Download App

खफा है जमाना हम से

जमाने से कुछ खफा से हैं आजकल,

या जमाना ही खफा है हम से आजकल.

जिस मोहब्बत को पाने के लिए,

कायनात का शुक्रिया करते थे हम,

उसी को कोसते नहीं थकते हम आजकल,

मोहब्बत नहीं मिली होती तो शायद,

एक ही गम होता मोहब्बत न पाने का,

जमाने भर से लड़े जिस के लिए,

उसी मोहब्बत की तलवार से कट गए हम

तभी तो जमाने से खफा से हैं आजकल

या जमाना ही खफा है हम से आजकल.

– स्मृति भोला

टेस्टी फूड स्पैशल : गाय के घी का शिगूफा

इन दिनों बाजार में गाय के घी का बुखार बेवजह नहीं चढ़ा है, बल्कि यह एक प्रायोजित षड्यंत्र है जिस के तहत गाय के घी का गुणगान अमृत की तरह किया जा रहा है. गाय को ले कर राजनीति तो और ज्यादा गरमा ही रही है, साथ ही, मौब लिंचिंग भी आम हो चली है यानी हर स्तर पर गाय की ब्रैंडिंग जारी है, भले ही वह वादविवाद और हिंसा की शक्ल में हो, लेकिन है.

हिंदू धर्म में बखान किया गया है कि गाय पूजनीय है, माता है. उस में सभी देवीदेवताओं का वास है, इसलिए वह पवित्र है. उसे मारा जाना और गौमांस खाना अक्षम्य अपराध है. जो ये बातें सीधेसीधे नहीं मानेगा उसे सड़क पर पीटपीट कर मारने का माद्दा हिंदू रखते हैं.

हालांकि ये सब धार्मिक और सियासी बातें व टोटके हैं लेकिन सच यह भी है कि गाय 70 के दशक तक अर्थव्यवस्था की रीढ़ नहीं तो छोटीमोटी हड्डी जरूर हुआ करती थी. गाय अकेली ऐसे जानवरों में से है जो मरने के बाद भी आदमी के काम आती है. इस की हड्डियों से खाद बनाई जाती है और खाल यानी चमड़े से जूते बनाए जाते हैं. जिस से करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है.

नया शिगूफा गाय का घी

धीरेधीरे लोगों को समझ आया कि गाय पालना घाटे का सौदा है, लेकिन इस से गाय का धार्मिक महत्त्व खत्म नहीं हो गया. गौदान का चलन आज भी बरकरार है. फर्क इतना है कि असली गाय दान करने के बजाय यजमानों से उस का नकद मूल्य लिया जाने लगा है.

गाय पूरी तरह परिदृश्य से लुप्त न हो जाए, इसलिए हैरतअंगेज तरीके से गाय के घी की ब्रैंडिंग 5 सालों से कुछ इस तरह हो रही है कि हर किसी को लगने लगा है कि उसे एक बार गाय का घी आजमा कर देखना ही चाहिए.

घी बनाने वाली तमाम कंपनियां इफरात से गाय का घी बना कर बेच रही हैं, जो आमतौर पर सामान्य घी से कहीं ज्यादा महंगा है. गाय के घी का भाव 500-600 रुपए प्रतिकिलो है.

लोगों को गाय का ही घी खरीदने के लिए जिन तरीकों से उकसाया जा रहा है वे चमत्कारी टोनेटोटके ज्यादा हैं. उस की गुणवत्ता और उपयोगिता विज्ञापनों में गिनाई जाती है. उस के मुताबिक, गाय का घी अमृत है, सेहत के लिए फायदेमंद है और कई रोगों से नजात दिलाता है.

आम उपभोक्ता हर उस विज्ञापन व प्रचार से प्रभावित होता है जो बड़े पैमाने पर किया जाता है. इसलिए लोग गाय का महंगा घी खरीदने को प्रमुखता देने लगे हैं. बारीकी से देखें तो यह विज्ञापनों का प्रभाव कम, बखान किए जा रहे तथाकथित चमत्कारों का सम्मोहन ज्यादा है.

कैसेकैसे दावे

कुछ बातें जो विज्ञापनों में नहीं बताई और दिखाई जा सकतीं उन्हें सोशल मीडिया के जरिए प्रचारित कर गाय के घी की महत्ता बताई जा रही है. मकसद घी बेचना भर है, क्योंकि उस की मांग महज दैनिक प्रयोग के लिए बड़े पैमाने पर पैदा नहीं की जा सकती.

इस में कोई शक नहीं कि घी कई गुणों की खान होता है लेकिन इस में शक है कि गाय का घी चमत्कारी होता है. गौरतलब है कि कोई भी घी कोई दवा नहीं है, यह एक डेयरी उत्पादभर है. लेकिन उसे बेचने के लिए जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं वे खुद साबित करते हैं कि गाय का घी लोग अपनी मरजी से नहीं अपना रहे हैं.

आयुर्वेद में गाय के घी का अकल्पनीय बखान किया गया है. तब मंशा यह थी कि लोग गाय पालें और दान करें. अब मंशा यह है कि गाय लोग भले ही न पाल पाएं लेकिन उस का घी जरूर खरीदें. कहने को हवाला सेहत का दिया जाता है पर असल बात कुछ और है.

प्रचार यह किया जा रहा है कि गाय का घी हर रोग को ठीक करता है. मामूली सर्दीजुकाम से ले कर बांझपन और कैंसर तक इस से ठीक हो जाते हैं. इंटरनैट पर ऐसी सामग्री भरी पड़ी है जिस में बताया गया है कि गाय के घी की दोचार बूंदें नाक में डालने से सर्दीजुकाम ठीक हो जाता है. कान के परदे खराब नहीं होते. और तो और, इस के सेवन से पागल तक ठीक हो जाते हैं.

काली देशी गाय का घी खाया जाए तो आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता, जैसी बातें भी लोगों को गाय का घी खरीदने को उकसाती हैं. इस प्रचार का सीधा मतलब यह है कि काले रंग की गाय का घी खाने से सैक्स पावर बढ़ती है.

गाय का घी रामबाण है. इसे पैरों के तलवों में लगाओ तो जलन ठीक हो जाती है. रोज खाओ तो कब्ज और एसिडिटी नहीं होती. नाक में डालो तो गंजों के भी बाल उगने लगते हैं, जैसी बातें और दावे भी चमत्कार के दायरे में ही आते हैं. इन टोनेटोटकों की मानें तो ऐसी कोई बीमारी नहीं है जो गाय के दूध से ठीक नहीं होती हो.

अगर ऐसा होता है तो

अगर वाकई गाय के घी में इतना दम है जितना कि बताया जा रहा है तो न तो एलोपैथी डाक्टरों की जरूरत है और न ही मनोचिकित्सकों की. जरूरत है तो बस, गाय के घी की जो थोड़ा महंगा है और इसे कुछ खास किस्म के ही लोग बना रहे हैं और इस का प्रचार कर रहे हैं.

हर एक उत्पाद की तरह घी में भी कुछ तत्त्व हैं जो शरीर और सेहत के लिए जरूरी हैं, लेकिन गाय के घी में ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो सिर्फ उसी में पाया जाता हो, मसलन प्रोटीन, वसा और दूसरे पोषक तत्त्व.

घी चूंकि प्राचीनकाल से ही चलन में रहा है, इसलिए मान लिया गया है कि उस में पाए जाने वाले तत्त्व आसानी से दूसरे पदार्थ में नहीं मिलते. उलट इस धारणा के, घी के रासायनिक संगठन को देखें तो साफ लगता है कि भैंस के घी में गाय के घी से कहीं ज्यादा पोषक तत्त्व पाए जाते हैं (देखें बौक्स).

फिर हल्ला गाय के घी पर ही क्यों हो? इस सवाल का जवाब साफ है, क्योंकि इस का कनैक्शन धर्म से है. पहले हर तीजत्योहार पर घी के पकवान बनाए जाते थे, लेकिन धीरेधीरे इस के विकल्प आने लगे और किफायती होने के चलते सस्ते पड़ने लगे तो घी की जरूरत और मात्रा कम होने लगी.

घी कभी रईसों का आइटम था जो अब मध्यवर्गियों का भी होने लगा है. दिल के बढ़ते मरीजों और बढ़ते कौलेस्ट्रौल को देख डाक्टर घी से बचने की सलाह देने लगे तो अब यह प्रचार किया जा रहा है कि गाय के घी से कौलेस्ट्रौल नहीं बढ़ता और हार्टअटैक होना तो दूर की बात है. उलटे, यह हार्टअटैक से बचाव करता है. एलोपैथी के डाक्टर हार्टअटैक और दूसरी बीमारियों का डर दिखा कर घी के  चलन को जो खत्म कर रहे हैं वह दरअसल हमारे धर्म व संस्कृति को खत्म करने की साजिश है.

