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Family Story : टूटते जुड़ते सपनों का दर्द – मुदित ने क्या लिखा था पत्र में?

Family Story : 7कालेज की लंबी गोष्ठी ने प्रिंसिपल गौरा को बेहद थका डाला था. मौसम भी थोड़ा गरम हो चला था, इसलिए शाम के समय भी हवा में तरावट का अभाव था. उन्होंने जल्दीजल्दी जरूरी फाइलों पर हस्ताक्षर किए और हिंदी की प्रोफेसर के साथ बाहर आईं. अनुराधा की गाड़ी नहीं आई थी, सो उन्हें भी अपनी गाड़ी में साथ ले लिया. घर आने पर अनुराधा ने बहुत आग्रह किया कि चाय पी कर ही वे जाएं, लेकिन एक तो गोष्ठी की गंभीर चर्चाओं पर बहस की थकान, दूसरे मन की खिन्नता ने वह आमंत्रण स्वीकार नहीं किया. वे एकदम अपने कमरे में जाना चाह रही थीं.

सुबह से ही मन खिन्न हो उठा था. अगर यह अति आवश्यक गोष्ठी नहीं होती तो वे कालेज जाती भी नहीं. आज की सुबह आंखों में तैर उठी. कितनी खुश थीं सुबह उठ कर. सिरहाने की लंबी खिड़की खोलते ही सिंदूरी रंग का गोला दूर उठता हुआ रोज नजर आता. आज भी वे उस रंग के नाजुक गाढ़ेपन को देख कर मुग्ध हो उठी थीं. तभी पड़ोस में रहने वाली अनुराधा के नौकर ने बंद लिफाफा ला कर दिया, जो कल शाम की डाक से आया था और भूल से उन के यहां डाकिया दे गया था.

उसी मुदित भाव से लिफाफा खोला. छोटी बहन पूर्वा का पत्र था उस में. गोल तकिए पर सिर टेक कर आराम से पढ़ने लगीं, लेकिन पढ़तेपढ़ते उन का मन पत्ते सा कांपने लगा और चेहरे से जैसे किसी ने बूंदबूंद खुशी निचोड़ ली थी. ऐसा लगा कि वे ऊंची चट्टान से लुढ़क कर खाई में गिर कर लहूलुहान हो गई हैं. जैसे कोई दर्द का नुकीला पंजा है जो धीरेधीरे उन की ओर खौफनाक तरीके से बढ़ता आ रहा है. उन की आंखों से मन का दर्द पानी बन कर बह निकला.

दरवाजे की घंटी बजी. दुर्गा आ गई थी काम करने. गौरा ने पलकों में दर्द समेट लिया और कालेज जाने की तैयारी में लग गईं. मन उजाड़ रास्तों पर दौड़ रहा था, पागल सा. आंखें खुली थीं, पर दृष्टि के सामने काली परछाइयां झूल रही थीं. कितनी कठिनाई से पूरा दिन गुजारा था उन्होंने. हंसीं भी, बोलीं भी, कई मुखौटे उतारतीचढ़ाती भी रहीं, परंतु भीतर का कोलाहल बराबर उन्हें बेरहमी से गरम रेत पर पछाड़ता रहा. क्या पूर्वा का जीवन संवारने की चेष्टा व्यर्थ गई? क्या उन के हाथों कोई अपराध हुआ है, जिस की सजा पूरी जिंदगी पूर्वा को झेलनी होगी?

अपने कमरे में आ कर वे बिस्तर पर निढाल हो कर पड़ गईं. मैले कपड़ों की खुली बिखरी गठरी की तरह जाने कितने दृश्य आंखों में तैरने लगे. विचारों का काफिला धूल भरे रास्तों में भटकने लगा.

3 भाइयों के बाद उन का जन्म हुआ था. सभी बड़े खुश हुए थे. कस्तूरी काकी और सोना बूआ बताती रहती थीं कि 7 दिन तक गीत गाए गए थे और छोटेबड़े सभी में लड्डू बांटे गए थे. बाबा ने नाम दिया, गौरा. सोचा होगा कि बेटी के बाद और लड़के होंगे. इसी पुत्र लालसा के चक्कर में 2 बहनें और हो गईं. तब न गीत गाए गए और न लड्डू ही बांटे गए.

कहते हैं न कि जब लोग अपनी स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति मनचाहे ढंग से प्राप्त नहीं कर पाते हैं तब घर के द्वारदेहरी भी रुष्ट हो जाते हैं. वहां यदि अपनी संतान में बेटाबेटी का भेद कर के निराशा, कुंठा, निरादर और घृणा को बो दिया जाए तो घर एक सन्नाटा भरा खंडहर मात्र रह जाता है.

उस भरेपूरे घर में धीरेधीरे कष्टों के दायरे बढ़ने प्रारंभ होने लगे. बड़े भाई छुट्टी के दिन अपने साथियों के साथ नदी स्नान के लिए गए थे. तैरने की शर्त लगी. उन्हें नदी की तेज लहरें अपने चक्रवात में घेर कर ले डूबीं. लौट कर आई थी उन की फूली हुई लाश. घर भर में कुहराम मच गया था. मां और बाबूजी पागल हो उठे. बाबा की आंखें सूखे कुएं की तरह अंधेरों से अट गईं.

धीमेधीमे शब्दों में कहा जाने लगा कि तीनों लड़कियां भाई की मौत का कारण बनी हैं. न तीनों नागिनें पैदा होतीं और न हट्टाकट्टा भाई मौत का ग्रास बनता. समय ने सभी के घावों को पूरना शुरू ही किया था कि बीच वाले भाई हीरा के मोतीझरा निकला. वह ऐसा बिगड़ा कि दवाओं और डाक्टरों की सारी मेहनत पर पानी फेरता रहा.

मौत फिर दबेपांव आई और चुपचाप अपना काम कर गई. इस बार के हाहाकार ने आकाश तक हिला दिया. पिता एकदम टूट गए. 20 वर्ष आगे का बुढ़ापा एक रात में ही उन पर छा गया था. बाबा खाट से चिपक गए थे. मां चीखचीख कर अधमरी हो उठीं और बिना किसी लाजहिचक के जोरजोर से घोषणा करने लगीं कि मेरी तो लड़कियां ही साक्षात मौत बन कर पूरा कुनबा खत्म करने आई हैं. इन का तो मुंह देखना भी पाप है.

महल्ला, पड़ोस, रिश्तेदार सभी परिवार के सदस्यों के साथ तीनों बहनों को भरपूर कोसने लगे. अपने ही घर में तीनों किसी एकांत कोने में पड़ी रहतीं, अपमानित और दुत्कारी हुईं. न कोई प्यार से बोलता, न कोई आंसू पोंछता. तीनों की इच्छाएं मर कर काठ हो गईं. लाख सोचने पर भी वे यह समझ नहीं पाईं कि भाइयों की मृत्यु से उन का क्या संबंध है, वे मनहूस क्यों हैं.

तीसरा भाई बचपन से जिद्दी व दंगली किस्म का था. अब अकेला होने पर वह और बेलगाम हो गया था. सभी उसी को दुलारते रहते. उस की हर जिद पूरी होती और सभी गलतियां माफ कर दी जातीं. नतीजा यह हुआ कि वह स्कूल में नियमित नहीं गया. उलटेसीधे दोस्त बन गए. घर से बाहर सुबह से शाम तक व्यर्थ में घूमता, भटकता रहता. ऐसे ही गलत भटकाव में वह नशे का भयंकर आदी हो गया. न ढंग से खाता, न नींद भर सो पाता था. मातापिता से खूब जेबखर्च मिलता. कोई सख्ती से रोकनेटोकने वाला नहीं था. एक दिन कमरे में जो सोया तो सुबह उठा ही नहीं. उस के चारों ओर नशीली गोलियों और नशीले पाउडरों की रंग- बिरंगी शीशियां फैली पड़ी थीं और वह मुंह से निकले नीले झाग के साथ मौत की गोद में सो रहा था.

उस की ऐसी घिनौनी मौत को देख कर तो जैसे सभी गूंगेबहरे से हो उठे थे. पूरे पड़ोस में उस घर की बरबादी पर हाहाकार मच गया था. कहां तक चीखतेरोते? आंसुओं का समंदर भीतर के पहाड़ जैसे दुख ने सोख लिया था. घर भर में फैले सन्नाटे के बीच वे तीनों बहनें अपराधियों की तरह खुद को सब की नजरों से छिपाए रहती थीं. उचित देखभाल और स्नेह के अभाव में तीनों ही हर क्षण भयभीत रहतीं. अब तो उन्हें अपनी छाया से भी भय लगने लगा था. दिन भर उन्हें गालियां दे कर कोसा जाता और बातबात पर पिटाई की जाती.

जानवर की तरह उन्हें घर के कामों में जुटा दिया गया था. वे उस घर की बेटियां नहीं, जैसे खरीदी हुई गुलाम थीं, जिन्हें आधा पेट भोजन, मोटाझोटा कपड़ा और अपशब्द इनाम में मिलते थे. पढ़ाई छूट गई थी. गौरा तो किसी तरह 10वीं पास कर चुकी थी लेकिन छोटी चित्रा और पूर्वा अधिक नहीं पढ़ पाईं. जब भी सगी मां द्वारा वे दोनों जानवरों की तरह पीटी जातीं, तब भयभीत सी कांपती हुई दोनों बड़ी बहन के गले लग कर घंटों घुटीघुटी आवाज में रोती रहती थीं.

कुछ भीतरी दुख से, कुछ रातदिन रोने से पिता की आंखें कतई बैठ गई थीं. वे पूरी तरह से अंधे हो गए थे. मां को तो पहले ही रतौंधी थी. शाम हुई नहीं कि सुबह होने तक उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था. बाबा का स्नेह उन बहनों को चोरीचोरी मिल जाया करता था लेकिन शीघ्र ही उन की भी मृत्यु हो गई थी.

पिता की नौकरी गई तो घर खर्च का प्रश्न आया. तब बड़ी होने के नाते गौरा अपना सारा भय और अपनी सारी हिचक,  लज्जा भुला कर ट्यूशन करने लगी थी. साथ ही प्राइवेट पढ़ना शुरू कर दिया. बहनों को फिर से स्कूल में दाखिला दिलाया. तीनों बहनों में हिम्मत आई, आत्मसम्मान जागा.

तीनों मांबाबूजी की मन लगा कर सेवा करतीं और घरबाहर के काम के साथसाथ पढ़ाई चलती रही. वे ही मनहूस बेटियां अब मां और बाबूजी की आंखों की ज्योति बन उठी थीं, सभी की प्रशंसा की पात्र. महल्ले और रिश्तेदारी में उन के उदाहरण दिए जाने लगे. घर में हंसीखुशी की ताजगी लौट आई. इस ताजगी को पैदा करने में और बहनों को ऊंची शिक्षा दिलाने में वे कब अपने तनमन की ताजगी खो बैठीं, यह कहां जान सकी थीं? विवाह की उम्र बहुत पीछे छूट गई थी. छोटेबड़े स्कूलों का सफर करतेकरते इस कालेज की प्रिंसिपल बन गईं. घर में गौरा दीदी और कालेज में प्रिंसिपल डा. गौरा हो गई थीं. छोटी दोनों बहनों की शादियां उन्होंने बड़े मन से कीं. बेटियों की तरह विदा किया.

चित्रा के जब लगातार 5 लड़कियां हुईं, तब उस को ससुराल वालों से इतने ताने मिले, ऐसीऐसी यातनाएं मिलीं कि एक बार फिर उस का मन आहत हो उठा. बहुत समझाया उन लोगों को. दामाद, जो अच्छाखासा पढ़ालिखा, समझदार और अच्छी नौकरी वाला था, उसे भी भलेबुरे का ज्ञान कराया, परंतु सब व्यर्थ रहा.

चित्रा की ससुराल के पड़ोस में ही सुखराम पटवारी की लड़की सत्या की शादी हुई थी. उस ने आ कर बताया था, ‘बेकार इन पत्थरों के ढोकों से सिर फोड़ती हो, दीदी. उन पर क्या असर होने वाला है? हां, जब भी तुम्हारे खत जाते हैं या उन्हें समाज, संसार की बातें समझाती हो, तब और भी जलीकटी सुनाती हैं चित्रा की सास और जेठानी. जिस दामाद को भोलाभाला समझती हो, वह पढ़ालिखा पशु है. मारपीट करता है. हर समय विधवा ननद तानों से चित्रा को छलनी करती रहती है. चित्रा तो सूख कर हड्डियों का ढांचा भर रह गई है. बुखार, खांसी हमेशा बनी रहती है. ऊपर से धोबिया लदान, छकड़ा भर काम.’’

