. 2 स्टेशनरी की दुकानें हैं, जबकि मां सिलाई केंद्र चलाती थी. पिता अपनी बेटी की शादी किसी पैसे वाले से करवाना चाहते थे. चर्च में भेदभाव

जाति आधारित भेदभाव और छुआछूत चर्च में भी मौजूद है. दलित ईसाइयों को केरल के ज्यादातर ऊंची जाति के ईसाइयों यानी सिरीयन से शादी की इजाजत नहीं है. सिरीयन इस बात पर यकीन करते हैं कि उन के पूर्वज ब्राह्मण थे. एक समय में जब जाति उत्पीड़न ऊंचाइयों पर था, दलितों व निचली जाति के लोगों को ब्राह्मणों से छिपना पड़ता था. उन की छाया भी निचली मानी जाती थी. हालत कमोबेश आज भी वही है. कई चर्चों में तो दलित ईसाइयों का जाना मना है. यही नहीं, मृत्यु के बाद दलित ईसाइयों को उस सेमिटिरी में दफनाने की इजाजत नहीं है जहां ऊंची जाति के ईसाइयों को दफनाया जाता है.

केविन और नीनू का केस कोई अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है. उन की तरह धर्म, जाति या संपन्नता में फर्क होने की वजह से बहुत से अभिभावकों ने अपने बच्चों की शादी में बाधाएं डालीं, हस्तक्षेप किया. कुछ महीने पहले 21 साल की अथिरा, एझावा (ओबीसी) समुदाय की लड़की को शादी से एक रात पहले उस के पिता द्वारा मार दिया गया. वह उत्तर प्रदेश में तैनात सैनिक ब्रजेश से शादी करना चाहती थी. उस के पिता और भाई ने इस विवाह का विरोध किया क्योंकि बृजेश दलित था. पिता ने शराब के नशे में आपे से बाहर हो कर बेटी को मार डाला.

ऐसे एकदो नहीं, बल्कि कई उदाहरण हैं जहां अभिभावकों ने अपनी बेटियों को तथाकथित लवजिहाद रिश्तों से बाहर निकालने के लिए गंभीर सजाएं दीं. औनर किलिंग का अर्थ है किसी व्यक्ति का अपने ही परिवार के सदस्यों द्वारा परिवार की इज्जत के नाम पर की गई हत्या.

केरल में औनर किलिंग का सच भले ही केरल को कितना भी विकसित और शिक्षित राज्य कहा जाए मगर इस मामले में वह भी अलग नहीं है. वहां के लोगों की सोच भी अभी पिछड़ी हुई ही है. दूसरे राज्यों की तरह ही पितृसत्तात्मक ढांचा और पुरुषों की तानाशाही वहां भी बरकरार है. स्त्रियों को अब भी अपनी जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दों जैसे जीवनसाथी का चुनाव आदि पर खुद फैसला लेने का अधिकार नहीं है. हमेशा से यह फैसला घर के पुरुष सदस्यों का ही होता है. 2005 में केरल में महिलाओं की शादी की औसत उम्र 22.9 साल थी, जबकि 2014 में यह गिर कर 21.4 वर्ष हो गई.

युवा हो कर युवतियों को अभिभावक, खासकर पिता और भाई की तानाशाही सहनी पड़ती है. यदि वे दिल की सुन कर किसी के साथ जुड़ना चाहती हैं तो कभी धार्मिक पवित्रता तो कभी जाति या स्टेटस के नाम पर घर वाले उन के प्रति हिंसक हो उठते हैं. समान नागरिकता के लाख दावों के बावजूद महिलाओं को एक इंसान मानने के बजाय महज घर की इज्जत का नाम दे कर उन से इस तरह का सुलूक किया जाता है. केविन जोसेफ और नीनू चाको की यह कहानी केरल के मानवीय मूल्यों के गिरते स्तर को दर्शाती है.

सिर्फ केरल ही क्यों, पूरे देश में आएदिन इस तरह के उदाहरण देखने को मिलते हैं. यह कितनी शर्मनाक बात है कि हम सभ्यता के विकास के चरम पर तो हैं मगर जाति, धर्म और स्टेट्स के नाम पर ऐसी हरकतें कर अपनी जंगली और वहशी मानसिकता का परिचय देते रहते हैं. प्रेम एक ऐसा एहसास है जो जाति और धर्म पूछ कर नहीं किया जाता या नहीं होता. यह दिल से दिल का सफर है जिसे किसी भी तरह के बंधन बांध नहीं सकते. चाहे जितने भी प्रेमी जोड़े औनर के नाम पर मार दिए जाएं, प्रेम की आग कभी बुझ नहीं सकती.