लोगों ने इस पर भी ज्यादा भरोसा नहीं किया तो अब देशी गाय के घी की बात की जाने लगी और उस में भी काले व भूरे रंग जोड़े जाने लगे कि सफेद देशी गाय के घी में ये गुण होते हैं और काली देशी गाय के घी से मर्दाना ताकत बढ़ती है वगैरहवगैरह.

व्यावहारिक तौर पर ये बातें मूर्खतापूर्ण और मनगढ़ंत हैं जिन का मकसद सिर्फ गाय का घी बेचना है. गाय के घी को उत्पाद की तरह नहीं, बल्कि चमत्कार की तरह बना कर बेचा जाना ठगी नहीं तो और क्या है. आयुर्वेदाचार्य और गाय का घी बनाने वाले भले ही गाय के घी का प्रचार करते रहें लेकिन एलोपैथी के डाक्टर अफवाहस्वरूप ही घी न खाने की सलाह देते हैं और यह तो कतई नहीं कहते कि गाय का घी मत खाओ.

गाय का घी और ज्यादा बिके, इस बाबत अब यह प्रचार किया जा रहा है कि गाय के घी से हवन करने से पर्यावरण शुद्धि होती है. प्रचार से एक तीर से दो निशाने साधे जा रहे हैं. पहला लोगों को कर्मकांड में उलझाए रखना और दूसरा जैसे भी हो गाय का घी बिके. इस से समझ आता है कि चूंकि लोग यज्ञ, हवन, पूजापाठ के लिए ही अरबों रुपयों का घी खरीदते हैं, सो अब उन्हें गाय के घी से हवन करने की सलाह दी जाती है.

लोगों की धार्मिक भावनाओं और चमत्कारी मानसिकता को भुनाने के लिए गाय के घी का कारोबार शबाब पर है. लोग जिज्ञासावश इसे खरीद तो रहे हैं लेकिन इस के वे फायदे नहीं हो रहे जो बताए जा रहे हैं. यह तय है कि यह खेल आज नहीं तो कल, खत्म हो जाएगा. लेकिन जब तक गाय के घी के कारोबारी तगड़ी चांदी काट चुके होंगे.

वैज्ञानिक कसौटी पर घी

गाय के घी के अपने अलग गुण हैं और इस से ज्यादा प्रचलित व सस्ती भैंस के दूध के अलग गुण हैं. भैंस के घी में पोषक तत्त्वों की मात्रा ज्यादा होती है. यह तुलना सिर्फ इसलिए पेश की जा रही है कि उपभोक्ताओं को हकीकत समझ आए और वे महज भ्रामक प्रचार या चमत्कार या शिगूफे के आधार पर गाय का घी न खरीदें.

भैस के घी में फैट यानी वसा की मात्रा गाय के घी से कहीं ज्यादा होती है, इसलिए गाय का घी हलका होता है. चूंकि फैट को पचाने में मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है, इसलिए बच्चों और बूढ़ों को गाय का दूध पीने की सलाह दी जाती है. क्या यह कोई चमत्कार है. जाहिर है, नहीं. सीधा सा फंडा यह है कि अपनी क्षमता के मुताबिक ही घी और दूसरे खाद्य उत्पादों का सेवन करना चाहिए. भैंस के घी में प्रोटीन गाय के घी से ज्यादा होता है.

हैरानी वाला तथ्य यह है कि भैंस के घी में गाय के घी से कम कौलेस्ट्रौल होता है, इसलिए किडनी, डायबिटीज और हाइपरटैंशन से ग्रस्त लोगों को भैंस का घी खाने की सलाह दी जाती है. इस का यह मतलब नहीं कि महज इसी वजह से भैंस का घी चमत्कारी या अमृत हो गया. अलावा इस के, भैंस के घी में मिनरल्स भी गाय के घी से ज्यादा होते हैं.

कसमसाई हसरतें

वो मेरे सामने बनठन के आज आई हैं,
लग रहा मांग रहीं मुझ से मुंह दिखाई हैं.

मैं ने तो भर नजर देखा नहीं अभी उन को,
बेवजह आज वो दुलहन सी क्यों शरमाई है.

उन के पाजेब की आवाज क्यों नशीली है,
लग रहा पांव में थिरकन की अदा आई है.

आज बेलौस दुपट्टा सरक रहा है क्यों,
लग रहा धड़कनों में बहार आई है.

आंख की पुतलियां नाच रही सुधबुध खो,
देखने की अदा तूफान बन कर आई है.

खोल कर जुल्फ वो काली घटा सी तैर रहीं,
उन की मुसकान ने दिल में कहर मचाई है.

डालियों की सी उन के बदन में लचक है,
चाल की लहर मेरे मन में उतर आई है.

उन के जलवों का बुलावा अकारण क्यों,
मेरी सोई हुई उम्मीद ने ली अंगड़ाई है.

अब तो आ जा करीब, तेरे बदन को छू लूं,
देख तू, हसरतें मेरी भी कसमसाई हैं.

– नीलम कृष्णदेव कुंद

अब वक्त है सोच बदलने का

इस देश में औरतों की क्या स्थिति है, यह एक छोटी सी घटना से जाहिर है. दिल्ली जैसे शहर की एक कालोनी में यह घटना हुई, जो आदमियों और परिवारों की मानसिकता को बताती है.

एक घर में पतिपत्नी का विवाद था तो पत्नी रूठ कर मायके चली गई. पीछे से पति ने आत्महत्या कर ली. पति के घर वालों को लगा था कि कम से कम अब तो पति का दुख जताने के लिए झूठे ही सही, पत्नी ससुराल रोनेधोने के लिए तो आएगी पर वह नहीं आई.

पति की मौत के 2 माह बाद पति के संबंधी पत्नीके घर गए और उन में से एक ने पत्नी की छुरे से हत्या कर डाली. सालभर पहले हुई शादी का अंत दोनों की मौतों से हो गया.

पतिपत्नी में झगड़ा हो तो मामला पतिपत्नी का है. अगर शादी साल भर पुरानी हो और कोई बच्चा न हो तो औरत को जबरन पति से नहीं बांधा जा सकता. न ही उस के मरने के बाद उसे छातियां पीटपीट कर रोने का नाटक करने पर मजबूर करा जा सकता है. पर आज भी परिवारों की सोच यही है कि पत्नी का जीवन तो पति के सहारे ही चलता है.

पत्नी ने मृत पति के लिए स्यापा नहीं किया तो पति व घर वालों को अपमान लगा और इस अपमान की जड़ में यही मान्यता है कि शादी के बाद तो पत्नी पति की गुलाम हो जाए. पति मर जाए तो पत्नी रोएधोए, विधवाओं की तरह रहे. दुनियाभर के रीतिरिवाजों को पूरा करे. पति के घर वाले और पति खुद पत्नी को एक तरह से गुलाम मानने लगता है और यह किस्सा दिल्ली का है जहां की आबादी देशभर में सब से ज्यादा पढ़ीलिखी है. उसे सब से ज्यादा नई सोच मिलती है. वहां ऐसे लोग मौजूद हैं, जो हर डोर टूट जाने के बाद भी समझते हैं कि पत्नी को तो विधवा की तरह रहना ही होगा. शायद उन के मन में होगा कि पति की आत्मा को मुक्ति तभी मिलेगी.

हर औरत को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का हक है. यदि वह पति के साथ भरेपूरे घर में अपनी सहमति से आती है तो उसे सब मान लेना होगा पर जब वह घर छोड़ कर ही जा चुकी हो और पति की मृत्यु हो चुकी हो तो उस पर ससुराल वालों की जिद हरगिज नहीं थोपी जा सकती.

आज भी यह सोच आखिर क्यों कायम है कि पत्नी की तो मृत देह ही पति के घर से निकलेगी?

बुद्धिजीवियों के विचारों पर पहरेदारी, क्या हैं इसके मायने

कोई वजह नहीं कि नक्सलियों से किसी तरह की हमदर्दी रखी जाए जो बंदूक की नोक पर शोषकों के खात्में का ख्वाब देखते और दिखाते हैं. हिंसा तो आखिर हिंसा है, उस से किसी समस्या का समाधान नहीं होता. वहीं, कोई वजह नहीं कि 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए उन 5 विचारकों, लेखकों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से, सिर्फ इसलिए कि उन पर एक ब्रिगेड ने अरबन नक्सल का बिल्ला लगा दिया, असहमति न जताई जाए जो बिलकुल अहिंसकरूप से गरीब आदिवासियों और दलितों के हितों के लिए वैचारिक व बौद्धिक रूप से काम कर रहे थे.

