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जब दोस्त बनाना चाहे किसी को बौयफ्रेंड

आजकल के छोटे परिवारों में लडकियां कम उम्र में ही हौस्टल में रहने चली जाती हैं. ऐसे में बौयफ्रेंड के साथ आने वाले खतरे उनको पता नहीं होते. हर लड़की की कोई न कोई सबसे प्रिय दोस्त होती है जिसे वह अपने हर राज बताती है. ऐसे में अगर सहेली सही राय देगी तो लडकी बौयफ्रेंड के साथ गलत दिशा में जाने से बच जाएगी.

नेहा और दीपिका दोनों की स्कूलिंग एक साथ हुई थी. दोनों को ही एमबीए की पढाई करनी थी. इसके लिये उन लोगों ने मैनेजमेंट स्कूल में प्रवेश लिया. कालेज में होस्टल खाली नहीं था. इसलिये दोनों ने एक प्राइवेट होस्टल में रहना शुरू किया. नेहा और दीपिका के स्वभाव में थोड़ा सा अंतर था. नेहा केवल पढ़ाई की तरफ ही ध्यान देती थी जबकि दीपिका पढ़ाई के साथ साथ दुनियादारी में भी अपना दखल रखती थी.

कौलेज में उसके तमाम दोस्त थे. उनमें से एक दो उसके बहुत करीब हो गये थे. इनके साथ दीपिका अक्सर घूमने निकल जाती थी. नेहा उसको समझाती भी थी पर दीपिका की समझ में नही आता था.
नेहा और दीपिका जिस रूम में रहते थे उसका रास्ता अलग से था और सीढ़ियों से नीचे उतरने पर मकान मालिक का छोटा सा गार्डन था. नेहा रात में जब सो जाती तो दीपिका गार्डन में टहलने के लिये जाती थी.

टहलने के बहाने वह अपने बौयफ्रेंड से मोबाइल पर बात भी करती थी. दीपिका के बौयफ्रेंड को जब यह पता चला कि वह अकेले गार्डन में टहलती है तो वह उससे मिलने के लिये आने लगा. एक दिन नेहा ने उसको देख लिया. दीपिका और उसका बौयफ्रेंड गार्डन में बहुत ही रोमांटिक अंदाज में बैठे थे. नेहा ने उस समय तो दीपिका से कुछ नहीं कहने में भलाई समझी पर अगले दिन उसने दीपिका को समझाया. आगे आने वाले खतरों से अवगत कराया.

सहेली को समझायें :

एक दिन दीपिका का बौयफ्रेंड रात में उसके कमरे में आने की जिद करने लगा. दीपिका को पता था कि नेहा इसके लिये तैयार नही होगी. इस पर दीपिका के बौयफ्रेंड ने उसको अपनी गाड़ी में बैठने के लिये कहा और उसको लेकर बाहर चला गया. उसने दीपिका के अकेलेपन का खूब लाभ उठाया. दीपिका के साथ उसने बीयर पी. नशे की हालत में दीपिका अपने बौयफ्रेंड को मनमानी करने से रोक नही सकी. रात लगभग 3 बजे दीपिका को नीचे छोडकर उसका बौयफ्रेंड चला गया. लडखडाते कदमों से दीपिका ने कमरे में प्रवेश किया तो नेहा को अपने इंतजार में जागते पाया. नेहा ने कुछ भी नही कहा. दीपिका समझ गयी थी कि नेहा बहुत नाराज है. वह उसके पास गयी पहले अपने व्यवहार के लिये सौरी कहा इसके बाद अपनी पूरी बात समझायी.

दीपिका की बात सुनकर नेहा को बहुत दुख हुआ वह बोली ‘मै तुमको बहुत पहले से ही समझा रही थी. इसके बाद भी तुमने मेरी बात नही मानी. शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना बहुत खतरनाक होता है. अगर तुम प्रेगनेंट हो गयी तो क्या होगा. एर्बाशन कराना कितना खतरनाक होता है यह तुम को पता नही है.’

नेहा की बात सुनकर दीपिका को अपनी गलती का अहसास हुआ. वह परेशान हो गयी. दीपिका जानती थी कि प्रेगनेंट होने के बाद एबार्शन कराना कितना मुश्किल होता है. बौयफ्रेंड के बहकावे में आकर दीपिका ने जो गलती की थी उसका सुधार होना मुश्किल था. दीपिका ने पूछा,”अब क्या करूं? एबार्शन से कैसे बचा जाये?.”  नेहा को इमरजेंसी पिल्स के बारे में पता था. उसने सुबह सबसे पहले दीपिका को इमरजेंसी पिल्स खाने के लिये तैयार किया. इसके बाद अपने व्यवहार को सुधारने के लिये कहा. नेहा की समझदारी से दीपिका बड़ी परेशानी से बच गयी.

रूम में अकेले न छोड़ें :

अगर कभी रूममेट अपने बौयफ्रेंड के साथ रूम में अकेले रहने के लिये कहे तो उसको अकेला न रहने दें. रूममेट को अकेला पाकर बौयफ्रेंड अकेलेपन का लाभ उठा सकता है. जिससे बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड सकता है. प्रतिभा और पूनम अपने रूम में अपने अपने बौयफ्रेंड को बुलाने लगी तो इसकी सूचना दूसरी लडकियों को लग गयी. जल्द ही यह बात मकान मालिक को पता चल गयी मकान मालिक ने इस बारे में पूरी सूचना दोनों के घर वालों को दे दी. इससे दोनों की बहुत बदनामी हुई. उम्र के नाजुक दौर में बौयफ्रेंड का होना कोई अनहोनी नही होती है. बौयफ्रेंड के बारे में सबसे पहले रूममेट को ही पता चलता है. रूममेट पर उसका प्रभाव भी पड़ता है.

मीना की रूममेट का बौयफ्रेंड मीना को भी अपने प्रेमजाल में फंसाना चाहता था. मीना को भी पहले यह अच्छा लगा. पर जब उसका शारीरिक शोषण लगातार होने लगा तो वह परेशान हो गयी अब वह इस हालात से बचना चाहती थी पर ब्लेकमेलिंग का शिकार हो रही थी. मीना अपनी परेशानी लेकर डाक्टर के पास आयी. इसके बाद मीना ने ब्लेकमेलिंग से बचने के लिये कोई भी खराब काम करने से मना कर दिया.अपने साहस से ही मीना बौयफ्रेंड के शोषण से बच सकी.

बतायें बौयफ्रेंड से संबंध के नुकसान :

हमारा समाज भले ही बहुत आगे बढ़ गया हो पर लडकी के विवाहपूर्व संबंधों को लेकर वह अभी भी पुरानी मानसिकता में रहता है. बहुत सारे पुरूष आज भी यह मानते हैं कि शादी की पहली रात में शारीरिक संबंध् के समय हाइमन झिल्ली को फटना चाहिये. विवाह पूर्व संबंध किसी भी तरह से सही नही होते. यह सामाजिक मानसम्मान को तो नुकसान पहुंचाते ही हैं. कई तरह के शारीरिक रोगों को भी जन्म देते हैं. विवाहपूर्व संबंधों में सबसे बड़ी परेशानी उस समय आती है जब बिना किसी सुरक्षा के शारीरिक संबंध बनाये जायें. इसमें बिन ब्याही मां बनने से लेकर यौन रोग होने की भी पूरी संभावना होती है.

विवाहपूर्व संबंध बनाते समय सावधनी न बरतने के कारण गर्भधारण हो सकता है. शादी के पहले गर्भपात कराने से कई तरह की परेशानियां हो सकती है. इससे योनि में संक्रमण के कारण गर्भाशय में सूजन आ सकती है. जिसका प्रभाव गर्भधारण करने पर भी पड़ सकता है. कुछ लड़कियां संबंध बनाने के बाद इमरजेंसी पिल्स का उपयोग बेधड़क करने लगती हैं. यह ठीक नही है. इमरजेंसी पिल्स को इमरजेंसी का ख्याल करके बनाया गया है. रेगुलर खाने से यह शरीर का नुकसान कर सकती हैं. इन पिल्स का बहुत ज्यादा सेवन करने से ब्रेस्ट और गर्भाशय के कैंसर तक की आशंका जतायी जाती है. विवाहपूर्व संबंधें में मानसिक उलझन भी रहती हैं. इससे कैरियर पर भी प्रभाव पड़ता है. कभी कभी माहवारी में भी परेशानी आ जाती है. माहवारी समय पर नहीं आती या पफर जल्दी जल्दी आने लगती है.

