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पत्रकार का स्कूटर

थानेदार साहब किसी सस्ते जासूसी उपन्यास पढ़ने में खोए हुए थे. उन्होंने अपनी कुरसी की पीठ झुका कर पीछे की गंदी दीवार से सटा रखी थी और उन के पैर सामने पड़ी कमजोर मेज पर बिखरी हुई गंदी फाइलों पर रखे थे. कहानी के उतारचढ़ाव के साथसाथ मेज भी आगेपीछे झूलती जाती थी.

छत का पंखा आहिस्ताआहिस्ता घूम रहा था, इस पर भी कड़ी घुटन और गरमी महसूस हो रही थी. शायद कहानी में वह प्रसंग आ रहा था जब हीरो अपनी सहायिका को, जो एक सुंदरी थी, बांहों  में बांध कर यह बताता है कि किस तरह उस ने अकेले निहत्थे ही विदेशी जासूसों के दल का पता लगा कर उस का सफाया कर दिया.

तभी बाहर के कमरे में फोन की घंटी बज उठी. किसी ने फोन उठाया. थानेदार साहब का फोन था. उन्हें एक्सटेंशन दिया गया. पंजाबी में एक भद्दी सी गाली देते हुए उन्होंने किताब मेज पर दे मारी और चोंगे में जोर से ‘हां’ कहा.

‘‘मैं एस.पी. बोल रहा हूं,’’ दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘कितनी बार तुम से कहा कि फोन पर धीरे बोला करो, लेकिन तुम पर असर ही नहीं होता.’’

‘‘सर…जनाब,’’ वह तेजी से उठे और एडि़यां बजाते हुए तन कर सलाम किया, ‘‘साहब, हम लोगों को फोन पर इतना परेशान किया जाता है कि…’’

‘‘चुप रहो और मेरी बात सुनो. तुम्हारे यहां से एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया था. आज शाम तक वह मिल जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन, साहब,’’ थानेदार साहब ने कहना चाहा, ‘‘पहले ही 10 स्कूटरों और मोटर साइकिलों के केस पड़े हैं और…’’

‘‘बकवास मत करो. उन 10 की कोई जल्दी नहीं है. यह पत्रकार का स्कूटर है, फौरन मिलना चाहिए. जल्दी करो!’’ एस.पी. ने फोन रख दिया था.

थानेदार साहब ने गुस्से से चोंगे की तरफ देखा, फिर मेज पर पड़ी किताब की तरफ और फिर जोर से चोंगा पटक दिया.

‘‘मुंशीजी,’’ वह दहाड़े.

बांहों पर 3 पट्टी वाले 6 फुटे मुंशीजी ने फौरन अंदर आ कर सलाम किया.

‘‘क्या किया तुम ने?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘क्या किया, हुजूर?’’

‘‘धत्तेरे की,’’ थानेदार साहब गरजे, ‘‘तुम दूसरे फोन पर सब बात सुन रहे थे. है न?’’

मुंशीजी ने स्वीकार किया.

‘‘फिर क्या किया तुम ने…’’ रुक कर उन्होंने सांस खींची, ‘‘क्या किया उस पत्रकार का स्कूटर शाम तक ढूंढ़ने के लिए?’’

मुंशीजी कोई जवाब दें, इस के पहले ही फोन की घंटी बजी और थानेदार साहब ने चोंगा उठाया.

‘‘जनाब सर,’’ जितना हो सकता था उतनी नम्रता से

वह बोले.

‘‘मैं सेतुरामन हूं, श्रीमान! मैं सरकारी इंजीनियर हूं और पी.वाई.जेड. कारखाने में काम करता हूं. मैं यह जानना चाहता था कि मेरे चोरी गए स्कूटर के संबंध में आप ने क्या काररवाई की है. शायद आप को याद हो, मैं ने 3 महीने पहले रिपोर्ट लिखाई थी.’’

‘‘मिस्टर सेतुरामन,’’ थानेदार ने कुढ़ कर कहा, ‘‘सरकारी नौकर होने का यह मतलब नहीं है कि आप पुलिस वालों पर हुक्म चलाएं. आप का स्कूटर ढूंढ़ने के अलावा हमारे पास और भी काम है. कुछ पता चला तो हम लोग आप को बताएंगे ही. आप बेकार हमारा वक्त क्यों बरबाद करते हैं?’’ अंतिम वाक्य उन्होंने बड़ी जोरदार आवाज में कहा.

‘‘हां, तो…’’ वह फिर मुंशीजी की तरफ मुड़े. तभी फोन की घंटी फिर बजी.

‘‘क्या है?’’ वह चिल्ला कर बोले.

‘‘मैं आई.जी. बोल रहा हूं. गधे, तुम यह कब सीखोगे कि हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं और बदतमीजी से बोलना हमें शोभा नहीं देता, खासतौर से फोन पर.’’

थानेदार साहब ने एडि़यां बजाईं और तन कर सलाम किया, ‘‘सर, जनाब…’’ वह कुछ कहना चाहते थे मगर बात बीच में ही काट दी गई.

‘‘सुनो, एक पत्रकार का स्कूटर तुम्हारी तरफ से उठ गया है और…’’

‘‘एस.पी. साहब ने मुझे बताया था, हुजूर और…’’

‘‘गोली मारो उन को, मेरी बात सुनो. तुम्हारे इलाके से एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया है और ब्लिंक अखबार ने तूफान खड़ा कर रखा है. उन्होंने इस बात को ले कर संपादकीय में भी लिखा है, जैसे देश में और कोई समस्या है ही नहीं. जो भी हो, मैं चाहता हूं कि दोपहर को खाने की छुट्टी के पहले ही तुम स्कूटर ढूंढ़ निकालो. मिलते ही सीधे मुझे फोन करो. समझे!’’

थानेदार साहब ने फोन की तरफ गुस्से से देखा फिर मुंशीजी की तरफ मुड़े.

‘‘तुम मेरी तरफ मरियल कुत्ते की तरह क्या घूर रहे हो?’’ वह जैसे फट पड़े, ‘‘जाओ, और जा कर कुछ करो.’’

‘‘लेकिन क्या किया जाए, हुजूर?’’

थानेदार साहब ने कुछ तेज बातें करने के लिए सांस भरी, लेकिन न जाने क्या सोच कर धीरे से छोड़ दी.

‘‘समझने की कोशिश करो, मुंशीजी, मैं तो मुसीबत में पड़ गया हूं. तुम्हारी और इस थाने की भी मुसीबत है. बस, एस.पी. भर की बात होती तो तरफदारी की बात के बहाने अपनी जान बचाई जा सकती थी. लेकिन आई.जी. के आगे…ना बाबा ना, सोचो, कुछ तो सोचो.’’

और आखिर मुंशीजी ने एक बढि़या तरकीब सोच ही निकाली, ‘‘हम लोग उस पत्रकार से लापरवाही से स्कूटर रखने के लिए जवाब तलब क्यों न करें?’’

थानेदार साहब का बस चलता तो वह मुंशीजी को कच्चा ही चबा जाते. लेकिन वह इतना ही कह कर रह गए, ‘‘तुम बुद्धू हो.’’

अचानक उन के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई. उन्होंने पूछा, ‘‘हमारे इलाके में कितने मोटर मिस्त्री हैं? खासतौर से उन के नाम बोलो, जो हमारे इस नंबरी रजिस्टर में दर्ज हैं.’’

मुंशीजी ने मूंछों पर हाथ फेरतेफेरते 2 बार खंखार कर गला साफ किया, जमीन की तरफ देखा और फिर छत की तरफ, थोड़ा सा हिलतेडुलते हुए बोले, ‘‘जी, कांस्टेबल भीमसिंह को पता होगा.’’

‘‘कहां है, वह?’’

‘‘वह अपनी बीवी को लेने स्टेशन गया है. उस के पहला बच्चा लड़का हुआ था. आज वह आ रही है.’’

‘‘मुबारक हो,’’ थानेदार साहब ने तानाकशी के साथ कहा, ‘‘और यहां मुजरिम को थाने में कौन लाएगा? तुम ही लाओगे? जाओ, जो कर सको, करो, नहीं तो आई.जी. साहब से कह दो और भुगतो,’’ फोन की तरफ इशारा करते हुए थानेदार साहब ने अपना अधूरा पढ़ा उपन्यास उठा लिया.