देश में इन दिनों धर्म और जाति के नाम पर अफरातफरी मची हुई है जिस पर काबू पाने में सरकार सफल नहीं हो पा रही है. ऐसा सिर्फ इसलिए हो रहा है कि हल्ला और बोलबाला सिर्फ पंडेपुजारियों व भगवाधारियों का है. हो वही रहा है जो वे चाहते हैं और इस के पीछे उन के निहित स्वार्थ हैं.

लोकतंत्र की एक अनिवार्यता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है जिस का ढोल तो खूब पीटा जाता है, लेकिन कानून की आड़ में मुश्कें उन लोगों की कसी जाती हैं जो सत्ताधारी दल की विचारधारा और सिद्धांतों से असहमत रह कर खामोशी से अपना काम करते रहते हैं.

ये वे बुद्धिजीवी लेखक, अध्यापक, वकील, वक्ता, पत्रकार हैं जो जागरूकता और समानता के अधिकार की पैरवी करते हैं. इन्हें कभी सड़कों या जंगलों में हथियार चलाते नहीं देखा गया था, न ही ये बारूदी सुरंग बना कर पुलिस वालों या सेना के जवानों को उड़ाते हैं. ये उन के आसपास फटकते हों, ऐसा भी नहीं है.

शोषण के बदलते रूप और स्वरूप को बहुत बारीकी से देखने वाला बुद्धिजीवियों का यह वर्ग न तो ऐशोआराम की जिंदगी जीता है और न ही किसी सिस्टम से कोई समझौता कर पाता है. इसीलिए दुनियाजहान की दुश्वारियां इन्हीं लोगों के हिस्से में आती हैं जो आदिवासियों, दलितों, किसानों और गरीबों के बारे में सोचते हैं. वास्तविक नक्सली भी उन्हीं आदिवासियों, दलितों, किसानों के लिए हिंसक प्रतिशोध ले रहे हैं जो नितांत गलत रास्ता है.

यह वर्ग हमेशा ही सरकार के लिए खतरा रहा है, क्योंकि ये आम लोगों को उन के संवैधानिक सामाजिक और कानूनी अधिकारों से अवगत कराते हैं और शोषणकर्ताओं के चेहरे बेनकाब करते रहते हैं. नक्सली एक विचारधारा भी है जिस के हिमायतियों की कमी नहीं, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि नक्सली विचारधारा से सहमत सभी लोग उन की हिंसा को भी स्वीकारते हों और उसे शह देते हों.

इस के बाद भी उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित व परेशान किया जाता है, क्योंकि उन की अहिंसा हिंसा से कहीं ज्यादा प्रभाव डालती है और दीर्घकालिक भी है. लोकतंत्र में अलगअलग विचारधाराओं वाली सरकारें आतीजाती रहती हैं, लेकिन विचारकों का यह वर्ग शाश्वत है. यह वर्ग सरकारों से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं रखता, तो इस की अपनी वजहें हैं, जिन में  अहम है लोकतांत्रिक तानाशाही जिस के तहत सरकार यह मान कर चलती है कि उस का सार्थक विरोध अगर कोई कर सकता है तो वह यही तबका है जिस के पास विचार है, तीक्ष्णता है और असमहत होने का साहस भी है.

28/8 का ड्रामा

बीती 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए 5 बुद्धिजीवी और विचारक लोकतांत्रिक तानाशाही की सजा भुगत रहे हैं, जिन का संयुक्त अपराध गरीब और दलित आदिवासियों का हमदर्द हो कर उन के लिए काम करना और उन के अधिकारों के लिए आवाज उठाना है.

इस दिन पुणे पुलिस ने एक नाटकीय घटनाक्रम में योजनाबद्ध तरीके से मुंबई सहित दिल्ली, रांची, गोवा और हैदराबाद में छापे मार कर 5 बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार किया और जिन्हें गिरफ्तारी के चंद घंटों बाद ही नक्सली करार दे दिया गया.

हैदराबाद से वरवर राव, फरीदाबाद से सुधा भारद्वाज, दिल्ली से गौतम नवलखा, मुंबई से वरनौन गोंजाल्विस और ठाणे से अरुण फरेरा को गिरफ्तार किया गया था. रांची में फादर स्टेन स्वामी और गोवा में लेखक आनंद तेलतुंवडे के घर पर छापे मार कर कुछ सामग्री जब्त की गई. यह सामग्री कोई एके 47 जैसे हथियार न हो कर पैनड्राइव और हार्डडिस्क वगैरह थीं.

ये पांचों कोई जानेमाने नाम या चेहरे आम लोगों के लिहाज से नहीं थे, इसलिए लोगों को लगा कि नक्सलियों के किसी बड़े गिरोह या दल को पुलिस ने पकड़ने में कामयाबी हासिल कर ली है जो किसी बड़ी हिंसक वारदात को अंजाम देने की फिराक में था.

लेकिन चंद घंटों में ही जब यह पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है, बल्कि ये मानव अधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील, कवि और विचारक हैं तो लोगों को समझ आ गया कि बात में दम नहीं है, बस, सरकार अपने पर उतारू हो आई है.

बात में दम लाने और होहल्ला मचाने के लिए पुलिस ने जल्द ही यह सनसनीखेज खुलासा भी कर डाला कि इन्हें यों ही शौकिया तौर पर गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि ये बुद्धिजीवी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे.

इसी दौरान इस गिरफ्तारी और छापेमारी के तार इसी साल जनवरी में हुई भीमाकोरेगांव की हिंसा से भी जोड़े गए और पुलिस ने यह भी बताया कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की हत्या की योजना भी बनाई जा रही थी.

गौरतलब है कि 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में यलगार परिषद नाम की संस्था का एक आयोजन हुआ था. तब आयोजन स्थल के बाहर हजारों दलित और आदिवासी इकट्ठा हुए थे. इस के दूसरे दिन ही भीमाकोरेगांव में हिंसा भड़क गई थी जिस का अपना अलग इतिहास है.

इस के बाद पुलिस ने कल्याण और मुंबई से कई माओवादियों को गिरफ्तार किया था. 28 अगस्त की कार्यवाही का इस से संबंध स्थापित करते पुलिस ने उबाऊ सा खुलासा यह किया कि उस के हाथ ईमेल द्वारा शीर्ष नक्सली नेताओं को भेजे गए पत्र लगे हैं जिन में नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश करने का जिक्र है. ये पत्र 2016 और 2017 में कभी लिखे गए थे.

पुलिस के मुताबिक, नक्सलियों के बीच चर्चा यह हुई थी कि जिस तरह राजीव गांधी की हत्या हुई थी उसी तर्ज पर किसी रोडशो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या कर दी जाएगी.

होनहार पुलिस अधिकारियों ने दिल्ली के एक वामपंथी कार्यकर्ता रोना जैकब विल्सन को गिरफ्तार कर के बताया कि ये पत्र इस शख्स को मेल आईडी से किसी कामरेड प्रकाश और शीर्ष माओवादियों को भेजे गए थे. पत्रों में गोलाबारूद खरीदने और करोड़ों का फंड जुटाने का भी जिक्र है.

बात हास्यास्पद और 70-80 के दशक के जासूसी उपन्यासों व फिल्मों सरीखी थी, जिन में देशद्रोही कान में हैडफोन लगाए साजिश रच रहे होते हैं और पुलिस और हीरो ऐन मौके पर पहुंच कर उन का खेल खत्म कर देते हैं. लेकिन इस खेल का दूसरा पहलू बड़ा खतरनाक है जिस को भांपते ही देशभर के बुद्धिजीवियों ने सरकार और पुलिसिया कार्यवाही को ही कठघरे में ला कर खड़ा कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हैरानी जाहिर की, लेकिन कथित आरोपियों को कोई खास राहत नहीं मिली.

नजरबंदी : राहत या आफत

29 अगस्त का दिन इस मामले में काफी अहम और दिलचस्प साबित हुआ. इस दिन इतिहासकार रोमिला थापर सहित कई दिग्गजों ने सुप्रीम कोर्ट में इन 5 बुद्धिजीवियों और विचारकों की गिरफ्तारी को चुनौती देती जनहित याचिकाएं दायर कीं.

याचिकाओं पर सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोटूक कहा कि असहमति या विरोध लोकतंत्र का सैफ्टीवौल्व है, यदि आप ने इस की (असहमति की) अनुमति नहीं दी तो विस्फोट होगा. सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए इन पांचों को गिरफ्तार करने के बजाय अपनेअपने घरों में नजरबंद रहने की व्यवस्था भी दी. यह भी एक तरफ से अति है. नजरबंदी चाहे अपने ही घर में क्यों न हो, है तो जेल भेजने की तरह ही.