देह पवित्रता : अग्निपरीक्षा युवती के लिए ही क्यों

कुछ समय पहले एक दैनिक अखबार में खबर छपी थी जिस का शीर्षक था, ‘बेवजह पत्नी को जान से मार डाला’ और फिर उस समाचार का ब्योरा था कि उस स्त्री का किसी से संबंध था. और फिर किसी फिल्मी कहानी की तरह घटना चलती है. अखबार के भीतरी पृष्ठ के एक कोने में छपा यह एक छोटा सा समाचार था, जबकि यह घटना इतनी छोटी नहीं थी. एक पूरी की पूरी पृष्ठभूमि, सामाजिक आर्थिक संरचना भी उस के साथसाथ चलती है. वह संरचना है समाज द्वारा बनाए गए नियमों की, जिस की गिरफ्त में महिलाएं जकड़ी होती हैं. युवती सात फेरे लगवा कर पत्नी तो बन जाती है लेकिन क्या कोई उस से यह जाननेपूछने की कोशिश करता है कि क्या वह उस पुरुष के साथ जीवनभर बंधने को तैयार है?

देह जब नर देह या मादा देह होती है तो संसार के माने बदल जाते हैं. नर और मादा के इस विभेदीकरण के साथसाथ ही सोच के भी सारे समीकरण बदल जाते हैं, मान्यताओं की सीमारेखाएं बदल जाती हैं, नियमों के बंधन बदल जाते हैं. व्यक्तिगत, समाजगत, संसारगत मान्यताओं व अवधारणाओं में यह परिवर्तन तब तो और भी लक्षित होता है जब यह देह नारीदेह के रूप में परिभाषित होती है.

युवती नहीं सराय या धर्मशाला हो

देह का सब से ज्यादा सरलीकरण पौराणिक काल से ले कर अब तक नगरवधुओं, देवदासियों और अब वेश्याओं के रूप में किया जा चुका है, जहां उसे सार्वजनिक उपभोग की वस्तु बना दिया गया है, मानो वह युवती नहीं, सराय या धर्मशाला हो जहां हर कोई अपना पड़ाव डाल सके. उस पर सभी का अधिकार है, पर उस का किसी पर हक नहीं. इस भोग और उपभोग से उत्प्रेरित समाज आज इतना विकृत हो चुका है कि इन युवतियों के अंदर भी कोई युवती होती है जिस की अपनी इच्छाआकांक्षा होती होगी, यह कोई भी सोचना तक नहीं चाहता.

शास्त्रोंपुराणों में स्त्रियों की व्याख्या इस श्रेणी की औरतों की स्थितियां अलग से बहस का विषय हैं. उन औरतों की स्थिति के बारे में देखें जो घर की चारदीवारी में जन्मती हैं, पलती हैं, बढ़ती हैं, एक दहलीज लांघ कर दूसरी दहलीज में प्रवेश करती हैं और अपनी दहलीज समरूप होने तक वहां रहती हैं.

शास्त्रों व पुराणों में महिलाओं की अलगअलग तरह से व्याख्या की गई है. नायिका के रूप में वह मुग्धा, प्रौढ़ा है तो इस से इतर वह देवी, मां, सहचरी, प्राण है. वह बेटी से ले कर मां तक के बीच की यात्रा करती है और इस यात्राक्रम के अपने विभिन्न रूपों बहन, पत्नी आदि के कर्तव्यों का निर्वाह करती चलती है. हमारे शास्त्रों में भी इस धर्मनिर्वाह की चर्चा है, जिस का अभिप्राय है कि महिला को खिलाते समय मां का, स्नेह करते समय बहन का और शयन के समय रंभा का रूप धारण करना चाहिए. यह भी कि पति, पिता, पुत्र आदि के लिए निर्धारित किए गए धर्मों का पालन करने वाली महिलाएं सदा खुशहाल रहती हैं और उन का घरपरिवार धनधान्य से परिपूर्ण रहता है.

महिला से की जाती है वंशवृद्धि की अपेक्षा ध्यान देने योग्य बात यह है कि धनधान्य की यह समृद्धि उन के घरपरिवार के लिए है. यह किसी ने भी नहीं सोचा कि उस परिवार में उस महिला की भी कोई पहचान है जो अपनी कोख व सिंदूर को बनाए रखने की भीख मांगती रहती है, जो व्रतत्योहार के नाम पर यज्ञ की सूखी समिधा सी चिटकती होम होती रहती है. जो महिला घर में खुद जूठा और बासी भोजन कर घर के पुरुषों को ताजा भोजन करवाती है, उस की गिनती कहीं नहीं होती. महिला को वंशवृद्धि के लिए भी याद किया जाता है.

नियमों की गिरफ्त में युवतियां युवती पत्नी बन कर पत्नी के सारे कर्तव्य निभाती है, घर के हर सदस्य खासकर पति की हर इच्छा को सर्वोपरि मान कर चलती है, लेकिन उस से यह पूछना कतई आवश्यक नहीं समझा जाता कि क्या वह अपनी इस स्थिति से संतुष्ट है. दूसरा, अगर समझा भी तो सरसरी तौर पर पूछ लिया, ‘खुश तो हो या सब ठीकठाक है न.’ यह बिलकुल उस औपचारिक रूप के तहत होता है जहां हम पहले से ही मान कर चलते हैं कि सबकुछ ठीकठाक ही होगा.