वे कांप उठी थीं सत्या से सारी बातें सुन कर. उस के लिए उन का मन भीगभीग उठा था. बचपन में मां से दुत्कारी जाने पर वे उसे गोदी में छिपा लेती थीं. उन की विवशता भीतर ही भीतर हाहाकार मचाए रहती थी.

एक दिन बुरी खबर आ ही गई कि क्षयरोग के कारण चित्रा चल बसी है. शुरू से ही अपमान से धुनी देह को क्षय के कीटाणु चाट गए अथवा ससुराल के लोग उस की असामयिक मौत के जिम्मेदार रहे? प्रश्नों से घिर उठीं वे हमेशा की तरह.

और इधर आज महीनों बाद मिला यह पूर्वा का पत्र. क्या बदल पाईं वे बहनों का जीवन? सोचा था कि जो कुछ उन्हें नहीं मिला वह सबकुछ बहनों के आंचल में बांध कर उन के सुखीसंपन्न जीवन को देखेगी. कितनी प्रसन्न होगी जीवन की इस उतरती धूप की गहरी छांव में. अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाएं और मेहनत से कमाई पाईपाई उन पर न्योछावर कर दी थी. हृदय की ममता से उन्हें सराबोर कर के अपने कर्तव्यों का एकएक चरण पूरा किया परंतु…

पंखे की हवा से जैसे पूर्वा के पत्र का एकएक अक्षर उन के सामने गरम रेत के बगलों की तरह उड़ रहा था या कि जैसे पूर्वा ही सामने बैठ कर हमेशा की तरह आंसुओं में डूबी भाषा बोल रही थी. किसे सुनाएं वे मन की व्यथा? पत्र का एक- एक शब्द जैसे लावा बन कर भीतर तक झुलसाए जा रहा था :

‘दीदी, मैं रह गई थी बंजर धरती सी सूनीसपाट. कितने वर्ष काटे मैं ने ‘बंजर’ शब्द का अपमान सहते हुए और आप भी क्या कम चिंतित और बेचैन रही थीं मेरी मानसिकता देखसुन कर? फिर भी मैं अपनेआप को तब सराहने लगी थी जब आप के बारबार समझाने पर मेरे पति और ससुराल के सदस्य किसी बच्चे को गोद लेने के लिए इस शर्त पर तैयार हो गए थे कि एकदम खोजबीन कर के तुरंत जन्मा बच्चा ही लिया जाएगा और आप ने वह दुरूह कार्य भी संपन्न कराया था.

‘‘फूल सा कोमल सुंदर बच्चा पा कर सभी निहाल हो उठे थे. सास ने नाम दिया, नवजीत. ससुर प्यार से उसे पुकारते, निर्मल. बच्चे की कच्ची दूधिया निश्छल हंसी में हम सभी निहाल हो उठे. आप भी कितनी निश्ंिचत और संतुष्ट हो उठीं, लेकिन दीदी, पूत के पांव पालने में दिखने शुरू हो गए थे. मैं ने आप को कभी कुछ नहीं बताया था. सदैव उस की प्रशंसा ही लिखतीसुनाती रही. आज स्वयं को रोक नहीं पा रही हूं, सुनिए, यह शुरू से ही बेहद हठी और जिद्दी रहा. कहना न मानना, झूठ बोलना और बड़ों के साथ अशिष्ट व्यवहार करना आदि. स्कूल में मंदबुद्धि बालक माना गया.

‘क्या आप समझती हैं कि हमसब चुप रहे? नहीं दीदी, लाड़प्यार से, डराधमका कर, अच्छीअच्छी कहानियां सुना कर और पूरी जिम्मेदारी से उस पर नजर रख कर भी उस के स्वभाव को रत्ती भर नहीं बदल सके. आगे चल कर तो कपटछल से बातें करना, झूठ बोलना, धोखा देना और चोरी करना उस की पहचान हो गई. पेशेवर चोरों की तरह वह शातिर हो गया. स्कूल से भागना, सड़क पर कंचे खेलना, उधार ले कर चीजें खाना, मारनापीटना, अभद्र भाषा बोलना आदि उस की आदत हो गई. सभी परेशान हो गए. शक्लसूरत से कैसा मनोहारी, लेकिन व्यवहार में एकदम राक्षसी प्रवृत्ति वाला.

‘उम्र बढ़ने के साथसाथ उस की आवारागर्दी और उच्छृंखलता भी बढ़ने लगी. दीदी, अब वह घर से जेवर, रुपया और अपने पिता की सोने की चेन वाली घड़ी ले कर भाग गया है. 2 दिन हो चुके हैं. गलत दोस्तों के बीच क्या नहीं सीखा उस ने? जुए से ले कर नशापानी तक. सब बहुत दुखी हैं. कैसे करते पुलिस में खबर? अपनी ही बदनामी है. स्कूल से भी उस का नाम काट दिया गया था. हम क्या रपट लिखाएंगे, किसी स्कूटर की चोरी में उस की पहले से ही तलाश हो रही है.

‘दीदी, यह कैसा पुत्र लिया हम ने? इस से अच्छा तो बांझपन का दुख ही था. यों सांससांस में शर्मनाक टीसें तो नहीं उठतीं. संतानहीन रह कर इस दोहरेतिहरे बोझ तले तो न पिसती हम लोगों की जिंदगी. पढ़ेलिखे, सुरुचिपूर्ण, सुसंस्कृत परिवार के वातावरण में उस बालक के भीतर बहता लहू क्यों स्वच्छ, सुसंस्कृत नहीं हुआ, दीदी? हमारी महकती बगिया में कहां से यह धतूरे का पौधा पनप उठा? लज्जा और अपमान से सभी का सुखचैन समाप्त हो गया है. गौरा दीदी, आप के द्वारा रोपा गया सुनहरा स्वप्न इतना विषकंटक कैसे हो उठा कि जीवन पूर्णरूप से अपाहिज हो उठा है. परंतु इस में आप का भी क्या दोष?’

पत्र का अक्षरअक्षर हथौड़ा बन कर सुबह से उन पर चोट कर रहा था. टूटबिखर तो जाने कब की वे चुकी थीं, परंतु पूर्वा के खत ने तो जैसे उन के समूचे अस्तित्व को क्षतविक्षत कर डाला था. वे सोचने लगीं कि कहां कसर रह गई भला? इन बहनों को सुख देने की चाह में उन्होंने खुद को झोंक दिया. अपने लिए कभी क्षण भर को भी नहीं सोचा.

क्या लिख दें पूर्वा को कि सभी की झोली में खुशियों के फूल नहीं झरा करते पगली. ठीक है कि इस बालक को तुम्हारी सूनी, बंजर कोख की खुशी मान कर लिया था, एक तरह से उधार लिया सुख. एक बार जी तो धड़का था कि न जाने यह कैसी धरती का अंकुर होगा? जाने क्या इतिहास होगा इस का? लेकिन तसल्ली भरे विश्वास ने इन शंकालु प्रश्नों को एकदम हवा दे दी थी कि तुम्हारे यहां का सुरुचिपूर्ण, सौंदर्यबोध और सभ्यशिष्ट वातावरण इस के भीतर नए संस्कार भरने में सहायक होगा. पर हुआ क्या?

लेकिन पूर्वा, इस तरह हताश होने से काम नहीं चलेगा. इस तरह से तो वह और भी बागी, अपराधी बनेगा. अभी तो कच्ची कलम है. धीरज से खाद, पानी दे कर और बारबार कटनीछंटनी कर के क्या माली उसी कमजोर पौधे को जमीन बदलबदल कर अपने परीक्षण में सफल नहीं हो जाता? रख कर तो देखो धैर्य. बुराई काट कर ही उस में नया आदमी पैदा करना है तुम्हें. टूटे को जोड़ना ही पड़ता है. यही सार्थक भी है.

यह सोचते ही उन में एक नई शक्ति सी आ गई और वे पूर्वा को पत्र लिखने बैठ गईं. Family Story

Love Stories In Hindi : ऐ चांद जहां वो जाएं

Love Stories In Hindi : आज से लगभग 60 साल पहले की बात है. तब मैं हरिद्वार के पन्ना लाल भल्ला इंटर कालेज में 10वीं क्लास में पढ़ता था. मेरे पिताजी हरिद्वार में स्टेशन मास्टर थे. हरिद्वार का अपना ही महत्त्व था. भारत के दूरदराज से आने वाले यात्रियों के लिए रेलगाड़ी ही एकमात्र साधन था. शायद अंगरेजों ने इसी के चलते सोचा होगा कि यहां किसी  वक्त बहुत बड़ी लड़ाई हुई होगी, इसलिए स्टेशन मास्टर साहब के रहने के लिए वैस्टर्न स्टाइल का घर बनाया.

हमारे घर की बाउंड्री वाल के साथ सड़क के किनारे पर एक झोंपड़ी थी. इस में सतीश मेरा दोस्त रहता था. उस के पिता मोची थे, जो सड़क के किनारे बैठ कर लोगों के जूतों की मरम्मत व पौलिश किया करते थे. मांबाप की इकलौती औलाद थी सतीश, जिस पर उन की उम्मीदें टिकी थीं. अपना पेट काट कर वे सतीश की पढ़ाई और देहरादून में रहने का खर्च उठाते थे. सतीश देहरादून के डीएवी कालेज से एमए इंगलिश लिटरेचर में अपनी पढ़ाई कर रहा था. लगभग 21-22 साल का नौजवान, दरमियाना कद, पतला शरीर और सब से अधिक प्रभावित करने वाली थी उस की गहरे सांवले रंग की आंखें, जो उस के काले रंग के बावजूद किसी को भी आकर्षित कर सकती थीं. उस का सपना था कि वह आईएएस अफसर बनेगा.

सतीश के इंगलिश विभाग के हैड प्रोफैसर शुक्ला का मानना था कि वह एक दिन जरूर बड़ा आदमी बनेगा. यहां तक कि वह चाहते थे कि एमए पूरी करने के बाद वह कालेज में ही इंगलिश विभाग का प्रोफैसर बने. इतनी खूबियों का मालिक होने के बावजूद वह जब भी गाता तो सुनने वाले उस के मुरीद हो जाते. वह बात करता तो ऐसा लगता मानो घंटियां बज रही हैं.

घर के ही पास रहने और देहरादून में पढ़ने के चलते मेरी दोस्ती सतीश से हो गई थी. वह गाहेबगाहे हमारे घर आता. शायद उसे अहसास हो गया था कि उस के घरेलू हालात को देखतेजानते भी हम कोई भेदभाव नहीं करते. कहना न होगा कि वह हमारे परिवार का एक सदस्य ही बन गया था. मैं भी सतीश के पास झोंपड़ी में जाता तो उस की मां बड़े प्रेम से एक पुरानी प्याली में चाय पिलाती. झोंपड़ी में घरगृहस्थी का थोड़ा सा ही सामान था. हां, सतीश की पढ़ाई की मोटीमोटी किताबें एक पुरानी लक्कड़ की अलमारी में करीने से सजी हुई थीं.

जब भी सतीश कालेज से गरमियों की छुट्टियों में हरिद्वार आता तो हम दोनों गंगा पर बने पुल मायापुर डैम, जो हमारे घर से 2 किलोमीटर और था, में शाम को साथसाथ जाते.

यों तो आज से 60 साल पहले का हरिद्वार भक्तिपूर्ण वातावरण के कारण हरि का द्वार था. गंगा की धारा पर बने मायापुरी डैम का अपना ही आकर्षण था. शाम के झुटपुटे में गंगा की पवित्र कलकल करती धारा, क्षितिज के पार सूर्य नारायण की ब्रह्मांड की यात्रा से थक कर जल धारा पर पड़ती रंगबिरंगी किरणें और गंगा के साथ मंदमंद बहती बयार हमें अलग ही दुनिया में ले जाती थी.

मायापुरी डैम के किनारे पड़ी बैंच पर हम दोनों बैठ जाते. ऐसे माहौल में सतीश अपने कालेज के बारे में खुल कर बातें किया करता था और मैं 10वीं कक्षा का छात्र उस की बातें बड़े चाव से सुनता.

