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Hindi Stories: डाह

Hindi Stories: शाम के 5 बजे थे. ईशा अपने बैड पर लेटी हुई मोबाइल पर गेम खेलने में बिजी थी कि बच्चों के शोर ने उस का ध्यान भंग कर दिया था.

रुशिल दौड़ता हुआ आया, ‘‘मौम,  देखो, दादा नई मर्सिडीज गाड़ी ले कर आए हैं. मम्मा, ब्लू कलर की बहुत सुंदर गाड़ी है. दादा आप को बुला रहे हैं.’’

‘‘जल्दी चलिए, दादा पहले डीलर के पास एक बार फिर जाएंगे, फिर आज का डिनर भी सब लोग बाहर ही करेंगे.’’

वह उठी और बालकनी से झुक कर देखा, घर के सब लोग बाहर इकट्ठा थे और उसी का इंतजार हो रहा था.

वह बड़ी बहन की संपन्नता देख डाह के मारे जलभुन कर रह गई थी.

‘‘रुशिल, जा कर कह दो कि मम्मा को सिर में बहुत दर्द है, इसलिए वे नहीं जा पाएंगी.’’

दिशा ने उन की बात सुन ली थी क्योंकि वह खुद ही उसे बुलाने के लिए उस के कमरे में आ गई थीं.

‘‘चलो ईशा, खाने पर चलोगी तो सिरदर्द दूर हो जाएगा. आज खाना बनाने से भी छुट्टी मिलेगी. आज सुमित सब को बाहर खाना खिला रहे हैं. ऐसा मौका तो कभीकभी ही आता है. चलो, सब लोगों के साथ चलेंगे, मजा आएगा.’’

‘‘मुझे नहीं जाना, कह दिया न. मेरा जी न जलाओ.’’

दिशा और ईशा दोनों बहनें थीं. दिशा का संगमरमरी रंग, हिरणी जैसी चंचल चितवन पर सुमित मरमिटा था. एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में सुमित ने दिशा को देखा तो वह देखता ही रह गया था. सुमित ने अपने दोस्त आरव से उस का फोन नंबर ले लिया और फेसबुक व इंस्टा पर उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज कर दोस्ती कर ली. फिर मिलनाजुलना शुरू हो गया. दोनों के बीच प्यार की बातें, मुलाकातें जल्दी ही शादी के पैगाम तक पहुंच गईं.

दिशा के पिता सोमेशजी को सुमित पहली नजर में ही पसंद आ गया था. दिल्ली के कनौट प्लेस में सुमित के पिता विजय गुप्ता का विजय ऐंड संस नाम से रेडीमेड गारमैंट्स का बड़ा सा शोरूम था. सुमित सुदर्शन, सौम्य और सुशील नवयुवक था. वह एमबीए कर चुका था. वह अब अपने पिता के साथ शोरूम में बैठ कर बिजनैस में हाथ बंटाता था. सोमेशजी को अपनी बेटी के लिए सुमित योग्य वर के रूप में बहुत पसंद आया था.

सोमेश सिंह ने विजय गुप्ता के परिवार के विषय में जानकारी इकट्ठी की तो मालूम हुआ कि विजय गुप्ता के सुमित और अमित 2 बेटे हैं. उन का परिवार समाज में प्रतिष्ठित परिवार था. ऐसा कुछ भी नहीं था कि वे शादी के लिए मना करते. आर्थिक और सामाजिक दोनों ही स्तर पर विजय गुप्ता उन से बीस थे. घर बैठे बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता आया, इसलिए झटपट दोनों परिवारों में शहनाई बजने लगी और दिशा दुलहन बन कर सुमित के घर आ गई थी. दिशा ने  ससुराल में आते ही अपने कार्य, व्यवहार और अपनी मीठी जबान से सब का दिल जीत लिया था.

दिशा सुंदर होने के साथसाथ पढ़ाई में बचपन से ही तेज थी, इसलिए परिवार हो या स्कूल सभी जगह उस की तारीफ होती तो छोटी बहन ईशा चिढ़ कर रह जाती. वह सांवले रंग के साथसाथ साधारण नैननक्श की थी. वह स्वभाव से जिद्दी और उद्दंड भी थी. छुटपन से ही अपनी बहन दिशा से बहुत डाह करती थी. कभी उस की किताब छिपा देती तो कभी कौपी फाड़ देती.

उस ने जब अपनी दिशा दी की ससुराल की संपन्नता देखी तो तुरंत उस ने मन ही मन में उसी घर की बहू बनने की ठान ली थी. इस के लिए उस ने अमित पर डोरे डालना शुरू कर दिए थे. आपस की छेड़छाड़, हंसीठिठोली करतेकरते दो युवा दिलों के बीच कब नजदीकियां बढ़ गई थीं, पता ही नहीं लगा था. दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे थे, यहां तक कि एकांत के पलों में दोनों के बीच संबंध भी बन गए. परिणामस्वरूप, ईशा के गर्भ में नवजीवन का अंकुर प्रस्फुटित हो उठा. जब दोनों बच्चों के पेरैंट्स तक यह खबर पहुंची तो सब ने मिलबैठ कर तय किया कि जल्दी से शादी कर देना ही एकमात्र उपाय है. और बस, जल्दी ही ईशा बहू बन कर उसी घर में आ गई.

विजय गुप्ता ने भविष्य के झटपट झगड़ों से बचने के लिए दोनों भाइयों का कारोबार अलगअलग कर दिया. सुमित हमेशा से मेहनती और बिजनैस की बारीकियों को सम?ाने वाला था, इसलिए उस का बिजनैस दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था. दिशा भी परिवार को साथ ले कर चलने वाली सम?ादार युवती थी. वह सासससुर की जरूरतों का ध्यान रखती और सच कहा जाए तो सुमित के व्यापार और परिवार के लिए समर्पित महिला थी. वह अकसर उस के साथ औफिस जाती और कुछ छोटी जिम्मेदारियां उस ने अपनेआप ले ली थीं.

ईशा का स्वभाव हमेशा से मौजमस्ती वाला था. सब के मना करने के बावजूद वह हनीमून के लिए स्विट्जरलैंड जबरदस्ती गई जबकि प्रैग्नैंट होने के कारण उस की तबीयत भी ठीक नहीं थी. उसे किटी पार्टी, क्लब और ताश की बाजियों का शौक था. उसे क्लब में डांस, ड्रिंक और पार्टी में दोस्तों के साथ बहुत आनंद आता. उस के ड्रिंक और डांस के शौक के चलते उस का एबौर्शन हो गया. अपने एबौर्शन के लिए पूरी तरह से उस ने दिशा को दोषी बता कर घर के माहौल को खराब कर दिया था.

अब वह स्वच्छंद हो कर अमित को अपने इशारों पर नचाने लगी थी. जब कभी भी अमित अपने काम का हवाला देता तो वह रूठ कर इतना हंगामा करती कि मजबूरीवश उसे उस की बात माननी ही पड़ती. उस ने कभी अमित के बिजनैस में झांकने तक की कोशिश नहीं की. दिशा की गोद में प्यारी सी गुडि़या आ गई थी. घर में खुशियां छा गई थीं. घर में आएदिन फंक्शनों की बहार आ गई थी. दिशा ने 3 साल के बाद एक बेटे को भी जन्म दिया. उस का परिवार पूरा हो गया था.

इधर ईशा मां नहीं बन पा रही थी. उस को इस बात में अपनी हेठी लग रही थी. अब वह हर सूरत में दिशा से बराबरी करने के लिए मां बनना चाहती थी. इस के लिए उस ने डाक्टर, वैद्य और हकीम लुकमान के साथसाथ मंदिरमसजिद सब जगह माथा टेका लेकिन कुछ परिणाम न निकला. फिर बाबा, मौलवी, पंडितों के पास चक्कर लगाना शुरू किया. फिर भी जब कोई नतीजा न निकला तो उस ने कई लाख खर्च कर के आईवीएफ द्वारा जुड़वां बच्चों को जन्म दिया.

अमित ने अपने शोरूम को बिलकुल ही मैनेजर के हवाले कर दिया था. अब वह ईशा के इच्छानुसार यहांवहां घूमता रहता क्योंकि वह ईशा को नाराज करना मतलब घर में झगड़ेलड़ाई को न्योता देना था. परिणामस्वरूप, उस का शोरूम तरक्की के बजाय घाटे में चलने लगा. उस की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी.

सुमित ने भाई को कई बार समझने की कोशिश की कि यदि तुम अपने शोरूम पर ध्यान नहीं दोगे तो धंधे में नुकसान हो जाएगा. लेकिन ईशा अमित को अपनी तरह से सम?ा देती कि पंडितजी ने बताया है तुम्हारे ऊपर राहु में शनि की वक्रदृष्टि पड़ रही है. यह शनि की दशा 3 साल चलेगी. इस के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए पंडितजी ने ग्रहशांति की पूजा बताई है. ग्रहशांति की पूजा के बाद दुकान में लाखों के वारेन्यारे होने लगेंगे, देखते रहिएगा. आप अपना शोरूम संभालिएगा.

सुमित को तो यह अच्छा लगता कि  वे दोनों भाई खुशी से रहें. जैसे विवादों से पहले वे दोनों घूमने जाया करते थे, वैसे ही अब बच्चों के साथ जाएं बच्चे तो आपस में घुलमिल गए पर दिशा की बहुत कोशिशों के बाद ईशा अमित को अलग ही घूमने ले जाती, कभी वे साथ नहीं जाते. दिशा समझती थी कि ईशा को उस से ईर्ष्या हो रही है पर वह उस बात को भरसक छिपा कर रखती.

अमित पत्नी के रंग में रंगा हुआ था, ईशा जो कहती, उसे वही ठीक लगता.

ईर्ष्यालु ईशा रातदिन इस जुगाड़ में रहती कि किस तरह से उस के पति अमित की इनकम परिवार में सब से ज्यादा हो जाए. यहां तक कि दिशा अपने घर में जितने नौकर रखती उतने ही नौकर ईशा भी रखती, जबकि उसे जरूरत भी नहीं थी.

पूरा परिवार पुश्तैनी घर में ही रहता था. दोनों के पोर्शन अलगअलग थे. इसलिए शोरूम के नफानुकसान की बातें घर तक आ ही जातीं. उन के परिवार के कायदे के अनुसार तो घर की महिलाओं को शोरूम में बैठने की मनाही थी पर दिशा ने इस को तोड़ दिया था और ईशा इसे पकड़ कर बैठ गई कि दी ने परिवार की मान्यता को खराब कर दिया लेकिन कुछ समय बाद ईशा ने भी पति के साथ शोरूम पर बैठना शुरू कर दिया. लेकिन दिशा के विपरीत वह पति के हर निर्णय पर उस की अपनी दखलंदाजी और जिद व जबरदस्ती रहा करती. एक दिन किसी कस्टमर के सामने ईशा की बहसबाजी और जिद से तंग आ कर अमित ने उस से शोरूम पर आने के लिए मना कर दिया.

ईशा अपने अपमान से क्रोधित हो कर रोती हुई घर आ गई. उस के उदास चेहरे को देख कर उस की नौकरानी ने उस की उदासी व परेशानी से नजात पाने के लिए अपनी पहचान के जानेमाने तांत्रिक से मिल कर उसे अपनी समस्या का समाधान कर लेने की सलाह दी. ईशा हमेशा से आलसी और कामचोर स्वभाव की थी, इसलिए वह बाबा लोगों के चमत्कारों पर बहुत विश्वास करती थी. वह बचपन से ही तंत्रमंत्र पर बहुत विश्वास करती थी कि किसी तरह बड़ी बहन से आगे निकल जाए. वह नौकरानी के साथ तांत्रिक के पास पहुंची और उस ने जो कुछ उपाय बताए, उस ने सबकुछ वैसे ही किया.

अमित को उन्हीं दिनों एक बड़ा अच्छा और्डर मिल गया. उस को उस का अच्छा परिणाम मिला. अब तो तांत्रिक पर उस का भरोसा बहुत बढ़ गया था. उस ने बतौर इनाम, अपनी नौकरानी को अपनी कीमती घड़ी दे दी. धीरेधीरे घर पर ईशा का प्रभुत्व बढ़ गया और पति अमित बेजुबान भोले बच्चे की तरह उस के कहने के अनुसार चलने लगा. बच्चे तो छोटे ही थे, उन्हें तो अपनी मेड के साथ ही रहना होता था, वही उन की देखभाल करती थी. ईशा को तो यहांवहां जाने की वजह से बच्चों के लिए फुरसत ही नहीं थी.

जिस घर में किसी भी अजनबी के प्रवेश की मनाही थी वहां पर अब रोज नएनए बाबा, तांत्रिक का आवागमन बढ़ गया था. अमित ईश्वर के कार्यों के बीच हस्तक्षेप करने की हिम्मत ही नहीं रखता था. अब घरपरिवार के कार्यों में उस की भूमिका नगण्य हो गई थी. दिशा ने एक बार समझाने की कोशिश की तो ईशा ने बड़ी बहन को ही झिड़क दिया.

जब सुमित और दूसरे घर वालों ने ईशा की इन हरकतों का विरोध किया तो घर में अशांति और कहासुनी का माहौल बन गया. आखिरकार, सब ने मौन धारण कर लिया था. फिर भी सुमित ने एक दिन ईशा को सम?ाने के लिए कहा, ‘‘ईशा, समाज में हमारी इज्जत है, 4 रिश्तेदार हैं, लोग घर की बहू के लिए ऊटपटांग बातें करते हैं तो हम लोगों की भी इज्जत खराब होती है. इसलिए ऐसे लोगों को घर पर मत बुलाया करो. तांत्रिक वगैरह केवल पैसा कमाने के लिए ये सारे स्वांग करते हैं, इन सब से कुछ नहीं होने वाला.’’

सुमित ने भाई को सम?ाते हुए कहा, ‘‘अमित, तुम अपने बिजनैस पर ध्यान दो. मैनेजर पर इतना भरोसा करना ठीक नहीं.’’

ईशा नाराज हो कर बोली, ‘‘मैं अपने घर पर बुलाती हूं, आप के घर पर तो नहीं बुलाती? मुझे जिसे बुलाना होगा, उसे मैं बुलाऊंगी. आप को अच्छा लगे या न लगे. मुझे इस से मतलब नहीं. जिस की इज्जत जाती है या बुरा लगता है, वह मु?ा से रिश्ता न रखे.’’

सुमित समझ गए कि विनाश काले विपरीत बुद्धि. ‘‘ईशा, मैं तुम्हें फिर भी आखिरी बार समझ रहा हूं कि ये तांत्रिक किसी का भला करने वाले नहीं हैं. अभी भी संभल जाओ. अभी कुछ खास बिगड़ा नहीं है.’’ यह कह कर सुमित अपने पोर्शन में चला गया.

ईशा स्वच्छंद स्वभाव की थी ही, धीरेधीरे वह तांत्रिक जगमोहन के इशारों पर नाचने लगी थी. वह अपने साथ 2-4 साथियों को ले कर आता और दिखावा करने के लिए सप्तम स्वर में मंत्रों को बोलबोल कर अनुष्ठान के नाम पर काले तिल से हवन करवाता और दक्षिणा के नाम पर अच्छी रकम लूटता परंतु ईशा की आंखों पर तो ईर्ष्या और डाह की पट्टी बंधी हुई थी. वह जगमोहन के अतिरिक्त अपने लालच के चक्कर में दूसरे तांत्रिकों के संपर्क में रहने लगी थी. अब उस के घर में जो तांत्रिक कहता, वही काम होता.

ईशा दिनप्रतिदिन तांत्रिकों के जाल में फंसती जा रही थी. वह एक के बाद एक अच्छे तांत्रिक के चक्कर में, जादूटोना, पूजापाठ के फेर में उल?ाती जा रही थी. एक तांत्रिक ने अपने एक और भक्त के अनुज को कुछ बिजनैस देने के लिए मनवा लिया और  इस से उस तांत्रिक की घर में ज्यादा ही चलने लगी. सुमित, अपने बिजनैस के प्रति बहुत समर्पित था, इसलिए सफलता और संपन्नता उस के कदम चूम रही थी और इधर ईशा के मन में दिशा की बराबरी की सनक और उस के प्रति डाह और ईर्ष्या बढ़ती जा रही थी. वह पहले तो अपनी शानशौकत और यूरोप के टूर में पैसा बहाती रही और अब तांत्रिक के चक्कर में रातदिन ऊलजलूल कामों में पैसे बहा रही थी.

उस की ईर्ष्या और डाह की सनक इतनी बढ़ती जा रही थी कि घर के कामों से उस ने अपनी आंखें मूंद ली थीं यहां तक कि पति और बच्चे मेड के न आने पर खाना बाहर से और्डर कर के मंगाते.  उस का घर पहले से ही उस की आलस्य, फिर पूजापाठ, तांत्रिकों की तंत्रक्रिया के लिए होने वाले अनुष्ठानों के कारण हमेशा से नौकरों के भरोसे रहता था. अब वह बिना देखभाल के बरबादी की कगार पर पहुंच गया था.

पहले वह कईकई दिनों तक घर से बाहर रहा करती थी, तांत्रिक और बाबा तीर्थयात्राओं का आयोजन करते थे और भक्तों को कईकई दिन के लिए मंदिरों में ले जाते. अब वे दिनों में बदल गए थे. कई बार अमित ने बच्चों की पढ़ाई और खानेपीने की अव्यवस्था का हवाला दिया लेकिन ईशा पर तो जैसे तांत्रिक जगमोहन के वशीकरण मंत्र का नशा चढ़ा हुआ था, पति की किसी बात का कोई असर ही न होता, यहां तक कि वह पत्नी के सामने रोयागिड़गिड़ाया लेकिन वह तो डाह, ईर्ष्या और द्वेष की आग में ?ालस रही थी.

