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कैंसर का कारण बन सकती है गले की खराश

कैंसर एक जानलेवा बीमारी है, अगर समय रहते इसे पहचान ला जाए तो मरीज की जान बचाई जा सकती है. कैंसर के साथ परेशानी होती है कि शुरुआती समय में इसके लक्षण समाने नहीं आ पाते. पर हालिया स्टडी में बात सामने आई है कि कैंसर के लक्षण के बारे में बताया जा सकता है.

क्या कहती है स्टडी

स्टडी में कहा गया है कि लगातार गले में खराश या गला खराब रहना कैंसर का एक लक्षण हो सकता है. रिपोर्ट की माने तो गले की खराश के साथ साथ अगर कान में दर्द होता है, या कुछ खाने या सांस लेने में दिक्कत होती है तो ये लैरिंक्स कैंसर का लक्षण हो सकता है.

ब्रिटिश जर्नल औफ जरनल प्रैक्टिस में प्राकशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्टडी से कैंसर के शुरुआती समय में पहचान करने में मदद मिलेगी.

क्या कहते हैं जानकार

स्टडी में शामिल जानकारों की माने तो ये पहली ऐसी स्टडी है जिसमें लैरिंक्स कैंसर के लक्षण के बारे में जानकारी दी गई है. जानकारों ने आगे कहा कि गला बैठना लैरिंक्स कैंसर के अहम लक्षण है. स्टडी में ये भी बताया गया है कि बार-बार गले में खराश रहने से इस कैंसर का खतरा अधिक बढ़ जाता है.

कौन थे सैंपल

स्टडी में लगभग 800 से ज्यादा लैरिंक्स कैंसर से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया है. स्टडी की रिपोर्ट में सामने आया कि 5 फीसदी से ज्यादा लोगों को कैंसर लगातार गले में खराश रहने के कारण हुआ.

कोई बेवजह हाथ में पत्थर या बंदूक नहीं उठाता : सोनी राजदान

आज की यंग जेनरेशन उन्हे एक्ट्रेस आलिया भट्ट की मां के रूप में भी जानती हैं. पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘‘राजी” में उन्होंने एक कश्मीरी मां के किरदार में नजर आयी थीं. हम बात कर रहे हैं टैलेंटेड एक्ट्रेस सोनी राजदान की जो मूलतः कश्मीरी पंडित हैं. लेकिन इंग्लैंड में पली बढ़ी हैं. इन दिनों वो डायरेक्टर अश्विन कुमार की फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ को लेकर चर्चा में है. जो 5 अप्रैल को रिलीज होगी. इस फिल्म में वो एक बार फिर वह कश्मीरी महिला के किरदार में नजर आएंगी.

पेश है सोनी राजदान के साथ ‘‘सरिता’’पत्रिका के लिए हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश…

सवाल: फिल्म ‘‘36 चौरंगी लेन’’से लेकर ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’तक के सिनेमा में आपने क्या बदलाव देखा? आपको क्या लगता है कि 38 सालों में सिनेमा कहां से कहां पहुंचा?

जवाब: धीरे-धीरे काफी कुछ बदलाव आ गया है. मेरी राय में भारतीय सिनेमा में बदलाव की  शुरुआत फिल्म ‘‘रंग दे बसंती’’ से हुई थी. क्योकि मुझे याद है कि उस वक्त बौलीवुड के एक बहुत बड़े और फेमस फिल्म क्रिटिक (मैं उनका नाम लेकर उन्हें बेवजह शर्मिंदा नहीं करना चाहती) ने दावा किया था कि अगर फिल्म ‘रंग दे बसंती’ सफल हो गयी, तो वह अपना नाम बदल देंगे.

उसी वक्त मैंने अपने पति व फिल्मकार महेश भट्ट से कहा कि अब इस फिल्म आलोचक को 100 प्रतिशत अपना नाम बदलना पड़ेगा. क्योंकि यह फिल्म सफलता के झंडे जरूर गाड़ेगी. हुआ भी यही फिल्म ‘‘रंग दे बसंती’’ को मिली सफलता से पूरा बौलीवुड सकते में आ गया था. पहली बार बौलीवुड को अहसास हुआ था कि दर्शक बदल रहा है और उसे इस तरह की फिल्में दी जानी चाहिए.

इतना ही नहीं जब हमने ‘36 चौरंगी लेन’ या ‘सारांश’ की थी, तब भी हमें यकीन था कि यह फिल्में पसंद की जाएंगी. ‘सारांश’ तो सेमी कमर्शियल फिल्म थी. मगर ‘‘36 चौरंगी लेन’’ पूरी तरह से आर्ट फिल्म थी, लेकिन दर्शकों ने इन दोनों फिल्मों को पसंद किया था.

मैं मानती हूं कि उन दिनों इस तरह की फिल्मों को बनाना मुश्किल काम था. लेकिन आज भी कंटेंट बेस्ड सिनेमा बनाना आसान काम नहीं है. सच कह रही हूं, चाहे आज से 20 साल पहले का समय हो या आज का समय हो, जब भी फिल्मकार कुछ हट कर यानी कि एक अलग तरह के कौन्सेप्ट पर फिल्म बनाने की कोशिश करता है, तो उसे कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है. अगर किसी गंभीर विषय की फिल्म बना रहे हैं, तो और मुश्किल हो जाती है.

लेकिन मैं यह मानती हूं कि पिछले तीन चार सालों में सिनेमा बहुत तेजी से बदला है. ‘ए वेडनेस्डे’, ‘स्त्री’ जैसी फिल्में सफल हुई हैं. जबकि इनमें आम बौलीवुड मसाला फिल्मों की तरह गाने नहीं थे और ना ही प्रेम कहानी थी. तो अब सिनेमा उस दौर में पहुंच गया है, जहां कंटेंट का महत्व बढ़ गया है. अब कंटेंट ही किंग हो गया है. अब किसी भी फिल्म के लिए स्टार कोई मायने नहीं रखते. मगर पहले कहानी की बजाय स्टार कलाकार मायने रखते थे. उस वक्त हर फिल्म निर्माता और वितरक एक ही बात कहता था कि स्टार होगा, तभी फिल्म को बाक्स आफिस पर सफलता मिलेगी. उस वक्त नाच गाना इंपोरटेंट था. आपकी फिल्म की कहानी बकवास हो, लेकिन दो तीन अच्छे गाने हों, तो फिल्म चल जाती थी.

मेरे कहने का मतलब यह कि  एक समय वह था, जब कहानी की बजाय बेहतर म्यूजिक दर्शकों को बौक्स आफिस तक खींच लाता था. लेकिन अब हम सभी इस बात को गंभीरता के साथ महसूस कर रहे हैं कि स्टार या नाच गाना नहीं बल्कि कहानी और कंटेंट बहुत मायने रखता है. यही वजह है कि आज की तारीख में निर्माता निर्देशक से लेकर एक्टर तक फिल्म की स्टोरी को महत्व देने लगे हैं. आज की तारीख में स्टार्स के नाम पर किसी भी तरह की फिल्म नहीं बना सकते हैं. आज तो पहली शर्त है अच्छी स्क्रिप्ट. यही वजह है कि मैंने फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’की. क्योंकि इस फिल्म की स्टोरी बहुत सुंदर और जबरदस्त है. ये एक यूनिक फिल्म है. बहुत ही आउट स्टैडिंग स्क्रिप्ट है. अश्वनी कुमार की लिखावट की तारीफ करनी पड़ेगी.इस फिल्म को देखकर आप खुद फैसला दीजिएगा कि फिल्म कैसी है?

 जब आपको फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ का औफर मिला, तो इसकी स्क्रिप्ट में क्या खास बात थी, जिसके चलते आपने फिल्म स्वीकार की. वरना आप तो काफी कम फिल्में कर रही हैं?

पहली बात तो ये कि कम फिल्में करना मेरी च्वौइस नही है.मेरे पास लोग अपनी फिल्म का औफर लेकर नहीं आते, तो मैं क्या करुं? बहरहाल,हम ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ की बात करते हैं. जब अश्वनी कुमार मेरे पास इस फिल्म का औफर लेकर आए, तो फिल्म की स्क्रिप्ट एक अंडर स्टैंडिंग के प्वाइंट से लिखी गयी है. स्क्रिप्ट को पढ़कर मुझे अहसास हुआ कि हम इसमें उस कश्मीर को देखने वाले हैं, जिसे सामान्यतः हम नही देखते हैं. इस स्क्रिप्ट को पढ़कर मैंने कश्मीर को लेकर कुछ सीखा, जो कि सामान्यतः हमें सीखने को नहीं मिलता. तो मुझे यह बात अच्छी लगी. मुझे अहसास हुआ कि फिल्म के डायरेक्टर अश्वनी कुमार कश्मीर को बेहतर तरीके से जानते हैं. उनकी वजह से मैं भी उसी दिशा में जा रही हूं, जिसके बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है. कश्मीर को लेकर हम हमेशा एक पक्ष ही देखते हैं. दूसरा पक्ष देखने को नहीं मिलता. लेकिन मुझे स्क्रिप्ट में ये बात पसंद आयी कि ये स्क्रिप्ट/फिल्म उस दूसरे पक्ष की भी बात करती है. इतना ही नहीं, यह महज एक गंभीर फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर विषयवस्तु पर है. इस फिल्म ने मुझे 2013 की ब्रायन पर्सीवल निर्देशित हौलीवुड फिल्म ‘‘बुक थीफ’ ’की याद दिला दी,जिसमें जियोफ्री रश, एमली वाट्सन और सोफी नेलिसे मुख्य भूमिका में थे. यह फिल्म दूसरे विश्व युद्ध के समय जर्मनी की पृष्ठभूमि पर है. लेकिन यह फिल्म फाइटर पायलट, हिटलर या बम बार्मिंग को लेकर नहीं है. यह फिल्म जर्मनी के छोटे से शहर की है, जिसमें दिखाया गया है कि दूसरे विश्व युद्ध ने छोटे शहर के जीवन को किस तरह प्रभावित किया है. बड़ी खूबसूरत फिल्म है.

फिल्म ‘‘बुक थीफ’’ की कहानी नाजी युग में जर्मन परिवार द्वारा गोद ली गई एक लड़की के बारे में है. जो अपने पालक माता पिता द्वारा दी गयी सीख के अनुसार अपनी किताबे यहूदी शरणार्थियों के साथ साझा करती है. इसमें मानवता के सूत्र की बात की गयी है.

तो फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ की स्क्रिप्ट पढ़कर मैंने सोचा कि यह फिल्म भी उसी तरह की है. यह फिल्म एक कौन्फिलिक्ट जोन की कहानी है. फिल्म में कश्मीर की पृष्ठभूमि में ढेर सारा ड्रामा चल रहा है. लेकिन इस बड़े कौन्फिलिक्ट से छोटे शहर के लोग प्रभावित हो रहे हैं, उनकी जिंदगी प्रभावित हो रही है. इस फिल्म में एक्टिंग करना मेरे लिए एक अलग अनुभव रहा.