उस ने बताया कि कालेज के वार्षिकोत्सव में उस ने शैक्सपियर के एक नाटक में हीरो और उस की कक्षा में पढ़ने वाली लड़की मानसी ने हीरोइन का पार्ट किया था, जिस में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला था. मानसी का जिक्र करते ही उस का चेहरा चमक उठता था.

…और फिर शुरू होता सिलसिला गानों का. मेरा चहेता गाना वह जरूर गाता था, ‘‘रमैया वस्ता वईय्या, रमैया वस्ता वईय्या, मैं ने दिल तुझ को दिया…’’

सतीश की आवाज में ऐसी कशिश थी कि डैम पर सैर करने वाले सैर छोड़ कर हमारी बैंच के आसपास व गाने सुनने को खड़े हो जाते थे. पर उस का सब से चहेता गाना था, जिसे वह पूरी शिद्दत से गाता था,    ‘‘ऐ चांद जहां वो जाएं तू भी साथ चले जाना, वैसे है कहां है वो हर रात खबर लाना…’’ गाते हुए वह किसी और ही दुनिया में खो जाता था.

10वीं कक्षा पास कर ली थी. पिताजी का भी हरिद्वार से ट्रांसफर हो गया था. मेरे जाने के दिन नजदीक आ रहे थे. पर, सतीश गरमियों की छुट्टियों में नहीं आया था. एक दिन मैं उस के मांबाप से मिलने उस की झोंपड़ी में गया, तो बाहर ताला लगा हुआ था. मैं सोच ही रहा था कि क्या करूं, तभी हमारे रेलवे के टिकट बाबू मिश्रा अंकल भी जो पास ही रेलवे क्वार्टर में रहते थे, मुझे अकसर सतीश के साथ देखते थे. वे हाथ हिला कर मुझे बुला रहे थे. मैं उन के पास चला गया. कमरे में पड़ी हुई कुरसी पर बैठते हुए मैं ने पूछा, ‘‘सतीश के घर पर ताला लगा हुआ है, क्या वे सब कहीं गए हैं?”

मिश्रा अंकल ने लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘सतीश ने कुछ दिन पहले मायापुरी डैम से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर ली है,’’ कहते हुए उन की आंखें नम हो गई थीं.

मुझे लगा कि मैं ने कुछ गलत सुन लिया है. मिश्रा अंकल रुंधे गले से बोले जा रहे थे, “गुरबीर, उस की क्लास में एक लड़की पढ़ती थी, कालेज में एक ड्रामे के दौरान उन की दोस्ती हो गई. वे एकदूसरे को चाहने लगे थे. वह जानती थी कि सतीश एमए इंगलिश में कालेज ही नहीं यूनिवर्सिटी का सब से मेधावी छात्र है. उस का आईएएस अफसर बनने का सपना साकार हो कर रहेगा.”

मैं मूक बना सुन रहा था और मिश्रा अंकल बोले जा रहे थे, ‘‘लड़की का नाम मानसी था और वह देहरादून के एक प्रतिष्ठित अमीर घराने की लड़की थी.”

सतीश ने उस से यह बात छिपाई थी कि उस के पिता एक मोची हैं और वह लोगों के जूते पौलिश, मरम्मत करते हैं. हो सकता है कि  उस ने इस डर से कि लड़की उस से मिलनाजुलना न बंद कर दे, सचाई नहीं बताई.

मैं ने देखा कि मिश्रा अंकल की पत्नी भी कमरेे में आ गई थीं. उन की भी आंखें नम थीं. मिश्रा अंकल ने कहा, ‘‘लड़की के पिता को उन के प्रेम संबंधों की जानकारी हो गई थी. उस के पिता ने हरिद्वार में रह रहे अपने मित्रों, संबंधियों से सतीश के बारे में जानकारी हासिल कर ली थी. लड़की के मातापिता हरिद्वार आए, लड़की भी उन के साथ थी. लड़की को सतीश की सचाई के बारे में पता चल चुका था. उस ने अपनी आंखों से सतीश की झोंपड़ी, जिस में उस का परिवार रहता था, सड़क के किनारे बैठे मोची को उस के पिता ने देख लिया था. लड़की ने सतीश के सामने सारी बातें खोल दी थीं, उस ने सतीश से बोलनाचालना बंद कर दिया था. लड़की के पिता ने सतीश को कालेज छोड़ने के लिए कहा और ऐसा न करने पर जान से मारने की धमकी दी. सतीश ने पढ़ाई छोड़ दी थी और वह हरिद्वार अपने मांबाप के पास आ गया था. अब वह पहले वाला आशाविश्वास से भरा सतीश नहीं रह गया था. उस ने लोगों से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. वह अपने में ही खोयाखोया सा रहता था और घर में ही पड़ा रहता था.

मिश्रा आंटी की आंखों में आंसू थे. वे कह रही थीं, ‘‘गुरबीर, कितना बुरा हुआ एक होनहार बच्चे का ऐसा दर्द भरा अंत. उस के मांबाप इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पाए. दोनों झोंपड़ी में ताला लगा कर कहीं चले गए हैं. कुछ लोग कहते हैं कि अपने गांव चले गए  है… पर पता नहीं, वे कहां गए हैं.

आज 60 साल से भी अधिक हो गए हैं, पर सतीश नहीं भूलता और न ही भूलता है उस का गाना, ‘‘ऐ चांद जहां वो जाएं तू भी साथ चले जाना…’’  Love Stories In Hindi

Stories In Hindi Love : जन्मदिन का तोहफा

Stories In Hindi Love : सुमन ने अपनी बड़ी बहन दीपिका की मौत के बाद उस की गृहस्थी की डोर मजबूती से थाम ली थी लेकिन रमेश उस के समर्पण, प्यार का हर पल तिरस्कार करता रहा. सुमन आखिर कब तक सहती. प्रस्तुत है, स्मिता टोके की दिल को छूती कहानी.

‘‘कितनी लापरवाही से काम करती हो तुम,’’ रमेश के स्वर की कड़वाहट पिघले सीसे की तरह कानों में उतरती चली गई.

सुबहसुबह काम की हड़बड़ी में रमेश के लिए रखा दूध का गिलास मेज पर लुढ़क गया था. सुमन बेजबान बन कर अपमान के घूंट पीती रही, फिर खुद को संयत कर बोली, ‘‘टिफिन तो रख लो.’’

‘‘भाड़ में जाए तुम्हारा टिफिन. बच्चा रो रहा है और तुम्हें टिफिन की पड़ी है.’’

‘‘ले रही हूं विनय को, लेकिन आप के खानेपीने की चिंता भी तो मुझे ही करनी पडे़गी न.’’

‘‘छोड़ो ये बड़ीबड़ी बातें,’’ रोज की तरह सुमन को शर्मिंदा कर रमेश जूते खटखटाते हुए आफिस निकल गए और सुमन ठगी सी खड़ी रह गई. नन्हे विनय को गोद में उठा कर वह जब तक आंगन में पहुंचती, रमेश गाड़ी स्टार्ट कर फुर्र से निकल गए, न मुड़ कर देखा, न परवा की.

‘‘अच्छा, भूख लगी है राजा बेटे को. हांहां, हम बिट्टू को दूध पिलाएंगे…’’ सुमन के हाथ यंत्रवत बोतल में दूध भरने लगे. मुंह में दूध की बोतल लगते ही विनय का रोना थम गया. लेकिन सुमन तो जैसे झंझावात से घिर गई थी. अंतर्मन में घुमड़ रहे बवंडर पर उस का खुद का भी बस न था.

वह सोच रही थी, आखिर उस की गलती क्या है? क्या समर्पण का यही फल मिलेगा उसे. 22 साल की उम्र में उस ने अपनी भावनाओं का गला घोंट दिया. दीदी के उजड़े परिवार को बसाने की खातिर खुद का बलिदान दे दिया तो क्या गलती हो गई उस से. यह ठीक है कि दीपिका दीदी के असमय बिछोह ने रमेश को अस्तव्यस्त कर दिया है, लेकिन क्या इस के लिए वह सुमन पर जबतब व्यंग्य बाण चलाने का हकदार बन जाते हैं?

दूसरे दिन आने वाले अपने जन्मदिन पर सुमन ने अपनी सहेलियों को घर पर आमंत्रित किया. मधु, रीना, वाणी, महिमा सब कितनी बेताब थीं उस के घर आने को. सुमन की अचानक हुई शादी में शामिल न होने की कसर वे उस का जन्मदिन मना कर ही पूरी कर लेना चाहती थीं. सुबह की घटना को भूल कर सुमन ने रमेश के सामने बात छेड़ी, ‘‘सुनिए, कल मैं ने कुछ सहेलियों को घर पर बुलाया है. आप भी 6 बजे तक आ जाएंगे न.’’

‘‘क्यों, कल क्या है?’’ रमेश ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘तो जनाब का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है,’ सुमन मन ही मन सोचते हुए चुहल के मूड में बोली, ‘‘जैसे आप को मालूम ही नहीं है?’’

‘‘हां, नहीं मालूम मुझे, क्या है कल?’’ कहते हुए रमेश के माथे पर बल पड़ गए.

रमेश के तेवर देख कर सुमन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. वह मायूसी से बोली, ‘‘मधु, वाणी वगैरह कल मेरा बर्थडे मनाना चाहती थीं. इसी बहाने मिलना भी हो जाएगा और हम सहेलियां मिल कर गपशप भी कर लेंगी.’’

‘‘बर्थडे और तुम्हारा? ओह, कम आन सुमन. एक बच्चे की मां हो तुम और बर्थडे मनाओगी, सहेलियों को बुलाओगी. यह बचकानापन छोड़ो और थोड़ी मैच्योर हो जाओ,’’ रमेश की बातें सुन कर उस के धैर्य का बांध टूटने लगा.

‘‘इस में बचकानेपन की क्या बात है? आप नहीं आ पाएंगे क्या?’’ वह संयत स्वर में बोली.

‘‘देखूंगा. वैसे तुम्हारी सहेलियों से मिलने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. और तुम तो जानती हो कि दीपिका के बाद कोई भी फंक्शन, भले ही वह छोटा क्यों न हो, मैं उस में शामिल होना पसंद नहीं करता. फिर क्यों जोर दे रही हो तुम?’’ रमेश की आवाज में उपेक्षा साफ झलक रही थी.

शादी के बाद इस दिन के लिए कितनी कल्पनाएं की थीं सुमन ने पर वे सारी कल्पनाएं धराशायी हो गईं. वह मन ही मन आशाएं लगा रही थी कि उस दिन रमेश सुबहसुबह उसे उठा कर कोई अच्छा सा गिफ्ट देंगे और वह सारे गिलेशिकवे भुला कर उन्हें माफ कर देगी. सारी कड़वाहट भुला देगी. रमेश उसे सरप्राइज देते हुए, एक दिन की छुट्टी ले लेंगे. उस की सहेलियों के घर में आने पर सारे लोग मिल कर खूब मौजमस्ती करेंगे. विनय भी खूब खुश होगा. सब को हंसीखुशी देख कर बाबूजी को बहुत संतोष होगा कि उन का निर्णय गलत नहीं था. क्या कुछ नहीं सोचा था उस ने, पर सब धरा का धरा रह जाएगा.

‘मैच्योर होने की ही तो सजा भुगत रही हूं रमेश. आज मैं किसी दूसरे घर में होती तो मुझे यों उलाहने न सुनने पड़ते. दूसरी बीवी हूं न इसलिए मेरे किए का, मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है आप के लिए,’ वह तड़प कर बुदबुदाई.

लेकिन उस की बुदबुदाहट सुनने के लिए रमेश वहां थे कहां? वह तो कब के मामले का पटाक्षेप कर के अपने कमरे में बैठे टेलीविजन देख रहे थे.

दूसरे दिन सुबह उठ कर जब बाबूजी को प्रणाम किया तो उन्होंने आशीर्वाद की झड़ी लगा दी, ‘‘खुश रहो बेटा. तुम्हारे आने से यह घर बस गया है बेटी. अच्छा सुनो, आज मां के यहां भी सहेलियों के आने से पहले हो आना. वे दोनों भी तो राह देखते होंगे. रमेश चला गया न, नहीं तो तुम तीनों ही चले जाते.’’

‘‘कोई बात नहीं, बाबूजी. मैं आटो कर लूंगी,’’ इतना कह कर वह धीरे से मुसकराई.

नए कपड़ों में 5 माह का गोलमटोल विनय और भी प्यारा लग रहा था. सुनहरी किनारी वाला रानी कलर का सूट सुमन पर खूब फब रहा था.