युवती से तृप्ति की बात खुद पति ही नहीं पूछता

हमारे समाज में संबंधों को विकृत बना कर पेश किया जाता है, जहां युवतियों से बात पूछी ही नहीं जाती. इस कथा में आज तक सिर्फ नायक जिंदा होता है, नायिका तो बस देहभर होती है. देह से ऊपर उठ कर इच्छा के द्वार पर आते ही वह शूर्पणखा हो जाती है.

घर के बुजुर्ग या दूसरे लोगों के लिए यह विषय वर्जनीय है तो हमउम्र के लिए ठिठोली या चुहल का एक गंभीर विषय. युवतियों से तृप्ति की बात स्वयं पति ही नहीं पूछता, अन्यों से तो आशा ही बेकार है.

देहपवित्रता की कसौटी सिर्फ शरीर

आज अगर चुटकुलों का इतिहास उलट कर देखें तो हम पाएंगे कि आधे से ज्यादा चुटकुले पतिपत्नी से ही संबंधित होते हैं, जिन में पति पीडि़त और पत्नीपीड़क दिखाया जाता है, जबकि वस्तुस्थिति एकदम उलटी है. पढ़ीलिखी युवती हो या फिर अनपढ़गंवार, उस की इस स्थिति में कोई फर्क नहीं रहता, बल्कि अनपढ़गंवार युवतियां तो एक माने में इसलिए भी अच्छी होती हैं कि वे रो कर, चिल्ला कर, गालियां बक कर, अपने मन का क्रोध कुछ तो हलका कर लेती हैं जबकि पढ़ीलिखी युवतियां खुद के पढ़ेलिखे होने के चलते खामोश ही रहती हैं.

इतिहास साक्षी है कि मात्र रावण द्वारा हर लेने भर से ही सीता को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा और लांछन पा कर वनवास झेलना पड़ा, यानी चरित्र मापन में पवित्रता की कसौटी सिर्फ उस का शरीर ही है वरना कौन नहीं जानता कि रावण के यहां रह कर भी सीता तनमन से अपने पति को समर्पित रही.

उचित नहीं युवकयुवती की मनोवैज्ञानिक व्याख्या

यहां तो विडंबना यह है कि ब्याह होने से ही वह पति से प्रेम करने को बाध्य कर दी जाती है. यह बात वैसे तो पुरुषों पर भी लागू होती है मगर उन के लिए विकल्प छोड़ दिए गए हैं. दरअसल, पवित्रता का संबंध पुरुष देह से है ही नहीं, उसे तो औरतों को ढोना होता है. इसलिए पुरुष अपनी पत्नी को अपनी दासियों, प्रेमप्रसंगों की चर्चा बड़े मजे ले कर सुनाता है, पर पत्नी मजाक में भी ऐसा कुछ कह दे तो भूचाल आ जाता है. वह भूल जाता है कि जिन युवतियों के बारे में पत्नी से चर्चा कर रहा है, वे भी किसी न किसी की पत्नी बनी होंगी और उन के पति भी उन से ऐसी ही अपेक्षा रखते होंगे जैसी वह रख रहा है. पिछली खबर को ही लें. उस का पति यह बरदाश्त न कर पाया कि उस की पत्नी के किसी अन्य से संबंध हो सकते हैं. जाहिर है उस की हत्या लोगों के मन में संतोष और पति के प्रति सहानुभूति प्रकट करेगी. पर क्या उस युवकयुवती की मनोवैज्ञानिक व्याख्या उचित नहीं. संभव है, पति उसे पैर की जूती समझ कर व्यवहार करता हो जिस से उस का दिल आहत होता रहा हो. सामाजिक मान्यताओं के अनुसार ही शब्द और संबंध प्रचलित होते हैं.

भारतीय समाज में कुलटा, बदचलन जैसे शब्द हैं और सती, रखैल जैसे भी. जाहिर है कि ये सब के सब युवतियों के लिए महफूज हैं. इसलिए ये नियम सिर्फ उन्हीं के लिए बने. मर्दों के लिए इन के समानार्थी शब्दों की जैसे दरकार ही नहीं. जरूरत है आज बेवफा जैसे शब्दों की पुनर्व्याख्या करने की ताकि लांछन की सजा मात्र युवती ही नहीं, युवक भी भोगे.

चाइनीज मांझा बन रहा जानलेवा

पतंगबाजी दुनियाभर में मशहूर है. कई देशों में अलगअलग तरह के पतंगबाजी महोत्सव मनाए जाते हैं, जो वहां के पर्यटन को बढ़ावा देते हैं. एकदूसरे की पतंग काट कर जीत का जो मजा मिलता है वह पतंगबाजों के लिए अद्भुत होता है. पतंग काटने में हवा का रुख और पतंग की कलाबाजी के साथसाथ पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाली डोर यानी मांझा का भी खास महत्त्व होता है. पतंग में आगे की ओर अलगअलग तरह के मांझे और लोहे के तार तक का प्रयोग होता है. पतंग के साथ लगे मांझे के बाद एक अलग किस्म की डोर लगाई जाती है. पतंग के साथ लगा मांझा ही दूसरी पतंग के मांझे को रगड़ता है और उसे काट देता है. मांझा दूसरी पतंग की डोर को काट सके, इस के लिए मांझे में कांच और लोहे का बुरादा लगाया जाता है. देश में कौटन के धागे से तैयार पतंग की डोर बनाई जाती है.

