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Family Story in Hindi : मधु विष बना – मां की याद और पंकज की नईनवेली दुलहन

Family Story in Hindi :

पंकज अपनी मां रश्मि की मौत के बाद भी उन्हें भूला न पाया. दूसरी मां ने पूरा सम्मान दिया लेकिन मन में रश्मि की ही तसवीर बसी थी. ऐसे में अपनी नईनवेली दुलहन को देखा तो…

बचपन में होश संभालने के बाद पंकज ने बूआ के मुंह से यही सुना था कि ‘यह तुम्हारी मम्मी की तसवीर है. इसे प्रणाम करो’ और अब 3 साल का पंकज पूजा के कमरे में आ कर आले में रखी अपनी मां की तसवीर को एकटक देखता रहता. कभीकभी वह बूआ की गोद में चढ़ कर तसवीर पर हाथ भी फेर लेता.
पहले वह तसवीर पंकज के पिता शिवानंद के कमरे में टंगी थी क्योंकि इस के साथ उन की कुछ यादें जुड़ी थीं. कभी चित्र की नायिका ने शिवानंद से कहा भी था, ‘अब तो मैं सशरीर यहां रहती हूं. तब मेरा इतना बड़ा चित्र क्यों लगा रखा है? अब तो मैं वधू भी नहीं रही, एक बच्चे की मां बन चुकी हूं.’
शिवानंद ने तब हंसते हुए कहा था, ‘क्या करूं मेरी आंखों में तुम्हारा वही रूप समाया हुआ है.’
‘हमेशा पहले जैसा तो नहीं रहेगा,’ रश्मि बोली, ‘अब तो रूप बदल गया है.’ ‘नहीं, रश्मि. हम बूढे़ हो जाएंगे तब भी तुम ऐसी ही याद आती रहोगी,’ शिवानंद भावुक हो कर बोले, ‘पहली झलक यही तो देखी थी.’
यह सच था कि विवाह से पहले शिवानंद और रश्मि ने एक दूसरे को देखा नहीं था. रश्मि को परिवार के दूसरे लोगों ने देखा और पसंद किया. तब जयमाला की रस्म होती नहीं थी. विवाह के समय सबकुछ इतना दबादबा हुआ था कि चाह कर भी शिवानंद पत्नी को देख नहीं सके. विवाह कर घर लौटे तो अपने कमरे में टंगे चित्र में पत्नी को पहली बार देखा तो देखते ही रह गए. इस चित्र को उन के छोटे भाई सदानंद ने खींचा था और बड़ा करा कर भाई के कमरे में लगा दिया था.
रश्मि के कई बार टोकने पर भी वह चित्र उन के शयनकक्ष में लगा ही रहा. 2 साल में रश्मि ने एक सुंदर से बच्चे को जन्म दिया, जिस का नाम पंकज रखा गया. पंकज भरेपूरे परिवार का दुलारा था. उस के दिन सुख से बीत रहे थे कि रश्मि में पुन: मातृत्व के लक्षण उभरे. घर में बेटा या बेटी को ले कर एक नई बहस छिड़ गई. दादी कहती कि एक बेटा और हो जाए तो पंकज को भाई मिल जाएगा. दोनों भाई उसी तरह साथ रहेंगे जैसे मेरे शिवानंदसदानंद रहे. बूआ पूछती, ‘मां, क्या बहन भाई के सुखदुख की साथी नहीं होती?’
इस तरह के हासपरिहास में 4 महीने बीत गए कि अचानक एक दिन रश्मि अपनी ही साड़ी में उलझ कर सीढि़यों से लुढ़कती हुई नीचे आ गिरी. बच्चा पेट में ही मर गया. रश्मि की चोट गहरी थी. उसे भी बचाया नहीं जा सका.
रश्मि का वधूवेश में लिया चित्र पहले जहां टंगा रहता था उस की मृत्यु के बाद भी वही टंगा रहा. नन्हा पंकज पूछता तो बूआ बहलाते हुए कहतीं, ‘मम्मी, अभी फोटो में से निकल कर आसमान में घूमने गई हैं.’
‘कैसे, प्लेन में बैठ कर?’
‘हां, बेटा.’
‘बूआ, मम्मी, घूम कर कब आएगी?’
‘बस, एकदो दिन में आ जाएगी.’
शिवानंद के विरोध पर उन का विवाह टल गया था. उस दौरान बेटी प्रभा भी शादी कर के अपनी ससुराल चली गई. मां को गृहस्थी संभालना पहाड़ लग रहा था क्योंकि बहू और बेटी के रहते हुए उन में निश्चिंतता की आदत पड़ गई थी. मां मजबूरी में घर तो संभाल रही थी पर बेटे व पोते की तकलीफ जब देखी नहीं गई तो उन्होंने शिवानंद पर फिर से शादी कर लेने का दबाव यह सोच कर बनाया कि पत्नी आने के बाद पंकज की देखभाल हो जाएगी और शिवानंद का मन भी लग जाएगा.
शिवानंद भी थोड़ा टालमटोल के बाद फिर से विवाह के लिए तैयार हो गए.
शिवानंद की वकालत अच्छी चल रही थी. अपना बड़ा सा मकान था. पिता भी शहर के जानेमाने वकीलों में से थे. उन के विवाह के 4 वर्ष छोड़ दिए जाएं तो सब तरह से वे सुयोग्य वर थे. एक बेटा था तो उसे भी देखने वाले बहुत लोग थे.
शिवानंद की फिर से विवाह की तैयारी होने लगी. चढ़ावे के लिए नई साडि़यां और गहने आए, रश्मि के गहने भी थे जिन्हें नई बहू को देने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी.
प्रभा ने यह कहते हुए कि रश्मि भाभी के कुछ गहने चढ़ावे पर नहीं जाएंगे, अलग रख दिए.
‘तुम्हारा मन है तो बाकी मुंहदिखाई में दे देंगे,’ मां ने दुलार में कहा, ‘मांग टीका और नथ तो अभी चढ़ावे के समय जाने दो.’
‘नहीं मां, इन्हें भी अलग ही रहने दो.’ बेटी प्रभा बोली, ‘सब कुछ मुझे पंकज के विवाह में देना है.’
दुलार भरी हंसी से मां ने कहा, ‘पंकज की बहू के लिए पुराने गहने. अरे पगली, तब तक कितना नया चलन हो जाएगा.’
प्रभा मचलते हुए तब बोली थी, ‘अम्मां, यह सब अलग ही रख लें… वह लहंगाचुनरी भी, सभी कुछ मेरे कहने से.’
लाडली बेटी की बात अम्मां ने मान ली और बहू शिखा के लिए सबकुछ नया सामान चढ़ावे में भेजा गया.
अम्मां ने टोका अवश्य था कि बेटी, नई बहू क्या पंकज को उस का हिस्सा नहीं देगी. आखिर उस का हिस्सा तो रहेगा ही.
‘उस के अपने भी तो होंगे, अम्मां. यह सब अलग जमा कर दें.’
मां के मन में विवाद उठा, ‘लड़की अपने लिए तो कुछ नहीं कह रही है पर भतीजे के लिए ममता का यह रूप भी किसी को अच्छा नहीं लग रहा था.’
विवाह हुआ. शयनकक्ष सजा. कुछ याद करते हुए मां ने आदेश दिया और उस दिन रश्मि का वधूवेश में सालों से टंगा चित्र वहां से हट कर पीछे के एक कमरे में लगा दिया गया. प्रभा ने देखा तो वह विचलित हो उठी और वहां से हटा कर तसवीर को पूजा के कमरे में लगाने लगी.
पंकज ने तोतली आवाज में पूछा था, ‘बूआ का कर रही हो. मम्मी ऊपर से आएंगी तो रास्ता भूल जाएंगी न.’
‘मम्मी आ गई हैं,’ यह कहते हुए प्रभा ने पंकज को नववधू शिखा की गोद में बैठाया तो वह यह कहते हुए गोद से उतर गया, ‘नहीं, यह मेरी मम्मी नहीं हैं.’
शूल सा लगा शिखा को सौतेले बेटे का कथन. पंकज अपना हाथ छुड़ा कर उस कमरे में चला गया जहां पहले उस की मां की तसवीर टंगी थी. पर वहां चित्र नहीं था. ‘अरे, मेरी मम्मी कहां गई,’ करुण स्वर चीत्कार कर उठा.
‘देखो पंकज, यह हैं मम्मी. तुम भूल गए. वह अब यहां आ गई हैं. सब उन की पूजा करेंगे न.’
प्रभा को लगा कि नई मां ला कर पंकज के साथ अन्याय किया गया है. पंकज के प्रति उस की अगाध ममता
ही थी जो उस ने रश्मि भाभी के गहने शिखा भाभी को न देने की जिद की थी.
शिखा ने 2 पुत्रों और 1 पुत्री को जन्म दिया था. पंकज भी जैसेजैसे समझदार हुआ उस ने मां को मां का सम्मान ही दिया और भाईबहन को अपना माना. मन में कोई विद्वेष नहीं था, पर पूजाघर में जब भी पंकज जाता मां की तसवीर को बेहद श्रद्धा से देखता.
बीतते समय के साथ पंकज इंजीनियर बना तो विवाह के लिए रिश्ते भी आने लगे. उस की राय मांगी गई तो प्रोफेसर की बेटी निधि उसे पसंद आई. प्रोफेसर ने शिवानंद को सपरिवार घर आने का निमंत्रण दिया. प्रभा उसी दिन ससुराल से आई थी. बोली, मैं भी भाभी के साथ लड़की देखने चलूंगी.
‘‘बूआ,’’ पंकज बोला, ‘‘मुझे कुछ जरूरी काम को पूरा करने के लिए अभी बाहर जाना है. आप और मां लड़की देखने चली जाएं. आप की पसंद मेरी पसंद होगी.’’
लड़की देखने की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक माह के अंदर शादी हो गई और निधि दुलहन बन कर पंकज के घर आ गई. अब प्रभा ने रश्मि का चित्र पूजा घर से हटा कर पंकज के कमरे में लगा दिया.
आज सुहागरात है, यह सोच कर प्रभा ने अपनी पसंद के कपड़े निधि को पहनाए. फिर वे सभी गहने जो कभी रश्मि ने शादी के मौके पर पहने थे और जिसे आज के दिन के लिए प्रभा ने मां के पास रखवा दिए थे. निधि को गहने पहना कर देखा तो देखती रह गई. उसे लगा जैसे चित्र में से निकल कर रश्मि आ गई है. अनुकृति ही नहीं असल में है वही.
शयनकक्ष में सुहाग सेज पर प्रतीक्षा में बैठी निधि को देख कर पंकज विक्षिप्त हो उठा, ‘‘मम्मीमम्मी, तुम आ गईं.’’
पंकज के कहे शब्दों को सुन कर दरवाजे पर खड़ी भाभी और बहनें विस्मय से चीख पड़ीं. प्रभा बूआ, देखिए न पंकज को क्या हो गया है? उधर उस के सामने खड़ी निधि विस्मय, अकुलाहट, अचकचाहट से उसे देखती रह गई.
‘‘पंकज क्या है, क्या कह रहे हो? वह निधि है, तुम्हारी पत्नी,’’ बूआ बोली, ‘‘मम्मी कहां से आ गईं? पागल हो गए हो?’’
‘‘आ गई है न बूआ, देखिए न…’’
विस्मय, आश्चर्य, अनहोनी के डर से कांपती प्रभा बूआ अपने को अपराधिनी मानती हुई पंकज को घसीट कर निधि के पास कर आई और निधि का हाथ उस के हाथ में देते हुए बोली, ‘‘पंकज यह तुम्हारी पत्नी है.’’
‘‘नहीं,’’ बूआ का हाथ झटक कर निधि बोली, ‘‘इन्होंने मुझे मम्मी कहा है. मैं दूसरे संबंध की कल्पना नहीं कर सकती. मैं इन की पत्नी नहीं हो सकती,’’ कह कर वह दूसरे कमरे में चली गई.
परिवार के बडे़बूढ़ों के साथ दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी निधि को समझाया कि वैदिक मंत्रों के बीच तुम ने सात फेरे लिए हैं, तो कहे के रिश्ते का क्या मूल्य है. बेटी, उसे नाटक समझ कर भूल जाओ.
इस बीच निधि मायके गई तो फिर ससुराल आने का नाम ही नहीं लेती थी. तब घरवालों ने ऊंचनीच समझा कर उसे किसी तरह ससुराल भेज दिया.
पंकज का भ्रम टूट जाए, इस के लिए सब तरह के उपाय किए गए. मनोचिकित्सक से परामर्श भी लिया गया. रश्मि का चित्र पंकज के कमरे से हटा कर अलमारी में बंद कर दिया गया था. रश्मि के पहने गहने और कपडे़ अलग रख दिए गए, इस के बाद सालों बीत जाने पर भी निधि के मन में पंकज के प्रति प्रणय के अंकुर न फूटे. उस के नाम से ही उसे अरुचि हो गई थी. मन बहल जाए इसलिए पिता ने बेटी को पीएच.डी. करने की प्रेरणा दी ताकि अध्ययन में व्यस्त हो कर वह अपने अतीत को भूल जाए.
उधर पंकज को भी एकदो बार अवसर दिया गया कि स्थिति में सुधार हो किंतु वह न सुधर सका. उस की ऐसी मनोदशा देख पिता शिवानंद ने उस का निधि से संबंधविच्छेद करवा दिया. कुछ सालों बाद निधि का अपने सहयोगी से प्रेमविवाह हो गया.
पंकज के मन पर जो गहरा आघात लगा था वह वर्षों के इलाज से थोड़ा बहुत सुधरा, किंतु कभीकभी वह दिमाग का संतुलन खो बैठता था. सरकारी नौकरी थी, चल रही थी, पर कभी भी उस के छूटने की आशंका बनी रहती थी. उस के पुनर्विवाह के लिए संबंध आते रहे किंतु पिता शिवानंद ने कहा कि जब तक वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाता वह किसी की लड़की का जीवन बरबाद नहीं करेंगे.
प्रभा बूआ अपने सौम्य, सुंदर, सुयोग्य भतीजे को पागलपन के कगार पर लाने के लिए खुद को दोषी मानती हैं. आंसू बहाती हैैं और कहती हैं, ‘‘मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे लाड़ की ऐसी परिणति होगी.’’