इधर, कोर्ट से बाहर बुद्धिजीवियों की आक्रामक प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई थीं. प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार विजेता, साहित्यकार और समाजसेविका अरुंधति राय ने कहा, ‘‘ये गिरफ्तारियां उस सरकार के बारे में खतरनाक संकेत देती हैं जिसे अपना जनादेश खोने और सत्ता से बेदखल होने का डर सता रहा है.’’ बकौल अरुंधति, ‘‘बेतुके आरोप लगाकर वकील, कवि, लेखक, पत्रकार, प्रोफैसर और दलित कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना सरकार के दमनतंत्र का परिचायक है.’’

इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देना ही चाहिए ताकि आजाद आवाजों पर अत्याचार और उत्पीड़न रोका जा सके.

उम्मीद के मुताबिक राजनीति भी गरमाई, लेकिन इस से नजरबंद बुद्धिजीवियों को कोई राहत नहीं मिली. हुआ बस इतना कि वे इस होहल्ले के चलते गिरफ्तार होने से बच गए. लेकिन इन के घर पुलिस छावनी में तबदील हो गए. सब्जी और दूध जैसी दैनिक उपयोग की चीजें भी जांच करने के बाद इन के किचन तक जाने दी गईं मानो उन में कोई असलहा या बारूद छिपा हो.

यों दबाई जाती है आवाज

इस ड्रामे से किसे क्या हासिल हुआ, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि इस से तात्कालिक फायदा सरकार को हुआ है. ये गिरफ्तारियां, दरअसल, उन बुद्धिजीवियों का मनोबल तोड़ने के लिए थीं जो सरकार से इत्तफाक नहीं रखते. भक्तों की हमदर्दी बटोरने में भी भगवा खेमा कामयाब रहा जिस ने इन बुद्धिजीवियों को खतरा बताते हुए इन्हें शहरी नक्सली होने की उपाधि दे डाली.

गौरतलब है कि अब से तकरीबन 10 वर्षों पहले छत्तीसगढ़ के एक समाजसेवी, पेशे से डाक्टर विनायक सेन को भी इसी तरह परेशान कर देशद्रोह का मुकदमा चला कर जेल भेज दिया गया था. विनायक सेन का गुनाह इतना भर था कि वे छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में गरीब आदिवासियों का मुफ्त इलाज करते थे और उन्हें जागरूक भी करते थे.

विनायक सेन की लोकप्रियता छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को रास नहीं आई तो उन्हें भी जेल का रास्ता दिखा दिया गया. मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उन्हें जमानत मिल गई. तब सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी काबिलेगौर थी कि नक्सलियों से जेल में जा कर मिलने या उन का समर्थन करने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता.

विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद जब इस प्रतिनिधि ने उन की पत्नी इलिना सेन से वर्धा में बातचीत की थी तब वे बेहद परेशान थीं. इलिना का कहना था कि एक निर्दोष की गिरफ्तारी से उस के परिवार वाले भी टूट जाते हैं.

हालिया गिरफ्तारियों में साफ दिख रहा है कि मकसद कुछ और था. आरोप अदालत में साबित हों न हों, इस से किसी को सरोकार नहीं. 5 बुद्धिजीवी विचारकों की गिरफ्तारी बाकी बुद्धिजीवियों को डराने की साजिश ज्यादा नजर आती है. नरेंद्र मोदी आपातकाल की आधिकारिक घोषणा नहीं कर रहे, यह उन की समझदारी ही है, क्योंकि उस में झंझटें बहुत होती हैं. देश का माहौल चारों तरफ एकसाथ बिगड़ता है और जेलें कम पड़ जाती हैं. अघोषित आपातकाल में सरकार से असहमत हर आदमी डर कर रहता है कि जाने कब उस की बारी आ जाए. डर बनाए रखने के लिए इस से बेहतर टोटका कुछ और हो भी नहीं सकता.

धीरेधीरे साबित यह हो रहा है कि मोदीराज वाकई में भक्तों, पंडेपुजारियों और कांवडि़यों के मजे के लिए है. ये हिंदूवादी भक्त सरेआम सड़कों पर उपद्रव करें, हिंसा करें, मौब लिंचिंग करें, इन पर बेहद लचर मुकदमे, वह भी दिखाने को, दायर किए जाते हैं ताकि इन्हें सजा न हो और भक्तों व बिरादरी को शह मिलती रहे. जेलों में इन्हें शाही ठाटबाट से रखा जाता है. मंत्री उन से मिलने आते हैं और पीठ थपथपाते हैं. बाहर निकलने पर उन का जुलूस की शक्ल में स्वागत होता है. अगले चुनाव में उन को टिकट मिलने की गारंटी हो जाती है.

यह कैसी आजादी

इस के उलट, मोदीराज में विचारक और बुद्धिजीवियों की शामत आ रही है, क्योंकि वे पोंगापंथ में भरोसा नहीं करते और धर्म से कोई खास वास्ता नहीं रखते. मुमकिन है घोषित तौर पर सरकार कहने लगे कि दरअसल, नास्तिक और अनीश्वरवादी ही आतंकी और नक्सली हैं.

जब दलितों, आदिवासियों व गरीबों और किसानों का भला करने वालों को जेल भेजा जाए या घर में नजरबंद किया जाए तो सरकार की यह मंशा साफ  हो जाती है कि वह बेवजह के बवंडर के भरोसे चलने में यकीन करने लगी है.

पांचों बुद्धिजीवियों की नजरबंदी सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ा दी है जबकि पुलिस कोई ठोस सुबूत उन के खिलाफ पेश नहीं कर पाई.

सुबूत तो पुलिस 19 और 20 सितंबर की सुनवाईयों में भी पेश नहीं कर पाई. नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखते पांचों विचारकों को घर में नजरबंद रहने को यथावत रखा. इसे न्याय तो कतई नहीं कहा जा सकता. वजह, कोर्ट का असमंजस था.

सुनवाई कर रहे जजों में से एक जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अदालत पेश किए गए सुबूतों को बाज की नजर से देखेगी. जस्टिस चंद्रचूड़ ने साफतौर पर कहा, ‘हम समझ रहे हैं कि आप उन का विरोध जता रहे हैं, लेकिन इस के लिए आप के पास पुख्ता सुबूत भी होने चाहिए. कानूनव्यवस्था के खिलाफ या सरकार को गिराने की कोशिश और सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय सैमिनार आयोजित करने के फर्क को समझना चाहिए.’

इस टिप्पणीभर से कानून के जानकारों ने मान लिया था कि ये पांचों विचारक रिहा हो सकते हैं, क्योंकि पुलिस के सुबूत काफी लचर थे. वे अगर ठोस होते तो पहली सुनवाई में ही पांचों नप जाते. होम अरैस्ट का एक हफ्ते बढ़ना किसी सजा से कम नहीं कहा जा सकता. 20 सितंबर की सुनवाई में अदालत असहमति और अपराध की व्याख्या के दर्शन में उलझी रही जिस ने देर और अंधेर वाली कहावत को उलट दिया.

विचारकों को ऐसे ही घर में कैद किया जाता रहा तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां रही. वे न तो किसी से संपर्क रख सकते हैं और न ही विचारों को साझा कर सकते हैं. यह कैसी आजादी है और कैसा लोकतंत्र है, बात सिरे से ही समझ से परे है.

मुसलिम महिलाएं : मुश्किलें कम नहीं, ज्यादा नाजुक है स्थिति

इस में दोराय नहीं है कि मुसलिम समुदाय के पिछड़ेपन और बदहाली के लिए खुद मुसलिम वर्ग जिम्मेदार है. इस वर्ग में फैली अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी के साथसाथ इस वर्गविशेष के साथ अन्य धर्मों का उपेक्षात्मक व्यवहार, सरकार की उदासीनता आदि कारण भी इन के विकास में बाधक बन कर खड़े हैं.

इन सभी कारणों का सब से ज्यादा बुरा प्रभाव मुसलिम महिलाओं पर पड़ा है. चाहे प्रश्न उस के पालनपोषण का हो, नौकरी या शादी का या फिर उस के अधिकारों का, हर जगह वह खाली हाथ ही खड़ी नजर आती है.

सोचने वाली बात :  जब एक व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होगा तो वह अपने परिवार का अच्छी तरह पालनपोषण कैसे करेगा? अगर वह अपनी पत्नी और बेटी बेटे को दोवक्त की रोटी नहीं खिला सकता तो उन्हें पढ़ाएगा कहां से? नौकरी और शादी तो बहुत दूर की बात है.

