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इन टिप्स को अपनाकर निखारे अपनी खूबसूरती

तेलों में बहुत से ऐसे तत्व होते हैं, जो त्वचा को पौष्टिकता देने और रंग को साफ करने में मदद करते हैं. इसलिए अगर आप कुछ खास तेलों को जगह दें, तो सौंदर्य में अपने आप निखार आने लगेगा. इतना ही नहीं आपका ब्यूटी प्रोडक्ट और कौस्मेटिक पर होनेवाला मोटा खर्च बच जाएगा. सिर में लगाने के अलावा तेलों से अपने लिए नेचुरल स्क्रब, बौडी लोशन, आई क्रीम, मेकअप रिमूवर भी बना सकती हैं. तो आइए जानते हैं इसके बारे में.

बादाम का तेल व अंडर आई क्रीम : आंखों के नीचे काले घेरे और महीन रेखाओं को दूर करने का सबसे आसान और प्रभावी उपाय है बादाम का तेल. रोज रात को सोने से पहले अपनी अनामिका उंगली में एक बूंद बादाम का तेल मलें और आंखों के नीचे लगाएं. कुछ ही हफ्ते में आंखों के नीचे की त्वचा का रंग साफ और त्वचा मुलायम हो जाएगी.

बौडी स्क्रब और नारियल तेल : नारियल तेल में थोड़ी सी चीनी मिला कर नेचुरल फुट स्क्रब बनाएं. इसके इस्तेमाल से मृत कोशिकाएं दूर होंगी और त्वचा चमकदार बनेगी. नारियल तेल को बेस आइल बनाएं और अपनी पसंद का असेंशियल आइल डालें, इसकी महक से मस्तिष्क को ठंडक मिलेगी और थकान दूर होगी.

मेकअप रिमूवर आलिव आइल : दिन में अगर आप मेकअप करती हैं, या शादी, पार्टी में मेकअप लगाना का इस्तेमाल करती हैं, तो शाम को मेकअप उतारना ना भूलें. इसे उतारने के लिए पानी में भिगोयी हुई रुई पर आलिव आइल की कुछ बुंदें डालें और मेकअप साफ करें. अगर मेकअप हेवी है, तो इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराएं. इस तरीके से वाटरप्रूफ मेकअप भी हटा सकती हैं. इसे बेहद हल्के हाथों से हटाएं. इसके बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें. रक्तसंचार बढ़ेगा, बंद पोर्स खुलेंगे और त्वचा की खोयी नमी लौट आएगी. आइली या मुंहासेवाली त्वचा पर इसका प्रयोग ना करें. इससे मुंहासे में संक्रमण होने की समस्या और बढ़ेगी.

त्वचा और बादाम का तेल : माना जाता है कि त्वचा पर सीधे आइल मसाज नहीं करनी चाहिए. इससे त्वचा की रंगत सांवली पड़ सकती है. लेकिन सभी तेल की मसाज से ऐसा हो, यह जरूरी नहीं. बादाम का तेल लगाने पर रंग निखरता है. इसे सर्कुलर मोशन में तब तक मालिश करें, जब तक यह त्वचा पर पूरी तरह जज्ब(सोख न ले) ना हो जाए. त्वचा की झुर्रियां और बारीक रेखाओं को दूर करने के लिए क्रीम लगाने की जगह बादाम के तेल का प्रयोग कर सकती हैं.

तीन तलाक विधेयक लोकसभा में पास

लोकसभा में विरोध और लंबी बहस के बाद तीन तलाक विधेयक एक बार फिर से पास हो गया. इस बिल के पास होने पर देश भर में तीन तलाक की त्रासदी और डर से गुजर रही मुस्लिम पीड़िताओं में खुशी की लहर दौड़ गयी है. हालांकि मौलानाओं और उलेमाओं सहित मुस्लिम समाज के ठेकेदार बने कुछ नेताओं ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए इसे शरीयत विरोधी साजिश करार दिया है. दारुल उलूम समेत दीगर उलेमा ने इस पर एतराज जताते हुए इसे शरीयत में दखलंदाजी बताया है. बिल पर लोकसभा में बहस के दौरान सदन के अन्दर कांग्रेस, डीएमके, एनसीपी, टीडीपी और जेडीयू ने बिल का जम कर विरोध किया. सपा नेता आजम खान, अखिलेश यादव और असद्दुदीन औवेसी बिल के खिलाफ अड़े रहे. दो साल पहले तीन तलाक के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका पर सुनवायी के दौरान भी देखा गया था कि इस मसले पर देश्व्यापी बहस में मुस्लिम समाज के अधिकांश नेता और धर्मगुरु अपने-अपने तर्कों के साथ तीन तलाक की वर्तमान व्यवस्था के समर्थन में ही खड़े थे. खैर, गुरुवार को बिल पर दिन भर बहस चली और शाम को यह बिल बड़े समर्थन के साथ लोकसभा में पास हो गया. बिल के समर्थन में 303 वोट पड़े जबकि विरोध में केवल 82 वोट. हालांकि यह बिल पिछली लोकसभा में ही पास हो चुका था, लेकिन राज्यसभा ने इस बिल को वापस कर दिया था. 16वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद मोदी सरकार ने कुछ बदलावों के साथ इस बिल को दोबारा संसद में पेश किया. अब इसे राज्यसभा में भी पास कराने की जद्दोहजद होगी.

तीन तलाक बिल पास होने पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सदन के सभी सदस्यों का आभार जताया. उन्होंने कहा कि यह बिल मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न खत्म करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है. उन्होंने कहा कि यह बिल मुस्लिमों के लिए इसलिए लाया गया है, क्योंकि तीन तलाक केवल वहीं है. कहीं और होता तो उनके लिए भी लाया जाता. हिन्दू धर्म में भी समय-समय पर ऐसे बदलाव किये गये हैं. जिसका असर भी दिख रहा है. हिन्दू समाज में व्याप्त कितनी कुप्रथाएं बंद हो गयी हैं. समय के साथ ही धार्मिक विचारों में भी बदलाव आना चाहिए. हिन्दू धर्म में ऐसे कई बदलाव किये गये हैं. मुस्लिम समाज में छोटी-छोटी बातों पर तलाक देने के कई मामले सामने आये हैं. आज वहां तलाक को मजाक बना दिया गया है. अब इसे रोकना जरूरी है. मुस्लिम महिलाएं इस सदन की ओर बड़ी उम्मीद से देख रही थीं. इस बिल में बुरा न सहने के बारे में भी बताया गया है. जो लोग इस बिल का विरोध कर रहे हैं, वे बताएं कि मुस्लिम महिलाओं के लिए उन्होंने क्या किया है? रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ऐसा कौन सा धर्म है जो बेटियों के साथ नाइंसाफी करने के लिए कहता है? संविधान में हर धर्म के लिए कानून है फिर चाहे वह हिन्दू हो या पारसी. जो लोग इस बिल का विरोध कर रहे है, वे बताएं कि जब हमने हिन्दुओं  के लिए आपराधिक कानून बनाया तो किसी को दिक्कत क्यों नहीं हुई? दहेज और घरेलू हिंसा के लिए कठोर कानून बनाये गये हैं, जिसमें कठोर कारावास की सजा का प्रावधान है. अगर कोई कानूनी तौर पर तलाक देता है, तो इससे किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? अगर लोग नियमों का पालन करेंगे तो उन्हें अपराधी नहीं कहा जाएगा. बिल पास होने के बाद बधाई देते हुए प्रसाद ने कहा कि सवाल धर्म, वोट और पूजा का नहीं, बल्कि नारी-न्याय, गरिमा और सम्मान का था. सदन को इस बिल पर तीसरी बार चर्चा करनी पड़ी है, अगर 1986 में ही यह काम हो गया होता, तो आज इस बिल की जरूरत ही नहीं पड़ती. गौरतलब है कि शाहबानो केस में 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने पांच बच्चों की मां और तीन तलाक की पीड़िता शाहबानो के हक में फैसला दिया था. मगर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने तब मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम समाज के दबाव में संसद में एक कानून पास करके उच्चतम न्यायालय के फैसले को बदल दिया था.

अब तीन तलाक बिल के लोकसभा में पास होने के बाद तलाक की मार से छटपटाती महिलाओं के चेहरों पर खुशी दिखायी दे रही है, हालांकि जिन महिलाओं को तीन बार ‘तलाक’ शब्द का उच्चारण करके घर से बेघर किया जा चुका है, उनको तो अब किसी फैसले या बिल से कोई राहत नहीं मिलेगी, मगर वे खुश हैं कि वे तमाम मुस्लिम महिलाएं जो तीन तलाक के भय और असुरक्षा में जीवन बिता रही थीं, उनकी जिन्दगी कुछ सुरक्षा की ओर बढ़ी है. मुस्लिम समाज में तीन तलाक का दंश सहने वाली महिलाओं की दुर्दशा और उनके दर्द का अन्दाजा लगा पाना आसान नहीं है. अशिक्षा के अंधकार से घिरी, चारदीवारी में बंद और बुर्के में लिपटी महिलाओं का दुख समझने और उन्हें उस दुख से निजात दिलाने में देश के कर्णधारों को कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही. यह मामला हमेशा राजनीतिक रोटियां सेंकने का माध्यम बना रहा.

कितना अमानवीय है कि एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर अपनी जिन्दगी और अपने घर से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकता है. एक औरत जो एक पुरुष से निकाह करके अपना घर, अपने माता-पिता, भाई-बहन, नाते-रिश्ते सब कुछ छोड़ कर आती है, अपनी सेवा और कार्यों से एक पुरुष के घर को सजाती-संवारती है, दिन-रात घर के कामों में खटती है, अपना शरीर उस पुरुष को उपभोग के लिए देती है, तमाम कष्ट सह कर उसके बच्चे पैदा करती है, उस औरत को अचानक एक दिन ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर घर से बाहर धकेल दिया जाता है! इस कृत्य की जितनी भर्त्सना की जाए कम है. यह बेहद अमानवीय और वीभत्स कृत्य है. संगीन जुर्म है और सदियों से इस महादेश में मुस्लिम औरतें इस जुर्म का शिकार हो रही हैं. धर्म के ठेकेदारों का डर और  दबाव इसकदर तारी है कि न तो उदारवादी मुस्लिम समाज और न ही मुस्लिम औरतें कभी इस जुर्म के खिलाफ एकजुट हो पायीं. आज तीन तलाक, हलाला एवं बहुपत्नी जैसी कुप्रथाओं को इस देश से पूरी तरह खत्म करने की जरूरत है. तीन तलाक पर पाबंदी मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार की दिशा में पहला कदम है.

दरअसल तीन तलाक का जो तरीका वर्तमान में चल रहा है वह कुरान की हिदायतों के बिल्कुल विपरीत और बेहद गैर इस्लामी है. कुरान शरीफ में मुस्लिम समाज की स्त्रियों की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे प्रावधान हैं. तलाके के मामले में इतनी बंदिशें लगायी गयी हैं कि अपनी बीवी को तलाक देने के पहले पुरुष को सौ बार सोचना पड़े. कुरान में  तलाक को न करने लायक काम बताते हुए इसकी प्रक्रिया को बहुत कठिन बनाया गया है, जिसमें रिश्ते को बचाने की आखिरी दम तक कोशिश की जाती है. इसके तहत पति पत्नी के बीच सम्वाद, दोनों के परिवारीजनों के बीच बातचीत और सुलह की कोशिशें और तलाक की पूरी प्रक्रिया को एक लम्बी समय सीमा में बांधा गया है.

सूरह निसा में लिखा है कि अगर पुरुष को अपनी औरत की नाफरमानी और बददिमागी का खौफ हो, तो वह उसे नसीहत करे और अलग बिस्तर पर छोड़ दे. इसके साथ यह भी लिखा है कि अगर किसी औरत को अपने शौहर की बददिमागी और बेपरवाही का खौफ हो तो वह भी शौहर को सुधरने का मौका दे, न कि फौरन कोई फैसला ले ले. घर को बर्बादी से बचाने के लिए अगर उसके हक में कोई कमी हो तो उसे भूल कर हर हाल में घर को बचाने की कोशश की जानी चाहिए. अगर पति-पत्नी के साथ रहने की तमाम कोशिशें नाकाम हो जाए, तब भी तलाक देने में जल्दबाजी को जगह दोनों के खानदान से एक एक समझदार और हकपरस्त व्यक्ति को मीडिएटर बना कर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि रिश्ता न टूटे. अगर फिर भी तमाम कोशिशें नाकाम साबित हों तभी दोनों को एक दूसरे से अलग होने की इजाजत है. कुरान में एकतरफा, एक ही वक्त में या एक ही बैठक में तलाक देना गैर- इस्लामी माना गया है. मगर अफसोस, कि इस लिखे को मुस्लिम पुरुष ने कभी नहीं माना. मुस्लिम समाज में इन प्रक्रियाओं का पालन कभी नहीं हुआ. कुरान की व्याख्याओं पर आधारित तीन तलाक के नियम को तोड़-मरोड़ कर पुरुष समाज ने इसे औरत पर ज्यादती का हथियार बना लिया. यह पुरुष की दमनकारी सोच और तंग नजरिये की वजह से हुआ. आज के दौर में इन सारी प्रक्रियाओं को निभाए बगैर मुस्लिम पुरुष फोन पर, ई-मेल पर, वाट्सएप पर, किसी अन्य के द्वारा कहलवा कर एक औरत की हंसती खेलती जिन्दगी को एक झटके में गम और दुश्वारियों के अंधेरे कुएं में ढकेल देता है. उसे अचानक घर से बेघर कर दिया जाता है. उसके मासूम बच्चों को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. और ताज्जुब है कि मुस्लिम समाज न सिर्फ इस अमानवीय कृत्य को खामोशी से देख रहा है बल्कि तमाम आलिम-फाजिल मुल्ला-मौलाना इसका समर्थन भी करते हैं. वे साफ कहते हैं कि अगर आदमी ने तीन बार औरत को तलाक बोल दिया तो अब वह उस पर हराम है, उसे सबकुछ छोड़ कर अपने घर चले जाना चाहिए.

