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तुरंत रिहा करो : एकतिहाई सजा काट चुके कैदी

Undertrial Prisoners: यह बात स्पष्ट है कि जेलों में ज्यादातर विचाराधीन कैदी एससी, एसटी और मुसलिम समाज के हैं और आबादी के प्रतिशत से भी ज्यादा हैं. आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से ये कैदी अच्छे वकील नहीं रख पाते और सालों जेलों में बिना सजा मिले पड़े रहते हैं. ऐसे कैदियों की सुध हाईकोर्ट कभीकभार लेती रहती है. दिल्ली हाईकोर्ट ने एकतिहाई समय उस सजा की काट चुके जिस के आरोप उन पर लगे हैं उन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है.

धोखाधड़ी के एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया. कोर्ट में आरोपी ने तर्क दिया कि उस के अपराध में अधिकतम सजा 7 साल है लेकिन वह 7 साल की अधिकतम सजा का एकतिहाई समय जेल में बिता चुका है जबकि कोर्ट में उस के मामले की चार्जशीट फाइल होने के बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हुई. यह याचिका दायर करने के लिए इस कैदी को वकील मिल गया वरना तो अधिकांश मामलों में यह भी नहीं मिलता है.

दिल्ली हाईकोर्ट जस्टिस गिरीश कठपालिया ने 13 अप्रैल, 2026 को एक महत्त्वपूर्ण फैसले में दिल्ली के सभी जिला अदालतों और जेल प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया है. इस आदेश के तहत पहली बार अपराध करने वाले विचाराधीन कैदियों को जमानत पर रिहा करने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी. ऐसे कैदी जिन का मुकदमा किसी भी कोर्ट में चल रहा है लेकिन अभी उन्हें कोर्ट से सजा नहीं मिली है और उन्होंने अपने जुर्म की अधिकतम सजा का एकतिहाई समय जेल में काट लिया है तो उन्हें जमानत मिलनी चाहिए.

यह फैसला बीएनएसएस यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 479 पर आधारित है जो पुरानी सीआरपीसी की धारा 436 ए से ज्यादा नर्म है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले ही जेल अधीक्षकों को निर्देश दिया था कि वे जेल में अपनी सजा का एकतिहाई समय पूरी करने वाले कैदियों की जमानत याचिकाएं तुरंत अदालत में भेजें.

भारतीय जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या कुल कैदियों का लगभग 78 प्रतिशत है. ये लोग दोषी साबित होने से पहले ही लंबे समय तक जेल में बंद हैं. यह न सिर्फ न्याय व्यवस्था की खामी है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन भी है. Undertrial Prisoners

 

 

भारतीय मूल के धनकुबेर भारत के लिए बेकार

Indian Origin Billionaires: पैसा कमाना हर्ज की बात नहीं. हर्ज की बात विदेश में जा कर बहुत सा पैसा कमा कर वहीं बस जाना और अपने देश की अनदेखी करना वह भी ताने सुन कर, बेइज्जती बरदाश्त कर और गालियां सुनने के साथसाथ यह गर्व की नहीं बल्कि शर्म और चिंता की बात है जो अमेरिका की एक महिला की एक वायरल पोस्ट से साबित हुई कि वहां बसे भारतीय मूल के धनकुबेर अपने देश के किस काम के.

इस साल सोशल मीडिया प्लेटफौर्म एक्स पर ज्यादा वायरल होने वाली पोस्टों में से एक यह थी जिस में यूजर ने लिखा था, ‘मैं झूठ नहीं बोलूंगी जब मैं ने इसे पहली बार देखा तो मुझे लगा यह एआई से बना हुआ है, अगर यह सच्चा है तो हमें समस्या है.’ इस पोस्ट में, दरअसल, एक कोलाज अटैच था जिस में स्टैंप साइज के 30 फोटोग्राफ्स थे. ये सभी भारतीय मूल के रईस थे जिन में अधिकतर नामी कंपनियों के सीईओ थे, मसलन गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसौफ्ट के सत्या नाडेला, जस्केलर इंक के जय चौधरी, यूट्यूब के नील मोहन, आईबीएम के अरविंद कृष्ण, अडोबी के शांतनु नारायण, माइक्रोन के संजय मेहरोत्रा और नोवार्तिज के वसंत नरसिम्हन वगैरह. बहुत दिलचस्प, अहम और काबिलेगौर बात यह है कि हरेक के फोटो के नीचे भारतीय तिरंगा लगा हुआ है.

इस पोस्ट को लाखों व्यूज और हजारों कमैंट्स मिले थे, क्योंकि बात थी भी कुछ ऐसी ही. भारतीय मूल के इन कुबेर अमेरिकी नागरिकों पर गाहेबगाहे भारतीय हिंदू गर्व किया करते हैं कि इन्होंने अमेरिका जा कर भारत और हिंदू धर्म के झंडे गाड़े हैं. यह गर्व उतना ही मिथ्या या बेवजह है जितना सुभाषचंद्र बोस के बारे में यह मान लेना कि देश को आजादी उन की वजह से मिली. जबकि `नेताजी` ने देश के लिए कियाधरा कुछ नहीं था. बल्कि विदेशों में बीमारी के बहाने रहते वे विलासी जिंदगी जीते रहे थे और तानाशाह जरमनी के एडौल्फ़ हिटलर और वैसे ही जापान के सम्राट के साथ काम कर के भारत में लोकतांत्रिक स्वदेशी राज लाने के नारे लगाने लगे थे.

यह गंभीर बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन उक्त विदेशी भारतीयों, जो अमेरिका की नागरिकता ले कर वहीं रचबस गए हैं, के मामले में तो दो टूक सोचा और पूछा जा सकता है कि इन लोगों ने अपने देश के लिए क्या किया है जो इन पर गर्व किया जाए. लेकिन उस से पहले इस पोस्ट के बहाने यह समझ लें कि इन्होंने अमेरिका के लिए जो काफीकुछ किया है उस के एवज में इन्हें कोई शाबाशी या तारीफ नहीं, बल्कि तिरस्कार और धिक्कार ही मिलते हैं. यानी, ये लोग न घर के रह गए और न ही घाट के.

उक्त पोस्ट टैक्सास में रहने वाली एक महिला केलि कैम्पबेल ने बीती 14 मार्च को डाली थी जो निहायत ही चर्चवादी महिला है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन यानी मागा की कट्टर समर्थक है. केलि हालांकि आम गृहिणी है लेकिन वह स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहती है. उस की एक पहचान राइट विंग सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की भी है जो अकसर भारतीय अमेरिकों के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट डालती रहती है.

इसी साल फरवरी के महीने में उस ने इसी तरह का एक वीडियो शेयर करते लिखा कि भारतीय एच-1 बी वीजाधारक हाउसिंग स्कैम कर रहे हैं. यानी, खरीदे या किराए पर लिए अपार्टमैंट्स सब-लीजिंग से अपने दोस्तों को दे रहे हैं जिस से दूसरे लोग घर नहीं पा रहे. उस ने इस पोस्ट में इंडिया टेकओवर शब्द का इस्तेमाल करते हुए यह भी बहुत स्पष्ट लिखा था कि वे अमेरिकन नहीं हैं, वे स्कैमर्स हैं. उस की इस तरह की पोस्टें गोरे अमेरिकियों के बीच काफी वायरल होती हैं और उन पर प्रतिक्रियाएं भी इफरात से मिलती हैं.

उन में से कुछ ये हैं-

इस पोस्ट में इतने सारे भारतीयों को नामी कंपनियों के शीर्ष पदों पर देख केलि केम्पबेल जैसी सोच रखने वाले करोड़ों दक्षिणपंथी गोरे अमेरिकी परेशान हैं. उन्हें लगता है कि ये भूरे वाले भारतीय नौकरीचोर हैं जो एक दिन देश पर आर्थिक के बाद सत्ता पर भी कब्जा कर सकते हैं. यह डर ठीक वैसा ही है जैसा सवर्ण हिंदुओं को आबादी के लिहाज से मुसलमानों, पिछड़ों और दलितों से लगता है.

भारतीयों के प्रति अमेरिकियों की नफरत कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही, फिर भले ही वे आम मजदूर हों, नामी कंपनियों के सीईओ हों या भारतीय मूल की डैमोक्रेटिक कमला हैरिस हों जिन्होंने पिछला चुनाव डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ लड़ा था. उन के रंग, नस्ल और जैंडर पर हद से ज्यादा भद्दी टिप्पणियां की गई थीं. पेप्सिको की सीईओ रहीं इंदिरा नुई ने एक बार कहा था कि अमेरिकी उन्हें `विदेशी` की नजर से देखते हैं.

के लिए की पोस्ट पर भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं हुई थीं. लेकिन वे इन कुबेरों के खिलाफ थीं जिन के चक्कर में पूरे भारतवासियों को जलीकटी सुनना पड़ीं. कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाओं पर नजर डालें जिन से स्पष्ट होता है कि इन भारतीय मूल के दिग्गजों के प्रति अमेरिकी मानसिकता क्या है और क्यों ये लोग स्वाभिमान व गैरत जैसे शब्दों की तरफ से पीठ किए इन्हें खामोशी से बरदाश्त करने को मजबूर होते हैं. इस `क्यों` में एक अहम वजह यह भी है कि वे अपमानित हो कर भी क्यों अमेरिका में ही रहते हैं. जोहो कौर्पोरेशन के श्रीधर बैम्बू की तरह भारत वापस नहीं आते और क्यों डोनाल्ड ट्रंप की जीहूजूरी व खुशामद में लगे रहते हैं.

– भारतीय यहूदी जैविक हथियार हैं. भारतीय सीईओज सब बिना प्रतिभा वाले स्कैमर हैं जो अमेरिकी बिजनैस को पूरी तरह बरबाद कर देंगे. वे सिर्फ नकली बना सकते हैं.
– भारतीय सीईओज मूल्य पैदा करने के लिए सत्ता में नहीं हैं. उन्हें सिर्फ अमेरिकी श्रम से भारतीय श्रम में बदलाव प्रवंधित करने के लिए नियुक्त किया गया है.
– अगर आप आईटी सैक्टर में काम करते तो समझ जाते कि ये सब से अच्छे और होशियार नहीं हैं. भारतीय सीईओज अपने सस्ते और आज्ञाकारी भारतीय मजदूरों को ही रखते हैं. यह सब सिर्फ पैसों के बारे में है.
– भारतीय कागज पर बेहद काबिल दिखते हैं लेकिन चूंकि वे बहुत आज्ञाकारी और पूरी तरह बिना किसी रचनात्मकता वाले हैं. इसलिए भारतीय सीईओज बोर्ड औफ डायरैक्टर्स के लिए बेहतरीन नौकर बनते हैं.
– उन के पास 1.5 अरब लोग हैं, इसलिए वे सिर्फ लाखों लोगों को हमारे रास्ते में फेंक कर अमेरिकी संस्कृति को कुचल सकते हैं. हम एक मूर्ख देश हैं जिस में राजनीति में खरीदे गए देशद्रोही लोग भरे पड़े हैं.
– जब कोई भारतीय सीईओ बनाता है तो इसलिए कि कंपनी खतरे में है और कुछ गड़बड़ होने पर किसी को बलि का बकरा बनाने की जरूरत है.
– 30 या इस से ज्यादा प्रमुख अमेरिकी टैक कंपनियां भारतीय सीईओज द्वारा चलाई जा रही हैं वे अमेरिकी कर्मचारियों को निकालते हैं, एच1 और एल1 भारतीय कर्मचारियों को रखते हैं, और आउटसोर्स करते हैं. मैं इन से तंग आ गया हूं.

निश्चित रूप से इन प्रतिक्रियाओं में डर, भड़ास और पूर्वाग्रह ज्यादा हैं. बावजूद इस के, ये कुबेर तगड़ा टैक्स अमेरिकी सरकार को देते हैं. डोनाल्ड ट्रंप और उन की रिपब्लिकन पार्टी को भारी चंदा देते हैं, ये अमेरिका के शान में कसीदे गढ़ते हैं और वक्तवक्त पर अमेरिका के प्रति अपनी वफादारी व्यक्त कर उस का नवीनीकरण कराते रहते हैं. लेकिन अपने मूल देश के लिए कुछ नहीं करते, यानी, बात ‘सौसौ जूता खाएं, तमाशा घुस के देखेंगे’ वाली कहावत को चरितार्थ करती है.

केलि जैसे करोड़ों गोरे कट्टरपंथी दक्षिणपंथियों की दिक्कत अकेले यह कमाई नहीं, बल्कि धार्मिक डर भी है कि अगर इस कमाई की रफ्तार डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते नहीं थमी तो कल को ये काले हिंदू सत्ता पर भी काबिज हो जाएंगे और हैरानी नहीं होनी चाहिए कि चर्चों के बराबर से मंदिर दिखने लगें और ईसाई राष्ट्र हिंदू राष्ट्र में तबदील होने लगे.

यह डर दूर की कौड़ी भी नहीं है. इसलिए मागा वाले भारतीयों को दबानेकुचलने का कोई मौका नहीं छोड़ते. इन डरे हुए लोगों के दबाव का नतीजा ही ट्रंप सरकार के वे फैसले और नीतियां हैं जिन्होंने भारतीयों की मुश्कें कस रखी हैं. हैरानी की बात यह है कि अमेरिका में बसे ये धनकुबेर इन पर चूं भी नहीं कर पाए.

उलटे, ये करोड़ोंअरबों का चंदा डोनाल्ड ट्रंप को देते रहते हैं. न्यूयौर्क टाइम्स की 22 दिसंबर, 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सत्या नाडेला ने 32.2 करोड़ रुपए ट्रंप के अभियानों के लिए दिए थे और इतना ही नहीं, उन की कंपनी माइक्रोसौफ्ट ने भी 9.2 करोड़ का चंदा दिया था. सुंदर पिचाई ने 11.04 करोड़ और उन की कंपनी गूगल ने 9.2 करोड़ का चंदा दिया था. शांतनु नारायण ने 9.2 करोड़ और अरविंद कृष्ण ने 6.9 करोड़ का चंदा ट्रंप को दिया था. दूसरे सीईओज ने भी, कुछ कम ही सही, चंदा दिया था.

देशप्रेम पर खामोशी और भक्ति की धूमधाम

इन सीईओज की पहली सब से बड़ी कमजोरी पैसा और दूसरी अमेरिकी नागरिकता छिन जाने का डर है जिस के चलते वे अमेरिका की भारतविरोधी नीतियों के आगे नतमस्तक रहते हैं. अपनी कंपनी के हित उन की प्राथमिकता में रहते हैं. इस के लिए वे कोई भी समझौता कर लेते हैं. यह अमेरिका के प्रति प्रत्यक्ष वफादारी और भारत के प्रति अप्रत्यक्ष बेवफाई नहीं तो और क्या है.

अकसर भारतीयों को औफ और औनलाइन दोनों तरीकों से करी और ज्यादा तला भुना खाने वाले कह कर नीचा दिखाया जाता है. उन्हें कंजूस के खिताब से भी नवाजा जाता है. उन के इंग्लिश उच्चारण का मजाक बनाया जाता है. स्कूल, कालेजों और दफ्तरों में ऐसा ज्यादा होता है जिस का विरोध भारतीय नहीं कर पाते. इसलिए नहीं कि वे बहुत ज्यादा सहनशील हैं बल्कि इसलिए कि वे पैसा कमाने की अपनी हवस के आगे लाचार ज्यादा हैं. इसलिए ये यह भी सुन लेते हैं कि तुम लोग `वायरस स्प्रेडर` हो. सीधी सी बात तो यह है कि अमेरिका में `मौडल माइनौरिटी` के खिताब से नवाजे गए भारतीय ट्रंप राज में `टारगेट माइनौरिटी` हो गए हैं. उन की हालत वहां वही है जो भारत में दलितों की है.

जब ट्रंप सरकार ने एच-1 बी वीजा के नए आवेदनों पर एक लाख डौलर की फीस लगाई थी और दूसरे सख्त नियम भी लागू किए थे तो इन सीईओज के मुंह में दही जम गया था. इन की चुप्पी को दुनिया ने हैरानी से देखा था क्योंकि इन में से किसी ने कोई बयान देना तो दूर की बात है, सोशल मीडिया पर कोई ट्वीट भी नहीं किया था और न ही कोई पोस्ट कहीं डाली थी. भारत में भी घुटनभरी हायहाय होती रही. वजह, मोदी-ट्रंप की कथित दोस्ती आड़े आ रही थी और एक हद तक भारतीय दक्षिणपंथी असमंजस में भी थे क्योंकि वे अगर इस का विरोध करते तो उंगली उन पर भी उठती कि आप में और उन में और ट्रंप व मोदी में फर्क क्या है. अलावा इस के, ट्रंप के सनकभरे टैरिफों पर भी इन के होंठ नहीं हिलते.

कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने जरूर इन कुबेरों पर तंज कसते हुए कहा था कि भारतीय अमेरिकी डायस्पोरा और ये बिजनैस लीडर्स खामोश क्यों हैं. एकाध मीडिया हाउस ने भी इन लोगों की चुप्पी पर हैरानी जताई थी. लेकिन खिंचाई करने की हिम्मत कोई नहीं कर पाया था कि यह कैसा अपनी जड़ों और देश से प्रेम है जो अपने ही देश और देशवासियों के खिलाफ ज्यादतियों पर लिहाफ ओढ़ कर सो जाता है. यह न भूलें कि बहुत से भारतीय नेताओं के बच्चे विदेशों में बसे हैं और वहीं नौकरियां कर रहे हैं. उन में सांसद, मंत्री, विधायक, आईएएस अफसर शामिल हैं.

बहुत बाद में सुंदर पिचाई थोड़ा बोले थे लेकिन वह वैसा ही था जैसे राह चलते ऐक्सिडैंट में घायल को देख कर यह कहना कि उफ, बुरा हुआ, देख कर चलना चाहिए. ये सीईओज टक्कर मारने वाले के पीछे दौड़ कर उसे कूटने वालों में से नहीं हैं. अपने कहे को अन्यथा न लिया जाए इसलिए सुंदर पिचाई ने लगेहाथ डोनाल्ड ट्रंप की एआई नीति की जम कर तारीफ की थी. तय है, यह डर और उस से पहले एक तरह का गिल्ट था.

इन लोगों की देशभक्ति और तथाकथित देशप्रेम आएदिन उजागर होते रहते हैं. साल 2025 में ही अमेरिका में भारतीयों पर हुए हमले हों या हिंदू मंदिरों पर हमले हों या कि फिर नस्लीय भेदभाव व हिंसा के अलावा सोशल मीडिया पर उजागर नफरत हो, ये सीईओज कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते. दो टूक कहा जा सकता है कि जिन्हें अपने ही देश (अमेरिका) में अपने देशवासियों पर ज्यादतियां और जुल्मोसितम देख कर मुंह फेर लेने की आदत पड़ गई हो वे अपने देश (भारत) के लिए क्या खा कर कुछ करेंगे. ये लोग और इन के हिमायती तो भारत को यह कहते बदनाम करते हैं कि वहां टैलेंट की पूछपरख नहीं है और उस से भी अहम बात यह कि भारत एक गरीब देश है, वह हमें अपनी काबिलीयत के मुताबिक पैसा नहीं दे पाता, इसलिए हम यहां आ गए.

बात जहां तक अपनी कंपनियों के जरिए भारत में नौकरी और रोजगार देने की बात है जिसे कुछ लोग गागा कर बताते रहते हैं तो यह भी समझने वाली बात है कि यह कोई एहसान नहीं है बल्कि अपनी कंपनियों का धंधा बढ़ाने का कौर्पोरेट तरीका है क्योंकि भारत इन लोगों के लिए बहुत बड़ा बाजार है. न केवल इन के लिए बल्कि हर कंपनी के लिए, क्योंकि भारत की आबादी 140 करोड़ है. अमेरिका में रह रहे ये कुबेर दिल से वहां के कानूनों और नीतियों के उतने ही हिमायती लगते हैं जितना कोई श्वेत ईसाई या मागा वाला होता है. यह भी ज्यादा दिक्कत की बात नहीं. दिक्कत की बड़ी बात यह है कि ये उन लोगों में से नहीं है जो अपनी जड़ों और देश से कोई प्यार करते हों या जिन्हें वतन की मिटटी याद आती हो.

हमें गद्दार कहने वालों भूखे पेट देशभक्ति नहीं होती` जैसे कोटेशन से सहमत होने की कई वजहें और दलीले हैं लेकिन भारत में जन्मे, पलेबढ़े और शिक्षित हुए इन सीईओज के पेट तो हद से ज्यादा भरे हुए हैं, फिर इन पर किस बात का गर्व और यह सवाल क्यों नहीं कि आप ने देश के लिए किया ही किया है, आप हमारे किस काम के.