एक दिन अमित ने कहा, ‘‘ईशा, तुम सम?ाती क्यों नहीं, अब तो कोई नौकरानी हम लोगों के घर पर काम करने के लिए भी तैयार नहीं होती. हम लोग होटल से खाना मंगा कर कब तक खाते रहेंगे. ये ढोंगीपाखंडी किसी के सगे नहीं होते. वे भला तुम्हारा क्या भला करेंगे. ईशा तुम्हारे इन तांत्रिकों के कारण मेरा सारा बिजनैस चौपट होता जा रहा है, घर भी बरबाद हो रहा है. तब तक अमित को उस और्डर की पोल पता चल चुकी थी जिस में सामान तो गया था पर पेमैंट नहीं हुई थी.

‘‘आखिर तुम क्यों नहीं सम?ा रही हो? मेरा कहना मान लो नहीं तो बहुत पछताओगी.’’ ईशा ने पति की बातों को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल कर पर्स उठा कर बाहर चल दी. अमित पत्नी को बेबस आंखों से देखता रह गया था.

जब तांत्रिक जगमोहन को यह पता लगा कि ईशा अब उसे छोड़ कर दूसरे तांत्रिक लाल बाबा के पास जाने लगी है, वह अपने अपमान और अपने धंधे के मंदा हो जाने के कारण नाराज हो उठा. उस की नजर तो शुरू से ईशा के गदबदे तन और धन पर थी, अभी तक वह उस के पैसे पर नजर गड़ाए हुए था. अब जब उसे लगा कि चिडि़या उस के हाथ से फुर्र होने वाली है तो वह उस के घर जा पहुंचा. इधर ईशा जिस तांत्रिक लाल बाबा के पास गई थी, ‘बेटी, तुम मेरी शिष्या बन जाओ. आज बहुत शुभ दिन है. आज की रात्रि शनि अमावस्या की रात्रि है. आज की रात ही महादेवी शक्तिपात करती हैं. तुम सच्ची अधिकारिणी हो. इसलिए आज देवी प्रसन्न हो कर तुम पर शक्तिपात करेंगी. इसलिए केवल आज की रात तुम्हें मेरे आश्रम में रुकना होगा.’

लाल बाबा ने उसे कोई आसव, एक छोटे से पात्र में पवित्र जल कह कर दिया. उसे पीते ही उसे चक्कर सा आने लगा. वह तांत्रिक की वासनायुक्त ललचाई आंखों को देख डर गई थी. वह घबरा कर तेजी से उठ कर बाहर जाने की कोशिश करने लगी तो उसे चक्कर सा आने लगा. किसी तरह वह अपने को संभालती हुई बाहर आई. उसे सामने सड़क पर एक औटो दिखा. वह उस पर बैठ गई तो उसे पति की बात याद आई कि ये ढोंगी तांत्रिक ठग होते हैं लेकिन उस पर नशा छाता जा रहा था और उसे पता ही नहीं लगा और वह औटो से गिर कर बेहोश हो गई थी.

चूंकि वह एक प्रतिष्ठित परिवार की महिला थी इसलिए लोग उसे पहचानते थे. कुछ लोग उसे रिक्शे में बैठा कर उस के घर में आ कर छोड़ गए थे. वह होश में आ चुकी थी लेकिन अपने घर पर जगमोहन को बैठा देख कर एक पल को परेशान हो उठी लेकिन फिर सामान्य दिखने के लिए वह स्वयं को संभाल कर जगमोहन को प्रणाम कर के वहीं उन के पास बैठ गई.

‘‘देवी, तुम ने तो साक्षात भैरवी का रूप धारण कर लिया है.’’ आज जगमोहन की आंखों के लाल डोरे जाने क्यों उस के मन में भय उत्पन्न कर रहे थे.

‘‘देवी, तुम ने मु?ा पर अविश्वास किया और लाल बाबा के पास गईं. देवी, तुम ने अच्छा नहीं किया परंतु क्षमा, देवी क्षमा. मैं तुम्हें क्षमा करता हूं,’’ कह कर वह कुछ मंत्र जोरजोर से बोलते हुए भभूत निकाल कर बोले, ‘‘देवी मुंह खोलो.’’

उस समय ईशा अपने होशोहवास में नहीं थी. उस ने रोबोट की तरह आज्ञा मानते हुए अपना मुंह खोल दिया था. वह भभूत के नाम पर कोई नशीला पदार्थ था. वह पागलों की तरह जगमोहन का अनुसरण करती हुई उस के पीछेपीछे चल दी थी. वह तो अपना होश ही खो चुकी थी. अमित ने ईशा को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन ईशा तो अपने होश में ही नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे वह तो अपना दिमागी संतुलन ही खो चुकी थी. वह जगमोहन के पीछेपीछे चलती चली गई थी. बच्चे बिलख रहे थे लेकिन उस ने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा था.

अमित का कारोबार बरबाद हो चुका था क्योंकि ईशा के साथसाथ वह भी घर में होने वाली पूजापाठ और अनुष्ठानों के नाम पर अपना समय और पैसा दोनों खर्च करता चला जा रहा था. वह लंबे समय से शोरूम को मैनेजर के हवाले कर के तांत्रिकों और बाबा लोगों पर अनापशनाप खर्च कर रहा था. इधर शोरूम के कर्मचारियों की लूट, उधर तंत्रमंत्र के अनुष्ठानों के कारण उस का खजाना खाली हो चुका था. जो बच्चे शहर के नामी स्कूलों में पढ़ते थे, वे अब सरकारी स्कूलों में जाने लगे थे.

आखिर, सुमित और दिशा ने अमित के शोरूम के लिए फाइनैंस कर के सहारा दिया, बच्चों का एडमिशन अच्छे स्कूल में करवा दिया. अमित ने ईशा को ढूंढ़ने के लिए पुलिस में रिपोर्ट कर दी. वह ढूंढ़ने की खुद भी कोशिश करता रहा लेकिन वह असफल रहा था. कुछ दिनों बाद पुलिस की सूचना पर ट्रेन की पटरी पर कटी हुई लावारिस लाश की पहचान करने के लिए अमित को बुलाया गया. न चाहते हुए भी उस ने लाश देखी तो हनीमून पर प्यार से बनवाया टैटू देख उस की आंखें बरस पड़ी थीं-

ईशा, तुम्हारी डाह ने तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ा. Hindi Stories

 

केरल की राजनीति में बिहार आरजेडी का खाता खुलने के मायने

Kerala Politics: केरल विधानसभा चुनाव में आरजेडी का खाता खुलना राजनीतिक धुरंधरों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. केरल में आरजेडी का खाता खोलने वाले व्यक्ति का नाम है पी के प्रवीन. सवाल यह है कि जो पार्टी बिहार में पकड़ नहीं बना पाई वो केरल में यह कमाल कैसे कर गई? बिहार की पार्टी को केरल में जनाधार कैसे मिला?

पी के प्रवीन, कन्नूर जिले की कूथुपरम्बा सीट से आरजेडी के विधायक बने हैं. 2026 केरल विधानसभा चुनाव में इन्होंने 70,448 वोट पा कर आईयूएमएल की जयंती राजन को 1,286 वोट से हराया. केरल में आरजेडी की यह पहली जीत है. पी के प्रवीन केरल की पानूर नगरपालिका के पार्षद रह चुके हैं और पानूर पंचायत के 2 बार सदस्य रहे. वे 4 साल युवा जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष रहे. 2021 में ये सीट एलजेडी के के पी मोहनन ने जीती थी. 2023 में एलजेडी का आरजेडी में विलय हो गया, इसलिए अब वे आरजेडी के टिकट पर लड़े और जीत दर्ज की.

सच्चाई तो यह है कि आरजेडी केरल में अकेले कुछ नहीं है. वह सीपीएम की अगुआई वाले एलडीएफ गठबंधन का हिस्सा है. केरल में लोग सीपीएम को वोट देते हैं. आरजेडी को यह सीट एलडीएफ के कोटे से मिली है. कूथुपरम्बा कन्नूर में है. यहां आईयूएमएल बनाम एलडीएफ की सीधी लड़ाई थी. बीजेपी 22,195 वोट ले कर तीसरे नंबर पर रही. मुसलिम और पिछड़ा वोट एलडीएफ के साथ गया. आरजेडी का समाजवादी टैग और स्थानीय उम्मीदवार पी के प्रवीन की ईमानदार छवि की वजह से आरजेडी जीती.

केरल की जनता बीजेपी के खिलाफ वोट देती है तो एलडीएफ का जो भी उम्मीदवार हो जनता उसे जिता देती है. असल में जनाधार आरजेडी का नहीं, एलडीएफ का है. एलडीएफ में सीट बंटवारा होता है. सीपीएम बड़ी पार्टी है, वह आरजेडी, एनसीपी जैसी छोटी पार्टियों को एकदो सीटें देती है ताकि गठबंधन बड़ा दिखे. आरजेडी केरल में एम वी श्रेयम्स कुमार जैसे नेताओं के दम पर है जो पहले एलजेडी में थे.

केरल में 55 फीसदी हिंदू, 27 प्रतिशत मुसलिम और 18 फीसदी ईसाई मिलजुल कर रहते हैं. यहां लव जिहाद, गौरक्षा और मंदिरमसजिद जैसे मुद्दे नहीं चलते. केरल में देश में सब से ज्यादा 96 फीसदी साक्षरता है. यहां लोग व्हाट्सऐप फौरवर्ड से नहीं बल्कि अपने विवेक से वोट देते हैं और सैक्युलर मूल्यों को बखूबी समझते हैं. केरल के पास पहले से 2 मजबूत सैक्युलर गठबंधन हैं, इसलिए यहां बीजेपी को हिंदू हृदय सम्राट बनने की जगह नहीं मिल पाती.

केरल में आरजेडी का खाता एलडीएफ की बैसाखी पर खुला है. यह तेजस्वी यादव की जीत नहीं बल्कि केरल मौडल की जीत है जहां धर्म से ऊपर इंसान और विकास रखा जाता है. Kerala Politics

गट हैल्थ के लिए 3 एफ का नियम अपनाएं

Fiber Rich Diet: शरीर के 90 फीसदी हैप्पी हार्मोंस हमारे पाचनतंत्र से ही बनते हैं. क्या आप ने महसूस किया है कि जिस दिन आप का पेट ठीक नहीं होता उस दिन हमें अच्छा महसूस नहीं होता. यदि लंबे समय तक पेट में कब्ज की शिकायत हो या पाचन से संबंधित परेशानियां आ रही हों तो इस का असर हमारे मूड, स्किन और एनर्जी लैवल पर भी पड़ता है. इस के लिए अपनी गट हैल्थ का ध्यान रखना आवश्यक है.

जब हमारी गट हैल्थ खराब होती है तो इस से डिप्रैशन, चिंता और मूडस्ंिवग जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं क्योंकि पाचनतंत्र और दिमाग का सीधा कनैक्शन होता है जिसे ब्रेन गट कनैक्शन कहा जाता है. इस में गट में मौजूद माइक्रोबायोम एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जब इन का संतुलन बिगड़ता है तब मन पर भी इस का असर पड़ता है.

शरीर को हैल्दी रखने के लिए गट हैल्थ यानी आंतों की सेहत का खयाल रखना बेहद जरूरी है. हमारी आंतों (गट) में करोड़ों बैक्टीरिया होते हैं, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहा जाता है. यदि हमारी गट हैल्थ अच्छी होती है तो खाना अच्छे से पच जाता है और पोषक तत्त्व शरीर में सही तरह से एब्जौर्ब हो जाते हैं. दूसरी ओर जब हमारे गट में बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ता है तो इसे डिस्बायोसिस कहते हैं, जिस से पेट खराब होना और मैंटल हैल्थ (तनाव व चिंता) से जुड़ी समस्याएं पैदा होने लगती हैं. यानी, हमारी डाइट और लाइफस्टाइल की छोटीछोटी आदतों का असर हमारे गट हैल्थ पर पड़ता है. गट के बैक्टीरिया हमारी भावनाओं और तनाव को प्रभावित कर सकते हैं जिस की वजह से एंग्जाइटी और डिप्रैशन जैसी मैंटल परेशानियां पैदा हो सकती हैं. सो, अच्छी गट हैल्थ के लिए 3 एफ का नियम बनाएं. 3 एफ का यहां मतलब है- फाइबर युक्त डाइट, फर्मेन्टेड फूड और फास्ंिटग.

फाइबर युक्त डाइट

फाइबर अच्छे पाचन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है. यह हमारी पाचनक्रिया के सुचारुरूप से काम करने के लिए बहुत आवश्यक होता है. फाइबर सिर्फ पाचन में ही नहीं बल्कि शरीर को कई बीमारियों से बचाने में भी मदद करता है. शरीर में फाइबर पेट के अंदर मौजूद गुड बैक्टीरिया को पोषण देने से ले कर आंतों को साफ रखने और मेटाबौलिज्म को बढ़ाने में मदद करता है.

फाइबर कोलैस्ट्रौल को कम कर दिल की सेहत को बेहतर रखने में मदद करता है. फाइबर ब्लड शुगर को अचानक से बढ़ने नहीं देता, जिस वजह से डायबिटीज का खतरा कम होता है. यह वजन कम करने में भी मदद करता है, जिस से मोटापे से बचाव किया जा सकता है. इस के अलावा कब्ज जैसी समस्या से राहत दिलाने में भी फाइबर आप की मदद करता है. जानें कि फाइबर युक्त चीजें खाने में कैसे शामिल करें.

द्य दालें, काली बीन्स, छोले, राजमा और अन्य फलियां फाइबर का भंडार होती है.

द्य सब्जियां फाइबर का बेहतरीन स्रोत होती हैं. कुछ विशेष रूप से अच्छी उच्च फाइबर वाली सब्जियां ये हैं- ब्रोकली, गाजर, चुकंदर, शकरकंद आदि.

द्य अधिकांश फलों में फाइबर होता है. केले फाइबर का एक बड़ा स्रोत है और यह पोटैशियम जैसे आवश्यक विटामिन व खनिज भी प्रदान करता है लेकिन कुछ और फल विशेष रूप से अच्छे स्रोत हैं- सेब, चीकू, नाशपाती, बेरीज, ब्लैकबेरी और स्ट्रोबेरी. इन्हें दही या स्मूदी में आसानी से मिलाया जा सकता है. फाइबर से भरपूर इन फलों को छिलके सहित खाना सब से अच्छा होता है, क्योंकि छिलकों में फाइबर की मात्रा काफी होती है.

द्य एवोकाडो में फाइबर और स्वस्थ वसा प्रचुर मात्रा में होता है, जिस से यह सलाद, टोस्ट और स्मूदी के लिए एक बढि़या विकल्प है.

द्य साबुत अनाज आप के आहार में फाइबर जोड़ने का एक शानदार तरीका है. क्विनोआ, दलिया उच्च फाइबर वाले अनाजों में से एक हैं जो पूर्ण प्रोटीनयुक्त भी हैं.

द्य ओट्स अपने फाइबर तत्त्व के लिए जाना जाता है. नाश्ते के लिए यह एक लोकप्रिय विकल्प है. इस का इस्तेमाल ओटमील, बेक्ड सामान या स्मूदी में भी किया जा सकता है.

द्य ब्राउन चावल और जौ अनाजों में फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है और इन्हें

विभिन्न प्रकार के व्यंजनों, जैसे स्टर-फ्राई से ले कर सूप तक, के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

द्य चिया सीड्स में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है और इसे दही या दूध में, किसी जूस के ऊपर स्प्रिंकल कर सकते हैं. इसे स्मूदी में मिलाया जा सकता है या चिया पुडिंग बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

द्य मेवे और बीज फाइबर के साथसाथ स्वस्थ वसा और प्रोटीन के भी अच्छे स्रोत हैं.

द्य अलसी सीड्स उच्च फाइबर वाले बीज हैं और इन्हें अनाज, सलाद या स्मूदी में जोड़ा जा सकता है.

द्य बादाम और पिस्ता जैसे उच्च फाइबर वाले मेवे नाश्ते के लिए बहुत अच्छे होते हैं. अतिरिक्त पोषण के लिए इन्हें व्यंजनों में भी मिलाया जा सकता है.

फर्मेन्टेड फूड 

ऐसा भोजन जिसे पकाने के लिए चूल्हा या तेज तापमान नहीं, बल्कि खमीरी प्रक्रिया से गुजारा जाता है. जो खाद्य पदार्थ खमीर प्रक्रिया से गुजरते हैं, उन्हें फर्मेंटेड फूड कहा जाता है. फर्मेंटेशन के प्रोसैस में खाने में हैल्दी बैक्टीरिया पनपते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं. बता दें कि इन बैक्टीरिया को प्रोबायोटिक्स भी कहा जाता है जो गट हैल्थ और पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी बेहद फायदेमंद होते हैं.

फर्मेंटेड फूड गट हैल्थ के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं क्योंकि इन में प्रोबायोटिक्स होते हैं, जो अच्छे बैक्टीरिया होते हैं जो पाचन में सुधार करते हैं और इम्युनिटी को मजबूत करते हैं, जैसे इडली, डोसा, दही, याकुल्ट, अचार, ढोकला या खमीरी रोटी आदि.

फास्टिंग

फास्टिंग का अर्थ है अपने पेट को कुछ समय के लिए खाने से आराम देना. बेहतर पाचन के लिए डिनर और नाश्ते के बीच 12-14 घंटे का फास्ट जरूरी है. लगातार खाते रहने से पाचनतंत्र को आराम नहीं मिलता. यदि आप बेहतर डाइजेशन चाहते हैं तो फास्ंिटग एक बेहतर विकल्प है.