मुसलमान औरतें यह जुर्म बर्दाश्त करने के लिए इसलिए भी मजबूर हैं क्यों मुसलमानों के तमाम धर्मगुरु और लगभग सारे मुल्ला-मौलवी पुरुष वर्ग से हैं. औरतों का वहां कोई प्रतिनिधित्व है ही नहीं. इनकी शह का नतीजा है कि मुस्लिम पुरुष जब चाहे एक बार में तीन तलाक बोलकर अपनी बीवी को अकेला और बेहसहार छोड़ देता है. पढ़ी-लिखी और कामकाजी औरतें तो तलाक के बाद अपने प्रयास से अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हैं और अपनी व अपने बच्चों की परवरिश कर लेती हैं, मगर आर्थिक रूप से रूप से पूरी तरह पति पर आश्रित और बाल बच्चेदार औरतों के लिए तलाक के बाद की जिन्दगी कितनी कठिन होती है, इसकी कल्पना भी रूह को थर्रा देती है.

कुछ लोग तलाक के बाद औरत को हासिल होने वाली मेहर की रकम का हवाला देकर कहते हैं कि उससे औरत अपनी बाकी की जिन्दगी काटे, लेकिन क्या मेहर की छोटी सी रकम से किसी की जिन्दगी कट सकती है? बच्चे पल सकते हैं? सवाल यह भी है कि जब निकाह लड़के और लड़की की दोनों की रजामंदी के बाद होता है, तो फिर तलाक का अधिकार सिर्फ पुरुष को ही क्यों है? जब निकाह खानदान वालों, दोस्तों-नातेदारों की उपस्थिति में होता है तो तलाक कायरतापूर्ण तरीके से एकान्त में, फोन पर, ई-मेल या वॉट्सएप पर देने का क्या तुक है?

बहुत से इस्लामी देशों में तीन तलाक के अन्याययपूर्ण रिवाज को या तो खत्म कर दिया गया है या समय के अनुरूप उसमें कई संशोधन हुए हैं, लेकिन भारत में इसे लेकर हठधर्मिता जारी है. मुस्लिम पुरुष समाज इसमें कतई कोई बदलाव नहीं चाहता है. तलाक के लिए औरत की भी रजामंदी हो, तलाक के सम्बन्ध में उससे भी सम्वाद हो, उसके आगे के एकाकी जीवन और बच्चों की परवरिश के लिए जरूरी रकम और सुरक्षा का इंतजाम सुनिश्चित हो, इन सब जरूरी बातों से मुस्लिम पुरुष हमेशा बचता रहा, इसलिए वह तीन तलाक जैसे अमानवीय कृत्य के खिलाफ कभी नहीं बोला. वर्ष 1985 के शाहबानों प्रकरण के बाद से आजतक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के संदर्भ में जाना सुना नहीं गया. मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस पर पित्तृ सत्तात्मक विचारधारा के पुरुषों ने कब्जा जमा रखा था और उन्होंने हमेशा मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी सुधार की कोशिश को रोकने का प्रयास किया. मुस्लिम महिलाओं को हमेशा ही कुरान शरीफ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों से महरूम रखने की साजिशें होती रहीं, लेकिन अब तीन तलाक पर कानून बनने की प्रक्रिया में तेजी आने के बाद वे उत्साहित हैं.

तीन तलाक बिल पर किसने क्या कहा

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शाइस्ता अंबर (आल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल ला बोर्ड की अध्यक्ष)

शाइस्ता अंबर का कहना है कि यह अच्छी बात है कि सरकार तीन तलाक पर कानून बनाने जा रही है. यह महिलाओं के हित के लिए है. मेरा मानना है कि जिस तरह हिन्दू मैरिज एक्ट बना है, उसी तरह मुस्लिम मैरिज एक्ट बनना चाहिए. सभी के समर्थन से कानून बनना चाहिए. इसमें कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. तीन तलाक देने वाले लोगों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

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निदा खान (आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष)

तीन तलाक के खिलाफ बरेली से बड़ी आवाज उठाने वाली और आला हजरत खानदान की बहू रहीं निदा खान स्वयं अपने तलाक को लेकर काफी मुखर रही हैं. उन्होंने तीन तलाक की पीड़िताओं को एकजुट कर बकायदा एक मोर्चा खोल रखा है. इस बिल पर निदा खान ने कहा कि सरकार ने मुस्लिम औरतों की सुरक्षा और सम्मान के लिए तीन तलाक बिल लाकर अपना वादा निभाया है. मुस्लिम महिलाओं ने इसी उम्मीद से उन्हें वोट दिया था. बिल से उलेमा को भी चेताया गया है कि वह अब महिलाओं का शोषण-उत्पीड़न नहीं कर सकेंगे. देश का कानून सबसे ऊपर है. उन्हें इसे मानना होगा.

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जयदेव गल्ला (टीडीपी सांसद)

लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान टीडीपी सांसद जयदेव गल्ला ने बिल का विरोध करते हुए कहा कि इस बिल को कोर्ट भी गलत बता चुका है. सभी के लिए बराबर कानून होना चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हिन्दू को भी तलाक पर जेल भेजा जाएगा? अगर ऐसा नहीं तो क्या ये कानून केवल मुस्लिमों के लिए है?

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असद्दुदीन ओवैसी (एआईएमआईएम नेता)

एआईएमआईएम नेता ने बिल का कड़ा विरोध किया और इसके तहत मुस्लिम पुरुष के लिए तीन साल की जेल की सजा को गलत ठहराया. उन्होंने कहा कि तीन तलाक बिल मुस्लिम महिलाओ के पक्ष में नहीं है. यह कानून मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ जुर्म करेगा. इस्लाम में 9 तरह के तलाक होते हैं. इस कानून के अनुसार अगर आप शौहर को गिरफ्तार करेंगे तो खातून को मेंटेनेंस कौन देगा? शौहर जेल में बैठकर मेंटेनेंस कैसे देगा? इस बिल में तीन तलाक को अपराध बना दिया है. कोर्ट ने समलैंगिकता को गैर-आपराधिक बना दिया है, ऐसे में आप तीन तलाक को अपराध बनाकर नया हिन्दुस्तान बनाने जा रहे हैं? अगर पति जेल चला जाएगा तो क्या औरत तीन साल तक उसका इंतजार करती रहे. उस औरत को शादी से निकलने का हक मिलना चाहिए. और तीन तलाक अगर गलती से कहा जाए तो शादी नहीं टूटती और यही सुप्रीम कोर्ट भी कह रहा है. तीन तलाक बिल लाकर सरकार शादी खत्म कर रही है. इस कानून के जरिए सरकार मुस्लिम औरतों पर जुर्म कर रही है और औरत को सड़क पर ला रही है.

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मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी (सचिव तंजीम उलमा-ए-इस्लाम)

मौलाना रिजवी ने बिल की मुखालफत करते हुए कहा कि इससे पारिवारिक विवाद बढ़ेंगे. कानून और शरीयत में टकराव की स्थिति पैदा होगी. दूसरा, उलमा के सामने भी समस्या खड़ी होगी. तलाक के मसलों में वह फतवा कैसे देंगे?

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मौलाना इंतेजार हुसैन कादरी (राष्ट्रीय सुन्नी उलमा कौंसिल के अध्यक्ष )

मौलाना इंतेजार हुसैन बिल से खासे नाराज हैं. उनका कहना है कि सरकार ने चंद औरतों के जरिये मुस्लिम महिलाओं की हमदर्दी पाने के लिए तलाक बिल की चाल चली है. यह शरीयत पर हमला है, जो ठीक नहीं है. वह सरकार में हैं, कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन आज भी 99 प्रतिशत महिलाएं शरीयत के मुताबिक ही जिन्दगी गुजारना चाहती हैं और गुजारेंगी.

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मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी (दारुल उलूम)

दारुल उलूम के नौमानी साहब कहते हैं कि तीन तलाक पर किसी भी तरह का कानून शरीयत में दखलंदाजी है. मजहबी मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाए यह मसला सरकार को उलमा पर छोड़ देना चाहिए. हिन्दुस्तान में संविधान के मुताबिक सभी मजहब के लोगों को अपने हिसाब से जीवन गुजारने का अधिकार है. इसके बावजूद इस तरह की दखलंदाजी सरासर गलत है.

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राजीव रंजन सिंह (जेडीयू नेता)

एनडीए की सहयोगी जेडीयू ने तीन तलाक बिल का विरोध किया है. जेडीयू के नेता राजीव रंजन सिंह ने कहा कि तीन तलाक बिल समाज के एक खास वर्ग के मन में अविश्वास की भावना पैदा करेगा. हड़बड़ी में कोई काम करने की जरूरत नहीं है. आप कानून को बनाकर पति-पत्नी के रिश्ते को तय नहीं कर सकते. तलाक को कोई भी पसंद नहीं करेगा, आपको कानून बनाने के बजाए उस समुदाय के लिए जन-जागृति पैदा करनी चाहिए.

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मुख्तार अब्बास नकवी (अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री)

मुख्तार अब्बास नकवी ने सदन में तीन तलाक बिल पर कहा कि जो लोग इस बिल के विरोध में है, वो इस पर अपना तर्क दें, न कि कुतर्क. कुछ लोगों को इस बिल के समर्थन से वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा है, लेकिन ये बिल सुधार के साथ है, आपके उधार के साथ नहीं है. इसलिए इस गलतफहमी में न रहें कि तीन तलाक बिल राज्यसभा में पास नहीं हो पाएगा.

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कनिमोझी (डीएमके सांसद)

तीन तलाक बिल का विरोध करते हुए डीएमके सांसद कनिमोझी ने कहा कि केन्द्र सरकार को इस बिल को पास कराने की इतनी जल्दी क्यों है? इस बिल को लाकर देश में बंटवारे का संदेश जा सकता है. अभी तक केन्द्र सरकार ने महिला आरक्षण को लेकर कुछ भी नहीं किया है. महिलाओं के हक में बात करने वाले पहले महिला आरक्षण बिल लेकर आएं. क्या आपने कभी आनर किलिंग को लेकर बिल लाने की सोची है? आनर किलिंग को लेकर अभी तक क्या कानून बना है? भाजपा नेता आजादी की बात करते हैं लेकिन आज के हालात ऐसे हैं कि देश में  खाने-पहनने तक की आजादी नहीं है.

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मीनाक्षी लेखी (भाजपा सांसद)

किसी के घर के अंदर भले ही खुद का कानून चलता हो, लेकिन घर के बाहर एक ही कानून चलता है और वो है भारत का संविधान. विपक्ष इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी मुस्लिम महिलाओं का हितैषी कैसे हो सकते हैं? धार्मिक कानून गलत हैं, इस सोच को बदलने की जरूरत है. बाबा साहब भी हिन्दू कानूनों को रोकना चाहते थे और बाद में इसी वजह से उन्होंने कांग्रेस छोड़ी. पीएम मोदी हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री होने का हक अदा कर रहे हैं.

क्या ये एक्ट्रेस बनने वाली है मिस्टर बजाज की एक्स-वाइफ ?

सीरियल कसौटी जिंदगी के 2 में कोई ना कोई ट्विस्ट दर्शकों को देखने को मिल रहा है. हाल ही मे इस सीरियल में अनुराग को बचाने के लिए प्रेरणा ने कुर्बानी देते हुए मिस्टर बजाज से शादी कर ली है. और अब वह स्विट्जरलैंज में उनके साथ हनीमून मनाने गई है. दिलचस्प बात यह है कि अनुराग भी यहां पहुंच चुका है और यहां आते ही वह हर जगह मिस्टर बजाज और प्रेरणा का पीछा कर रहा है.

 

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ये सब देखकर आप समझ ही गए होंगे, इस सीरियल में आपको कुछ-न कुछ टविस्ट देखने को मिलते रहेंगे. वैसे इस सीरियल से जुड़ी एक खबर आपको बता दें, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जल्द ही इस सीरियल में मिस्टर बजाज की स्टाइलिश और एक्सवाइफ की एंट्री  होने वाली है. इस किरदार के लिए मेकर्स कई एक्ट्रेस के औडीशन ले चुके है लेकिन अभी तक किसी भी अदाकारा का नाम को फाइनल नहीं किया गया है.

ये भी पढ़ें- 18 साल की फैन ने आर माधवन को शादी के लिए किया प्रपोज

 

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खबरों के अनुसार इस किरदार के लिए शिल्पा आनंद का नाम सबसे ऊपर आ रहा है. आपको बता दें, अगर वाकई में शिल्पा को इस किरदार के लिए फाइनल किया जाता है तो ऐसा दूसरी बार होगा कि वे करन सिंह ग्रोवर के साथ स्क्रीन शेयर करें. इससे पहले ये दोनों सीरियल दिल मिल गए में भी साथ नजर आ चुके हैं.

चीन की अनूठी विरासत बीजिंग और शंघाई

चीन सिर्फ दुनियाभर में इलैक्ट्रौनिक सामान के लिए ही नहीं बल्कि पर्यटन के शानदार ठिकानों के लिए भी मशहूर है. चाहे वह बीजिंग हो या फिर शंघाई, यहां के अद्भुत नजारों को देख कर आप का मन गद्गद हो उठेगा.

