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The Choshu Five : सिर्फ 5 युवा जिन्होंने 1863-1890 में जापान को बदल डाला

The Choshu Five : चोशू 5 वे युवा थे जो 1863 में जापान से निकले और 1868 में लौटे. पुरानी व्यवस्था को गिराया और 1890 तक जापान को एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया. आज के जापान के रेलवे, शिक्षा, तकनीक, नौसेना, उद्योग और लोकतंत्र के नायक यही 5 नौजवान थे. इन पांचों के बिना जापान भी 19वीं सदी में भारत या चीन की तरह यूरोप का गुलाम बन जाता. जापान ने तय किया कि या तो आधुनिक बनो या गुलाम बन जाओ. सिर्फ 30-40 साल में जापान ने नौसेना, उद्योग, शिक्षा, रेलवे, बैंकिंग सबकुछ पश्चिमी मौडल पर खड़ा कर लिया. यह दुनिया के इतिहास की सब से तेज मौडर्नाइजेशन की प्रक्रिया थी. आखिर, सिर्फ 3 दशकों में कैसे बदला जापान, आइए जानते हैं.

आज अमेरिका और यूरोप में भारतीयों की स्थिति बेहतर नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप की नीयत और उन की नीतियां इमिग्रैंट्स के खिलाफ हैं. इस के चलते भारतीयों के लिए अमेरिका ख्वाब बनता जा रहा है. भारतीयों के लिए यूरोप में भी स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई. दशकों से मिडिलईस्ट में चल रही अराजकता के कारण यूरोप पहले से ही शरणार्थी संकट से जूझ रहा है, ऐसे में यूरोप के कई देशों ने इमिग्रेशन पौलिसी में बदलाव किए हैं जिस से सब से ज्यादा नुकसान भारतीयों को हो रहा है लेकिन सवाल यह है कि भारतीयों की भारत से भागने की होड़ क्यों है? सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा कहने वाले लोग ही हिंदुस्तान से भागने को तत्पर क्यों नजर आ रहे हैं?

जापान के इतिहास की एक बेहद महत्त्वपूर्ण घटना है जिसे ‘चोशू फाइव’ के नाम से जाना जाता है. बात 1863 की है जब 5 जापानी नौजवान इतो हिरोबुमी, इनौए काओरू, यामाओ योजो, नोमुरा याकिची और एंडो किनसुके कोयले से लदे जहाज में छिप कर जापान से ब्रिटेन चले गए थे. उस दौर में इस तरह जापान से बाहर भागना किसी भी जापानी के लिए अपराध था. पकड़े जाते तो देशद्रोह के जुर्म में फांसी हो जाती. ये पांचों जापान के पहले ऐसे नौजवान थे जिन्होंने यूनिवर्सिटी कालेज, लंदन में दाखिला लिया और वहां से इंजीनियरिंग, राजनीति, अर्थशास्त्र, तकनीक और विज्ञान की शिक्षा हासिल की.

5 साल तक शिक्षा लेने के बाद ये पांचों नौजवान जापान लौटे और इन्होंने जापान को बदल दिया. इन्हीं पांचों नौजवानों की बदौलत जापान एक फिसड्डी फ्यूडल देश से एक महाशक्ति के रूप में उभरा. इतो हिरोबुमी बाद में जापान के पहले प्रधानमंत्री और संविधान निर्माता बने. इनौए काओरू विदेश मंत्री बने. यामाओ योजो इंजीनियरिंग में एक्सपर्ट थे, उन्होंने मौडर्न जापान के इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव डाली और बाद में इंपीरियल कालेज औफ इंजीनियरिंग की स्थापना की. नोमुरा याकिची नौसेना प्रमुख बने. एंडो किनसुके ने चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में जापान को मौडर्न देशों की कतार में ला खड़ा कर दिया.

चोशू 5 के नाम से मशहूर ये वे 5 जापानी नौजवान थे जो अपनी जान जोखिम में डाल कर विदेश पहुंचे. वहां मजदूरी कर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया. महज 5 साल में ही इतनी नौलेज इकट्ठी कर ली कि जब लौटे तो इन्होंने जापान को बदल दिया. इन्हीं पांचों की वजह से आज का आधुनिक जापान बना है.

चोशू 5 ने कैसे बदला जापान?

उन्नीसवीं सदी वह दौर था जब एशिया के तमाम देशों पर यूरोप की सम्राज्यवादी ताकतों द्वारा कालोनी बनाए जाने का खतरा मंडरा रहा था. 1868 से पहले जापान में तोकुगावा शोगुनेट नाम के एक गुट के पास सत्ता थी जबकि सम्राट केवल नाममात्र का राजा था. 1853-54 में अमेरिकी कमोडोर मैथ्यू पेरी ने अपने ‘ब्लैक शिप्स’ के साथ जापान आ कर जबरन बिजनैस समझते किए.

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ये वही 5 जापानी युवा हैं जो डेढ़ सौ साल पहले विषम परिस्थितियों में जापान से बाहर निकल कर इंगलैंड पहुंचे और वापस आ कर जापान को बदल दिया.

अमेरिकी ताकतों का जापान में दाखिल होने और बिजनैस के नाम पर जमीनें हथियाने के पीछे तोकुगावा शोगुन के लोग जिम्मेदार थे. यह जापान के गुलाम होने की शुरुआत थी. इस से जापान के समुराई तोकूगावा शोगुन गुट के खिलाफ हो गए. जापान में ‘सम्राट का सम्मान करो, विदेशियों को भगाओ’ का नारा प्रसिद्ध हुआ. लेकिन एक दशक के बाद विद्रोही गुटों को समझ आया कि जापान से विदेशियों को भगाना संभव नहीं, बल्कि उन से सीखना जरूरी है.

चोशू 5 के पांचों नौजवानों के जापान में वापस लौटने के बाद 3 जनवरी, 1868 को शोगुनेट शासन का अंत कर दिया गया और सारी सत्ता सम्राट के पास वापस चली गई. टोक्यो को नई राजधानी बनाया गया. छोटी रियासतें खत्म कर सैंट्रल गवर्नमैंट बनाई गई. समुराई वर्ग को पैंशन दे कर नौकरी से हटा दिया गया.

सेना को सैंट्रलाइज्ड किया गया और पश्चिम देशों की तर्ज पर सेना में भरती व ट्रेनिंग की व्यवस्था की गई. 1872 में प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और सब के लिए अनिवार्य कर दिया गया. ‘समृद्ध देश, मजबूत सेना’ के नारे के साथ रेल, जहाज, कारखाने, बैंक और हौस्पिटल्स बनाए गए. 1889 में जरमनी की तर्ज पर मीजी संविधान लागू किया गया. कपड़े, खानपान, रहनसहन, कानून, तकनीक और व्यापार में पश्चिमी कल्चर को अपनाया गया. इन तमाम कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि जापान एक पिछड़े हुए सामंती देश से सिर्फ 30-40 वर्षों में एशिया की पहली महाशक्ति बन गया. 1894-95 में चीन को और 1904-05 में रूस को हरा कर जापान ने दुनिया को चौंका दिया.

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इतो हिरोबुमी

मीजी पुनर्स्थापना वह क्रांति थी जिस ने जापान को मध्ययुग से मौडर्न युग में पहुंचाया और उसे विश्वशक्ति बनाया. जापान के वे पांचों युवा इस क्रांति के नायक बने जिन्होंने जापान से बाहर निकल कर देशद्रोह किया था. बिना इन 5 युवाओं के मीजी क्रांति इतनी तेजी से और इतने कम खूनखराबे से संभव न होती.

इन्हीं 5 नौजवानों ने ‘जापान को बचाने के लिए पहले उसे बदलना होगा’ का विचार दिया. इन पांचों ने देखा कि पश्चिमी देश कितने आगे हैं? लौट कर इन्होंने यह समझया कि अगर जापान पुरानी व्यवस्था में रहा तो गुलाम बना दिया जाएगा.

चोशू फाइव वे 5 युवा थे जो 1863 में जापान से निकले. 1868 में जापान लौटे और पुरानी व्यवस्था को गिराया और 1890 तक जापान को एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया. आज के जापान के रेलवे, शिक्षा, तकनीक, नौसेना, उद्योग और लोकतंत्र के नायक यही 5 नौजवान  हैं. इन पांचों के बिना जापान भी भारत या चीन की तरह 19वीं सदी में यूरोपीय उपनिवेश बन जाता.

250 साल तक बंद देश रहने के बाद जापान ने तय किया कि या तो आधुनिक बनो या गुलाम बन जाओ. सिर्फ 30-40 साल में जापान ने नौसेना, उद्योग, शिक्षा, रेलवे, बैंकिंग सबकुछ पश्चिमी मौडल पर खड़ा कर लिया. यह दुनिया के इतिहास की सब से तेज मौडर्नाइजेशन की प्रक्रिया थी.

वर्ष 1900 तक ही जापान में साक्षरता दर 90 फीसदी से ऊपर पहुंच गई थी. उस समय भारत में शिक्षा दर 5 फीसदी भी नहीं थी. आज भी जापान की पीआईएसए रैंकिंग हमेशा टौप 5 में रहती है. जापान में इंजीनियरिंग और विज्ञान में पीएचडी करने वालों की संख्या प्रतिव्यक्ति सब से ज्यादा है.

जापान अकेला वह देश था जिस ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका से सीधी टक्कर ली. 1945 में हार के बाद अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराए लेकिन जापान एक दशक में ही उठ खड़ा हुआ और उस ने दुश्मनी भुला कर अमेरिका को अपनी तरक्की में साझेदार बना लिया. अमेरिका ने जापान में जमीन सुधार किया, जमींदारी खत्म की और सब से बड़ी बात, जापान को सेना पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 1 फीसदी ही रखने दिया ताकि सारा पैसा अर्थव्यवस्था में लगे.

जापान की सरकार ने 1950-80 के दशक में स्टील, शिप, कार, इलैक्ट्रौनिक्स और रोबोटिक्स इंडस्ट्री को सब्सिडी, टैक्स छूट और प्रोटैक्शन देना शुरू किया जिस से इस क्षेत्र में जापान सब से आगे पहुंच गया. जापान को देख कर ही कोरिया और चीन ने भी यही मौडल कौपी किया. जापान ने 150 साल पहले फैसला किया कि ‘हम दुनिया में सब से अच्छे बनेंगे’ और फिर शिक्षा, अनुशासन, लंबी सोच, बिजनैस, सहयोग और सामाजिक एकता से इस ख्वाब को पूरा कर दिखाया.

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इनौए काओरू

जापान की यह क्रांति उन 5 नौजवानों की बदौलत है जो कोयले के जहाज में छिप कर लंदन गए थे. वर्ष 1868 में इन लोगों ने वापस लौट कर जापान को बदलने में अहम भूमिका निभाई. अब सवाल यह है कि भारत के नौजवान उस वक्त क्या कर रहे थे?

भारतीयों ने क्यों नहीं लांघी देशों की सीमा?

मनुस्मृति के अध्याय 3, श्लोक 158 में कहा गया है कि समुद्र यात्रा करने से व्यक्ति का धर्म भ्रष्ट होता है क्योंकि इस से पवित्रता और आचरण के नियम टूटने की आशंका रहती है और इस से व्यक्ति की जाति और धार्मिक शुद्धता प्रभावित होती है. यही कारण है कि 19वीं सदी तक भारत के ऊंची जाति के लोग विदेश यात्राओं से बचते थे.

दरअसल, सवर्णों को विदेश जाने की जरूरत भी नहीं थी. वर्णव्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी. विलासिता का जीवन था, जमीनें थीं और जमीनों पर काम करने वाले सस्ते मजदूर थे. सत्ता में राजपूत हों, मुगल हों या अंगरेज हों, इन की विलासिता पर कोई आंच नहीं आती थी. समुद्र पार कर विदेशी धरती तक जाने का जोखिम कौन उठाता? जरूरत भी क्या थी? स्पैनिश लोगों ने अमेरिका की खोज यों ही नहीं की थी. उन्हें अवसरों की तलाश थी. कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की क्योंकि उन्हें नई जगह खोजनी थी. वास्को डी गामा भारत घूमने नहीं निकले थे बल्कि उन की मजबूरी उन्हें यहां तक लाई थी.

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1870 के दशक तक जापान के हालात बदतर थे. गरीबी, बेरोजगारी, जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार चरम पर था. इंगलैंड से पढ़ कर आए 5 लड़कों ने अगले कुछ दशकों में जापान की तसवीर बदल दी.

जापान के 5 समुराई नौजवानों के पास देश को बदलने का विजन था लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग के पास न तो ऐसा कोई विजन था, न कोई मजबूरी थी, न ही अवसरों की तलाश थी और न ही ज्ञान की लालसा थी. भारत के अपर कास्ट वाले यह भ्रम पाले बैठे थे कि सारा ज्ञान तो इन की पोथियों में पहले ही भरा हुआ है, फिर ज्ञान की तलाश में विदेश क्यों जाना?

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यामाओ योजो

यही कारण है कि पूरी 19वीं सदी में भारत से विदेश (ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका) जाने वाले भारतीयों की संख्या बहुत कम थी. उस समय समुद्र यात्रा को हिंदू धर्म में पाप माना जाता था और ऐसा पाप करने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाना तय था. फिर भी कुछ दूरदर्शी और सुधारवादी लोगों ने यह जोखिम उठाया. इन सुधारवादी लोगों द्वारा की गईं विदेश यात्राएं भारतीय पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार और मौडर्न एजुकेशन के प्रसार में बेहद महत्त्वपूर्ण साबित हुईं.

1830 में राजा राममोहन राय मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के दूत के रूप में इंगलैंड गए. 1828 में सतीप्रथा पर रोक लगने के बाद ब्रिटिश संसद में इस के कानून को मजबूत करने के लिए लौबिंग की जरूरत थी. 19वीं सदी में वे पहले भारतीय थे जिन्होंने धर्मगुरुओं के विरोध के बावजूद पहली बार समुद्र यात्रा की.

1842 में द्वारकानाथ टैगोर ने इंगलैंड और फ्रांस की यात्राएं कीं. द्वारकानाथ टैगोर उस वक्त कोलकाता के सब से बड़े उद्योगपति थे. उन्होंने अपनी इस यात्रा से ब्रिटेन में भारतीय व्यापारियों की छवि सुधारने का प्रयास किया.

1883 में पंडित रमाबाई इंगलैंड और अमेरिका गईं. वे पहली भारतीय महिला थीं जिन्होंने विदेश यात्रा की और इंगलैंड में संस्कृत की प्राध्यापिका बनीं. उन्होंने अमेरिका में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ी और विधवाओं के उत्थान के लिए लोगों को जागरूक किया. पंडित रामाबाई ने ‘मुक्ति मिशन’ और ‘शारदा सदन’ की स्थापना की. 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए. शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन था. उसी सम्मेलन में उन्हें बुलाया गया था.

20वीं सदी की शुरुआत में लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर और दादाभाई नौरोजी जैसी महान शख्सियतों ने विदेश यात्राएं कीं और वापस लौटे तो उन्होंने भारत की आजादी और सामाजिक क्रांति की नींव डाली.

देश आजाद हुआ तो संविधान ने सब को बराबर कर दिया. अब ऊंचे लोग सिर्फ जमीनों से गुजारा नहीं कर सकते थे. जो जमींदार थे उन की जमीनें छिन गईं. अब काहिल लोगों को घरों से निकलना पड़ा, इलाकों को छोड़ना पड़ा और धर्म को ताक पर रख कर देशप्रदेश की सीमाओं को लांघना पड़ा. जिन के पूर्वज समुद्र लांघने को पाप कहते थे वे लोग अवसरों की तलाश में सात समंदर पार तक चले गए. ग्लोबलाइजेशन का दौर आया, तब तक तो एनआरआई की संख्या खासी हो चुकी थी.

1991 से 2025 के बीच भारत दुनिया का सब से ज्यादा प्रवासी भेजने वाला देश बन गया. 2024 तक 1.85 करोड़ से अधिक लोग विदेश चले गए. 2025 में यह गिनती और तेजी से बढ़ रही है. इन में अधिकतर वे लोग हैं जो भारत की सामाजिक व्यवस्था में कास्ट और क्लास में ऊपर हैं. 2026 में ऐसे तकरीबन 1.42 लाख लोग देश छोड़ने की तैयारी में हैं. देश छोड़ने का मतलब यह नहीं कि वे विदेश जा रहे  हैं बल्कि ये डेढ़ लाख वे लोग हैं जो भारत की नागरिकता को छोड़ रहे हैं.

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नोमुरा याकिची

भारत में पढ़ेलिखे लोगों में बेरोजगारी सब से ज्यादा है और जो लोग अच्छी जौब में हैं उन्हें उन की स्किल के हिसाब से भारत में सैलरी नहीं मिलती. इस के उलट अमेरिका, कनाडा और यूके में अच्छी सैलरी, स्टौक औप्शंस और बेहतर कैरियर ग्रोथ मिलते हैं. यही लालच भारतीयों को विदेशों की ओर खींच रहा है.

इस के अलावा अच्छी क्वालिटी की शिक्षा के लिए बड़ी तादाद में भारतीय छात्र विदेश जाते हैं. 2026 तक भारतीय छात्रों की संख्या 20 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है जो अमेरिका, कनाडा और यूरोप में पढ़ाई के बाद वहीं बस जाते हैं. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा कारक है जिस की वजह से लोग विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं.

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एंडो किनसुके

आम जनता से टैक्स लेने के मामले में भारत सब से ऊपर के देशों में गिना जाता है. रुपए का तेजी से गिरना और टैक्स पर कम रिटर्न अमीरों को विदेश जाने पर मजबूर कर रहा है. भ्रष्टाचार, प्रदूषण, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, बाढ़, बिजली व पानी की कमी और ट्रैफिक जैसी समस्याएं भारत के शहरों को रहने लायक नहीं बनातीं. विदेशों में साफ हवा, बेहतरीन बुनियादी सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी होती है. यही कारण है कि 2024 में 72,500 अमीरों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी और 2025 में 3,500 अरबपति देश छोड़ कर चले गए.

डंकी रूट से गधा बनने को मजबूर भारतीय

अरबपतियों के लिए अमेरिका में जा कर बस जाना बेहद आसान है लेकिन आम भारतीयों के लिए यूरोप और अमेरिका पहुंचना किसी खौफनाक सपने से कम नहीं है. 18 सितंबर, 2025 को एक भारतीय नागरिक को यूके से हिरासत में लिया गया. यह आदमी अगस्त 2025 में छोटी नाव से इंग्लिश चैनल पार कर के यूके में घुसा था. फ्रांस अब इस व्यक्ति को भारत वापस भेजने की तैयारी कर रहा है. इंग्लिश चैनल से अवैध क्रौसिंग बढ़ रही हैं. यह रूट इतना खतरनाक है कि वर्ष 2025 में अक्तूबर तक 23 मौतें हुई हैं. इस के अलावा यूके में 2,715 भारतीय नागरिक इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन के कारण हिरासत में हैं. इस के बावजूद इन मामलों में पिछले साल के मुकाबले 108 फीसदी वृद्धि हुई है.

दिसंबर 2023 में फ्रांस ने मानव तस्करी के संदेह में दुबई से निकारागुआ जा रही एक फ्लाइट, जिस में 303 भारतीय सवार थे, को वाट्री एयरपोर्ट पर रोका. जांच के बाद 276 भारतीयों को भारत डिपोर्ट किया गया.

अमेरिका जाने का ख्वाब देखने वाले लोग किसी भी तरह से अमेरिका जाने को तैयार हो जाते हैं. अमेरिका पहुंचने के लिए अमीर लोगों के रास्ते सीधे हैं लेकिन आम भारतीयों के लिए अमेरिका का रास्ता बेहद कठिन है. वहीं, डंकी रूट के जरिए अमेरिका पहुंचने की हिम्मत करने वाले भारतीयों की तादाद भी कम नहीं है.

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अकसर लोग सोचते हैं कि अमेरिका जा कर रिस्पैक्ट और सक्सैस मिलेगी लेकिन हकीकत में डिपोर्टेशन, जेल या मौत उन का
इंतजार कर रही होती है. 2023 में सर्बिया ने भारतीयों के लिए वीजामुक्त यात्रा बंद कर दी क्योंकि हजारों भारतीय डंकी रूट से यूरोप में घुस रहे थे.

भारत से पहले सर्बिया, ब्राजील, इक्वाडोर, फिर मैक्सिको के रेगिस्तान को पार कर के अमेरिका की सीमा तय की जाती है. यह सफर हवाई जहाज, नाव, पैदल या जंगल-रेगिस्तान से होता है, जो महीनों चलता है. रास्ते में कई लोग मारे जाते हैं, कई गायब हो जाते हैं.

पंजाब, गुजरात, हरियाणा, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के युवा बेहतर जीवन की तलाश में इस जोखिमभरे रास्ते को चुनते हैं. विदेश भेजने वाले एजेंट्स ‘ड्रीम सेलर्स’ की तरह काम करते हैं. वे 20-50 लाख रुपए ले कर वादा करते हैं कि ‘15 दिनों में अमेरिका पहुंचा देंगे’. लेकिन ऐसा होता नहीं. अमेरिका भेजने के नाम पर एजेंट्स पैसा ठगते हैं और पैसे न देने पर हत्या तक कर देते हैं.

अगर 30-40 लाख रुपए खर्च करने के बाद डंकी रूट से अमेरिका पहुंच भी गए तो वहां से डिपोर्ट होने का खतरा हमेशा बना रहता है. 2025 में अमेरिका ने 104 भारतीयों को हथकड़ी लगा कर डिपोर्ट किया.

अकसर लोग सोचते हैं कि अमेरिका जा कर रिस्पैक्ट और सक्सैस मिलेगी लेकिन हकीकत में डिपोर्टेशन, जेल या मौत उन का इंतजार कर रही होती है. 2023 में सर्बिया ने भारतीयों के लिए वीजामुक्त यात्रा बंद कर दी क्योंकि हजारों भारतीय डंकी रूट से यूरोप में घुस रहे थे.