मुंशीजी थोड़ी देर तो खड़े रहे फिर बोले, ‘‘हुजूर…हुजूर, मुझे याद आया, भीमसिंह एक बार एक मिस्त्री के बारे में कह रहा था कि उस का नाम रिकार्ड में है रसिया…रसिया नाम है उस का.’’

निगाह उठा कर थानेदार साहब मुसकराए, ‘‘तो मुंशीजी, इंतजार किस बात का है? उसे पूछताछ के लिए बुलाओ.’’

थोड़ी ही देर में मुंशीजी थानेदार साहब के कमरे में वापस आ गए. उन के पीछे ही पीछे ग्रीस लगे हाथ पाजामे से पोंछता हुआ रसिया आया. अधजली बीडि़यां उस के दोनों कानों पर रखी उस की शोभा बढ़ा रही थीं.

मुंशीजी ने तन कर सलाम किया. जवाब में थानेदार साहब ने जैसे सिर से कोई मक्खी उड़ाई, लेकिन किताब में मशगूल रहे. पीछे जो कुछ हो, लेकिन कम से कम दूसरों के सामने पुलिस वाली औपचारिकता खूब निभाते हैं. मुंशीजी आराम से खड़े हो गए और रसिया भी खड़ा इधरउधर देखता रहा और अपने बालों पर हाथ फेरता रहा.

10 मिनट बाद किताब पढ़ चुकने पर थानेदार साहब ने रसिया की तरफ देखा और बोले, ‘‘पधारिए, रसियाजी, बैठिए, बैठिए. वाह मुंशीजी, आप ने इस बेचारे को बैठाया क्यों नहीं?’’

अपने सारे गंदे दांत निपोरते हुए रसिया कमरे में एक ओर पड़ी बैंच पर बैठ गया और उस का हाथ कान पर लगी बीड़ी पर चला गया. थानेदार साहब ने उसे बीड़ी जला लेने दी. फिर बोले, ‘‘यहां बीड़ी पीना मना है.’’ खिसियाते हुए उस ने बीड़ी बुझा दी और फिर कान पर ही रख ली.

थानेदार साहब ने मेज की दराज में से एक मोटा बेंत निकाल कर मेज पर रखा, फाइलों पर पटक कर उन की धूल साफ की, फिर उठ कर मेज के एक कोने के पास खड़े हो गए और उन्होंने रसिया व रसिया के घर वालों का हालचाल पूछा.

‘‘और धंधा कैसा चल रहा है?’’ घर का हालचाल जानने के बाद उन्होंने पूछा.

‘‘आप की किरपा से ठीक चल रहा है, माईबाप.’’

थानेदार साहब असली बात पर आए. तुम्हें इसलिए तकलीफ दी है कि एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया है. उसे आधे घंटे में ही मिल जाना चाहिए और इतनी जल्दी तो बस, तुम्हीं ढूंढ़ सकते हो.’’

‘‘माईबाप, स्कूटर तो 15 मिनट में थाने आ जाए. लेकिन बात यह है कि हम सब को अच्छा कमीशन मिलना चाहिए. बहुत अच्छी हालत में है वह.’’

‘‘हम सब का कमीशन? क्या मतलब?’’

‘‘माईबाप, जानते होंगे,’’ रसिया व्यंग्य से बोला, ‘‘सरकार, भीमसिंह ने हर चोरी का स्कूटर बिक्री करने के लिए 250 रुपए तय कर रखा है. 150 आप के और 50-50 मुंशीजी और भीमसिंह के. यह कमीशन दे कर ही हमें बेचने का हुक्म है.’’

थानेदार साहब दंग रह गए. उन्होंने मुंशीजी की तरफ देखा, वह शर्माए से खड़े थे. रसिया का कुछ हौसला बढ़ा तो उस ने बीड़ी सुलगाने की फिर कोशिश की.

‘‘बीड़ी नहीं,’’ थानेदार साहब गरजे और डंडा मेज पर पटका, ‘‘कितने स्कूटर इस तरह बेचे गए हैं?’’

‘‘हुजूर, 10, और मैं ने पूरापूरा कमीशन चुका दिया.’’

‘‘हूं, अब जल्दी से पत्रकार का स्कूटर ले आइए.’’

‘‘लेकिन, माईबाप.’’

‘‘अगर 10 मिनट में वह स्कूटर नहीं आया,’’ थानेदार साहब ने हर शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘‘तो तुम्हारी खाल उधेड़ दी जाएगी.’’

रसिया के पीछे मुंशीजी भी मुड़े, लेकिन थानेदार ने उन्हें वापस बुला लिया. दुनिया में बहुत कुछ होता है जिसे शायद खुदा भी नहीं देख पाता. और इस थाने में भी वही होता है. उन्होंने बड़ी शांति से कहते हुए फोन उठाया, ‘‘हां, तो मुंशीजी, पता है आप को कि मेरा 1,500 रुपए का कर्ज किस पर है?’’

‘‘हां, हुजूर, मुझ पर और भीमसिंह पर.’’

‘‘कितने दिन में चुकेगा?’’

‘‘कुछ ही घंटों में, हुजूर, कांस्टेबल भीमसिंह के आते ही.’’

‘‘ठीक है, तुम जा सकते हो.’’

उन्होंने आई.जी. का नंबर मिलाया. उन के बोलते ही एडि़यां बजाते हुए सलाम किया और कहा, ‘‘हुजूर, मैं ने पत्रकार का स्कूटर ढूंढ़ लिया है.’’

‘‘शाबाश…शाबाश. 3 बजे कंट्रोल रूम में ले आओ. मैं साढ़े 3 बजे पुलिस की मुस्तैदी दिखाने के लिए प्रेस कानफे्रंस बुला रहा हूं.

‘‘तुम्हारी मुस्तैदी के इस मामले को देखते हुए एंटीकरप्शन डिपार्टमेंट में तुम्हारे तबादले की बात पर और अच्छी तरह ध्यान दिया जाएगा.’’

खुशीखुशी सीटी बजाते हुए थानेदार साहब ने घड़ी देखी. उस वक्त साढे़ 12 बज रहे थे, ‘कंट्रोल रूम जाने के लिए तैयारी का काफी समय है.’ उन्होंने सोचा, ‘तब तक एक उपन्यास और क्यों न पढ़ लिया जाए?’ और वह पढ़ कर ही गए.

: सुकुमार महाजन

नो बौल विवाद : ‘अब क्रिकेट में अंपायरों की जरूरत नहीं’

रौयल चैलेंजर्स बैंगलोर और मुंबई इंडियन्स के बीच हुए मुकाबले में नो बौल के विवाद ने तूल पकड़ ली है. इसपर टिप्पड़ी करते हुए इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन ने एक नई बहस की शुरुआत कर दी है. पीटरसन का मानना है कि अब क्रिकेट में अंपायरों की कोई जरूरत नहीं है.
पीटरसन का मानना है कि इस खेल में तकनीक ने इतनी उन्नती कर ली है कि बिना अंपायर के यह देखा जा सकता है कि बल्लेबाज आउट है या नहीं. इसके अलावा पीटरसन ने कहा कि इसे किसी टूर्नामेंट में प्रयोग के तौर पर देखाना चाहिए.

पीटरसन ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, ‘क्रिकेट को अब अंपायरों की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे ऐसे लोगों की जरूरत है जो खेल को कंट्रोल कर सकें और उसे खिलाने में सक्षम हों.’ इसके आगे उन्होंने लिखा कि, ‘ आउट के सभी तरीके अब वैसे भी तकनीक के साथ तय किए जा सकते हैं. हो सकता है कि यूके में 100 बौल टूर्नमेंट में इसके बारे में सोचना चाहिए.’

कई दिग्गज हैं नाराज

इस मैच के दौरान अंपायर से हुई इस चूक की हर ओर निंदा हो रही है. इसपर कई दिग्गजों ने प्रतिक्रिया देते हुए गलत बताया. इसपर विराट और रोहित भी खासा नाराज हैं.

दोनों ही टीमों के कप्तानों ने इसपर नाराजगी जाहिर की है. विराट ने तो यहां तक कह दिया कि ये आईपीएल है ना की कोई गली क्रिकेट. अंपायर को आंखें खोल कर रखनी चाहिए थी. वहीं इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए रोहित शर्मा ने कहा कि जब वो मैदान से बाहर गए तो उन्हें बताया गया कि आखिरी गेंद नो बौल थी. इस तरह के फैसले खेल के लिए अच्छे नहीं होते. इसके साथ ही उन्होंने बुमराह के ओवर में हुई अंपायर की एक और गलती गिनाई. वहीं कमेंटेटर संजय मांजरेकर ने इसे अक्षम्य गलती बताई है.