असुरक्षित सेक्स से होता है यौन रोग :

शादी से पहले यौनसंबंध से यौन रोगों के फैलने का खतरा ज्यादा होता है. यौन रोग शरीर के अदरूनी अंगों में होने वाली बीमारियों को कहते हैं. यह असुरक्षित यौन संबंध रखने से हो सकते है. इसके अलावा ये एक साथ कई लोगों के साथ संबंध बनाने से भी हो सकता है. कभी कभी यौन रोग इतने मामूली होते हैं कि उसके लक्षण नजर ही नहीं आते हैं. पर बाद में इसके परिणाम घातक हो सकते हैं. इसलिये यौन रोग के मामूली लक्षण को कभी भी नजरअदांज नहीं किया जा सकता. यौन रोग कभी कभी अपने आप ठीक भी हो जाते हैं. पर इनके वैक्टीरिया शरीर में पड़े रहते हैं. कुछ समय बाद वह शरीर में तेजी से हमला करते हैं. यौन रोग शरीर के खुले और छिले स्थान वाली त्वचा से ही फैलते है.

यौन रोग का घाव इतना छोटा होता है कि देखने में पता ही नहीं चलता है. लड़का लड़की को इसका पता नहीं चलता है. यौन रोगों का प्रभाव 2 सप्ताह से 20 सप्ताह के बीच कभी भी सामने आ सकता है. इसके चलते औरतों को माहवारी बीच समय में ही आ जाती है. यौन रोग योनि, गुदा और मुंह के द्वारा शरीर में फैलते हैं. इन यौन रोगों में हरपीज बहुत ही सामान्य किस्म का यौन रोग है. इसमें पेशाब करने में जलन होती है. पेशाब के साथ कई बार मवाद भी आ जाता है. बार बार पेशाब जाने का मन करता है. बुखार हो जाता है. शौच जाने में भी परेशानी होने लगती है. जिसको हरपीज होता है उसके मुंह और योनि में छोटे छोटे दाने हो जाते हैं. शुरूआत में यह अपने आप ठीक भी हो जाते है. अगर यह दोबारा हो तो इलाज जरूर कराएं.

यौन रोगों में वाट्स में छोटी छोटी फूलनुमा गांठे शरीर के तमाम हिस्सों में पड़ जाती हैं. वाट्स एचपीवी वायरस के चलते फैलता है. यह 70 प्रकार का होता है. यह गांठे अगर शरीर के बाहर हों और 10 मिलीमीटर के अंदर हो तो इसको जलाने का काम किया जा सकता है. इससे बड़ा होने पर आपरेशन के जरीये इसको हटाया जाता है. योनि में फैलने वाले वायरस को जेनरेटल वाट्स कहते है. यह योनि में बच्चेदानी के मुख पर हो जाता हैं. अगर समय पर इलाज न हो तो यह घाव कैंसर का रूप रख लेता है. अतः अगर यह हो तो 35 साल की उम्र के बाद एचपीवी वायरस का कल्चर जरूर करा लें. इससे घाव का पूरा पता चल जाता है.

गिनेरिया भी खास किस्म को यौन रोग होता है. इस रोग में पेशाब नली में घाव हो जाता है. जिससे पेशाब नली में जलन होने लगती है. कई बार खून और मवाद भी आने लगता है. इसका इलाज एंटीबायोटिक दवाओं के जरीये किया जाता है. अगर यह बार बार होता है तो इसका घाव पेशाब नली को बंद कर देता है. जिसको बाद में आपरेशन के द्वारा ठीक किया जाता है. गिनोरिया को साधरण बोली में सुजाक भी कहा जाता है. इसके होने पर तेज बुखार भी आता है. इसके वैक्टीरिया की जांच के लिये मवाद की फिल्म बनायी जाती है. शुरूआत में यह बीमारी पकड़ में आ जाये तो अच्छा रहता है. बाद में इसका इलाज कराने में मुश्किलें आती हैं.

सिफलिस ऐसा यौन रोग होता है जो वैक्टेरिया के कारण फैलता है. यह यौन संबंध के कारण ही होता है. इस रोग के चलते पुरूषों में लिंग के उपर गांठ सी बन जाती है. कुछ समय के बाद यह ठीक भी हो जाती है. इन गांठ को शैंकर भी कहा जाता है. शैंकर से पानी लेकर माइक्रोस्कोप के सहारे देखा जाता है. पहले स्टेज पर माइक्रोस्कोप के सहारे ही वैक्टेरिया को देखा जा सकता है. इस बीमारी की दूसरी स्टेज पर शरीर में लाल दाने से पड़ जाते है. यह कुछ समय के बाद शरीर के दूसरे अंगो को भी प्रभवित करने लगता है. इस बीमारी का इलाज तीसरी स्टेज के बाद संभव नहीं होता है.

खराब अवस्था में यह शरीर की धामनियों को प्रभावित करती है. इससे धामनियां फट भी जाती है. जो जिदंगी के लिये बहुत खतरनाक हो जाता है. दवा और इंजेक्शन से इसका इलाज होता है.यौन संबंधें के चलते क्लामेडिया नामक वाला यौन रोग औरतों को होता है. इस बीमारी में औरतो को योनि में हल्का सा संक्रमण होता है. यह योनि के द्वारा बच्चेदानी तक में फैल जाता है. यह बांझपन का सबसे बड़ा कारण होता है. यह बच्चेदानी को खराब कर देता है. बीमारी की शुरूआत में ही इलाज हो जाये तो अच्छा रहता है. क्लामेडिया के चलते औरतो को पेशाब में जलन, पेट दर्द , माहवारी में दर्द , शौच के समय दर्द , बुखार और जूडी की परेशानी पैदा होने लगती है. यौन रोगों से बचाव का सबसे प्रमुख तरीका यह होता है कि असुरक्षित यौन संबंध न बनाये जाये.

कितने कारगर हैं लापता फोन को खोजने का दावा करते एप्स ?

पिछली साल इसी माह में दिल्ली के प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन के पास मेरी जैकेट से सैमसंग नोट 2 फोन को पौकेटमार गैंग ने उड़ा लिया. खैर, जो हुआ सो हुआ, लेकिन फोन चोरी होने के बाद 2 काम ऐसे हैं जो चाहें या न चाहें आपको करने ही पड़ते हैं. पहला है फोन चोरी होने की रिपोर्ट उस क्षेत्र के थाने में दर्ज कराना, जिस इलाके से वह उड़ाया गया है. और दूसरा है सिम बंद कराने के लिए टेलिकौम कम्पनियों के सेंटर्स पर टोकन लेकर लाइन लगाना. (यकीन मानिए ये दोनों की काम मोस्ट फ्रस्ट्रेटिंग होते हैं). ये दोनों काम करने के बाद ख्याल आता है कि अब वो फोन मिलेगा या नहीं. और उसमें सेव्ड डाटा कहीं गलत हाथ में न पड़ जाए. यहां पर दिमाग गैजेट गुरु बनने लगता है और फिर ध्यान जाता है उन एप्लीकेशंस पर जो अपने एडवर्टाइजिंग कैम्पेन्स में चिल्ला चिल्ला कर दावा करती हैं कि हम आपके चोरी और लापता हो चुके स्मार्टफोन को स्मार्टली ढूंढ लाएंगे. इसके लिए वे find my device, location tracker जैसे बड़े बड़े टेक्नीकल टर्म यूज करते हैं. वैसे ये हैं कितने कारगर, चलिए, पता करते हैं.

कहां है मेरा फोन ?

यह सोच कर कि इन एप्स के जरिये मुझे भी फोन और चोरों की लोकेशन पता चल जाएगी, मैंने भी Google Find My Device ऐप में अपना लौग इन कर लिया. आप अपनी मेल आईडी से उसे कंट्रोल कर सकते हैं. बता दूं कि Google Find My Device ऐप को पिछले साल मई में लौन्च किया गया था. सो मैंने डेस्कटाप में इस फीचर का लाभ उठाने के उद्देश्य से लौग इन किया. Google Find My Device में जाकर फोन ट्रैक करने के ऑप्शन पर पहुंचकर फोन जहां से चोरी हुआ, वहां की लास्ट लोकेशन देखा तो रेड डाट वही जगह दिखा रहा था जहां से यह चोरी हुआ था. थोड़ी सी आस बंधी. लगा कि अब जैसे जैसे फोन एक जगह से दूसरी जगह जाएगा, मुझे उसकी एग्जैक्ट लोकेशन का पता चल जाएगा.

तब तक फोन को लौक, डाटा डिलीट/सेफ, थेफ़्ट एलर्ट करने के जितने भी औप्शंस दिखे, मैंने ट्राई कर डाले. लेकिन शुरुआती उत्साह कुछ ही घंटों में काफुर हो गया जब वह रेड डाट कई घंटों बाद भी वहीं का वहीं रहा. यानी लास्ट लोकेशन तो दिख रही थी लेकिन उसके बाद फोन किन चोरों के हाथ से होता हुआ कितनी और लोकेशंस तक पहुंचा होगा, यह बताने में Google Find My Device पूरी तरह से नाकाम रहा.

