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Love Story : क्या जादू कर दिया – दिनेश पर चंपा ने कैसा जादू कर दिया

Love Story : चंपा अपने गांव के बसअड्डे पर बस से उतर कर गलियां पार कर के अपने घर की ओर जा रही थी. वह रोजाना सुबह कालेज जाती थी, फिर दोपहर तक वापस आ जाती थी.

चंपा इस गांव के बाशिंदे भवानीराम की बेटी थी. वे चंपा को कालेज पढ़ाना नहीं चाहते थे, मगर चंपा की इच्छा थी और उस के टीचरों के दबाव देने पर वे उसे पढ़ाने के लिए शहर भेजने को राजी हो गए.

जैसे ही चंपा का कालेज में दाखिला हुआ, उस की सहेलियों ने खुशियां मनाईं. वे सब चंपा को पढ़ाकू समझती थीं और उसे चाहती भी खूब थीं.

जब चंपा गांव के हायर सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, तब पूरी जमात में उस का दबदबा था. अगर कोई लड़का ऊंची आवाज में बोल देता था, तब वह उसे ऐसी नसीहत देती थी कि वह चुप हो जाता था. इसी वजह से वह अपनी सहेलियों की चहेती बनी हुई थी.

गांव में भी चंपा की धाक थी. कोई भी बदमाश लड़का उस से कुछ नहीं कहता था. कहने वाले दबी जबान में कहते थे कि यह चंपा नहीं, बल्कि ‘चंपालाल’ है.

अभी चंपा गली का नुक्कड़ पार कर ही रही थी कि दिनेश, जो गांव का एक आवारा लड़का था और शहर के कालेज में पढ़ता था, न जाने कब से उस के पीछेपीछे आ रहा था.

दिनेश उस का रास्ता रोकते हुए बोला, ‘‘कहां जा रही हो चंपा?’’

‘‘अपने घर,’’ हंसते हुए चंपा बोली.

‘‘कभी हमारे घर भी चलो,’’ उस के जिस्म को घूरते हुए दिनेश बोला.

‘‘तुम्हारे घर क्यों भला?’’ चंपा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मेरा कहना मानोगी, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा,’’ दिनेश ने लालच देते हुए कहा.

चंपा जानती थी कि दिनेश गांव के रईस मांगीलाल का बिगड़ैल बेटा है. उसे पैसों का खूब घमंड है, इसलिए सारा दिन गांव में आवारागर्दी करता है. लड़कियों को छेड़ना उस की आदत है. उस की करतूत जगजाहिर है, मगर अपनी इज्जत के डर से कोई भी गांव का आदमी उस के मुंह नहीं लगता है.

चंपा को चुप देख कर दिनेश बोला, ‘‘क्या सोच रही हो चंपा? मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?’’

चंपा ने देखा कि जिस मोड़ पर वे दोनों खड़े थे, उस के आसपास जितने भी मर्दऔरत अपने घरों में बैठ कर बातें कर रहे थे, उन्होंने अपने दरवाजेखिड़कियां बंद कर ली थीं. दिनेश का डर उन के भीतर बैठा हुआ था. ऐसा लग रहा था कि कर्फ्यू लगा हुआ है.

दिनेश जब भी शहर से गांव में आता था और वहां की गलियों में घूमता था, तो उस के डर से सन्नाटा छा जाता था.

आज चंपा का उस से पहली बार सामना हुआ था, इसलिए उस ने भीतर ही भीतर उस से सामना करने के लिए अपने को तैयार कर लिया था.

‘‘चंपा, तू क्या सोचने लगी?’’ उसे चुप देख कर दिनेश ने फिर कहा, ‘‘तू ने जवाब नहीं दिया?’’

‘‘मैं ने जवाब दे तो दिया, शायद तुम ने सुना नहीं. बहरे हो क्या?’’

‘‘क्या कहा, मैं बहरा हूं? शायद तू मुझे जानती नहीं है?’’

‘‘अरे, तुझे तो सारा गांव जानता है,’’ चंपा ने कहा.

‘‘तब फिर क्यों तू दादागीरी कर रही है?’’

‘‘मैं एक लड़की हूं. मैं क्या दादागीरी करूंगी. गांव का दादा तो तू है,’’ चंपा उसी तरह से जवाब देते हुए बोली.

‘‘जैसा मैं ने सुना था, तू वैसी ही निकली. सुना है, कालेज में भी तू दादा बन कर रहती है?’’ दिनेश ने पूछा.

‘‘मैं ने पहले ही कहा, मैं क्या दादागीरी करूंगी. मगर अब लड़कियां इतनी कमजोर भी नहीं हैं कि हर कोई उन की कमजोरी का फायदा उठा सके,’’ कह कर चंपा ने अपने इरादे जाहिर कर दिए.

दिनेश कोई जवाब नहीं दे पाया. गली में पूरी तरह सन्नाटा था. मगर फिर भी लोग खिड़की खोल कर झांकने की कोशिश कर रहे थे. उन के भीतर एक डर बैठा हुआ था कि आज चंपा दिनेश के सामने आ गई है.

दिनेश बोला, ‘‘बहुत अकड़ कर बात कर रही है. मैं तेरी यह अकड़ निकाल दूंगा. चल, मेरे साथ. बहुत जवानी का जोश है तुझ में,’’ कह कर दिनेश ने चंपा का हाथ पकड़ लिया.

चंपा गुस्से में चीखते हुए बोली, ‘‘छोड़ दे मेरा हाथ. मैं वैसी लड़की नहीं हूं, जैसा तू समझ रहा है.’’

‘‘मैं एक बार जिस लड़की का हाथ पकड़ लेता हूं, फिर छोड़ता नहीं हूं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘ये फिल्मी डायलौग मत बोल. चुपचाप मेरा हाथ छोड़ दे.’’

‘‘यह तू नहीं, तेरी जवानी बोल रही है. चल मेरे साथ, जवानी का सारा जोश ठंडा कर देता हूं,’’ कह कर दिनेश उस को घसीट कर ले जाने लगा.

तब चंपा चिल्ला कर बोली, ‘‘मर्द है तो मर्द की तरह बात कर. यों कमरे में बंद कर के क्यों अपनी मर्दानगी दिखा रहा है. अगर तुझे अपनी मर्दानगी दिखानी है, तो यहीं दिखा. उतारूं कपड़े?’’ कहते हुए उस ने अपनी टीशर्ट उतार दी.

दिनेश थोड़ा ढीला पड़ गया. तब चंपा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘क्या सोच रहा है, और उतारूं कपड़े? बुझा ले अपनी प्यास,’’ कहते हुए उस ने टीशर्ट घुमा कर दिनेश को दे मारी.

‘‘मगर एक बात याद रख, गांव की किसी लड़की पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए. लड़की कमजोर नहीं है. छोड़ दे बुरी नजर. फिर हर औरत को कमजोर भी मत समझ. इसलिए कहती हूं कि पैसों का घमंड छोड़ दे. यह एक दिन तुझे ले डूबेगा,’’ चंपा ने समझाते हुए कहा.

सारा महल्ला देखता रह गया. लोग बाहर निकल आए. लड़की के हाथों पिटे दिनेश का मुंह छोटा हो गया.

इतना कह कर चंपा वहां से चली गई.

दिनेश गुस्से से भरा वहीं खड़ा रह गया. आज एक लड़की से हार गया, जो उसे चुनौती दे गई. चुनौती भी ऐसी, जिसे वह पूरा नहीं कर सके. आज तक गांव वालों में से किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि कोई उस के खिलाफ बोले, उसे चुनौती दे, मगर आज चंपा ने इस कदर उस को चुनौती दे डाली. वह उस का विरोध नहीं कर सका.

दिनेश ने जब गली की तरफ देखा, तो सभी मर्दऔरत दरवाजा खोल कर उसे हैरत भरी नजरों से देख रहे थे. वह उन से नजरें नहीं मिला सका और चुपचाप अपनी हवेली की तरफ चल दिया.

सारे गली वाले मानो एक ही सवाल अपनेआप से पूछ रहे थे कि चंपा ने दिनेश पर ऐसा क्या जादू किया, जो नीची गरदन कर के चला गया? सभी एकदूसरे से आंखों ही आंखों में इशारा कर रहे थे, मगर कुछ समझ नहीं पा रहे थे. सभी के दिमाग में एक ही बात बैठ चुकी थी कि चंपा की अब खैर नहीं. उस ने दिनेश से पंगा ले कर अपने ऊपर मुसीबत मोल ले ली है. वह गांव का बहुत बड़ा गुंडा है. पैसों के बल पर वह कुछ भी कर सकता है.

इस घटना से गांव में दहशत फैल गई. सभी गांव वाले खामोश हो गए.

अगले दिन चंपा कालेज पहुंची, तो हीरो बन गई थी. दिनेश की हिम्मत अब टूट चुकी थी.

चंपा कालेज नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए उस ने भी हालात से समझौता कर लिया.

इस घटना के कुछ दिनों बाद दिनेश में बहुत बड़ा बदलाव दिखा. पहले वह हमेशा गुंडा बन कर रहा करता था, अपने को सब से बड़ा समझता था.

आमतौर पर अब वह चंपा के साथ कैंटीन में चाय पीता दिखता. वह अपने दोस्तों से कहता, ‘‘यह रही टीशर्ट…मार चंपा.’’

यह सुन कर चंपा शर्म से लाल हो जाती.

दिनेश शरीफ हो चुका था. गांव की किसी लड़की या किसी बहू को अब वह बुरी नजर से नहीं देखता था. उस पर चंपा ने उस दिन ऐसा क्या जादू कर दिया, यह आज तक राज बना हुआ था.

Hindi Story : असली सुहागरात

Hindi Story :जीवन प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत, मनोरम पहाड़ी रास्ता नहीं है क्या, जहां मानव सुख से अपनों के साथ प्रकृति के दिए उपहारों का आनंद उठाते हुए आगे बढ़ता रहता है.

फिर अचानक किसी घुमावदार मोड़ पर अतीत को जाती कोई संकरी पगडंडी उस की खुशियों को हरने के लिए प्रकट हो जाती है. चिंतित कर, दुविधा में डाल उस की हृदय गति बढ़ाती. उसे बीते हुए कुछ कड़वे अनुभवों को याद करने के लिए मजबूर करती.

श्रेष्ठा भी आज अचानक ऐसी ही एक पगडंडी पर आ खड़ी हुई थी, जहां कोई जबरदस्ती उसे बीते लमहों के अंधेरे में खींचने का प्रयास कर रहा था. जानबूझ कर उस के वर्तमान को उजाड़ने के उद्देश्य से.

श्रेष्ठा एक खूबसूरत नवविवाहिता, जिस ने संयम से विवाह के समय अपने अतीत के दुखदायी पन्ने स्वयं अपने हाथों से जला दिए थे. 6 माह पहले दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे और पूरी निष्ठा से एकदूसरे को समझते हुए, एकदूसरे को सम्मान देते हुए गृहस्थी की गाड़ी उस खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर दौड़ा रहे थे. श्रेष्ठा पूरी ईमानदारी से अपने अतीत से बाहर निकल संयम व उस के मातापिता को अपनाने लगी थी.

जीवन की राह सुखद थी, जिस पर वे दोनों हंसतेमुसकराते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक रविवार की एक शाम आदेश को अपनी ससुराल आया देख उस के हृदय को संदेह के बिच्छु डसने लगे.

श्रेष्ठा के बचपन के मित्र के रूप में अपना परिचय देने के कारण आदेश को घर में प्रवेश व सम्मान तुरंत ही मिल गया, सासससुर ने उसे बड़े ही आदर से बैठक में बैठाया व श्रेष्ठा को चायनाश्ता लाने को कहा.

श्रेष्ठा तुरंत रसोई की ओर चल पड़ी पर उस की आंखों में एक अजीब सा भय तैरने लगा. यों तो श्रेष्ठा और आदेश की दोस्ती काफी पुरानी थी पर अब श्रेष्ठा उस से नफरत करती थी. उस के वश में होता तो वह उसे अपनी ससुराल में प्रवेश ही न करने देती. परंतु वह अपने पति व ससुराल वालों के सामने कोई तमाशा नहीं चाहती थी, इसीलिए चुपचाप चाय बनाने भीतर चली गई. चाय बनाते हुए अतीत के स्मृति चिह्न चलचित्र की भांति मस्तिष्क में पुन: जीवित होने लगे…

वषों पुरानी जानपहचान थी उन की जो न जाने कब आदेश की ओर से एकतरफा प्रेम में बदल गई. दोनों साथ पढ़ते थे, सहपाठी की तरह बातें भी होती थीं और मजाक भी. पर समय के साथ श्रेष्ठा के लिए आदेश के मन में प्यार के अंकुर फूट पड़े, जिस की भनक उस ने श्रेष्ठा को कभी नहीं होने दी.

यों तो लड़कियों को लड़कों मित्रों के व्यवहार व भावनाओं में आए परिवर्तन का आभास तुरंत हो जाता है, परंतु श्रेष्ठा कभी आदेश के मन की थाह न पा सकी या शायद उस ने कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि वह तो किसी और का ही हाथ थामने के सपने देख, उसे अपना जीवनसाथी बनाने का वचन दे चुकी थी.

हरजीत और वह 4 सालों से एकदूजे संग प्रेम की डोर से बंधे थे. दोनों एकदूसरे के प्रति पूर्णतया समर्पित थे और विवाह करने के निश्चय पर अडिग. अलगअलग धर्मों के होने के कारण उन के परिवार इस विवाह के विरुद्घ थे, पर उन्हें राजी करने के लिए दोनों के प्रयास महीनों से जारी थे. बच्चों की जिद और सुखद भविष्य के नाम पर बड़े झुकने तो लगे थे, पर मन की कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी.

किसी तरह दोनों घरों में उठा तूफान शांत होने ही लगा था कि कुदरत ने श्रेष्ठा के मुंह पर करारा तमाचा मार उस के सपनों को छिन्नभिन्न कर डाला.

हरजीत की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. श्रेष्ठा के उजियारे जीवन को दुख के बादलों ने पूरी तरह ढक लिया. लगा कि श्रेष्ठा की जीवननैया भी डूब गई काल के भंवर में. सब तहसनहस हो गया था. उन के भविष्य का घर बसने से पहले ही कुदरत ने उस की नींव उखाड़ दी थी.

इस हादसे से श्रेष्ठा बूरी तरह टूट गई  पर सच कहा गया है समय से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं. हर बीतते दिन और मातापिता के सहयोग, समझ व प्रेमपूर्ण अथक प्रयासों से श्रेष्ठा अपनी दिनचर्या में लौटने लगी.

यह कहना तो उचित न होगा कि उस के जख्म भर गए पर हां, उस ने कुदरत के इस दुखदाई निर्णय पर यह प्रश्न पूछना अवश्य छोड़ दिया था कि उस ने ऐसा अन्याय क्यों किया?

सालभर बाद श्रेष्ठा के लिए संयम का रिश्ता आया तो उस ने मातापिता की इच्छापूर्ति के लिए तथा उन्हें चिंतामुक्त करने के उद्देश्य से बिना किसी उत्साह या भाव के, विवाह के लिए हां कह दी. वैसे भी समय की धारा को रोकना जब वश में न हो तो उस के साथ बहने में ही समझदारी होती है. अत: श्रेष्ठा ने भी बहना ही उचित समझा, उस प्रवाह को रोकने और मोड़ने के प्रयास किए बिना.

विवाह को केवल 5 दिन बचे थे कि अचानक एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई. आदेश जो श्रेष्ठा के लिए कोई माने नहीं रखता था, जिस का श्रेष्ठा के लिए कोई वजूद नहीं था एक शाम घर आया और उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. श्रेष्ठा व उस के पिता ने जब उसे इनकार कर स्थिति समझाने का प्रयत्न किया तो उस का हिंसक रूप देख दंग रह गए.

एकतरफा प्यार में वह सोचने समझने की शक्ति तथा आदरभाव गंवा चुका था. उस ने काफी हंगामा किया. उस की श्रेष्ठा के भावी पति व ससुराल वालों को भड़का कर उस का जीवन बरबाद करने की धमकी सुन श्रेष्ठा के पिता ने पुलिस व रिश्तेदारों की सहायता से किसी तरह मामला संभाला.

काफी देर बाद वातावरण में बढ़ी गरमी शांत हुई थी. विवाह संपन्न होने तक सब के मन में संदेह के नाग अनहोनी की आशंका में डसते रहे थे. परंतु सभी कार्य शांतिपूर्वक पूर्ण हो गए.

बैठक से तेज आवाजें आने के कारण श्रेष्ठा की अतीत यात्रा भंग हुई और वह बाहर की तरफ दौड़ी. बैठक का माहौल गरम था. सासससुर व संयम तीनों के चेहरों पर विस्मय व क्रोध साफ झलक रहा था. श्रेष्ठा चुपचाप दरवाजे पर खड़ी उन की बातें सुनने लगी.

‘‘आंटीजी, मेरा यकीन कीजिए मैं ने जो भी कहा उस में रत्तीभर भी झूठ नहीं है,’’ आदेश तेज व गंभीर आवाज में बोल रहा था. बाकी सब गुस्से से उसे सुन रहे थे.

‘‘मेरे और श्रेष्ठा के संबंध कई वर्ष पुराने हैं. एक समय था जब हम ने साथसाथ जीनेमरने के वादे किए थे. पर जैसे ही मुझे इस के गिरे चरित्र का ज्ञान हुआ मैं ने खुद को इस से दूर कर लिया.’’

आदेश बेखौफ श्रेष्ठा के चरित्र पर कीचड़ फेंक रहा था. उस के शब्द श्रेष्ठा के कानों में पिघलता शीशी उड़ेल रहे थे.

आदेश ने हरजीत के साथ रहे श्रेष्ठा के पवित्र रिश्ते को भी एक नया ही

रूप दे दिया जब उस ने उन के घर से भागने व अनैतिक संबंध रखने की झूठी बात की. साथ ही साथ अन्य पुरुषों से भी संबंध रखने का अपमानजनक लांछन लगाया. वह खुद को सच्चा साबित करने के लिए न जाने उन्हें क्याक्या बता रहा था.