क्या है पूरा मामला

असल में मुंबई इंडियन्स और रौयल चैलेंजर्स बैंगलोर के बीच खेला गया ये मुकाबला अपने निर्णय के लिए आखिरी गेंद तक पहुंच गया था. आखिरी गेंद पर जीतने के लिए आरसीबी को 7 रन चाहिए थे. गेंदबाजी कर रहे मलिंगा ने अपनी आखिरी गेंद शिवम दुबे को फेंकी पर उसपर कोई रन नहीं बना और इस तरह से मुंबई की जीत हो गई. पर बाद में पता चला कि आखिरी गेंद नो बौल थी. जिसे अंपायर ने ध्यान नहीं दिया. इस तरह से विराट की टीम 6 रनों से ये मैच हार गई.

केबीसी का 11वां सीजन लेकर आ रहे हैं अमिताभ बच्चन

सोनी चैनल पर प्रसारित होने वाले रियलिटि शो कौन बनेगा करोड़पति सबसे ज्यादा लोकप्रिय शोज है. दर्शक इस शोज को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं. क्योकि इस शोज को अमिताभ बच्चन होस्ट करते हैं और करोड़पति बनने का मौका देते हैं. जी हां एक बार फिर से अमिताभ बच्चन कौन बनेगा करोड़पति के 11वें के साथ वापसी करने जा रहे हैं.

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खबरों के अनुसार मेकर्स ने 11वें सीजन के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं. इस बात की घोषणा बिग बी ने अपने ब्लौग के जरिए दी हैं कि उन्होंने केबीसी के प्रोमो के लिए शूट शुरू कर लिया है. बता दें कि, अभी तक भी शो के रजिस्ट्रेशन की तारीख को डिसाइड नहीं किया गया है.

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इसी बीच कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही हैं जिनमें अमिताभ बच्चन कमिंग सून का बैनर लिए नजर आ रहे हैं. ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि, यह शो बहुत जल्द ही टीवी पर दस्तक देने वाला है. दर्शकों को केबीसी का बेसब्री से इंतजार रहता है. यह एक ऐसा शो है जिसमें गेम को जीतकर करोड़पति बना जा सकता हैं. इस शो के औन एयर होते ही टीआरपी लिस्ट में बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है.

किसके खाते में जाएगा दलित वोट

पिछले 2–3 महीनों से जब से लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई है तब से दलित अत्याचार या प्रताड़ना की कोई खबर ऐसी नहीं आई है जो सुर्खी बनी हो. आदर्श आचार संहिता लगने के बाद देश के किसी भी कोने में किसी सवर्ण ने दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने से नहीं रोका है, नाई के यहां हजामत करवाने पर किसी दलित की धुलाई पिटाई नहीं हुई है, जींस पहनने पर किसी दलित युवा को सबक नहीं सिखाया गया है और तो और हैरतअंगेज तरीके से मोब लिंचिंग की कोई वारदात नहीं हुई है. गौ रक्षक भी खामोश हैं शायद उनकी लाठिया घर के किसी कोने में सरसों का तेल पी रहीं हैं.

बात सिर्फ इतनी सी है कि चुनाव सर पर हैं इसलिए इन सब शुभ और प्रिय कार्यों पर अघोषित रोक लग गई है क्योंकि सभी को दलितों के वोट चाहिए जिससे उनकी सहमति से दलित प्रताड़ना का सनातनी काम पुनः 23 मई के बाद प्रारम्भ किया जाकर हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा की जा सके. दूसरे शब्दों में कहें तो सनातनी परंपरा का निर्वाह किया जा सके सवाल या चुनौती 2022 या 2024 तक देश के विश्व गुरु बनने की जो है.

आजादी के 70 सालों बाद देश जागरूक तो हुआ है. 70 – 80 के दशक की तरह दलित वोट अब डरा धमका कर नहीं बल्कि पुचकार कर लिए जाने लगे हैं. कल तक भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टियां जो दलित बस्तियों में जाकर वोट मांगना अपनी तौहीन समझती थीं उनके आका और कर्ता धर्ता इन निकृष्ट शूद्रों के घर जाकर भोजन करने लगे थे और अब तो समारोह पूर्वक उनके पैर धोने लगे हैं. बात या दलील एकदम सटीक और सही है कि और कितने अच्छे दिन चाहिए.

कैसे सरकार दलित वोटों के ही दम पर बनती है यह साल 2014 के चुनावों से ही साबित नहीं हुआ था बल्कि पहले आम चुनाव से ही होता आ रहा था. दलित समुदाय कांग्रेस को अपना हितेषी समझते उसे वोट करता रहा था एवज में कांग्रेस उसे हिफाजत की मौखिक गारंटी देती रहती थी जिस पर अक्सर वह खरी नहीं उतर पाती थी क्योंकि उसमें भी मनुवादियों की भरमार थी जो दलितों की कुटाई को अपना हक समझते थे. हालत शोले फिल्म के उस द्रश्य जैसी थी जिसमें गब्बर सिंह रामगढ़ बालों को समझा रहा होता है कि जुल्म न करने के बदले में और उससे बचाने के एवज में अगर मेरे आदमी (यानि डाकू) तुमसे मुट्ठी भर अनाज ले लेते हैं तो कोई जुर्म नहीं करते. दलित उसकी मंशा पर शक न करें इसलिए उसने कुछ बड़े नामी और ब्रांडेड नेता भी अपने शो रूम में पुतलों की तरह सजा रखे थे .

शुरू के 8 – 10 आम चुनाव तक तो यही होता रहा कि मतदान बाले दिन दलित सुबह उठकर घिसे कोयले या नीम की दातून से दांत साफकर पतली चाय में बासी रोटियां डुबोकर उदरस्थ कर अपने मेहनत मजदूरी के काम पर निकलते मतदान केंद्र पर कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा ठोकता जाता था और कांग्रेस जीत जाती थी. हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद, और जनसंघ जैसे दल बेचारे हाथ मलते देखते रहते थे कि भला उनका ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया या कायस्थ मेरे ठाकुर, ब्राह्मण, बनिए या कायस्थ से ज्यादा रसूखदार कैसे जबकि इन दलितों को तो हम उनसे ज्यादा लतियाते हैं.

फिर 80 के दशक में एक हुये कांशीराम जिनहे दलित समुदाय उतनी ही शिद्दत और श्रद्धा से मान्यवर कहता है जितना कि भीम राव अंबेडकर को बाबा साहिब कहता है. कांशीराम ने पूरे सामाजिक शोध के बाद पाया कि बिना राजनीति में स्वतंत्र हिस्सेदारी के दलित उद्धार नामुमकिन है तो उन्होंने इसे मुमकिन बनाने का बीड़ा उठा लिया और दलितों को उनकी ताकत और गैरत से रूबरू कराया. बात दलितों को समझ आई तो देखते ही देखते हिन्दी भाषी राज्यों में तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा गूंजने लगा. दलितों के भीतर बैठा दबंगों का खौफ कम हुआ तो वे बीएसपी के हाथी पर मुहर लगाने लगे.

कुछ साल तो सब ठीक ठाक चला लेकिन फिर इसी दौर में नई गड़बड़ उत्तर प्रदेश में ही पैदा की मुलायम सिंह नाम के समाजवादी युवा ने जिसने लोहिया की दुहाई दे देकर पिछड़ों को दलितों से अलग कर दिया जिनमें सवर्णों जैसी ही कास्ट फीलिंग आने लगी थी. इधर भाजपा और कांग्रेस को यह अलगाव वरदान लगने लगा था इसलिए इन दोनों ही दलों ने पनपते इस नए जातिवाद को खूब खाद पानी दिया. बसपा का आधा वोट सपा को जाने लगा और उत्तरप्रदेश में जातिगत समीकरण रेखागणित की किसी प्रमेय की तरह सिद्ध हो गए कि दलित वोट बसपा का, पिछड़ा वोट सपा का, सवर्ण वोट भाजपा का और मुसलिम वोट अपनी सहूलियत के मुताबिक कभी सपा को तो कभी बसपा को और कभी कांग्रेस को जाते रहे.

