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चमचमाते बरतन, चादर और कपड़े

रमेश मिडिल क्लास परिवार का था. उस की बेटी की शादी थी. उस ने शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. बड़ा शामियाना, तरहतरह के भोजन और भी कई तरह के तामझाम.

इतना सब करने के बावजूद वहां आने वाले मेहमानों ने कई कमियां निकाल दीं. जैसे शामियाने में इस्तेमाल किया गया रंगीन कपड़ा धुला हुआ नहीं था. उस पर मैल की परतें जमा थीं. खाने में इस्तेमाल की गई क्रौकरी भी ढंग से धुली हुई नहीं थी. यह देख कर बहुत से लोगों ने खाना खाने में नाकभौं सिकोड़ी. रमेश के किएकराए पर पानी फिर गया.

यह बात सच है कि जब भी हम कभी बतौर मेहमान किसी के घर जाते हैं तो घर के भीतर घुसते ही वहां का माहौल बता देता है कि वहां रहने वाले कितने साफसफाई पसंद हैं. कोई कैसे कपड़े पहनता है, उस के बिस्तर पर कैसी चादर बिछी है और वह खाने के लिए किस तरह के बरतनों का इस्तेमाल करता है, यह सब भी इसी दायरे में आता है.

घर के बरतन और कपड़े व चादरों को साफसुथरा रखना कोई रौकेट साइंस नहीं है, बल्कि अब तो साइंस ने ऐसे सस्ते व बढि़या पाउडर, लिक्विड सोप वगैरह ईजाद कर दिए हैं कि आप को यह बहाना नहीं मिल सकता है कि घर और रसोई गंदी क्यों है.

आजकल ज्यादातर सभी घरों में स्टील के बरतन इस्तेमाल किए जाते हैं, जो मजबूत होने के साथसाथ धोने में भी आसान रहते हैं. इन पर कभीकभी सख्त दाग लग जाते हैं पर उन्हें हटाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती.

मान लीजिए, स्टील के पतीले में सख्त दाग लगे हुए हैं तो उसे कुछ घंटे के लिए साबुन के गरम पानी में भिगोएं, फिर पानी निकाल कर मांजने के पैड से रगड़ दें. ऐसी चीज न इस्तेमाल करें जिस से उस बरतन पर खरोंच लग जाए.

इसी तरह किसी बरतन पर जले के निशान हटाने के लिए बेकिंग सोडा डाल कर सूखे कपड़े से अच्छी तरह रगड़ें. बेकिंग सोडा का पेस्ट बना कर भी गीले कपड़े या स्क्रब से साफ कर बरतन को चमकाया जा सकता है.

जिस इलाके में पानी अच्छी क्वालिटी का नहीं होता?है वहां पानी के दाग भी स्टील के बरतनों पर रह जाते हैं. इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए बरतन के चारों ओर थोड़ा सा क्लब सोडा डालें और साफ कपड़े से पोंछ कर सुखाएं.

चादर या दूसरे कपड़े धोते समय सफेद व रंगीन कपड़ों को अलगअलग कर लेना चाहिए ताकि रंगीन कपड़ों का रंग सफेद कपड़ों पर लगने का डर न रहे.

कपड़े धोने के लिए अच्छे डिटर्जैंट पाउडर या साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से उन की क्वालिटी बरकरार रहती है. अब तो वाशिंग पाउडर या डिटर्जैंट में खुशबू भी डाली जाती है जिस से कपड़े उजले होने के साथसाथ महकते भी हैं.

कपड़े धोते समय लोगों में यह भरम भी रहता है कि ज्यादा वाशिंग पाउडर इस्तेमाल करने से उन के कपड़े ज्यादा साफ होते हैं, पर ऐसा नहीं है. साबुन या डिटर्जैंट का इस्तेमाल कपड़े के अनुपात में करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा मात्रा होने से कपड़े खराब होने का डर भी रहता है.

मैले कपड़ों पर कभीकभी ऐसे दाग भी लग जाते हैं जो धोते समय परेशानी का सबब बन जाते?हैं. ऐसे में साबुन या डिटर्जैंट पर लिखे दिशानिर्देशों को ध्यान से पढ़ लेना चाहिए. सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ों के लिए उन्हीं के मुताबिक डिटर्जैंट वगैरह का इस्तेमाल करना चाहिए.

हाथ से या वाशिंग मशीन में कपड़े धोने के लिए भी आजकल अलगअलग तरह के डिटर्जैंट बाजार में हैं. लिक्विड डिटर्जैंट नया प्रोडक्ट है जो नाजुक कपड़ों में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. यह कपड़ों के साथसाथ धोने वाले के हाथों के लिए भी सुरक्षित रहता है.

अपना सारा घर कीटाणुओं से बचाएं

घर की मालकिन के लिए अपने आशियाने की साफसफाई रखना सब से बड़ी चुनौती होती है. शीला की भी यह समस्या है. अपने घर को चमचमाता बनाए रखने के लिए उन्होंने कामवाली बाई भी रखी हुई है जो ईमानदारी से अपना काम करती है पर ऊपरी तौर पर क्योंकि शीला के घर में पनप रहे गंदे कीटाणुओं से कोई न कोई बीमार ही रहता है.

अब इन कीटाणुओं से कैसे निबटा जाए और ये घर के किस कोने में अपनी बस्ती बसा कर रहते हैं, यह जानना भी जरूरी?है.

आमतौर पर रसोईघर में इस्तेमाल की जाने वाली चीजों जैसे चाकू, तौलिया, सिंक, कूड़ेदान, दरवाजे के हैंडल, नल, बरतनों के स्टैंड वगैरह में कीटाणुओं के बसने का सब से?ज्यादा डर रहता है.

इस के अलावा जब घर के सदस्य बाहर से आते हैं, खासकर जब बच्चे खेलकूद कर गंदे हो कर घर में दाखिल होते हैं, तब वे भी कीटाणु रूपी अनचाहे मेहमान साथ ले आते?हैं. उन्हें तो नहलाधुला कर कीटाणुओं से?छुटकारा दिला दिया जाता?है, लेकिन घर में पल रहे बीमारी के वाहक कीटाणुओं की अनदेखी कर दी जाती है.

घर का फर्श, बाथरूम और?टौयलैट भी कीटाणुओं का बसेरा होते?हैं. तो इन का इलाज क्या?है? इलाज है और बहुत आसान है. कीटाणुओं से छुटकारा पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:

* गंदे कपड़ों को?ज्यादा लंबे समय तक यहांवहां न फैला रहने दें. रोजाना नहीं तो कम से कम एक दिन छोड़ कर उन्हें धो देना चाहिए. जो वाशिंग मशीन आप के कपड़े धोती?है, उसे भी समयसमय पर साफ करते रहना चाहिए. इस के लिए उस में थोड़ा ब्लीचिंग पाउडर डाल कर यों ही चलता छोड़ दें. इस से मशीन के कीटाणु मर जाएंगे.

* गंदे तौलिए को तो अच्छे से डिटर्जैंट से गरम पानी में?धोना चाहिए.

* बिस्तर की चादरें ज्यादा दिनों तक न बिछाएं रखें.

* बिस्तर पर बैठ कर खाने की आदत से बचें.

* फर्श पर पोंछा लगाते समय अच्छी क्वालिटी का फर्श क्लीनर या तेजाब वगैरह मिला दें.

* बाथरूम और टौयलैट को भी अच्छी तरह चमकाएं. इस के लिए बाजार से मिलने वाले खुशबूदार फर्श क्लीनर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इन्हें गीला न रखें क्योंकि नमी वाली जगह पर काई, फफूंदी के अलावा कीटाणु पनपने का खतरा बना रहता?है. अगर टाइलें लगी?हैं तो उन्हें भी क्लीनर से साफ करें.

* रसोई की सफाई करना न भूलें. जूठे बरतन ज्यादा देर तक न रहने दें.

* कूड़ेदान को गंदा न रहने दें. सिंक और नाली के आसपास कीटनाशक घोल का छिड़काव करें.

* बैडरूम और ड्राइंगरूम में भी तमाम तरह के बैक्टीरिया होते हैं. समयसमय पर सोफासैट, परदों, टैलीविजन के रिमोट वगैरह की अच्छी तरह से साफसफाई करनी चाहिए.