फास्टिंग के समय भारी और गरिष्ठ फूड लेने से बचें. हलका और सुपाच्य भोजन करें, जैसे वैजिटेबल सूप, फ्रूट्स, सलाद आदि. फास्ंिटग करने से पेट से जुड़ी समस्याओं में आराम मिलता है. अगर आप लंबे समय से पाचन की समस्या से परेशान हैं तो फास्ंिटग करने से आप की यह समस्या कम हो सकती है.

फास्टिंग के फायदे 

द्य रात का भोजन जल्दी करें, इस से पाचनतंत्र बेहतर होता है.

द्य वजन नियंत्रित रहता है.

द्य यह तनाव और चिंता को कम करने में भी मदद करता है.

द्य फास्टिंग से शरीर का मेटाबौलिज्म स्लो होता है, जिस से शरीर को सफाई करने का समय मिलता है और शरीर से विषैले पदार्थ दूर होते हैं.

द्य शरीर फिजिकली और मैंटली दोनों तरीकों से रिलैक्स होता है.

यदि आप किसी बीमारी से पीडि़त हैं और आप का इलाज चल रहा है तो अपने डाक्टर से परामर्श करने के बाद ही फास्ंिटग करें. धार्मिक उपवास को फास्ंिटग न समझें क्योंकि उस के बाद जम कर तला खाना अमूमन खा लिया जाता है. धार्मिक उपवास स्वास्थ्य की दृष्टि से नहीं बनाए गए हैं. ये गृहस्थों को अपना खाना पुजारियों को देने के लिए बनाए गए हैं.

अच्छी गट हैल्थ पाएं

खाने में शुगर की मात्रा कम करें : खाने में अधिक शुगर होने की वजह से गट में मौजूद गुड बैक्टीरिया खत्म होने लगते हैं, जिस वजह से हानिकारक बैक्टीरिया की मात्रा बढ़ने लगती हैं. सो, शुगर कम खाएं.

तनाव कम करें : तनाव होते ही सब से पहला प्रभाव हमारी गट हैल्थ पर पड़ता है. कई बार पेट अच्छे से साफ नहीं होता और कब्ज या कौन्स्टिपेशन की समस्या हो जाती है. इसलिए यह सम?ा जा सकता है कि मैंटल हैल्थ और गट हैल्थ के बीच गहरा रिश्ता है. तनाव अधिक होने की वजह से गट माइक्रोबायोम बिगड़ सकता है. स्ट्रैस कम करने के लिए ऐक्सरसाइज, डीप ब्रीदिंग, वाकिंग, रनिंग, जौगिंग आदि की मदद लें. ओवरईटिंग न करें : रात के समय में आप ओवरईटिंग न करें. इस से आप की पाचनक्रिया पर दबाव पड़ता है और आप को पेट संबंधी समस्या हो सकती है.

खाने में करें शामिल : खाने में हैल्दी फूड आइटम्स, जैसे हरी सब्जियां, साबुत अनाज, फल, दूध, दही आदि को शामिल करें. ज्यादा नमक, तेल और चीनी वाले खाने से भी बचें. जंक फूड या प्रोसैस्ड फूड हमारे गट के माइक्रोबायोम को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिस से पाचन में परेशानी हो सकती है.

प्रोबायोटिक खाएं : प्रोबायोटिक्स गट में मौजूद माइक्रोब्स की हैल्दी ग्रोथ के लिए जरूरी होते हैं, इसलिए अपनी डाइट में प्रोबायोटिक्स से भरपूर खाना, जैसे दही रोज खाएं. इस से आप के गट बैक्टीरिया हैल्दी रहेंगे. ऐक्सरसाइज करें : ऐक्सरसाइज करने से आप का पाचनतंत्र और मैंटल हैल्थ दोनों ठीक रहते हैं, इसलिए रोज 30 से 40 मिनट ऐक्सरसाइज करें. इस से आप की सेहत को काफी फायदा होगा और आप का मूड भी बेहतर रहेगा. Fiber Rich Diet

 

एक रिक्त कोना – क्या सुशांत का जीवन सूना ही रह गया

सरिता, बीस साल पहले,  मई (प्रथम) 2006

सुशांत मेरे सामने बैठे अपना अतीत बयान कर रहे थे :

Mother Son Relationship: ‘‘जीवन में कुछ भी तो चाहने से नहीं होता है. इंसान सोचता कुछ है, होता कुछ और है. बचपन से ले कर जवानी तक मैं यही सोचता रहा. आज ठीक होगा, कल ठीक होगा मगर कुछ भी ठीक नहीं हुआ. किसी ने मेरी नहीं सुनी. सभी अपनेअपने रास्ते चले गए. मां अपने रास्ते, पिता अपने रास्ते, भाई अपने रास्ते और मैं खड़ा हूं यहां अकेला सब के रास्तों पर नजर गड़ाए. कोई पीछे मुड़ कर देखता ही नहीं. मैं क्या करूं?’’

वास्तव में कल उन का कहां था, कल तो उन के पिता का था. उन की मां का था. वैसे, कल उस के पिता का भी कहां था, कल तो था उस की दादी का.

विधवा दादी की मां से कभी नहीं बनी और पिता ने मां को तलाक दे दिया. जिस दादी ने अकेले रह जाने पर पिता को पाला था, क्या बुढ़ापे में मां से हाथ छुड़ा लेते?

आज उन का घर श्मशान हो गया. घर में सिर्फ रात गुजारने आते हैं वह और उन के पिता, बस.

‘‘मेरा तो घर जाने का मन ही नहीं होता, कोई बोलने वाला नहीं. पानी पीना चाहो तो खुद पिओ. चाय को जी चाहे तो रसोई में जा कर खुद बना लो. कुछ खाना चाहो तो बिस्कुट का पैकेट, नमकीन का पैकेट, कोई चिप्स, कोई दाल, भुजिया खा लो.

‘‘मेरे दोस्तों के घर जाओ तो सामने उन की मां हाथ में गरमगरम चाय के साथ खाने को कुछ न कुछ जरूर ले कर चली आती हैं. किसी की मां को देखता हूं तो गलती से अपनी मां की याद आने लगती है.’’

‘‘गलती से क्यों? मां को याद करना क्या गलत है?’’

‘‘गलत ही होगा. ठीक होता तो हम दोनों भाई कभी तो पापा से पूछते कि हमारी मां कहां हैं. मु?ो तो मां की सूरत भी ठीक से याद नहीं है, कैसी थीं वे, कैसी सूरत थी. मन का कोना सदा से रिक्त है. क्या मुझे यह जानने का अधिकार नहीं कि मेरी मां कैसी थीं जिन के शरीर का मैं एक हिस्सा हूं?

‘‘कितनी मजबूर हो गई होंगी मां जब उन्होंने घर छोड़ा होगा. दादी और पापा ने कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा होगा उन के लिए वरना 2-2 बेटों को यों छोड़ कर कभी नहीं जातीं.’’

‘‘आप की भाभी भी तो हैं. उन्होंने घर क्यों छोड़ दिया?’’

‘‘वे भी साथ नहीं रहना चाहती थीं. उन का दम घुटता था हमारे साथ. वे आजाद रहना चाहती थीं, इसलिए शादी के कुछ समय बाद ही अलग हो गईं. कभीकभी तो मु?ो लगता है कि मेरा घर ही शापित है. शायद, मेरी मां ने ही जातेजाते श्राप दिया होगा.’’

‘‘नहीं, कोई मां अपनी संतान को श्राप नहीं देती.’’

‘‘आप कैसे कह सकती हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरे पेशे में मनुष्य की मानसिकता का गहन अध्ययन कराया जाता है. बेटा मां का गला काट सकता है लेकिन मां मरती मर जाए, बच्चे को कभी श्राप नहीं देती. यह अलग बात है कि बेटा बहुत बुरा हो तो कोई दुआ भी देने को उस के हाथ न उठें.’’

‘‘मैं नहीं मानता. रोज अखबारों में आप पढ़ती नहीं कि आजकल मां भी मां कहां रह गई हैं.’’

‘‘आप खूनी लोगों की बात छोड़ दीजिए न, जो लोग अपराधी स्वभाव के होते हैं, वे तो बस अपराधी होते हैं. वे न मां होते हैं न पिता होते हैं. शराफत के दायरे से बाहर के लोग हमारे दायरे में नहीं आते. हमारा दायरा सामान्य है, हम आम लोग हैं. हमारी अपेक्षाएं, हमारी इच्छाएं साधारण हैं.’’

बेहद गौर से वे मेरा चेहरा पढ़ते रहे. कुछ चुभ सा गया. जब कुछ अच्छा सम?ाती हूं तो कुछ रुक सा जाते हैं. उन के भाव, उन के चेहरे की रेखाएं फैलती सी लगती हैं मानो कुछ ऐसा सुना जो सुनना चाहते थे.

आंखों में आंसू आ रहे थे सुशांत की.

‘‘मुझे यह सोच कर बहुत

तकलीफ होती है कि मेरी

मां जिंदा हैं और मेरे पास नहीं हैं. वे अब किसी और की पत्नी हैं. मैं मिलना चाह कर भी उन से नहीं मिल सकता. पापा से चोरीचोरी मैं ने और भाई ने उन्हें तलाश किया था. हम दोनों मां के घर तक भी पहुंच गए थे लेकिन मां हो कर भी उन्होंने हमें लौटा दिया था. सामने पा कर भी उन्होंने हमें छुआ तक नहीं था और आप कहती हैं कि मां मरती मर जाए पर अपनी संतान को…’’

‘‘अच्छा ही तो किया आप की मां ने. बेचारी, अपने नए परिवार के सामने आप को गले लगा लेतीं तो क्या अपने परिवार के सामने एक प्रश्नचिह्न न खड़ा कर देतीं. कौन जाने आप के पापा की तरह उन्होंने भी इस विषय को पूरी तरह भुला दिया हो. क्या आप चाहते हैं कि वे एक बार फिर से उजड़ जाएं?’’ सुशांत अवाक मेरा मुंह देखते रह गए थे.

‘‘आप बचपना छोड़ दीजिए. जो छूट गया उसे जाने दीजिए. कम से कम आप तो अपनी मां के साथ अन्याय

न कीजिए.’’

मेरी डांट सुन कर सुशांत की आंखों में उमड़ता नमकीन पानी वहीं रुक गया था.

‘‘इंसान के जीवन में सदा वही नहीं होता जो होना चाहिए. याद रखिए, जीवन में मात्र 10 प्रतिशत ऐसा होता है जो संयोग द्वारा निर्धारित किया जाता है, बाकी 90 प्रतिशत तो वही होता है जिस का निर्धारण व्यक्ति स्वयं करता है. अपना कल्याण या अपना सर्वनाश व्यक्ति अपने ही अच्छे या बुरे फैसले द्वारा करता है.

‘‘आप की मां ने सम?ादारी की जो आप को पहचाना नहीं. उन्हें अपना घर बचाना चाहिए जो उन के पास है. आप को वे गले क्यों लगातीं जबकि आप उन के पास हैं ही नहीं.

‘‘देखिए, आप अपनी मां का पीछा छोड़ दीजिए. यही मान लीजिए कि वे इस संसार में ही नहीं हैं.’’

‘‘कैसे मान लूं, जब मैं ने उन का दाहसंस्कार किया ही नहीं.’’

‘‘आप के पापा ने तो तलाक दे कर रिश्ते का दाहसंस्कार कर दिया था न. फिर अब आप क्यों उस राख को चौराहे का मजाक बनाना चाहते हैं? आप सम?ाते क्यों नहीं कि जो भी आप कर रहे हैं उस से किसी का भी भला होने वाला नहीं है.’’

अपनी जबान की तल्खी का अंदाज मुझे तब हुआ जब सुशांत बिना कुछ कहे उठ कर चले गए. जातेजाते उन्होंने यह भी नहीं बताया कि अब कब मिलेंगे वे. शायद अब कभी नहीं मिलेंगे.

सुशांत पर तरस आ रहा था मु?ो क्योंकि उन से मेरे रिश्ते की बात चल रही थी. वे मुझ से मिलने मेरे क्लीनिक में आए थे. अखबार में ही उन का विज्ञापन पढ़ा था मेरे पिताजी ने.

‘‘सुशांत तुम्हें कैसा लगा?’’ मेरे पिता ने मु?ा से पूछा.

‘‘बिलकुल वैसा ही जैसा कि एक टूटे परिवार का बच्चा होता है.’’

पिताजी थोड़ी देर तक मेरा चेहरा पढ़ते रहे, फिर कहने लगे, ‘‘सोच रहा हूं कि बात आगे बढ़ाऊं या नहीं.’’

पिताजी मेरी सुरक्षा को ले कर परेशान थे, बिलकुल वैसे जैसे उन्हें होना चाहिए था. सुशांत के पिता मेरे पिता को पसंद थे. संयोग से दोनों एक ही विभाग में कार्य करते थे, उसी नाते सुशांत 1-2 बार मुझे मेरे क्लीनिक में ही मिलने चले आए थे और अपना रिक्त कोना दिखा बैठे थे.

मैं सुशांत को मात्र एक मरीज मान कर भूल सी गई थी. उस दिन मरीज कम थे, सो घर जल्दी आ गई. फुरसत थी और पिताजी भी आने वाले थे इसलिए सोचा, क्यों न आज चाय के साथ गरमागरम पकौडि़यां और सूजी का हलवा बना लूं.

5 बजे बाहर का दरवाजा खुला और सामने सुशांत को पा कर मैं स्तब्ध रह गई.

‘‘आज आप क्लीनिक से जल्दी आ गईं?’’ दरवाजे पर खड़े हो सुशांत बोले, ‘‘आप के पिताजी मेरे पिताजी के पास गए हैं और मैं उन की इजाजत से ही घर आया हूं. कुछ बुरा तो नहीं किया?’’

‘‘जी,’’ मैं कुछ हैरान सी इतना ही कह पाई थी कि चेहरे पर नारीसुलभ संकोच तैर आया था.

अंदर आने के मेरे आग्रह पर सुशांत दो कदम ही आगे बढे़ थे कि फिर कुछ सोच कर वहीं रुक गए जहां खड़े थे.

‘‘आप के घर में घर जैसी खुशबू है, प्यारीप्यारी सी, मीठीमीठी सी जो मेरे घर में कभी नहीं होती है.’’

‘‘आप उस दिन मेरी बातें सुन कर नाराज हो गए होंगे, यही सोच कर मैं ने भी फोन नहीं किया,’’ अपनी सफाई में मुझे कुछ तो कहना था न.

‘‘नहीं. नाराजगी कैसी. आप ने तो दिशा दी है मुझे. मेरी भटकन को एक ठहराव दिया है. आप ने अच्छे से समझ दिया वरना मैं तो बस भटकता ही रहता न. चलिए, छोडि़ए उन बातों को. मैं सीधा औफिस से आ रहा हूं, कुछ खाने को मिलेगा.’’

पता नहीं क्यों, मन भर आया मेरा. एक लंबाचौड़ा पुरुष जो हर महीने लगभग 30 हजार रुपए कमाता है, जिस का अपना घर है, बेघर सा लगता है, मानो सदियों से लावारिस हो.

पापा का और मेरा गरमागरम नाश्ता मेज पर रखा था. अपने दोस्तों के घर जा कर उन की मां के हाथों में छिपी ममता को तरसी आंखों से देखने वाला पुरुष मुझ में भी शायद वही सब तलाश रहा था.

‘‘आइए, बैठिए, मैं आप के लिए चाय लाती हूं. आप पहले हाथमुंह धोना चाहेंगे, मैं आप के लिए तौलिया लाऊं?’’

मैं हतप्रभ सी थी. क्या कहूं और क्या न कहूं. बालक की तरह असहाय से लग रहे थे सुशांत मुझे. मैं ने तौलिया पकड़ा दिया, तब एकटक निहारते से लगे.

मैं ने नाश्ता प्लेट में सजा कर सामने रखा. खाया नहीं बस, देखते रहे. मात्र चम्मच चलाते रहे प्लेट में.

‘‘आप लीजिए न,’’ मैं ने खाने का आग्रह किया.

वे मेरी ओर देख कर कहने लगे, ‘‘कल एक डिपार्टमैंटल स्टोर में मेरी मां मिल गईं. वे अकेली थीं, इसलिए उन्होंने मुझे पुकार लिया. उन्होंने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ लिया था लेकिन मैं ने अपना हाथ छुड़ा लिया.’’ सुशांत की बातें सुन कर मेरी तो सांस रुक सी गई. बरसों बाद मां का स्पर्श कैसा सुखद लगा होगा सुशांत को.

सहसा सुशांत दोनों हाथों में चेहरा छिपा कर बच्चे की तरह रो पड़े. मैं देर तक उन्हें देखती रही. फिर धीरे से सुशांत के कंधे पर हाथ रखा. सहलाती भी रही. काफी समय लग गया उन्हें सहज होने में.

‘‘मैं ने ठीक किया न?’’ मेरा हाथ पकड़ कर सुशांत बोले, ‘‘आप ने कहा था न कि मुझे अपनी मां को जीने देना चाहिए, इसलिए मैं अपना हाथ खींच कर चला आया.’’

क्या कहती मैं? रो पड़ी थी मैं भी. सुशांत मेरा हाथ पकड़े रो रहे थे और मैं उन की पीड़ा, उन की मजबूरी देख कर रो रही थी. हम दोनों ही रो रहे थे. कोई रिश्ता नहीं था हम में, फिर भी हम पास बैठे एकदूसरे की पीड़ा को जी रहे थे. सहसा मेरे सिर पर सुशांत का हाथ आया और थपक दिया.