बीजिंग

चीन की राजधानी होने के साथ बीजिंग ऐसा शहर है जहां विश्व के 7 अजूबों में ‘चीन की दीवार’ यानी गे्रट वाल औफ चाइना तो देखी ही जा सकती है. कई प्राचीन राजाओं व राजवंशों की ऐतिहासिक इमारतें, किले व स्मारक भी देखे जा सकते हैं. चीन की भव्य प्राचीन सभ्यता, चाहे वह किसी भी राजवंश युआन, मिंग या किग राजवंश से जुड़ी हो, यहां की भव्य ऐतिहासिक इमारतों में देखी जा सकती है. बीजिंग में विश्व का सब से बड़ा केंद्रीय स्क्वायर है. यहां विश्व के अन्य बड़े महानगरों की भांति बहुमंजिली इमारतें, फैशनेबल लोग, भारी ट्रैफिक, बडे़बड़े शौपिंग मौल व व्यापारिक प्रतिष्ठान भी हैं. दर्शनीय स्थलों में मुख्य रूप से सभी स्थल प्राचीन व ऐतिहासिक ही हैं.

भाषा व मुद्रा: यहां के लोगों की आपसी भाषा चीनी ही है. गिनेचुने लोग ही अंगरेजी जानते हैं. आप की बात किसी भी दुकानदार या व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए आप की मदद लोकल टूर गाइड ही कर सकता है. यहां की मुद्रा युआन है जो भारतीय रुपए के हिसाब से अभी लगभग 9 रुपए है. बीजिंग एअरपोर्ट पर ही मुद्रा बदल लेना बेहतर होगा.

दर्शनीय स्थल

चीन की दीवार : बीजिंग का मुख्य आकर्षण है चीन की दीवार. विश्व के 7 आश्चर्यों में से एक यह प्रसिद्ध दीवार, जो 4163 मील लंबी तथा लगभग 15 फुट चौड़ी है, विश्वभर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. मुझे भी चीन की दीवार का यही आकर्षण बीजिंग खींच लाया. यह 2 हजार वर्ष पुरानी है जो चीन की दूसरे देशों के आक्रमण से रक्षा करती है. चीन की दीवार के दूसरी ओर मंगोलिया है. कहा जा सकता है कि यह चीन की प्राचीन सभ्यता की खूबसूरत निशानी है.

द सिटी औफ लाइट्स पैरिस

वास्तव में जमीन पर बनी यह मात्र एक सीधी दीवार नहीं है, बल्कि पहाड़ी व जंगली इलाकों को पार करती हुई ऊंचीनीची दीवार है जिस के दोनों ओर मुंडेर बनी है. सुना था कि यह मोटर चलने लायक चौड़ी सड़क की भांति है. यह चौड़ी तो अवश्य है परंतु हर 20-30-50 गज की दूरी पर बनी सीढि़यां पर्यटकों को जल्दी ही थका देती हैं. यहां मोटर या कोई अन्य वाहन जाना संभव ही नहीं क्योंकि बीजिंग में यह कमरेनुमा भाग से शुरू होती है, जहां सीढि़यां ही सीढि़यां हैं. सड़क के दोनों ओर मुंडेर बनी होने से गिरने का खतरा नहीं रहता. परंतु पूरी सड़क पर पहाड़ी जैसी ढलान होने के कारण मात्र 1-2 किलोमीटर तक ही पर्यटक मुश्किल से जा पाते हैं. मैं मुश्किल से 1 किलोमीटर ही जा सकी. सीढि़यां एकदम ऊंची व खड़ी हैं.

हां, ऊपर जाने के बाद चारों तरफ निगाहें दौड़ाने पर दूरदूर तक पहाड़ों व पेड़ों के बीच दीवार दिखाई देती है. यह हो सकता है कि प्राचीन काल में युद्ध के घोड़े इस ऊंचीनीची दीवार पर चढ़ते व दौड़ते रहे हों.

मिंग टौंब : यह प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है जहां मिंग राजवंश के 13 राजाओं की भव्य समाधियां हैं. चारों ओर घिरे पहाड़ व प्राकृतिक सुंदरता पर्यटकों का मिंग टौंब देखने का उत्साह दोगुना कर देते हैं.

समर पैलेस: शाहीबाग, पहाडि़यों व लेक से घिरा यह पैलेस पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र है. यहां लगभग 3 हजार ऐसे ‘खूबसूरत प्राकृतिक स्थल’ हैं जहां आप फोटोग्राफी का आनंद उठा सकते हैं. पैलेस के बड़ेबड़े बरामदे, हौल, पवेलियन, हरेभरे बाग तथा साथ में विकसित की गई लेक दृश्यों को आकर्षक बनाते हैं.

टियानमेन स्क्वायर : यह विश्व का सब से बड़ा स्क्वायर यानी वर्गाकार जमीन का टुकड़ा है जो शहर के बीचोबीच वहां की संसद के चारों ओर बना है. इस का आकार 4 लाख वर्ग मीटर है. इस स्क्वायर में तरीके से लगी हरीभरी घास व पौधे इसे सुंदर पिकनिक स्थल होने जैसा आभास देते हैं. इस के चारों ओर महत्त्वपूर्ण इमारतें हैं.

पैलेस म्यूजियम : यह एक संग्रहालय है जिसे ‘फौरबिडन सिटी’ के नाम से जाना जाता है. 72 हैक्टेअर में फैले इस संग्रहालय के भीतर अनेक राजमहल कौंप्लैक्स हैं. बहुत बड़े भूखंड में फैले होने के कारण पर्यटक जहां सुंदर शाही महलों के भवनों का आनंद उठाते हैं वहीं बाहर निकलने तक वे काफी थक भी जाते हैं. यह विश्व का सब से बड़ा महलों का कौंप्लैक्स है.

कैसे पहुंचें

अनेक टूर कंपनियां चीन का 10 दिन का पैकेज बनाती हैं जिन में बीजिंग भी शामिल रहता है. इस पैकेज में आनेजाने व रहने का खर्च लगभग 1 लाख रुपए आता है. आप सीधे हवाई टिकट ले कर भी बीजिंग की सैर कर सकते हैं. यहां आनेजाने का किराया लगभग 35 से 40 हजार रुपए है.

चीन की चाय की चुस्की

बीजिंग जा कर चीन की चाय का आनंद अवश्य लें. यहां चाय के बड़ेबड़े शानदार शोरूम हैं, जहां एक कमरा विशेष रूप से चाय के स्वाद का अनुभव करने के लिए बना होता है.

यहां की अंगरेजीभाषी खूबसूरत लड़कियां एक विशेष अंदाज में आप को 8 से 15 तरह की विभिन्न स्वाद व खुशबू वाली चाय का आस्वादन कराती हैं. छोटेछोटे कप में दी जाने वाली यह चाय बिना दूध व बिना चीनी के बनाई जाती है.

इस तरह बीजिंग के दर्शनीय स्थलों के साथ चाइना वाल की थकानभरी सैर करने के बाद चीनी चाय के स्वाद का लुत्फ थकान को स्वाहा कर पर्यटन की मस्ती को दोगुना बढ़ा देता है.

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शंघाई

कई वर्षों से भारत में चर्चा सुनी थी कि मुंबई को शंघाई बनाएंगे तो मन में तमन्ना थी कि देखें आखिर शंघाई में क्या है? वाकई में गगनचुंबी डिजाइनर इमारतों से सजी और रात्रि में रोशनियों से जगमग चकाचौंध भरे शंघाई की खूबसूरती मन को भीतर तक आकृष्ट कर गई. चौड़ी सड़कें, बड़ीबड़ी भव्य इमारतें, डिजाइनर तरीके से किया गया सड़कों का सौंदर्यीकरण हर पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफी था. ऊपर से शाम होते ही ज्योंज्यों रात्रि का अंधकार अपना विस्तार करता गया, इमारतों से निकलने वाली डिजाइनर रोशनियां व लेजर किरणें शहर के सौंदर्य का चमत्कार बढ़ाती गईं. मन इतना मंत्रमुग्ध था कि उस खूबसूरती को निखारते रहने को जी चाहता था.

पूर्वी चीन में यांगजे नदी के किनारे बसा शंघाई चीन का सब से बड़ा शहर है. यों तो चीन की राजधानी बीजिंग है, परंतु चीन के अर्थतंत्र का आधार शंघाई ही है. शंघाई बंदरगाह विश्व के व्यस्ततम बंदरगाहों में से एक है. वर्ष 2005 में तो यह विश्व का सब से बड़ा ‘कार्गो पोर्ट’ ही बन गया. शंघाई दक्षिणपूर्वी देशों का सब से महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन चुका है.

किसी भी पर्यटक के लिए शंघाई में मुख्य रूप से 3 आकर्षण हैं – व्यापार, शौपिंग तथा दर्शनीय स्थल. शंघाई को ‘ओरिएंटल पैरिस’ के नाम से भी जाना जाता है. मौडर्न व फैशनेबल शौक रखने वालों के लिए नांजिंग रोड व हुआइहै रोड उपयुक्त हैं जबकि मध्यम प्रकार की खरीदारी के लिए सिचुआन नौर्थ रोड जाना चाहिए.

दर्शनीय स्थल

ओरिएंटल पर्ल टीवी टावर : यहां का यह टावर पर्यटकों का सब से प्रमुख आकर्षण है. इसे ‘फोटोग्राफिक ज्वैल’ का नाम दिया गया है यानी इसे कैमरे में कैद कर के फोटोग्राफी के शौकीन भरपूर संतुष्टि पा सकते हैं. पुडोंग पार्क में बना यह टावर यांगपू पुल से घिरा हुआ है. इस का दृश्य यों प्रतीत होता है कि जैसे 2 ड्रैगन मोतियों से खेल रहे हों.

468 मीटर ऊंचा यह टावर विश्व में तीसरा सब से ऊंचा टावर है. 3 खंभों पर खड़ा यह टावर रात की रोशनी में और भी अधिक आकर्षक हो उठता है. डबल डैकर एलीवेटर्स में इतनी ऊंचाई तक 7 मीटर प्रति सैकंड की गति से ऊपर जाते हैं. दर्शक 263.5 मीटर की ऊंचाई तक जाते हैं, जहां लगे आब्जर्वेटरी लेवल से पूरे शंघाई का सुंदर नजारा देखा जा सकता है.

टावर का भीतरी भाग अद्भुत मनोरंजक खजाने से भरा है. इस के पैडस्टल में शंघाई म्यूनिसिपल इतिहास संग्रहालय बना है. निम्न तल पर भविष्य का सुंदर अंतरिक्ष शहर व साइटसीइंग हौल है जहां विश्व के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का खूबसूरत दृश्य देखा जा सकता है. इस के अतिरिक्त टावर के बेस में साइंस सिटी बनाई गई है.

टावर के ऊपरी भाग में पर्यटकों के लिए यादगार वस्तुओं की अनेक दुकानें व रोटेटिंग रैस्टोरेंट हैं.

जेड बुद्धा मंदिर : बुद्ध से संबंधित यह मंदिर विश्व के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. यहां सफेद जेड (एक प्रकार का अत्यंत कीमती पत्थर) से बनी बुद्ध प्रतिमाएं हैं.

यूयुआन गार्डन : यूयुआन गार्डन शंघाई के सब से प्राचीन गार्डनों में से एक है जो मिंग तथा किग राजाओं के जमाने की वास्तुकला पर आधारित है. यह 6 भागों में विभक्त है, इन भागों का अपनाअपना स्टाइल है. यह 2 हैक्टेअर क्षेत्र में फैला है. यहां 40 ऐसे स्थल हैं जहां से सुंदर व मनोहारी फोटोग्राफी की जा सकती है. पूरा गार्डन देखने में कई घंटे का समय लग जाता है.

शंघाई म्यूजियम : यह संग्रहालय चीन की प्राचीन कला का अद्भुत खजाना है यहां लगभग 1,20,000 कीमती वस्तुएं प्रदर्शित हैं. दूर से देखने पर संग्रहालय का आकार एक कांसे के प्राचीन बरतन जैसा प्रतीत होता है जो 5 हजार वर्ष पूर्व चीन में भोजन पकाने के लिए प्रयोग किया जाता था. यहां 4 तलों पर कुल 11 संग्रहालय बने हैं जिन में अलगअलग कांसे, पाटरी, फर्नीचर, जेड, धातु के बरतन, आभूषण, हस्तकला तथा ग्रामीण आर्ट के संग्रहालय हैं.

कू्रज का आनंद : यहां के विशेष आकर्षण व रात्रि की चकाचौंध का नजारा देखने के लिए हुआंगपू नदी में कू्रज का आनंद अवश्य लें. लगभग 2 घंटे की सैर में आप को इतना आनंद आएगा कि मानो आप सपनों में सैर कर रहे हों.

कू्रज के निचले भाग में एअरकंडीशंड कमरे में बैठ कर खिड़की से दृश्य का आनंद लिया जा सकता है. कू्रज के ऊपरी भाग में हवाओं के झोंके के साथ खूबसूरत नजारे देखे जा सकते हैं. यदि रात्रि में इन दृश्यों का आनंद नहीं लिया तो समझिए आप ने शंघाई को देखा ही नहीं और फिर चीन की आप की यात्रा अधूरी मानी जाएगी.