आम भारतीय इन के इस दब्बू और कायराना व्यवहार से बेहतर तरीके से वाकिफ होता जा रहा है, इसलिए वह न तो इन का सम्मान करता है और न ही लिहाज. उलटे, अब इन की खिंचाई करने लगा है. न केवल इन की, बल्कि सुनीता विलियम्स की भी जिन्होंने अंतरिक्ष से वापस लौटने के बाद गर्व से खुद को अमेरिकी बताया था. इस से आहत हो कर फेसबुक पर कल्पना टी गोवदा ने 25 मार्च, 2025 को अपनी पोस्ट में जो कहा था उस की प्रतिक्रिया में उन्हें वही रिस्पौंस मिला था जो केलि कैम्पवेल को मिला था.

बकौल कल्पना, ‘मुझे भारतीयों को सुनीता विलियम्स के वापस आने पर इतना पागल होते देखकर सच में थकान हो गई है. वे अमेरिकी हैं और भारत से उन का कोई लेनादेना नहीं है. हम भारतीयों को समझना चाहिए कि सुंदर पिचाई, सत्या नाडेला, सुनीता विलियम्स आदि अमेरिकी हैं, भारतीय नहीं. वे सब भारतीय मूल के हैं लेकिन वे अमेरिका के लिए काम करते हैं. इस में गर्व करने जैसा कुछ भी नहीं है. इस के बजाय हमें उन भारतीयों पर गर्व करना चाहिए जैसे रतन टाटा और एपीजे अब्दुल कलाम जिन्होंने वाकई हमारे देश के लिए योगदान दिया है.’

कल्पना की बात और भावनाओं से असहमत होने की कोई वजह नहीं लेकिन हमें गर्व श्रीधर बम्बू जैसे उद्यमियों पर भी करना चाहिए जो असमानता का विरोध करते अपने देश भारत में आ कर अपनी कंपनी जोहो कौर्पोरेशन, जो माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनी को टक्कर देती है, के जरिए टैक्नालौजी के क्षेत्र में भारत का नाम ऊंचा कर रहे हैं. इस से भी ज्यादा अहम यह कि वे देहाती इलाकों में स्कूल और एजुकेशन प्रोजैक्ट चलाते हैं जिस से लाखों गरीब बच्चों का भला हो रहा है. बकौल श्रीधर, देशभक्ति विकास को अर्थ देती है. बिना इस के, विकास बेमानी हो जाता है.

बौक्स टैक्सों में योगदान : अमेरिकी खजाना भरते हैं

बहुत ताजे आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में भारतीयों की कुल आबादी महज 1.5 फीसदी (लगभग 51 लाख) है जो अमेरिका को उस के कुल टैक्स का 6 फीसदी टैक्स देती है. यह राशि लगभग 25 लाख करोड़ होती है. दिलचस्प बात यह कि यह केवल फैडरल टैक्स राशि है. स्टेट और लोकल टैक्स अलग हैं जिन के आंकड़े जारी नहीं किए जाते.

जाहिर है इस टैक्स राशि का बड़ा हिस्सा ये टौप 30 सीईओज देते हैं जो करोड़ों डौलर होता है. ये सीईओज खुद तो अपनी कमाई पर टैक्स देते ही हैं, इन की कंपनियां इन से भी ज्यादा टैक्स देती हैं. मिसाल अकेले सुंदर पिचाई की लें तो वे लगभग 630 करोड़ रुपए बतौर टैक्स अमेरिकी खजाने में भरते हैं. उन के बाद सत्या नाडेला 160 करोड़ और शांतनु नारायण 95 करोड़ सालाना टैक्स देते हैं. यह लिस्ट लंबी है जो इन आंकड़ों में और इजाफा ही करती है. अब कंपनियों पर नजर डालें तो माइक्रोसौफ्ट लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपए, अल्फाबेट 1.2 लाख करोड़ रुपए और एडोबी 20 हजार करोड़ रुपए सालाना टैक्स देती हैं. जाहिर है कमाई इस से सैकड़ों गुना ज्यादा है.

अमेरिका में भारत के सीईओज की नैटवर्थ का आलम तो यह है कि अकेले 5 धनकुबेर सुंदर पिचाई, सत्या नाडेला, शांतनु नारायण, निकेश अरोरा और अरविंद कृष्ण की नैटवर्थ तकरीबन 40 हजार करोड़ है जो भारत के छोटेमोटे राज्यों के बजट से ज्यादा होती है, मसलन सिक्किम का सालाना बजट 12 हजार करोड़ से 3 गुना से भी ज्यादा और गोवा के 26 हजार बजट से डेढ़ गुना ज्यादा. Indian Origin Billionaires

 

कस्टमर सप्लायर रिलेशनशिप बनाता है ड्रैस कोड

Lenskart Controversy: लैंसकार्ट चश्मा बनाने वाली कंपनी है. लैंसकार्ट ने 27 पन्ने के अपने ड्रैस कोड ‘स्टाइल गाइड’ में धार्मिक चिन्हों को ले कर गाइडलाइन बनाई थी. उस के अनुसार, स्टोर के कर्मचारियों को तिलक, कलावा, जनेऊ, तुलसी की माला और बिंदी पहनने से मना किया गया था. वहीं दूसरी तरफ हिजाब, पगड़ी और दाढ़ी की अनुमति दी गई थी. इस मसले को धार्मिक चश्मे से देखा जाने लगा. हिंदूवादी संगठनों ने लैंसकार्ट के स्टोर में जा कर प्रदर्शन किया. सोशल मीडिया पर ‘बायकौट लैंसकार्ट’ मुहिम शुरू हो गई.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय किसान यूनियन के नेता विनीत सिंह ने लैंसकार्ट की इस दोहरी नीति की कड़ी अलोचना की. विनीत सिंह ने कहा, ‘भारत के संविधान ने सभी नागरिकों को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक आजादी दी है. किसी भी कंपनी को अपना नियमकानून बनाने का हक है, लेकिन यहां यह देखना जरूरी है कि इस में किसी तरह का भेदभाव न हो. एक धर्म के लिए किसी तरह का बंधन हो और एक लिए छूट, तो यह अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का हनन है.’

सोशल मीडिया में चर्चा बढ़ने व बौयकाट अभियान चलने के बाद लैंसकार्ट अपना पल्ला झाड़ने और बच निकलने का रास्ता देखने खोजने लगी. कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए जारी की गई ‘स्टाइल गाइड’ में हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर लगाई गई रोक को अवैध घोषित कर दिया. कंपनी के सीईओ पियूष बंसल ने कहा, ‘सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पौलिसी को पुराना बताया और कहा कि यह वर्तमान की नीति नहीं है. यह ड्रैस कोड पौलिसी पुरानी है. नए कौर्पोरेट युग में इस की जरूरत नहीं है.’

सोशल मीडिया के इस दौर में छवि को नुकसान पंहुचाना बहुत आसान हो गया है. लैंसकार्ट के इस विवाद में हवा देने का काम कंपनी के सीईओ पियूष बंसल की पत्नी निधि बंसल के पुराने 2014-2015 के ट्वीट किए गए मैसेज वायरल होने लगे जिन में आम आदमी पार्टी की तारीफ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों की आलोचना की गई थी. इस को ले कर कंपनी की छवि को खराब करने का प्रयास किया गया और साबित करने की कोशिश की गई कि वह कंपनी मोदीविरोधी है.

लैंसकार्ट के सीईओ पियूष बंसल हरियाणा के रहने वाले हैं. पहले वे माइक्रोसाफ्ट में नौकरी करते थे. 2007-2008 में वे भारत आए और अपना नया बिजनैस शुरू करने की तैयार की. 2010 में लैंसकार्ट का काम शुरू किया. गुडगांव में कंपनी का मुख्य औफिस है. यह कंपनी चश्मा, सनग्लासेस और कौन्टैक्ट लैंस बनाने का काम करती है. इस कंपनी की 2,000 से अधिक रिटेल शौप पूरे भारत में है. भारत के बाहर यूएई और यूएसए जैसे देशों में भी कंपनी के रिटेल स्टोर हैं. कंपनी अपने  चश्मे खुद बनाती, डिजाइन करती और खुद बेचती है. औनलाइन और औफलाइन दोनों ही तरह से कंपनी बिजनैस करती है. पियूष बंसल की पत्नी निधि बसंल लैंसकार्ट फाउंडेशन की फांउडर चेयरपर्सन और सोशल वर्कर हैं.

लैंसकार्ट फाउंडेशन गरीब लोगों को चश्मा उपलब्ध कराना, आंखों की बीमारियों का इलाज और अंधेपन को रोकने की दिशा में काम करती है. पियूष बंसल मिडिल क्लास परिवार से उठ कर अपना बिजनैस शुरू किया और कामयाबी हासिल की. धार्मिक चश्मे के नैरेटिव ने सोशल मीडिया पर लोगों को उन की आलोचना करने का मौका दे दिया. लैंसकार्ट के ड्रैस कोड में हिंदू लड़कियों को साड़ी, सलवार सूट पहनने से मनाही नहीं थी. जो हिंदूवादी निशान उन्होंने रोकने की कोशिश की थी वे दरअसल धार्मिक कट्टरता की निशानियां हैं, आम हिंदू, खासतौर पर पिछड़े, दलित, आदिवासी, उन्हें इस्तेमाल नहीं करता. ये चोंचले केवल ऊंची जातियों के हिंदुओं के हैं.

पहनावे और सोच से छवि पर प्रभाव

सब से बड़ा सवाल है कि कार्यस्थल पर क्या पहना जाए? कार्यस्थल पर पहनी जाने वाली ड्रैस इस तरह की होनी चाहिए जो काम करने में आरामदायक हो. उस से कार्य करने में कोई दिक्कत न हो और काम करने वालों के साथ पोशाक की वजह से कोई दुर्घटना न हो. इस के साथ ही साथ वहां आने वाला कस्टमर उस ड्रैस में सप्लायर को देख कर सहज अनुभव कर सके. ड्रैस इस तरह की हो जिसे देख कर कस्टमर और सप्लायर के बीच एक नैचुरल रिलेशनशिप बन सके. कस्टमर ड्रैस देख कर पहले से ही यह न समझ ले कि यहां उस के साथ अच्छा अनुभव न होगा. कस्टमर किसी भी धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र का हो सकता है.

अदालतों में आज भी एक ड्रैस क्यों है? इसलिए न कि आने वाले वादी-प्रतिवादी को यह न लगे कि सामने उस का फैसला करने वाला व्यक्ति ऐसा है जो किसी खास धर्म या जाति से जुडा है. अब अगर जज इस तरह की पोषाक पहन कर आने लगे तो वादीप्रतिवादी के मन में सवाल उठेगा कि फैसला निष्पक्ष होगा या नहीं. जैसे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को मन में दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को देख कर लगा था. कुछ सुप्रीम कोर्ट जज तरहतरह के तिलक लगा कर आने के लिए मशहूर थे और उन के धर्म संबंधी मामलों में निर्णय निष्पक्ष नहीं होते थे.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के पहनावे से अरविंद केजरवाल को दिक्कत नहीं थी, उन को दिक्कत थी कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. अरविंद केजरवाल ने तर्क दिया था कि उन की लड़ाई आरएसएस की विचारधारा से है. ऐसे में अगर आरएसएस की विचारधारा के कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाली जज उन के साथ सही न्याय नहीं कर पाएगी. केजरीवाल ने अदालत से कहा था कि इस मामले की सुनवाई कर रहीं जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा खुद को इस केस से अलग कर लें. उन्होंने कहा कि उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष सुनवाई को ले कर आशंका है. उन के आदेशों में एक पैटर्न दिखता है, जिस में ईडी और सीबीआई के हर तर्क को स्वीकार किया जाता है. जज स्वर्ण कांता शर्मा ने जब बात नहीं मानी तो केजरीवाल की पार्टी ने अपना पक्ष रखने से ही इनकार कर दिया है. केंद्रीय जांच ब्यूरो जो चाहे तर्क दे.

जाति धर्म का शोर

जज, वकील, डाक्टर, पुलिस, शिक्षक और अफसर एक तरह की ड्रैस पहनते हैं जिस से उन के पास आने वाला उन की ड्रैस को देख कर अपने मन में कोई धारणा न बनाए. हमारे देश में अपनी जाति और धर्म को ले कर लोगों के मन में गर्व होता है वहीं दूसरे की जाति और धर्म को ले कर मन में भरोसा नहीं होता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने कांवड यात्रा के समय सड़क पर लगने वाली दुकानों से कहा कि वे दुकान के नाम के साथ मालिक का नाम और पूरा विवरण लिख कर रखें जिस से वहां खाने वाले को यह पता चल जाए कि वह किस जाति और धर्म की दुकान पर खा रहा है. कांवड़ यात्रा के मार्ग में बहुत से मुसलिमों की खाने की दुकानें हैं और कटटर हिंदू हिंदू-मुसलिम खाई को चौड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं.

लोकतंत्र में सरकार द्वारा जाति और धर्म का प्रयोग मना है. पर असल में हर चुनाव में टिकट देने के पहले चुनाव लड़ने वाले की जाति, धर्म और उस क्षेत्र में रहने वालों की जाति व धर्म के बीच संतुलन को हर पार्टी द्वारा देखा जाता है. इस के बाद ही टिकट दिया जाता है. जाति और धर्म इसीलिए सिर चढ़ कर बोल रहा होता है. इस कारण ही प्राइवेट कंपनियां यह नहीं चाहतीं कि कस्टमर और सप्लायर के बीच ड्रैस या किसी दूसरे पहचान चिन्ह को देख कर कस्टमर के मन में कोई जाति और धर्म के नाम पर हो रहे भेदभाव का असर पड सके. सरकारी विभागों में शर्मा, मिश्रा, दीक्षित चोटी भी रखते हैं, तिलक भी लगाते हैं, कलेवा बांधते भी हैं और सरकारी कंपनियों तक में हिंदू देवताओं की मूर्तियां लगा लेते हैं.

भारत में जाति और धर्म को ले कर भेदभाव गहरा है. धर्म यह चाहता है कि वह ही खाना, पहनना, सोचना सबकुछ अपने मुताबिक कर पाए. जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है, जो समानता के संवैधानिक अधिकारों के बावजूद सामाजिक विभाजन, अस्पृश्यता और असमानता को बढ़ावा देता है. यह भेदभाव शिक्षा, रोजगार, आवास और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच को सीमित करता है. धार्मिक भेदभाव व्यक्ति के विश्वास, संप्रदाय या धर्म के आधार पर असमान व्यवहार होता है. इस में अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह और भेदभाव शामिल हैं. यह भेदभाव समाज में एकता को तोड़ता है और सामाजिक न्याय को रोकता है. सब से बड़ी बात यह धार्मिकता औरतों के साथ अन्याय करती है क्योंकि हिंदू ही क्या बल्कि हर धर्म में औरतों को दोयम समझा गया है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है. अनुच्छेद 15 (4) और 15 (5) पिछड़े वर्गों के लिए विशेष अधिकार देता है. जाति, धर्म और रंग का भेदभाव मिटाने के लिए सभी के प्रति सम्मान और एकता का भाव आवश्यक है. अनुच्छेद 15 के अनुसार, राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इन में से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा. ऐसे में जब लोग अलगअलग ड्रैस और पहनावे का प्रदर्शन करते हैं तो एकता के भाव का प्रदर्शन नहीं हो पाता है.

पोशाक के फेर में फंसती जनता

धार्मिक पहचान वाली ड्रैस के सहारे धर्म वाले जनता को लूटने का काम करते हैं. भारत में बाबाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है जो अंधविश्वास का फायदा उठा कर आम जनता, खासकर महिलाओं, का शोषण कर रहे हैं. महाराष्ट्र के नासिक जिले में अशोक खरात उर्फ ‘कैप्टन बाबा’ का मामला सामने आया. इस मामले में महिलाओं के यौन उत्पीड़न, ब्लैकमेलिंग और आर्थिक शोषण जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं. कनाडा जैसे देशों में अगर कोई जादूटोना या चमत्कार दिखाने की कोशिश करता है, तो उसे तुरंत सजा मिलती है. भारत में हर धर्म और समुदाय में ऐसे बाबाओं की संख्या अधिक है, जो आसानी से लोगों को अपने जाल में फंसा लेते हैं. बाबाओं की पहचान उन की ड्रैस से होती है और नेता व पुलिस पहरावे के कारण उन के चरण चुंबन करते नजर आते हैं.

नासिक जिले में एक बाबा ने अपने आश्रम को फार्महाउस में बदल कर कई महिलाओं को फंसाया. जब यह मामला सामने आया तो महालक्ष्मी महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर भी विवाद में फंस गईं. यह घटना महिलाओं के लिए चेतावनी है कि अंधविश्वास का शिकार होने पर नुकसान कितना बड़ा हो सकता है. इस तरह के बाबाओं के नाम चर्चा में रहते हैं. इन में स्वामी नित्यानंद भारत के सब से अमीर बाबाओं में से एक है. उन्होंने ‘कैलासा’ नामक अलग देश बनाने का दावा किया. जबकि, रेप के आरोपों के बाद वे भारत से भाग गए.

भगवा कपड़े पहनने वाले स्वामी चैतन्यानंद छात्राओं के साथ अश्लील हरकतों के आरोप में फरार हैं. कई मालाएं धारण करने वाले गुरमीत राम रहीम महिला शिष्यों के साथ यौनाचार के आरोप में 20 साल से जेल में हैं. आसाराम नाबालिग छात्रा से रेप के आरोप में उम्रकैद की सजा भुगत रहे हैं. संत रामपाल धार्मिक विवाद और हत्या के मामलों में गिरफ्तार हैं. भारत में अंधविश्वास और पाखंड का दायरा बहुत अधिक फैला हुआ है. ये सभी अपनी पोषाकों से ही जनता के बीच प्रभाव बढ़ाते हैं. साधुसंतों के पहनावे को लोग अच्छा मानते हैं और उन के जाल में फंस जाते हैं. सजाओं के बाद भी इन बाबाओं की औरत भक्तिनों में कमी नहीं हुई है.

जिस तरह से बाबाओं की ड्रैस प्रभाव डालती है और जनता उन के भ्रमजाल में फंस जाती है उसी तरह से पुलिस की यूनिफौर्म भी लूट का जरिया बन जाती है. आजकल डिजिटल अरेस्ट पुलिस की ड्रैस के प्रभाव में होती है, जिस के सहारे लोग लूट का जरिया बन जाते हैं. भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जरिए साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिन में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या कस्टम अधिकारी की यूनिफौर्म पहन कर वीडियोकौल के जरिए डराते हैं. वे नकली गिरफ्तारी वारंट दिखा कर पैसे ऐंठते हैं. इस को संगठित अपराध माना जाता है. 2026 में, दिल्ली में 23 करोड़ और लखनऊ में 1.5 करोड़ की ठगी के मामले सामने आए.

धोखाधडी करने वाले वीडियो कौल करते हैं. नकली पुलिस स्टेशन का सेटअप दिखाते हैं और ‘मनी लौन्डरिंग’ या ‘नशीली दवाओं’ के मामले में फंसाने की धमकी देते हैं. ये लोग बुजुर्गों और रिटायर लोगों को निशाना बनाते हैं. इस के अलावा अब पढ़ेलिखे पेशेवर भी इस का शिकार हो जा रहे हैं. नैशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार, 2024 (जनवरी-अगस्त) में 2,746 मामलों से बढ़ कर 2025 में यह संख्या 4,439 हो गई. इस ठगी की सब से बड़ी वजह यूनिफौर्म होती है, जिस को देख कर लोगों को लगता है कि सामने वाला पुलिस में ही होगा. वह इस झांसे में फंस जाता है.

भारत में कपड़ों को देख कर लोगों के चालचलन और आचरणव्यवहार को तय किया जाता है. इस कारण कभी पूजापाठ करने वालों के तो कभी पुलिस और सेना की ड्रैस पहन कर ठगी करने वाले ठग लेते हैं. नेता वैसे तो हमेशा लकदक कपड़े पहनता है. लोग उस के करीब जाने में डरते नहीं हैं. चुनावों में नेता सफेद कुरतापजामा पहन कर जनता का हितैषी बन जाता है. नेता वोट लेते समय कई बड़ेबड़े वादे करते हैं. चुनाव बीत जाने के बाद वादे भूल जाते हैं. इस के अलावा जिस तरह के गलत काम नेता करते हैं उस से यह साफ है कि वे अपनी सफेद ड्रैस का मिसयूज करते हैं. कांग्रेसी सफ़ेद टोपी पहना करते थे. भाजपाई भगवा कमल छाप दुपट्टे को हर अपराध करने कवच मानते हैं.

जहां लोग काम करते है वहां अचानक एक दिन कोई सेना और पुलिस की ड्रैस में आ जाए तो सब अजीब नजरों से उसे देखने लगते हैं जिस से वह मिलने आता है. उन को लगता है कि इस ने जरूर कुछ गलत किया होगा जिस की वजह से पुलिस वाला घर आया है. यह सारा डर उस की ड्रैस की वजह से है. जो भी आप पहनते हैं उस का असर आप से मिलने वाले पर पड़ता है. किसी बिकिनी पहने लड़की से मिलने वाले को भी लोग अजीब नजरों से देखते हैं. इसीलिए कहावत है कि ‘खाना अपनी पंसद का और पहनना दूसरे की पसंद का होना चाहिए.’