मैं कई दिनों तक फोन को ट्रेस करता रहा लेकिन गूगल मैप पर लोकेशन का वही पुराना राग अलापा जाता रहा. कुछ तकनीकी जानकार मित्रों ने कहा कि पुलिस की साइबर सेल में सर्विलांस सिस्टम होता है जो फोन की रियल लोकेशन ट्रेस कर सकता है लेकिन पुलिस वाले हर फोन को इतनी आसानी से सर्विलांस पर लगाते नहीं है. जाहिर है उसका इशारा वीआइपी कल्चर और रसूख वालों के फोन को लेकर था.

बहरहाल वो फोन जैसा कि चोरी हो चुके फोनों के साथ होता है, मुझे नहीं मिला. और मुझे कोई ऐसा टकराया नहीं जिसे इन एप्स के जरिये कोई चोरी हो चुका फोन मिला हो. हो सकता है कुछ लोगों को मिल गया हो लेकिन यकीनन यह आंकड़ा उंगलियों पर गिनने भर का होगा.

इंडोर मैप्स फीचर का शगूफा

अब Google Find My Device में इंडोर मैप्स फीचर को जोड़ा है. कहा जा रहा है कि इस नए फीचर की मदद से फोन को लौक किया जा सकता है. लेकिन सवाल वही है फोन को फाइंड या ट्रैक करने का दावा करते करते ये एप्स सिर्फ डिवाइस को लौक करने तक सीमित क्यों रह जाते हैं. और कौन जाने कि कमबख्त फोन लौक होता भी है या नहीं. ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कई ऐसे मामले आते हैं जहाँ उन लोगों के चोरी हुए फोन्स का निजी डाटा लीक हुआ है जिसे वे लौक कर चुके थे. यानी अश्लील साईट पर जो महिलाओं या लड़कियों की निजी पिक्स लीक होने के मामले सामने आते हैं, उनमें ज्यादातर पिक्स उसी फोन्स से ली गयी होती हैं जो कुछ समय पहले चोरी हुए होते हैं. ऐसे में लौक डिवाइस करने का फीचर भी सवालों के घेरे में आ जाता है.

दरअसल Google Find My Device का इंडोर मैप्स फीचर उसी फोन के लोकेशन बता सकता है जो कहीं पर रखकर छूट गया हो या गिर गया हो. और अभी तक वहीं पड़ा हो. लेकिन अगर वो वहां से किसी के भी हाथ लग गया और उसने उस डिवाइस को औफ कर दिया या टेक्नीकल हाथों में पड़ गया तो करते रहिये Google Find My Device का जाप. आपका फोन नहीं मिलने वाला.

सवाल और एप्स और भी हैं

एक बात यह भी है कि गूगल ने इस बात को स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि यह नया फीचर कौन सी इमारतों का इंडोर व्यू दिखाएगा. अगर गूगल प्ले स्टोर पर जाकर इसकी डिटेल्स देखेंगे तो पता चलेगा कि इंडोर मैप्स यूजर को एयरपोर्ट, शौपिंग सेंटर और बड़ी इमारतों में हैंडसेट ढूंढने में मददगार साबित होगा. लेकिन यह भी कोई ख़ास कारगर नहीं होने वाला. क्योंकि फोन चुराने वाले और उन्हें खरीदने वाले इतने शातिर हैं कि हर टेक्नीकल फीचर्स और सिक्योरिटी का तोड़ पहले ही निकाल चुके हैं. बहुत समय तक यह हौवा खड़ा किया था कि फोन के IMEI नंबर से बहुत कुछ हो जाता है लेकिन इस नंबर को बदलने का तकनीकी करामात भी हो चुका है. इस नंबर का बस इतना ही काम है कि पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराते वक्त आपको IMEI नंबर की भी जानकारी देनी होती है. फिर स्थानीय कानून के आधार पर, आपके फोन को नेटवर्क इस्तेमाल करने या उससे कौल करने पर रोक लगाया जा सकता है.

इसके अलावा और भी कई एप्स हैं जो यही दावा करते हैं कि हमारी मदद से आप चोरी हुए फोन का पता लगा सकते हैं. कुछ तो चोर का हुलिया बताने का काम भी करते हैं. मसलन Avast Mobile Security 2018- ऐप Stealth Mode को एक्टिवेट करने पर चोर को पकड़ने का दावा करता है तो वहीं इसके फीचर्स के लिए आपको इसका प्रीमियम पैक भी लेना होता है यानी जेब ढीली करनी पड़ेगी. इसी तरह Lookout Security & Antivirus फोन की बैटरी खत्म होने से पहले की लास्ट लोकेशन का पता लगाने और डाटा बैकअप को डिलीट करने का औप्शन देता है. और Find My Device का किस्सा तो ऊपर बयां हो ही चुका है.

दावे, चोरी और कंडीशन अप्लाई..

दरअसल इसमें तकनीकी पेंच बहुत होते हैं. जैसे कि आपने अपने फोन में अगर सम्बंधित एप्स चोरी होने से पहले इंस्टाल नहीं की तो इनका कोई फायदा नहीं है. सिर्फ इंस्टाल ही नहीं उस पर बाकायदा लौग इन कर सिक्योरिटी सेटिंग्स भी औन करनी जरूरी हैं. इसके अलावा ज्यादातर एप्स कुछ ही दिनों के फ्री ट्रायल लेने के बाद आपको एक मोटी फीस चुकानी पड़ती है. अब जाहिर है न तो लोग इतने टेक्नीकल हैं और न ही बजट फोन वाले इतनी फीस देने में सहज महसूस करते हैं. और इस तरह से आपका फोन खोजने का ज्यादातर एप्स दावा करती रहती हैं और फोन भी इफरात से चोरी होते रहते हैं.  अच्छा तो यह हो कि ये सारे एप्स वाले अपने दावों के साथ कंडीशन अप्लाई वाला स्टार (*) लगाएं. तब कोई शिकायत नहीं होगी.

इस बल्लेबाज ने खेली 11,000 रन की ऐतिहासिक पारी

आजकल की नई पीढ़ी 40 साल की उम्र तक नौकरी से रिटायरमेंट लेने की सोचने लगती है पर क्रिकेटर वसीम जाफर के इरादे कुछ और ही हैं. वे भले ही इंटरनेशनल लेवल पर ज्यादा कमाल न दिखा पाए हों पर घरेलू क्रिकेट खासकर रणजी क्रिकेट में तो उन का कोई सानी नहीं है.

‘रणजी क्रिकेट के सचिन तेंदुलकर’ कहे जाने वाले इस दिग्गज बल्लेबाज ने बुधवार, 21 नवंबर, 2018 को विधर्भ की तरफ से खेलते हुए रणजी ट्राफी में बड़ौदा के खिलाफ शतक जमा कर इतिहास रच दिया. अब वसीम जाफर रणजी ट्राफी में 11,000 रन का शानदार आंकड़ा पार करने वाले पहले बल्लेबाज बन गए हैं.

वसीम जाफर ने इस ऐतिहासिक मैच की पहली पारी में 153 रन बनाए. यह उन के प्रथम श्रेणी कैरियर का 54वां शतक है.

याद रहे कि वसीम जाफर ही रणजी ट्राफी में 10,000 रन का आंकड़ा पार करने वाले पहले बल्लेबाज बने थे. रणजी ट्राफी में सब से ज्यादा रन बनाने के मामले में दूसरे नंबर पर मुंबई के अमोल मजूमदार हैं. उन्होंने 9,202 रन बनाए हैं. इस के बाद तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश के देवेंद्र बुंदेला हैं जिन्होंने अमोल मजूमदार से बस एक रन कम बनाया है. उन के कुल 9,201 रन हैं.

इतना ही नहीं, वसीम जाफर के खाते में रणजी क्रिकेट में सब से ज्यादा 37 शतक और 81 अर्धशतक भी शामिल हैं.

26 फरवरी, 1978 को मुंबई में जन्मे वसीम जाफर का इंटरनेशनल क्रिकेट में इतना अच्छा रिकौर्ड नहीं रहा है. उन्होंने कुल 31 टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें 34.10 की औसत से 1,944 रन बनाए हैं. उन्होंने टेस्ट मैचों में एक बार दोहरा शतक भी बनाया है. उन्होंने वनडे मैचों के नाम पर महज 2 मैच खेले हैं और बस 10 रन ही बनाए हैं.

लेकिन फर्स्ट क्लास क्रिकेट का रिकौर्ड देखें तो वसीम जाफर ने अब तक खेले गए 244 मैचों में 50.34 की औसत से 18,275 रन बनाए हैं. अब देखते हैं कि क्रिकेट का यह महारथी आगे और कौन से रिकौर्ड बनाता है.