अपने बच्चों को अमेरिका या यूरोप भेजने के लिए कई परिवार जमीनजायदाद बेच कर या बैंकलोन ले कर पैसे जुटाते हैं लेकिन वे कभी अमेरिका, यूरोप पहुंच ही नहीं पाते, डिपोर्ट कर दिए जाते हैं. ऐसे में कई नौजवान आत्महत्या तक कर लेते हैं. 2025 में 54 ‘डंकियों’ को डिपोर्ट किया गया, जो इटली-लैटिन अमेरिका हो कर गए थे.

डंकी रूट से अमेरिका जाने वाले कई भारतीय मैक्सिको के रेगिस्तान में प्यास से मर जाते हैं, जंगलों में खो जाते हैं या गिरोहों द्वारा मार दिए जाते हैं. तमाम मुसीबतों को झेलते हुए अगर पहुंच भी गए तो डिपोर्ट कर दिए जाते हैं. 2017 में 30 भारतीय अमेरिका-मेक्सिको बौर्डर पर फंस गए जिन्हें बाद में डिपोर्ट कर दिया गया.

केंद्र सरकार ‘डंकी रूट मत लो’ जैसे पोस्टर और वर्कशौप के जरिए अपनी जिम्मेदारी तय करने का नाटक करती है लेकिन समाधान पर बात नहीं करती. असली समाधान रोजगार सृजन और स्किल ट्रेनिंग है. समस्या की असली जड़ बेरोजगारी है.

अमेरिका में काम करना अब मुश्किल

भारत सरकार बारबार यह दावा करती रही है कि उस की विदेश नीति मजबूत है और अमेरिका के साथ संबंध पहले से कहीं बेहतर हुए हैं लेकिन हकीकत इस के उलट है. अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए अब मुश्किल की घड़ी आ चुकी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने आदेश जारी किया है कि अब एच-1बी वीजा पर सालाना एक लाख अमेरिकी डौलर की भारी फीस देनी होगी.

यह रकम पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा है और इस का सब से बड़ा असर भारतीय कामगारों पर पड़ेगा, क्योंकि एच-1बी वीजाधारकों में लगभग 71 फीसदी भारतीय होते हैं. ट्रंप के इस आदेश से साफ है कि सरकार विदेश नीति के मोरचे पर नाकाम रही है.

सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे नारे कागजों तक ही सीमित रहे. बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन नहीं हुआ और न ही रिसर्च व इनोवेशन को बढ़ावा देने वाला वातावरण बना. यही वजह है कि आज भी लाखों युवा देश छोड़ कर अमेरिका और यूरोप जाने का सपना देखते हैं और एच-1बी वीजा जैसी योजनाओं पर निर्भर रहते हैं. अब जब अमेरिका ने फीस बढ़ा कर सालाना एक लाख डौलर कर दी है तो इस का बोझ भी सब से ज्यादा इन्हीं भारतीयों पर पड़ेगा.

पडोसी देशों का भी यही हाल

यह घटना 21 सितंबर, 2025 की है. अफगानिस्तान का 13 साल का एक लड़का काबुल से दिल्ली तक एक खतरनाक सफर कर के पहुंच गया. दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर एक बच्चे को रनवे पर घूमते हुए पाया गया. जब बच्चे से पूछताछ की गई तो पता चला कि बच्चा प्लेन के रियर सैंट्रल लैंडिंग गियर कंपार्टमैंट में छिप कर काबुल से दिल्ली पहुंच गया. यह बच्चा ईरान जाना चाहता था. तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान के हालात बदतर हुए हैं जिस की वजह से कई लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं.

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चोशू 5 वर्ष 1868 में जापान लौटे और उन्होंने जापान में बदलाव की ऐसी क्रांति शुरू की जिस की बदौलत महज 100 साल में ही जापान दुनिया में सब से आगे पहुंच गया. 1970 तक जापान दुनिया का सब से समृद्ध और शिक्षित देश बन चुका था.

बड़ी तादाद में पाकिस्तानी पढ़ालिखा तबका यूरोप, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और खाड़ी देश जाना चाहता है. पाकिस्तान में महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है. एक औसत इंजीनियर/डाक्टर/आईटी प्रोफैशनल को पाकिस्तान में 80 हजार से 2 लाख रुपए महीना मिलता है जबकि वही व्यक्ति विदेश में 5 से 10 गुना ज्यादा कमा सकता है.

विदेश में कमाई से परिवार को सपोर्ट करना, घर बनवाना, बहनभाइयों की शादियां करना आसान हो जाता है. आतंकवाद, टारगेट किलिंग, अपहरण फिरौती, स्ट्रीट क्राइम ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है. पाकिस्तान की माइनौरिटीज के हालात तो और भी बुरे  हैं. अहमदी, हिंदू, शिया और बलोच एक्टिविस्ट्स को हमेशा जान का खतरा बना रहता है, इसलिए वे मजबूरी में भागते हैं.

शिक्षा और हैल्थकेयर की खराब हालत है. अच्छी यूनिवर्सिटीज बहुत कम हैं, वहां रिश्वतखोरी भरी हुई है. अच्छे हौस्पिटल सिर्फ अमीरों के लिए हैं. गंभीर बीमारी होने पर लोग विदेश ही भागते हैं. पाकिस्तान में नौजवानों को भविष्य का कोई प्लान नहीं दिखता.

युवाओं को लगता है कि पाकिस्तान में मेहनत करो या न करो, सिस्टम आप को आगे नहीं बढ़ने देगा. नैपोटिज्म, करप्शन और कोटा सिस्टम हर जगह है.

यही सब कारण हैं जिन की वजह से पाकिस्तान का पढ़ालिखा, स्किल्ड और महत्त्वाकांक्षी तबका ‘ब्रेन ड्रेन’ कर रहा है क्योंकि उसे अब पाकिस्तान में कोई उम्मीद नहीं दिखती. यही हाल बंगलादेश का है. बंगलादेश में राजनीतिक उथलपुथल ने युवाओं का मोह भंग कर दिया है. बड़ी तादाद में बंगलादेश से लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं.

माइग्रेशन बुरी बात नहीं है लेकिन

माइग्रेशन बुरी चीज नहीं है. अवसरों की तलाश में हमेशा से लोग माइग्रेट करते आए हैं लेकिन राष्ट्रवाद के नाम पर वोट लेने वाली सरकारें राष्ट्र के भीतर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा मुहैया करवाने में फेल हैं, इसलिए भविष्य को सुरक्षित रखने की सोच रखने वाले लोग देश छोड़ कर भाग रहे हैं.

दुनिया की चौथी सब से बड़ी इकोनौमी का दंभ भरने वाले और डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में आज भी 80 करोड़ लोग 5 किलो अनाज पर गुजारा कर रहे हैं. भुखमरी, क्राइम और भ्रष्टाचार में भी हम बहुत आगे हैं. अमेरिका में बसने वाले भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा अपर कास्ट का है जो अमेरिका में रह कर भी अपनी जातिवादी और सांप्रदायिक मानसिकता को छोड़ नहीं पाता. ये लोग अमेरिका में रह कर भी देश की सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का खुल कर समर्थन करते हैं.

जापान के 5 लोग विदेश गए और वापस लौटे तो जापान को महाशक्ति बना दिया लेकिन यह भारत का दुर्भाग्य ही रहा कि यहां चोशू 5 जैसे नौजवान कभी पैदा ही नहीं हुए. विवेकानंद जैसे युवा विदेश गए तो उन्होंने धर्म का महिमागान तो किया लेकिन विदेश से देश की वास्तविक समस्याओं, सामाजिक विद्रूपों और जातिवाद को मिटाने का कोई उपाय ले कर नहीं आए.

19वीं सदी में देश में शिक्षा और न्याय के मामले में जो भी तरक्की की शुरुआत हुई वह गुलामी के दौर की सब से बड़ी उपलब्धि थी, जिस का श्रेय भारतीयों को नहीं, अंगरेजों को जाता है. भारत अपनी सामाजिक समस्याओं से जूझता रहा लेकिन यहां कभी कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई. सतीप्रथा और विधवा पुनर्विवाह की दिशा में जो भी समाज सुधार हुए उन में भी इंग्लिश शिक्षा हासिल करने वाले उन भारतीयों की अहम भूमिका रही जो विदेश यात्रा करने की हिम्मत कर पाए.

भारत के ‘चोशुओं’ ने क्या किया?

1840 के दशक से भारतीय छात्र ब्रिटेन जाने शुरू हुए. उन में लगभग सभी ऊंची जाति के युवा थे. चिकित्सा, कानून और बिजनैस की शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाने वाले ये छात्र ज्यादातर बंगाल के नौजवान थे. उन में भी ज्यादातर वे थे जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था या जिन के पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में ऊंचे पदों पर थे. 1840 के दशक में लंदन, एडिनबरा, औक्सफौर्ड और कैम्ब्रिज तक पहुंचने वाले कुल भारतीय छात्रों की संख्या 100-200 के आसपास थी और वर्ष 1900 तक यह संख्या 700 हो गई.

1840 के दशक में ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले कई छात्र जब वापस भारत लौटे तो वे ब्रिटिश सरकार में ऊंचे पदों पर तैनात हो कर एलीट बन गए. उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा, शासन और व्यापार से भरपूर फायदा उठाया. विदेशियों के साथ मिल कर उन्होंने काफी संपत्ति बनाई. विदेशी संस्कृति में रचबस कर उन्होंने ठाट का जीवन बिताया लेकिन देश में सोशल, पौलिटिकल और इकोनौमिकल बदलाव लाने के लिए इन लोगों ने कुछ नहीं किया.

उसी दौर में ईश्वर चंद विद्यासागर, ज्योतिबा फुले और राजा राममोहन राय जैसे कुछ समाज सुधारक ऐसे हुए जिन में से किसी ने भी ब्रिटिश यूनिवर्सिटी में पढ़ाई नहीं की, फिर भी भारत में सामाजिक क्रांति के नायक बन कर उभरे. ईश्वर चंद्र विद्यासागर की शिक्षा पूरी तरह भारत में ही हुई. राजा राममोहन राय ने गांव की पाठशाला में बंगाली सीखी, फिर पटना चले गए जहां उन्होंने मदरसे में फारसीअरबी पढ़ी और फिर बनारस में जा कर संस्कृत पढ़ी. वे 1829-1833 तक मुगल बादशाह अकबर शाह सानी के प्रतिनिधि के तौर पर इंगलैंड गए जहां उन की मृत्यु हो गई.

ज्योतिबा फुले ने पुणे के स्कौटिश मिशनरी स्कूल में 1841-1847 तक पढ़ाई की. वहां उन्होंने इंग्लिश की शिक्षा प्राप्त की और अपना पूरा जीवन जातिवाद को मिटाने, औरतों की शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के लिए समर्पित कर दिया. ये वे लोग थे जो ब्रिटेन की किसी यूनिवर्सिटी तक नहीं पहुंचे लेकिन भारत में साइंटिफिक टैंपरामैंट को बढ़ावा देने का मूवमैंट शुरू किया.

वे लोग, जो उसी दौर के शुरुआती ग्रेजुएट्स थे, जापान के चोशू 5 की तरह शिक्षा हासिल करने ब्रिटेन तक पहुंचे और पश्चिमी विचारों से प्रभावित भी हुए. उन्होंने वापस लौट कर देश की समस्यायों से जूझने का जोखिम नहीं उठाया बल्कि अपनी शिक्षा को ओहदा और संपत्ति बनाने का जरिया बना लिया. पश्चिम के सैक्युलरिज्म, विज्ञान और लोकतंत्र को भारत में लागू करने की मुहिम छेड़ने वाले शुरुआती लोगों में भारतीय ग्रेजुएट्स बिलकुल नहीं बल्कि अंगरेज ही थे. विलियम वेंटिक्स और मैकाले जैसे विदेशियों ने भारत में शिक्षा और बराबरी की बुनियाद रखी जिस से सामाजिक सुधार और एजुकेशन की दिशा में क्रांति की शुरुआत हुई.

सूरजो कुमार चक्रबर्ती वो पहले इंडियन थे जिन्होंने 1840 के दशक में लंदन के यूनिवर्सिटी कालेज से मैडिकल साइंस की पढ़ाई पूरी की. वे 1848 में ब्रिटिश यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने वाले पहले भारतीय डाक्टर बने. वापस लौट कर वे कलकत्ता मैडिकल कालेज में प्रोफैसर बने. सूरजो कुमार चक्रबर्ती पहले भारतीय थे जो इस पद पर पहुंचे.

प्रफुल्ल चंद्र रे ने 1880 में एडिनबरा यूनिवर्सिटी से कैमिस्ट्री की पढ़ाई पूरी की. वापस लौट कर उन्होंने बंगाल कैमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स वर्क्स की स्थापना की जो भारत का पहला मौडर्न कैमिस्ट्री बिजनैस बना.

कौर्नेलिया सोराबजी 1892 में औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला थीं और भारत की पहली महिला बैरिस्टर भी.

रोमेश चंद्र दत्त ने 1871 में लंदन के यूनिवर्सिटी कालेज से पढ़ाई की और भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) पास की. जब भारत लौटे तो उन्होंने एडमिनिस्ट्रेशन में बड़े बदलाव किए. रोमेश चंद्र दत्त ने भारत की इकोनौमिकल हिस्ट्री पर किताबें लिखीं. आगे चल कर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने.

महात्मा गांधी ने 1888 से 1891 के दौरान लंदन के इनर टैंपल से कानून की पढ़ाई की. वापस लौट कर उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया. अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत दिए. रेव धुन्जीभोय नौरोजी पारसी समाज के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया. धुन्जीभोय नौरोजी ने भारत में प्रोटेस्टैंट/क्रिश्चियन मिशनरी के रूप में काम किया.

दादाभाई नौरोजी प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, अर्थशास्त्री और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे. दादाभाई नौरोजी ने ‘ड्रेन थ्योरी’ दी और ब्रिटिश संसद में चुने गए पहले भारतीय बने. सत्येंद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे. सत्येंद्र नाथ टैगोर ने यूनिवर्सिटी कालेज, लंदन में पढ़ाई की और 1863 में आईसीएस एग्जाम में सफलता हासिल करने वाले पहले भारतीय बने. सत्येंद्र नाथ की इस कामयाबी के बाद अपर कास्ट भारतीयों में आईसीएस के प्रति ऐसा उत्साह पैदा हुआ कि कई नौजवान ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज में दाखिला लेने के लिए घर छोड़ कर ब्रिटेन भाग गए थे.

मोहन घोष कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर बने; बदरुद्दीन तैयबजी कांग्रेस अध्यक्ष बने और मधुसूदन दत्त प्रसिद्ध साहित्यकार बने. 1860 के दशक तक ये भारतीय छात्र ब्रिटेन में अपने खर्चे पर पढ़ाई करते थे. पढ़ाई का खर्च इतना ज्यादा था कि कई स्टूडैंट्स को पढ़ाई बीच में छोड़ कर ही लौटना पड़ा और कइयों को कर्ज ले कर या घरबार बेच कर पढ़ाई पूरी करनी पड़ी. ऐसे गरीब स्टूडैंट्स के लिए 1868 में ब्रिटिश सरकार ने प्रतिवर्ष 200 पाउंड की स्कौलरशिप देनी शुरू की.

ब्रिटिश काल में ब्रिटेन की अलगअलग यूनिवर्सिटीज से निकले भारतीय स्टूडैंट्स सिस्टम का हिस्सा बने. ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज की बदौलत ही अफसर, डाक्टर, इंजीनियर और बैरिस्टर बने. 1890 तक तीसरी पीढ़ी विदेशी यूनिवर्सिटीज से पासआउट हो कर निकल चुकी थी. वर्ष 1900 आतेआते इन विदेशी यूनिवर्सिटीज से निकलने वाले ग्रेजुएट्स की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी लेकिन इन में चोशू वाला जनून, समझ और समर्पण की भावना नहीं थी. लंदन से पढ़ कर जापान लौटे सिर्फ 5 लोग तीन दशकों में ही जापान को बदल चुके थे लेकिन भारत से ब्रिटेन गए 500 लोगों ने क्या किया? जापान और भारत में आज भी मानसिकता का यह अंतर कायम है.

पुरानी सभ्यता को परे रख जापान का विकास

चोशू फाइव जापान से छिप कर इंगलैंड गए थे. उन्होंने वहां जापान, जो कभी मुसलिमों या गोरों का गुलाम नहीं बना था, का गुणगान नहीं किया. इतो हिरोबुमी (1841-1909) ने जापान में कैबिनेट सिस्टम लागू किया. इन्होंने शोगुन लड़ाकुओं के राज के खात्मे के बाद जापान के आधुनिकीकरण में जापान को नई शासन व्यवस्था दी. इतो हिरोबुमी वर्ष 1885 में जापान के पहले प्रधानमंत्री बने. फिर वे 4 बार प्राइम मिनिस्टर रहे.

यामागाता अरितोमो ने जापान की मिलिट्री का आधुनिकीकरण किया. जापान की सेना गोरों के हाथों में नहीं थी. उन्होंने सभी जापानी युवाओं को कुछ साल मिलिट्री सेवा में शामिल होने की योजना लागू की और विदेशी यूरोपीय हथियार जापान में बनवाना शुरू कराया. पुलिस व्यवस्था में सुधार भी किया.

किडो ताकायोशी ने सामंतवादी शोगुनों का राज खत्म किया और पश्चिमी देशों का कानून, वहां की शिक्षा और वहां सरकारी व्यवस्था को लागू किया.

इनोऊ मसारू को रेलवे का जनक माना जाता है. उन्होंने जापान में रेललाइनें बिछवा डालीं.

यामाओ योजी ने सड़कों के और सार्वजनिक निर्माण कराए.

इन में से किसी ने भी अपने देश जापान की पुरानी सभ्यता के गुणगान में समय बरबाद नहीं किया. उन की पोशाकें अकसर यूरोपीय स्टाइल की होती थीं. इन का उद्देश्य था देश को अमीर बनाओ, सेना को मजबूत करो न कि जापान की संस्कृति, पुजारियों, ग्रंथों की झठी वाहवाही करो. उन्होंने जापान को विश्वगुरु साबित करने की कोशिश नहीं की जबकि शोगुनों के जमाने में जापान अपनी कला व संस्कृति बचाने के चक्कर में रहा और 250 सालों तक विदेशी संपर्क नहीं होने दिया. The Choshu Five

Satirical Story In Hindi : आवारा कुत्तों के पीछे – कुत्तों का काटन कर्म कोई तो रोको

Satirical Story In Hindi : आप ही बताएं इन आवारा कुत्तों का क्या किया जाए जो बिना पासपोर्ट, बिना वीजा और बिना विचारधारा के खुलेआम सड़कों पर लोकतंत्र का आनंद लेते फिरते हैं? इन्हें न देश का फर्क दिखता है, न विदेशी मेहमान का-बस मौका मिला और दांतों की ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ हो गई.

समाज में आदमी द्वारा आदमी को काटने की घटनाएं तो समयसमय पर होती रहती हैं और कुसूरवार को उस के हिसाब से सजा भी मिलती है लेकिन उन आवारा कुत्तों का क्या किया जाए जो खुलेआम घूमते हुए लपक कर किसी को भी काट खाते हैं. ये कूकुर यह भी नहीं देखते कि बंदा देश का है या विदेश का?

अब किसी कुत्ते को कोई कैसे समझाए कि रंगरूप को देख कर इतना तो समझा लो कि यह विदेशी आदमी है. इसे काटने से देश की इज्जत को झाटका लगेगा, लेकिन कुत्ते तो कुत्ते होते हैं. देशी को भी काट देते हैं, विदेशी को भी काट देते हैं.

जैसे देश के कुछ गुंडेबदमाश देश के लोगों को भी लूटते हैं और विदेश से आए हुए पर्यटकों को भी लूट लेते हैं. महिला हुई तो उस के साथ रेप भी कर देते हैं. वैसे ही कुत्ते धर्मजाति में फर्क न कर अपना ‘काटन कर्म’ करते हैं. वे सभी धर्म के लोगों को समान रूप से देखते हैं और जब भी उन का मूड होता है, किसी को भी काट खाते हैं.

देश का ऐसा कोई शहर नहीं होगा जहां आवारा कुत्तों की कुकुरगीरी न चलती हो. गुंडों की तरह लोगों के पीछे पड़ जाते हैं. ये लोग जान बचाने के लिए दाएंबाएं होते हैं.

पिछले दिनों कुत्तों से बचने के लिए सरकार से गुहार लगाई गई, तो उस ने एक दिन राज्यों को निर्देश जारी कर दिए कि बहुत हो गया अब. आप लोग सुधर जाएं. आवारा कुत्तों के मामले में गंभीर हो कर काम करें और हर महीने रिपोर्ट दें कि आप के यहां कितने कुत्ते हैं जिन को शैल्टर होम में रखा गया है या नहीं रखा गया है, आंकड़े पेश करें. कितनों की नसबंदी हुई है, यह भी बताया जाए.

सरकार ने निर्देश जारी कर दिए, तो नगरनिकाय के बड़े अफसर परेशान हो गए कि बाप रे, अब एकएक कुत्ते की निगरानी कैसे होगी? लेकिन सरकारी आदेश है, तो उस की खानापूरी तो करनी ही पड़ेगी, इसलिए नगरनिकाय के कर्मचारी अपनी भी सुरक्षा की चिंता करते हुए शहर में आवारा कुत्तों को देखने व मौका लगते ही उन को पकड़ कर किसी ‘श्वानालय’ उर्फ शैल्टर होम में भेजने के उपाय करने लगे.

उस दिन एक कर्मचारी की नजर सड़क के किनारे बैठ कर धूप सेंकते अकेले कुत्ते पर पड़ी. वह खुश हो गया और मोटा सा जाल ले कर उस की ओर दबेपैर बढ़ा. लेकिन कुत्ते को शायद यह शेर पता था कि ‘बहुत पहले से हम कदमों की आहट जान लेते हैं…’ वैसे भी कुत्ते की नींद के मामले में हम सब जानते हैं कि वह थोड़ी सी आहट में खुल जाती है.