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विशेष पाक्सो कोर्ट गठित हों: सुप्रीम कोर्ट

देश की सबसे बड़ी अदालत ने बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों को देखते हुए देश भर में विशेष पाक्सो कोर्ट बनाने का आदेश दिया है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुआई वाली बेंच ने 25 जुलाई 2019 को इस मामले की सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार को 60 दिनों के भीतर ये विशेष अदालतें स्थापित करने का आदेश दिया है. बेंच में जस्टिस दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस भी थे. कोर्ट ने कहा है कि जिन जिलों में बच्चों के उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार के सौ से ज्यादा मामले दर्ज हैं, वहां साठ दिनों के भीतर विशेष पाक्सो कोर्ट बनाया जाए. इन विशेष अदालतों के गठन का खर्च केन्द्र सरकार वहन करेगी. यह अदालतें सिर्फ बच्चों के साथ हुए यौन अपराधों के मामले की सुनवाई करेंगी. कोर्ट ने इस मामले में सख्ती बरतते हुए यह आदेश भी जारी किया है कि चार हफ्तों के भीतर इसकी प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल हो. कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों को भी निर्देश दिया है कि वे अपने राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में ऐसे मामलों की फोरेंसिक रिपोर्ट समय पर भिजवाना सुनिश्चित करें. सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को इन अदालतों के गठन के लिए धन उपलब्ध कराने, अभियोजकों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करके विशेष अदालतें स्थापित करने की दिशा में होने वाली प्रगति की रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर प्रस्तुत करने का आदेश भी सुनाया है. इस मामले में अगली सुनवाई अब 26 सितम्बर 2019 को होगी.

गौरतलब है कि बच्चों के साथ बढ़ते यौन अपराधों को देखते हुए वर्ष 2012 में संसद ने विशेष कानून ‘प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल आफेंसेस’ यानी पाक्सो पारित किया था. इसके तहत इस तरह के मामलों की जांच के लिए विशेष पुलिस टीम बनाने, हर जिले में विशेष कोर्ट के गठन जैसे प्रावधान थे, लेकिन देश के ज्यादातर जिलों में इन पर अमल नहीं हो पाया. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आयी थी कि पूरे देश की निचली अदालतों में पाक्सो अधिनियम से जुड़े करीब 112628 मामले लम्बित पड़े हैं. जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 30883 मामले लम्बित हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र समेत गोवा, केन्द्र शासित प्रदेशों दीव एवं दमन, दादर एवं नगर हवेली में करीब 16099 मामले लम्बित हैं. इसके बाद मध्य प्रदेश में 10117, पश्चिम बंगाल में 9894, ओडिशा में 6849, दिल्ली में 6100, केरल व केन्द्र शासित प्रदेश लक्ष्यद्वीप में 5409, गुजरात में 5177, बिहार में 4910 और कर्नाटक में 4045 मामले लम्बित हैं. यह संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है. रजिस्ट्री के माध्यम से जुटाये गये आंकड़े आश्चर्यचकित करने वाले हैं. वर्ष 2019 की शुरुआत से छह महीने के भीतर ही पॉक्सो के तहत देश भर में 24212 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं. इन मामलों में अब तक मात्र 6449 ही अदालत की पटल  पर सुनवाई के लिए पहुंचे हैं.

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बच्चों से बलात्कार और यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट काफी गम्भीर है और उसने खुद ही संज्ञान लेकर ज्यादा अपराध वाले जिलों में विशेष पाक्सो अदालतों के गठन का आदेश दिया है. कोर्ट ने देश के हर जिले में लम्बित पाक्सो मामलों का ब्योरा भी मांगा है.

वहीं मंगलवार को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर राज्यसभा ने बच्चों के साथ गंभीर यौन उत्पीड़न के दोषियों को मौत की सजा के प्रावधान पर भी मुहर लगा दी थी. राज्यसभा ने बच्चों को यौन अपराध से संरक्षण (संशोधन) विधेयक 2019 पारित कर दिया है. इसमें अति गम्भीर अपराध के आरोपी को मौत की सजा का प्रावधान है. 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार या छेड़छाड़ इस विधेयक के दायरे में है. यह विधेयक लड़के और लड़की दोनों को ही समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है. अब इस विधेयक को लोकसभा में पारित कराया जाएगा. महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को राज्यसभा में पोक्सो विधेयक पेश किया था और सभी से समर्थन मांगा था.

इस पर चर्चा करते हुए तृणमूल सांसद डेरेक ओब्रायन ने अपने बाल्यकाल में बस में उनके साथ हुई छेड़छाड़ का जिक्र किया और कहा कि कई मामलों में शिकायतें ही नहीं होती हैं. सरकार को इस अपराध से सख्ती से निपटने के लिए कठोर प्रयास करने होंगे. कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने भी कहा कि वह विधेयक का स्वागत करते हैं लेकिन कड़े प्रावधान भी ऐसी घटनाएं नहीं रोक पा रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के पास भी 2016 के बाद से बच्चों के यौन उत्पीड़न के अपराधों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. अन्नाद्रमुक की नेता विजिला सत्यनाथन ने भी विधेयक का समर्थन करते हुए इन घिनौने अपराध के दोषियों का कैमिकल कैस्ट्रेशन करने की भी मांग की. सपा सांसद जया बच्चन ने भी समर्थन किया. उन्होंने कहा कि सिर्फ कानून में संशोधन से समस्या का हल नहीं निकलेगा इसके लिए तय समय में जांच और सजा होना भी जरूरी है. साथ ही उचित मुआवजा मिलना चाहिए. उन्होंने कहा कि दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद कानून सख्त किया गया लेकिन ऐसी घटनाएं फिर भी नहीं रुकीं. अन्य दलों के नेताओं ने भी विधेयक का समर्थन किया.

सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि बच्चों के प्रति हुए यौन अपराधों में सजा की दर बहुत कम है. ज्यादातर मामले लम्बे समय तक अदालतों में चलते हैं और इस बीच गवाहों और सबूतों की अनदेखी के चलते वे नष्ट हो जाते हैं. वहीं पैसे के जोर पर गवाहों को खरीद लिया जाता है. फोरेंसिक रिपोर्टस बदलवा दी जाती हैं. इसी चिन्ता के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने पाक्सो विशेष कोर्ट की संख्या बढ़ाने का आदेश पारित किया है, ताकि अपराधियों को सबूतों से छेड़छाड़ का मौका न मिल सके.

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हालांकि राज्यसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को ही ऐसे मामलों में सख्ती और तेजी से निपटने के लिए 1023 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्णय लिए जाने की बात कही थी. उन्होंने स्पष्ट किया था कि जरूरत इसलिए है क्योंकि विभिन्न अदालतों में ऐसे 1.66 लाख मामले लंबित हैं. अब महिला एवं बाल विकास मंत्रलय ने पोक्सो कानून में संशोधन कर बच्चों का यौन उत्पीड़न करने वालों को सख्त सजा देने का प्रावधान किया है. दोषियों को 20 साल से लेकर उम्रकैद और मौत की सजा तक का प्रावधान किया गया है. कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाया गया है ताकि सिर्फ बच्चियों को ही नहीं, बल्कि बालकों को भी यौन उत्पीड़न से बचाया जा सके. इसके अलावा कानून में चाइल्ड पोर्नोग्राफी की परिभाषा भी तय की गयी है जिसमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी की फोटो, वीडियो, कार्टून या फिर कंप्यूटर जेनेरेटड इमेज को इसके तहत दंडनीय अपराध माना गया है. ऐसी सामग्री रखने वाले व्यक्ति पर 5000 से लेकर 10000 रुपये तक के जुर्माने के दंड की व्यवस्था की गयी है. ऐसी सामग्री का व्यवसायिक इस्तेमाल करने वाले को जेल की सख्त सजा भी भुगतनी होगी. कानून में बच्चों का यौन उत्पीड़न करने के उद्देश्य से उन्हें दवा या रसायन आदि देकर जल्दी युवा करने को भी गैर जमानती अपराध बना दिया गया है, जिसमें पांच साल तक की कैद का प्रावधान है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुख्य बिंदु

  • पाक्सो एक्ट के प्रावधान के मुताबिक बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की जांच के लिए हर जिले में विशेष पुलिस टीम का गठन हो.
  • हर जिले में विशेष पाक्सो अदालत बनायी जाए. कोर्ट का माहौल बच्चों के अनुकूल रखा जाए.
  • पाक्सो मामलों को देखने के लिए अलग से सरकारी वकीलों की नियुक्ति हो. ये वकील बच्चों के प्रति संवेदनशील हों. इसके लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण मिले.
  • पाक्सो कोर्ट में सपोर्ट स्टाफ हो, जो बाल मनोविज्ञान को भलीभांति समझता हो. ये स्टाफ कोर्ट परिसर में अलग से बने कमरे में पीड़ित बच्चे से बयान ले. जज और वकील वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए इसे देखें.
  • जांच में तेजी लाने के लिए हर जिले में फोरेंसिक टेस्ट लैब हो. ये लैब सिर्फ बच्चों के यौन शोषण से जुड़े सबूतों की जांच करे.
  • मुकदमों का निपटारा साल भर के भीतर हो.

व्यंग्य: एक और चिट्ठी मोदी जी के नाम

परम पूज्य, परम आदरणीय, प्रभुतुल्य श्री नरेंद्र मोदी जी,

सादर चरण तो चरण तलुवा स्पर्श भी

सबसे पहले तो मैं यह बता कर आपको बेफिक्र (वैसे आप किसी बात या चीत की फिक्र करते ही कहां हैं) कर दूं कि मैं कोई जिद्दी या बुद्धिजीवी नहीं बल्कि एक औसत से भी गई गुजरी बुद्धि बाला देहधारी भारतीय हूं जो आप की भक्ति की अनिवार्य शर्त है. इस पात्रता के नाते मैं अपनी व्यथा व्यक्त कर रहा हूं कि वे 49 कथित बुद्धिजीवी जिन्होंने आप को पत्र लिखने की बेहूदी हरकत की घोर राष्ट्र द्रोही हैं.

हे श्रेष्ठों में श्रेष्ठ, वे घोर अज्ञानी नहीं जानते कि ऐसे पत्रों से आप के कानों में जूं तक नहीं रेंगती इसलिए आप उन्हें मक्खी, मच्छर या खटमल (जैसे परजीवी जो बौद्धिक संकर्मण फैलाते रहते हैं) समझ कर क्षमा कर देना अब आखिर वे जैसे भी हैं हैं तो जन्मना आर्य ही.

यहां आपके श्री चरणों में दंडवत और करबद्ध प्रार्थना है कि आप इस आर्य और अनार्य के शाब्दिक फेर में मत पड़ना यह सब इतिहासकारों की चालाकी है इसलिए आप उन भूतपूर्व मूर्खों को भी क्षमा कर देना. इससे आपकी महानता में और कुछ चांद लग जाएंगे.

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हे इंद्रों के इन्द्र, वे मूर्ख जो मौब लिंचिंग पर चिंता जो दरअसल में खीझ है जता रहे हैं वे इस महान राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से बाकिफ हैं कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सब के सब मिथ्या हैं और कुछ स्वार्थी मानवों या दानवों कुछ भी कह लें, इनके द्वारा निर्मित और रचित हैं. न्याय कभी चार दीवारी और बंद कमरों में नहीं होता उसके लिए तो रण भूमि ही उपयुक्त है. जहां न देर होती और न ही अंधेर होता. जिन्हें वे अल्पसंख्यक और दलित कह रहे हैं वे पशुतुल्य जीव हैं इसलिए उन्हें औन द स्पौट दंड मिलना ही चाहिए .

हे प्रभो, इन घनघोर नास्तिकों की बुद्धि फिर गई है जो वे जय श्री राम के पवित्र नारे को युद्धोन्माद फैलाने जैसा बता रहे हैं. राम नाम की महिमा से अवगत कराने के लिए उन्हें अगुवा कर जबरदस्ती राम चरित मानस का नियमित पाठ पढ़ाया जाना चाहिए और तब तक पढ़ाते, रटाते रहना चाहिए जब तक वे खुद जय श्री राम, जय श्री राम न चिल्लाने लगें. इससे उनका कल्याण होगा और हालिया चिट्ठी लिखने सहित दूसरे तमाम पाप भी धुल जाएंगे.

हे महादेव,  ये निकृष्ट लोग जाने क्यों कानून बनाने की बात कर रहे हैं क्या इन्हें मालूम नहीं कि आप के श्री मुख से कानों को सुख देने वाले जो वचन निकलते हैं वही आजकल कानून होते हैं. क्या जय श्री राम बोलना कोई अपराध है यह नाम तो तारने वाला है इसलिए आप इन मूढ़ और मूर्ख लोगों की बात पर तनिक भी कान न दें. (वैसे यह बात भी कहने की नहीं लेकिन भक्ति के वशीभूत होकर कह दी).

हे महाप्रतापी, ये अज्ञानी अपनी भ्रष्ट हो गई बुद्धि के चलते कह रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती. इन की जिव्हा में निसंदेह कीड़े मकोड़े पड़ेंगे जो ये यह नहीं जानते या फिर जानबूझ कर भी उसे नजरंदाज कर रहे हैं कि राष्ट्र का अर्थ बदले पांच साल गुजर चुके हैं और प्रजा ने पुनः आपको और आपकी पार्टी को ही राष्ट्र पिछली 23 मई को माना है. ये नास्तिक नहीं जानते कि आप ही कल्कि अवतार के प्री एडीशन हैं.

हे महामानव, आप अत्यंत दयालु हैं जो ये 49 के 49 अभी भी स्वतंत्र विचरण कर रहे हैं क्या यह अभिव्यक्ति की स्वन्त्र्ता का उत्कृष्ट उदाहरण नहीं जबकि अगर आप की दृष्टि अगर बिगड़ गई तो ये तो बिना अग्नि के ही भस्म हो जाएंगे. आप क्रोधित होकर इन्हें निष्कासन की सजा मत सुना देना. आप जल्दबाज़ी मे तीसरा नेत्र भी अभी मत खोलना उसे तो आपात काल के लिए रिजर्व में रखना.

