चुनावी मंच पर खड़े हो कर कहना आसान है कि न खाऊंगा न खाने दूंगा पर जब देश में हरकोई खाने और निगलने को नहीं हड़पने को तैयार बैठा हो तो कैसा भी नेता हो बेईमानियां तो होंगी ही. नेताओं और अफसरों की बेईमानियां तो देश में कम नहीं हुईं ऊपर से बिल्डरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों आदि की एक नई जमात पैदा हो गई है, जिस ने बेरहमी से बैंकों में आम गरीब जनता का पैसा ठीक उसी तरह हड़प लिया जैसे मृत्युभोज पर पंडे हड़पते हैं, जबकि मृतक के घर वाले हिसाब लगा रहे होते हैं कि कल से घर कैसे चलेगा.

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