हाल के कुछ सालों में चीन से नायलौन से तैयार की गई डोर बाजार में आने लगी है. नायलौन की यह डोर आसानी से टूटती नहीं है. उस के ऊपर जब लोहे और कांच का बुरादा चढ़ाया जाता है तो यह कौटन वाले भारतीय मांझे से उड़ रही पतंग की डोर को आसानी से काट देती है. चाइनीज मांझे से पतंग के साथसाथ उड़ाने वाले के हाथ भी कटने लगे. सब से खतरनाक काम तो तब होता है जब कटी हुई पतंग किसी साइकिल या मोटरसाइकिल सवार के गले, मुंह या हाथ में लिपट जाती है. इस से कई बार गले की नसें तक कट जाती हैं. इस तरह की कई घटनाएं देश में घट चुकी हैं. इस कारण देश में चाइनीज मांझे को नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने प्रतिबंधित कर रखा है. नायलौन के साथ सिंथैटिक मैटेरियल से तैयार दूसरे मांझे बेहद खतरनाक होते हैं.

कानून के अनुसार इस तरह के मांझे से केवल पतंग उड़ाना ही गुनाह नहीं, इस मांझे को बेचना भी अपराध है. ऐनवायरनमैंट प्रोटैक्शन एक्ट 1986 की धारा 5 के अंतर्गत इस के इस्तेमाल पर 5 साल की सजा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है. यह निजी फर्म, कंपनी, अथवा सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होता है. कैसे तैयार होता है

चाइनीज मांझा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नवाबीकाल से ही पतंगबाजी होती आई है. समय के साथ यहां पतंगबाजी का स्वरूप भी बदला है. शहर में पतंग बेचने की 100 से अधिक दुकानें हैं. ज्यादातर दुकान लखनऊ के पुराने महल्ले

जैसे चौक, अमीनाबाद, सआदतगंज, मौलवीगंज, खालाबाजार, टुडियागंज, ठाकुरगंज, हुसैनगंज में हैं. वैसे तो अब पतंगबाजी का शौक कम होता जा रहा है. इस के बाद भी दीवाली, मकरसंक्रांति, 15 अगस्त, रक्षाबंधन और दूसरे कुछ छुट्टी वाले दिनों में खूब पतंगबाजी होती है. एक अनुमान के अनुसार लखनऊ में पतंगबाजी का करीब 3 करोड़ का सालाना कारोबार है. केवल चाइनीज मांझे का ही कारोबार एक करोड़ से ऊपर का है. पतंगबाजी में मांझे का प्रमुख उपयोग होता है. उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में देशी मांझा तैयार किया जाता है. देशी मांझा कौटन के धागे से तैयार होता है.

मांझा तैयार करने के लिए कौटन के धागे को एक छोर से दूसरे छोर पर टाइट कर के बांधा जाता है. इस के बाद चावल के मांड को धागे पर घिस कर लगाया जाता है. चावल का मांड कौटन के धागे पर पूरी तरह से चढ़ जाता है. एक बार सूखने के बाद कई बार उस को लगा कर सुखाया जाता है. इस के बाद उस को घिस कर धागे को चिकना किया जाता है, जिस से यह तेज हो जाता है. मांझा तैयार करने में कांच के पिसे हुए टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाने लगा है. कांच लगने से मांझा काफी तेजी से दूसरे धागे को काट देता है. कांच के साथ अब लोहे का बुरादा भी इस में प्रयोग होने लगा है जिस से मांझे की धार और तेज हो जाती है. कौटन के धागे में यह परेशानी थी कि वह लोहे के बुरादे का प्रयोग होने से जल्दी टूट जाता था.

कांच और लोहे के बुरादे का होता है प्रयोग इस बीच, भारत में चाइनीज नायलौन के धागे की खपत शुरू हो गई. अब चाइनीज नायलौन के धागे पर मांझा तैयार करना सरल हो गया है. कांच और लोहे के बुरादे को जब चावल के मांड के साथ इस पर लगाया जाने लगा तो यह कौटन के धागे की तरह टूटता नहीं है. जल्दी न टूटने के कारण यह पतंग उड़ाने वालों के लिए भी खास हो गया. इस से अब दूसरी पतंग को काटना आसान हो गया है. इस कारण चाइनीज नायलौन से तैयार मांझा पतंगबाजी की पहली पसंद बन गया है.