फिल्म ‘‘नो फादर इन कश्मीर’’ में आपका अपना किरदार क्या है?

मैंने इसमें ‘हलीमा’ नामक कश्मीरी औरत का किरदार निभाया है, जिसने अपने बेटे अरशद को खोया है. उसे अपना बेटा नजर नही आ रहा है. मेरी ही तरह तमाम लोग अपने बेटे को खो चुके है. एक दिन मेरी पोती नूर, जो कि ब्रिटेन में रह रही है, वह अपने पिता की खोज में कश्मीर आती है. फिर कश्मीर की समस्याओं पर बात होती है. इस फिल्म में मेरे इमोशंस को बेहतर ढंग से दिखाया गया है.

 मुंबई में रहते हुए कश्मीर को लेकर आपकी एक समझ रही होगी. अब कश्मीर जाने के बाद वह समझ कितनी बदली है?

बहुत बदली है. हकीकत में हम मुंबई में बैठकर सही मायने में कश्मीर को समझ नही सकते. कश्मीर को समझने के लिए आपको बहुत कुछ पढ़ना और देखना पड़ेगा. बहुत कुछ शोध करना पड़ेगा. इसके बावजूद कश्मीर में जाकर वहां के गांव के लोगों से बात कर कश्मीर को सही मायनों में समझना पड़ेगा. जब आप कश्मीर के छोटे शहरों और गांव में जाएंगें, तो आपकी समझ में आएगा कि कश्मीरी कितने विनम्र, मेहमाननवाजी वाले प्यारे इंसान हैं. तहजीब के साथ जिंदगी जीने वाले शांत प्रिय लोग हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के परिवार के बच्चे क्यों हाथ में पत्थर उठाते हैं? या आतंकवाद की राह पकड़ लेते हैं? या बंदूक उठा लेते हैं? इसके पीछे कोई वजह होगी, जिसे हमें समझना पड़ेगा. कोई बेवजह तो हाथ में पत्थर या बंदूक नहीं उठाएगा. इसके पीछे कुछ न कुछ तो कारण हैं. इन कारणों को जानने की कोशिश देश के सभी लोगों को करनी चाहिए और उस सच को स्वीकार भी करना चाहिए. कश्मीरीयों  की समस्या को समझना भी चाहिए. वरना समस्या का हल नही निकल सकता.

 आप ‘‘राजी’’और ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ की शूटिंग के लिए कश्मीर जा चुकी हैं. वहां के लोगों से आपकी बात हुई होगी. क्या अनुभव रहें?

हां! मैने तमाम लोगों से बातचीत की. वहां की जो समस्या है, उसकी वजह शायद यह है  कि उन्हें न्याय नही मिला. उनकी समस्या को हल करने के लिए कोई सरकार आगे नहीं आती. वर्तमान राजनैतिक माहौल में कश्मीर के लोग अपने आपको बेसहाय पाते हैं. लेकिन इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वजह यह है कि कश्मीर का नौजवान बेरोजगार है. उसके पास करने के लिए कुछ नही है. स्कूल के बाद युवा पीढ़ी अपने घर जाकर खाली बैठी रहती है. सिनेमा थिएटर भी नही है. मनोरंजन का भी कोई साधन नही है. नौकरी नही है. लेकिन वहां के लोग जो भी कर सकते हैं, वह कर रहे हैं. हां!जिस तरह से लोग मुंबई या दूसरे शहरों में संघर्ष करते हैं, उस तरह का संघर्ष उनका नहीं है. वह एक अलग तरह की जिंदगी जी रहे हैं. लेकिन उस तरह की जिंदगी वह जीना नहीं चाहते. उन्हें अपनी जिंदगी में आशा और उम्मीद चाहिए. उन्हें जिंदगी जीने का मकसद चाहिए, जो कि वहां की युवा पीढ़ी के लिए कुछ भी नही है. इस दिशा में बदलाव आना चाहिए. मुझे यकीन है कि यह बदलाव आएगा. लेकिन जितनी जल्दी बदलाव आएगा, उतना ही अच्छा है. क्योंकि कश्मीर की आज की युवा पीढ़ी आतंकवाद के दौरान पली बढ़ी है. उनके लिए आतंकवादी घटनाएं आम हैं. आतंकवादी घटनाओं के बीच जिंदगी जीना उनके लिए बहुत मामूली सी बात है. लेकिन इसके साथ वह कुछ न कुछ काम करना चाहते हैं. अगर कश्मीर की युवा पीढ़ी को नौकरी मिल जाए, मनोरंजन के कुछ साधन मिल जाएं, तो वहां हाथ पत्थरबाजी या  बंदूक की तरफ नहीं जाएगा.

 कश्मीर की यह जो मूलभूत समस्या है, उसके लिए दोषी सरकार है या फिर कोई औऱ?

एक नही कई दोषी हैं. पूरा सरकार तंत्र गड़बड़ है. कश्मीर के लोग भी कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेदार हैं. सरकार, राजनीति,कश्मीर के लोग और दूसरों की दखलअंदाजी मिले-जुले रूप से कश्मीर के अंदर की समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. जब लोग मदद की उम्मीद लगाए हों और मदद ना मिले, तो क्या होगा? इसलिए सबसे बड़ी जरुरत उनकी इन समस्याओं को सुनने की है. देखिए, यह कहना बहुत मूर्खतापूर्ण बात है कि वह डल झील में होटेल चला रहे हैं. हम यह क्यों भूल जाते हैं कि उन्हें मनोरंजन भी चाहिए. वह भी देश के दूसरे हिस्से के लोगों की तरह सामान्य जिंदगी जीना चाहते हैं.जब यह हो जाएगा, तो वहां की काफी समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी.

फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ के प्रदर्शन के बाद इस फिल्म का क्या असर होगा?

मैं सोचती हूं कि हमेशा परिस्थितियों की अच्छी समझ हर इंसान को होना जरूरी है. यह फिल्म लोगों को सोचने लेकिन मजबूर करेगी. मैं अपनी बात कहूं तो फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद कश्मीर को लेकर मेरे मन में उत्सुकता बढ़ी. मेरे अंदर इच्छा हुई कि मैं कश्मीर के बारे में और अधिक से अधिक जानकारी हासिल करूं. इस फिल्म के बाद कश्मीर को लेकर लोगों के अंदर एक उत्सुकता बढ़ेगी. यह फिल्म समस्या ग्रस्त कश्मीर को समझने में लोगों की मदद करेगी. मेरा मानना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह फिल्म देखनी चाहिए.

आपने कुछ टीवी सीरियलों में भी अभिनय किया है. आज आपको टीवी कैसा नजर आ रहा है?

काफी समय पहले मैंने टीवी देखना बंद कर दिया था. मेरे अनुसार टीवी का पतन हो चुका है. टीवी पर जिस तरह की कहानी दिखायी जा रही हैं, उससे मैं रिलेट नहीं कर सकती. टीवी लेकिन जो कुछ परोसा जा रहा है, उसका मेरी जिंदगी से कोई ताल्लुक ही नही  है. लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि वह सीरीयलों से खुद को जोड़ पा रहे हैं. अब मैं तो किसी को टीवी देखने से मना नहीं कर सकती न.

गूगल प्लस 2 अप्रैल से हो रहा है बंद, जानिए पूरी खबर

गूगल अपनी सोशल नेटवर्किंग सर्विस गूगल+ को आज से यानि 2 अप्रैल से बंद होने जा रही है. जी हां सही सुना आपनें कंपनी गूगल+ के यूजर्स का डेटा 2 अप्रैल से डिलीट करना शुरू कर देगी. गूगल ने अपनी इस सर्विस को पूरी तरह बंद करने की घोषणा पिछले साल ही कर दी थी. 2019 में फरवरी से ही कंपनी ने गूगल+ के कई फीचर्स औफलाइन करना शुरू कर दिए हैं. कंपनी अब अपने यूजर्स का डेटा डिलीट करने की शुरुआत करने जा रही है, ऐसे में जरूरी है कि आप डेटा का बैकअप रख लें या फिर अकाउंट आर्काइव में सेव होने से पहले ही डिलीट कर दें.

क्यों बंद हो रहा है गूगल प्लस?

एक बड़ा सिक्योरिटी इश्यू सामने आने के बाद गूगल ने इस सर्विस को बंद करने का फैसला लिया था. गूगल का कहना था कि गूगल प्लस को बंद करने की वजह इसे यूजर्स की ओर से मिल रही प्रतिक्रिया भी रही. कंपनी का कहना है कि सोशल प्लैटफौर्म पर यूजर्स का इंगेजमेंट तेजी से घटता जा रहा था और इसपर ज्यादातर यूज सेशन पांच सेकंड्स तक सिमट गए थे.

साथ ही बताया जा रहा है कि एक सौफ्टवेयर गड़बड़ी के कारण 2015 से 2018 के बीच बाहरी डेवलपर्स ने गूगल प्लस प्रोफाइल के डेटा में सेंध लगाने की कोशिश की. गूगल के मुताबिक करीब 5 लाख लोगों के निजी डेटा में सेंध लगाई गई थी. हालांकि गूगल ने दावा किया है कि उस बग को ठीक कर लिया गया था. असुरक्षित डेटा में प्रोफाइल नेम, ईमेल ऐड्रेस, औक्युपेशन, जेंडर और ऐज जैसे डेटा शामिल थे. कंपनी का दावा है कि इसके अलावा और कोई भी डेटा इसमें शामिल नहीं था जिसे आपने गूगल प्लस पर पोस्ट किया हो.

समर टिप्स: अब नहीं पड़ेगी सनस्क्रीन लगाने की जरूरत…

गर्मियों में धूप से शरीर में डिहाइड्रेशन के साथ-साथ सूर्य की यूवी किरणों के प्रभाव में आने से स्किन में मैलानिन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे स्किन की रंगत पर भी असर पड़ता है. जब मैलानिन त्वचा के निचले हिस्सों में पैदा होने के बाद ऊपरी हिस्सों तक पहुंचता है तो स्किन काली पड़ जाती है. धूप में त्वचा की पूरी नमी खत्म हो जाती है, जिसके कारण स्किन  ड्राई और बेजान पड़नी शुरू हो जाती है. ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसा उपाय जिसके बाद आपको कभी भी सनस्क्रीन लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

ओरल सनस्क्रीन टैबलेट Vs सनस्क्रीन लोशन

सूर्य की अल्ट्रावौयलेट किरणों से स्किन को बचाने के लिए नए विकल्प के रूप में ओरल सनस्क्रीन टैबलेट्स मौजूद हैं. स्कीनोवेशन के डायरेक्टर कल्पेश गावड़े ने भारत में हेलीओकेयर ओरल उत्पाद लांच किया है, जो पूरी तरह से रिसर्च और टेस्ट के बाद ही मार्केट में लाया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि सन प्रोटेक्शन के पुराने तरीके पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि ज्यादातर महिलाएं बहुत कम सनस्क्रीन लोशन का इस्तेमाल करती हैं. महिलाएं शरीर के सभी दिखने वाले हिस्सों का कवर करना या तो भूल जाती हैं या फिर उन्हें लगता है कि सिर्फ फेस को कवर करना ही काफी है.