कैसा हो कार्यस्थल का ड्रैस कोड

कार्यस्थल या औफिस का ड्रैसकोड ऐसा हो कि जिस से किसी तरह का भेदभाव समझ न आए, जिस से कस्टमर और सप्लायर के बीच किसी तरह का असमंजस न हो. लड़कियों का मेकअप और ड्रैस प्रभावी दिखे लेकिन साधारण हो. इसी तरह से लड़कों की पैंटशर्ट होनी चाहिए. बाल और दाढ़ी करीने से कटे होने चाहिए. कई बार यह देखा जाता है कि जिन लड़कियों की नईनई शादी होती है वे उसी तरह से सजधज कर औफिस आ जाती हैं. उन के हाथों में सुहागचूड़ा दूर से ही लोगों को अपनी तरफ खींचता है.

कई औफिसों में अलगअलग तरह के पहनावे में लोग आ जाते हैं पर उन को भी धार्मिक पहचान से बचना चाहिए ताकि वहां आने वाला हर कोई सहज रूप से बात कर सके, उसे कोई हिचकिचाहट न हो. ड्रैस पहनने वाले का अंदाजा लग जाता है. इस से सामने वाले के देखने का नजरिया बदल जाता है. धर्म कभी भी लोगों को आजादी नहीं देता है. वह दुनिया को अपने रीतिरिवाज में ढाल कर रखना चाहता है. इस कारण उस की मंशा यह रहती है कि उस के अनुसार ही सब काम करें. धर्म की यह मंशा ही लोगों के बीच भेदभाव को बढ़ाने का काम करती है. लोग बंटे रहेंगे तो उन की ताकत भी बंटी रहेंगी. सो. लोग धर्म के मुहताज बने रहेंगे.

 

 

 

पश्चिम बंगाल चुनाव : भाजपा चुनाव जीत नहीं रही, कौन्कर कर रही है

West Bengal Election: पश्चिम बंगाल में चुनाव के नाम पर जो हुआ वह यह बताता है कि भारत का लोकतंत्र अब अपने आखिरी पायदान पर है. यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि लोकतंत्र में तो वोटर सरकार को चुनता है, पर जब कोई सरकार राज्यों के वोटर को चुनने लग जाए, वह खुद यह तय करने लग जाए कि कौन मत डालेगा और कौन नहीं, तो फिर कौन सा लोकतंत्र बचता है?

एक लड़का परीक्षा में नकल कर के प्रदेश में टौप कर गया. उस ने और उस के जानने वालों ने अखबारनवीसों से कहा, बहुत मेहनत की, सफलता पाने के लिए दिनरात एक कर दिए. पश्चिम बंगाल चुनाव में जो हुआ, वह कुछ ऐसा ही है. दिल्ली, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इसी तर्ज पर भाजपा ने चुनाव जीते. आगे भी इसी तरीके से चुनाव जीते जाएंगे. अनेकानेक तरीकों से वोट चोरी कर के धीरेधीरे क्षेत्रीय पार्टियों को नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा, विपक्ष को बलहीन कर संसद से बाहर खदेड़ दिया जाएगा और फिर बनेगा दक्षिणपंथी विचारधारा का एक चक्रवर्ती सम्राट और पूरे भारत में उस का एकछत्र राज.

ऋग्वेद, यजुर्वेद और बाद में रामायण व महाभारत में अश्वमेघ यज्ञ का वर्णन है. यह यज्ञ राजाओं द्वारा अपनी सार्वभौमिक सत्ता स्थापित कर चक्रवर्ती सम्राट बनने की मंशा से आयोजित किया जाता था. अश्वमेघ यज्ञ के लिए राजा एक सजा हुआ घोड़ा छोड़ता था, घोड़ा छलांगें लगाता एक राज्य से दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से दौड़ता था. घोड़े के पीछे राजा की सेना होती थी. जिनजिन राज्यों में घोड़े के कदम पड़ते थे वे राज्य राजा की अधीनता स्वीकार कर लेते थे. जो अधीनता स्वीकार नहीं करते थे उन से जंग होती थी और उन्हें जबरन राजा के अधीन किया जाता था. इस तरीके से राजसत्ता बढ़ा कर राजा यह दर्शाता था कि वह सब से शक्तिशाली है.

सालभर बाद घोड़ा वापस राजधानी लाया जाता था, तब वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ शुरू होता था. यज्ञ के बाद राजा को चक्रवर्ती सम्राट घोषित कर दिया जाता था. यह धार्मिक अनुष्ठान के लबादे के अंदर राजनीतिक शक्ति हासिल करने का तरीका था. इस यज्ञ में ब्राह्मणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जो राजनीति + धर्म का घालमेल कर विरोध के स्वर को कुचल कर एक ऐसे व्यक्ति को चक्रवर्ती घोषित करते थे जो जनता को धर्म के चाबुक से हांकता रहे.

अश्वमेघ यज्ञ का प्रचलन पौराणिक साहित्य में मिलता है, इतिहासकार उस की पुष्टि नहीं कर सकते. इस के अनुसार, राजा को जमीन और प्रजा का मालिक माना जाता था. वही सर्वशक्तिमान था. उस की तानाशाही लोगों पर चलती थी. अधिकांश देशों में आज जनता का राज यानी लोकतंत्र स्थापित है. इन देशों में जमीन का राजा कौन होगा, यह फैसला जनता करती है.

फिर आज यहां अचानक अश्वमेघ यज्ञ का जिक्र क्यों? दरअसल आजादी के बाद के सात दशकों में भारत एक बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका था, तभी 2014 में दक्षिणपंथी विचारधारा की मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई. कुछ समय तक तो लगा कि जनता की चुनी हुई सरकार जनता के लिए क़ाफीकुछ करने की इच्छा रखती है, मगर धीरेधीरे शासकों को चक्रवर्ती बनने की धुन सवार हुई.

ब्राह्मणों ने सोचा वैदिक काल को वापस लाने का यह सही समय है, लोगों से उन की अपेक्षाएं और सवाल छीन कर उन्हें धर्म की जंजीरों में जकड़ा जाए. लिहाजा, उन्होंने अपने करतब शुरू कर दिए.

अश्वमेघ यज्ञ की तैयारियां होने लगीं और घोड़ा दौड़ाया गया. कलियुग में या कहें कि मोदीयुग में इस घोड़े का नाम है- चुनाव आयोग. इस को दौड़ादौड़ा कर एकएक कर राज्य हथियाए जाने लगे. फर्क सिर्फ इतना है कि तब घोड़े के पीछे सेना चलती थी और आज चुनावी मशीनरी, प्रचारतंत्र, जांच एजेंसियां और संसाधनों की अपार शक्ति चलती दिखाई देती है. चक्रवर्ती बनने की लोलुपता में राजा ने तमाम सरकारी मशीनरी और चुनाव आयोग को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और धीरेधीरे 17 राज्यों पर अपना आधिपत्य जमा लिया.

मगर चक्रवर्ती बनने की राह में जो बड़ा रोड़ा था, वह था पश्चिम बंगाल, दुर्गा-काली का बंगाल, जहां की कमान 15 साल से एक महिला ममता बनर्जी के हाथ में थी. इस राज्य को फतह करने के लिए चुनाव आयोग ने जो किया उसे राजनीति के इतिहास में सब से काले अध्याय के रूप में देखा जाएगा. बंगाल में चुनाव के नाम पर जो हुआ वह यह बताता है कि भारत का लोकतंत्र अब अपने आखिरी पायदान पर है. यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि लोकतंत्र में तो वोटर सरकार को चुनता है, पर जब कोई सरकार राज्यों के वोटर को चुनने लग जाए, वह खुद यह तय करने लग जाए कि कौन मत डालेगा और कौन नहीं, तो फिर कौन सा लोकतंत्र बचता है?

पश्चिम बंगाल में स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन (एसआईआर) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए मोदी सरकार ने अपने लिए वोटर चुने. जो भाजपा को वोट नहीं डालते उन्हें वोटिंग लिस्ट से बाहर कर दिया गया. चुनाव से पहले एसआईआर के जरिए राज्य की मतदाता सूची से 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए. वोटर लिस्ट से नाम हटाने का काम मुसलिम मतदाताओं को निशाना बना कर किया गया क्योंकि मुसलिम मतदाताओं को ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का बेस वोटर माना जाता है. पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी मुसलिम मतदाता हैं जो 2011 से ममता बनर्जी का समर्थन करते रहे हैं.

इस के बाद अन्य राज्यों में जा बसे पश्चिम बंगाल के उन हजारों लोगों के नाम वोटर लिस्ट में फौर्म 6 के जरिए जोड़े गए जो भाजपा के पक्ष में वोट डालते हैं. अवैध तरीके से एकएक दिन में 30-30 हजार फौर्म जमा हुए. कई जिलों में एक ही दिन में हजारोंहजार आवेदन जमा होने की खबरें सामने आईं. अनेक आवेदनों में पते संदिग्ध थे, दस्तावेज अधूरे थे और बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम जोड़े गए थे जो वास्तव में राज्य में निवास ही नहीं करते थे. यह इसलिए किया गया क्योंकि वे भाजपा के संभावित समर्थक माने जा रहे थे.

यह मामला इतना गंभीर और राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो गया कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं. उन्होंने चुनाव आयोग की स्पैशल इंटैंसिव रिविजन (एसआईआर) प्रक्रिया को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए चुनौती दी. अदालत में उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रक्रिया के जरिए पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि संदिग्ध नाम जोड़े जा रहे हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की तरह व्यवहार करने के बजाय केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि यदि मतदाता सूची ही प्रभावित हो जाए तो चुनाव की निष्पक्षता का पूरा आधार समाप्त हो जाता है.

विपक्षी दलों ने इसे ‘लोकतंत्र की आत्मा पर हमला’ बताया. मगर आश्चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया. मोदी सरकार के आगे कोर्ट ने मुख्यमंत्री की एक न सुनी. कोर्ट ने कहा- “इस बार वोट नहीं डाल पाए, कोई बात नहीं, अगली बार वोट डाल देना.” मानो, वोटिंग कोई वैकल्पिक खेल हो.

इस तरह चुनाव आयोग और न्यायालय पर दबाव बनाता हुआ शासकों का यह सम्राट खुद को चक्रवर्ती बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों – प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में खुल कर किया गया. पश्चिम बंगाल में शारदा चिट फंड घोटाला, शिक्षक भरती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी का आरोप लगा कर तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेताओं और सरकारी अधिकारियों को परेशान किया गया. बहुतों को गिरफ्तार भी किया गया. पार्थ चटर्जी (पूर्व मंत्री), उन की करीबी अर्पिता मुखर्जी, अनुब्रत मंडल जैसे टीएमसी के प्रभावशाली नेता सीबीआई की हिट लिस्ट में रहे. जैसेजैसे चुनाव करीब आए, कार्रवाई और तेज हो गई. जो नेता डर कर भाजपा में शामिल हो गए उन के खिलाफ कार्रवाइयां समाप्त हो गईं.

तमाम हथकंडे अपना कर भाजपा ने अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी चुनाव ‘कौन्कर’ कर लिया है. अब कुछ समय तक मणिपुर की तरह बंगाल भी जल सकता है. डर और खौफ कायम करने के बाद धर्म का झंडा ऊंचा किया जाएगा. सब को उस के आगे नतमस्तक होना होगा. कोई सवाल नहीं करेगा. विकास की बात नहीं होगी. शिक्षा-रोजगार की बात नहीं होगी. न्याय और समानता की बात नहीं होगी. बस, धर्म और मंदिरमसजिद की बात होगी.

ऐसे हथकंडों से लड़ा गया चुनाव और उस के बाद तैयार किया जा रहा माहौल केवल सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम है. जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को विरोधी नहीं बल्कि शत्रु की तरह देखा जाए, तब लोकतांत्रिक संस्कृति धीरेधीरे भय और अधीनता की संस्कृति में बदल जाती है. तानाशाही का उदय होता है. जनता के भीतर यह संदेश बैठाना कि सत्ता अजेय है, संस्थाएं निष्प्रभावी हैं और प्रतिरोध व्यर्थ है. लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में चल रही दक्षिणपंथी चाल को यदि अब भी समझ जाएं तो लोकतंत्र को बचाया जा सकता है.

इतिहास गवाह है कि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव परिणामों से नहीं, बल्कि चुनाव के बाद के वातावरण से होती है. क्या नागरिक बिना डर के अपनी बात कह सकते हैं, क्या विपक्ष सुरक्षित है, क्या कानून सब पर समान रूप से लागू है और क्या राज्य जनता के अधिकारों की रक्षा कर रहा है? लोकतंत्र में ये बातें महत्त्वपूर्ण हैं. लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि इस भरोसे से चलता है कि चुनाव निष्पक्ष होंगे, संस्थाएं स्वतंत्र होंगी और सत्ता बदलने का रास्ता खुला रहेगा.

जब मैदान बराबरी का न रहे, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां, मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाएं सत्ता के पक्ष में झुक जाएं और जनता से अपना मुखिया चुनने का अधिकार छीन लिया जाए तो ‘लोकतंत्र‘ कपोल-कथा से ज्यादा कुछ नहीं. इसे चुनाव जीतना नहीं बल्कि चुनाव कौन्कर करना कहते हैं, जो भाजपा ने किया और आगे अब वह उन राज्यों में करेगी जहां अन्य राजनीतिक पार्टियों की सरकारें हैं. West Bengal Election

आप के पत्र व अनुभव – पाखंडवाद की पोल

Religion Vs Science: आज चीन जैसा देश चांद पर जीवन जीने की तकनीक विकसित कर रहा है. वह बगैर सपोर्ट वाले कांच के पारदर्शी मजबूत व टिकाऊ पुल धड़ल्ले से बना रहा है. रूस, अमेरिका जैसे देश फाइटर जेट विमान व हवा से हवा में मार करने वाली सुपरसोनिक मिसाइल बना कर दूसरे देशों पर हुकूमत करने की जुगत लगा रहे हैं.

सीमित आबादी वाले एवं शांतिप्रिय देश जापान में लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए परिवहन वाहनों का अधिक प्रयोग करने के बजाय पैदल चलने पर अधिक जोर व प्रोत्साहन दिया जा रहा है.

इस सब के उलट, हमारे देश में घर पर बैठेबैठे ही धर्म के ठेकेदारों द्वारा रचित कपोलकल्पित कहानियां सुनसुना कर, पढ़पढ़ा कर स्वस्थ व निरोगी रहने की घुट्टी पिलाई जाती है. पौराणिक कथाओं के श्रवण या अनुसरण बनाम अनुकरण से किसी का भला हो या न हो लेकिन मुफ्त की रबड़ीमलाई खाने के आदी हो चुके कुछ विशेष महानुभावों की तिजोरी जरूर भर जाती है.

पिछले कुछ दिनों से ‘सरिता’ के सभी अंक लाजवाब व शानदार अंदाज में पाठकों के समक्ष उत्कृष्ट व सौ प्रतिशत पढ़ने योग्य साहित्य के साथ पेश किए जा रहे हैं. लेखक – विमल वर्मा

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पुस्तकों में रह गए आदर्श

आज अनगिनत युवक व युवतियां विदेशों में बस जाने को विवश हैं. शिक्षित युवा वर्ग भी उज्ज्वल भविष्य की तलाश में विदेशों की ओर भागते हैं. मातापिता दिल पर पत्थर रख कर उन्हें भेज देते हैं. समाज में उन का मानसम्मान बढ़ जाता है कि उन के बेटेबेटियां विदेशों में ऊंची नौकरियां कर रहे हैं. अनेक सुनहरे सपने ले कर ये देसी विदेश पहुंचते हैं और तब उन का सामना वास्तविकता से होता है. अनेक प्रश्न उन के मन को परेशान करने लगते हैं- इतने डौलर, पौंड आदि में किस प्रकार रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था करें.

देसी युवकों को आसानी से घर ही नहीं मिलता क्योंकि हमारे भोजन की महक विदेशियों को पसंद नहीं या उन्हें ऐसा भी लगता है कि ये सफाई से नहीं रहते. भारत देश जैसी सस्ती बाई की सुविधा तो वहां होती ही नहीं. सब काम अपनेआप करने पड़ते हैं. धीरेधीरे शारीरिक समस्याएं व मानसिक तनाव पैदा होने लगते हैं.

अब आती है नौकरी की बारी. काम तो मिल गया था तभी तो विदेश गए थे पर वहां भी कालेगोरे की समस्या. ट्रंप जैसे राष्ट्रपति तो खुलेआम कहते हैं कि अमेरिका अमेरिकनों का है. सो, मुंह बंद कर के सैकंड क्लास सिटिजन के समान रहिए. आप खुशी महसूस कीजिए कि आप को विदेश में नौकरी मिल गई. मुंह बंद कर के, गरदन  झुका कर रहिए.

इधर भारत में मातापिता अब वृद्ध हो गए जिन्होंने गर्व से बच्चों को विदेश भेजा था. उन को पूछने वाला कौन है? जब अपने बेटे और बेटियों के पास समय नहीं तब रिश्तेदार भी क्या करें? विदेशों से थोड़ाबहुत पैसा आ जाता है, बस इतना ही संबंध रह गया. अब तो ऊंचेऊंचे आदर्श पुस्तकों में रह गए. अपने बलबूते जीवन बिताइए.

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महिला आरक्षण ढोल की पोल

Women Reservation Bill India: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की विधानसभाओं के चुनावों में प्रचार के लिए मुद्दा पैदा करने के लिए भाजपा ने जो बवंडर खड़ा किया उस के पीछे ‘बड़ेसाब’ तो आरएसएस ही था जो सवर्ण महिलाओं को ले कर दिक्कत में था कि इन का क्या करें, ये तो मंदिरों में भजनपूजन और कलश यात्राओं में ही अच्छी लगती हैं. अगर ये संसद में बड़े पैमाने पर आ गईं तो हिंदू राष्ट्र और ब्राह्मण राज का सपना ध्वस्त हो जाएगा. महिला आरक्षण बिल इसी मकसद से एक साजिश के तहत लाया और फिर गिरवाया गया.

महिला आरक्षण पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में जो बिल लाया गया और जो दोतिहाई बहुमत न पाने के कारण गिर गया, असल में वह एक ढोल पीटना ही था. सरकार की मंशा महिलाओं को न नौकरियों में आरक्षण देने की थी, न समाज में और न ही न्यायपालिका या कार्यपालिका में. यह ढोल केवल संसद और विधानसभाओं में बजाने के लिए था. इस में पोल ही पोल है.

बीती 16 और 17 अप्रैल को महिला आरक्षण बिल के नाम पर संसद में चर्चा और बहस के नाम पर जो प्रायोजित शोबाजी व ड्रामेबाजी जानबूझ कर की गई उस से पहले सरकार अगर कुछ सांसदों का प्रतिनिधि मंडल या अध्ययन मंडल एक बहुत छोटे से नार्डिक देश स्वीडन भेज देती तो शायद ही नहीं, बल्कि तय है कि सब से पहले उस का ध्यान इस तरफ ही जाता कि वहां की संसद में महिलाओं के लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं है. इस के बाद भी आधी से जरा ही कम यानी 46 फीसदी महिलाएं संसद में हैं.

स्वीडन की संसद रिक्सडाग में कुल 349 सीटें हैं जिन में से महिला सांसदों की संख्या 157 है. इस आंकड़े में हैरान कर देने वाली 2 प्रमुख बातों में से पहली यह है कि स्वीडन में महिलाओं को अलग से कोई कानूनी, लैंगिक या जातिगत आरक्षण नहीं मिला हुआ है और दूसरी यह है कि यह आंकड़ा पूरी दुनिया के औसत से लगभग 27 फीसदी ज्यादा है और भारत से तो 30 फीसदी ज्यादा है.

हमारी संसद में बहस के दौरान और सदन के बाहर भी सत्तारूढ़ और विपक्षी दल दोनों ही एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे कि चूंकि तुम महिलाविरोधी हो इसलिए बिल पारित नहीं होने दे रहे. खासतौर से भाजपा तो 17 अप्रैल की वोटिंग के बाद बेहद तिलमिलाई और बौखलाई हुई थी (यह भी पूर्वनियोजित था). उस की महिला सांसद संसद परिसर में हाथ में तख्तियां और मुंह में हायहाय के नारे लगा रही थीं कि ‘महिला शक्ति का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’.

विपक्षी दलों के अड़ जाने और वर्तमान संख्या में महिलाओं को आरक्षण देने की मांग संसद द्वारा ठुकरा दिए जाने पर नरेंद्र मोदी 19 अप्रैल की रात न्यूज चैनल्स पर प्रकट हो गए. उन्होंने यथासंभव दयनीय चेहरा बना कर जो संबोधन राष्ट्र के नाम दिया वह भाजपा प्रचार ज्यादा था. उस का एक पार्ट दुर्वासा ऋषि सरीखा था जो बातबात में श्राप देने को कुख्यात थे.

मोदी ने सब से पहले तो देशभर की महिलाओं से माफी मांगते कहा, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन नहीं हो पाया, इस के लिए मैं देश की माताओंबहनों से क्षमा प्रार्थी हूं.’ वर्ष 2014 से 2026 तक इस तरह का संशोधन न लाने के लिए दोषी कौन है, यह बात वे छिपा गए.