‘‘तुम बहुत अच्छी हो. जिस दिन से तुम से मिला हूं, ऐसा लगता है कोई अपना मिल गया है. 10 दिनों के लिए शहर से बाहर गया था, इसलिए मिलने नहीं आ पाया. मैं टूटाफूटा इंसान हूं. स्वीकार कर जोड़ना चाहोगी? मेरे घर को घर बना सकोगी? बस, मैं शांति व सुकून से जीना चाहता हूं. क्या तुम भी मेरे साथ जीना चाहोगी?’’

डबडबाई आंखों से मुझे देख रहे थे सुशांत. एक रिश्ते की डोर को तोड़ कर दुखी भी थे और आहत भी. मु?ा में सुशांत क्याक्या तलाश रहे होंगे, यह मैं भलीभांति महसूस कर सकती थी. अनायास ही मेरा हाथ उठा और दूसरे ही पल सुशांत मेरी बांहों में समाए फिर उसी पीड़ा में बह गए जिसे मां से हाथ छुड़ाते समय जिया था.

‘‘मैं अपनी मां से हाथ छुड़ा कर चला आया? मैं ने अच्छा किया न. शुभा, मैं ने अच्छा किया न?’’ वे बारबार पूछ रहे थे.

‘‘हां, आप ने बहुत अच्छा किया. अब वे भी पीछे मुड़ कर देखने से बच जाएंगी. बहुत अच्छा किया आप ने.’’

एक तड़पतेबिलखते इंसान को किसी तरह संभाला मैं ने. तनिक चेते तब खुद ही अपने को मुझ से अलग कर लिया. शीशे की तरह पारदर्शी सुशांत का चरित्र मेरे सामने था. कैसे एक साफसुथरे सचरित्र इंसान को यों ही अपने जीवन से चला जाने देती. इसलिए मैं ने सुशांत की बांह पकड़ ली थी. साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछने का प्रयास किया तो सहसा सुशांत ने मेरा हाथ पकड़ लिया और देर तक मेरा चेहरा निहारते रहे. रोतेरोते मुसकराने लगे. समीप आ कर धीरे से गरदन ?ाकाई और मेरे ललाट पर एक प्रगाढ़ चुंबन अंकित कर दिया. फिर अपने ही हाथों से अपने आंसू पोंछ लिए.

अपने लिए मैं ने सुशांत को चुन लिया. उन्हें भावनात्मक सहारा दे पाऊंगी, यह विश्वास है मुझे. लेकिन उन के मन का वह रिक्त स्थान कभी भर पाऊंगी, ऐसा विश्वास नहीं क्योंकि संतान के मन में मां का स्थान तो सदा सुरक्षित होता है न, जिसे मां के सिवा कोई नहीं भर सकता. Mother Son Relationship

 

फैक्ट्रियों में मजदूरी करेंगे रोबोट

Humanoid Robots China: चीन की टैक कंपनी शाओमी अब स्मार्टफोन और इलैक्ट्रिक कार के बाद एक और बड़ी टैक्नोलौजी रेस में उतर चुकी है. कंपनी का दावा है कि आने वाले कुछ सालों में चीन की फैक्ट्रियों में इंसानों की जगह ह्यूमनौइड रोबोट बड़ी संख्या में काम करते दिखाई देंगे. कंपनी अगले 5 साल में अपने प्रोडक्शन प्लांट्स में बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट तैनात करने की योजना बना रही है. कई फैक्ट्रियों में ह्यूमनौइड रोबोट काम करते देखे भी जा रहे हैं. आने वाले समय में ये रोबोट्स मजदूर वर्ग को किनारे कर उन का सारा काम अपने कंधों पर ले लेंगे.

शाओमी ने हाल ही में अपनी औटोमोबाइल फैक्ट्री में ह्यूमनौइड रोबोट का ट्रायल शुरू किया है. इस टैस्ट के दौरान रोबोट ने बिना किसी इंसानी मदद के करीब 3 घंटे तक लगातार काम किया और कार असैंबली से जुड़े कई काम सफलतापूर्वक पूरे किए. इन रोबोट्स को कार के फ्लोर पर स्क्रू लगाना और छोटेछोटे पार्ट्स फिट करने जैसे काम दिए गए थे, जिन में करीब

90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर देखने को मिली. शाओमी के मुताबिक इन रोबोट्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे फैक्ट्री के तेज प्रोडक्शन सिस्टम के साथ तालमेल बिठा सकें. कंपनी की कार फैक्ट्री में एक गाड़ी बनाने में लगभग 76 सैकंड लगते हैं. इन रोबोट को उसी गति के साथ काम करने के लिए ट्रैंड किया जा रहा है.

इन रोबोट्स के पीछे शाओमी का अपना एआई सिस्टम और रोबोटिक्स प्लेटफौर्म काम करता है. कंपनी ने इस के लिए विजन-लैंग्वेज-ऐक्शन मौडल और मल्टी मौडल एआई टैक्नोलौजी का इस्तेमाल किया है. इस से रोबोट न सिर्फ चीजों को पहचान सकता है बल्कि यह भी समझ सकता है कि उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है. इसी वजह से रोबोट असैंबली लाइन में छोटेछोटे जटिल काम भी कर पा रहा है.

शाओमी पहले कंट्रोल्ड माहौल वाले इंडस्ट्रियल प्लांट में रोबोट को ट्रैंड करेगी, ताकि वे असली दुनिया के काम सीख सकें. बाद में इसी तकनीक को घरों और सर्विस सैक्टर में इस्तेमाल करने की योजना है. चीन इस समय आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस और रोबोटिक्स को ले कर काफी आक्रामक रणनीति अपना रहा है. कई टैक कंपनियां और स्टार्टअप ह्यूमनौइड रोबोट विकसित कर रही हैं, जिन्हें मैन्युफैक्चरिंग से ले कर लौजिस्टिक्स तक के कामों में लगाया जा सकता है.

ह्यूमनौइड रोबोटों का आगमन केवल एक तकनीकी घटना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है. क्या भविष्य की फैक्ट्रियों में इंसानों के लिए जगह बचेगी या फिर उत्पादन की मशीनें इतनी ‘स्मार्ट’ हो जाएंगी कि इंसान बेकार घोषित कर दिए जाएंगे? Humanoid Robots China

 

हंगरी से सबक ले भारत

India Hungary Comparison: हंगरी की राजनीति में 13 अप्रैल, 2026 को आया बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के पुनर्जागरण का संकेत है. टिस्जा पार्टी के पीटर मग्यार की निर्णायक जीत और सत्ताधारी फिदेस्ज पार्टी के विक्टर और्बान के लंबे शासन का अंत यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र में जनता कब निर्णायक बन जाए, पता नहीं चलता. जब वह चुपचाप परिवर्तन का मन बना ले तो सब से मजबूत तानाशाही सत्ता भी टिक नहीं पाती है.

विक्टर और्बान के 16 साल लंबे शासनकाल का अंत और पीटर मग्यार की जीत ने हंगरी की राजनीति को तो पूरी तरह बदल ही दिया है, पूरे यूरोप पर भी असर डाला और भारत पर भी. जिस तरह भारी मतों से पीटर मग्यार ने चुनाव में बाजी मारी है वह यह बताने के लिए काफी है कि जनता का मूड भांपना आसान नहीं है, वह सिरआंखों पर धरी राजनीतिक पार्टी को भी सत्ता से उखाड़ कर फेंक सकती है. पीटर मग्यार की टिस्जा पार्टी ने लगभग 53.6 फीसदी वोट के साथ 138 सीटें जीत कर निर्णायक जीत हासिल की है. वहीं विक्टर और्बान की फिदेस्ज पार्टी 38 फीसदी वोटों पर ही सिमट गई है. यह रोचक सत्ता परिवर्तन हंगरी के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है. जो यह सम?ाते हैं कि विरोधी 16 साल बाद थक चुके होंगे, अब अपनी राय बदल लें.

राजनीतिक संदेश

मग्यार के पक्ष में हुआ रिकौर्ड मतदान एक राजनीतिक संदेश है. जो इस समय दुनिया के कई लोकतंत्रों में सुनाई दे रहा है. ऐसा भारत में 1977 के चुनाव में हुआ था, जब आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी सरकार को जनता ने नकार दिया था या फिर हाल के वर्षों में नेपाल में पारंपरिक दलों के खिलाफ उभरी नई राजनीति, जिस ने राजनीति के धुरंधर नेताओं को पटखनी दे कर नितांत नए और जवान चेहरे बालेन शाह को सत्ता में स्थापित कर दिया. बंगलादेश में भी यही हुआ जब शेख हसीना को धक्के मार कर भगा दिया गया. हंगरी की जनता मौजूदा शासन व्यवस्था से असंतुष्ट थी और एक नए विकल्प की तलाश में थी.

हंगरी में विक्टर और्बान ने लगातार

4 बार चुनाव जीत कर सत्ता में अपनी मजबूत पकड़ स्थापित कर ली थी. भारत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार की तरह शुरू में विक्टर और्बान ने भी विकास के नएनए नारे गढ़े, उन्नति और जनता को समृद्ध करने की योजनाएं उछाली थीं. भारत की ही तरह वहां भी सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थाओं के क्षरण और असहमति के दमन के साथ नेताओंअधिकारियों का भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी भरपूर गिरावट आई.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हंगरी पिछले कुछ वर्षों में ‘इलैक्टोरल औटोक्रेसी’ (चुनावी निरंकुशता) का उदाहरण बन गया था. जहां चुनाव होते रहे, लेकिन सत्ता का संतुलन लगातार एक तरफ झुकता गया. चुनाव दरअसल, नौटंकी बन कर रह गए थे. मीडिया का बड़ा हिस्सा गोदी मीडिया बन गया था, वह सरकार का समर्थक और उस का अंधभक्त बन गया था. न्यायपालिका पर सरकार का दबाव और हस्तक्षेप बढ़ गया था. विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता सीमित कर दी गई थी.

यह स्थिति हमें तुर्की या रूस जैसे देशों की भी याद दिलाती है और कुछ हद तक भारत को इसी आईने में देखा जा सकता है जहां लोकतांत्रिक ढांचा तो मौजूद है लेकिन उस की जड़ पर लगातार प्रहार होते रहते हैं.

लोकतंत्र की जीवंतता

हंगरी से भारत की तुलना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र केवल संविधान में लिखे शब्दों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता की सक्रियता से जीवित रहता है. पीटर मग्यार की जीत को यूरोप में उदार लोकतंत्र की वापसी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. यह उसी तरह का क्षण है जैसा पोलैंड में हाल के चुनावों में देखने को मिला, जहां जनता ने संस्थागत संतुलन की बहाली के लिए मतदान किया था.

हंगरी में सत्ता परिवर्तन केवल एक देश तक सीमित नहीं है. यूरोपीय संघ लंबे समय से हंगरी की लोकतांत्रिक स्थिति को ले कर चिंतित था. ऐसे में यह परिवर्तन यूरोपीय संघ के प्रति हंगरी के दृष्टिकोण में बदलाव का संकेत भी है.

हंगरी मध्य यूरोप का एक देश है और यह यूरोपीय संघ का सदस्य है. यूरोपीय संघ के सदस्य देश के रूप में हंगरी पर लोकतांत्रिक मानकों को बनाए रखने की जिम्मेदारी अधिक है लेकिन विक्टर और्बान सरकार ने मीडिया, न्यायपालिका और शैक्षणिक संस्थानों पर अपना प्रभाव बढ़ा कर लोकतंत्र की संस्थागत स्वतंत्रता को लगभग खत्म कर दिया था. वहां का मीडिया अपना फर्ज और सरकार से सवाल पूछने की अपनी जिम्मेदारी को भूल कर उसी तरह दिनरात सरकार के महिमामंडन में लगा रहता था जिस तरह भारत का गोदी मीडिया कर रहा है. विक्टर के 16 साल के शासन में हंगरी एक ऐसे लोकतंत्र में तबदील हो चुका था जहां बाहरी ढांचा तो लोकतंत्र सा था मगर उस की अंदरूनी जड़ क्षीण हो चुकी थी.

सत्ता का अहंकार

यूरोपीय संघ को उम्मीद है कि पीटर मग्यार की जीत का असर केवल हंगरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे यूरोप की राजनीति को प्रभावित करेगा. मग्यार ने यूरोपीय संघ के साथ संबंधों को मजबूत करने और रूस के साथ नीतियों की पुनर्समीक्षा करने का संकेत भी दिया है. इस से यह भी स्पष्ट होता है कि घरेलू राजनीति और वैश्विक कूटनीति एकदूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी होती हैं.

दूसरी तरफ विक्टर की हार यह बताती है कि लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बावजूद अगर शासन जनता की अपेक्षाओं से दूर हो जाए तो असंतोष तेजी से उभरता है जो दिखता नहीं. लोकतंत्र में जनादेश स्थायी नहीं होता, बल्कि यह निरंतर नवीनीकरण की प्रक्र्रिया है.

लोकतंत्र में सत्ता का अहंकार सब से बड़ा खतरा होता है. जब शासक यह मान बैठते हैं कि जनता का समर्थन स्थायी है, तब वे वास्तविक मुद्दों से दूर होने लगते हैं लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता धैर्यवान जरूर होती है, परंतु जब उस की सीमाएं टूटती हैं तो परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है. और सत्ता परिवर्तन केवल सरकार बदलने का मामला नहीं, बल्कि जनता द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की कोशिश होती है. India Hungary Comparison

संपत्ति के नाम पर औरत का हक सिर्फ कागजों तक क्यों

Women Property Rights India: संविधान के आर्टिकल 14 और 15 कहते हैं कि औरत और मर्द बराबर हैं. संविधान की नजर में जैंडर बेस्ड कोई भेदभाव नहीं है. 2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम ने बेटियों को जन्म से ही पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हक दिया लेकिन बराबरी का यह हक सिर्फ कानून की किताबों तक सिमट कर रह गया.

दिल्ली की रहने वाली नेहा की शादी फरीदाबाद के अशोक से 2015 में हुई थी. अशोक बिजनैसमैन थे. शादी के बाद उन्होंने काफी प्रौपर्टी बनाई. 2022 में नेहा का तलाक हुआ. तलाक के समय नेहा को एहसास हुआ कि उस के पति अशोक की कुल प्रौपर्टी में से एक भी प्रौपर्टी नेहा के नाम नहीं थी. सारी प्रौपर्टी अशोक और उस के भाइयों के नाम पर खरीदी गई थी हालांकि नेहा को कोर्ट से एलिमनी के रूप में एक करोड़ की रकम मिली. नेहा इतने भर से संतुष्ट भी हो गई लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि औरतें प्रौपर्टी से वंचित क्यों रखी जाती हैं? इस मामले में कानून क्या कहता है और स्थिति क्या है?

दरअसल, 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने से पहले पुरानी परंपराएं लागू थीं. मिताक्षरा व्यवस्था के तहत बेटियां पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं रखती थीं. परिवार की संपत्ति में सिर्फ बेटों का जन्मजात हक होता था. महिलाओं को सिर्फ सीमित अधिकार मिलते थे. औरतों के मामले में लिमिटेड स्टेट लागू था, इस के तहत औरतों को पति की संपत्ति पर रखरखाव का हक तो था लेकिन वह संपत्ति की मालकिन नहीं बन सकती थी.

1956 के कानून ने औरतों को मालिकाना हक दिया. धारा 14 के तहत कोई भी संपत्ति चाहे विरासत, गिफ्ट, खरीद या मेहनत से मिली हो अगर वह महिला के कब्जे में है तो वह उस संपत्ति की मालकिन हो गई. पहले की लिमिटेड एस्टेट वाली मियाद खत्म हो गई. 1956 के बाद विधवा और बेटियां पति या पिता की निजी संपत्ति में बेटों के बराबर वारिस बन गईं. यह कानून हिंदू समाज में बराबरी की ओर पहला कदम था. इस से औरतों को कुछ हद तक आर्थिक सुरक्षा भी मिली.

जवाहरलाल नेहरू की सरकार द्वारा लागू किया गया यह कानून आजाद भारत में औरतों को संपत्ति में बराबरी देने वाला एक क्रांतिकारी प्रयास साबित हुआ. यह कानून महिलाओं की स्थिति सुधारने की दिशा में पहला बड़ा बदलाव तो था लेकिन इस में अभी भी कमियां थीं.

बेटियां पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं ले सकती थीं सिर्फ बेटे ही हिस्सेदार हो सकते थे. 1956 के कानून की कुछ धाराएं तो भेदभावपूर्ण रहीं. घर के विभाजन में बेटियों के हिस्से पर रोक थी और अगर विधवा औरत पुनर्विवाह कर ले तो उस का अधिकार छिन जाता था. वक्त के हिसाब से तो 1956 का कानून जरूरी था लेकिन यह औरतों को बराबरी का हक देने के मामले में अधूरा था. इस कानून ने महिलाओं को कुछ अधिकार तो दिए लेकिन बराबरी नहीं दी.

संविधान ने औरतों को बराबरी का हक दिया

संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है और आर्टिकल 15 किसी भी तरह के भेदभाव को रोकता है. 1956 का कानून संविधान के आर्टिकल 14 और 15 की भावना को पूरा नहीं कर पा रहा था, इसलिए इस कानून के बनने के 50 साल बाद इस में सुधार जरूरी हो गया. 2005 में इस कानून में संशोधन हुआ. इस संशोधन के तहत हिंदू सक्सेशन अमेंडमैंट एक्ट 2005 बना. कांग्रेस सरकार के समय यह महत्त्वपूर्ण संशोधन हुआ. यह अमेंडमैंट जैंडर इक्वैलिटी के लिए बहुत जरूरी था क्योंकि इस से 1956 के कानून में जो इक्वैलिटी थी वह खत्म हो गई.