कुत्ते को लगा कि कोई उस की तरफ आ रहा है. उस ने कर्मचारी को देखा और समझा गया कि यह बंदा मेरी आजादी का दुश्मन है, पकड़ने आ रहा है. बस, फिर क्या था, कुत्ते ने दूसरी दिशा में दौड़ लगा दी. पैदल घूम रहा कर्मचारी आखिर कितनी दूर दौड़ता. थकहार का एक जगह बैठ गया और ठेले पर चाय पीने लगा.

कुछ देर बाद दूसरा कर्मचारी भी आ कर वहीं बैठ गया. उसे देख कर पहले कर्मचारी ने पूछा, ‘‘आज कितने कुत्ते पकड़े?’’

दूसरे कर्मचारी ने कहा, ‘‘2 घंटे से दौड़भाग कर रहा हूं. ये कुत्ते गुंडेमवालियों की तरह होशियार हो गए हैं.’’

‘‘लेकिन क्या करें, रिपोर्ट तैयार कर के नगरनिकाय को सौंपनी है. रिपोर्ट फिर भारत सरकार तक जाएगी. इन कुत्तों ने तो नाक में दम कर रखा है. बोलो पार्टनर, क्या किया जाए?’’ पहले कर्मचारी ने कहा.

दूसरा कर्मचारी बोला, ‘‘करना क्या है, हमारी परंपरा जारी रहे यानी खानापूरी. फर्जी रिपोर्ट तैयार करेंगे कि आज 5 कुत्ते पकड़ कर ‘कुत्तालय’ में जमा किए गए. कौन देखने आता है.

‘‘आएगा कभी कोई देखने कि जमा हुए हैं या नहीं, तो भविष्य में कभी देखेंगे. गोलमोल जवाब दे दिया जाएगा कि कुत्ते बड़े चतुर होते हैं. वे बाउंड्री पार कर के भाग गए. हम फिर से उन्हें पकड़ेंगे.’’

पहले कर्मचारी ने कहा, ‘‘यह तो बहुत अच्छा आइडिया है. सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

दूसरा कर्मचारी बोला, ‘‘अब कुत्ते के बीच में यह सांप कहां से आ गया?’’

पहले वाले कर्मचारी ने हंसते हुए कहा, ‘‘अरे, यह मुहावरा है पार्टनर.’’

उस की बात सुन कर दूसरा कर्मचारी हंसा और बोला, ‘‘जानता हूं, जानता हूं, लेकिन मन को खुश करने के लिए मजाक कर दिया.’’

तो सरकार के दिशानिर्देश का नगरनिकायों ने गंभीरता से पालन करना शुरू किया और सब से अच्छी बात यह रही कि देशभर में रिकौर्ड बड़े दुरुस्त होते रहे. यह और बात है कि कुत्तों की समस्या जस की तस बनी रही.

कुत्ते पहले की तरह ही दौड़दौड़ कर लोगों काटते रहे. समताभाव के साथ बूढ़े, बच्चे, नौजवान, महिला, जिस पर उन की नजर पड़ी, उस को काट दिया. सरकार ने अपना काम किया, कड़े निर्देश दे दिए.

इस देश की सरकारें एक काम बहुत अच्छा करती हैं, निर्देश कड़े देती हैं. नगरनिकाय के अधिकारी भी कौन्फिडैंट थे कि उन्होंने कर्मचारियों को कड़े निर्देश दे दिए हैं कि कुत्तों के मामले में हर महीने रिपोर्ट पेश करो. यह और बात है कि सरकारी लिखापढ़ी क्या चल रही है, इस से किसी भी कुत्ते को कोई लेनादेना नहीं था. उन्हें तो अपनी कुत्तागीरी उर्फ दादागीरी दिखानी थी और राह चलते लोगों को काटने का श्वान धर्म निभाना था.

‘मानवाधिकार’ की तर्ज पर ‘श्वानाधिकार’ के लिए लड़ने वाले बड़े खुश हैं कि उन्होंने आवारा कुत्तों के पक्ष में आवाज उठाई थी और सरकार ने उन की बातों का संज्ञान लेते हुए निर्देश तो जारी किया. लेकिन पिछले दिनों कमाल हो गया. श्वानाधिकारी को एक आवारा कुत्ते ने काट लिया. लेकिन वे इस पीड़ा को सार्वजनिक नहीं कर सकता था, क्योंकि लोग उस पर हंसते. सोशल मीडिया में उस की फजीहत करते. उस ने चुपचाप अस्पताल जा कर इलाज कराया, इंजैक्शन लगवाया.

अब वह श्वानाधिकारी आवारा कुत्तों से सम्मानजनक दूरी बना कर चलता है और अपने ‘श्वान प्रेम’ में कोई कमी नहीं दिखाता. Satirical Story In Hindi

Family Story in Hindi : लिपस्टिक वाली सास – सास की पैरवी करती बहू

Family Story in Hindi : सुमन को अपनी सास की फैशनपरस्ती को ले कर उलटीसीधी बात सुनना नागवार गुजरता. उम्र तो एक संख्या भर है. ऐसा सुमन का मानना था. अपनी इसी सोच के चलते अपनी सास निर्मलाजी के खिलाफ बोलने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने में भला पीछे क्यों रहती.

‘‘कैसी है तुम्हारी लिपस्टिक वाली सास?’’ नरेश सक्सेना सर ने उस से मीटिंग समाप्त होने के बाद चाय पीते हुए पूछा तो वह बिदक गई. अभी वह कुछ बोलती कि सरला ने उसे टीचर्स एसोसिएशन की ओर से बधाई देते हुए कहा, ‘‘अरे, वे सुमन की रोलमौडल हैं. खुद राजनीति में हैं तो बहू क्यों पीछे रहे. है कि नहीं? वे तो चाहेंगी ही कि बहू भी राजनीति में मन लगाए.’’

‘‘आप लोग छूटते ही टीकाटिप्पणी क्यों करने लगते हैं?’’ वह नरेश सक्सेना सर को घूरते हुए देख कर बोली, ‘‘यदि कोई आप के अभिभावकों के बारे में ऐसी ही सतही बात करे तो कैसा लगेगा. रही बात उन की, उन की व्यक्तिगत रुचियों और रहनसहन पर ऐसी हलकी बात करने का कोई हक नहीं है. वे चाहे जैसे रहें, वे मेरी मां समान अभिभावक हैं. यही क्या कम है कि वे मेरी स्वतंत्रता पर कोई बंदिश नहीं लगातीं.

‘‘और रही बात मेरी राजनीति में आने की तो मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है. शुरू से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही कि इसी बहाने हम अपने हक की बात कर सकें. यहां टीचर्स एसोसिएशन में भी इसलिए रुचि रखती हूं कि अपने समूह के हितों की रक्षा कर सकूं. आप से भी तो उपाध्यक्ष पद पर खड़े होने को कहा गया था. मगर आप पीछे क्यों हट गईं?’’

‘‘सरला, तुम बड़े घर से हो तो तुम्हें समय मिल जाता है यह सब करने को,’’ उस ने गहरी सांस भरी, ‘‘यहां तो घर भी, बाहर भी, सभीकुछ खुद ही देखना होता है. मेरी सास 19वीं सदी में जीती हैं. उन्हें अपने पूजापाठ से फुरसत ही नहीं मिलती. यही क्या कम है कि वे मुझे नौकरी करने दे रही हैं.’’

‘‘ऐसा है तो दूसरों पर हलकी बातें तो न किया करो. जैसे तुम्हारी सास आदरणीय हैं, वैसे ही मेरी सास भी मेरे लिए आदरणीय हैं. अब यह समय की बात है कि मुझे बड़ा घराना ही नहीं, बड़ी सोच वाले लोग भी मिले हैं. सो, मैं उन के बारे में सतही टिप्पणियां नहीं सुन सकती.’’

कहने को तो वह बहुतकुछ कह गई थी उस दिन. मगर उस ने गौर किया था कि लोग उस की सास के बारे में कुछ अधिक ही बात करते हैं. इसी पर उस की सास निर्मलाजी ने उस से कहा था, ‘अरी बहू, तुम इतना ज्यादा क्यों सोचती हो. जब हम सार्वजनिक जीवन जिएंगे तो टिप्पणियां सुनने को मिलेंगी ही. तुम इतना अधिक रिऐक्ट मत किया करो और सबकुछ सहज भाव से लिया करो.’ मगर इतना आसान कहां होता है, सभी कुछ सहज भाव से लेना.

अभी पिछले ही दिनों छूटते ही एक रिश्तेदार महिला ने जब उस से पूछा कि ‘कैसी है तुम्हारी लिपस्टिक वाली सास’ तो वह कुछ असहज हो गई थी. अभी आगे कुछ कहती कि वे फिर शुरू हो गईं, ‘पिछले सप्ताह ही उन्हें एक शौपिंग मौल के एक थिएटर में सिनेमा देखते देखा था.’

और उस ने भी उन्हें जम कर सुना दिया था कि यह क्या बात हुई कि बस इसलिए कि वह सास बन गई है तो कोई लिपस्टिक न लगाए. अब वे थोड़े रंगों में, थोड़ी मुसकान में खुद के लिए जीना चाहती हैं तो इस में बुरा क्या है. फिर उस ने यह भी सुना दिया था कि यह समाज अपने दकियानूसी मनमिजाज को कब बदलेगा, जो उसे रंगीन वृद्धाएं खलती हैं. क्या उम्र के साथ इच्छाएं दम तोड़ देती हैं? क्या सास बनते ही स्त्रियों को फैशन की चिता में जल जाना चाहिए?

हमारी यह सोच क्यों है जो स्त्री को उम्र, रिश्ते और त्याग में बांध कर रखना चाहती है. यह समाज आखिर यही क्यों चाहता है कि सास बूढ़ी हो तो चुपचाप तुलसी में जल चढ़ाए, मंदिर में आरती के दीपक दिखाए, घंटी टुनटुनाए और भजनकीर्तन करती रहे. आखिर, मेरी सास मौल्स के थिएटरों में गुलाबी लिपस्टिक लगा कर सिनेमा देखने क्यों नहीं जा सकती.

उस की सास शहर की एक सम्मानित, संभ्रांत महिला हैं. समाजसेवा से ले कर राजनीति तक में वे दखल रखती हैं. तो क्या बेटे की शादी होने के बाद वे यह सबकुछ छोड़ दें कि वह सास बन गई हैं.

बहुत दिनों बाद वह मायके आई थी. वह उन्हें कुछ कड़ा जवाब देना चाहती थी. मगर छोटी बहन ने रोक लिया, ‘जाने दो दीदी. ये छोटी मानसिकता के लोग नहीं सुधरने वाले. तुम्हारी सास इतनी आधुनिक है तो लोगों की नजरों में चढ़ेगी ही. उन्होंने तुम्हें भी पर्याप्त स्वतंत्रता दे रखी है. बल्कि तुम को भी प्रोत्साहित करती हैं कि सार्वजनिक जीवन जीना चाहिए लेकिन कुछ लोगों को यही खलता भी है. सो, उस पर ध्यान न दिया करो.’

ध्यान तो वह नहीं देती है लोगों की बातों पर. फिर भी गलत टीकाटिप्पणी सुन कर मन में गुस्सा तो आता ही है. यह ठीक है कि उस की सास अपने रखरखाव पर विशेष ध्यान देती हैं. वे सोशल लाइफ एंजौय करती हैं तो इस में बुरा क्या है. कौन है आज जो महत्त्वाकांक्षी नहीं है.

ऐसे में यदि उस की सास महत्त्वाकांक्षा रखती हैं तो गलत क्या है और जब से वे वार्ड पार्षद बनी हैं, आर्थिक रूप से मजबूत भी हो गई हैं वे. अपने समृद्ध पिता की बदौलत उन्होंने बहुतकुछ पाया है और यहां भी उन के पति करोड़ों में खेलते हैं तो वे ढंग से क्यों न जिएं-रहें. क्या हमेशा अपने अभाव, अपनी गरीबी, अपनी बीमारी और असहायता का ढोल पीटते रहना जरूरी है.

सुमन के पास सवाल ही सवाल थे. मगर जल्दी ही उस ने जान लिया कि ऊपर से आधुनिक कहलाने वाले लोग अभी भी मध्यकालीन सामंती मानसिकता रखते हैं. एक दिन उसे उस की सहेली पूनम की मां ने टोक ही दिया, ‘क्यों सुमन, तुम्हारी सास तो बड़ी ठसकदार हैं. अब भी ग्लौसी गुलाबी लिपस्टिक लगाती हैं? अरे भई, अब उम्र हो गई है तो इन से परहेज करना चाहिए. मगर तुम्हारी सास तो साड़ी नहीं, सैल्फी संभालती हैं. वे सोशल मीडिया पर भी खूब ऐक्टिव हैं. मैं ने देखा है कि उन के माथे की बिंदी भले तिरछी हो जाए लेकिन लिपस्टिक का शेड मैच होना ही होना चाहिए. अरे, अब तो तुम्हारी सास को तो समय के अनुसार चलना चाहिए. थोड़े समय बाद वे दादीनानी बन जाएंगी. अब तो उन्हें भी समय के अनुसार बदल जाना चाहिए.’

वह कहना चाहती थी कि क्या जिंदगी इतनी जल्दी खत्म हो जाती है कि हम समय के साथ न चलें. अब तो लोग लंबी उम्र जीते हैं तो इस में बुरा क्या है कि वे समयानुकूल फैशन के साथ चलें. खुद से प्यार करना कहां से गुनाह हो गया. अपनी उम्र को झुठलाती वे ठाटठसक से रहती हैं तो इस में बुरा क्या है? मगर प्रकटतया वह यही बोल कर रह गई कि ‘वे समय के अनुसार ही चल रही हैं, आंटी. उन का अपना जीवन है. चाहे जैसे खर्च करें, चाहे जैसे अपना समय व्यतीत करें. वे अपना जीवन भलीभांति जी रही हैं तो इस में सब को खुश होना ही चाहिए. वे तो यही सिद्ध कर रही हैं कि उम्र, बस, एक संख्या भर है.’

जब वह यहां ब्याह कर आई थी, तभी से उसे घबराहट होने लगी थी. इतने बड़े घर में जहां चारों तरफ पैसे ही पैसे हों, उस की पूछ कितनी होगी, यह सवाल उस के मन में था. ठीक है कि वह नईनवेली दुलहन थी और उसे उम्मीद थी कि यहां उसे अटैंशन मिलेगा. कम से कम कुछ समय तक तो उस की पूछ रहेगी ही. मगर यहां तो स्थिति ही उलटी थी. यहां जिस को देखो, वही उस की सास निर्मलाजी से आतंकित था. एक उन्हीं की आवाज सुनाई देती थी. आवाज क्या, वह एक तरह से आदेश ही होता था. उस में ‘न’ कहने की गुंजाइश ही नहीं होती थी. बेटे तो क्या, पति तक को उन की बात माननी होती थी.

शुरू में कितना मुश्किल लग रहा था कि इतने बड़े घराने में शादी के बाद कैसे निभा पाएगी. समरेश तो खैर एक संस्थान में आईटी मैनेजर की नौकरी ही कर रहा था. किसी ने उस की बात चला दी और शादी के लिए सबकुछ फिक्स हो गया. बल्कि समरेश ने मजाक भी किया था, ‘मां, मास्टरनी बहू लाओगी तो कहीं वह सभी को पढ़ाने न लग जाए.’

इस पर निर्मलाजी तमक कर बोली थीं, ‘इस में बुरा क्या है. अगर वह समय के साथ चलना चाह रही है तो चलना ही चाहिए. स्त्रीविमर्श के आज के युग में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं तो उसे भी बढ़ना ही चाहिए. यह तो तुम्हारे लिए अच्छी बात है कि घरबैठे तुम्हें टीचर मिल रही है.’

निर्मलाजी एक सोशलवर्कर हैं, यह वह जानती थी. अब ससुर का इतना बड़ा बिजनैस है, जिस में ढाई सौ लोग खट रहे हों तो वे करें क्या. घर में नौकरों की फौज है, सो वे घर से निश्चिंत हैं. समाजसेवा और राजनीतिक दल वाले आते तो ससुरजी चंदे की मोटी रकम दे कर टरका देते. फिर भी कभीकभार तो उन के कार्यक्रमों में आनाजाना होता ही था. कई बार वे उन के साथ गईं. फिर ससुरजी की व्यस्तता देख वे अकेले ही जाने लगीं. ऐसे में एक राजनीतिक दल के प्रति रुचि बढ़ी तो उस की सदस्यता भी ले ली और यहीं से उन का राजनीतिक सफर भी शुरू हुआ.

यहां समारोहों में देखा कि यहां तो सम्मान ही सम्मान है. करना कुछ खास नहीं. बस, कभी फीता वगैरह काट देना है या मुख्य अतिथि वगैरह की कुरसी की शोभा बढ़ानी है. रोजरोज टीवी के उत्पाती धारावाहिकों से वे ऊब ही चुकी थीं. अब इतना बड़ा शहर है तो कार्यक्रमों की क्या कमी. समाजसेवा के नाम पर बहुतकुछ चलता है यहां. एक अकेले धर्म के नाम पर कभी मंदिर स्थापना तो कभी कलशयात्रा तो कभी देवी जागरण का दौर चलता रहता है. बाकी तो पचासों प्रकार के पूजा माहात्म्य हैं ही. हालां?कि उन का इस से बहुत जुड़ाव कभी रहा नहीं. मंदिर वगैरह जा कर हाथ जोड़ लेना एक बात है लेकिन वहां के कर्मकांडों से स्वयं को जोड़ लेना दूसरी बात है. पूजापाठ में बहुत रुचि न रखने के बावजूद उन्हें उन की राजनीतिक पार्टी ने समझया कि पब्लिक से जुड़े रहने के लिए ये सब चोंचलेबाजी जरूरी हैं तो वे मान गई थीं.

बहुत बड़ा शहर है पटना. क्या नहीं है यहां, जो इसे अत्याधुनिक न मानें. ऐसे में सभी की सोच बदलती ही है. बदलनी ही चाहिए. पूजापाठ के अलावा कभी स्पोर्ट्स का तो कभी डोनेशन का दौर चलता है. प्राकृतिक आपदा आई हों तो कहना ही क्या. वैसे, ब्लड डोनेशन भी क्या कम है. साहित्य के भी कार्यक्रम होते हैं. राजधानी होने का एक फायदा यह तो है ही कि यहां राजनीतिक गतिविधियां चलती रहती हैं और इन्हीं के बीच परिचय का दायरा बढ़ता चला जाता है. निर्मलाजी को राजनीति का चस्का बस यों ही लग गया था, जो बढ़तेबढ़ते सत्ता की सीढि़यों की ओर सरकने लगा था.

फिलहाल वे अपने वार्ड की पार्षद थीं. मगर उन का रुतबा किसी नगर मेयर से कमतर न था. नगरनिगम के पार्षदों की बैठकों में वे मुखर हो कर मुद्दों को सामने लाती थीं. अब महत्त्वाकांक्षा तो हर किसी में होती है. सो, वे खुद मेयर या विधायक पद के लिए दावेदार तो समझती थीं ही. यह अलग बात है कि उन्होंने इस पर विशेष रुचि नहीं ली या परिस्थितियां वैसी बनी नहीं. वैसे, उम्र भी तो कुछ खास नहीं, 55 की है. समय आने पर वहां भी बात बन ही जाएगी.

उस ने यहां आने के पहले ही कुछ इस प्रकार का मन बना भी लिया था कि उस की सास कोई पुरानी फिल्मों की विलेन सास मनोरमा, शशिकला या ललिता पवार जैसी होगी. ऐसा उस ने अपने शहर में कई जगह देखा भी था. उस की कई सहेलियों ने उस से अपने अनुभव साझ किए थे कि इस 21वीं सदी में अभी भी ऐसी सासें होती हैं जो घर को अपने पूरे नियंत्रण में रखती हैं. खासकर लिपस्टिक लगाने वाली सासों का कहना ही क्या. उन से उस ने ‘लाली लाली होंठवा’ से ले कर ‘लगावेली जब लिपस्टिक तक’ की अनेक कहानियां भी सुन चुकी थी. साथ ही, यह भी कि इस में कुछ 19-20 भले हो जाए, होता ऐसा ही है और वे भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगा रही थीं.

लेकिन यहां तो एकदम उलट था. ठीक है कि घर में सारा कुछ उन्हीं के निर्देश पर होता था. पूरा घर घड़ी की सूइयों के पीछे डोलता फिरता. उस के 9 बजे के स्कूल होने पर वह तैयारी करती. घर में सभी काम निबटाने वाले स्टाफ हों तो कहना ही क्या. सारा कुछ हाजिर हो तो करना क्या है.

समरेश 10 बजे तैयार हो कर बाहर निकलते. ससुरजी का शहर के पौश इलाके में अपना विशाल चमचमाता शौपिंग मौल था, जहां उन्होंने अपना औफिस बना रखा था. वे आराम से दोपहर में एकाध घंटे के लिए वहां कभी जाते, कभी नहीं जाते और अधिकांश काम फोन पर ही निबटा दिया करते थे. शाम में वे बाकायदा वहीं समय व्यतीत करते थे. तीनतीन चार्टर्ड अकांउंटैंट जिस के दफ्तर में खटते हों, उस दफ्तर के तामझम का अंदाजा लगाया जा सकता है. तिजोरियों से रुपए के गट्ठर निकालते व रखते उन के आदमी जिस तत्परता से काम करते, वह देखने लायक होता. पहली बार उसे एहसास हुआ कि उस के पापा महीने में जितना कमाते हैं, उतना तो वे एक दिन में खर्च कर डालते हैं.

लेकिन निर्मलाजी कार्यक्रमों के अनुसार अपनी दिनचर्या शुरू करती थीं. कभी किसी मंत्री से मिलने जाना हो या किसी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में राज्यपाल भवन ही क्यों न जाना हो, वे विशेष रूप से तैयारी करती थीं. घर में ही समरेश ने एक कमरे को जिमखाना बना लिया था. वहां के इंस्ट्रूमैंट्स पर व्यायाम करना थोड़ाबहुत चल जाता था. वैसे, उन्हें खास रुचि देसी ऐक्सरसाइज में थी. इतवार के दिन खासतौर से एक महिला इंस्ट्रक्टर आती थी, जिस की देखरेख में वे ऐक्सरसाइज करती थीं. बाद में वे खुद ही आधेक घंटे तक ऐक्सरसाइज करतीं.