यह कूटनीति है कि दूसरे को गलत ठहराने के लिए उस के सही कदम पर माफी मांग लो ताकि दरअसल खुद की की गई गलती छिप जाए. यहां मानसिक डर भी था कि असल गलती तो खुद भाजपा ने इस संबंध में वर्ष 2023 में बिल में बदलाव कर सदन में पेश करने की की थी. वह बिल कानून की शक्ल में साल 2023 में ही विपक्षी दलों की सहमति से पारित हो गया था. वह लागू नहीं हो पाया था क्योंकि उस बिल में शर्त यह थी कि आरक्षण 2026 में होने वाली नई जनगणना और उस के बाद होने वाले लोकसभा व विधानसभाओं के क्षेत्रों के परिसीमन के बाद होगा. इस बाबत इस बार संविधान (131वां संशोधन) परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 भी पेश किए गए थे.

बकौल मोदी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम व तृणमूल कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने मिल कर सदन में इस अधिनियम की भ्रूण हत्या कर दी. दुर्वासा स्टाइल में उन्होंने कहा, ‘जो पाप किया है, जनता द्वारा उस की सजा से वे बच नहीं पाएंगे.’

कहना तो कायदे से उन्हें यह चाहिए था कि आदर्श भारतीय नारी तो अपना अपमान करने वालों को भी माफ कर देती है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह को बेहतर मालूम था कि उन के पास दोतिहाई बहुमत नहीं है, फिर भी लोकसभा अध्यक्ष पर दबाव डाल कर उन्होंने यह विशेष सत्र बुलाया. उस का मकसद महिला आरक्षण विधेयक को पीठ पर लाद कर दरअसल परिसीमन विधेयक पारित कराना था. जब विपक्ष ने यह मंशा पूरी नहीं होने दी तो उसे विलेन साबित करने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन इस बार सबकुछ पहले जैसा नहीं था. केवल मुट्ठीभर भाजपा कार्यकर्ता ही मुख्य सड़कों पर उतरे. सोशल मीडिया पर जो तुक की पोस्टें वायरल हुई थीं उन में प्रमुख यह थी कि अगर 307 सांसद और बढ़ जाते तो उन के भारीभरकम वेतन और भत्तों सहित पैंशन का भार तो उस जनता के सिर पर ही पड़ता जिस की कमर पहले ही से महंगाई की मार से टूटी हुई है. दूसरे, अगर महिला आरक्षण इतना ही जरूरी है तो पहले मौजूदा 543 सीटों में ही दे दिया जाए जिस का विरोध विपक्ष नहीं कर रहा था. राजनीति में दिलचस्पी न रखने वालों ने भी कहा कि यह तो भाजपाई ट्रिक थी जिस ने इस मुद्दे को लंबे समय तक के लिए दफना दिया है.

दक्षिणपूर्व की हताशा

क्यों यह अधिनियम पारित नहीं हो पाया, इस से पहले यह सम?ाना मौजूं है कि बिल लाने के लिए सरकार ने यही वक्त क्यों चुना? जवाब बहुत आसान और सरल है कि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों को ले कर भाजपा बहुत घबराई हुई थी क्योंकि इन राज्यों, खासतौर से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल, में उस के पास हमेशा की तरह वोट मांगने के लिए मुद्दों का टोटा था. असल में यह कदम भाजपा का शुद्ध चुनावी टोटका था जिस के तहत मंशा विपक्ष को महिलाविरोधी प्रचारित कर वोटरों से वोट झटकने की थी.

यह पहले से ही मालूम था कि चूंकि यह संविधान संशोधन बिल था इसलिए इसे पारित कराने के लिए एनडीए सरकार को दोनों सदनों में जरूरी दोतिहाई यानी लोकसभा में 352 और राज्यसभा में 164 वोट चाहिए थे लेकिन लोकसभा में उस के अपने महज 240 थे. बाकी के लिए उसे जनता दल यूनाइटेड और चंद्रबाबू नायडू पर निर्भर रहना था. दूसरा पेंच, इस से जुड़े परिसीमन बिल का था जिस के तहत भाजपा लोकसभा सीटों की संख्या 2011 की जनगणना के आधार पर 543 से बढ़ा कर 850 कर देना चाह रही थी.

तीसरा पेंच, ओबीसी के आरक्षण का था जिस पर कांग्रेस सहित सपा और आरजेडी खासतौर से एतराज उठा रहे थे. ये तीनों चाहते थे कि महिलाओं के साथसाथ ओबीसी को भी आरक्षण मिले, कम से कम ओबीसी महिलाओं को तो मिले. संसद में बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह की एक चालाकी उजागर भी हुई थी जब परिसीमन पर विपक्ष भारी पड़ने लगा तो वे बोले, ‘मुझे एक घंटा दीजिए, मैं संशोधित विधेयक ले कर लौटूंगा जो सीटों में 50 फीसदी वृद्धि की गारंटी देगा.’

सोशल मीडिया एक्स पर नायिनी अनुराग रेड्डी ने शाह के इस कथन को निशाने पर लेते लिखा, ‘एक घंटा, बस, इतना ही समय लगता है दक्षिण भारत की रक्षा करने के लिए, तो फिर यह पहले ही क्यों नहीं किया गया? यह मूल मसौदे में क्यों नहीं था? इस विधेयक की समीक्षा किस ने की? इसे मंजूरी किस ने व कब दी? वे किस का इंतजार कर रहे थे विपक्ष की चुप्पी का या विपक्ष के आत्मसमर्पण नहीं करने का?’ इस पोस्ट का सार यह है कि विपक्ष ने सवाल उठाया तो संसद को सुनना पड़ा.

यह एजेंडा भी दरअसल आरएसएस का दिया हुआ है जो खालिस धर्म, हिंदुत्व और इन में भी ब्राह्मणपूजक राजनीति, समानता और समरसता के नाम पर करता है. उस की यह नीति दक्षिण में नहीं, उत्तर भारत में चलती है.

यह ब्राह्मणवादी संगठन अपने जन्म से ही महिला विरोधी रहा है. दूसरे, तमाम धर्मों की तरह सनातन धर्म भी महिलाओं को दोयम दर्जे का मानता है. इस बिल को संसद में ला कर फेल करवाने की चाल भी आरएसएस की ही थी क्योंकि दलितों के बाद खासतौर से सवर्ण महिलाएं उस के गले की फांस और हड्डी बनी जा रही थीं जिन का दबाव और अपेक्षाएं संघ से बढ़ रहे थे.

इन से छुटकारा पाने का घोषित और संवैधानिक तरीका वही था जो 18 अप्रैल को संसद में देखा गया. आरएसएस सहित भाजपा और दूसरे हिंदूवादी दल व संगठन कैसे महिला विरोधी हैं, इसे आरएसएस के महिला संबंधी विचारों से सम?ा जा सकता है. यह भाजपा की मूलनीति से जुड़ा मसला है.

आरएसएस का एजेंडा आरएसएस का शताब्दी वर्ष

2 अक्तूबर, 2025 को समारोहपूर्वक नागपुर के रेशमबाग मैदान में मनाया गया था. अव्वल तो न्यूज रीडर की तरह लिखालिखाया जो भाषण संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिया वह उन के कई मौकों पर दिए गए भाषणों का संकलन ही था पर आरएसएस की 100 वर्षीय मंशा उन्होंने यह कहते स्पष्ट कर दी कि विविधता और हमारी संस्कृति का पूर्ण स्वीकार और सम्मान जो हम सभी को एक सूत्र में बांधता है वह राष्ट्रवाद है. यह हमारे लिए हिंदू राष्ट्रवाद है. हिंदवी, भारतीय और आर्य सभी हिंदू के पर्यायवाची हैं.

100 साल के अपने विवादित सफर में संघ ने जिन मुद्दों पर जानबू?ा कर तटस्थता ओढ़े रखी है, स्त्री विमर्श यानी महिलाओं की भूमिका उन में से एक है. उस दिन अपने भाषण में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दुनियाभर की बातें कीं लेकिन महिलाओं पर चुप्पी साधे रख जता दिया कि कुछ मामूली बदलावों और हलके से लचीलेपन के साथ हिंदुओं का यह संगठन अपने पौराणिक हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर अडिग है जिस में अहल्या, द्रौपदी, सीता सदा ही पीडि़त रही हैं लेकिन सभी को पूजा जाता है, देवी सा माना जाता है. संदेश यह है कि पत्थर बनो, जुए में हारो, कठिन परीक्षा दो.

पिछले साल 2024 के भाषण में तो मोहन भागवत ने भाजपा की 2 दिग्गज नेत्रियों विजयाराजे सिंधिया और सुषमा स्वराज के योगदान का तो उल्लेख कर दिया था लेकिन इसी कैटेगरी की दिग्गज कांग्रेसी इंदिरा गांधी का नाम नहीं लिया. उन्होंने या उन के पूर्वजों ने कभी फातिमा शेख या सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाओं का भी जिक्र नहीं किया जिन्होंने महिला शिक्षा को एक मिशन की शक्ल दी थी.

आरएसएस ने कभी दिल से महिला आरक्षण की हिमायत नहीं की क्योंकि यह उस के एजेंडे में ही नहीं है कि महिलाओं को सत्ता में संवैधानिक भागीदारी दी जाए. इसलिए उस ने बड़ी मासूमियत से भाजपा के जरिए यह बिल ऐसे वक्त में पेश करवाया जिस में उस का गिर जाना गारंटीड था. अगर वाकई में वह इस मुद्दे पर गंभीर होता तो इसे नरेंद्र मोदी के पहले या दूसरे कार्यकाल में पारित करवा सकता था. मंशा तो इस मुद्दे की भ्रूण हत्या करना नहीं बल्कि गर्भाशय ही निकलवा देने की थी जिस में वह कामयाब भी रहा.

यह सवाल मौजूं है और दिलचस्प भी कम नहीं कि कोई भी क्यों औरतों पर संघ का स्पष्ट रुख चाहता है. इस के लिए संघ की स्थापना से ले कर आज तक के माहौल पर गौर करें तो यह एक सामाजिक दबाव संघ पर है जिस की वजह फैमिनिस्ट या वामपंथी या कोई और नहीं बल्कि खुद सवर्ण महिलाएं हैं जो अब शिक्षा पा कर और कांग्रेसी युग के कानूनों के सहारे परिवार और समाज में अपनी मौजूदगी व दखल साबित कर चुकी हैं. जाहिर है इस कामयाबी में किसी संघ या हिंदूवादी संगठन का कोई योगदान नहीं रहा है बल्कि यह खुद शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होती इन महिलाओं की धार्मिक घुटन और रूढि़यों से उबरने की कोशिशों का नतीजा है कि लोग संघ से उन की बाबत

सवाल करें.

साल 1925 में जब आरएसएस का गठन हुआ था तब उस में ब्राह्मण पुरुषों का दबदबा था और आज भी है. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब कुछ गैरब्राह्मण वैश्य और मामूली तादाद में गैरसवर्ण मसलन दलित, ओबीसी जातियों वाले पुरुष भी इस से जुड़ गए हैं. 100 साल की इस इकलौती उपलब्धि में महिलाएं कहीं नहीं हैं.

पौराणिक इमेज पर जोर

नागपुर के 2 अक्तूबर के अहम जश्न और जलसे में भी महिलाएं कहीं नहीं थीं. 21,000 चुनिंदा स्वयंसेवकों में किसी महिला का न होना महिलाओं से ताल्लुक रखते हर उस सवाल का जवाब है जो आरएसएस से अकसर मांगा जाता है. हिंदू राष्ट्र की विचारधारा या केंद्रीय विचार में महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की ही है. यह हकीकत 1925 से ले कर हर कभी उजागर होती भी रही है. गुरुजी के नाम से मशहूर आरएसएस के दूसरे सरसंघसंचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने अंगरेजी में लिखी गई अपनी किताब ‘द बंच औफ थौट्स’ में यह स्पष्ट किया भी है.

आरएसएस इस किताब को अपनी श्रीम्दभगवदगीता और रामचरितमानस से कम नहीं मानता जिस का हिंदी अनुवाद ‘विचार नवनीत’ शीर्षक से हुआ है. गोलवलकर महिलाओं को रीढ़ की हड्डी तो कहते हैं लेकिन कई शर्तें भी महिलाओं पर थोपते हैं. मसलन :

द्य महिलाओं का शिक्षित होना अनिवार्य है लेकिन यह शिक्षा राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए न कि पश्चिमी प्रभाव वाली होनी चाहिए.

द्य वे महिलाओं को देवी करार देते उन की शक्ति को आध्यात्मिक रूप से जोड़ते हैं. यह चेतावनी देना वे नहीं भूलते कि आधुनिक पश्चिमी प्रभाव महिलाओं की पारंपरिक भूमिका को कमजोर कर सकता है. इसलिए उस का सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव होना जरूरी है. राष्ट्रीय जीवन में स्त्रियों की भूमिका को स्पष्ट करते यानी समेटते हुए सार रूप में कहा गया है कि हमारी भूमि की स्त्रियां हमारे समाज की मुख्य आधारशिला रही हैं. वे त्याग, सेवा और निस्वार्थ भावना की प्रतीक हैं. राष्ट्र की उन्नति के लिए पुरुष को जन्म देना, उन का पालनपोषण करना और उन्हें राष्ट्रभक्ति का संस्कार देना आदि सब स्त्री की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं.

द्य एक और जगह बड़ी भावुक सी बात यह कही गई है जिसे रोजरोज दोहराया जाता है कि हमारी संस्कृति में स्त्री को देवी का स्थान प्राप्त है. दुर्गा, लक्ष्मी, सीता और सावित्री उस के आदर्श हैं. दहेज प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियां समाज को कमजोर करती हैं, इन्हें त्यागना होगा. स्त्री को सभी हिंदुओं की माता मान कर समान अवसर प्रदान किए जाएं ताकि वह जातपांत के भेदभाव से उठ कर ‘राष्ट्र एकता’ की प्रतीक बने.

कहनेसुनने में यह बात बड़ी जज्बाती और आकर्षक लगती है लेकिन यह ठीक वैसी ही है जैसी यह कह देना कि छुआछूत बुरी बात है, दलित भी हमारे भाई हैं, उन्हें प्रताडि़त नहीं किया जाना चाहिए वगैरहवगैरह और फिर दलित घर में आ जाए तो उस के लिए जाने के बाद गोमूत्र या गंगाजल से घर को धुलवाना.

मौजूदा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तो कई बार एक घाट और एक श्मशान का राग आलाप चुके हैं लेकिन ऐसे प्रवचननुमा विचारों से बदलता कुछ नहीं है, उलटे, दबंगों को याद जरूर आ जाता है कि अरे, इन छोटी जाति वाले का तो श्मशान भी अलग होता है और पनघट भी. इन्हें तो हमारी बराबरी का हक ही नहीं. आरएसएस ने सत्ता तो पा ली लेकिन गांवों में एक घाट, एक श्मशान, एक ही मंदिर का इंतजाम वह नहीं कर पाया.

औरत होने के मायने

यही महिलाओं के मामले में होता है कि उन्हें मीठीमीठी बातों के जाल में उलझ कर सिर्फ यह एहसास कराया जाता है कि चूंकि तुम देवी हो इसलिए तुम्हारा धर्म अपने देवो यानी पुरुषों को खुश रखना और बच्चे पैदा करनी है और उन की परवरिश इस तरह करना है कि वे भी कट्टर हिंदू ही बनें.

18 अप्रैल को महिलाओं का सत्ता में भागीदारी का जो सपना टूटा वह हमेशा ही सपना था, असलियत तो वह होनी ही नहीं थी. अकेली महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराने के लिए अमित शाह 15-20 दिन कोलकाता में रहे, चुनाव आयोग ने हर रोज नियम बदले, कितने ही मुकदमे हुए, कितनों को ही गिरफ्तार किया गया.

इस विकट के दोहरेपन और विरोधाभास को कम ही लोग सम?ा पाते हैं क्योंकि आरएसएस का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिस बुनियाद पर खड़ा है वह मनुस्मृति है जिस की नींव में गीता और रामायण आदि जैसे धर्मग्रंथ हैं जो हर तरह से स्त्रीविरोधी हैं. ‘विचार नवनीत’ में कैसे महिलाओं को उड़ने की कहनेभर की आजादी देने के बाद किस तरह की हिदायतों से उन के पर कुतरे गए हैं, ‘विचार नवनीत’ में ही देखिए :

द्य  आज की कुछ स्त्रियां पाश्चात्य सभ्यता के चकाचौंधपूर्ण आकर्षण में उल?ा कर अपनी मूल शक्ति और सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो रही हैं. यह भटकाव न केवल उन्हें बल्कि पूरे राष्ट्र को कमजोर कर रहा है. स्त्री को अपनी दुर्गा शक्ति को फिर से जागृत करना होगा, न कि विदेशी मौडल का अनुकरण करना.

द्य कुछ आधुनिक प्रवर्तियां स्त्रियों को घरपरिवार की पवित्र जिम्मेदारियों से अलग कर रही हैं जिस से समाज की नींव हिल रही है. यह न तो समाज के हित में है और न राष्ट्र के. हमें अपने परंपरागत आदर्शों की तरफ लौटना होगा जहां स्त्री सेवा और त्याग की प्रतीक बने.

इस के बाद कुछ कहनेसुनने की जरूरत नहीं रह जाती कि दरअसल आरएसएस हिंदू सवर्ण महिला से यही अपेक्षाएं रखता है कि वे दासी बनी रहें, बच्चे पैदा करती रहें, मर्दों की चाकरी और यौन इच्छाएं पूरी करती रहें. अपने अधिकारों के बाबत वे मुंह न खोलें, सिर्फ अपने कर्तव्य देखें जिन्हें मनुस्मृति में जोर दे कर कहा गया है. यानी, सीधेसीधे महिलाओं को इस बाबत मजबूर किया जाता रहा है कि वे पौराणिक किस्सेकहानियों के मुताबिक जिएं. उसे महिलाएं दफ्तरों या संसद में नहीं बल्कि कलश यात्राओं में ज्यादा अच्छी व आकर्षक लगती हैं. महिलाओं का उद्धार या कल्याण संसद में बहस करने से नहीं बल्कि मंदिरों में भजनकीर्तनों पर ?ामने से होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि बीच में 1950 में हिंदू मैरिज एक्ट 1956 में हिंदू सक्सेशन एक्ट वगैरह आ गए जिन्होंने इन बंधनों और बेडि़यों से औरतों को आजादी दिलाने के लिए बराबरी के हक दे दिए. वे जब कानून बने थे तो आरएसएस सहित सारे हिंदूवादी तिलमिला उठे थे जो आज तक जारी है. ऐसा दोबारा न हो, इस के लिए आरएसएस ने अभी से फील्ंिडग करनी शुरू कर दी है, मसलन लिवइन रिलेशनशिप को निशाने पर लेते मोहन भागवत ने अपने नेक खयाल पेश करते हुए कोलकाता में 20 दिसंबर को कहा, ‘लिवइन रिलेशनशिप जिम्मेदारी लेने की अनिच्छा दर्शाते हैं. आप जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं, यह सही नहीं है.’

यह सीधीसीधी अभिजात्य धौंस है कि सही क्या है, यह संघ बताएगा, समाज या कानून इस का फैसला न करें क्योंकि सब से ऊपर अब आरएसएस है. लिवइन से महिलाओं को कई ?ां?ाटों से छुटकारा मिला है. वे इस रिश्ते में खूंटे से बंधी गाय नहीं रह जातीं जिस का काम सुबहशाम दूध देना और एक के बाद एक बछड़े जन्म कर गौवंश को आगे बढ़ाना रहता है. यह महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मसला है, इसलिए संघ को अखर रहा है. संघ दरअसल महिलाओं को आजाद नहीं करना चाहता है.

इतना ही नहीं, मोहन भागवत ने कोलकाता में ही मीठे शब्दों में यह इशारा भी कर दिया कि महिला की 19 से 25 साल की उम्र के बीच शादी हो जाए और 3 बच्चे हों तो मातापिता का स्वास्थ्य अच्छा रहता है. अपनी इस बात के फायदे गिनाते उन्होंने अति यह कहते कर डाली कि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लोगों को अहंकार को नियंत्रित करना सीखने में मदद मिलती है.

संघियों में सपाट बयानी के लिए जाने और प्रचारित होते रहने वाले मोहन भागवत बड़ी मासूमियत से एक तीर से दर्जनभर निशाने लगा गए, मसलन यह कि शादी जल्दी होगी तो बच्चे भी ज्यादा और जल्द होंगे जिस से हिंदू राष्ट्र भी जल्द बन जाएगा. पेरैंट्स को बेहतर सेहत का औफर या ?ांसा भी उन्होंने दिया. अब यह तो वही जानें कि ज्यादा बच्चे होने से अहंकार दूर होने की बात कौन से लोक के मनोवैज्ञानिक करते हैं लेकिन अगर ऐसा हुआ तो सारा भार महिलाओं को ही उठाना पड़ेगा, उन की सेहत भी दांव पर लग जाएगी और कैरियर भी शुरू होने से पहले खत्म हो जाएगा. और यही, आरएसएस की मंशा भी है. क्या इस तरह नियंत्रित करने वाली महिलाओं को भाजपा वास्तव में संसद व विधानसभाओं में आरक्षण देना चाहती है?