महकाए मन खुशबूदार बदन

राजवीर की नईनई शादी हुई थी. रात होतेहोते मिलन की घड़ी भी आ गई. राजवीर ने जैसे ही खुशबूदार गुलाबों की सेज से महकते बिस्तर पर इंतजार कर रही रजनी के करीब जा कर कपड़े उतारे तो रजनी ने अचानक से नाक पर हाथ रख दिया और मुंह सिकोड़ते हुए बिस्तर से उठ खड़ी हुई.

रजनी की इस हरकत की वजह थी राजवीर के शरीर और मुंह से आती बदबू. फिर क्या था, दोनों की सुहागरात बेहद उदास और मनमुटाव भरे अंदाज में शुरू हुई.

देश और दुनिया के सैक्सोलौजिस्ट भी मानते हैं कि सैक्सुअल लाइफ को खुशनुमा बनाए रखने में शरीर की खुशबू की बहुत अहमियत होती?है क्योंकि यह खुशबू रिश्ते की मजबूती को बनाए रखती है.

अगर राजवीर ने सुहागरात पर कोई बढि़या सा परफ्यूम या बौडी स्प्रे इस्तेमाल किया होता तो शायद अंजाम कुछ और ही होता.

याद रखें, बेहतरीन क्वालिटी का परफ्यूम वही है जो ज्यादा से ज्यादा समय तक बरकरार रहता है और जिस की पहुंच दूरदूर तक होती है.

परफ्यूम के अलावा नहाने के पानी या फिर मुंह धोने के लिए खुशबूदार फेसवाश, शरीर के लिए बौडी क्रीम, लोशन वगैरह का इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

गरमी के दिनों में ज्यादा पसीना आता है इसलिए नहाने से पहले पानी में यूडी कोलोन, डेटौल या कोई इत्र मिला लें, इस से शरीर महक उठेगा. हलकी खुशबू वाला टैलकम पाउडर भी लगा सकते हैं.

कुछ खास तरह की चीजें खाने, मसूड़ों की बीमारी, शरीर में जिंक की कमी या डायबिटीज के चलते मुंह से बदबू आ सकती है. इस को दूर करने के लिए माउथवाश का इस्तेमाल करें.

अकसर बगल व गुप्तांगों के आसपास बाल बढ़ जाते हैं, उन की समयसमय पर सफाई करना न भूलें, नहीं तो सैक्स के दौरान आप से बदबू आ सकती है. बालों को किसी अच्छे ब्रांड के ट्रिमर से साफ कर लें. लड़कियां और औरतें हेयर रिमूवर क्रीम इस्तेमाल कर सकती हैं. हां, ऐसी क्रीम खरीदें जो आप की चमड़ी के लिए एलर्जिक न हो.

अगर आप के शरीर से नहाने और परफ्यूम लगाने के बाद भी पसीने की बदबू आ रही है तो आप किसी डाक्टर से सलाह लें, नहीं तो सैक्स के दौरान आप के हमसफर का मूड उखड़ सकता है.

सहवास को सुखनुमा और रंगीन बनाने के लिए केवल परफ्यूम या डियोडैं्रट पर ही निर्भर न रहें बल्कि अपने आसपास के माहौल को भी रूम फ्रैशनर वगैरह से खुशबूदार बना लें.

सैक्स के दौरान कभी भी वही कपड़े न पहनें जो दिनभर पहने हों. हमेशा धुले कपड़े पहनें और कपड़ों में खुशबू के लिए अच्छा और खुशबूदार डिटर्जेंट इस्तेमाल करें.

दरअसल, खुशबू के बिना कोई भी सिंगार अधूरा रहता?है. बदन से झरती भीनीभीनी खुशबू किसी भी रिश्ते में गरमजोशी और माहौल में नई एनर्जी भर देती है और बात जब रूमानी हो तो एकदूसरे की खुशबू को महसूस करने से ही कामोत्तेजना में बढ़ोतरी होती?है.

भारत ही एक ऐसा देश है जहां खुशबू को 21 श्रेणियों में बांटा गया है. हमारे यहां खुशबू की एक अलग ही परंपरा रही है, इसलिए आप भी अपने बदन की खुशबू से अपने चाहने वाले का मन महकाएं और बहकाएं भी.

आकाश

सुबहसुबह खिड़की तक जा कर आकाश छुआ जब आंखों ने

सारा आकाश तुम्हारा है कानों में कह दिया किसी ने.

सांझसवेरे रंगबिरंगे नित नूतन चित्र उकेरे

बिन नाविक पतवारों के बादल की नावें तैरें.

कभी स्वर्ण का वैभव कभी सुगंधित सौरभ

बांटे यह आकाश खिले चांदनी तो लगता है

हंसता यह आकाश तारों की जगमग में

लगता शर्माया आकाश. कभी धुंधलके रंग बिछाते

कभी उजाले सजते नवनिर्मित परिधानों में

लगे रम्य आकाश. दूरदूर तक विहग नापते

मिला आदि न अंत है अनंत आकाश.

उद्योगपतियों की परिक्रमा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी को कुछ उद्योगपतियों से ज्यादा मिलने और उन्हें फायदा पहुंचाने की बात खासे जोर से कही. अपने 90 मिनट के उत्तर में नरेंद्र मोदी ने इस बात का स्पष्टीकरण न दे कर कांग्रेस के इतिहास और उस के नेताओं के व्यक्तित्व की चर्चा कर के मामले को टाल दिया.

लखनऊ में उन्होंने सफाई दी कि अगर नीयत साफ हो तो उद्योगपतियों से मिलने में क्या हर्ज है, क्योंकि वे देश के प्रमुख लोग हैं.

यह सही बात है. उद्योगपति ही देश की रगों में वह खून देते हैं जिस से अर्थव्यवस्था चलती है और अगर उन की समस्याएं सुनी व समझी न जाएं तो कोई देश ढंग से नहीं चल सकता.

नरेंद्र मोदी की सरकार से शिकायत यह है कि वे उद्योगपतियों से मिलते हैं तो केवल उन्हें भाषण पिलाने के लिए. वे प्रवाचक की तरह उपदेश देते हैं. वे उन से समस्याएं सुनने को तैयार नहीं हैं क्योंकि धर्म प्रचारकों की तरह उन्हें विश्वास है कि उन के पास ज्ञान और बुद्धि का अपार खजाना है.

नरेंद्र मोदी ने अपनी सफाई देने की जगह धर्म प्रचारकों की तरह कांग्रेसियों पर पलटवार किया कि वे भी तो ऐसा ही करते हैं, उद्योगपतियों के बरामदों में चहलकदमी करते हैं. यह धर्म प्रचारकों का मुख्य तरीका है अपने विरोधियों को चुप कराने का. आप महिलाओं पर हिंदू धर्म में होने वाले भेदभाव की बात जैसे ही करेंगे, तो जवाब मिलेगा कि मुसलमानों में तुरंत 3 तलाक, 4 पत्नियां रखने, बुरका के विषय भी तो हैं.

अपने दोषों से मुकरने के लिए दूसरों के दोषों को दिखाना ठीक नहीं है. लोग अपने नेताओं से ऐसा व्यवहार चाहते हैं जो शांति, व्यवस्थाबराबरी, आर्थिक उन्नति दे.

गौरक्षकों द्वारा मौब लिंचिंग का जवाब यह नहीं कि 1984 में भी तो लिंचिंग हुई थी.

 

बिहार में फिर निकला विशेष राज्य दर्जा का जिन्न

लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही नीतीश कुमार को फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की याद आई है और इस के लिए उन्होंने केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. 29 मई, 2018 को उन्होंने 15वें वित्त आयोग को इस मसले को ले कर चिट्ठी भेजी थी. जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के दर्जे की मांग करना कोरा राजनीतिक स्टंट है. बिहार विशेष राज्य का दर्जा पाने के नियमों पर खरा ही नहीं उतरता है तो किस मुंह से इस की मांग कर के जनता को बरगलाया जा रहा है?

केंद्र सरकार कई दफा इस मांग को खारिज करती रही है. नीतीश कुमार ही नहीं, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति जैसी पार्टियां भी अपनी सहूलियत और सियासी मतलब के हिसाब से यह मांग उठाती रही हैं. बिहार कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल कहते हैं कि उन की पार्टी बिहार को स्पैशल स्टेटस दिलाने का समर्थन करती रही है. इस के लिए पार्टी मुहिम चलाने की तैयारी भी कर चुकी है.