Family Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : एक और परिणीता – क्या स्वर्णा की सोच सही थी ?

Romantic Story in Hindi :

सरिता, बीस साल पहले, फरवरी (द्वितीय) 2006

स्वर्णा ने खुद को एक दायरे तक सीमित रखा हुआ था. शिवेन का उस दायरे में प्रवेश स्वर्णा को सही नहीं लगा था लेकिन उस की यह सोच कितनी गलत थी?

शिवेन दत्त के चार्ज लेते ही पूरे दफ्तर में खलबली मच गई कि दादा अडि़यल इंसान हैं. हां, चपरासी और मेकैनिक खुश हैं. दोनों की खुशी की वजहें अलगअलग हैं.

चपरासी तो इसलिए खुश हैं कि बाबुओं की तीमारदारी से उन्हें अब कुछ राहत मिलेगी. मेकैनिक खुश हैं कि शिवेन दत्त तकनीकी जानकारी रखते हैं और उन का चयन योग्यता के आधार पर हुआ है, किसी की सिफारिश से नहीं.

दूर संचार विभाग के मैनेजर पद पर आंखें तो बहुत से लोग गड़ाए बैठे थे मगर इन में से एक भी तकनीकी जानकारी नहीं रखता था और विभाग को ऐसे इंजीनियर की तलाश थी जो आज के तेज रफ्तार संचार माध्यमों का सही ढंग से संचालन कर सके. इसीलिए चयन कार्यक्रम में पूरी तरह से पारदर्शिता बरती गई.

दूर संचार विभाग में काम करने वाली महिलाओं का अपना एक संगठन भी था जिस की अध्यक्ष स्वर्णा कपूर थी. वह बोलती कम पर लिखती अधिक थी. आएदिन किसी न किसी पुरुषकर्मी की शिकायत लिख कर वह अधिकारी के पास भेजती रहती थी और पुरुषकर्मी अपना शिकायतीपत्र पीए को कुछ दे कर हथिया लेते थे. कहने का मतलब यह कि स्वर्णा कपूर किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकी.

नई झाड़ू जरा जोरदार सफाई करती है. इस कहावत को ध्यान में रखते हुए सभी पुरुषकर्मी कुछ अधिक चौकन्ने हो गए थे.

शिवेन दत्त ने स्वर्णा कपूर को पहली बार तब देखा जब वह लंबी छुट्टी मांगने उन के पास आई. साड़ी का पल्लू शौल की तरह लपेटे वह किसी मूर्ति की तरह मेज के पास जा खड़ी हुई. शिवेन दत्त खामोशी की उस मूर्ति को देखते ही हतप्रभ रह गए.

स्वर्णा पलकें झुकाए दृढ़ स्वर में बोली, ‘‘अगर आप छुट्टी मंजूर नहीं करेंगे तो मैं नौकरी से इस्तीफा दे दूंगी, क्योंकि मैं कभी छुट्टी नहीं लेती हूं.’’
शिवेन दत्त जैसे जाग पड़े, ‘‘तो फिर आज क्यों? और वह भी इतनी लंबी छुट्टी ली जा रही है?’’

‘‘एमए फाइनल की परीक्षा देनी है मुझे.’’

शाम को काम खत्म कर शिवेन जाने लगे तो अपने पीए से पूछ बैठे, ‘‘कब से हैं मिसेज कपूर यहां?’’

‘‘5 बरस तो हो ही गए हैं. पर सर, आप इन्हें मिसेज नहीं मिस कहिए.’’

‘‘शटअप,’’ शिवेन ने डांट दिया.

बचपन में मैनिनजाइटिस होने से स्वर्णा का मुंह टेढ़ा हो गया और जवानी में वह हताश व कुंठित थी, क्योंकि दोनों छोटी बहनों की शादी हो चुकी थी.

स्वर्णा को सितार सिखाने वाली महिला, जिसे पति की जगह दूर संचार विभाग में नौकरी मिली थी, ने स्वर्णा को दूर संचार विभाग में काम करने का रास्ता दिखाया और वह टैलीफोन औपरेटर बन गई.

शिवेन का अपने विभाग पर ऐसा दबदबा कायम हुआ कि हर बात में निंदा करने वाले भी उन की बात मानने लगे. यही नहीं, उन्होंने अपनी मेजकुरसी हौल में ही एक ओर लगवा ली ताकि सब को उन के होने का एहसास बना रहे. उन से खार खाने वाले अधेड़ उम्र के सहकर्मी भी उन के विनम्र स्वभाव से दब गए.

3 महीने पलक झपकते ही निकल गए. स्वर्णा जब लौट कर दफ्तर आई तो किसी पुराने मनचले ने फब्ती कसी, ‘‘डिगरी पर डिगरी लिए जाओ, बरात नहीं आने वाली.’’

इस फब्ती से प्रथम श्रेणी में डिगरी हासिल करने का गर्व व खुशी मटियामेट हो गई. स्वर्णा ने एक बार फिर अपने आंसू पी लिए.

शिवेन के पीए ने जा कर जब यह छिछोरा व्यंग्य उन्हें सुनाया तो वे भी तिलमिला पड़े पर वे जानते थे कि स्वर्णा उन से कहने नहीं आएगी.

अगली बार वे स्वर्णा के सामने से गुजरे तो अनायास रुक गए और एक अभिभावक की तरह उन्होंने नम्र स्वर में पूछा, ‘‘पास हो गईं?’’

‘‘जी,’’ स्वर्णा ने गरदन नीची किए ही उत्तर दिया.

‘‘मिठाई नहीं खिलाओगी?’’

‘‘जी, पापाजी से कह दूंगी.’’

अगले दिन स्वर्णा मिठाई का कटोरदान ले कर शिवेन की मेज के सामने जा खड़ी हुई तो वे कुछ झेंप से गए.

‘‘अरे, आप, मैं ने तो यों ही कह दिया था.’’

‘‘मैं ने खुद बनाए हैं,’’ स्वर्णा उत्साह से बोली.

शिवेन ने एक लड्डू उठा लिया और कहा कि बाकी लड्डुओं को अपने सहकर्मियों में बांट दो.

इस के कुछ दिनों बाद ही सरकारी आदेश आया कि रात की ड्यूटी के लिए कुछ टैलीफोन औपरेटर रखे जाएंगे जिन्हें तनख्वाह के अलावा अलग से भत्ता मिलेगा. मौजूदा कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाएगी. स्वर्णा ने रात की शिफ्ट में काम करने का मन बनाया तो मिसेज ठाकुर भी उस के साथ हो लीं. तय हुआ कि रात को आते समय दफ्तर के ही सरकारी चौकीदार को कुछ रुपए महीना दे देंगी ताकि वह उन को घर तक छोड़ जाया करेगा. यह सबकुछ इतना गोपनीय ढंग से हुआ कि विभाग में किसी को पता ही नहीं चला.

स्वर्णा को अपनी जगह न देख कर शिवेन ने पूछताछ की तो पता चला कि स्वर्णा और मिसेज ठाकुर ने शाम की शिफ्ट ली है. उस रात जब दोनों ड्यूटी खत्म कर बाहर निकलीं तो जहां उन का रिकशा और चपरासी खड़ा होता था वहां शिवेन अपनी जीप ले कर खुद खड़े थे. दोनों को जीप में बैठने का आदेश दिया और खुद चालक की सीट पर बैठ कर जीप चलाने लगे. पहले स्वर्णा को उस के घर छोड़ा, फिर मिसेज ठाकुर जब अकेली रह गईं तो उन्हें आड़े हाथों लिया.

अपनी सफाई में मिसेज ठाकुर ने सारा सच उगल दिया.

‘‘सर, आप समझने की कोशिश कीजिए. दफ्तर के लोगों ने स्वर्णा का जीना दूभर कर दिया था. कौन क्या कहता है, आप को शायद इस का आभास नहीं है.’’

‘‘एक कुंआरी लड़की का रात को बाहर अकेले काम पर जाना क्या ठीक है?’’

‘‘नहीं, मगर यहां उसे कोई छेड़ता तो नहीं है. रामदेवजी बाप की तरह उसे स्नेह देते हैं. मैं उस के साथ हूं. रिकशे वाले को मैं पिछले 15 वर्षों से जानती हूं.’’

‘‘अच्छा, आप लोगों को रात के समय घर छोड़ने के लिए कल से आरिफ रोज जीप ले कर आएगा,’’ शिवेन बोले, ‘‘कुछ ही दिनों में मैं आप लोगों के लिए एक वैन का इंतजाम करा दूंगा.’’

कभीकभी शिवेन विभाग में दौरा करने आते तो स्वर्णा से हालचाल पूछ लेते. धीरेधीरे शिवेन स्वर्णा से इधरउधर की भी बातें करने लगे. मसलन, कौनकौन से लेखक तुम्हें पसंद हैं, कहांकहां घूमी हो, क्याक्या तुम्हारी अभिरुचियां हैं.

स्वर्णा उत्तर देने में झिझकती. मिसेज ठाकुर ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘मित्रता बुरी नहीं होती. बातचीत से आत्मविश्वास पनपता है.’’
एक दिन रामदेव ने कहा, ‘‘बेटी, शिवेन को तुम्हारी बड़ी चिंता रहती है,’’ और उस पर गहरी नजर डाल दी.

स्वर्णा संभल गई. अगली बार जब शिवेन उस के पास बैठ कर शहर में लगी फिल्मों की बात करने लगे तो वह झुंझला कर बोली, ‘‘सर, मेरे पास इतना समय नहीं है कि फिल्में देखती फिरूं.’’

उस की इस बेरुखी से शिवेन शर्मिदा हो चुपचाप वहां से हट गए.

स्वर्णा का मन फिर काम में नहीं लगा. अनमनी सी सोचने लगी कि सब तो उस के चेहरे का इतिहास पूछते हैं, फिर सहानुभूति जताते हैं और उस के अंदर की वेदना को जगा कर अपना मनोरंजन करते हैं लेकिन इस व्यक्ति ने कभी भी उस से वह सबकुछ नहीं पूछा जो और लोग पूछते हैं.

शिवेन फिर दिखाई नहीं दिए. अगर आते भी थे तो रामदेव से औपचारिक पूछताछ कर के चले जाते थे.

उधर, स्वर्णा की बेचैनी बढ़ने लगी. हर रोज उस की आंखें बारबार दरवाजे की ओर उठ जातीं. इतने सरल, स्वच्छ इंसान पर उस ने यह कैसा वार किया. क्या बुरा था. दो बातें ही तो वे करते थे. हंसनामुसकराना जुर्म है क्या. वे तो उस के संग हंसते थे, न कि उस पर.

अपने ही अंतर्द्वंद्व में उलझ स्वर्णा को जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो एक दिन बिना किसी को कुछ बताए उस ने एक छोटा सा पत्र लिख कर डाक द्वारा शिवेन को भिजवा दिया.

कई दिनों तक कोई उत्तर नहीं आया. फिर एक पत्र उस के घर के पते पर सरकारी लिफाफे में आया जिस में उसे एक नए पद के साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था.