नहाधो कर पार्क घूमने जातीं तब कब 10 बज जाते थे, पता नहीं चलता था. इस बीच मोबाइल फोन, फेसबुक, व्हाट्सऐप ग्रुप, इंस्टाग्राम वगैरह तो थे ही. नाश्ता वगैरह कर वे जरूरी फोन जो करने बैठतीं तो लंबा सिलसिला चल निकलता था. इस बीच, कभीकभार मिलनेजुलने वाले भी आतेजाते थे. इन सभी कार्यक्रमों में व्यतिक्रम भी हो सकता था लेकिन शाम में लगभग तय होता था कि उन्हें कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रोग्राम में जाना ही है. उन की अपनी लंबी महंगी गाड़ी थी. अपना मुंह लगा ड्राइवर महेश था, जो किसी बाउंसर से कम नहीं दिखता था.

लंबाचौड़ा महेश जब 20 साल का था, तभी से उन के साथ लगा हुआ था. उस के चाचा रामयतन यादव सेठजी के ड्राइवर थे. जब निर्मलाजी की अपनी गाड़ी आ गई तो उन्हें ड्राइवर की भी जरूरत महसूस हुई. उन्हीं के कहने से उन्होंने महेश को अपना ड्राइवर बना लिया था.

वैसे तो, वह ठीक 10 बजे ही आ जाता था मगर वक्तजरूरत वह कभी भी हाजिर हो सकता था. वह आराम से बंगले में अपनी बाइक लगाता और वहीं एक कमरे में रहता था. एक दिन जब वह स्कूल के लिए निकलने वाली थी, अचानक निर्मलाजी ने उस से कहा कि सुमन, तुम यह स्कूटी से क्यों चलती हो? तुम्हारे पापा ने तो कहने से भी गाड़ी नहीं दी. उन्हें हमारे लिए नहीं सही, तुम्हारे लिए तो कार देनी ही चाहिए थी. तुम तो कार चलाना जानती भी हो. खैर, कोई बात नहीं. मैं समरेश से कह कर तुम्हें गाड़ी खरीदवा देती हूं.

वह हंस कर रह गई, बोली, ‘‘दोढाई किलोमीटर की यात्रा के लिए कार रखना जरूरी है क्या. फिर पटना शहर का ट्रैफिक तो देख ही रही हैं. मैं स्कूटी पर ही ठीक हूं.’’

‘‘अच्छा बहू, तुम मैट लिपस्टिक क्यों लगाती हो? मेरी तरह ग्लौसी लिपस्टिक क्यों नहीं लगाती. सारे जेवरात भी लौकर में रख दिए तुम ने.’’ वे जैसे अपनी रौ में कह रही थीं, ‘‘अभी तुम्हारे खानेखेलने के दिन हैं और तुम बिलकुल सादे ढंग से रहती हो. यह कुछ जंचता नहीं. तब और, जब मैं इतनी बनठन कर रहती हूं तो तुम्हें भी उसी प्रकार रहना चाहिए.’’

‘‘मम्मीजी, आप की बात और है. आप सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं से जुड़ी हैं तो आप का यों रहना ठीक ही है,’’ उस ने शालीनतापूर्वक जवाब दिया, ‘‘लेकिन मैं स्कूल में पढ़ाने जाती हूं, वहां मुझे बच्चों को संबोधित करना होता है. ऐसे में वहां गहरा मेकअप कर जाना ठीक नहीं लगता. वैसे तो, समरेश के साथ जब कहीं शौपिंग करने या घूमने जाती हूं तो वह सब चलता ही है.’’

‘‘शायद, तुम सही हो,’’ वे बोली थीं, ‘‘फिर भी मुझे कहीं कुछ गलत लगता है. कहीं बाहर तुम्हें कुछ सुनना भी पड़ता होगा?’’

‘‘उस की मैं परवा नहीं करती, मम्मीजी. हर व्यक्ति की सोचसमझ अलग होती है,’’ वह अपनी स्कूटी स्टार्ट करते हुए बोली, ‘‘हमें अपनी जिंदगी जीनी चाहिए, इसलिए हमें अपनी समझ से ही चलना चाहिए.’’ Family Story in Hindi

Bangladesh Election Results : बंगलादेश – अस्थिरता से स्थिरता की ओर

Bangladesh Election Results : बांग्लादेश की राजनीति में आए बदलाव ने लंबे अस्थिर दौर के अंत का संकेत दिया है. बीएनपी की प्रचंड जीत बांग्लादेश की जनता की शांति, संतुलन और विकास की आकांक्षा को दर्शाता है. सत्रह साल के निर्वासन से उबर कर नेतृत्व की बागडोर संभालने वाले बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सामने अब चुनौती विरासत से आगे बढ़ कर पारदर्शी, संस्थागत और नीति आधारित शासन देने की है.

बंगलादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है. लंबे समय तक सत्ता संघर्ष, वैचारिक ध्रुवीकरण और अस्थिरता के दौर से गुजरने के बाद अब बंगलादेश में सत्ता की बागडोर अंततः खालिदा जिया और जियाउर्रहमान के बेटे तारिक रहमान के हाथों में आ गई है. 17 फरवरी को बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान ने निर्वासित जीवन से नेतृत्व की ओर कदम बढ़ाते हुए देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. 12 फरवरी को हुए चुनाव में तारिक की पार्टी ने 299 सीटों में से 212 सीटों पर विजय हासिल की. यह इस बात का प्रमाण है कि बंगलादेश के लोग लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता, हिंसा, घृणा, डर और वैचारिक ध्रुवीकरण से बाहर निकलना चाहते हैं.

चुनाव नतीजों ने यह स्पष्ट किया कि जनता निरंतर टकराव, हिंसा और अनिश्चितता से उकता चुकी थी. बीएनपी की विजय केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि शासन में संतुलन और संवाद की अपेक्षा का भी प्रतीक है. कई विश्लेषकों के अनुसार, तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार में जनसंपर्क के अपेक्षाकृत आधुनिक और सहभागी तरीकों को अपनाया – अधिक रैलियां, सीधा संवाद, और पारिवारिक छवि का प्रस्तुतीकरण, जिस से उन्हें व्यापक सामाजिक वर्गों से समर्थन मिला.

विरासत और नेतृत्व की परीक्षा

तारिक रहमान ऐसे राजनीतिक परिवार से आते हैं जिस की बंगलादेश के इतिहास में गहरी छाप रही है. उन के पिता जियाउर रहमान और मां खालिदा जिया देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियां रहे हैं. इस विरासत ने उन्हें पहचान तो दी है, पर साथ ही अपेक्षाओं का भार भी बढ़ाया है. अब उन के सामने चुनौती है कि वे व्यक्तिगत करिश्मे से आगे बढ़ कर संस्थागत मजबूती, पारदर्शिता और नीति आधारित शासन को प्राथमिकता दें.

अब जबकि नेतृत्व की बागडोर तारिक रहमान के हाथों में आ गई है, देखना दिलचस्प होगा कि तारिक इस विरासत को किस तरह आगे बढ़ाते हैं. 17 फरवरी को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. 12 फरवरी को हुए आम चुनाव में उन की पार्टी, बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), ने 299 में से 212 सीटों पर जीत दर्ज की. यह परिणाम संकेत देता है कि मतदाता स्थिरता, शांति और विकास की नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं.

जमात ए इस्लामी और शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाली नैशनल सिटीजन पार्टी को लग रहा था कि सत्ता की बंदरबांट में वही मुख्य किरदार रहेंगे. वे यह मान कर चल रहे थे कि बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी के लिए चुनाव आसान नहीं होगा क्योंकि खालिदा जिया अब जीवित नहीं है और 17 साल तक देश से बाहर रहने वाले तारिक रहमान इतनी जल्दी देश से कनैक्ट नहीं हो पाएंगे. मगर तारिक ने ऐसा कनैक्ट किया कि बाकी सब की नैया डुबो दी.

जनता से संवाद की रणनीति

तारिक रहमान ने मरने की कगार पर पहुंच चुकी अपनी मां की पार्टी बीएनपी में नई जान फूंकने के लिए जनता से संवाद का बिलकुल नया तरीका अपनाया. चुनाव प्रचार के लिए 19 दिनों में 64 रैलियां कर डालीं और इन रैलियों में उन्होंने अपनी पत्नी डा. जुबैदा रहमान और बेटी जाइमा रहमान को भी अपने साथ रखा. इस ने बंगलादेश की नारी शक्ति को जागृत किया. तारिक ने खुद को एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में जनता के सामने रखा जिस से जनता उन से तुरंत कनैक्ट हो गई. उन्होंने चुनावी मंच पर आम लोगों को आमंत्रित किया. उन से सीधे बात की, सवाल पूछे, समस्याएं जानीं और निदान का आश्वासन दिया. इन नीतियों ने मतदाताओं को उन के करीब ला दिया. वे हर मंच से देश में शांति, सद्भाव और लोकतंत्र की बात करते रहे. नतीजा यह हुआ कि शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थकों को भी तारिक रहमान ही उम्मीद की एकमात्र किरण नजर आए और और आवामी लीग के मतदाताओं के वोट भी तारिक की झोली में गए.

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जोर मारती इस्लामी ताकतें

यह बंगलादेश का दुर्भाग्य रहा कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद अंतरिम सरकार चलाने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता मौहम्मद यूनुस के चरित्र में उदारवादी लक्षणों की जगह इस्लामिक परस्ती और पाकिस्तान के प्रति झुकाव ज्यादा दिखाई दिया. उन्होंने बंगलादेश में एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र स्थापित करने की बजाय देश को कट्टरपंथी जिहादी दौर में ले जाने की पूरी कोशिश की. यूनुस ने बंगलादेश में हिंदू नागरिकों की हत्या पर चुप्पी साधे रखी और भारत विरोधी घृणा का चित्रण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यूनुस के लिए पाकिस्तान आइकौन बन गया जबकि पाकिस्तान से बंगलादेश को न कभी कोई फायदा हुआ और न होने वाला है.

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में जिस तरह पाकिस्तान और चीन का दबाव और दखल बढ़ा और जिस तरह बंगलादेश को एक इस्लामिक देश घोषित करने की तरफ पाकिस्तान बढ़ रहा था, तारिक रहमान की जीत ने उस मंशा पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है. यह पाकिस्तान की नीतिगत इस्लामिक हार है, जो बंगलादेश का भला कतई नहीं चाहता था, बस उसे एक आतंकी अड्डा बनाने की फिराक में था. तारिक के हाथ सत्ता सौंप कर बंगलादेश की जनता ने पाकिस्तान की हिंसा और घृणा का संहार किया है, इस में दोराय नहीं है.

गौरतलब है कि तारिक रहमान बीते 17 सालों से ब्रिटेन में रह रहे थे. उन पर वहां की बहुलतावादी संस्कृति का प्रभाव है, यह उन की बोलचाल, पहनावे और संपर्कों से पता चलता है. इसलिए यह माना जा रहा है कि वे कमाल पाशा की नीति पर चल कर बंगलादेश को सभी धर्मों के लोगों के लिए एक सुरक्षित जगह बनाएंगे.

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कमाल पाशा की नीतियां और तारिक

बताते चलें कि तुर्की के पूर्व राष्ट्रपति, मार्शल, क्रांतिकारी राजनेता, लेखक और तुर्की गणराज्य के संस्थापक कमाल पाशा उर्फ कमाल अतातुर्क ने तुर्की में न सिर्फ प्रगतिशील सुधारों की पहल की थी, बल्कि तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष और औद्योगिक राष्ट्र के रूप में बदल दिया था. वैचारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्षतावादी और राष्ट्रवादी कमाल पाशा की नीतियों और सिद्धांतों को कमालवाद के रूप में जाना जाता है. तारिक रहमान यदि उन के सिद्धांतों और नीतियों पर आगे बढ़ते हैं तो बंगलादेश को एक संप्रभु राष्ट्र बनाने में जरूर सफल होंगे, हालांकि कठमुल्लेपन के खतरे से वे अनजान नहीं हैं और चीन और पकिस्तान के दबाव से बाहर निकलने के लिए उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ेगी.

पाकिस्तान तारिक रहमान पर आंतरिक दबाव बनाएगा. इस्लामिक दुनिया में भी तारिक पर दबाव रहेगा. आर्थिक मदद के बदले बंगलादेश को इस्लामिक देश घोषित करने की शर्त रखी जाएगी. ऐसे समय में भारत का यह दायित्व बनता है कि जिस तरह पहले एक दोस्त की तरह वह कठिन वक्त में बंगलादेश के साथ मजबूती से खड़ा रहा, इस वक्त भी उस का भरपूर साथ दे.

पश्चिमी सहयोग की आवश्यकता

पश्चिमी देशों और भारत का सहयोग तारिक को चीन, पाकिस्तान और इस्लामिक देशों के दबाव और खतरे को कम करने में मददगार साबित होगा. वैसे भी तारिक के बंगलादेश वापस लौटने और चुनाव लड़ने के पीछे अमेरिका और ब्रिटेन का बड़ा हाथ है. जानकारों की मानें तो तारिक को ब्रिटेन में शरण देने और बंगलादेश में शेख हसीना का तख्तापलट के लिए धन और अन्य साधन मुहैया कराने में भी ब्रिटेन और अमेरिका ने मदद की है. दुनिया की अन्य शक्तियों ने भी तारिक रहमान की जीत का अनुमान लगाया था. यहां तक कि तारिक रहमान की पार्टी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के शेयर बाजार का खर्च भी अमेरिका ने वहन किया है.

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भारत से संबंध सुधारने की जरूरत

बंगलादेश का इतिहास संघर्ष, त्याग और पहचान की जिजीविषा से निर्मित हुआ है. भारत ने बंगलादेश के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाई थी. 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की निर्णायक भूमिका केवल सैन्य सहायता तक सीमित नहीं थी, वह सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग का भी प्रतीक थी. बंगलादेश और भारत के पश्चिमी हिस्से खासकर पश्चिम बंगाल की बोली, खानपान और पहनावा आपस में मिलताजुलता है. हमारी संस्कृति आपस में मेल खाती है. जबकि पाकिस्तान की बोली, पहनावा और संस्कृति का बंगलादेश से कोई मेल नहीं है. बंगलादेश के विकास में भारत की भूमिका अनिवार्य रूप से अग्रणी है. मुश्किल दौर में भारत बंगलादेश की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटा. ऐसे में अब तारिक रहमान को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह पाकिस्तान के दबाव और डर से बाहर निकल कर भारत से अपने रिश्तों को पुनः व्यवस्थित करें और एक धर्मनिरपेक्ष उदारवादी राष्ट्र का निर्माण करें.

पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक ध्रुवीकरण, कट्टरवादी विमर्श और बाहरी प्रभावों ने भारत और बंगलादेश की ऐतिहासिक आत्मीयता को एक गहरी धुंध में धकेल दिया था. इस के लिए भारत की मोदी सरकार भी जिम्मेदार रही, जिस ने सत्ता की हवस में भारतीय समाज में ध्रुवीकरण का कोई मौका नहीं छोड़ा और अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढाए. घुसपैठियों के नाम पर बांग्लादेशियों को गरियाया, उन को उठाउठा कर जेल में ठूंसा और उन के प्रति बहुसंख्यकों के दिलों में नफरत का जहर भरा. बिलकुल वैसा ही मोहम्मद यूनुस की आतंरिम सरकार के दौरान बंगलादेश में भी होता रहा. वहां भी आए दिन हिंदुओं को मारे जाने की खबरें आईं. दोनों ही देशों के शीर्ष नेतृत्व को लगा कि ऐसा कर के वे सत्ता में लंबे समय तक बने रहेंगे, मगर बंगलादेश की जनता ने यूनुस सरकार को आइना दिखा दिया है.

ध्रुवीकरण से उधड़े समाज के तानेबाने

डेढ़ साल पहले जब कट्टरपंथी आंदोलन ने शेख हसीना का तख्तापलट किया और यूनुस की अंतरिम सरकार बनी तो ऐसा मालूम हुआ जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को पसंद करने वाला देश कट्टरपंथ के रास्ते पर चल निकला है. फिर पाकिस्तानी कठमुल्लाओं और नेताओं का लगातार दौरा, चीन से बढ़ती नजदीकी, आएदिन अल्पसंख्यकों की हत्याएं और यूनुस सरकार द्वारा भारत विरोधी भावना को उकसाना और बढ़ाना बंगलादेश को पाकिस्तान के रास्ते चल पड़ने का संदेश दे रहा था. यूनुस की अंतरिम सरकार में जिस प्रकार वैचारिक कठोरता और प्रशासनिक असमंजस दिखा, उसने वहां की अर्थव्यवस्था और सामाजिक तानेबाने दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया.

यूनुस को भले ही नोबेल से सम्मानित किया गया मगर एक भोलेभाले दिखने वाले चेहरे के पीछे बेहद क्रूर शैतानी सोच काम कर रही थी, जो सत्ता में जमे रहने के लिए बंगलादेश की नसों में धर्मांधता का जहर घोलने में जुटी थी. अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान और चीन की गोद में खेलने लगा और अन्य राजनीतिक पार्टियों के दबाव के बावजूद चुनाव को बारबार टालने लगा. मोहम्मद यूनुस को जब लगा कि अब ध्रुवीकरण अपनी चरम पर है और चुनाव में कट्टरपंथी ताकतें ही जीतेंगे और उन का वजूद बना रहेगा, तब उन्होंने चुनाव की घोषणा की.

मगर जनता शांति चाहती है. वह भले किसी भी देश की हो. चाहे भारत की हो, पाकिस्तान की हो, अमेरिका या बंगलादेश की. आम जनता को दो वक्त की रोटी शांति और सुकून से चाहिए. लिहाजा यूनुस की शैतानी चालें धरी की धरी रह गईं. तारिक रहमान को चुनाव में एक स्पष्ट जनादेश मिलना यह बताता है कि बंगलादेश का जनता अब स्थिरता, भाईचारे और सौहार्द की कामना कर रही है.

Bangladesh Election Results (3)
एक समय में बंगलादेश ने वस्त्र उद्योग, निर्यात वृद्धि और महिला सशक्तीकरण के क्षेत्रों में प्रगति
की मिसाल कायम की थी. क्या यह अब बरकरार रह पाएगा?

रोजगार और विकास पर नजर

गौरतलब है कि बंगलादेश ने शेख हसीना सरकार में आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति की थी. वस्त्र उद्योग, निर्यात वृद्धि और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में उस ने मिसाल कायम की. उन के समय में भारत के साथ सुखसहयोग में खासी वृद्धि हुई. वहां के गारमेंट बाजार में भारतीय कामगारों की बहुतायत थी. भारत सहित अनेक देशों ने बंगलादेश में भारीभरकम निवेश किया था. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता ने निवेशकों का विश्वास तोड़ा, जिस के चलते बंगलादेश आर्थिक परेशानियों में फंस गया. अब तारिक सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह आर्थिक सुधारों को गति दे, रोजगार सृजन पर ध्यान दे, पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत करे ताकि विदेशी निवेश को ज्यादा से ज्यादा आमंत्रित किया जा सके. अगर तारिक रहमान ऐसा न कर सके तो चीन और पाकिस्तान सहित इस्लामिक देशों का दबाव उन पर हावी हो जाएगा.

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मोहम्मद यूनुस को भले ही नोबेल से सम्मानित किया गया लेकिन उन्होंने बंगलादेश की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल कर दी.

तारिक रहमान के सामने कई चुनौतियां हैं. सवाल कई हैं. क्या वे बंगलादेश को आर्थिक रूप से उसी मुकाम पर ले जा पाएंगे जहां शेख हसीना ने पहुंचाया था? बीते 18 महीने में मोहमद यूनुस ने देश की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल कर दी है. आर्थिक स्थिति में प्रगति के लिए तारिक को निश्चित ही अमेरिका की मदद चाहिए होगी, मगर चीन की नजर उन पर बनी हुई है. वह भी तारिक सरकार को साधने की कोशिश करेगा. उधर अमेरिका बंगलादेश में अपना एक सैन्य अड्डा बनाना चाहता है, क्या इस के लिए तारिक राजी होंगे? पाकिस्तान और चीन का डर और दबाव उन के काम को कितना प्रभावित करेगा?

भारत की पहल

बड़ा सवाल यह है कि भारत के साथ उन के रिश्ते कितने सहज हो पाएंगे? बंगलादेश भारत का सब से करीबी पड़ोसी है. बंगलादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है. भारत के साथ बेहतर रिश्तों के बगैर आर्थिक रूप से समृद्ध बंगलादेश की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. हालांकि खालिदा जिया ने जब भी कुर्सी संभाली तो भारत के साथ उन के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे, लेकिन तारिक के पास एक बेहतर अवसर है कि वे भारत के साथ दोस्ती की राह पर आगे बढ़ें. शुरुआत भारत ने कर दी है. खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजा गया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन के हाथों शोक संदेश पत्र भी भेजा था. अब तारिक के शपथ ग्रहण में स्पीकर ओम बिरला ने शिरकत की है. मोदी ने तारिक को जीत की बधाइयां भेजी हैं.

तारिक रहमान के नेतृत्व में बंगलादेश एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ा है. जनादेश ने अवसर प्रदान किया है, परंतु सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी प्रभावी ढंग से संस्थाओं को मजबूत करती है, सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करती है और विदेश नीति में संतुलन साधती है. जनता की मूल आकांक्षाएं सार्वभौमिक हैं – शांति, स्थिरता, सम्मानजनक जीवन और विकास. यदि नई सरकार इन प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहती है, तो बंगलादेश न केवल आंतरिक रूप से सुदृढ़ हो सकता है, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग और संतुलन में भी रचनात्मक भूमिका निभा सकता है. Bangladesh Election Results

CBSE Controversy : सीबीएसई – ब्रिटिश हुकूमत की तर्ज पर फूट डाल रहा

CBSE Controversy : सीबीएसई का जन्म ब्रिटिशकाल में हुआ था जिस का कायाकल्प आजादी के बाद हुआ कहने को सिर्फ नाम बदला लेकिन उस की कार्यशैली ब्रिटिश हुकूमत की तरह पौराणिक सी ही रही. इस ने जिस भेदभाव को जन्म दिया अब वह विकराल रूप धारण कर चुका है. औन स्क्रीन मार्किंग के बहाने नजर डालें उस हकीकत पर जो आमतौर पर नंगी आंखों से नजर नहीं आती.