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान कहते हैं कि बिहार पिछड़ा राज्य है और इसे विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए. गौरतलब है कि बिहार के अलावा झारखंड, ओडिशा और राजस्थान में भी विशेष राज्य का दर्जा की मांग उठती रही है. केंद्र सरकार इस मसले को छेड़ने से परहेज करती रही है. बिहार को स्पैशल स्टेटस मिलने के बाद बाकी तीनों राज्य भी उस के पीछे हाथ धो कर पड़ सकते हैं.

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा ने 4 अप्रैल, 2006 को ही राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग का प्रस्ताव पास कर दिया था और इस बारे में मुख्यमंत्री ने 3 जून, 2006 को प्रधानमंत्री को जानकारी दी थी. 31 मई, 2010 को बिहार विधानपरिषद ने भी इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी थी और 10 जून, 2010को मुख्यमंत्री ने फिर प्रधानमंत्री को चिट्ठी के जरीए यह जानकारी दी थी.

23 मार्च, 2011 को राज्य के सभी सियासी दलों और सांसदों से इस मुहिम को समर्थन देने की अपील की गई थी और एक हस्ताक्षर मुहिम की शुरुआत की गई थी. जब 13 साल पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को ले कर बिहार में नए सियासी ड्रामे ने जोर पकड़ा था तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को इस के अलावा कुछ और नहीं सूझ रहा था. उस समय राज्य के बाकी दल इसे नीतीश कुमार की सियासी नौटंकी करार दे कर उन की मांग की हवा निकालने पर तुले हुए थे.

नीतीश कुमार ने साल 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई थी और इस मामले को ले कर यह हवा बनाई गई थी कि अगर केंद्र ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया तो उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे. बिहार की वाजिब तरक्की नहीं हो पाने का ठीकरा केंद्र के माथे फोड़ कर नीतीश कुमार खुद की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं. 5-6 साल पहले इस मसले पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए जद (यू) ने राज्यभर में हस्ताक्षर मुहिम

शुरू की थी और एक करोड़ बिहारियों के हस्ताक्षर जुटा कर केंद्र सरकार को सौंपे थे. नीतीश कुमार बारबार यह रट लगा रहे हैं कि बिहार के सामाजिक और माली पिछड़ेपन को दूर करने के लिए राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलना जरूरी है.

आजादी के बाद से ही केंद्र सरकारों ने बिहार की अनदेखी की है. पढ़ाईलिखाई और सेहत के लिए जरूरत से काफी कम पैसे मिले. रोजगार के लिए बड़ी तादाद में लोग राज्य से भाग रहे हैं. खनिज से भरा होने के बाद भी यहां उद्योग नहीं लग सके हैं. जिन उद्योगों को बिहार आना चाहिए था वे छिटक कर दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में चले गए. साल 2000 में बिहार के बंटवारे ने तो राज्य को पूरी तरह से चौपट कर के रख दिया. खदान वाला हिस्सा झारखंड में चला गया. विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद राज्य में पूंजी निवेश बढ़ेगा, कारखाने लगेंगे, रोजगार के मौके बढ़ेंगे और लोगों का यहां से जाना भी रुकेगा.

राजद नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि नीतीश कुमार इस मामले पर केवल हवाबाजी करते रहे हैं. बिहार के साथ कभी इंसाफ हुआ ही नहीं है. सरकार के पास केंद्र सरकार से विशेष राज्य के दर्जे की भीख मांगने के अलावा और कोई काम नहीं रह गया है. सरकार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि केंद्र की वजह से ही राज्य की तरक्की नहीं हो पा रही है, तो राजद सरकार पर वह किस मुंह से बिहार के पिछड़ेपन का आरोप मढ़ती रही है.

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करने वालों का कहना है कि बिहार को एक स्पैशल इकोनौमी पैकेज की जरूरत है और इस के लिए संविधान में दिए गए मापदंडों की समीक्षा की जानी चाहिए. पिछड़े राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दे कर माली मदद और टैक्सों में छूट दी जाती है. जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, सिक्किम और मेघालय को पिछड़े राज्यों का दर्जा दे कर केंद्र सरकार स्पैशल मदद दे रही है.

बिहार प्रदेश विशेष राज्य दर्जा संघर्ष समिति के मुख्य प्रवक्ता संजय वर्मा कहते हैं कि बिहार का एक बड़ा इलाका नक्सलवाद, बाढ़, सूखा, पलायन, भौगोलिक अलगाव, बेरोजगारी, बिजली की कमी, कारखानों की कमी और कमजोर माली हालात से जूझ रहा है, ऐसे में विशेष राज्य का दर्जा पाए राज्यों से बिहार की हालत बेहतर नहीं है. आमतौर पर राज्य को केंद्र सरकार तरक्की की योजनाओं के लिए

30 फीसदी अनुदान और 70 फीसदी कर्ज के रूप में देती है. स्पैशल राज्य का दर्जा मिलने पर 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी कर्ज मिलता है.

बिहार चैंबर औफ कौमर्स के अध्यक्ष ओपी साह कहते हैं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद इस का औद्योगिक और माली रंगरूप पूरी तरह से बदल जाएगा और बिहार तरक्की की दिशा में ऊंची छलांग लगा सकेगा. औद्योगीकरण और रोजगार पैदा न होने से राज्य में ठहराव के हालात बन गए हैं.

वैसे, इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि देश के बाकी राज्यों की तुलना में बिहार की काफी अनदेखी हुई है, इसलिए यह समय की मांग है कि बिहार को स्पैशल राज्य का दर्जा मिले.

क्या मिलेगा विशेष राज्य का दर्जा से

* केंद्रीय अनुदान का फार्मूला 70:30 के बजाय 90:10 हो जाएगा.

* कर्ज मुहैया होने की वजह से संसाधन जुटाना आसान होगा.

* कर्ज के बोझ में कमी आएगी. इस से बाजार को लुभाना आसान होगा और निवेश बढ़ेगा.

* सामाजिक और माली क्षेत्र के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा.

* टैक्सों और ऐक्साइज ड्यूटी में काफी छूट मिलेगी. इस से प्राइवेट निवेश में तेजी आएगी.

* गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार पैदा होने के कामों में तेजी आएगी, जिस से विकास दर बढ़ेगी.

11 लोगों द्वारा सामूहिक आत्महत्या : अंधविश्वास की पराकाष्ठा

सुबह के साढ़े 7 बज चुके थे, पर ललित की दुकान अभी तक बंद थी. जबकि रोजाना साढ़े 6 बजे ही दुकान खुल जाती थी. दुकान बंद देख कर पड़ोस में रहने वाले गुरचरण सिंह को आश्चर्य हुआ. क्योंकि उन के घर का मुख्य दरवाजा खुला था. जबकि अमूमन होता उलटा था, दुकान खुली होती थी और घर का दरवाजा बंद होता था.

संतनगर, बुराड़ी की गली नंबर 2 में रहने वाले गुरचरण सिंह का घर ललित के पड़ोस में ही था. ललित के घर का मुख्य दरवाजा खुला देख गुरचरण सिंह उन के घर के भीतर चले गए. अंदर का दृश्य देख कर वह हक्केबक्के रह गए. छत पर लगी लोहे की ग्रिल से घर के सारे सदस्य फांसी के फंदे पर लटके हुए थे. यह खौफनाक दृश्य देख गुरचरण सिंह उल्टे पांव वापस लौट आए और पड़ोस के लोगों को इकट्ठा कर अंदर की जानकारी दी. साथ ही उन्होंने पुलिस को भी सूचना दे दी. गली नंबर 2 में रहने वाले जिस किसी ने भी घर में जा कर देखा, हैरान रह गया. घर के सभी 11 लोगों के फांसी के फंदे पर झूलने की बात सुन कर कुछ ही देर में वहां लोगों की भीड़ जुट गई.

कुछ ही देर में बुराड़ी थाने की पुलिस भी आ गई. यह बात पहली जुलाई 2018 की सुबह की थी. एक ही घर के 11 लोगों की मौत बहुत बड़ी घटना थी. सूचना पा कर थोड़ी देर में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल पर पहुंचना शुरू कर दिया था.

