केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के 2019 के बजट पर भाजपा चाहे जितना शोर मचा ले, वोटकैचर नहीं है. देश की जो हालत है उस में इस बजट से कुछ सुधार होगा, यह नहीं दिखता. सरकार ने अपने घाटे के बजट को बनाए रख कर छोटीमोटी कुछ छूटें दी हैं जो अगले

2-3 महीनों में  सरकार का खर्च बढ़ाएंगी जबकि जनता की जेब में कुछ ज्यादा नहीं डालेंगी. हां, यह भ्रम रहेगा कि जनता की जेब काटी नहीं जाएगी.

सरकार के पास अब जेब काटने की गुजांइश भी नहीं. नोटबंदी कर के सरकार कालाधन पहले ही निकाल चुकी है- कम से कम नोटबंदी के समय यही कहा गया था-और अब टैक्स लगाने की कहीं गुजांइश नहीं है. टैक्स तो कालेधन को बटोरने के लिए ही लगाया जाता था न.

उधर, जीएसटी से सरकार ने पहले ही हर चीज को टैक्स के दायरे में ला दिया है. जीएसटी का कानून ही ऐसा है कि हर व्यापारी चोर समझा जाता है और चोरों को जब जीएसटी से पकड़ा जा चुका हो तो उन से और क्या वसूला जा सकता है? व्यापारी वर्ग, जो अब भी हिंदूहिंदू के नारे लगा रहा है, भूल रहा है कि हिंदूहिंदू के नारे के पीछे चंदाटैक्स चंदाटैक्स का नारा छिपा है जो जीएसटी के माध्यम से सरकार के हाथों में जा रहा है.

आयकर के दायरे में आने की सीमा बढ़ाना तो महज औपचारिकता है. उस से सरकार का काम घटेगा और जो थोड़ाबहुत राजस्व का नुकसान होगा वह रिटर्नों के साथ सिर न खपाने से बच जाएगा.

हर सरकार हर बजट में लोगों या व्यापारियों के दबाव में कुछ बदलाव करती है. अब की बार किसान भी इस में जोड़ लिए गए हैं. जो थोड़ा परिवर्तन किया गया है वह उसी दबाव के कारण है. इस में सरकार की दूरदर्शिता या आर्थिक विकास का दर्शन नहीं है. मीडिया में इस बजट की तारीफ हो रही है तो सिर्फ इसलिए कि इस में जेबकटौती नहीं है. जब जेब पहले ही खाली है, तो काट कर क्या करेंगे?

बजट कहीं से भी देश को दूरगामी रास्ते पर ले जाने वाला नहीं है. उलटे, गौशालाओं के लिए पैसे देना यह पक्का करता है कि सरकार तो अभी भी संतोंमहंतों को पैसा देने में जुटी है और जनता की मेहनत का पैसा व्यर्थ के तीर्थों व मूर्ति स्थलों पर खर्च किया जाता रहेगा. यह भाजपाई चुनावी बजट नहीं है, यह सरकारी बजट है जो हर सरकार पेश करती है, पार्टी चाहे कोई भी हो.

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