मुख्यधारा से जोड़ा जाए : यह बहुत जरूरी है कि मुसलिम वर्ग को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए. अशिक्षा जो इस वर्ग की सब से बड़ी कमी है, उसे दूर किया जाए.

बदलाव की धीमी प्रक्रिया :  इसे मुसलिम वर्ग की अजीब दशा ही कहेंगे कि आज भी हमारे देश में मुसलिम महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. हो भी कैसे, दशकों से मुसलिम पर्सनल ला बिना किसी विशेष परिवर्तन के स्थिर अवस्था में है. उस में जरूरी बदलाव किया जाना बहुत जरूरी है.

मुसलिम महिला की स्थिति :   बात जब मुसलिम महिलाओं की स्थिति की होती है तो धर्म उस के मार्ग में सब से बड़ी बाधा के रूप में सामने आता है. मामला चाहे पुरुष की 4 शादियों का हो या 3 तलाक का या फिर 2 महिलाओं के बराबर एक मर्द की गवाही का, मुसलिम रहनुमाओं का कर्तव्य बनता है कि वे समय के साथ मुसलिम पर्सनल ला में आवश्यक सुधार करें ताकि मुसलिम महिला अपना सामाजिक, आर्थिक विकास करते हुए अपने अस्तित्व की पहचान कर सके.

फतवों का भय :  जिन मुसलिम महिलाओं ने कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज बुलंद की, उन के वर्चस्व को चुनौती दी, उन के खिलाफ फतवे का फरमान जारी कर दिया गया. अफसोस कि अशिक्षित मुसलिम समाज ने हकीकत को जाने बिना उन फतवों को अपनी स्वीकृति भी प्रदान कर दी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भेंट चढ़ीं बंगलादेश की मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन इस की मिसाल हैं. आज वे फतवों के चलते पलायन पर मजबूर है.

संकीर्ण मानसिकता :  मुसलिम महिलाओं के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण उन की शिक्षा का निम्न स्तर का होना भी है. इसी के पीछे मुसलिम समाज की संकीर्ण मानसिकता है जिस के तहत लड़कियों पर पैसा खर्च करना बेकार समझा जाता है. साथ ही, घिसापिटा डायलौग दोहराया जाता है कि पढ़लिख कर क्या करेगी, आखिर संभालना तो उन्हें चूल्हाचौका ही है. इस से आगे सोचना मुसलिम समाज जरूरी नहीं समझता. यही कारण है कि मुसलिम महिलाएं दूसरे धर्मों की स्त्रियों से बहुत पिछड़ी हुई हैं.

धर्म की आड़ में :  शिक्षा के अभाव के कारण मुसलिम महिलाओं का हमेशा शोषण होता रहा है और इस का पूरा फायदा मुसलिम पुरुषों ने उठाया. सिर्फ मुसलिम महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अपनी इच्छाओं की स्वतंत्रता आदि के लिए मौलवियों का फतवा जारी करना, शरीयत का हवाला देना क्या उचित है? यह मात्र पुरुषप्रधान मुसलिम समाज की मानसिकता के पिछड़ेपन का प्रतीक है जो किसी भी प्रकार से मुसलिम महिला को धार्मिक रूढि़यों के बंधन से आजाद नहीं करना चाहता.

सोचना होगा :  मुसलिम महिलाओं को अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए खुद प्रयास करना होगा. इस के लिए उन्हें अपनी शिक्षा के स्तर को उठाना होगा, खुद में आत्मविश्वास पैदा करना होगा, सही और गलत में अंतर महसूस करना होगा. वहीं, इस बात पर गंभीरता से विचारविमर्श भी करना होगा कि हर क्षेत्र में मुसलिम महिलाओं का प्रतिशत न के बराबर क्यों है.

सरकार को भी करना होगा सहयोग :  मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना बहुत जरूरी है. ऐसा करने से भी मुसलिम वर्ग की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा. इस से सामाजिक संतुलन भी स्थापित होगा. मदरसों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के साथ सरकार को चाहिए कि वह धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा को भी जरूरी करने के लिए कारगर कदम उठाए.

मुसलिम महिलाओं का उत्थान :  मुसलिम महिला का उत्थान तभी हो सकता है जब वे अपने अधिकारों की लड़ाई खुद लड़ेंगी. यह मुसलिम महिलाओं पर निर्भर करता है कि वे अपने साथ होने वाले अन्याय को मूकदर्शक बन कर देखती हैं या फिर अपने अधिकारों को सीना ठोक कर हासिल करती हैं.

समाज में अपनी उपस्थिति को दर्शाने के लिए मुसलिम महिलाओं को आगे आना ही होगा. वर्तमान परिवेश में मुसलिम महिलाओं का यह कर्तव्य भी बनता है कि वे खुद शिक्षित हो कर अपने परिवार को भी शिक्षा के महत्त्व से अवगत कराएं.

शिक्षा ग्रहण करना और अपने अधिकारों के लिए लड़ना मुसलिम नारी का जन्मसिद्ध ही नहीं, बल्कि धर्मसिद्ध अधिकार भी है. वैसे भी मुसलिम महिलाएं जब तक शिक्षित नहीं होंगी, तब तक उन्हें कुरान का सही ज्ञान कैसे होगा? और कैसे उन्हें शरीयत (इसलामी कानून) से मिले अधिकारों की जानकारी होगी?

शिक्षित होने की अवस्था में वे अवश्य अपने अधिकारों को जान पाएंगी. वहीं, समाज में उचित तरीके से वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह भी कर सकेंगी.

समलैंगिकता : धर्म के धंधेबाजों को धक्का

6 सितंबर को भारत में उस समय इंद्रधनुषी छटाएं बिखर गईं जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से हटा कर उन पर कानूनी मुहर लगा दी. नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के इस फैसले से धर्म की संकीर्णता की घुटन में छटपटा रहे प्रेमपरींदे कैद से मुक्त हो कर खुले आसमान में आजाद उड़ते नजर आने लगे. लाखों लोगों के होंठों पर सतरंगी मुसकानें खिल उठीं. समलैंगिक समुदाय में खुशी की लहर है. इस फैसले को ऐतिहासिक मानते हुए उदार और प्रगतिशील लोगों ने खुशी जाहिर की है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सदियों पुरानी मान्यता, जड़ता और मूर्खता परास्त हो गई. यह फैसला नैतिकता के ठेकेदारों को करारा जवाब है. सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा सर्वसहमति से सुनाया गया यह फैसला ऐतिहासिक है.

सुप्रीम कोर्ट को अपने ही फैसले को पलटना पड़ा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2009 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था.

2009 में हाईकोर्ट में कांग्रेस सरकार की ओर से कहा गया था कि समलैंगिकता अनैतिक है. इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने से समाज का नैतिक पतन होगा. धार्मिक मान्यताओं के आधार पर समलैंगिक संबंधों पर प्रतिबंध लगाने की केंद्र सरकार की दलील पर हाईकोर्ट नाराज हुआ और केंद्र को वैज्ञानिक दृष्टिकोण पेश करने का निर्देश दिया था. हालांकि ताजा फैसले में केंद्र सरकार ने डर कर कोई पक्ष नहीं लिया. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया ताकि उसे भगवा तत्त्वों का अंदरूनी विरोध न सहना पड़े.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने धारा 377 के हिस्से को तर्कहीन, मनमाना और बचाव नहीं करने योग्य करार दिया. जजों के फैसले में व्यक्ति की पसंद, प्रेम, एहसास, यौन संबंध, निजता की खूबसूरत व्याख्या की गई है. फैसले में समाज की धार्मिक मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, संकीर्णता की धज्जियां उड़ाई गई हैं.

supreme court order on homosexuality

मुझे वही समझें जो मैं हूं

अदालत का फैसला पढ़ने में बहुत रुचिकर है. सदियों से चली आ रही भ्रांतियां अदालत की व्याख्याओं के सामने टिक नहीं पाईं. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत जस्टिस आर एफ नरीमन, ए एम खानविलकर, डी वाई चंद्रचूड़ और इंदू मल्होत्रा ने फैसले में कई विश्वप्रसिद्ध लोकतांत्रिक उदारवादियों, लेखकों, दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों की बातों का जिक्र किया. उन्होंने जरमन चिंतक गेटे, शेक्सपियर, शेपेनहावर, जौन स्टुअर्ट मिल को उद्धृत किया है.