2005 के अमेंडमैंट के बाद अब बेटे की तरह बेटी भी पिता की संपत्ति में जन्म से ही हिस्सेदार हो गई. इस कानून के बाद अब बेटी भी संपत्ति में हिस्सा मांग सकती है, बेच सकती है या उस पर अपना अधिकार जता सकती है. 1956 के कानून की 23 और 24 जैसी भेदभावपूर्ण धाराएं हटा दी गईं. इन धाराओं में घर के विभाजन में बेटी हिस्सा नहीं ले सकती थी. 2005 के बाद अब विधवा को पुनर्विवाह के बाद भी अधिकार बरकरार रहे.

क्रांतिकारी था कानून में संशोधन

2005 का संशोधन क्रांतिकारी था क्योंकि इस ने सदियों पुरानी धर्म की भेदभावपूर्ण व्यवस्था को तोड़ दिया. बेटी अब जन्म से ही पिता की पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर हकदार बन गई. शादी के बाद भी उस का यह हक कायम रहता है. इस कानून से महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिली और परिवार में मजबूत स्थिति बनी. इस से औरतों की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी और परिवार के फैसलों में उन की भागीदारी बढ़ी.

हालांकि यह कानून तो बेहद क्रांतिकारी है लेकिन व्यवहार में आज भी अनेक चुनौतियां हैं. सामाजिक दबाव, डर, अज्ञानता या रिश्तों के टूटने के भय के कारण महिलाएं अपने अधिकार नहीं मांग पातीं. अदालतों में मुकदमे लंबे चलते हैं. फिर भी, यह महिलाओं को सशक्त बनाने का एक बड़ा कानूनी हथियार जरूर बना है.

धरातल पर कानून का कितना असर

1956 का कानून बेहद महत्त्वपूर्ण था लेकिन अधूरा था. उस से महिलाओं को कुछ सुरक्षा मिली थी लेकिन उस में बराबरी नहीं थी, इसलिए 2005 का संशोधन बहुत जरूरी था. इस अमेंडमैंट से यह साबित हुआ कि कानून समाज को धीरेधीरे लेकिन सही दिशा में ले जा सकता है बेटियों को बेटों के बराबर हक देने वाला 2005 का संशोधन सामाजिक स्तर पर आज भी दूर की कौड़ी ही है. आंध्र प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में तो हालात ऐसे हैं कि बेटियां अपना कानूनी हक छोड़ने के लिए मजबूर की जाती हैं. इस के लिए इन राज्यों में हक त्याग नाम से नई प्रथा का ईजाद किया गया है. इस प्रथा के तहत परिवार के लोग इकट्ठा होते हैं और बेटी को हक त्याग के लिए तैयार कर उस से उस का कानूनी हक छीन लेते हैं. बेटी को कहा जाता है कि ‘तुम्हारा तो ससुराल है. पिता की संपत्ति को भाइयों का नाम रहने दो.’

यही वजह है कि औरतों के नाम संपत्ति के मामले में भारी अंतर नजर आता है. 2021 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार अकेली औरत के नाम पर घर का आंकड़ा करीब 13 प्रतिशत और जमीन का महज 8.3 फीसदी ही है. औल इंडिया डेब्ट एंड इनवैस्टमैंट सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की जमीनमालिकी 5 से 11 प्रतिशत के बीच ही है. ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कुल जमीन मालिकों की महज 14 फीसदी हैं और कुल कृषि भूमि की सिर्फ 11 प्रतिशत ही हैं.

बेटियां घर की मालकिन नहीं

बेटियों को घर की लक्ष्मी कहने का ढोंग करने वाला समाज संपत्ति बंटवारे में बेटी का हक बेहद निर्लज्जता से मार लेता है. मुसलिम, ईसाई या दूसरे धर्मों में तो यह दोगलापन और बढ़ जाता है. मुसलिम पर्सनल लौ में बेटी को बेटे का आधा हिस्सा ही मिलता है. संविधान की बराबरी यहां पूरी तरह गायब नजर आती है. हिंदू कानून में 2005 के बाद बराबरी तो मिली लेकिन कोर्ट केस में 77 फीसदी फैसलों में मेंटिनैंस का ?ान?ाना पकड़ा दिया जाता है, संपत्ति नहीं मिलती. इन में से आधे मामलों में भी औरत को कोपार्सनरी यानी पितृ संपत्ति का सीधा हक नहीं मिलता. यहां परिवार का दबाव काम करता है.

वसीयत में बेटी को बहिष्कृत रखा जाता है. राजस्व रिकौर्ड में नाम चढ़ाने में धांधली की जाती है. कई जगह दहेज को बेटी का हक बता कर उसे सम?ा दिया जाता है कि तुम्हारा हक खत्म. बेटियों से बेईमानी का यह खेल बेहद ईमानदारी से खेला जाता है. हालांकि प्रौपर्टी के मामले में शहरों में कुछ बदलाव दिख रहा है. 2024 में महिलाओं द्वारा अकेले मकान खरीदने के ट्रांजेक्शन 14 फीसदी तक बढ़े हैं. कुल प्रौपर्टी डील्स का 22 फीसदी हिस्सा औरतों के नाम पर है. 30 प्रतिशत से ज्यादा शहरी संपत्ति की खरीदार अब महिलाएं हैं लेकिन औरत की इस स्वतंत्रता में आज भी धर्म की मानसिकता हावी है. औरतों को प्रौपर्टी के लायक सम?ा ही नहीं जाता.

जो पुरुष औरतों के नाम से प्रौपर्टी खरीदते हैं असल में वहां औरतें सिर्फ कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए होती हैं क्योंकि समाज की नजर में संपत्ति पुरुष की इज्जत का प्रतीक है औरत की सुरक्षा का नहीं. कुछ औरतें जो इतनी आत्मनिर्भर हैं कि खुद की प्रौपर्टी खरीद सकती हैं उन की तादात आज भी आटे में नमक के बराबर ही है क्योंकि ऐसी सक्षम महिलाओं पर परिवार के कई लोग निर्भर होते हैं. इतना पैसा बचता ही नहीं जिस से वह अपने नाम प्रौपर्टी खरीद सके फिर भी शहरों में खुद के दम पर प्रौपर्टी खरीदने वाली औरतों की तादात बढ़ी है.

गांवों में हालात और भी बदतर

ग्रामीण भारत में तो औरतों के नाम प्रौपर्टी होना आज भी मुश्किल है. यह सांस्कृतिक दोगलापन आज भी मजबूती से कायम है. बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है कि तुम घर की इज्जत हो लेकिन वही परिवार जब संपत्ति बांटता है तो लड़की को पराया मान लेता है.  समाज कहता है बेटी का हिस्सा तो दहेज में दे दिया. दहेज जो कानूनीतौर पर अपराध है लेकिन सामाजिक तौर पर परिवार की परंपरा है.

हिंदू सक्सैशन एक्ट में 2005 में बेटियों को बराबर अधिकार दिए गए लेकिन यह अधिकार व्यावहारिक रूप से लागू नहीं हो पाए. इस मामले में विधवाएं तो अधिकार पाती हैं लेकिन बेटियों को कुछ नहीं मिल पाता. कई बार जमीन के कागजों पर औरत का सा?ा नाम दर्ज किया जाता है लेकिन ऐसा सिर्फ पुरुष अपने निजी फायदे या मजबूरी के लिए करते हैं. ऐसी जमीनों को बेचने खरीदने में औरतों की मरजी नहीं उन का सिग्नेचर ज्यादा जरूरी होता है.

संपत्ति के मामले में इस गैरबराबरी से औरतों की आर्थिक स्वतंत्रता कमजोर पड़ जाती है. उन्हें लोन लेने में अड़चन होती है. वह अपनी मरजी से कहीं निवेश नहीं कर पातीं. इस से औरतों की वैल्थ बिल्ंिडग प्रभावित होती है. असल में जैंडर वैल्थ गैप वेतन गैप से भी बड़ा है क्योंकि अचल संपत्ति असल संपत्ति होती है जिस से औरतों को दूर रखा जाता है.

यह धर्म का सब से बड़ा फरेब है कि औरतें हमेशा मर्दों के नीचे दब कर रहें. संविधान बराबरी जरूर देता है लेकिन समाज उस बराबरी को पैरोंतले कुचल देता है. संविधान की बराबरी कागजों पर ही नजर आती है जमीन पर नहीं, इसलिए यह बराबरी अधूरी है. धर्म औरत को घर की लक्ष्मी सम?ाने का ढोंग जरूर करता है लेकिन औरत घर की मालकिन हो, यह उसे बरदाश्त नहीं. Women Property Rights India

 

 

दूसरी पोस्टिंग – एक सैनिक का अनुभव साझा करती कहानी

Soldier Story: अफसर बनने के बाद मेरी दूसरी पोस्ंिटग फौरवर्ड एरिया की एक वर्कशौप में हुई. मैं कैप्टन बन चुका था. मु?ो पठानकोट ट्रांजिट कैंप में रिपोर्ट करनी थी. ट्रांजिट कैंप स्टेशन के बिलकुल सामने था. मैं ने कुली से सामान उठवाया और ट्रांजिट कैंप के औफिस के बरामदे में रख दिया. अफसर कमांडिंग के कमरे में एक लैफ्टिनैंट साहब बैठे हुए थे. मैं अंदर गया तो उस ने मु?ो उठ कर सैनिक सम्मान दिया और बैठने के लिए कहा. मैं ने अपना मूवमैंट और्डर दिया. उस ने अपने औफिस से 2 जवान बुलवाए और मेरा सामान एक कमरे में रखने के लिए कहा. मु?ा से कहा, ‘‘आप कमरे में जाएं. आज शाम तक पता चल जाएगा कि श्रीनगर की फ्लाइट है या नहीं. अगर हुई तो सुबह

5 बजे एयरपोर्ट जाना होगा. स्टेशन वैगन लेने आएगी. अगर नहीं हुई तो 2 दिन आप को यहीं रुकना होगा. जवानों और जूनियर अफसरों को श्रीनगर जाने के लिए डीलक्स बसें मिलती हैं. अगर सभी को एयरलिफ्ट की सुविधा होती तो पुलवामा में 40 जवान शहीद न होते लेकिन अब भी जवानों और जूनियर अफसरों को बसों से भेजा जाता है. सब हथियारबंद होते हैं. कुछ चीजें सेना के हाथ में नहीं होतीं. हालांकि, वे जवान भारतीय सेना के नहीं थे. वे थे अर्धसैनिक बल के जवान जो सेना को हर जगह असिस्ट करते थे.

मैं कमरे में आ गया. कमरा पुराना लेकिन शानदार था. हर सुविधा उपलब्ध थी. मैं ने अभी यूनिफौर्म उतार कर नाइट सूट पहना ही था कि एक जवान मेरे लिए चाय ले कर आया. सफर से आया था, चाय की जरूरत भी थी. उसी समय व्हिसल हुई. मैं ने जवान से पूछा ‘‘यह व्हिसल किस लिए हुई है?’’

‘‘सर, जवानों की चाय के लिए.’’

पता भी था कि व्हिसलें सब जवानों के लिए होती हैं. हम अफसरों को मैसेंजर मैसेज देते हैं. आगे जवान ने कहा, ‘‘सर, यह आप के बैड के साथ स्विच लगा है. अगर किसी चीज की जरूरत पड़े तो यह घंटी बजा दीजिएगा. मैं हाजिर हो जाऊंगा. वैसे, 8 बजे बार खुलता है और उस के बाद डिनर शुरू हो जाता है.’’

ड्रिंक जवानों और जूनियर अफसरों को भी मिलती है लेकिन उन के लिए कोई बार नहीं बना रखा है. बार सिर्फ अफसरों के लिए होता है.

सोच रहा था कि अगर फ्लाइट शनिवार की हुई तो मैं 2 दिन क्या करूंगा. अमृतसर में मेरा घर था. वहां जाने को मन नहीं करता था. उस घर में मैं हमेशा उपेक्षित रहा हूं. हां, यहां से 20 किलोमीटर दूर मेरा पुश्तैनी गांव है. वहां दादू से मिल आऊंगा. वे मु?ो बहुत प्यार करते हैं. वे हमेशा कहते, ‘मेरा फौजी अफसर आ गया.’

मैं बार में बैठा ड्रिंक ले रहा था तो मु?ो बता दिया गया था कि फ्लाइट शनिवार की है. मैं ने लैफ्टिनैंट साहब को बताया कि 2 दिन की फरलो लीव चाहिए. यहां से 20 किलोमीटर दूर मेरा गांव है. 2 दिन के लिए वहां जाना चाहता हूं. मैं शुक्रवार शाम को लौट आऊंगा.’’

उन्हें कोई एतराज नहीं था. मेरा 2 दिन का फरलो लीव सर्टिफिकेट बना दिया गया. मेरे जाने से ट्रांजिट कैंप वालों को 2 दिन के राशन का फायदा होता. जवान या जूनियर अफसर भी जाते हैं तो उन का भी राशन बचेगा. इस बारे में कोई नहीं सोचता कि ट्रांजिट कैंप वाले उस राशन का क्या करते हैं. सभी को घर जाने का मोह रहता है. फरलो लीव में हम ट्रांजिट कैंप की स्ट्रैंथ पर रहते और केवल राशन का फायदा रहता. वापस आने पर लीव सर्टिफिकेट फाड़ दिए जाते. मैं ने जब गांव के लिए बस पकड़ी तो सुबह के 10 बज चुके थे. नाश्ता मैं ने ट्रांजिट कैंप में ही कर लिया था. आधे घंटे में मैं ?ाकोलाड़ी बस स्टैंड पर उतरा. स्टैंड के सामने हलवाई की दुकान अब भी थी. बचपन से मैं इस दुकान को देखता आया था. कुछ और दुकानें भी खुल गई थीं.

गांव के लिए टैंपों और बसें चलने लगी थीं. नहीं तो पहले गांव तक पैदल जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. सड़क भी कच्ची होती थी. बरसात के दिनों में कच्ची सड़क पर मैं बहुत बार फिसल जाता था. पक्की सड़क बनने पर टैंपों और बसें चलने लगी थीं.

मैं अपने गांव का टिकट ले कर बस में बैठा. बस ने मु?ो 20 मिनट में ही गांव में उतार दिया. गुरुद्वारे से घर की ओर जा रहा था कि रास्ते में कई जानकार मिले. सब से ‘सत श्री अकाल’ हुई. बलवंत की दुकान के पास मु?ो सिमरन मिली, मेरी बचपन की सहेली. उस की शादी हो गई थी. मुझे देख कर मुसकराई और ‘सत श्री अकाल’ की. मेरी क्लासफैलो भी रही थी. मेरा और उस का मजाक चलता था. मैं ने कहा, ‘‘अडि़ए सिमरन, तू शादी के बाद बहुत सोहनी हो गई ऐ. ससुराल वाले क्या खिलाते हैं? वह मुसकराई. बोली तो कुछ नहीं लेकिन हाथ से इशारा किया कि वह मारेगी.

वह हमेशा मुझे ‘अड़या’ कहा करती थी और मैं ‘अडि़ए’ कहता था. मैं मुसकराया और आगे बढ़ गया. तरलोके की दुकान पर बहन लाजो मिली वह भी अपने बच्चे के साथ. वह वैसी ही दुबलीपतली थी. आंखें मिलीं तो ‘सत श्री अकाल’ की. दुबलीपतली होने के कारण सभी उसे ‘सुकड़ी’ कहते थे. मैं ने कहा, ‘‘नी ‘सुकडि़ए’ तू तो वैसी की वैसी है. तेरे ससुराल वाले घट खिलांदे ने? सिमरन तो बहुत सोहनी हो गई ऐ.’’

 

तरलोके ने कहा, ‘‘नहीं भाजी, ऐदा वजूद ही ऐसा है. जिना मरजी खिला लो, इस ने वैसे ही रहना ऐ.’’

तरलोका ‘सुकड़ी’ कहतेकहते रह गया. लाजो ने आंखें तरेरीं और हाथ से मारने का इशारा किया, कहा, ‘‘मेरा मुंडा तो संडा ऐ.’’

मैं मुसकरा कर आगे बढ़ गया, कहा, ‘‘अज घर आके दसांगा.’’

मैं घर पहुंचा तो दादू खेतों को जाने के लिए तैयार थे. मु?ो देख कर बहुत खुश हुए. मैं ने पांव छुए और आशीर्वाद लिया. उन्होंने कहा, ‘‘मैं खेतों का चक्कर लगा कर आता हूं, तुम आराम करो.’’

‘‘दादू, मैं भी आप के साथ चलता हूं. मैं ज्यादा दूर से नहीं आया हूं. पठानकोट से आया हूं.’’

‘‘पोस्ंिटग पठानकोट हुई है?’’

‘‘नहीं दादू, पोस्ंिटग तो श्रीनगर से आगे की है. प्लेन शनिवार को जाएगा, इसलिए मिलने आ गया.’’

‘‘चंगा किता.’’

मेरी आवाज सुन कर दादी भी कमरे से बाहर आ गई थीं. मैं ने उन के भी पांव छू कर आशीर्वाद लिया. मैं जब भी गांव आता, दादू के लिए रम की 2 बोतलें जरूर ले कर आता. मैं ने बोतलें टेबल पर रख दीं और दादू के साथ खेतों में जाने के लिए तैयार हो गया.

‘‘पुत्तर, यह तुम चंगा करदे हो, मेरे लिए रम ले आंदे हो. मैं सारा दिन खेतां च कम कर के थक जादां हां. दो पेग लगाता हूं तो सारी थकावट दूर हो जांदी ऐ. मेरी सर्दियां मजे नाल कट जादियां ने. तू ने खाना खाना होएगा?’’

‘‘हां दादू, खेतां च चक्कर मार कर खाते हैं.’’

दादी को खाना बनाने के लिए कहा तो उन्होंने ने कहा, ‘‘ दाल, चावल, माहनी बना हुआ है. इसे पसंद भी है. रात नू जो कहेगा, बना देंगे.’’