आटो रुकते ही मां दौड़ी चली आईं. उस ने विनय को अपनी मम्मी की गोद में दे कर मम्मीपापा दोनों को झुक कर प्रणाम किया.

पापा बोले, ‘‘बेटा, रमेश आते तो अच्छा होता.’’

‘‘वह तो चाहते थे, लेकिन छुट्टी ही नहीं मिली,’’ अपनी प्रतिष्ठा बचाने और मम्मीपापा को दिलासा देने की खातिर झूठ बोलने में कितनी कुशल हो गई थी सुमन.

थोड़ी देर बाद पापा विनय को घुमाने ले गए. उन के निकलते ही मां को टोह लेने का मौका मिल गया.

‘‘सच बता सुमी, तू खुश तो है न? रमेश का व्यवहार कैसा है?’’

‘‘सब ठीक है, मां,’’ वह उदास स्वर में बोली.

‘‘सब ठीक है तो फिर तू उदास, खोईखोई सी क्यों लगती है?’’

‘‘मां, विनय रात में सोने कहां देता है. नींद पूरी नहीं हो पाती, इसी से सुबह भी थकी हुई लगती हूं.’’

‘‘बेटी, वह तो ठीक है. पर…’’ मां की आवाज का प्रश्नचिह्न बहुत कुछ कह गया.

‘‘पर क्या, मां? मैं ने कभी कुछ कहा क्या?’’ वह झुंझलाई.

‘‘बोला नहीं तभी तो सुमी. यह जो तेरी कुछ न बोलने की आदत है न, उसी से तो डर लगता है. तू शुरू से ही ऐसी है. मन की बात भीतर दबा कर रखने वाली. तू घुटघुट कर जी लेगी, लेकिन अपनी पीड़ा कहेगी नहीं. बेटी, क्या हम नहीं समझते कि यह शादी तुम ने सिर्फ हमारी इच्छा रखने की खातिर की है.’’

‘‘अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ उस का शुष्क स्वर उभरा.

मां लगभग चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘क्योंकि तू अभी जिंदा है और तू अपने परिवार के साथ हंसतीखेलती रहे यही हमारी हसरत है. एक बेटी को तो हम खो ही चुके हैं. आगे कुछ भलाबुरा सहन नहीं…’’ मां की आवाज तर हो गई. मां ने हथेलियों से आंसू छिपाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहीं.

सुमन मां के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘सौरी मां, मैं ने तुम्हें रुला दिया. मैं ने कहा न सब ठीक है, तुम बेकार ही परेशान होती हो. अच्छा, मां, बोलो तो मेरे लिए क्या बनाया है?’’

मां आंसू पोंछते हुए नाश्ते की थाली लगाने लगीं. पापा भी विनय को ले कर लौट आए. मां ने सुमन की सहेलियों के लिए भी केक, मटर कचौरी, नमकीन और गाजर का हलवा रखवा दिया.

पापा उसे घर तक छोड़ने गए. फिर दोनों समधी देर तक बरामदे में बैठ कर बतियाते रहे.

महीनों बाद सुमन खुल कर हंस रही थी, वरना शादी के बाद तो उस का जीवन जैसे दुस्वप्न बन गया था. उस की बड़ी बहन दीपिका की सड़क दुर्घटना में हुई आकस्मिक मौत ने जैसे सभी के जीवन से खुशियों के रंग छीन लिए थे. मम्मी, पापा और बाबूजी की समझ से परे था कि दीपिका की मौत का गम करें या विनय और रमेश के बचने के लिए नियति को धन्यवाद दें.

सुमन ने स्वेच्छा से नन्हे विनय की देखभाल का जिम्मा खुद पर ले लिया था. पत्नी की इस तरह मौत से रमेश बिलकुल जड़ हो गए. चिड़चिड़े, तुनकमिजाज और छोटीछोटी बातों पर बिफरने वाले. घर के बड़े लोगों ने सोचा कि यदि रमेश की शादी कर दी जाए तो शायद वह फिर सामान्य जीवन बिता सके.. और उन्हें इस के लिए सुमन से बेहतर विकल्प नहीं दिख रहा था. बड़ों के प्रश्न के जवाब में वह ना नहीं कह सकी और ब्याह कर इस घर में आ गई, जो कभी उस की दीदी का घर था.

मुखर दीपिका को शांत सुमन में खोजने की रमेश की कोशिश निष्फल रही. धीरेधीरे घर में उन का व्यवहार सिर्फ खाना खाने, कर्तव्यपूर्ति के लिए धन और सामान जुटाने व आराम करने के लिए ही शेष रह गया था.

सुमन के प्रति रमेश का कटु व्यवहार कभीकभी उस में भी अपराधभाव जगाता, लेकिन जल्द ही वह उस से फारिग भी हो जाता. हां, रमेश के इस आचरण से सुमन जरूर दिन ब दिन उन से दूर होती चली जा रही थी. रमेश के उखड़े व्यवहार के बावजूद सुमन विनय की बाललीलाओं और बाबूजी के स्नेह के सहारे अपने नवनिर्मित घरौंदे को बचाने की कोशिश करती रहती.

उस दिन सुमन की उम्मीद के विपरीत रमेश सही वक्त पर घर पहुंच गए. उस की सखियां चुहल करने लगीं कि तू तो कह रही थी कि जीजाजी नहीं आएंगे.

रमेश बड़ी देर तक सुमन की सभी सहेलियों से बातचीत करते रहे. बड़े खुशनुमा माहौल में उस की सखियों ने सब से विदा ली. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘जीजाजी, सुमन को ले कर घर जरूर आइएगा.’’

‘‘जरूरजरूर, क्यों नहीं.’’

वह विस्मित थी कि लोगों के सामने उस के साथ से भी कतराने वाले रमेश आज इतने मुखर कैसे हो उठे?

‘‘थैंक्स, रमेश, जल्दी आने के लिए,’’ सुमन, विनय को चादर ओढ़ाते हुए बोली.

‘‘इस में थैंक्स की क्या बात है. मैं ने सिर्फ अपना फर्ज पूरा किया है,’’ रमेश का स्वर हमेशा की तरह सपाट था.

‘‘फर्ज निभाया? और मेरी गिफ्ट?’’ वह शरारत से बोली.

‘‘गिफ्ट, कैसी गिफ्ट? तुम्हारी सहेलियों से जरा अच्छे से बात क्या कर ली कि तुम्हारे तो हौसले ही बढ़ने लगे. इस घर में किस बात की कमी है तुम्हें जो एक गिफ्ट और चाहिए. इन सब की उम्मीद मत रखना मुझ से,’’ रमेश गुस्से में बोला.

‘‘क्यों, मैं ने ऐसी कौन सी बात बोल दी, जो इतने लालपीले हो रहे हो,’’ पहली बार जबान खोली उस ने. आवेश में उस की आवाज कांपने लगी.

‘‘मैं लालपीला हो रहा हूं, यह बोलने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी,’’ रमेश फटकारते हुए बोले.

‘‘रमेश, सब्र की भी कोई सीमा होती है. 6 माह से मैं लगातार आप का मन जीतने और आप को सामान्य महसूस कराने की कोेशिश कर रही हूं. लेकिन आप ने तो जैसे खुद को एक पिंजरे में कैद कर लिया है. न खुद बाहर निकलते हैं, न मुझे अपने करीब आने देते हैं. दीदी के जाने का सदमा सिर्फ आप को ही नहीं हम सब को हुआ है. अब तो इस पिंजरे की दीवारों से टकरा कर मैं लहूलुहान हो चुकी हूं. अब इस से ज्यादा मैं नहीं सह सकती. आप के इस रवैये को देख कर तो मैं कभी का घर छोड़ चुकी होती, लेकिन बाबूजी के स्नेह ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया. आप मुझे सह नहीं पा रहे हैं इस घर में तो मैं यह घर ही छोड़ दूंगी. कल सुबह ही मैं मुन्ने को ले कर मां के यहां जा रही हूं,’’ सुमन की आवाज थरथराई, वह धम्म से पलंग पर बैठ गई.

रमेश पैर पटकते हुए तकिया और चादर ले, हाल में जा कर सोफे पर लेट गए.

वह सोचने लगी, ‘मैं कोई बेजबान गुडि़या तो नहीं जो ठोकरों को सहती रहे और उसे चोट भी न लगे.’ आवेश के मारे उस का रगरग तपने लगा और सोचतेसोचते शरीर को बुखार ने चपेट में ले लिया. रात 1 बजे तक चिंतन से जब दिमाग जवाब देने लगा तो वह खुद नींद की आगोश में चली गई.

सुबह आंख खुली तो घड़ी 7 बजा रही थी. विनय सोया हुआ था. सिर दर्द से फटा जा रहा था. उस ने उठने की असफल कोशिश की. उसे जागा देख कर रमेश तुरंत आ गए. उस ने घृणा से मुंह फेर लिया.

‘‘ओह, तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है,’’ रमेश उस के तपते माथे पर हाथ रखते हुए बोले.

वह आंखें मूंदे लेटी रही.

‘‘लो, चाय पी लो.’’

‘‘बाई आ गई क्या?’’ क्षीण स्वर में सुमन ने पूछा.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर चाय?’’

‘‘क्यों, मैं नहीं बना सकता क्या?’’ रमेश ने मुसकराते हुए बिस्कुट की तश्तरी आगे कर दी.

‘‘एक मिनट, ब्रश कर के आती हूं.’’

जैसे ही सुमन उठने को हुई कि उसे चक्कर सा आ गया और वह फिर से पलंग पर बैठ गई. तब रमेश उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले कर आए.

जब वह मुंह धो चुकी तो रमेश हाथों में टावेल ले कर खड़े थे.

वह चाय पी कर लेट गई. रमेश उस के सिरहाने ही बैठ गए.

पिछली रात के घटनाक्रम और रमेश के सुबह के रूप में तालमेल बिठातेबिठाते सुमन की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

‘‘प्लीज, रोओ मत तुम, नहीं तो तबीयत और खराब होगी.’’

रमेश का चिंतित स्वर अंदर तक हिला गया उसे.

रमेश का कौन सा रूप सच्चा है.

रमेश उस के सिर पर हथेली रख कर बोले, ‘‘कल के लिए सौरी, सुमन. मैं सारी सीमाएं तोड़ गया कल. तुम्हें चोट पहुंचा कर मेरा अहं संतुष्ट होता रहा अब तक. दीपिका के बाद मैं तो टूट ही चुका था. तुम्हीं थीं जिस ने मेरा उजड़ा घर फिर बसाया. नातेरिश्तेदार तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकते थे. इस से मुझे बहुत तकलीफ होती थी, लेकिन ये तारीफ मिलने के पहले तुम ने अपने सारे अरमानों को राख कर दिया है, इतनी छोटी सी बात को नहीं समझ पाया मैं. हर रोज छोटीछोटी बातों पर तुम्हें अपमानित कर के भले ही मैं थोड़ी देर का संतोष पा लेता था, लेकिन अपनी यह हरकत मुझे भी कचोटती रहती थी. आखिर इतना बुरा तो नहीं हूं मैं. हां, मैं अपनी कुंठा, तुम पर निकालता रहा, तुम्हारी तपस्या को कभी देख ही नहीं पाया. कल तुम ने घर छोड़ कर जाने की बात की तो मैं बर्दाश्त नहीं कर सका.’’

एक पल को रमेश रुके फिर बोले, ‘‘सुमन, तुम्हारे बिना अब मैं अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

यह सब सुन कर सुमन उन्हें अपलक देखती रही. तभी दरवाजे के बाहर बाबूजी की आहट पा कर रमेश एक झटके में उठ खड़े हुए.

‘‘बेटा, डाक्टर साहब से बात हो गई है. वह आधे घंटे में क्लिनिक पहुंच जाएंगे. सुमन बेटा, तुम विनय की चिंता मत करना, वह मेरे पास खेल रहा है.’’

‘‘जी, बाबूजी, हम लोग अभी तैयार हो जाते हैं,’’ सुमन ने कहा.

‘‘सुनो, तुम कपड़े बदल लो. हमें 10 मिनट में निकलना है.’’

‘‘हां,’’ सुमन का स्वर अशक्त था.

पलंग से उठ कर सुमन ने मेज पर देखा तो लखनवी कढ़ाई वाला आसमानी रंग का सूट रखा था और पास ही थी लाल गुलाब की ताजी कली.