एनएफडीसी के खिलाफ सीबीआई की प्राथमिक जांच शुरू

अंग्रेजी की एक वेबसाइट के अनुसार केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय के अनुरोध पर सीबीआई ने सरकारी संस्थान ‘‘राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम’’ उर्फ एनएफडीसी के खिलाफ प्राथमिक जांच शुरू कर दी है. यह जांच एनएफडीसी द्वारा पिछले सात वर्ष के दौरान धन राशि आवंटन की गड़बड़ियों को लेकर है. इस मामले में सन टीवी, फिल्मकार अनुराग कष्यप और फिल्मकार दिबाकर बनर्जी के खिलाफ भी सीबीआई जांच करेगी. सूत्रों की माने तो सीबीआई ने 23 अक्टूबर को ही एनएफडीसी को पत्र लिखकर इस जांच के बारे में सूचना दे दी थी.

सीबीआई के इस पत्र के अनुसार वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर एनएफडीसी के अलावा ‘सन टीवी’, ‘यूएफओ मूवीज’, ‘अनुराग कष्यप फिल्मस’ के खिलाफ जांच होगी. आरोप है कि एनएफडीसी ने इन कंपनियों को सारे कानून नियमों व कायदों को ताक पर रखकर करोड़ों रूपए दिए.

सीबीआई के पत्र के अनुसार एनएफडीसी ने ‘यूएफओ मूवीज’ को दूसरी कंपनियों की बनिस्बत ज्यादा तवज्जो देते हुए नियमों से ज्यादा भुगतान किया. इतना ही नहीं एनएफडीसी ने अपने ही नियमों को तोड़ते हुए उन चैनल व कंपनियों को विज्ञापन दिए, जिन्हें डीएवीपी ने स्वीकृत नही किया था. सीबीआई के पत्र के अनुसार सन टीवी को 38,41,800 रुपए और यूएफओ मूवीज को 40,13,898 रूपए का ज्यादा भुगतान किया गया. इसी तरह अनुराग कष्यप और दिवाकर बनर्जी को भी बेवजह भुगतान किया गया.

अनुराग कष्यप को 2011 में फिल्म ‘‘दैट गर्ल इन यलो बूट’’ के लिए 62 लाख रुपए और 2013 में फिल्म ‘‘द लंच बाक्स’’ के लिए डेढ़ करोड़ रूपए का एनएफडीसी ने भुगतान किया. दिबाकर बनर्जी के निजी खाते में भी एक बड़ी रकम गलत ढंग से दी गयी.

उधर अनुराग कष्यप और दिबाकर बनर्जी ने एक वेब साइट से बात करते हुए सारे आरोपों को बेबुनियाद बताया है. एनएफडीसी पर लगे इन आरोपों के केंद्र में ‘एनएफडीसी’ चीफ नीना लाथ गुप्ता हैं, जो कि इस पद पर 2006 यानी कि 12 वर्ष से काबिज हैं. इन्हें इस वर्ष फरवरी माह में तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया था. पर दो माह बाद दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर वह पुनः अपने पद पर काबिज हो गयी थीं. फिर मई माह में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने उन्हे बर्खास्त किया.

ज्ञातव्य है कि भारत सरकार ने 1975 में भारत में फिल्म उद्योग को विकसित करने के मकसद से एनएफडीसी का गठन किया था. एनएफडीसी ने कुछ थिएटर बनवाए. कुछ फिल्मकारों को धन देकर अब तक 300 फिल्मों का निर्माण करवाया. हर वर्ष भारत में आयोजित होने वाले ‘अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव’ में भी एनएफडीसी ही आगे रहता है. एनएफडीसी ही ‘इफी’ में फिल्म बाजार का आयोजन करता है, जिसमें पिछले दस वर्षों से अनुराग कष्यप व दिबाकर बनर्जी का ग्रुप ही हावी रहा है.

‘हम चार’ से दोस्ती का नया पाठ पढ़ायेगा राजश्री प्रोडक्शन

1989 से पारिवारिक मूल्यों के साथ साथ जीवन मूल्यों को उकेरने वाली फिल्में बनाता आ रहा ‘‘राजश्री प्रोड्क्शन’’ पहली बार समय के साथ खुद की सोच में बदलाव करते हुए दोस्त भी परिवार होता है, इस कौन्सेप्ट के साथ एक अनूठी फिल्म ‘‘हम चार-फ्रेंड्स भी फैमिली भी’’ लेकर आ रहा है. जिसका पहला पोस्टर सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है.

राजश्री प्रोड्क्शन की विषय को लेकर सोच भले ही बदली हो पर इस 58 वीं फिल्म में भी वह अपनी पुरानी परंपरा के अनुरूप ही चार नए चेहरों प्रीत कमानी, अंशुमन मल्होत्रा, सिमरन शर्मा और तुषार पांडे को बौलीवुड में लाने जा रहा है. 2019 में प्रदर्शित होने वाली यह फिल्म राजश्री प्रोड्क्शन की 58 वीं फिल्म होगी. राजश्री प्रोड्क्शन ने अपनी 57 वीं फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ का निर्माण सलमान खान व सोनम कपूर के साथ किया था.

अभिषेक दीक्षित के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘‘हम चार – फ्रेंड्स भी फैमिली भी’’ वर्तमान समय का ही प्रतिबिंब है. वर्तमान समय में जब संयुक्त परिवार खत्म से हो गए हैं और एकाकी परिवार ही हर जगह मौजूद हैं, ऐसे में इन एकाकी परिवारों के लिए इनके दोस्त ही परिवार बनते जा रहे हैं. यही इस फिल्म का हिस्सा है.

फिल्म के निर्देशक अभिषेक दीक्षित कहते हैं – ‘‘जब हम पटकथा लिख रहे थे, तभी से यह तय था कि इसमें नए कलाकारों को जोड़ा जाएगा. हमारी फिल्म की कहानी दर्शकों तक किरदारों के माध्यम से ही पहुंचनी है, इसलिए कलाकारों का चयन करना हमारे लिए कठिन रहा. क्योंकि हर कलाकार का उसके किरदार में विश्वसनीय लगना बहुत जरुरी है.’’

इस फिल्म की चर्चा करते हुए फिल्म के निर्माता सूरज बड़जात्या कहते हैं – ‘‘हमारी कंपनी राजश्री प्रोड्क्शन ने जब से बौलीवुड में कदम रखा, तब से नई प्रतिभाआें को ही बढ़ावा देती आयी है. हमें इस बात का गर्व है कि हमारी कंपनी ने बौलीवुड को कई कलाकार, निर्देषक, संगीतकार व अन्य तकनीशियन दिए हैं. अब 58 वीं फिल्म से हम बौलीवुड को चार नए चेहरे देने जा रहे हैं.’’

आप का पार्टनर कहीं नारसिसिस्ट तो नहीं

स्वधा और अमोल ने पहली नजर में ही एकदूसरे को पसंद किया था. अमोल उस की खूबसूरती और स्वभाव से बहुत प्रभावित हुआ था जबकि स्वधा को उस की स्मार्टनैस और व्यवहार बहुत अच्छा लगा. दोनों उस समय मुंबई के एक कालेज में पढ़ रहे थे. दोनों ने ही अपने इस रिश्ते को आगे तक ले जाना चाहा पर कुछ ही महीनों में यह भावना समाप्त होने लगी.

स्वधा अपने मन की बात शेयर करते हुए बताती है, ‘‘कई लड़के मेरे करीब आने की कोशिश करते थे. वे मुझ से दोस्ती करना चाहते थे पर मैं ने किसी को लिफ्ट नहीं दी थी. बस, मुझे अमोल का व्यवहार बहुत अच्छा लगा था, पर अचानक मेरा दम घुटने लगा. मैं ने खुद को उपेक्षित महसूस किया. ऐसा लगता था कि इस रिश्ते में बस एक ही व्यक्ति का महत्त्व है और वह है अमोल. वह मुझे मेरे सब दोस्तों से दूर रखने लगा. मेरा कोई स्पेस ही नहीं था. वह चाहता था कि मैं बस उसी से मतलब रखूं और किसी से नहीं.

मेरी भावनाओं और जरूरतों की उसे जरा भी कद्र नहीं थी पर उसे मेरा पूरा ध्यान और तारीफ चाहिए होती थी. जल्दी से मेरा धैर्य भी चुकने लगा था. मैं लाउड और डौमिनेटिंग नहीं थी तो उसे लगता था मैं उस की हर बात मानती रहूंगी. इस रिश्ते में पार्टनरशिप जैसी कोई चीज ही नहीं थी. मैं चाहती थी यह रिश्ता चले, टूटे नहीं.

आखिरकार मैं काउंसलर के पास गई जिस ने मुझे समझाया कि गलती कहां थी. मेरा बौयफ्रैंड नारसिसिस्ट था.’’