केवल उपयोगिता में ही नहीं, कीमत में यह धागा सस्ता भी पड़ता है. ऐसे में इस का इस्तेमाल बढ़ने लगा और बाजार में चाइनीज मांझे के नाम से यह बिकने लगा. इस ने कौटन के धागे को पछाड़ दिया. पतंग जब कटने लगी और यह धागा लोगों की गरदन में फंसने लगा तो इस की शिकायत होने लगी. पर्यावरण के लिहाज से यह धागा उचित नहीं था. इस कारण इस के इस्तेमाल पर पूर्णरूप से कानूनी प्रतिबंध लग गया है. कानूनी रूप से बंद होने के बाद भी चाइनीज मांझे का इस्तेमाल आज भी हो रहा है. देश में बेईमानी इस कदर हावी है कि यहां पर कानून के विपरीत काम करना सरल है. हर आदमी थोड़े से मुनाफे के लिए सिस्टम को तोड़ लेता है. पतंगबाज अपनी छोटी सी खुशी और थोड़ी सी बचत के आगे देशी कौटन के मांझे के विपरीत चाइनीज मांझे का प्रयोग कर रहे हैं. प्रतिबंधित चाइनीज मांझा दिल्ली के रास्ते लखनऊ तक पहुंचता है. चाइनीज मांझे का कोई तय मूल्य नहीं होता. डिलिवरी करने वाले को ही मुंहमांगी कीमत मिल जाती है. फुटकर बाजार में यह मांझा ज्यादा डिमांड में है, ऐसे में यह चोरीछिपे खूब बिकता है.

अविश्वास प्रस्ताव : वारिस बनाम प्रवाचक संघर्ष

भारतीय जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा संसद में लाया गया पहला अविश्वास प्रस्ताव भले ही गिर गया, पर इस बहाने विपक्ष की एकजुटता के साथसाथ अगले साल होने वाले आम चुनाव का एजेंडा साफ हो गया है. विपक्ष का यह प्रस्ताव तेलुगूदेशम पार्टी ने लोकसभा में पेश किया था, पर इस पर बोलने के लिए सब से ज्यादा समय राहुल गांधी को मिला था. 50 मिनट के भाषण में राहुल गांधी को मौका मिला था नरेंद्र मोदी की जम कर खिंचाई करने का और अन्य विपक्षी दलों ने उसे सहज स्वीकार कर एक तरह से एनडीए को महागठबंधन की तैयारी की झलकी दिखा दी. राहुल गांधी ने पूरी आक्रामकता के साथ सरकार पर हमला बोला. राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे में अनियमितता, युवाओं की बेरोजगारी, किसानों की दयनीय स्थिति, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हिंसात्मक हमले जैसे मुद्दे उठा कर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा किया.

मोदी संख्याबल पर भले ही अविश्वास प्रस्ताव जीत गए हों पर विपक्ष द्वारा जनता से जुड़े सवालों का जवाब देने में वे विफल रहे. संघ प्रचारक से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले मोदी भाषण देने में माहिर हैं पर उन के प्रवचननुमा भाषण में विपक्ष के सवालों के जवाब नहीं दिखे, केवल व्यक्तिगत कटाक्ष ही दिखे. मतभेद भी, मनभेद भी

अन्नाद्रमुक पार्टी ने तो सरकार के पक्ष में मतदान किया, लेकिन एनडीए सहयोगी शिवसेना ने मतदान में भाग न ले कर साफ कर दिया कि वह मोदी सरकार से नाराज है. स्पष्ट है कि अगले चुनाव की रूपरेखा बनाई गई है जिस में वारिस और प्रवाचक के बीच संघर्ष निश्चित है. इस में जनता का हित कहां होगा, दोनों दलों के पास उस का कोई ब्लूपिं्रट नहीं है. महज भाषणबाजी है, हवाई बातें हैं, भरपूर जुमले हैं.

संसद में 11 घंटे चली अविश्वास की बहस में 2014 की तुलना में अब फर्क साफ दिखाई दिया. इस बार विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी हमले की मुद्रा में थे और भाजपा के नेता व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बचाव की मुद्रा में. एक कांग्रेस का नया चेहरा है, दूसरा संघ का प्रचारक और हिंदुत्व की राजनीति का प्रवाचक. देश के अधिकांश मतदाता युवा हैं और वे अब प्रवचनों से ऊब रहे हैं. युवाओं के लिए कोई ठोस काम होते नहीं दिखते. वे हिंदुत्व, राष्ट्रवाद की बात करने वाली सरकार से खुश नहीं हैं.

पिछले 4 सालों से युवा रोजगार की राह देख रहा है. वह शिक्षा में सुधार की उम्मीद किए बैठा है. वह सरकारी कामकाज में आसानी की आस लगाए हुए है पर बजाय सुधार के, युवाओं को सिर्फ झूठे आंकड़ों की फेहरिस्त दिखाई जा रही है. हकीकत से दूर भ्रामक आंकड़ों से उन का मन बहलाने की कोशिश की जा रही है. सत्तारूढ़ भाजपा के नेता प्रवचन देने में पारंगत हैं. वे बातबात में पुराणों के किस्से सुनाने में आगे रहते हैं. जैसे हिंदू धर्म के दुकानदार ग्रंथों की कहानियों को सुनाते हुए दस्यु राजाओं की बातें करते रहे हैं वैसे ही भाजपाई कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान हुए कांडों को खोदखोद कर उजागर करते रहते हैं. वे अपनी उपलब्धियों की नहीं, पहले की बातें करते हैं, ठीक धार्मिक प्रवचनों की तरह जिन में पौराणिक कथाएं सुनासुना कर दुखों के निवारण किए जाते हैं.