आदेश एक ज्वालामुखी की भांति झूठ का लावा उगल रहा था, जो श्रेष्ठा के वर्तमान को क्षणभर में भस्म करने के लिए पर्याप्त था, क्योंकि हमारे समाज में स्त्री का चरित्र तो एक कोमल पुष्प के समान है, जिसे यदि कोई अकारण ही चाहेअनचाहे मसल दे तो उस की सुंदरता, उस की पवित्रता जीवन भर के लिए समाप्त हो जाती है. फिर कोई भी उसे मस्तक से लगा केशों में सुशोभित नहीं करता है.

श्रेष्ठा की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. क्रोध, भय व चिंता के मिश्रित भावों में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हृदय की धड़कन तेज दौड़तेदौड़ते अचानक रुक जाएगी.

‘‘उफ, मैं क्या करूं?’’

उस पल श्रेष्ठा के क्रोध के भाव 7वें आसमान को कुछ यों छू रहे थे कि यदि कोई उस समय उसे तलवार ला कर दे देता तो वह अवश्य ही आदेश का सिर धड़ से अलग कर देती. परंतु उस की हत्या से अब क्या होगा? वह जिस उद्देश्य से यहां आया था वह तो शायद पूरा हो चुका था.

श्रेष्ठा के चरित्र को ले कर संदेह के बीज तो बोए जा चुके थे. अगले ही पल श्रेष्ठा को लगा कि काश, यह धरती फट जाए और वह इस में समा जाए. इतना बड़ा कलंक, अपमान वह कैसे सह पाएगी?

आदेश ने जो कुछ भी कहा वह कोरा झूठ था. पर वह यह सिद्घ कैसे करेगी? उस की और उस के मातापिता की समाज में प्रतिष्ठा का क्या होगा? संयम ने यदि उस से अग्निपरीक्षा मांगी तो?

कहीं इस पापी की बातों में आ कर उन का विश्वास डोल गया और उन्होंने उसे अपने जीवन से बाहर कर दिया तो वह किसकिस को अपनी पवित्रता की दुहाई देगी और वह भी कैसे? वैसे भी अभी शादी को समय ही कितना हुआ था.

अभी तो वह ससुराल में अपना कोई विशेष स्थान भी नहीं बना पाई थी. विश्वास की डोर इतनी मजबूत नहीं हुई थी अभी, जो इस तूफान के थपेड़े सह जाती. सफेद वस्त्र पर दाग लगाना आसान है, परंतु उस के निशान मिटाना कठिन. कोईर् स्त्री कैसे यह सिद्घ कर सकती है कि वह पवित्र है. उस के दामन में लगे दाग झूठे हैं.

जब श्रेष्ठा ने सब को अपनी ओर देखते हुए पाया तो उस की रूह कांप उठी. उसे लगा सब की क्रोधित आंखें अनेक प्रश्न पूछती हुई उसे जला रही हैं. अश्रुपूर्ण नयनों से उस ने संयम की ओर देखा. उस का चेहरा भी क्रोध से दहक रहा था. उसे आशंका हुई कि शायद आज की शाम उस की इस घर में आखिरी शाम होगी.

अब आदेश के साथ उसे भी धक्के दे घर से बाहर कर दिया जाएगा. वह चीखचीख कर कहना चाहती थी कि ये सब झूठ है. वह पवित्र है. उस के चरित्र में कोई खोट नहीं कि तभी उस के ससुरजी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.

स्थिति अधिक गंभीर थी. सबकुछ समझ और कल्पना से परे. श्रेष्ठा घबरा गई कि अब क्या होगा? क्या आज एक बार फिर उस के सुखों का अंत हो जाएगा? परंतु उस के बाद जो हुआ वह तो वास्तव में ही कल्पना से परे था. श्रेष्ठा ने ऐसा दृश्य न कभी देखा था और न ही सुना.

श्रेष्ठा के ससुरजी गुस्से से तिलमिलाते हुए खड़े हुए और बेकाबू हो उन्होंने आदेश को कस कर गले से पकड़ लिया, बोले, ‘‘खबरदार जो तुमने मेरी बेटी के चरित्र पर लांछन लगाने की कोशिश भी की तो… तुम जैसे मानसिक रोगी से हमें अपनी बेटी का चरित्र प्रमाणपत्र नहीं चाहिए. निकल जाओ यहां से… अगर दोबारा हमारे घर या महल्ले की तरफ मुंह भी किया तो आगे की जिंदगी हवालात में काटोगे.’’

फिर संयम और ससुर ने आदेश को धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया. ससुरजी ने श्रेष्ठा के सिर पर हाथ रख कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेटी. तुम सुरक्षित हो. हमें तुम पर विश्वास है. अगर यह पागल आदमी तुम्हें मिलने या फोन कर परेशान करने की कोशिश करे तो बिना संकोच तुरंत हमें बता देना.’’

सासूमां प्यार से श्रेष्ठा को गले लगा चुप करवाने लगीं. सब गुस्से में थे पर किसी ने एक बार भी श्रेष्ठा से कोई सफाई नहीं मांगी.

घबराई और अचंभित श्रेष्ठा ने संयम की ओर देखा तो उस की आंखें जैसे कह रही थीं कि मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. मेरा विश्वास और प्रेम इतना कमजोर नहीं जो ऐसे किसी झटके से टूट जाए. तुम्हें केवल नाम के लिए ही अर्धांगिनी थोड़े माना है जिसे किसी अनजान के कहने से वनवास दे दूं.

तुम्हें कोई अग्निपरीक्षा देने की आवश्यकता नहीं. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं और रहूंगा. औरत को अग्निपरीक्षा देने की जरूरत नहीं. यह संबंध प्यार का है, इतिहास का नहीं.

श्रेष्ठा घंटों रोती रही और आज इन आंसुओं में अतीत की बचीखुची खुरचन भी बह गई. हरजीत की मृत्यु के समय खड़े हुए प्रश्न कि यह अन्याय क्यों हुआ, का उत्तर मिल गया था उसे.

पति सदासदा के लिए अपना होता है. उस पर भरोसा करा जा सकता है. पहले क्या हुआ पति उस की चिंता नहीं करते उस का जीवन सफल हो गया था.

पुराणों के देवताओं से कहीं ज्यादा श्रेष्ठकर संयम की संगिनी बन कर सासससुर के रूप में उच्च विचारों वाले मातापिता पा कर स्त्री का सम्मान करने वाले कुल की बहू बन कर नहीं, बेटी बन कर उस रात श्रेष्ठा तन से ही नहीं मन से भी संयम की बांहों में सोई. उसे लगा कि उस की असल सुहागरात तो आज है.

लेखिका : प्रिया रानी 

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दिल्ली का छतरपुर का इलाका. 23 दिसंबर की शाम. तापमान 7 डिग्री सैंटीग्रेड. 2 पंजाबी परिवारों के लड़केलड़की की शादी. फार्महाउस इस ढंग से सजा हुआ था कि पूछो मत. तरहतरह की रोशनियों से की हुई सजावट इतनी ज्यादा कि देखने वाले देखते रह जाएं. 10 से ज्यादा देशों के व्यंजनों के मेज लगे हुए थे. तरहतरह के पेय पदार्थों के साथसाथ खानेपीने की तगड़ी व्यवस्था थी. मैं पूरे फार्महाउस का चक्कर लगा कर स्वागतद्वार पर पहुंचा जहां बरात दूल्हे के रथ के साथ अभीअभी आई थी. समय था रात के 11 बजे. मुझे मालूम था कि लड़के वाले अभी कम से कम आधा घंटा और नाचगाना करेंगे और उस के बाद ही वरमाला की रस्म हो पाएगी.

मैं कौफी के 3 कप पी चुका था. मैं शोरशराबे से दूर एक कैनोपी (छतरी) की तरफ चल पड़ा जहां सर्दी से बचाव के लिए अंगीठी जल रही थी. वहां पर एक महिला बैठी थी, अकेली. अधेड़ उम्र की. बाल, गाल, होंठ, आंखों वगैरह की तारीफ तो नहीं कर सकता लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि देखते ही लगा कि जवानी में उस ने बहुत से युवकों को हार्टअटैक दिया होगा. अभी भी सुंदर और मनमोहक लग रही थी. पास पहुंच कर मैं ने कहा, ‘‘अगर आप को तकलीफ न हो तो आप के पास बैठ जाऊं?’’

‘‘तकलीफ मुझे नहीं, सोफे को हो सकती है. उस से इजाजत ले लीजिए. रही बात मेरे साथ बैठने की तो माफ कीजिए मैं उस की अनुमति नहीं दे सकती. हां, आप सामने बैठ सकते हैं ताकि बात करते हुए एकदूसरे को ढंग से देखा जा सके,’’ महिला ने कहा.

सच कहूं तो मुझे इस प्रकार के बेबाक उत्तर की कतई भी उम्मीद नहीं थी.

‘‘बहुतबहुत धन्यवाद. लगता है, अब बाकी की शाम, अगर इसे शाम कह सकते हैं तो आप से बातें करते आसानी से गुजर जाएगी,’’ मैं ने कहा, ‘‘लोग मुझे माथुर के नाम से बुलाते हैं और मैं इस शादी में अपने बेटे और बहू के साथ आया हूं. सच पूछो तो जबरदस्ती लाया गया हूं. बच्चे कहने लगे कि कुछ दिनों के लिए आए हो हमारे पास, साथ चलो, अकेले घर पर बैठ कर क्या करोगे.’’

‘‘मैं भी आप जैसी ही किश्ती में सवार हूं, अपनी इच्छा के खिलाफ लाई गई हूं,’’ उस ने हंस कर कहा और पूछा, ‘‘आप को माथुर या मिस्टर माथुर कह कर नहीं बुला सकती, अपना फौजी रैंक बताइए?’’

‘‘अरे वाह, आप को किस ने कहा कि मैं फौजी हूं?’’

‘‘इस में कहनेपूछने की क्या बात है. आप के चालढाल से पता चलता है कि आप फौज में रह चुके हैं. जब आप गिलास ले कर इधर आ रहे थे तभी मैं सम?ा गई थी. फिर जिस अदब और अंदाज से आप ने मुझ से बात की, शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रही. अरे जनाब, मेरी तो पूरी उम्र फौजियों को देखते और उन में रहते हुए गुजरी है. मेरे पापा और पति दोनों ही एअरफोर्स में थे,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

‘‘मान गया आप को…’’ मैं ने वाक्य को अधूरा ही छोड़ दिया जिसे वह तुरंत ही सम?ा गई और कहा, ‘‘मधु साहनी नाम है मेरा. अब अकेली हूं इसलिए अकेले मधु का ही इस्तेमाल करती हूं. आप भी मुझे मधु कह कर बुला सकते हैं पर आप ने अपना रैंक नहीं बताया.

‘‘अब रैंक कहां. पहले ब्रिगेडियर था. पूरा नाम है ब्रिगेडियर ब्रजमोहन माथुर, अति विशिष्ट सेवा मैडल, भूतपूर्व सैनिक,’’ मैं ने कहा और फिर मजाक के लहजे में कहा, ‘‘हर बार इतना बड़ा नाम कैसे लेंगी? आप मुझे माथुर या फिर बीएम कुछ भी कह सकती हैं, जो आप को कहने में ठीक लगे.’’

‘‘यह ‘आप’ कहां से आ गया. तुम कह सकते हो अगर कभी मधु न कहना हो तो. वैसे भी मैं आप से उम्र में छोटी ही लगती हूं.’’

‘‘चलो, ठीक है पर यह तो ठीक नहीं कि मैं तो तुम्हें तुम कहूं और तुम मुझे आप. छोटेबड़े की बात छोड़ो और बराबरी की बात करो?’’ मैं ने कहा तो उस ने हंस कर कहा, ‘‘बात तो तुम ठीक करते हो बीएम साहब.’’

‘‘यह तो वही बात हुई कि ‘आसमान से गिरे, खजूर में अटके’ तुम ने आप छोड़ दिया लेकिन साहब लगा दिया. सीधेसीधे बीएम कहो. अच्छा लगेगा.’’

‘‘मंजूर. चलो, यह बताओ रहते कहां हो, करते क्या हो? गोल्फ और ब्रज खेलने के अलावा भी कोई शौक है क्या?’’ मधु ने पूछा.

‘‘इस बार तुम्हारा अंदाजा बिलकुल गलत निकला मधु. मैं इन में से कोई भी शौक नहीं रखता,’’ मैं ने कहा और फिर उसे अपने काम के बारे में बताया कि मैं तो आजकल सामाजिक सेवा में लगा रहता हूं. कब सुबह होती है, कब शाम होती है, इस का पता ही नहीं चलता.

 

इस के बाद बातों का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि समय का पता ही नहीं चला. रात को 1 बजने वाला था जब मधु की बेटी आई और कहने लगी, ‘‘चलो मम्मी, अब घर चलते हैं,’’ मु?ा से परिचय कराने के बाद मधु ने कहा.

‘‘कुछ देर रुको. बीएम को अकेले छोड़ना ठीक नहीं लगता. इन के बच्चों को आ जाने दो, फिर चलते हैं. थोड़ी ही देर में मेरे बेटाबहू भी आ गए. जब हम उठने लगे तो  मधु ने हाथ बढ़ा कर कहा, ‘‘बीएम, सच में तुम से मिल कर बहुत खुशी हुई. अपना नंबर बताओ. तुम से बातचीत कर के अच्छा लगेगा.’’

2 दिनों बाद मधु का फोन आया. औपचारिक रूप से हालचाल पूछने के बाद उस ने कहा, ‘‘परसों वापस अपने शहर जा रही हूं. अगर समय हो और इच्छा हो तो कल मिल सकते हैं क्या?’’

‘‘पहली बात तो यह कि मैं यहां बच्चे पालने तो आया नहीं, सो समय ही समय है कोई कमी नहीं और दूसरी बात जो तुम ने इच्छा की कही है तो इतना ही कहूंगा कि ‘‘नेकी और पूछपूछ… कोई बेबकूफ ही तुम जैसी औरत से मिलने से इनकार करेगा,’’ मैं ने हंसते हुए कहा जिस पर मधु ने भी हंसते हुए कहा, ‘‘फोन पर पहली ही बातचीत में चापलूसी पर उतर आए या फिर इसे छेड़खानी समझू?’’

‘‘जो तुम्हारा दिल कहे, कह सकती हो लेकिन मेरी सच्ची बात को चापलूसी कह कर मेरी अक्लमंदी पर प्रश्नचिह्न तो मत लगाओ. खैर, बताओ कहां और कब मिलना है?’’ मैं ने पूछा.

अगले दिन जब हम मिले तो ऐसा लगा जैसे कि हम दोनों एकदूसरे को बरसों से जानते हों. 2 घंटे न जाने कब और कैसे, कौनकौन सी इधरउधर की बातें करने में निकल गए. जब वेटर बिल ले कर आया तो मधु कह रही थी, ‘‘बीएम, मैं चाहती हूं कि हमारी दोस्ती, बुढ़ापे की तो नहीं कहूंगी लेकिन इस उम्र की दोस्ती, कुछ अलग ढंग की हो. इस के लिए एक शर्त रखना चाहूंगी. मंजूर हो तो कहूं?’’

‘‘सुनने के बाद मंजूरी देना तो सुना था लेकिन बिना अपनी बात बताए मंजूरी की मांग तो मधु ही कर सकती है. चलो, तुम भी क्या याद करोगी कि किस रईस से पाला पड़ा था, चलो दे दी मंजूरी. कहो क्या कहना है, कौन सी शर्त है तुम्हारी?’’

‘‘हम व्हाट्सऐप पर बात नहीं करेंगे,’’ उस ने कहा तो मैं ने आश्चर्यभरी आवाज में पूछा, ‘‘यह कैसी शर्त है? मैं समझ नहीं?’’

‘‘देखो, व्हाट्सऐप पर हम अकसर अपनी बात नहीं कहते. दूसरों की बातों पर बातें करते हैं. उन्हीं की भेजी हुई तसवीरों, चुटकलों और न जाने कितनी अप्रासंगिक प्रतिक्रियाओं पर अपना समय बिताते हैं. ऐसा करने के लिए मेरे पास कई ग्रुप्स हैं. मैं उन में से निकलना चाहती हूं लेकिन दोस्तमित्र और रिश्तेदार ऐसा करने नहीं देते. मैं तुम्हारे साथ इस व्यर्थ की बातचीत में नहीं पड़ना चाहती. मंजूर है तो आगे कुछ कहूं?’’

‘‘हां बोलो, मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं और फिर तुम्हारी शर्त मैं पहले ही मंजूर कर चुका हूं और तुम तो अच्छी तरह से जानती हो कि कोई भी फौजी कभी भी अपनी बात से कभी नहीं मुकरता.’’

‘‘हम फोन पर बात किया करेंगे. व्हाट्सऐप का इस्तेमाल मैसेज भेज कर बातचीत का समय तय करने के लिए किया जा सकता और किसी बात के लिए नहीं.’’

‘‘ठीक है,’’ मैं ने कहा. फिर हम उठ कर रैस्टोरैंट से बाहर आ गए और हाथ मिला कर अपनेअपने घरों को चल पड़े. कुछ दिनों बाद मैं ने पहला मैसेज भेजा, यह जानने के लिए कि कब बात की जा सकती है?

‘कभी भी, शाम के 5 बजे के बाद,’ मधु का कुछ ही देर में उत्तर आ गया.

बात शुरू तो हुई एकदूसरे का हालचाल जानने से लेकिन कब मौसम की जानकारी के आदानप्रदान और विश्व की समस्याओं से होतेहोते एकदूसरे की दिनचर्या पर चली गई पता ही नहीं चला. हम दोनों ने एकदूसरे की जिंदगी के बारे में जाना और अपनेअपने जीवनसाथी को खोने के बारे में भी खुल कर बात की.