असल मकसद पौराणिक युग

2 अक्तूबर को एक बार फिर मोहन भागवत ने हिंदू राष्ट्र का अपना सनातनी संकल्प नागपुर से दोहराया, साथ ही, विश्वगुरु बन जाने की बात भी कही. इस में सभी वर्गों और जातियों के सहयोग की अपेक्षा भी उन्होंने की. यह अपेक्षा, दरअसल, धौंस थी जिस से दलित, आदिवासी और महिलाएं आरएसएस की अधीनता स्वीकार लें.

उन दिनों में एक नया विवाद आई लव मोहम्मद बनाम आई लव महादेव शबाब पर था जिसे ले कर सवर्ण हिंदू आक्रोशित और उत्तेजित थे. यह सब जानबूझ कर पैदा किया गया था जिसे हर किसी ने समझ भी कि विवाद बेसरपैर का है लेकिन आरएसएस अपने मकसद में कामयाब रहा था कि अगर धर्म का राज्य चाहिए तो समयसमय पर ऐसे टोटके छोड़े जाने जरूरी हैं.

यह सब इसलिए भी कि कोई यह सवाल न करने लगे कि घोषित तौर पर संघ को यह राग आलापते 100 साल हो गए लेकिन हिंदू राष्ट्र के कहीं अतेपते नहीं हैं और इन 100 सालों में उस ने हिंदुओं के लिए किया क्या है. यही माहौल आरएसएस चाहता है कि हिंदू और हिंदुत्व के नाम पर बस, इसी तरह के सवाल उठते रहें, कोई भी तुक की बात न करे. बात हो तो सिर्फ मंदिरों और दानदक्षिणा की, पंडेपुजारियों की जिन की रोजीरोटी का जिम्मा संघ ने उठा रखा है. बात हो तो ब्राह्मण राज की जिस के लिए क्याक्या जतन नहीं किए जा रहे.

इस बाबत मोहन भागवत ने कुंभ का जिक्र करते हुए कहा, ‘हमारे सामने पुरानी व नई चुनौतियां उपस्थित हैं. उन को अधिक स्पष्ट करने वाला भी वही कालावधि है जैसे प्रयागराज में एक विशाल महाकुंभ हुआ. आधुनिक व्यवस्थापन के सारे कीर्तिमान तोड़ कर एक जागृति उपक्रम तो उस ने प्रस्थापित किया ही, साथ ही संपूर्ण भारत में श्रद्धा व एकात्मकता की लहर भी उस ने दौड़ा दी.’

लेकिन यह यानी धार्मिक आयोजनों का गुणगान एक बहुत बड़ा खतरा उस धर्मनिरपेक्ष देश और संविधान के लिए है जिस का विरोध आरएसएस शुरू से करता रहा है कि संविधान पाश्चात्य मौडल पर आधारित है, इसे मनुस्मृति आधारित होना चाहिए.

साल 1939 में ही गोलवलकर ने आरएसएस की मंशा बहुत कम शब्दों में साफ कर दी थी कि भारत में जो भी रहेगा उसे हिंदू संस्कृति के मुताबिक जीना होगा. यही मोहन भागवत आज भी दोहरा रहे हैं. यानी, विविधता के लिए देश में कोई जगह नहीं. मुसलमानों को निशाने पर लेते उन्होंने कहा, ‘छोटीबड़ी बातों पर यह केवल मन में संदेह है, इसलिए कानून हाथ में ले कर रास्तों पर निकल आना, गुंडागर्दी व हिंसा करना यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है. मन में प्रतिक्रिया रख कर या किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करना जैसी घटनाओं को योजनापूर्वक करवाया जाता है.’

यही अब संघ कह रहा है कि हजारों सालों से हिंदू परंपरा पर आधारित भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है जिस पर संघ, भाजपा को ढाल बना कर शासन करेगा.

मोहरा बनी महिलाएं

महिलाएं संघ के आयोजनों में होती हैं पर वे जुलूसों के संचालन करने वालों पर फूल बरसाती, कलश यात्राओं में सिर पर कलश ढोते होती हैं. ये सवर्ण महिलाएं हमेशा की तरह भूल गई थीं कि यह उन की भूमिका और योगदान पर पौराणिक हमला है जो यह बताता है कि उन का अपना कोई वजूद नहीं है, उन का वजूद घर के उन मर्दों से ही है जिन का खुद का वजूद आरएसएस बन गया है.

इसी मानसिकता के चलते महिलाओं ने आरक्षण बिल को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उन्हें मर्दों के राज में इस के पारित होने का भरोसा ही नहीं था और कभी पास भी हो गया तो ताकत उन के नहीं, बल्कि पुरुषों के हाथ ही आएगी. जिस तरह सरपंच पति और सरपंच पार्षद इफरात से पाए जाते हैं उसी तरह सांसद पति और विधायक पति भी होने लगेंगे. यानी, महिलाओं को पुरुषों के इशारे पर नाचने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उन का कोई स्वतंत्र अस्तित्व समाज व समाज पर हुकूमत करने वाले धर्म में नहीं है.

तब तिलमिला उठे थे

आज जो भगवा गैंग एकजुट हो कर महिला आरक्षण बिल पर हायहाय कर रहा है उस का असल चेहरा बेहद कुटिल और वीभत्स है. देश आजाद होने के बाद जब संविधान बना तो उस का विरोध इन्हीं लोगों यानी आरएसएस, हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद जैसे कट्टर हिंदूवादी संगठनों व दलों ने किया था. संविधान सभा ने 26 नवंबर, 1949 को संविधान को अपनाया था. इस के ठीक 4 दिनों बाद आरएसएस के मुखपत्र ‘और्गेनाइजर’ के लंबेचौड़े संपादकीय में लिखा गया था-

हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अद्वितीय संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है. मनु (स्मृति) के कानूनों की आज भी विश्व प्रशंसा करता है तथा लोग खुद ही उन का पालन करते हैं लेकिन हमारे संवैधानिक विद्वानों के लिए इस का कोई मतलब नहीं है. इस के लिखे और छपने के वक्त ही डाक्टर भीमराव अंबेडकर हिंदू कोड बिल का मसौदा भी तैयार कर रहे थे. उस का मकसद था मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद को समाप्त कर समानता का राज स्थापित करना जिस से स्वतंत्र भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े यानी शूद्र और मुसलमान सहित महिलाएं स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जी सकें.

ऐसा हुआ भी. जैसे ही हिंदू कोड बिल का मसौदा सामने आया तो सिरे से सारे हिंदूवादी नमक पड़े केंचुए की तरह तिलमिला उठे थे. और्गेनाइजर में ही लिखा गया था कि यह हिंदू समाज पर एटम बम है. हम हिंदू कोड बिल का विरोध करते हैं. यह विदेशी और अनैतिक सिद्धांतों पर आधारित है. यह हिंदू कानूनों, संस्कृति और धर्म पर क्रूर व अज्ञानी हमला है. हिंदू महासभा के मुखिया पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो संसद में कहा था कि हिंदू कोड बिल हिंदू संस्कृति की भव्य संरचना तोड़ देगा.

यह विरोध की ही सही फिर भी सभ्य भाषा थी लेकिन तत्कालीन दिग्गज हिंदू धर्मगुरु स्वामी करपात्री महाराज ने तो अंबेडकर पर निशाना साधते यह तक कह डाला था कि ब्राह्मणों के क्षेत्र में पूर्व अछूत का हमला है. तब देशभर में मैसेज यह गया था कि हिंदू एक अछूत शूद्र द्वारा लिखित कानून स्वीकार नहीं करेंगे.

करपात्री ने इसे धर्मयुद्ध की संज्ञा देते मार्च 1949 में एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी का ही गठन कर डाला था जिस में आरएसएस, रामराज्य परिषद और हिंदू महासभा सहित देशभर के धर्मगुरु और पंडेपुजारी शामिल हुए थे. उसी साल आरएसएस ने अकेले दिल्ली में ताबड़तोड़ 79 मींटिगें आयोजित की थीं. फिर 11 और 12 दिसंबर, 1949 की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में दिल्ली देशभर से आए सनातनियों से पट गई थी. पहले दिन रामलीला मैदान में वक्ताओं ने हिंदू कोड बिल की तुलना एटम बम के साथसाथ रोलर एक्ट से भी की थी.

दूसरे दिन 12 दिसंबर को आरएसएस कार्यकर्ताओं की अगुआई में संसद तक बड़ा पैदल मार्च किया गया था जिस में हिंदू कोड बिल मुर्दाबाद, पंडित नेहरू मुर्दाबाद और नेहरू हुकुमत छोड़ दो जैसे नारे लग रहे थे. प्रदर्शनकरियों ने नेहरू और अंबेडकर के पुतले जलाए थे और शेख अब्दुल्ला की कार को आग के हवाले कर दिया था. इधर, बाकी देश के शहरों और गांवों में भी ब्राह्मण और गैरब्राह्मण सवर्ण सभाएं कर हिंदू कोड बिल का विरोध कर रहे थे.

इसलिए तिलमिलाए थे

यह उपद्रव बेवजह नहीं था. दरअसल, हिंदू कोड बिल में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए थे. हिंदू विवाह अधिनियम 1956 में शादी और तलाक से ताल्लुक रखते कानून थे जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने के साथसाथ एक से ज्यादा शादी करने को अपराध करार देते हैं. यानी, औरत को सौत से छुटकारा देते हैं. ऐसा ही एक था हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 जो महिलाओं को भी संपत्ति का अधिकार देता है. इस में मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में संशोधन करते पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर हिस्सा और अधिकार दिए थे जो सनातनियों को तब रास आया था न आज हजम होता है.

कांग्रेस में इस का अंदरूनी विरोध सवर्ण सांसदों ने किया था. कुछ तो एकएक कर बाकायदा भाजपा में चले भी गए. इसी तरह का विरोध कांग्रेस में ही रहते डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी संविधान और हिंदू कोड बिल का किया था. इसी तरह हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम 1956 और हिंदू अल्पसंख्यक और भरणपोषण अधिनियम 1956 भी सनातनियों को बहुत अखरे थे. ये भी औरतों को मर्दों के बराबर हक देने वाले थे. इस मुद्दे पर ‘सरिता’ पत्रिका में शृंखलाबद्ध तरीके से तथ्यातमक लेख प्रकाशित किए गए हैं, पाठकों को यह सीरीज जरूर पढ़नी चाहिए ताकि वे ऐतिहासिक सच से रूबरू हो सकें. यह सीरीज सरिता की वैबसाइट पर भी पढ़ी जा सकती है.

सनातनियों का तब यह विरोध इतना तीव्र और आक्रामक था कि एक दफा तो लग रहा था कि सरकार को हिंदू कोड बिल आग के हवाले करना पड़ेगा और महिलाओं सहित दलितों व आदिवासियों को बराबर का हक नहीं मिलेगा. देश फिर धार्मिक गुलामी की गर्त में चला जाएगा. इस विरोध पर नेहरू का शांत रवैया देख कर भीमराव अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन बाद में नेहरू ने हिंदू कोड बिल के उक्त 4 टुकड़े कर देश में कानून और संविधान का राज कायम किया था. उस से कुंठित और बौखलाए नरेंद्र मोदी आएदिन नेहरू पर किसी न किसी बहाने भड़ास निकाल ही लेते हैं.

आज वही मोदी, भाजपा और तमाम हिंदूवादी महिला आरक्षण बिल पर राहुल गांधी सहित कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को कोस रहे हैं. उन्हें तो खासतौर से राहुल और प्रियंका गांधी से नेहरू का वास्ता और दुहाई देते कहना चाहिए कि देखिए, आप के परदादा ने महिलाओं के लिए इतना कुछ किया था. उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दिए तो आप क्यों महिला आरक्षण संशोधित बिल का विरोध कर रहे हैं लेकिन मोदी और पूरे भगवा गैंग में इस सच को सार्वजनिक तौर पर स्वीकारने की तो दूर की बात है, जिक्र करने का भी साहस नहीं है क्योंकि इस से उन के पूर्वजों की पोलपट्टी खुल जाएगी.

‘चित भी मेरी और पट भी मेरी और सिक्का मेरे बाप का’ की तर्ज पर, दरअसल, ताजी साजिश यह है कि बिल पास ही न हो और अगर गिरतेपड़ते कभी हो भी जाए तो सत्ता महिलाओं के जरिए सवर्ण पुरुषों के हाथों में रहे. जैसे मंदिर में हिंदू महिला पूजा का थाल पकड़े आरती उतारती रहती है और पति पंडेपुजारी के पैर छूते उस के थाल में चढ़ावा चढ़ाता रहता है वैसा ही कुछ अलग तरीके से संसद में हो. अब इस मुद्दे पर देखने को कुछ नहीं बचा है. खुद भगवा गैंग ने महिला आरक्षण का ढोल बजाबजा कर फोड़ और फाड़ दिया है तो कोई क्या कर लेगा, इस चालाकी का तोड़ तो शायद ब्रह्मा के पास भी न होगा.

स्वीडिश मौडल है हल

इस विधेयक का अब क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता लेकिन इस से परे स्वीडन की राजनीति पर गौर किया जाना चाहिए जहां प्रमुख राजनीतिक दल ग्रीन पार्टी, लेफ्ट पार्टी, स्वीडिश सोशल डैमोक्रेटिक पार्टी वगैरह टिकट वितरण जिपर सिस्टम से करते हैं यानी एक पुरुष एक महिला यह क्रम चलता रहता है. इसलिए रिक्सडाग में महिला सांसद आधी के लगभग हैं. हमारे यहां की पार्टियां इसे अपना पाएंगी, इस में शक है क्योंकि उन पर भी कब्जा मर्दों का ही है. मिसाल महिला आरक्षण बिल पर सब से ज्यादा हल्ला मचा रही भाजपा की ही लें, तो उस में कभी कोई महिला अध्यक्ष नहीं रही और जो मौजूदा नेत्रियां हैं वे महज शोपीस हैं.

ओडिशा में बीजद के नवीन पटनायक ने साल 2016 से एक अच्छी पहल की थी कि 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देना शुरू कर दिया था. अब ताजे बवंडर के बाद डीएमके सांसद पी विल्सन ने राज्यसभा में एक प्राइवेट बिल इस आशय का पेश किया है कि उन की पार्टी बिना परिसीमन और जनगणना के तुरंत ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए तैयार है. अब इस प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई होगी लेकिन कोई और पार्टी ऐसी पहल करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही.

महिलाओं को संसद में आरक्षण देने से बदलाव आंशिक ही होंगे लेकिन उन का कल्याण या भला शिक्षा व जागरूकता से ही होगा, इस के लिए अब जरूरी हो चला है कि उन्हें सामाजिक और धार्मिक दबावों से मुक्त करने के लिए अभियान छेड़े जाएं, विधेयक लाए जाएं, बहसें की जाएं और धरनेप्रदर्शन भी किए जाएं लेकिन यह तभी संभव होगा जब हिंदूवादी संगठन और पार्टियां महिलाओं को मंदिरों में ढकेलना बंद करें, उन्हें उन के मसलों से ताल्लुक रखते फैसले लेने दें. स्वीडन इस की बेहतर मिसाल है जहां 100 फीसदी साक्षरता है, जागरूकता है, शादीतलाक और जौब की आजादी है. सब से अहम बात, वहां आर्थिक आत्मनिर्भरता है, इसलिए वहां स्वाभिमान और आत्मसम्मान भी हैं जिन पर भाजपा सिर्फ गाल बजाती रही.

अगर वाकई भारतीय जनता पार्टी की नीयत साफ होती तो 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में वह महिलाओं को 33 फीसदी टिकट दे देती और कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के मुंह बंद कर देती. असल में सवर्ण पुरुष घबराए हुए हैं कि अगर वाकई महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिल गया तो उन्हें मिलने वाले मौके कम हो जाएंगे. Women Reservation Bill India

Hindi Story: जमीर

Hindi Story: काफी बहस के बाद ही अभय राजी हो पाए थे कि नीचे गैराज में बने कमरे को किराए पर दे दिया जाए. अभय कभी भी घर में किसी भी किराएदार को रखने के पक्ष में नहीं थे और जया अच्छी तरह जानती थी कि उन्हें इस बात के लिए राजी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है. बहस तो पिछले 2 वर्षों से चल रही थी. जब से अभय ने अपना काम दूसरे शहर में भी लेना शुरू किया तब से उन के टूर प्रोग्राम बढ़ गए थे और जया को घर में अकेलापन लगने लगा था.

वैसे भी अभय के काम में उस का भी कुछ सहयोग रहता था पर बारबार अभय के साथ बाहर जाना भी मुश्किल होता जा रहा था. घर में चौकीदार रख कर जाओ तो वह भी समय से नहीं आता, नौकरानी बिंदिया यों तो पुरानी थी पर वह भी अकसर छुट्टी कर जाती. बाहर के गमले सूख जाते, छत पर धूल जमा हो जाती और फिर जया को भी बाहर जाने का शौक था. अभी तक तो बच्चों और घरगृहस्थी में ही उलझ रही. अब समय मिला है तो उस का भी लाभ उठा नहीं पा रही है. गाजियाबाद की इस कालोनी में किराएदार मिलना मुश्किल नहीं है लेकिन फैमिली वाले अच्छे लोगों को दिया जाए तो बेहतर होगा. बारबार जब दलीले दीं और यही सब समझाया तो आखिरकार अभय मान गए थे.

‘‘ठीक है, तुम जिसे सही सम?ा रख लो लेकिन अकेले छात्र को मैं कमरा हरगिज नहीं दूंगा. देख रही हो न, कितने हादसे हो रहे हैं गाजियाबाद में.’’

‘‘हां, वह तो मैं भी समझती हूं, मुझे किसी जिम्मेदार को ही रखना है जो घर को मेरी अनुपस्थिति में संभाल सके,’’ कुछ सोचते हुए जया ने जवाब दिया था.

आखिरकार उसे अधिक इंतजार करना भी नहीं पड़ा. बाहर दरवाजे पर तख्ती लगाते ही तीसरे दिन एक लड़की ने दरवाजे की घंटी बजाई थी.

जया ने खिड़की से झाका.

‘‘आंटी, क्या रूम खाली है?’’ वह लड़की पूछ रही थी. साधारण वेशभूषा में एक सांवली सी लड़की खड़ी थी.

‘‘हां, किसे चाहिए?’’

जया सोच रही थी कि अकेली लड़की को तो कमरा देना ही नहीं है तो यहीं से मना कर दिया जाए. पर वह लड़की खड़ी रही.

‘‘आंटी, मैं और मेरी मां रहेंगी.’’

‘‘अच्छा.’’

जया ने बाहर आ कर फाटक खोला, ‘‘क्या करती हो? कहां से हो?’’

‘‘आंटी, मैं राजस्थान के सांगोद से आई हूं. मैं ने 12वीं पास की है और यहां कोचिंग करूंगी. मेरी मां भी साथ रहेंगी तो क्या कमरे के साथ किचन भी है?’’

कमरा जया ने अभय से कह कर चौकीदार के लिए बनवाया था तो सारी सुविधाएं थीं लेकिन अभी भी वह कुछ हिचकिचा रही थी.

‘‘मां, कहां हैं? पहले उन से बात कर लूं.’’

‘‘जी, मां भी हैं, सब्जी ले रही हैं, अभी बुलाती हूं,’’ कह कर लड़की ने मां को आवाज दी थी.’’

एक महिला, जो देखने में ग्रामीण सी तो प्रतीत हो रही थी, हाथ में सब्जी का थैला लिए आती हुई दिखी.

‘‘म्हारो नाम सावित्रि है. या म्हारी छोरी गीता है, यहां कोचिंग कररी है. बड़ी छोरी माया और कंवर साहब भी पास ही रेवें. उन के पास ही हम थे पर अब बेटी के घर भी कब तक रहें तो कमरा देख रिया हैं,’’ हिंदी और लोकभाषा के मिश्रण में उस महिला ने अपनी बात रखी थी.

जया ध्यान से देखती रही, बोली, ‘‘पिता क्या करते हैं?’’

‘‘मेरे पापा का दूध का बिजनैस है गांव में. गाय, भैंसें, जमीन, मकान सब हैं. रामस्वरूप नाम है. कभीकभी वे मिलने आएंगे,’’ अब बेटी ने जवाब दिया था.

‘‘ठीक है, कमरा देख लो.’’

जया ने फिर नौकरानी बिंदिया को आवाज लगाई थी और कमरा दिखाने को कह दिया था.

किराया तो बहुत ही कम था. सावित्री ने स्वयं ही धोपोंछ कर कमरे की सफाई कर दी थी. फिर दोनों मांबेटी औटो में अपना सामान ले कर आ गई थीं.