हे यशस्वी, कल शाम को मेरी ही तरह आपकी भक्ति में लीन एक चैनल का नारद सच ही कह रहा था कि इन लोगों के पास कोई काम नहीं बचा है और इन्हें पश्चिम बंगाल की हिंसा नहीं दिखती क्योंकि इनमें से तीस उसी प्रांत के हैं जहां ममता नाम की एक निष्ठुर स्त्री शासन करती है. वह भी राम नाम से चिढ़ती है अब उसके कुशासन का अंत तय है. आपके भक्त उसे शूर्पनखा और त्रिजटा तक कहते हैं.

हे जनार्दन,  इस पत्र के भावों से प्रसन्न होकर आप कहीं मुझे कोई पद्म पुरुस्कार प्रदान मत कर देना. इस खुशी को मैं संभाल नहीं पाऊंगा क्योंकि पिछले कोई साढ़े पांच वर्षों से मैं भी अनिद्रा, मधुमेह, कमजोरी (वह वाली नहीं) उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी रोगों व बीमारियों से ग्रस्त हूं. एक अंजाना सा डर मुझे घेरे रहता है जो हर साल 8 नवंबर को और बढ़ जाता है, इसलिए आप कृपा कर मुझे कोई इनाम मत दे देना अन्यथा मेरी देह और आत्मा का चिरंतन संबंध विच्छेद हो सकता है. इसलिए हे कृपालु आप की दया दृष्टि ही मुझ निर्धन बुद्धिहीन, विवेकहीन, रुग्ण लेखक के लिए पर्याप्त है .

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चूंकि मैं 49 उन कृतघ्न बुद्धीहीनों के कुकृत्य से आहत और असहमत था इसलिए मैंने भी चिट्ठी के जरिये अपनी व्यथा आपके सम्मुख व्यक्त कर दी है.

शेष आपका आशीर्वाद है .

करोड़ों की तरह आपका एक नवजात चरण सेवक

बच्चों के लिए बेहद खतरनाक हैं ये बीमारियां

हाल ही में बिहार में बच्चों को चमकी बुखार होने के कारण कोहराम मच गया है. यह बुखार बच्चों को अपनी चपेट में लेता है और अगर समय पर इस का इलाज न हो तो पीड़ित बच्चे की जान पर बन आती है. ऐसा नहीं है कि बच्चों को और बीमारियां नहीं होती हैं. बहुत सी तो ऐसी होती हैं जिन के बारे में लोग आज भी अनजान हैं या लापरवाही बरतते हैं. आइए, जानते हैं कुछ ऐसी ही बीमारियों में बारे में.

मम्प्स

मम्प्स वायरसजन्य बीमारी है जो ज्यादातर बचपन में होती है. यह रोग किशोर बच्चों को कम होता देखा गया है लेकिन अगर यह बीमारी युवावस्था में हो तो इस के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

कर्णपूर्वग्रंथि शोथ यानी मम्प्स रोग में कर्णपूर्वग्रंथि में सूजन आ जाती है. यह ग्रंथि जबड़े की गोलाई और कान के नीचे स्थित होती है तथा यह शरीर की सब से बड़ी लार ग्रंथि है.

मम्प्स के लक्षण

वायरस के संपर्क में आने के 2 या 3 सप्ताह बाद ही रोगी में इस रोग के लक्षण उभर कर सामने आते हैं. इस के वायरस हवा द्वारा फैलते हैं. मम्प्स से प्रभावित व्यक्ति रोग के लक्षणों के उभरने से एक सप्ताह पहले और

2 सप्ताह बाद तक इस बीमारी को फैलाने का माध्यम बना रहता है.

लार उत्पन्न करने वाली एक या दोनों पैरोटिड ग्लैंड्स यानी कर्णपूर्वग्रंथियों में सूजन उत्पन्न होना ही इस रोग की सब से पहली पहचान है. इस ग्रंथि में सूजन और दर्द उत्पन्न होने से बच्चे को मुंह खोलने, चबाने और निगलने में बहुत तकलीफ होती है.

बच्चा बुखार और सिरदर्द की भी शिकायत करता है. बुखार 2 या 3 दिन बाद कम हो जाता है और पैरोटिड ग्रंथि की सूजन कम होने में लगभग 10 दिन का समय लग जाता है. अगर चेहरे के एक ही तरफ की ग्रंथि में सूजन है तो कभीकभी दूसरी ग्र्रंथि में सूजन तब आती है जब पहली ग्रंथि की सूजन कम हो जाती है.

कुछ बच्चों में मम्प्स के लक्षण बिलकुल भी दिखाई नहीं देते. उन्हें केवल थोड़ी अस्वस्थता और पैरोटिड ग्रंथि के पास बेचैनी महसूस होती है. लार ग्रंथि में आई सूजन और दर्द को देख कर डाक्टर दर्दनिवारक गोलियों के सेवन की सलाह देता है. खाने के लिए तरल पदार्थों का सेवन ही बच्चे के लिए सही रहता है. इस रोग में डाक्टरों द्वारा आराम करने की हिदायत खासतौर पर दी जाती है.

मम्प्स का अनजाना सच

कई किशोरों व पुरुषों में मम्प्स होने पर आर्काइटिस की समस्या उत्पन्न हो जाती है. इस में शुक्रग्रंथि में शोथ उत्पन्न हो जाता है. इस दशा में पुरुषों की एक या दोनों जनन ग्रंथियों में दर्दनाक सूजन हो जाती है. यह तकलीफदेह स्थिति 2 से 4 दिनों तक रहती है. इस के बाद प्रभावित शुक्र्रग्रंथि पहले से छोटी हो जाती है. अगर दोनों शुक्र्रग्रंथियां इस से प्रभावित हो जाएं तो पुरुषों में बंध्यता की समस्या उत्पन्न हो जाती है.

मम्प्स कभीकभी मैनिनजाइटिस का रूप भी ले लेता है, लेकिन किसी गंभीर समस्या का सामना नहीं करना पड़ता. लड़कों को किशोरावस्था में पहुंचने से पहले मम्प्स का टीका लगवाना फायदेमंद रहता है. ऐसा करने से उस का आर्काइटिस से भी बचाव होता है.

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खसरा

खसरा रुबैला विषाणु द्वारा उत्पन्न एक अत्यधिक संक्रामक रोग है जो वसंत ऋ तु में ज्यादातर 5-7 साल की आयु के बच्चों को होता है. इस बीमारी के होने पर नेत्र श्लेष्मला शोथ हो जाता है, छींकें आती हैं, नाक बंद हो जाती है, घबराहट होती है और तेज बुखार भी हो जाता है.

मुख की श्लेष्मिक झिल्ली पर कोपलिक के धब्बे बन जाते हैं. खांसीं आती है तथा घमौरी जैसे दाने पूरे शरीर पर फैल जाते हैं. खसरा अधिकतर बचपन में ही होता है, लेकिन अगर यह रोग वयस्क होने पर हो तो भयंकर रूप ले लेता है.

रोगी के वायरस से संक्रमित हो जाने के एक से दो हफ्तों के बीच रोग के लक्षण दिखाई देने लग जाते हैं. रोग के अन्य लक्षणों के साथसाथ कई बार रोगी तेज बुखार के कारण बेहोश भी हो जाता है.

रोग संक्रमित होने के 3-4 दिनों बाद बच्चे के गाल के अंदर की तरफ लाल सतह पर सफेद धब्बे नजर आते हैं. बच्चे को सिरदर्द भी हो सकता है व उस का बुखार 100 से 102 डिगरी तक जा सकता है.

डाक्टरों का कहना है कि कुछ बच्चों की लसिका वाहिनियों में सूजन आ जाती है और वे रोशनी से संवेदनशील हो जाती हैं. भूरापन लिए गुलाबी धब्बे पहले माथे और गरदन पर उभरते हैं और फिर शरीर के निचले भाग पर फैल जाते हैं.

कभीकभी धब्बे इतने अधिक फैल जाते हैं कि वे बड़ेबड़े चकत्तों की शक्ल ले लेते हैं. 6 दिनों के बाद धब्बे धीरेधीरे फीके पड़ कर मुरझाने लगते हैं. बच्चों में अधिकतर 10 दिनों के बाद रोग पूरी तरह लुप्त हो जाता है जबकि वयस्कों में यह रोग ठीक होने में 4 हफ्ते का समय ले लेता है.

उपचार

इस रोग में सब से अधिक ध्यान देने की बात यह है कि परिवार के सभी सदस्यों को संक्रमण से अपना बचाव करना चाहिए, खासकर उम्रदराज महिलाओं और गर्भवती महिलाओं को. रोगी को तरल पदार्थों का अधिक से अधिक सेवन करने को दें व उसे पूरी तरह आराम दें. खसरे में बुखार पर नियंत्रण के लिए उम्र के अनुसार बुखार की दवा दी जा सकती है.

बच्चा अगर रोशनी से घबराए तो उसे थोड़ी कम रोशनी वाले कमरे में रहने दें. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि खसरा होने पर एंटीबायोटिक दवा नहीं दी जाती है. खसरा से टीकाकरण द्वारा बचा जा सकता है, लेकिन बचपन में खसरा हो जाने के बाद व्यक्ति के शरीर में जीवन भर के लिए इस रोग के लिए प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है.

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जटिलताएं

डाक्टरों के अनुसार, खसरा बच्चे को बचपन में एक बार तो होना ही है, यह सोच कर भी अभिभावक इस रोग के प्रति ज्यादा चिंतित नहीं होते. परिवार में सब की चिंता बीमारी के संक्रमण के फैलने से जुड़ी होती है और सभी इस से बचाव के लिए प्रयत्नशील भी रहते हैं.

खसरे का एक जटिल पक्ष भी है जिस के अंतर्गत इस के रोगी को छाती और कान में इन्फैक्शन हो सकता है. कई बार कनजंक्टिवाइटिस भी हो जाता है. खसरे के रोगी को अतिसार, उलटियां, पेटदर्द भी हो सकता है. कभीकभी खसरे के बाद निमोनिया भी हो सकता है.

सावधानियां

गर्भवती महिला का खसरे से बचना बहुत जरूरी है. गर्भवती महिला यदि खसरे के संक्रमण का शिकार हो जाए तो उस का भू्रण नष्ट हो सकता है या उसे भारी नुकसान पहुंच सकता है. शिशु में कई तरह की विकलांगता आ सकती है. आजकल डाक्टर गर्भवती महिला को खसरा होने पर गर्भपात तक की सलाह देते हैं.

छोटी चेचक

छोटी चेचक यानी चिकनपौक्स एक तीव्र विषाणुजनक रोग है जो बहुत तेजी के साथ संक्रामक होता है. इस के होने पर सिरदर्द होता है व तेज बुखार भी आ जाता है, जिस के बाद शरीर पर दाने निकल आते हैं. दानों का आकार छोटाबड़ा दोनों तरह का होता है. इस रोग को मसूरिका भी कहते हैं.

चिकनपौक्स होने का कारण वेरिसेला जोस्टर वायरस होता है जो हर्पीज रोग की श्रेणी का वायरस है. आमतौर पर बच्चों में इस रोग के कारण कोई गंभीर समस्या पैदा नहीं होती, इसीलिए इस रोग के चलते जटिल परिस्थितियां कभीकभार ही उत्पन्न होती हैं. लेकिन इस रोग का एक बार हो जाना जीवनभर के लिए इस के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है.

इस रोग के विषाणु हवा के माध्यम से एकदूसरे व्यक्ति में पहुंचते हैं. इस रोग से बच्चों में बेचैनी बढ़ जाती है, हलका बुखार और सिरदर्द होता है. बच्चे का मन मिचलाता है.

शरीर में लाल चकत्तेदार धब्बे या पानीभरे दाने सिर व गरदन पर होने शुरू होते हैं, और फिर टांगों, बांहों तक फैल जाते हैं. कुछ दिनों के बाद ये दाने ढल कर सूख जाते हैं और उन पर पपड़ी जम जाती है. 12-15 दिनों बाद ये धब्बेदाने पूरी तरह गायब हो जाते हैं और बहुत कम ही अपना निशान छोड़ते हैं.

रोगी से रोग के संक्रमित होने का अंदेशा रैश शुरू होने के एक दिन पहले से ले कर उस के पूरी तरह समाप्त होने तक के समय तक बना रहता है. इस रोग में आराम की सब से अधिक आवश्यकता होती है. कभीकभी दानों में खुजली होने से वे छिल जाते हैं और उन में इन्फैक्शन हो जाता है. अगर बच्चा खुजली करने से न रुके तो उस के नाखूनों को काट कर छोटा रखें जिस से शरीर को नुकसान न पहुंचे.

रोग से जुड़ी सावधानियां

बच्चे को पूरी तरह शाकाहारी भोजन दें.

खाने में नमक की मात्रा बिलकुल कम कर दें. इस से शरीर में दानों के कारण होने वाली खुजली में कमी आएगी.

दानों पर कैलेमाइन या एलोवेरा लोशन लगाया जा सकता है.

एरोमाथेरैपी के अंतर्गत टी-ट्री औयल बहुत थोड़ी मात्रा में चिकनपौक्स के रैशे पर लगाया जा सकता है.

बीमार बच्चे को थोड़ा गरम मगर हवादार कमरे में रखें. रोगी की परिवार के अन्य सदस्यों से दूरी बनाए रखना आवश्यक है.

बच्चे के चेहरे या गरदन पर आए पसीने को कुनकुने पानी में नरम कपड़े को भिगो कर पोंछें.

बीमार व्यक्ति द्वारा पहने गए कपड़े व बिस्तर की चादर रोज बदलें.