सुमन सोचने लगी कि वह कहीं कोई सपना तो नहीं देख रही है.

डाक्टर के क्लिनिक से लौटते समय उस ने रमेश से पूछा, ‘‘आफिस के लिए लेट हो रहे हो न?’’

‘‘नहीं, आज छुट्टी ले ली है.’’

सुन कर वह बड़ी आश्वस्त हुई. हलके से मुसकराते हुए यह विचार उस के दिलोदिमाग में कौंध गया कि रमेश ने उसे भले ही कोई कीमती उपहार न दिया हो, पर जन्मदिन का इस प्यार से बढ़ कर बड़ा तोहफा क्या हो सकता है?  Stories In Hindi Love

Social Story : तू रुक, तेरी तो – क्या रुचि हो रहे अन्याय के प्रति आवाज उठाई?

Social Story : ‘चटाक…’’ समर्थ ने आव देखा न ताव, रुचि के गालों पर झन्नाटेदार तमाचा आज फिर रसीद कर दिया. तमाचा इतनी जोर का था कि वह बिलबिला उठी. आंखों से गंगायमुना बह निकली. वह गाल पकड़े जमीन पर जा बैठी. समर्थ रुका नहीं, ‘‘तू रुक तेरी तो बैंड बजाता हूं अभी,’’ कहते हुए खाने की थाली जमीन पर दे मारी, फिर इधरउधर से लातें ही लातें जमा कर अपना पूरा सामर्थ्य दिखा गया. 5 साल का बेटा पुन्नू डर कर मां की गोद में जा छिपा. ‘‘चल छोड़ उसे, बाहर चल,’’ समर्थ उसे घसीटे जा रहा था, ‘‘चल, नहीं तो तू भी खाएगा…’’

वह गुस्से से बावला हो रहा था. ‘‘नई…नई… जाना आप के साथ, आप गंदे हो,’’ पुनीत चीखते हुए रो रहा था. ‘‘ठीक है तो मर इस के साथ,’’ समर्थ ने झटके से उसे छोड़ा तो वह गिरतेगिरते बचा. अपने आंसू पोंछता हुआ भाग कर वह मां के आंसू पोंछने लगा. रुचि का होंठ कोने से फट गया था, खून रिस रहा था. ‘‘मम्मा, खून… आप को तो बहुत चोट आई है. गंदे हैं पापा. आप को आज फिर मारा. मैं उन से बात भी नहीं करूंगा. आप पापा से बात क्यों करते हो, आप कभी बात मत करना,’’ वह आंसुओं के साथ उस का खून भी बाजुओं से साफ करने लगा, ‘‘मैं डब्बे से दवाई ले आता हूं,’’ कह कर वह दवा लेने भाग गया. रुचि मासूम बच्चे की बात पर सोच रही थी, ‘कैसे बात न करूं समर्थ से. घर है, तमाम बातें करनी जरूरी हो जाती हैं, वरना चाहती मैं भी कहां हूं ऐसे जंगली से बात करना.

2 घरों से हैं, 2 विचार तो हो ही सकते हैं, वाजिब तर्क दिया जा सकता है कोई है तो, पर इस में हिंसा कहां से आ जाती है बीच में. समर्थ को बता कर ही तो सब साफ कर के खाना तैयार कर दिया था समय पर. अम्माजी को आने में देर हो रही थी. फोन भी नहीं उठा रही थीं. खाना तैयार नहीं होता, तो भी सब चिल्लाते.’ ‘‘अपने को गलत साबित होते देख नहीं पाते ये मर्द. बस, यही बात है,’’ अपनी सूजी आंखों के साथ जब अपने ये विचार अंजलि को बताए तो वह हंस पड़ी. ‘‘यार देख, मन तो अपना भी यही करता है. कोई अपनी बात नहीं मानता तो उसे अच्छे से पीटने का ही दिल करता है. पर हम औरतों के शरीर में मर्दों जैसी ताकत नहीं होती, वरना हम भी न चूकतीं, जब मरजी, धुन कर रख देतीं, अपनी बात हर कोई ऊपर रखना चाहता है.’’ ‘‘तू तो हर बात को हंसी में उड़ा देना चाहती है. पर बता, कोई बात सहीगलत भी तो होती है.’’ ‘‘हां, होती तो जरूर है पर अपनेअपने नजरिए से.’’

‘‘फिर वही बात. ऐसे तो गोडसे और लादेन भी अपने नजरिए से सही थे. पर क्या वे वाकई में सही कहे जा सकते हैं?’’ अंजली को सम झ नहीं आ रहा था, वह रुचि का ध्यान कैसे हटाए. आएदिन मासूम सी रुचि के साथ समर्थ की मारपीट की घटनाएं उसे कहीं अंदर तक झिंझोड़ रही थीं, बेचारे नन्हे पुन्नू के दिलोदिमाग पर क्या असर होता होगा. सारी बातें सुनी उस ने, किचन से सटे पूजाघर में सुबह से बह रहे दूध, बताशे, गुड़, खीर, मिष्ठान के चढ़ावे की सुगंध आकर्षित लग रही थी. मक्खियों, चीटियों की बरात से परेशान हो कर रुचि ने लाईजोल डालडाल कर किचन के साथसाथ पूजाघर को भी अच्छी तरह चमका डाला था. किचन के चारों कोनों में पंडित मुखानंद के बताए 5-5 बताशे रख कर दूध चढ़ाने के टोटके का आज भी पालन कर के अपने भाई के घर गई. सास को लौटने में देर हो रही थी. चींटियों, मक्खियों के बीच रात का खाना बनाना मुश्किल हो रहा था. रुचि ने तंग आ कर सफाई का कदम उठाया था, क्या गलत किया उस ने. रुचि की कोई गलती आज भी उसे नहीं लगी.

और फिर, गलती हो भी तो क्या कोई जानवरों की तरह सुलूक करता है भला? रोजरोज ऐसे बेसिरपैर के टोटके, पूजा, पाखंड उन का चलता ही रहता. हैरानी तो यह कि बहुत मौडर्न बनने वाला समर्थ भी ये सब मानता है. पहले ही मना किया था रुचि से कि समर्थ कुछ ज्यादा ही जता रहा है अपने को, अच्छे से एक बार और सोच ले, फिर शादी कर. पर मानी नहीं. पापा के सिर का बो झ जल्द से जल्द उतार कर उन्हें खुश देखना चाहती थी वह तो? ‘‘तू भी न, गौ बनी हुई है, गौ के भी 2 सींगें, 4 लातें और लंबी दुम होती है, वक्त आने पर इस्तेमाल भी करती है. पर तू तो बिलकुल सुशील, संस्कारी अबला नारी बनी हुई है, बड़ेबड़े मैडल मिलेंगे तु झे क्या? इतनी ज्यादती सहती क्यों है? डिपैंडैंट है इसलिए…’’ इतनी पढ़ीलिखी है, बोला था जौब कर ले. पर नहीं, पतिपरमेश्वर नहीं मानते. अरे, मानेंगे कैसे भला, फुलटाइम की दासी जो छिन जाएगी,’’ उस ने चिढ़ते हुए उस की ही बात कही. अंजलि का घर रुचि से कुछ ही दूर था.

बचपन से कालेज तक साथ पढ़ी अंजलि अपनी शादी के 2 महीने बाद ही पति के हादसे में हुई मौत के बाद वापस आ कर उसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी. पड़ोस के ब्लौक में ही रुचि की शादी हुई थी तो अकसर अंजलि लौटते समय रुचि से मिलने आ जाया करती. खूबसूरत रुचि को स्मार्ट समर्थ ने अपने को खुलेदिमाग का जता, उस के पिता हरिभजन के आगे अपने को चरित्रवान बताया, महात्मा गांधी, विवेकानंद आदि पर अपना पुस्तक संग्रह दिखा कर अच्छे होने का प्रमाण देदे कर, उस से शादी तो कर ली पर शादी के बाद ही उस की 18वीं सदी की मानसिकता सामने आ गई. खुलेदिमाग की हर तरह की सफाईपसंद रुचि जाहिलों में फंस कर रह गई. पिता के संस्कार थे, ‘बड़ों की आज्ञा का पालन करना है सदैव, अवज्ञा कभी नहीं,’ सो, किए जा रही थी. मां तो थी नहीं. पर नेकी, ईमानदरी, सत्य पर चलने वाले पिता ने अच्छे संस्कार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पर यहां उन बातों की न इज्जत है न जरूरत. अब रुचि को कौन सम झाए, उस ने तो पिता की बातें गांठ बांध अंतस में बिठा ली हैं.

बात वही है, ‘सबकुछ सीखा हम ने, न सीखी होशियारी.’ क्या करूं इस लड़की का? रोज ही मार खाए जा रही है. पर पिता से बताती भी नहीं कि वे आघात सह नहीं पाएंगे. लेदे के वही तो हैं उस के परिवार में. पुन्नू घर पर होता तो वे रोतेरोते अपनी मासूम जबां से मम्मा के साथ घटी पूरी हिंसा का ब्योरा अंजलि मौसी को देने की कोशिश करता. ‘कैसे दादी, बूआ, चाचू सभी पापा की साइड लेते हैं. कोई मम्मा को बचाने नहीं आता. कहते हैं, और मारो और मारो.’ अंजलि सोचती, वे बचाने क्या आएंगे, सभी एक थाली के चट्टेबट्टे हैं. जंगली गंवई हूश. छोटे से बच्चे में दिनबदिन कितना आक्रोश भरता जा रहा है, अंजलि देख रही थी. इतनी नफरत, इतना गुस्सा उस अबोध के व्यक्तित्व को बरबाद किए जा रहा है. पर करती भी क्या? रुचि तो हठ किए बैठी थी कि उस की मूक सेवा कभी तो रंग लाएगी, एक दिन प्रकृति सब ठीक करेगी. अब तो पुन्नू भी पापा, चाचू के जैसे चीजें तोड़नेफेंकने लगा है. गुस्सा होता तो घरवालों की तरह चीखता है. खाना उठा कर जमीन पर दे मारता, तो रुचि थप्पड़ रसीद करती. तो रुचि को ही डांट पड़ने लगती. उसे तुरंत साफ करने के लिए आदेश हो जाता. घर के लोग शह भी देते उसे. कितनी बार देखासुना है उन्हें कहते हुए, ‘लड़का है, लड़की थोड़ी ही है. मर्द है वह क्यों करेगा भला. बहू, चल साफ कर जल्दी से, मुखानंद महाराज आते ही होंगे, इस की कुंडली का वार्षिक फल विचार कर के.

आजा मेरे लाल, तू तो हमारे घर का वारिस है. तेरा कोई कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. तु झे तो, मिनिस्टर बनना है. आज वे तेरे और तेरे पापा समर्थ के लिए असरदार टोटका बताने वाले हैं. नई तावीज भी लाएंगे तेरे लिए.’ उस दिन अंजलि स्कूल से लौटी तो रुचि के घर के आगे ऐंबुलैंस खड़ी देख कर माथा ठनका, किस को क्या हो गया? उस ने पांव तेजी से बढ़ाए, पास पहुंची तो देखा लोग रुचि को स्ट्रैचर पर डाले ऐंबुलैंस से निकाल कर घर में ले जा रहे हैं. रुचि बेसुध थी. खून से लथपथ सिर फट गया था, खून बह कर माथेचेहरेगरदन, कपड़ों पर जम चुका था. कुछ अभी भी सिर से बहे जा रहा था. पड़ोसियों ने बताया, ‘घर मैं काफी देर तक आएदिन की तरह चीखपुकार होती रही थी. 2 घंटे से रुचि यों ही पड़ी रही. तब जा कर ऐंबुलैंस ले आने का इन्हें होश आया. तब तक देर हो चुकी थी. रुचि ने ऐंबुलैंस में जाते ही दम तोड़ दिया.’ रुचि के पिता हरिभजन को किसी भले मानस ने खबर दे दी थी.

