‘औरतें तब गंजी होती हैं जब उन का पति मर जाता है. इस का तो पति जिंदा है, जरूर इस ने पाप किए होंगे, तभी भरी जवानी में गंजी हो गई है.’

‘अरे, एक तरफ हट जाओ, वह अपशकुनी आ रही है. सामने पड़ेगी तो न जानें क्या आफत आ जाए?’

‘एक किशोर दूसरे से, ‘वो देख रहे हो न, जो आंटी जा रही हैं, वो जल्दी ही मर जाएंगी. उन्होंने पाप किया है, इसलिए गंजी हो गई हैं.’

इन्हें फब्तियां तो नहीं कहना चाहिए मगर 40 वर्षीया केतकी जानी की जिंदगी में अचानक आए ये कमैंट फब्तियों से भी कहीं ज्यादा दिल को छलनी करने वाले थे. ये कमैंट ऐसी गालियां थीं, जिन्हें सुनते हुए वे हरपल मर रही थीं. सब से बड़ी बात तो यह भी कि 10 जनवरी, 1971 को अहमदाबाद के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मी केतकी जानी को फब्तियों की शक्ल में ये जो गालियां मिल रही थीं, उस के लिए वे कुसूरवार बिलकुल नहीं थीं.

केतकी ने एमए, बीएड तक की पढ़ाई की थी. उन की अपने ही जैसे पढ़ेलिखे नितेश जानी से साल 1993 में शादी हो गई थी. एक साल बाद ही एक परी सी प्यारी बेटी भी उन की गोद में आ गई थी. जब वे जिंदगी में कुछ और बेहतर पाने के लिए 1997 में अहमदाबाद से पुणे आईं तो इस के अगले ही साल वे एक प्यारे से बेटे की भी मां बन गईं. इस तरह उन की दुनिया खुशियों से लबालब हो गई थी.

उन्हें महाराष्ट्र राज्य पाठयक्रम ब्यूरो में गुजराती भाषा विभाग में स्पैशल औफिसर की शानदार नौकरी भी मिल चुकी थी.

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