हानिकारक किरणों से बचने के लिए है बेहतर विकल्प

दूसरी ओर क्रीम या लोशन को अच्छी तरह से काम करने के लिए हर कुछ घंटों बाद दोबारा लगाने की जरूरत पड़ती है, मगर ज्यादातर महिलाओं के पास समय नहीं होता है. इसी वजह से महिलाएं इसे इस्तेमाल करने से कतराती हैं. सनस्क्रीन लोशन हर किसी की स्किन को सूट नहीं करता और इससे एलर्जी आदि की समस्या भी हो जाती है. ऐसे में सनस्क्रीन टैबलेट्स फायदेमंद हैं.

अगर कहीं बाहर जाने के लिए आपने मेकअप आदि किया है तो उस के साथ सनस्क्रीन लोशन लगाना किसी मुसीबत से कम नहीं है. ऐसे में टैबलेट एक अच्छा विकल्प है ताकि मेकअप भी ठीक रहे और स्किन भी सुरक्षित रहे.

टैबलेट में है क्या….

ओरल सनस्क्रीन टैबलेट्स में अनार, विटामिन सी, विटामिन ई, कैरोटीनोइड जैसी चीजें होती हैं. नई गोलियों में फर्न से निकाले गए पोलीपोडियम ल्यूकोटोमोस होते हैं. साथ ही इन में ऐंटीऔक्सीडेंट भी होता है. ये सभी मिल कर धूप से बचाव तो करते ही हैं साथ ही डैमेज हो चुकी त्वचा को भी सही करने का काम करते हैं.

स्किन को बचाने के अलावा यह सिर व पैरों को भी कवर करता है जहां सनस्क्रीन लोशन लगाना संभव नहीं है. साथ ही यह धूप में बालों को रंग उड़ने से भी रोकता है. स्वीमिंग और एक्सरसाइज के दौरान ओरल सनस्क्रीन टैबलेट ज्यादा फायदेमंद है, क्योंकि लोशन को दोबारा लगाना संभव नहीं होता.

ध्यान दें…………

वैसे तो इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है, लेकिन अगर आप को कोई गंभीर बीमारी है, तो इसे लेने से पहले डाक्टर से एक बार सलाह जरूर ले लें.

“ओरल सनस्क्रीन टैबलेट्स में ऐंटीऔक्सीडैंट, विटामिन सी, विटामिन डी, लाइकोडीन और अन्य कई चीजें पाई जाती हैं, जिनके कारण इसे मल्टीविटामिन हैल्थ सप्लीमेंट कह सकते हैं. लेकिन इसकी मेन प्रौपटी यूवी किरणों से प्रोटैक्ट करना ही है.” -ऐप्पल स्किन क्लीनिक की डर्मेटोलॉजिस्ट

(दीप्ति ढिल्लो से शिखा जैन द्वारा की गई बातचीत पर आधारित लेख)

छेना रबड़ी बनाने की रेसिपी

रबड़ी मालपुआ खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है और ये बच्‍चों को भी पसंद आती है. और हां, रबड़ी मालपुआ  बनाने में भी बेहद आसान है. तो फिर सोच क्‍या रहे हैं, आप भी छेना रबड़ी बनाने की विधि ट्राई करके देखें.

सामग्री :

– पनीर 100 ग्राम (कद्दूकस किया हुआ),

– दूध ( 04 कप)

– शक्कर (08 बड़े चम्मच)

– सिंघाड़े का आटा ( 04 बड़े चम्मच)

– छोटी इलायची 02 (छीलकर पीस लें)

– काजू  02 छोटे चम्मच (कटे हुए)

– बादाम  02 छोटे चम्मच (कटे हुए)

छेना रबड़ी बनाने की विधि :

–  सबसे पहले 4 बड़े चम्मच दूध में सिंघाड़े का आटा मिलाकर उसका पेस्ट बना लें.

– बचे हुए दूध को उबाल लें.

– इसके बाद दूध में सिंघाड़े का पेस्ट मिला दें और आंच को मीडियम करके पकाएं.

– जब दूध की मात्रा आधी रह जाए, उसमें पनीर मिला दें.

– इसके बाद शक्कर मिलाएं और 5 मिनट तक चलाते हुए पकाएं.

– आंच बंद कर दें और इलायची का पाउडर तथा काजू-बादाम ऊपर से छिड़क दें.

– लीजिए छेना रबड़ी बनाने की विधि कम्‍प्‍लीट हुई.

कलावती और मलावती का दुखद अंत

27 जून, 2018 की उमस और गरमी भरी सुबह थी. इंसान तो इंसान, जानवरों तक की जान हलकान थी. बिहार के पूर्णिया जिले के थाना जलालगढ़ क्षेत्र के रामा और विनय नाम के दोस्तों ने तय किया कि वे बिलरिया ताल जा कर डुबकी लगाएंगे. वैसे भी वे दोनों रोजाना अपने मवेशियों को बिलरिया ताल के नजदीक चराने ले जाते थे.

रामा और विनय जलालगढ़ पंचायत के गांव चकहाट के रहने वाले थे. उन के गांव से बिलरिया ताल 2 किलोमीटर दूर था. ताल के आसपास घास का काफी बड़ा मैदान था. चरने के बाद मवेशी गरमी से राहत पाने के लिए ताल में घुस जाते थे. फिर वह 2-3 घंटे बाद ही ताल से बाहर निकलते थे. उस दिन जब उन के मवेशी ताल में घुसे तो दोनों दोस्त यह सोच कर घर की ओर लौटने लगे थे कि 2-3 घंटे बाद आ कर मवेशियों को ले जाएंगे.

रामा और विनय ताल से घर की ओर आगे बढ़े ही थे कि तभी रामा की नजर ताल के किनारे के झुरमुट की ओर चली गई. झुरमुट के पास 2 लाशें पड़ी थीं. उत्सुकतावश वे लाशों के पास पहुंचे तो दोनों के हाथपांव फूल गए. दोनों लाशों के सिर कटे हुए थे और वे लाशें महिलाओं की थीं. यह देख कर दोनों चिल्लाते हुए गांव की तरफ भागे. गांव में पहुंच कर उन्होंने लोगों को बिलरिया ताल के पास 2 लाशें पड़ी की बात बताई.

उन की बातें सुन कर गांव वाले लाशों को देखने के लिए बिलरिया ताल के पास पहुंचे. जरा सी देर में वहां गांव वालों का भारी मजमा जुट गया. यह खबर गांव के रहने वाले अशोक ततमा के बेटे मनोज कुमार ततमा को हुई तो वह भी दौड़ादौड़ा बिलरिया ताल जा पहुंचा.

दरअसल, 4 दिनों से उस की 2 सगी बुआ कलावती और मलावती रहस्यमय तरीके से गायब हो गई थीं. वे 23 जून की दोपहर में घर से जलालगढ़ बाजार जाने के लिए निकली थीं. 4 दिन बीत जाने के बाद भी वे दोनों घर नहीं लौटीं तो घर वालों को उन्हें ले कर चिंता हुई. उन का कहीं पता नहीं चला तो 24 जून को मनोज ने जलालगढ़ थाने में दोनों की गुमशुदगी की सूचना दे दी थी.

बहरहाल, यही सोच कर मनोज मौके पर जा पहुंचा. वह भीड़ को चीरता हुआ झाडि़यों के पास पहुंचा तो कपड़ों से ही पहचान गया कि वे लाशें उस की दोनों बुआ की हैं. लाशों को देख कर मनोज दहाड़ मार कर रोने लगा था.

इसी बीच गांव का चौकीदार देव ततमा भी वहां पहुंच गया था. उस ने जलालगढ़ थाने के एसओ मोहम्मद गुलाम शहबाज आलम को फोन से घटना की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही एसओ आलम मयफोर्स आननफानन में बिलरिया ताल रवाना हो गए. एसएसआई वैद्यनाथ शर्मा, एसआई अनिल शर्मा, कांस्टेबल अवधेश यादव, अशोक कुमार मेहता, जयराम पासवान और उपेंद्र सिंह उन के साथ थे.

एसओ मोहम्मद आलम ने बारीकी से लाशों का मुआयना किया. दोनों लाशें क्षतविक्षत हालत में थीं. लग रहा था जैसे लाशों को जंगली जानवरों ने खाया हो. लाशों के आसपास किसी तरह का कोई सबूत नहीं मिला. पुलिस आसपास की झाडि़यों में लाशों के सिर तलाशने लगी. लेकिन सिर कहीं नहीं मिले.

इस का मतलब था कि हत्यारों ने दोनों की हत्या कहीं और कर के लाशें वहां छिपा दी थीं. कातिल जो भी थे, बड़े चालाक और शातिर किस्म के थे. मौके पर उन्होंने कोई सबूत नहीं छोड़ा था. पुलिस के लिए थोड़ी राहत की बात यह थी कि लाशों की शिनाख्त हो गई थी.

इस के बाद एसओ मोहम्मद आलम ने एसपी विशाल शर्मा और एसडीपीओ कृष्णकुमार राय को घटना की सूचना दे दी थी. उन्होंने घटनास्थल का मुआयना किया तो जिस स्थान से लाशें बरामद की गई थीं, वह इलाका उन के थाना क्षेत्र से बाहर का निकला. वह जगह थाना कसबा की थी. लिहाजा उन्होंने इस की सूचना कसबा थाने के एसओ अरविंद कुमार को दे दी.

एसओ कसबा अरविंद कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे. लेकिन उन्होंने भी उस जगह को अपना इलाका होने से साफ मना कर दिया. इलाके को ले कर दोनों थानेदारों के बीच काफी देर तक बहस होती रही.

तब तक एसपी विशाल शर्मा और एसडीपीओ कृष्णकुमार राय भी मौके पर जा पहुंचे. दोनों अधिकारियों के हस्तक्षेप और मौके पर बुलाए गए लेखपाल की पैमाइश के बाद घटनास्थल कसबा थाने का पाया गया. एसपी शर्मा के आदेश पर थानेदार अरविंद कुमार ने मौके की काररवाई निपटा कर दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दीं.

चूंकि कलावती और मलावती की गुमशुदगी जलालगढ़ थाने में दर्ज थी, इसलिए जलालगढ़ एसओ मोहम्मद आलम ने यह मामला कसबा थाने को स्थानांतरित कर दिया. एसओ अरविंद कुमार ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की छानबीन शुरू कर दी.

चूंकि बात 2 सामाजिक कार्यकत्रियों की हत्या से जुड़ी थी, इसलिए यह मामला मीडिया में भी खूब गरमाया. पुलिस पर जनता का भारी दबाव बना हुआ था. पुलिस की काफी छीछालेदर हो रही थी. एसपी विशाल शर्मा ने एसडीपीओ कृष्ण कुमार राय के नेतृत्व में एक टीम गठित की.