पुलिस आयुक्त के आदेश पर क्राइम ब्रांच के कई अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. फौरेंसिक और क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीमें भी मौके पर पहुंच कर जांच में जुट गईं. मरने वालों में 4 पुरुष और 7 महिलाएं थीं. जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. इन में से 4 पाइप बडे़ और सीधे थे, जबकि 7 अन्य पाइपों का मुंह नीचे की ओर था.

घर की मुखिया नारायणी देवी की लाश नीचे फर्श पर पड़ी थी. उन के 2 बेटों भुवनेश और ललित, उन की पत्नियां सविता और टीना, नारायणी की विधवा बेटी प्रतिभा और प्रतिभा की बेटी प्रियंका की लाशें जाल में बंधी चुन्नियों से लटकी थीं.

भुवनेश के 3 बच्चे नीतू, मेनका व ध्रुव और ललित के बेटे शिवम की लाशें भी चुन्नी के सहारे जाल से लटकी हुई थीं. सभी लाशें प्रथम तल पर थीं. यह पूरा परिवार भोपाल सिंह भाटिया का था. भोपाल सिंह की मौत करीब 11 साल पहले हो गई थी.

प्रथम तल पर जाने वाली सीढ़ी के दोनों दरवाजे खुले थे. घर में कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. न ही लूटपाट के कोई निशान थे. संभवतया देश भर में यह अपनी तरह की पहली घटना थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के 11 लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

नारायणी देवी का एक बेटा दिनेश सिविल कौंट्रेक्टर है जो अपने परिवार के साथ राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में रहता है और उन की एक बेटी सुजाता पानीपत में रहती है. पुलिस ने इन दोनों भाईबहनों के पास भी सूचना भिजवा दी.

सामूहिक आत्महत्या की देश की सब से बड़ी घटना

मामले की जांच क्राइम ब्रांच ने शुरू कर दी. ज्योंज्यों तफ्तीश आगे बढ़ी मामला साफ होता गया. शुरू में हत्या और सामूहिक आत्महत्या, दोनों एंगल से जांच शुरू की गई. भाटिया परिवार के बचे सदस्यों ने यह हत्या का मामला बताया. भोपाल सिंह की बेटी सुजाता ने कहा कि उन का परिवार आत्महत्या नहीं कर सकता. उन की योजनाबद्ध तरीके से किसी ने हत्या की है. परिवार धार्मिक जरूर था पर अंधविश्वासी नहीं था.

पुलिस की जांच में 11 लोगों की मौत का खुलासा हुआ तो अंधविश्वास की एक ऐसी खौफनाक कहानी सामने आई जिसे सुन कर हर कोई दंग रह गया. अंधविश्वास के दलदल में फंस कर समूचा परिवार मौत के मुंह में समा गया. अंधविश्वास से जुड़ी यह विरल घटना थी, जिसे जान कर हर कोई हैरान और सन्न रह गया. टीवी चैनलों पर दिनभर भाटिया परिवार की मौत की सनसनीखेज खबरें प्रसारित होने लगीं.

अंधविश्वास की इस घटना ने तमाम वैज्ञानिक और शैक्षिक तरक्की को अंगूठा दिखा दिया. इस घटना ने समाज के उस अंधकार को उजागर किया, जिस के भीतर सदियों से डूबा यह देश परमात्मा, आत्मा, स्वर्ग, नरक, मुक्ति और मोक्ष को तलाशता रहा है.

पुलिस जांच में सामने आया कि घर की मुखिया जिन नारायणी देवी की लाश फर्श पर पड़ी मिली, उन्हें गला घोंट कर मारा गया था. बाकी सभी के शव जाल से लटके मिले. उन की आंखों पर पट्टी बंधी थी, मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. हाथ बंधे हुए थे.

पुलिस को मकान से जो डायरी मिली उस से पता चला कि यह सब मौतें अंधविश्वास की वजह से हुई थीं. डायरी में लिखी बातों से पता लगा कि ललित पिता के अलावा परिवार से जुड़े 5 अन्य सदस्यों की आत्मा को भी मोक्ष दिलाना चाहता था. डायरी में 9 जून को लिखा था, ‘अभी 7 आत्माएं मेरे साथ भटक रही हैं. क्रिया में सुधार करोगे तो गति बढ़ेगी. मैं इस चीज के लिए भटक रहा हूं. ऐसे ही सज्जन सिंह, हीरा, दयानंद, कर्मानंद, राहुल, गंगा और जमुना देवी मेरे सहयोगी बने हुए हैं.’

ललित ने जिन लोगों का जिक्र किया है उन में सज्जन सिंह ललित का ससुर यानी उस की पत्नी टीना का पिता, हीरा प्रतिभा का पति, दयानंद और गंगा देवी ललित की बहन सुजाता के ससुराल पक्ष के लोग थे, जो कुछ समय पहले मरे थे.

संयुक्त आयुक्त क्राइम ब्रांच आलोक कुमार के मुताबिक तफ्तीश में जितने भी सबूत मिले, उस से साफ हो गया कि परिवार के सभी सदस्यों ने अंधविश्वास के चलते सामूहिक आत्महत्या की थी. ऐसा करने के लिए पूरे परिवार को ललित ने मजबूर किया था.

शुरू में इन लोगों की हत्या का संदेह जताया गया पर बाद में सबूतों और पूछताछ के आधार पर एक ऐसे परिवार की कहानी सामने आई, जो अंधविश्वास के ऐसे खौफनाक अंधकार में फंसा हुआ था कि किसी में विवेक नाम की जरा भी शक्ति नहीं बची थी. अंधविश्वास के दलदल में फंसे इस परिवार की भयावह हकीकत जान कर हर कोई सन्न रह गया.

अंधविश्वास का अंधकूप

तलाशी के दौरान पुलिस को छानबीन में घर से कई डायरियां मिलीं, इन डायरियों में परिवार के सदस्यों की इन मौतों की पूरी पटकथा लिखी थी. पुलिस ने कडि़यां जोड़ीं तो इस परिवार द्वारा मृत पिता भोपाल सिंह की ‘आत्मा’ के आदेश पर ‘परमात्मा’ से मिल कर वापस लौट आने का झूठा भ्रम फैलाया गया था.

भाटिया परिवार के मझले बेटे ललित के सिर में कुछ साल पहले चोट लगी थी. जिस की वजह से वह बोल नहीं पाता था. चोट से उस के दिमाग पर बुरा असर पड़ा था. उस का 3 साल तक इलाज चला. इस के बाद वह थोड़ाथोड़ा बोलने लगा था. इसे वह चमत्कार मानता था.

ललित ने दावा करना शुरू कर दिया था कि उस पर उस के पिता भोपाल सिंह की आत्मा आती है और वह परिवार को सुखी रखने और दुख दूर करने के उपाय बताती है. बाद में उस ने डायरी लिखनी शुरू की जिस में धार्मिक आदेशात्मक बातें लिखता था.

पुलिस के अनुसार ललित ने अंधविश्वासी क्रियाएं जुलाई, 2007 से शुरू कीं. ललित पूजापाठ से परिवार की समस्याएं दूर करता था. पड़ोसी बताते हैं कि इस काम में ललित की पत्नी टीना भी मदद करती थी. वह पूरी धार्मिक हो गई थी.

भाटिया परिवार हदे से परे तक धार्मिक प्रवृत्ति का था और पूजापाठ में डूबा रहता था. साथ ही वह घोर अंधविश्वासी भी था. पूरा परिवार सुबह, दोपहर और शाम यानी 3 टाइम पूजापाठ करता था. क्राइम ब्रांच को 5 जून, 2013 से 30 जून, 2018 तक की तारीखों में लिखी 11 डायरियां मिलीं.

इन डायरियों में अलगअलग तरह की लिखावट थी. ज्यादातर लिखावट प्रियंका की थी. ललित पर जब पिता का साया आता था और वह जो बोलता था उसे प्रियंका ही नोट करती थी.

भाटिया परिवार को भरोसा था कि दिवंगत पिता की आत्मा परिवार की मदद कर रही है. यह विश्वास इसलिए बढ़ा क्योंकि घर के बाहर दोनों भाइयों की 2 दुकानें अच्छी चल रही थीं. भुवनेश की बेटी मेनका भी स्कूल में टौपर बच्चों में से थी. भुवनेश की किराने की दुकान थी और ललित की प्लाईवुड की.