फोन पर पहली बात इतनी लंबी और मजेदार बात होगी इस का अनुमान न मुझे था और न ही मधु को. इस के बाद तो बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. लेकिन इस में थोड़ी सी कठनाई होती थी. बातचीत कब की जाए इस का फैसला करने में ही बहुत सा समय निकल जाता था क्योंकि जब मुझे समय होता था तब मधु किसी काम में लगी होती थी और जब वह फ्री होती थी तब मैं किसी काम में व्यस्त होता था.

चूंकि हम दोनों के खून में फौजी रंग समा चुका था इसलिए इस परेशानी का हल भी हम ने आसानी से निकाल लिया. यह निर्णय लिया गया कि सप्ताह में एक दिन एक निश्चित समय पर बात की जाए. यह निर्णय इतना बढि़या रहेगा मुझे इस का अंदाजा नहीं था. मैं एक बार फिर से जवानी के दिनों में पहुंच गया क्योंकि अब मुझे उस दिन और उस समय का 2-3 दिन पहले से ही इंतजार रहने लगा था. जब यह बात मैं ने मधु को बताई तो उस ने अपने अंदाज में हंस कर कहा, ‘‘सच कहूं, इंतजार तो मुझे भी रहता है.’’

इस का मतलब है कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई. इस पर वह कहने लगी, ‘‘ऐसी बात है तो नहीं लेकिन अगर तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हारी सोच को तो मैं रोक नहीं सकती पर इतना जरूर कहूंगी कि किसी शायर के शेर की टांग तो मत तोड़ो. जहीर देहलवी का सही शेर है, ‘चाहत का जब मजा है कि वो भी हों बेकरार, दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई.’

‘‘तो इस का मतलब है कि जनाब को भी शेरोशायरी का शौक है,’’ मैं ने कहा तो मधु तपाक से बोली, ‘‘तो तुम ने भी इस शौक को पाल रखा है, मुझे मालूम नहीं था. चलो अच्छा है, खूब जमेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो.’’

‘‘मिलने तक इंतजार करेंगे तो मर नहीं जाएंगे क्या? मुझे यकीन है मधु कि इस बात को तुम भी मानोगी कि कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जो कही नहीं जातीं या फिर कहने में उतनी असरदार नहीं होतीं जो लिख कर बताने में होती हैं. क्या हम कभीकभी ऐसी बातों को लिख कर एकदूसरे से शेयर नहीं कर सकते?’’ जब मैं ने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘हां, क्यों नहीं, लेकिन व्हाट्सऐप पर नहीं. तुम चाहो तो ईमेल का इस्तेमाल कर सकते हो.’’

‘‘अगर मैं कहूं कि ईमेल नहीं, स्नेलमेल कैसा रहेगा तो क्या कहोगी?’’ मेरे इस प्रश्न पर मधु ने पूछा, ‘‘स्नेलमेल से तुम्हारा मतलब डाक से पत्रव्यवहार का है क्या?’’ जब मैं ने ‘हां’ कहा तो वह खूब खुल कर हंसी और कहा, ‘‘अब इस उम्र में, फिर से…’’

‘‘क्यों तुम्हें प्रेमपत्रों की याद आ गई है क्या, लिखे थे कभी?’’ छेड़खानीभरे अंदाज में मैं ने प्रश्न किया.

‘‘कभी का क्या मतलब? हां, लिखे थे, बहुत सारे, ढेरों से, शादी से पहले भी और शादी के बाद भी. जब मेरे पति 5 महीने के लिए रूस गए थे तब तो हर दूसरे दिन एक पत्र लिखा जाता था. और जानते हो, हरेक पत्र को क्रम संख्या दी जाती थी क्योंकि एकदूसरे का पत्र मिलने में 10-15 दिन लग जाते थे. एक और मजेदार बात उन दिनों की. इन के वापस आने के 15 दिनों बाद तक इन के लिखे पत्र आते रहे जिन्हें हम दोनों साथ बैठ कर पढ़ते थे और खूब मजे लेते थे.’’

‘‘मैं पत्रों की बात कर रहा हूं, प्रेमपत्रों की नहीं. अच्छा बताओ, अगर पहल मैं करूं जवाब तो दोगी?’’ जब मैं ने पूछा तो मधु का स्पष्ट उत्तर था, ‘‘अब दोस्ती की है तो जरूर निभाऊंगी.’’

अब हमारी साप्ताहिक बातचीत बिना किसी झिझिक किसी भी विषय पर होती थी लेकिन इस में कभी भी प्यार, इश्क जैसे शब्दों का हम दोनों में से किसी ने भी इस्तेमाल नहीं किया और न ही कभी वयस्क चुटकुलों को इस बातचीत में आने दिया. लेकिन हां बचपन की शरारतें और जवानी के किस्से जरूर बातों में शामिल हो गए थे. एक दिन जब मैं ने कहा, ‘‘मधु, तुम्हें पहली बार फार्महाउस में देख कर जो बात मेरे दिमाग में सब से पहले आई थी वह थी, ‘खंडहर देख कर लगता है कि इमारत कभी बुलंद थी.’ वह अपने जानेपहचाने अंदाज में ठहाका मार कर बोली, ‘‘लगता है, तुम्हारे दिल और दिमाग में कोई तालमेल नहीं है. अरे भाई, अगर दिमाग ने सोचा था तो दिल से आवाज क्यों नहीं निकली थी?’’

एक दिन बातोंबातों में यों ही अचानक मधु ने पूछा, ‘‘तुम्हारे उस पत्र का क्या बना?’’

जब मैं ने कहा कि कौन सा पत्र? तो उस ने प्रश्न करते हुए कहा, ‘‘भूल गए क्या?’’

‘‘जब मैं ने कहा कि हां, सच कह रहा हूं. मुझे कोई खबर नहीं कि तुम किस पत्र की बात कर रही हो? मुझे किसी भी पत्र के बारे में कुछ भी याद नहीं.’’

तब मधु ने याद दिलाते हुए कहा, ‘‘ईमेल, स्नेलमेल, कुछ याद आया क्या?’’

‘‘अरेअरे… क्या हो गया है मुझ को? समझ में नहीं आता कि कैसे इतनी प्यारी सी बात भूल गया. तुम्हारे सामने होता तो शायद कह भी देता कि खूबसूरत बुत को देखा तो याददाश्त खो बैठा, लेकिन अब क्या कहूं?’’

 

फिर थोड़ा सोच कर मैं ने कहा, ‘‘इस भूलने की खूबसूरत सजा मैं अपनेआप को दे रहा हूं. कल ही मेरा पहला पत्र तुम्हारे घर की ओर रवाना हो जाएगा.’’

‘‘यह की न कोई ढंग की बात इतने दिनों बाद,’’ जब मधु ने कहा तो मैं ने कहा, ‘‘जब कभी भी यह दिमाग चलता तो है, तो सिर्फ चलता ही नहीं दौड़ता है. एक और ढंग की बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘बीएम, तुम तो ऐसी भूमिका बांध रहो हो जैसे कि शादी का प्रस्ताव पेश करने जा रहे हो. कहो, क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘फरियाद कर रही हैं यह तरसी हुई निगाहें, देखे हुए किसी को जमाना गुजर गया,’’ जब मैं ने कहा तो मधु का उत्तर था, ‘‘शेर तो अच्छा है. कहना क्या चाहते हो? मेरे शहर में आने का विचार है क्या?’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं हैं. मैं तो एक छोटा सा सुझाव देने वाला हूं. हम फोन पर साधारण बात करने की जगह पर वीडियोकौल नहीं कर सकते क्या?’’ जब मैं ने पूछा तो मधु बोली, ‘‘बस, इतनी सी बात कहने के लिए घबराहट हो रही थी? मैं तो सोचती थी कि ब्रिगेडियर साहब ने अपने फौजी जीवन में बहुत सी कठिन परिस्थितियों को बिना किसी घबराहट के आसानी से निबटा लिया होगा,’’ और फिर हंस कर कहा, ‘‘परमिशन ग्रांटेड.’’

एक ही दिन में 2 अच्छी बातों का होना- पत्रों के आदानप्रदान का सिलसिला और फिर वीडियोकौल्स के माध्यम से बातचीत. पता नहीं क्यों मुझे लगा मानो पतझड़ में बहार आ गई हो. जब मैं ने यही बात मधु से कही तो उस ने कहा, ‘‘इतनी बहार भी नहीं आई क्योंकि जैसे हम सप्ताह में एक बार बात करते हैं वैसे ही महीने में एक बार ही वीडियो पर बात किया करेंगे. कोई शक, कोई सवाल?’’ मधु ने फौजी अंदाज में लेकिन मेरी टांग खींचते हुए पूछा.

उत्तर में मैं ने नहीं में सिर हिला दिया. क्षणभर के लिए मैं यह समझ बैठा था कि हम वीडियोकौल पर हैं और मधु मेरी ‘नहीं’ में दी गई स्वीकृति को समझ जाएगी.

Love Story : प्‍यार की कीमत

Love Story : ‘‘सुना है, तेरा बापू तेरा ब्याह रचाने की तैयारी में है…’’ केशव ने 16 साल की हरीरी से पूछा. ‘‘पता नहीं… पर एक दिन अम्मां और बापू कुछ बात कर रहे थे और जब मैं पहुंची तो वे चुप हो गए,’’ हरीरी ने भोलेपन से जवाब दिया. ‘‘हां, पर तुझे कुछ पता भी है कि तेरा मरद कौन होने वाला है,’’ केशव ने कहा. ‘‘कोई भी हो, क्या फर्क पड़ता है… अब तुम तो ऊंची जाति वाले हो, इसलिए तुम से ब्याह कर पाना तो मेरे करम में नहीं है,’’ मन भर आया था हरीरी का. उस के इस सवाल के बदले में कोई भी जवाब नहीं था केशव के पास, बस उस ने आगे बढ़ कर हरीरी के गाल को चूम लिया था. केशव की बांहों में अपनेआप सीमटती चली गई हरीरी.

‘‘तेरा बापू… असल में तेरा सौदा कर रहा है. वह तुझे मोहनलाल, जो गांव के बाहर देशी शराब का ठेका चलाता है और अंडे बेचता है, को तुझे बेच रहा है पूरे 10,000 रुपए में,’’ केशव ने बताया. ‘‘पर केशव, मैं तो इस में कुछ नहीं कर सकती. अभी बापू के घर में हूं तो जहां वे काम के लिए भेजते हैं, वहां चली जाती हूं, कल को जहां ब्याह दी जाऊंगी… वहीं चली जाऊंगी, ’’ हरीरी बोली. ‘‘पर यह ब्याह नहीं है. वे तो तुझे उस 40 साल के बूढ़े के हाथों पैसा ले कर बेच रहे हैं,’’ केशव गुस्से में था. ‘‘ठीक तो है… जब मेरा ब्याह मोहनलाल के साथ हो जाएगा, तब मेरे ठेके पर आना… मुफ्त में दारू पिलाएंगे तुझे,’’ कहते हुए ठहाका लगाया था हरीरी ने. केशव ओर हरीरी एक ही गांव में रहते और एकदूसरे से प्यार भी करते थे. यह अलग बात है कि एक ऊंची जाति के लड़के को एससी लड़की से प्यार करने में क्याक्या परेशानियां आ सकती हैं,

इस से वे दोनों अनजान नहीं थे, और बिना अपने प्यार का नतीजा जाने वे एकदूसरे से छिप कर मिलते रहे थे. फिर एक दिन हरीरी के बाप ने उस का और मोहनलाल का ब्याह करा दिया. या यों कह लीजिए कि हरीरी को एक आदमी के हाथों बेच दिया. मोहनलाल की पहली बीवी मर चुकी थी, इसलिए उसे अपने दारू के धंधे में हाथ बंटाने के लिए एक औरत चाहिए थी. हरीरी के बाप को पैसा चाहिए था, इसलिए दोनों ने मिल कर एकदूसरे की समस्या का हल कर दिया था.

अपनी शादी के दिन, गांव के एक हिस्से से गांव के ही दूसरे घर में पहुंच गई थी हरीरी. न बैंडबाजा, न बरात, बस मोहनलाल को चायपानी जरूर करा दिया गया था और मोहनलाल ने पूरे 10,000 रुपए गिन कर दे दिए थे हरीरी के बापू को. रात हुई तो हरीरी ने खाना बनाया और दोनों ने साथ में मिल कर खाया. बिस्तर पर लेटते ही मोहनलाल हरीरी को चूमने लगा था और फिर पीठ घुमा कर खर्राटे भरने लगा, क्योंकि उस के शरीर को औरत की जरूरत सिर्फ अपने धंधे के लिए थी, किसी औरत को संतुष्ट कर पाने की ताकत नहीं थी उस में. अगली सुबह से ही दुलहन बनी हरीरी ने घर का सारा काम संभाल लिया और मोहनलाल के धंधे में उस का हाथ भी बंटाने लगी.

एक कम उम्र की लड़की दारू के ठेके पर बैठ कर अंडा, नमकीन बेचेगी तो दारू की बिक्री में इजाफा होना तो तय ही था. लोग दारू पीते, अंडानमकीन खाते, हरीरी को देखदेख कर आहें भरते और भद्दे मजाक करते हुए चले जाते, पर मोहनलाल को इस सब से कोई दिक्कत नहीं थी. एक शाम ठेके पर केशव आया. उसी समय मोहनलाल कहीं बाहर गया हुआ था. केशव द्वारा दारू मांगने पर हरीरी बोली, ‘‘तुम कब से दारू पीने लगे?’’ ‘‘जब से तुम जिंदगी से दूर चली गई हो,’’ केशव ने कहा. हरीरी के बुलाने पर केशव अंदर बैठ कर दारू पीने लगा. तभी बाहर तेज बारिश शुरू हो गई थी. अंदर 2 जवां प्रेमी के दिल तेजी से धड़क रहे थे. केशव ने हरीरी का हाथ पकड़ लिया और हरीरी ने भी बिना कोई विरोध किए केशव को सौंप दिया. दोनों के मन तो पहले से एक थे, आज तन भी एक हो गए. मोहनलाल का धंधा दोगुना फायदा दे रहा था. अब तो वह देर शाम को घर आता तो पैसों की एक थैली उस के हाथ में होती, जिन को कई बार वह गिन कर ही अलमारी में रखता था.

केशव के मन में हरीरी के लिए प्यार की आग और भी भड़क उठी थी. उसे लगने लगा था कि अब वह हरीरी के बिना नहीं रह सकेगा. उधर हरीरी भी ठेके पर लोगों के गलत बरताव से दुखी हो चुकी थी. हरीरी ने कई बार मोहनलाल से शिकायत भी की थी, मैं काम से नहीं मना करती, पर यहां लोग दारू पीने के बाद मुझ से छेड़छाड़ करते हैं, जो मुझे अच्छा नहीं लगता. इस पर मोहनलाल ने उसे जवाब दिया, ‘‘इसी के लिए तुझे ब्याह कर लाया हूं कि मेरे काम में एक औरत के होने से और रौनक आए और निचली जाति में पैदा होने के बाद इतने नखरे मत झाड़ा कर.

कभीकभार कोई कुछ बोल भी दे, तो मुंह बनाने के बजाय मुसकरा दिया कर.’’ हरीरी ने चुपचाप मोहनलाल की बात सुन ली और अपने काम में लग गई. दोनों की शादी के 6 महीने बीत गए थे. एक सुबह जैसे ही मोहनलाल सो कर उठा, तो हरीरी ने तबीयत खराब होने की बात बताई. पहले तो मोहनलाल ने ऐसे ही टालने की कोशिश की, पर जब हरीरी को उलटियां होने लगीं, तो वह उसे गांव के अस्पताल में ले गया. अस्पताल में जब डाक्टर ने उसे बताया कि हरीरी मां बनने वाली है, तो यह बात सुन कर वह सन्न रह गया. ‘‘यह बच्चा किस का है?’’ घर आते समय मोहनलाल ने पूछा. पहले तो हरीरी खामोश रही,

पर जब उसे लगा कि मोहनलाल से सच छिपाने से क्या फायदा, इसलिए उस ने केशव और अपने संबंध के बारे में सबकुछ सचसच बता दिया. रात में खूब दारू पीने के बाद मोहनलाल ने हरीरी को बहुत पीटा और जीभर कर गालियां दीं. उस की गालियां और मार खा कर हरीरी के मन में जीने की कोई इच्छा न रही. वह घर से भाग गई और शायद खुदकुशी कर ही ली थी, अगर उसे केशव ने सही समय पर नहीं बचाया होता. सारा हाल जानने के बाद केशव ने फैसला लिया कि अब वह हरीरी को अकेला नहीं छोड़ेगा. दोनों शहर में जा कर रहेंगे.

अब चाहे अंजाम कुछ भी हो, पर वह हरीरी को नहीं छोड़ेगा. केशव अपने घर से पैसे और दूसरा जरूरी सामान लाने हरीरी का हाथ पकड़ कर चल दिया. उधर जब हरीरी घर में नहीं मिली, तो मोहनलाल समझ गया कि चिडि़या फुर्र हो गई है. वह सीधा केशव के पिता के पास पहुंचा और सारी बात बताते हुए कहा कि भोलेभाले केशव को उस की पत्नी हरीरी ने डोरे डाल कर फंसा लिया है और अब वह पैसे के लालच में केशव के साथ कहीं भाग सकती है. केशव के पिताजी की आंखें गुस्से से लाल हो गई थीं.

वे क्षत्रिय थे, भला किसी निचली जाति वाली लड़की उन के लड़के पर कैसे डोरे डाल सकती है? क्या केशव की मति मारी गई है, जो उस लड़की के साथ रिश्ता बना रहा है…?

अरे, पैर की जूती पैर में ही भली लगती है. ऐसा सोच कर उन्होंने अपने आदमियों को तुरंत केशव को ढूंढ़ कर लाने को कहा. तभी सामने से केशव आता दिखाई दिया. केशव ने बड़ी हिम्मत से हरीरी का हाथ पकड़ा हुआ था.