इस टीम में जलालगढ़ के एसओ मोहम्मद गुलाम शहबाज आलम, थाना कसबा के थानेदार अरविंद कुमार, मुफस्सिल थाने के एसओ प्रशांत भारद्वाज, तकनीकी शाखा प्रभारी एसएसआई जलालगढ़ वैद्यनाथ शर्मा, एसआई अनिल शर्मा, कांस्टेबल अवधेश यादव, अशोक कुमार मेहता, जयराम पासवान और उपेंद्र सिंह को शामिल किया गया.

एसडीपीओ कृष्णकुमार राय ने घटना की छानबीन की शुरुआत मृतकों के घर से की. मनोज से पूछताछ पर जांच अधिकारियों को पता चला कि कलावती और मलावती दोनों पतियों द्वारा त्यागी जा चुकी थीं. पतियों से अलग हो कर दोनों मायके में ही रह रही थीं.

मायके में रह कर दोनों सोशल एक्टिविस्ट का काम कर रही थीं. कलावती और मलावती की नजरों पर गांव के कई ऐसे असामाजिक तत्व चढ़े थे, जिन के क्रियाकलाप से लोग परेशान थे. उन में 4 नाम वीरेंद्र सिंह उर्फ हट्टा, लक्ष्मीदास उर्फ रामजी, बुद्धू शर्मा और जितेंद्र शर्मा शामिल थे. दोनों बहनों ने इन चारों पर कई बार मुकदमा दर्ज करा कर उन्हें जेल भी भिजवाया था.

जांच अधिकारियों को यह समझते देर नहीं लगी कि कलावती और मलावती की हत्या के पीछे इन्हीं चारों का हाथ है. फिलहाल पुलिस के पास उन के खिलाफ कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं था, जिसे आधार बना कर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता. उन पर नजर रखने के लिए जांच अधिकारी ने मुखबिरों को लगा दिया कि वे कहां जाते हैं, किस से मिलते हैं, क्याक्या करते हैं?

इधर एसओ कसबा अरविंद कुमार ने दोनों बहनों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई और केस को समझने में जुट गए थे. काल डिटेल्स में कुछ ऐसे नंबर मिले, जो संदिग्ध थे. उन नंबरों से कलावती और मलावती देवी को कई दिनों से लगातार फोन किए जा रहे थे. पुलिस ने उन संदिग्ध नंबरों की पड़ताल की तो वे नंबर मृतका के गांव चकहाट के रहने वाले वीरेंद्र सिंह उर्फ हट्टा और लक्ष्मीदास उर्फ रामजी के निकले.

काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने पूछताछ के लिए वीरेंद्र सिंह और लक्ष्मीदास को उन के घरों से हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. इसी बीच मुखबिर ने एसडीपीओ कृष्णकुमार राय को एक ऐसी चौंकाने वाली बात बताई, जिसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

मुखबिर ने बताया कि कलावती और मलावती की हत्या गांव के ही कई लोगों ने मिल कर की थी. उन में वीरेंद्र सिंह और लक्ष्मीदास के अलावा बुद्धू शर्मा और जितेंद्र शर्मा भी शामिल थे.

इस से पुलिस को पुख्ता जानकारी मिलगई कि दोहरे हत्याकांड में कई लोग शामिल थे. हिरासत में लिए गए वीरेंद्र और लक्ष्मीदास से सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही दोनों बहनों को मौत के घाट उतारा था.

‘‘लेकिन क्यों? ऐसा क्या किया था दोनों बहनों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो इतनी बेरहमी से कत्ल कर दिया?’’ एसडीपीओ कृष्णकुमार राय ने सवाल किया.

‘‘साहब, मैं अकेला नहीं मेरे साथ लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र भी थे. क्या करते साहब, दोनों बहनों ने हमारा जीना मुश्किल कर दिया था.’’

इस के बाद वीरेंद्र सिंह और लक्ष्मीदास ने पूरी घटना विस्तार से बताई. दोनों की निशानदेही पर पुलिस ने गांव चक हाट से बुद्धू और जितेंद्र शर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया. चारों आरोपियों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने श्मशान घाट के तालाब के पास से जमीन में दबाए हुए दोनों महिलाओं के सिर भी बरामद कर लिए.

उसी दिन शाम को आननफानन में पुलिस लाइन के मनोरंजन कक्ष में प्रैस कौन्फ्रैंस किया गया. 7 दिनों से रहस्य बनी सोशल एक्टिविस्ट कलावती और मलावती हत्याकांड की गुत्थी सुलझा चुकी पुलिस जोश से लबरेज थी.

प्रैस कौन्फ्रैंस में एसपी विशाल शर्मा ने बताया कि कलावती और मलावती की हत्या उसी गांव के रहने वाले वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मी दास, बुद्धू और जितेंद्र शर्मा ने मिल कर की थी. इस मामले में गांव के 12 लोग और शामिल थे, जिन्होंने घटना को अंजाम देने में आरोपियों की मदद की थी. जिन में 4 आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए.

इस के बाद पुलिस ने चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. आरोपियों के बयान के आधार पर पुलिस ने 16 लोगों वीरेंद्र सिंह उर्फ हट्टा, लक्ष्मीदास उर्फ रामजी, बुद्धू शर्मा, जितेंद्र शर्मा, दिलीप शर्मा, विनोद ततमा, प्रकाश ततमा, सोनू शर्मा, रामलाल शर्मा, विष्णुदेव शर्मा, पप्पू शर्मा, उपेन शर्मा, इंदल शर्मा, सुनील शर्मा, सतीश शर्मा और बेचन शर्मा के नाम पहली जुलाई के रोजनामचे पर दर्ज कर लिए. अभियुक्तों के बयान और पुलिस की जांच के बाद कहानी कुछ यूं सामने आई.

बिहार के पूर्णिया जिले के जलालगढ़ थानाक्षेत्र में एक गांव है— चक हाट. जयदेव ततमा इसी गांव के मूल निवासी थे. उन के 3 बच्चे थे, जिन में एक बेटे अशोक ततमा के अलावा 2 बेटियां कलावती ततमा और मलावती ततमा थीं. अशोक ततमा दोनों बेटियों से बड़ा था.

जयदेव ततमा का नाम चक हाट पंचायत में काफी मशहूर था. वह इलाके में बड़े किसान के रूप में जाने जाते थे. उन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई. उन की दिली इच्छा थी कि बच्चे पढ़लिख कर योग्य बन जाएं.

कलावती और मलावती बड़े भाई अशोक से बुद्धि और कलाकौशल में काफी तेज थीं. दोनों बहनें पढ़ाई के अलावा सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थीं. उन का सपना था कि बड़े हो कर समाज की सेवा करें.

पिता की मदद से कलावती और मलावती ने समाजसेवा की जमीन पर अपने पांव पसारने शुरू कर दिए. गरीबों और मजलूमों की सेवा कर के उन्हें बहुत सुकून मिलता था. बेटियों की सेवा भाव से पिता जयदेव ततमा खुश थे. धीरेधीरे वे गांव इलाके में मशहूर हो गईं.

बचपन को पीछे छोड़ कर दोनों बहनें जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थीं. पिता को बेटियों की शादी की चिंता थी. थोड़े प्रयास और भागदौड़ से जयदेव ततमा को दोनों बेटियों के लिए अच्छे वर और घर मिल गए.

समय से दोनों बेटियों के हाथ पीले कर के वे अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए. इस के बाद ब्याहने के लिए एक बेटा अशोक ततमा शेष रह गया था. बाद में उन्होंने उस की भी शादी कर दी. अशोक और उस की पत्नी जयदेव की सेवा पूरी जिम्मेदारी से कर रहे थे.

जयदेव ततमा के जीवन की गाड़ी बड़े मजे से चल रही थी. न जाने उन की खुशहाल जिंदगी में किस की नजर लगी कि एक ही पल में सब कुछ मटियामेट हो गया. कलावती और मलावती के पतियों ने उन्हें हमेशा के लिए त्याग दिया. वे वापस आ कर मायके में रहने लगीं. यह बात जयदेव से सहन नहीं हुई और वे असमय काल के गाल में समा गए.

अचानक हुई पिता की मौत से घर का सारा खेल बिगड़ गया. दोनों बहनों की जिम्मेदारी भाई अशोक के कंधों पर आ गई थी. लेकिन दोनों स्वाभिमानी बहनें भाई पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं. वे खुद ही कुछ कर के अपना जीवनयापन करना चाहती थीं.

एक बात सोचसोच कर अशोक काफी परेशान रहता था कि उस की बहनों ने ससुराल में आखिर ऐसा क्या किया कि उन के पतियों ने उन्हें त्याग दिया. जबकि वह बहनों के स्वभाव से भलीभांति परिचित था. फिर उन के बीच ऐसी क्या बात हुई, यही जानने के लिए अशोक ने दोनों बहनों से बात की.

बहनों ने ईमानदारी से भाई को सब कुछ सचसच बता दिया. दोनों बहनों के सोशल एक्टिविस्ट होने वाली बात भाई अशोक को पहले से पता थी. अपनीअपनी ससुराल में रहते हुए कलावती और मलावती गृहस्थी संभालने के बावजूद दिल से समाजसेवा का भाव नहीं निकाल सकी थीं.

ससुराल में कुछ दिनों तक तो दोनों बहनें घूंघट में रहीं. लेकिन जल्दी ही घूंघट के पीछे उन का दम घुटने लगा. ये बहनें स्वच्छंद और स्वतंत्र विचारों वाली, न्याय के लिए संघर्ष करने वाली जुझारू महिलाएं थीं. वे जिस पेशे से जुड़ी हुई थीं, उस के लिए उन का घर की दहलीज से बाहर निकलना बहुत जरूरी था.

जब कलावती और मलावती घर से बाहर होती थीं तो उन्हें घर वापस लौटने में काफी देर हो जाया करती थी. दोनों के पतियों को उन का देर तक घर से बाहर रहना कतई पसंद नहीं था, उन का कामकाज भी. पति उन्हें समझाते थे कि वे समाजसेवा का अपना काम छोड़ दें और घर में रह कर अपनी गृहस्थी संभालें. समाजसेवा करने के लिए दुनिया में बहुत लोग हैं.

पतियों के साथ ही सासससुर भी उन के काम से खुश नहीं थे. वे उन के काम की तारीफ करने या उन की मदद करने के बजाय उन का विरोध करते थे. धीरेधीरे ससुराल वाले उन के कार्यों का विरोध करने लगे. उन की सोच में टकराव पैदा होता गया. कलावती और मलावती समाजसेवा के काम से पीछे हटने को तैयार नहीं थीं.

पतियों ने इस बात को ले कर ससुर जयदेव ततमा और साले अशोक से भी कई बार शिकायतें कीं. इस पर अशोक और उस के पिता ने कलावती और मलावती को काफी समझाया, पर अपनी जिद के आगे दोनों बहनों ने उन की बात भी नहीं मानी.

आखिर जयदेव ततमा और अशोक को जिस बात का डर था, वही सब हुआ. विचारों के टकराव और अहं ने पति और पत्नी के बीच इतनी दूरियां बना दीं कि वे एकदूसरे की शक्ल देखने को तैयार नहीं थे. एक छत के नीचे रहते हुए वे एकदूसरे से पराए जैसा व्यवहार करने लगे. रोज ही घर में पतिपत्नी के बीच झगड़े होने लगे थे.