बहस में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार के 2014 से अब तक के कार्यकाल पर तथ्यों सहित सवाल खड़े किए तो बदले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेसकाल की कहानियां प्रवचननुमा सुना कर जवाब दिए. मोदी से उम्मीद थी कि वे राहुल गांधी के तमाम सवालों के जवाब गंभीरता से देंगे पर हैरानी हुई कि ऐसा करने के बजाय उन्होंने सरेआम मजाक उड़ाने वाले अंदाज में राहुल गांधी पर तीखा व्यक्तिगत हमला बोला. मोदी उन तमाम मुद्दों पर चुप्पी साधे रहे जिन के कारण देश का व्यापार ठप हो रहा है. उन का पूरा जोर व ध्यान केवल नेहरूगांधी परिवार को राक्षस साबित करने में था. अपनी सरकार की सफलता गिनाने के लिए उन आंकड़ों को दोहराते रहे जिन्हें सुनने में किसी की दिलचस्पी नहीं.

राहुल गांधी ने अपने भाषण में मोदी द्वारा युवाओं को हर वर्ष 2 करोड़ रोजगार देने, कालाधन वापस ला कर हरेक देशवासी के खाते में 15 लाख रुपए डालने से ले कर राफेल हवाई जहाज सौदा, दलितों, अल्पसंख्यकों व महिलाओं के खिलाफ हिंसा, डोकलाम विवाद और सर्जिकल स्ट्राइक तक पर सत्तापक्ष को कठघरे में खड़ा कर दिया. ये सब 2014 के बाद हुआ. जुमलों की राजनीति

राहुल गांधी ने भाषण की शुरुआत में सवाल उठाया, ‘‘15 लाख रुपए और रोजगार देने का वादा सिर्फ जुमला है. एमएसपी भी जुमला है. प्रधानमंत्री के शब्दों का मतलब होना चाहिए.’’ इस सवाल का प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जवाब दिया, ‘‘हमें जुमलों की सरकार कहा जा रहा है पर हमारी सरकार अपने वादों को पूरा करने के लिए काम कर रही है. हमारी सरकार ने पूर्व की सरकारों की योजनाओं की खोजखबर ली और उन्हें पूरा कर रही है. हम ने गरीबी हटाओ का जुमला नहीं दिया.’’ कुल मिला कर मोदी को अपनी बात कहने के लिए कांग्रेस सरकारों को लाना पड़ा.

राफेल के नाम पर राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सवाल उठाया, कहा, ‘‘प्रधानमंत्री के दबाव में रक्षामंत्री ने झूठ बोला. यूपीए की डील में एक राफेल विमान 520 करोड़ रुपए का था. मोदी फ्रांस गए तो एक विमान 1,600 करोड़ रुपए का हो गया. रक्षामंत्री कहती हैं कि सीक्रेट पैक्ट के कारण वजह नहीं बता सकतीं. फ्रांस के राष्ट्रपति ने मुझ से कहा था कि ऐसा कोई सीक्रेट करार नहीं हुआ. आप यह बात बता सकते हैं.’’

प्रधानमंत्री ने इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देने के बजाय कहा, ‘‘देश के सुरक्षा मुद्दों पर ऐसा खेल ठीक नहीं है. क्या बचकानी हरकत ही करते रहोगे? बिना सुबूत चिल्लाने की राजनीति देशहित में नहीं है. समझौता 2 सरकारों के बीच हुआ है, व्यापारियों के बीच नहीं. आप के बयान के कारण 2 देशों को खंडन जारी करना पड़ा है.’’ लोकसभा और जनता को यह जानने का हक है कि यदि देश का पैसा गलत खर्च किया गया है तो उस के सभी तथ्य सामने रखे जाएं. फ्रांस सरकार चाहे तो अनुबंध तोड़ने का साहस कर सकती है. यह बंदिश अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने नहीं लगाई, सिर्फ एक समझौते के आधार पर है.

राहुल ने आगे सवाल उठाया, ‘‘मोदी की मार्केटिंग का पैसा अमीर देते हैं. राफेल सौदा एचएएल से ले कर इन्हीं में से एक ऐसी कंपनी को दिया गया है जिस ने जिंदगी में एक भी जहाज नहीं बनाया. उस ने 45 हजार करोड़ रुपए कमाए. प्रधानमंत्री मुझ से आंख नहीं मिला सकते. देश ने देख लिया है कि प्रधानमंत्री चौकीदार नहीं, भागीदार हैं.’’ इस पर मोदी का जवाब देखिए, ‘‘मैं एक गरीब मां का बेटा, कैसे आप की आंख में आंख डाल सकता हूं. इतिहास गवाह है जिस ने भी आप की आंख में आंख डालने की कोशिश की उस का आप ने क्या हश्र किया. मैं आप से आंख नहीं मिला सकता. सुभाष चंद्र बोस से ले कर प्रणब मुखर्जी तक को इस की कीमत चुकानी पड़ी. यहां भागीदारी की बात उठी. हां, मैं भागीदार हूं. गर्र्व है कि मैं गरीबों के दुख, किसानों की पीड़ा, नौजवानों के सपनों और विकास का भागीदार हूं. आप की तरह सौदागर और ठेकेदार नहीं हूं.’’ यानी राफेल ठेका किस को दिया गया, क्यों दिया गया, बात पूरी तरह गोल कर दी.