दिल्ली से आए 3 उच्च अधिकारियों ने उस का साक्षात्कार लिया और वह सहायक प्रबंधक के रूप में चुन ली गई.
शिवेन के सामने वाले कमरे में अब उस की मेज लगा दी गई थी. उसे प्रबंधन व नियंत्रण की सारी जानकारी शिवेन स्वयं देने लगे. वह एक चतुर शिष्या की तरह सब ग्रहण करती गई.

ऊपर से भले ही सबकुछ शांत था पर अंदर ही अंदर इस नई नियुक्ति को ले कर दफ्तर में काफी उथलपुथल थी. आतेजाते किसी ने वही पुराना राग छेड़ दिया, ‘‘यार, नया न सही, 4 बच्चों वाला ही सही.’’

स्वर्णा तिलमिला कर रह गई. घर आने के बाद रोरो कर उस ने अपनी आंखें सुजा लीं.

दशहरे पर शिवेन ने 15 दिन की छुट्टी ली तो उन की गैरमौजूदगी में स्वर्णा बिना किसी सहायता के विभाग सुचारु रूप से चलाती रही.

इसी दौरान एक दिन घर पर शिवेन का फोन आया. दफ्तर की बाबत औपचारिक बातें करने के बाद उस से बाजार की एक बड़ी दुकान के बाहर मिलने को कहा. स्वर्णा ने घर में किसी को कुछ नहीं बताया और मिलने चली गई. शिवेन ने उस की पसंद से अपनी मां और बहन के लिए कपड़ों की खरीदारी की. फिर दोनों एक रैस्तरां में बैठ कर इधरउधर की बातें करते रहे. बातों के सिलसिले में ही स्वर्णा पूछ बैठी, ‘‘बच्चों के लिए कुछ नहीं लिया आप ने?’’

‘‘नहीं,’’ शिवेन एकदम खिलखिला कर हंस दिए और बोले, ‘‘किस के बच्चे? मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है.’’

स्वर्णा अविश्वास से बोली, ‘‘दफ्तर में तो सब कहते हैं कि आप 4 बच्चों के बाप हैं.’’

‘‘स्वर्णा, मेरी उम्र 36 साल हो गई है पर मैं कुंआरा हूं. अगर एक 30 साल की स्त्री कुंआरी हो तो लोग कहते हैं कि किसी ने उसे पसंद नहीं किया. मगर एक पुरुष अविवाहित रहे तो जानती हो लोग उस के विषय में क्या सोचते हैं… मैं शादीशुदा हूं, यह भ्रम बना रहे तो अच्छा है.’’

शिवेन ने अपना हृदय खोल कर रख दिया था और स्वर्णा जीवन में पहली बार किसी की राजदार बनी थी. 2 दिनों बाद शिवेन ने स्वर्णा को अपने साथ सिनेमा देखने के लिए आमंत्रित किया. इस बार भी वह घर से बहाना बना कर शिवेन के साथ चली गई. यद्यपि इस तरह घर वालों से झूठ बोल कर जाने पर उस के मन ने उसे धिक्कारा था मगर इस खतरे में बाजी जीत जाने का स्वाद भी था.

कोई उसे भी चाह रहा था, यह एहसास होते ही उस के सपने अंगड़ाई लेने लगे थे. वह सुबह उठती तो अपनी उनींदी मुसकान उसे समेटनी पड़ती. कहीं कोई कुछ पूछ न ले.

अगली शाम वह उसी दुकान पर गई और अपने लिए सुंदर साडि़यां खरीद लाई. फिर जाने क्या सोच कर अपनी मां के लिए ठीक वैसी ही साड़ी खरीदी जैसी शिवेन की मां के लिए उस ने पसंद की थी.

मां को ला कर साड़ी दी तो वे उदास स्वर में बोलीं, ‘‘क्या मेरी तकदीर में बेटी की कमाई की साड़ी लिखी है?’’

‘‘मां, तुम यह क्यों नहीं समझ लेतीं कि मैं तुम्हारा बेटा हूं.’’

स्वर्णा अपनी खुशी में मिसेज ठाकुर को शरीक करने के लिए उन के घर की ओर चल दी. धीरेधीरे उन्हें सबकुछ बता दिया. वे गंभीर हो गईं, समझाते हुए बोलीं, ‘‘स्वर्णा, तुम जवान लड़की हो. आगेपीछे सोच कर कदम उठाना. शिवेन बड़े ओहदे वाला इंसान है. क्या तुम्हें अपनी बिरादरी के सामने स्वीकार करेगा? कहीं ऐसा न हो कि जिस दिन उसे अपनी बिरादरी की कोई अच्छी लड़की मिले, तो तुम्हें फटे कपड़े की तरह छोड़ दे. थोड़े दिनों की खुशी के लिए जीवनभर का दुख मोल लेना कहां की समझदारी है? अब अगर शिवेन बुलाए तो मत जाना.’’

अगली बार शिवेन ने फोन पर उसे अपने घर आने के लिए कहा. स्वर्णा ने पहली बार टाल दिया लेकिन दूसरी बार शिवेन ने फिर बुलाया तो उस ने मिसेज ठाकुर को बताया. यह सुनते ही वे भड़क उठीं.
‘‘देखा न, घर पर बुला रहा है. उस का इरादा कतई नेक नहीं है, कुछ करना पड़ेगा.’’
‘‘दीदी, अगर मैं नहीं गई तो भी वे बदला ले सकते हैं. मेरी नौकरी और पदोन्नति का भी तो खयाल करो. सब उन्हीं की मेहरबानी है. टैलीफोन पर उन की बातों से ऐसा नहीं लगता कि उन का कोई बुरा इरादा होगा. समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं क्या न करूं.’’
‘‘ठीक से सोच लो, स्वर्णा. जाना तो तुम्हें कल है.’’
मिसेज ठाकुर के घर से लौटते समय आगे की सोच कर उस का गला सूखा जा रहा था. मन का तनाव उस की नसनस में बह रहा था. अनायास उस ने महसूस किया कि वह नितांत अकेली है. उस के आसपास के सभी व्यक्ति, जो उस पर अधिकार जताते हैं, किसी न किसी डर के अधीन हैं. अपनीअपनी सामाजिकता से बंधे पालतू पशुओं की तरह एक नियत जीवनयापन कर रहे हैं.
दादी को जातबिरादरी का डर, पिताजी को अपने कर्तव्य से गिर जाने का डर, मां को इन दोनों को नाराज करने का डर और इन सब के नीचे, लगभग कुचला हुआ उस का अपना अस्तित्व था. इन सब के विपरीत उस के मन को एक शिवेन ही तो था जो बादलों तक उड़ा ले जा रहा था.
शिवेन का खयाल आते ही उस का अंगअंग झंकृत हो उठा. सहसा उसे लगा कि वह इतनी हलकी है कि कोई शिला उसे पूरी तरह दबा दे, नहीं तो वह उड़ जाएगी. वह अपने ही हाथपैरों को कस कर समेटे गठरी सी बनी खिड़की के बाहर देखती कब सो गई, उसे पता ही न चला.
सुबह आंख खुली तो उस की नजर सामने अलमारी पर पड़ी जिस के एक खाने में उस की दोनों छोटी बहनों के विवाह की तसवीरें रखी थीं. उन के ठीक बीच में एक बंगाली दूल्हादुलहन की जोड़ी रखी थी जो वर्षों पहले उस ने एक मेले से खरीदी थी.
सुबह उस ने अपना फैसला फोन पर मिसेज ठाकुर को सुनाया. वे बोलीं, ‘‘चलो, मैं तुम्हारे साथ चलती हूं. तुम आगे जा कर दरवाजा खुलवाना. बाहर ही खड़ी रह कर बात करना. यदि अंदर आने के लिए शिवेन जोर दें तो बताना कि मैं भी साथ हूं. रिकशे वाला भी हमारा अपना है. यदि जरूरत पड़ी तो शोर मचा देंगे.’’

हिम्मत कर के स्वर्णा शिवेन के घर चल दी. मिसेज ठाकुर भी रिकशे में पीछेपीछे हो लीं. शिवेन का मकान कई गलियों से गुजरने के बाद मिला था. स्वर्णा ने दरवाजा खटखटाया. अंदर से एक स्त्री कंठ ने कहा, ‘‘कौन है, दरवाजा खुला है, आ जाओ.’’
स्वर्णा ने अपना नाम बताया और दरवाजा जरा सा खोला तो वह पूरा ही खुल गया. सामने आंगन में बैठी एक अधेड़ उम्र की महिला उसे बुला रही थी.
स्वर्णा ने दरवाजा खुला ही छोड़ दिया क्योंकि उस के ठीक सामने 10 गज की दूरी पर मिसेज ठाकुर उसे अपने रिकशे में बैठेबैठे देख सकती थीं.
‘‘बेटी शेफाली, देखो, स्वर्णा आई है.’’
शेफाली धड़धड़ाती हुई सीढि़यों से उतरी और स्वर्णा को प्रेम से गले लगाया.
‘‘शिबू ने बताया था कि आप आएंगी. वह कोलकाता गया है. परसों आ जाएगा. आइए, बैठिए.’’

शेफाली को देख कर स्वर्णा का मुंह खुला का खुला रह गया, क्योंकि उस का ऊपर का होंठ बीच में से कटा हुआ था. इस के बाद भी शेफाली ने सहज ढंग से उस की खातिर की. मांजी के पास रखे बेंत के मूढ़ों पर दोनों बैठीं बातचीत करती रहीं. नाश्ता किया और फिर शेफाली उसे अपना घर दिखाने के लिए अंदर ले गई. स्वर्णा ने देखा कि शिवेन के कमरे में ढेरों पुस्तकें पड़ी थीं. एक कोने में सितार रखा था.
शेफाली ने बताया, ‘‘शिबू मुझ से 3 साल छोटा है. वह तुम को बेहद पसंद करता है. इस से पहले शिवेन ने कभी अपनी शादी की बात नहीं की थी. तुम पहली लड़की हो जो उस के जीवन में आई हो.
‘‘आज से 20 साल पहले जब पिताजी का देहांत हुआ था तब मैं 19 साल की थी और शिवेन 16 का रहा होगा. इतनी छोटी उम्र में ही उस पर मेरी शादी का बोझ आ पड़ा. मेरा ऊपर का होंठ जन्म से ही विकृत था. विकृति के कारण रिश्तेदारों ने मेरे योग्य जो वर चुने उन में से कोई विधुर था, कोई अपंग. स्वयं अपंग होते हुए भी लोग मुझे देख कर मुंह बना लेते थे.
‘‘एक दिन एक आंख से अपंग व्यक्ति ने जब मुझे नकार दिया तो शिवेन उसे बहुत भलाबुरा कहते हुए बोला कि चायमिठाई खाने आ जाते हैं, अपनी सूरत नहीं देखते.
‘‘इस बात को ले कर हमारे रिश्तेदारों ने हमें बहुत फटकारा. बस, उसी दिन मैं ने शिवेन को बुला कर कह दिया कि बंद करो यह नाटक. मुझे किसी से शादी नहीं करनी है. शिवेन रोते हुए बोला, ‘ऐसा मत सोचिए, दीदी. मैं अपना फर्ज पूरा नहीं करूंगा तो समाज यही कहेगा कि बाप रहता तो बेटी कुंआरी तो न बैठी रहती,’’ शेफाली स्वर्णा को बता रही थी.
‘‘बाबा मेरी शादी करवा सकते थे क्या? क्या उन के पास देने के लिए लाखों रुपए का दहेज था? मैं ने शिवेन से पूछा, अभी तू छोटा है तभी फर्ज की बात कर रहा है. कल को जब तू शादी लायक होगा तो क्या तू मेरी जैसी लड़की से शादी कर लेगा? दूसरों को क्यों लज्जित करता है?’’
‘‘बस, उसी दिन से उस ने शपथ ले ली कि विकृत चेहरे वाली लड़की से ही शादी करूंगा.’’
थोड़ा रुक कर शेफाली फिर बोली, ‘‘स्वर्णा, जिस दिन पहली बार उस ने तुम्हें देखा था उसी दिन शिबू ने तुम से शादी के लिए अपना मन बना लिया था. इस पर तुम इतनी गुणी निकलीं. अब तुम्हारी बारी है. घरबार भी तुम ने देख लिया है. बोलो, क्या कहती हो?’’
स्वर्णा ने दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया. उस की रुलाई फूट पड़ी. शेफाली ने उसे गले से लगाया. स्वर्णा चुपचाप उठी, साड़ी का पल्लू पीछे से खींच कर सिर ढक लिया और घुटनों के बल बैठ कर मांजी के पांव छुए.
स्वर्णा जाते समय धीरे से शेफाली से बोली, ‘‘आज से चौथे दिन मैं आप सब का अपने घर पर इंतजार करूंगी.’’