मोहनलाल अपनी बीवी को गैरमर्द के साथ देख कर चीख पड़ा था, ‘‘देखिए ठाकुर साहब… यह रही डायन, आप के लड़के को फांसे हुए है.’’ मोहनलाल के शब्द सुन कर केशव के पिता की आंखें गुस्से से दहक उठीं. उन्होंने अपने आदमियों को इशारा किया, जिन्होंने केशव को तुरंत पकड़ कर अंदर कमरे में बंद कर दिया.

केशव ने छूटने की बहुत कोशिश की, पर उन मुस्टंडों की ताकत के आगे वह अकेला था और छूट नहीं पाता. तब तक केशव के घर के आगे गांव के काफी लोग भी जमा हो गए थे.

केशव के पिताजी ऊंची आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, आज एक और शरीर को हमें डायन के आतंक से मुक्ति दिलानी होगी. यह डायन हमारे लड़के को भी खाने वाली थी और धीरेधीरे सारे गांव को ही अपना निवाला बना लेती, इसलिए इसे इतना मारो कि इस की आत्मा अभी इस शरीर को त्याग कर परलोक सिधार जाए.’’

ऐसे मौकों पर गांव वालों के पास न तो पत्थरों की कमी होती है और न ही ताकत की. गांव वालों ने इस से पहले भी कई बार कई औरतों को डायन के आतंक से मुक्ति दिलाई थी. गांव वालों ने बिना कुछ सोचेसमझे पत्थर उठा कर मारने शुरू किए और कुछ ही देर में हरीरी की आत्मा उस के शरीर को त्याग चुकी थी और उस की लाश गांव वालों के सामने पड़ी हुई थी. गांव वालों ने एक एससी लड़की को मोक्ष प्रदान कर दिया था.

Box Office : ‘सिकंदर’ के बाद ‘जाट’ भी पस्त, धड़ाधड़ गिरे पीवीआर आयनौक्स के शेयर के दाम

Box Office : अप्रैल माह में बड़े बजट की फिल्में तो रिलीज हुईं मगर बौक्स औफिस पर वे चल नहीं पाईं. निर्माता और निर्देशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है.

अप्रैल माह के पहले सप्ताह ने नहीं जगाई कोई उम्मीद. 2025 की पहली तिमाही इतनी सूखी रही कि निर्माता, निर्देशक, कलाकारों व सिनेमाघर मालिकों के साथ ही आम जनता की जेब से करोड़ों रूपए चले गए. देश में दो सब से बड़े मल्टीप्लैक्स चैन हैं- पीवीआर और आयनौक्स. अब यह दोनों एक हो गए हैं.

जनवरी 2025 के पहले सप्ताह में पीवीआर आयनौक्स के शेयर के दाम प्रति शेयर लगभग 1600 रूपए थे, जो कि 30 मार्च को घट कर प्रति शेयर लगभग 958 रुपए हो गए थे. यानी कि इस के शेयर धारक को प्रति शेयर सिर्फ तीन माह के अंदर 642 रूपए का नुकसान हो गया था.

सभी को उम्मीद थी कि तिमाही के अंतिम दिन रिलीज हो रही सलमान खान की फिल्म ‘सिकंदर’ कुछ कमाल करेगी. इसे पूरे दो सप्ताह में 12 दिन (30 मार्च से दस अप्रैल) का समय मिल रहा था. लेकिन ‘सिकंदर’ इस कदर बौक्स औफिस पर डूबी कि 4 अप्रैल को पीवीआर आयनौक्स के शेयर के दाम प्रति शेयर लगभग 58 रूपए घटकर 900 रुपए पर पहुंच गए थे.

अप्रैल के पहले सप्ताह में कोई नई फिल्म रिलीज नहीं हुई, मगर मोहनलाल की विवादित डब मलयालम फिल्म ‘‘लूसी 2 इम्पूरन’ ने थोड़ा सहारा दिया. उस के बाद अप्रैल के दूसरे सप्ताह से एक दिन पहले 10 अप्रैल को सनी देओल की फिल्म ‘जाट’’ रिलीज हुई. ‘सिकंदर’ के मुकाबले पांच प्रतिशत ठीक होने के बावजूद अति विभत्स हिंसा व खून खराबा के चलते पहले ही दिन इस फिल्म को दर्शक नहीं मिले. परिणामतः पीवीआर मल्टीप्लैक्स के शेयर के दाम ज्यादा नहीं बढ़े. फिर भी 4 अप्रैल को 900 रुपए के मुकाबले 11 अप्रैल को 16 रुपए बढ़ कर 916 रूपए हो गया.

शेयर बाजार से जुड़े लोगों की राय में यह दाम इसलिए बढ़े कि लोग अभी भी उम्मीद लगाए हुए हैं कि शनिवार, रविवार वो सोमवार को छुट्टी के दिन ‘जाट’ कुछ कमाई कर लेगी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो मंगलवार, 15 अप्रैल को पीवीआर आयनोक्स की हालत काफी खराब हो जाएगी.

अब बात अप्रैल माह के पहले सप्ताह के बाक्स आफिस रिपोर्ट की की जाए, तो अप्रैल के पहले सप्ताह 4 अप्रैल को कोई नई फिल्म रिलीज नहीं हुई. जिस के चलते मार्च के चौथे और अप्रैल के पहले सप्ताह को मिला कर सलमान खान की फिल्म महज 102 करोड़ रूपए ही कमा सकी.

सिकंदर की इतनी बुरी दुर्गति हुई यह फिल्म असफल फिल्मों ‘जीरो’ और ‘लाल सिंह चड्ढा’ की भी बराबरी नहीं कर पाई.

दो सप्ताह के अंदर मोहनलाल की मलयालम फिल्म ‘लूसी 2 इम्पूरन’ ने हिंदी और मलयालम मिला कर केवल भारत में 102 करोड़ रूपए तथा पूरे विश्व में 262 करोड़ रूपए कमाए.

अप्रैल माह के पहले सप्ताह की समाप्ति से एक दिन पहले 10 अप्रैल को सनी देओल व रणवीर हुडा अभिनीत फिल्म ‘‘जाट’’ रिलीज हुई. निर्माताओं के अनुसार इस फिल्म ने पहले दिन महज साढ़े 9 करोड़ रूपए ही बाक्स आफिस पर एकत्र कर सकी. 100 करोड़ रूपए में बनी फिल्म ‘जाट’ पहले दिन के कलेक्यान के आधार पर लाइफ टाइम बिजनेस 70 करोड़ ही कर पाएगी. यानी कि फिल्म की लागत वसूल नहीं कर पाएगी.

यदि शनिवार, रविवार और सोमवार की छुट्टी के दिनों में कोई चमत्कार हो जाए तो स्थिति बदल सकती है.

Online Hindi Story : आईना – किस राह पर चलने लगी थी सुंदर की बेटी

Online Hindi Story : मस्ती में कंधे पर कालिज बैग लटकाए सुरुचि कान में मोबाइल का ईयरफोन लगा कर एफएम पर गाने सुनती हुई मेट्रो से उतरी. स्वचालित सीढि़यों से नीचे आ कर उस ने इधरउधर देखा पर सुकेश कहीं नजर नहीं आया. अपने बालों में हाथ फेरती सुरुचि मन ही मन सोचने लगी कि सुकेश कभी भी टाइम पर नहीं पहुंचता है. हमेशा इंतजार करवाता है. आज फिर लेट.

गुस्से से भरी सुरुचि ने फोन मिला कर अपना सारा गुस्सा सुकेश पर उतार दिया. बेचारा सुकेश जवाब भी नहीं दे सका. बस, इतना कह पाया, ‘‘टै्रफिक में फंस गया हूं.’’

सुरुचि फोन पर ही सुकेश को एक छोटा बालक समझ कर डांटती रही और बेचारा सुकेश चुपचाप डांट सुनता रहा. उस की हिम्मत नहीं हुई कि फोन काट दे. 3-4 मिनट बाद उस की कार ने सुरुचि के पास आ कर हलका सा हार्न बजाया. गरदन झटक कर सुरुचि ने कार का दरवाजा खोला और उस में बैठ गई, लेकिन उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

‘‘जल्दी नहीं आ सकते थे. जानते हो, अकेली खूबसूरत जवान लड़की सड़क के किनारे किसी का इंतजार कर रही हो तो आतेजाते लोग कैसे घूर कर देखते हैं. कितना अजीब लगता है, लेकिन तुम्हें क्या, लड़के हो, रास्ते में कहीं अटक गए होगे किसी खूबसूरत कन्या को देखने के लिए.’’

‘‘अरे बाबा, शांत हो कर मेरी बात सुनो. दिल्ली शहर के टै्रफिक का हाल तो तुम्हें मालूम है, कहीं भी भीड़ में फंस सकते हैं.’’

‘‘टै्रफिक का बहाना मत बनाओ, मैं भी दिल्ली में रहती हूं.’’

‘‘तुम तो मेट्रो में आ गईं, टै्रफिक का पता ही नहीं चला, लेकिन मैं तो सड़क पर कार चला रहा था.’’

‘‘बहाने मत बनाओ, सब जानती हूं तुम लड़कों को. कहीं कोई लड़की देखी नहीं कि रुक गए, घूरने या छेड़ने के लिए.’’

‘‘तुम इतना विश्वास के साथ कैसे कह सकती हो?’’

‘‘विश्वास तो पूरा है पर फुरसत में बताऊंगी कि कैसे मुझे पक्का यकीन है…’’

‘‘तो अभी बता दो, फुरसत में…’’

‘‘इस समय तो तुम कार की रफ्तार बढ़ाओ, मैं शुरू से फिल्म देखना चाहती हूं. देर से पहुंचे तो मजा नहीं आएगा.’’

सिनेमाहाल के अंधेरे में सुरुचि फिल्म देखने में मस्त थी, तभी उसे लगा कि सुकेश के हाथ उस के बदन पर रेंग रहे हैं. उस ने फौरन उस के हाथ को झटक दिया और अंधेरे में घूर कर देखा. फिर बोली, ‘‘सुकेश, चुपचाप फिल्म देखो, याद है न मैं ने कार में क्या कहा था, एकदम सच कहा था, जीताजागता उदाहरण तुम ने खुद ही दे दिया. जब तक मैं न कहूं, अपनी सीमा में रहो वरना कराटे का एक हाथ यदि भूले से भी लग गया तो फिर मेरे से यह मत कहना कि बौयफें्रड पर ही प्रैक्टिस.’’

यह सुन कर बेचारा सुकेश अपनी सीट पर सिमट गया और सोचने लगा कि किस घड़ी में कराटे चैंपियन लड़की पर दिल दे बैठा. फिल्म समाप्त होने पर सुकेश कुछ अलगअलग सा चलने लगा तो सुरुचि ने उस का हाथ पकड़ा और बोली, ‘‘इस तरह छिटक के कहां जा रहे हो, भूख लगी है, रेस्तरां में चल कर खाना खाते हैं,’’ और दोनों पास के रेस्तरां में खाना खाने चले गए.

कोने की एक सीट पर बैठे सुकेश व सुरुचि बातें करने व खाने में मस्त थे. तभी शहर के मशहूर व्यापारी सुंदर सहगल भी उसी रेस्तरां में अपने कुछ मित्रों के साथ आए और एक मेज पर बैठ कर बिजनेस की बातें करने लगे. आज के भागदौड़ के समय में घर के सदस्य भी एकदूसरे के लिए एक पल का समय नहीं निकाल पाते हैं, सुरुचि के पिता सुंदर सहगल भी इसी का एक उदाहरण हैं. आज बापबेटी आमनेसामने की मेज पर बैठे थे फिर भी एकदूसरे को नहीं देख सके.

लगभग 1 घंटे तक रेस्तरां में बैठे रहने के बाद पहले सुरुचि जाने के लिए उठी. वह सुंदर की टेबल के पास से गुजरी और उस का पर्स टेबल के कोने से अटक गया. जल्दी से पर्स छुड़ाया और ‘सौरी अंकल’ कह कर सुकेश के हाथ में हाथ डाले निकल गई. उसे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वह टेबल पर बैठे अंकल और कोई नहीं उस के पिता सुंदर सहगल थे.

लेकिन पिता ने देख लिया कि वह उस की बेटी है. अपने को नियंत्रण में रख कर वह बिजनेस डील पर बातें करते रहे. उन्होंने यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह उन की बेटी थी. रेस्तरां से निकल कर सुंदर सीधे घर पहुंचे. उन की पत्नी सोनिया कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रही थीं. मेकअप करते हुए सोनिया ने पति से पूछा, ‘‘क्या बात है, दोपहर में कैसे आना हुआ, तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हां, ठीक है.’’

‘‘तबीयत ठीक है तो इतनी जल्दी? कुछ बात तो है…आप का घर लौटने का समय रात 11 बजे के बाद ही होता है. आज क्या बात है?’’

‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘किटी पार्टी में और कहां जा सकती हूं. एक सफल बिजनेसमैन की बीवी और क्या कर सकती है.’’

‘‘किटी पार्टी के चक्कर कम करो और घर की तरफ ध्यान देना शुरू करो.’’

‘‘आप तो हमेशा व्यापार में डूबे रहते हैं. यह अचानक घर की तरफ ध्यान कहां से आ गया?’’

‘‘अब समय आ गया है कि तुम सुरुचि की ओर ध्यान देना शुरू कर दो. आज उस ने वह काम किया है जिस की मैं कल्पना नहीं कर सकता था.’’

‘‘मैं समझी नहीं, उस ने कौन सा ऐसा काम कर दिया…खुल कर बताइए.’’

‘‘क्या बताऊं, कहां से बात शुरू करूं, मुझे तो बताते हुए भी शर्म आ रही है.’’

‘‘मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि आप क्या बताना चाहते हैं?’’ सोनिया, जो अब तक मेकअप में व्यस्त थी, पति की तरफ पलट कर उत्सुकतावश देखने लगी.

‘‘सोनिया, तुम्हारी बेटी के रंगढंग आजकल सही नहीं हैं,’’ सुंदर सहगल तमतमाते हुए बोले, ‘‘खुल्लमखुल्ला एक लड़के के हाथों में हाथ डाले शहर में घूम रही है. उसे इतना भी होश नहीं था कि उस का बाप सामने खड़ा है.’’

कुछ देर तक सोनिया सुंदर को घूरती रही फिर बोली, ‘‘देखिए, आप की यह नाराजगी और क्रोध सेहत के लिए अच्छा नहीं है. थोड़ी शांति के साथ इस विषय पर सोचें और धीमी आवाज में बात करें.’’

इस पर सुंदर सहगल का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. चेहरा लाल हो गया और ब्लडप्रेशर ऊपर हो गया. सोनिया ने पति को दवा दी और सहारा दे कर बिस्तर पर लिटाया. खुद का किटी पार्टी में जाने का प्रोग्राम कैंसल कर दिया.

सुंदर को चैन नहीं था. उस ने फिर से सोनिया से सुरुचि की बात शुरू कर दी. अब सोनिया, जो इस विषय को टालना चाहती थी, ने कहना शुरू किया, ‘‘आप इस बात को इतना तूल क्यों दे रहे हैं. मैं सुकेश से मिल चुकी हूं. आजकल लड़कालड़की में कोई अंतर नहीं है. कालिज में एकसाथ पढ़ते हैं. एकसाथ रहने, घूमनेफिरने में कोई एतराज नहीं करते और फिर मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है कि वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकती है. मैं ने उसे पूरी ट्रेनिंग दे रखी है. आप को मालूम भी नहीं है, वह कराटे जानती है और 2 बार मनचलों पर कराटे का इस्तेमाल भी कर चुकी है…’’

‘‘सोनिया, तुम सुरुचि के गलत काम में उस का साथ दे रही हो,’’ सुंदर सहगल ने तमतमाते हुए बीच में बात काटी.

‘‘मैं आप से बारबार शांत होने के लिए कह रही हूं और आप हैं कि एक ही बात को रटे जा रहे हैं. आखिर वह है तो आप की ही बेटी. तो आप से अलग कैसे हो सकती है.

‘‘आप अपनी जवानी के दिनों को याद कीजिए. 25 साल पहले, आप क्या थे. एक अमीर

बाप की बिगड़ी औलाद जो महज मौजमस्ती के लिए कालिज जाता था. आप ने कभी कोई क्लास भी अटैंड की थी, याद कर के बता सकते हैं मुझे.’’

‘‘तुम क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘वही जो आप मुझ से सुनना चाह रहे थे…आप का ज्यादातर समय लड़कियों के कालिज के सामने गुजरता था. आप ने कितनी लड़कियों को छेड़ा था शायद गिनती भी नहीं कर सकते, मैं भी उन्हीं में से एक थी. आतेजाते लड़कियों को छेड़ना, फब्तियां कसना ही आप और आप की मित्रमंडली का प्रिय काम था. छटे हुए गुंडे थे आप सब, इसलिए हर लड़की घबराती थी और मेरा तो जीना ही हराम कर दिया था आप ने. मैं कमजोर थी क्योंकि मेरा बाप गरीब था और कोई भाई आप की हरकतों का जवाब देने वाला नहीं था. इसलिए आप की हरकतों को नजरअंदाज करती रही.

‘‘हद तो तब हो गई थी जब मेरे घर की गली में आप ने डेरा जमा लिया था. आतेजाते मेरा हाथ पकड़ लेते थे. कितना शर्मिंदा होना पड़ता था मुझे. मेरे मांबाप पर क्या बीतती थी, आप ने कभी सोचा था. मेरा हाथ पकड़ कर खीखी कर पूरी गुंडों की टोली के साथ हंसते थे. शर्म के मारे जब एक सप्ताह तक मैं घर से नहीं निकली तो आप मेरे घर में घुस आए. कभी सोचने की कोशिश भी शायद नहीं की होगी आप ने कि क्या बीती होगी मेरे मांबाप पर और आज मुझ से कह रहे हैं कि अपनी बेटी को संभालूं. खून आप का भी है, कुछ तो बाप के गुण बच्चों में जाएंगे लेकिन मैं खुद सतर्क हूं क्योंकि मैं खुद भुगत चुकी हूं कि इन हालात में लड़की और उस के मातापिता पर क्या बीतती है.