रोजरोज के झगड़े और कलह से घर की सुखशांति एकदम छिन गई थी. पतियों ने कलावती और मलावती को अपने जीवन से हमेशा के लिए आजाद कर दिया. बाद में दोनों का तलाक हो गया. पते की बात यह थी कि कलावती और मलावती दोनों की जिंदगी की कहानी समान घटनाओं से जुड़ी हुई थी. दुखसुख की जो भी घटनाएं घटती थीं, दोनों के जीवन में समान घटती थीं.

यह बात सच है कि दुनिया अपनों से ही हारी हुई होती है. अशोक भी बहनों की कर्मकथा से हार गया था. पर वह कर भी क्या सकता था. वह उन्हें घर से निकाल भी नहीं सकता था.

सामाजिक लिहाज के मारे उस ने बहनों को अपना लिया और सिर छिपाने के लिए जगह दे दी. वे भाई के अहसानों तले दबी हुई थीं, लेकिन दोनों उस पर बोझ बन कर जीना नहीं चाहती थीं.

ऐसा नहीं था कि वे दोनों दुखी नहीं थीं. वे बहुत दुखी थीं. अपना दुख किस के साथ बांटें, समझ नहीं पा रही थीं. वे जी तो जरूर रही थीं, लेकिन एक जिंदा लाश बन कर, जिस का कोई वजूद नहीं होता. पति के त्यागे जाने से ज्यादा दुख उन्हें पिता की मौत का था.

कलावती और मलावती ने भाई से साफतौर पर कह दिया था कि वे उस पर बोझ बन कर नहीं जिएंगी. जीने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगी.

दोनों बहनें फिर से समाजसेवा की डगर पर चल निकलीं. अब उन पर न तो कोई अंकुश लगाने वाला था और न ही टीकाटिप्पणी करने वाला.

वे दोनों घर से सुबह निकलतीं तो देर रात ही घर वापस लौटती थीं. सोशल एक्टिविटीज में दिन भर यहांवहां भटकती फिरती थीं. अशोक बहनों के स्वभाव को जान चुका था. वह भी उन पर निगरानी नहीं रखता था. उसे अपनी बहनों और उन के चरित्र पर पूरा भरोसा था कि वे कभी कोई ऐसा काम नहीं करेंगी, जिस से समाज और बिरादरी में उसे शर्मिंदा होना पड़े.

लेकिन गांव के उस के पड़ोसियों खासकर वीरेंद्र सिंह उर्फ हट्टा, लक्ष्मीदास उर्फ रामजी, बुद्धू शर्मा और जितेंद्र शर्मा को कलावती और मलावती के चरित्र पर बिलकुल भरोसा नहीं था.

दोनों बहनों के चरित्र पर लांछन लगाते हुए वे उन्हें पूरे गांव में बदनाम करते थे. वे कहते थे कि ततमा की दोनों बेटियां पेट की आग बुझाने के लिए बाजार में जा कर धंधा करती हैं. धंधे की काली कमाई से दोनों के घरों में चूल्हे जलते हैं. धीरेधीरे यह बात पूरे गांव में फैल चुकी थी. उड़तेउड़ते कुछ दिनों बाद यह बात कलावती और मलावती तक आ पहुंची.

सुन कर दोनों बहनों के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. सहसा उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उन्होंने जो सुना है, वह सच है. जबकि उन का चरित्र एकदम पाकसाफ था. अपने चरित्र को ले कर दोनों बहनों ने जब गांव वालों की बातें सुनीं, तो वे एकदम से परेशान हो गईं.

वैसे भी किसी चरित्रवान के दामन पर ये दाग किसी गहरे जख्म से कम नहीं थे. दोनों ने फैसला किया कि उन्हें नाहक बदनाम करने वालों को इस की सजा दिलवा कर दम लेंगी, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो. उन्होंने पता लगा लिया कि उन्हें बदनाम करने वाले उन के पड़ोसी वीरेंद्र, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र थे.

जिद की आग में पकी कलावती और मलावती ने वीरेंद्र, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र शर्मा की कुंडली तैयार की. गांव के चारों बाशिंदे ग्रामप्रधान के भरोसेमंद प्यादे थे. प्रधान के रसूख की बदौलत वे कूदते थे.

चारों ही प्रधान की ताकत के बल पर असामाजिक कार्यों को अंजाम देते थे. ये बातें दोनों बहनों को पता चल गई थीं. दोनों ने आरटीआई के माध्यम से ग्राम प्रधान और उन के चारों प्यादों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर के वीरेंद्र सिंह और लक्ष्मीदास के खिलाफ जलालगढ़ थाने में मुकदमा दर्ज करा कर उन्हें जेल भिजवा दिया.

वीरेंद्र और लक्ष्मीदास को जेल भिजवाने के बाद दोनों बहनें शांत नहीं बैठीं. इस के बाद उन्होंने बुद्धू और जितेंद्र शर्मा को जेल भिजवा दिया. कुछ दिनों बाद वीरेंद्र और लक्ष्मीदास जमानत पर जेल से रिहा हुए तो दोनों बहनों ने फिर से उन के खिलाफ एक नया मुकदमा दर्ज करा दिया.

उन लोगों को फिर से जेल जाना पड़ा. इंतकाम की आग में जलती कलावती और मलावती ने चारों के खिलाफ ऐसी जमीन तैयार की कि उन के दिन जेल की सलाखों के पीछे बीत रहे थे.

वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र शर्मा बारबार जेल जाने से परेशान थे. समझ में नहीं आ रहा था कि कलावती और मलावती नाम की दोनों बहनों से कैसे छुटकारा पाया जाए. वे लोग खतरनाक योजना बनाने लगे. दिलीप शर्मा, विनोद ततमा, प्रकाश ततमा,सोनू शर्मा, रामलाल शर्मा, विष्णुदेव शर्मा, पप्पू शर्मा, उपेन शर्मा, इंदल शर्मा, सुनील शर्मा, सतीश शर्मा और बेचन शर्मा उन का साथ देने को तैयार हो गए.

वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास और उस के सहयोगियों ने फैसला कर लिया कि जब तक दोनों बहनें जिंदा रहेंगी, तब तक उन्हें चैन की सांस नहीं लेने देंगी. उन दोनों को मौत के घाट उतारने में ही सब की भलाई थी. घटना से करीब 5 दिन पहले सब ने योजना बना ली.

वीरेंद्र सिंह और उस के साथियों ने कलावती और मलावती के खिलाफ खतरनाक षडयंत्र रच लिया था. उन्होंने उन की रेकी करनी शुरू कर दी.

रेकी करने के बाद उन लोगों ने दोनों बहनों की हत्या करने की रूपरेखा तैयार कर ली. योजना में तय हुआ कि दोनों बहनों की हत्या के बाद उन के सिर धड़ से अलग कर के अलगअलग जगहों पर फेंक दिया जाएगा ताकि पुलिस आसानी से लाशों की शिनाख्त न कर सके.

सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. बात 23 जून, 2018 के अपराह्न 2 बजे की थी. वीरेंद्र ने अपने सहयोगियों को दोनों बहनों पर नजर रखने के लिए लगा दिया था. दोपहर 2 बजे के करीब कलावती और मलावती घर से जलालगढ़ बाजार जाने के लिए निकलीं.

दोनों ने अपने भतीजे मनोज से बता दिया था कि वे जलालगढ़ बाजार जा रही हैं. वहां से कुछ देर बाद लौट आएंगी. दोनों के घर से निकलते ही इस की सूचना किसी तरह वीरेंद्र सिंह तक पहुंच गई.

वीरेंद्र सिंह ने सहयोगियों को सतर्क कर दिया कि दोनों जलालगढ़ बाजार के लिए घर से निकल चुकी हैं. चक हाट से जलालगढ़ जाने वाले रास्ते में कुछ हिस्सा सुनसान और जंगल से घिरा हुआ था. कलावती और मलावती जब सुनसान रास्ते से जलालगढ़ बाजार की ओर जा रही थीं कि बीच रास्ते में वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास, बुद्धू शर्मा, जितेंद्र शर्मा सहित 12 और सहयोगियों ने उन का रास्ता घेर लिया.

वे सभी दोनों बहनों को जबरन उठा कर बिलरिया घाट ले गए. वीरेंद्र और उस के साथियों ने मिल कर दोनों बहनों को तेज धार वाले चाकू से गला रेत कर मौत के घाट उतार दिया.

इस के बाद दोनों के सिर धड़ से काट कर अलग कर दिए गए. फिर दोनों के कटे सिर घाट के किनारे जमीन खोद कर दबा दिए. उस के बाद बाकी शरीर को वहां से करीब 500 मीटर दूर ले जा कर झाडि़यों में फेंक कर अपनेअपने घरों को चले गए.

वीरेंद्र और उस के साथियों ने बड़ी चालाकी के साथ घटना को अंजाम दिया, लेकिन वे भूल गए थे कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से ज्यादा दिनों तक नहीं बच सकता.

एक न एक दिन कानून के लंबे हाथ अपराधी के गिरेहबान तक पहुंच ही जाता है. इसी तरह वे सब भी कानून के हत्थे चढ़ गए. 4 आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस ने फरार 12 आरोपियों को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार 16 आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था. गिरफ्तार आरोपियों में से किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. वीरेंद्र और उस के साथियों ने अगर सूझबूझ के साथ काम लिया होता तो उन्हें ऐसे दिन देखने को नहीं मिलते.  ?

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फिर क्यों: क्या तुषार की साजिश से बच पाई दीपिका

विक्रम से शादी कर दीपिका ससुराल आई तो खुशी से झूम उठी. यहां उस का इतना भव्य स्वागत होगा, इस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक ससुराल में रस्में चलती रहीं. इस के बाद वह कमरे में आराम करने लगी. शाम करीब 4 बजे कमरे में विक्रम आया और दीपिका से बोला, ‘‘मेरा एक दोस्त बहुत दिनों से कैंसर से जूझ रहा था. उस के घर वालों ने फोन पर अभी मुझे बताया है कि उस का देहांत हो गया है. इसलिए मुझे उस के घर जाना होगा.’’

दीपिका का ससुराल में पहला दिन था, इसलिए उस ने पति को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन विक्रम उसे यह समझा कर चला गया, ‘‘तुम चिंता मत करो, देर रात तक वापस आ जाऊंगा.’’

विक्रम के जाने के बाद उस की छोटी बहन शिखा दीपिका के पास आ गई और उस से कई घंटे तक इधरउधर की बातें करती रही. रात के 9 बजे दीपिका को खाना खिलाने के बाद शिखा उस से यह कह कर चली गई कि भाभी अब थोड़ी देर सो लीजिए. भैया आ जाएंगे तो फिर आप सो नहीं पाएंगी.

ननद शिखा के जाने के बाद दीपिका अपने सुखद भविष्य की कल्पना करतेकरते कब सो गई, उसे पता ही नहीं चला.