भाइयों के बच्चे भी अच्छे नंबरों से पास होते थे. इन के अलावा ललित की भांजी प्रियंका को मांगलिक बताया गया था. इस के बावजूद उस का रिश्ता तय हो गया था. 17 जून, 2018 को ही प्रियंका की सगाई नोएडा के एक इंजीनियर लड़के से तय हो गई थी और परिवार ने सगाई का कार्यक्रम बड़ी खुशीखुशी किया था.

इस से पहले ललित ने प्रियंका का रिश्ता न होने पर उसे मांगलिक मान कर घर में हवनपूजा की थी. जिस में उस ने दावा किया था कि उस के पिता की आत्मा भी मौजूद है. प्रियंका के मांगलिक होने पर ललित ने उज्जैन जा कर भी पूजापाठ कराया था. ललित तंत्रमंत्र क्रियाएं भी कराता रहता था.

जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. यह पाइप भी ललित ने ही लगवाए थे. इन की वहां जरूरत भी नहीं थी. पुलिस को यह पता नहीं लगा कि ललित ने ये पाइप किसलिए लगवाए थे.

पढ़ेलिखे बेवकूफ

पूरा भाटिया परिवार पढ़ालिखा था. 32 साल की प्रियंका ने एमबीए किया था. वह दिल्ली में ही पढ़ीलिखी थी. इस समय प्रियंका नोएडा की सीपीएम ग्लोबल कंपनी में नौकरी करती थी. इस से पहले वह एक नामी सौफ्टवेयर कंपनी में थी.

प्रियंका की भी धर्म, ज्योतिष और धर्मगुरुओं के प्रति रुचि थी. वह सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी. जन्म के 2 साल बाद ही प्रियंका के पिता हीरा की मृत्यु हो गई थी. इस के बाद वह अपनी मां के साथ राजस्थान से आ कर संतनगर, बुराड़ी में रहने लगी थी. प्रियंका की मां प्रतिभा घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी.

प्रियंका का रिश्ता हो जाने पर ललित ने अपने पिता और भगवान का शुक्रिया करने के लिए 24 से 30 जून तक 7 दिन की पूजा साधना क्रिया का प्रोग्राम तय किया था, जिस में पूरे परिवार को शामिल होना था. इस बात की तस्दीक डायरी में लिखी बातों से होती है.

डायरी में एक सप्ताह पहले लिखा गया था कि इस पूजा का उद्देश्य भगवान को धन्यवाद देना था, क्योंकि पूरे परिवार का मानना था कि भगवान उन पर आशीर्वाद बनाए हुए हैं. कुछ वर्षों के दौरान ललित अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गया था कि पिता की आत्मा की वजह से उन का परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है.

डायरी में परिवार के सदस्यों की मौत का पूरा बयौरा लिखा गया था. डायरी में एक जगह लिखा था, ‘सभी सदस्य मोक्ष प्राप्त करने के बाद भगवान से मिल कर वापस धरती पर आ जाएंगे. इस के लिए तैयार रहना.’

आगे लिखा था, ‘बड़ पूजा क्रिया की जाएगी. यानी बड़ वृक्ष के नीचे लटकी जड़ों की तरह सब को लटकने की क्रिया करनी होगी. यह पूजा पूरी लगन और श्रद्धा से लगातार 7 दिन करनी है. पूजा के समय अगर कोई घर में आ जाए तो पूजा अगले दिन से शुरू होगी.’

एक जगह लिखा था, ‘9 सदस्यों के लिए भगवान का रास्ता जाल (घर में लगा लोहे का जाल) से शुरू होता है. बेबी (प्रतिभा) मंदिर के निकट स्टूल पर खड़ी होगी. 10 बजे भोजन का और्डर किया जाएगा. मां रोटी खिलाएंगी. क्रिया 1 बजे होगी. गीला कपड़ा मुंह में रखना होगा. टेप से हाथों को बांधना होगा और कानों को रूई से बंद करना होगा.’ आगे लिखा था, ‘पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. उस समय शून्य के अलावा कुछ भी नहीं दिखना चाहिए.’

यह भी लिखा था, ‘एक कप पानी का रखा जाएगा और जब पानी का रंग बदल जाएगा तब समझना कि पिता की आत्मा प्रकट हो चुकी है और वही आत्मा सब को बचा लेगी.’

ललित ने एक जगह लिखा था, ‘झूठ की जिंदगी से दूर रहना होगा. ऐसा करने से तुम्हारा जीवन आगे नहीं बढ़ेगा. मैं चाहता हूं कि आप ऐसा काम करो जिस से आप को कम मेहनत करनी पड़े और खुशहाल जिंदगी जी सको.’

हवाई खयालों में जीता था ललित

28 जून को डायरी में लिखी गई बात को पढ़ने से साफ हो जाता है कि परिवार का मरने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि इस में अगले महीने तक की प्लानिंग लिखी थी. डायरी में लिखा था, ‘भूपी (भुवनेश) बैंक से पैसा निकालेगा. इस पैसे को दुकान में लगाया जाएगा. घर में इस पैसे का इस्तेमाल कदापि नहीं होगा.’

पुलिस ने दरवाजे के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो 30 जून की सुबह प्रतिभा और प्रियंका मौर्निंग वाक पर जाती दिखीं. भुवनेश सुबह 5:40 बजे मंदिर गया और 5:51 बजे घर वापस आ गया. 10 बजे ललित अपनी दुकान पर गया.

दोपहर में उस ने मोबाइल की एक दुकान से अपना फोन रिचार्ज करवाया. रात 10 बजे सीसीटीवी में घर की 2 महिलाएं स्टूल ले कर आती दिखीं. कुछ देर बाद बच्चे नीचे दुकान से तार ले जाते दिखे. 10:40 बजे डिलीवरी बौय खाना दे कर गया. खाने में केवल 20 रोटियां थीं.

मुंह पर चिपकाने के लिए टेप और अलगअलग रंग की चुन्नियां खरीदी गई थीं. इस से स्पष्ट है कि यह सब ललित के दिमागी पागलपन की निर्धारित योजना के तहत था.

वास्तव में ललित मनोरोगी था. परिवार के किसी सदस्य को इस बात का पता नहीं चला. परिवार यही सोचता था कि जब ललित पर पिता की आत्मा सवार हो जाती है उस समय ललित के मुंह से पिता भोपाल की भाषा शैली में ही आवाज निकलती है. उस समय ललित जो कुछ बोलता था, पूरा परिवार ध्यान से सुन कर उस पर अमल करता था.

डायरी में लिखे गए आदेशों के अनुसार 30 जून, 2018 की रात को पूरे परिवार ने 11 बजे के बाद मोक्ष की क्रिया शुरू की. रात को 10बजे के करीब बाहर से रोटी मंगाई गई. परिवार के पास एक कुत्ता था, जिसे छत के ऊपर जाल में बांध दिया गया और फिर परिवार के सभी 11 सदस्य फंदे बना कर लटक गए. घर का दरवाजा इसलिए खुला रखा गया ताकि ‘पिता की आत्मा’ दरवाजे से प्रवेश कर सके.

ललित ने घर वालों को बताया था कि मोक्ष के लिए उन्हें 7 दिन तक मोक्ष क्रिया करनी होगी और जब यह क्रिया पूरी कर लेंगे तब पिता की आत्मा ही उन्हें बचाएगी. ईश्वर और पिता से मिलने के बाद वे वापस लौट आएंगे.

भाटिया परिवार के सदस्य मरना नहीं चाहते थे और उन्हें जरा भी मालूम नहीं था कि ईश्वर से मिलने के लिए वे जो क्रिया कर रहे हैं, उस से वे सचमुच मौत को गले लगाने जा रहे हैं. उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें पिताजी बचा लेंगे.

डायरी में लिखे मौत के रहस्य

डायरी में फंदे पर कैसे लटकना है, इस का तरीका भी लिखा था. ‘7 दिन लगातार पूजा करनी है. थोड़ी श्रद्धा और लगन से. बेबी खड़ी नहीं हो सकतीं तो वह अलग कमरे में लेट सकती हैं. पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. हाथ प्रार्थना की मुद्रा में होने चाहिए.गले में सूती चुन्नी या साड़ी का ही प्रयोग करना है.’