2014 के आम चुनावों में एक नई बात खासतौर से उत्तरप्रदेश में देखने में आई कि सभी जातियों ने एकजुट होकर उस भाजपा को वोट दे दिया जो घोषित तौर पर सवर्ण हिंदूवादी मानी जाती थी और मानी जाती है और दरअसल में है भी. ऐसा किस झोंक में हुआ यह किसी को आजतक किसी की समझ नहीं आ रहा तो मुमकिन है लोगों को नरेंद्र मोदी के लच्छेदार भाषणों से उम्मीद बंधी हो कि वे इस जातिवादी राजनीति को खत्म नहीं तो कम जरूर कर देंगे.

पर हुआ उल्टा जल्द ही नरेंद्र मोदी का सच भी सामने आ गया और इतने वीभत्स तरीके से आया कि इस चुनाव में दलितों ने भाजपा से भी तौबा कर रखी है .

एम डी फेक्टर चलेगा इस बार– इतिहास के इस संक्षिप्त छज्जे से वर्तमान की जमीन पर कूदें तो सवाल मुंह बाए खड़ा है कि अब दलित वोट कहां जाएगा. पहला जबाब बसपा कोई दे तो वह गलत साबित होगा क्योंकि मायावती ने दलित हितों और उनकी सामाजिक सुरक्षा से कभी कोई वास्ता नहीं रखा उनके लिए भी दलित वोट सत्ता की छत पर पहुंचने की सीढ़ी भर रहे दूसरे उन्होने जिस सपा से गठबंधन कर रखा है वह दबंग पिछड़ों का है यानि नया नया सवर्ण तबके का ही है. ये वो पिछड़े हैं जो धर्मग्रंथों में परिभाषित और घोषित सवर्णों से कहीं ज्यादा कहर उन पर ढाने लगे हैं. सियासी तौर पर देखें तो सपा का जमीनी कार्यकर्ता भी इस एंगेजमेंट से खुश नहीं है जिसे लग रहा है कि अखिलेश यादव जरूरत से ज्यादा मायावती के सामने झुक रहे हैं.

बात सच भी है कि अखिलेश यादव भाजपा से घबराए हुये हैं और उन्हें भी मायावती की तरह समझ आ गया है कि अगर इस चुनाव में दलितों और पिछड़ों के वोटों का बंटवारा सपा और बसपा के बीच हुआ तो दोनों कहीं के नहीं रह जाएंगे.

लेकिन ये दोनों जानबूझकर इस हकीकत से मुंह फेरे बैठे हैं कि जरूरी नहीं कि पिछड़े बसपा को और दलित सपा को वोट दें. खुद को जातिगत राजनीति का कीड़ा या विशेषज्ञ मानने बाले ये दोनों महारथी कांग्रेस नाम के खतरे को कम करके नहीं आंक रहे जो एतिहासिक दुर्गति के बाद फिर ट्रेक पर लौट रही है. खासतौर से मायावती जो इन दिनों बेहद झल्लाई और बौखलाई हुईं हैं उनके निशाने पर अब कल की मनुवादी भाजपा कम आज की वो कांग्रेस ज्यादा है जो गली गली में दलितों को गले लगाते घूम रही है. बसपा को 2014 के चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी और विधानसभा चुनाव में भी उसकी ख़ासी दुर्गति हुई थी यानि दलित वोटर लगातार उनकी पकड़ से बाहर होकर अब कांग्रेस की तरफ खिसक रहा है. यह बात मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से भी साबित हुई थी जहां उसका वोट शेयर और सीटें उम्मीद से ज्यादा घटे थे. यहां भी महज दबाब बनाने की गरज से उन्होने कांग्रेस से गठबंधन नहीं किया था.

यह बात किसी सबूत या गणित की मोहताज नहीं कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस को दलितों का समर्थन मिला है जो लोकसभा चुनाव में भी बरकरार रहेगा. गौर से देखें तो एक नया समीकरण उत्तरप्रदेश में भी बन रहा है कि मुसलमान और दलित कांग्रेसी छत के नीचे आ रहे हैं जिसकी कई वजहें हैं मसलन राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा की गारंटी जिसके मोदी राज में इतने चिथड़े उड़े हैं कि उन्हें समेटकर गिन पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं. बात बहुत सीधी है कि जिन सीटों पर मुसलिम वोट ज्यादा हैं उन पर दलित उनके साथ कांग्रेस को वोट देगा. मुसलिम वोटों की हालत तो यह है कि वह अब कांग्रेस के सिवाय किसी और पर भरोसा नहीं कर रहा. कल का एमवाय यानि मुसलिम यादव का फार्मूला अब एमडी यानि मुसलिम दलित में तब्दील होता नजर आ रहा है.

मुसलिम दलित और पिछड़े वोटों का अब एक साथ एक पार्टी में जाना नामुमकिन इसलिए भी हो गया है कि एडी चोटी का ज़ोर लगाने के बाद भी सपा बसपा उत्तर प्रदेश में 40 का आंकड़ा पार करते नजर नहीं आ रहे यानि नतीजों के बाद दोनों में से किसी एक का भाजपा के साथ जाना तय है क्योंकि आसार त्रिशंकु लोकसभा के ज्यादा हर किसी को लग रहे हैं. ऐसे हालातों में उत्तरप्रदेश का वोटर शायद ही नहीं तय है कोई जोखिम 2014 जैसा नहीं उठाएगा.

साफ है कि कांग्रेस को बैठे बिठाये फायदा मिल रहा है इसलिए उसने भी गठबंधन में दिलचस्पी नहीं ली वजह उसके हिस्सा बनने पर दलित, मुसलिम, पिछड़ा वोट सपा बसपा को ज्यादा मिलता और वह फिर अधर में लटककर रह जाता. दलित और मुसलिम बिहार का अंजाम देखकर और डरे हुये हैं जहां नीतीश कुमार और लालू यादव ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता में आने से रोक लिया था लेकिन अब नीतीश भाजपा के साथ हैं.

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश में सपा बसपा खाली हाथ रह जाएंगे उन्हें अपने प्रभाव बाली सीटों पर ही जीत की उम्मीद करनी चाहिए. आरक्षित सीटों पर बसपा भारी पड़ेगी और यादव बाहुल्य सीटों पर सपा बाजी मार ले जाएगी. इस पूरे खेल में बड़ा नुकसान भाजपा का होना तय दिख रहा है जिसका हल्ला ज्यादा मचा हुआ है. इसकी वजह 2014 में रिकौर्ड 73 सीटें जीतना है जो दरअसल में उसे पिछड़ों और दलितों की वजह से ज्यादा मिलीं थीं. एटरोसिटी एक्ट विवाद के बाद जातिगत आरक्षण छिनने की आशंका से ग्रस्त और त्रस्त दलित वोटर अगर कांग्रेस की तरफ झुक रहा है या वापस मुड़ रहा है तो इसकी सियासी वजह कांग्रेस का कद बढ़ना भी है.  उसका कद राष्ट्रीय है जबकि सपा बसपा का कद क्षेत्रीय है जो उन्हें किसी भी तरह से आश्वस्त नहीं कर रहा.

काफी मिल्‍क शेक बनाने की आसान रेसिपी

कौफी मिल्क शेक आजकल काफी प्रसिद्ध है और इसे बनाना भी बेहद आसान है. तो चलिए इसकी रेसिपी आपको बताते हैं.

 सामग्री :

– कौफी पाउडर ( 01 बड़ा चम्‍मच)

– हल्का गरम पानी (1/4 कप)

– शक्‍कर ( 3-4 छोटे चम्‍मच/स्वादानुसार)

– ठंडा दूध ( 02 कप)

– बर्फ के टुकड़े (आवश्‍यकतानुसार)

कोल्ड कौफी बनाने की विधि :

– सबसे पहले ब्लेंडर कौफी, शक्‍कर और 1/4 कप गुनगुना पानी डालें और उसे ब्‍लेंड करके झागदार बना लें.

– अगर आपके पास ब्‍लेंडर न हो, तो कौफी, दूध और गुनगुने पानी को एक बर्तन में लें और उसे तब तक   फेटें, जब तक वह झागदार न बन जाए.

– अब ब्‍लेंडर में 4-5 बर्फ़ के टुकड़े डालें और ब्‍लेंड कर लें.