दीपिका अपने मांबाप की एकलौती बेटी थी. उस से 3 साल छोटा उस का भाई शेखर था. वह 12वीं कक्षा में पढ़ता था. पिता की कपड़े की दुकान थी.

ग्रैजुएशन के बाद दीपिका ने नौकरी की तैयारी की तो 10 महीने बाद ही एक बैंक में उस की नौकरी लग गई थी.

2 साल नौकरी करने के बाद पिता ने विक्रम नाम के युवक से उस की शादी कर दी. विक्रम की 3 साल पहले ही रेलवे में नौकरी लगी थी. उस के पिता रिटायर्ड शिक्षक थे और मां हाउसवाइफ थीं.

विक्रम से 3 साल छोटा उस का भाई तुषार था, जो 10वीं तक पढ़ने के बाद एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था. तुषार से 4 साल छोटी शिखा थी, जो 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी.

पति के जाने के कुछ देर बाद दीपिका गहरी नींद सो रही थी, तभी ननद शिखा उस के कमरे में आई. उस ने दीपिका को झकझोर कर उठाया. शिखा रो रही थी. रोतेरोते ही वह बोली, ‘‘भाभी, अनर्थ हो गया. विक्रम भैया दोस्त के घर से लौट कर आ रहे थे कि रास्ते में उन की बाइक ट्रक से टकरा गई. घटनास्थल पर उन की मृत्यु हो गई. पापा को थोड़ी देर पहले ही पुलिस से सूचना मिली है.’’

यह खबर सुनते ही दीपिका के होश उड़ गए. उस समय रात के 2 बज रहे थे. क्या से क्या हो गया था. पति की मौत का दीपिका को ऐसा गम हुआ कि वह उसी समय बेहोश हो गई.

कुछ देर बाद उसे होश आया तो अपने आप को उस ने घर के लोगों से घिरा पाया. पड़ोस के लोग भी थे. सभी उस के बारे में तरहतरह की बातें कर रहे थे. कोई डायन कह रहा था, कोई अभागन तो कोई उस का पूर्वजन्म का पाप बता रहा था.

रोने के सिवाय दीपिका कर ही क्या सकती थी. कुछ घंटे पहले वह सुहागिन थी और कुछ देर में ही विधवा हो गई थी. खबर पा कर दीपिका के पिता भी वहां पहुंच गए थे.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने विक्रम का शव घर वालों को सौंप दिया था. तेरहवीं के बाद दीपिका मायके जाने की तैयारी कर रही थी कि अचानक सिर चकराया और वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गई. ससुराल वालों ने उठा कर उसे बिस्तर पर लिटाया. मेहमान भी वहां आ गए.

डाक्टर को बुलाया गया. चैकअप के बाद डाक्टर ने बताया कि दीपिका 2 महीने की प्रैग्नेंट है. पर वह बेहोश कमजोरी के कारण हुई थी.

2 सप्ताह पहले ही तो दीपिका बहू बन कर इस घर में आई थी तो 2 महीने की प्रैग्नेंट कैसे हो गई. सोच कर सभी लोग परेशान थे. दीपिका के पिता भी वहीं थे. वह सकते में आ गए.

दीपिका को होश आया तो सास दहाड़ उठी, ‘‘बता, तेरे पेट में किस का पाप है? जब तू पहले से इधरउधर मुंह मारती फिर रही थी तो मेरे बेटे से शादी क्यों की?’’

दीपिका कुछ न बोली. पर उसे याद आया कि रोका के 2 दिन बाद ही विक्रम ने उसे फोन कर के मिलने के लिए कहा था. उस ने विक्रम से मिलने के लिए मना करते हुए कहा, ‘‘मेरे खानदान की परंपरा है कि रोका के बाद लड़की अपने होने वाले दूल्हे से शादी के दिन ही मिल सकती है. मां ने आप से मिलने से मना कर रखा है.’’

विक्रम ने उस की बात नहीं मानी थी. वह हर हाल में उस से मिलने की जिद कर रहा था. तो वह उस से मिलने के लिए राजी हो गई.

शाम को छुट्टी हुई तो दीपिका ने मां को फोन कर के झूठ बोल दिया कि आज औफिस में बहुत काम है. रात के 8 बजे के बाद ही घर आ पाऊंगी. फिर वह उस से मिलने के लिए एक रेस्टोरेंट में चली गई.

उस दिन के बाद भी उन के मिलनेजुलने का कार्यक्रम चलता रहा. विक्रम अपनी कसम देदे कर उसे मिलने के लिए मजबूर कर देता था. वह इतना अवश्य ध्यान रखती थी कि घर वालों को यह भनक न लगे.

एक दिन विक्रम उसे बहलाफुसला कर एक होटल में ले गया. कमरे का दरवाजा बंद कर उसे बांहों में भरा तो वह उस का इरादा समझ गई.

दीपिका ने शादी से पहले सीमा लांघने से मना किया लेकिन विक्रम नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने आत्मसमर्पण कर दिया.

गलती का परिणाम अगले महीने ही आ गया. जांच करने पर पता चला कि वह प्रैग्नेंट हो गई है. विक्रम का अंश उस की कोख में आ चुका था. वह घबरा गई और उस ने विक्रम से जल्दी शादी करने की बात कही.

‘‘देखो दीपिका, सारी तैयारियां हो चुकी हैं. बैंक्वेट हाल, बैंड वाले, बग्गी आदि सब कुछ तय हो चुके हैं. एक महीना ही तो बचा है. घर वालों को सच्चाई बता दूंगा तो तुम ही बदनाम होगी. तुम चिंता मत करो. शादी के बाद मैं सब संभाल लूंगा.’’

जब सास उसे तरहतरह के ताने देने लगी तो दीपिका ने आखिर चुप्पी तोड़ दी. उस ने सभी के सामने सच्चाई बता दी. पर उस का सच किसी ने स्वीकार नहीं किया. सभी ने उस की कहानी मनगढ़ंत बताई.

आखिर अपने सिर बदचलनी का इलजाम ले कर दीपिका मातापिता के साथ मायके आ गई.

वह समझ नहीं पा रही थी कि अब क्या करे. भविष्य अंधकारमय लग रहा था. होने वाले बच्चे की चिंता उसे अधिक सता रही थी.

5 दिन बाद दीपिका जब कुछ सामान्य हुई तो मां ने उसे समझाते हुए गर्भपात करा कर दूसरी शादी करने की सलाह दी.

कुछ सोच कर दीपिका बोली, ‘‘मम्मी, गलती मैं ने की है तो बच्चे को सजा क्यों दूं. मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं बच्चे को जन्म दूंगी. उस के बाद ही भविष्य की चिंता करूंगी.’’

दीपिका को ससुराल आए 20 दिन हो चुके थे तो अचानक तुषार आया. वह बोला, ‘‘मुझे विश्वास है कि तुम बदचलन नहीं हो. तुम्हारे पेट में मेरे भाई का ही अंश है.’’

‘‘जब तुम यह बात समझ रहे थे तो उस दिन अपना मुंह क्यों बंद कर लिया था, जब सभी मुझे बदचलन बता रहे थे?’’ दीपिका ने गुस्से में कहा.

‘‘उस दिन मैं तुम्हारे भविष्य को ले कर चिंतित हो गया था. फिर यह फैसला नहीं कर पाया था कि क्या करना चाहिए.’’ तुषार बोला.

दीपिका अपने गुस्से पर काबू करते हुए बोली, ‘‘अब क्या चाहते हो?’’

‘‘तुम से शादी कर के तुम्हारा भविष्य संवारना चाहता हूं. तुम्हारे होने वाले बच्चे को अपना नाम देना चाहता हूं. इस के लिए मैं ने मम्मीपापा को राजी कर लिया है.’’

औफिस और मोहल्ले में वह बुरी तरह बदनाम हो चुकी थी. सभी उसे दुष्चरित्र समझते थे. ऐसी स्थिति में आसानी से किसी दूसरी जगह उस की शादी होने वाली नहीं थी, इसलिए आत्ममंथन के बाद वह उस से शादी के लिए तैयार हो गई.

दीपिका बच्चे की डिलीवरी के बाद शादी करना चाहती थी, लेकिन तुषार ने कहा कि वह डिलीवरी से पहले शादी कर के बच्चे को अपना नाम देना चाहता है. ऐसा ही हुआ. डिलीवरी से पहले उन दोनों की शादी हो गई.

जिस घर से दीपिका बेइज्जत हो कर निकली थी, उसी घर में पूरे सम्मान से तुषार के कारण लौट आई थी. फलस्वरूप दीपिका ने तुषार को दिल में बसा कर प्यार से नहला दिया और पलकों पर बिठा लिया.

तुषार भी उस का पूरा खयाल रखता था. घर का कोई काम उसे नहीं करने देता था. काम के लिए उस ने नौकरी रख दी थी.

तुषार का भरपूर प्यार पा कर दीपिका इतनी गदगद थी कि उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

डिलीवरी का समय हुआ तो बातोंबातों में तुषार ने दीपिका से कहा, ‘‘तुम अपने बैंक की डिटेल्स दे दो. डिलीवरी के समय अगर मेरे एकाउंट में रुपए कम पड़ जाएंगे तो तुम्हारे एकाउंट से ले लूंगा.’’

दीपिका को उस की बात अच्छी लगी. बैंक की पासबुक, डेबिट कार्ड और ब्लैंक चैक्स पर दस्तखत कर के पूरी की पूरी चैकबुक उसे दे दी.

नौरमल डिलीवरी से बेटा हुआ तो उस का नाम गौरांग रखा गया. 6 महीने बाद तुषार ने हनीमून पर शिमला जाने का प्रोग्राम बनाया तो दीपिका ने मना नहीं किया.

वहां से लौट कर आई तो बहुत खुश थी. तुषार का अथाह प्यार पा कर वह विक्रम को भूल गई थी.

गौरांग एक साल का हो गया था. फिर भी दीपिका ने तुषार से डेबिट कार्ड और दस्तखत किए हुए चैक्स वापस नहीं लिए थे. इस की कभी जरूरत महसूस नहीं की थी. तुषार ने उस के अंधकारमय जीवन को रोशनी से नहला दिया था. ऐसे में भला वह उस पर अविश्वास कैसे कर सकती थी.

जरूरत तब पड़ी, जब एक दिन दीपिका के पिता को बिजनैस में कुछ नुकसान हुआ और उन्होंने उस से 3 लाख रुपए मांगे. तब दीपिका ने पिता का एकाउंट नंबर तुषार को देते हुए कहा, ‘‘तुषार, मेरे एकाउंट से पापा के एकाउंट में 3 लाख रुपए ट्रांसफर कर देना.’’

इतना सुनते ही तुषार ने दीपिका से कहा, ‘‘डार्लिंग, तुम्हारे एकाउंट में रुपए हैं कहां. मुश्किल से 2-4 सौ रुपए होंगे.’’

दीपिका को झटका लगा. क्योंकि उस के एकाउंट में तो 12 लाख रुपए से अधिक थे. आखिर वे पैसे गए कहां.