‘‘ठीक है, दादी.’’

मैं ने रास्ते में दादू से पूछा, ‘‘दादू, होर पिंड दा की हाल ऐ?’’

‘‘ठीक ऐ, वो बिशन दी मां होती थी न, वह अपने घर के सामने कुएं में डूब कर मर गई.’’

‘‘अच्छा, वह जो सारे पिंड च सोटी ले कर घूमती थी. किसी को कुछ नहीं सम?ाती थी. अपनी सास को बहुत तंग किया करती थी. यह अभिमान था कि वह चालीस किले की मालकिन है.’’

‘‘हां, जब किसी कारण सास के शुगर से आए जख्मों पर मारती थी तो वह कहती थी, ‘चरसतिए, तू सात जन्म तक ऐवें रहे. तेरे नाल वी ऐदां होवे.’

‘‘बात केवल इतनी होती थी कि उसे भूख जल्दी लग जाती थी. वह रोटी मांगती और चरसती उसे देती नहीं थी, कहती, ‘‘जब सब के लिए बनेगी तब मिलेगी. इसी बात पर झगड़ा बढ़ जाता और चरसती इसी बात पर उस के जख्मों पर सोटी मारती. कहते हैं न, फौजी अफसर साहब, ‘‘सेर को सवासेर मिल जाता है. बिशन की वोहटी आई तो उस ने वही व्यवहार अपनी सास के साथ किया. तंग आ कर कुएं में छलांग लगा दी. पिंड दे लोग कहने लगे, ‘‘बिशन दी वोहटी चरसती की सास बन कर आ गई है.’’

‘‘हां दादू, कर्मों का हिसाब तो देना ही पड़ता है. सदा दिन एकजैसे नहीं रहते.’’

‘‘हां, तिलक तेरा दोस्त भी नहीं रहा.’’

‘‘उस के बारे में पता चला था.’’

सारी बातें पंजाबी भाषा में हो रही थीं. कई और भी लोगों के मरने की बात बताई. उन में मास्टर ज्ञान चंदजी भी थे जो पिंड के बच्चों को पढ़ाया करते थे. वे पैसे नहीं लेते थे. अनाज के बदले बच्चों को पढ़ाते. मैं अफसोस से कुछ बोल नहीं पाया.

पहले हम गांव भाद्दे वाले खेतों में गए. चना बहुत शानदार लगा हुआ था. दादू ने कहा, ‘‘पहले मैं खड़ी फसल आड़ती नू बेच देदां सी. अब मैं मंडी च जा कर बेचूंगा. मैंनू ओथे दुकान अलौट हो गई ऐ. वहां बेचने से चार पैसे ज्यादा मिल जानगे.’’

‘‘ठीक ऐ, दादू, ट्रैक्टरट्रौली तो है ही. थोड़ी मेहनत पड़ेगी. घर के लिए भी चना और कनक बच जाया करेगी.’’

‘‘हां, 2 नौकर हैं, वे मेरे नाल रहेंगे. घर दे कौल खेत च मैं ने मौसमी सब्जियां लगवाई हैं. नई तां सब्जियां भी खरीदनी पैंदयां सी. पिसली बार बाड़ लगा कर तू ने चंगा किता. सब्जियां चोरी नहीं होतीं और फसल खराब नहीं होती.’’

‘‘बस दादू, मेरी सर्विस 60 साल तक है. उस के बाद मैं ने ऐथे ही आ जाना ऐ.’’

दादू बहुत खुश हुए, ‘‘शाबाश पुत्तर, कोई तो है जो मेरे बुजुर्गों की जमीन संभालेगा. नई तां मैं नू कोई उम्मीद नई सी.’’

दादू काफी देर आसमान की ओर देखते रहे. मैं ने ही कहा, ‘‘दादू, कमला वाले आम के बाग और खेतों में चलें.’’

कमला विधवा थी, उस ने दादू को बाग बेच दिया था. शहर बेटे के पास चली गई थी. जब हम वहां पहुंचे तो फसल वहां भी लहलहा रही थी. पेड़ पर खूब आम लगे हुए थे. बहुत से आम नीचे टपके हुए थे. मैं तो टपके हुए आमों को कूल में धो कर खाने लगा. इतने मीठे, रसीले आम मैं ने कभी नहीं खाए थे.

दादू ने कहा, ‘‘अपने नाल पेटी भर के लेजा.’’

‘‘ले जाता, दादू लेकिन एयरफोर्स के जहाज में खाने की चीजें नहीं ले जा सकते.’’

घर लौटे तो दादी ने दाल, चावल और महानी खाने के लिए रखा. पेट तो आम खाने से ही भर गया था. थोड़े से खाए.

दादी ने पूछा, ‘‘क्यों पुत्तर, घट क्यों खाया?’’

‘‘अम्ब खान नाल ही पेट भर गया सी. रातीं खा लूंगा.’’

2 दिन रह कर मैं ट्रांजिट कैंप लौट आया. ये 2 दिन मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं थे. घर के खाने का स्वाद अभी भी मुंह में था. मैं बहन लाजो के घर भी गया. उस का भाई मेरा लंगोटिया यार था.

शनिवार सुबह 6 बजे प्लेन उड़ा और एक घंटे के अंदर ही मैं श्रीनगर पहुंच गया. एयरपोर्ट से मैं ने कमांडिंग अफसर कर्नल बंसल साहब को मोबाइल किया. उन्होंने कहा, ‘‘मैं गाड़ी भेज रहा हूं, पहुंचने में एक घंटा लग जाएगा.’’

‘‘ठीक है, सर. मैं एयरफोर्स कैंटीन में बैठा हूं.’’

कश्मीर में आतंकवाद न के बराबर रह गया था. केवल दक्षिण कश्मीर में छिटपुट घटनाएं हो जाती थीं. घात लगा कर हमले किए जाते थे. हमारे जवान उन का सफाया कर रहे थे. वे भी धरे जा रहे थे जो आतंकवादियो को पनाह देते थे. ये औपरेशन चुपचाप किए जा रहे थे. हां, कश्मीर मीडिया को इस की सूचना दी जाती थी. मैं सोच रहा था कि आतंकवादियों के इतने अड्डे बने कैसे? कौन दोषी है इस के लिए? इन सवालों के उत्तर मिल भी जाएं तो उन जवानों का क्या जो शहीद हो गए हैं. जिस घर का जीव चला जाता है, पता उन्हें लगता है.

मैं ने एयरफोर्स की अफसर कैंटीन से चाय और ब्रैडमक्खन लिया और आराम से बैठ कर खाने लगा. एक घंटे बाद मेरे मोबाइल की घंटी बजी, मैं ने ‘हैलो’ कहा.

‘‘जयहिंद सर, मैं हवलदार सावन सिंह बोल रहा हूं. आप के लिए गाड़ी ले कर आया हूं.’’

‘‘ठीक है, सावन सिंह, आप सामान लेने वाली जगह पर पहुंचें, मैं आ रहा हूं.’’

सामान लिया और यूनिट के लिए चल दिए. एक घंटे बाद अफसर मेस पहुंचे. सारे कमरे लकड़ी के बनाए गए थे. छतें ढलान वाली थीं इसलिए कि अगर बर्फ या बरसात हो तो छत पर पानी न रुके. कमरे अंदर से बहुत शानदार थे. अटैच वाशरूम के साथ गीजर आदि की सुविधाएं उपलब्ध थीं. लगता ही नहीं था कि कमरे लकड़ी के बने हैं.

औफिसर कमांडिंग कर्नल बंसल के अलावा 3 अफसर ईएमई के थे. केवल मैं और्डिनैंस अफसर था. मेरा विभाग वर्कशौप को स्पेयरपार्टज देने के लिए था.

मैं अभी यूनिफौर्म उतार कर गरम नाइट सूट पहन कर बैठा ही था कि मेरे लिए नाश्ता आ गया. नाश्ते में 4 ब्रैड पीस और 2 अंडों का आमलेट था. थरमस में चाय थी. मैं ने नाश्ता किया. चाय पी और पलंग पर लेट गया. मैं ने दादू और अमृतसर के अपने घर में बता दिया कि मैं अपनी नई यूनिट में पहुंच गया हूं.

मेरा आज से इस मौसम में घुलमिल जाने के लिए 3 दिन का रैस्ट था. मैं पलंग पर लेटा और सो गया. 11 बजे के करीब दरवाजा खटका तो मैं उठा. एक जवान चाय और स्नैक्स ले कर खड़ा था. जवान टेबल पर रख कर चला गया. मैं ने थरमस से चाय कप में डाली और स्नैक्स के साथ पीने लगा. चाय चाहे पाउडर के दूध की थी लेकिन बहुत टेस्टी थी. स्नैक्स भी अच्छे थे. खा कर मैं फिर पलंग पर लेट गया. मेरा सहायक क्वार्टरमास्टर से गरम कपड़े ले कर आ गया था. जो यूनिफौर्म फिट करवानी थी, वे यूनिट टेलर के पास ले कर चला गया. बोला, ‘‘सर, बूट आ कर तैयार कर दूंगा.’’

मैं ने नाप के लिए पुरानी यूनिफौर्म देते हुए कहा, ‘‘ठीक है, यूनिफौर्म की पैंट और कमीज 2 इंच खुली रखें. नीचे बहुत से कपड़े पहनने पड़ेंगे.’’

‘‘जानता हूं, सर. मैं ने इसीलिए एक्स्ट्रालार्ज साइज इश्यू करवाए हैं.’’

‘‘गुड. ले जाओ.’’

मैं लेट गया तो मेस से फोन आया, ‘‘सर, मैं अफसर मेस से हवलदार नायर बोल रहा हूं. सर, आप की डाइट के बारे पूछना था.’’

‘‘मैं ऐग ईटर हूं. मीट बिलकुल नहीं खाता.’’

‘‘ठीक है, सर. थैंक्यू.’’

मैं फिर सो गया. 2 बजे मेरे लिए लंच हौटकेस में आया. 2 सब्जियां, दाल, चावल और रोटी सब था. सलाद के साथ रायता भी था. टेस्टी था. पेट भर खाया.

जवानों और जूनियर अफसरों को भी 3 दिन का रैस्ट मिलता है लेकिन उन्हें अपनेअपने मेस में जा कर खाना पड़ता है. फिर रैस्ट करते हैं. मैं तब तक मेस में जा कर खाना नहीं खा सकता था जब तक डाइनिंगइन पार्टी नहीं हो जाती. उस के लिए

2 दिन अभी बाकी थे. समयसमय पर मु?ो सब कमरे में मिलता रहा. 2 दिन बाद पार्टी हुई तब मैं रैगुलर ड्यूटी करने लगा.

टैक्निकल स्टोर के स्टाफ में कलर्क, स्टोरकीपर तथा अन्य जनरल ड्यूटी करने वाले मिला कर कुल 17 जवान थे. काम का लोड बहुत था. खासकर इश्यू और रिसीप्ट का. बहुत से रिसीप्ट वाउचर साइन के लिए पैंडिंग थे. मैं ने अपने स्टोरकीपरों से कहा, ‘‘एक कुरसीटेबल अपने सैक्शन में रख देना. मैं पीछे बैठ कर वाउचर साइन करता रहूंगा. आप का इश्यू रिसीप्ट भी नहीं रुकेगा. लेजर मेरे औफिस में लाने की जरूरत नहीं है. मैं ने एक दिन में ही सारे वाउचर साइन कर दिए. पूरी इनवैंट्री कंप्यूटराइज हो रही थी. फिर लेजरों का काम नहीं रहेगा. मु?ो आइटम देख कर ओके करना होगा.

लंच के समय कर्नल बंसल साहब ने हम से कहा, ‘‘चाहे हम लड़ाकू फौज के नहीं हैं लेकिन खुफिया रिपोर्ट हैं कि सौफ्ट टारगेट पर हमले होने के चांस अधिक हैं. हम लड़ाई के लिए ट्रेंड नहीं हैं. केवल बेसिक ट्रेनिंग हमारे साथ है. हमारे पास हथियार, गोलाबारूद भी आत्मरक्षा के लिए हैं. मेरे ब्रिगेड कमांडर ने कहा है कि हो सकता है कि हम समय पर मदद न दे पाएं. सभी जवान, जूनियर अफसर और अफसर अपनेअपने हथियार और गोलियां साथ ले कर ड्यूटी करेंगे. आज शाम को

6 बजे मैं ने सैंट्रल रोलकौल रखी है. आप सभी आएंगे.’’

मैं कर्नल बंसल साहब के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ देख रहा था. मैं ने कहा, ‘‘सर, आप चिंता न करें, हर हालत में हम मुकाबला करेंगे.’’

और अफसरों ने भी मेरी बात का समर्थन किया. लंच कर के मैं अपने औफिस में अपने सैक्शन के जवानों को इकट्ठा कर के कर्नल बंसल साहब के इंस्ट्रक्शन बताए, कहा, ‘‘24 घंटे होशियार रहना है.’’

मैं ने अपने सभी जवानों के चेहरों को गौर से देखा. उन के चेहरों पर किसी तरह की शिकन या डर नहीं था. हवलदार राम सिंह ने कहा, ‘‘सर, ऐसी धमकियां रोज आती रहती हैं. आज क्वार्टरगार्ड से अपने हथियार और गोलियां भी ले लेंगे. सर, आप बिलकुल चिंता न करें.’’

दूसरे रोज हमारे जवानों के साथ पूरी वर्कशौप अपनेअपने हथियारों के साथ काम कर रही थी. अच्छा लगा कि पूरी यूनिट वारमोड पर आ गई है. दिन में भी चारों तरफ खोदे गए मोरचों में डीएससी यानी डिफैंस सिक्योरिटी कोर के जवान खड़े मिले. अपनी ओर से सुरक्षा के सारे प्रबंध कर दिए गए थे. हम अफसरों की ड्यूटी यह थी कि अपने काम के साथ सारी सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखना, विशेषकर रात के समय. कर्नल बंसल साहब खुद चैक करते थे. किसी भी दुर्घटना की जिम्मेदारी उन की थी. वे रातदिन इस के लिए ऐक्टिव रहते थे.

15 दिन में कोई दुर्घटना नहीं घटी. एक दिन सुबह 3 बजे के करीब दूर कहीं गोलियों की आवाज सुनी. पूरी यूनिट अलर्ट हो गई. सभी मोरचों पर थे. सभी जवानों के पास नाइटविजन थे. वे आतंकवादियों की हरकतों को देख रहे थे. दूर थे. हमारे हथियारों की रेंज में नहीं थे. जब रेंज में आए तो वे हम पर फायर करते, हम ने उन पर फायर शुरू किया. आदेश था कि कोई औटोमैटिक फायर नहीं करेगा. सभी रैपिड फायर करेंगे ताकि बैरल से एकएक, दोदो गोलियां निकलें. मकसद यह था कि हमारी गोलियां खत्म न हो जाएं और आतंकवादी इतने नजदीक न आ जाएं कि वे हम पर ग्रेनेड से या रौकेट लौंचर से हमला कर सकें. गुथमगुथा की लड़ाई न करनी पड़े. जैसे ही रेंज में आए, हमारी ओर से रौकेट लौंचर और एलएमजी से फायर किए गए. दोनों तरफ से गोलियां भी चलीं.

आतंकवादियों को उम्मीद नहीं थी कि हम इस तरह सावधान होंगे और हमला करेंगे. मुठभेड़ ज्यादा देर नहीं चली. वे 3 थे और काफी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद ले कर आए हुए थे. लंबी लड़ाई लड़ने आए थे. इस ?ाड़प में हमारे 2 जवान भी घायल हुए जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया गया.

रिपोर्ट बना कर ब्रिगेड हैडक्वार्टर भेजी गई. ब्रिगेड कमांडर साहब ने विजिट किया. सारी यूनिट को शबाशी दी, कहा, ‘‘ऐसे ही सावधान रह कर बहादुरी से लड़ना है. कर्नल बंसल साहब ने और हथियार और गोलाबारूद मांगा, जिस की पूर्ति एक हफ्ते में कर दी गर्ह. रात के समय एक तरह से पूरी यूनिट मोरचे पर होती.

तीनों आतंकवादी पाकिस्तानी थे. रिपोर्ट कमांड हैडक्वार्टर से आर्मी हैडक्वार्टर चली गई थी. फिर कोई हमला नहीं हुआ. आतंकवादियों के हथियार और गोलाबारूद ब्रिगेड हैडक्वार्टर के क्वार्टरगार्ड में जमा करवा दिए थे. तीनों आतंकवादियों के शव भी सेना अस्पताल भेज दिए थे ताकि मीडिया को दिखाया जा सके. पाकिस्तानी इन शवों को कभी वापस नहीं लेते, सारे प्रूफ होने पर भी. उन्हें सम्मान से दफना दिया जाता. भारतीय सेना का यह मानवीय रूप हमेशा रहा है.

रात की सतर्कता वैसी ही रही. दिन में वर्कशौप नौर्मल मोड पर आ गई. मेरा ध्यान स्टोर के प्रबंधन पर चला गया कि किसी भी पार्ट के लिए गाडि़यों, टैंकों या अन्य संबंधित मशीनों की रिपेयर न रुके. इस के लिए डीलरों से संपर्क बना रहा. वे पार्टज सप्लाई करते रहे. हमारा चैक यह था कि वर्कशौप से पुराना ले कर नया देना. पार्ट हम जौबकार्ड पर देते. पुराने सामान को हम सौलवेज डिपो भेज देते. जो क्लर्क डिटेल था, उस से डीलरों के बिल जल्दी क्लियर करने के लिए कहा जिस से उन्हें पेमैंट जल्दी मिल सके.