जया ने उन को सब सम?ा दिया था, ‘‘मैं यहीं रहती हूं लेकिन कभीकभार बाहर जाना होता है तो आप लोग घर का ध्यान रखिए. माली समय पर आ कर पौधों की देखभाल करता है या नहीं नौकरानी ठीक से साफसफाई कर रही है और बिजली, पानी के बिल संभाल लेना.’’

‘‘आप चिंता मत करो आंटीजी, मम्मी सब संभाल लेंगी.’’

गीता तपाक से बोली तो सावित्री ने भी बात आगे बढ़ा कर कहा, ‘‘माली, नौकरानी की जरूरत कोई ना, म्हूं ही पौधों ना पानी डाल दूंगी और साफसफाई भी कर दूंगी.’’

जया अब कुछ निश्ंिचत हो गई थी. चलो, यह काम भी हुआ.

गीता तो अकसर अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती पर सावित्री को सफाई का शौक था तो जया के मना करने के बाद भी कभी छत की सफाई करती तो कभी सीढि़यों की झड़पोंछ कर देती.

सावित्री के यहां मेहमान के नाम पर बस बड़ी बेटी माया और उस के पति विजय का आनाजाना होता. हां, जब उन के दोनों बच्चे आते तब जरूर शोरगुल मचता. पर चलो, अब यह सब तो होगा ही. जया सोचती.

सावित्री का दामाद विजय शायद किसी जौहरी की दुकान पर काम करता था या उस की अपनी कोई दुकान थी, जया को यह ठीक से मालूम नहीं था लेकिन रहनसहन से लगता था कि अच्छी आमदनी है उन लोगों की. वैसे, स्कूटर पर ही आते वे लोग, कभीकभार एक कार भी ले कर आते. सावित्री खूब खातिर करती, कभी बाफले, लड्डू बनते तो कभी मक्की, बाजरे की रोटी.

जब पहली बार सावित्री मना करने के बाद भी उड़द के लड्डू, सरसों का साग और मक्की की रोटी जया के लिए ले कर आई तो अभय भी चौंके थे.

‘‘अरे, यह महिला तो लाजवाब खाना बनाती है. वाह, क्या लड्डू हैं और गरमागरम साग.’’

‘‘हां, देखो गांव की महिला है पर बेटी को पढ़ाने के लिए शहर में एक कमरा ले कर रह रही है. गांव में तो कह रही थी कि बहुत बड़ा मकान है उस का,’’ जया ने हां में हां मिलाते हुए कहा था.

‘‘वैसे, इस के पति क्या करते हैं?’’ अभय ने पूछा था.

‘‘दूध का बिजनैस है, यहां तो कम ही आते है, दोएक बार देखा था मैं ने मोटरसाइकिल पर, झुक कर प्रणाम कर रहे थे. अच्छे लंबेचौड़े हैं, रोबदार, बड़ी मूंछें.’’

‘‘अरे वाह, तुम ने तो पूरा वर्णन कर दिया,’’ अभय हंसे थे.

जया को सचमुच इस बात की खुशी थी कि स्वयं अनपढ़ होते हुए भी सावित्री बेटी की पढ़ाई का इतना ध्यान रख रही है. एक बार उस ने जया से कहा भी था-

‘‘दीदी, बड़ी बेटी तो नहीं पढ़ी तो छोटी उम्र में ब्या दी. पर या छोरी गीता पढ़ना चाहे तो म्हूं पढ़ा री हूं. 12वीं मां भी अच्छा नंबर लाई थी छोरी, पर गांव वाला बोले कि ब्या कर दो, हमारी जात में शादी कम उम्र में ही होती है, म्हारो भी बालविवाह था.’’

‘‘अच्छा चलो, यह भी अच्छा है कि इन के पिता भी इसे पढ़ाने के पक्ष में हैं, और इतना खर्चा कर रहे हैं, रिश्तेदारों की बात नहीं मान रहे,’’ जया ने तारीफ के स्वर में कहा था.

‘‘वी ही सारो खर्चा करे, म्हारी कया औकात,’’ कहते हुए सावित्री कुछ भावुक हो गई थी.

‘‘अरे, तो क्या हुआ, पिता है, दायित्व है उन का, तुम क्यों परेशान होती हो,’’ जया ने समझाया था.

धीरेधीरे सावित्री और गीता परिवार का हिस्सा बनते जा रहे थे. जब कोई काम होता तो दोनों सहयोग देतीं.

‘‘अरे आंटी, आप के पांव में तकलीफ है, आप क्यों यह भारी बैग उठा रही हैं, मैं ले जाती हं ऊपर.’’

गीता दौड़ कर आ जाती. आसपास से कोई छोटामोटा सामान मंगवाना होता तो सावित्री ले आती.

जया अब निश्ंिचत हो कर अभय के साथ टूर पर जा सकती थी.

पर इस बार जब वे लोग जयपुर से लौट रहे थे तभी माया के पति विजय का फोन आया, ‘‘आंटी, आप लोग कहां हो? जल्दी आइए, यहां बहुत गड़बड़ हो गई है, गीता के पिता आए हुए हैं, उन की आंख का औपरेशन हुआ है और गीता व उस की मां उन्हें घर के अंदर तक नहीं आने दे रही हैं, अब वे कहां जाएं?’’

‘‘क्या?’’ जया कुछ समझ नहीं पा रही थी. अभी परसों ही तो वे लोग आए हैं, तभी गीता के पिता को देखा था. मोटरसाइकिल पर दूध के बड़े बरतन रख कर सब से हंसहंस कर बात कर रहे थे.

अच्छेभले दिख रहे थे. अब औपरेशन भी हो गया और सावित्री कैसे मना कर देगी उन्हें अंदर आने से.

‘‘क्या हुआ?’’ गाड़ी चलाते हुए अभय ने पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, घर चल कर देखते हैं?’’

फिर उस ने विजय से भी कहा था.

‘‘हम अभी घर पहुंच रहे हैं, फिर बात करेंगे.’’

घर पहुंच कर कमरा खोल कर वे लोग बैठे ही थे कि पास के कमरे से जोरजोर की आवाजें सुनाई

देने लगीं.’’

‘‘कौन बोल रहा है यह?’’ अभय ने गुस्से में पूछा.

‘‘पता नहीं, आवाज तो गीता के जीजाजी विजय की ही लग रही है, पर उसे इतनी जोर से चिल्लाते हुए तो कभी सुना नहीं,’’ जया को भी आश्चर्य हो रहा था.

तभी दरवाजे के बाहर आ कर विजय ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘आंटी, आप जरा बाहर आएं.’’

‘‘क्या बात है?’’ अभय का गुस्सा अब और बढ़ गया था.

‘‘देखो, तुम अंदर आ कर बैठो और शांति से बताओ कि क्यों फोन कर रहे थे. इस तरह घर में शोरगुल मचाने की जरूरत नहीं है.’’

जया ने मामला शांत करना चाहा. तभी विजय एक बूढे़ से आदमी, जिस की आंख पर पट्टी बंधी थी, को ले कर अंदर आया, साथ में माया भी थी.

‘‘आंटी, इस आदमी को पहचानती हैं आप?’’ उस की आवाज में अभी भी तेजी थी.

‘‘नहीं, कौन है यह, और यहां क्या कर रहा है?’’ जया चौंकी थी.

‘‘आंटी, अंकल, ये हैं गीता के असली पिता, इन की आंख का औपरेशन होना था, वह तो हम ने किसी प्रकार करा दिया. अब गीता और उस की मां इन्हें यहां रखने तक को तैयार नहीं हैं,’’

विजय का स्वर फिर से ऊंचा होता जा रहा था.

‘‘अरे, मम्मी तो दरवाजा ही नहीं खोल रही थीं, मैं ने धमकी दी कि दरवाजा तोड़ दूंगी, तब डर से इन्होंने दरवाजा खोला.’’

माया कहे जा रही थी कि जया ने डांट कर उसे चुप कराया.

‘‘देखिए, अंकल अब आप किसी मुसीबत में न फंस जाएं इसलिए कहता हूं कि इन लोगों से कमरा खाली करवाइए, ऐसे चरित्रहीन व्यक्तियों को अपने घर में जगह न दें.’’

अभय के चेहरे के भाव देख कर जया भी डर गई थी. ये तो वैसे ही कमरा किसी को किराए पर देने के पक्ष में नहीं थे. उस पर अभय का घोर परंपरावादी स्वभाव.

तभी उस ने गीता और सावित्री को आवाज दे कर अंदर बुलाया.

गीता की आंखें रोरो कर सूज रही थीं और सावित्री ने भी सिर पर पल्लू ले कर चेहरा कुछ ढक रखा था.

‘‘गीता,’’ जया का स्वर भी अब कुछ कड़क हो गया था.

‘‘क्या यही तुम्हारे असली पिता हैं?’’ उस आदमी की तरफ इशारा करते हुए उस ने पूछा था.

‘‘जी आंटी, मुझे जन्म देने वाले,’’ कुछ सहम कर गीता ने जवाब दिया था.

‘‘औरऔर, वो कौन थे जो मिलने आते थे मोटरसाइकिल पर, जिन का तुम ने परिचय दिया था कि मेरे पापा हैं.’’

जया कुछ और कह पाती कि गीता ने बीच में ही रोक दिया.

‘‘मैं अपना असली पिता उन्हीं को मानती हूं, ये तो मेरे जन्म के बाद से ही हम लोगों को छोड़ गए थे पर उन्होंने ही हमें सहारा दिया, सारा खर्च उठाया, मुझे पढ़ा रहे हैं,’’ गीता अटकते स्वर में भर्राई आवाज में कहे जा रही थी और सावित्री अभी भी सहमी सी सिर ढके कोने में खड़ी थी.

जया ने अब माया की तरफ देखा.

‘‘माया, तुम तो इतने समय से यहां आ रही हो, विजय और बच्चे भी, तुम तो दूधवाले रामस्वरूप को जानती हो, तुम्हारे सामने भी कई बार आए थे, फिर?’’

‘‘नहीं आंटी, मैं और किसी को नहीं जानती. मैं तो, बस, अपने इन असली पिता को ही जानती हूं, हेमराज नाम हैं इन का, कनवास में रहते हैं, हमारे पिता हैं तो हम ने ही इन की आंख का औपरेशन कराया. अब बेटी के यहां तो अधिक दिन रह नहीं सकते पर मां…’’

जया को अब माया के सफेद झूठ पर आश्चर्य हो रहा था. इतनी कैसे बदल गई यह लड़की.

उधर, अब तक चुप खड़ी सावित्री का भी गुस्सा फूटा था.

‘‘पिछले बीस साल से कौन देखभाल कर रहा है, किस ने तेरा ब्याह कराया, किस ने तेरा घर बसाया, किस ने तेरे आदमी की नौकरी लगवाई, क्या तू नहीं जानती.’’

तब तक विजय फिर आगे बढ़ा था, ‘‘देखिए अंकलआटी, हम बस इन्हें ही जानते हैं. ये ही असली पिता हैं. अब आप इस चरित्रहीन महिला को घर से निकालिए वरना आप की बदनामी होगी, गांवभर में तो इन की हो ही रही है,’’ विजय की आवाज फिर ऊंची हो गई थी.

‘खामोश,’’ अभय के गुस्से को देख कर वह चुप हो गया था.

‘‘हम किसी को बाहर नहीं निकालेंगे. यह महिला और इन की बेटी सम्मान के साथ यहीं रहेंगी. कौन असली पिता है और कौन नहीं, हमें इस से मतलब नहीं और आप लोग अब जा सकते हैं,’’ अभय की इतनी कड़कती आवाज जया ने भी पहली बार सुनी थी. अभय के कड़कते स्वर से डर कर विजय, माया और हेमराज कमरे से बाहर निकल गए थे.

‘‘बहनजी,’’ अभय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘यहां से आप को कोई नहीं निकाल सकता, आप आराम से रहिए और बेटी को पढ़ाइए.’’ कह कर अभय अंदर चले गए थे.

सावित्री अब फूटफूट कर रो पड़ी थी, एक प्रकार से जया के पैरों पर वह गिर पड़ी थी.

‘‘दीदी, आप लोगों ने हमारी लाज रख ली, बेटी और दामाद तो हमें बेघर कर के बेइज्जत करने पर ही तुले थे.’’ सावित्री की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.

‘‘आप शांत हो जाएं, कोई आप को बेघर नहीं करेगा, पर आश्चर्य है कि दामाद भले ही बदल जाए पर आप की स्वयं की बेटी…’’ जया यह कहे बिना न रह सकी.

‘‘वही तो दीदी, अब हमारे जमाई साब बड़े आदमी बन गए हैं. समाज में उन की इज्जत है और हम चरित्रहीन हो गए. क्या ये नहीं जानते कि गीता के जन्म के बाद से ही किस ने हमें सहारा दिया. हेमराज तो उसी समय घर छोड़ कर भाग गया था, 2 छोटी बेटियां और अकेली मैं कैसे रहती, कहां जाती. तब इन्हीं रामस्वरूपजी ने हमें सहारा दिया.

माया की शादी की, यहां तक कि उस की ननदों तक को मायरा इन्होंने दिया, विजय को नौकरी से लगाया, उस का घर बनवाया और अब गीता की पढ़ाई का खर्चा वे ही उठा रहे हैं. तो गीता तो इन्हें ही अपना असली पिता मानेगी न,’’ कहते हुए सावित्री का गला फिर रुंध गया था और जया अभी तक समझ नहीं पा रही थी कि कोखजाई बेटी, जिस के ऊपर इतने एहसान हैं, वक्त बदलते ही आज अपनी उसी मां को चरित्रहीन कहने को तत्पर हो गई. Hindi Story

पीढि़यों तक रिसते हैं युद्ध के घाव

Iran Israel War: इंसान के दिमाग पर जंग का असर जंग चलने तक ही नहीं बल्कि जंग खत्म होने के बाद कई सालों तक और उस के बाद उस की आने वाली पीढि़यों के मन, व्यवहार और व्यक्तित्व तक में उतर जाता है. युद्ध की सब से भयावह सच्चाई यह है कि यह सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता बल्कि इंसानी दिमाग के भीतर भी चलता रहता है, कभी खत्म न होने वाली लड़ाई की तरह.

ईरान और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के हालात ने पूरी दुनिया की इकोनौमी और पौलिटिक्स को हिला कर रख दिया है. इस संघर्ष ने ऊर्जा, बाजार और कूटनीतिक समीकरणों का तानाबाना तो उधाड़ ही दिया है, इस का सब से गहरा और दीर्घकालिक असर उन आम लोगों पर पड़ रहा है जो जंग की धधकती आग के बीच रहने को मजबूर हैं.

ईरान-इजराइल युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे लोगों की मानसिक व भावनात्मक स्थिति पर कोई बात करता दिखाई नहीं दे रहा. साइकोलौजिस्ट एंड ह्यूमन एंड सोशल राइट्स एक्टिविस्ट मालिनी सबा की मानें तो युद्ध से जन्मी स्थितियां मानव मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ती हैं कि इस का असर पीढि़यों तक नजर आता है. भले ही ईरान-इजराइल युद्ध सीजफायर के कारण अभी रूका हुआ है. और कुछ दिनों बाद खत्म भी हो सकता है, लेकिन कड़वा सच यह है कि इस से जन्मी मानसिक और भावनात्मक समस्याएं एक से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहेंगी.

वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन का भी कहना है कि युद्ध और सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लगभग हर

5 में से एक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझता है. मिसाइल सायरन, बम धमाके, रातों की नींद हराम कर देने वाली अनिश्चितता, ये सब मिल कर युद्ध क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों के नर्वस सिस्टम को लगातार अलर्ट मोड में रखते हैं. ऐसे हालात में शरीर के अंदर कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रैस हार्मोन लगातार उच्च स्तर पर बने रहते हैं. यही स्थिति आगे चल कर पोस्ट ट्रौमेटिक स्ट्रैस डिसऔर्डर, क्रोनिक एंग्जाइटी और फोबिया जैसी समस्याओं को जन्म देती है.

मानव शरीर और मस्तिष्क पर यह असर सिर्फ जंग जारी रहने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आने वाली पीढि़यों के मन, व्यवहार और व्यक्तित्व तक में उतर जाता है. युद्ध की सब से भयावह सच्चाई यही है कि यह सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि इंसानी दिमाग के भीतर भी चलता रहता है, कभी खत्म न होने वाली लड़ाई की तरह.

यूएन की रिफ्यूजी एजेंसी के अनुसार, हमलों के पहले 48 घंटों में 1,00,000 से ज्यादा लोगों को ईरान की राजधानी तेहरान को छोड़ कर भागना पड़ा है. लगातार होते हमले, मिसाइलों का गिरना, घर नष्ट हो जाना, परिवारों का अलग हो जाना और पूरी दिनचर्या का बिखर जाना, लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ देता है. ईरान और इजराइल दोनों ही जगहों पर लोग सिर्फ जान का खतरा नहीं झेल रहे, बल्कि अपनी पहचान और सुरक्षा के टूटने का दर्द भी झेल रहे हैं.

जल्दी घाव नहीं भरते

किसी इंसान का घर उजड़ना सिर्फ उस का भौतिक नुकसान नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति की स्मृतियों, रिश्तों और पहचान को भी खत्म कर देता है. गाजा पट्टी में ऐसे अनेक लोग हैं जिन के प्रियजन युद्ध में मारे जा चुके हैं. ऐसी औरतें और बच्चे बड़ी संख्या में हैं जिन के घर के पुरुष खत्म हो चुके हैं. ऐसे में इन में से कई खुद के बच जाने के अपराधबोध से ग्रस्त हैं. इस स्थिति को सर्वाइवर गिल्ट कहते हैं. वहीं, बिना किसी शारीरिक कारण के दर्द, थकान और घबराहट जैसे लक्षण भी आम होते जा रहे हैं. इसे मनोविज्ञान में साइकोसोमैटिक प्रभाव कहा जाता है.

आज का युद्ध सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज कवरेज के कारण दुनियाभर के लोग भी इस हिंसा, आगजनी, चीखपुकार, खून में नहाए शवों को प्रत्यक्ष देख रहे हैं. लगातार ऐसे दृश्य देखने से दिमाग वास्तविक और वर्चुअल अनुभव में फर्क नहीं कर पाता. इस से सैकंडरी ट्रौमा पैदा होता है, जिस में व्यक्ति खुद युद्धक्षेत्र में न होते हुए भी एंग्जाइटी, बेचैनी और भावनात्मक थकान महसूस करता रहता है.

बच्चों के पास भले ही वह भाषा नहीं होती जिस में वे सटीकता के साथ अपने ट्रौमा को जाहिर कर सकें, लेकिन यह बात तय है कि उन के आसपास क्या हो रहा है और भावनात्मक माहौल कैसा है, इसे वे गहराई से अपने सबकौन्शियस ब्रेन में एब्जौर्ब करते हैं. वे युद्ध को अपने व्यवहार, खेल और खामोशी में जीने लगते हैं. उन में बिहेवियरल चेंज दिखने लगते हैं. वे डर के मारे बारबार बिस्तर गीला करते हैं, कभी वे अचानक चुप हो जाते हैं या अत्यधिक आक्रामक हो जाते हैं. खेलखेल में वे टैंक, बंदूक और धमाकों की दुनिया रचते हैं. यह उन के भीतर जमा डर का संकेत होता है. जब बच्चा बारबार टैंक, बंदूक, बम बनाता है तो वह असल में अपने अनुभव को सम?ाने व नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है.

युद्ध प्रभावित क्षेत्र में पलेबढ़े होने के कारण बच्चों में अकसर टौक्सिक स्ट्रैस भी मौजूद रहता है. जो डिप्रैशन, नशे की लत और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रौमा के लक्षण पास होने के जोखिम को बढ़ाता है. न्यूरोसाइंस बताती है कि बचपन में लगातार डर और असुरक्षा का अनुभव ट्रौक्सिक स्ट्रैस पैदा करता है, जो मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है. इस का असर जीवनभर रहता है. युद्धग्रस्त देशों में बच्चों में कम आत्मविश्वास, रिश्तों में अस्थिरता और निर्णय लेने की क्षमता पर युद्ध का प्रभाव साफ देखा गया है.

इतिहास गवाह है, चाहे वह वियतनाम युद्ध हो, सीरिया का संघर्ष या द्वितीय विश्वयुद्ध, युद्ध खत्म होने के दशकों बाद भी उस के मनोवैज्ञानिक घाव बने रहे हैं. मातापिता का अधूरा डर, असुरक्षा और तनाव अगली पीढ़ी के व्यवहार और सोच में उतरती है. ऐसे समाजों में अविश्वास, हिंसा की स्वीकृति और भावनात्मक दूरी सामान्य व्यवहार में आ जाती है.

दुनियाभर के देश जो युद्ध की विभीषिकाओं से निकले हैं, वहां सड़कों, पुलों और इमारतों के पुनर्निर्माण पर तो जोर दिया जाता है लेकिन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब तक लोगों को सुरक्षित माहौल, सामुदायिक सहयोग और मनोवैज्ञानिक सहायता नहीं मिलती, रिकवरी अधूरी रहती है.