जानकारी दो हकीकत क्या है राहुल गांधी ने आगे पूछा, ‘‘भारतीय जवान डोकलाम में घुसे चीनी सैनिकों के सामने खड़े थे. उस के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री चीनी राष्ट्रपति से बिना एजेंडे के मुलाकात करने गए. वह चीन का एजेंडा था. ऐसा कर के प्रधानमंत्री ने भारतीय सैनिकों को धोखा दिया है.’’

इस पर मोदी का लीपापोतीभरा जवाब आया, ‘‘बिना जानकारी के बोलने से पहले सोचें. इस से देश का नुकसान होता है. जब सरकार और देश डोकलाम पर काम कर रहे थे तब आप चीनी राजदूत के साथ बैठे थे, फिर नाटकीय तरीके से कभी बोले मिले, कभी बोले नहीं मिले.’’ यहां फिर मोदी ने कोईर् सफाई नहीं दी कि वे शी जिनपिंग से डोकलाम मामले को ले कर क्यों नहीं मिले. यह कहना कि तुम विधर्मी या अधर्मी हो, इसलिए तुम्हारे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं, प्रवाचकों की पुरानी आदत है. राहुल गांधी ने पूछा, ‘‘प्रधानमंत्री जुमला स्ट्राइक करते हैं. पहला हर खाते में 15 लाख रुपए. दूसरा 2 करोड़ युवाओं को हर साल रोजगार. जबकि 2016 में सिर्फ 4 लाख युवाओं को ही रोजगार मिला पाया.’’

मोदी ने जवाब दिया, ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक को जुमला कहना देश स्वीकार नहीं करेगा. गाली देनी है तो मुझे दीजिए. सर्जिकल स्ट्राइक को जुमला कह कर सरहद पर खड़ी सेना को अपमानित मत कीजिए.’’ प्रवाचक अकसर कहते हैं कि धर्म या देवताओं के बारे में आस्था होनी चाहिए, सवाल नहीं खड़े किए जाने चाहिए. यही उन्होंने यहां किया और सेना को देवताओं का दर्जा दे कर राहुल पर पलटवार कर दिया. सच क्या है, यह जवाब से पता ही नहीं चलता. रही रोजगार की बात, तो लगता है कि नरेंद्र मोदी ट्रक ड्राइवरों, ट्रक पर खलासी का काम करने, औटो ड्राइवरी, औटो मैकेनिकों को नए भारत के इकलौते रोजगार मान रहे हैं, पकौड़े बनाना तो है ही. शिक्षित बेरोजगार कहां जाएं, इस का कोई जवाब उन के 90 मिनट के प्रवचन में नहीं मिला. कारोबारी बनाम किसान

राहुल गांधी ने किसानों का मुद्दा उठाते हुए कहा, ‘‘प्रधानमंत्री ने बड़े कारोबारियों के ढाई लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. किसानों ने कहा हमारा भी थोड़ा कर्ज माफ कर दो और आप के वित्त मंत्री ने कहा कि किसानों का ऋण माफ नहीं होगा. बड़े उद्योगपतियों का ही माफ होगा, क्योंकि तुम में दम नहीं है.’’ अपने भाषण में मोदी ने जवाब में इतना ही कहा कि सरकार 2022 में किसानों की आय दोगुनी करने जा रही है. सिंचाईर् योजनाएं पूरी की जा रही हैं. 15 करोड़ किसानों को आधुनिक तकनीक की ओर ले जाया गया है.

राहुल गांधी यहीं नहीं रुके, उन्होंने आगे पूछा, ‘‘दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ी है. लेकिन इस पर प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहते हैं हम इसे बरदाश्त नहीं करेंगे.’’ मोदी ने जवाब दिया, ‘‘कांग्रेस अफवाहें फैलाती है कि आरक्षण खत्म होगा. एससीएसटी एक्ट खत्म होगा. आप दलितों, गरीबों, वंचितों को ब्लैकमेल करते हैं.’’

राहुल गांधी ने बिना चूके तुरंत जवाब दिया, ‘‘प्रधानमंत्री ने कहा था मैं देश का चौकीदार हूं लेकिन जब आप के मित्र अमित शाह के पुत्र जय शाह की आमदनी 16 हजार गुना बढ़ती है तो कुछ नहीं होता.’’ प्रधानमंत्री ने इस का कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन संसद में सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने जरूर हल्ला मचाया और अमित शाह के पुत्र का नाम कार्यवाही से निकलवा दिया गया.

राहुल ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री जब बाहर जाते हैं तब अपने सिक्योरिटी कवर से बाहर नहीं निकलते. 10-20 अमीरों से मिलते हैं. छोटे लोगों से नहीं मिलते. उन के पास गरीबों, छोटे लोगों के लिए थोड़ा सा भी समय नहीं है. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस का भी जवाब नहीं दिया. गरीबों के लिए बनी योजनाओं का जरूर बाद में जिक्र किया.