क्यों पढ़ें?

फूट डालो और राज करो की नीति

सीबीएसई की आन मार्किंग व्यवस्था यह जता गई कि उसकी कार्यशैली शुरू से ही ब्रिटिस हुकुमत के प्रभाव में रही है. ‘फूट डालो और राज करो’ का मन्त्र परीक्षा और पढ़ाई में कैसे सीबीएसई चला रही है, इसे समझना जरुरी है कि अब नारा है- ‘फूट डालो और वर्ण व्यवस्था की नई शक्ल कायम रखो.’

अपने नएनए लेकिन अधिकतर गैरजरूरी प्रयोगों के लिए चर्चा, आलोचना और विवादों में रहने वाले सीबीएसई ने नया शिगूफा इस साल औनस्क्रीन मार्किंग का छेड़ा है. 12वीं क्लास में इस साल औनस्क्रीन मार्किंग की तुक क्या है यह किसी को समझ नहीं आ रहा है. इस प्रक्रिया के तहत सभी आंसर शीट्स की स्कैनिंग परीक्षा केंद्र पर ही होगी.

इस साल 12वीं के इम्तहान में 18 लाख 59 हजार से भी ज्यादा छात्र शामिल हो रहे हैं. जिन की एक करोड़ से भी ज्यादा आंसर शीट के 32 करोड़ से भी ज्यादा पेज स्केन किए जाएंगे स्कैनिंग कैसे होगी और इसे कौन यानी किस तरह के कर्मचारी करेंगे यह बहुत जल्द साफ हो जाना है.

CBSE Controversy (01)
डिजिटल मार्किंग का सीबीएसई का नया शिगूफा टैक्निकल टोटका भी साबित नहीं हो रहा. इस से छात्रों को कोई फायदा नहीं होने वाला.

लेकिन यह जरूर सीबीएसई ने बताया है कि एक क्वालिटी चेक टीम इस बात की जांच करेगी कि कोई भी पेज स्कैनिंग से छूटे न और किसी भी पेज की दो बार स्कैनिंग न हो जाए जाहिर है पहली झंझट जो पेशगी में ही बता दी गई है वह छात्रों की यही शिकायत रहेगी कि हमारी आंसर शीट के पूरे पेज स्केन नहीं हुए. लिहाजा इसे दोबारा स्कैन कर जांचा जाए.

जाहिर यह भी है कि इस में करोड़ों रुपए खर्च होंगे लेकिन इस के बाद भी योजना सफल होगी इस में एक नहीं बल्कि कई शक बने हुए हैं. सीबीएसई के एग्जाम कंट्रोलर संयम भारद्वाज के मुताबिक इस नई व्यवस्था से उत्तर पुस्तिकाओं के ट्रांसपोर्ट में लगने वाला समय और खर्च बचेगा और मूल्यांकन अधिक पारदर्शी तेज और त्रुटि रहित रहेगा.

इस दावे में जाहिर है जोश ज्यादा है क्योंकि सभी परीक्षा केंद्रों पर बिजली सप्लाई वक्त पर मिलेगी इस की कोई गारंटी नहीं. दूसरे जिस ट्रांसपोर्ट खर्च के बचने की बात की जा रही है उस के लगभग ही स्कैनिंग में खर्च होगा. तीसरे यह ठीक है कि स्कैनिंग कोई बड़ी तकनीक का काम नहीं लेकिन इतने बड़े काम में गड़बड़ियों से बच पाना आसान नहीं होगा.

सब से बड़ी झंझट जो निश्चित ही थोक में विवाद पैदा करेगी वह यह है कि अगर परीक्षक से धोखे से एक भी पेज स्कैन होने से छूटा तो पूरी आंसर शीट ही अमान्य हो जाएगी. स्कैनर कितनी ही अच्छी क्वालिटी का क्यों न हो एक वक्त के इस्तेमाल के बाद उस की स्कैनिंग में धुंधलेपन की आशंका बनी रहती है.

यह काम शिक्षकों को दिमागी तौर पर थका देने वाला भी साबित होगा क्योंकि इस में उन्हें भी मशीन बन जाना है स्वभाविक थकान का शिकार हो कर उन से गलतियां होंगी कापियां जांचने में भी और पेज अपलोड करने में भी. त्रुटि चाहे मानवीय हो तकनीकी उस की सजा छात्रों को ही भुगतना पड़ेगी.

इस खामी की देन है सीबीएसई

इस व्यवस्था में खामियों का अंबार है जिस में से एक यह भी है कि सर्वर या सौफ्टवेयर में गड़बड़ी का खामियाजा कौन भुगतेगा और कैसे भुगतेगा यह स्पष्ट नहीं है कुल 8 हजार में से जिन परीक्षा केंद्रों में सीमित संसाधन हैं वे कैसे इस नए हुक्म को मैनेज करेंगे इस तरफ भी नहीं सोचा गया. परीक्षा केंद्रों की असमान डिजिटल कैपेसिटी भी बड़ा फैक्टर होगा.

यह नई व्यवस्था कितनी कारगर रही यह नाईनाई बाल कितने वाली कहावत की तर्ज पर जल्द सामने आ जाना है. लेकिन यह अभी से साफ हो गया है कि सीबीएसई की कार्यप्रणाली में ब्रिटिश हुकूमत वाली कार्यशैली अभी भी झलकती है क्योंकि उस का जन्म ही ब्रिटिश काल में हुआ था. कम ही लोग जानते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने साल 1929 में बोर्ड औफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन राजपुताना का गठन किया था जिस का मुख्यालय अजमेर था. यह परीक्षाओं के एकीकरण का पहला कदम था. तब इस में 70 हाई स्कूल और महज 12 इंटरमीडिएट स्कूल शामिल हुए थे.

इस पहल का मकसद था ब्रिटिश सरकार के ट्रांसफर वाले कर्मचारियों के बच्चों को एक सी शिक्षा और एक सी परीक्षा प्रणाली मुहैया कराना. लेकिन यह मकसद बाद तक बना रहा आजादी के बाद 1952 में पहली भारतीय सरकार ने बोर्ड औफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन राजपुताना का पुनर्गठन करते उस का नाम सीबीएसई यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकेंडरी एजुकेशन कर दिया और 1962 में पूरी तरह इसे राष्ट्रीय बोर्ड का दर्जा दे दिया गया.

यह ठीक वैसा ही था जैसे इंडियन सिविल सर्विसेज का नाम बदल कर इंडियन एडमिनिस्ट्रैटिव सर्विसैज कर देना करने के नाम पर इतना हुआ कि इस का मुख्यालय भी दिल्ली बना दिया गया. पहले ब्रिटिश कमिश्नर इस का मुखिया होता था अब आईएस होने लगे जिन के दिमाग में अंग्रेजियत कूटकूट कर भरी होती है.

सीबीएसई के जन्म से ताल्लुक रखती इस संक्षिप्त कथा का उत्तरकांड यह है कि पहले भी पढ़ाई और परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी था और आज भी है. कहने को हिंदी विकल्प है लेकिन हकीकत में वह कहने को ही है. क्योंकि सीबीएसई वाले प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी से ही अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई होती है. जहां के छात्र 12वीं और उस के बाद तक तिरसठ और सिक्सटी थ्री में फर्क नहीं कर पाते. भारतीय मांबाप के लिए यह शर्म की नहीं बल्कि गर्व की बात होती है कि उन का बच्चा यह नहीं जानता समझता कि छब्बीस रूपए कितने होते हैं. ट्वैंटी सिक्स रुपीज कहो तभी उसे बात समझ आती है.

अंग्रेज चले गए लेकिन अपनी औलादें यही छोड़ गए का ताना अब कम ही कसा जाता है वजह अधिकतर शहरी आबादी ने खुद को भाषाई स्तर पर भी अंग्रेजों की मानद संतान स्वीकार लिया है. हिंदी को गांवदेहातों और पिछड़े गंवारों की भाषा की मान्यता मिले अरसा बीत चुका है. ब्रिटिश काल में गिटरपिटर अंग्रेजी बोलने वालों जो सवर्ण ही होते थे को बिना किसी लाग लपेट के विद्वान और बुद्धिमान मान लिया जाता था. तब मुट्ठी भर सवर्ण यह विदेशी भाषा जानते थे अब मुट्ठी भर शहरी सवर्ण ही मिलेंगे जो अंग्रेजी न जानते हों.

लेकिन अंग्रेजी जानने का मतलब यह नहीं है कि वे शेक्सपियर ब्रांड अंग्रेजी जानने समझने लगे हों. बल्कि यह है कि वे प्रेमचंद छाप हिंदी भी जाननेसमझने काबिल नहीं रहे. यानी एक ऐसी पीढ़ी वजूद में आई जो सलीके से न हिंदी जानती है न ही अंग्रेजी. क्योंकि इनके घरों की भाषा हिंदी है और पढ़ाई अंग्रेजी.

यह पीढ़ी हिंदी में सोचती है लेकिन बोलती अंग्रेजी में है. अब वह अंग्रेजी कितनी शुद्ध और ग्रामैटिक है इस का सटीक मूल्यांकन करने वाले ही गिनती के मिलेंगे. यह वह पीढ़ी है जो स्टील प्लांट का अनुवाद इस्पात का पौधा करती है. बताने की जरूरत नहीं कि इस पीढ़ी का बौद्धिक स्तर क्या है और यह क्यों कुंठित है.

सीबीएसई इस रामायण में इन मानों में फिट होता है कि उस ने कभी अंग्रेजी से छुटकारा पाने की कोशिश नहीं कि बल्कि हमेशा से ही हिंदी से छुटकारा पाने की जुगत में लगी रही.

यों कायम रही वर्ण व्यवस्था

आजादी के वक्त ही धर्म के आधार पर डली फूट देश के बंटवारे की शक्ल में दिखी थी. जाति के नाम पर तो देश गलेगले तक बंटा ही है. लेकिन हीनता और श्रेष्ठता के नाम पर स्कूली स्तर पर फूट डाली सीबीएसई ने जिस ने अंग्रेजी पर ही तवज्जुह दी. जैसे पौराणिक काल में ऋषिमुनि संस्कृत को तवज्जुह देते थे जिस से ब्राह्मण और क्षत्रिय ही पढ़ पाए. इस से हुआ यह कि शिक्षा पर सवर्णों का हक और कब्जा बना रहा. धर्म निरपेक्ष संविधान की जड़ें पौधा बनने से पहले ही खोदी जाने लगीं. धर्म, राजनीति और समाज के बाद असमानता पर सीबीएसई ने सब से बड़ा और छिपा हमला किया.

नाम बदला कार्यशैली नहीं

सीबीएसई का जन्म ब्रिटिशकाल में हुआ था जिस का कायाकल्प आजादी के बाद हुआ. कहने को सिर्फ नाम बदला लेकिन उस की कार्यशैली ब्रिटिश हुकूमत की तरह पौराणिक सी ही रही. इस ने जिस भेदभाव को जन्म दिया, अब वह विकराल रूप धारण कर चुका है. औनस्क्रीन मार्किंग के बहाने नजर डालें उस हकीकत पर जो आमतौर पर नंगी आंखों से नजर नहीं आती.

अगर अंग्रेजी पढ़ाई और परीक्षा में थोपी नहीं जाती तो सब को शिक्षा का संवैधानिक सपना साकार हो भी सकता था बशर्ते यह सब को समान शिक्षा का होता. और सीबीएसई को खत्म ही कर दिया जाता जिस के प्रोत्साहन और शह पर कुकुरमुत्ते से उगते इंग्लिश मीडियम स्कूलों जो उस से संबंध होते गए ने वर्ण व्यवस्था की शक्ल बदलने में अहम रोल निभाया.

जाति के बाद खासतौर पर हिंदी भाषी राज्यों के छात्र स्कूली स्तर से ही सवर्ण और गैर सवर्ण दो वर्णों में बंटने लगे. ऊंची जाति वाले हिंदी मीडियम वाले सरकारी स्कूलों जिन्हें स्टेट बोर्ड संचालित करता है से परहेज करने लगे क्योंकि उन में नीची जाति वालों के बच्चों को भी पढ़ने का हक मिल गया था.

सरकार शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते स्कूल खोलती रही. तमाम जातियों के बच्चे उन में पढ़ने भी लगे. लेकिन सीबीएसई सवर्णों के लिए वरदान साबित हुआ जिस का पाठ्यक्रम स्टेट बोर्ड्स से अलग होता है और अंग्रेजी जहां लगभग थोपी गई भाषा है. खुद अपने को और अपने बच्चों को अलगथलग यानी सुपीरियर दिखाने के लिए ऊंची जाति वाले अपने बच्चों को सीबीएसई वाले प्राइवेट स्कूलों में भेजने लगे जिन में दलित ओबीसी आदिवासी बच्चे न के बराबर जा पाते थे क्योंकि ये स्कूल महंगे भी थे. गांवदेहात के गरीब सवर्णों की सहूलियत के लिए नवोदय विद्यालय सरकार ने खोले. ट्रांसफर वाले केंद्रीय विद्यालयों को भी सीबीएसई से संबद्ध कर दिया ताकि कर्मचारियों के बच्चों को स्टेट बोर्ड की दरिद्रता से बचाया जा सके.

अब जरूर सीबीएसई स्कूलों में कुछ गैरसवर्ण छात्र आने लगे हैं लेकिन वे उतने ही हैं जितने कि स्टेट बोर्ड्स बाले स्कूलों में सवर्ण छात्र हैं. यानी महज 8 से 10 फीसदी के लगभग यह विभाजन आज भी समानता के सिद्धांत या परिकल्पना कुछ भी कह समझ लें के लिए चुनौती बन कर खड़ा है. जिस में घोषित तौर पर कोई खामी या एतराज नहीं जताया जा सकता. 10 लाख सरकारी स्कूलों पर सीबीएसई से संबद्ध 32 हजार के लगभग प्राइवेट स्कूल भारी पड़ रहे हैं.

ऐसा सिर्फ इसलिए कि हर किसी ने यह मान लिया है कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे होनहार और बुद्धिमान होते हैं. क्योंकि वे अलग सिलेबस वाली पढ़ाई करते हैं जो स्टेट बोर्ड्स से कही बेहतर और कठिन होता है. इसीलिए सीबीएसई से निकले बच्चों को जौब देने में प्राइवेट और मल्टीनैशनल कंपनियां हिचकिचाती नहीं. पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होने के चलते ये बच्चे राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं मसलन नीट, गेट, क्लेट, ए ट्रिपल आई और आईएस तक में भी बाजी मारने लगे. मौखिक साक्षात्कार में उन का अंग्रजी बोलना उन्हें चयनकर्ताओ का लाडला बनाने लगा क्योंकि उन में से अधिकतर इन्हीं स्कूलों से पढ़ कर निकले हुए थे.

लेकिन इस का असल पहलू यह है कि ये बच्चे एलीट क्लास के और सीबीएसई स्कूलों की महंगी पढ़ाई को अफोर्ड करने वाले घरों के होते हैं जिन में 90 फीसदी सवर्ण होते हैं. यही वह पैमाना है जो धार्मिक वर्ण व्यवस्था को बिना गुरुकुल खोले स्कूली स्तर पर ही शक्ल बदल कर थोपता है.

औनस्क्रीन मार्किंग सीबीएसई का नया मार्केटिंग फंडा है जो अपने खास किस्म के ग्राहकों को आश्वस्त करता है कि हम स्टेट बोर्ड से नया और बेहतर करने का अपना वादा निभा रहे हैं. यह और बात है कि औन स्क्रीन मार्किंग में नया या अनूठा कुछ नहीं है एक क्लेरिकल काम को मशीनों से करवाए जाने का ढिंढोरा भर है. उस में कोई नई टैक्नालौजी भी नहीं है, है तो बस अलग दिखने और दिखाने की कोशिश जो 1929 में गठित बोर्ड औफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन राजपूताना के दौर से की जाती रही है. ताकि भेदभाव और दूरियां कायम रहें. CBSE Controversy

Life After Death : मरने के बाद क्या होगा, जानें आप भी

Life After Death :

इसलाम में मरने के बाद के जीवन की जो भी व्याख्याएं मौजूद हैं वो हदीसों पर आधारित हैं. हजरत मुहम्मद ने अपने जीवनकाल में जो भी बातें कहीं उन्हें हदीसों के रूप में जमा करने का काम उन लोगों ने किया जो मुहम्मद साहब के मरने के दोतीन सदियों बाद पैदा हुए.

मृत्यु के बाद क्या होता है, यह बताने आज तक कोई नहीं आया लेकिन सभी धर्मों ने इस पर कहानियां जरूर गढ़ी हैं. पुरोहितों ने बड़ी चालाकी से ये कहानियां रची हैं ताकि लोगों में मरने का डर और मरने के बाद का भय पैदा हो और इस भय के नाम पर लोगों से धन ऐंठा जा सके.

इसलाम में मरने के बाद काफिर और मोमिन को अलगअलग परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है.

इब्न माजा हदीस नंबर 4262 के अनुसार- यदि मरने वाला व्यक्ति मोमिन था, तो फ़रिश्ते उस की आत्मा को लेने से पहले उस से सवालजवाब करते हैं. मोमिन इस में पास हो जाता है तब फरिश्ते उसे जन्नत के इत्र से सुगंधित करते हैं, फिर उसे अल्लाह के पास ले जाते हैं, अल्लाह कहता है: “मेरे बंदे का नाम जन्नत की किताब में लिखो और इसे वापस धरती पर ले जाओ.”

इस प्रकार आत्मा को वापस कब्र में ला कर उस के मृत शरीर में लौटा दिया जाता है और मोमिन की कब्र को जितना उस की आंखें देख सकती हैं उतना विस्तृत कर दिया जाता है लेकिन अगर यह किसी काफ़िर की आत्मा है तो फ़रिश्ते जहन्नुम दिखाने के लिए उस की आत्मा को शापित, अपमानित और भयभीत अवस्था में ऊपर ले जाते हैं और फिर उसे वापस धरती पर ला कर उसे उस के शरीर में वापस कर देते हैं, फिर व्यक्ति को उस की क़ब्र में यातना दी जाती है. उसे कब्र की दीवारों को भींच कर दबाया जाता है और उस के पास जहन्नुम की गरमी और धुआं छोड़ा जाता है.

क्या इसलाम की इस कहानी में कोई लौजिक है? पहले शरीर से आत्मा को अलग कर उसे सातवें आसमान पर ले जाया जाता है, फिर उसी आत्मा को उस के मृत शरीर में वापस फिट किया जाता है.

क्या इन बातों का कोई सिरपैर है? अगर कब्र में मुर्दे की आत्मा उस के जिस्म में घुसेड़ दी जाती है तो लाश सड़ने के बाद भी क्या वो रूह उस सड़ी हुई लाश में ही रहती है?

कई ऐसी वारदातें होती हैं जिन में कुछ शातिर चोर नई कब्रों को खोद कर ताजा दफन लाशों से और्गेन चोरी कर उन्हें बेचते हैं. लाश के अंगों को निकालने वाले लोगों को तो इसलाम कि इन बातों पर बिलकुल यकीन नहीं है तभी तो ये अंगचोर लोग रात के अंधेरे में कब्र को खोद कर ताजी दफन लाशों के और्गन चोरी करते हैं और कोई रूह या फरिश्ता उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक पाता.

या तो कब्र में रूह वाली बात झूठी है या फिर वो रूह जो कयामत के इंतजार में जन्नत की खिड़की से जन्नत की खुशबू का मजा लेने को कब्र में बैठी है वो इतनी कमजोर और नालायक है कि अपने जिस्म की हिफाज़त भी नहीं कर सकती.

इसलाम के अनुसार फ्यूचर में किसी वक्त कयामत होगी और तब सभी मुर्दे जिंदा किए जाएंगे और उन सभी के हिसाबकिताब के बाद ही उन्हें जन्नत या दोजख में भेजा जाएगा.

अब सवाल यह उठता है कि क्या आदम से ले कर अब तक मरे लोगों की आत्माएं उन की कब्रों में ही हैं?

इजराइल और फिलिस्तीन के युद्ध में जिन लोगों कि लाशें दफन न हो सकीं उन की रूहों का क्या होगा? जो लोग अपने मुर्दों को दफन नहीं करते, कयामत तक उन की रूहें किस स्टोररूम में रखी जाएंगी?

प्लेन दुर्घटनाओं में जिन लोगों की लाशें तक नहीं मिल पाईं उन की रूहें कब तक भटकेंगी?

गरुड़ पुराण के मुताबिक, मरने के बाद आत्मा यमलोक जाती है. आत्मा को यमदूत 24 घंटे में कर्म दिखाते हैं और फिर 13 दिनों बाद यमलोक ले जाते हैं. आत्मा के मार्ग का चयन उस के कर्मों पर निर्भर करता है. मरने के बाद आत्मा 24 घंटे के अंदर एक बार फिर से धरती पर लौटती है और परिजनों द्वारा 13वीं करने के बाद उसे सूक्ष्म शरीर मिलता है. आत्मा को पैदल चल कर ही यमलोक की दूरी तय करनी पड़ती है. पाप करने वाले लोगों को मरने के बाद इस की सजा भुगतनी पड़ती है. बुरे कर्म करने वाले मनुष्यों को नरक में भेजा जाता है और अच्छे कर्म करने वाले को स्वर्ग. मरने के बाद आत्मा 13 दिन तक अपने घर में रहती है. इस दौरान परिवार के सदस्य को अलगअलग धार्मिक कर्म करते रहना चाहिए तभी आत्मा को शांति मिलती है.

मरने के बाद क्या होता है, इस सवाल पर धार्मिक नजरिया पूरी तरह आस्था पर कायम है जिस में लौजिक ढूंढ़ना बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं.