‘‘इतिहास खुद को दोहराता है. आज से 25 साल पहले जब उस दिन सब हदें पार कर के आप मेरे घर में घुसे थे कि शरीफ बाप क्या कर लेगा और अपनी मनमानी कर लेंगे तब मैं अपने कमरे में पढ़ रही थी और कमरे में आ कर आप ने मेरा हाथ पकड़ लिया था. मैं चिल्ला पड़ी थी. पड़ोस में शकुंतला आंटी ने देख लिया था. उन के शोर मचाने पर आसपास की सारी औरतें जमा हो गई थीं…जम कर आप की धुनाई की थी, शायद आप उस घटना को भूल गए होंगे, लेकिन मैं आज तक नहीं भूली हूं.

‘‘महल्ले की औरतों ने आप की चप्पलों, जूतों, झाड़ू से जम कर पिटाई की थी, सारे कपड़े फट गए थे, नाक से खून निकल रहा था और आप को पिटता देख आप के सारे चमचे दोस्त भाग गए थे और उस अधमरी हालत में घसीटते हुए सारी औरतें आप को इसी घर में लाई थीं. ससुरजी भागते हुए दुकान छोड़ कर घर आए और आप की करतूतों के लिए सिर झुका लिया था, लिखित माफी मांगी थी, कहो तो अभी वह माफीनामा दिखाऊं, अभी तक संभाल कर रखा है.’’

सुंदर सहगल कुछ नहीं बोल सके और धम से बिस्तर पर बैठ गए. सोनिया ने उन के अतीत का आईना सामने जो रख दिया था. सच कितना कड़वा होता है शायद इस बात का अंदाजा उन्हें आज हुआ.

आज इतिहास करवट बदल कर सामने खड़ा है. खुद अपना चेहरा देखने की हिम्मत नहीं हो रही है, सुधबुध खो कर वह शून्य में गुम हो चुके थे. सोनिया क्या बोल रही है, उन के कान नहीं सुन रहे थे, लेकिन सोनिया कहे जा रही थी :

‘‘आप सुन रहे हैं न, चोटग्रस्त होने की वजह से एक हफ्ते तक आप बिस्तर से नहीं उठ सके थे. जो बदनामी आप को आज याद आ रही है, वह मेरे पिता और ससुरजी को भी आई थी. बदनामी लड़के वालों की भी होती है. एक गुंडे के साथ कोई अपनी लड़की का ब्याह नहीं कर रहा था. चारों तरफ से नकारने के बाद सिर्फ 2 ही रास्ते थे आप के पास या तो किसी गुंडे की बहन से शादी करते या कुंआरे रह कर सारी उम्र गुंडागर्दी करते.

‘‘जिस बाप की लड़की के पीछे गुंडा लग जाए, वह कर भी क्या सकता था. ससुरजी ने जब सब रास्ते बंद देख कर मेरा हाथ मेरे पिता से मांगा तो मजबूरी से दब कर एक गुंडे को न चाहते हुए भी उन्हें अपना दामाद स्वीकार करना पड़ा,’’ कहतेकहते सोनिया भी पलंग का पाया पकड़ कर सुबक कर रोने लगी.

बात तो सच है, जवानी की रवानी में जो कुछ किया जाता है, उस को भूल कर हम सभी बच्चों से एक आदर्श व्यवहार की उम्मीद करते हैं. क्या अपने और बच्चों के लिए अलग आदर्श होने चाहिए, कदापि नहीं. पर कौन इस का पालन करता है. सुंदर सहगल तो केवल एक पात्र हैं जो हर व्यक्ति चरितार्थ करता है.

Best Hindi Story : जीवन की डाटा एंट्री – जिंदगी से हताश युवक की दिल छूती कहानी

Best Hindi Story : इधरउधर नजरें घुमा कर अनंत देसाई ने आफिस का मुआयना किया. उन्होंने आज ही अखबार के आधे पृष्ठ का रंगीन विज्ञापन देखा था. डेल्टा इन्फोसिस प्राइवेट लिमिटेड का नाम इस विज्ञापन में देख कर और उस की बारीकियां पढ़ कर देसाईजी ने चैन की सांस ली थी कि चलो, बेटे रोहित का कहीं तो ठिकाना हो सकता है. नौकरियां नहीं हैं तो क्या इस एम.एन.सी. (मल्टीनेशनल कंपनी) कल्चर ने रोजीरोटी के कुछ और रास्ते निकाल ही दिए हैं. उन से बेटे का हताशनिराश चेहरा अब और नहीं देखा जा रहा था.

रोहित एम.सी.ए. करने के बाद एक कंप्यूटर कंपनी की सेल्स मार्केटिंग में लगा हुआ था. सुबह 8 बजे का निकला रात के 8 बजे ही घर आ पाता था. धूप हो, बारिश हो या तबीयत खराब हो, वह छुट्टी की बात सोच भी नहीं सकता था, उस पर वेतन 2,500 रुपए.

अपने जहीन बेटे की ज्ंिदगी को 2,500 रुपए में गिरवी पड़ी देख कर अनंत देसाई को भारी छटपटाहट होती थी. उन्होंने एक दिन गुस्से में कहा भी था, ‘‘यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते?’’

रोहित ने लाचारी से आंखें उठाई थीं, ‘‘यह नौकरी छोड़ भी दूं तो करूंगा क्या? आप तो देख रहे हैं कि 2 वर्ष से लिखित परीक्षा पास कर के भी साक्षात्कार में मात खा रहा हूं. नौकरी हथिया लेता है कोई सिफारिशी लड़का या लड़की.’’

‘‘उच्च तकनीकी शिक्षा ले कर भी बाजार में नौकरी के लिए मारेमारे घूमते हो यह मुझ से देखा नहीं जाता है.’’

‘‘पापा, और रास्ता भी क्या है?’’ कह कर रोहित मायूस हो गया था.

अभी उसे नौकरी करते 5 महीने ही बीते थे कि रोहित बारबार बीमार पड़ने लगा जिस का असर उस के काम पर भी पड़ रहा था. इस से पहले कि

कंपनी वाले उसे नौकरी से निकाल देते उस ने नौकरी छोड़ दी.

इस के बाद से ही रोहित ने अपने को कमरें में बंद कर लिया. न घूमने निकलता, न दोस्तों से मिलता. मम्मी कभी जबरन उसे टेलीविजन के सामने बैठा देतीं तो उस की आंखें टीवी के परदे पर स्थिर हो जातीं लेकिन ध्यान कहीं और भटकता रहता.

अनंत देसाई ने रोजगार समाचार के अलावा अन्य अखबार भी मंगाने शुरू कर दिए थे. वह रोहित के लिए नौकरियों के विज्ञापन को लाल स्याही के घेरे में तो ले लेते लेकिन एक भी नौकरी जीवन के घेरे में नहीं आ पा रही थी.

पितापुत्र दोनों डेल्टा इन्फोसिस के कार्यालय की शानोशौकत से प्रभावित बैठे थे. यू आकार के काउंटर के पीछे 2 लड़के व 1 लड़की मुस्तैदी से काम कर रहे थे. दाईं तरफ बने एक केबिन को देख कर अनंत देसाई ने सोचा इस में जरूर डायरेक्टर नीलेश याज्ञनिक बैठे होंगे.

रिसेप्शन के गुदगुदे सोफे पर पहलू बदलते हुए अनंत देसाई ने धीमे से बेटे से कहा, ‘‘आफिस तो अच्छा है.’’

रोहित ने सिर हिला कर समर्थन किया. थोड़ी देर में चपरासी ने झुक कर कहा, ‘‘आप लोगों को सर बुला रहे हैं.’’

उन के अंदर आते ही नीलेश ने बड़ी गर्मजोशी से उन का स्वागत किया और दोनों से हाथ मिलाया. अनंत देसाई ने सीधे ही बता दिया, ‘‘देखिए, डाटा एंट्री के बारे में मैं थोड़ाबहुत जानता हूं. मैं अपने बेटे के लिए कोई काम ढूंढ़ रहा हूं. आप ने जो विज्ञापन दिया था उस के बारे में विस्तार से बताइए.’’

‘‘जरूर’’ नफासत से कंधे उचकाते हुए नीलेश ने कहना शुरू किया, ‘‘आजकल विदेशों में बड़े होटलों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के पास समय नहीं है इसलिए वे अपनी स्केन फाइल के दस्तावेज बनवाने के लिए हमारे पास भेजते हैं. आप ने शायद ओबलौग इ लाइब्रेरी का नाम सुना होगा?’’ नीलेश ने सीधे ही उन की आंखों में देख कर पूछा.

न जानते हुए भी उन के मुंह से ‘हां’ निकला तो नीलेश ने कहा, ‘‘बस, वही हमारे सब से बड़े क्लाइंट हैं.’’

‘‘आप का यह पहला आफिस है?’’

‘‘नहीं, हमारे मुंबई और दिल्ली में भी आफिस हैं. वहां की प्रगति देख कर मैं ने सोचा कि एक आफिस यहां भी खोला जाए.’’

‘‘मेरा बेटा डाटा एंट्री का काम करना चाहता है. इस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’

‘‘डाटा एंट्री करने वाले कंप्यूटर आपरेटर कहलाते हैं. इन से हम 2,500 रुपए सिक्योरिटी मनी के रूप में लेते हैं. वे यह काम घर बैठ कर भी कर सकते हैं.’’

‘‘जी, इस काम से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?’’

‘‘अजी साहब, अभीअभी तो यह काम शुरू हुआ है पर जो विदेशी कंपनियां भारत को काम दे रही हैं वे यहां के प्रतिभावान लोगों को अपने देश में भी बुला सकती हैं.’’

‘‘पहले काल सेंटर व ट्रांसक्रिप्शन का ऐसा ही शोर मचा था. कुछ काल सेंटर तो बंद भी हो गए.’’

‘‘उन के प्रबंधक नाकाबिल रहे होंगे. बड़े शहरों में तो अभी भी धड़ल्ले से काल सेंटर चल रहे हैं. मुझे कोई जल्दी नहीं है, आप सोच लीजिए. वैसे मेरे पास इतना काम है कि मैं 400 लोगों को काम दे सकता हूं.’’

अनंत देसाई ने फौरन कहा, ‘‘मैं 2,500 रुपए अभी देना चाहता हूं.’’

‘‘धन्यवाद, आप इस काम की पूरी जानकारी यहां के मैनेजर सोमी से ले लीजिए और उन्हीं के पास रुपए जमा कर दीजिए.’’

केबिन से बाहर आ कर उन्होंने देखा बाईं तरफ लकड़ी के केबिन के बाहर नेमप्लेट लगी थी ‘सोमी’.

देसाई और रोहित कुरसियां खींच कर सोमी के सामने बैठ गए. देसाई ने उन से कहा, ‘‘मैं अपने बेटे रोहित की सिक्योरिटी फीस देना चाहता हूं पर उस से पहले मैं यह शंका दूर करना चाहता हूं कि जो लोग यह काम करेंगे उन्हें पैसा किस हिसाब से मिलेगा.’’

‘‘देखिए, बहुराष्ट्रीय कंपनी हमें किसी फर्म की स्केन फाइल भेजती है. मान लीजिए उस में देख कर कोई आपरेटर 1 हजार करेक्टर यानी लैटर्स टाइप करता है तो हम उसे एक शब्द मान कर पेमेंट करेंगे. अभी यह कंपनी नई है इसलिए एक शब्द के लिए 6 रुपए देगी पर बाद में यह पैसा बढ़ा कर 20 रुपए प्रति शब्द कर देगी.’’

‘‘यह काम तो अमेरिका में भी हो सकता था.’’

‘‘हां, हो तो सकता था किंतु वहां महंगा बहुत है. वहां उन्हें प्रति शब्द 2 डालर यानी कि 90 रुपए देने होते हैं. भारत में कमीशन देने के बाद भी उन्हें यह सस्ता पड़ता है और हां, साइज के हिसाब से भी टाइपिंग पेमेंट होगी.’’

अनंत देसाई प्रभावित हो गए और तुरंत ही रोहित का सिक्योरिटी फार्म भरकर 2,500 रुपए जमा कर दिए. 10 रुपए के स्टांप पेपर पर मैनेजर ने अपने व याज्ञनिक के हस्ताक्षर करवा कर उन्हें दे दिए.

उस दिन अपने आफिस के काम में देसाई का मन नहीं लग रहा था. इस समय कंप्यूटर खरीदने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी क्योंकि साल के अंदर ही शिखा की शादी करनी थी लेकिन अब तो कंप्यूटर खरीदना ही है, चाहे किसी भी हालत में. रोहित के चेहरे की हताशा को किसी तरह पोंछना ही होगा. जब से उन्होंने एक बेरोजगार युवक की आत्महत्या की बात पढ़ ली थी तब से दिल में एक डर सा बैठ गया था.

घर की दशा को देखते हुए रोहित उन्हें बारबार समझा चुका था कि कोई पुराना कंप्यूप्टर ले लेना चाहिए लेकिन वह जिद पर अड़े थे कि बहुराष्ट्रीय कंपनी का मामला है, हर चीज उसी के स्तर की होनी चाहिए.

कंप्यूटर आते ही जैसे रोहित की ज्ंिदगी में पंख निकल आए थे. वह 5-6 घंटे बैठ कर टाइप करता और जैसे ही काम पूरा होता वह दस्तावेज डेल्टा इन्फोसिस प्रा.लि. को दे आता. सोमी उसे तुरंत ही भुगतान कर देते. याज्ञनिक तो अकसर टूर पर बाहर रहते थे.

2 माह में ही रोहित ने अच्छीखासी रकम कमा ली. तब घर के कोनेकोने में जैसे खुशी की तरंगें मचलने लगी थीं. रोहित की मां बेटे की टाइपिंग स्पीड देख कर निहाल थीं लेकिन पिता की नजर बहुत दूर तक देख रही थी. उन्हें सपने में भी किसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी का बोर्ड नजर आता रहता जिस के पारदर्शी कांच के अंदर बैठे अपने बेटे का मुसकराता चेहरा देख कर वह खिल जाते थे.

इसी सपने को पूरा करने के लिए वह याज्ञनिक से मिलना चाहते थे लेकिन अनेक शहरों में फैले काम की वजह से उन का यहां आना कम होता था. सोमी से उन्होंने कह रखा था कि जैसे ही याज्ञनिक साहब आफिस आएं उन्हें तुरंत खबर करें.

याज्ञनिक के शहर में आने की खबर पाते ही वह एक किलो मिठाई का डब्बा ले कर उन से मिलने चल दिए.

मिठाई का डब्बा थोड़ी आनाकानी के बाद लेते हुए याज्ञनिक मुसकराए, ‘‘देसाईजी, इस की क्या जरूरत थी?’’

‘‘साहब, यह मिठाई मैं नहीं एक पिता दे रहा है. आप ने मेरे बेटे के चेहरे की हंसी वापस लौटा दी है. वह आप के यहां का काम करते हुए प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है.’’

‘‘बहुत खूब, इस शहर के डाटा आपरेटरों में वही सब से होनहार है.’’

‘‘रियली,’’ कहते हुए देसाई की आंखों में सुदूर देश के किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के आफिस में लगी हुई बेटे की नेमप्लेट कौंध गई.

तभी नीलेश याज्ञनिक के मोबाइल की घंटी बज उठी. मोबाइल पर क्या बातें हुईं यह अनंत देसाई की समझ में नहीं आया लेकिन नीलेश के चेहरे की खुशी देख कर वह यह तो समझ गए कि कोई अच्छी खबर है.

मोबाइल का स्विच बंद करते ही उन्होंने बेहद गर्मजोशी से देसाई से हाथ मिलाया और उत्साह से कहा, ‘‘देसाई, आप की यह मिठाई मेरे लिए शुभ समाचार लाई है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अभी बताता हूं,’’ यह कह कर नीलेश ने घंटी दबा दी. कुछ पल बाद ही चपरासी आ कर खड़ा हो गया तो वह बोले, ‘‘गोपीराम, भाग कर आफिस में सभी के लिए बटरस्काच आइस्क्रीम लाओ.’’

‘‘ऐसी भी क्या खुशखबरी है जी?’’ अनंत देसाई ने पूछा.

‘‘यों समझिए कि एक माह से रुका पड़ा साढ़े 12 करोड़ रुपए का भुगतान हो गया है. इस पैसे के कारण दिल्ली और मुंबई के आपरेटरों का पेमेंट रुका हुआ था. कितना बुरा लगता है जब हमारे आपरेटर काम करते हैं और हम समय से उन्हें भुगतान नहीं दे पाते. अब मैं उन्हें भुगतान दे सकता हूं.’’

तीसरे दिन ही नीलेश ने आपरेटरों की एक मीटिंग रखी, ‘‘मैं सोच रहा हूं कि काम इतना बढ़ रहा है कि हर 3 दिन बाद आप लोगों को भुगतान करने में सोमी साहब परेशान हो जाते हैं तो क्यों न आप लोगों के काम के हिसाब से 15 या 30 दिन में भुगतान कर दिया करें. अब इस कंपनी का अकाउंट यहां केलोटस बैंक में है. आप चाहें तो इस की जांच कर लें. हम अब चेक से भुगतान करेंगे. अब आप लोग निर्णय लें कि आप 15 दिन भुगतान चाहते हैं या एक माह बाद?’’

आपरेटरों ने आपस में विचार कर 15 दिन बाद भुगतान लेने की बात पर सहमति जता दी.

अगले माह के दोनों चेकों का बैंक ने भुगतान किया लेकिन उस के बाद के चेक बाउंस होने लगे. जब शोर मचने लगा तो सोमी ने समझाया, ‘‘हम इतना बड़ा आफिस ले कर बैठे हैं. कहीं भाग जाने वाले नहीं हैं? लीजिए, आप लोग याज्ञनिक सर से बात कर लीजिए.’’