आगे लिखा था, ‘सब की सोच एक जैसी हो. पहले से ज्यादा दृढ़. स्नान की जरूरत नहीं है, मुंहहाथ धो कर ही काम चल सकता है. इस से तुम्हारे आगे के काम होने शुरू होंगे. ढीलापन और अविश्वास नुकसानदायक होते हैं. श्रद्धा में तालमेल और आपसी सहयोग जरूरी होता है. मंगल, शनि, वीर, इतवार को फिर आऊंगा. मध्यम रोशनी का प्रयोग करना है. हाथों की पट्टी बचेगी. उसे डबल कर के आंखों पर बांधना है. मुंह की पट्टी को भी रूमाल बांध कर डबल कर लेनी है. जितनी दृढ़ता और श्रद्धा दिखाओगे, उतना ही उचित फल मिलेगा. जिस दिन यह प्रयोग करो उस दिन फोन कम से कम प्रयोग करना.’

एक पेज पर लिखा था, ‘धरती कांपे या आसमान हिले लेकिन तुम घबराना मत. मैं आऊंगा और सब को बचा लूंगा.’

मनोचिकित्सकों का मानना है कि असल में ललित मनोरोगी था. उस का रोग धार्मिक मान्यता और अंधविश्वास से जुड़ा हुआ था. ऐसे में पीडि़त व्यक्ति को किसी अदृश्य शक्ति के वश में होने का अहसास होता है और अपने अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूल जाता है. मनोचिकत्सक इसे ‘शेयर्डसाइकोथिक डिसऔर्डर’ कहते हैं. पूरा परिवार इस बीमारी का शिकार था. ललित जो भी बात बताता था, पूरा परिवार उसे उस का आदेश मानता था.

आज पूरे देश में जिस तरह के धार्मिक अंधविश्वास का माहौल बना हुआ है, उसे देखते हुए संतनगर की यह घटना कोई ताज्जुब वाली बात नहीं है. क्योंकि सारा देश ही अंधविश्वास के जंजाल में बुरी तरह उलझा नजर आता है.

मौजूदा समय में लोगों में समस्याओं के समाधान के लिए पूजापाठ, हवनयज्ञ, तंत्रमंत्र, टोनेटोटकों का चलन चरम पर है. कदमकदम पर परेशानियां दूर करने वाले पंडेपुजारी, ज्योतिषी, तांत्रिक, साधु या गुरु अंधविश्वास का डेरा जमाए बैठे हैं.

हर नुक्कड़ पर समस्याओं का समाधान करने का दावा करने वाले तथाकथित मार्गदर्शक बैठे हैं जो बदले में दानदक्षिणा, चढ़ावा मांगते हैं.

धर्मगुरु, पंडेपुजारी अंधविश्वास के अंधेरे को बढ़ावा दे रहे हैं. मीडिया ऐसे पाखंडियों का प्रचार करने में लगा हुआ है. भाग्यवाद, लोकपरलोक, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, मोक्ष, पूर्वजन्म के कर्मों का फल, 33 करोड़ देवीदेवता, 84 लाख योनियां, मोहमाया त्याग कर ईश्वर की शरण में चले जाने जैसी मूर्खता की बातें इंसान को बरगलाने, मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए काफी हैं.

अंधविश्वास का जाल अब गांवों के दायरे से निकल कर शहरों, महानगरों में शिक्षित युवाओं और विदेशों तक पहुंच चुका है. आज लोग विज्ञान से ज्यादा टोनेटोटकों, अंधविश्वास और तंत्रमंत्र में अपनी परेशानियों का समाधान तलाश रहे हैं. अंधविश्वास का यह कारोबार खूब फलफूल रहा है.

11 लोगों की मौत की घटना किसी दूरदराज के इलाके में नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुई जो शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सभ्यता और तथाकथित आध्यात्मिकता व प्रगति संबंधी नीति निर्माण का केंद्र बिंदु है. यहां सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं.

ज्योंज्यों शिक्षा का विस्तार और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रसार हो रहा है, लोग उतने ही अंधविश्वास की गर्त में धंसते जा रहे हैं. अंधविश्वास तार्किक, उदार और स्वतंत्र विचारों पर हावी है. वैज्ञानिक और तार्किक विचारों की बात करने वालों पर हमले किए जाते हैं. ऐसे में संतनगर की घटना समूचे समाज के माथे पर कलंक है. यह घटना अंधविश्वास की इंतहा है.

हजारीबाग में भी हुआ बुराड़ी जैसा सुसाइड कांड

दिल्ली के बुराड़ी आत्महत्या कांड को अभी लोग भूले भी नहीं थे कि झारखंड में इस से मिलतीजुलती दिल हिला देने वाली घटना सामने आ गई. हजारीबाग जिले में एक ही परिवार के 6 लोगों ने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली. इस घटना से शहर के लोग स्तब्ध हैं. जिस घर में खुदकुशी हुई, वहां से पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला है.

पुलिस को पता चला है कि यह परिवार कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था. वैसे पुलिस दूसरे ऐंगल से भी मामले की जांच कर रही है. परिवार में कुल 6 सदस्य थे. इन में से 5 लोगों ने फांसी लगा के फंदे से झूल कर आत्महत्या कर ली, जबकि एक सदस्य ने छत से कूद कर जान दे दी. मरने वालों में मातापिता, बेटाबहू और पोतापोती शामिल थे. पुलिस को कमरे में 3 सुसाइड नोट और कुछ लीगल दस्तावेज भी मिले हैं.

हजारीबाग के महावीर स्थान चौक पर महावीर माहेश्वरी की ड्राई फ्रूट्स की होलसेल की दुकान है. महावीर माहेश्वरी के परिवार में पत्नी किरण माहेश्वरी, एकलौता बेटा नरेश अग्रवाल, बहू प्रीति अग्रवाल, पोता यमन, पोती यान्वी थे.

घटनास्थल पर महावीर अग्रवाल, उन की पत्नी किरण की बौडी फंदे पर,बहू प्रीति पलंग पर, पोती यान्वी सोफे पर मृत मिले. वहीं अमन का गला कटा हुआ था. नरेश अग्रवाल की बौडी अपार्टमेंट के सामने मिली है. पांचवें तल की छत पर रेलिंग के पास एक कुरसी मिली है. इस से अनुमान लगाया गया कि उन्होंने कूद कर खुदकुशी की थी.

पुलिस को कमरे से एक लिफाफा मिला, जिस पर एक तरह से सुसाइड नोट लिखा हुआ था. इस में लिखा है कि अमन को लटका नहीं सकते थे इसलिए हत्या की गई. आगे खुदकुशी को गणित के सूत्र के तौर पर समझाते हुए लिखा गया है, ‘बीमारी+दुकान बंद+दुकानदारों का बकाया न देना+बदनामी +कर्ज = तनाव और मौत.’

नरेश अग्रवाल के चचेरे भाई देवेश का कहना है कि पूरा परिवार काफी सीधा और स्वाभिमानी था. व्यवसाय काफी फैला हुआ था. लेकिन काफी दिनों से मार्केट में पैसा फंसा था. बताया जाता है कि उन का करीब 50 लाख से एक करोड़ रुपए तक की रकम बाजार में फंसी थी. बाजार से रिटर्न नहीं मिलने की वजह से व्यवसायी परिवार पेमेंट नहीं कर पा रहा था.

आयकर विभाग का हैरतंगेज छापा

कन्हैयालाल रस्तोगी लखनऊ के जानेमाने कारोबारी हैं. सोने के साथ रियल एस्टेट, ईंट भट्ठा और ब्याज पर पैसे लेनदेन का कारोबार है, जिसे वह अपने परिवार के साथ चलाते हैं. कन्हैयालाल रस्तोगी के घर आयकर विभाग की छापेमारी के बाद जिस तरह से कुबेर का खजाना मिला, उस से लखनऊ के लोग हतप्रभ रह गए.

लखनऊ में रस्तोगी बंधु के नाम से कन्हैयालाल रस्तोगी और संजय रस्तोगी का बहुत पुराना कारोबार है. राजा बाजार में इन का अपना निजी आवास है. सुभाष मार्ग पर इन का कार्यालय है. रस्तोगी बंधु अपना कारोबार मिलजुल कर चलाते हैं.

