धर्म ताश के पत्तों के महल की तरह है इसीलिए धर्म की जरा सी बुराई से धर्म के ठेकेदार थर्रा उठते हैं और इकट्ठा हो कर होहल्ला मचाने लगते हैं. उन्हें भय इस बात का रहता है कि धर्म की बुराई से कहीं पोलपट्टी न खुल जाए. धर्म और उन के ठेकेदारों की असलियत सामने न आ जाए.

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