मरने के बाद क्या होता है, इस सवाल पर बड़ीबड़ी बकवासें करने वाले पुरोहित, मुल्ला, पादरी आज तक रूह या आत्मा का कोई सुबूत नहीं दे पाए. इस से यह साबित होता है कि रूह या आत्मा का कोई वजूद ही नहीं.

विज्ञान के अनुसार, इंसान एक बायलौजिकल मशीन है जिस का सौफ्टवेयर जब तक काम करता है इंसान जिंदा रहता है और जब सिस्टम खराब हो जाता है तो इंसान मर जाता है. जो है यह शरीर ही है, इस से अलग कुछ नहीं. दिमाग के न्यूरौन्स की वजह से हम जिंदा इंसान कहलाते हैं. दिमाग के इन्हीं न्यूरौन्स कि वजह से हमारे विचार जिंदा होते हैं और जब न्यूरौन्स तक एनर्जी नहीं पहुंच पाती, हमारे विचार शून्य हो जाते हैं. इसी को मृत्यु की अवस्था कहा जाता है.

आप की धार्मिक आस्था आप को जीवनभर भ्रम में रखती है. आप जीवन को समझ ही नहीं पाते, इसलिए मृत्यु के बाद की परिकल्पनाएं आप को आकर्षित करती हैं और आप अपने कीमती जीवन को धर्म के चंगुल में उलझाए हुए लुटते चले जाते हैं. आप की इसी बेवकूफी पर धर्म का धंधा चलता है और आप की इसी नासमझी कि वजह से तमाम धार्मिक गिरोह आप की पीढ़ियों को तबाह करते हैं.

मरने के बाद क्या होगा, कोई यह बताने नहीं आया. मरने के बाद के जीवन को किसी ने नहीं देखा. इसलिए इस सवाल पर जीवन बरबाद करने की जरूरत नहीं है कि मरने के बाद आप का क्या होगा? यह सवाल ही गलत है. सही सवाल यह है कि मरने के बाद आप अपनी पीढ़ियों के लिए कैसी दुनिया छोड़ कर जाएंगे? आप को जीतेजी इस बेशकीमती सवाल का जवाब ढूंढ़ना चाहिए.

Life After Death

Romantic Story in Hindi : माई हैंडसम – कहानी युवा पीढ़ी के प्रैक्टिकल प्यार की

Romantic Story in Hindi :

अन्वी के बदलते रंगढंग देख कर रंजनी समझ गई थी कि उस की बहन पर इश्क का खुमार चढ़ गया है. खैर, यह उम्र ही ऐसी होती है. लेकिन रंजनी नहीं चाहती थी कि अन्वी अपने कैरियर को ताक पर रख दे, इश्क के चक्कर में पड़ कर. पर अन्वी के निर्णय ने तो रंजनी को हैरत में डाल दिया था.

ट्रिनट्रिनट्रिन. डोरबेल की आवाज सुनते ही अन्वी ने दरवाजा खोला और हड़बड़ाई सी अपनी दीदी रंजनी से बोली, ‘‘प्लीज दीदी, मुझे डिस्टर्ब मत करना. मैं एक जरूरी कौल पर हूं.’’
रंजनी के चेहरे पर मुसकान छा गई थी, क्योंकि पहले वह भी तो जिंदगी के इन अनुभवों से गुजर चुकी थी. वह ऐसे कौल्स की असलियत को अच्छी तरह जानती थी.
‘‘ओके माई डियर,’’ कहते हुए पास में रखी ‘गृहशोभा’ पत्रिका के पेज पलटने लगी थी लेकिन उस का ध्यान अन्वी पर ही अटका हुआ था.
19 वर्षीया अन्वी रंजनी की छोटी बहन है. उन के मम्मीपापा यूपी के कासगंज जैसे छोटे शहर में रहते हैं. वहां कोचिंग या पढ़ाई की अच्छी सुविधा नहीं है, इसलिए रंजनी ने अपने मम्मीपापा से जिद कर के उस को अपने पास दिल्ली जैसे शहर में रखा हुआ है. रंजनी अपनी छोटी बहन की हर हरकत पर अपनी काग दृष्टि लगाए रखती है क्योंकि वह थोड़ी चुलबुली सी आधुनिका है. उस के हर कदम पर वह पूरी निगरानी रखती है.
यदि कुछ गड़बड़ हो गई तो आखिर मम्मीपापा को उसी को तो जवाब देना होगा क्योंकि वही तो अन्वी को जिद कर के अपने साथ रहने के लिए ले कर आई थी. जबकि, निखिल उस के पति, के चेहरे पर नाराजगी स्पष्ट झलक रही थी.
अन्वी बचपन से पढ़ने में बहुत तेज थी. उस का सपना था कि वह सीए बने.
इसलिए मम्मीपापा ने उस के भरोसे और विश्वास पर ही अन्वी को उन लोगों के पास रहने के लिए भेजा था जबकि पापा तो उसे होस्टल में रखना चाहते थे.
अन्वी को उस के पेरैंट्स ने उसे पूरी छूट दे रखी थी कि वह अपना मनचाहा कैरियर चुन सकती है.
अन्वी ने सीए बनना चाहा और उस की एंट्रैंस की परीक्षा पास भी कर चुकी थी.
वैसे, दोनों बहनों के बीच आपस में बहुत अच्छी समझदारी थी. अन्वी कालेज से लौट कर आते ही अपने दोस्तों की सारी बातें रंजनी को बताया करती थी.
रंजनी की ओर से भी किसी भी दोस्त के घर आनेजाने पर कोई मनाही या प्रतिबंध नहीं था. जब दोस्तों का ग्रुप घर आता तो हर बार रंजनी अपनी ओर से यह जानने की कोशिश किया करती कि अन्वी का विशेष ध्यान किस लड़के पर है. वह उसे छेड़ती हुई कहती भी कि अन्वी तुम्हें इन सब में कौन सब से अच्छा लगता है तो वह अपनी दी को प्यार से घूर कर हंस दिया करती.
‘दीदी, मेरी जासूसी करने की कोई जरूरत नहीं है. वैसे, आप को बता देती हूं कि जैसा आप सोच रही हैं, वैसा कुछ भी नहीं है. अभी मुझे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है. प्यारव्यार के लिए अभी सारी उम्र पड़ी है.’
सीए का एंट्रैंस पास करने के बाद अन्वी फाइनल ग्रुप की तैयारी में जुटी हुई थी लेकिन लगभग सालभर बाद ही अन्वी के व्यवहार में आया बदलाव दोस्त जैसी बहन की आंखों से भला कैसे छिपता.
अब अन्वी के हाथों से फोन नहीं छूटता और वह अपने कमरे में बैठ कर फोन पर बहुत धीमेधीमे लंबीलंबी बातें किया करती. पहले तो उस का फोन कहीं भी पड़ा रहा करता था लेकिन अब वह अपना फोन अपने आसपास रखती और थोड़ीथोड़ी देर में अपना फोन चैक करती रहती थी. रंजनी ने अपनी छोटी बहन के इस नए बदलाव को नोटिस किया और समझ गई कि जरूर किसी लड़के के साथ इस का कुछ चक्कर शुरू हो गया है.

रंजनी को आजकल अन्वी को औब्जर्व करने में बहुत मजा आ रहा था. उसे अपने कालेज के दिनों की याद आती जब उस का और निखिल का अफेयर शुरू हुआ था तो वह भी ऐसे ही मैसेज की आवाज होते ही मैसेज को पढ़ने के लिए बेचैन हो जाया करती थी और तब तो वह मां से छिप कर मैसेज टाइप करती थी. कितने रूमानी दिन थे. हर समय, बस, रोमांस ही छाया रहा करता था. उस ने नोट किया था कि अब जब भी वह किसी काम के लिए अन्वी को फोन करती थी तो वह हमेशा जल्दी में रहती और तुरंत बात कर के फोन कट कर दिया करती थी.
रंजनी ने पति निखिल को अन्वी में आए इस परिवर्तन को बताने की जरूरत नहीं समझ थी क्योंकि निखिल अपने काम में बहुत बिजी रहते थे.
एक दिन जब अन्वी अपना फोन ले कर नहाने के लिए बाथरूम में जा रही थी तो वह जोर से हंस कर बोली थी, ‘‘आज फोन को भी नहलाने के लिए ले जा रही है क्या?’’
‘‘दी, तुम बहुत खराब हो. हर घड़ी मुझ पर नजर रखती हैं आप. म्यूजिक सुनने के लिए साथ में ले जा रही हूं.’’
रंजनी मुसकरा पड़ी थी. उस ने गौर किया था कि जब वह किचन में बिजी रहती तब अन्वी का फोन जरूर बजा करता था.
वह भी जानबूझ कर उस समय अन्वी के कमरे में जरूर जाती तो रंजनी को देखते ही वह अलर्ट सी हो कर चुप हो जाती थी.
रंजनी को यह तो समझ में आ गया कि अन्वी इन दिनों किसी ऐसे लड़के से बात कर रही है जो उस के परिचित दोस्तों से अलग है. कोई ऐसा नया दोस्त है जिस के बारे में उस ने अभी तक उन्हें बताने की या तो जरूरत नहीं समझ या उन से छिपाना चाहती है.
अब तो उसे अन्वी को देखने में बहुत आनंद आ रहा था. इन दिनों वह ऐसा महसूस करती कि मानो वह अपनी किशोरवय में जी रही हो. जब इसी तरह वह कालेज के दिनों में निखिल के प्यार में पड़ कर ऐसी ही हरकतें करती थी.

वह अन्वी के चेहरे के भावों को देख मन ही मन खूब हंसती. वाह अन्वी, तुम अपने को बहुत सयानी समझने लगी हो लेकिन अन्वी तुम डालडाल तो मैं पातपात. आखिर एक दिन दरवाजे की ओट से उधर से आने वाली आवाज को सुन कर यह तो कन्फर्म हो गया कि अन्वी किसी लड़के से ही बातें करती रहती है.
एक दिन अन्वी ने अपना फोन चार्ज करने के लिए किचन में लगा दिया और वह अंदर तैयार होने के लिए चली गई. तभी फोन की घंटी बजी तो तुरंत रंजनी ने फोन पर निगाह डाली, ‘माई हैंडसम’ के नाम से नंबर सेव था.
आज तो चोरी पकड़ी गई अन्वी की. फिर जरा ही देर में व्हाट्सऐप कौल भी आ गई तो जनाब की फोटो भी दिख गई. रंजनी ने ध्यान से देखा, लड़का तो स्मार्ट दिखाई पड़ रहा है. चलो अन्वी ने लड़का तो अच्छा ही पसंद किया है.
तभी अंदर से दौड़तीभागती घबराई हुई सी अन्वी आई और बोली, ‘‘दी. मेरा फोन बजा क्या?’’
‘‘हांहां, बजा तो था.’’
‘‘किस का फोन था?’’
अन्वी कन्फर्म करना चाह रही थी कि दीदी को कुछ पता तो नहीं चल गया. अन्वी बालों पर ब्रश करती हुई खड़ी थी, चार्जर निकालते हुए प्रश्नवाचक निगाहों से दीदी की ओर देख रही थी.
रंजनी ने अपने को बिजी दिखाते हुए कहा, ‘‘पता नहीं किस का फोन था?’’
‘‘तुम्हारा और तुम्हारे जीजू का टिफिन पैक करने की जल्दी होती है, उस समय भला फोन देखने और उठाने का कब होश रहता है.’’
अन्वी के चेहरे से तनाव की परछाईं उतर गई और वह सामान्य स्वर में बोली, ‘‘हां दी, मुझे पता है कि सुबह आप पर कितना काम का लोड रहता है.’’ अन्वी हंस कर बोली, ‘‘थैंक्यू माई डियर दी.’’ और प्यार से दी को हग कर के किचन से चली गई.
अब रंजनी को चिंता होने लगी क्योंकि उस ने अभी तक निखिल को कुछ नहीं बताया था. वैसे, सच तो यह है कि यदि अन्वी के जीवन में कोई लड़का आया भी है तो इस में खास बात भला क्या है? यह उम्र ही ऐसी है जब लोग प्यार के चक्कर में पड़ते ही हैं. इस में बुराई वाली भला क्या बात है. आखिर, उस ने और निखिल ने भी तो लवमैरिज ही की है. इस उम्र में प्यार में ऐसा नशा सा छाया रहता है जैसे सावन के अंधे को सबकुछ हराहरा ही दिखता है. वैसे भी प्यार में सबकुछ और सतरंगा और हसीन सा ही दिखता रहता है. अपने रूमानी दिनों को याद कर के रंजनी के चेहरे पर भी मुसकराहट आ गई थी.

यदि अन्वी को कोई लड़का पसंद है तो अच्छा तो है, हम सभी लड़का ढूढ़ने की जहमत से बच जाएंगे. इस उम्र में प्यार नहीं होगा तो बताओ कब होगा? रात को जब वह बैड पर गई तो उस के चेहरे की मुसकान रोज से कुछ खास महसूस हुई तो निखिल ने पूछा, ‘‘कोई खास बात है क्या? आज चेहरे पर इतनी बड़ी वाली खिली हुई मुसकान का राज क्या है?’’
‘‘हांहां, है तो कुछ खास बात लेकिन तुम अनुमान लगाओ.’’
‘‘मैं भला कब तुम महिलाओं के मन की बात जान सका हूं. तुम्हीं बता दो, मुझे नींद आ रही है,’’ जम्हाई लेते हुए निखिल बोले.
‘‘तुम्हारी प्यारी साली को शायद इश्क हो गया है.’’
निखिल चौंक पड़ा और बैड पर ही उठ कर बैठ गया था.
वे पहले तो थोड़ा सकपकाए, फिर बोले, ‘‘तुम बहुत ज्यादा खुश हो कर बता रही हो, उस ने तुम्हें बताया कि तुम केवल हवा में अंदाजा लगा रही हो.’’
‘‘उस ने बताया कहां?’’ उस की हरकतों को देख कर अंदाजा लगा रही हूं.’’
‘‘अच्छा, फिर उस के बताने का इंतजार करो.’’ निखिल बोले.
‘‘वैसे, मेरा अंदाजा बिलकुल पक्का है.’’
‘‘वेट ऐंड वाच, अब सो जाओ.’’
परंतु जैसा वे दोनों सोच रहे थे, वैसा नहीं हुआ और एक शाम अन्वी बोली, ‘‘दीदी और जीजू, कल संडे को मेरा एक फ्रैंड आप लोगों से मिलने के लिए आएगा. कल आप लोगों का कोई बाहर जाने का प्रोग्राम हो तो मैं उसे सुबहसुबह ब्रेकफास्ट पर बुला लूंगी.’’
रंजनी ने निखिल को आंखों ही आंखों में इशारा किया कि देख लो, मेरा अंदाजा सही निकला.
निखिल ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘साली साहिबा, ऐसा लग रहा है कि कोई खासमखास आ रहा है. यदि कोई स्पैशल हो तो मैं सूट पहन लूं और टाई लगा कर जैंटलमैन बन कर तैयार हो जाऊं.’’
जीजासाली के बीच चुहलबाजी चल ही रही थी कि रंजनी कौफी ले कर आ गई. प्याला रखते हुए वह हंस कर बोली, ‘‘कोई स्पैशल आ रहा है तो बता दो. मैं भी स्पैशल लंच की तैयारी करवा लूं.’’
‘‘और हां अन्वी, कहो तो मम्मीपापा को भी आने के लिए बोल दूं.’’
‘‘ओह दी, आप भी,’’ कह कर अन्वी उस से लिपट गई थी.
‘‘रिषभ मेरे साथ ही सीए कर रहा है. बस, क्लास में मिलतेमिलाते हम लोगों में दोस्ती हो गई. मैं ने सोचा कि उसे आप लोगों से मिलवा दूं.’’
‘‘जरूरजरूर, भला क्यों न मिलेंगे. कल लंच पर बुला लो.’’
तभी उस का मोबाइल बज उठा तो उसे फोन ले कर अंदर जाते देख कर वह धीमे से मुसकरा कर बोली, ‘‘माई हैंडसम का ही फोन होगा.
‘‘ऐसे ही तो मैं भी तो तुम्हारा नाम देखते ही फोन ले कर अंदर भाग जाती थी.’’
निखिल भी मुसकरा कर बोला, ‘‘यह इश्क भी क्या चीज है, बिलकुल पागल बना देता है.’’
दोपहर में रिषभ आया. वह तो माई हैंडसम की फोटो पहले ही देख चुकी थी. थोड़ी देर में ही वह निखिल और रंजनी से घुलमिल कर बातें करने लगा. ऐसा लगा ही नहीं कि वह पहली बार मिल रहा है. वह बोला, ‘‘दी, मेरी मौम को अपनी सोशल लाइफ से बिलकुल फुरसत नहीं रहती.
‘‘हमारे घर में किसी को पता नहीं होता कि मौम कब घर में आएंगी और कब जाएंगी. पापा को अपने बिजनैस से फुरसत नहीं रहती. वैसे, सच बताऊं तो वे भी दोस्तीयारी में ज्यादा रहते हैं. बिजनैस तो चाचाजी और स्टाफ के भरोसे ही चल रहा है.’’
‘‘मेरी छोटी बहन रिनी अपनी दुनिया में मस्त रहती है. वैसे, वह इंजीनियर है, बेंगलुरु में जौब कर रही है और किसी के साथ लिवइन में रह रही है.’’
रंजनी और निखिल रिषभ की साफगोई देख कुछ समझ नहीं पा रहे थे जबकि अन्वी की नजरों में अपने प्यार के प्रति दीवानापन साफ झलक रहा था.
वह लंच की बहुत तारीफ कर के चला गया लेकिन वह उत्कंठाभरी नजरों से अन्वी को निहार रहा था कि वह परीक्षा में पास हो पाया या नहीं.
रिषभ के जाते ही अन्वी रंजनी के गले से लग कर बोली, ‘‘दी, रिषभ आप लोगों को कैसा लगा?’’
‘‘ठीक ही है, तुम्हें पसंद है तो फिर हम लोगों को भला क्यों नहीं पसंद होगा.’’
‘‘दीदी, मम्मीपापा को बुला लो. मैं चाहती हूं कि वे लोग रिषभ की फैमिली से एक बार मिल कर बात कर लें.’’
‘‘क्यों?’’ रंजनी बोली.
‘‘मैं रिषभ के साथ शादी करना चाहती हूं.’’
अन्वी की बात सुनते ही दोनों को जोर का झटका लगा था.
‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है. अभी फाइनल की तैयारी करने के लिए पढ़ाई करने का समय है और तुम शादी की बात कर रही हो.’’

निखिल भी चुप नहीं रह सके थे. ‘‘ऐसी भी क्या आफत आई है. अभी शादी की उम्र थोड़े ही निकली जा रही है. तुम अभी केवल 21 साल की हो. यह उम्र भला शादी की होती है. दिमाग खराब है क्या?’’
‘‘दी, आप समझती क्यों नहीं? प्लीज, पढ़ाई तो हम दोनों साथ में रह कर ज्यादा अच्छी तरह कर लेंगे. आप लोग जानते ही हैं कि मैं अपने कैरियर के लिए कितनी सीरियस हूं.’’
निखिल नाराजगीभरे स्वर में बोले, ‘‘कितनी सीरियस हो, सब दिखाई पड़ रहा है. अभी चुपचाप पढ़ाई में मन लगाओ, शादी के लिए अभी बहुत समय है.’’
‘‘लेकिन जीजू, रिषभ जल्दी शादी करना चाहता है और मैं भी,’’ उस ने शरमा कर अपनी आंखें झांका लीं, फिर तुरंत बोली, ‘‘आप समझने की कोशिश करिए. उस की अट्रैक्टिव पर्सनैलिटी, उस के मस्तीभरे अंदाज और स्मार्टनैस के कारण बहुत सारी लड़कियां उस की दीवानी हैं. यदि किसी ने मुझ से पहले उस को अपनी बातों में फंसा लिया तो मैं तो हाथ मलती रह जाऊंगी.’’
निखिल का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था. रंजनी को भी उस की बेवकूफीभरी बातों पर गुस्सा आ रहा था.
रंजनी ने कहा, ‘‘अभी अपने कमरे में जाओ, कुछ पढ़ाई करो. इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे.’’

निखिल वैसे तो बहुत शांत स्वभाव के हैं लेकिन अन्वी की बातों को सुन कर उन को भी अच्छा नहीं लगा था. उन का चेहरा भी गुस्से से लाल हो रहा था. अन्वी जोरजोर से पैर पटकती हुई अपने कमरे की ओर चली गई और नाराजगी प्रकट करने के लिए बहुत जोर से दरवाजा बंद कर लिया था.
निखिल ने शांत भाव से पत्नी की हथेलियों को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया था जैसे वह इन कठिन लमहों में पत्नी का सहारा चाह रहा हो.
रंजनी ने भी पति की भावनाओं को समझते हुए अपनी दूसरी हथेली रख कर प्यारभरी नजरों से देख कर कहा, ‘‘सब ठीक हो जाएगा.’’
अब घर का माहौल बदल चुका था. अन्वी का मूड बिगड़ा रहता. अकसर जिद करने लगती कि पापा को आप कब बुला रहे हैं वरना वह ही मम्मी से बात कर ले. पापा से कहिए कि वे रिषभ के पेरैंट्स से मिल कर हमारी शादी की बात करें. अब रिषभ जबतब घर आ जाता और उस को देख कर अन्वी की आंखें खुशी से खिल पड़तीं और वह जितनी देर रहता, अन्वी उस के आगेपीछे घूमती रहती.
निखिल एक दिन पत्नी से बोले, ‘‘रिषभ मुझे पसंद है लेकिन अन्वी को इन दिनों अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. फाइनल एग्जाम की डेट नजदीक आ रही है.’’
‘‘अन्वी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो,’’ निखिल पहली बार नाराजगीभरे स्वर में बोले थे.
वह अन्वी की हरकतों को देख कर चिंतित रहने लगे थे. एक दिन वे पत्नी से बोले, ‘‘वह तुम्हारे ज्यादा नजदीक है, तुम्हारी बातें ज्यादा मानती है, इसलिए अब तुम ही उस को सही लाइन पर ला सकती हो.’’
रंजनी भी देख रही थी कि अन्वी का पढ़ाई से बिलकुल ध्यान हट गया था और वह ज्यादातर फोन से चिपकी रहती या फिर रिषभ के साथ रहती.
एक दिन अन्वी को खुश देख कर रंजनी उस के पास बेड पर लेट गई और
बोली, ‘‘रिषभ कैसा है, काफी दिनों से आया नहीं? क्या तुम लोगों में झगड़ा हो गया है?’’
‘‘अरे नहीं दी, वह कह रहा है कि इस बार उसे फाइनल निकालना ही है.’’
‘‘अच्छा, ऐसा है. हम लोग भी बहुत खुश होते हैं जब तुम कहती हो कि मुझे तो इसी अटैम्प्ट में सीए पास करना है. मम्मीपापा तो मुझ से रोज ही पूछा करते हैं कि अन्वी की तैयारी कैसी चल रही है, वे लोग तो बहुत प्राउड फील कर रहे हैं कि अन्वी इस साल सीए जरूर पास कर लेगी.