क्या होता है नारसिसिज्म

मनोवैज्ञानिक डाक्टर संयुक्ता कहती हैं, ‘‘नारसिसिज्म एक पर्सनैलिटी डिस्और्डर है जिस में व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण समझता है. अपनेआप को महत्त्वपूर्ण समझने से व्यक्ति आत्मकेंद्रित होता चला जाता है. उस के दिल में सहानुभूति, करुणा, सहयोग जैसी भावनाएं नहीं होतीं. वह दूसरों की, अपने पार्टनर की भी, जरूरतों के बारे में नहीं सोचता.’’

मनोचिकित्सक अल्पना बांगर का कहना है, ‘‘नारसिसिस्ट (आत्मकामी) व्यक्ति को अपनी तारीफ अच्छी लगती है पर वह दूसरों की तारीफ करना नहीं जानता है. वह अपने लुक्स में या प्रोफैशनल एचीवमैंट में बैस्ट होना चाहता है और वह यह मानता भी है कि वही बैस्ट है. जो वे चाहते हैं, उसे पाने के लिए आत्मकामी लोग दूसरों का फायदा भी उठाना जानते हैं. अपनी आलोचना उन्हें पसंद नहीं, क्योंकि उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं होता कि उन में कुछ कमियां हो सकती हैं.’’

नारसिसिस्ट होने के कारण

जिन लोगों में आत्मविश्वास बहुत कम होता है, उन के नारसिसिस्ट होने की आशंका ज्यादा रहती है. डाक्टर बांगर के अनुसार, ‘‘ऐसा व्यवहार बचपन के अनुभवों से जुड़ा है. जब बच्चे को लगातार यही महसूस करवाया गया हो कि उस का कोई महत्त्व नहीं है और उस में बहुत सी कमियां हैं.

‘‘जैसेजैसे ऐसे बच्चे बड़े होते हैं वे दूसरों को वैसा ही महसूस करवाने लगते हैं, जैसा उन्होंने अपने बचपन में महसूस किया था. अपनी असुरक्षा के कारण ये दूसरों को नीचा दिखाने लगते हैं. दरअसल, वे अपनेआप को यकीन दिलाते रहते हैं कि वे वास्तव में बहुत अच्छे हैं और उन में आत्मविश्वास की कमी नहीं, जबकि अंतर्मन में वे मान रहे होते हैं कि हर व्यक्ति उन से बेहतर है, पर यह वे स्वीकार नहीं कर सकते.

‘‘नारसिसिज्म को समाज और परिवार से बढ़ावा भी मिलता है. विशेषरूप से व्यावसायिक स्तर पर पुरुषों में ऐसे व्यवहार को कौन्फिडैंस मान कर बढ़ावा दिया जाता है. इसीलिए लगभग 50 से 75 प्रतिशत पुरुष इस डिस्और्डर के शिकार हैं. ऐसे लोग पार्टनर को उस के सोशल सर्कल से दूर रखने की कोशिश करते हैं. उन्हें अपना कंट्रोल खोने का डर रहता है. ऐसे लोग उन स्थितियों से दूर रहते हैं जिन्हें वे कंट्रोल नहीं कर सकते.’’

कैसे पहचानें

आप का प्रेमी या पार्टनर नारसिसिस्टिक व्यक्ति है या नहीं, इसे ऐसे पहचानें :

–     वह ये डींगें तो नहीं मारता कि वह जो भी करता है, बैस्ट होता है.

–     आत्मकामी लोग रिश्ते के शुरू में आप को काफी प्रोत्साहन देंगे और बदले में आप से भी यही चाहेंगे कि उन्हें आप का पूरा सहयोग मिले और आप का पूरा ध्यान उन पर ही हो तो उन की ईगो बूस्ट हो जाती है और वे कुछ दूरी रखना शुरू कर देंगे.

–     यदि आप का पार्टनर लगातार यह चाहता है कि आप हमेशा उस की पहुंच में रहें, तो इसे वौर्निंग साइन समझ लें.

–     ये लोग अपनी ही ब्लौकबस्टर लाइफ टाइम मूवी के स्टार होते हैं. यदि ये अपनी लाइफ की कहानी बारबार दोहरा रहे हैं, तो एक बार अपने रिश्ते के बारे में, उसे आगे बढ़ाने के बारे में जरूर सोचें.

–     आत्मकामी प्रेमी हर चीज का कंट्रोल अपने हाथ में चाहता है. रिश्ते से ज्यादा उस की खुद इमेज उस के लिए महत्त्वपूर्ण होती है.

–     उन्हें ना सुनना नहीं भाता. वे आप को ही बाध्य करेंगे कि आप की राय गलत है और आप को ही बदलना है. आप की पर्सनल बाउंड्री उन के लिए माने नहीं रखती.

–     क्या आप को अपने पार्टनर से बात कर के संतोष मिलता है? क्या वह आप के बारे में पूछता है? आप कैसे हैं, आप किस स्थिति से गुजर रहे हैं, क्या वह इस की चिंता करता है? अगर इन बातों का जवाब न है तो सावधान हो जाएं. अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने से पहले अच्छी तरह जांचपरख लें.

आत्मकामी के साथ कैसे रहें

आत्मकामी व्यक्ति का पार्टनर धीरेधीरे आत्मविश्वास खोने लगता है, ऐसे व्यक्ति से निबटने के लिए, उन के साथ रहने के लिए इन बातों का ध्यान रखें तो स्थिति बेहतर हो सकती है :

–     डाक्टर बांगर का कहना है कि नारसिसिस्ट कभी नहीं स्वीकार करते कि गलती उन की है, क्योंकि वे दोषारोपण या आलोचना सहन नहीं कर सकते. उदाहरण के लिए, वे किसी झगड़े या असहमति में माफी नहीं मांगेंगे. वे कुछ और कर सकते हैं, जैसे फूल ला सकते हैं या कुछ और जिस से यह पता चल जाता है कि झगड़ा खत्म हो चुका है. उन से निबटने के लिए आप को उन के व्यवहार का पैटर्न समझना होगा.

–     आत्मकामी लोग अकसर बहुत आलोचना करते हैं. कारण, उन्हें अपने को श्रेष्ठ दिखाना होता है. यह जरूरी है कि आप उन्हें स्पष्ट कर दें कि आप को कौन सी बात स्वीकार्य है, कौन सी नहीं. किस बाउंड्री को वे बिलकुल क्रौस न करें, जैसे आप अपने मातापिता या बच्चों की अकारण निंदा या आलोचना बिलकुल सहन नहीं करेंगी.

–     लगातार आलोचना सुनते रहने से किसी भी आत्मकामी के पार्टनर के आत्मसम्मान पर बहुत प्रभाव होता है. उसे यही लगने लगता है कि वह इस रिश्ते के लिए ठीक नहीं है या जीवन में कुछ भी करने के योग्य नहीं है. ऐसे में सकारात्मक बातें, छोटीछोटी सफलताओं की खुशियां मनाना, अच्छे दोस्तों के साथ रहना नारसिसिस्ट के पार्टनर के लिए जरूरी होता है.

–     उन की आलोचना न करें, उन से सवालजवाब न करें. वे आप की हर बात रिजैक्ट कर देंगे. उन से बात करने का तरीका आप को बदलना होगा. किसी बात को तुम से शुरू करने के बजाय हम से करें. यदि आप चाहती हैं कि आप का आत्मकामी पार्टनर आप के लिए कुछ करे, तो आप भी बदले में उस के लिए कुछ जरूर करें. बात करते हुए दृढ़ रहें. बहस से दूर रहें, क्योंकि आप बहस में उन से जीत नहीं सकतीं.

–     उन्हें तारीफ सुनना अच्छा लगता है. उन्हें कौम्पलिमैंट्स देती रहें, इस से आप के रिश्ते में बहुत सुधार होंगे. जब भी वे गुस्से में हों, उन की आलोचना को पर्सनल अटैक न समझें.

आदिवासियों नहीं, धर्मान्धता ने मारा है जौन ऐलन को

धर्म चाहे भगवा आवरण में हो या दाढ़ी टोपी में, फादर/पादरी लबादे में हो या निवस्त्र, काम सबका लोगों को अकर्मण्य, तर्कहीन व अंधभक्त बनाना और जरूरत पड़े तो मौत के अंधेरे दलदल में धकेलना ही रहा है.

अंडमान के सेंटिनल द्वीप में मारे गए अमेरिकी टूरिस्ट जौन ऐलन चाऊ की हत्या के लिए हम भले ही उस द्वीप में रह रहे आदिवासियों को जिम्मेदार ठहरा लें, लेकिन असली हत्यारा धर्म ही था. क्योंकि ऐलन चाऊ का मकसद आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म का प्रचार करना था.