राहुल गांधी ने भाषण के दौरान कहा कि वे भाजपा के लिए पप्पू हो सकते हैं पर उन के दिल में सभी के लिए हमेशा प्यार रहेगा. वे इसी तरह उन से प्यार करते रहेंगे और उन्हें कांग्रेस की तरफ लाने की कोशिश करते रहेंगे. मोदी से गले मिले राहुल

भाषण के अंत में राहुल गांधी प्रधानमंत्री के पास गए और उन से गले मिले. पहले तो मोदी सकपकाए, फिर राहुल को वापस बुला कर हाथ मिलाया और पीठ थपथपाई. राहुल का गले मिलना और फिर आंख मारने की गतिविधि को अधिक बतंगड़ बना कर प्रचारित किया गया. बाद में मोदीभक्तों की भीड़ राहुल के गले मिलने और आंख मारने को ले कर ट्रोल पर उतर आई.

राहुल गांधी का आंख मारना आलोचना का विषय हो सकता है. उन्होंने ऐसा कर के अपने किएधरे पर पानी फेर दिया. इस हरकत ने राहुल में गंभीरता का अभाव जाहिर कर दिया. राहुल गांधी को पप्पू कहना सही नहीं है. यह सत्तारूढ़ दल का घृणाभरा तर्क है. इस का जवाब राहुल ने घृणा से नहीं, प्यार से दिया. मोदी ने अपने भाषण की शुरुआत में राहुल गांधी के सवालों के जवाब कम और अपनी उपलब्धियों का बखान ज्यादा किया. उन्होंने भाषण में कहा, ‘‘मैं शिव की प्रार्थना करता हूं.’’

प्रवाचक की तरह गरीबों पर अपनी जो कृपा बरसाई उस का बखान करते हुए मोदी ने कहा कि उज्ज्वला योजना से साढ़े 4 करोड़ माताबहनों को धुंआमुक्त माहौल और उन में विश्वास जगाने का काम किया है. हमारे युवा आज 10 हजार से ज्यादा स्टार्टअप चला रहे हैं. एलईडी बल्ब कांग्रेस शासन के समय 450 रुपए में बिकता था जो आज सिर्फ 45 रुपए में मिल रहा है. ये तो इसी तरह की उपलब्धियां हैं जैसी मोबाइल के साथ हुई हैं. इस में तकनीक का कियाधरा है, सरकारों का नहीं. मोदी ने कहा कि कांग्रेस नेहरूगांधी विरासत की तरह हर किसी को ट्रीट करना चाहती है.

हमारा देश हमेशा से प्रवचनों की अच्छीअच्छी सीख सुन कर आत्ममुग्ध होता रहा है. आज भी देश में एक बड़ी तादाद पुराण, गीता, रामायण में दिए कथाकिस्सों के उद्धरण सुन कर खुश होती रहती है. धार्मिक नेताओं की फौज ही नहीं, सरकार में बैठे नेता भी पौैराणिक आख्यानों को आज की उपलब्धियों से जोड़ कर आत्ममुग्ध होते रहते हैं. अंधभक्तों की भीड़

प्रवाचक के पीछे भीड़ होती है. वह प्रवाचक की अंधभक्त होती है. अंधभक्त को प्रवचन में तर्क नहीं चाहिए. वह तो उस प्रवचन पर आंख मींच कर विश्वास करने वाली होती है. प्रवचन पर उसे पूरी आस्था रहती है. वारिस के पीछे भी ऐसी ही भीड़ रहती है. यह भीड़ भी प्रवाचकभक्तों की तरह वारिसपूजक होती है. वारिस के पीछे की भीड़ भी अंधभक्त होती है. पर इस बार राहुल गांधी को ईमानदारी से मेहनत कर के तथ्यों के साथ विरासत को बचाना पड़ रहा है.

दरअसल, सुनने में प्रवचन बहुत अच्छे लगते हैं, पर कोरे प्रवचनों से किसी का पेट नहीं भरता. भूखे को खाना, बेरोजगार को रोजगार, अशिक्षित को शिक्षा मिलने से ही राहत मिलेगी. हमारे नेताओं को जनता को बहलाए रखने की आदत पड़ गई है. ऐसे में प्रधानमंत्री के कोरे भाषणों से देश की तरक्की नहीं होगी. वहीं वारिस के अपने पुरखों की उपलब्धियों और त्याग से नंगीभूखी जनता का भला

नहीं होगा. सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही जब कुछ ठोस काम करेंगे तभी युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्याओं का निदान निकल पाएगा. हैरानी की बात है कि लगभग 70 साल के लोकतंत्र में लोग आज भी वारिसों और प्रवाचकों के अंधभक्त व्यक्तिपूजक बने हुए हैं. नेता इस देश की जनता की इसी कमजोरी का ही तो फायदा उठा

रहे हैं. जब तक जनता वारिसों और प्रवाचकों के मोहजाल में फंसी रहेगी, तब तक वह गरीब, बेरोजगार, अशिक्षित और पिछड़ी ही रहेगी.

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