– अगर आप बिना ब्‍लेंडर के कौफी बना रहे हैं, तो बर्फ के टुकड़े कर डालें और ठीक से मिक्‍स कर लें.

– अब कौफी के घोल में ठंडा दूध डालें और ढ़ेर सारा झाग बनने तक ब्‍लेंड कर लें.

– अब आपका स्‍वादिष्‍ट कौफी मिल्‍क शेक तैयार है.

अंधविश्वास के चक्रव्यूह में घिरा समाज

विज्ञान ने इनसान को धर्म के नाम पर स्थापित ऐसी कई प्रथाओं व अंधविश्वासों से छुटकारा दिलाने का काम किया है जिन्हें समाज के परंपरावादी लोग तर्कहीन ढंग से मानते आ रहे थे. इन में कुछ अंधविश्वास तो बर्बरता एवं उन्माद का परिचय देते हैं. सदियों से बेटे की इच्छा में ढोंगी तांत्रिकों, बाबाओं के कहने पर मातापिता द्वारा अबोध बच्चों की बलि व डायन बता कर निर्दोष महिलाओं की खुद महिलाओं द्वारा हत्या या निर्मम प्रताड़ना, अंधविश्वास के क्रूर उदाहरण हैं. अनपढ़, कूपमंडूक सोच वाले ग्रामीण इलाकों में ऐसे अंधविश्वास व्याप्त हैं पर अति आधुनिक शहरी लोग भी इस के कम शिकार नहीं हैं.

इस का बहुत सटीक प्रमाण एकाएक गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने की घटना से देखने को मिला था. केवल प्रचार मात्र से गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने उमड़ी भीड़ में महज अति धार्मिक सोच वाले ही नहीं, आधुनिक दंपती भी शामिल थे. अंधविश्वास में फंसे इन लोगों में स्कूलकालिजों के वे छात्रछात्राएं भी शामिल थे जिन्हें पहनावे में जींस, टौपलेस और बातचीत में सिर्फ अंगरेजी का प्रयोग अच्छा लगता है. हालांकि बाद में अंधश्रद्धा निर्मूलन व ज्ञानविज्ञान समिति के सदस्यों ने इस अंधविश्वास को दूर कर इस का वैज्ञानिक कारण सिद्ध किया. ये वे लोग हैं जिन्होंने परीक्षा में पास होने या नौकरी पाने के उद्देश्य से केवल पढ़नेलिखने के लिए वैज्ञानिक पुस्तकें नहीं पढ़ीं बल्कि तर्क व विवेक से विज्ञान को स्वीकार किया.

यह सच है कि अंधविश्वास की गहरी जडे़ं, ईश्वर में लोगों के विश्वास के कारण जमी हैं. यह भी सच है कि धार्मिक लोग ही अंधविश्वास से प्रभावित होते हैं. इसलिए वे ही अंधविश्वास का प्रचारप्रसार अधिक करते हैं. जिन चमत्कारों को धार्मिक लोग बाबाओं, महात्माओं की ईश्वरीय सिद्धि मान बैठते हैं, वास्तव में वह कोई देवीदेवता की देन न हो कर मनुष्य द्वारा विकसित विज्ञान ही है.

साइंस सेंटर व ज्ञानविज्ञान समिति के सदस्य ऐसे चमत्कार आसानी से कर दिखाते हैं और अंधविश्वासियों की आंखें खोलने के लिए इस का तर्कपूर्ण वैज्ञानिक कारण भी बताते हैं. दृष्टि भ्रम से जादूगर पीसा की मीनार और ताजमहल गायब कर दिखाते हैं. यह करतब, अंधविश्वासी लोग तंत्रमंत्र अथवा ईश्वर का चमत्कार मानेंगे, जबकि जादूगर इसे हाथ की सफाई बताते हैं.

भारत के एक मशहूर जादूगर ने अंधविश्वास का प्रचार करने वाले एक ‘पहुंचे हुए बाबा’ को चुनौती देते हुए कहा था कि बाबा में हिम्मत हो तो मेरे सामने आ कर अपना चमत्कार दिखाए, जिन विदेशी घडि़यों को हवा से ला दिखाने का चमत्कार बाबा करता है, ऐसे चमत्कार तो मेरे सिखाए बच्चे गलीमहल्लों में करते रहते हैं.

जादूगर की चुनौती बाबा को इस भय से कंपा देने के लिए काफी थी कि कहीं जादूगर ने उसे ही गायब कर दिखाया तो उस के भक्तों पर क्या बीतेगी. दरअसल, ईश्वर, भाग्य, स्वर्ग, मोक्ष को स्वीकारने वाले व्यक्ति जीवन की हकीकत और इनसानी मेहनत को महत्त्व नहीं देते. वे सृष्टि में मौजूद वस्तुओं और क्रियाओं को वैज्ञानिक तर्कों से समझनेसमझाने का प्रयास नहीं करते. वे इन सब को सिर्फ ईश्वर की देन मानते हैं जबकि प्रत्येक क्रिया के ठोस वैज्ञानिक आधार हैं.

कई साल पहले एक समाचार एजेंसी ने सोमालिया के रेगिस्तान में एक स्थान पर बादलों के बीच ईसा मसीह का चेहरा देखे जाने का समाचार जारी किया तो दुनिया भर के समाचारपत्रों ने इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित करते हुए प्रमुखता से प्रकाशित किया. अंध- विश्वासियों ने इसे ईश्वर का चमत्कार माना जबकि वैज्ञानिकों ने इस का खंडन करते हुए बादल की बनावट से उत्पन्न दृष्टिभ्रम मात्र बताया.

वैसे भी विज्ञान चाहे तो बादलों के टुकड़ों का स्क्रीन (परदे) के रूप में प्रयोग कर शक्तिशाली यंत्रों के माध्यम से किसी भी व्यक्ति की आकृति पैदा कर सकता है. आज के वैज्ञानिक युग में पढ़ालिखा कोई भी व्यक्ति क्या अपने बच्चों को यह बताना चाहेगा कि चंद्रमा पर बुढि़या सूत कात रही है. यह सब दादी मां द्वारा बच्चों को बहलाने का उपक्रम मात्र नहीं था बल्कि चंद्रमा पर इनसान के जाने से पहले अनपढ़ ही नहीं, शिक्षित लोग भी चंद्रमा पर बुढि़या का भ्रम पाले बैठे थे. बाद में पाया गया कि बुढि़यानुमा आकृति वास्तव में चंद्रमा के अंधेरे और बेहद ठंडे भाग हैं.

यह अंधविश्वास आज भी कायम है कि पढ़ने वाले बच्चे बाबाओं या ओझाओं से पेन पढ़वा कर परीक्षा देने जाते हैं. वे अपनी कड़ी मेहनत पर भरोसा न कर अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं. यह स्थिति ग्रामीण इलाकों में ही होती तब भी आश्चर्य न होता किंतु शहर के आधुनिक, अभिभावक व शिक्षक ही इस प्रकार के अंधविश्वास के शिकार हों तो आश्चर्य ही नहीं, घोर आश्चर्य होता है.

इसे अज्ञानता नहीं तो और क्या कहा जाए कि कक्षा में वैज्ञानिक आविष्कारों, क्रियाओं का पाठ पढ़ाने वाला शिक्षक इस भ्रम से मुक्त नहीं होता कि उसे ईश्वर ने बना कर धरती पर पैदा किया जबकि मनुष्य के पैदा होने (शिशु जन्म) के वैज्ञानिक कारण अब कोई रहस्य की बात नहीं रह गए.

यह भी बहुत हास्यास्पद किंतु दिलचस्प बात है कि झाड़फूंक में भरोसा रखने वाले पंडेपुजारी व तांत्रिक अस्वस्थ होने पर डाक्टर से दवा लेने अस्पताल जाते देखे गए हैं. यानी दूसरों को ठीक करने का दावा करने वाले इन लोगों पर इन की दैवीय शक्तियां काम नहीं करतीं और चोरी होने पर पुलिस में रपट लिखा कर चोरों को गिरफ्तार करने और माल बरामदगी की गुहार करते हैं. ये वे लोग हैं जिन के मंदिरों, मजारों पर चोरी या गुम वस्तुओं का पता पूछने वाले अंधविश्वासी सिर झुकाए खडे़ रहते हैं. ईश्वर की आड़ में पनपे अंधविश्वास ने देश व समाज को न सिर्फ कुंद किया है बल्कि उस के मानसिक व आर्थिक विकास को भी अवरुद्ध किया है.