न वह धर्म प्रचारकों की हांक में आकर अमेरिका से यहां आता और न ही असमय मारा जाता. वह टूरिस्ट की शक्ल में ईसाई धर्म का प्रोपोगैंडा कर रहा था और इसका नतीजा उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा.

धर्म की नाहक घुसपैठ

ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से 50 किलोमीटर दूर स्थित जिस प्रतिबंधित नौर्थ सेंटिनल द्वीप में हुई, वहां के आदिवासी समूह से टूरिस्टों को किसी भी तरह का संपर्क साफ मना था. बावजूद इसके ऐलन सिर्फ धर्म के वशीभूत होकर अपनी जान जोखिम में डालकर उस प्रतिबंधित इलाके में घुसा और अपने एकांत में गुजर बसर कर रहे आदिवासियों को ईसाई धर्म का पाठ पढ़ाने लगा. उनसे इस धर्म को अपनाने के लिए आग्रह भी करने लगा.

लेकिन आदिवासियों को यह सब नागवार गुजरा और उन्होंने तीर मारकर उनकी हत्या कर दी. बताते हैं कि चाऊ इस से पहले भी कई बार इस द्वीप पर घुसने की नाकाम कोशिश कर चुके थे लेकिन 16 नवंबर को जब वह इस प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसे तो यह उनकी आखिरी घुसपैठ साबित हुई.

इसके लिए उसने उनसे दोस्ती करने के लिए फुटबौल, मेडिकल किट वगैरह भी दी. जैसा कि दक्षिण भारत में इसाई धर्म के प्रचार के शुरुआती दौर में अंग्रेज किया करते थे. कहीं पैसे बांटते तो कहीं स्कूल खुलवाकर सबको चर्च आने पर मजबूर कर देते.

हालांकि इसमें ज्यादातर अल्पसंख्यक और दलित लोग ही होते थे, जो हिन्दू और मुस्लिम सवर्णों के शोषण से तंग आकर ईसाई धर्म में परमेश्वर के पास मुक्ति की आस में आ जाते थे. यह अलग बात है कि यहां भी उन्हें चर्च में कैंडल जलाने प्रभु ईशू के गुणगान करने पड़ते, सो हाल कुछ ज्यादा लगा नहीं था. क्योंकि  धर्म चोला और रंग बदल सकता है अपनी नीयत नहीं.

शव के पास अनुष्ठान!

इस पूरे प्रकरण में हर एंगल से धर्मकर्म, पूजा अनुष्ठान की तस्वीर सामने आ रही है. जहां ऐलन अपने धर्म के प्रचार के लिए उन आदिवासियों के धर्म के साथ छेड़छाड़ कर रहा था जो सालों से मुख्यधारा से अलग होकर अपने समुदाय, इलाके और धर्म को लेकर बेहद सचेत और कट्टर हो चुके थे. जैसे ही उन्हें लगा कि कोई और धर्म और वर्ण का आदमी उनकी टेरीटरी में प्रवेश कर रहा है तो सालों पुराना धर्म युद्ध सा छिड़ गया और इस क्रम में हमेशा की तरह खून बहा.

कहा जा रहा है कि ऐलन के शव को रेत में ही गाड़ दिया गया था और मछुआरों ने आदिवासियों संभवतया ऐलन की लाश के पास अनुष्ठान करते हुए भी देखा. यानी धर्म की काट धर्म से होती दिखी. हर सदी, देश और समाज में जब दो धर्म या विभिन्न संस्कृति के लोग टकराते हैं तो अंत बातचीत और तर्क के नहीं हिंसा के आधार पर होता है. यहां भी यही हुआ.

असली अपराधी परदे में

अब पुलिस मामले में मछुआरे सॉ जंपो, सॉ टैरे, सॉ वाटसन, सॉ मोलियन, एम भूमि, सॉ रेमिस और ऐलेक्जेंडर को आदिवासी जनजातियों (विनियमन) अधिनियम की सुरक्षा का उल्लंघन करने और चाऊ की मौत का कारण बनने के लिए गिरफ्तार करने की कानूनी खानापूर्ती भले ही कर रही हो लेकिन उन लोगों से सवाल पूछने की जहमत कोई नहीं उठा रहा जिनके या जिन धार्मिक संस्थाओं कहने पर एलन इतनी दूर अपनी जान गंवाने आये. किसी ने तो  उन्हें धर्म प्रचार के लिए भेजा होगा और इस हद तक उकसाया होगा कि वह कई सालों तक इस इलाके में अवैध रूप से घुसने का प्रयास करता रहा. उसे कहा गया होगा कि इस इलाके में कोई आदिवासी समूह है जो ईसाई धर्म के लिए पोटेंशियल मेंबर हो सकते हैं.

धर्म प्रचार की बढ़ती फौजें

सालों से ईसाई मिशनरियां भारत में साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाकर धर्मपरिवर्तन अभियान चलाती आई हैं. वेटिकन ईसाई के प्रचार के लिए प्रतिवर्ष करीब 17 हजार करोड़ डौलर खर्च करते हैं, ऐसा सुनने में आता रहता है. जाहिर है धर्म अपने प्रचार के लिए पूंजी खर्च करता है और ऐसे लोगों के फौज भी जो उनके एक इशारे पर किसी भी देश के कोने में फैली खतरनाक जगहों पर जाकर इस अभियान को बढ़ाने का काम करने लगें. यह काम सिर्फ ईसाई ही नहीं बल्कि हर धर्म कर रहा है.

हमारे यहां मंदिर-मस्जिद की राजनीति इसी मंशा की परिणिति है. हर धार्मिक पीठ, सनातन धर्म संस्थाएं, चर्च, मठ, जैन, बौद्ध, मुल्लामौलवी अपने प्रवचनों, तकरीरों, फतवों और भाषणों में अपने धर्म के पौराणिक उद्धरण देकर यही बताने कि कोशिश करते हैं कि हमारा धर्म सबसे बेहतर है और इसे ज्वाइन करिए. जाहिर है ऐलन चाऊ भी इन्ही में किसी एक धार्मिक गुट का हिस्सा या अनुयायी रहा होगा.

धर्मान्धता का रोग

ऐलन को मारने वाला 60 हजार पुराना आदिवासियों का कबीला बेहद विलुप्तप्राय है. न तो ये कोई मुद्रा प्रयोग करते हैं और न ही इन पर कोई कानूनी नियम चलते हैं. सेंटिनेलीस एशिया की आखिरी अछूती जनजातियों में से एक यह समुदाय कई बार साफ कर चुका है कि वह बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं रखना चाहते, इसके बावजूद कोई वहां जाकर अपने धर्म की पीपनी बजाता है और इस जेहादी क्रम में मारा जाता है तो असली गुनहगार कोई नहीं बल्कि धर्मान्धता ही है. और जब तक धर्मान्धता का यह रोग लोगों को संक्रमित करता रहेगा, ऐसी घटनाएं जारी रहेंगी.

आलू पोस्तो : स्वाद जो हमेशा रहेगा याद

सामग्री:

  • 3-4 आलू , टुकड़ों में कटा हुआ
  • 3 टेबल स्पून खसकस
  • 3 हरी मिर्च
  • 1 टी स्पून जीरा
  • 1 टी स्पून हल्दी पाउडर
  • 53 सूखी लाल मिर्च
  • स्वादानुसार नमक
  • (गार्निशिंग के लिए) ताज़ा हरा धनिया
  • तेल

विधि

  1. खसखस को एक मिनट के लिए भून लें. भुने हुए खसखस में हरी मिर्च और पानी डालकर पीस लें.
  2. आलू को हल्के भूरे रंग का होने तक डीप फ्राई करें. साइड रख दें.
  3. एक दूसरे पैन में 1 ½ बड़ा चम्मच तेल को गर्म करके जीरा, हल्दी पाउडर और सूखी लाल मिर्च का तड़का लगाएं.
  4. हल्का भूनें। इसके बाद इसमें तैयार किया खसखस का पेस्ट और नमक डालें.
  5. दो मिनट के लिए पकाएं. फिर इसमें फ्राई किए आलू मिलाएं. थोड़ा पानी डालें.
  6. करीब सात से आठ मिनट के लिए हल्की आंच पर पकाएं.
  7. गार्निश कर सर्व करें.

एक तख्ती से क्यों डर गई ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

ट्वीटर के सीईओ माइकल जैक ने सोचा भी नहीं होगा कि भारत में विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव करने वाले जिन लोगों से वह मिलने जा रहे हैं यह मेलमिलाप उन के लिए नाग की फांस बन जाएगा.

जातीय कट्टरता का नाग किस कदर फुंफकारता हुआ जहर उगल कर खौफ फैला सकता है, यह जैक द्वारा माफी मांग कर खामोश हो जाने की घटना से स्पष्ट हो गया है. जातिवादियों ने जैक पर हमला बोल दिया था और उन्हें भयभीत करा कर चुप करा दिया गया.