रोगी को दवा दे कर उस का बुखार नियंत्रण में रखें. 6 माह से छोटे बच्चे का बुखार अगर  101 डिगरी है या बड़े बच्चे का बुखार 104 डिगरी तक पहुंच जाए तो तुरंत डाक्टर की सलाह लें.

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विशेष सावधानी

चिकनपौक्स होने के दौरान कभीकभी यह वायरस रीढ़ की हड्डी की नस की जड़ में सुसुप्तावस्था में रह जाता है जो दोबारा विसर्पी छाजन (शिंगिल्स) रोग का रूप ले कर उभरता है. यह समस्या खासतौर पर बूढ़ों या उन लोगों में उत्पन्न होती है जिन की रोग प्रतिरोधक शक्ति किसी बीमारी या तनाव के कारण कमजोर पड़ जाती है.

श्ंिगिल्स रोग के इस तरह उभरने से प्रभावित नस में बहुत तेज दर्द होता है और त्वचा के ऊपर छोटेछोटे छालों का झुंड सा बन जाता है. छालों के ठीक हो जाने के बाद भी दर्द कई सप्ताह तक बना रहता है. इस में डाक्टरी सलाह और इलाज की आवश्यकता तुरंत पड़ती है.

इस जगह सड़क पर हुई नोटों की बारिश

कई बार आपने सडक़ पर गुजरते भारी वाहनों से कुछ न कुछ नीचे गिरते हुए देखा होगा. अगर वो काम की चीज होती है तो वहां लेने वालों की भीड़ लग जाती है. वैसे भी अगर काम की चीज हो और वो भी फ्री की, तो कौन छोड़ना चाहेगा. अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसी फोटो और वीडियो वायरल होते रहते हैं.

आज हम आपको ऐसे ही एक वीडियो के बारे में बताएंगे जो अमेरिका का है. खबरों के अनुसार अटलांटा में हाईवे पर एक ट्रक का दरवाजा गलती से खुल गया और उसमें रखे नोट हवा में उड़ा. सडक़ पर चारों ओर नोट ही नोट बिखर गए. इन्हें लूटने के लिए लोग कारों से बाहर निकल पड़े और सडक़ से उठाकर ले गए.

लोगों ने कारों को साइड में लगा-लगाकर नोट लूटे. वे किसी के भी आने से पहले जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा नोट उठाना चाह रहे थे. जानकारी के मुताबिक करीब 1 से 1.75 लाख की कीमत के डौलर सडक़ पर पड़े थे.

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एक मकान हजार गिद्ध

मध्य प्रदेश सरकार के 24 जून के इस फैसले को देशभर में बेहद अहम माना जा रहा है जिस में उस ने न केवल प्रौपर्टी को 20 फीसदी सस्ता कर दिया है बल्कि यह भी कहा है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में राज्य में कहीं भी प्रौपर्टी के दाम नहीं बढ़ेंगे. इस के पहले 19 जून को ही कैबिनेट ने अपनी मीटिंग में यह मंशा जता दी थी, जिस पर मुहर भोपाल में हुई केंद्रीय मूल्यांकन बोर्ड की मीटिंग में लगी.

ऐसा माना जा रहा है कि इस फैसले से आम लोगों को राहत मिलेगी और रियल एस्टेट के कारोबार में आई मंदी दूर होगी. भोपाल में ही तकरीबन 10 हजार मकान बिकने के लिए तैयार हैं, लेकिन खरीदार न मिलने से बिल्डर्स के चेहरे उतरे हुए थे. अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि रजिस्ट्री कराने के खर्च घटने से न केवल ये मकान बिक जाएंगे बल्कि सरकार को भी बतौर राजस्व खासी आमदनी होगी.

भोपाल क्रेडाई के अध्यक्ष नितिन अग्रवाल का कहना है कि सरकार के इस फैसले से आम लोगों को फायदा होगा, रोजगार बढ़ेगा और प्रौपर्टी के दाम कम होने से नए प्रोजैक्ट आएंगे.

इस फैसले को रुपए के उदाहरण से समझें तो भोपाल के सब से महंगे बावडि़याकलां इलाके की कालोनियों में जमीन के सरकारी सूचीबद्ध सर्किल रेट 21,000 रुपए से घट कर 16,800 रुपए प्रतिवर्ग मीटर हो जाएंगे. वहीं, घटती कीमत पर मकानों की रजिस्ट्री कराने पर 5 से 8 प्रतिशत का जो कर लगता है, वह भी कम लगेगा.

फायदा सब को है, खरीदने वाले को भी, बेचने वाले को भी और उस सरकार को भी जो जबरन कालाधन बचाने के नाम पर जमीनजायदाद की कीमतें तय करती है. फायदा बैंकों को भी है क्योंकि वाकई रियल एस्टेट में बूम आया तो होम लोन लेने वालों की तादाद बढ़ेगी जिस से उन का भी कारोबार बढ़ेगा.

सब को फायदा

आमतौर पर अब तक राज्य सरकारें प्रौपर्टी के दाम और रजिस्ट्री की दरें हर साल बढ़ाती ही रही हैं, लेकिन ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है कि कोई राज्य सरकार उलटा फैसला ले रही है. रियल एस्टेट के कारोबारी इस फैसले से खुश इसलिए हैं कि उन के प्रोजैक्ट सफेद हाथी साबित होने लगे थे, इसलिए वे सरकार का मुंह ताक रहे थे कि वह चारे का इंतजाम करे वरना उन के अरबोंखरबों रुपए डूब जाएंगे. सियासी तौर पर देखें तो कांग्रेस सरकार ने ऐसा इसलिए भी किया क्योंकि विधानसभा चुनाव के वक्त उस ने अपने वचनपत्र में यह बात कही थी.

खुशी और उत्साह के माहौल में कोई यह नहीं समझ पा रहा कि दरअसल सरकार ने अपना राजस्व बढ़ाने के लिए यह फैसला लिया है क्योंकि उस का खजाना खाली पड़ा है और दूसरी अहम बात यह भी है कि सरकार जब चाहे प्रौपर्टी के दाम घटा या बढ़ा सकती है, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है. अगले साल सरकार अगर यह कह देगी कि बावडि़याकलां इलाके में जमीनों की कीमत 30,000 रुपए वर्गमीटर होगी तो वहां प्रौपर्टी महंगी हो जाएगी.

आम लोगों के नजरिए से देखें तो जो प्रौपर्टी उसे 30 लाख रुपए की मिलती, वह अब 24 लाख रुपए में मिल जाएगी. यही नहीं, अब 30 लाख की जगह

24 लाख रुपए पर ही स्टांप ड्यूटी लगेगी और रजिस्ट्री शुल्क भी 24 लाख रुपए के हिसाब से चार्ज किया जाएगा. यानी, खरीदार को तिहरा फायदा होेगा.

वहीं, बिल्डर्स अगर इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं तो साफ यह भी होता है कि वे अब तक 24 लाख रुपए की बाजार भाव वाली प्रौपर्टी पर 30 लाख रुपए के हिसाब से कर देते थे. अब इस कम कीमत में भी उन्हें कोई घाटा नहीं हो रहा है, उलटे कर कम होने का मुनाफा ही हो रहा है. इनकम टैक्स की जवाबदेही से उन्हें अलग छुटकारा मिला क्योंकि आयकर वाले इस आय को अब 30 लाख की जगह 24 लाख रुपए मानने को मजबूर होंगे.

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बनते जा रहे फ्लैट

अकेले भोपाल या मध्य प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश के किसी भी शहर को देख लें, हर जगह थोक में मकान ही मकान बन रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में तो जहां तक नजर जाती है वहां गगनचुंबी इमारतें आकार लेती नजर आती हैं. महंगे, भव्य और आलीशान अपार्टमैंट व कालोनियां इन शहरों की शान होती जा रही हैं. बी श्रेणी के शहरों के हाल भी जुदा नहीं हैं. इन्हें देख लगता है कि लोगों के पास खाने को इफरात से है, पहनने को अच्छेअच्छे कपड़े भी हैं. लेकिन मकानों का हर कहीं टोटा है.

यानी 3 बुनियादी जरूरतों में से मकान सब से बड़ी जरूरत है और लोगों की क्रयक्षमता आजकल बढ़ी है. मिसाल या उदाहरण भोपाल का ही लें तो वहां के पौश इलाकों एमपी नगर, शिवाजी नगर, रचना नगर और टीटी नगर में डेढ़ करोड़ रुपए तक के फ्लैट धड़ल्ले से बिक रहे हैं और लोग बैंकों से लोन ले कर बिल्डर्स को महंगे मकानों की कीमत अदा कर रहे हैं.

यही हाल छोटे मकानों का भी है. उन के ग्राहकों की तादाद में भी इजाफा हो रहा है. 300-400 वर्गफुट या

5-6 लाख रुपए की कीमत वाला फ्लैट लोग अपनी जरूरत और हैसियत के हिसाब से खरीद रहे हैं, भले ही कर्ज के पैसों से खरीदें.

अपना मकान हर दौर में लोगों का सपना रहा है, जिस के पूरे होने के तौरतरीकों में क्रांतिकारी बदलाव आया है. अब मकान उस के क्षेत्रफल को नहीं, बल्कि कीमत देख कर खरीदे जाते हैं. एकल होते परिवारों और बढ़ते शहरीकरण के चलते सरकार ने लोगों को अपने इस सपने से समझौता करने को मजबूर कर दिया है. यह कोई नहीं जानता कि मकानों की कीमत कौन और कैसे तय करता है.

सारे सूत्र सरकार के हाथ

कोई अगर यह कहे कि मकानों के दाम बिल्डर तय करता है तो वह निश्चितरूप से एक परंपरागत गलतफहमी का शिकार है. दरअसल, सरकार की नीतियों, रीतियों और सैकड़ों तरह के नियमकायदे व कानून ही मकानों की कीमत तय करते हैं. किसी भी शहर या गांव तक में जमीन या मकान की रजिस्ट्री सरकार द्वारा तय किए दामों पर ही होती है. यानी रियल एस्टेट के कारोबार में सब से बड़ा रोल सरकार का होता है. भले ही, उस का चेहरा परदे के पीछे रहता हो.

मध्य प्रदेश में एक झटके से प्रौपर्टी के दाम, कथित रूप से ही सही, गिर जाएं तो इस की वजह सरकार का छोटा सा फैसला था. जब भी कोई आम आदमी या बिल्डर मकान बनाने की बात सोचता है तो उस की पहली जरूरत जमीन होती है. और जमीन के मामले में सरकार के कानून बेहद जटिल और उलझे हुए हैं. इन से वास्ता तभी पड़ता है जब कोई मकान बनाने की ठान लेता है.

आजकल चूंकि 10 फीसदी मकान भी लोग खुद नहीं बना पाते, इसलिए हर कोई मकान के लिए बिल्डर का मुहताज है. रियल एस्टेट में अब बड़ीबड़ी कंपनियां उतर आई हैं, जो लोगों की जरूरत के मुताबिक वाजिब दामों में मकान देने का दावा और वादा करती हैं. दैनिक अखबारों से ले कर टीवी चैनल्स के परदे तक बिल्डर्स के इश्तिहारों से रंगे पड़े रहते हैं. हालत तो यह तक हो गई है कि इन्हीं इश्तिहारों के जरिए पैसा कमाने के लिए कई नामी मीडिया हाउस प्रौपर्टी के मेले समारोहपूर्वक आयोजित करने लगे हैं.

वैध अवैध खर्चे

सच यह है कि आप जो मकान 30 लाख रुपए का खरीदते हैं उस की असल कीमत दरअसल 15 लाख रुपए के लगभग आती है. कहने का मतलब यह नहीं कि बचे 15 लाख रुपए बिल्डर का मुनाफा होता है, बल्कि इस में सरकार और उस के अधिकारियों की भी हिस्सेदारी होती है.

इस गुत्थी को आसान उदाहरण से समझा जा सकता है. अगर कोई बिल्डर एक एकड़ यानी 43,560 वर्गफुट जमीन में कालोनी या मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बनाने की सोचता है तो जिस भाव में वह जमीन खरीदता है या जिस भाव में जमीन उसे मिलती है उसी अनुपात में मकान की दरें तय होती हैं. रियल एस्टेट में लोकेशन शब्द बड़ी प्राथमिकता से लिया जाता है. जमीन और मकान की कीमतें इसी लोकेशन पर निर्भर करती हैं.

किसी भी शहर के पौश इलाके में बिल्डर अगर कालोनी बनाएगा तो जाहिर है जमीन महंगी मिलेगी. लिहाजा, मकान के दाम भी बढ़े हुए होंगे. इस पर भी हकीकत यह है कि ली गई जमीन का आधा हिस्सा ही वह निर्माण के लिए उपयोग कर पाता है, बाकी का आधा उसे सड़क, गलियों, पर्यावरण आदि के लिए कुरबान करना पड़ता है. मान लिया जाए कि उस ने एक एकड़ जमीन 30 लाख रुपए में ली, तो दरअसल वह उसे 60 लाख रुपए की पड़ती है.

जमीन का डायवर्जन भी आसानी से नहीं होता. इस के लिए बिल्डर को टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग विभाग में शुल्क देना पड़ता है जो अलगअलग राज्यों में अलग रहता है. चूंकि बगैर घूस के डायवर्जन नहीं होता, इसलिए सरकारी फीस के बराबर ही उसे घूस भी देनी पड़ती है वरना जमीन उस के किसी काम की नहीं रह जाती.

इस के बाद उसे नजूल यानी राजस्व विभाग की परिक्रमा करनी पड़ती है. वहां भी सरकारी शुल्क और घूस का हिस्सा तय होता है. प्रोजैक्ट संबंधी तमाम अनुमतियां यही दोनों विभाग देते हैं, लेकिन इन की शर्तें बड़ी कड़ी होती हैं कि इतने वर्गफुट की सड़क छोड़ो, इतने वर्गफुट की गलियां छोड़ो, इतने वर्गफुट में पार्क और पार्किंग एरिया बनेगा और इतने वर्गफुट में यह भी और वह भी होना जरूरी है क्योंकि सरकार ऐसा कहती या चाहती है.

होतेहोते इस जमीन का भाव उसे एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ पड़ता है. फिर शुरू होता है स्थानीय निकायों का दखल. यहां से उसे अंतिम तौर पर कालोनी बनाने की इजाजत मिलती है. बड़े शहरों के नगरनिगमों के अधिकारी से ले कर चपरासियों की तोंदें इन्हीं बिल्डर्स की दक्षिणा से बढ़ रही हैं. नगरनिगम पूरा प्रोजैक्ट देख इजाजत देता है जिस की घूस उस की लागत के करीब 10 फीसदी होती है.

अब तक 30 लाख रुपए वाली एक एकड़ की जमीन की कीमत डेढ़ करोड़ रुपए हो जाती है. इस पर बिल्डर अगर 40 फ्लैट्स बना रहा है तो उसे 12 करोड़ रुपए मिलते हैं जिन में से अब तक की प्रक्रिया के डेढ़ करोड़ रुपए घटा दिए जाएं तो साढ़े 10 करोड़ रुपए बचते हैं.

भोपाल के एक ब्रैंडेड और नामी बिल्डर से इस प्रतिनिधि ने इस सिलसिले में बातचीत की तो उन्होंने ठेठ देसी लहजे में बताया, ‘‘इन साढ़े 10 करोड़ रुपए में से हमें 2 करोड़ रुपए ही मुश्किल से बच पाते हैं. बाकी 10 करोड़ रुपए तक की राशि मकाननिर्माण सामग्री, बैंक से लिए कर्ज के ब्याज, इश्तिहार और दलाली आदि में चली जाती है. इस के अलावा हमें अपने स्टाफ की पगार और दूसरे खर्चें भी इसी में से पूरे करने पड़ते हैं. ऐसे में अगर एक प्रोजैक्ट 3 वर्षों में पूरा होता है तो हमें कुल 40-50 लाख रुपए बचते हैं. क्या यह हमारा हक नहीं, जबकि पूरी मेहनत हम करते हैं और जोखिम भी उठाते हैं.’’

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इस तजरबेकार बिल्डर की यह बात भी सच के बहुत नजदीक लगती है कि ग्राहक तो हमें सिर्फ फ्लैट के 30 लाख रुपए दे कर बेफिक्र हो जाता है. इस राशि के एवज में उस के घर में बिजली का इंतजाम भी हम ही करते हैं और नलों में पानी भी पहुंचाते हैं. इस पर भी आएदिन शिकायतें होती रहती हैं जिन का खमियाजा हमें ही भुगतना पड़ता है.

आजकल तो रेरा कानून के चलते जब तक हम कंप्लीशन सर्टिफिकेट जमा न कर दें तब तक हमारा पैसा फंसा रहता है. ग्राहक घर की चाबी ले कर जब हमें लिख कर दे देता है कि उसे मालिकाना हक मिल गया तभी हम चैन की सांस ले पाते हैं. लेकिन यही लोग सरकारी विभागों की मनमानियों और ज्यादतियों के सामने नतमस्तक रहते हैं.

बेहद अर्थपूर्ण लहजे में इस बिल्डर ने यह भी बताया कि मध्य प्रदेश सरकार के प्रौपर्टी के दाम 20 फीसदी घटाने के फैसले से कुछ खास फायदा किसी को नहीं हुआ है. इस से मार्केट में ब्लैकमनी आ जाएगी क्योंकि दाम रजिस्ट्री के घटे हैं जिस से ग्राहक को 50-60 हजार रुपए से ज्यादा का फायदा नहीं होने वाला क्योंकि सरकार पहले ही रजिस्ट्री की दरें 2.2 फीसदी बढ़ा चुकी है.

अब होगा यह कि जिस जगह प्रौपर्टी का दाम 30 लाख रुपए है वहां रजिस्ट्री 24 लाख रुपए की होगी, बाकी चीजें तो ज्यों की त्यों रहेंगी. घाटा उन लोगों का भी है जिन्होंने पहले ही मकान खरीद रखे हैं.

इस बिल्डर के मुताबिक, यह ठीक है कि सभी लोग बेचने के लिए ही मकान नहीं खरीदते. कोई 20 फीसदी लोग मकानों में निवेश करते हैं. अब उन्हें निवेश में फायदे की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. दरअसल, सरकार पर बिल्डर्स का दबाव था क्योंकि उन के अरबों रुपए फंसे पड़े थे, इसलिए यह फैसला सरकार को लेना पड़ा.

चक्कर ब्लैक ऐंड व्हाइट का

इस में कोई शक नहीं कि अधिकांश बिल्डर्स 2 नंबर का पैसा अपने प्रोजैक्ट्स में खपाते हैं. यह काला पैसा कहां से आता है और कैसे जनरेट होता है, यह हर कोई जानता और समझता है कि लोग सरकार को टैक्स नहीं देना चाहते.

रियल एस्टेट कारोबार में कदमकदम पर टैक्स और घूस का प्रावधान है. ऐसे में कोई बिल्डर यह सोचे कि वह सफेद पैसे से चार पैसे कमा लेगा तो यह उस की गलतफहमी है. तो क्या सरकार की टैक्स नीतियां इस की जिम्मेदार हैं, इस बात पर बहस की तमाम गुंजाइशें मौजूद हैं. लेकिन तगड़े मुनाफे का लालच बिल्डर भी छोड़ नहीं पाते, इसलिए अब हर बड़ी नामी कंपनी मकान बना रही है.

लेकिन इस से आम लोगों को कई सहूलियतें हैं. इस पर अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत लागू होता है कि कंपीटिशन तगड़ा होगा तो फायदा ग्राहक को भी होगा, दाम के मामले में भी और गुणवत्ता के मामले में भी.

कोई प्रामाणिक आंकड़ा किसी के पास उपलब्ध नहीं है, लेकिन बिल्डर्स के ही अंदाजों के मुताबिक, रियल एस्टेट कारोबार में लगा लगभग 50 फीसदी पैसा ब्लैक का है. इस में पूंजीपतियों, नेताओं, उद्योगपतियों, सैलिब्रिटीज और अफसरों तक की भागीदारी है. इस पैसे को पकड़ पाना किसी सरकार के लिए आसान नहीं है. हां, बड़ी कंपनियों के इस कारोबार में उतरने से ब्लैकमनी पर थोड़ी लगाम जरूर लगी है.

कारोबारियों की मुनाफाखोर प्रवृत्ति और सरकार की दखल देती नीतियां व कानून भी इस ब्लैकमनी के बड़े जिम्मेदार हैं जिस की तुलना सरकारी लौटरी और सट्टे से की जा सकती है. ये दोनों ही बुरे हैं, लेकिन धड़ल्ले से चलते हैं.

कम होती खेती की जमीनें

मकानों की बढ़ती मांग से सब से ज्यादा नुकसान कृषियोग्य भूमि का हो रहा है, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. अब खेतीकिसानी की जमीन का व्यावसायिक और आवासीय उपयोग पहले के मुकाबले आसान होता जा रहा है.

यह बेहद गंभीर और चिंताजनक बात है कि एक तरफ तो केंद्र सरकार 2022 तक खेतीकिसानी को मुनाफे का ध्ांधा बनाने का दावा कर रही है और दूसरी तरफ धड़ल्ले से जमीनों का डायवर्जन हो रहा है. डायवर्जन यानी भूमि उपयोग में बदलाव के कानून हर राज्य में अलगअलग हैं.

मध्य प्रदेश में साल 2017 में शिवराज सिंह चौहान सरकार ने डायवर्जन की प्रक्रिया को आसान बना दिया था. इस फैसले में प्रावधान है कि किसान खुद अपनी जमीन का डायवर्जन कर सकता है. अगर वह कह देगा कि वह जमीन का आवासीय या व्यावसायिक उपयोग कर रहा है तो सरकार उस की बात मान लेगी लेकिन तभी, जब वह सरकारी खजाने में निर्धारित शुल्क जमा करा देगा. यह सरकार को बैठेबैठाए मुफ्त पैसा देता है.

इस फैसले से हुआ यह कि बिल्डर्स ने किसानों से जमीनों के सौदे किए और रजिस्ट्री कराने से पहले ही उन से जमीन का डायवर्जन करवा लिया. हालांकि इस की फीस भी उन्होेंने ही भरी लेकिन इस के बाद प्रक्रिया से वे बच गए. सरकारी नियम तो यह है कि बंजर और अनुपजाऊ जमीन का ही डायवर्जन होगा लेकिन किसानों ने धड़ल्ले से उपजाऊ जमीनों का भी डायवर्जन करवाया. वैसे देश में कृषि उत्पादकता अगर बढ़े तो खेती की जमीन कभी कम न होगी. हमारी कृषि उत्पादकता काफी दयनीय है.

अंगरेजों के बनाए जमीन संबंधी कानून अभी भी वजूद में हैं. उन में संशोधन हो रहे हैं और उन में सरकार का अपना स्वार्थ है. सोनिया गांधी ने 2013 में कानून बनवा कर सरकार के हाथ बांधे थे पर भाजपा सरकार इन कानूनों में बदलाव ला कर खेतों से दलितों, गरीबों को निकाल कर गुलामी का दोहरा निशाना बना रही है.

एक किसान या भूमिस्वामी अगर किसी को जमीन बेचता है तो सरकार के लिए यह एक सूचनाभर होनी चाहिए, जिस से वह अपनी नीतियां बनाए. लेकिन सरकार हर बात में भारी टैक्स लेती है और हैरत की बात यह है कि जहांजहां टैक्स का प्रावधान है, वहीं घूस का चलन ज्यादा है. अगर कोई अपना मकान बनाना चाहे तो डायवर्जन के अलावा उसे स्थानीय निकाय से नक्शा पास कराना पड़ता है और राजस्व विभाग से इजाजत लेनी पड़ती है.

ये काम आसानी से नहीं हो पाते. बल्कि इन के लिए तगड़ी घूस देनी पड़ती है. सरकारी फीस तो अपनी जगह है ही. यहां इन तर्कों के कोई माने नहीं कि सरकार शहरी और ग्रामीण विकास व नियोजन करती है और लिए गए पैसे को विकास की कल्याणकारी योजनाओं में लगाती है, इस के अलावा वह लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराती है. अगर ऐसा होता तो शहर बेतरतीब न होते, कहीं भी ट्रैफिक जाम न होता, सड़कें साफसुथरी व चौड़ी होतीं और नालियों का पानी बह कर सड़कों पर नहीं आ रहा होता.

हकीकत तो यह है कि सरकारों ने जानबूझ कर सीवेज, ड्रेनेज और हवापानी के अधिकार हमेशा अपने हाथ में रखे हैं जिस से लोग बिना उस की मरजी के मकान न बना पाएं. अगर भूमिस्वामी सरकार द्वारा तय की गई दरों पर जमीन बेचने और निर्धारित स्टांप ड्यूटी देने का कानूनन बाध्य है तो फिर जमीन उस की कहां रही. बात वाकई ‘सभी भूमि गोपाल की’ जैसी है जिस के तहत कोई भी आसानी से मकान नहीं बना सकता.

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चक्रव्यूह कर्ज का

तमाम कानूनी खानापूर्तियां करने के बाद मकान बनाने में जरूरत पड़ती है पैसों की, जिस की बाबत अच्छी बात यह है कि लोन अब पहले के मुकाबले आसानी से मिल जाता है. इस कहनेभर की ‘अच्छी बात’ की हकीकत यह है कि लोन सिर्फ सरकारी कर्मचारियों को ही आसानी से मिलता है क्योंकि उन की आमदनी स्थायी और बंधीबंधाई होती है.

बैंकों को बेफिक्री इसलिए रहती है कि सरकारी कर्मचारी का जीपीएफ उस के जोखिम को कम करता है. प्राइवेट नौकरी वालों, व्यापारियों और अनियमित आमदनी वालों को लोनलेने के लिए अभी भी पापड़ बेलने पड़ते हैं. तरहतरह के पहचानपत्रों से ले कर इनकम टैक्स रिटर्न, आमदनी के सुबूत और 2 गारंटर तक बैंक के होमलोन में लगते हैं.

दिलचस्प बात यह कि लोन चुकता न होने तक मकान बैंक के पास बंधक रहता है. रजिस्ट्री की मूलप्रति बैंक अपने पास रखते हैं. मान लिया जाए कि ये सब हर्ज की बातें नहीं तो हैरत यह जान कर होती है कि अगर कोई 30 लाख रुपए का मकान खरीद रहा है तो वह उसे दरअसल 54 लाख रुपए के लगभग पड़ता है.

बैंक की ब्याजदरों में उतारचढ़ाव आता रहता है जो ग्राहक की मासिक किस्त यानी ईएमआई को ज्यादा प्रभावित नहीं करता. अगर कोई बैंक से 15 साल के लिए 30 लाख रुपए का कर्ज लेता है तो उस की मासिक किस्त लगभग 30 हजार रुपए बनती है. इस तरह वह 15 साल में 54 लाख रुपए बैंक को लौटाता है.

तो फिर होमलोन का फायदा क्या, सिवा इस के कि 15-20 साल में मकान की कीमत बढ़ कर 45 लाख रुपए तक हो जाती है. लेकिन नोटबंदी के बाद से तेजी से मकानों की कीमतें देशभर में गिरी हैं. जिन लोगों ने निवेश के लिहाज से नोटबंदी के पहले मकान खरीदे थे उन की कीमतें बजाय बढ़ने के, घटी हैं.

किसी भी नजरिए से यह नहीं कहा जा सकता कि लोन आसानी से मिलने लगे हैं और किफायती पड़ते हैं. दरअसल, पूरा रियल एस्टेट कारोबार ही बैंकलोन पर चल रहा है. बिल्डर भी कर्ज लेता है और उस का खरीदार भी, इस तरह बैंक को

2 तरफ से ब्याज मिलता है. इस के बाद भी ब्याजदरें बढ़ती जाती हैं. ऐसे में यह सवाल उठना कुदरती बात है कि आखिर इतना पैसा जाता कहां है और तमाम गारंटियों व बंधक होने के बाद भी मकान उस आदमी का क्यों नहीं होता जो ब्याज की चक्की तले पिसता रहता है और अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा बैंकों को चढ़ा देता है. वह बेचारा यह भी नहीं पूछता कि जिस मकान का पूरा मालिक वह है ही नहीं, उस का संपत्ति कर वह हर साल नगरनिगम को क्यों दे?

बदलती लाइफस्टाइल

नए मकानों, कालोनियों, मल्टीस्टोरीज बिल्डिंगों ने लोगों की लाइफस्टाइल बदल कर रख दी है. अब आम लोग खुद मकान नहीं बना पाते. सरकार ने मकान बनाने की प्रक्रिया इतनी कठिन कर दी है कि लोग झख मार कर बिल्डर के पास ही जाते हैं जो सरकारी विभागों से मकान संबंधी काम कराने का भी विशेषज्ञ हो जाता है.

इन नए मकानों में वर्णव्यवस्था भी नए तरह से फलफूल रही है. अगर आप एक ऐसी टाउनशिप में रहते हैं जिस में क्लब हाउस, स्विमिंग पूल, मीटिंग हौल, जिम, खेल का मैदान है तो आप नए

जमाने के आर्थिक सवर्ण हैं. इस से कम सुखसुविधाओं और कम कीमत के मकानों में रहने वाले लोग सामाजिक नजरिए से शूद्र होने लगते हैं. समाज में पूछपरख का एक बड़ा पैमाना आलीशान और महंगा मकान हो जाता है. लिहाजा, लोग अपनी हैसियत से बड़ा मकान लेने में हिचकिचाते नहीं हैं.

भोपाल के एक नामी आर्किटैक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ की मानें तो अब लोगों की लाइफस्टाइल बदल रही है. 10-15 वर्षों पहले तक लोग बड़ा स्वतंत्र बंगला चाहते थे लेकिन अब वे फिर फ्लैट्स का रुख कर रहे हैं. इस की वजह उन का सुरक्षित होना भी है और यह भी कि नई पीढ़ी अब अभिभावकों से दूर बाहर के शहरों में नौकरी कर रही है.

सुयश के मुताबिक, अब 4-6 हजार वर्गफुट तक के बंगले करोड़ों रुपयों में बिक रहे हैं जिन में फ्लैट्स बनेंगे. यह ठीक है कि लोग अब लक्जरी मकान चाहते हैं और उस की कीमत देने को भी तैयार रहते हैं लेकिन मकानों का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है. शहर के बाहर जमीन खोजने वाले बिल्डर्स अब फिर पौश इलाकों का रुख कर रहे हैं जहां एक बड़ा सा मकान तोड़ कर 8-10 मंजिला अपार्टमैंट्स बनाए जा सकें.

यानी असुरक्षित अमीर अब अपनी सुरक्षा और पड़ोस की खातिर अपने से थोड़े से नीचे के वर्ग के लोगों के साथ रहने को मजबूर हो चले हैं और बिल्डर्स इस पर ध्यान भी दे रहे हैं कि कहां यानी किस लोकेशन पर ग्राहक ज्यादा मिलेंगे.

पूरा होता सपना

सरकार चाहे जो भी फैसले ले, कैसी भी नीतियां बनाए लेकिन एक नपातुला सच यह भी है कि मकान या प्रौपर्टी कभी सस्ते नहीं होते. इस के बाद भी लोग इन्हें खरीद पा रहे हैं तो यह उन की महती जरूरत है. लेकिन एक मकान खरीदने के बाद उन की जिंदगी में बचत के नाम पर कुछ नहीं रह जाता. महंगाई बढ़ती है तो इस का यह मतलब नहीं कि लोगों की आमदनी भी बढ़ती है, बल्कि होता यह है कि लोग अपनी जरूरतें समेटने लगते हैं व आधी से ज्यादा जिंदगी कर्ज में डूबे रहते हैं.

तमाम सरकारी और गैरसरकारी झंझटों व परेशानियों के बाद भी इसी वजह से लोगों के मकान का सपना पूरा हो पा रहा है. यह सपना सस्ते में, किफायत से भी पूरा हो सकता है बशर्ते सरकार प्रौपर्टी के मामले में गैरजरूरी दखलंदाजी न करे. मकान बनाना अगर किसी होटल में खाना खाने जैसा आसान हो जाए तो सरकार का नुकसान नहीं होगा. उलटे, अर्थव्यवस्था बजाय बिगड़ने के सुधरेगी. पर सरकार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती. वह खुद तो कभी इस बात का हिसाबकिताब देती नहीं कि मकानों के बदले में उस के विभाग और एजेंसियां जो राजस्व इकट्ठा करती हैं उस का वह कहांकहां कैसे इस्तेमाल करती है, लेकिन आम लोगों से वह पाईपाई का हिसाब लेती है.

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ऐसा लगता नहीं कि बिल्डर्स की मुहताजी कभी खत्म या कम होगी, क्योंकि अब हर चीज का व्यावसायीकरण हो गया है और नियमकानून इतने उलझे हुए हैं कि लोग सीधे सरकारी विभागों में जाने से बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं. बात मकान की हो तो लोग अपने सपने और जरूरत से समझौता कर लेते हैं जिस का फायदा बिल्डर्स को मिल रहा है.

परिवारों में सिमटी राजनीति

बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को जब पार्टी में शामिल किया तो राजनीति में परिवारवाद की चर्चा मुखर हो गई. राजनीति और राजनेताओं को देखें तो साफ लगता है कि राजनीति में परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं रह गया है. जनता ने भी इसे स्वीकार कर लिया है.

जनता राजनीति के ट्रैंड को तय करती है. राजनीति में बहुत सारे नेता ऐसे भी रहे हैं जो परिवारवाद को ले कर कुछ नहीं कर पाए. वहीं, कुछ ऐसे नेता भी रहे हैं जो परिवारवाद को सफल बना सके हैं. परिवारवाद की जब बात चलती है तो सब से और ऊपर कांग्रेस पार्टी का नाम आता है.

कांग्रेस की यह परिपाटी सभी दलों में सफलतापूर्वक स्थापित हो गई है. दलों ने कांग्रेस के परिवारवाद को वंशवाद कहना शुरू किया है, जिस से उन की अपनी पार्टी के भीतर बने परिवारवाद को सही ठहराया जा सके. राजनीतिक जानकार रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘परिवारवाद और वंशवाद दोनों एक ही चीज हैं. नेता अपने बचाव के लिए इन को अलग कर के देख रहे हैं. परिवारवाद भारतीय राजनीति को बुरी तरह से जकड़ चुका है. अब इस को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता. परिवारवाद को ले कर हर दल की अपनी अलग कहानी, अलग सोच है.’’

नेहरूगांधी परिवार के अलावा भारतीय राजनीति में वंशवाद की श्रेणी में जिन नेताओं को रखा जाता है उन में शिवसेना का ठाकरे परिवार जिस में बाल ठाकरे के बाद उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, बिहार के लालू यादव, महाराष्ट्र के शरद पंवार, जम्मूकश्मीर के शेख अब्दुल्ला,

मध्य प्रदेश के माधवराव सिंधिया, तमिलनाडु के करुणानिधि और उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव प्रमुख हैं.

समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का राजनीति में सब से बड़ा परिवार है. उस के सब से ज्यादा सदस्य राजनीति में हैं. लालू प्रसाद यादव का नंबर मुलायम के बाद आता है. वर्तमान लोकसभा में मुलायम सिंह यादव और उन के पुत्र अखिलेश यादव संसद सदस्य हैं.

वंशवाद बनाम परिवारवाद

19वीं लोकसभा में चुनाव के बाद जिन 2 राजनीतिक मांबेटों की जोड़ी संसद सदस्य है उन में दोनों ही नाम कांग्रेस से जुड़े हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दोनों बहुएं सोनिया गांधी और मेनका गांधी खुद तो संसद सदस्य हैं ही, उन के बेटे राहुल गांधी और वरुण गांधी भी संसद सदस्य हैं. सोनिया और राहुल गांधी कांग्रेस से लोकसभा में हैं जबकि मेनका और वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी से संसद में हैं. दोगलेपन में माहिर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के मांबेटे की राजनीति को वंशवाद बताती है जबकि मेनका और वरुण गांधी की जोड़ी को संस्कारवादी बताती है.

वर्तमान लोकसभा में हेमा मालिनी और उन के सौतेले पुत्र सनी देओल की जोड़ी को परिवारवाद की नजर से देखा जा सकता है. सिनेमाजगत की यह जोड़ी भी परिवारवाद को कोसने वाली भाजपा के ही टिकट पर चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंची है. भाजपा सोनिया और राहुल गांधी की आलोचना करती है जबकि मेनका और वरुण गांधी को एकसाथ चुनाव लड़ने के टिकट देती है. मेनका गांधी के अलावा भी भाजपा में परिवारवाद का बोलबाला कम नहीं है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे पंकज सिंह विधायक हैं और बडे़ बेटे नीरज सिंह भी राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं.

हिमाचल प्रदेश के भाजपाई पूर्व मुख्यमंत्री पी के धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर भाजपा सांसद हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम और राजस्थान के भाजपा द्वारा नियुक्त राज्यपाल कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भाजपा सांसद हैं. कल्याण सिंह के ही पोते संदीप सिंह उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं.

इसी कड़ी में दूसरे प्रमुख नामों में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत राजे, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा, पूर्व दिग्गज भाजपा नेता चरती लाल गोयल के बेटे विजय गोयल, भाजपा नेता प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे, भाजपा नेता वेदप्रकाश गोयल के बेटे पीयूष गोयल, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद, भाजपा नेता ठाकुर प्रसाद के बेटे रविशंकर प्रसाद, बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन के बेटे गोपालजी टंडन, और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता लखीराम अग्रवाल के बेटे अमर अग्रवाल के नाम प्रमुख हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही अपवाद हैं पर अमित शाह के पुत्र परिवारवाद का लाभ उठा रहे हैं.

भाजपा के सहयोगी दलों में भी परिवारवाद छाया है. इन में राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति पासवान के नाम प्रमुख हैं.

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निशाने पर मायावती

बसपा सदा से पार्टी में परिवार का विरोध करती रही है. बसपा के संस्थापक कांशीराम ने तो कभी अपने परिवार को साथ रखा ही नहीं. उन का परिवार तो उन की मृतदेह भी न ले पाया क्योकििं मायावती ने उसे  डराया था. खुद मायावती ने भी पहले परिवार को राजनीति से दूर रखा. 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी के अंदर सक्रिय किया. आनंद कुमार नोएडा में रहते थे. पेशे से क्लर्क थे. पार्टी में आनंद कुमार का राजनीति से सीधा सरोकार भले ही नहीं था पर उन को मायावती का दाहिना हाथ माना जाता था. मायावती के सत्ता से हटने के बाद आनंद कुमार पर बेहिसाब पैसा कमाने के आरोप लगे. आनंद कुमार का पार्टी के अंदर दखल बना रहा.

2017 में पहली बार मायावती ने आनंद कुमार को बसपा उपाध्यक्ष बनाया. एक साल ही वे इस पद पर रह सके. 2018 में आंनद कुमार को इस पद से हटा दिया गया. उस समय मायावती ने तर्क दिया कि वे बसपा में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसा परिवारवाद नहीं चाहती हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव में सपाबसपा गठबंधन के बल पर लोकसभा की 10 सीटें जीतने के बाद मायावती ने पार्टी को पूरी तरह से परिवारवाद के हवाले कर दिया है. भाई आंनद कुमार को दूसरी बार पार्टी का उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का नैशनल कोऔर्डिनेटर बना दिया है.

मायावती खुद भी अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी की उपाध्यक्ष थीं. इस के बाद वे पार्टी सुप्रीमो बन गईं. मायावती बसपा को परिवारवाद की पार्टी नहीं बनाना चाहती थीं. लेकिन पार्टी में भरोसेमंद लोगों की कमी के चलते उन के लिए परिवार के लोगों को पार्टी में लाना मजबूरी हो गई है.

परिवारवाद से परे नेता

बिहार के समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के समय पर ही उन के बेटे रामनाथ ठाकुर को टिकट दिया गया तो कर्पूरी ठाकुर ने अपना नाम वापस ले लिया. चौधरी चरण सिंह जब तक सक्रिय राजनीति में रहे, अपने बेटे चौधरी अजीत सिंह को राजनीति में आने नहीं दिया. ओडिशा के नेता

बीजू पटनायक ने अपने सक्रिय रहते अपने बेटे नवीन पटनायक को राजनीति में नहीं आने दिया. बीजू पटनायक के बाद नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री बने.

वैसे, संघ अपने को खुद परिवार मानता है और इस नाते नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ संघ परिवार के सदस्य हैं. भाजपा की राजनीति में संघ परिवार के बाहर का व्यक्ति सेवक ही रहेगा जैसे कांग्रेस में गांधी परिवार के बाहर का.

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