लखनऊ में रस्तोगी बिरादरी का सोने, चांदी और ब्याज पर पैसे देने का पुश्तैनी कारोबार होता है. रस्तोगी बंधु के नाम से मशहूर कन्हैयालाल रस्तोगी और संजय रस्तोगी का लखनऊ के अलावा मुंबई में भी कामकाज था. लखनऊ के सर्राफा कारोबार में इन की अपनी अलग साख थी. कुछ सालों पहले इन लोगों ने प्रौपर्टी के कारोबार में अपनी पूंजी लगा दी थी.

सोना और प्रौपर्टी दोनों ही ब्लैकमनी को खपाने के सब से बड़े ठिकाने बन कर उभर रहे हैं. ऐसे में रस्तोगी बंधु आयकर विभाग के निशाने पर आ गए. आयकर विभाग को पता चला कि रस्तोगी बंधु प्रौपर्टी और सर्राफा कारोबार के साथ हवाला के जरिए पैसों का भी लेनदेन करते हैं. लखनऊ स्थित आयकर विभाग की जांच इकाई ने 17 जुलाई, 2018 की सुबह 8 बजे डिप्टी कमिश्नर रवि मल्होत्रा के नेतृत्व में रस्तोगी बंधु के राजाबाजार और सुभाष मार्ग स्थित ठिकानों पर छापेमारी की.

आयकर विभाग को अपने सूत्रों से जो जानकारी मिली थी, उस से कहीं अधिक नकदी और सोनेचांदी यहां से मिलने शुरू हुए. ऐसे में आयकर विभाग को अपनी छापेमारी का काम 17 जुलाई, 2018 को पूरा होता नहीं दिखा तो 18 जुलाई को आयकर विभाग की दूसरी टीम ने एडीशनल कमिश्नर पूजा पाल की अगुवाई में जांचपड़ताल शुरू की.

18 जुलाई की देर रात तक उत्तर प्रदेश आयकर विभाग की टीम ने इस छापेमारी में सब से बड़ी बरामदगी की. इस काम में आयकर विभाग की 6 टीमों के साथ बरामद नोटों की गिनती के लिए स्टेट बैंक औफ इंडिया के भी कुछ कर्मचारी शामिल किए गए.

लखनऊ के साथ ही साथ मुंबई में भी रस्तोगी बंधु के कारोबारी ठिकानों पर छापेमारी हुई. 2 दिनों तक चली छापेमारी के बाद आयकर विभाग के प्रवक्ता एवं डिप्टी कमिश्नर (जांच) जयनाथ वर्मा के मुताबिक कन्हैयालाल रस्तोगी और उन के बेटे के घर से 8.08 करोड़ की नकदी और 87 किलोग्राम सोने के बिस्कुट के रूप में बरामद हुए. साथ ही 2 किलोग्राम सोने के गहने भी मिले.

बरामद सोने के बिस्कुट हालमार्क प्रमाणित थे, जिस में सोने की शुद्धता 99.9 प्रतिशत थी. संजय रस्तोगी के घर से 1.13 करोड़ रुपए एवं 11.64 किलोग्राम सोना बरामद हुआ. 2 दिन की बरामदगी के बाद आयकर विभाग अब रस्तोगी बंधु के सूदखोरी के धंधे की भी जांच कर रहा है. शुरुआती जानकारी में पता चला कि इन लोगों ने 60 करोड़ रुपए सूदखोरी में खपाए गए हैं. जानकारी के मुताबिक रस्तोगी बंधु के पास सूदखोरी एजेंटों के जरिए होती है.

जानकारी के अनुसार रस्तोगी बंधु के पास रियल एस्टेट और ईंट भट्ठे का भी काम है. परिवार ने विदेशों में भी पूंजी निवेश कर रखी है. आयकर विभाग ने रस्तोगी बंधु के परिजनों को खर्च के लिए 16 लाख रुपए छोड़ कर बाकी नकदी जब्त कर ली. लखनऊ के लोग रस्तोगी बंधु के रहनसहन को देख कर इस बात पर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि उन के यहां से इतना पैसा और सोना बरामद हुआ है.

कन्हैयालाल रस्तोगी बहुत ही सीधेसरल दिखने वाले कारोबारी हैं. ऐसे में निश्चित रूप से यह रकम उन की मेहनत की कमाई हो सकती है. यह बात जरूर है कि बरामद जेवरों और सोने के बिस्कुटों के कागजात वह नहीं दिखा सके. आयकर विभाग के छापेमारी के बाद से कन्हैयालाल रस्तोगी का पूरा परिवार किसी भी तरह की बातचीत करने को तैयार नहीं था.

आयकर विभाग के अफसरों ने कहा कि बरामद सोने की जांच के बाद ही सटीक जानकारी हो सकती है. आयकर विभाग उन लोगों की भी छानबीन कर रहा है, जिन से रस्तोगी बंधु का कारोबार होता था. अब देखना यह है कि इस जांच के बाद आयकर विभाग का जाल कहां फेंका जाएगा.

सत्यमेव जयते : प्रासंगिक कहानी का घटिया प्रस्तुतिकरण

भ्रष्टाचार को खत्म करने तथा ईमानदार पिता के माथे पर लगे कलंक को मिटाने के लिए सभी भ्रष्ट पुलिस अफसरों को मौत के घाट उतारने की कहानी है फिल्मकार मिलाप मिलन झवेरी की एक्शन व रोमांचक फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते.’’ अतिनाटकीय घटनाक्रमों, अति रक्त रंजित दृश्यों से युक्त फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ में नएपन का घोर अभाव है. फिल्म देशभक्ति के साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश देने में भी पूरी तरह से विफल है. फिल्म देखते समय दर्शक को सत्तर व अस्सी के दशक में बनी इंतकाम व अच्छाई बनाम बुराई की कहानी वाली सैकड़ों ‘बी’ ग्रेड फिल्में याद आ जाती है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है एक भ्रष्ट पुलिस अफसर को वीर (जौन अब्राहम) के द्वारा आग में जिंदा जलाने से. जब तीन पुलिस अफसर इस तरह जलाकर मौत के घाट उतार दिए जाते हैं, तब अपराधी को पकड़ने के लिए पुलिस कमिश्नर (मनीष चौधरी), डीसीपी शिवांष (मनोज बाजपेयी) को जिम्मेदारी दी जाती है. डीसीपी शिवांष का हर कदम उन्हे अपराधी से दूर ही ले जाता है और भ्रष्ट पुलिस अधिकारी मारे जाते रहते हैं. इंटरवल तक पता चल जाता है कि वीर व शिवांष भाई हैं. जब यह बच्चे थे, तब इनके पिता और ईमानदार पुलिस अफसर शिवा को उनके दोस्त व पुलिस अफसर (मनीष चौधरी) ने ही साजिष रचकर ड्रग्स की तस्करी करने व घूस लेने के आरोप में पुलिस की नौकरी से निकलवाया था, जिसके बाद शिवा ने खुद को आग लगा ली थी.

बाद में बड़े होकर शिवांष पुलिस की नौकरी करने लगे और वीर एक चित्रकार बन गए. पर वीर ने भ्रष्ट पुलिस अफसरों की पहचान कर उनकी हत्या करने का सिलसिला जारी रखा. अंत में अपने पिता के अपराधी को वीर सजा देता है, मगर ईमानदार पुलिस अफसर शिवांष के हाथों गोली चलती है और वीर मारा जाता है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इस फिल्म के लेखक व निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी ही हैं. फिल्म की पटकथा बहुत कमजोर व सतही है. इस कमजोर कड़ी के चलते जौन अब्राहम और मनोज बाजपेयी का बेहतरीन अभिनय भी फिल्म को अच्छा नहीं बना पाता. पूरी फिल्म में भारी भरकम संवाद दर्शक को देशभक्ति या ईमानदारी का सबक देने की बजाय उसके सिर के उपर से गुजरते हैं.

फिल्म के कुछ संवाद तो बहुत सतही हैं. मसलन-‘पता लगाओ उसकी कोई रखैल है या नहीं. फिल्म के शुरुआती दृश्य और क्लायमेक्स प्रभावहीन हैं, इन पर कैंची चलाकर छोटा किया जाना चाहिए था. फिल्म में पुलिस अफसर को पीटना, फिर उस पर किरोसीन /घासलेट छिड़कना, फिर माचिस की तीली से आग लगा देने के दृश्य कई बार हैं. जबकि इसे सांकेतिक या छोटा करके भी दिखाया जा सकता था. फिल्म में जौन अब्राहम और आएशा शर्मा की प्रेम कहानी भी जबरन ठूंसी हुई लगती है. भ्रष्टाचार जैसे अति गंभीर मुद्दे को फिल्म में मजाक बना दिया गया.