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Fatty Liver Disease : खामोशी से पनपती एक खतरनाक बीमारी

Fatty Liver Disease : लिवर शरीर का सब से अहम अंग है जो विषैले तत्त्वों को बाहर निकालता है, पाचन में मदद करता है और ऊर्जा का भंडारण करता है. लिवर की कोशिकाओं में जब 10 प्रतिशत से अधिक हिस्से में फैट जमा हो जाए, तो इसे फैटी लिवर कहते हैं और यह स्थिति काफी चिंताजनक है, जो आगे चल कर जानलेवा सिरोसिस में तबदील हो सकती है.

नवीन कश्यप सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं. कभी उठ कर चूरन की गोलियां खाते हैं तो कभी फ्रिज से ठंडा दूध निकाल कर पीते हैं. मगर पेट और सीने की जलन घंटों शांत नहीं होती. ऊपर से गैस बनती है, जिस के कारण बारबार खाना हलक में आता है. पिछले एक साल से 75 वर्षीय नवीन बाबू इस समस्या से जूझ रहे हैं. रात के खाने के बाद उन को यह परेशानी अकसर होती है. कभीकभी तो वे इसी डर से रात का भोजन स्किप कर देते हैं.

मोनिका वैद्य को भी खाना न पचने की शिकायत अकसर रहती है. खाना खाने के बाद उन को उबकाइयां भी आती हैं. खट्टी डकारें और मुंह में बारबार खट्टा पानी भर आता है. पेट काफी फूलाफूला सा लगता है.

संध्या भसीन पेट की दाहिनी साइड में पसली के नीचे दर्द शिकायत करती हैं. अभी उन की उम्र 40 साल है मगर थकान दिनभर पूरे बदन को जकड़े रहती है. शरीर में ऊर्जा की कमी, हर वक्त नींद का एहसास और थोड़ा सा काम कर लें तो हांफने लगती हैं.

दरअसल, ये सभी लोग फैटी लिवर के शिकार हैं. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम जिन बीमारियों को सब से ज्यादा नजरअंदाज करते हैं, फैटी लिवर उन में सब से ऊपर है. यह बीमारी न तो शुरुआत में जोरदार दर्द देती है, न ही कोई साफ चेतावनी, इसीलिए इसे अकसर ‘खामोश बीमारी’ कहा जाता है. लेकिन खामोशी में पनपती यह समस्या आगे चल कर गंभीर यकृत रोगों का रास्ता खोल देती है.

अभी तक फैटी लिवर को बड़ों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह समस्या तेजी से बच्चों में भी बढ़ती जा रही है. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि आज हर 7 में से 1 बच्चा फैटी लिवर की चपेट में आ रहा है. यह आंकड़ा सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि मातापिता को सतर्क करने के लिए काफी है. बदलती लाइफस्टाइल, मोबाइलटीवी से चिपके रहना, जंकफूड, कोल्डड्रिंक्स और फिजिकल ऐक्टिविटी की कमी ने बच्चों की सेहत पर गहरा असर डाला है.

फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिस में लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है. अगर समय रहते इसे नहीं पहचाना गया तो आगे चल कर यह डायबिटीज, हार्मोनल प्रौब्लम और यहां तक कि लिवर डैमेज का कारण भी बन सकता है.

Fatty Liver Disease (1)
(सांकेतिक तस्वीर)

फैटी लिवर है क्या?

मानव शरीर में लिवर (यकृत) सब से अहम अंगों में से एक है. यह विषैले तत्वों को बाहर निकालता है, पाचन में मदद करता है और ऊर्जा का भंडारण करता है. जब लिवर की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक वसा यानी फैट जमा होने लगती है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. चिकित्सकीय रूप से यदि लिवर के 5–10 प्रतिशत से अधिक हिस्से में वसा जमा हो जाए, तो स्थिति चिंताजनक मानी जाती है.

लिवर में थोड़ी मात्रा में फैट मौजूद होता है, लेकिन अगर यह फैट लिवर के कुल वजन का 10 फीसदी से अधिक हो जाए तो इसे फैटी लिवर माना जाता है और इस से गंभीर शारीरिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं.

फैटी लिवर से हमेशा नुकसान नहीं होता, लेकिन कुछ मामलों में यह अतिरिक्त फैट लिवर में सूजन पैदा कर सकता है. इस स्थिति को स्टीटोहैपेटाइटिस कहा जाता है, जो वास्तव में लिवर को नुकसान पहुंचाता है. जब लिवर में सूजन लंबे समय तक बनी रहती है तो यह सख्त हो जाता है और इस में जख्म हो जाते हैं.

जब लिवर की लगभग 34 से 66 फीसदी कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है तब थकान, पेट में भारीपन या हलका दर्द जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. अगर जीवनशैली में बदलाव नहीं किया गया तो यह स्थिति गंभीर लिवर रोग में बदल सकती है.

फैटी लिवर के एडवांस और गंभीर चरण में लिवर की 66 फीसदी से अधिक कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है. इस स्थिति में सूजन (स्टिएटोहैपेटाइटिस), घाव या जख्म (फाइब्रोसिस) और सिरोसिस जैसे जटिल लक्षण दिखाई देने लगते हैं.

लिवर में ज्यादा फैट जमा होने पर इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है. ऐसे में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है. क्योंकि ऐसे लोगों का लिवर इंसुलिन के संकेतों को ठीक से प्रोसैस नहीं कर पाता है. फैटी लिवर डिजीज आज की तारीख में सिरोसिस की सब से बद्फी वजह है. लगभग 35 फीसदी लोगों, जिन्हें फैटी लिवर है, में से 25 फीसदी लोगों में इस के बढ़ने और सिरोसिस तक पहुंचने का खतरा होता है. हालांकि, लिवर की कोशिकाओं में फैट के सामान्य स्तर से सिरोसिस तक पहुंचने में लंबा समय यानी 5-10 साल तक लग सकते हैं.

Fatty Liver Disease (3)
(सांकेतिक तस्वीर)

शराब ही नहीं, आदतें भी दोषी

लंबे समय तक यह धारणा रही कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों को होता है. यह आधा सच है. वास्तव में इस के 2 प्रमुख रूप हैं- पहला, अल्कोहौलिक फैटी लिवर जो अत्यधिक शराब सेवन के कारण होता है. दूसरा, नौनअल्कोहौलिक फैटी लिवर जो बिना शराब के, जीवनशैली की गलतियों से होता है. आज भारत समेत दुनियाभर में दूसरा रूप तेजी से फैल रहा है. मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, जंक फूड, मीठे पेय, शारीरिक निष्क्रियता, ये सभी मिल कर लिवर को वसा का गोदाम बना रहे हैं.

शहरी जीवनशैली और बढ़ता खतरा

एसी दफ्तर, घंटों की स्क्रीन, देररात तक जागना और पैकेट वाला भोजन, यही शहरी जीवन का न्यू नौर्मल है. विडंबना यह है कि पढ़ालिखा, संपन्न और स्वस्थ दिखने वाला वर्ग इस बीमारी की सब से बड़ी चपेट में है. फैटी लिवर यह बता रहा है कि आधुनिक विकास का एक कड़वा साइड इफैक्ट भी है.

लक्षण जो अकसर अनदेखे रह जाते हैं

फैटी लिवर के शुरुआती चरण में लक्षण या तो होते नहीं, या इतने सामान्य कि उन्हें थकान मान कर छोड़ दिया जाता है, जैसे लगातार थकान, पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में भारीपन, भूख कम लगना, हलका मतलीपन आदि. समस्या तब गंभीर होती है जब यह लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस और आखिरकार लिवर फेल्योर तक पहुंच जाती है.

जांच और इलाज : दवा से ज्यादा जीवनशैली

फैटी लिवर का पता अकसर अल्ट्रासाउंड, रक्त जांच या विशेष स्कैन से चलता है. लेकिन इलाज की सब से अहम बात यह है कि इस की कोई जादुई गोली नहीं होती है. डाक्टर कहते हैं कि वजन घटाइए, रोज कम से कम 30 मिनट तेज चाल चलिए, मीठा, तला और प्रोसैस्ड भोजन कम कीजिए और शराब से दूरी बनाइए. यानी, इलाज की चाबी अस्पताल से ज्यादा रसोई और दिनचर्या में है.

सुबह अच्छा नाश्ता करें. दोपहर को मध्यम खाना लें और रात का खाना हलका लें. रात का खाना 7 बजे तक खा लें. दूध वाली चाय या कौफी की जगह ब्लैक कौफी पिएं. कई अध्ययनों से पता चला है कि ये फैटी लिवर और असामान्य लिवर एंजाइम के जोखिम को कम करता है.

पत्तेदार सब्जियों का भरपूर सेवन करें, क्योंकि इन में नाइट्रेट और पौलीफेनौल्स की मौजूदगी होती है जो फैटी लिवर को कंट्रोल करने में मददगार होते हैं. आधी प्लेट फाइबर वाले फल, सब्जियां और साबुत अनाज रखें. खाने में दाल, चना, सोयाबीन और मटर जैसी फलियां शामिल करें. ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछली ट्राइग्लिसराइड्स को कम करती है.

क्या न खाएं

खाने में अतिरिक्त चीनी न डालें, कुकीज, बिस्कुट, कैंडी, सोडा, स्पोर्ट्स ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, मिठाई और चौकलेट जैसी चीजों से दूर रहें. तला हुआ और प्रोसैस्ड फूड न खाएं. मछली और लीन मीट को डीपफ्राई करने के बजाय उबालें. प्रोसैस्ड मीट से बचें. फ्राइड चिकन, डोनट्स, चिप्स, बर्गर वगैरह से परहेज करें. प्रोसैस्ड खाद्य पदार्थों में अकसर फ्रक्टोज या हाई फ्रक्टोज कौर्न सिरप जैसी चीजें होती हैं जो फैटी लिवर को बढ़ाती हैं.

अतिरिक्त नमक न लें. यानी, आप ऐसे पैकेज्ड फूड से दूर रहें जिस में ज्यादा नमक होता है. सोडियम का सेवन प्रतिदिन 2,300 मिलीग्राम पर सीमित रखें.

व्हाइट ब्रेड, पिसा हुआ चावल या पास्ता न खाएं. ये शुगर के स्तर को बढ़ा सकते हैं. साबुत अनाज इस प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं क्योंकि इन में फाइबर की मात्रा अधिक होती है.

बहुत ज्यादा खाना न खाएं. ज्यादा खाने से आप के शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी जमा हो सकती है जो आसानी से फैट के रूप में जमा हो जाती है और फैटी लिवर रोग का जोखिम बढ़ जाता है.

सामाजिक चेतावनी भी है फैटी लिवर

फैटी लिवर केवल एक मैडिकल समस्या नहीं, यह एक सामाजिक चेतावनी है. यह बताता है कि हम ने सुविधा को स्वास्थ्य पर, और स्वाद को संतुलन पर भारी पड़ने दिया है. फैटी लिवर का सब से बड़ा खतरा यही है कि यह दिखता नहीं, लेकिन धीरेधीरे अंदर से खोखला कर देता है. समय रहते इसे गंभीरता से लिया जाए, तो यह पूरी तरह पलटने योग्य है. Fatty Liver Disease

Mardaani 3 (2026) – Movie Review : “गर्ल चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर कसी पटकथा”

Mardaani 3 (2026) – Movie Review :

बौलीवुड में अब मर्दानियों का बोलबाला है. मर्दानी बनी अभिनेत्रियां कभी झांसी की रानी बन कर आक्रांताओं का मुकाबला करती नजर आईं तो कभी बलात्कार की शिकार युवती का अभिनय किया. ‘गुलाम’ फिल्म में रानी मुखर्जी ने आमिर खान के साथ ऐक्शन दृश्य दिए. उस की ‘हैलो ब्रदर’ ऐक्शनथ्रिलर फिल्म थी. ‘मिसेज चटर्जी वर्सेस नौर्वे’ फिल्म ने उसे नैशनल अवार्ड भी दिलवाया.

रानी मुखर्जी ने सिर्फ मर्दानियों वाले रोल ही नहीं किए. किसी फिल्म में उस ने मैडिकल छात्रा का अभिनय किया तो ‘बंटी और बबली’ में एक महिला चोर का अभिनय किया. ‘ब्लैक’ में अंधी, बहरी और गूंगी महिला का अभिनय कर उस ने दर्शकों का दिल जीत लिया. इन के अलावा रानी मुखर्जी ने अनगिनत यादगार फिल्में कीं.

रानी मुखर्जी ने 2014 ‘मर्दानी’ सीरीज की पहली फिल्म की. यशराज के बैनर तले बनी यह फिल्म यशराज चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने बनाई थी. 2019 में ‘मर्दानी-2’ में रानी मुखर्जी ने एक 21 वर्षीय बलात्कारी और हत्यारे की कहानी वाली फिल्म की.