संविधान पीठ ने अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया की अदालतों के निर्णयों का भी हवाला दिया. फैसले में मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अलावा अदालत ने इंडोनेशिया में मानवाधिकार और यौन रुझान तथा लैंगिक पहचान पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का भी जिक्र किया. 493 पृष्ठों के फैसले में न्यायाधीशों की ओर से यह प्रतिध्वनि उजागर हुई है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता के अधिकार सर्वोपरि हैं. कोर्ट ने कहा कि 2 व्यक्तियों के निजी और अंतरंग संबंध निजता है.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने  अपने फैसले में कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र का उद्देश्य समाज का प्रगतिवादी बदलाव की अवधारणा रखता है. प्रगतिवादी व्याख्या में न केवल व्यक्तिगत अधिकारों और सम्मान से जीने की मान्यता शामिल है, यह ऐसा वातावरण भी तैयार करता है जिस में हर व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान का उचित अवसर मिलता हो. गरिमा, पहचान और निजता की सुरक्षा करना हमारे संविधान की पहचान है.

दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने अपनी बात जरमन कवि और चिंतक योहान गेटे को उद्धृत करते हुए लिखी है कि, ‘मैं जो हूं, सो हूं, इसलिए मुझे वही समझें, जो मैं हूं.’ इस के बाद वे जरमन विद्वान आर्थर शोपेनहावर की एक लाइन का जिक्र करते हैं कि, ‘कोई अपनी शख्सियत से पीछा नहीं छुड़ा सकता.’

शेक्सपियर के नाटक का हवाला दिया गया. फैसले में कहा गया कि नाटक का एक किरदार कहता है कि नाम में क्या रखा है. हम गुलाब को किसी और नाम से पुकारें, उस की महक वैसी ही रहेगी.

इस संवाद की मूल भावना यही है कि किसी भी चीज की मौलिक खूबियां माने रखती हैं न कि वह किस नाम से पुकारा जाता है. इस के अर्थ की गहराई में उतरेंगे तो समझ आएगा कि पहचान की सुविधा के लिए नाम भले ही जरूरी हो पर इस के पीछे सार वही पहचान का मूल है. बिना पहचान के नाम का काम सजावटी रह जाता है, इसलिए किसी के होने के लिए पहचान जरूरी है.

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह कानून 150 साल पहले बना. इस के 87 वर्षों बाद भारत आजाद हुआ और यह कानून आज तक बना रहा. समलैंगिक समुदाय को भी दूसरों की तरह समानता का अधिकार हासिल है. यौन प्राथमिकताओं को 377 के जरिए निशाना बनाया गया. राज्य का काम किसी नागरिक की निजता में घुसपैठ करना नहीं है.

माफी मांगे इतिहास

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि इतिहास को समलैंगिक समुदाय, समलैंगिकों के परिवारों से माफी मांगनी चाहिए. सदियों से हो रहे भेदभाव, यातना से इंसाफ मिलने में जो देरी हुई है उस के लिए माफी मांगनी चाहिए. इस समुदाय के लोगों को डर का जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया. बहुसंख्यक समाज ने मान्यता देने में नासमझी की कि समलैंगिकता पूरी तरह से प्राकृतिक है और इंसानी यौन प्राथमिकताओं के विशाल दायरे का एक हिस्सा है. धारा 377 का गलत इस्तेमाल अनुच्छेद 12 से मिले समानता के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 15 से मिले बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 21 से मिले निजता के अधिकार से वंचित कर रहा था. समलैंगिकों को बिना किसी शिकंजे के जीने का अधिकार हासिल है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत ने एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर दस्तखत किए हैं और उस के लिए इन संधियों के प्रति प्रतिबद्ध रहना जरूरी है.

2009 में हाईकोर्ट ने सहमति के आधार पर वयस्कों में समलैंगिक संबंधों को वैध ठहराया था, लेकिन 11 दिसंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने 150 साल से अधिक पुराने कानून की धारा 377 पर फैसला करने का सवाल संसद पर छोड़ दिया था. 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि पिछले 150 से अधिक सालों में धारा 377 के तहत केवल 200 लोगों को ही दंडित किया गया है.

2009 में हाईकोर्ट द्वारा समलैंगिकता को वैध ठहराने पर दिल्ली के एक ज्योतिषी और भाजपा नेता बी पी सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की थी.

संविधान पीठ ने 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना भी की. कहा गया कि किसी कानून को बनाए रखने का यह आधार नहीं हो सकता कि उस का दुरुपयोग बहुत कम हुआ है.

समलैंगिता अपराध नहीं

देश में धारा 377 को रानी विक्टोरिया के ब्रिटिश शासन के दौरान 1861 में लागू किया गया था. इस के तहत अगर कोई इंसान स्वेच्छा से अप्राकृतिक शारीरिक संबंध किसी महिला, पुरुष या जानवर के साथ स्थापित करता है तो उसे 10 साल से ले कर आजीवन कारावास के साथ जुर्माने का प्रावधान है. धारा 377 के अंतर्गत समलैंगिकता एक गैरजमानती अपराध है.

इस कानून से अमेरिका और यूरोप खुद को मुक्त कर चुके हैं. भारत और अन्य कई देशों में यह कानून अभी बना हुआ है. एक रिपोर्ट के अनुसार, करीब 72 देशों में आज भी समलैंगिकता अपराध है. पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मौरीशस और अरब देशों में समलैंगिकता को ले कर कड़े कानून मौजूद हैं. ईरान, सूडान और सऊदी अरब जैसे देशों में मृत्युदंड का प्रावधान है.

हमारे यहां समलैंगिकता को ले कर व्यापक बहस छिड़ी. इसे ले कर कई गैरसरकारी संगठनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. 2015 में सांसद शशि थरूर ने संसद में निजी बिल रखा था, हालांकि यह बिल गिर गया था.

सब से पहले नाज फाउंडेशन ने आवाज उठाई थी. इस संगठन ने 2001 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर समान लिंग के 2 वयस्कों के बीच यौन संबंध को अपराध घोषित करने वाले प्रावधान को गैरकानूनी बताया था. आईपीसी की इस धारा से संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन और मौलिक अधिकारों के हनन का हवाला देते समलैंगिकता की पैरवी करते हुए अदालत से इसे खत्म करने की मांग की गई थी.

देश में समलैंगिकों की कोई आधिकारिक जनसंख्या नहीं है, पर 2012 में सुप्रीम कोर्ट में बताया गया था कि यहां एलजीबीटीक्यू की आबादी लगभग 25 लाख है. यह संख्या भारत की कुल जनसंख्या को देखते हुए मामूली है, फिर भी इन के अधिकारों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए.

पुराने समय से मौजूद है

ऐसा नहीं है कि धारा 377 का विरोध किसी खास जाति, धर्म या वर्ग के लोग कर रहे हैं. हिंदू, मुसिलम, ईसाई, सिख सभी धर्मों ने न सिर्फ समलैंगिकता को गंभीर माना है, भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों को नष्ट करने वाला भी करार दिया.

वहीं हिंदू महासभा ने कहा कि यह हिंदू मूल्यों को खत्म कर देगा. उधर, देवबंद के मौलवियों ने इसे इसलाम के खिलाफ करार दिया.

समलैंगिक संबंधों को ले कर समाज का बड़ा हिस्सा धर्म, संस्कृति के नजरिए से बाहर नहीं निकल पाया है. धार्मिक ठेकेदारों ने उसे बाहर निकलने ही नहीं दिया. सदियों से लोगों के जीवन से जुडे़ हर फैसले धर्म द्वारा तय किए गए. हमारा समाज प्रेम को जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, उम्र से जोड़ता है. समाज प्रेमविवाह पर अपना अधिकार समझता है, भले ही प्राचीन हिंदू मंदिरों में समलैंगिकता के चित्र उकेरे देखे जा सकते हों. पुरुषपुरुष, स्त्रीस्त्री, पुरुषपशु, स्त्रीपशु के यौन संबंधों वाली प्रतिमाएं देश के

कई मंदिरों में हैं. चर्च के पादरी, धार्मिकसामाजिक संगठनों, मठोंमंदिरों के तथाकथित कुंआरे, ब्रह्मचारी लोग खुद समलैंगिक संबंधों में लिप्त रहे हैं.

समलैंगिकता की बहस में धर्मों के पाखंड और दोहरे मानदंड की पोल खुलती रही है. पादरियों, मौलवियों, पंडों के कुकर्मों का आएदिन भंडाफोड़ होता आया है.