सोमी ने तुरंत ही उन के मोबाइल का नंबर डायल किया और उन से बात कर के बोले, ‘‘सर, कह रहे हैं कि रोहित को फोन दो.’’

रोहित ने फोन पर कहा, ‘‘सर, हमारे चेक बाउंस हो रहे हैं.’’

‘‘देखो, एक बैंक की एल.सी. में कुछ स्पेल्ंिग की गलती है, उसे वापस भेजा है. जब दूसरी एल.सी. आएगी तब पैसा जमा होगा, तब आप लोगों का भुगतान हो जाएगा. सिक्योरिटी के लिए आप चेक लेते जाइए. एकसाथ भुगतान हो जाएगा.’’

‘‘ओ, थैंक्स, सर, आप ने हमारा संदेह दूर कर दिया.’’

रोहित ने अपने साथियों को इस बातचीत के बारे में बताया.

‘‘खैर, पेमेंट कहां जाएगा,’’ एक दादा टाइप लड़के ने कहा, ‘‘यदि पेमेंट नहीं दिया तो इस आफिस का फर्नीचर बेच कर अपना पैसा ले लेंगे.’’

इस तरह 3 महीने बीत गए. सभी आपरेटरों का गुस्सा सीमा पार करने लगा. अपने सामने मुसीबत खड़ी देख सोमी ने मोबाइल पर नीलेश और रोहित के बीच बात करा दी.

‘‘आप की एल.सी. पता नहीं कब जमा होगी. अब कोई आपरेटर इंतजार करने के लिए तैयार नहीं है,’’ रोहित जोर से चिल्लाया.

तभी दादा टाइप उस लड़के ने रोहित के हाथ से फोन छीन लिया और दहाड़ा, ‘‘सर, यदि कल तक हमें पेमेंट नहीं मिली तो हम सब आप के आफिस का सामान बेच कर अपना पैसा वसूल करेंगे.’’

‘‘ओ भाई, ऐसा मत करना,’’ नीलेश का स्वर हड़बड़ा गया, ‘‘चलो, मैं किसी भी तरह पैसे का इंतजाम कर के सुबह 10 बजे आफिस पहुंच रहा हूं. आप सब लोग भी आ जाइए.’’

दूसरे दिन सुबह का समाचारपत्र पढ़ कर 400 परिवार सन्न रह गए. हर समाचारपत्र का एक ही मजमून था कि प्रदेश के सब से बड़े डाटा एंट्री का भंडाफोड़…साथ में था पुलिस वालों के बीच मुंह लटकाए सोमी का फोटो.

अनंत देसाई ने धड़कते दिल से खबर पढ़ी, ‘‘सोमी गिरफ्तार लेकिन नीलेश याज्ञनिक तमाम आपरेटरों की जमा सिक्योरिटी ले कर और उन से मुफ्त में काम करा के 15 करोड़ रुपए का फायदा उठा कर फरार.’’

उस दादा टाइप लड़के ने अखबार पढ़ कर सोचा आफिस को फर्नीचर सहित आग लगा आए लेकिन आगे पढ़ कर वह सन्न रह गया क्योंकि आगे लिखा था कि आफिस व फर्नीचर नीलेश याज्ञनिक ने किराए पर ले रखा था.

उधर सोमी की मां बेटे की गिरफ्तारी से बेहोशी में थी. उन्हें जैसे ही होश आता चिल्लातीं, ‘‘सोमी, मैं ने पहले ही मना किया था कि तू इस कंपनी का मालिक मत बन. कोई वैसे ही लाखों रुपए का आफिस किसी के नाम नहीं करता.’’

और रोहित? वह अपने को संभालने की कोशिश कर रहा था. धीरेधीरे फिर वह अपने कमरे में बंद रहने लगा.

Love Story : बंद लिफाफा – केशव दिल्ली क्यों गया था?

Love Story : केशव को दिल्ली गए 2 दिन हो गए थे और लौटने में 4-5 दिन और लगने की संभावना थी. ये चंद दिन काटने भी रजनी के लिए बहुत मुश्किल हो रहे थे. केशव के बिना रहने का उस का यह पहला अवसर था. बिस्तर पर पड़ेपड़े आखिर कोई करवटें भी कब तक बदलता रहेगा. खीज कर उसे उठना पड़ा था.

रजनी ने घड़ी में समय देखा, 9 बज गए थे और सारा घर बिखरा पड़ा था. केशव को इस तरह के बिखराव से बहुत चिढ़ थी. अगर वह होता तो रजनी को डांटने के बजाय खुद ही सामान सलीके से रखना शुरू कर देता और उसे काम में लगे देख कर रजनी सारा आलस्य भूल कर उठती और स्वयं भी काम में लग जाती. केशव की याद आते ही रजनी के गालों पर लालिमा छा गई. उस ने उठ कर घर को संवारना शुरू कर दिया.

बिस्तर की चादर उठाई ही थी कि एक बंद लिफाफे पर रजनी की नजर टिक गई. हाथ में उठा कर उसे कुछ क्षणों तक देखती रही. मां की चिट्ठी थी और पिछले 10 दिन से इसी तरह तकिए के नीचे दबी पड़ी थी. केशव ने तो कई बार कहा था, ‘‘खोल कर पढ़ लो, आखिर मां की ही तो चिट्ठी है.’’

पर रजनी का मन ही नहीं हुआ. वह समझती थी कि पत्र पढ़ कर उसे मानसिक तनाव ही होगा. फिर से उस लिफाफे को तकिए के नीचे दबाती हुई वह बिस्तर पर लेट गई और अतीत में विचरण करने लगी:

मां का नाराज होना स्वाभाविक था, परंतु इस में भी कोई शक नहीं कि वे रजनी को बहुत प्यार करती थीं.

मां कहा करतीं, ‘मेरी रजनी तो परी है,’ अपनी खूबसूरत बेटी पर उन्हें बड़ा नाज था. पासपड़ोस और रिश्तेदारों में हर तरफ रजनी की सुंदरता के चर्चे थे. सिर्फ सुंदर ही नहीं, वह गुणवती भी थी. मां ने उसे सिलाईकढ़ाई, चित्रकला और नृत्य की भी शिक्षा दिलाई थी. रजनी के लिए तब से रिश्ते आने लगे थे जब वह बालिग भी नहीं हुई थी. पिताजी सिर्फ रजनी की पढ़ाई की ही चिंता करते, पर मां का तो सारा ध्यान लड़के की तलाश में लगा था.

यह तो अच्छा था कि उस के लिए जो भी रिश्ते आए, उन में से कोई भी लड़का मां को पसंद नहीं आया था.

आसपड़ोस और रिश्तेदारों के सामने रजनी की सुंदरता का बखान करते हुए मां कहतीं, ‘कुंआरी बेटी छाती पर बोझ होती है और वह अगर सुंदर होने के साथसाथ गुणी भी हो तो बोझ दोगुना हो जाता है. रजनी के लिए योग्य वर ढूंढ़ना बड़ा कठिन काम है. हम अकेले क्या कर लेंगे? आप भी ध्यान रखिएगा.’

बारबार मां के यही कहते रहने से उन की मुंहबोली बहन सुलभा अपने रिश्ते के एक लड़के का प्रस्ताव रजनी के लिए लाई लेकिन लड़के का फोटो देखते ही मां सुलभा पर बरस पड़ीं, ‘अरी सुलभा, तेरी आंखों को क्या हो गया है जो मेरी बेटी के लिए काना दूल्हा ढूंढ़ कर लाई है.’

‘काना? यह तू क्या कह रही है, कमला. लड़के की एक आंख दूसरी से थोड़ी छोटी है तो क्या वह काना हो गया,’ सुलभा मौसी भी चिढ़ गईं.

‘और नहीं तो क्या…एक छोटी, दूसरी बड़ी, काना नहीं तो और क्या कहूं?’ मां हाथ नचाती बोलीं, ‘मेरी बेटी में कोई खोट नहीं, फिर मैं क्यों ब्याहने लगी इस से…’ मां का क्रोध दोगुना हो गया था.

उस दिन मां ने सुलभा मौसी से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ दिया. इस घटना के बाद मां रिश्तेदारों में इस बात को ले कर मशहूर होती गईं कि उन्हें अपनी बेटी की सुंदरता पर बड़ा घमंड है, इसीलिए बेटी के लिए जो भी रिश्ता आता है, बस लड़के के दोष ही ढूंढ़ कर निकालती रहती हैं. मां का तनाव बढ़ रहा था पर रजनी और पिताजी मां की पीड़ा से अनभिज्ञ थे. रजनी जल्दी से जल्दी एम.ए. कर लेना चाहती थी. उसे स्वयं भी इस बात का डर था कि अगर मां को कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा तो उस की पढ़ाई पूरी न हो पाएगी.

आखिर रजनी की एम.ए. की पढ़ाई भी हो गई पर मां अपनी तलाश में असफल ही रहीं. रजनी नौकरी करना चाहती थी तो पिताजी ने चुपके से उसे इजाजत भी दे दी. उस ने आवेदनपत्र भेजने शुरू कर दिए. इस बीच उस के लिए रिश्ते भी आते रहे. अब तो उस की सुंदरता के साथसाथ पढ़ाई को भी ध्यान में रखा जाने लगा, जिस से मां की परेशानी और बढ़ गई.

जब रजनी के लिए कानपुर के एक कालेज से व्याख्याता पद के लिए नियुक्तिपत्र आया तो मां और पिताजी के बीच जम कर झगड़ा हुआ और अंत में मां का निर्णयात्मक स्वर उभरा, ‘रजनी नहीं जाएगी.’

‘क्यों नहीं?’ मां के निर्णय का खंडन करते हुए पिताजी का प्रश्न सुनाई दिया.

‘बेकार सवाल मत कीजिए. मैं अपनी खूबसूरत और जवान बेटी को अकेली दूसरे शहर जा कर नौकरी करने की इजाजत नहीं दे सकती और अगर इसे नौकरी करनी ही है तो यहीं शहर में करे.’

‘कमला, समझने की कोशिश करो. रजनी अब छोटी बच्ची नहीं रही…और फिर अच्छी नौकरी बारबार नहीं मिलती. तुम यह न समझना कि मैं उस का पक्ष ले रहा हूं. वह अपना फैसला खुद कर चुकी है और हमें उस के निर्णय में दखलंदाजी का हक नहीं है,’ पिताजी ने मां को समझाते हुए कहा.

‘क्यों नहीं है हक? क्या हम उस के कोई…’ अब मां का स्वर भीग गया था.

रजनी का दिल भर आया. मां उस की दुश्मन नहीं थीं पर रजनी भी हाथ आया मौका खोना नहीं चाहती थी. धीरे से उस ने मां के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘मां, मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं. मुझे मत रोको.’

रजनी के हाथों को अपने कंधों से झटकते हुए मां पिताजी पर ही बरस पड़ीं,  ‘देख लीजिएगा, आप की लाड़ली हमारी नाक कटवा कर ही मानेगी. दूसरे शहर में कोई रोकटोक न रहेगी. अपनी मनमानी करती फिरेगी. घर की इज्जत मिट्टी में मिल गई तो सिर पीटने से कोई फायदा नहीं होगा.’

मां अनापशनाप कहे जा रही थीं और पिताजी सिर थामे सोफे पर चुप बैठे थे. रजनी उन्हें अकेला छोड़ कर कमरे से निकल गई थी.

मां की लाख कोशिशों के बावजूद पिताजी ने एक बार भी रजनी को जाने से मना नहीं किया. नए शहर, नए माहौल और एक नई व्यस्तता भरी जिंदगी में वह अपनेआप को ढालने का प्रयास करने लगी. देखने में रजनी स्वयं एक छात्रा सी लगती थी. अपने से ऊंचे कद के लड़कों को पढ़ाते समय प्राय: वह घबरा सी जाती थी. लड़के उस के इसी शांत और डरेडरे से स्वभाव का फायदा उठा कर उसे छेड़ बैठते और तब बेबस रजनी का मन होता कि नौकरी ही छोड़ दे. कभीकभी तो वह अपनेआप को बेहद अकेली महसूस करती. कालेज के अन्य प्राध्यापकों से वह वैसे भी घुलमिल नहीं पा रही थी. बस, अपने काम से ही मतलब रखती थी.

एक दिन कुछ शरारती छात्रों ने कालेज से लौट रही रजनी को रास्ते में रोक लिया. हलकी सी बूंदाबांदी भी हो रही थी और लग रहा था कि कुछ ही मिनटों में जोरों की बारिश शुरू हो जाएगी. ऐसे में अपनेआप को इन लड़कों से घिरा पा कर उसे कंपकंपी छूटने लगी.

‘मैडम, आज आप ने जो कुछ पढ़ाया, वह हमारी समझ में नहीं आया. कृपया जरा समझा दीजिए,’ एक छात्र ने उस के समीप आ कर कहा.

‘क्यों, कक्षा में क्या करते रहते हैं आप लोग?’ चेहरे पर क्रोध भरा तनाव लाने का असफल प्रयास करते हुए रजनी ने पूछा.

‘दरअसल मैडम, हम कोशिश तो करते हैं कि पढ़ाई में ध्यान दें, पर आप हैं ही इतनी सुंदर कि पढ़ाई भूल कर बस आप को ही देखे चले जाते हैं…’ दूसरे छात्र ने कहा और जैसे ही उस ने अपना हाथ रजनी के चेहरे की ओर बढ़ाया, एक मजबूत हाथ ने उसे रोक लिया. प्रोफेसर केशव को पास पा कर रजनी को तसल्ली हुई.

‘कल सवेरे आप सब प्रिंसिपल साहब के कक्ष में मुझ से मिलिएगा. अब फूटिए यहां से…’ प्रोफेसर केशव के धीमे किंतु आदेशात्मक स्वर से सभी छात्र वहां से खिसक गए. रजनी चुपचाप केशव के साथ चल पड़ी. वैसे रजनी कई बार उन से मिल चुकी थी, पर ज्यादा बातचीत कभी नहीं हुई थी.

‘कहां रहती हैं आप?’ केशव ने चलतेचलते पूछा.

‘होस्टल में,’ रजनी ने धीमे से कहा.

‘पहले कहां थीं?’

‘जयपुर में.’

फिर दोनों के बीच एक गहरी चुप्पी छा गई. वे चुपचाप चल रहे थे कि केशव ने कहा, ‘आप में अभी तक आत्म- विश्वास नहीं आया है. आप पढ़ाते समय इतना ज्यादा घबराती हैं कि छात्रछात्राओं पर गहरा प्रभाव नहीं छोड़ पातीं.’

‘जी, मैं जानती हूं, पर यह मेरा पहला अवसर है.’

‘कोई बात नहीं,’ प्रोफेसर केशव मुसकरा दिए थे, ‘पर अब यह कोशिश कीजिएगा कि आत्मविश्वास हमेशा बना रहे. वैसे उन छात्रों से मैं निबट लूंगा. अब वे आप को कभी परेशान नहीं करेंगे.’

रजनी ने एक बार सिर उठा कर उन्हें देखा था. आकर्षक व्यक्तित्व वाले केशव के सांवले चेहरे का सब से बड़ा आकर्षण था उन की लंबी नाक. रजनी प्रभावित हुए बिना न रह सकी.

उस रात रजनी ढंग से सो भी न सकी. लड़कों की शरारत और केशव की शराफत का खयाल दिमाग में ऐसे कुलबुलाता रहा कि वह रात भर करवटें ही बदलती रही. उसे लगा कि वह केशव की मदद को आजीवन भूल न सकेगी.

दूसरे दिन रजनी केशव से मिली तो केशव के चेहरे पर उस घटना की याद का जैसे कोई चिह्न ही नहीं था. रजनी के नमस्कार का जवाब दे कर वे आगे बढ़ गए थे. धीरेधीरे रजनी का केशव के प्रति आकर्षण बढ़ता चला गया. केशव ने कभी भी यह जताने की कोशिश नहीं की थी कि रजनी की मदद कर के उन्होंने कोई एहसान किया हो.

रजनी जब भी केशव को देखती, अपलक उन्हें देखती रह जाती. उसे इस प्रकार अपनी ओर देखते हुए पा कर केशव धीरे से मुसकरा देते और यही मुसकराहट एक तीर सी रजनी के हृदय को भेद जाती. धीरेधीरे रजनी का यह आकर्षण प्रेम बन कर फूटने लगा तो उस ने निर्णय लिया कि वह केशव के सामने विवाह का प्रस्ताव रखेगी.

एक दिन रजनी ने प्रोफेसर केशव को दोपहर के खाने का आमंत्रण दे दिया. होटल में रजनी केशव के सामने यही सोच कर झेंपी सी बैठी रही कि वह इस बात को कहेगी कैसे. सोचतेसोचते वह परेशान सी हो गई.

‘क्या बात है, रजनी?’ केशव ने बातचीत में पहल की, ‘तुम खामोश क्यों हो?’

रजनी चुप रही.

‘कुछ कहना चाहती हो?’

‘हां…’

‘क्या बात है? क्या फिर किसी ने परेशान किया?’ केशव ने शरारत और आत्मीयता से भरा प्रश्न किया तो रजनी की आंखों से आंसू बहने लगे. प्रेम की विवशता और शर्म की खाई के बीच सिर्फ आंसुओं का ही सहारा था, जो शायद उस के प्रेम की गहराई को स्पष्ट कर पाते. वह धीरे से बोली, ‘मैं आप से प्रेम करती हूं और शादी भी करना चाहती हूं.’

‘शादीब्याह में इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं,’ केशव ने कहा तो सुन कर रजनी चौंक गई. क्या केशव उस के प्यार को ठुकरा रहा है?

‘तुम मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानतीं,’ केशव ने आगे कहा, ‘पहले जान लो, फिर निर्णय लेना.

‘शादी के बाद शायद मैं तुम पर बोझ बन जाऊं,’ कहते हुए केशव ने अपनी पैंट को घुटने तक खींच लिया. उस का घुटने से नीचे नकली पैर लगा था.