वह ही उन्हें थाम कर रुचि के अंतिम दर्शन करवाने ले आया था. वे रुचि के खून सने सिर पर हाथ रख कर बिलख उठे. पुन्नू को लिपटा कर फूटफूट कर रो पड़े थे. हादसे से अवाक अंजलि के रुंधे गले से शब्द ही नहीं निकल रहे थे. अंकल को क्या और कैसे ढाढ़स बंधाए. उस को देखते ही रुचि के पिता विलाप करते हुए बोल पड़े, ‘‘बेटी, इतना सब हो रहा था उस के साथ, तू ने कुछ बताया क्यों नहीं कभी. न उस ने कभी कोई भनक लगने दी. लकवे के कारण एक पैर से लाचार मु झे यह कह कर कि ‘ससुराल में यहां पूजा, पंडित, शकुन, अपशकुन बहुत मानते विचार करते हैं, घर नहीं आने देती थी मु झे. खुद ही पुन्नू को ले कर हफ्ते में एकदो बार आ जाती थी. तू तो उस की पक्की सहेली थी. तु झ से पूछता तो तू कहती बिलकुल ठीक है, आप उस की चिंता मत कीजिए. अब बता, ठीक है? चली गई मेरी रुचि. ‘वे अंजलि को, तो कभी रुचि के शव को पकड़ कर लगातार हिचकियों से रोए जा रहे थे. उन का क्रंदन सुन अंजलि का दिल टूकटूक हुआ जा रहा था. अपनी आंखों के सैलाब को किसी तरह रोकते हुए वह बोली, ‘‘अंकल, संभालिए अपने को, आप की तबीयत पहले ही ठीक नहीं. इसी से रुचि ने कसम दे रखी थी आप से कुछ न कहूं. मैं क्या करती अंकल. यहां आप की अच्छी सीख ने उसे बांधे रखा, जिन का इन जाहिलों के यहां कोई मोल नहीं था,’’ पुन्नू अंजलि को देखते ही उस से लिपट गया.

‘‘अंजलि मौसी, इन सब ने मिल कर मेरी मम्मा को मारा. पापा ने दीवार पर मम्मा का सिर दे मारा था. वे गिर पड़ीं. मम्मा तभी से मु झ से बोली नहीं बिलकुल भी. दादी ने पापा, चाचू को भगा दिया. अब झूठ कह रही हैं कि मम्मा सीढ़ी से गिर पड़ी,’’ वह रुचि से लिपट कर जोरजोर से रोने लगा. ‘‘उठो न मम्मा, अपने पुन्नू से बोलो न. मैं छोड़ूंगा नहीं किसी को. बड़ा हो कर बैंड बजा दूंगा इन सब की,’’ वह समर्थ से सीखे हुए शब्दों को दोहराने लगा. रोजरोज की चीखनेचिल्लाने व मारपीट की आवाजों से तंग आ कर आज किसी पड़ोसी ने 100 नंबर डायल कर दिया था. पुलिस आ गई. नन्हे पुन्नू के बयान पर तफ्तीश हुई. 2 दिन के अंदर पुलिस ने समर्थ और उस के भाई को धरदबोचा.

उन्हें जेल हो गई. नन्हा पुनीत किस के पास रहता, समस्या थी. क्योंकि पुन्नू अपनी दादी, बूआ के पास रहने को बिलकुल तैयार न था. अंजलि उसे यह कह कर अपने साथ ले गई. ‘‘अंकल, आज के दौर में सज्जनता, सिधाई, संस्कारों का मोल सम झने वाले बहुत कम हैं. दुनिया के हिसाब से अपने को तैयार करना चाहिए और सामने आई चुनौतियों को सिधाई से नहीं, चतुराई से निबटना चाहिए. सिधाई से अकसर आज की दुनिया मूर्ख बनाती है, दबाती है, अपना उल्लू सीधा करती है. जो, रुचि झेलती रही.

कितना सम झाया था उसे. अंकल, पुन्नू चाहे कहीं भी रहे मैं उस को दूसरा समर्थ कभी नहीं बनने दूंगी. आप निश्चित रहें अंकल. शादी के 2 महीने बाद ही दुर्घटना में पति प्रशांत की मौत के बाद निरुद्देश्य बंजर से मेरे जीवन को पुनीत के रूप में एक नया लक्ष्य मिल गया है. अब आप भी मु झे अपनी रुचि ही सम िझए अंकल. मैं इसे ले कर आप से मिलने उसी के जैसे आती रहूंगी.’’ रुचि के पिता हरिभजन के कांपते बूढ़े हाथ अंजलि के सिर पर जा रुके थे. उन से कुछ बोलते न बना, केवल आंसू आंखों से बहे चले जा रहे थे. अंजलि भीगे मन से उन्हें पोंछने लगी. पुन्नू ने दोनों हाथों से नाना और अंजलि मौसी को कस कर पकड़ लिया और आंखें मीचे वह गालों पर ढुलकते आंसुओं में अपनी मम्मा का एहसास ढूंढ़ रहा था. ‘‘मम्मा…’’ उस की हिचकियों के साथ निकलता बारबार वह एक शब्द सभी के हृदय को बींध रहा था.

Hindi-Marathi Controversy : हिंदी के मुद्दे पर बेकफुट पर क्यों भाजपा

Hindi-Marathi Controversy : भाजपा हिंदी क्यों थोपना चाहती है इस सवाल का जवाव हिंदू वादियों के अतीत से भी मिलता है और वर्तमान से भी कि लोग धर्म क्षेत्र और भाषा के नाम पर आपस में लड़ते रहें तो उस का अस्तित्व बना रहेगा लेकिन महाराष्ट्र का हालिया विवाद देख लगता है कि आम लोग अगर समझ से काम लें तो बंटवारे की राजनीति खुद बंट कर दम तोड़ देगी.

हिंदी हिंदू हिंदुस्तान न केवल हिंदूवादी संगठनों और राजनैतिक दलों का एजेंडा है बल्कि उन का मकसद, मंजिल और मुहिम भी है. हिंदू राष्ट्र का तम्बू इन्हीं तीन बम्बुओ पर टिका है जिस की कल्पना अब से कोई सवा सौ साल पहले हिंदू महासभा के मुखिया विनायक सावरकर ने की थी. धर्म और मन्दिरों की राजनीति को परवान चढ़ाने के बाद भाजपा की मंशा अब भाषा की राजनीति को हवा देने की है जिस के लिए महाराष्ट्र से मुफीद कोई और राज्य नहीं क्योंकि वह यहां सत्ता में है.

लेकिन बात चूंकि बिगड़ने लगी थी इसलिए 29 जून को मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडवनीस ने घुटने टेकते घोषणा कर डाली कि पहले के त्रिभाषा नीति से जुड़े सरकारी आदेश वापस लिए जाते हैं. अब डाक्टर नरेन्द्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जाएगी जो त्रिभाषा नीति के अमल पर सुझाव देगी. बात में वजन लाने उन्होंने यह सफाई भी दी कि हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाया गया था छात्रों को अन्य भाषा चुनने की छूट थी.

यह है विवाद

देवेन्द्र फडवनीस की यह मजबूरी हो गई थी कि जैसे भी हो अब शिवसेना ( यूबीटी ) और मनसे का 5 जुलाई का प्रस्तावित विरोध मार्च रोका जाए नहीं तो लेने के देने पड़ जाएंगे. कैसे उद्धव और राज ठाकरे मराठी भाषा को ले कर एक हो रहे थे और इस का महाराष्ट्र सहित देश की राजनीति पर क्या असर पड़ता उस से पहले यह समझ लेना जरुरी है कि इस विवाद की स्क्रिप्ट क्या है और इसे लिखा किस ने था.

16 अप्रैल, 2025 को महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी करते कहा था कि कक्षा 1 से ले कर 5 तक के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य किया जाता है. इस के समर्थन में दलील यह दी गई थी कि यह फैसला एनईपी यानी नई शिक्षा नीति 2020 के तहत लिया गया है जिस में मातृभाषा / स्थानीय भाषा अंग्रेजी और हिंदी या अन्य भारतीय भाषा पढ़ाने की सिफारिश की गई है. इस आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि 20 से अधिक छात्र हिंदी के बजाय दूसरी किसी भारतीय भाषा को चुनते हैं तो स्कूल को उस भाषा के शिक्षक की वैकल्पिक व्यवस्था करना पड़ेगी.

विरोध की धमक से सहमी सरकार

इतना कहना भर था कि मराठी प्रेमियों ने आसमान सर पर उठा लिया. विरोध गैरों ने तो किया ही लेकिन अपने भी पीछे नहीं रहे. मराठी भाषा सलाहकार समिति के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत देशमुख ने इस फैसले का विरोध करते कहा कि यह नीति मराठी भाषा और संस्कृति के लिए खतरा है. किसी को उम्मीद नहीं थी कि सरकार की सलाहकार समिति ही खुले तौर पर सरकार के फैसले का विरोध करेगी.

मनसे के राज ठाकरे ने तो बेहद हमलावर होते इस फैसले को मराठी अस्मिता पर हमला करार देते हिंदी थोपने की कोशिश बताया और अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ दिया कि हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं है. राज का साथ देने उन के कजिन और शिवसेना ( बाल ठाकरे ) के मुखिया उद्धव ठाकरे भी पार्टी सहित साथ आए तो मुंबई से ले कर दिल्ली तक के माथे पर बल पड़ गए कि जैसेतैसे तो इन दोनों को लड़ा भिड़ा कर कौरवों और पांडवों की तरह अलग किया गया था. अब अगर ये भाषा के मुद्दे जो हर दिन संवेदनशील होता जा रहा था पर साथ हो लिए तो भाषाई मुहिम परवान चढ़ने के पहले ही फिसल जाएगी.

इन दोनों ने एलान किया था कि 7 जुलाई को मुंबई के आजाद मैदान पर धरना आंदोलन आयोजित किया जाएगा. ठाकरे ब्रदर्स ने यह धौंस भी दी थी कि जब तक हिंदी को अनिवार्य करने का फैसला पूरी तरह वापस नहीं लिया जाएगा तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे. ऐसा होता तो अकेले मुंबई में नहीं बल्कि गांव कस्बों तक हिंदी का विरोध होता जो होतेहोते हिंदी भाषी हिन्दुओं यानी उत्तर प्रदेश व बिहार सहित झारखंड के लोगों को भी चपेट में ले सकता था. फिर हालात क्या होते इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. क्योंकि तमाम उतारचढ़ावों और विवाद के बाद भी ठाकरे भाइयों की जमीनी पकड़ किसी और से बहुत ज्यादा है.

यही वह मुकाम है जिस ने भाजपा को पांव खींचने मजबूर कर दिया. लेकिन विवाद अभी टला है खत्म नहीं हुआ है. देवेन्द्र फडवनीस इस मसले पर फस गए हैं जो हिंदी और मराठी भाषी दोनों तबकों में से किसी एक को भी नाराज नहीं कर सकते. समिति बनाएंगे, वह फैसला लेगी जैसे बयान वक्ती तौर पर तो पल्ला छुड़ाने मुफीद हैं लेकिन आज नहीं तो कल भाषाई गुल फिर खिलेंगे. ठाकरे ब्रदर्स के साथ कांग्रेस भी है और शरद पावर जैसे दिग्गज नेता भी हैं जो हिंदी की अनिवार्यता को थोपना मानते हैं.

हकीकत समझे लोग

यह ठीक है कांग्रेस और एनसीपी ( शरद पवार) मनसे और शिवसेना यूबीटी की तरह भाषा को ले कर आक्रामक नहीं होते लेकिन अंदरूनी तौर पर हिंदी थोपने को ले कर चिंतित वे भी हैं. इस की वजह साफ़ है कि धर्म और हिंदुत्व की राजनीति के चलते हिंदी भाषी वोट भाजपा के खाते में ज्यादा गिरते रहे थे लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंदी भाषियों ने इन तीन दलों बाले एमवीए यानी महाविकास अघाड़ी को वोट किया था. जिस से एनडीए 48 में से महज 17 सीटों पर सिमट कर रह गया था जबकि एमवीए या यूपीए कुछ भी कह लें को 30 सीटें मिली थीं और कांग्रेस 13 सीटें ले जा कर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी.

गेम अब ठाकरे ब्रदर्स और भाजपा के बीच खुले तौर पर है क्योंकि ये दोनों ही मांग करते रहे हैं कि सरकारी कामकाज रोजगार और शिक्षा में मराठी भाषा ही रहे कोई और भाषा मंजूर नहीं. इस मसले पर मराठियों का साथ इन दोनों को मिलता रहा है जिसे बनाए और संभाले रखने का कोई मौका ये दोनों नहीं छोड़ते. हैरानी की बात तो यह है कि हिंदी भाषियों को ऐसी राजनीति से कोई खास परहेज नहीं रहता.