अंधविश्वास की सर्वाधिक शिकार महिलाएं यह समझने का प्रयास नहीं करतीं कि उन के बच्चों को शारीरिक परेशानी या मौत किसी डायन के हाथों नहीं, स्वास्थ्य संबंधी कारणों से होती है. हालांकि अंधविश्वास के विरोध में अब कई संगठन सक्रिय हैं लेकिन व्यापक प्रचार माध्यमों का भरपूर सहयोग उन्हें नहीं मिल पाता. इस के लिए घरघर अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता उत्पन्न करना आवश्यक है.

चुनाव प्रचार में मुद्दे हटे, जुमले डटे

पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ‘कसाब’ का विश्लेषण करते हुए उसकी संज्ञा कांग्रेस-समाजवादी पार्टी और बसपा से कहा था. अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और बसपा को ‘शराब’ कहा ऐसे ही मुददों से चुनाव प्रचार में जमीनी मुद्दे विकास, कालाधन, बेरोजगारी, चुनाव सुधार, जीएसटी, नोटबंदी, कालाधन  और अपराध जैसे मुददे चर्चा से बाहर हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में जब नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तब नरेन्द्र मोदी ने धर्म की राजनीति को दरकिनार करके विकास की राजनीति पर जोर दिया.

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की सरकार के 10 साल के कुशासन से परेशान देश की जनता को लगा कि नरेन्द्र मोदी भाजपा की धर्म की राजनीति से दूर होकर देश में विकास की राजनीति करेंगे. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता अभियान, ग्रामीण आवास और महिलाओं को घरेलू गैस जैसी प्रमुख योजनाओं को आगे बढाने का काम भी किया. इसके बाद वह कांग्रेस वाली योजनाओं आधार कार्ड, जीएसटी और नोटबंदी जैसी योजनाओं को लागू करने लगे. इन योजनाओं के फेल होने का प्रभाव नरेन्द्र मोदी की सोंच पर पड़ा और वह 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रवाद, आतंकवाद, पाकिस्तान और राम मंदिर की राह पर वापस लौट आये.

विकास से शुरू हुआ नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक सफर धर्म और राष्ट्रवाद पर आकर टिक गया. 2014 में विकास, कालाधन, बेरोजगारी, चुनाव सुधार और अपराध के खिलाफ बात जंग लड़ने की बातें बेमानी हो गई. 2019 के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी पाकिस्तान और राष्ट्रवाद की बहस से जीत हासिल करना चाहते है. इसके लिये व्यापक रूप से प्रचार मध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है.  प्रचार की इस जदोजहद में जनता के अपने मुददे दूर हो गये है. लोकसभा चुनाव में मुददों को दरकिनार करके जुमलों को उछला जा रहा है.

लोकसभा चुनाव में जिन मुददों पर होना चाहिये चुनाव के प्रचार में वह मुद्दे कहीं नजर नहीं आ रहे है. चुनाव का प्रचार अभियान हर तरह की सीमायें तोड़ चुका है. चुनाव के प्रचार का बजट इतना बढ़ गया है कि छोटे छोटे क्षेत्रिय दलों प्रचार की दौड़ में पूरी तरह से पिछड गये है. बेराजगारी, मंहगाई, नोटबंदी, खेती किसानी और जीएसटी की मांग से जनता भले ही त्राहि-त्राहि कर रही हो पर राजनीतिक दल इस मंहगाई से पूरी तरह से बेअसर है. चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च घटाने के लिये भले ही तमाम प्रयास कर लिये हो पर चुनाव का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. चुनाव प्रचार ने जनता के मुद्दों को दरकिनार कर दिया है.

चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव लड़ने वालों को पैसा खर्च करने की एक सीमा तय कर रखी है. चुनाव आयोग खर्च का विवरण भी लेता है. इसके बाद भी चुनावों पर खूब सारा पैसा खर्च हो रहा है. जिसको देख कर साफ लग रहा है कि चुनावों के प्रचार में महंगाई का कोई असर नही दिख रहा है. मोटा अनुमान यह है कि इन चुनावों में राजनीतिक पार्टियां 20 हजार करोड़ से भी ज्यादा का पैसा खर्च कर रही है. सबसे ज्यादा पैसा शराब, प्रिटिंग, आटो, विज्ञापन और मैनेजमेण्ट लेवल पर खर्च हो रहा है. इसके अलावा निजी जरूरतों के सामान जैसे कपड़े, जूते, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, कास्मेटिक और कार्यकर्ताओं पर भी खूब खर्च हो रहा है.

चुनाव लड़ने वालों ने अपनी सुरक्षा पर भी खर्च को काफी बढ़ा दिया है. पहले सरकारी सुरक्षा कर्मचारियों के भरोसे ही नेता चल जाते थे. अब उनको अपनी ज्यादा सुरक्षा की जरूरत महसूस होती है. जिसके लिये वह प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों से बहुत सारे सुरक्षा कर्मचारियों को किराये पर लेकर चल रहे है. इन चुनावों में वोटरों को सीधे पैसा देने के बहुत सारे मामले सामने आ चुके है. इससे साफ लगता है कि चुनाव में पैसे भी खूब बांटे जा रहे हैं.

जंगली हाथियों को बचाने की कथा में इमोशंस और रोमांच का घोर अभाव

रेटिंग: दो स्टार

हाथियों के संरक्षण व हाथी दांत की तस्करी पर लगाम लगाने जैसे ज्वलंत मुद्दे पर बनी फिल्म ‘‘जंगली’’ कमजोर पटकथा व कहानी के चलते अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं रहती. पूरी फिल्म बचकानी सी लगती है. हाथियों का भी सही ढंग से उपयोग नहीं किया गया.

फिल्म ‘‘जंगली’’ की कहानी मुंबई के एक जानवरों के अस्पताल में कार्यरत डाक्टर राज नायर विद्युत जामवाल के इर्द गिर्द घूमती है, जो कि अपनी मां के देहांत के बाद से ही यानी कि पिछले दस वर्ष से मुंबई में हैं और अपने पिता से नाराज चल रहे हैं. डा. राज को लगता है कि यदि उसके पिता ने उसकी मां का इलाज शहर में करवाया होता, तो उसकी मां ठीक हो जाती. उसके पिता चाहते हैं कि डा. राज अपनी मां की बरसी के मौके पर उड़ीसा में हाथियों की उसी सेंचुरी में आए, जिसे उसकी मां व पिता ने ही बसाया है. अब राज के पिता ही इस सेंचुरी में हाथियों के संरक्षण का काम कर रहे हैं. उनके साथ शंकरा (पूजा सावंत) , राजेश भी हैं. राज अपने पिता के पास जाना नहीं चाहते, मगर पत्रकार मीरा (आशा भट्ट) की एक बात डा. राज को अपनी मां की दसवीं बरसी पर जाने के लिए राजी कर देती हैं.

डा. राज का पीछा करते हुए पत्रकार मीरा भी पहुंच जाती हैं, जिसे राज के पिता का इंटरव्यू अपनी वेब साइट के लिए करना चाहती है. राज की मुलाकात अपनी बचपन की साथी शंकरा और फौरेस्ट आफिसर देव (अक्षय ओबेराय )से होती है. घर लौटने के बाद राज अपने बचपन के साथी हाथियों में भोला और दीदी से मिलकर बहुत खुश होता है. वह अपने उन पुराने दिनों को याद करता है, जब उसकी मां जीवित थी और वह अपने गुरू (मकरंद देशपांडे) से कलारिपयट्टू का प्रशिक्षण ले रहा था. हाथियों की इस सेंचुरी व जंगल में पहुंचते ही से डा. राज को कई नई बातों से दो चार होना पड़ता है.

हाथियों के साथ मौज मस्ती करने वाले राज को इस बात का अहसास ही नहीं था कि उनकी खुशहाल सेंचुरी और हाथियों पर  शिकारी व हाथी दांत के तस्कर नजर गड़ाए बैठे हैं. राज की मां की बरसी होने के बाद की रात हाथी दांत के विदेशी तस्करों के लिए शिकार करने वाले  शिकारी (अतुल कुलकर्णी), फारेस्ट आफिसर देव व स्थानीय पुलिस की मदद से हाथियों की इस सेंचुरी में पहुंच कर भोला हाथी सहित चार हाथियों व राज के पिता को मौत की नींद सुलाकर भागने में सफल हो जाते हैं. मगर उससे पहले वह हाथी दांत निकालकर छिपा देते हैं. उधर स्थानीय पुलिस के मुखिया इंस्पेक्टर खान आरोप लगाते हैं कि हाथी दांत के तस्करों व शिकारियों के साथ राज के पिता मिले हुए थे. उसके बाद कहानी में कई मोड़ आते हैं. अंततः देव मारा जाता है. हाथी दांत बरामद हो जाते हैं.  शिकारी मारे जाते हैं. तस्कर विदेशी डालरों के साथ पकड़े जाते हैं.