‘‘रिषभ से तुम्हें प्यार है, डियर, यह उम्र ही प्यार करने की है और उस से शादी करने की इच्छा है तो इस में कुछ भी गलत नहीं है. आखिर मुझे भी तो निखिल से प्यार हुआ था लेकिन हम लोगों ने पहले कैरियर पर ध्यान दिया, फिर शादी की.
‘‘हम दोनों तो बहुत खुश होते हैं कि चलो, मेरी गुडि़या जैसी नटखट मनचली को कोई पसंद तो आया लेकिन अन्वी डियर, उसे अपने पैरों पर तो खड़े होने दो.
‘‘क्या वह अपने पापा से पैसे मांग कर तुम्हारे शौक पूरे करेगा? तुम्हें ब्रैंडेड ड्रैस चाहिए, शौपिंग, थिएटर, मूवी और आउटिंग के लिए पैसे क्या वह अपने पापा से मांगता फिरेगा? वह बता रहा था कि उस के पापा मस्तमौला हैं, अपनी दोस्तीयारी में रहते हैं. उस के पापा का मन होगा तो देंगे वरना मना कर देंगे. फिर?’’ रंजनी के कहने की स्टाइल पर अन्वी को हंसी आ गई थी.
‘‘हम सब मम्मीपापा को बुला कर तुम्हारे रिषभ के मौमडैड से मिलने जरूर जाएंगे लेकिन तुम्हें मेरी एक बात जरूर माननी पड़ेगी.’’
अन्वी उठ कर बैठ गई और दी का मुंह देखने लगी कि वे अब कौन सी शर्त उस पर थोपने वाली हैं, बोली, ‘‘कौन सी बात?’’
‘‘अभी अपने रिषभ से ध्यान हटा कर सीए के फाइनल एग्जाम की तैयारी करनी होगी. तुम सीए पास कर लो, फिर हम लोग खुशीखुशी धूमधाम से जिस से कहोगी, उस से तुम्हारी शादी कर देंगे.’’
अन्वी काफी देर तक पसोपेश में सोचती रही. फिर उस ने रिषभ को फोन लगा कर बात की. लगभग एक घंटे के बाद उस ने अपनी रजामंदी दी. अब जा कर रंजनी ने चैन की सांस ली थी.
निखिल को भी सारी बातें सुन कर राहत मिली.
अब वह देख रही थी कि अन्वी ने सचमुच अपने को पढ़ाई में झांक दिया था. अब वह कहती कि मुझे बारबार एक ही चीज की पढ़ाई थोड़े ही करनी है. वह मोबाइल को अपने से दूर रखती थी. एक दिन रंजनी ने सुना था कि वह फोन पर कह रही थी कि रिषभ अब एग्जाम के बाद ही मिलेंगे. मिलनेजुलने के चक्कर में समय खराब होता है और पढ़ाई में डिस्टरबैंस हो जाता है. प्लीज रिषभ, यदि शादी करनी है तो सीए पास करना जरूरी है. अब सब तरफ से ध्यान हटा कर पढ़ाई पर ही ध्यान लगाओ.
‘‘दी, रिषभ कह रहा था कि यदि फेल हो जाएंगे तो एग्जाम फिर से दे देंगे. मुझे तो उस पर बहुत जोर से गुस्सा आया.’’
रिषभ आता तो अन्वी उस से केवल बुक्स, नोट्स या फिर पढ़ाई की बात करती.

वह नोटिस कर रही थी कि रिषभ शायद पढ़ाई के लिए सीरियस नहीं था क्योंकि जबतब अन्वी से आइसक्रीम खाने या बाहर चलने के लिए फोन करता लेकिन अन्वी बहुत कम ही जाया करती और अपनी पढ़ाई में जुटी रहती.
जब सीए का रिजल्ट आया और अन्वी का रोल नंबर देखते ही घर में खुशी छा गई थी. गांव से मम्मीपापा भी आ गए थे.
रिषभ बुरी तरह फेल हो गया था.
अन्वी बोली, ‘‘देख लो दी, रिषभ फेल हो गया लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. दी, वह कह रहा है कि एक बार फिर से एग्जाम दूंगा. यदि फिर भी पास नहीं हुआ तो कोई बिजनैस कर लेगा.’’
अम्मा बोलीं, ‘‘बिटिया, तुम ने हम लोगों की बात मानी है तो अब हमारी बारी है कि हम लोग भी तुम्हारी बात को मानें. तुम्हीं बताओ कि हम
लोग रिषभ के घर रिश्ता पक्का करने के लिए कब जाएं?’’
‘‘अभी रुक जाइए, पापा. मेरी जौब लग गई है. उम्मीद है कि जहां बिग फोर में मैं ने ट्रेनिंग की थी वहीं मेरी प्रौपर जौब लग जाएगी. मम्मी, मुझे कुछ दिन अपनी सैलरी का मजा तो लेने दीजिए.’’
जौब लगते ही उस के चेहरे की चमक और खुशी देखते ही बनती थी. अब वह अपने औफिस में बहुत बिजी रहने लगी थी.
रिषभ इतवार को जब आता, दोनों साथसाथ कभी मूवी देखने तो कभी आइसक्रीम खाने जाते लेकिन मोबाइल पर माई हैंडसम की जगह अब रिषभ ने ले ली थी.

रंजनी ने गौर किया था कि अब वह खास बौयफ्रैंड नहीं, बस, दोस्त लगता था. अब अन्वी अपनी शादी की बात कभी नहीं करती बल्कि कहती, ‘रिषभ तो दी अपने कैरियर के लिए बिलकुल भी सीरियस नहीं है. ऐसा लगता है जैसे वह पढ़ाई करना ही नहीं चाहता और वह तो केवल अपने डैड का पैसा उड़ा रहा है. उस की मां के बारे में तो किसी को कुछ पता ही नहीं रहता और उस की बहन मुंबई में किसी के साथ लिवइन में रह रही है. रिषभ तो मुझ से भी लिवइन में रहने की जिद कर रहा था. इस के घर जाती हूं तो बिलकुल सबकुछ बेतरतीब, अस्तव्यस्त दिखाई पड़ता है. मेरा तो उस के घर में दम घुटता है, तुरंत भाग कर बाहर आ जाती हूं.’
रिषभ ने 6 महीने बाद फिर से एग्जाम दिया. फिर फेल हो गया. फेल होने के बाद वह लापरवाही से बोला, ‘‘अब मेरा बूता नहीं है कि मैं इस से ज्यादा पढ़ाई कर सकूं. एग्जाम एक बार और दे दूंगा. फिर क्या करना है, यह रिजल्ट आने के बाद सोचूंगा.’’
एक दिन रंजनी ने पूछा, ‘‘अब रिषभ शादी करने के लिए जिद नहीं करता?’’
‘‘हां, वह मुझ से बारबार कहता रहता है कि शादी कर लेते हैं, फिर पढ़ाई करता रहूंगा.’’
निखिल ने पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘अभी ठहरिए, देखती हूं कि वह अपने कैरियर के लिए कितना सीरियस है, फिर सोचूंगी.’’
उस रात रंजनी निखिल से बोली, ‘‘मेरी अन्वी बहुत समझदार है. प्यार भी किया है तो दीवानापन नहीं है. अपना भलाबुरा समझ रही है.’’ रंजनी अपनी छोटी बहन का सयानापन और उस की परिपक्वता देख रही थी. वह सोच रही थी कि नई पीढ़ी का इश्क अंधा नहीं है बल्कि अब इश्क समझदार हो गया है. प्यार अब प्रैक्टिकल ग्राउंड पर सोचविचार कर ही किया जा रहा है.
अपने भविष्य के प्रति जागरूक और अलर्ट हो कर ही प्यार और इश्क के चक्कर में पड़ना सही भी है.
अन्वी मन ही मन सोच रही थी कि वह रिषभ के इसी बेफिक्रे अंदाज से ही तो इश्क कर बैठी थी लेकिन ऐसे लापरवाह इंसान के साथ दोस्ती तो निभाई जा सकती है मगर उसे अपना जीवनसाथी बनाना अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है.
‘‘दी, मैं ने ‘माई हैंडसम’ के नंबर को ब्लौक कर दिया’’ यह कह कर वह बच्चों की तरह खुश हो कर बहन के गले में लग गई थी.
रंजनी सोच में पड़ गई थी कि आज के युवा कुछ ज्यादा ही प्रैक्टिकल हो गए हैं. खैर, निर्णय इन लोगों को खुद लेने दो अपने जीवन का, यही शायद ठीक है सब के लिए.

Romantic Story in Hindi

Family Story in Hindi : ऊपर की मंजिल – क्या जिम्मेदारी से मुक्त हो पाई सिमरन ?

Family Story in Hindi : अच्छी बेटी की जिम्मेदारी निभाते हुए सिमरन जैसे थक सी गई थी. मां की मृत्यु पर दोनों भाइयों का आना जैसे उसे तसल्ली दे रहा था. लेकिन क्या यह सुख क्षणभर का था?

जाड़े का मौसम. ठंडी बयार. शाम के 4 बज रहे थे. सिमरन तेज कदमों से चलते हुए घर पहुंची. ‘‘रिचा, रिचा कहां हो?’’ आवाज लगाते हुए वह घर के अंदर दाखिल हुई. उस ने देखा, रिचा मां के सिरहाने बैठी है.
‘‘क्या बात है, मां? तबीयत ठीक नहीं लग रही क्या?’’ उस ने मां की ओर मुखातिब होते हुए पूछा.
‘‘नहींनहीं, ठीक है. बस, थोड़ी सी कमजोरी लग रही है.’’
‘‘क्या बात है, दीदी, आज औफिस से जल्दी कैसे? कोई काम?’’ रिचा ने प्रश्न किया.
‘‘हांहां, काम ही तो है. अरे, मुझे अभी भोपाल के लिए निकलना है. कल 10 बजे वहां मेरी औफिस की मीटिंग है.’’
‘‘ओह, अच्छा,’’ करते हुए रिचा चाय बनाने चली गई.
सिमरन बैग जमाने लगी. तभी मां ने पलंग से उठने की कोशिश की. सिमरन ने उन्हें सहारा दे कर फिर लिटा दिया, यह कह कर कि ‘‘दवाई टाइम पर लेना. रिचा आप के पास है, मैं कल रात तक लौट आऊंगी.’’
रिचा चायनाश्ता टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘दीदी, आप निश्चिंचत हो कर जाइए. मैं कल कोचिंग से छुट्टी ले लूंगी.’’ रिचा के आश्वस्तभरे शब्दों ने सिमरन की चिंता को कुछ कम कर दिया.
रिचा सिमरन की ममेरी बहन थी. गांव से बैंक की कोचिंग के लिए यहां इंदौर आई थी. पिछले एक साल से बूआ के घर ही रह रही थी. बहुत ही नेकदिल और समझदार है.
मां को प्रणाम कर सिमरन ने जैसे ही जाने के लिए बैग उठाया, याद आया शर्मा अंकल को बताना ही रह गया. बाबूजी के गुजरने के बाद से पड़ोस के शर्मा अंकल सिमरन के परिवार के दुखसुख के पक्के साझेदार हो गए थे. गेट खोल कर अंदर जाने को हुई, अंकलआंटी बरामदे में ही बैठे मिल गए. वह बोली, ‘‘अंकल, मैं एक दिन के लिए भोपाल जा रही हूं. मां और रिचा घर पर अकेले हैं. मां की तबीयत थोड़ी ढीली है. प्लीज, आप ध्यान रखिएगा. आप को परेशान कर रही हूं.’’
‘‘अरे बेटा, इस में परेशानी वाली क्या बात है. यह तो हमारी भी जिम्मेदारी है. तुम नाहक परेशान हो रही हो. जाओ, अपना काम कर के लौट आओ.’’
अंकल के भरोसे ने सिमरन के चेहरे से चिंता की परत हटा दी.

सिमरन बसस्टौप पर आ गई. रात 10 बजे भोपाल पहुंच गई. होटल में उस के ठहरने की व्यवस्था थी. रिचा को उस ने पहुंचते ही कौल कर दिया और सो गई.
भोपाल की सर्द सुबह. शरीर में कंपकंपी छूट रही थी. तैयार हो कर उस ने स्वैटर के साथ कंधे पर शौल भी डाली.
करीब 2 बजे रिचा की कौल आई, ‘‘दीदी, बूआ की तबीयत बिगड़ गई है. शर्मा अंकल और आंटी की मदद से उन्हें अस्पताल ले कर आए हैं. बूआ अभी आईसीयू में हैं.
‘‘घबराना नहीं, बेटा. इत्मीनान से आओ. हम हैं यहां पर,’’ पीछे से शर्मा अंकल की आवाज आई.
सिमरन स्तब्ध थी.
औफिस के सहकर्मियों ने इंदौर के लिए टैक्सी की व्यवस्था करवाई.
टैक्सी में बैठने के बाद उसे लगा एक सप्ताह से ठंड कुछ ज्यादा ही पड़ रही है, हो सकता है मां इसी वजह से बीमार पड़ गई हो. 2 दिन पहले ही तो उस ने मां से कहा था, ‘इस छुट्टी में मार्केट जा कर आप के लिए बढि़या सा वूलन स्वेटर ले आऊंगी. आप के पुराने स्वेटर सब बेकार हो गए हैं.’
‘नहीं सिम्मी, नए स्वेटर की क्या जरूरत. मुझे कौन किसी के घर जाना है. दिनभर बिस्तर में ओढ़े ही रहती हूं,’ कहते हुए मां का स्वर कातर हो
आया था.
उस ने मां की बेचैनी को ताड़ लिया और मां के गले में बांहें डालते हुए बोली, ‘किस सोच में पड़ गईं मां? आप की बेटी के होते आप को कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है.’ और दोनों के होंठों पर मुसकान आ गई.
कल ही तो उस ने अपने औफिस की दोस्त से एक डाक्टर का एड्रैस लिया था. सोचा था, भोपाल से आ कर मां को दिखा देगी.

जरूरत से ज्यादा लंबा लगता हुआ यह सफर बड़ी मुश्किल से खत्म हुआ और सिमरन हौस्पिटल पहुंची. शर्मा अंकल और आंटी सामने चेयर पर बैठे मिल गए. उस ने डबडबाई आंखों से अंकल को देखा. वे हाथ पकड़ कर उसे आईसीयू तक ले गए. बमुश्किल 5 मिनट रुकने दिया गया उसे. वह निढाल सी अंकल के पास बैठ गई. उन्होंने बताया, मां के फेफड़ों में इन्फैक्शन है. सांस लेने में दिक्कत हो रही है.
उदासी की परत उस के चेहरे पर जम गई. कुछ देर में रिचा भी वहां आ कर बैठ गई. दोनों बहनें निशब्द थीं.
रात 11 बजे मां को हार्टअटैक पड़ा और वह चल बसीं. सुखद भविष्य के जो अरमान सिमरन ने अपने हृदय में संजोए थे, एक झटके में उजड़ गए. वह सिर्फ और सिर्फ शून्य में टकटकी लगाए देख रही थी, मानो पूछ रही हो, ‘घर की जो सांस थम गई है, उसे जीवंत कौन करेगा.’ पहले एकएक कर के दोनों भाई बाहर चले गए, फिर बाबूजी दुनिया से चले गए, और अब मां.
शर्मा अंकल ने सचिन और सौरभ दोनों को मां की मृत्यु की सूचना दे दी. दोनों ने जल्दी पहुंचने की बात कही.

दूसरे दिन मां की अंत्येष्टि भी हो गई. कुछ करीबी रिश्तेदार और परिचितसम्मिलित हुए लेकिन इन सब के होने का एहसास उस के लिए नगण्य था. आज से ज्यादा अकेला उस ने अपने को कभी नहीं पाया. उस के चारों तरफ तो सन्नाटा खिंच आया था. शर्मा आंटी आईं और कस के उसे अपने अंक में भर लिया, ‘‘मैं हूं न बेटा, तेरी मां.’’ और वे स्वयं भी दुख से अभिभूत हो उठीं.
सिमरन की आंखों से अश्रुओं का रेला बह निकला. बहुत देर रोती रही, फिर खुद ही संभाला अपनेआप को. मां के कमरे में जा कर बैठी और देखा, उन का पलंग, उन के कपड़े, उन की दवाएं, कुछ धार्मिक पुस्तकें आदि सब चीजें ऐसे रखी हुईं थीं मानो मां अभी आ जाएंगी. कितनी याद आएंगी मां.
दुखी मन से भाइयों को मोबाइल लगाया. बहुत देर ट्राई किया पर नैटवर्क नहीं मिला. मोबाइल का नैटवर्क न सही, मस्तिष्क का नैटवर्क जरूर जुड़ गया. विगत स्मृतियों के तार सिलसिलेवार जुड़ते चले गए.

दोनों भाई उस से बहुत प्यार करते थे. उस का रूठना, उस का मचलना, उस की खिलखिलाहट पर दोनों भाई निहाल हो जाते थे. सचिन भैया उसे गोद में उठा कर स्कूल छोड़ने जाते. कपड़ेजूते हर फरमाइश सचिन भैया बाबूजी से मनुहार कर के पूरी करवाते. हर रोज पार्क में घुमाने भी ले जाते.
एक बार की घटना है. पार्क में कुछ बच्चों ने उसे झूले पर से गिरा दिया था, नाक में से खून आने लगा था. दोनों भाइयों ने उन बच्चों के साथ बहुत लड़ाई की, बहुत धमकाया. यहां तक कि लड़ाई की खबर घर तक आ पहुंची थी. मां ने दोनों भाइयों को डांट लगाई थी, अब लड़ने से क्या फायदा?
भाई बोले, ‘हमें कुछ हो जाता कोई बात नहीं, बहन के लिए बरदाश्त नहीं करेंगे.’

अपने बेटों की बात सुन मां का गुस्सा हंसी में तबदील हो गया और उन्हें मारने के लिए उठाया हाथ उन के गालों को खींचे बिना रह नहीं पाया.
समय आगे बढ़ता रहा. पढ़ाईलिखाई और फिर नौकरी की व्यस्तता के चलते भाई आगे बढ़ गए और उन की छुटकी सिम्मी पीछे छूट गई.
बड़े भैया की एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब लग गई. बाद में शादी कर के वे अमेरिका चले गए.
सौरभ भैया ने ग्रेजुएशन के बाद हायर कोर्स करना चाहा पर बाबूजी फीस के पैसे जुटा नहीं पा रहे थे. सौरभ भैया की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने कहीं से थोड़ा सा कर्जा ले कर फीस जमा करवाई. बाद में उन की भी नौकरी लग गई, फिर शादी हो गई.
शादी के बाद बड़े भैया को देख वे भी बाहर जाने के सपने बुनने लगे. मां बिलकुल भी राजी न थीं कि सौरभ भैया भी सचिन भैया की तरह बाहर जा कर अपना घर बसाएं, किंतु अच्छी अपौर्चुनिटी मिलते ही उन्होंने मां को झूठी तसल्ली देते हुए मना लिया. यह भी आश्वासन दिया कि एक निश्चित रकम वे हर माह भेजेंगे. यह सिलसिला 3-4 साल तक तो चला, फिर धीरेधीरे पैसे कम होते चले गए और फासला बढ़ता गया. शायद उन के मन में यह विचार आया कि अब तो सिम्मी की भी नौकरी लग गई है.
मां से एक बार फोन पर बोले थे, ‘यहां बस खानेपीने जितने पैसे रह जाते है और अब हमें अपने भविष्य के लिए भी कुछ सोचना है.’
बड़े भैया भी बाबूजी की मौत पर आए थे तो रूठेरूठे ही रहे, कहने लगे, ‘बाबूजी ने घर तो सिमरन के नाम कर ही दिया है. हमारे लिए किया ही क्या है? सरकारी स्कूल में पढ़ाया, 2 कमरे के घर में पढ़ने तक की जगह न थी. आज मैं जहां भी हूं, अपनी मेहनत के बलबूते पर हूं.’
घर की स्थिति को देखते हुए उन की बात बुद्धिमतापूर्ण न थी. बच्चों को पढ़ाना और अपने लिए छत बनाना छोटी नौकरी वाले इंसान के लिए सहज नहीं था.
दोनों भाई नौकरी के चलते घर से दूर हो गए तो मातापिता की जिम्मेदारी को देखते हुए सिमरन ने शादी करने से इनकार कर दिया. मांबाबूजी के समझने पर भी वह न मानी. बाबूजी ने सोचसमझ कर घर सिमरन के नाम कर दिया.
‘‘दीदी, चाय,’’ रिचा का भावभीना स्वर था.