देखते ही रजनी की चीख निकल गई. वह धीरे से बोली, ‘यह कैसे हुआ?’

‘सड़क दुर्घटना से…’

रजनी की आंखों से अश्रुधारा बह चली थी. उस के निर्णय में एकाएक परिवर्तन आया. पल भर में ही उस ने सोच लिया कि वह शादी के बाद ही मां और पिताजी को सूचना देगी. वह जानती थी कि मां एक अपाहिज को अपने दामाद के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर पाएंगी. एक सादे से समारोह में रजनी ने केशव से विवाह कर लिया.

मां को पत्र लिखने के कुछ ही दिन बाद उन का जवाब आ गया. पर रजनी लिफाफा खोल न सकी. वह सोचने लगी कि मां का दिल अवश्य ही टूटा होगा और पत्र भी उन्होंने उसे कोसते हुए ही लिखा होगा. रजनी को हमेशा पिताजी का खयाल आता था. मां इस घटना के लिए पिताजी को ही जिम्मेदार ठहराती होंगी. पिताजी को भी शायद अब पछतावा ही होता होगा कि रजनी को यहां क्यों भेजा.

अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि नौकरानी की आवाज सुनाई दी तो वह अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गई.

‘‘मालकिन, आप की माताजी आई हैं.’’

‘‘मां?’’ रजनी चौंक गई, ‘‘कब आईं?’’

‘‘अभी कुछ देर पहले. नहा रही हैं.’’

रजनी के मन में कई तरह के विचार आने लगे. मां के आने से उस का मन शंकित हो उठा. न जाने वे क्या सोच कर आई हैं और केशव के साथ कैसा व्यवहार करेंगी? अचानक उसे लिफाफे का खयाल आया. दौड़ते हुए गई और तकिए के नीचे दबे लिफाफे को खोल कर पढ़ने लगी :

‘बेटी रजनी,

नहीं जानती कि अगर तू ने शादी के पहले मुझे यह बताया होता कि केशव अपाहिज है तो मैं क्या निर्णय लेती, पर बाद में पता चला तो थोड़ी सी पीड़ा सिर्फ यह सोच कर हुई कि अपने हाथों से तुझे दुलहन न बना सकी.

धीरेधीरे मैं यह महसूस करने लगी हूं कि तू ने गलत निर्णय नहीं लिया है बल्कि अपने इस निर्णय से यह साबित कर दिया है कि तू अपनी मां की तरह शारीरिक सुंदरता को महत्त्व देने वाली नहीं, वरन हृदय की सुंदरता को पहचानने वाली पारखी है. तेरे निर्णय पर मुझे नाज है. मैं तुझ से मिलने आ रही हूं.

तुम्हारी मां.’

रजनी को लगा कि मारे खुशी के वह पागल हो जाएगी. उसी तरह लिफाफे को तकिए के नीचे रख कर वह जोर से स्नानघर का दरवाजा पीटने लगी, ‘‘जल्दी आओ न मां, तुम्हें देखने को आंखें तरस गई हैं.’’

‘‘इतनी बड़ी हो गई है, पर अभी बचपना नहीं गया,’’ मां का बुदबुदाता सा स्वर सुनाई दिया.

रजनी को लगा कि मां जल्दीजल्दी से शरीर पर पानी डालने लगी हैं.

Hindi Story : क्या तुम आबाद हो – किस ने तबाह कर दी थी कृति और कल्पना की जिंदगी?

Hindi Story : कलरात अचानक नन्ही की तबीयत बहुत खराब होने की वजह से मैं परेशान हो गई. जय को फोन लगाया तो कवरेज से बाहर बता रहा था. रात के आठ बज रहे थे. कुछ सम झ नहीं आया तो मैं अकेली ही डाक्टर को दिखाने के लिए निकल पड़ी. नीरवता में अजीब सी शांति थी. मु झे यह रात बहुत भा रही थी. चारों ओर फैली उस कालिमा में रोमांस के अलावा और कुछ था तो वह था नन्ही की बीमारी के लिए चिंता और मेरे तेज चलते कदमों की आहट.

डाक्टर के कैबिन से बाहर आते ही मैं ने राहत की सांस ली. नन्ही को वायरल था, घबराने वाली बात नहीं थी. अंधेरा और गहरा हो गया था. दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं. अपनेआप पर गुस्सा भी आ रहा था. नन्ही की बीमारी ने मेरा दिलदिमाग सुन्न कर दिया था. बगैर सोचे रात को निकल पड़ी थी.

जय बहुत गुस्सा करेंगे. गुस्सा याद आते ही शरीर में डर से  झुर झुरी पैदा हो गई. जय जब गुस्सा करते हैं तो उन्हें कुछ भी तो सम झ में नहीं आता है… कभीकभी तो हाथ भी उठा देते हैं. मेरी खुद्दारी सिर्फ मेरे पास थी. इस से जय को कुछ लेनादेना नहीं था. वे तो अपने पौरुष बल को जबतब दिखा कर मु झे और कमजोर कर देते हैं.

कभीकभी सोचती हूं कि मेरे मांबाप ने मुझे पढ़ाया ही क्यों. अनपढ़ रहती तो ज्यादा अच्छा था. तभी मोबाइल की रिंग ने मुझे चौंका दिया. जय का नंबर देख थोड़ी राहत महसूस हुई.

‘‘कहां हो? मैं घर आया तो दरवाजे पर ताला लगा देख घबरा गया,’’ जय का घबराया स्वर सुन मेरा डर और बढ़ गया.

मैं ने कांपती आवाज में जवाब दिया, ‘‘नन्ही की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी… तुम्हारा मोबाइल कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था. पड़ोसी के घर चाबी है, ले लेना.’’

‘‘तुम वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में आता हूं,’’ कह कर जय ने फोन काट दिया.

मेरे बेचैन मन को शांति मिली.

फोन कटने के बाद जैसे ही नजर उठाई कि मु झे बरसों पुरानी मेरी एक दोस्त दिखाई दी.

हम एकदूसरे को कुछ देर देखते रह गए. बात करने की पहल उसी ने की, ‘‘व्हाट ए सरप्राइज… कल्पना तुम मु झे यहां ऐसे मिलोगी, मैं सोच भी नहीं सकती थी.’’

मैं ने मुसकराते हुए हलके से उस का हाथ दबा दिया.

बरसों पहले जब हम जुदा हुए थे तो छोटी सी बात पर हम दोनों के बीच दरार आ गई थी. बरसों की दूरी ने उस दरार को भर दिया था. हम सहज थे और मु झे अपनी सहजता पर विस्मय भी हो रहा था.

हालांकि मु झे उसे देख कर खास खुशी नहीं हुई. यह अप्रत्याशित मुलाकात मेरे अकेलेपन की समस्या से छुटकारा दिला देगी, यह सोच कर मेरा मन संतोष से भर गया. वह मेरे पास आ गई. मेरा हाथ पकड़ पास की बैंच पर बैठ गई तो मु झे भी बैठना पड़ा. उस ने मेरी बच्ची को मेरी गोद से अपनी गोद में ले लिया.

मैं ने उस का चेहरा गौर से देखा. थकी और परेशान लग रही थी. मु झे बरसों पुरानी बात याद आ गई, जब वह मु झे अपना दुखड़ा सुनाया करती थी और मैं ऊब जाया करती थी. वह हर समय अपने प्रेमी के बारे में बातें कर के जी हलका कर लेती थी पर मैं और भारी हो जाती थी. मैं वाहियात बातों पर अपना समय खराब नहीं करना चाहती थी. इसीलिए उस समय या बाद के दिनों में मेरा कोई प्रेमी नहीं हुआ.

‘‘कहां खो गई कल्पना?’’ उस की नम्र आवाज मु झे भूत से वर्तमान में ले आई.

‘‘कृति तुम अपने बारे में बताओ? इतने साल बाद मिली हो. तुम जिस से प्यार करती थी उसी से तुम्हारी शादी हुई या किसी और से? कितना प्यार करती थी न तुम उस से. तुम्हारी हरेक बात में सिर्फ उसी का जिक्र होता था,’’ वह बोली.

‘‘मैं उसे अभी तक नहीं भूल पाई… आखिर तक नहीं भूल पाऊंगी. शायद भूलना चाहूं तब भी नहीं भूल सकती. जानती हो कल्पना जिस दिन मैं उस को भूल जाऊंगी, उस दिन मैं मर जाऊंगी. उस ने मेरे साथ विश्वासघात किया, मु झे धोखा दिया. प्यार मु झ से किया और शादी किसी और से…’’

मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगी. मैं मरते दम तक उसे कोसती रहूंगी. वह जहां है जैसे भी है कभी खुश नहीं रहेगा. मेरी जिंदगी को बरबाद करने वाला कभी आबाद नहीं रहेगा. मेरे अंदर एक आग हमेशा जलती रहती है, जिसे मैं कभी बु झने नहीं दूंगी, क्योंकि मैं इसी आग के सहारे अभी तक जिंदा हूं. मैं अब किसी आदमी पर भरोसा नहीं कर पाती… वह मेरा विश्वास इस कदर तोड़ गया है.

‘‘मेरे शरीर के 1-1 हिस्से पर उस के स्पर्श के निशान हैं. उस ने मु झे निचोड़ दिया है. मेरे अंदर अब कुछ भी नहीं बचा है कि मैं अब किसी दूसरे पुरुष से शादी भी कर सकूं. मैं टूट गई हूं. बस अब तो मेरी एक ही ख्वाहिश है कि किसी भी तरह वह बेवफा मु झे मिल जाए और मैं उस से बदला ले सकूं. हालांकि मैं जानती हूं उस से बदला लेने के बाद मेरे मन में रिक्तता भर जाएगी. जीने की इच्छा खत्म हो जाएगी, लेकिन इस सब के बावजूद मैं उसे खोज रही हूं, कई शहर भटक रही हूं. बस एक ही ख्वाहिश लिए कि वह एक बार मिल जाए कहीं भी.’’

मैं परेशान हो गई. अभी भी इस की बातों में, इस के जेहन में सिर्फ वही लड़का है. इन्हीं वाहियात बातों के कारण मैं ने इस से दूरी बना ली थी. पर आज… आज की अप्रत्याशित मुलाकात के बाद भी इस के पास बात करने के लिए सिर्फ एक ही व्यक्ति था.

मैं ने कहा, ‘‘कृति भूल जाओ उस शख्स को, जिस ने तुम्हें इतना दर्द दिया है. उसे तुम्हारी कद्र नहीं है. तुम क्यों उस के पीछे अपना जीवन बरबाद कर रही हो. आगे बढ़ो… तुम्हें उस से कहीं अच्छा और ज्यादा प्यार करने वाला लड़का मिल जाएगा.’’

उस ने मु झे अजीब नजरों से देखा फिर धीरे से कहा, ‘‘क्या तुम आबाद हो?’’

यह एक विचित्र प्रश्न था मेरे लिए. मेरे मन में उथलपुथल होने लगी. क्या मैं आबाद हूं?

मेरी पलकें बादल बन गईं और आंखें समुद्र… पानी अंदर ही अंदर पीने की नाकाम कोशिश करने लगी कि क्या हम औरतों के हिस्से यही लिखा है. बारबार चोट खाने के बाद हम अपने ही वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं. कई बार तो यह नाकाम कोशिश हमें पीड़ा दे जाती है. क्या हमारा मन बारबार नहीं रूठता? मगर फिर खुदबखुद मान भी जाता है क्योंकि वह जानता है कि हमें मनाने वाला कोई नहीं है.

मेरी आंखों में पानी देख कल्पना का हाथ मेरे हाथ में आ गया. एक अनकही आत्मीयता का फूल हमारे मन में खिल गया. एक नजर उस ने मु झे देखा और फिर कहा, ‘‘कह दो कल्पना अपने अंदर का सारा दर्द… शायद तुम्हारा दर्द कुछ हलका हो जाए,’’ उस की बड़ीबड़ी आंखों में ममता उतर आई.

‘‘मैं क्या बताऊं कृति, मेरी जिंदगी रेगिस्तान है, जिस में कोई फूल नहीं खिल सकता. पोस्ट ग्रैजुएशन करते ही मेरी शादी हो गई. कई ख्वाबों को ले कर मैं सुसराल आ गई. सुहागरात के दिन करीब 12 बजे मेरे पति शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए आए.

‘‘मेरी कल्पनाओं के ख्वाब मन के खुले आसमान में उमंगें भर रहे थे. पर मेरी कल्पनाओं के विपरीत आते ही मेरी साड़ी उतार दी… न प्यार न मनुहार. मैं शर्म से सिकुड़ गई. उस की हंसी कमरे के चारों तरफ गूंज गई. मैं ने धीरे से कहा कि व्हाट इज दिस.

मगर जैसे उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया. मैं रो पड़ी. उस के चुंबन से मेरा दम घुटने लगा. मन गुस्से से भर गया. दिल में यही खयाल आया कि यह इंसान नहीं जानवर है. मैं बर्फ सी ठंडी पड़ गई.

कुछ मिनटों के बाद वह शांत सो गया पर मैं रातभर जागती रही. शरीर और मन दर्द से तड़पता रहा. कृति मैं बलात्कार की शिकार हो गई थी. इस से बचने का कोई उपाय हमारे समाज के पास नहीं है. मेरा पति अब हर रात मेरा बलात्कार करता है और मैं कुछ नहीं कर सकती. कुछ न कर सकने की पीड़ा मेरे अंदर आग जलाती रहती है. घर है राजमहल जैसा. सारी सुखसुविधाएं… पर मु झे इन सुखसुविधाओं से कोई मतलब नहीं. मैं एक भटकती आत्मा की तरह दिनभर भटकती रहती हूं. मेरे सपने तिरोहित हो गए कल्पना. पढ़लिख कर अनपढ़से भी बदतर जिंदगी… अकेलापन काटने के लिए कई नुसखे आजमाए… पर कुंठा और हताशा मेरे अंदर निराशा भरती गई. मेरा दर्द आंसुओं के रूप में बहने लगा. मैं एक लंबी सांस ले कर चुप हो गई.’’

‘‘ओह, कल्पना तुम कितना सहन करती हो… मु झ से कहीं ज्यादा. शायद सारे मर्द कमीने होते हैं. जहां भी मर्द को मौका मिला औरत के शरीर को नापने लगता है. कभी हाथों से तो कभी आंखों से. इसीलिए मु झे सख्त नफरत है मर्द जात से.’’

अभी कृति कुछ और कहना चाह रही थी कि गाड़ी की आवाज से मैं कांप गई. पति की गाड़ी का हौर्न मेरे दिलोदिमाग पर छाया रहता है. मैं ने हलके से कृति का हाथ दबा दिया. स्पर्श की अपनी भाषा होती है. शायद कृति सम झ गई और गाड़ी की दिशा में देखने लगी.

जय को देखते ही अचानक उस की सांसें तेज हो गईं और वह जोर से चिल्ला पड़ी,

‘‘यही तो है वह बेवफा, जिस ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. तुम्हारी शादी इस से हुई है? तभी तो यह जानवर है… नहींनहीं यह जानवर नहीं यह तो राक्षस है राक्षस… औरतों के शरीर से खेलने की आदत हो गई है इसे. मैं इसी को तो कोस रही थी. मेरा आज कुदरत पर से विश्वास उठ गया… तुम्हारी जैसी लड़की को यह हैवान मिला.’’

अचानक जय ने मेरा हाथ पकड़ खींचते हुए गाड़ी में बैठा दिए. गाड़ी चल दी. मैं अंदर से खोखली हो गई थी. अब मु झे अपनी इस दोस्त से ईर्ष्या होने लगी… कम से कम उस के पास याद करने के लिए बेवफाई का अनुभव तो है पर मेरे पास क्या है?

एक दलदल जिस में मैं धंसती जा रही थी, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. मेरा मन कहीं और था पर मेरा शरीर एक और शरीर के साथ चले जा रहा था उसी विशाल मकान में जहां मैं रोज रात अपने ही शरीर का शोर सुनती हूं.

Bollywood : कलाकारों का सारा ध्यान अभिनय के बजाय प्रौपर्टी खरीदनेबेचने पर

Bollywood : पहले कलाकार अभिनय को सिर्फ कला से जोड़ कर देखते थे इसलिए उन्हें प्रौपर्टी जोड़ने या अत्यधिक पैसों का लोभ नहीं था. बदलते समय की फिल्मों में कौर्पोरेट के दखल और कलाकारों की पैसा कूटने की भूख ने कला को दोयम बना दिया.

50, 60 और 70 के दशकों में सब से अमीर अभिनेता कौन था? शायद आप दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन समेत कई अभिनेताओं के नाम गिना देंगे. लेकिन सच यह नहीं है. सच यह है कि इन तीनों दशकों में सर्वाधिक अमीर कलाकार कौमेडियन भगवान दादा थे. उन्होंने यह धन फिल्मों में अभिनय व फिल्म निर्माण से कमाया था. उन के पास बहुत पैसा था. लेकिन, समय ने उन्हें ऐसा धोखा दिया कि जिंदगी के आखिरी दिन उन्हें मुंबई की एक चाल में किराए पर गुजरबसर करने पड़े.

सब से अहम बात यह है कि भगवान दादा पहले मुंबई की एक कपड़ा मिल में मजदूरी करते थे. 8 साल तक नौकरी करने के बाद 1938 में भगवान दादा ने फिल्मों से जुड़ते हुए अपनी पहली फिल्म ‘बहादुर किसान’ का सहनिर्देशन किया.

1940 के दशक में भगवान दादा को कम बजट वाली फिल्मों की सफलताओं से प्रसिद्धि हासिल हुई, जिस ने उन्हें छोटे शहरों में लोकप्रिय बना दिया. 1942 में भगवान दादा जागृति प्रोडक्शंस के साथसाथ निर्माता भी बन गए. 1951 में राज कपूर ने उन के साथ एक सामाजिक फिल्म ‘अलबेला’ बनाई, जो उस साल की सब से बड़ी हिट फिल्मों में से एक थी. इस फिल्म का गाना ‘शोला जो भड़के…’ आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं. इस के बाद भगवान दादा ने ‘झमेला’ (1953) और ‘भागमभाग’ (1956) जैसी ब्लौकबस्टर फिल्में बनाईं.