युद्ध के बाद जीवित बचे लोगों को मैंटल हैल्थ सपोर्ट, ट्रौमा काउंसलिंग और खुल कर बातचीत का माहौल मिलना उतना ही जरूरी है जितना कि आर्थिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है. Iran Israel War

 

वर्किंग कपल्स के बीच स्पेस और प्राइवेसी

Husband Wife Dispute: वर्किंग कपल्स ज्यादातर यूनिटरी फैमिलीज में रहते हैं. उन की चाहत यह होती है कि उन के बीच स्पेस न रहे जिस से कि किसी और की जगह न बन सके लेकिन आज मोबाइल के दौर में एक का दूसरे को बारबार फोन करना भी निगरानी जैसा लगने लगता है. दूसरी तरफ दिक्कत यह भी है कि ज्यादातर कपल्स के पास आपस में बात करने के मुद्दे नहीं होते और इसलिए फोन पर बेमतलब की बातें पूछने के अलावा कुछ होता नहीं है. इन हालात से आपसी तनाव और अलगाव की घटनाएं घट रही हैं.

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग में परेशान पतिपत्नी के बीच जनसुनवाई चल रही थी. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राज्य महिला आयोग का कार्यालय तीसरी मंजिल पर है. राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डाक्टर बबिता सिंह के सामने रवि और रेखा नामक पतिपत्नी अपनी शिकायत ले कर पहुंचे थे. दोनों की सब से बड़ी परेशानी यह थी कि वे साथ रहना भी नहीं चाहते थे और अलग भी नहीं रहना चाहते थे लेकिन साथ रहने के लिए पतिपत्नी एकदूसरे की शर्तें मानने को तैयार नहीं थे. पत्नी रेखा का कहना था कि उस के पति रवि ने अपने साथ भतीजेभतीजियां रख रखी हैं. उन की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रहे हैं. ऐसे में वह उस के साथ नहीं रह सकती.

रेखा के अनुसार इन का लखनऊ के सीतापुर रोड पर दोमंजिला मकान है. नीचे के कमरों में वह रहती है और ऊपर के 2 कमरों में रवि के रिश्तेदार 4 बच्चे रहते हैं. उन में 2 लड़कियां हैं जो बीएससी और बीए कर रही हैं. 2 लड़के हैं जो 12वीं और बीए कर रहे हैं. रवि ज्यादातर उन के पास ही रहते हैं. उन्हें ट्यूशन पढ़ाते हैं. रेखा और रवि की शादी को 2 साल हो गए हैं. उन के अपने बच्चे नहीं हैं. रेखा सरकारी विभाग में क्लर्क है और रवि प्राइवेट कालेज में पढ़ाता है. रेखा का कहना है कि इतने समय में उन के बीच नजदीकियां कम जबकि दूरियां अधिक हैं.

रेखा का यह कहना भी था कि रवि की भतीजी उस के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती. ऐसे में वह इस घर में उस के साथ नहीं रह सकती और रवि उसे ले कर दूसरे घर में रहे जहां ये बच्चे न रहें. रवि पत्नी के साथ रहना चाहते थे लेकिन अपने भाईबहन के बच्चों का साथ छोड़ना नहीं चाहते थे. ये बच्चे अपनी पढ़ाई कर रहे थे और ये रवि व रेखा की शादी के पहले से रह रहे थे. सुनवाई के दिन रेखा के साथ उस की मां आई थी. दूसरी तरफ रवि के साथ उस का एक सहयोगी था.

महिला आयोग में जनसुनवाई के दौरान पतिपत्नी ही रहते हैं. महिला आयोग की अध्यक्ष और 2 सदस्य वहां रहती हैं. जनसुनवाई में पूरी गोपनीयता रहती है. परेशान लोगों के नाम और पहचान को गोपनीय रखा जाता है. सुनवाई एक दिन में पूरी न हो तो कई पेशी पड़ती हैं. सम?ाता होने की दशा में मुकदमा कोर्ट को भेज दिया जाता है. मसला हल होने पर पुलिस को सूचना चली जाती है कि इस मसले में सुलह हो गई है.

पुलिस थाना बनता जोड़े में दरार का कारण

केवल महिला आयोग के सामने ही नहीं, ऐसे मामले सब से पहले पुलिस थानों में पहुंचते हैं. हर थाने में महिला हैल्पलाइन डैस्क होती है. इस में सबइंस्पैक्टर रैंक की महिला दारोगा महिलाओं की समस्या को सुनती है. कई बार शिकायत पर मुकदमा कायम नहीं भी होता. महिला को सम?ा कर सुलह करा दी जाती है. ऐसे में पुलिस की भूमिका निगरानी तक सीमित रहती है. पुलिस के बाद मसले फैमिली कोर्ट जाते हैं.

जब बात आपसी समझते से नहीं बनती तो कोर्ट में तलाक की प्रक्रिया शुरू होती है. पुलिस में जाना जोड़े में एक दरार पैदा कर देता है जो बाद में बहुत मुश्किल से भरती है. पतिपत्नी के मामले में वर्किंग कपल्स की संख्या अधिक है. इस की वजह यह है कि इन के बीच औफिस के काम का भी अत्यधिक तनाव होता है. राज्य सरकारों ने वन स्टौप सैंटर बनाया है जहां फोन द्वारा पतिपत्नी अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं. इस के अनुसार, 60 फीसदी घरेलू हिंसा की घटनाएं आपसी विवाद की वजह से घटती हैं.

लखनऊ वन स्टौप सैंटर की प्रभारी अर्चना सिंह कहती हैं, ‘‘हर महिला की बात को सुन कर जो बेहतर समाधान होता है वह समझैया जाता है. कई बार पत्नियां बात को सम?ा जाती हैं. कई बार पति नहीं समझते जिस से बात बनतेबनते रह जाती है. समाधान करने के लिए इन की समस्याओं को समझना जरूरी होता है.’’

आपसी विवाद से बढ़ रहे झगड़े

मनोविज्ञानी डाक्टर मधुबाला यादव अपना काउसलिंग सैंटर चलाती हैं. वे कहती हैं, ‘‘वैवाहिक जीवन में कलह भावनात्मक थकावट, सैक्स की समस्याओं और शारीरिक व मानसिक हिंसा के रूप में सामने आती है. यह मारपीट, जबरदस्ती, आर्थिक नियंत्रण और अपमान के कारण आपसी तनाव बढ़ा रहा है. वर्किंग कपल्स में कार्यस्थल का तनाव घर पहुंच जाता है.

घर में उन के पास बात करने का मुद्दा नहीं होता. एकदूसरे के औफिस के बारे में बातचीत होती नहीं. समाज, फिल्म और राजनीति पर कितनी बात कर सकते हैं. राजनीतिक मसलों पर बातचीत झगड़े में बदल जाती है. असल में न्यूज चैनलों और धारावाहिकों में चीखचीख कर बोलना और एकदूसरे के खिलाफ साजिश के आरोप लगाना ही रह गया है. यंग कपल्स ने पढ़नालिखना बंद कर दिया है.

‘‘ऐसे में निराशा और चुप्पी तनाव बन जाती है. यहीं से एकदूसरे के लिए समय का अभाव होने लगता है जिस से रिश्ते में दरार आ रही है. कई बार ये घटनाएं घरेलू हिंसा ही नहीं, बल्कि अपमान, डर और आर्थिक परेशानियों में भी बदल जाती हैं. जहां बात बढ़ जाती है वहां तनाव के चलते गंभीर अपराध की संभावना बढ़ जाती है. नतीजतन, लड़ाई?ागड़े होने लगते हैं जो बाद में थाना और कचहरी तक पहुंच जाते हैं.’’

डाक्टर मधुबाला आगे कहती हैं, ‘‘वर्किंग कपल्स के जब बच्चे होते हैं तब उन पर काम का दबाव बढ़ जाता है. ऐसे में कई बार महिलाओं पर काम को छोड़ना पड़ता है. यह भी हिंसा का रूप ले लेता है. यहां ज्यादातर हिंसा पति द्वारा ही की जाती है. वर्किंग कपल्स में झगड़े का एक और कारण पैसा भी होता है. पति को लगता है कि पत्नी के पैसों पर भी उस का हक है. कमाने के बाद भी पत्नी जब पैसे खुद नहीं रख पाती तो वह झगड़ा करने लगती है. इन तनावपूर्ण स्थितियों से बचने के लिए कार्यों में संतुलन और आपसी संवाद को बेहतर बनाना सब से जरूरी होता है.’’

पतिपत्नी के बीच बातचीत के मुद्दों का अभाव

पुरुष प्रधान समाज में पत्नी को केवल सुनने के लिए रखा जाता है. पत्नी की बात को सुनने वाले पति को जोरू का गुलाम कहा जाता है. ऐसे में पति, पत्नी की कही सही बात को भी नकार देता है जिस से आपसी बातचीत बंद हो जाती है. बातचीत में पति का आदेश ज्यादा होता है.

पत्नी को यह समझाया जाता है कि पति की बात मानना उस का कर्तव्य और अधिकार दोनों है. घरपरिवार के सारे बड़े फैसले पति करता है. अब जब पत्नी खुद कमाती है तो उसे लगता है कि फैसलों में उस की भी बात सुनी जानी चाहिए और उस का भी हक होना चाहिए. यहीं से विवाद शुरू हो रहे हैं.

पहले पतिपत्नी के बीच उन के परिवार के लोग होते थे जो मसलों को सम?ाने का काम करते थे. आज के वर्किंग कपल्स अकेले होते हैं. इन के बीच होने वाले मतभेद सुलझने वाले लोग कम हो गए हैं. दूर बैठे पेरैंट्स अपनेअपने हिसाब से सोचते हैं. उन को भी संबंधों को जोड़ने की कला नहीं आती है. ऐसे में लड़भिड़ कर मसले थानेकचहरी तक पहुंच जाते हैं. जिस से वर्किंग कपल्स तलाक की ओर बढ़ जाते हैं. तलाक सरल नहीं रह गया है. यह जीवन को कई तरह से जटिल बना देता है.

वर्किंग कपल्स का झगड़ा दोनों के जीवन में गहरा असर डालता है. वर्किंग कपल्स में तलाक के नएनए रूप सामने आने लगे हैं. इन में एक नाम है स्लीप डिवोर्स. इस में कपल्स साथसाथ तो रहते हैं पर बेहतर नींद के लिए अलगअलग बिस्तरों या कमरों में सोते हैं. हालांकि इस का मतलब यह नहीं है कि उन का रिश्ता टूट रहा है बल्कि यह एक तरीका है जिस से वे एकदूसरे को परेशान किए बिना अच्छी नींद ले सकते हैं.

कई बार पार्टनर के खर्राटे लेने की आदत से दूसरे की नींद खराब हो जाती है. वहीं कुछ कपल्स के सोने और जागने के समय अलगअलग होते हैं, जिस से एक की नींद दूसरे की वजह से प्रभावित हो सकती है जबकि किसी एक पार्टनर को स्लीप डिसऔर्डर हो सकता है, जिस से दूसरे की नींद में खलल पड़ता है. यह स्थिति अकसर तलाक या अलगाव की ओर बढ़ सकती है. इस की नौबत न आए, इस का प्रयास किया जाना चाहिए. तलाक की नौबत आने पर तरहतरह के विकल्प हैं.

आपसी सहमति से तलाक

आपसी सहमति से तलाक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिस में पति और पत्नी दोनों सहमति से अपने विवाह को समाप्त करने का निर्णय लेते हैं. यह प्रक्रिया विवादित तलाक की तुलना में सरल और कम तनावपूर्ण होती है. आपसी सहमति से तलाक का मतलब है कि दोनों पतिपत्नी इस बात पर सहमत होते हैं कि वे अब साथ नहीं रह सकते और अपने विवाह को समाप्त करना चाहते हैं. इस में दोनों पक्ष चाइल्ड कस्टडी, संपत्ति का विभाजन और गुजाराभत्ता जैसे मुद्दों पर सहमत होते हैं.

सहमति से तलाक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत पतिपत्नी द्वारा संयुक्त रूप से फाइल किया जाता है. इस में संपत्ति, बच्चों की कस्टडी और भरणपोषण पर सहमति बना कर कोर्ट में 2 याचिकाएं दायर की जाती हैं. इस में 6 से 18 महीने की प्रक्रिया के बाद डिक्री मिलती है. यह पतिपत्नी तब करते हैं जब वे एकसाथ रहने में असमर्थ हों. इस में दोनों पक्ष गुजाराभत्ता, संपत्ति और बच्चों की कस्टडी को ले कर लिखित समझता तैयार करते हैं. पहली याचिका दोनों के वकील परिवार न्यायालय में संयुक्त याचिका दायर करते हैं. कोर्ट दोनों के बयान दर्ज करता है.

कूलिंग औफ की समय सीमा 6 महीने तक हो सकती है. पहली और दूसरी याचिका के बीच आमतौर पर 6 महीने का समय दिया जाता है ताकि सुलह की गुंजाइश देखी जा सके. इस अवधि को कोर्ट की अनुमति से कम भी किया जा सकता है. दूसरी याचिका 6 से 18 महीने के भीतर होती है. यदि पति और पत्नी तलाक पर अडिग रहते हैं तो कोर्ट डिक्री पारित कर देता है. तलाक के लिए जरूरी कागजात में शादी का प्रमाणपत्र, पतिपत्नी के आधार कार्ड, पैन कार्ड, पता प्रमाण में आधार, वोटर आईडी शामिल हैं. अगर बच्चे हैं तो उन का जन्म प्रमाणपत्र और पेरैंट्स का आय प्रमाणपत्र लगाया जाता है.

विवादित तलाक से बचें

विवादित तलाक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिस में एक पक्ष तलाक चाहता है जबकि दूसरा पक्ष इस के लिए तैयार नहीं होता. यह प्रक्रिया आपसी सहमति से तलाक की तुलना में अधिक जटिल और समय लेने वाली होती है. इस तलाक का मतलब है कि पति या पत्नी में से एक तलाक चाहता है, लेकिन दूसरा पक्ष इस के लिए सहमत नहीं है. इस में अदालत को यह तय करना होता है कि तलाक के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं.

हमारे देश में तलाक एक कठिन प्रक्रिया है. विदेशों में यह अलगअलग रूपों में मौजूद है. विदेशों में 50 वर्ष या उस से अधिक उम्र के बीच होने वाले तलाक को ‘ग्रे डिवोर्स’ कहते हैं. यहां लोग शादी के कई वर्षों बाद तलाक लेने का निर्णय लेते हैं.

?तलाक के बाद आर्थिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है. पैंशन, संपत्ति और अन्य वित्तीय संसाधनों का विभाजन करना पड़ता है, जिस से दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है. इस को ही ‘ग्रे डिवोर्स’ कहते हैं. दूसरा ‘नो फौल्ट तलाक’ है. जिस में पक्षों को अपनी शादी के तोड़ने के लिए कोई विशेष आधार या कारण साबित करने की जरूरत नहीं होती.

मुसलिम वर्ग में भी तलाक के कई रूप हैं. इन में से एक तलाक ए अहसन है. इस में पति अपनी पत्नी को एक बार तलाक कहता है और फिर 3 महीने का इंतजार करता है. इस दौरान अगर पतिपत्नी के बीच सुलह हो जाती है तो तलाक रद्द हो सकता है. इस एक और तलाक ए हसन होता है. इस में पति 3 महीने के अंतराल पर 3 बार तलाक कहता है. हर महीने एक बार तलाक कहने के बाद, अगर पतिपत्नी के बीच सुलह नहीं होती है तो तीसरे महीने के बाद तलाक हो जाता है.

तलाक ए बिदत को तीन तलाक भी कहा जाता है. इसलाम में एक विवादास्पद और अब भारत में गैरकानूनी घोषित किया गया तलाक का तरीका है. इस में पति एक ही बार में तीन बार ‘तलाक’ कह कर अपनी पत्नी को तलाक दे देता है. इस प्रक्रिया में तलाक तुरंत प्रभावी हो जाता है और पतिपत्नी के बीच विवाह संबंध समाप्त हो जाता है.

समझदारी दिखाएं

वर्किंग कपल्स के लिए तलाक अंतिम विकल्प होना चाहिए. इस की वजह यह है कि लड़कालड़की दोनों की दूसरी शादी के लिए साथी का मिलना सरल नहीं है. दूसरी शादी के बाद भी कई तरह के विवाद चलते रहते हैं. ऐसे में आपसी बातचीत और समझदारी के जरिए रिश्ता बनाने का प्रयास करना चाहिए. उन को अपने कामकाज के साथ ही साथ अपने लिए स्पेस निकालना चाहिए. पतिपत्नी दोनों के ही पास करीबी लोगों का अभाव होता है. ऐसे में पतिपत्नी ही सब से अच्छे दोस्त होते हैं.

सब से बड़ी बात यह है कि हर कपल को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना चाहिए और यह उपन्यासों, कहानियों, लेखों, समाचारपत्र, पत्रिकाओं को पढ़ कर, सिर्फ सुन कर नहीं, ही बढ़ सकता है. सुनते समय या स्क्रीन पर देखते समय रुक कर किसी भी बताए जा रहे मामले को अपनी समस्या से जोड़ना असंभव है जबकि पढ़ते समय यह संभव है. सदियों तक तो पढ़ने की सुविधा नहीं थी और इसीलिए परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी मशीनों की तरह एकदूसरे की भावनाओं से अपरिचित रहते थे.

आज जब पड़ोसी, रिश्तेदार, दोस्त कम होने लगे हैं तो ऐसे में किताबें ही कुछ नया रास्ता सु?ा सकती हैं, टीवी व मोबाइल नहीं. आज भी सब से ज्यादा सफल व्यवसायों में लगे लोग पढ़ने से नहीं चूकते लेकिन मध्यवर्ग ने पढ़ना छोड़ कर अपनों के बीच स्पेस क्रिएट कर लिया है.

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भरणपोषण की हकदार नहीं अपनी मरजी से पति से अलग रहने वाली पत्नी

बौम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच ने हाल ही में एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है जिस में कहा गया है कि बिना किसी ठोस कारण अपनी मरजी से पति से अलग रहने वाली पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण की हकदार नहीं है.

रत्नप्रभा प्रकाश और ध्यानाबाजी की शादी 1985 में हुई थी. रत्नाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और जून 2018 में रिटायर हुए. रिटायरमैंट तक दोनों पतिपत्नी साथ रहे. रिटायरमैंट के बाद रत्नाकर अपने गांव चले गए लेकिन ध्यानाबाजी पति के साथ गांव जाने को तैयार नहीं हुईं. यहीं से दोनों के बीच विवाद बढ़ा और मामला कोर्ट पहुंचा. कोर्ट में ध्यानाबाजी ने आरोप लगाया कि पति ने उन के साथ दुर्व्यवहार किया और दूसरी महिला के साथ रहते हैं लेकिन इन दोनों आरोपों को वह कोर्ट में साबित नहीं कर पाई.

ध्यानाबाजी 34 साल तक पति के साथ रही. उस दौरान दोनों के बीच कोई विवाद नहीं हुआ. रिटायरमैंट के बाद गांव जाने की वजह से दोनों के बीच दूरियां पैदा हुईं. सीआरपीसी की धारा 125(4) के अनुसार, ‘‘जो पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण की हकदार नहीं है.’’ इस मामले में पति की ओर से कोई गलत व्यवहार साबित नहीं हुआ, इसलिए पत्नी का भरणपोषण का दावा खारिज हो गया.

फैमिली कोर्ट ने पहले ही पत्नी का दावा खारिज कर दिया था. अब हाईकोर्ट ने भी पत्नी की रिवीजन याचिका खारिज कर दी. सीआरपीसी की धारा 125 केवल जरूरतमंद पत्नी को सुरक्षा देता है वहीं धारा 125(4) साफतौर पर कहती है कि यदि पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से मना करती है तो वह भरणपोषण नहीं पा सकती.

पर्याप्त कारणों में क्रूरता, खतरा, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शामिल हैं. हर केस के तथ्य अलग होते हैं. अगर पत्नी के पास क्रूरता या खतरे के ठोस सुबूत हों तो कोर्ट भरणपोषण दे सकती है. यह फैसला सिर्फ उन मामलों पर लागू होता है जहां अलगाव पूरी तरह मरजी से हो. Husband Wife Dispute

 

मौलिक अधिकारों का हनन करती धर्मप्रचार राजनीतिक पार्टियां

Fundamental Right: भारत में राजनीतिक विचारधारा दो मार्गीय है. एक तरफ धर्म का प्रचार करती पार्टियां हैं तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्ष. केंद्र से ले कर प्रदेश स्तर तक धर्म के आधार पर यह वैचारिक विभाजन साफ है. आज यही विभाजन चुनावी मुद्दा बन गया है. शासन, सुशासन, विकास और मौलिक अधिकार अब चुनावी मुद्दे नहीं रहे.

जदयू के संस्थापक नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य बन गए तो बिहार की राजनीति से उन का रिश्ता टूट गया और नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, कर्पूरी ठाकुर युग का अंत हो गया जिस में गैरधार्मिक पार्टियां शासन कर रही थीं.