इस घटना से यह भी जाहिर है कि ट्वीटर जैसे विश्वव्यापी मजबूत मंच के बावजूद इस के मुखिया तक पुरानी विचारधारा के विरोध में एक क्षण टिक नहीं पाए और खिलाफत के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गए.

जैक ने ज्योंही भारत के बदलाव के लिए अभियान चला रहे कुछ लोगों के साथ खिंची एक फोटो ट्वीट की, उन पर हमला शुरू हो गया. सदियों पुरानी गैर बराबरी पर टिकी ब्राह्मणवादी व्यवस्था जैक पर एक साथ टूट पड़ी और उस आवाज को दबाने पर उतर आई जो उन्होंने उठाई तो नहीं थी, महज एक पोस्टर के जरिए उजागर की थी.

जैक की आवाज दबाने के पीछे ब्राह्मणवादी ताकतें ही नहीं, इस के पीछे सत्ता का हाथ भी शामिल है. यह सही है कि ट्वीटर के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है और इस बाजार को कोई भी बाहरी कंपनी गंवाना नहीं चाहती पर यह भी सही है कि विरोधी करने वाली ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के सामने अपने धंधे का भी सवाल है.

क्या है ब्राह्मनीकल पितृसत्ता?

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता सदियों पुरानी गैर बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था है जो आज तक कायम है जो पुरोहितों द्वारा थोपी गई. इस में जातीय शुद्धता व ऊंचनीच के भेदभाव के साथसाथ स्त्रियों पर पुरुष के नियंत्रण का अधिकार भी शामिल है. इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने, बदलाव की कोशिश करने या छेड़छाड़ करने वालों पर हमला किया जाता है.

किस को डर है ‘स्मैश ब्राह्मनिकल पैट्रिआर्की’ लिखे पोस्टर से?

दरअसल इस ब्राह्मनिकल पैट्रिआर्की के पीछे धर्म का कारोबार टिका हुआ है. जैक को शायद मालूम नहीं था कि ‘स्मैश ब्राह्मनीकल पैट्रिआर्की’ लिखी जिस तख्ती को वह पकड़े हुए हैं, वह भारत में सदियों से चले आ रहे धंधे पर चोट पहंचा सकती है. इस का असर भारत में तो पड़ता ही, विश्व के देशों में हिंदुत्व का कारोबार कर रहे धंधेबाजों के लिए यह पोस्टर खतरा खड़ा कर सकता था.

यह ब्राह्मणवादी पितृसत्ता किसी भी परिवर्तन के खिलाफ है. इस के खिलाफ आवाज उठाने वालों को ट्रोल करना शुरू कर दिया जाता है. धर्म, जाति का कारोबार चलता रहे. यह ताकतें इस व्यवस्था को कायम रखना चाहती हैं.

अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार भले ही इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार देते फिरें पर इन ताकतों की इस तरह की स्वतंत्रता बिल्कुल पंसद नहीं है जो उन के धंधे पर चोट पहुंचाए.

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया धार्मिक सामाजिक गैरबराबरी, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने का एक बड़ा मंच साबित हो रहा है.

दुनिया भर में सोशल मीडिया सामाजिक आंदोलन का बड़ा जरिया बन रहा है. भारत में भ्रष्टाचारी व्यवस्था के खिलाफ अन्ना हजारे का आंदोलन हो या दुनिया भर में चल रहा मी टू अभियान या फिर जनमत संग्रह, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम जैसे मंच महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

ब्राह्मनीकल पितृसत्ता किसी भी तरह के बदलाव की विरोधी है. यह जातीय भेदभाव कायम रखना चाहती है. यह स्त्रियों की देह पर अपना हक, अपना नियंत्रण रखना चाहती है. यह समाज में कौन क्या खाएपीए, क्या पहनेओढे, क्या पढेलिखे, क्या कामधंधा, नौकरी करे, इन सब बातों पर नियंत्रण रखना चाहती है.

लेकिन ट्वीटर, फेसबुक जैसे इतने बड़े मंचों के बावजूद ब्राह्नीकल पैट्रिआर्की का प्रचारप्रसार तंत्र व्यापक और अधिक मजबूत है. इस व्यवस्था के पक्ष में धर्म के धंधेबाजों के साथ सत्ता भी खड़ी नजर आ रही है इसीलिए ट्वीटर जैसे बड़े मंच के मुखिया इन के सामने टिक नहीं पाए तो कोई ताज्जुब नहीं है.

डायरेक्टर की अय्याशी : 11 साल की लड़की से बनाए संबंध

डा. शफातउल्लाह खान मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्य करता था. अपनी पत्नी आयशा और 2 बेटियों के साथ जबलपुर शहर के भंवरताल गार्डन के पास स्थित कृतिका अपार्टमेंट में रहता था. अपने पद व रुतबे के कारण पूरे अपार्टमेंट में उसे सब सम्मान देते थे. डा. शफातउल्लाह खान ने सन 1991 में जबलपुर की ही आशा श्रीवास नाम की लड़की से प्रेमविवाह किया था और शादी के बाद उस ने उस का नाम आयशा खान रख दिया था.

इतने ऊंचे और प्रतिष्ठा के पद पर नौकरी करने वाले डा. खान की एक कमजोरी यह थी कि वह अय्याश प्रवृत्ति का था. रंगीनमिजाजी के लिए पूरे विभाग में उस की पहचान थी और तो और विभाग में अपने मातहत काम करने वाली महिला कर्मचारियों को भी अपने जाल में फांस कर अपनी हसरतें पूरी कर लेता था.

वह धीरेधीरे 2 बेटियों का पिता बन गया, इस के बावजूद भी  वह नहीं सुधरा. आयशा को भी पति के किस्से सुनने को मिलते रहते थे. आयशा ने पति को कई बार समझाया कि अब तो उन्हें अपनी इस तरह की आदतें छोड़ देनी चाहिए. लेकिन डा. शफातउल्लाह खान पत्नी की बातें एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता.

यदि आयशा उस से बहस करती तो वह उस पर ही चरित्रहीनता का आरोप लगाते हुए उस की पिटाई कर देता था. कोई भी औरत नहीं चाहती कि उस का प्यार किसी दूसरी महिला के साथ बंटे. पर आयशा मजबूर थी. वह पति के डर की वजह से यह सब न चाहते हुए भी सहन कर रही थी.

जब आयशा तीसरी बार गर्भवती हुई तो उस ने घर के काम में सहयोग के लिए अपनी 11 वर्षीय भतीजी कशिश को बुला लिया था. डा. शफातउल्लाह जमीर का इतना गिरा हुआ इंसान था कि उस ने हवस और वहशीपन की सीमाएं पार कर 11 वर्ष की मासूम कशिश के साथ भी जिस्मानी संबंध बना लिए जिस से कशिश को गर्भ ठहर गया.

इस से शफातउल्लाह की सोसाइटी के अलावा रिश्तेदारियों में भी काफी थूथू हुई. लेकिन वह बेशर्म था. वह समाज में जिस तरह सीना तान कर चल रहा था उस से तो यही पता लग रहा था जैसे कि उस पर कोई फर्क ही न पड़ा हो. लेकिन आयशा के मन में ऐसे निर्लज्ज पति के प्रति अब पहले जैसी इज्जत नहीं रही.

आयशा ने फिर से एक बेटी को जन्म दिया. ऐसे पति के प्रति आयशा के मन में नफरत भर गई थी. उस का मन अपने पति से उचट चुका था. आयशा ने पति को नपुंसक बनाने का मन बना लिया था. उस के मन में खयाल आया कि क्यों न वह पति का लिंग काट दे जिस से ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.’

इस के बाद पतिपत्नी के बीच होने वाला झगड़ा इस हद तक बढ़ चुका था कि डा. खान पत्नी आयशा के साथ शराब के नशे में मारपीट करने लगा था. आयशा ने किसी तरह भतीजी का गर्भपात करा दिया, लेकिन इस के बाद उस ने अपनी किसी रिश्तेदार को रहने के लिए नहीं बुलाया. यदि कोई आती भी थी तो आयशा की निगाहें चौकस रहती थीं.

डा. खान के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी, पर पत्नी को परेशान करने के लिए उस ने आयशा को घर खर्च के लिए पैसे देने बंद कर दिए थे. अपनी बेटियों के भविष्य को देखते हुए आयशा चुपचाप पति के जुल्म सहती रही.

साल दर साल ऐसे ही बीतते रहे. देखतेदेखते आयशा की 2 बेटियों की शादी हो गई और सब से छोटी बेटी सैफी भी 18 साल की हो चुकी थी. इस के बावजूद भी पति की आदतों में कोई सुधार नहीं आया था.

आयशा के भाई की लड़की कशिश भी अब जवान हो चुकी थी. वह अपने प्रेमी पवन विश्वकर्मा के साथ गुजरात के एक शहर में लिव इन रिलेशन में रह रही थी. कशिश का अपनी बुआ के घर जबलपुर आनाजाना होता रहता था. सन 2018 के जून महीने में कशिश जब अपनी बुआ आयशा से मिली तो बुआ की परेशानी समझते उसे देर न लगी.

अपने पति से लगातार बढ़ रही दूरियों और जोर ज्यादतियों के चलते आयशा ने पति को रास्ते से हटाने का मन बना लिया था. आयशा ने अपनी भतीजी कशिश के साथ मिल कर पति को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. कशिश को शफातउल्लाह ने बाल उम्र में ही अपनी हवस का शिकार बना दिया था इसलिए वह उस से पहले से ही नफरत करती थी. वह भी खान से प्रतिशोध लेना चाहती थी.

कशिश जानती थी कि शाजापुर निवासी उस का प्रेमी पवन विश्वकर्मा पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है. कशिश ने जब उस से खान को हटाने की बात की तो उस ने हामी भर दी.

योजना को अंजाम देने के लिए पवन ने अपने साथी राजेंद्र और अनिल को भी शामिल कर लिया. 23 वर्षीय राजेंद्र मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के किशनखेड़ी गांव का रहने वाला था और 17 वर्षीय अनिल गुजरात के राजापुर का निवासी था.

योजना के मुताबिक 12 जून, 2018 को पवन विश्वकर्मा अपने दोस्तों अनिल और राजेंद्र मालवीय को ले कर जबलपुर आ गया था. अपने साथ वह कशिश को भी बुला लाया था. वह सब दोपहर 1 बजे भंवरताल गार्डन में आयशा के यहां चले गए. जहां पर उन्होंने आयशा के साथ बैठ कर चर्चा की तथा डा. खान को ठिकाने लगाने की प्लानिंग कर ली. डा. खान पवन को पहचानता था, इसलिए तय हुआ कि राजेंद्र और अनिल इस काम को अंजाम देंगे.

आयशा ने दोनों लड़कों को 10-10 हजार रुपए भी दे दिए. बाकी रकम 50-50 हजार रुपए काम होने के बाद देने को कहा. इतना ही नहीं आयशा ने कशिश और उस के प्रेमी पवन को भरोसा दिया था कि वह काम हो जाने के बाद उन्हें 5 लाख रुपए नकद और एक फ्लैट देगी.

12 जून, 2018 को रात करीब 8 बजे की बात है. आयशा उस की बेटी शैफी, पति शफातउल्लाह एवं नाति शब्बीर अहमद घर में थे, तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक देते हुए कहा कि बिजली विभाग से आए हैं, दरवाजा खोलो. दरवाजा खोलते ही दोनों लड़के जो मुंह पर कपड़ा बांधे थे अंदर घुस आए. आयशा को धमकाते हुए बोले, ‘‘तेरा आदमी कहां है?’’

तभी एक लड़के ने आयशा की गरदन पर चाकू सटा कर गले में पहनी सोने की चेन खींच ली. इस के बाद वह उसे कमरे में ले गए. कमरे में उन्होंने शफातउल्लाह की गरदन पर चाकू लगाते हुए कहा, ‘‘अबे डाक्टर, रुपया कहां है. बैंक से जो पैसे लाया है, वो कहां रखा है.’’

डर के मारे डा. खान कांप उठा और कहने लगा, ‘‘मेरे पास जो कुछ है ले लो. परंतु मुझे मत मारो.’’ डा. खान ने जेबों में जो रुपए थे निकाल कर उन्हें दे दिए और देखते ही देखते दोनों लड़कों ने चाकू से डा. खान की छाती, पीठ, दाहिने हाथ की कलाई पर कई जगह वार किए. मारते समय एक लड़के ने पहले अल्लाह कहा और बाल पकड़ कर डा. शफातउल्लाह का गला रेत दिया. दोनों उस की बेटी को बाथरूम की तरफ ले जा रहे थे तो पीछेपीछे आयशा भी आ गई. शब्बीर भी उस के पीछे आ गया.

उन युवकों ने उन सभी को डराते हुए बाथरूम में बंद कर दिया था. कपड़ों से उन सभी के हाथपैर बांध दिए. तीनों डर के मारे बाथरूम से चिल्लाते रहे. लगभग आधे घंटे बाद लोगों ने दरवाजा खोला तो उन्होंने ओमती पुलिस थाने को घटना की जानकारी दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अरविंद चौबे तत्काल दलबल सहित वहां पहुंच गए. वहां जा कर देखा तो डा. शफातउल्लाह खान की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. लाश के समीप आयशा जोरजोर से दहाडें़ मार कर रो रही थी.

पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर वरिष्ठ अधिकारियों को घटना की सूचना दे दी. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

चूंकि मामला स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर की हत्या का था इसलिए आईजी जोन अनंत कुमार सिंह और डीआईजी भगवत सिंह चौहान ने भी घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद मृत डाक्टर के घर वालों से बात की. उन्होंने थानाप्रभारी को जल्द से जल्द केस खोलने के निर्देश दिए.

विवेचना के दौरान पुलिस को शफातउल्लाह खान की पत्नी आयशा द्वारा बताई गई कहानी कुछ बनावटी सी लगी. अपार्टमेंट और नीचे चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरों से फुटेज प्राप्त कर उस की जांच की तो पता चला कि 2 लड़के अपार्टमेंट के अंदर मुंह पर नकाब लगा कर प्रवेश हुए और एक लड़का बाहर 2 जनों को निर्देश देता हुआ दिखाई दिया. आयशा और डा. शफातउल्लाह खान के रिश्तेदारों से भी बारीकी से पूछताछ की.

पुलिस को शक हो गया था कि घर में डा. खान के अलावा 3 लोग थे. इस के बाद भी हत्यारे वारदात को अंजाम दे कर चले गए. किसी ने विरोध तक नहीं किया. पुलिस ने सब से पहले डाक्टर की पत्नी आयशा से पूछताछ की तो कई बातों का विरोधाभास उस की बातों में देखने को मिला.

पुलिस को यह भी पता चल गया था कि घटना वाले दिन आयशा के यहां उस की भतीजी कशिश भी आई थी. जब पुलिस ने आयशा से कशिश के बारे में जानकारी की तो आयशा ने बताया कि वह गुजरात में है. सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने आयशा से कशिश का फोन नंबर मालूम कर उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस के मोबाइल की लोकेशन घटना वाले दिन जबलपुर की मिल रही थी.

यहीं से पुलिस का संदेह पुख्ता होता गया और आखिरकार पुलिस ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर कशिश को खोज निकाला. जब पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो पूरा मामला सामने आ गया.

कशिश ने स्वीकार करते हुए बताया कि उस की बुआ आयशा खान ने ही डा. शफातउल्लाह की हत्या कराई थी. एसपी शशिकांत शुक्ला के अनुसार पत्नी आयशा ही पति की हत्या की मास्टरमाइंड निकली. पति की अय्याशी से परेशान हो कर आयशा ने अपनी भतीजी कशिश और उस के प्रेमी पवन की मदद से अनिल व राजेंद्र मालवीय को सुपारी दे कर डा. शफातउल्लाह खान की हत्या कराई थी.

कशिश द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर जबलपुर जिले के एएसपी राजेश तिवारी ने 2 पुलिस टीमें गुजरात एवं सिहोर भेजी दीं. पुलिस टीम ने मध्य प्रदेश के सिहोर से एक आरोपी राजेंद्र मालवीय को गिरफ्तार कर लिया. राजेंद्र के पास से हत्या में प्रयुक्त चाकू के साथ 2 हजार रुपए और मृतक डाक्टर से छीनी हुई एक घड़ी, सुजालपुर से जबलपुर तक का 11 जून का रेल टिकट जब्त किया गया. उस ने बताया कि वह ट्रेन से ही जबलपुर गया था.

पुलिस रिमांड पर ले कर जब राजेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने अपने दोस्त पवन और अनिल के बारे में भी बता दिया. राजेंद्र ने बताया कि पवन घटना के बाद गुजरात चला गया था. पुलिस ने मोबाइल की काल डिटेल्स के आधार पर शाजापुर निवासी पवन विश्वकर्मा और 17 वर्षीय अनिल को खोज निकाला. उन के पास से भी घटना में प्रयुक्त दूसरा चाकू और मोबाइल जब्त कर लिया.

कथा लिखे जाने तक सभी आरोपी गिरफ्तार हो चुके थे. पुलिस ने अनिल को बाल न्यायालय में पेश कर बाल सुधारगृह भेज दिया जबकि अन्य अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.   ?

— कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित. कशिश और अनिल परिवर्तित नाम हैं.

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