हाथियों के संरक्षण व हाथी दांत की तस्करी पर लगाम लगाने जैसे ज्वलंत व अति समसामायिक विषय पर अति कमजोर पटकथा के चलते पूरी फिल्म फुसफुसा पटाका के अलावा कुछ नहीं है. फिल्म में हाथी दांत की तस्करों व हाथियों की प्रजाति को खत्म करने पर आमादा शिकारियों के साथ फारेस्ट अफसरों, स्थानीय पुलिस व प्रशासन की सांठगांठ पर पुरजोर तरीके से बात करने से फिल्मकार डरे हुए नजर आए. फिल्म में इमोशन का भी घोर अभाव है. कमजोर पटकथा के चलते इंटरवल से पहले फिल्म बहुत बोर करती है. इंटरवल के बाद एक्शन दृष्यों के चलते फिल्म कुछ संभलती है.

अफसोस की बात यह है कि हौलीवुड निर्देशक चक रसेल भी इस कमजोर पटकथा पर बेहतरीन फिल्म नहीं बना सके. चक रसेल की संजीदगी इस फिल्म में नजर नहीं आती. जबकि वह हौलीवुड में ‘‘मौस्क’’, ‘स्कौर्पियन किंग’, ‘इरेजर’ जैसी कई सफलतम फिल्में दे चुके हैं. यदि इसी तरह की सतही फिल्म बनानी थी, तो फिर हौलीवुड निर्देशक की बजाय भारतीय निर्देशक की ही सेवाएं ली जानी चाहिए थी. हाथी व अन्य जानवरों की दुर्लभ प्रजाति को बचाने के साथ ही जानवरों से प्रेम करने की बात करने वाली कहानियों की हमारे देश में कमी नहीं है. अतीत में हमारे यहां ‘हाथी मेरे साथी’ सहित कई बेहतरीन फिल्में इसी मुद्दे पर बन चुकी हैं.

पटकथा व संवाद लेखकों ने फिल्म में  शिकारी के मुंह से कुछ धार्मिक मंत्रों, महाभारत के धृष्टराष्ट्र व अश्वत्थामा जैसे पात्रों के नाम उद्धरित करवाए हैं, वह महज फिल्म को तहस नहस करने के अलावा कुछ नहीं है. फिल्म ‘जंगली’ को महज बौलीवुड फिल्म बताने के लिए भगवान गणेश को जोड़ना भी अजीब सा लगता है.

हं! फिल्म ‘जंगली’ के एक्शन दृष्य (ज्यादातर एक्शन दृष्य कलारी पट्टू पर ही आधारित हैं) रोमांच पैदा करने में सफल नहीं रहते. कुछ एक्शन दृष्य तो हास्यास्पद लगते हैं. जबकि कलारी पट्टू नामक मार्शल आर्ट में विद्युत जामवाल को महारत हासिल है. हमें याद रखना चाहिए कि विद्युत जामवाल की मां केरला के पलक्कड़ में आश्रम चलाती है, जहां कलारी पट्टू कला का प्रशिक्षण दिया जाता है. यही वजह है कि कुछ एक्शन दृष्यों का निर्देशन भी विद्युत जामवाल ने ही किया है.

मगर थाइलैंड के जंगलों में फिल्मायी गयी इस फिल्म में जंगल, नदी व हाथियों की सेंचुरी के दृष्य जरुर मनमोह लेते हैं. इसके लिए कैमरामैन मार्क इरविन बधाई के पात्र हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो कलारी पट्ट के एक्शन दृष्यों में विद्युत जामवाल का कोई सानी नहीं है. आशा भट्ट और पूजा सावंत की यह पहली फिल्म है, पर दोनों शो पीस ही रही. कहानी में इनका कोई योगदान नहीं है.  शिकारी के किरदार में अतुल कुलकर्णी ने एक बार फिर अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. छोटी भूमिका में मकरंद देशपांडे अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अक्षय ओबेराय प्रभाव छोड़ने में असफल रहे.

1 घंटा 55 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘जंगली’ का निर्माण ‘जंगली पिक्चर्स’ के बैनर तले विनीत जैन व प्रीति सहानी ने किया है. फिल्मके निर्देशक चक रसेल, लेखक अक्षत खिलडियाल व सुमन दुबे, पटकथा लेखक एडाम प्रिंस व राघव दार, कहानी लेखक रोहन सिप्पी, चारूदत्त आचार्य, उमेश पड़लकर व रितेश शाह, संगीतकार समीर उद्दीन व तनुज टिकू, कैमरामैन मार्क इर्विन व सचिन गदनकुश तथा कलाकार हैं- विद्युत जामवाल, आशा भट्ट, पूजा सावंत, मकरंद देशपांडे, अतुल कुलकर्णी, अक्षय ओबेराय व ठलावैवसल विजय व अन्य.

नोटबुक : थाई फिल्म का घटिया भारतीयकरण

‘फिल्मिस्तान’ और ‘मित्रों’ जैसी फिल्मों के सर्जक नितिन कक्कड़ इस बार प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘नोटबुक’ में अपना जादू जगाने में बुरी तरह से असफल रहे हैं. अफसोस की बात यह है कि 2014 में औस्कर तक पहुंची थाई फिल्म ‘टीचर्स डायरी’ का सही ढंग से भारतीयकरण नहीं कर पाए.

फिल्म ‘नोटबुक’ की कहानी शुरू होती है दिल्ली में अपने घर के अंदर नींद में सपना देख रहे कश्मीरी पंडित कबीर (जहीर इकबाल) से. सपने में कबीर एक सैनिक की पोशाक में है, सीमा पार से आया एक मासूम बालक उसे देखकर भागता है और जमीन पर पड़े एक बम पर उसके पैर के पड़ने से वह मारा जाता है. तभी श्रीनगर से आए फोन की घंटी से कबीर की नींद टूटती है. फोन पर बात करने के बाद वह श्रीनगर के लिए रवाना होता है. श्रीनगर में वह अपने पुश्तैनी मकान पर पहुंचता है, जिसकी देखभाल एक मुस्लिम शख्स कर रहा है. कई साल पहले कुछ कश्मीरी मुस्लिमों ने ही उसके परिवार को श्रीनगर छोड़ने पर मजबूर किया था. अब एक मुस्लिम ही उसके मकान को सुरक्षित रखे हुए हैं. श्रीनगर की एक झील के बीचो बीच कबीर के पिता का ‘वूलर स्कूल’ है,जिसमें सात बच्चे नाव से पढ़ने आते जाते हैं. लेकिन जुनैद से शादी तय होने पर स्कूल की शिक्षक फिरदौस (प्रनूतन बहल) ने वूलर स्कूल छोड़कर अपने होने वाले शौहर जुनैद के डीपीएस स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया है.वूलर स्कूल में कोई शिक्षक नहीं है. यूं तो स्कूल अब सरकार के कब्जे में है, मगर कबीर के घर की सुरक्षा कर रहे शख्स की इच्छा है कि कबीर वूलर स्कूल के बच्चों को पढ़ाए, जिससे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो. कबीर प्रयास करता है और उसे वूलर स्कूल में नौकरी मिल जाती है. स्कूल के बच्चे फिरदौस शिक्षक को भूले नहीं हैं, इसलिए वह कबीर को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. कबीर को कक्षा में फिरदौस की नोटबुक मिलती है, जिसमें फिरदौस ने हर दिन की कथा व अपने मन के विचार लिख रखे हैं. इस नोटबुक को पढ़कर कबीर उसी तरह बच्चों के साथ व्यवहार कर बच्चों का दिल जीत लेता है. इतना ही नहीं वह फिरदौस से प्यार कर बैठता है और फिरदौस का पता लगाकर उससे मिलने का असफल प्रयास करता है.