मैं ही नहीं, दूसरे अफसर भी बारीबारी से जो जवान घायल हुए थे उन्हें देखने अस्पताल जाते थे. एक के दाहिने कंधे पर गोली लगी थी. उस का पूरा दाहिना बाजू बेकार हो गया था. दूसरे के पैर में गोली लगी थी. गोली निकालने पर भी इन्फैक्शन के कारण उस का आधा पैर काट दिया गया था. दुख की बात यह थी वे ठीक हो कर दोबारा सर्विस में नहीं आ सकते थे. ऐसा सभी घायल सैनिकों के साथ होता है.

मैडिकल पैंशन और सर्विस पैंशन दे कर उन्हें घर भेज दिया जाता है. यह नहीं कि उन्हें सड़क पर छोड़ दिया जाता है. उन्हें जिला सैनिक बोर्ड सरकारी नौकरियों में एडजस्ट करते हैं. जो अपाहिज होते हैं, उन्हें दूध, सब्जी के बूथ दे कर सैटल किया जाता है. वे अपने परिवार के साथ मिल कर स्थापित हो जाते हैं. बहुत कम सैनिक ऐसे होते हैं जो बिलकुल कुछ नहीं कर पाते हैं. वे अपनी पैंशन से गुजारा करते हैं. उन्हें भी सेना की ओर से सारी सुविधाएं मिलती हैं. मैं अपने खयालों से तब उबरा जब मेरा क्लर्क कलपुर्जों की डिमांड साइन करवाने आया. वे अपने डिपो से कलपुर्जे डिमांड करते रहते हैं. जो पुर्जे डिपो में नहीं होते उन्हें लोकल परचेज किया जाता है. रिपेयर का काम किसी तरह रुकता नहीं है. 3 साल का स्टौक मेनटेन करते हैं. इसी तरह दूसरे विभाग भी करते हैं.

सब से मुश्किल होता है यहां से जवानों और जूनियर अफसरों का छुट्टी जाना. उन्हें सड़कमार्ग से छुट्टी जाना पड़ता है. फिर घर जाने के लिए वे रास्ते की तकलीफों के बावजूद छुट्टी पर जाते रहते हैं. ट्रांजिट कैंपों में खाना अच्छा नहीं मिलता लेकिन इस की कोई भी जवान शिकायत नहीं करता. सोचते हैं, कौन सा हमें सदा यहां रहना है. एकदो दिन में आगे के लिए गाडि़यां मिलेंगी और घर चले जाना है. बस, जीने के लिए खाते हैं.  पहले तो नहीं था लेकिन अब सेना का इंटैलिजैंट विभाग को इस की जिम्मेदारी दी गई कि वे ट्रांजिट कैंप के खाने को चैक करें कि वहां ठहरने वाले जवानों को और जूनियर अफसरों को खाना ठीक से मिलता है या नहीं. अफसर कोई फौरवर्ड एरिया में जाने वाला ट्रांजिट कैंप में ठहरता, उसे खाना हमेशा अच्छा मिलता. उन का खाना अलग से बनता. यह भी तब हुआ जब एक धाकड़ कमांडर को पता चला. उस ने खुद भेष बदल कर चैक किया. अफसर समेत पूरा स्टाफ बदल दिया गया. वहां जो कमियां थीं उन्हें पूरा किया गया.

इंटैलिजैंट विभाग के अधिकारी रोज खाना चैक करते. तब से खाना ठीक मिलने लगा उन्हें भी जो रास्ते की कठिनाइयों के कारण ट्रांजिट कैंप में लेट पहुंचते थे. नहीं तो उन्हें भूखे सोना पड़ता था या वे अपनी यूनिट से खाना ले कर आते थे. खाना तो दोपहर को ही शाम के लिए बन जाता था. देखा कि 20 जवान और आ गए और बनाई हुई दाल कम पड़ेगी तो उसी में पानी डाल कर 20 जवानों को खाना दे दिया जाता जो बिलकुल बेस्वाद होता. दाल उबाल कर रखने के लिए बड़ेबड़े फ्रिज और प्रैशरकुकर दिए गए. हमारी सब यूनिटों में भी ऐसे ही किया गया. वैसे, ऊंचे इलाकों में प्रैशरकुकर के बिना खाना नहीं बन पाता.

अब सब ठीक कर दिया गया था. छुट्टी के लिए पूरे साल का प्रोग्राम बन जाता और उसी के अनुसार सभी छुट्टी पर जाते रहते. 31 दिसंबर तक सभी छुट्टी काट कर यूनिट में आ जाने चाहिए. अगर सभी जवान 31 दिसंबर तक छुट्टी काट कर नहीं आते तो इस का प्रभाव कमांडिंग अफसर की गुप्त रिपोर्ट पर पड़ता. समयसमय पर यह चैक होता रहता कि प्रोग्राम के अनुसान छुट्टी गया है या नहीं? जवानों को पता है कि अगर 31 दिसंबर तक छुट्टी नहीं काटी तो उन की छुट्टी कम कर दी जाएगी. 31 दिसंबर तक उन्हें यूनिट में होना चाहिए. इसी तरह 3 साल ऐक्टिव सर्विस कर के मेरी एक बड़े डिपो में पोस्टिंग हो गई.

इन्हें आजमाइए

? बच्चों के स्कूल टिफिन में रोजाना अलगअलग आइटम्स रखें ताकि बोरिंग न लगे. कभी सैंडविच, कभी परांठा, कभी राइस या दाल का कौम्बिनेशन.

? हलका कार्टिगन, श्रग या श्रग स्टाइल जैकेट पहनें. यह लुक क्लासी बनाता है और बौडी शेप कवर करता है.

? घर में होटल जैसा फील और खूबसूरती के लिए फेयरी लाइट, एलईडी स्ट्रिप, टेबल लैंप या वार्म लाइट लगाएं.

? सुबह उठते ही और सोने से पहले मोबाइल से दूर रहें. बेवजह की स्क्रौलिंग आप का समय और ध्यान खा जाती है.

? हर समय लोगों पर निर्भर रहना सही नहीं, खुद के साथ समय बिताना आप को मजबूत बनाता है.

? जूते से आवाज आए तो तलवे के नीचे थोड़ा पाउडर डाल दें-स्क्वीकिंग बंद हो जाएगी.

? टेप का किनारा ढूंढ़ना हो तो टेप के किनारे पर छोटा कागज चिपका दें, बारबार ढूंढ़ना नहीं पड़ेगा.

? अलमारी में कौटन में थोड़ा परफ्यूम डाल कर रखें, कपड़े पहनते समय हलकी खुशबू रहती है.

? खाना हमेशा सजा कर पेश करें. सुंदर प्रेजैंटेशन खाने का स्वाद भी बढ़ाता है. Soldier Story:

 

9 लाख करोड़ – दान की बछिया के दांत

Religious Donation Truth: दान की महिमा वाकई में अपरंपार है जिस ने देशभर के 10 ब्रैंडेड मंदिरों की जायदाद को 9 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया है लेकिन इस से किसे क्या हासिल हो रहा है, यह कोई नहीं सोचता. सोचता तो कोई यह भी नहीं कि दान की लत भक्तों को भाग्यवादी बनाने के साथसाथ डर और लालच भी उन के दिलोदिमाग में भर देती है.

न वा उ देवा: क्षुधमिद् वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यव:।

उतो रयि: पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते॥अर्थात देवताओं ने भूख को ही मृत्यु का कारण नहीं बनाया है. भोजन करने वाले को भी मृत्यु आती है. दान करने वाले का धन कभी क्षीण नहीं होता जबकि जो नहीं देता उसे कोई सहारा (सांत्वना) नहीं मिलता.

(ऋग्वेद 10.117.1)

ऋगवेद की इस ऋचा की मानें तो दान फुजूलखर्ची या अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को मुफ्त में मुफ्तखोरों पर लुटाना नहीं बल्कि एक लौंग टर्म इन्वैस्टमैंट है जो आप के पैसे को बढ़ाता है और बोनस में देता है दान देने वाले को सुखसम्मान वगैरह. मैसेज बहुत स्पष्ट है कि अगर आप को समाज में नाम और मानसम्मान चाहिए तो पंडेपुजारियों व मठमंदिरों में दान करते रहो नहीं तो कंजूस, कृपण और आजकल की भाषा में कहें तो नास्तिक, वामपंथी और अर्बन नक्सली वगैरह कहलाने के लिए तैयार रहो.

महाभारत के अनुशासन पर्व में मृत्यु शैय्या पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर से चर्चा करते हुए नसीहत भी देते हैं कि-

अदत्तदानो नरकं याति अर्थात जो दान नहीं करता वह नर्क में जाता है.

पौराणिक ग्रंथों में दान से ताल्लुक रखते इफरात किस्सेकहानियों में से एक दिलचस्प कहानी राजा भोज की है जो एक बार अपने राजकवि पंडित धनपाल के साथ जंगल से होते कहीं जा रहे थे. रास्ते में भोज ने देखा कि बरगद के एक बड़े पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता है जो शहद के वजन से लगभग गिरने को ही था. गौर से देखने पर एहसास हुआ कि मधुमक्खियां उस छत्ते से अपने हाथपैर घिस रही हैं. उन्होंने धनपाल से इस की वजह पूछी तो उस ने भोज की शंका दूर करते बताया कि महाराज, दान की बड़ी महिमा है. शिवि, दधीची, कर्ण और बलि जैसे अनेक दानियों के नाम उन के न रहने के बाद भी चल रहे हैं जबकि केवल धन संचय करते रहने वाले बड़ेबड़े राजामहाराजाओं का नाम लेने वाला भी कोई नहीं.

मधुमखियों ने केवल संचय ही किया है, कभी दान नहीं दिया, इसलिए आज अपनी संपत्ति को नष्ट होते देख उन्हें दुख हो रहा है, सो, वे अपने हाथपैर घिस रही हैं. यानी, जरूरत से ज्यादा पैसा इकट्ठा करना दुख का कारण होता है. सार यह कि अगर आप भी धन का संचय करते हैं और दान नहीं देते तो तय है कि आप सनातनविरोधी हैं. इस के बाद भी आप को देश में रहने दिया जा रहा है तो यह आप के पूर्व जन्मों के सुकर्मों का फल है. अब यह और बात है कि दरअसल इस का श्रेय जाता तो संविधान और लोकतंत्र को है जिन की स्थापना में दान की खाने वालों ने कम अड़ंगे नहीं डाले थे.

तमाम पौराणिक ग्रंथ दान की महिमा से भरे पड़े हैं जिन पर थोड़ी सी ईमानदारी या अधिकतम बेईमानी से भी अमल किया जाए तो दान के बिना जिंदगी बेकार लगती है. जीवन सार्थक बना रहे, इसलिए हर हिंदू को बचपन से ही दान करने की लत लगा दी जाती है. लागी छूटे न… की तर्ज पर आदमी जिंदगीभर फिर दान ही करता रहता है और जिस दिन दान न करे, उस दिन उसे अपने नास्तिक और पापी होने का गिल्ट घेरने लगता है, जिसे दूर करने वह फिर दान करने के लिए भागता है. इसे ही मार्क्स ने अफीम का नशा कहा है.

पूरी दुनिया और तमाम धर्मों के मानने वाले इस नशे की लत की गिरफ्त में हैं जिन में होड़ इस बात की लगी है कि कौन ज्यादा से ज्यादा दान करता है. मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे वगैरह किसी ऊपर वाले के नहीं, बल्कि नीचे उस के नाम पर धंधा कर रहे उस के दलालों और कमीशनखोरों के बनाए हुए हैं. हैरानी की बात यह भी है कि इन लूट केंद्रों को बनाने का पैसा भी भक्तों से लिया गया जो जिंदगीभर वे कर्ज, जो असल में कभी लिया ही नहीं, की किस्तों की तरह इसे भरते रहते हैं.

मंदिरों में बरस रहा पैसा

दान के पैसे की एक बड़ी लिस्ट ब्रैंडेड मंदिरों में जाती है, जिस की तुलना भोज वाली कहानी की मधुमक्खियों से की जा सकती है जिन के छत्ते का शहद खुद मधुमक्खियां नहीं बल्कि पंडेपुजारी, मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट वगैरह खाते हैं. मधुमक्खियां वे भक्त हैं जो दान देने को इन मंदिरों के इर्दगिर्द मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहते हैं. इन भक्तों के दान देने की लत के चलते देश के टौप 10 मंदिरों के पास कुल जमा 9 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा की जायदाद इकट्ठा हो गई है.

ग्लोबल वैल्थ इंडैक्स 2026 के मुताबिक, तिरुपति बालाजी मंदिर सब से टौप पर है जिस की जायदाद 3 लाख करोड़ रुपए के लगभग है. आइए बाकी मंदिरों का हाल भी देखें कि उन में कितनी जायदाद है और औसतन कितना चढ़ावा प्रतिदिन आता है.

टौप-10 अमीर मंदिर

१. पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,50,000-2,50,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 15-25 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 5-6 लाख रुपए.

२. तिरुपति बालाजी (आंध्र प्रदेश).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,00,000- 3,38,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय :5,258 करोड़ रुपए

रोज औसत आय : 4-6 करोड़ रुपए

३. स्वर्ण मंदिर (अमृतसर).

कुल अनुमानित संपत्ति : अमूल्य (ऐतिहासिक व स्वर्ण).

सालाना आय : 1,260 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1.5-2 करोड़ रुपए.

४. जगन्नाथ मंदिर (पुरी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,20,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 1,000-1,200 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 5-8 लाख रुपए.

५. साईं बाबा मंदिर (शिरडी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 500-600 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1-1.5 करोड़ रुपए.

६. श्रीराम मंदिर (अयोध्या).

कुल अनुमानित संपत्ति : 6-9 हजार करोड़ रुपए.

सालाना आय : 327 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1-1.5 करोड़ रुपए.

७. वैष्णों देवी मंदिर (जम्मू).

कुल अनुमानित संपत्ति : 2,500 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 250-300 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 50-60 लाख रुपए.

८. सिद्धिविनायक मंदिर (मुंबई).

कुल अनुमानित संपत्ति : 800 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 133 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 35-40 लाख रुपए.

९. काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 100-125 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 25-35 लाख रुपए.

१०. सोमनाथ मंदिर (गुजरात).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,100 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 40-55 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 15-20

लाख रुपए.

डर और लालच हैं वजहें

कहने को ही ये और इन जैसे लाखों छोटेबड़े मंदिर आस्था के केंद्र हैं वरना तो सच यह है कि भक्त इन में डर और लालच के चलते पैसा चढ़ाते हैं. उन्हें चाहिए रहती है सुखमय जीवन की गारंटी जो दान के एवज में देने का दावा सिर्फ धर्म करता है लेकिन यहां भी एक डिस्क्लेमर चस्पां है कि सुखमय जिंदगी मिले न मिले, यह भाग्य की बात है. भक्तों को डर नरक का और लालच स्वर्ग का रहता है जहां ऐशोआराम के तमाम साधन मौजूद हैं. नरक का डर इसलिए रहता है कि वहां पापियों, जो जाहिर है दान न करने वाले या हैसियत से कम दान करने वाले होते हैं, को तरहतरह की दिलकंपा देने वाली सजाएं दी जाती हैं.

इन सजाओं का जिक्र गरुड़ पुराण में विस्तार से मिलता है जिस का पाठ घर में किसी मौत के बाद 10 दिनों तक ब्राह्मण से करवाया जाता है. गरुड़ पुराण में कोई 28 तरह के प्रमुख नरक बताए गए हैं जिन में पापियों को तरहतरह की यातनाएं दी जाती हैं. ऐसे ही एक नरक का नाम शूलप्रोत नरक है जहां दान न करने वालों या हैसियत से कम दान करने वालों को सजा का प्रावधान है. इन लोगों के शरीर को यमदूत नुकीली सूइयों से सालोंसाल तक सिलते रहते हैं जिस की तकलीफ के बारे में कल्पना करना ही जेब ढीली करवाने को पर्याप्त है.

दान न कर के कैसे लोग दरिद्र यानी गरीब हो जाते हैं, इस का भी खुलासा करते एक श्लोक में गरुड़ पुराण कहता है-

दानदोषेण भवेद् दरिद्र:

दरिद्रभावाच्च करोति पापम्।

पापप्रभावान्नरकं प्रयाति

पुनर्दरिद्र: पुनरेव पापी॥

अर्थात जो व्यक्ति दान नहीं करता (अदान) वह अगले जन्म में दरिद्र होता है. दरिद्रता के कारण वह पाप करता है और पाप के कारण नरक में जाता है. फिर बारबार यही होता है.

अब कौन भला आदमी गरीब और दरिद्र रहते परलोक में भी नरक भोगना चाहेगा, इसलिए वह हैसियत से बढ़ कर दान करता है. दान करने को सब से मुफीद जगह मंदिर हैं जिन में हर तरह के प्रगट व गुप्तदान स्वीकार किए जाते हैं. हजारदोहजार रुपए में नारकीय यातनाओं से बचने का आश्वासन भी घाटे का सौदा नहीं. मंदिर और दान से इतर गरुड़ पुराण के उक्त श्लोक के फलसफे पर गौर करें तो उस में सीधेसीधे गरीबों को पापी करार दिया गया है. यह ट्रिगनामेट्री एक ट्रैंगिल यह बनाती है कि दान न करने वाला अगले जन्म में गरीबी में पैदा होता है. यह गरीबी पाप यानी अपराध करवाती है और यही पाप नरक में ढकेलते हैं. जाहिर है सारे फसाद की जड़ गरीबी है. अब यह सम?ाने वाला कोई नहीं कि मेहनत, शिक्षा और प्रतिभा से गरीबी दूर होती है, दान से तो वह और बढ़ती है.