उस ने तुषार से पूछा, ‘‘मेरे एकाउंट में उस समय 12 लाख रुपए से अधिक थे. इस के अलावा हर महीने 40 हजार रुपए सैलरी के भी आ रहे थे. सारे के सारे पैसे कहां खर्च हो गए?’’

तुषार झुंझलाते हुए बोला, ‘‘कुछ तुम्हारी डिलीवरी में खर्च हुए, कुछ हनीमून पर खर्च हो गए. बाकी रुपए घर की जरूरतों पर खर्च हो गए. तुम्हारे पैसों से ही तो घर चल रहा है. मेरी सैलरी और पापा की पेंशन के पैसे तो शिखा की शादी के लिए जमा हो रहे हैं.’’

तुषार का जवाब सुन कर दीपिका खामोश हो गई. पर उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ कहीं कुछ न कुछ गलत हो रहा है.

डिलीवरी के समय उसे छोटे से नर्सिंगहोम में दाखिल किया गया था. उस का बिल मात्र 30 हजार रुपए आया था. हनीमून पर भी अधिक खर्च नहीं हुआ था. जिस होटल में ठहरे थे, वह बिलकुल साधारण सा था. उन का खानापीना भी सामान्य हुआ था.

जो होना था, वह हो चुका था. उस पर बहस करती तो रिश्ते में खटास आ जाती. लिहाजा उस ने भविष्य में सावधान रहने की ठान ली.

तुषार से अपनी बैंक पास बुक, चैकबुक और डेबिट कार्ड ले कर उस ने कह दिया कि वह घर खर्च के लिए महीने में सिर्फ 10 हजार रुपए देगी. सैलरी के बाकी पैसे गौरांग के भविष्य के लिए जमा करेगी और शिखा की शादी में 2 लाख रुपए दे देगी.

दीपिका के निर्णय से तुषार को दुख हुआ, लेकिन वह उस समय कुछ बोला नहीं.

अगले दिन ही दीपिका ने बैंक से ओवरड्राफ्ट के जरिए पैसे ले कर अपने पिता को दे दिए. पर उन्हें यह नहीं बताया कि तुषार ने उस के सारे रुपए खर्च कर दिए हैं.

कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा. उस के बाद अचानक तुषार ने उस से कहा, ‘‘मैं ने नौकरी छोड़ दी है.’’

‘‘क्यों?’’ दीपिका ने पूछा.

‘‘बिजनैस करना चाहता हूं. इस के लिए तैयारी कर ली है, पर तुम्हारी मदद के बिना नहीं कर सकता.’’

‘‘तुम्हारी मदद हर तरह से करूंगी. बताओ, मुझे क्या करना होगा?’’ दीपिका ने पूछा.

‘‘तुम्हें अपने नाम से 50 लाख रुपए का लोन बैंक से लेना है. उसी रुपए से बिजनैस करूंगा. मेरा कुछ इस तरह का बिजनैस होगा कि लोन 5 साल में चुकता हो जाएगा.’’

‘‘इतने रुपए का लोन मुझे नहीं मिलेगा. अभी नौकरी लगे 5 साल ही तो हुए हैं.’’

‘‘मैं ने पता कर लिया है. होम लोन मिल जाएगा.’’

‘‘होम लोन लोगे तो बिजनैस कैसे करोगे. इस लोन में फ्लैट या कोई मकान लेना ही होगा.’’ दीपिका ने बताया.

‘‘इस की चिंता तुम मत करो. मैं ने सारी व्यवस्था कर ली है. तुम्हें सिर्फ होम लोन के पेपर्स पर दस्तखत कर बैंक में जमा करने हैं.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं, तुम करना क्या चाहते हो. ठीक से बताओ.’’

तुषार ने अपनी योजना दीपिका को बताई तो वह सकते में आ गई. दरअसल तुषार ब्रोकर के माध्यम से फरजी कागजात पर होम लोन लेना चाहता था. इस में उसे 3 महीने बाद पूरे रुपए कैश में मिल जाता. बाद में ब्रोकर अपना कमीशन लेता.

दीपिका ने इस काम के लिए मना किया तो तुषार ने उसे अपनी कसम दे कर कर अंतत: मना लिया.

तुषार ने 4-5 दिनों में पेपर तैयार कर के दीपिका को दिए तो वह धर्मसंकट में पड़ गई कि सिग्नेचर करूं या न करूं. इसी उधेड़बुन में 3 दिन बीत गए तो घर में झाड़ूपोंछा लगाने वाली सरोजनी अचानक उस से बोली, ‘‘मेमसाहब, सुना है कि आप बैंक से लोन ले कर तुषार बाबू को देंगी?’’

‘‘तुम्हें किस ने बताया?’’ दीपिका ने हैरत से पूछा.

‘‘कल आप के घर से काम कर के जा रही थी तो बरामदे में तुषार बाबू और उस की मां के बीच हुई बात सुनी थी. तुषार बाबू कह रहे थे, ‘चिंता मत करो मां. लोन ले कर दीपिका रुपए मुझे दे देगी तो उसे घर में रहने नहीं दूंगा. उस पर तरहतरह के इल्जाम लगा कर घर से बाहर कर दूंगा.’’

सरोजनी चुप हो गई तो दीपिका को लगा उस के दिल की धड़कन बंद हो जाएगी. पर जल्दी ही उस ने अपने आप को संभाल लिया. सरोजनी को डांटते हुए कहा, ‘‘बकवास बंद करो.’’

सरोजनी डांट खा कर पल दो पल तो चुप रही. फिर बोली, ‘‘कुछ दिन पहले मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब हुई थी तो आप ने रुपए से मेरी बहुत मदद की थी. इसीलिए मैं ने कल जो कुछ भी सुना था, आप को बता दिया.’’

वह फिर बोली, ‘‘मेमसाहब, तुषार बाबू से सावधान रहिएगा. वह अच्छे इंसान नहीं हैं. उन की नजर हमेशा अमीर लड़कियों पर रहती थी. उन्होंने आप से शादी क्यों की, मेरी समझ से बाहर की बात है. इस में भी जरूर उन का कोई न कोई मकसद होगा.’’

शक घर कर गया तो दीपिका ने अपने मौसेरे भाई सुधीर से तुषार की सच्चाई का पता लगाने का फैसला किया. सुधीर पुलिस इंसपेक्टर था. सुधीर ने 10 दिन में ही तुषार की जन्मकुंडली खंगाल कर दीपिका के सामने रख दी.

पता चला कि तुषार आवारा किस्म का था. प्राइवेट जौब से वह जो कुछ कमाता था, अपने कपड़ों और शौक पर खर्च कर देता था. वह आकर्षक तो था ही, खुद को ग्रैजुएट बताता था. अमीर घर की लड़कियों को अपने जाल में फांस कर उन से पैसे ऐंठना वह अच्छी तरह जानता था.

दीपिका को यह भी पता चल चुका था कि उस से 50 लाख रुपए ऐंठने का प्लान तुषार ने अपनी मां के साथ मिल कर बनाया था.

मां ऐसी लालची थी कि पैसों के लिए कुछ भी कर सकती थी. उस ने तुषार को दीपिका से शादी करने की इजाजत इसलिए दी थी कि तुषार ने उसे 2 लाख रुपए देने का वादा किया था. विवाह के एक साल बाद तुषार ने अपना वादा पूरा भी कर दिया था.

तुषार पर दीपिका से किसी भी तरह से रुपए लेने का जुनून सवार था. रुपए के लिए वह उस के साथ कुछ भी कर सकता था.

तुषार की सच्चाई पता लगने पर दीपिका को अपना अस्तित्व समाप्त होता सा लगा. अस्तित्व बचाने के लिए कड़ा फैसला लेते हुए दीपिका ने तुषार को कह दिया कि वह बैंक से किसी भी तरह का लोन नहीं लेगी.

तुषार को बहुत गुस्सा आया, पर कुछ सोच कर अपने आप को काबू में कर लिया. उस ने सिर्फइतना कहा, ‘‘मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी.’’

कुछ दिन खामोशी से बीत गए. तुषार और उस की मां ने दीपिका से बात करनी बंद कर दी.

दीपिका को लग रहा था कि दोनों के बीच कोई खिचड़ी पक रही है. पर क्या, समझ नहीं पा रही थी.

एक दिन सास तुषार से कह रही थी, ‘‘दीपिका को कब घर से निकालोगे? उस ने तो लोन लेने से भी मना कर दिया है. फिर उसे बरदाश्त क्यों कर रहे हो?’’

‘‘उस से तो 50 लाख ले कर ही रहूंगा मां.’’ तुषार ने कहा.

‘‘पर कैसे?’’

‘‘उस का कत्ल कर के.’’

उस की मां चौंक गई, ‘‘मतलब?’’

‘‘मुझे पता था कि फरजी कागजात पर वह लोन नहीं लेगी. इसलिए 7 महीने पहले ही मैं ने योजना बना ली थी.’’

‘‘कैसी योजना?’’

‘‘दीपिका का 50 लाख रुपए का जीवन बीमा करा चुका हूं. उस का प्रीमियम बराबर दे रहा हूं. उस की हत्या करा दूंगा तो रुपए मुझे मिल जाएंगे, क्योंकि नौमिनी मैं ही हूं.’’

तुषार की योजना पर मां खुश हो गई. कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘अगर पुलिस की पकड़ में आ जाओगे तो सारी की सारी योजना धरी की धरी रह जाएगी.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा मां. दीपिका की हत्या कुछ इस तरह से कराऊंगा कि वह रोड एक्सीडेंट लगेगा. पुलिस मुझे कभी नहीं पकड़ पाएगी. बाद में गौरांग का भी कत्ल करा दूंगा.’’

कुछ देर चुप रह कर तुषार ने फिर कहा, ‘‘दीपिका की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर बैंक में मुझे नौकरी भी मिल जाएगी. फिर किसी अमीर लड़की से शादी करने में कोई परेशानी नहीं होगी.’’

दीपिका ने दोनों की बात मोबाइल में रिकौर्ड कर ली थी. मांबेटे के षडयंत्र का पता चल गया था. अब उस का वहां रहना खतरे से खाली नहीं था.

इसलिए एक दिन वह बेटे गौरांग को ले कर किसी बहाने से मायके चली गई. सारा घटनाक्रम मम्मीपापा को बताया तो उन्होंने तुषार से तलाक लेने की सलाह दी.

दीपिका तुषार को सिर्फ तलाक दे कर नहीं छोड़ना चाहती थी. बल्कि वह उसे जेल की हवा खिलाना चाहती थी. यदि उसे यूं छोड़ देती तो वह फिर से किसी न किसी लड़की की जिंदगी बरबाद कर देता.

फिर थाने जा कर दीपिका ने तुषार के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई. सबूत में मोबाइल में रिकौर्ड की गई बातें पुलिस को सुना दीं. तब पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर तुषार को गिरफ्तार कर लिया.