फिरदौस की नोटबुक से ही पता चलता है कि एक बुद्धिमान व होनहार विद्यार्थी स्कूल नहीं आ रहा है,तो वह इमरान के घर जा कर नोटबुक में लिखी बातें इमरान की मां से कहकर इमरान के साथ उसकी बहन को भी स्कूल में पढ़ने के लिए ले आता हैं.

उधर डीपीएस स्कूल के व्यवस्थापकों व जुनैद से बच्चों को पढ़ाने के तरीके पर फिरदौस की नोंकझोक चलती रहती है. एक दिन तंग आकर फिरदौस नौकरी छोड़ देती है.

इधर कबीर, इमरान को गणित के गलत सूत्र पढ़ा देता है, जिसके चलते वार्षिक परीक्षा में इमरान फेल हो जाता हैं. इमरान रोते हुए ब्लैकबोर्ड पर गणित के सूत्र को लिखकर कबीर से कहता है कि आपने ही पढ़ाया था तो फिर मैं फेल कैसे हो गया? मैं फेल नहीं हो सकता. कबीर को अपनी गलती का अहसास होता है. वह सरकारी अफसर के पास जाकर अपनी गलती मानते हुए नौकरी छोड़ देता है. इमरान को पास कर दिया जाता है.

तो दूसरी तरफ शादी के दिन फिरदौस को पता चलता है कि उसके होने वाले पति जुनैद के बच्चे की मां एक अन्य औरत बनने वाली है. फिरदौस शादी तोड़कर पुनः वूलर स्कूल में नौकरी करने पहुंच जाती है, बच्चे खुश हो जाते हैं. फिरदौस अपनी नोटबुक उठाती हैं, तो उसमें खाली पड़े पन्नों में कबीर ने अपनी कहानी लिख रखी है जिसे पढ़कर फिरदौस को भी कबीर से प्यार हो जाता हैं. वह कबीर से मिलने उसके घर पहुंचती हैं. कबीर ही मिलता मगर पता चलता है कबीर के पिता ने ही फिरदौस को गणित पढ़ाया था. फिरदौस के पिता ने ही कबीर के कश्मीरी पंडित परिवार को श्रीनगर छोड़ने पर मजबूर किया था. फिरदौस के पिता ने ही कबीर के घर को जलाने का असफल प्रयास किया था.

एक दिन जब इमरान के पिता गुस्से से इमरान को ले जाने आते हैं तभी कबीर वहां पहुंचता हैं और नाटकीय घटनाक्रम के बाद इमरान के पिता इमरान को छोड़कर चले जाते हैं. कबीर व फिरदौस के प्यार को मुकाम मिलता है.

2014 की सफलतम थाई फिल्म ‘टीचर्स डायरी’ की भारतीयकरण वाली फिल्म ‘नोटबुक’ कमजोर पटकथा के चलते विषयवस्तु के साथ न्याय करने में पूरी तरह से विफल रहती है. फिल्म कहीं न कहीं वर्तमान सरकार के एजेंडे वाली असफल फिल्म है. फिल्म की कहानी के केंद्र में कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडितों की भी बात है.

कश्मीर में फिल्मायी गयी इस फिल्म में प्रेम कहानी ठीक से उभर नहीं पाती है. मगर फिल्म में कश्मीर के वर्तमान हालातों, शिक्षा को लेकर वहां के कट्टर मुस्लिमों की सोच, कश्मीरी पंडितों के पलायन जैसे मुद्दों को भी हलके फुलके ढंग से चित्रित किया गया है. मगर कमजोर पटकथा के चलते फिल्मकार नितिन कक्कड़ पूणरूपेण एक बेहतरीन फिल्म बनाने में असफल रहे हैं. फिल्मकार ने जिस प्रेम कहानी को पेश किया हैं, उससे दर्शक खुद को जोड़ नहीं पाता. सरलतावादी राजनीति के रूखेपन के बीच प्रेम कहानी अपना असर नहीं डालती.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो जहीर इकबाल व प्रनूतन बहल की यह पहली फिल्म है, पर दोनों अपनी अभिनय प्रतिभा की छाप छोड़ने में असफल रहे हैं. फिल्मकार नितिन ने इनकी कमजोरी को छिपाने के लिए ज्यादातर दृश्य लांग शौट यानी कि काफी दूर से ही फिल्माए हैं. दोनों कलाकारों के चेहरे पर आपेक्षित भाव नहीं आते. घाटी के खूबसूरत दृश्यों के बीच दोनों कलाकारों का लकड़ी की तरह सपाट चेहरा पैबंद नजर आता है. फिरदौस द्वारा जुनैद से शादी तोड़कर वहां से निकलने वाले दृश्य में जरुर एक आत्मविश्वास प्रनूतन बहल में नजर आता है. प्रनूतन बहल व जहीर इकबाल से कई गुना बेहतर परफार्मेंस तो बाल कलाकारों की है.

जहां तक गीत संगीत का सवाल है, तो संगीतकार असफल ही रहे हैं. मगर फिल्म के कैमरामैन मनोज कुमार खटोई बधाई के पात्र है जिन्होंने अपने कैमरे से घाटी की सुंदरता को चित्रित कर कई जगह फिल्मकार की मदद की हैं.

एक घंटा 52 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘नोटबुक’ का निर्माण सलमान खान, मुराद खेतानी व अश्विन वर्दे ने किया है. फिल्म के निर्देशक नितिन कक्कड़, लेखक शरीब हाशमी व पायल असर, पटकथा लेखक दराब फारूकी, संगीतकार विषाल मिश्रा व ज्यूलियस पकम, कैमरामैन मनोज कुमार खटोई तथा कलाकार हैं- जहीर इकबाल ,प्रनूतन बहल व अन्य.

सोनाक्षी सिन्हा ने दिया करारा जवाब, देखें विडियो

बौलिवुड आदाकार सोनाक्षी सिन्हा ने सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों को करारा जवाब दिया है. दरअसल सोशल मीडिया पर लोग सोनाक्षी के वजन को लेकर काफी ट्रोल करते हैं. इस बारे में सोनाक्षी ने बताया कि वो ऐसे लोग को ब्लौक कर देती हैं.

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कमेंट पढ़कर कभी-कभी लगता है कि लोगों को उनके बारे में उनसे भी ज्यादा जानकारी है. सोनाक्षी सिन्हा ने ये बातें क्विक हिल पिंच बाई आरबाज खान शो में कही हैं. आपको बता दें, इस शो में अरबाज खान बौलीवुड के अलग-अलग सितारों से सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग को लेकर बात करते हैं. इसी दौरान एक यूजर ने तो उनके लिए अबे मोटी भी लिखा. ऐसे लोगों को जवाब देते हुए सोनाक्षी ने कहा, ”जब मैंने दबंग की थी तो मैं अनफिट थी. मैंने 30 किलो वजन किय. तब भी लोग बात करते थे. इसके बाद से ही मैंने सुनना बंद कर दिया. जो मैंने पसीना बहाया है वो भी उन्हें नहीं दिखता. मैंने अपना वजन कम करने के लिए बहुत मेहनत की है. लोगों को मेरी आधी मेहनत भी नहीं दिखती. लोग फिर भी बातें करते हैं, तो अब जिसे देखना है उसे देखो नहीं तो मत देखो.”

सोनाक्षी के इंस्टाग्राम की एक तस्वीर पर एक यूजर ने लिखा, ”इन लोगों ने शरम बेच खाई है? क्या इनका कल्चर ये है?”  इसके जवाब में सोनाक्षी ने कहा, ”मतलब हमारे कल्चर के सारे रखवाले इंस्टाग्राम पर बैठे हैं. ये वही लोग हैं जो फौरेन की अभिनेत्रियों की बिकिनी की तस्वीरें लाइक करते हैं और उन्हें फौलो भी करते हैं. मैं ऐसी पर्सन नहीं हूं जो ऐसी ड्रेस नहीं पहनती जो कंफर्टेबल ना हो.”

जब अरबाज ने सोनाक्षी से पूछा कि वो इंस्टा पर क्यों हैं तो उन्होंने कहा, ”मैं अपने फैंस से जुड़ने के लिए इंस्टाग्राम पर हूं. वहां पर नफरत से ज्यादा प्यार मिलता है. कुछ लोग हैं जो आपको प्रेरित करते हैं. सपोर्ट भी करते हैं. ये मेरे फैंस के साथ डायरेक्ट कनेक्ट है.”

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