मिलाप मिलन झवेरी की फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ की फिल्म में दीवार, दबंग, सिंघम, अक्षय कुमार की फिल ‘गब्बर इज बैक’ सहित कई फिल्मों का मिश्रित मुरब्बा है.

एक गुस्सैल आम आदमी वीर के किरदार में जौन अब्राहम ने बेहतरीन अभिनय किया है. दृढ़ प्रतिज्ञ व ईमानदार पुलिस अफसर शिवांष के किरदार में मनोज बाजपेयी ने दमदार अभिनय किया है. मनीष चौधरी का अभिनय ठीक ठाक है. नवोदित अभिनेत्री आएशा शर्मा ने काफी निराश किया है. फिल्म का गीत संगीत प्रभावित नहीं करता.

दो घंटे 21 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ का निर्माण टीसीरीज व निखिल अडवाणी ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी, संगीतकार साजिद वाजिद, तनिस्क बागची, रोचक कोहली, कैमरामैन निगम  बोमजान तथा कलाकार हैं – जौन अब्राहम, मनोज बाजपेयी, आएशा शर्मा, अमृता खानविलकर, तोतारौय चौधरी, देवदत्ता नागे, नोरा फतेही व अन्य..

गोल्ड : देशभक्ति के जज्बे के साथ इतिहास के अध्याय का चित्रण

हौकी के खेल के इर्दगिर्द बुने गए देश के जज्बे से लबालब इतिहास के किसी पन्ने को मनोरंजक तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर पेश करना आसान तो नहीं कहा जा सकता, मगर रीमा कागती ने इसे बड़ी खूबसूरती से अंजाम दिया है.

खेल के मैदान पर अपने देश के झंडे को लहराते हुए देखना हर नागरिक के लिए गर्व की बात होती है. पर खेल के मैदान पर जब खिलाड़ी देशभक्ति के जज्बे के साथ खेलते हुए जीत के बाद अपने वतन के झंडे को लहराते हुए अपने देश का राष्ट्रन विदेशी धरती पर गाता है, उस वक्त उसका सीना चौड़ा हो ही जाता है.

ऐसे ही खेल के मैदान की ऐसी कहानी, जिसके बारे में वर्तमान पीढ़ी बहुत कम जानती है, को फिल्मकार रीमा कागती फिल्म ‘‘गोल्ड’’ में लेकर आयी हैं. यह कहानी है 200 साल की अंग्रेजों की गुलामी के बाद आजाद हुए भारत की हौकी टीम द्वारा 1948 में लंदन में संपन्न पहले ओलंपिक में अंग्रेजों की ही धरती पर उन्हें परास्त कर अपने वतन के झंडे को लहराने व राष्ट्रगान का सपना देखने वाले एक युवक की. यह ऐसी कहानी है जिसे हर इंसान जरूर देखना चाहेगा.

फिल्म की कहानी 1936 से शुरू होती है, जब बर्लिन में आयोजित ओलंपिक खेलों में तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया की हौकी टीम ने जर्मनी को हराकर गोल्ड मैडल जीता था. उस वक्त इस टीम के कैप्टन थे सम्राट (कुणाल कपूर). तथा जूनियर मैनेजर थे तपन दास (अक्षय कुमार). जब ब्रिटिश टीम हार रही होती है, तब तपनदास ने ग्रीन रूम में खिलाड़ियों को अपने बैग में छिपाए भारतीय झंडे को दिखाकर कहा था कि उन सबको इसके सम्मान के लिए खेलना है और अंततः टीम ने गोल्ड जीता था. उसी वक्त तपन दास ने सपना देखा था कि आजादी के बाद होने वाले ओलंपिक में भारत, अंग्रेजों को हौकी में हराएगा.

कहानी आगे बढ़ती है. 1947 में भारत देश आजाद होता है और 1948 में लंदन में ओलंपिक होते हैं. जिसके लिए तपनदास काफी जद्दोजेहाद करके भारतीय हौकी टीम तैयार करता है, जिसे सम्राट प्रशिक्षित करते हैं. इस टीम में बलरामपुर के राज कुमार रघुवीर प्रताप सिंह (अमित साध) और पंजाब के हिम्मत सिंह (सनी कौशल) भी जुड़ते हैं. भारतीय हौकी फेडरेशन के सेक्रेटरी मेहता, तपन दास के खिलाफ अपनी घटिया राजनीतिक चालें चलते रहते हैं. पर तपन को फेडरेशन के अध्यक्ष का साथ मिल जाता है. उधर रघुवीर प्रताप सिंह ओर हिम्मत सिंह के बीच भी तनातनी है. मगर तपन दास की सूझबूझ के चलते 1948 के ओलंपिक में इंग्लैंड की ही धरती पर हौकी में हराकर गोल्ड मैडल जीतकर भारतीय हौकी टीम अंग्रेजों से 200 साल का हिसाब चुकता करती है. वहां भारतीय तिरंगा फहराए जाने के साथ राष्ट्रगान भी होता है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी यह है कि यदि यह कहानी एक कालखंड की न हो, तो  कहानी व घटनाक्रमों के स्तर पर काफी कुछ पुरानी फिल्म ‘‘चक दे इंडिया’’ से ली गयी है. यह बात ‘गोल्ड’ के खिलाफ जाती है. अन्यथा फिल्म के कई हिस्से बहुत बेहतरीन हैं.

लेखक व निर्देशक ने आजादी से पहले व आजादी के बाद देश व खिलाड़ियों के बीच आए बदलाव को भी बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है. आजादी से पहले ब्रिटिश शासन के दबाव में किस तरह दबाव के साथ खिलाड़ी खेलते हैं और आजादी के बाद भारतीय तिरंगे के लिए जीतने के जज्बे के साथ जब खेलते हैं, तो कितना अंतर होता है. इसे भी निर्देशक ने कुशलता से चित्रित किया है. तो वहीं राज कुमार भले ही बेहतरीन हौकी खिलाड़ी हो, पर उसके अंदर राजशाही परिवार के होने के गरूर का भी अच्छा चित्रण है. यदि फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसकर छोटा किया जाता, तो फिल्म और अधिक बेहतर हो सकती थी. यदि फिल्मकार ने गिमिक से बचने का प्रयास किया होता, तो ज्यादा अच्छा होता. सनी कौशल व निकिता दत्ता की प्रेम कहानी जबरन ठूंसी हुई लगती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अक्षय कुमार ने धोती पहने हुए बंगाली तपन दास के किरदार को निभाते हुए एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह किसी भी किरदार में अपने अभिनय से जान डाल सकते हैं. वह कभी हंसाते हैं, तो कभी भावुक भी करते हैं. सम्राट के किरदार में कुणाल कपूर, रघुवीर प्रताप सिंह के किरदार में अमित साध, हिम्मत सिंह के किरदार में सनी कौशल ने भी अच्छा काम किया है. विनीत कुमार सिंह ने भी ठीकठाक अभिनय किया है. टीवी अदाकारा मौनी रौय की पहली फिल्म है, अभी उन्हे बहुत कुछ सीखने व मेहनत करने की जरुरत है.

कैमरामैन अल्वरो गुटीरेज भी बधाई के पात्र हैं.

दो घंटे 33 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘गोल्ड’’ का निर्माण रितेश सिद्धवानी व फरहान अख्तर ने किया है. फिल्म की निर्देशक रीमा कागती, संवाद लेखक जावेद अख्तर, पटकथा लेखक राजेश देवराज, कहानीकार रीमा कागती व राजेश देवराज, संगीतकार सचिन जिगर, कैमरामैन अल्वरो गुटीरेज तथा कलाकार हैं – अक्षय कुमार, मौनी रौय, कुणाल कपूर, अमित साध, विनीत कुमार सिंह, सनी कौशल, निकिता दत्ता, दिलीप ताहिल, जतिन सरना, भावशील साहनी, अब्दुल कादिर अमीन व अन्य.

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