कुछ महीनों बाद ही दीपिका ने तुषार से तलाक ले लिया. इस के बाद पापा ने उसे फिर से शादी करने का सुझाव दिया.

शादी के नाम का कोई ठप्पा अब दीपिका नहीं लगाना चाहती थी. पापा को समझाते हुए बोली, ‘‘मुझे किस्मत से जो मिलना था, मिल चुका है. फिलहाल जिंदगी से बहुत खुश भी हूं. फिर शादी क्यों करूं. आप ही बताइए पापा कि इंसान को जीने के लिए क्या चाहिए? खुशी और संतुष्टि, यही न? बेटे की परवरिश करने से जो खुशी मिलेगी, वही मेरी उपलब्धि होगी. फिर मैं बारबार किस्मत आजमाने क्यों जाऊं?’’

पापा को लगा कि दीपिका सही रास्ते पर है. फिर वह चुप हो गए.

खुशहाल रहने वाले कपल हर रोज करते हैं ये 6 काम

कुछ लोग लाख चाहने के बाद भी अपने रिश्ते में खुशियां नहीं ला पाते ऐसे में उनके मन में कई बार ये सवाल होते हैं कि बाकी लोग अपने रिश्ते में कैसे खुश रह पाते हैं. वो ऐसा क्या करते हैं कि उनका रिश्ता इतना खुशहाल और स्वस्थ है. कुछ सामान्य और साधारण चीजों से भी आप अपने रिश्ते में प्यार और खुशी को बनाकर रख सकते हैं. आइए जानते हैं कि जो खुशहाल कपल हैं वो खुश रहने के लिए क्या करते हैं.

  1. बातचीत:

बातचीत करना संबंधों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. एक दिन में कम से कम एक बार पूरे अटेंशन के साथ बातचीत करना जरुरी होता है. किसी भी तरह की गलतफहमी को दूर करने के लिए भी आपको बात करना आवश्यक होता है. यदि आप किसी बात को लेकर चिंतित हैं या आपका साथी जो कर रहा है उससे आपको आपत्ति है तो इस बारे में बात करें. हैप्पी कपल अपने साथी से केवल शिकायत या उन में दोष ही नहीं देखते हैं. वे नकारात्मक की बजाय सकारात्मक चीजों की सराहना करते हैं.

  1. समान आदतें बनाना:

जो लोग अपने साथी के साथ रिश्ते में खुश हैं वो एक-दूसरे के साथ अपनी आदतें शेयर करते हैं. यह एक बेहतर तरीका है एक-दूसरे को समझने का. अगर आप एक-दूसरे के साथ अपने शोक, आदतें और रुचि साझा करते हैं और उन्हें सीखने की कोशिश करते हैं तो इससे आपका सम्बंध गहरा होता है. हालांकि ऐसा जरुरी नहीं है आपके साथी के साथ आपकी हर एक रुचि मेल खाती हो लेकिन कोशिश करें कि आप दोनों में कुछ आदतें तो समान हो. उदाहरण के लिए आप साथ में खाना बना सकते हैं या गार्डनिंग कर सकते हैं.

  1. साथ में समय बिताना:

तेजी से चलती जिंदगी में अपने लिए खाली समय ढूंढ पाना बहुत कठिन होता है लेकिन आप अपनी व्यस्त दिनचर्या से कम से कम आधे घंटा निकाल ही सकते हैं. आप दोपहर का भोजन साथ में करें या घर का सामान लेने के लिए, शाम को इवनिंग वॉक के लिए जा सकते हैं. साथ ही वीकेंड पर आप कुछ अलग प्लान करें. उदाहरण के लिए, लॉन्ग ड्राइव पर जा सकते हैं जहां आप दोनों ठंडी हवा और शाम का लुत्फ ले सकें.

  1. अपने प्यार को जाहिर करना:

हर बार अपने साथी से ये बोलना कि आप उनसे प्यार करते हैं थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन विश्वास करें इससे आपका रिश्ता और मजबूत होगा. आप इन्हें मैजिक वर्ड कहते हैं और हम कह सकते हैं कि ये मैजिक वर्ज जादू करते हैं. किसी भी रिश्ते को खुशहाल बनाने के लिए जरुरी है कि आप अपने साथी से प्यार का इजहार करें.

  1. जब आप साथ में हैं तो फोन और लेपटॉप को बंद करें:

आपका अधिकतर समय काम पर ही बीतता है और उस दौरान आप फोन और लेपटॉप के साथ ही होते हैं इसलिए ऑफिस से आने के बाद फोन और लैपटॉप बंद कर दें. आपके पास जो समय बचता है बेहतर है कि आप उसका सदुपयोग करें और एक-दूसरे को यह समय दें. जब आप घर पर अपने पार्टनर के साथ हैं तो कोशिश करें कि आप अपने फोन और बाकी चीजों से दूर रहें. साथी के साथ बात करते वक्त अपना फोन बंद कर दें.

  1. अपना भविष्य साथ में प्लान करना:

जो लोग अपने साथी के साथ खुशहाल रिश्ते में हैं वो अपने भविष्य में अपने साथी को अपने साथ देखना पसंद करते हैं इसलिए वो अपने भविष्य के सारे प्लान अपने पार्टनर के साथ ही बनाते हैं. आप दोनों एक टीम का हिस्सा हैं, इसलिए टीम की तरह काम करें. सब कुछ एक साथ प्लान करें. चाहे वह बच्चों से संबंधित हो, सेक्स लाइफ, कैरियर, या घर से जुड़ी आपकी योजनाएं. प्लान आपके बंधन को मजबूत बनाते हैं.

IPL-2019 : इस गलती की वजह से रहाणे पर लगा 12 लाख का जुर्माना

आईपीएल 2019 का रोमांच अपनी उंचाई पर है. अभी सीरीज शुरू हुए अधिक वक्त भी नहीं बीता और अपने रोमांच और अनिश्चिताओं ने सीरीज में और अधिक जान भर दी है. हाल ही में इंडियन प्रीमियर लीग गवर्निंग कांउसिल ने राजस्थान रौयल्स टीम के कप्तान अजिंक्य रहाणे पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. यह जुर्माना आईपीएल सीजन 12 में चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाफ खेले गए एक मैच में निर्धारित समय सीमा में ओवर ना खत्म कर पाने की वजह से लगाया गया है. यह मुकाबल  रविवार एम. चिदंबरम स्टेडियम में खेला गया था, जहां राजस्थान रौयल्स को 8 रनों से हार का सामना करना पड़ा.

इस जुर्माने की जानकारी देते हुए आईपीएल ने प्रेस रिलीज किया. आईपीएल ने कहा कि, इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) की आचार संहिता के तहत स्लो ओवर रेट का राजस्थान रौयल्स टीम का इस सीजन में यह पहला अपराध था. इस वजह से कप्तान अजिंक्य रहाणे पर IPL के कोड औफ कंडक्ट के तहत 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाता है.’

आपको बता दें कि आईपीएल सीजन 12 में जुर्माना भरने वाले दूसरे कप्तान हैं अजिंक्य रहाणे. इससे पहले किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ स्लो ओवर रेट की वजह से रोहित शर्मा पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था.

नए रिश्तें में लोगों को सताता हैं इन 6 बातों का डर

रिलेशनशिप में आना हर किसी के जीवन में एक नए पड़ाव जैसा होता है जिसमे व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपने जीवन के सुख दुःख को साझा करता है जिसे वो पसंद करता है जिससे वो प्यार करता है. जहां नए रिलेशनशिप में आना लड़का और लड़की दोनों के लिए नया और प्यारा एहसास होता है वहीं दूसरी ओर दोनों के मन में नए रिश्ते को लेकर कई तरह के डर भी पैदा होते हैं. आज हम आपसे उन्ही बातों, उन्ही डर का जिक्र करेंगे जो एक व्यक्ति के मन में नए रिलेशनशिप में आने के बाद घर करती है

  1. गलत करने का डर:

नए रिलेशनशिप में आने के बाद हर किसी के मन में यह ख्याल आता है कि वो जो कर रहे हैं वो सही है या गलत. नए रिलेशन में आने के बाद लोग कुछ दिनों तक ये नहीं समझ पाते की इस रिश्ते में वो खुश रह पायेंगे या इस रिश्ते से उन्हें कोई नुकसान तो नहीं होगा. ऐसे कई लोग होते हैं जिन्हें नए रिश्ते में आने के बाद इन बातों का डर सताता रहता है.

  1. जल्दबाजी का डर:

नए रिलेशनशिप में आने के बाद कई लोगो के मन में यह डर सताता है कि कहीं उन्होंने रिश्ता बनाने में जल्दबाजी तो नहीं की है? क्या ये सही वक्त है? क्या मुझे थोड़ा समय लेना चाहिए था? नए रिलेशनशिप में आने के बाद कई लोगो के मन में इस तरह के ख्याल आते हैं. वो सोचते है की इतनी जल्दी बनाये गए रिश्ते का भविष्य सुरक्षित होगा या नहीं.

  1. सही साथी न चुन पाने का डर:

ऐसा कई बार देखा गया है कि लोगो को रिलेशनशिप में आने के सालभर बाद ये पता चलता है कि मेरे द्वारा चुना गया लड़का या चुनी गयी लड़की मेरे लिए सही नहीं है और इस स्थिति में रिलेशनशिप टिक नहीं पाता. नए रिलेशनशिप में आये लोगो के मन में भी इस तरह के ख्याल आते हैं. कई बार लोगो को ये समझ नहीं आता की उनके द्वारा चुना गया साथी वाकई उनके लिए सही है या नहीं. इस बात का डर नए-नए रिलेशनशिप में आये लोगो के मन में ज्यादा होता है.

  1. साथी के रिश्ता तोड़ देने का डर:

नए नए रिलेशनशिप में आने के बाद कई लोगों के मन में यह डर बैठा रहता है कि कहीं उसका पार्टनर उससे रिश्ता न तोड़ ले. ये डर उन लोगों के मामले में ज्यादा होता है जिनके अन्दर आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की कमी होती है. ये डर उन लोगों के मन में भी ज्यादा होता हैं जिन्होंने झूठ बोलकर रिश्ता बनाया होता है.

  1. ये सचमच में प्यार है या बस वो मुझे पसंद करता/करती है:

कई लोगों को नए रिलेशनशिप में आने के बाद इस ख्याल में डूबे रहते हैं कि उनका पार्टनर उसे सच में प्यार करता है या बस उसे पसंद करता है. ऐसे कई लोग होते हैं जो इस स्थिति में हमेशा अपने साथी के प्यार को हर पैमाने पर मापते हैं जिससे कई बार रिश्ते के टूटने की सम्भावना पैदा होती है.

  1. खुद की पहचान खोने का डर:

कई लोगों के मन में रिलेशनशिप में आने के बाद ये डर सताता है कि कहीं नए रिश्ते के लिए खुद को बदलने के क्रम में अपनी पहचान ही न खो दें. बहुत से लोगों के मन में यह बात रहती है कि कहीं वो अपने साथी को इम्प्रेस करने या उसे प्रभावित करने में कहीं खुद की पहचान न खो दें.

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