समलैंगिकता आदिकाल से सामाजिक व्यवस्था में मौजूद रही है. भारतीय गं्रथों में इस का उल्लेख है. वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में इस विषय पर खुल कर लिखा है. मनुस्मृति में इस पर दंडविधान है. भारतीय समाज में समलैंगिकता का वजूद खजुराहो से ले कर दक्षिण भारत के कई मंदिरों में उकेरी गई आकृतियों के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि भारतीय समाज में समलैंगिकता को कभी खुलेतौर पर स्वीकार नहीं किया गया.

विज्ञान का मानना है कि समलैंगिकता की प्रवृत्ति पैदाइशी होती है. पैदाइशी होने के कारण इस में बदलाव नामुमकिन है. पारिवारिक दबाव में बहुत मामलों में बदलाव की कोशिशें की जाती हैं, पर ऐसा हो नहीं पाता.

धर्मों द्वारा विरोध का असली कारण यह है कि समलैंगिक रिश्तों से धर्म के व्यापारियों को कोई फायदा नहीं होता. कुंडली नहीं मिलानी होगी, मुहूर्त नहीं निकलेगा, फेरे नहीं होंगे. इन संबंधों के चलते बच्चे नहीं होंगे, तो दानदक्षिणा का सारा धंधा चौपट हो जाएगा. इसलिए पंडेपुजारियों, पादरियों, मुल्लामौलवियों, ग्रंथियों ने इसे पाप, अनैतिक कह कर इस का विरोध किया.

हर धर्म यह भी चाहता है कि हर सैक्स संबंध से बच्चे पैदा हों जो दान भी दें और धर्म की रक्षा के लिए लड़ें और मरें. समलैंगिक सैक्स के जरिए अपनी आवश्यकता पूरी कर लेंगे. पर बच्चे नहीं होंगे तो धर्म के ठेकेदारों को नुकसान होगा. हस्तमैथुन पर भी इसीलिए आपत्ति की जाती है पर चूंकि यह अकेले होता है, इसलिए इस पर रोक संभव नहीं है.

धर्म और नैतिकता के ठेकेदारों ने समलैंगिकता को पाप, अप्राकृतिक बताते हुए विरोध किया तो इसलिए कि उन की दुकानदारी पर मंदी आने का खतरा था.

दरअसल यह सरकार और धर्म का व्यक्ति की निजी जिंदगी में बेजा दखल है. कोई व्यक्ति बैडरूम में क्या कर रहा है, सरकार और धर्म उस का भी अधिकार अपने पास रख रहे हैं. यह व्यक्तिगत आजादी का हनन है. ऐसे और कितने काम हैं जहां धर्म और सरकार व्यक्ति पर नियंत्रण रखना चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सरकार और धर्म दोनों को इस मामले से दूर कर दिया है. जीवन का आधार मानवीय होना चाहिए. इस अधिकार के बिना दूसरे अधिकार औचित्यहीन हैं.

समाज को पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की जरूरत है. संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संकीर्णता की जगह नहीं होनी चाहिए. दकियानूसी मान्यताओं को बदलने में ही भलाई है.

इन हीरोइनों के नाम पर चल रही है वायरस की दुकान

आपने कई बार देखा होगा, आप गूगल पर किसी लोकप्रिय व्यक्ति का नाम सर्च करते हैं और आपके सामने खुल जाती हैं अश्लील पोर्न साइट्स या फिर कभी किसी बेकार प्रोडक्ट की वेबसाइट. दरअसल ये वायरस या मालवेयर का फंक्शन होता है जो सम्बंधित कीवर्ड से अपने वायरस जोड़कर आपको असुरक्षित वैब पेजेज पर रिडायरेक्ट कर देते हैं और आपको बेमतलब नुकसान पंहुचा देते हैं.

हालांकि इनके बढ़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए कुछ एंटीवायरस कपनियां बाजार में आयीं लेकिन वायरस इनको भी गच्चा देना जानते हैं. इस बार इन्होने तरीका अपनाया है फिल्म एक्ट्रेस और एक्टर्स के नाम का. दरअसल अब इन्होने वेश बदलकर सेंधमारी शुरू कर दी है. उदाहरण के तौर पर अगर आप किसी ऐक्ट्रेस के फैन हैं और उसका नाम डालकर औनलाइन सर्च करते हैं तो आप मालवेयर के निशाने पर आ जाते हैं.

अमेरिका की साइबर सिक्यौरिटी कंपनी मैक्फी  ने हाल ही में दुनियाभर के ऐसे सिलेब्रिटीज की लिस्ट निकाली है, जिन्हें सर्च करना खतरनाक हो सकता है. इस लिस्ट में बेहद पौपुलर एक्टर और ऐक्ट्रेस है जिन्हें दुनिया भर में जमकर सर्च किया जाता है. कंपनी ने हौलिवुड और बौलिवुड सिलेब्रिटीज की अलग लिस्ट निकाली है. जहां हौलिवुड में सबसे खतरनाक सिलेब्रिटीज की लिस्ट में रूबी रोज का नाम टौप पर है, वहीं बौलिवुड में यह खिताब ऐक्ट्रेस इलियाना डिक्रूज का नाम है. तो अगली बार जब आप इलियाना कीवर्ड से कुछ सर्च कर रहे तो जरा अलर्ट रहें, मालवेयर आपके आसपास ही घात लगाकर बैठे हैं. मैक्फी के मुताबिक प्रीति जिंटा के नाम पर भी कुछ सर्च करने पर यूजर्स मालवेयर साइट्स पर रीडायरेक्ट हो रहे हैं, जो खतरनाक हैं. गौरतलब है कि इस वर्ष जहां इलियाना, प्रीति जैसी एक्ट्रेस इस लिस्ट में वहीँ पिछले साल इसी लिस्ट में अक्षय कुमार, ऋषि कपूर और गोविंदा थे.

इस एंटी वायरस की लिस्ट में सबसे डेंजरस किम कार्डैशियन भी हैं. साइबर सिक्यौरिटी फर्म की मानें तो किम को सर्च करना सबसे ज्यादा खतरनाक है. इसी तरह वायरस फैलाने वाली वेबसाइट्स नाओमी कैंपबेल के कंधे पर रखकर भी हमला कर रहे हैं. हौलिवुड ऐक्ट्रेस रूबी रोज को सर्च करने पर भी यूजर्स ऐसी वेबसाइट्स पर रीडायरेक्ट हो रहे हैं जो वायरस से भरी हुई हैं या फिर उनमें कुछ मालवेयर भी हैं. अन्य फिल्म स्टार्स की बात करें तो अमेरिकन टीवी पर्सनैलिटी और ऐक्ट्रेस क्रिस्टीन केवलरी, फ्रेंच ऐक्ट्रेस और म्यूजीशियन मारियन कोटिलार्ड, वंडरवुमन लिंडा कार्टर, ऐक्ट्रेस रोज बायर्नी का नाम शामिल है.

इंटरनेट एक ऐसी भूल भुलैया है जहां कदम कदम पर धोखे, फर्जी कंटेंट और सायबर क्रिमिनल्स के अड्डे खुले हैं. चूंकि हाल के सालों में इंटरनेट पैक इतने सस्ते हुए हैं कि देश में औनलाइन सक्रियता लगातार बढ़ रही है. इसी बात का फायदा उठा रही हैं वायरस और मालवेयर फैलाने वाली वेबसाइट्स. इनका काम यह होता है कि आप जैसे ही किसी सब्जेक्ट के लिंक में क्लिक करेंगे, इनका मालवेयर या वायरस आपको सीधे खतरनाक साइट्स की और रिडायरेक्ट कर देगा. इसके चलते कई बार आपके कम्प्युटर या फोन में मौजूद संवेदनशील सामग्री, तसवीरें और पासवर्ड भी हैक हो जाते हैं. कई ऐक्ट्रेस की न्यूड पिक्स और फिल्मों का लीक होना इन्ही की करतूतों का नतीजा होता है.

सब कुछ प्रचार पर आधारित हो गया है : नीना गुप्ता

पिछले 37 वर्षों से बौलीवुड में सक्रिय व फिल्म ‘छोकरी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुकीं अभिनेत्री व निर्देशक नीना गुप्ता सदैव अपने काम को ईमानदारी के साथ करने में यकीन रखती आयी हैं. बीच में कुछ वर्ष तक वह गायब रहीं, मगर अब वह कई बेहतरीन फिल्मों में काम करते हुए नजर आ रही हैं. ‘वीरे दी वेडिंग’ व ‘मुल्क’ में उन्हें काफी सराहा गया. अब वह 19 अक्टूबर को प्रदर्शित होने वाली अमित शर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘बधाई हो’’ में प्रियंवदा कौशिक नामक एक ऐसी अधेड़ उम्र की मां के किरदार में नजर आएंगी, जो कि एक युवा और एक टीनएजर उम्र के बेटे की मां है. मगर 50 की उम्र में वह पुनः गर्भवती हो जाती हैं, तब पूरे परिवार को किस तरह सामाजिक शर्मिंदगी से उबरना होता है.