अपात्र भी कर रहे दान

मंदिरों में चढ़ावे की रकम अगर बढ़ रही है तो उस की एक वजह यह है कि अब वे लोग भी मंदिरों में दान कर रहे हैं जिन्हें धर्मग्रंथ शूद्र करार देता है. यानी, वे दलित, आदिवासी और पिछड़े जिन्होंने थोड़ाबहुत पैसा कमा लिया है, खुद को सवर्ण साबित करने के लिए दान करने लगे हैं. धर्मग्रंथों में जगहजगह शूद्रों को धकियाने और लतियाने के निर्देश तो हैं लेकिन उन से दानदक्षिणा न लेने का जिक्र कहीं नहीं मिलता. बात सही भी है कि पैसे की कोई न तो जाति होती, न ही जैंडर होता और न ही धर्म होता. ब्रैंडेड मंदिरों में अब कोई भी जा कर दानपेटी की भूख मिटा सकता है. इस अघोषित छूट से मंदिरों को फायदा यह हुआ कि दलित, पिछड़े और आदिवासी भी दान करने वहां जाने लगे. जो उन के लिए एक रोमांचक घटना से कम नहीं होता.

भोपाल के दलित समुदाय के सरकारी विभाग के एक इंजीनियर की मानें तो वे जब आज से लगभग 4 साल पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर गए तो अंदर घुसते यह सोचसोच कर डर रहे थे कि अगर किसी ने जाति पूछ ली तो क्या होगा. मंदिर में प्रवेश दिया भी जाएगा या नहीं. कहीं दुत्कार कर भगा न दिया जाए. इन्हीं शंकाओं और चिंता में डूबे वे कब धक्के खाते शंकर के सामने पहुंच गए, पता ही नहीं चला लेकिन जब पहुंच ही गए तो भावविह्वल हो गए और जेब से पांचपांच सौ के दस करारे नोट निकाल कर पुजारी के सामने रखे थाल में रख दिए.

पुजारी ने दस खरेखरे नोट देख कर प्रसन्न हो कर उन्हें खूब सा आशीर्वाद दिया, उन के माथे पर टीका लगा दिया और साथ में फूलमाला, प्रसाद वगैरह भी थमा दिए जो आमतौर पर पैसे वाले यजमानों को दिया जाता है और आमतौर पर जो सवर्ण ही होते हैं. तो इस तरह उस दिन से इंजीनियर साहब खुद को सवर्ण सम?ाने लगे. यह कुंठा है, हीनता है, ग्लानि है, आत्ममुग्धता है या एक गैरजरूरी मूर्खता है, यह तो वही जानें लेकिन अब वे दिल से नहीं बल्कि दिमाग से दान करते हैं. इधर ठेकेदारों से घूस लेते हैं और उस का चौथाई हिस्सा धर्म के ठेकेदारों को दे आते हैं.

इस तरह के पैसों से भी मंदिरों में चढ़ावा बढ़ रहा है जो धंधे के लिहाज से हर्ज की बात मकसूद शायर की इस पंक्ति ‘उस मय से दिल ही में जो खिंचती है…’ की तर्ज पर नहीं है. निष्कर्ष यह कि अगर आप के पास दान देने को तगड़ा पैसा है तो आप की जाति नजरअंदाज कर दी जाएगी लेकिन समाज में हैसियत सुधरने का ठेका नहीं लिया जाएगा. इस पैसे से तो आप अगले जन्म में अच्छी योनि में पैदा होने की बुकिंग फिक्स कर रहे हैं, जो कि किसी ने देखी ही नहीं. दान की बाबत कमाई का जरिया तो कोई कभी पूछता ही नहीं, इसलिए यह कहावत बनी कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, जो जैसे जितना दे उसे चुपचाप रख लिया जाता है.

महिलाएं हैं बड़ी दानी

शूद्रों की तरह सवर्ण महिलाओं की बाबत भी धर्मग्रंथों में तरहतरह के निर्देश हैं कि वे दासी हैं, अशुद्ध और अपवित्र हैं. और तो और, वे नरक का द्वार भी हैं लेकिन इस के बाद भी इन से दान न लेने की बात कहीं नहीं कही गई है. किसी भी मंदिर में देख लें या धार्मिक आयोजन में देख लें, पुरुषों से ज्यादा महिलाएं नजर आती हैं क्योंकि वे भी शूद्रों की तरह अपना उद्धार चाहती हैं, परलोक सुधारना चाहती हैं. दूसरे, उन के धार्मिक बने रहने से घर के पुरुषों को भी खुशी होती है कि चलो, इन्हें इसी बहाने अपनी हैसियत का एहसास होता रहेगा और ये हमारी गुलामी ढोने से इनकार नहीं करेंगी.

यह भी और बात है कि शिक्षा और जागरूकता के चलते महिलाएं, थोड़ी तादाद में ही सही, आर्थिक तौर पर आजाद हुई हैं लेकिन धार्मिक बेडि़यों से मुक्त हो गई हैं, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. दिलचस्प लेकिन चिंता की बात यह है कि जब महिलाएं ज्यादा कमाने लगती हैं तो दान भी ज्यादा करने लगती हैं. अशोका यूनिवर्सिटी के सैंटर फौर सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैंथ्रोपी के नए आंकड़ों के मुताबिक, महिलाएं दान करने में पुरुषों से ज्यादा सक्रिय रहती हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक ही भारत में घरेलू दान की अनुमानित राशि 540 अरब रुपए से भी ज्यादा है.

दान करने में महिलाएं पुरुषों से उन्नीस नहीं हैं. वे कम पैसों वाले छोटेछोटे नियमित दान ज्यादा करती हैं और सालभर करती हैं. साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन उन्हें तरहतरह के, मसलन करवा चौथ, संतान सप्तमी, ग्यारस, नवमी, अष्टमी सहित उन के इष्ट के खास दिन के व्रतउपवास रखने पड़ते हैं और अधिकतर में दान का विधान है. अलावा इस के, महिलाओं की परवरिश बचपन से ही जरूरत से ज्यादा धार्मिक बंदिशों में होती है, इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा दान करती हैं.

दान क्यों

धार्मिक दान एकदम बेतुकी बात है जिस में पैसे की बरबादी की 100 फीसदी गारंटी रहती है. दान के पैसे से सिर्फ पंडेपुजारी पलते हैं जिन का समाज और देश के विकास में कोई योगदान नहीं होता. उलटे, ये देश को पिछड़ा बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ब्रैंडेड मंदिरों में पंडेपुजारियों की आमदनी लाखों रुपए महीना तक होती है. छोटे से छोटे मंदिर का पुजारी भी शान से गुजर करने लायक कमा लेता है. यह बहुत ही बारीकी से सोचने की बात है कि दान का पैसा भगवान के पास नहीं जाता क्योंकि वह कहीं है ही नहीं. दान के पैसे पर मौज वही पंडेपुजारी करते हैं जो पीढि़यों से लोगों को दान के लिए उकसाते रहे हैं और मेहनत की खाने से परहेज करते हैं. अब वक्त है कि हरकोई अपनी मेहनत से कमाए गए पैसों की कीमत समझे और उसे मंदिरों में दान करने जैसे अनुत्पादक कामों में न लगाए. Religious Donation Truth

अंगूठे की जात

Thumb Story: उंगलियों की दुनिया में भी राजनीति कम दिलचस्प नहीं है. तर्जनी खुद को क्रांतिकारी मानती है, मध्यमा बदनाम है और अनामिका बेवजह दिल से जुड़ी अफवाहों का बोझ ढो रही है. मगर असली पावर सैंटर तो अंगूठा ही है-चाहे वोट डालना हो या मशीन अनलौक करनी हो. इस देश में अकसर दिमाग नहीं, अंगूठा ही काम करता है.

चौरासी लाख योनियों में मानव का जीवन प्राप्त करना अपनेआप में बड़ी उपलब्धि है. ईश्वर ने सोचसोच कर हमारे अंदर एकएक पार्ट फिट किए हैं तो भाई, इस शरीर का गुमान होना तो स्वाभाविक है. उदाहरण के लिए जैसे हमारे शरीर में 2 हाथ और 2 पैर होते हैं जिन में कुल मिला कर 20 उंगलियां होती हैं. हर एक उंगली का अपना महत्त्व है. पैर की उंगलियों को छोड़ दें, हाथ की उंगलियों की बात करें तो सब से ज्यादा महत्त्व अंगूठे का रहा है. हमारी अम्मा कहती थी, हमारे अगूंठे में अमृत होता है. हम ने इस बात को थोड़ा ज्यादा ही सीरियसली ले लिया था और बचपन में अंगूठे को इतना चूसा कि अम्मा को हार कर हमारे हाथों में कपड़े का दस्ताना पहनाना पड़ा. बेचारा हमारा अंगूठा शहीद होने से बचा था.

अंगूठे का जिक्र तो पौराणिक काल से होता चला आ रहा है. महाभारत काल में तो अंगूठे के कारण गुरु पर पक्षपात का आरोप भी लग गया था. दरअसल, गुरुजी को महसूस हुआ कि वह व्यक्ति तो बिना उन्हें फीस दिए उन से शिक्षा प्राप्त कर रहा है, और तो और, उन के प्रिय शिष्य से ज्यादा योग्य व प्रभावशाली है. राजा का बेटा राजा होने की तो परंपरा रही है पर योग्य का बच्चा भी योग्य हो, यह जरूरी तो नहीं.

हम आज नैपोटिज्म का ढोल अपने गले में लटकाए बिना बात के पीट रहे हैं जबकि उस की नींव तो बहुत पहले ही पड़ चुकी थी. अब उस जमाने में इंस्टाग्राम और ट्विटर तो था नहीं कि कोई ट्रैंड चला दिया जाता. “# sameonGuru ji”। तमाम चैनलों पर प्राइम टाइम पर एक्सपर्ट की खिड़कियां खुल जातीं और वे गला फाड़फाड़ कर बिना किसी नतीजे की बहस करते.

कल्पना कीजिए अर्जुन के सपोर्ट में ट्रोल आर्मी बैठ जाती और दूसरी तरफ एकलव्य के सपोर्टर्स ट्वीट करते लेकिन हमारे गुरुजी बड़े चालाक निकले, आखिर गुरुजी की रेपुटेशन की बात थी, उन्होंने आव देखा न ताव फीस में, मतलब गुरुदक्षिणा में, शिष्य का अंगूठा ही मांग लिया. वहीं, यह बात भी सच है कि इतिहास में ‘मैरिट बनाम नैपोटिज्म’ की बहस अमर हो गई. खैर. तिलक लगाने से ले कर मांग में सिंदूर भरने की प्रक्रिया में अंगूठा बाजी मार गया. ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि विपरीत परिस्थितियों में नायक को जब भी नायिका की मांग खून से सजानी हो तो अंगूठा सब से पहले कूद पड़ा है और उंगलियों को मौका भी नहीं मिला.

अंगूठे ने बड़े हो कर भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा. परिवार के लोगों ने भले ही हमें आज भी बुद्धिमान और बड़ा नहीं समझ पर संविधान ने हमें 18 साल का होते ही इस योग्य समझ लिया कि सरकार बनाने में हम भी अपना योगदान दे सकते हैं पर एक बात का अफसोस हमेशा रहा कि पढ़ेलिखे होने और धड़ाधड़ इंग्लिश बोलने के बावजूद उन्होंने हमें अंगूठाछाप ही समझ. वोट डालने के लिए हम पढ़ेलिखे हो कर भी अंगूठाछाप बने हुए थे.

पर बात यहां पर भी खत्म हो जाती तो ठीक थी पर नई टैक्नोलौजी ने हमें पूरी तरह से अंगूठाछाप घोषित कर दिया है और हमारी डिग्रियां, जो हमारे पढ़ेलिखे होने का सुबूत थी, कहीं दूर मुंह छिपाए मातम मना रही हैं. अंगूठा इतना स्मार्ट हो गया है कि वह हमारी पूरी पर्सनल लाइफ का सिक्योरिटी गार्ड बन चुका है. मोबाइल चलाना हो या फिर दरवाजा खोलना या फिर अपनी अटैंडैंस लगानी हो या फिर आप पासवर्ड भूल जाए तो फिकर नौट, अपना अंगूठा लगाइए और आप के लिए आप की सारी दुनिया खुल जाएगी. कभीकभी हमें लगता है कि हमारी सारी ताकत अंगूठे में आ कर रुक गई है. बेचारी बाकी उंगलियों का क्या दोष है? हम जब लिखते हैं तो सारी उंगलियां साथ देती हैं पर जब बात सम्मान की आती है तब अंगूठे की ही वाहवाही होती है.

तर्जनी इस बात पर नाराज है कि वह दिशा दिखाती है, क्रांति लाती है पर सुर्खियां तो अंगूठा ही बटोर ले जाता है. मध्यमा की हालत तो सैंडविच की तरह है जिसे लोग गंदी नजर से देखते हैं. जब से डीडीएलजे फिल्म आई, अनामिका पर तो बिना बात के इस बात का बोझ लाद दिया गया कि उस की नसें दिल तक जाती हैं, शादीब्याह की अंगूठियों का बोझ क्या कम था जो एक नया बोझ और लाद दिया गया है. अब बारी आती है कनिष्ठा की तो उस की अहमियत जीवनभर शौचालय का रास्ता दिखाने और कान खुजाने से ज्यादा नहीं रही. कुल मिला कर महफिल लूटने का काम अंगूठे के हिस्से ही आया.

कभी यह अंगूठा लोकतांत्रिक प्रतीक बन जाता है तो कभी टैक्नोलौजी का पहरेदार. अंगूठे का दबदबा आज भी कायम है. बाकी उंगलियां चाहे जितना रो लें, भाई, इस देश में दिमाग से ज्यादा ताकत अंगूठे में ही है. दिमाग बहस करता है, दिल बहलता है लेकिन फैसला अंगूठे ही लाता है चाहे वह ईवीएम मशीन के माध्यम से हो या फिर बायोमैट्रिक मशीन द्वारा. सो बोलो, अंगूठे भैया की जय. Thumb Story

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साहित्यकार जौर्ज औरवेल इन की धरोहर जर्जर हालत में 

1892 से 1904 के बीच रिचर्ड वाल्म्सले ब्लेयर भारतीय सिविल सेवा में अफीम विभाग के अधिकारी थे. ब्रिटिश राज के समय पूर्वी चंपारण जिला यानी मोतिहारी अफीम उत्पादन का केंद्र था, इसलिए ब्लेयर अपने परिवार के साथ मोतिहारी में 3 कमरों वाले बंगलेनुमा घर में रहते थे. मोतिहारी शहर में गोपाल साह हाईस्कूल के पास आज भी यह घर मौजूद है. ब्लेयर के घर के पास ही एक गोदाम भी था जो अफीम के स्टोरेज के लिए इस्तेमाल होता था. 25 जून, 1903 को मोतिहारी के इसी घर में दुनिया की एक महान शख्सियत का जन्म हुआ था. उस बच्चे का नाम था एरिक आर्थर ब्लेयर, जो आगे चल कर जौर्ज औरवेल के नाम से जाना गया.

जौर्ज औरवेल बेहद छोटी उम्र में ही अपनी मां इडा ब्लेयर के साथ इंगलैंड चले गए थे. सो, मोतिहारी में उन के बचपन की यादें तो नहीं रहीं लेकिन वह स्थान उन के जन्म के कारण दुनियाभर में मशहूर हो गया.

जौर्ज औरवेल 20वीं सदी के सब से महान इंग्लिश लेखकों में से एक हैं जिन की रचनाएं सामाजिक अन्याय के खिलाफ क्रांतिकारी दस्तावेज की अहमियत रखती हैं. 1945 में जौर्ज औरवेल ने ‘एनिमल फार्म’ लिखा. इस उपन्यास के जरिए औरवेल ने सोवियत रूस के स्टालिनवादी शासन की जम कर आलोचना की. इस नौवेल में उन्होंने जानवरों की क्रांति के जरिए सत्ता के भ्रष्टाचार को बेहद शानदार तरीके से दिखाया है.

1949 में जौर्ज औरवेल ने ‘नाइनटीन एटी फोर’ नामक मशहूर उपन्यास लिखा. इस उपन्यास के जरिए औरवेल ने सर्विलांस वाली डिस्टोपियन दुनिया का चित्रण किया है. यह उपन्यास आज भी प्रासंगिक है. औरवेल की कई रचनाएं सिस्टम की खामियां और कुलीन तंत्र के भ्रष्टाचार को दर्शाती हैं. औरवेल की लिखी ‘बर्मी डेज’, ‘द रोड टू विगन पियर’, ‘होमेज टू कैटेलोनिया’ जैसी रचनाएं बेहद क्रांतिकारी साबित हुईं. औरवेल नास्तिक थे, फिर भी वे न तो पूंजीवाद के समर्थक थे और न ही स्टालिनवादी साम्यवाद के समर्थक. वे दोनों विचारधाराओं के भ्रष्टाचारों के खिलाफ थे. 46 की उम्र में 21 जून, 1950 को लंदन में औरवेल का निधन हो गया.

2014 में बिहार सरकार ने औरवेल के बंगले को दुनिया का पहला जौर्ज औरवेल म्यूजियम बनाने की योजना बनाई. मरम्मत का काम भी शुरू हुआ लेकिन हुआ कुछ नहीं. दुनिया के सब से महान साहित्यकार की पैदाइश वाली यह जगह आज भी जर्जर हालत में है.

जौर्ज औरवेल ने गरीबी,  साम्राज्यवाद और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर खुल कर लिखा. सत्ता के दुरुपयोग, झूठी प्रचार व्यवस्था और आम नागरिकों की आजादी के विषय पर औरवेल की लिखी किताबें आज भी प्रासंगिक हैं.

आज जौर्ज और्वेक इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उन की किताबें और मोतिहारी का उन का घर हमेशा रहेंगे.

 

 

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