‘मर्दानी-3’ ‘मर्दानी’ सीरीज की तीसरी फिल्म और पिछली फिल्मों की सीक्वल है. इस फिल्म में रानी मुखर्जी ने फिर से शिवाजी राय के रूप में अपनी धाक जमाई है. फिल्म बाल अपहरण और भिखारी माफिया के पीछे की घिनौनी कहानी को दर्शाती है.

पहली ‘मर्दानी’ फिल्म में रानी मुखर्जी ने गर्ल चाइल्ड ट्रैफिकिंग का सफाया किया था. ‘मर्दानी-2’ में एक खूंखार रेपिस्ट का खात्मा किया था. अब की बार ‘मर्दानी-3’ में वह फुल ऐक्शन में नजर आई है.

कहानी यहां भी गर्ल ट्रैफिकिंग की ही है. कहानी एक वीवीआईपी की मासूम बच्ची के किडनैपिंग से शुरू होती है. उस के साथ एक वरिष्ठ सरकारी अफसर की बेटी भी उठा ली जाती है. एसएसपी शिवानी शिवाजी राय (रानी मुखर्जी) केस की तहकीकात करती है तो पता चलता है इस में बच्चियों की खरीदफरोख्त करने वाली भिखारी गैंग की मुखिया अम्मा (मल्लिका प्रसाद) का हाथ है. किडनैपिंग की ये कड़ियां कहां तक जुड़ी हैं, शिवानी इस की तह तक जाती है और अम्मा और उस के सभी साथियों को धर दबोचती है.

फिल्म की यह कहानी जानीपहचानी है. गर्ल चाइल्ड ट्रैफिकिंग की कहानियां इस से पहले कई फिल्मों में दिखाई जा चुकी हैं. मगर इस फिल्म की पटकथा कसी होने पर दर्शकों को इस के पुरानेपन का एहसास नहीं होता.

फिल्म में टर्न्स और ट्विस्ट्स ज्यादा हैं. संवाद सीटीमार हैं. निर्देशन कुछ हद तक अच्छा है. पूरी फिल्म रानी मुखर्जी के कंधों पर है. उसे धाकड़ दिखाया गया है ठीक उसी प्रकार जैसी ‘धाकड़’ फिल्म में अभिनेत्री कंगना रनौत ने अपने ऐक्शन सीन दिए थे. मगर वह कंगना रनौत जैसा परफौर्म नहीं कर पाई है. फिल्म का क्लाइमैक्स दमदार है. अम्मा के किरदार में मल्लिका जबरदस्त दिखी है. रानी मुखर्जी से उस का सामना दिलचस्प है. कांस्टेबल फातिमा के रूप में जानकी बोदीवाला ने भी अच्छा अभिनय किया है. कैमरा दिल्ली की गलियों और अपराध की स्याह दुनिया को नजदीक से दिखाता है.

फिल्म का गीतसंगीत साधारण है. ‘बब्बर शेरनी…’ वाला गीत शिवानी के प्रभावशाली व्यक्तित्व को दर्शाता है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

Mardaani 3 (2026) – Movie Review

Border 2 (2026) – Movie Review : “कहानी लंबी होते हुए भी दर्शकों को बांधे रखती है”

Border 2 (2026) – Movie Review :

आजकल विश्वभर में युद्ध के बादल छाए हुए हैं. अमेरिका, चीन, रूस, ईरान आपस में टकरा रहे हैं. अमेरिका और रूस ने तो बाकायदा छोटेछोटे देशों को धमका कर उन्हें हथियाना शुरू कर दिया है. ऐसे में बौलीवुड की फिल्म ‘बौर्डर-2’ प्रासंगिक है. दूसरे, यह फिल्म भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर रिलीज की गई है.

1997 में पहली ‘बौर्डर’ फिल्म आई थी. यह फिल्म उस की सीक्वल है. पिछली ‘बौर्डर’ को जे पी दत्ता ने निर्देशित किया था और वह ब्लौकबस्टर साबित हुई थी. यह फिल्म भारतपाक युद्ध पर बनी थी. इस फिल्म में सनी देओल, राखी गुलजार, जैकी श्रौफ, सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना, तब्बू, सुदेश बैरी जैसे कलाकार थे. रिलीज होने से पहले ही यह फिल्म काफी चर्चित हो गई थी. नई दिल्ली के उपहार सिनेमाहाल में पहले दिन पहले शो में ही मध्यांतर के बाद थिएटर में आग लग गई थी. भीड़ अधिक होने पर सिनेमा मैनेजमैंट ने हाल के दरवाजे बाहर से बंद कर दिए थे और बहुत से दर्शक धुंए से दम घुटने के कारण हाल से बाहर नहीं निकल पाए थे और उन की मृत्यु हो गई थी. सालों चले इस मुकदमे में अदालत ने सिनेमा मैनेजमैंट को दोषी ठहराया था. इस फिल्म की कहानी भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी की थी (जिन में से अधिकतर पंजाब के थे) जिन्हें हर कीमत पर भारतपाक सीमा की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया था. फिल्म ने अभिनेता अक्षय खन्ना को नई पहचान दिलाई. फिल्म का गाना ‘संदेशे आते हैं…’ आज भी गुनगुनाया जाता है.

मगर फिल्म के दूसरे भाग (सीक्वल) में अधिकतर वही कलाकार लिए गए हैं. इस दूसरे भाग में दिलजीत दोसांझ, सोनम बाजवा, वरुण धवन आदि को पहली बार लिया गया है. फिल्म का दूसरा भाग भी 1971 के युद्ध पर आधारित है. यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सब से बड़ी युद्ध की कहानी पर आधारित है. फिल्म दर्शकों में जोश और देशभक्ति का संचार करती है. इस को प्रमुख ऐक्शन वार फिल्म माना जा रहा है. यह भारतपाक युद्ध की सच्ची कहानियों से प्रेरित है कि कैसे सेना, नौसेना और वायुसेना एक शक्ति के रूप में एकजुट हो कर लड़ती हैं.

फिल्म ‘बौर्डर’ की कहानी हर किसी को पता है कि इस में युद्ध दिखाया गया है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था. यह लड़ाई 1991 के युद्ध का ही हिस्सा है. ‘बौर्डर-2’ में पहले पार्ट की कहानी को आगे नहीं बढ़ाया गया है बल्कि ‘बौर्डर-2’ में 1971 में भारतपाक के युद्ध की कहानी को दिखाया गया है.

कहानी 1971 में भारतपाक युद्ध की है जहां लड़ाई तीनों मोरचों जमीन, समुद्र और आसमान से हो रही थी. होशियार सिंह (वरुण धवन) आर्मी में है, निर्मलजीत सिंह (दिलजीत दोसांझ) एयरफोर्स में पायलट है और महेंद्र रावत (अहान शेट्टी) नौसेना में है. तीनों दोस्त हैं. इन के मैंटर फतेह सिंह (सनी देओल) बौर्डर पर अपनी बटालियन का नेतृत्व कर रहे हैं.

फिल्म की शुरुआत सैनिकों और उन के परिवारों की जिंदगी से होती है. दुश्मन अचानक भारत पर तीन दिशाओं से हमला कर देता है तो हालात मुश्किलभरे हो जाते हैं. ऐसे में ये चारों अपनेअपने मोरचों से देश की रक्षा में जुट जाते है और दुश्मन के छक्के छुड़ा देते हैं.

फिल्म की यह कहानी बहुत लंबी है- 3 घंटे 20 मिनट. यह कहानी लंबी होते हुए भी दर्शकों को बांधे रखती है. मध्यांतर से पहले जवानों की पर्सनल लाइफ दिखाई गई है. मध्यांतर के बाद वार सीन हैं. हर ऐक्टर को खासा टाइम दिया गया है. किरदारों की बौंडिंग दर्शकों को उन से जोड़े रखती है. किरदारों की बैक स्टोरी से दर्शक तारतम्यता बना लेते हैं.

मध्यांतर के बाद वार सीन्स औसत लगते हैं, उन में नयापन नहीं दिखता. वीएफएक्स जानेपहचाने लगते हैं. ऐसा लगता है कि इस तरह का वार हम ने पहले भी देखा हुआ है. वार सीन देखते वक्त धैर्य रखने की जरूरत है. सिनेमेटोग्राफी शानदार है. सनी दयोल की परफौर्मेंस बढ़िया है. उस ने निराश नहीं किया है. वरुण धवन ने भी कमाल की ऐक्टिंग की है. दिलजीत दोसांझ सहज नहर आते हैं. सोनम बाजवा के साथ उस की ट्यूनिंग कमाल की है.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है. संवाद बढ़िया हैं. निर्देशक ने अलगअलग चारों किरदारों की कहानियों को एक माला में पिरोया है. वरुण धवन की पत्नी की भूमिका में मेघा राणा और अहान शेट्टी की पत्नी की भूमिका में ‘बैड्स औफ बौलीवुड’ की मैनेजर आन्या सिंह ने जान फूंक दी है.

परदे पर जब गाना ‘घर कब आओगे…’ आता है तो पिछली ‘बौर्डर’ की याद ताजा हो जाती है. इस के अलावा और कोई गाना जबां पर चढ़ नहीं पाता. कहींकहीं फिल्म आंखों में आंसू ला देती है. इस फिल्म को भी देखते वक्त ज्यादा दिमाग मत लगाएं. हां, भारतीय सेना की हिम्मत को देखने के लिए एक बार इसे देख सकते हैं. यह नए भारत की नई सेना है, घर में घुस कर मार सकने में सक्षम है.

Border 2 (2026) – Movie Review

Bhabiji Ghar Par Hain! (2026) – Movie Review : “कहानी और पटकथा बेसिरपैर की”

Bhabiji Ghar Par Hain! (2026) – Movie Review :

यह एक हिट टीवी सीरियल पर आधारित कौमेडी फिल्म है. यह हिंदी भाषा का एक सिटकौम है जिस का प्रीमियर 2 मार्च, 2015 को टैलीविजन पर हुआ था. जब इस के इतने सारे शो टीवी पर प्रसारित हो चुके हैं तो निर्देशक को फिल्म बनाने की क्या जरूरत पड़ गई. यह 1990 के दशक के हिंदी सिटकौम ‘श्रीमान श्रीमतीजी’ से प्रेरित है.

‘भाभी जी घर पर हैं’ से पहले कई कौमिक शो टीवी पर प्रसारित हुए, मगर उन में ‘तारक मेहता का चश्मा’ और ‘औफिस औफिस’ अधिक पौपुलर हुए. इस के अलावा ‘हम पांच’, ‘खिचड़ी’, ‘देख भाई देख’ भी खासे चर्चित हुए. 2008 में आया ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ एक हाउसिंग सोसाइटी में स्थापित परिवार केंद्रित सामाजिक कौमेडी था. वहीं 2001 से 2004 तक चले ‘औफिस औफिस’ में पंकज कपूर के नेतृत्व में देश की नौकरशाही व भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य था.

‘भाभी जी घर पर हैं’ कौमेडी शो ने पड़ोसी दंपतियों मिश्रण और तिवारी के इर्दगिर्द घूमता है, जहां पति एकदूसरे की पत्नियों की ओर आकर्षित होते हैं और उन्हें प्रभावित करने के लिए विभिन्न असफल मगर हास्यास्पद तरीकों का उपयोग करते हैं.

दोनों अपनीअपनी पत्नियों के साथ उत्तराखंड निकल जाते हैं. वहां मौका पा कर विभूति और अंगूरी मंदिर निकल जाते हैं. उन की तलाश में पीछे तिवारी और अनिता भी निकल पड़ते हैं. इस सफर में सभी की मुलाकात बाहुबली भाइयों शांति (रवि किशन) और क्रांति (दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ) से होती है. शांति का दिल अंगूरी पर आ जाता है और तिवारी का दिल क्रांति भाभी पर आ जाता है. इस के बाद शुरू होता है गलत कहानियों और मजेदार घटनाओं का सिलसिला.

टीवी एपिसोडों जैसी इस फिल्म की कहानी और पटकथा बेसिरपैर की है. फिल्म की कहानी और लेखन बहुत ही खराब है. इस में फूहड़ कौमेडी, द्विअर्थी संवाद इस्तेमाल किए गए हैं, इसलिए यह परिवार के साथ देखने लायक नहीं है.

फिल्म में टीवी सीरियल वाले वही पुराने किरदार हैं, वही शरारतें हैं. मगर फिल्म निखरीनिखरी सी लगती है. अंगूरी भाभी को ले कर पैदा हुआ हौरर एंगल फिल्म में रोमांच जोड़ता है. आसिफ शेख, रोहिताश गौड़, शुभांगी अत्रे और विदिशा श्रीवास्तव अपने पुराने अंदाज में नजर आते हैं. सो, वे दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाते. योगेश त्रिपाठी दरोगा हप्पू सिंह की भूमिका में हंसी पैदा करते हैं. सीमा राठौड़ भी हास्य पैदा करती हैं.

फिल्म के निर्देशन में कोई नई बात नहीं है. संपादन ढीला है. कई सीन जबरदस्ती खींचे गए लगते हैं.

Bhabiji Ghar Par Hain! (2026) – Movie Review

Editorial : सरित प्रवाह – ट्रंप के जाल में अमेरिका

Editorial :

एक नेता कैसे अपने देश की जनता से मित्र देशों को दुश्मन मनवा सकता है, इस का ‘महान’ उदाहरण अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप हैं. ‘द इकोनौमिस्ट’ पत्रिका के लिए किए गए गूगल के सर्वे से पता चला है कि अमेरिका में जहां वर्ष 2016 तक मुश्किल से 2-3 प्रतिशत लोग कनाडा को एनिमी या दुश्मन मानते थे, ट्रंप के शासन में आने के बाद उन की गिनती बढ़ने लगी है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के 25 परसैंट लोग कनाडा को अब अनफ्रैंडली या एनिमी मानते हैं.

इसी तरह यूरोप को अब 30 परसैंट रिपब्लिकन वोटर और 4 परसैंट डैमोक्रेट वोटर अपना यानी अमेरिका का मित्र नहीं मानते. यह बदलाव डोनाल्ड ट्रंप और उन के मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के निरंतर प्रचार का नतीजा है. वर्ष 1948 से पहले पूरा यूरोप अमेरिका को अभिन्न मित्र मानता था क्योंकि वहां यूरोप के विभिन्न देशों से गए लोगों ने ही मिलजुल कर अमेरिका को अमेरिका बनाया व बसाया था.

वर्ष 1940-1945 के विश्व युद्ध में जरमनी से फ्रांस व ब्रिटेन के साथ अमेरिकी कंधे से कंधे मिला कर लड़े थे और उस के बाद उन्होंने यूरोप के पुनर्निर्माण में पूरा सहयोग भी दिया था.

आज यूरोपीय, कनाडाई और बहुत से अन्य उदार व संपन्न देश अमेरिका को मित्र मानने से इनकार कर रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप और मागा की सोच ने अमेरिकियों के मन में कनाडा और यूरोप के प्रति इस कदर जहर भर दिया है कि अब दोनों को एक मेज पर बैठना मुश्किल हो गया है. यूरोप में बसे कट्टरपंथी अमेरिकी और अमेरिका में बसे कनाडाई व यूरोपीय धीरेधीरे अपने देशों में जा रहे हैं. यह बदलाव समाज पर मागा व ट्रंप का थोपा गया है.

अब दोनों तरफ विश्वास की कमी होने लगी है. और यह परिवर्तन स्थायी लगता है. यह केवल ट्रंप के राष्ट्रपति काल तक रहेगा, ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा. यूरोप के लोग इस साल अब फुटबौल वर्ल्ड कप में जाना टाल रहे हैं जो अमेरिका में होने वाला है. यूरोपीय फुटबौल के खास शौकीन हैं, उन्हें लगता है कि गोरी स्किन और यूरोपीय पासपोर्ट के होने बावजूद अमेरिकी अफसर उन से ढंग से बात नहीं करेंगे.

ऐसा ही कुछ भारत और बंगलादेश में हुआ है. भारत में बंगलादेशी घुसपैठियों को ले कर 10 सालों के दौरान इतना शोर मचाया गया है कि आज आम बंगलादेशी भारत को 1971 में पश्चिमी पाकिस्तानी सेना से बचाने वाला उदारक मानने से इनकार कर रहा है. पश्चिमी पाकिस्तान से तो हमारा बैर 1947 में ही शुरू हो गया था. यहां भी एक गुट ने 2 लोगों, जो सदियों साथ रहे, साथ खाएपिए, साथ लड़े, साथ दुश्मनों से पिटे, को अब एकदूसरे का दुश्मन बना दिया है.

Editorial

Family Story in Hindi : दीपशिखा – शिखा बारबार शादी के लिए क्यों मना कर रही थी ?

Family Story in Hindi :

आधुनिकता से कोसों दूर रहने वाली शिखा को अभावों ने जीना सिखा दिया था. शादी में होने वाले दिखावे को व्यर्थ मानने वाली शिखा ने अपनी समझदारी से मायके व ससुराल को फुजूलखर्ची से बचा लिया.

सुबह होते ही  दीप  का  मोबाइल बज  उठा, ‘‘हाय जीजू, कैसे हो? रात कैसी थी? दीदी सो रही हैं या नहीं. आप ने उन्हें सोने भी दिया या नहीं?’’

‘‘बसबस, सवाल ही पूछती रहोगी या कुछ जवाब भी देने दोगी,’’ दीप ने बीना से कहा, बीना उस की नईनवेली पत्नी शिखा की लाड़ली बहन है. ‘‘लो बहन से ही पूछो. मैंने सबकुछ कह दिया तो तुम दोनों ही शरम से लाल हो जाओगी.’’

शिखा और बीना की बातें शुरू हुईं तो लगा मानो वर्षों बाद बात हो रही है.

बीना का रिजल्ट निकला. वह पास हो गई थी. शिखा ने ही बीना को पढ़ाया था. नौकरी लगने के फौरन बाद ही शिखा ने बीना को इंजीनियरिंग कालिज में प्रवेश दिला दिया था. कालिज की पढ़ाई का भारी खर्च शिखा के ही कंधों पर था क्योंकि मां एक साधारण अध्यापिका थीं और पिता कुछ नहीं करते थे.

शिखा को तो मां ने अतिरिक्त ट्यूशन पढ़ापढ़ा कर इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा कराया था पर बीना का बोझ शिखा ने उठा लिया था.

आज की युवा पीढ़ी की तरह मौजमस्ती से दूर केवल पढ़ाई को लक्ष्य बना कर दोनों बहनों ने सफलता प्राप्त की.

शिखा बहुत बड़ी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर थी, उस का वेतन 20 हजार रुपए महीना था. पर देखने में वह इतनी सीधी थी कि उसे देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह इतनी पढ़ीलिखी है और 20 हजार रुपए महीना कमाने वाली लड़की है.

शिखा देखने में सुंदर भी थी. 2 साल से उस के लिए रिश्ते आ रहे थे पर वह उन्हें टालती जा रही थी.

शिखा ने एक दिन मां से पूछ ही लिया, ‘‘मां, आप लड़के के बारे में पूछ रही थीं न, अगर दूसरी बिरादरी का लड़का होगा तो भी आप मान जाएंगी न?’’

‘‘ओह हो, तो यह बात है. मेरी रानी बिटिया को कोई भा गया है. बता, जल्दी से बता. मुझे बिरादरी अलग होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. बस, लड़का लायक होना चाहिए.’’

‘‘मां, जब एक बार मैं बीमार पड़ी थी तब आफिस के कई साथी हालचाल पूछने आए थे, उन में वह लड़का भी था. उस ने सफेद कुरतापाजामा पहना हुआ था. बाल थोड़े लंबे थे.’’

‘‘अच्छाअच्छा, तू दीप की बात कर रही है जिसे देख कर मैं ने उसे शायर की उपाधि दी थी.’’

‘‘हां, मां. हम दोनों एक ही प्रोजेक्ट पर काम करते हैं. बहुत ही अच्छा लड़का है. मेरी तरह वह भी उड़ने वाले लड़कों में से नहीं है.’’

‘‘उस की मां को पता है कि तुम दूसरी जाति की हो?’’

‘‘उस की मां को सब पता है. वह यह जानती है कि मैं हरियाणा के जाट परिवार से हूं. अब आप की तरफ से अगर हां हो तो दीप मुझे एक दिन अपनी मां से मिलवाने ले जाएगा.’’

‘‘ठीक है जब उन की तरफ से हां हो जाएगी तब हम भी उन से मिल लेंगे.’’

मां बड़ी खुश थीं. एक बड़ा बोझ उन के सिर से जैसे उतर गया हो. अगले इतवार को ही दीप शिखा को अपनी मां से मिलवाने ले गया. शिखा बहुत ही सामान्य कपड़ों में और बिना किसी मेकअप के दीप के घर उन की मां से मिलने आई थी. दीप की मां तो उसे देखते ही मुग्ध हो गई थीं. उन्हें तेजतर्रार लड़कियों से बड़ा डर लगता था.

उन के मन में एक ही इच्छा थी कि दीप को उस की तरह ही सीधीसादी लड़की मिले क्योंकि एक  तो वह बेहद सरल स्वभाव का था दूसरे छलकपट और दिखावे से भी बहुत दूर रहता था. बस, अपने काम की दुनिया में वह मस्त रहने वाला इनसान था.

शिखा को देख कर दीप की मां उस से बातें करने में खो गईं. दोनों की बातों में दीप जैसे अकेला पड़ गया तो वह चुपचाप उठ कर कंप्यूटर पर जा बैठा था.

पहली ही मुलाकात में शिखा ने अपने और अपने परिवार के बारे में दीप की मां को सबकुछ बता दिया था. दीप के बारे में तो वह जानती ही थी.

दीप की मां ने पहली मुलाकात में ही शिखा को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया तो दोनों परिवार मिले और बात आगे बढ़ी. शादी की तारीख तय हुई और फिर खरीदारी शुरू हो गई. दीप की मां ने सारी खरीदारी शिखा को साथ ले जा कर की.

इस तरह रोज की मुलाकातों में शिखा की व्यवहारकुशलता और बचत करने की आदत से भी वह परिचित हो गई थीं.

जीवन की कठिनाइयों ने शिखा को पैसे का मूल्य समझना सिखा दिया था. वह कहीं भी फुजूलखर्ची न तो खुद करती न दूसरों को करने देती थी. दीप की मां जस्सी शिखा के बारे में सोचसोच कर हैरान होती कि देखो जमाने की हवा से शिखा कितनी दूर है. इतना कमाती है फिर भी सोचसमझ कर ही खर्च करती है. जस्सी की ओर से खरीदारी पूरी हो चुकी थी. तभी एक दिन शिखा का फोन आया.

‘‘मां, आप से एक बात पूछनी है. आप बुरा मत मानना और किसी को भी बताना नहीं, यहां तक कि दीप को भी नहीं बताना.’’

‘‘क्या बात है? कोई गंभीर समस्या है क्या?’’

‘‘नहीं मां, कोईर् गंभीर बात नहीं है. पर फिर भी आप की रजामंदी के बिना मैं कुछ नहीं करूंगी.’’

‘‘अच्छा बोलो, मैं वादा करती हूं कि तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘मां शादी पर पहनने वाली ड्रेस मैं बनवाना नहीं चाहती. इधर मैं ने बाजार में सब देखा. कोई भी डे्रस 10-12 हजार रुपए से कम की नहीं है. सिर्फ एक दिन पहनने के लिए इतना पैसा बरबाद करने का मेरा मन नहीं है. क्या मैं किराए पर ले कर पहन लूं. आजकल किराए पर एक से एक बढि़या ड्रेस और साथ में मैचिंग गहने मिलते हैं. आप तो जानती हैं कि मैं दोबारा ऐसे कपड़े पहनने वाली नहीं हूं. यदि आप मेरा साथ देंगी तभी मैं यह कदम उठा सकती हूं. दूसरे दिन ही सब सामान वापस चला जाएगा.’’

‘‘तू कैसी लड़की है?’’ जस्सी ने कहा, ‘‘शादी की डे्रेस पर तो सब लड़कियां अपने पूरे अरमान निकाल लेती हैं और तू कहती है कि बनवानी ही नहीं है. बेटी, मैं पैसे देती हूं, तू अपनी पसंद की बनवा ले.’’

‘‘मां, बात पैसे की नहीं है. मेरी समझ में यह पैसे की बरबादी है. आप भी मेरी बात से सहमत होंगी.’’

‘‘तुम्हारी मम्मी क्या कहती हैं?’’

‘‘वह कहती हैं कि अगर समधनजी मान जाएं तो ऐसा कर लो. मां को तो मैं ने मना लिया है, अब आप को मनाना बाकी है.’’

‘‘ठीक है, जैसा तुम चाहो वैसा कर लो. मुझे कोई आपत्ति नहीं है और यह रहस्य मेरे तक ही सीमित रहेगा.’’

‘‘थैंक्यू मां,’’ कह कर शिखा ने फोन रख दिया.

जस्सी के मन में अब शिखा के लिए आदर का भाव और भी बढ़ गया. उस ने सोचा कि देखो शिखा कितना सोचती है अपने परिवार के बारे में. बेकार में पैसा उड़ाने में विश्वास नहीं रखती है. कल को पति के घर को भी अच्छे से संभाल लेगी.

शादी का दिन आ पहुंचा. गुलाबी रंग के लहंगेचुनरी में शिखा का सौंदर्य निखर उठा था. गहने उस की सुंदरता को और भी बढ़ा रहे थे. शिखा की डोली विदा हो कर दीप के घर आ गई थी. सब तरह के रीतिरिवाजों से निबट कर जब आराम करने के लिए शिखा अपने कमरे में जाने लगी तो उस ने अपनी सास को इशारे से कमरे में बुला लिया. बहुत ही ध्यान से शिखा ने कपड़े उतार कर अटैची में बंद किए. सब गहने उतार कर डब्बे में रखे. इस काम में जस्सी ने शिखा की मदद की. बहुत ही ध्यान से दर्जनों सेफ्टीपिन लहंगे और चुनरी से निकाले. सबकुछ सहेज कर रखने के बाद शिखा ने राहत की सांस ली और अपनी सास को एक बार फिर दिल से थैंक्यू कहा.

सास ने प्यार से उसे बांहों में भर लिया और बोलीं, ‘‘बेटी, जैसे तुम ने अपने मायके का पूरा ध्यान रखा है उसी तरह से ससुराल का भी ध्यान रखना.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है मां. अब तो यह मेरा घर है. मेरी जान इसी पर न्योछावर है.’’

रात होतेहोते दीप के दोस्तों और मौसेरे, चचेरे भाईबहनों ने मिल कर बोलना शुरू किया, ‘‘अरे दीप, किस होटल में कमरा बुक किया है. चलो, तुम दोनों को छोड़ आएं.’’

‘‘हम अपनेआप चले जाएंगे, तुम लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’

घर मेहमानों से भरा हुआ था क्योंकि वह 2 कमरों का एक छोटा सा फ्लैट था. दीप भी जानता था कि समाज के रिवाज के अनुसार उसे शिखा को ले कर किसी होटल में जाना ही पड़ेगा, अन्यथा आज की सोच वाले उस के दोस्त उस का पीछा नहीं छोड़ेंगे. रात के 10 बज चुके थे, दीप और शिखा ने सब को ‘बाय’ किया और अपनी कार में घर से चल दिए. रास्ते में शिखा ने दीप से पूछा कि होटल के कमरे में कितने रुपए लगेंगे?

‘‘पांचसितारा होटल में 5 हजार, तीनसितारा होटल में 3 हजार और एक सितारा होटल में 1 हजार रुपए. तुम बोलो कि तुम्हें कहां चलना है, पैसे का प्रबंध मैं ने कर रखा है.’’

‘‘और कंपनी के गेस्ट हाउस के कमरे के कितने?’’

‘‘मुफ्त. केवल 100 रुपए चौकीदार को टिप के रूप में देने पड़ेंगे.’’

‘‘तो चलो वहीं चलते हैं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है. लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘मेरा दिमाग बिलकुल ठीक है,’’ शिखा बोली, ‘‘मैं लोगों की चिंता नहीं करती. पैसे की बरबादी मैं नहीं करती, यह तुम अच्छे से जानते हो.’’

‘‘यह रात फिर कभी नहीं आएगी. बाद में ताना मत मारना कि मैं कंजूस हूं.’’

‘‘नहीं, ऐसा कभी नहीं होगा,’’ इतना कह कर शिखा ने धीरे से दीप के हाथ पर अपना हाथ रख दिया.

दीप ने कार गेस्ट हाउस की दिशा में मोड़ दी. रात बहुत हो चुकी थी फिर भी सड़क के किनारे एक फूल वाला अपने फूल समेटने की तैयारी में था. दीप ने कार रोकी और उस के सारे गुलाब के फूल खरीद लिए. दीप जानता था कि शिखा को गुलाब के फूल बहुत अच्छे लगते हैं.वह सप्ताह में एक दिन गुलाब के फूलों का एक गुच्छा खरीद कर घर ले जाती थी और उन्हें ही सहेज कर हफ्ता निकाल देती थी.

कार गुलाबों से महक उठी. गेस्ट हाउस के उस कमरे को दोनों ने मिल कर सजाया. दोनों के दिलों में प्यार की महक थी इसलिए वह साधारण सा कमरा भी किसी पांचसितारा होटल से अधिक सुंदर लग रहा था. दोनों एकदूसरे की बाहों में खो गए थे.

सुबह होते ही घर जाने की तैयारी हुई. शिखा बहुत ही खुश नजर आ रही थी. दीप ने पूछा, ‘‘क्या बात है बहुत खुश हो.’’

‘‘हां, वो तो है. मैं बहुत खुश हूं क्योंकि आज मैं दीपशिखा बन गई हूं.’’

‘‘दीप भी तो शिखा के बिना अधूरा था,’’ दीप बोला, ‘‘चलो, अब दीपशिखा मिल कर चलें,’’ शिखा हसंती हुई बोली.

शिखा का खिला हुआ चेहरा देख कर जस्सी ने उसे गले से लगा लिया था. शिखा की खुशी का एक और राज भी था जिसे उस ने मां को नहीं बताया था. पहले दिन से उस ने अपने घर की सुरक्षा का बीमा अपने हाथों में ले लिया था.

दीप का मोबाइल.

Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : जय सरकारी तंत्र – मंजरी हैरान भी थी और परेशान भी

Satirical Story In Hindi : सरकारी मकान का भी जवाब नहीं. कभी कमरे में बारिश का पानी भरता है, कभी छत टपकती है तो कभी पंखा खराब हो जाता है…और मरम्मत के लिए जो कर्मचारी आते हैं उन की अपनीअपनी अदाएं हैं. सारा तमाशा देख कर मंजरी हैरान भी थी और परेशान भी.

छप छप, छपाक के लयबद्ध संगीत  से मंजरी की आंख खुल गई.  अलसाते हुए  उस ने घड़ी की ओर देखा तो वह चौंक कर उठ खड़ी हुई.

‘अरे, साढ़े 7 बज गए… बारिश के कारण समय का पता ही नहीं चला,’ बुदबुदाते हुए मंजरी ने अंगड़ाई ली और खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गई.

बाहर हर तरफ पानी से भरे गड्ढे दिख रहे थे, ‘इस का मतलब रात से ही लगातार बारिश हो रही है. मौसम कितना खुशगवार है पर मैं कितनी अकेली हूं. दोनों बच्चे होस्टल में हैं और समीर…जब देखो तब बाहर ही रहते हैं. वैसे देखा जाए तो कितनी सुखी हूं मैं. कर्मठ व ईमानदार पति, होनहार बच्चे, बंगला, गाड़ी, नौकर सबकुछ तो है. बस, है नहीं तो केवल समीर का साथ. समीर रेलवे में उच्च पद पर हैं, जो अकसर काम की देखरेख के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं.’

‘‘मेम साहब, मेम साहब…’’ रामू की आवाज से मंजरी की तंद्रा टूटी.

एक लंबी सांस ले कर वह दरवाजा खोलने के लिए बाहर आई. वापस आते हुए बैठक का नजारा देख कर उस की चीख निकलतेनिकलते बची, कमरे के एक तरफ की छत से टपटप पानी गिर रहा था और कीमती कालीन का एक बड़ा हिस्सा पानी से पूरी तरह भीग चुका था.

‘‘रामू, रामू…’’ मंजरी ने जोर से आवाज लगाई.

‘‘जी, आया, मेम साहब,’’ रामू ने गरम चाय का प्याला मंजरी को पकड़ाया.

‘‘रामू, यह कालीन जरा बरामदे में खड़ा कर दो, फिर बाकी सामान भी दूसरी तरफ किनारे की ओर खिसका दो,’’ चाय पीते हुए मंजरी ने कहा.

चाय पी कर अपने कमरे से मंजरी ने रेलवे के सेक्शन इंजीनियर के दफ्तर में फोन मिलाया. काफी देर घंटी बजने के बाद उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, सेक्शन आफिस.’’

‘‘हैलो,

हां, क्या सेक्शन इंजीनियर साहब हैं?’’ मंजरी ने पूछा.

‘‘साहब तो बाहर कर्मचारियों को आज की ड्यूटी बांट रहे हैं. अभी बहुत व्यस्त हैं.’’

‘‘उन्हें बताओ कि बंगला नं. 40 की छत से बहुत पानी टपक रहा है. जल्दी से किसी को ठीक करने के लिए भेज दें.’’

‘‘सौरी, मैडम, आज तो कुछ नहीं हो सकता. बड़े साहब के घर में काम चल रहा है.’’

‘‘लेकिन यहां भी तो बहुत जरूरी है. यह घर…’’ मंजरी के वाक्य पूरा करने से पहले ही दूसरी तरफ से फोन रख दिया गया.

मंजरी ने झल्लाते हुए फोन रखा ही था कि उस के सिर पर टपाटप 3-4 बूंदें गिरीं. उस ने चौंक कर ऊपर देखा तो पंखे के बीचोंबीच से पानी टपक रहा था. यह तो अच्छा हुआ कि उस समय पंखा बंद था.

मंजरी ने फौरन बिजली विभाग का नंबर मिला कर पंखा खराब होने की शिकायत दर्ज करा दी और रामू को आवाज दी.

‘‘आया, मेम साहब.’’

रामू को आया देख कर मंजरी बोली, ‘‘सुनो, यह पलंग जरा उधर खिसका दो, और हां, यह पंखा मत चलाना. करंट आ सकता है.’’

मंजरी सोच में पड़ गई थी कि अब पता नहीं कब बिजली विभाग के लोग पंखा ठीक करने आएंगे? यदि समीर यहां होते तो सब दौड़ते हुए आते. मन ही मन सरकारी तंत्र को कोसा. अफसर को सामने देख कर तो काम करते हैं वरना वे…

सोचते हुए मंजरी बरामदे में आई और कालीन को वहां बिछा कर वैक्यूम क्लीनर से सुखाने का प्रयास किया. फिर रामू से कमरे में भरा पानी निकलवाया.

यह सब करतेकरते 11 बज गए. वह नहाने के लिए जा ही रही थी कि फोन बजा.

‘‘हैलो, मंजरी, मैं मीता, क्या कर रही थी?’’

‘‘अरे, क्या बताऊं, यार, पूरा घर टपक रहा है.’’

‘‘मेरे यहां का तो हाल ही मत पूछ. पिछले 5 दिन से रसोई में टाइल्स लग रही हैं, पर अभी भी पूरी नहीं हुईं.’’

‘‘पता नहीं, कैसे काम करते हैं ये लोग?’’

‘‘खैर, इन सब बातों को मारो गोली. चलो, हम लोग बाजार चलते हैं. कलाकृति में सेल लगी हुई है.’’

‘‘हां…ठीक है, लेकिन दोपहर के बाद चलेंगे.’’

जब मंजरी नहा कर आई तो 12 बज चुके थे. उसे बहुत जोर की भूख लगी थी. सोचा अब नाश्ते का समय तो है नहीं, अत: सीधे खाना ही खा लिया जाए.

खाना खा कर और रामू को भेज कर मंजरी जब अंदर आई तो थक कर चूर हो गई थी. आंख बंद कर वह अभी लेटी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी.

इस समय कौन हो सकता है? उस ने सोचा और बाहर जा कर देखा तो बिजली विभाग के 4 कर्मचारी खड़े थे.

‘‘मैडम, आप का पंखा नहीं चल रहा है?’’

‘‘हांहां, आइए.’’

अंदर आ कर उन्होंने नीचे से ही पंखे को देखा और फिर घड़ी में समय देख कर बोले, ‘‘मैडम, आज तो यह पंखा ठीक नहीं हो सकता.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘आज सीढ़ी नहीं है.’’

‘‘पर, भैया, बिना पंखे के हम क्या करेंगे?’’

‘‘बोला न मैडम, आज नहीं हो सकता. अब समय भी नहीं है,’’ कह कर वे चले गए.

मंजरी को बेहद गुस्सा आया पर वह क्या कर सकती थी. सब को कामचोरी की ऐसी आदत पड़ चुकी है कि ऐसा काम जिस में थोड़ी मेहनत हो, वे टालते रहते हैं.

आखिरकार, वह स्टोर से पुराना टेबलफैन निकाल कर ले आई और उसे झाड़पोंछ कर बेडरूम में लगाया. पूरा घर अस्तव्यस्त हो रहा था. इस कारण मंजरी ने मीता को भी बाजार के लिए मना कर दिया. रात को समीर का फोन आया तो मंजरी उफन पड़ी. उस ने पूरी दास्तान सुनाई. समीर ने वादा किया कि वह वहीं से शिकायत करेंगे.

अगले दिन सुबह फिर 3-4 लोगों की एक फौज बाहर खड़ी थी.

‘‘मैडम, आप के घर में पानी टपक रहा है?’’

‘‘हां, इधर देखिए,’’ मंजरी ने कमरे दिखाए.

‘‘ठीक है, मैडम, अभी सीमेंट और सामान लाते हैं.’’

मंजरी का सिर यह देख कर भन्नाने लगा कि अभी क्या ये घूमने के लिए आए थे. खैर, 2 लोग सामान लाने के बहाने चले गए और 2 पेड़ के नीचे बैठ कर बीड़ी पीने लगे.

करीब 1 घंटे के बाद वे दोनों कर्मचारी फिर प्रकट हुए. बाकी दोनों भी अलसाए से उठे और आखिर काम शुरू हुआ. ठक, ठक, ठक…हथौड़े की आवाज सिर में समाती जा रही थी.

‘‘मैडम, मैडम…’’ बाहर से मिस्तरी ने आवाज दी.

‘‘क्या बात है,’’ मंजरी पूछते हुए बाहर आई तो देखा वे लोग सामान समेट कर जाने के लिए तैयार हैं.

‘‘मैडम, हम जा रहे हैं. अब कल आएंगे.’’

‘‘लेकिन, पूरा घर फैला हुआ है.’’

‘‘आज हम लोगों को तनख्वाह मिलेगी, इसलिए अब काम नहीं होगा.’’

‘‘पर, तनख्वाह ले कर आ जाओ.’’

‘‘नहीं, हम लोग वेतन मिलने के बाद काम नहीं करते,’’ मिस्तरी ने दोटूक जवाब दिया.

मंजरी का मन हुआ कि इन्हें धक्के मार कर निकाल दे पर सिर्फ बेबस बनी उन्हें जाते देखती रही.

‘कैसी जंग लग चुकी है इस सिस्टम में,’ उस ने सोचते हुए घर का हाल देखा. पूरे ड्राइंगरूम में धूल भरी हुई थी. छत से सीमेंट और चूना झड़ कर एक अलग दृश्य पेश कर रहे थे. इतने में घंटी बजी. इस बार बिजली वाले थे. उन्हें बेडरूम की राह दिखाई. पंखा बदल कर उन्होंने आवाज लगाई. मंजरी ने जा कर देखा कि पंखे की डंडी बहुत ही छोटी है जिस की वजह से पंखा छत से सट गया है. हवा भी नीचे तक रोरो कर ही पहुंच रही थी.

‘‘यह पंखा तो बहुत ऊंचा है.’’

‘‘मैडम, आज काम चला लीजिए. कल पाइप ला कर लगा देंगे.’’

‘‘फिर आज ही क्यों नहीं लाए,’’ मंजरी का धैर्य जवाब देने लगा था.

‘‘पाइप स्टाक में नहीं है.’’

‘‘उफ, यानी कल का दिन भी बरबाद हो जाएगा.’’

मंजरी यह देख कर हैरान थी कि ऐसे कर्मचारियों के बूते पूरी भारतीय रेलवे कैसे चल रही है, जो विश्व का दूसरा सब से बड़ा रेल नेटवर्क है, पर जब पूरी व्यवस्था ही अंदर तक सड़ चुकी हो, तब किसी से अनुशासन की अपेक्षा करना व्यर्थ है.

मंजरी के सामने अब पूरे सरकारी तंत्र की बखिया खुल चुकी थी. उसे समझ में आ गया था कि देश के कर्मचारी काहिली और अकर्मण्यता के रंग में इतने गहरे रंग गए हैं कि अब उन पर किसी बात का असर नहीं होता.

मंजरी का सिर फटा जा रहा था. अपने ही घर में 2 दिनों से न वह चैन से बैठ पा रही थी, न लेट पा रही थी. 2 घंटे के काम में 2 दिन तो बरबाद हो चुके थे और जाने कितने दिन अभी और लगने हैं. जय प्रजातंत्र, जय सरकारी तंत्र. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : टौयलेट एक घोर व्यथा – बेचारेलाल की बेचारगी की क्या थी वजह

Satirical Story In Hindi :

फिल्म ‘टौयलेट: एक प्रेमकथा’ के हीरो अक्षय कुमार हैं, जबकि टौयलेट: एक घोर व्यथा के हीरो हैं बेचारेलाल.

भले ही बेचारेलाल को ले कर कोई फिल्म न बनी हो, पर आप थोड़ा सब्र कर के उन की परेशानी को उन की जगह खुद को रख कर जानने की कोशिश करें, तो एक अनदेखी फिल्म देख पाएंगे. बेचारेलाल की बेचारगी यह है कि जिस तरह हर पल सांस लेना जरूरी है, उसी तरह उन के लिए हर आधे घंटे में मूत्र विसर्जन करना जरूरी है.

बचपन से ले कर किशोर होने तक बेचारेलाल बिस्तर ही गीला करते रहे. डाक्टरों से सलाह करने पर उन्होंने बताया कि उन का मूत्राशय छोटा है, इस वजह से यह समस्या है. बड़े होने पर उन्हें लगा कि अब तो उन के साथसाथ मूत्राशय भी बड़ा हो गया होगा, सो फिर उन्होंने डाक्टर से पूछा.

इस बीच तकनीक काफी तरक्की कर चुकी थी और डाक्टरों ने जांच कर के बताया कि प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने के चलते उन के साथ यह समस्या है.

बाद में बिस्तर गीला करने की आदत तो छूटी, पर अभी भी हर आधे घंटे पर सूसू की तलब ठीक वैसे उठती है, जैसे नेताओं को कुरसी की तलब हर 5 साल में होती है.

छोटी जगहों पर यह आदत कोई समस्या नहीं, क्योंकि उन के लिए जगह ही जगह होती है. ‘धरती मेरी माता पिता आसमां…’ गाते हुए वे कहीं भी शुरू हो जाते थे, पर बड़ेबड़े शहरों में छोटीछोटी समस्याएं भी बड़ी हो जाती हैं और बड़ा शहर भी ऐसावैसा नहीं बंबई नगरिया, जो अब मुंबई के नाम से जाना जाता है. इस के बारे में गाने भी बने हैं, ‘ये जो बंबई शहर हादसों का शहर है’ और ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां…’ वगैरह.

बेचारेलाल की दिक्कत यह है कि मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन, जो कभीकभार किलर के किरदार में भी आ जाती है, में टौयलेट नामक किसी सुविधा का वजूद नहीं है. अगर हो भी जाए, तो कोई फायदा नहीं, क्योंकि मुसाफिर बेचारे एकदूसरे से गोंद की तरह चिपके रहते हैं. अपनी जगह से खिसकने का सवाल ही नहीं और अगर इन ट्रेनों में शौचालय का इंतजाम कर भी दिया जाए, तो उस में भी 5-10 मुसाफिर तो हर वक्त ठुंसे हुए रहेंगे ही.

फिर किसी स्टेशन पर अगर सुविधा है भी, तो अकसर आप ‘अभी कतार में हैं’ महसूस होता रहता है. अगर कतार से बचना है, तो 2 रुपए का सिक्का पास में होना चाहिए.

बेचारेलाल को दिनभर में इतने फेरे लगाने पड़ते हैं कि कितने सिक्के रखें पास में और फिर 2 रुपए देना उन के दिल को ऐसे भी गंवारा नहीं है.

आखिर वहां वे कुछ देते ही हैं, लेते तो नहीं. जिस ने कुछ दिया पैसे तो उसे मिलने चाहिए. गोबर गैस प्लांट से मिलने वाले फायदे की तर्ज पर मूत्र गैस प्लांट बनाओ और ऊर्जा बनाओ. गोमूत्र से दवा बना सकते हो, मानव मूत्र से कम से कम बायोपैट्रोलियम तो बनाओ.

फिर कई बसअड्डों पर तो यह सुविधा है ही नहीं. अगर खुले में जाने की सोचें, तो कभी विद्या बालन और कभी अक्षय कुमार की इमेज सामने आ जाती है. अमिताभ बच्चन भी मजाक उड़ाते से दिख जाते हैं, चालान का डर अलग से.

सुनने में तो यहां तक आया है कि दिल्ली में इधर आप दीवार पर ‘सूसू चित्रकारी’ कर रहे होते हैं, उधर ऊपर से ‘बरसो रे मेघामेघा’ का संगीत सुनाते हुए रेडियो स्टेशन वाले ऊपर से नकली मेघ बरसा देते हैं. अब 2 सौ मिलीलिटर सूसू क्या किया, 2 लिटर पानी से नहला दिया गया. ऐसी हालत में कोई करे तो क्या करे.

वैसे, इन रेडियो स्टेशन वालों ने पानी के इंतजाम में जितना समय और मेहनत गंवाई, उतने में तो मूत्रालय बनवा देते. पर समस्या के समाधान करने में वह मजा कहां है, जो समस्या में घिरे लोगों का मजाक उड़ाने में है.

यदि इस समस्या के समाधान पर ध्यान दिया जाता, तो आजादी के इतने साल बाद भी मनोरंजन के इतने साधन कहां रह पाते भला?

एक बार यों हुआ कि जोगेश्वरी बसअड्डे पर बेचारेलाल बस का इंतजार कर रहे थे. सूसू जोर मार रहा था. सारे बसअड्डे पर जगह छान मारी, पर कहीं भी मूत्रालय न दिखा.

इसी बीच एक होटल वाले ने आवाज दी, तो मन ही मन उसे 2-4 क्विंटल गालियां दीं. उन्हें इस बात पर दुख हुआ कि लोग खानेपीने की चीजें बेचते हैं, तो उसे निकालने का इंतजाम क्यों नहीं करते. न खाऊंगा न खाने दूंगा तो ठीक है, पर खाने दूंगा पर जाने न दूंगा, कहां तक ठीक है?

एक दिन बेचारेलाल से सूसू का जोर सहा नहीं गया. अपनी समझ से जितनी दूर हो सकता थे, बढ़ गए मूत्र विसर्जन के लिए. बसअड्डा और रेलवे स्टेशन के बीच दीवार पर कलाकारी करने लगे. पर मन में डर था, दूर खड़ी बस में कुछ जोर से बातें करने की आवाज आती, तो उन का दिल धड़कधड़क जाता और सूसू की धार बीच में ही रुक जाती.

वे पलटपलट कर उस ओर देखते रहते, जिधर से आवाज आ रही थी. वे इतनी देर से जब्त किए बैठे थे कि काम खत्म होने में भी समय लगना था.

एकाएक बेचारेलाल की नजर एक वरदीधारी पर पड़ी. वह तेजी से उन की ओर ही आ रहा था. बेचारेलाल अपने काम को बीच में ही छोड़ एक ओर जा कर खड़े हो गए. चेहरे पर जितनी मासूमियत ला सकते थे, ले आए.

बेचारेलाल यों इधरउधर देखने लगे मानो वैसे ही खड़े हैं. उन्हें डर था कि वरदीधारी उन की खिंचाई करेगा और चालान काटेगा. अखबारों में खुले में शौच करने वालों के चालान काटे जाने की कई सचित्र खबरें पढ़ी थीं उन्होंने. कहीं उन का चित्र भी मुंबई के अखबार में अगले दिन न आ जाए.

वे यही सोच कर घबरा रहे थे, पर यह क्या… वरदीधारी उन की ओर न आ कर उसी दिशा में जा रहा था, जिधर वे खड़े हो कर हलके हो रहे थे. कहीं वह सुबूत इकट्ठा करने तो उधर नहीं गया है. मुंबई पुलिस के बारे में वैसे भी काफी नाम सुन चुके थे वे. तो क्या सुबूत के साथ वह उन्हें गिरफ्तार करेगा?

यह नजारा देख कर बेचारेलाल की तो सिट्टीपिट्टी गुम हो रही थी. पर वरदीधारी भी उन्हीं की तरह शायद बड़े दबाव में था. वह भी इन्हीं की तरह हलका हुआ और लौट पड़ा. बेचारेलाल की जान में जान आई. पर बसअड्डे पर कतार में जब वे खड़े हुए, तो उन के सामने 2 समस्याएं मुंहबाए खड़ी थीं. पहली, बस आने तक फिर से उन्हें सूसू की तलब न लग जाए. दूसरी यह कि क्या सरकार के द्वारा प्रोस्टेट बढ़े हुए या दूसरी इसी तरह की समस्या से पीडि़त लोगों को कुछ छूट दी जानी चाहिए?

पर छूट मिलने की बात पर तो सभी छूट खोजने लगेंगे. जो ऊंची जाति का होने का दंभ भरते हैं, वे भी रिजर्वेशन के लिए रेल की पटरी पर बैठ जाते हैं, जाली सर्टिफिकेट बना कर रिजर्व्ड कोटे में शामिल हो जाते हैं, अच्छेखासे अमीर लोग गरीबी रेखा के नीचे सरक लेते हैं थोड़ी सी छूट के लिए. अच्छा, इस मामले में छूट न सही, पर कम से कम खुले में शौच से छुटकारे के लिए बंद जगह का इंतजाम तो कर दिया जाए.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

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Satirical Story In Hindi

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