मार्च के महीने में शिवसेना यूबीटी के नेता कृष्णा पावले ने मांग की थी कि मुंबई के रेस्तरा और होटलों में मेन्यु कार्ड अनिवार्य रूप से मराठी मरण हों. इस मांग पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई थी लेकिन मराठियों ने इस से सहमति रखी थी क्योंकि इस से उन का भाषाई अहम तुष्ट हो रहा था.

लेकिन बबाल तब मचा था जब मार्च के महीने में ही एक कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ नेता भैयाजी जोशी ने यह कहा था कि मुंबई में रहने वालों को मराठी बोलना जरुरी नहीं है. बवाल मचा तो भैया जी जोशी आम नेताओं की तरह यह सफाई देते गायब हो गए कि उन के बयान का गलत मतलब निकाला गया. मराठी न केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र की भाषा है और सभी को इसे सीखना चाहिए.

समझने वालों को तभी समझ आ गया था कि अब प्राइमरी स्कूलों को निशाने पर लिया जाएगा और ऐसा हुआ भी जिस पर मनसे ने जो तांडव मचाया उस से यह साबित हुआ था कि भाजपा और आरएसएस की राह उतनी आसान है नहीं जितनी कि वे गलतफहमी या अतिआत्मविश्वास के चलते मान बैठे हैं. मनसे कार्यकर्ताओं ने अपने संस्कारों का हिंसक प्रदर्शन सार्वजनिकतौर पर करते मराठी न बोलने वालों की मार कुटाई करते अपना मैसेज फारवर्ड कर दिया कि हिंदी नहीं चलेगी और जबरन चलाई गई तो हिंदी भाषी भी नहीं बख्शे जाएंगे.

महाराष्ट्र के हिंदी भाषी जो लगभग 22 फीसदी हैं 70 फीसदी मराठी भाषियों से भाषा के आधार पर नहीं टकराना चाहते क्योंकि इस से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला उलटे हासिल किया हुआ जो छिनता है वह उन्हें एक झटके में सालों पीछे ढकेल देता है. पिछले लोकसभा चुनाव में इस समझदारी की झलक पूरे महाराष्ट्र सहित महाराष्ट्र के सब से बड़े और अहम हिंदी भाषी शहर मुंबई में भी दिखी थी जहां एमवीए को 6 में से 4 सीटें मिली थीं जबकि एनडीए 2 पर सिमट कर रह गई थी.

नया विवाद देखा जाए तो नई शिक्षा नीति की आड़ में भाजपा का फैलाया हुआ रायता है जिसे मजबूरी में ही सही ज्यादा बहने से उसने रोक लिया है. लेकिन भाषा का मामला धर्म से कम संवेदनशील नहीं होता इसलिए आम लोगों को ही समझ से काम लेना होगा.

Bihar Elections : गैर सवर्णों की भागीदारी समेटने की दोतरफा साजिश

Bihar Elections : मतदाता सूची में बदलाव को ले कर बिहार में बवाल मचा हुआ है. ईसीआई के तुगलकी हुक्म से करोड़ों वोटर हैरान परेशान हैं जिन में सब से ज्यादा गैर सवर्ण हैं. क्या इन्हें एक साजिश के तहत वोट डालने से वंचित किया जा रहा है और क्यों बारिश के मौसम में बिहार में एकाएक ही चुनावी बाबाओं और धार्मिक आयोजनों की चुनावी बाढ़ आ गई है?

धीरेन्द्र शास्त्री उर्फ़ बागेश्वर बाबा और उन के गुरु राम भद्राचार्य ने भाजपा की तरफ से एलान कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में मुद्दा सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व है. बेरोजगारी, पिछड़ापन, गरीबी, शिक्षा बदहाली और गरीब मजदूरों के पलायन से चुनाव का कोई लेना देना नहीं. ये सब बेकार की बातें हैं तुक की इकलौती बात धर्म हिंदुत्व और राष्ट्रवाद है. चुनाव आयोग भी कैसे इस मुहिम को अंजाम देने में जुट गया है यह जानने से पहले इन बाबाओं के भाषणों पर गौर करें तो लगता है कि वह और बाबा एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं.

पटना के गांधी मैदान में आयोजित सनातन महाकुम्भ में दहाड़ते हुए धीरेन्द्र शास्त्री ने कहा –

1- अगर भारत हिंदू राष्ट्र बना तो पहला राज्य बिहार होगा. हिंदू राष्ट्र का नक्शा बना तो उस की शुरुआत बिहार से ही होगी.

2 – अगर हिंदू धर्म पर हमला हुआ तो मैं जबाब दूंगा, मेरा सपना भगवा – ए – हिन्द है.

3 – मैं मुसलमानों या ईसाइयों से नहीं बल्कि उन हिंदूओं से नाराज हूं जो जातिगत विभाजन फैला रहे हैं.

4 – मेरा मकसद राजनीति करना नहीं है, मैं तो रामनीति की बात करने आया हूं.

ब्राह्मणों के आराध्य तथाकथित भगवान परशुराम की जयंती पर आयोजित सनातन महाकुम्भ के कर्ताधर्ता यानी यजमान केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव थे. एक तरह से यह ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मणों का जलसा था जिस में कुछ और ऊंची जाति वालों ने भी भागीदारी की. गांधी मैदान पर दिन भर भजन पूजन, कीर्तन, पूजापाठ और अनुष्ठान वगैरह होते रहे. इस मजमे का मकसद और पैगाम साफ था कि सवर्णों एकजुट हो जाओ और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी भाषी राज्य बिहार की भी सत्ता हथिया लो. तभी देश हिंदू राष्ट्र बन पाएगा.

हिंदू राष्ट्र यानी राज सवर्णों का, जिस में दलित पिछड़े मुसलमान आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक हो कर इन की गुलामी करते रहते हैं. लोकतंत्र में यह चूंकि आसान काम नहीं है कि सभी को वोट देने से रोका जा सके लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि गैर सवर्णों को कम से कम वोट देने का मौका या हक दिया जाए. अब यह काम तो बाबा लोग कर नहीं सकते थे इसलिए संविधान नियम और कायदे कानूनों की आड़ ले कर यह जिम्मेदारी चुनाव आयोग ने संभाल ली.

बेतुका फरमान

बीती 24 जून को भारत निर्वाचन यानी चुनाव आयोग (इसीआई) ने एक हुक्म जारी किया कि बिहार की मौजूदा वोटर लिस्टों को रद्द किया जाता है. अब इन्हें नए सिरे से तैयार किया जाएगा जिस के लिए जरुरी है कि सभी मौजूदा वोटर्स अपनी पहचान और नागरिकता साबित करने के लिए तयशुदा 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करें. इसे विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर नाम दिया गया.

यह दस्तावेज बीएलओ यानी बूथ लेवल औफिसर के पास ले जा कर जमा करना होगा. इन दस्तावेजों में खास है, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और मांबाप की नागरिकता से ताल्लुक रखते लेखी सबूत. इस के अलावा मैट्रिक या हाई स्कूल का प्रमाण्पत्र, डिग्री या डिप्लोमा सर्टिफिकेट, मातापिता का जन्म प्रमाण पत्र, पेन कार्ड, सरकारी या उस के बराबर की नौकरी का पहचान पत्र, पेंशन दस्तावेज या फिर शादी का सर्टिफिकेट.

यह तो थी एक चालाकी दूसरी यह थी कि इस कार्रवाई में आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी और मनरेगा कार्ड मान्य नहीं होंगे क्योंकि ये दस्तावेज जन्म तारीख, जगह या नागरिकता को साबित नहीं करते. धन्य है भारत सरकार और ईसीआई जो आधार कार्ड, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मनरेगा कार्ड जैसे अहम दस्तावेजों को किसी के वोटर और नागरिक होने का सबूत नहीं मानते तो इस खामी का जिम्मेदार वे ही नहीं तो और कौन है.

सार ये कि अगर आप के पास ये सरकारी दस्तावेज हैं भी तो आप सरकार चुनने के हकदार नहीं जबकि ये तमाम पहचान पत्र भी सरकार द्वारा ही जारी किए जाते हैं. जो 11 दस्तावेज मांगे गए हैं उन में से कितनो के पास कितने हैं इस पर नजर डालें तो साजिश और धूर्तता साफ नजर आती है कि यह भी बाबाओं सरीखी ही हिंदू राष्ट्र की मुहिम है.

प्रमाणपत्रों का टोटा

जानकर हैरानी और अफ़सोस दोनों होते हैं कि बिहार में केवल 2.8 फीसदी लोगों के पास ही जन्म प्रमाण पत्र हैं. यह विकट के पिछड़ेपन की निशानी है और नेता विकास और जागरूकता के कसीदे गढ़ रहे हैं. गांवदेहातों जहां तकरीबन 80 फीसदी वोटर हैं वहां तो न के बराबर लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र हैं. क्योंकि वहां जचकी यानी डिलीवरी घरों में ही ज्यादा लगभग 80 फीसदी होती हैं. यह बदहाल स्वास्थ सेवाओं का सबूत है. इन्हें जन्म प्रमाण पत्र क्यों मुहैया नहीं कराया गया इस का जवाब शायद ही सुशासन बाबू नीतीश कुमार दे पाएं जो भगवा गोद में विराजे हिंदू राष्ट्र की शर्त पर अपने फिर से मुख्यमंत्री बन जाने का ख्वाव देख रहे हैं.

यही हाल पासपोर्ट का भी है जो बिहार में 3 फीसदी लोगों के पास भी नहीं और जिन के पास हैं वे सिरे से शहरी इलाकों के रहने वाले हैं. इन में भी सवर्णों की तादाद ज्यादा है. यह भी जाहिर बात है कि जिस के पास हवा में उड़ने का यह दस्तावेज होगा वह हवाई चप्पल पहनने वाला गरीब तो कतई नहीं होगा बल्कि खासे पैसों बाला और मालदार होगा.

अब और हैरान होने मैट्रिक और हाई स्कूल के प्रमाणपत्रों का आंकड़ा देखिए यह बिहार में महज 14.71 फीसदी लोगों के पास है बाकी लगभग 85 फीसदी लगभग अनपढ़ हैं. ईसीआई की मनमानी से परे पहले तो नीतीश बाबू की गर्दन इस बाबत पकड़ी जानी चाहिए कि आप 25 सालों से बिहार में राज कर रहे हैं फिर ये हालात क्यों? शिक्षा की इतनी बदहाली क्यों?

इस से आगे चलें तो बिहार में 7 फीसदी लोग भी ग्रेजुएट नहीं हैं. वह सिर्फ इसलिए कि कालेज सवर्णों के लिए हैं ताकि उन के बच्चे पढ़ लिख कर सरकारी या गैरसरकारी अच्छी पगार वाली नौकरी करने विदेश या फिर देश में बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे शहर चले जाएं और गरीब, दलित, पिछड़े, मुसलिम, आदिवासी बच्चे या तो बिहार में ही मजदूरी करते नजर आएं या फिर इन्हीं शहरों में जा कर हाड़तोड़ मेहनत कर जैसेतैसे जिंदगी बसर कर लें.

यह आंकड़ा महाभारत के एकलव्य की याद दिलाता है जिस का अंगूठा द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में मांग लिया था जिस से क्षत्रिय राजकुमार अर्जुन को कोई चैलेंज या खतरा ही न रहे. अब अंगूठा काटने के तौर तरीके बदल गए हैं लेकिन मकसद द्वापर युग सरीखा ही है.

इस लिहाज से तो धीरेंद्र शास्त्री जैसे कट्टर सनातनी ब्राह्मण बाबाओं को तो कोई चिंता करनी ही नहीं चाहिए क्योंकि ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार पहले से ही हिंदू राज्य है. अब बाबा लोग और चुनाव आयोग चाहते हैं कि इस अघोषित वर्ण व्यवस्था और मनुवाद पर चुनाव के जरिए संवैधानिक मोहर और लग जाए तो सारा सिस्टम यूपी एमपी की तरह ऊंची जाति वालों की मुट्ठी में होगा. रहे बुढ़ाते और याददाश्त खोते बीमार नीतीश कुमार तो उन्हें डुबोने और धकियाने की स्क्रिप्ट तो मोदीशाह 6 महीने पहले ही लिख चुके हैं.