बहरहाल, नीना गुप्ता हमेशा शोकेस बाजी से दूर रहीं. नीना गुप्ता ने अस्सी व नब्बे के दशक में ‘मर्चेंट आयवरी’, ‘द डिसीवर्स’, ‘इन कस्टडी’ व ‘काटन मैरी’ सहित करीबन पांच छह इंटरनेशनल फिल्मों में अभिनय किया था. पर इसे उन्होंने कभी भी प्रचार का मुद्दा नहीं बनाया था. जबकि वर्तमान समय के कलाकार इसे जोर शोर से प्रचारित करते हैं. अब प्रियंका चोपड़ा हों या दीपिका पादुकोण, एक इंटरनेशनल फिल्म करके उसे इस तरह से प्रचारित करती हैं कि जैसे उन्होंने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है.

हाल में जब नीना गुप्ता से हमारी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई, तो हमने इस बदलाव को लेकर नीना गुप्ता से बात की, उन्होने कहा- ‘‘देखिए, अब सब कुछ प्रचार पर आधारित हो गया है. सब कुछ मार्केटिंग पर आधारित है. हमारे वक्त में पत्रकारों से सेट पर कभी भी बात हो जाया करती थी. फिल्म के प्रचार के नाम पर हम सिर्फ दो दिन इंटरव्यू देते थे. पर अब एक फिल्म के प्रचार के लिए कलाकार को एक से दो माह का वक्त देना पड़ता है. कभी मुंबई, कभी दिल्ली, कभी लखनऊ भागना पड़ता है. हकीकत में अब सब कौरपोरेट हो गया है. मैं दावे के साथ कहती हूं, क्योंकि मुझे पता है कि इस कौरपोरेटाइजेशन ने टीवी को बर्बाद किया. कौरपोरेट कंपनी ने चिल्लाना शुरू किया कि हम फिल्म हो या सीरियल, उसके विषय को लेकर रिसर्च करेंगे. इस ढंग से प्रचारित करेंगे वगैरह वगैरह…इनकी पीआर टीम में इतने लोग रहते हैं कि मैं देखकर हैरान रह जाती हूं. सच कहूं तो आज तक मेरी समझ में नही आया कि यह पीआर टीम वास्तव में करती क्या है? जब मैं बड़े बड़े सफल सीरियल बना रही थी, उस वक्त भी मैं आपको कभी कभार फोन कर लिया करती थी. हमारी बात हो जाया करती थी. बस, मैंने कभी अपना पीआर नही रखा. पर अब लोग काम कम चिल्लाना व हौव्वा बनाने का काम करते हैं. यह बहुत बड़ा बदलाव है.’’

नीना गुप्ता अपनी लय में आगे कहती हैं- ‘‘मैं आपको टीवी की बात बताती हूं. जब मैं टीवी सीरियल बना रही थी, तो अचानक कौरपोरेटाइजेशन के चलते टीवी चैनल की तरफ से सेट पर ईपी आने लगा. एकदम नयी उम्र की लड़की या लड़का, जिसे टीवी या फिल्म मीडियम की एबीसीडी नही पता. कला क्या है, वह नहीं जानता. लेकिन सेट पर आकर मेरी जैसी अनुभवी कलाकार व निर्देशक को आदेश देती थी कि इस रंग का परदा नहीं चलेगा या इस रंग की कुर्सी नहीं चलेगी. तो जिन को कला के बारे में पता नहीं, जिन्हें यह नही पता कि कला को लेकर मेरी अपनी समझ क्या है, वह मुझे सलाह दे रहा था. अब ऐसे लोग मुझे क्या काम देंगे या मुझसे क्या काम करवाएंगे. तो इसी कौरपोर्रेट जगत की पैदाइश हैं तथाकथित स्टार कलाकार.’’

वह आगे कतही हैं- ‘‘आपने प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण की बात की. तो इन्हें समझ में आ गया कि पीआर क्या होता है? पीआर कैसे किया जाना चाहिए. तो इन्होंने एक फिल्म करके भी उसे इस तरह से प्रचारित किया जैसे कि उन्होंने पूरे विश्व में सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो. और इनसे पहले किसी ने ऐसा ना किया हो. यह प्रचार में इतना माहिर हो गए हैं कि इनके गलत बयानों पर भी कोई सवाल नहीं करता. प्रियंका हो या दीपिका इन सभी ने अपने साथ पीआर टीम की बहुत बड़ी फौज रखी है. अब आप सोचिए, वह कब एअरपोर्ट जाएंगी, कब किस देश से रवाना होंगी, कब वापस मुंबई पहुंचेगी? इतनी छोटी छोटी चीजों को भी प्रचारित करते हैं. हमारे जमाने में कौन सा कलाकार कब विदेश जाकर आ जाता था, मीडिया को तो छोड़िए, हम कलाकारों को भी पता नहीं चलता था.’’

वह आगे कहती हैं- ‘‘हकीकत में आज के जमाने के कलाकार जितनी मेहनत काम करने में करते हैं, उससे कहीं ज्यादा मेहनत उसे प्रचारित करने में करते हैं. हम लोग सीधे साधे थे, काम किया और चुपचाप घर पर आकर बैठ गए. शूटिंग के दौरान कोई पत्रकार सेट पर मिलने आ गया, तो उससे बात कर ली. अब तो हर कलाकार स्टाइलिश हो गया है. हीरोइनें कितने कपड़े बदलने लगी हैं. एक ही दिन में चार फंक्शन में जाएंगी, तो हर बार नई पोशाक में. भले उधार लेकर जाए. मैं आज की पीढ़ी के कलाकारों का सम्मान करती हूं कि वह बहुत ही ज्यादा स्मार्ट हैं. उन्होंने सीख लिया है कि जमाने के साथ चलना है, तो क्या और कैसे करो. हम नहीं सीख पाए.’’

वेस्टइंडीज की शर्मनाक हार, क्या टेस्ट मैच खो रहा है अपना औचित्य

राजकोट में 3 दिन से पहले ही वेस्टइंडीज को मिली करारी हार से सवाल उठने लगा है कि क्या टेस्ट मैच अपना औचित्य खोने लगे हैं या फिर खिलाड़ी ही अब इस से ऊबने लगे हैं? यह ठीक है कि घरेलू टीम को अपने मैदानों पर खेलने का फायदा मिलता है पर जिस तरह से मेहमान टीम ने अपनी नाक कटाई है वह बात हजम नहीं हो रही है.

मैच के दूसरे दिन ही डगमगा गई वेस्टइंडीज की टीम ने तीसरे दिन भी कोई चमत्कार नहीं किया. उस ने पहली पारी में 48 ओवरों में महज 181 रन ही बनाए. फॉलोऑन देने के बाद भारत ने उसे दोबारा बैटिंग करने के लिए बुलाया. लेकिन दूसरी पारी में भी नतीजा ढाक के तीन पात रहा.

वेस्टइंडीज के सभी खिलाड़ी मानो अपने विकेट फेंकते चले गए. 50.5 ओवर में उन्होंने 196 रन ही जोड़े. इस तरह भारत ने एक पारी और 272 रनों से वेस्टइंडीज को हरा दिया.

वेस्टइंडीज की दूसरी पारी में भारत के स्पिन गेंदबाज कुलदीप यादव ने 14 ओवरों में 57 रन दे कर 5 विकेट लिए. आर. आश्विन ने 2 तो रविंद्र जडेजा ने 3 विकेट चटकाए.

वेस्टइंडीज की तरफ से ओपनर बल्लेबाज पॉवेल ने सब से ज्यादा 83 रन बनाए. बाकी बल्लेबाज कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाए. पहली पारी में 53 रन बनाने वाले आरएल चेस ने दूसरी पारी में निराश किया.

मैच जीतने के बाद भारत के कप्तान विराट कोहली ने अपना पहला मैच खेल रहे पृथ्वी शॉ के साथ साथ रविंद्र जडेजा की भी तारीफ की. वे बोले, “मैं खुश हूं कि हम ने शानदार खेल खेला. जिस तरह से पृथ्वी ने अपने डेब्यू मैच में शानदार शतक जमाया उसे देख कर अच्छा लगा. जड्डू भी बहुत अच्छा खेला. उन्होंने हमारे लिए कीमती रन बनाए.”

पृथ्वी शॉ को इस मैच में उम्दा खेल दिखाने के लिए मैन ऑफ द मैच का खिताब दिया गया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें