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औरतों का दुरुपयोग धर्म की देन

जिस तरह से सैक्सुअल हैरेसमैंट के आरोप देशभर में लगाए जाने लगे हैं, उस से साफ है कि यहां सारी शिक्षा, सादगी, सतकर्मों के व्याख्यानों, पूजापाठ के ढकोसलों के बावजूद मर्द आज भी मर्द हैं और उन की निगाहों में लड़कियां और औरतें सिर्फ और सिर्फ उन के इशारों पर चलने वाली सैक्सी गुडि़याएं हैं, और कुछ नहीं.

हर सुंदर, आकर्षक, बोल्ड, सफल युवती के साथ यह चैलेंज रहता है कि वह अपनी सफलता पर गर्व करे या नहीं, क्योंकि चाहेअनचाहे उसे तरहतरह के कंप्रोमाइज करने होते हैं. आज स्थिति यह है कि वह समझ नहीं पाती कि उस का सैक्स पार्टनर उस से वास्तव में प्रेम करता है या सिर्फ अपनी मर्दानगी और ओहदे का उपयोग कर रहा है. जिसे वह प्यार व समर्पण समझती है हो सकता है केवल नकली हो और पुरुष नाना पाटेकर या आलोक नाथ की तरह हो सकता है जो ऐक्टिंग में सहायता देने के बहाने सैक्सुअल टैस्टिंग कर रहा हो.

औरतों ने शरीर की कीमत सदियों से दी है. धर्म का पूरा ढांचा ही औरतों की टांगों के बीच पर टिका है और यह केवल हिंदू धर्म में ही नहीं है, लगभग हर धर्म में है कि औरतों को सैक्स गुलाम बनाने के कुछ स्पष्ट तो कुछ अस्पष्ट नियमकानून व रिवाज बनाए गए हैं.

हर धर्म कौमार्य के गुणगान गाता है पर पुरुष के नहीं केवल स्त्री के. विधवा विवाह ज्यादातर धर्मों में हिकारत से देखा जाता है. हिंदू धर्म तो इजाजत ही नहीं देता, इसलाम और क्रिश्चियनिटी में भी आसान नहीं रहा है. पुरुष को कभी भी अनब्याहियों की कमी नहीं रही है.

जो औरतें घर से बाहर निकल कर पिता, पति या खुद के कारणों से किसी तरह सफल हो पाई हैं उन्हें भी हर तरह की आफत सहनी पड़ी है और कई बार तो खुद उन के बेटों ने ही उन का दुरुपयोग किया है. पुरुष अपनी मरजी से किसी को भी जब चाहे छू ले, उठा ले, बिस्तर पर ले जाए पर बदनाम औरत होगी, पुरुष नहीं. औरतों के लिए तनुश्री दत्ता और कंगना राणावत की तरह शिकायत करना भी कठिन रहा है.

यह सामाजिक ढांचा कानून की देन नहीं है, धर्म की देन है. कठिनाई यह है कि जो ‘मीटू’ आंदोलन दुनियाभर में चल रहा है इस में भी धर्म को छूने की हिम्मत नहीं हो रही. मीडिया ट्रायल ही औरतों का अकेला अधिकार बना हुआ है और उसी के बल पर अदालतों का कुछ साथ मिल रहा है.

वास्तव में इन नियमों को लागू करने में धर्म का ही हाथ है और उसे औरतें छूने तक की हिम्मत नहीं कर पा रहीं. यह ‘मीटू’ आंदोलन फुस्स पटाखा साबित होगा पक्का है.

 

जानिए स्किन कैंसर के लक्षण

धूप में ज्यादा रहने से या ज्यादा वक्त तक रेडियोएक्टिव तरंगों के संपर्क में रहने से स्किन कैंसर का खरता रहता है. दुनियाभर में स्किन कैंसर की शिकायतें बढ़ रही हैं और आने वाले समय में ये लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है. बढ़ते समय के साथ इसके नए नए प्रकार भी सामने आ रहे हैं.

क्या हैं संकेत

कैंसर का कोई भी प्राकर हो उसके संकेत आपको काफी पहले से दिखने लगेंगे. इसका सबसे पहले आपको अपने चेहरे, कान, गर्दन, होंठ व हाथों की त्वचा पर असर नजर आएंगे. इस खबर में हम आपको स्किन कैंसर के संकेतों के बारे में आपको बताएंगें जो कैंसर होने से ठीक पहले आपके शरीर पर होते हैं.

  • शरीर पर लाल निशान

symptoms of skin cancer

स्किन कैंसर का सबसे पहला संकेत है शरीर पर लाल निशानों का होना. ऐसा होने पर आप तुरंत किसी डाक्टर से संपर्क करें. ये निशान आपके सिर, गर्दन और हाथ पर होते हैं.

  • एग्जिमा

एग्जिमा एक तरह की त्वचा संबंधी बीमारी है. आम भाषा में इसे खाज भी कहते हैं. समान्य तौर पर ये समस्या कोहनी, हथेली या पैरों पर होती है. एग्जिमा होते ही आप स्किन स्पेशेलिस्ट से जांच कराएं.

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  • ज्यादा मस्सों का होना

अगर आपके शरीर पर मस्सों की संख्या बढ़ने लगे तोसचेत हो जाइए. स्किन कैंसर वाले मस्सों में त्वचा से खून निकलने की शिकायतें भी होती हैं. अगर आपकी त्वचा पर मौजूद मस्से का आकार पांच या छह मिलीमीटर से अधिक है तो ये स्किन कैंसर का संकेत है.

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  • होठों पर बनने लगें निशान

होठों के सूखे पड़ने पर उसमें दरार का दिखना, इसके साथ ही उसपर पापड़ी वाले चकत्ते दिखने लगें तो ये कैंसर के संकेत हैं. आप तुरंत डाक्टर से संपर्क करें.

  • मस्सों का रंग

अगर आपको काल, नीला, सफेद या लाल रंग का मस्सा हो रहा हो तो ये आपके लिए खतरे की घंटी है. आपको तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए. वहीं भूरे या गुलाबी मस्से का होना एक समान्य बात है.

जोड़ों के दर्द में भूल कर भी ना खाएं ये खाना

बढ़ती उम्र के साथ जोड़ों का दर्द लोगों में आम है. ज्यादातर बुजुर्गों में ये बीमारी प्रमुखता से पाई जाती है. इसमें लोगों को चलने में इतनी ज्यादा परेशानी होती है कि उनके लिए दिन गुजारना भी मुश्किल होता है. ऐसे में दवाओं का चयन बहुत सर्तक हो कर करना होता है, आंख बंद कर के कोई भी दवाई लेना खतरनाक हो सकता है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कुछ घरेलू नुस्खें जिनको आजमाने से आपको जोड़ों के दर्द में खाफी राहत मिलेगी.

इन फूड्स का करें सेवन मिलेगा आराम

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जिन लोगों में जोड़ों के दर्द की शिकायत है उनके लिए जरूरी है कि वो फैटी फिश, तरह तरह के नट्स औलिव औयल जैसे खाद्य पदार्थों को अपने खाने में जगह दें. इनके नियमित सेवन से जोड़ों के दर्द और ऐंठन में काफी आराम मिलेगा.

इन खाद्य पदार्थों से बना लें दूरी

जोड़ों के दर्द की शिकायत में जरूरी है कि आप कुछ खास खाद्य पदार्थों से दूरी बना लें. इस परेशानी में आप इनका सेवन तत्काल बंद कर दें.

सोडा

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सोडा ना केवल दिल और डायबटीज रोगियों के लिए खतरनाक होता है बल्कि जोड़ों के दर्द में भी ये काफी खतरनाक है. सोडा में सुगर की मात्रा काफी ज्यादा होती है, इससे शरीर में साइटोकिन्‍स रिलीज़ होता है. जो जोड़ों के दर्द को और ज्यादा बढ़ाता है.

टमाटर

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टमाटर भी जोड़ों के दर्द में काफी नुकसानदायक होता है. कारण है इसमें पाए जाने वाला यूरिक एसिड. टमाटर में यूरिक एसिड की मात्रा काफी ज्यादा होती है. जिसकी वजह से शरीर में सूजन बढ़ जाती है और जोड़ों में दर्द होने लगता है.

दमा मरीज इन खानों को करें ‘इन’ और इन्हें करें ‘आउट’

अगर आपको दमे की परेशानी है तो जरूरी है आप बैलेंस्ड डाइट लें. अक्सर मोटे लोगों में दमा की समस्या आम होती है इसलिए जरूरी है कि इस बीमारी में आप अपने खानपान पर खासा ध्यान दें. कई जानकारों का मानना है कि ज्यादा फास्टफूड खाने से इस बीमारी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है. पर ये जरूर है कि इस बीमारी से बचने के लिए हरे साग, सब्जियों का सेवन काफी लाभकारी है.

आपको बता दें कि जो लोग विटामिन C और E का सेवन करते हैं, बीटा-केरोटिन, मैग्नीशियम, फ्लावोनोइड, सेलेनियम, ओमेगा-3-फैटी एसिड अपने आहार में लेते हैं उनमें दमा की संभावना कम होती है. क्योकि इन आहारों में एंटीऔक्सीडेंट भारी मात्रा में होते हैं, ये कोशिकाओं की रक्षा करते हैं. इससे आपके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है जो आपके अंदर जीवाणु, विषाणु और एलर्जी से लड़ने में काफी मदद करते हैं.

इन आहारों को रखिए अपनी डाइट में नहीं होगी दमा की शिकायत

  • सब्जियां और फल

prevention for asthma patients

अपने खानपान में आप फल और हरी साग सब्जियां रखें. इससे आप दमा को दूर कर सकेंगे. इससे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है. इसलिए जरूरी है कि आप ताजे और हरी साग सब्जियां जरूर खाएं.

  • ओमेगा-3-फैटी एसिड

prevention for asthma patients

अपने भोजन में मछली को प्रमुखता से जगह दें. इसमें भरपूर मात्रा में ओमेगा-3-फैटी एसिड होता है. दमा के रोकथाम में आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस तरह के खानपान से बना लें दूरी

दमा के मरीजों के लिए वो आहार जरूरी होते हैं जिनका उन्हें परहेज करना है. जिस खानपान से बीमारी बिगड़ती है उसका परहेज ज्यादा जरूरी है.

ज्यादा तले हुए खानों से दूरी बना लें. दमा के मरीजों के लिए ये काफी हानिकारक होते हैं. इसके अलावा ज्यादा कैलोरी वाले खानों से भी आप परहेज करें. इस बीमारी में ज्यादा कैलोरी लेना खतरनाक हो सकता है.

prevention for asthma patients

डब्बा बंद खानों को तौबा कहिए. इनमें ट्रांस फैट की मात्रा होती है जो मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकती है.

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आप किसी भी तरह के एलर्जी वाले फूड से दुरी बना लें. आपको पता होगा कि आपको किन आहारों से एलर्जी है. उनसे आप बिल्कुल दूरी बना लें. ये आपके लिए बेहद हानिकारक हो सकते हैं.

छोटे कमरे को दें बड़े कमरों सा लुक

क्या आपका कमरा इतना छोटा है कि कोई भी सामान भीड़ लगने लगती है? अगर ऐसा है तो आपको जरा सी सूझबूझ की जरुरत है, जिससे आप अपने कमरे को बड़ा लुक दे सकती हैं. तो देर किस बात की, आइए जानते हैं, आप छोटे कमरे को बड़ा लुक कैसे दे सकती हैं.

दरअसल दीवारों पर ओवरसाइज शीशा या फिर शीशे का टेबल या शेल्फ में अधिक शीशे का काम, ये सब कमरे को बड़ा लुक देने में मददगार हैं.कमरे को बड़ा लुक देने के लिए शीशे का फर्नीचर में इस्तेमाल समझदारी है.

दीवारों का रंग भी कमरे को बड़ा या छोटा लुक देने में अहम भूमिका निभाता है। हल्के रंग की दीवारों में कमरे का लुक बड़ा लगता है क्योंकि उनमें लाइट का रिफ्लेक्शन अधिक होता है. सफेद, क्रीम, बेज, हल्के गुलाबी आदि रंगों में कमरा अधिक बड़ा लगता है.

ऐसा फर्नीचर जिसमें बौक्स का अधिक इस्तेमाल हो आपके कमरे की न सिर्फ एक्स्ट्रा चीजों को भरने में मददगार है बल्कि कमरे को खाली और बड़ा लुक देने में मदद करते हैं.

लाइंट‌िंग पर ध्यान दें. कमरे में कई प्वाइंट्स पर लाइट बल्ब लगाएं जिससे कमरा बड़े होने का आभास होता है.

कमरों में फर्श से छत तक दीवारों पर शेल्फ का इस्तेमाल करें. छोटे बास्केट और शोकेस न सिर्फ कमरे को फैलने नहीं देते बल्कि कमरे को साफ और बड़ा दिखने में मदद करते हैं.

सीबीआई का संकट मोदी सरकार की राजनीतिक नियुक्तियों का नतीजा

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना को रातोरात हटाए जाने और इस संस्थान के राजनीतिकरण के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. इस तख्तापलट पर जारी कानूनी उठापटक में चौंका देने वाले खुलासे हुए हैं. अभी हाल में सीबीआई के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मनीष सिन्हा ने खुलासा किया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सहित अन्य लोगों ने अस्थाना के खिलाफ जांच में दखल दिया था. सीबीआई के अक्सर राजनीतिक प्रभाव में आकर काम करने की बात को स्वीकारते हुए 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पिंजरे का तोता कहा था. लेकिन फिलहाल जो चल रहा है, वैसा विवाद सार्वजनिक रूप में शायद ही अब से पहले देखने को मिला है. मीडिया में प्रकाशित सीबीआई के निदेशक की जासूसी करने वाले चार अधिकारियों को गिरफ्तार करते सुरक्षाकर्मियों की फोटो, संस्थान में आई अभूतपूर्व गिरावट को दर्शाता है.

इस विवाद के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के पिछले कामों का साया है- दागदार छवि वाले उनके चहते अधिकारी, नौकरशाह और कानूनी अधिकारियों को दिल्ली के बड़े ओहदो पर रखा गया है. मोदी और अस्थाना का रिश्ता उस वक्त से है जब अस्थाना ने 2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन में जलाई गई रेल की छानबीन की थी. उस हादसे में मारे गए 59 लोगों में ज्यादातर कारसेवक थे. अस्थाना ने पड़ताल के नतीजे में कहा था कि रेल को मुस्लिम भीड़ ने सुनियोजित षडयंत्र के तहत जलाया था. परिणामस्वरूप मार्च 2011 में आए एक फैसले में 31 लोगों को दोषी करार दिया गया. हालांकि कई मीडिया रिपोर्टों में इस आधिकारिक दावे पर प्रश्न चिन्ह लगाए गए हैं और रेल के जलने को दुर्घटना बताया गया है.

मोदी के करियर में ऐसे बहुत से राज़ हैं जो उनके विश्वस्त सहयोगियों की मदद से दफन कर दिए गए. राजनीतिक दखल का यह संकट अब व्यापक बन गया है. यह संकट, सीबीआई, गुप्तचर विभाग और सॉलिसिटर जनरल सहित अन्य संवैधानिक पदों में नियुक्तियों के जरिए कानून और न्यायिक संस्थाओं में फैल चुका है. खबरों के मुताबिक वर्मा को पद से हटाए जाने की वजह फ्रांस सरकार के साथ 36 राफेल विमानों की खरीद वाले विवादास्पद करार की पड़ताल करने की उनकी इच्छा को बताया जा रहा है. ऊंचे ओहदो में नियुक्त बहुत से लोग ने मोदी और अमित शाह के विवादास्पद इतिहास को छिपाने का काम किया है और इस लिहाज से ताज़ा विवाद के मद्देनजर इन नियुक्तियों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.

2013 में, आम चुनावों के एक साल पहले, मोदी और शाह, गुजरात के आला पुलिस अधिकारी, नौकरशाहों, विधि अधिकारी और सरकार के मंत्रियों के साथ विवादों में फंसे हुए थे. एक चौंकाने वाले स्टिंग ऑपरेशन में गुजरात सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और आला पुलिस अधिकारी – इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद अली राणा और ज़ीशान जोहर – की कथित फर्जी मुठभेड़ के बारे में सीबीआई की पड़ताल को भटकाने की कोशिशों के बारे में चर्चा करते पाए गए थे. उस मीटिंग का मकसद, सीबीआई जांच को प्रभावित करना, अदालत को धोखे में रखना और आरोपी पुलिस अधिकारियों और मंत्रियों को कानून के शिकंजे से बचाना था.

15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी भाग में गुजरात पुलिस की अपराध शाखा के अफसरों ने इन चार लोगों की, यह कह कर हत्या कर दी थी कि ये लोग लश्कर-ए- तैयबा के सदस्य थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे. सितंबर 2009 में अहमदाबाद मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग, ने इस घटना को “फर्जी मुठभेड़” करार दिया था. दो साल बाद मुठभेड़ की जांच कर रही विशेष जांच टीम ने भी इस मुठभेड़ को “फर्जी” करार दिया था, जिसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2011 को यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया था.

सीबीआई को मामला सौंपने के एक महीना पहले, उस वक्त अहमदाबाद एंटी टेररिज्म स्क्वाड के प्रमुख, जीएल सिंघल ने एक स्टिंग किया था जिसमें मोदी के शीर्ष अधिकारी, मामले की आंच मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचने न देने के लिए इसे उलझाने की योजना बनाते रिकॉर्ड किए गए थे. अधिकारियों द्वारा मंत्रियों के साथ होने वाली अपनी बातचीत को रिकॉर्ड करना और एक दूसरे की जासूसी करना आम बात है. चूंकि गजरात सरकार मनमाफिक तरीके से अधिकारियों को इस्तेमाल करने और हटाने के लिए बदनाम थी, इसलिए अधिकारी अक्सर किसी जांच से खुद को बचाने के लिए ऐसी रिकॉर्डिंग किया करते थे.

अगस्त 2013 में इन स्टिंग रिकॉर्डिंगों की कॉपी मेरे हाथ लग गई और मैंने तहलका में पूरी ट्रांस्क्रिप्ट के साथ रिपोर्ट प्रकाशित की. वरिष्ठ अधिकारी और आला पुलिस अफसर इसमें शामिल थे – राज्य के गृह राज्य मंत्री प्रफुल पटेल, राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी, मोदी के विश्वसनीय माने जाने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जी सी मुर्मू, तत्कालीन कानून राज्य मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा, अहमदाबाद के तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त एके शर्मा, तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता और अन्य. इनमें से अधिकांश लोगों का करियर हाल के दिनों में चमक गया है.

उन ऑडियो टेपों में महाधिवक्ता त्रिवेदी कहते हैं कि उन्होंने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम के एक अधिकारी को, जी सी मुर्मू की उपस्थिति में अपने केबिन में बुला कर जांच टीम से अलग हो जाने को कहा है. यहां जिस अधिकारी की बात हो रही थी, वह गुजरात काडर के मोहन झा हैं. त्रिवेदी आगे कहते हैं कि गुजरात सरकार आरोपियों की मदद करने की इच्छुक है, और वो मोदी और शाह, जो इस मामलें पर करीब से नजर रखे हुए हैं, के संपर्क में हैं. इस बातचीत के दौरान, ऐसा लगता है, मुर्मू और त्रिवेदी मोदी को कॉल करते हैं जो उस समय दिल्ली जा रहे थे.

तहलका में रिपोर्ट प्रकाशित होने के एक महीने के भीतर, सीबीई के पुलिस निरीक्षक संदीप तामगड़े के नेतृत्व में फर्जी मुठभेड़ की जांच कर रही सीबीआई टीम ने मुर्मू, शर्मा, त्रिवेदी और मेहता से पूछताछ की. छह महीने बाद सीबीआई के वरिष्ठ पदों में बदली की गई. जो अधिकारी इस मामले की जांच और निगरानी कर रहे थे उनके खिलाफ जांच आरंभ हो गई, स्थानांतरण कर दिया गया या रिटायर हो गए. यही वो वक्त है जब स्टिंग में सुनाई दे रहे अधिकारियों को, जो छानबीन को भटकाने और प्रोफेशनल मिसकंडक्ट (पेशे के वितरीत काम) में शामिल थे, केन्द्र की मोदी सरकार ने व्यवस्थित तरीके से अलग अलग पदों में नियुक्त किया.

ताजा मामला तुषार मेहता का है. रिकॉर्डिंग के अनुसार मेहता ने नवंबर 2011 वाली मीटिंग कराई थी. इस साल 10 अक्टूबर को मेहता को भारतीय सॉलिसिटर जनरल बना दिया गया है. ऐसा नहीं है कि मेहता विवादों से बचे हुए हैं. अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में ऐसे ढेरों ईमेलों को नत्थी किया गया है, जिनमें 2002 के गुजरात दंगों के मामले में मेहता और आरएसएस के विचारक एस गुरुमर्ति के बीच बातचीत है. दंगों के मामले को गुजरात से बाहर हस्तांतरित करने की मांग करने वाली याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया.

सरकार के प्रमुख विधि सलाहकार के रूप में मेहता की नियुक्ति से पहले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा और मनिंदर सिंह, और पूर्व सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार सहित कई कानूनी अधिकारियों ने इस्तीफा दिया. सरकार के भीतर ही अलोकप्रिय रहे मेहता की नियुक्ति अमित शाह की स्वीकृति से जबरदस्ती की गई. पहचान न बताने की शर्त पर कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने बताया कि मेहता की नियुक्ति के खिलाफ अरुण जेटली के करीबी माने जाने वाले अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल की खुली बगावत को आखिरी वक्त में दबा दिया गया. लेकिन पिछले एक साल में हुए इस्तीफों की संख्या बहुत कुछ बताती है.

अप्रैल 2015 में मुर्मू को दिल्ली बुलाकर व्यय विभाग का अतिरिक्त सचिव बना दिया गया. मुर्मू 2014 तक गुजरात में मोदी के मुख्य सचिव रहे थे. उनकी नियुक्ति को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नियुक्तियों के लिए मंत्रीमंडलीय समिति ने मंजूरी दी थी. 2017 में मुर्मू को राजस्व विभाग में विशेष सचिव नियुक्ति कर दिया गया. जिस महीने मुर्मू को राजस्व विभाग में विशेष सचिव बनाया गया उसी महीने स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए एक अन्य अधिकारी, एके शर्मा को, जो अहमदाबाद में सिटी अपराध शाखा में विशेष पुलिस आयुक्त थे, दिल्ली लाकर सीबीआई का विशेष निदेशक बना दिया गया. ये नियुक्ति इस बात के बावजूद की गई कि इशरत जहां मामले में चार फर्जी मुठभेड़ों पर सीबीआई जांच और सुनवाई कर रही थी. सीबीआई की जांच अभी भी जारी है.

एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने मुझे बताया कि 2017 में अमित शाह के करीबी माने जाने वाले और स्टिंग ऑपरेशन में सबसे संदिग्ध भूमिका वाले कमल त्रिवेदी को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बनाया जाना था, लेकिन तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपनी पसंद के आदमी के पक्ष में दखल कर इस नियुक्ति को रोक दिया. त्रिवेदी अभी भी गुजरात के महाधिवक्ता हैं.

एक हैरान करने वाली बात यह है कि नागालैंड काडर के अधिकारी संदीप तामगड़े को जिन्होंने स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए अधिकारियों और मंत्रियों से पूछताछ की थी, फर्जी मुठभेड़ मामले से हटा दिया गया, और उन्हें अपने काडर में वापस भेज दिया गया है. तामगड़े ने ही गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख के साथी, तुलसी प्रजापति की मौत की जांच में अमित शाह को मुख्य आरोपी और किंगपिन बताया था. सोहराबुद्दीन और तुलसी की हत्या गुजरात पुलिस की फर्जी मुठभेड़ में की गई थी. दोनों मामलों में तामगड़े ने पूरक चार्जशीटें भी दायर की थी, जिनमें दोनों मृत्कों की अपहरण, हत्या और फिरौती में अमित शाह की भूमिका को विस्तार से बताया गया था. अपने काडर में भेज दिए जाने के बाद सीबीआई ने तामगड़े के खिलाफ ढेरों जांच बिठा दी और उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में बेहद कम अंक दिए – जिससे भविष्य में प्रमोशनों के अवसरों से उन्हें प्रभावशाली रूप में वंचित कर दिया गया.

जीएल सिंघल का स्टिंग ऑपरेशन आज मोदी सरकार और सीबीआई में रसूखदार पदों पर बैठे बहुत से अधिकारियों के भविष्य को तय कर सकता था, लेकिन जांच टीम के अधिकारी के अनुसार फरवरी 2014 में दाखिल इशरत जहां मामले की दूसरी चार्जशीट में इस ऑडियो को सबूत के रूप में शामिल नहीं किया गया. वरिष्ठ सीबीआई अधिकारी के अनुसार जिस तरह से दूसरी चार्जशीट दाखिल की गई और उसमें मुख्य नामों को शामिल न करने से कुछ समय के लिए सीबीआई के विशेष निदेशक अनिल सिन्हा और निदेशक रंजीत सिन्हा के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी. 2014 में अनिल सिन्हा सीबीआई के निदेशक बन गए.

बहुत सी नियुक्तियों ने सीबीआई की विश्वसनीयता को खत्म कर दिया है. लेकिन मोदी और शाह के लिए इन नियुक्तियों ने उनकी राजनीतिक यात्रा के दौरान उन पर लगे बहुत से दागों को धो दिया है. सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में दायर आरोपपत्र में अमित शाह को हत्या, हत्या का षडयंत्र रचने, फिरौती और आपराधिक धमकी के आरोपी के रूप में पहचाना गया था. दिसंबर 2014 में अमित शाह को बरी कर दिया गया. इस साल अक्टूबर के आरंभ में, बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका की सुनवाई में सीबीआई ने अमित शाह को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती न देने का बचाव यह कह कर किया कि यह “सचेत” और “तार्किक” निर्णय है. इस महीने अदालत ने यह जनहित याचिका खारिज कर दी. इस बीच इशरत जहां मामले में जांच एजेंसियां आरोपी अधिकारियों पर मामला चलाने की अनुमति का इंतजार कर रही हैं, जो अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित है.

जब हम आलोक वर्मा मामले को सीबीआई-बनाम-सीबीआई की तरह पेश करते हैं, तो हम भी निजी हितों के लिए सीबीआई की छवि खराब करने वालों के एजेंडे को ही पुख्ता करने लगते हैं. सीबीआई के आज के संकट का कारण अपने हितों के लिए पीएमओ द्वारा इसका निरंतर राजनीतिकरण करना है. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही पूर्व में सीबीआई का इस्तेमाल किया है लेकिन आज की तरह के हालात पहले कभी नहीं रहे. जब वर्तमान सरकार ने संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन करते हुए ऐसे लोगों की नियुक्ति की जिन्होंने राष्ट्रीय भूमिका में रहते हुए अपने पहले के पदों को बदनाम किया था तो ऐसे में न्याय और सत्यनिष्ठा के पदों का देर सवेर दागदार हो जाना लाजमी ही है.

निपटें खराब और बेजान बालों से

अक्सर ऐसा होता है कि आपने बालों में 2 दिनों से शैंपू न किया हो और बाल देखने में तैलीय लग रहे हों, कई बार बाल रूखे सूखे से लगने लगते हैं तो कई बार वे देखने में बेहद अजीब से लगने लगते है. आप चाहे जितनी कोशिश कर लें लेकिन वह जैसे दिख रहे होते हैं वैसे ही रहते हैं और उनमें कोई सुधार नहीं आता. आप केवल बस इतना ही कर सकती हैं कि टेढ़े-मेढे़ बालों को किसी तरह एक नया हेयर स्‍टाइल दे दें. आइये जानते हैं कि खराब बालों को झट से कैसे ठीक किया जाए-

इस प्रकार निपटें खराब बालों से

– कई बार बालों में किसी भी प्रकार की समस्‍या नहीं होती पर फिर भी वह बेकार लगने लगते हैं. तो इसको सही करने के लिये आप कोई अच्‍छी और आसान हेयर स्‍टाइल बना सकती हैं. जूड़ा बना कर आप बालों की परेशानी से छुटकारा पा सकती हैं. भले बाल तैलीय हो गए हों या फिर रुखे, बस एक जूड़ा बना लीजिये आपका काम हो जाएगा.

– बालों का तैलीय हो जाना एक बहुत बड़ी समस्‍या बन जाती है. कहीं जाना हो तो याद आता है कि आपने बालों को दो दिन से शैंपू ही नहीं किया है. इसलिये इस समस्‍या को दूर करने के लिये जल्‍दी ही बालों को शैंपू करें और तेल हटाएं.

– कभी कभी बाल धोने के बाद उन्‍हें मैनेज करना बहुत मुश्‍किल हो जाता है. ऐसा केवल इसलिये होता है क्‍योंकि आपने बालों को शैंपू करने से पहले उन पर तेल नहीं लगाया था. अब बाल को सही करने के लिये आप हेयर जैल का प्रयोग कर सकती हैं लेकिन रोज-रोज बालों पर जैल लगाने की आदत से बचें.

– अगर बाल कोई लट सही नहीं हो रही हो तो हेयर पिन लगा कर उसे दबा दें. इस लुक से आप की लट दब जाएगी और बाकी के बाल खुले दिखेगे जो कि कूल लुक देगी.

–  दूसरा विकल्प है हेयर बैंड, अगर आपने अपने बाल धुले हैं और उन्‍हें मैनेज करना बहुत मुश्किल हो रहा है. तो हेयर बैंड से अच्‍छा दूसरा और कोई विकल्प नहीं है.

– जिस दिन बाल अनमैनेजब हों,उस दिन चोटी या फिर पोनीटेल तो कभी नहीं बांधनी चाहिये. इससे वह इधर-उथर भागेगी और उसका अपना ही अलग स्‍टाइल दिखेगा.

कुछ इस तरह अप्लाई करें यह नेल आर्ट

अगर आपको अपने नाखून पर हमेशा नेल पालिश लगाए रखना अच्‍छा लगता है, तो नेल आर्ट आपको जरुर ट्राई करनी चाहिये. आप अपने नाखूनों पर रंग-बिरंगे रंगो से खूब सारा एक्‍सपेरिमेंट कर सकती हैं और उन्हें सजी सकती हैं. अगर आपको भी नेल आर्ट लगाना हो तो अपनाएं हमारे दिए हुए कुछ खास टिप्‍स-

– सबसे पहले अपने नाखून पर लगी पुरानी नेल पालिश को रुई और नेल पालिश रिमूवर से साफ कर लें.

– फाइलर की मदद से नाखून के क्‍यूटिकल्‍स को साफ करें. अक्‍सर होता ये है कि नेल पालिश लगाते वक्‍त वह इन क्‍येटिकल्‍स में जा कर फस जाती है और दाग छोड़ देती है.

– इसके बाद अपने हाथों को साबुन से धोएं. नाखूनों को भी साफ करें और पांच मिनट रुकें, जबतक नाखून पूरी तरह से सूख न जाए.

– अब न्‍यूड पिंक नेल पालिश लें और देखें की नेल पालिश थोड़ी सी ग्‍लिट्री हो. नेल पालिश को लगाने से पहले उसे शेक कर लें, जिससे आपको उसका सही रंग मिल सके.

– इस नेल पालिश की एक कोट अपने नाखूनों पर ऊपर से नीचे की ओर लगाएं. अगर शेड बहुत ही लाइट है तो एक कोट और लगा सकती हैं. अब नेल पालिश को अच्‍छी तरह से सूखने दें.

– अब एक डार्क ब्‍लू रंग की नेल पालिश लें. इस नेल आर्ट में नीले रंग को नाखून की टिप पर लगाया जाता है, यानी की सबसे आखिर और नीचे की ओर.

– ब्‍लू नेल पालिश को उसी शेप में लगाइये, जिस शेप में आपके नाखून कटे हुए हों. अगर नाखून चौकोर आकार में कटे हैं, तो ब्‍लू कलर को उसी तरह लगाइये. ध्‍यान रहे की पिंक वाली नेल पालिश पर ब्‍लू नेल पालिश न चढ़े, वरना दोनों मिल कर कुछ और ही रंग छोड़ने लगेंगे.

– जब नेल पालिश लगा लें तो उसे पांच मिनट तक अच्‍छे से सूखने के लिये छोड़ दें. अब लास्‍ट में एक गोल्‍डन नेल आर्ट डिजाइन ले कर अपने सीधे हाथ की रिंग फिंगर के नाखून में बड़ी ही सफाई से चिपका दें. लीजिये अब आपके नाखूनों पर नेल आर्ट बन गई.

ममता बनर्जी सरकार के कैबिनेट मंत्री सोवन चटर्जी का इस्तीफा

जब किसी भारी भरकम नेता का घरेलू किस्सा सामने आता है. तब वही ज्यादा चर्चा में होता है. पत्नी रत्ना के साथ ममता बनर्जी सरकार में कैबिनेट मंत्री सोवन चट्टोपाध्याय का जो डिवोर्स का मामला चल रहा है, उसके कारण उनका मंत्री पद छिन गया और अब उनकी मेयर की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा रहा है.

असल में ये सारा मामला मंत्री सोवन और एक शादीशुदा लड़की बैसाखी बंदोपाध्याय को लेकर शुरू हुआ है जिसकी शुरुआत सोवन की पत्नी रत्ना ने उन दोनों के संबंधों पर ऊंगली उठा कर की. इसके प्रतिरोध में सोवन ने भी अपनी पत्नी पर भी चरित्रहीन होने का आरोप लगाया, जिसके चलते आरोपों प्रत्यारोपों का यह दौर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है.

सोवन का कहना है की उनकी पत्नी का किसी अभिजीत नाम के शख्स के साथ प्रेम संबंध है साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया की उनके जन्मदिन पर उनकी पत्नी रत्ना ने उनके केक में जहर मिला दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा की रत्ना ने उनकी दोस्त बैसाखी और उनके बेटों को मारने के लिए एक सुपारी किलर का सहारा लिया.

इस सब मामले पर अभी बैसाखी बंदोपाध्याय का कोई कमेंट बाहर नहीं आया है. लेकिन कुछ ही दिन हुए बैसाखी ने सोवन और उनकी दोस्ती पर मुहर लगाई थी. उन्होंने तब कहा था कि वह सिर्फ सोवन की ही नहीं बल्कि सावन और रत्ना दोनों की ही पारिवारिक दोस्त हैं. मगर रत्ना ने पलटवार करते हुए कहा की बैसाखी सिर्फ सोवन की दोस्त हैं उनकी नहीं.

इन आरोपों के जवाब में अभिजीत ने हंसते हुए कहा, “रत्ना मेरी बहन जैसी है, सोवन भाई बहन के रिश्तों पर तोहमद लगा रहा है. ” इस बारे में रत्ना से पूछने पर उन्होंने कहा,”अभिजीत मेरे से 15 साल छोटा और भाई जैसा है. सोवन ने हमारे इज्जतदार रिश्ते पर ऊंगली उठा के ठीक नहीं किया.”

रत्ना ने यह भी कहा की, “जिस केक में जहर की बात सोवन कर रहे हैं वो सरासर झूठी है, वही केक मेरे बच्चों ने भी खाया था. और मैंने कोई सुपारी किलर बैसाखी को मारने के लिए नहीं भेजा. अपनी बचत के पैसों से मैं अपने बच्चों को पालूंगी, सोवन मेरे बच्चों के लिए एक रुपया भी नहीं खर्चता.”

दूसरी ओर सोवन ने कहा,” बैसाखी के साथ मेरी कोई खास दोस्ती नहीं है. वो मेरी एक अच्छी दोस्त हैं. मेरे बुरे दिनों में उन्होंने मेरा साथ दिया था. उन दिनों को मैं कभी नहीं भूलूंगा. मेरे  साथ खड़े लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए मुझे जो करना होगा करूंगा, जो छोड़ना होगा छोड़ दूंगा.”

रत्ना का कहना है की वह मानहानी का मामला करके कंपनसेशन नहीं चाहतीं, वह जज साहब को रिक्वेस्ट करेंगी कि सोवन चट्टोपाध्याय को 10 बार कान पकड़कर उठक बैठक करने की सजा दें.

इतना कुछ होने के बाद भी रत्ना ने कहा,” घर तोड़कर सोवन ने गलत काम किया है, अपना घर छोड़  दूसरों का साथ देना उनके पौलिटिकल करियर के लिए कफन में आखिरी कील गाड़ने जैसा होगा.

इन सब आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच सोवन को अपने मंत्री पद के साथ-साथ अपना घर भी छोड़ना पड़ा है. सी.एम. ममता बनर्जी ने सोवन का इस्तीफा पत्र स्वीकार कर लिया है. इसके साथ ही उन्हें कोलकाता कौर्पोरेशन के मेयर पद से भी इस्तीफा देने के लिये निर्देश दे दिया गया है.

पती-पत्नी का यह व्यक्तिगत मामला पब्लिक हो गया है और काफी चर्चा में है. अब इसमें कितना सच है और कितना झूठ…ये तो वक्त ही बताएगा.

मध्य प्रदेश चुनाव : कांग्रेस के घोषणापत्र के बाद सक्रिय हुआ स्वयंसेवक संघ

मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं. पिछले 10 दिनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राजनीतिक मोर्चे, भारतीय जनता पार्टी, के लिए प्रचार करने के उद्देश्य से राज्य भर में एक अनोखा सर्वे कराया है. इस सर्वे में मतदाताओं को उनके राजनीतिक झुकाव के अनुसार ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ श्रेणी में रखा गया है. संबंधित डाटा को बूथ स्तर पर संकलित किया गया है ताकि मतदाताओं को बीजेपी को वोट देने के लिए प्रेरित कर पार्टी के पक्ष में अत्याधिक परिणाम लाया जा सके.

धार जिले के जैतपुर गांव में इस सर्वे के इंचार्ज एवं आरएसएस कार्यकर्ता मृणाल डोराये ने मुझे बताया, “जो वोटर हमेशा से बीजेपी को वोट देते आए हैं उन्हें हमने ‘ए’ श्रेणी में रखा है और जो अपना चुनाव बदलते रहते हैं और अनौपचारिक स्तर अधिक समझाने की जरूरत है उन्हें ‘बी’ श्रेणी में रखा गया है”. उन्होंने आगे बताया, “कम्युनिस्ट विचारधारा वाले मतदाता या ऐसे मतदाता जिन्हें अपने पक्ष में नहीं किया जा सकता उन्हें ‘सी’ श्रेणी में रखा गया है.” वो बताते हैं, “क्योंकि ऐसे वोटरों पर अपना समय और उर्जा खर्च करना बेकार है इसलिए डाटा के जरिए ‘बी’ श्रेणी के वोटरों पर ध्यान देने में मदद मिलेगी.”

यह सर्वे आरएसएस की चुनावी रणनीति में बदलाव का संकेत है और उस पर मंडरा रहे हार के खतरे को दिखाता है. पहले संघ के बूथ स्तरीय कार्यकर्ता सभी तरह के वोटरों के बीच, प्रचार को इस प्रकार केन्द्रित किए बिना जाते थे.

संघ ने यह निर्णय 10 नवंबर को जारी किए गए कांग्रेस के घोषणापत्र के मद्देनजर लिया है. अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने आरएसएस पर निशाना साधते हुए, उसकी सरकार बनने पर सरकारी कर्मचारियों को संघ की शाखाओं में भाग लेने की अनुमति वाले आदेश को रद्द करने की घोषणा की है. कांग्रेस ने यह भी घोषणा की है कि राज्य में सरकार बनने पर वह सरकारी परिसरों में आरएसएस को शाखा लगाने नहीं देगी. धार जिले के तिरुपति नगर में संघ के चुनावी प्रयासों में शामिल आरएसएस के कार्यकर्ता ईश्वर दास वैष्णव बताते हैं, “सर्वे करने का निर्देश कांग्रेस की इस घोषणा के ठीक दूसरे दिन आया था.”

इस सर्वे में बीजेपी के कार्यकर्ताओं को शामिल नहीं किया गया है. यह काम संघ कार्यकर्ता स्वयं कर रहे हैं. जिन निर्वाचन क्षेत्रों में आरएसएस कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क है उन जगहों में सर्वे को व्यापक स्तर पर किया जा रहा है. वैष्णव बताते हैं, “संघ की बूथ स्तरीय समिति के प्रत्येक सदस्य को 20 से 25 घरों का जिम्मा दिया गया है और इन घरों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ श्रेणी में चिन्हित करने को कहा गया है”. वो कहते हैं, “सर्वे पूरा करने के लिए हम लोगों को 22 नवंबर तक का समय दिया गया था परंतु तिरुपति नगर के अधिकांश स्वयंसेवकों ने यह सर्वे इससे पहले ही पूरा कर लिया है.”

पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के एक वरिष्ठ संघ पदाधिकारी ने बताया कि इस सर्वे का उद्देश्य आरएसएस के नेटवर्क का अधिकत्म प्रयोग कर कांग्रेस को पराजित करना है. नाम न बताने की शर्त पर आरएसएस के इस पदाधिकारी का कहना है, “मध्य प्रदेश मे आरएसएस को लगभग पूरी तरह से प्रतिबंधित करने वाली घोषणा से एक नए प्रकार की स्थिति का निर्माण हो गया है. कांग्रेस की जीत का मतलब न केवल एक राज्य का हाथ से जाना है बल्कि यह आरएसएस के लिए कठिन समय लाएगा. इसलिए हम लोगों के पास कांग्रेस को पराजित करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है.”

हालांकि मध्य प्रदेश में आरएसएस की जड़ें काफी मजबूत हैं, फिर भी कुछ महिनों से, राज्य की सत्ता में लंबे समय तक बने रहने और अन्य कारणों से वह थकी हुई सी दिखाई दे रही थी. लेकिन कांग्रेस के घोषणापत्र में प्रतिबंधों की बातों ने आरएसएस को इतना सक्रीय बना दिया है, मानो यह चुनाव उसके लिए करो या मरो वाला हो.

आरएसएस की इस नई रणनीति का बहुआयामी महत्व है. आरएसएस के लक्षित चुनाव प्रयासों में मदद करने के साथ साथ अगले वर्ष हाने जा रहे लोक सभा चुनावों में वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए उपलब्ध डाटा का प्रयोग हो सकता है.

आरएसएस के पदाधिकारी बताते हैं, “बी श्रेणी के मतदाताओं से नियमित अंतक्रिया करने से हमें यह समझने का मौका मिलेगा कि हम लोग कितने वोटरों पर भरोसा कर सकते हैं. चूंकि ‘ए’ वोटर पहले से ही हमारे पक्ष में है, हमारे स्वयंसेवकों को ठीकठाक अनुमान होगा कि उनको अपनी उर्जा किन विशिष्ठ व्यक्तियों पर केन्द्रित करनी है.”

सवाल : मध्य प्रदेश में क्या इस बार कमल फिर से खिलेगा या हाथ बाजी मार ले जाएगा। अपनी राय हमें कमेंट बौक्स में जाकर दें।     

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