50 के दशक में उन्होंने अपने रहने के लिए जुहू में सागर किनारे 25 कमरों वाला बंगला खरीदा. उन के पास 7 लग्जरी कारों का काफिला भी था. वे हर दिन शूटिंग के लिए अलग कार में जाया करते थे. उस जमाने में भगवान दादा भारत के सब से अमीर और सब से अधिक पारिश्रमिक पाने वाले कलाकारों में से एक थे. वे सिर्फ दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद जैसे सुपरस्टार से पीछे थे पर इस बंगले के बाद उन्होंने कभी कोई संपत्ति नहीं खरीदी.

एक बार राज कपूर ने उन्हें सलाह दी थी कि उन्हें चाहिए कि वे हर फिल्म की सफलता के बाद कोई न कोई प्रौपर्टी खरीद लिया करें, तब भगवान दादा ने मुसकराते हुए कहा था, ‘‘मैं ठहरा संतोषी जीव. मेरा काम अच्छा चल रहा है. मुझे रहने के लिए बंगला चाहिए था, वह मेरे पास है. शौक के लिए कार चाहिए तो 7 कारें हैं. अब इस से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. फिर बुरे वक्त में मेरे साथ इस इंडस्ट्री का हर शख्स रहेगा.’’

लेकिन कहते हैं कि जो बुलंदी पर है वह कब जमीं पर आ जाए, कहा नहीं जा सकता और यहां लोग सिर्फ चढ़ते सूरज के साथ होते हैं, ढलते सूरज के साथ नहीं पर विनम्र स्वभाव के सीधेसादे भगवान दादा गिरगिट की तरह रंग बदलती इंसानी प्रवृत्ति से शायद वाकिफ नहीं थे. 1960 के बाद भगवान दादा चरित्र भूमिकाएं निभाते हुए शोहरत बटोरते रहे.

1970 के बाद धीरेधीरे उन्हें फिल्में मिलनी कम हो गईं पर उन के शौक कम नहीं हुए. उन को यकीन था कि आज नहीं तो कल, लोग उन्हें बुला कर काम देंगे. इसी आस में उन्होंने अपना बंगला व कारें बेच डालीं.

इधर भगवान दादा का बंगला व कारें बिक रही थीं तो दूसरी तरफ फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग उन से दूरी बढ़ा रहे थे. एक वक्त वह आया जब भगवान दादा मुंबई के दादर इलाके की एक चाल में रहने लगे. तब उन से मिलने संगीतकार सी रामचंद्र, गीतकार राजेंद्र कृष्ण और अभिनेता अशोक कुमार के अलावा कोई नहीं जाता था. उन की आर्थिक हालत दिनोंदिन बदतर होती गई. आखिरकार, 4 फरवरी, 2002 को 89 वर्ष की उम्र में भगवान दादा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

सिर्फ भगवान दादा ही नहीं, 70 के दशक तक के किसी भी कलाकार ने धन जमा कर के रखने या संपत्ति खरीद कर जखीरा बनाने की तरफ ध्यान नहीं दिया. उस वक्त के कलाकार व फिल्मकार तो कलाप्रेमी थे. उन के अंदर धन की बेहिसाब लालसा नहीं थी. उस वक्त के कलाकार फिल्मों में अच्छा किरदार निभाने या अच्छे कंटैंट पर बेहतरीन फिल्म बनाने से ले कर एकदूसरे के सुखदुख में अपनेपन के भाव के साथ उपस्थित रहने पर ही सारा ध्यान देते थे. लेकिन 1980 के बाद कलाकारों की जो नई जमात आनी शुरू हुई, उस में काफी बदलाव नजर आ रहा था. कला को ले कर इन के दृष्टिकोण में बदलाव नजर आने लगा था. यह पीढ़ी कला के साथ धन कमाने पर भी जोर देने लगी थी पर ये सभी कला की सेवा करना चाहते थे और दाल में नमक या यों कहें कि आटे में नमक की तर्ज पर धन के बारे में सोचने लगे थे. यह सोच गलत नहीं थी क्योंकि हम सभी जानते हैं कि यदि भोजन में नमक न हो तो भोजन में स्वाद नहीं आता.

कौर्पोरेट कल्चर हुआ हावी

2001 में जी स्टूडियो निर्मित फिल्म ‘गदर : एक प्रेम कथा’ के साथ ही फिल्म इंडस्ट्री में अचानक कौर्पोरेट कल्चर इस कदर हावी हुआ कि बौलीवुड की दिशा व दशा बदलने के साथ ही कलाकार व फिल्मकार की सोच में इस कदर परिवर्तन हुआ कि ये सभी ‘कला’ के बजाय ‘धन’ और ‘आटे में नमक’ के बजाय ‘नमक में आटा’ मिलाने लगे.

वास्तव में कौर्पोरेट कंपनियों ने कदम रखते हुए ‘कला’ के बजाय पैसे से पैसा कमाने की सोच के साथ जिस कलाकार की उस की अभिनय क्षमता के बल पर 10 रुपया कीमत थी, उसे इन कौर्पोरेट कंपनियों ने 200 रुपए थमा कर एकसाथ कई फिल्मों का अनुबंध कर लिया. उन दिनों खबरें बहुत तेजी से वायरल हुई थीं कि रिलायंस एंटरटेनमैंट ने अमिताभ बच्चन को 1,500 करोड़ रुपए में साइन किया. एक अन्य कौर्पोरेट कंपनी ने अक्षय कुमार को एक फिल्म के लिए 150 करोड़ रुपए में साइन किया, जबकि उन दिनों अक्षय कुमार को निजी फिल्म निर्माता 2 करोड़ रुपए देने में भी हिचकिचा रहे थे.

इसी तरह एक कंपनी ने सनी देओल को 2 हजार करोड़ रुपए में साइन किया था. सनी देआल ने उस के साथ केवल एक फिल्म की और उस फिल्म को रिलीज करने में उसे नाकों चने चबवा दिए. 2001 से 2010 के बीच में करीबन 30 कौर्पोरेट कंपनियां मैदान में आ गई थीं और इसी तरह से कलाकारों के बीच धन बांट रही थीं. उन्हीं दिनों एक मराठी के सुपरस्टार ने हम से कहा था, ‘‘बौलीवुड में यह जो हो रहा है, इस के चलते सिनेमा बरबाद हो जाएगा.

मराठी सिनेमा से जुड़े कलाकारों को भी पारिश्रमिक राशि अधिक मिलने लगी है, मगर जिन्हें पहले 10 रुपए मिलते थे, उन्हें अब 15 रुपए से 20 रुपए मिल रहे हैं. हिंदी की तरह 10 रुपए की जगह 200 से 300 रुपए नहीं मिल रहे.’’

इतना ही नहीं, 2013 में मशहूर फिल्म निर्देशक राजकुमार संतोषी ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि, ‘ये जो हालात हैं उन्हें देखते हुए कह सकता हूं कि बहुत जल्द वह दिन आएगा जब हर कलाकार टिकट ले कर घरघर जाएगा और लोगों को टिकट देते हुए कहेगा कि मेरी फिल्म जा कर देख लीजिए.’

2013 में राजकुमार संतोषी ने यह जो इशारा किया था, उस की तरफ बौलीवुड बढ़ता नजर आने लगा था. 2015 की शुरुआत से हूबहू वही हो रहा है. फिल्म ‘फतेह’ से ले कर ‘स्काई फोर्स’ के कलाकारों व निर्माताओं ने लगभग घरघर जा कर मुफ्त में टिकटें दीं, मगर दर्शक फिर भी फिल्म देखने सिनेमाघर नहीं गए.

संपत्ति बनाने पर ध्यान

एक तरफ कौर्पोरेट या यों कहें कि फिल्म स्टूडियो सिनेमा बनाने के लिए अपने अंदाज में पैसा बांटते हुए अपनी फिल्मों में सुपरस्टार होने का विज्ञापन कर शेयर बाजार में अपने शेयर के दाम बढ़ा कर आम भोलीभाली जनता को लूटते रहे तो वहीं कौर्पोरेट कल्चर में पलबढ़ रहे फिल्म निर्देशक व कलाकारों ने भगवान दादा की हालत से सबक सीखने के नाम पर प्रतिभा की अपेक्षा कहीं ज्यादा अनापशनाप मिल रहे पैसे से मुंबई व मुंबई के बाहर संपत्ति खरीदना शुरू कर दिया. इस का परिणाम यह हुआ कि कलाकार हो या फिल्म निर्देशक, हर किसी की नजर इस बात पर टिक गई कि कहां से कितना पैसा मिलेगा तो कौन सी प्रौपर्टी खरीद सकेंगे. धीरेधीरे इन का ‘कला’ या ‘किरदार’ या ‘कहानी’ से कोई सरोकार ही नहीं रह गया.

2001 के बाद कुकुरमुत्ते की भांति उभरी ये कौर्पोरेट कंपनियां फिल्म बनाने की आड़ में क्याक्या कर रही थीं या कर रही हैं, इस को ले कर कुछ ठोस कहना मुश्किल है. मगर एक उदाहरण बताना सटीक रहेगा. एक कौर्पोरेट कंपनी बहुत तेजी से उभरी थी. उस के 10 रुपए के शेयर के दाम अचानक 90 रुपए पर पहुंच गए थे. इस कौर्पोरेट कंपनी के चमचे लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे थे कि इस कंपनी के शेयर के दाम बहुत जल्द 1,500 रुपए का आंकड़ा पार कर लेंगे.

उस वक्त यह बात लोगों को सही लग रही थी क्योंकि यह कंपनी सुनील शेट्टी, परेश रावल सहित कई दिग्गज कलाकारों को ले कर फिल्में बना रही थी पर कुछ समय बाद पता चला कि यह कंपनी तेल व डीजल की कालाबाजारी में लिप्त थी और इस के सभी डायरैक्टर जेल की सलाखों के पीछे चले गए थे. जिन आम लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई को अच्छा लाभ कमाने के लिए इस कंपनी के शेयर खरीदे थे, वे सब कंगाल हो गए. लेकिन फिल्म निर्देशकों या कलाकारों की सेहत पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इन्हें तो पैसे मिल चुके थे और इन्होंने उस धन को संपत्ति खरीदने में लगा दिया था तो ये सभी चैन की नींद सोते रहे. अब तो इन्हें उन फिल्मों की शूटिंग भी नहीं करनी थी जिन के लिए उस कौर्पोरेट ने उन्हें पैसे दे दिए थे.

अब उस कंपनी के डायरैक्टर कब जेल से बाहर आए या अभी तक नहीं आए, पता नहीं चला पर उस के बाद इस कौर्पोरेट कंपनी का कहीं कोई नामोनिशान नजर नहीं आया. अब तक ‘ईरोज’ सहित करीबन 20 से अधिक कौर्पोरेट कंपनियां गायब हो चुकी हैं. उन के गायब होने से किसी कलाकार या फिल्म निर्देशक को अपनी संपत्ति बेच कर धन वापस करने की जरूरत भी नहीं पड़ी, मगर आम इंसान जिस ने शेयर में अपनी गाढ़ी कमाई लगाई थी वह जरूर रो रहा है.

अभिनय का बेड़ा गर्क

इस सारे खेल के बीच हम आएदिन सुनते रहते हैं कि फलां कलाकार ने फलां प्रौपर्टी खरीद ली. मजेदार बात यह है कि एक फिल्म रिलीज होती है, बौक्स औफिस पर फिल्म लागत का 10 प्रतिशत भी वसूल नहीं कर पाती यानी कि पूरा नुकसान हो जाता है मगर कलाकार द्वारा नई संपत्ति खरीदने की खबरें आ जाती हैं.

सब से ताजातरीन उदहारण वरुण धवन का लीजिए. उस की फिल्म ‘बेबी जौन’ रिलीज हुई. फिल्म ने बौक्स औफिस पर पानी तक नहीं मांगा पर 3 दिनों बाद ही वरुण धवन ने लगभग 50 करोड़ रुपए में एक नई संपत्ति खरीद ली. आखिर ऐसा कैसे संभव है? फिल्म से जो नुकसान हुआ वह कौन भरता है. यह तो वही जनता भरती है जिस ने फिल्म निर्माण से जुड़ी कौर्पोरेट कंपनी के शेयर में पैसा इन्वैस्ट कर रखा है या कर रही है. यह ऐसा लंबा व जटिल विषय है जिस पर आप जितनी बात करेंगे या सोचेंगे, उतना ही जलेबी की तरह घूमते रह जाएंगे.

बहराहल, आइए अब हम यह जान लें कि इन दिनों किस कलाकार के पास कितनी प्रौपर्टी है या कोविड के बाद किस ने कौन सी प्रौपर्टी बेची या खरीदी. कलाकार की फिल्मों से तो आप सभी खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि आखिर कलाकार क्यों फिल्मों में अपनी अभिनय प्रतिभा का कमाल नहीं दिखा रहे हैं.

धनकुबेर बने कलाकार

इस फेहरिस्त में अमिताभ बच्चन का सब से पहला नाम आता है. अमिताभ बच्चन ने मुंबई के ओशिवाड़ा इलाके के अपने डुपलैक्स फ्लैट को 83 करोड़ रुपए में बेच दिया. इस समय उन के पास देशविदेश में अरबों रुपए की प्रौपर्टी है. उन्होंने अपने बेटे अभिषेक बच्चन के साथ मिल कर भी कई प्रौपर्टी खरीदी हैं. ऐसे में बिग बी इन प्रौपर्टीज को बेच कर और किराए पर दे कर मोटी कमाई कर रहे हैं.

फिलहाल अमिताभ बच्चन अभी मुंबई में जुहू ‘जलसा’ बंगले में रहते हैं. 10,125 वर्गफुट में फैले इस बंगले की कीमत करीब 120 करोड़ रुपए बताई जाती है.

ऐसे ही अक्षय कुमार ने भी रियल एस्टेट में सब से ज्यादा इन्वैस्ट कर रखा है. भारत में मुंबई से ले कर गोवा तक में अक्षय कुमार के कई घर हैं तो वहीं उन की प्रौपर्टी कनाडा, मौरिशस, इंग्लैंड व दुबई में भी है.

बात यदि नवाब की पदवी धारण करने वाले अभिनेता सैफ अली खान की हो तो उन के पास भी तमाम प्रौपर्टीज हैं. 150 मिलियन डौलर (1200 करोड़ रुपए से अधिक) की अनुमानित कुल संपत्ति के साथ सैफ अली खान की संपत्ति उन के फिल्मी कैरियर से कहीं अधिक है, जो उन के रियल एस्टेट संपत्तियों के प्रभावशाली संग्रह से पता चलता है.

नएनए जमे कार्तिक आर्यन भी इस रेस का हिस्सा बन गए हैं. उन के पास मुंबई में करोड़ों के अर्पाटमैंट्स हैं. एक वैबसाइट के अनुसार, मिथुन चक्रवर्ती की नैटवर्थ 101 करोड़ रुपए है. जबकि उन की दर्जनों फिल्में फ्लौप रही हैं. ऐसे ही अभिनेता मनोज बाजपेयी वर्सोवा इलाके में आलीशान अपार्टमैंट में रहते हैं जिस की कीमत 40 करोड़ बताई जाती है. उन के पास बिहार में कई प्रौपर्टीज हैं तो वहीं कुछ जमीन उत्तराखंड में भी है.

बौलीवुड में फ्लौप होने के बावजूद वरुण धवन ने कई प्रौपर्टीज जमा कर ली हैं. वरुण धवन और उन की पत्नी नताशा ने ‘बेबी जौन’ के असफल होने के 2 दिनों बाद ही जुहू में ट्वेंटी बाय डी डेकोर प्रोजैक्ट की 7वीं मंजिल पर साढ़े 44 करोड़ रुपए का फ्लैट खरीदा है. सौदे के पंजीकरण के लिए धवन ने 2.67 करोड़ रुपए की स्टांप ड्यूटी का भुगतान किया है. यह अपार्टमैंट 5,112 वर्गफुट का है और इस में 4 कार पार्किंग स्थान हैं तो वहीं वरुण और उन की मां करुणा ने भी इसी बिल्डिंग के 6ठे फ्लोर पर एक अपार्टमैंट खरीदा है. अपार्टमैंट 4,617 वर्गफुट का है और इस में 4 कार पार्किंग स्थान हैं. वरुण के पास कार्टर रोड पर सागर दर्शन बिल्डिंग में एक अपार्टमैंट है.

अजय देवगन के पास प्राइवेट जेट, कई कारों के अलावा मुंबई व गोवा में प्रौपर्टीज हैं. मुंबई में अजय देवगन के 2 घर हैं. एक जुहू में फ्लैट है और दूसरा मालगाड़ी रोड पर बंगला है. गोवा में अजय देवगन और काजोल के पास एक आलीशान विला है. मुंबई के अंधेरी पश्चिम में अजय देवगन के पास 5 औफिस स्पेस हैं.

सलमान खान ने मुंबई में बांद्रा इलाके के गैलेक्सी अपार्टमैंट से ले कर दुबई में एक शानदार घर तक, कई भव्य संपत्तियों में निवेश किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन की अपार लोकप्रियता और आकर्षक कैरियर ने उन की कुल संपत्ति 2,900 करोड़ रुपए तक पहुंचा दी है.

मिस्टर परफैक्शनिस्ट के नाम से मशहूर आमिर खान के पास टाइम्स औफ इंडिया के अनुसार, अनुमानित कुल संपत्ति 1,862 करोड़ रुपए है.

सलमान खान या आमिर खान की ही तरह लगभग हर कलाकार ने संपत्तियां खरीद रखी हैं तो वहीं वे अभिनय के अलावा कई तरह के व्यवसायों से भी जुड़े हुए हैं. इसी वजह से वे अभिनय पर कम ध्यान दे रहे हैं.

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