वह स्मृतियों की सघन धुंध से बाहर आई. आंखें डबडबा आईं. रिचा जबरदस्ती चाय का कप हाथ में थमाते हुए बोली, ‘‘पहले चाय पी लो दीदी, फिर लेट जाना. सिर्फ दो घूंट चाय पी कर वह वहीं पलंग पर लेट गई.
मन के आकाश में छाई यादों की बदलियां उसे कहां सोने दे रही थीं.
दूसरे ही दिन दोनों भाई अपने परिवार के साथ पहुंच गए.
‘‘मां इतनी जल्दी चली जाएंगी, यकीन ही नहीं होता, सिम्मी,’’ सचिन भैया भावविभोर हो कर बोले.
‘‘8 दिन पहले तो मां से बात हुई थी, उन्होंने अपनी तबीयत के बारे में कुछ नहीं बताया,’’ कहते हुए सौरभ भैया की रुलाई फूट पड़ी.
सिमरन सवालिया आंखों से दोनों भाइयों को देख रही थी. ‘‘बाबूजी
की मौत के गए, अब मां की मौत पर आए हैं. कितने संपर्क में थे वे अपनी मां के?’’ मानो, उन से पूछ रही हो. दोनों भाइयों ने सिम्मी को गले से
लगा लिया.
वह निस्पंद खड़ी रही, फिर रुंधे गले से बोली, ‘‘मां को कई रात मैं ने करवटें बदलते देखा है, छत को निहारते हुए आप दोनों की पुरानी बातें, किस्से, यादें बुदबुदाती रहती थीं.’’
दोनों भाभियों ने सिम्मी को सांत्वना दी.
मां और बाबूजी अपने दोनों बेटों के आगे हार गए थे. यह सोच कर सिमरन अपने को सहज नहीं कर पा रही थी.
रिचा ने कंधे पर स्पर्श किया, ‘‘दीदी,’’ सिमरन ने खाली आंखों से उसे देखा. रिचा समझ गई, दीदी अभी सदमे से उबर नहीं पाई है, दुख उस की आंखों में तैर रहा है.
हालांकि आने के बाद दोनों भाई आगे के काम में जुट गए. तेरहवीं की व्यवस्था की सारी कमान दोनों भाइयों ने अपने हाथों में ले ली. सिम्मी दोनों भाइयों से नाराज थी और अपनी नाराजगी छिपाने का भी उस का कोई इरादा न था पर फिर भी उन दोनों के आने से क्यों वह पहले से हलका महसूस कर रही थी? यह सवाल बारबार उस को चुभ रहा था. शायद हर वक्त एक अच्छी बेटी होने की जिम्मेदारी का वहन करतेकरते जो थकान हो गई थी, वह भाइयों के आ जाने से जैसे बंट सी गई.

दोनों भाभियां भी घर के काम में जुट गईं. मेहमानों के ठहरने, खाने की सारी व्यवस्था कर ली गई. सब को शोकपत्रिका भेज दी गई.
तेरहवीं में 3 दिन शेष बचे थे. वह कपड़े उठाने कमरे में गई तो देखा, दोनों भाई और बड़ी भाभी आपस में कुछ बात कर रहे थे. बड़े भैया देखते ही बोले, ‘‘सिम्मी, कोई नाम छूट रहा हो तो बता देना, उन्हें भी शोकपत्रिका भेज देंगे या फोन कर देंगे.’’
‘‘हां,’’ उस ने संक्षिप्त उत्तर दिया. नाराजगी के बादल अभी उस के मन से हटे नहीं थे. वह बाहर जाने को मुड़ी, ‘‘तनिक रुको, सिम्मी,’’ भाभी ने हाथ पकड़ा, ‘‘चिंता न करो, सिम्मी, सब काम अच्छे से करेंगे.’’
वह चुप रही.

तेरहवीं का कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से निबट गया. सब नातेरिश्तेदार चले गए. सब के रहते भी घर में एक सन्नाटा खिंच गया था.
दिन आगे सरकने लगे. रिचा भी कोचिंग जाने लगी.
मां को गए सवा महीना बीत गया. बड़े भैया ने पंडितजी को बुला कर मंत्रोच्चार का एक छोटा सा कार्यक्रम शर्मा अंकल और दोचार घनिष्ठ लोगों की उपस्थिति में करवाया.
8 दिन बाद सिमरन ने औफिस जौइन कर लिया. औफिस में सिमरन लंच के दौरान अपनी दोस्त के साथ बैठी अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालने की कोशिश करती रही, ‘कुछ दिनों बाद भैयाभाभी भी चले जाएंगे.’ ‘बहुत अकेलापन सा फील कर रही हूं.’ ‘सचिन भैया, सौरभ भैया बस अब जाने की तैयारी में होंगे, इतना लंबा रुक गए, यह काफी शौकिंग है’, ‘घर तो काटने को दौड़ता है पर घर से बाहर निकलने की भी हिम्मत नहीं होती.’ ‘विल आई एवर फील बैटर?’
घर लौटते हुए उस ने भैया के बच्चों के लिए टौफी, फ्रूट्स, ड्रौइंगबुक, कुछ गेम्स खरीदे.
घर से कुछ ही दूर थी कि उस ने देखा, घर के बाहर ईंट और रेत से भरी 2 गाडि़यां खड़ी हैं. उस ने जल्दीजल्दी कदम बढ़ाए, ‘‘भैया, भैया, यह बाहर जो सामान आया है, वह किस ने मंगवाया है?’’
‘‘हम ने’’, दोनों भाई एक स्वर में बोले.
‘‘क्यों?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘ऊपर की मंजिल बनवा रहे हैं. अब हम इंडिया में ही रहेंगे. जौब भी यहीं करेंगे. हम सब एकसाथ रहेंगे. हमें अपनी बहन की धूमधाम से शादी भी तो करनी है.’’
दोनों भाई निर्निमेष सिम्मी को देख रहे थे और सिमी विस्फारित नेत्रों से दोनों भाइयों को.
‘‘चल पगली, इस सरप्राइज पर गरमागरम चाय पिला.’’
सब के होंठों पर मुसकराहट तैर गई. Family Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : पहला स्पर्श – किशोरावस्था में दो दिलों की नादानी

Romantic Story in Hindi : किशोरावस्था में मोनिका और समय के नादान दिलों ने पहले स्पर्श का जो एहसास किया था वह आज युवावस्था में भी उन को भीतर तक तरंगित कर जाता था. क्या दोनों दोबारा उस एहसास को जी पाए?

‘‘आंटी, आंटी, समय भैया और मोनिका दीदी इतने बड़े हो गए, फिर भी कपड़े उतार कर गैराज वाले कमरे में चारपाई पर लेटे हैं. मेरी मम्मी तो कहती है कि मैं बड़ी हो गई हूं, मुझे किसी के सामने ऐसे कपड़े नहीं उतारने चाहिए. आप उन्हें डांटो चल कर.’’
ऋतु हतप्रभ थी पड़ोस की बच्ची, जो अभी 5 साल की थी, की बात सुन कर. उस का मन आशंकाओं में डूबनेउतरने लगा. अप्रत्याशित बात सुन कर कांप गई वह.
ऋतु और पूजा नंदभाभी थीं. ऋतु की भाभी पूजा की घनिष्ठ मित्र शीला का बेटा समय था. ऋतु की बेटी मोनिका थी. हरिद्वार में पूजा रहती थी और ऋतु का घर रुड़की में था. पूजा और मोनिका भले ही नंदभाभी थीं लेकिन दोनों में दोस्ताना व्यवहार ही था. ऋतु के घर तीज का फंक्शन था, उस की भाभी पूजा और उन की मित्र शीला नाचगाने में निपुण थीं तो ऋतु ने स्पैशली आने के लिए कहा था.
समय और मोनिका एक ही क्लास में पढ़ते थे. मोनिका की मामी की दोस्त का बेटा समय अकसर आता रहता था. तीज का त्योहार हो या कोई अन्य फंक्शन, समय की मम्मी को भी स्पैशल इन्विटेशन जाता था क्योंकि नाचनेगाने और ढोलक बजाने के कारण महिला मंडली की प्रिय थीं वे. उन का मधुर स्वर इतना कर्णप्रिय था कि कोई भी सुनता तो मंत्रमुग्घ हुए बिना न रहता. इत्तफाक से समय और मोनिका एक ही स्कूल में साथ पढ़ते भी थे. समय जब भी आता तो दोनों में खूब गप्पें होतीं, पढ़ाई के साथ अन्य विषयों पर भी खूब चर्चा होती. आज भी मम्मी के साथ समय आया था क्योंकि मोनिका की मम्मी ऋतु ने अपनी भाभी पूजा से कहा था, ‘भाभी, आप को आना है, साथ में शीला भाभी को भी लाना है. मेरी सारी सहेलियां आप की और शीला भाभी की फैन हैं.’
‘‘लेकिन ऋतु, इस समय तो स्कूल में पेपर चल रहे हैं, मेरा आना मुश्किल है.’’
‘‘अच्छा, मैं इतवार को रख लेती हूं, अब तो ठीक है न भाभी.’’
पीछे से मोनिका चिल्ला कर बोली, ‘‘आंटी, समय को भी साथ लाइएगा.’’
इस बात पर ऋतु ने हंसते हुए कहा तो पूजा ने यह सोच कर हां कर दी कि उसी दिन जा कर वापस आ जाएगी. उस ने अपनी प्रिय मित्र शीला को भी साथ ले लिया. शीला ने बेटे समय को भी साथ ले लिया. लौटने में रात हो जाएगी तो समय साथ होगा तो अच्छा रहेगा. समय को भी ऋतु के यहां अच्छा लगता था. हमउम्र मोनिका उस की मित्र थी. दोनों बचपन से लड़तेझगड़ते किशोरवय की उम्र पर आ पहुंचे थे. 15 साल की मोनिका और समय 16 साल का था. दोनों बच्चों को इस तीज के फंक्शन में कोई भी इंट्रैस्ट नहीं था.
‘‘चलो न समय, बाहर वाले कमरे में चलते हैं, यहां तो इन लोगों के गानेबजाने में हम बात ही नहीं कर पाएंगे.’’
मोनिका ने समय का हाथ पकड़ा और लौबी से बाहर कमरे में चल दिए. समय को भी इस तीज पार्टी में कुछ खास नहीं लग रहा था. वह तो केवल यह सोच कर मम्मी के साथ आ गया था कि कुछ समय मोनिका के साथ गप्पें लड़ाएगा. वैसे भी, इस टीन ऐज में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण कुछ अधिक ही होता है.
‘‘और बता समय, तेरी क्लास में क्या चल रहा है? सुना है वंश अपने मम्मीपापा के साथ मुंबई शिफ्ट हो रहा है?’’
क्योंकि तीज पार्टी में बहुत सारी महिलाएं थीं, ढोलक के साथ नाचने व आपस में हंसीमजाक से बहुत शोर हो रहा था, सो, समय ने मोनिका से कहा, ‘‘अरे मोनिका, तेरे घर में कोई ऐसी जगह नहीं है जहां आंटियों की तेज आवाजें न सुनाई दें क्योंकि मुझे तेरी बात भी समझ नहीं आ रही.’’
‘‘हां, हां, चल, एक बाहर गैराज वाला कमरा है जिस का रास्ता भी बाहर की तरफ से है. वहीं चलते हैं.’’
गैराज वाले कमरे में पंहुच कर समय बोला, ‘‘यार मोनिका, यहां तो सिर्फ यह चारपाई है पुराने जमाने की, बैठेंगे कैसे?’’
मोनिका ने समय का हाथ खींचा और उसी चारपाई पर धकेल दिया पर खुद को संभाल नहीं पाई और समय के ऊपर जा गिरी.

अचानक से समय को मोनिका का अपने ऊपर आने से उस के स्पर्श से उसे नवीन अनुभूति हुई. मोनिका उठने लगी तो समय ने उसे कस कर पकड़ लिया. अचानक से हुए इस स्पर्श ने किशोर होते दोनों बच्चों के मन झिंझड़ दिए. कच्चे मन के एहसास तनमन में अजीब सी हलचल मचाने लगे. दोनों को ही सहीगलत कुछ समझ नहीं आ रहा था. वे दोनों भावावेश में बह कर बहे जा रहे थे कि तभी वहां पास के घर में रहने वाली डौली आ गई. समय और मोनिका कुछ समझ पाते कि तभी मोनिका की मम्मी और बूआ वहां आ गईं.
अपने बच्चों को इस अवस्था में देख कर ऋतु और पूजा ने एकदूसरे को हताशा से देखा. उन की आंखों में हताशा के साथ क्रोध भी था. प्यारे रिश्ते में यह जहर जैसा था. ऋतु ने बेटी के गाल पर कस कर तमाचा मारा. चांटे के झटके से मोनिका गिर पड़ी. पूजा ने गुस्से में समय के चांटा मारा. खून का घूंट पी कर दोनों ही वहां चारपाई पर सिर पकड़ कर बैठ गईं. बच्चे अपराधबोध से ग्रसित सिर झुकाए
खड़े थे.
नंदभाभी का दिमाग असंतुलित हो रहा था. ऋतु का पूरा शरीर कांप रहा था. समाज में बेटी की ही बदनामी ज्यादा होती है जबकि कुसूर दोनों का होता है. इस समय तो इन नादान बच्चों की स्थिति और भी विकट थी. पूजा ने समय को तुरंत वापस जाने को बोला. फिर ऋतु को कंधे से पकड़ कर उस को समझाने लगी क्योंकि ऋतु क्रोध के आवेग में फफक कर रो रही थी.
‘‘सुन ऋतु, इस समय घर में सारे मेहमान हैं, थोड़ा समझदारी से काम लो. बच्चों को अभी सहीगलत का पता नहीं है लेकिन हमें समझदारी से काम लेना होगा वरना बात बिगड़ जाएगी. दोनों की बदनामी होगी. अभी शांत हो कर अंदर चलते हैं, घर में मेहमान हैं. पूजा ऋतु को समझ कर फंक्शन हौल में ले आई और मोनिका को वहीं बैठने को कहा.
हौल में सब ने ऋतु को उस का हाल देख कर पूछा तो पूजा ने कहा, ‘‘इस की बेटी की अचानक तबीयत खराब हो गई थी. यह जल्दी घबरा जाती है, इसलिए परेशान है. लेकिन वह अब ठीक है, सो रही है.’’
बेमन से ऋतु ने प्रोग्राम खत्म किया. सब सोचने लगे, बेटी की तबीयत से परेशान है इसलिए पार्टी का जल्दी ही समापन कर दिया गया.

शाम को जब ऋतु के पति आए और सारी बात पता चली तो गुस्से से बेटी पर चिल्लाने लगे, पुलिस बुलाने के लिए जैसे ही डायल करने लगे, बढ़ कर पूजा ने रोक कर फोन बंद कर दिया.
ऋतु के पति अभी भी चिल्ला रहे थे, ‘‘समय को तो जेल में बंद करवाऊंगा,’’ यह कह कर गुस्से के आवेग में वे पसीनेपसीने हो रहे थे. बेटी के पिता की विवशता ने मन को व्यथित कर दिया था लेकिन पूजा ने कहा, ‘‘भाईसाहब, सोचिए, दोनों बच्चे नाबालिग हैं, इन से नासमझ में गलती हुई है. अगर पुलिस आई तो
लड़के को ले जाएगी, समाज में बदनामी होगी तब सुधरने का कोई तरीका नहीं रहेगा.
‘‘समय के व्यक्तित्व का विकास अपराधी के रूप में होगा क्योंकि हर कोई इसे हेयदृष्टि से देखेगा. बेटी भी हर बार गलत सवालों का सामना करेगी. उसे भी समाज की घूरती निगाहों का सामना करना पड़ेगा. किशोरदिल अपमान से कुंठित हो जाएगा,’’ थोड़ी देर चुप रह कर पूजा ने आगे कहा, ‘‘भाईसाहब, बच्चों से गलती हुई है, इन्हें समझ कर गलती सुधारने का मौका देना चाहिए.’’
पूजा उन्हें समझ कर वापस लौटते वक्त सोच रही थी, विवेक से काम लें भाईसाहब तो बच्चों का जीवन सही दिशा में बढ़ जाए. पूजा समझ रही थी किशोरावस्था में कभीकभी कुछ गलतियां हो जाती हैं, यही वह समय होता है जब तनमन आकाश में उड़ता है तो कभी आशंकित मन मायूस हो जाता है, कभी बीता बचपन पुकारता है तो कभी यौवन की बहती शीतल हवाएं बहका देती हैं. मन के साथसाथ बढ़ते शरीर की उलझनें भी असमंजस में डाल देती हैं.
मोनिका के पापा ने पुलिस नहीं बुलाई थी. वक्त आगे बढ़ चला था.

मोनिका ने पीएचडी कर एक यूनिवर्सिटी में लैक्चरशिप ले ली थी. आज मौसम भीगाभीगा सा था. ब्रेक के समय चाय की प्याली लिए आसमान के छिटकते बादलों की नन्ही बूंदें जो धरती को हंस कर छेड़ रही थीं, हवा खिड़की पर खड़ी मोनिका के माथे पर आई लट को छू कर लौट जाती थी.
आज मोनिका का मन बीते दिन के गलियारों में भटकने लगा था, समय की याद जाने क्यों बरबस उस के मन को भिगो चली थी. पच्चीस बसंत रीते ही बीते थे, कोई और मन को भाया ही नहीं था. ऐसा नहीं था कि कोई पास आया नहीं लेकिन कोई मन को छू न सका. कच्चे मन में जो प्रेम का पौधा खिल उठा था उस की खुशबू तनमन को जबतब रजनीगंधा सा महका देती थी.
मोनिका के हाथ में चाय का कप था और मन दस साल पहले के स्पर्श से आज भी सिहर जाता था. उस घटना के बाद से समय के घरवालों से संपर्क टूट गया था. आज मोनिका का मन जाने क्यों टूट कर रोना चाहता था, कहां हो समय, कभी तुम से मिलना होगा भी या नहीं, विचारों की लहरियां बिछुड़न और मिलन को साथ ले कर उसे आज मथ रही थीं, मन उद्विग्न था, सांस तेज चल रही थी. मोनिका छुट्टी की एप्लिकेशन दे कर अपने घर आ गई. मोनिका ने पढ़ाई के बाद पूना में जौब जौइन की थी. दोपहर के एक बजे थे, मोनिक ने अपनी बचपन की सहेली को फोन किया, वह भी पूना में ही थी.
‘‘अर्शा, क्या कर रही है?’’
‘‘अरे मोनिका, तू ने इस समय फोन किया, सब ठीक तो है?’’
‘‘बस यों ही, मन नहीं लग रहा था, तू क्या औफिस से छुट्टी ले सकती है?’’
‘‘हां, आज तो फ्री ही हूं. अच्छा, तू औफिस आ जा, यहीं से ही कहीं चलते हैं.’’
मोनिका अर्शा के औफिस पहुंच गई. अर्शा औफिस में अपने किसी कलीग से काम के लिए डिसकस कर रही थी. वह जिस से बात कर रही थी मोनिका की ओर उस की पीठ थी. मोनिका को आते देख अर्शा ने उसे बाकी काम कल समझाने को कहा और मोनिका की ओर चली आई. दोनों जा ही रही थीं कि वह कलीग पीछे से आ कर बोला, ‘‘अर्शा मेम, रुकिए, एक बात पूछनी थी.’’
अर्शा के साथसाथ मोनिका ने भी पलट कर देखा, देखते ही मोनिका के पैर जैसे जमीन से चिपक गए, सांस जैसे सीने में अटक गई हो, पूरा शरीर जैसे थरथरा गया हो.
अर्शा ने बिना ध्यान दिए उस से परिचय करवाने के लिए कहा, ‘‘मोनिका, यह समय है, कल ही औफिस जौइन किया है. और समय, ये मेरी दोस्त मोनिका है.’’
अर्शा ने कहते हुए समय की ओर देखा तो उसे आश्चर्य हुआ जो एकटक मोनिका को ही देख रहा था. अब अर्शा ने मोनिका को देखा, वह भी समय को अपलक देख रही थी.
‘‘अरे, तुम दोनों एकदूसरे को जानते हो क्या?’’
उस के इस सवाल पर मोनिका ने अपनी नजरें झुका लीं और समय ने भी. शब्द खामोश थे, सांसें बोल रही थीं, एहसास आंखों में खिल रहे थे.
‘‘मोनिका, कहीं यह वह लड़का तो नहीं, जिस के बारे में तुम ने मुझे बताया था.’’

मोनिका ने आंख उठा कर, पलक झपका कर हां का संकेत दिया. लरजते होंठ कांप कर रह गए, चेहरा अचानक मिली इस खुशी से संवर उठा था, लालिमा ने चेहरे को नई रंगत में रंग दिया था.
समय भी खामोश खड़ा अपनी सांसों को संयत करने की कोशिश कर रहा था. ऐसा लग रहा था, समय भी मोनिका के उस पहले स्पर्श को अभी भी महसूस कर रहा है.
‘‘अरे, फिर देरी किस बात की है, तुम दोनों जाओ, अब मेरा क्या काम?’’
और अर्शा मुसकराती अपने केबिन में चली गई.
समय ने मोनिका से कहा, ‘‘चलें क्या?’’
कुछ सकुचाई सी मोनिका उस के साथ चल दी, लिफ्ट से नीचे आ कर समय ने कहा, ‘‘तुम यहीं रुको, मैं कार ले कर आता हूं.’’
कार ला कर समय ने उस के सामने कार रोकी और दरवाजा खोल कर बैठने को कहा.
मोनिका बिना कुछ कहे कार में बैठ गई.
‘‘कहां चलोगी?’’
मोनिका ने अपनी बड़ीबड़ी आंखें उठा कर समय की ओर देखा, फिर धीरे से कहा, ‘‘कहीं भी, जहां तुम ले चलो.’’
समय ने गाड़ी चलाते हुए पूछा, ‘‘मेरी याद आई कभी?’’
मोनिका की आंखों के आंसू शायद बहुतकुछ कह रहे थे. 10 साल का लंबा सफर जैसे मोनिका ने हर पल इंतजार किया है. पहला स्पर्श जिसे महसूस कर आज तक सिहर जाती है. किशोरवय की नादानी आज वही मन का बंधन है.
समय ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘सुनो, भूला तो एक पल को मैं भी नहीं, क्या मेरे जीवन की पार्टनर बनोगी, अधूरे एहसास को पूरा करने, आज भूल नहीं परिपक्व कदमों के साथी होंगे.’’
मोनिका का तनमन समय के प्यार की अनुभूति से सराबोर हुए जा रहा था. अब दोनों ही अपने को उस प्यार के एहसास में डुबो देना चाहते थे जिस की अनुभूति उन्होंने बरसों पहले की थी. Romantic Story in Hindi

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