धार्मिक और गैरधार्मिक जिन को धर्मनिरपेक्ष माना जाता है के राजकाज में मुख्य अंतर नीति निर्माण के आधार और प्राथमिकताओं में होता है. धार्मिक पार्टियां पहचान और सांस्कृतिक पहचान को अपना आधार बना कर राजनीति करती हैं. इन से समस्या यह होती है कि एक तरफ ये अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खतरा और बहुसंख्यवाद को बढ़ावा देती हैं और दूसरी तरफ धार्मिक कर्मकांडों को सरकारी नीतियों का हिस्सा बना लेती हैं.

गैरधार्मिक पार्टियां धर्मनिरपेक्षता, विकास और संवैधानिक नागरिक समानता व अधिकारों के आधार पर राजनीति करती हैं. इन की नीतियां तर्कसंगत, साक्ष्य आधारित और संवैधानिक नियमों व सिद्धांतों पर आधारित होती हैं. ये शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, रोजगार और कानून का शासन जैसे कामों पर ध्यान देती हैं. इन के निर्णय धर्म आधारित भेदभाव के बिना सभी नागरिकों के लिए समान होते हैं.

धार्मिक पार्टियां इन पर विरोधी सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा करने का आरोप लगाती हैं. धार्मिक पार्टियां आस्था को शासन का केंद्र मानती हैं जबकि गैरधार्मिक पार्टियां ‘नागरिक अधिकार’ और ‘विकासात्मक समानता’ व संविधान की भावना को प्राथमिकता देती हैं

बिहार को कितना बदल पाए नीतीश कुमार

नीतीश कुमार लगभग 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इतना समय कम नहीं होता. वे समाजवादी विचारधारा के नेता हैं. जयप्रकाश नारायण, डाक्टर राममनोहर लोहिया, कपूर्री ठाकुर की विचारधारा को आगे ले कर वे चले. उन के साथ शरद यादव, जौर्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान जैसे नेता थे.

सत्ता की चाह में गैरकांग्रेसवाद के नारे पर समाजवादी विचारधारा के नेता 1977 से जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के करीब आए. इस के बाद समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता विचार पीछे छूटते गए. नीतीश कुमार भी खुद को धर्मनिरपेक्ष कहतेकहते हकीकत में धर्म की राजनीति करने वालों के साथ खड़े ही नहीं हो गए, उन कामों में सक्रिय हाथ बंटाने भी लगे.

नीतीश कुमार लगभग वैसे ही भाजपा के साथ बिहार सरकार चलाते रहे जैसे दूसरे भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें चलाई जा रही हैं. और, करदाताओं का पैसा धार्मिक पाखंडों पर खर्च ही नहीं किया गया, लोगों को उकसाया भी गया कि वे समाजवाद को छोड़ कर वर्णव्यवस्था, हिंदूमुसलिम भेद, निरंतर पूजापाठ को अपना लें. नीतीश कुमार ने समाजवादी सोच को छोड़ कर धर्म के पाखंड में बिहार की जनता को धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने पुनौरा धाम के विकास के लिए बिहार की गरीब जनता के 882 करोड़ रुपए राममंदिर की तर्ज पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए दिए.

नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाईटेड की नीतियों को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी की नीतियों का भगवा चोंगा पहन लिया था और गया में विष्णुपद मंदिर के आसपास के घाटों का सौंदर्यीकरण में करदाताओं का पैसा फूंक दिया. यही नहीं, रामायण सर्किट व शिव शक्ति सर्किट के तहत अहल्या स्थल, मुंडेश्वरी देवी धाम पर पैसा फूंका. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहते कोविड के दिनों में बिहारी मजदूरों को दूसरे राज्यों से रेलों से नहीं ला पाए. उन्हें सैकड़ों मील पैदल चल कर आना पड़ा. कोविड के संक्रमण का खतरा ले कर रेलों और बसों को आसानी से चलवाया जा सकता था.

नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी को खुश करने के लिए उस के मंदिर एजेंडे को बढ़ाने के लिए सैकड़ों मंदिरों की चारदीवारियों पर जनता का कर से वसूला पैसा लगाया. मैथिली ब्राह्मणों को खुश करने के लिए कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाईटेड को समाजवादी सैक्यूलर पार्टी से धार्मिक पार्टी बना डाला. उन के विधायकों ने विरोध नहीं किया जबकि वे लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल व कांग्रेस के सहयोग से सैक्युलर वोटों से जीत कर आए थे. सत्ता और बंगले की चाहत इतनी जोरदार रही कि सब के सब गंगा आरती जैसे व्यर्थ के पूजापाठ और शहरों के गंगा किनारे मैरीन ड्राइवों को स्नान घाटों में बदलने को तैयार हो गए.

बिहार की बदहाली तो एक नमूना है. देशभर में सैक्युलर गैरधार्मिक पार्टियां भी भारतीय जनता पार्टी के कुछ वोट बटोरने के चक्कर में आमतौर पर धार्मिक मामलों में सरकारी खजाने का मुंह खोल ही देती हैं. नीतीश कुमार एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अनुसरण करने लगे हैं और जनता दल यूनाईटेड अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों घटकों में से एक बन कर रह गया है.

धर्म की राजनीति से पिछड़ गए यूपी और बिहार

यह नहीं भूलना चाहिए कि राम मंदिर को ले कर चलने वाली पार्टी भाजपा शासित महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रतिव्यक्ति आय कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से काफी पीछे है. कर्नाटक की प्रतिव्यक्ति आय 2,04,605 रुपए, तमिलनाडु 1,96,309 रुपए और तेलंगाना की 1,87, 912 रुपए है. इन के मुकाबले उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय 1,08,572 रुपए, बिहार की 69,321 रुपए मात्र है.

बिहार 20 सालों के नीतीश कुमार के सुशासन के बावजूद दक्षिणी राज्यों से कहीं पिछड़ा रहा क्योंकि इन 20 सालों में नीतीश कुमार का गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के साथ ही ज्यादा रहा. उत्तर प्रदेश और बिहार विकास की दौड़ में सब से पीछे हैं तो इस की सब से बड़ी वजह यह है कि 1990 के बाद से इन राज्यों में उन राजनीतिक पार्टियों का कब्जा हो गया जो जाति और धर्म पर सरकार चला रही थीं. उन का प्रदेश के विकास से कोई लेनादेना नहीं है. बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नया काम नहीं हुआ कि जिस से इन के आने वाले कल में कोई सुधार दिखता हो. नीतीश कुमार ने 20 सालों के सुशासन के बावजूद भाजपा के सहयोग के कारण उन के राज्य की स्थिति भाजपा शासित दूसरे राज्यों से और ज्यादा खराब रही.

राजस्थान की प्रतिव्यक्ति आय 1,67,964 रुपए है, मध्य प्रदेश की 1,42,565 रुपए, असम की 1,35,787 रुपए, छत्तीसगढ़ की 1,47, 361 रुपए और झारखंड की 1,15,960 रुपए. सिर्फ गुजरात ही एक अपवाद है. 1960-61 से 2023-24 के बीच की तुलना करें औसत में अंतर में उत्तर प्रदेश में 31.6 फीसदी, बिहार में 37.5 फीसदी, राजस्थान में 5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 5 फीसदी आय घटी है जबकि तेलंगाना की 103.7 फीसदी, कर्नाटक की 84 फीसदी, केरल की 67.9 फीसदी तमिलनाडु की 61.9 फीसदी और आंध्र प्रदेश की 41.7 फीसदी आय बढ़ी है.

1947 में जब देश आजाद हुआ, उस के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव शुरू हुए तो कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए चुनावी घोषणाएं नहीं कीं बल्कि चुनाव जीतने के बाद विकास के काम किए. इन में आईआईटी, एम्स, पावर प्लांट प्रमुख थे. जब देश और प्रदेश पर धार्मिक सरकारों का राज स्थापित हुआ तो वहां पर मंदिरों का विकास ज्यादा होने लगा. अयोध्या, काशी और मथुरा, गया, सीतामढ़ी के मंदिरों से जितनी आय प्रदेश को हो रही है उतनी आय किसी उद्योग से नहीं हो रही.

धर्म की राजनीति करने वाले दलों के सामने धर्म की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती होती है. इन दलों को यह लगता है कि अगर धर्म के एजेंडे को पूरा नहीं करेंगे तो उन को वोट नहीं मिलेगा. भारतीय जनता पार्टी ने शुरू से ही अपने वोटर से 3 मुद्दों पर वोट मांगा था. इन में पहला अयोध्या में राम मंदिर, दूसरा कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करना और तीसरा समान नागरिक संहिता कानून बनाना था.

भाजपा सत्ता में आई तो उस ने अपने ये काम पूरे किए. भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में अच्छे दिन, विकास, बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी जैसे और भी तमाम बातें थीं लेकिन इन को पूरा नहीं किया गया और भाजपा व उस के सहयोगी दल इन की बातें नहीं करते.

क्या हुआ बुलेट ट्रेन का

मोदी सरकार की बुलेट ट्रेन योजना अभी भी पूरी नहीं हुई है. इस की योजना 2014 में बनी थी. मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना का काम अभी तक पूरा नहीं हुई है. इस पर अभी भी काम चल रहा है. 508 किलोमीटर लंबे कौरिडोर में से 320 किलोमीटर से अधिक का वायाडक्ट यानी पुल का काम पूरा बताया जा रहा है.

सूरत, वापी, बिलिमोरा, भरूच और वडोदरा सहित गुजरात के कई स्टेशनों पर काम तेज गति से चल रहा है. पहली बुलेट ट्रेन 350 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से दौड़ने के लिए तैयार की जा रही है. इस में पूरा संदेह है कि यह छोटी दूरी की बुलेट ट्रेन हवाई यात्रियों को आकर्षित करेगी. बुलेट ट्रेन की बात दब जाए, इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही नईनई वंदे भारत रेल गाडि़यों को चलाने के लिए झंडी दिखाते रहते हैं. जो काम रेलमंत्री को करना चाहिए वह काम खुद नरेंद्र मोदी करते हैं ताकि जनता यह सवाल पूछ न सके कि बुलेट ट्रेन का क्या हुआ.

मोदी सरकार के लिए बुलेट ट्रेन से अधिक महत्त्वपूर्ण काम मंदिर बनाने का लगा. इस की वजह यह थी कि मोदी को धर्म के नाम पर वोट मिलते हैं. इसलिए न केवल राममंदिर बल्कि बिहार में सीता मंदिर, वाराणसी में काशी विश्वनाथ का मंदिर और मथुरा में मंदिरों का दर्शन करने के लिए विकसित किया गया. नीतीश कुमार ने पहले तो आनाकानी की पर बाद में वे नरेंद्र मोदी के रंग में नहा गए.

धर्म पर राजनीति करने वाले दल धर्म के आसपास ही अपना विकास देखते हैं. यह बात केवल भारत की ही नहीं है, दुनिया के तमाम देश अब धर्म की राजनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे चर्च की राजनीति का प्रभाव रहा है.

नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और भारत एक ही तरह के राजकाज से धर्म की राजनीति चलाते रहे हैं. दक्षिण एशिया के इन सभी देशों पर धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता का खतरा मंडरा रहा है. इन देशों में धार्मिक कट्टरता लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा है. चिंताजनक बात यह है कि यह तेजी से बढ़ रही है. राजशाही का खात्मा कर के जनता ने अपने लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चुनी थी. अब नेपाल को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश हो रही थी जो फिलहाल नए चुनावों के बाद शायद रुकी है. यही हाल बंगलादेश का हुआ है. श्रीलंका में लोकतंत्र खत्म हो गया है.

भारत के आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू समर्थक दलों के लोग नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे पर फिलहाल यह टल गया है क्योंकि बालेन शाह की सरकार धर्म को कोई महत्त्व नहीं दे रही. श्रीलंका में अहिंसा में विश्वास रखने वाले बौद्ध धर्म के कई भिक्षुओं ने मुसलमानों और तमिल हिंदुओं के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. मुसलमानों के धार्मिक स्थलों और उन की बस्तियों पर अकसर हमले किए जाते हैं. देश में मुसलमानों के खिलाफ नफरत में तेजी से वृद्धि हुई है. पहले तमिलईलम को ले कर लंबा गृहयुद्ध चला था.

बर्मा यानी म्यांमार में तो बौद्ध भिक्षु ही नहीं, वहां की सरकार भी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ है. सैकड़ों रोहिंग्या मुसलमान मारे जा चुके हैं और उन की कई बस्तियां जला कर खाक कर दी गईं. हजारों रोहिंग्या भाग कर दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. बंगलादेश में मुसलिम कट्टरपंथी संगठन जोर पकड़ रहे हैं. धर्म के नाम पर कई प्रमुख आतंकवादी संगठन अस्तित्व में आए हैं. वहां के हिंदू अल्पसंख्यक खतरे में हैं. उन के साथ हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं. धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और शोषण के मामले धीरेधीरे बढ़ते जा रहे हैं. हर साल हजारों हिंदू बंगलादेश छोड़ कर भारत में शरण ले रहे हैं. बर्मा का आर्थिक विकास पड़ोसी थाईलैंड, इंडोनेशिया, सिंगापुर, चीन से कहीं कम है.

पाकिस्तान में लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा ही वहां के धार्मिक कट्टरपंथियों से है. धार्मिक कट्टरपंथ का मुकाबला करने में वहां का लोकतंत्र फेल हो गया है. ईशनिंदा जैसे विषयों से जुड़े कानूनों ने धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यक पहले से अधिक असहाय व असुरक्षित हो गए हैं. धार्मिक कट्टरपंथ देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर भी असर डालने लगे हैं. दूसरे राजनीतिक दलों में धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करने का संकल्प खत्म हो गया है.

भारत में 80 बनाम 20 की बात कर के 1980 के बाद सभी चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं. ‘बंटोगे तो कटोगे’ जैसे नारे भारत की हालत को बताने में सक्षम है. पहले दक्षिण एशिया में भारत, सब से गरीब होने के बावजूद, मजबूत लोकतंत्र माना जाता था. हिंदू समर्थक दक्षिणपंथी दल के अपने बल पर सत्ता में आने से यहां भी सवाल खड़े हो गए हैं. भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग चल रही है. एक तरह से 20 फीसदी अल्पसंख्यकों को राजनीति की मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया है. चुनाव आयोग को अब इस का ठेका दे दिया गया है कि वह भाजपा के धार्मिक एजेंडे को अमलीजामा पहनाए.

धार्मिक कट्टरपंथी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते और जनता के मौलिक अधिकारों के हनन से पीछे नहीं हटते. दक्षिण एशिया देशों में जो गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और पिछड़ापन है, इस की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरवाद ही है. इस का समाधान धार्मिक कट्टरवाद में नहीं, बल्कि केवल उदार, सभी को अधिकार देने वाले लोकतंत्र में निहित है.

लोकतंत्र में सरकार का काम देश चलाने का होता है. मंदिर चलाना सरकार का काम नहीं होता. जबकि, मौजूदा सरकार मंदिर चलाने में जुटी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस की मिसाल हैं. नीतीश कुमार ने कुछ दिनों इस का विरोध किया, फिर वे भी इसी राह पर चल पड़े. उन्होंने बिहार के साथ पूरे उत्तर भारत का नाश कर दिया है.

सरकार का काम मंदिर चलाने का नहीं

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने यह साबित करने का काम किया कि सरकार का काम मंदिर चलाने का भी है. इस का बड़ा उदाहरण अयोध्या का राम मंदिर, काशी विश्वनाथ और मथुरा का मंदिर है. जहां प्रधानमंत्री लगातार आतेजाते रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने कार्यकाल के दौरान प्रमुख मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लिया.

नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया तो चुनाव क्षेत्र के रूप में वाराणसी को चुना, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर मुद्दा था. अयोध्या, काशी और मथुरा भाजपा के एजेंडे में थे. वाराणसी से सांसद बनने के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री ने काशी के विकास पर ध्यान दिया. वहां काशी विश्वनाथ मंदिर और काशी तमिल संगम जैसे आयोजन किए. इस के बाद गुजरात में सोमनाथ मंदिर दर्शन और शौर्ययात्रा में हिस्सा लिया. इस के बाद महाराष्ट्र के नासिक में कालाराम मंदिर में पूजा की.

नरेंद्र मोदी ने दक्षिण भारत के लगभग सभी बड़े मंदिरों की यात्राएं की हैं. केरल में गुरुवयूर और श्री रामास्वामी मंदिर में फोटो खिंचाए. इस के अलावा आंध्र प्रदेश लेपाक्षी के वीरभद्र मंदिर और तमिलनाडु के रामेश्वरम, श्रीरंगम के प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए. नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी मंदिर का दौरा किया था. इस के अलावा वे उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ, असम में कामाख्या मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों का भी नियमित रूप से दौरा करते रहे हैं. चुनावों के बीच उन्हें टूटे पुल देखने का मौका नहीं मिलता पर कोई मंदिर नहीं छोड़ते.

मथुरा के कृष्ण मंदिर में प्रधानमंत्री के रूप में गए. अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास और उद्घाटन के मौके पर वे मुख्य जजमान की भूमिका में रहे. 2024 के राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले उन्होंने 11 दिनों तक देशभर के कई प्रसिद्ध मंदिरों का दौरा किया. देशभर के मंदिरों में उन के दौरे तो हुए ही, मंदिर वाले शहरों को चमकाने में सरकारी पैसे को बेतहाशा विकास के नाम पर खर्च किया गया. यह साबित करने की कोशिश की गई कि मंदिरों के जरिए पैसा कमाया जा सकता है. उत्तर प्रदेश के महाकुंभ को भव्य से भव्य तरह से आयोजित किया गया और गंगा के पानी से ज्यादा करदाता का पैसा बहा.

2025 के साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धार्मिक यात्राओं को देखें तो

5 फरवरी, 2025 को प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में त्रिवेणी तट पर संगम में डुबकी लगाई और पूजा की.

2 मार्च को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन और विशेष पूजा की. 6 मार्च को मुखवा मंदिर जहां गंगा शीतकालीन विश्राम करती है वहां पूजा और गंगा आरती की.

11 अप्रैल, 2025 को गुरुजी महाराज मंदिर ईसागढ़, मध्य प्रदेश के आनंदपुर धाम कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 6 अप्रैल, 2025 को रामानाथ स्वामी मंदिर में रामनवमी के अवसर पर पूजन तथा नए पंबन ब्रिज कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 11 अप्रैल, 2025 को गुरुजी महाराज मंदिर, आनंदपुर धाम परिसर में पूजा के कार्यक्रम में भागीदारी की. 27 जुलाई, 2025 को बृहदस्वरा मंदिर दर्शन के लिए पहुंचे. वहां मंदिर में चोल इतिहास से जुड़े उत्सव में हिस्सा लिया.

22 सितंबर, 2025 का माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर उदयपुर, त्रिपुरा में मंदिर परिसर के उद्घाटन कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 30 सितंबर, 2025 को चितरंजन पार्क के दुर्गा मंदिर, दिल्ली में नवरात्र के दौरान पूजाअर्चना कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 16 अक्तूबर, 2025 को श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर में पूजा की.

15 नवंबर, 2025 को देवमोगरा मंदिर नर्मदा, गुजरात में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर दर्शन किए. इस के बाद 25 नवंबर, 2025 राम जन्मभूमि मंदिर शिखर पर ध्वज आरोहण तथा पूजा की. 25 नवंबर, 2025 को ब्रह्म सरोवर मंदिर कुरुक्षेत्र, हरियाणा में दर्शन और पूजा की. 28 नवंबर, 2025 श्री पुतिगे श्री कृष्ण मठ उडुपी, कर्नाटक मंदिर दर्शन और पूजा कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 28 नवंबर, 2025 को ही श्री संस्थान गोकर्ण पर्तगाली जीवोत्तम मठ कानाकोना, गोवा में आध्यात्मिक यात्रा और दर्शन किए.

यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भी विदेश यात्राएं कीं, वहां भी वे हिंदुओं के नए व पुराने मंदिरों के दर्शन अवश्य करने गए. 2024 में यूएई के आबूधाबी के हिंदू मंदिर की स्थापना में नरेंद्र मोदी गए. इस को खाड़ी देशों में बना पहला भव्य मंदिर माना जाता है. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी नेपाल गए. वहां पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा की. तब वहां धर्मनिष्ठ कम्युनिस्टों की सरकार थी. बाली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया के मंदिर में दर्शन किया. 2016 में केन्या के इस्कौन मंदिर में वे दर्शन करने गए. इसी तरह से आस्ट्रेलिया के सिडनी मंदिर में पूजा की.

किसी भी देश की उन्नति उस के लोगों की पूजापाठ से नहीं बल्कि निर्माण से, उत्पादन से, सही प्रबंध से होती है. इस के लिए चर्च, मसजिद, गुरुद्वारे या मंदिरों में आस्था की बाढ़ नहीं चाहिए बल्कि अर्थव्यवस्था और कानूनी संस्थाओं में जनता के विश्वास की जरूरत होती है. हर धार्मिक पार्टी नागरिक के बहुत से मानव अधिकार उस से छीन कर पूजापाठ कराने वाली संस्थाओं के हाथों गिरवी रख देती है. Fundamental Right

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