अब बात नागरिकता प्रमाणपत्र की जो देश में ही अच्छेअच्छों के पास नहीं तो बिहारियों की बिसात क्या. आम लोगों को इस की जरूरत ही नहीं पड़ती. यह भी उन खास लोगों का शगल है जो विदेश जा कर बस गए हैं. इस प्रमाण पत्र को हासिल करना भी बहुत कठिन है. मातापिता का जन्म प्रमाण पत्र मांगा जाना भी कोई छोटामोटा मजाक नहीं. जब 97 फीसदी से भी ज्यादा लोगों के पास अपने ही जन्म का प्रमाण पत्र नहीं तो वे अपने पुरखोंपूर्वजों के जन्म प्रमाण पत्र किस चित्रगुप्त से लाएंगे यह तो भगवान कहीं हो तो वही जाने.

1987 के बाद पैदा हुए 2 करोड़ 93 लाख नौजवान वोटर अब बगलें झांक रहे हैं कि जब अपने खुद के पैदा होने का ही सर्टिफिकेट नहीं तो हमें पैदा करने वलों का कहां से मिलेगा. मातापिता के जन्म का प्रमाण पत्र शायद सौ पचास शिक्षित शहरी लोगों के पास मिल भी जाए लेकिन मातापिता की नागरिकता का एक भी प्रमाण पत्र बिहार में ढूंढे से न मिलेगा. क्योंकि इस की जरूरत खास मामलों में ही पड़ती है मसलन विदेशी मूल के नागरिकों से ही आमतौर पर यह दस्तावेज मांगा जाता है.

सेवा पहचान पत्र जिस के पास होगा उस के पास तो दूसरे कई दस्तावेज भी होंगे क्योंकि उन के बगैर सरकारी नौकरी मिलती नहीं. इसलिए यह भी गैरजरूरी और अव्यवहारिक मांग है. एक अंदाजे के मुताबिक कोई डेढ़ फीसदी लोगों के पास यह हो सकता है. इस से बदतर और बुरी हालत पेंशन दस्तावेज की है जो 1 फीसदी लोगों के पास भी नहीं. यह उन्हीं के पास होता है जो सरकारी नौकरी या संगठित क्षेत्र में काम कर चुके हैं. कितने लोग शादी का रजिस्ट्रेशन कराते हैं बिहार का आंकड़ा देखें तो 15 फीसदी के लगभग ही विवाह पंजीयन करवाते हैं और ये भी शहरी इलाकों के हैं. गांवदेहात के लोगों को तो मालूम भी नहीं रहता कि शादी का रजिस्ट्रेशन भी होता है और होता है तो कहां होता है.

जैसे ही यह फरमान आम हुआ तो लोग अपनीअपनी जेबें टटोलने लगे जिन में इन में से एक भी दस्तावेज नहीं था. विपक्ष ने उम्मीद के मुताबिक हल्ला मचाया क्योंकि इस हुक्म की जद में 95 फीसदी दलित, मुसलिम, पिछड़े और आदिवासी वोटर आ रहे थे जो आरजेडी और कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक हैं. लोगों के पास ये प्रमाणपत्र नहीं हैं इस से भी ज्यादा अचम्भे की बात यह है कि बिहार की कोई 29 फीसदी आबादी जो 1 करोड़ 76 लाख होती है बिहार में नहीं रहती. ये लोग जिन्हें प्रवासी मजदूर कहा जाता है दूसरे राज्यों में जा कर मेहनत मजदूरी या छोटीमोटी नौकरी कर अपना पेट पालते हैं क्योंकि बिहार में रोजगार का भी टोटा है और इन में 98 फीसदी दलित मुसलिम पिछड़े और आदिवासी हैं. बचे 2 फीसदी में से अधिकतर सवर्ण युवा या पैसे वाले पिछड़े जिन्हें अगड़ा मान लिया गया है, हैं जो कम्पनियों की तगड़े पैकेज वाली नौकरी कर रहे हैं.

सीधेसीधे प्रवासी पौने 2 करोड़ बिहारी मजदूर वोट डालने से वंचित हो सकते हैं क्योंकि इन्हें बाहरी राज्यों से बिहार आना पड़ेगा जो बेहद खर्चीला काम है. बिहारी मजदूर केवल छठ के त्यौहार पर ही घर आते हैं लेकिन इस के लिए उन का अलग से फंड होता है जिस में वे साल भर पैसा जमा करते हैं. अब ये दिक्कत में आ गए हैं कि अभी 15 – 20 हजार रुपए आने जाने में खर्च किए तो साल भर का बजट बिगड़ेगा फिर वोट डालने तो जाने का सवाल ही नहीं उठता तो क्यों बेकार में एक पहचान पत्र के लिए भागादौड़ी और मगजमारी की जाए.

यही चुनाव आयोग और बाबा लोग चाहते हैं कि ये गैर सवर्ण वोट डाल ही न पाएं क्योंकि इन में से अधिकतर भाजपा के वोटर नहीं हैं.

कोढ़ में खाज सरीखी बात यह कि चुनाव आयोग ने इतने बड़े काम के लिए महज एक महीने का वक्त दिया यानी आयोग यह मानकर चल रहा है कि जैसे ही लोग जन्म प्रमाण पत्र बनवाने जाएंगे वह थाल में कहीं सजा रखा होगा. यही हाल दूसरे दस्तावेजों का है जिन्हें हासिल करने में महीनों और कभीकभी तो सालों लग जाते हैं. ऊपर से घूस देना पड़ती है सो अलग. जिस राज्य में लोगों को खानेपीने और रहने सहित रोजगार के लाले पड़े हों वे घूस के पैसे कहां से लाएंगे यह सोचना किसी आयोग या सरकार का काम नहीं. यह भी नहीं देखा गया कि मौसम बारिश और बाढ़ का है ऐसे में गांव वालों का बाहर निकलना दूभर हो जाता है.

और जिन लोगों की यह जिम्मेदारी है उन्होंने हल्ला भी मचाया और सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया. आरजेडी सांसद मनोज झा, स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ये दलीलें ले कर सुप्रीम कोर्ट गए हैं कि एसआईआर संविधान के अनुच्छेद 14, 19 ( 1 )( ए ), 21, 325 और 328 की अनदेखी या उल्लंघन है. जिस से लाखों वोटर वोट डालने के अपने हक से महरूम रह जाएंगे.

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई कर अपना फैसला देगा. उधर बात और माहौल बिगड़ते देख चुनाव आयोग ने राहत के नाम पर यह घोषणा कर दी है कि अभी वोटर गणना फार्म जमा कर दें दस्तावेज बाद में जमा कर सकते हैं. यह मन बहलाने जैसी और विवाद टकराऊ बात नहीं तो और क्या है.

इस दौरान आरजेडी मुखिया तेजस्वी यादव ने इस फरमान के विरोध में 9 जुलाई को चक्का जाम की घोषणा कर दी जिस में कांग्रेस इस में शामिल होगी. तेजस्वी इसे लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश और एनआरसी जैसा कदम बता रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे भी विरोध जता रहे हैं.

खामोश हैं तो 2 प्रमुख दलित नेता राम को काल्पनिक करार देने वाले जीतन राम मांझी जिन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता और वे अगर किसी मंदिर में चले भी जाएं तो मंदिर को गंगा जल से धो कर पवित्र किया जाता है. दूसरे हैं रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान जो इन दिनों गागा कर दलितों को बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपने पिता को भाजपा के साथ जाने के लिए मनाया था जबकि उन्होंने यह घोषणा कर दी थी कि एक दफा जहर खा लूंगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा. अब भगवा गोद में झुला झूल रहे और सत्ता सुख भोग रहे चिराग अपने पिता के समाजवादी उसूलों में आग लगा रहे हैं.

बिहार में बवाल मचा हुआ है. गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. उस के 10 जुलाई के फैसले पर सभी की निगाहें हैं अगर वह चुनाव आयोग से इत्तफाक नहीं रखता तो चुनाव आयोग की खासी किरकिरी होगी और घुसपैठियों की रोकथाम के लिए यह कवायद की जा रही है जैसी दलीलों से सहमत होता है तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि लगभग 2 करोड़ वोटर अपना वोट नहीं डाल पाएंगे. बीच का रास्ता कोर्ट यह निकाल सकती है कि इस की मियाद थोड़ी और बढ़ा दे लेकिन इस से सभी लोग यानी वोटर रजिस्टर हो जाएंगे ऐसा लगता नहीं.

जिस राम नीति की बात धीरेन्द्र शास्त्री पटना से कर गए उस में शंबूक नाम के शूद्र को महज इसलिए मार दिया गया था कि उस के धर्म कर्म करने से रामराज में एक ब्राह्मण बालक की मौत हो गई थी. इसी नीति पर चुनाव आयोग संवैधानिक तरीके से चल रहा है कि गैर सवर्ण वोट ही न डाल पाएं.

Childless Women : 60 प्रतिशत निःसंतान महिलाएं तांत्रिकों के कुचक्र में

Childless Women : कुसुम की शादी को दूसरा साल बीत रहा था, मगर अभी तक वह कंसीव नहीं कर पाई थी. कुसुम की सास ने तो शादी के दिन ही पोतेपोतियों की फरमाइश कर दी थी. साल भर तो वह चुप रही, मगर दूसरे साल से ही वह बचा पैदा करने के लिए बहू के पीछे पड़ गई. रिश्तेदारों से फ़ोन पर बात करती तो बस यही बात ले कर बैठ जाती कि बहू की गोद अभी तक सूनी है. कुछ और समय बीता तो वह कुसुम को बांझ होने का दोष देने लगी. सुबह शाम के उलाहनों से कुसुम का जीना दूभर हुआ जा रहा था. एक दिन उस ने झुंझला कर सास से कह दिया, ‘अब बच्चा नहीं ठहर रहा तो मैं क्या करूं. जब होना होगा तब हो जाएगा.’

मगर सास कहां चुप बैठने वाली थी. बेटे को समझा बुझा कर उस ने कुसुम को एक तांत्रिक के पास ले जा कर झाड़फूक कराने को कहा. मां की जिद के आगे बेटा भी झुक गया. कुसुम से बोला, ‘जैसा मां कहती हैं करो. वह अनुभवी हैं. हमारा बुरा नहीं चाहती हैं.’

कुसुम पढ़ीलिखी थी, फिर भी परिवार के दबाव में तांत्रिक के पास जाने को राजी हो गई. तांत्रिक ने 16 शनिवार लगातार आने और एक घंटे की पूजा का मंतर सुनाया. इस सब में अब हर शनिवार उन के 1000 रुपए से ज्यादा खर्च होने लगे. 501 रुपए तो वह अपनी दक्षिणा ले लेता और बाकी हवन सामग्री के नाम पर ऐंठता था. चार शनिवार तो कुसुम की सास उस के साथ गई मगर बाद में कुसुम अकेले ही जाने लगी. एक दिन तांत्रिक ने कुसुम से कहा कि तुम्हारा पति योग्य नहीं है. तुम उस के साथ समय नष्ट कर रही हो. बच्चा चाहो तो मैं तुम्हें दे सकता हूं. सब गोपनीय रहेगा.

इतना सुनना था कि कुसुम ने आव देखा ना ताव एक झन्नाटेदार थप्पड़ तांत्रिक के गाल पर बजा दिया और एक झटके में वहां से बाहर निकल गई. घर आ कर उस ने पति को सारी बात बताई. वह सारी बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. मां से कुछ कहते तो वह उलटे बहू को ही दोष देने लगतीं. लिहाजा मां को कुछ बताए बगैर अगले शनिवार दोनों एक गाइनेकोलौजिस्ट से मिले.

कुसुम के कुछ टेस्ट होने के बाद पता चला कि उसके यूट्रस में फाइब्राइड्स हैं जो गर्भ नहीं ठहरने दे रहे हैं. फाइब्राइड्स, जिन्हें मायोमा या लियोमायोमा भी कहा जाता है, गर्भाशय में होने वाले गैर-कैंसरयुक्त ट्यूमर होते हैं. ये मांसपेशियों और रेशेदार ऊतक से बने होते हैं. इन के कारण निषेचन के पश्चात बना भ्रूण बच्चेदानी की दीवार से चिपक नहीं पाता और नष्ट हो कर शरीर से बाहर चला जाता है. ये फाइब्राइड्स बांझपन को तो बढ़ाते ही हैं, अधिक रक्तश्राव के कारण महिलाएं एनिमिक भी हो जाती हैं. इस के अलावा बारबार पेशाब आना, कब्ज, पीठ और पैर में दर्द जैसी परेशानियों से भी जूझती हैं.

अब कुसुम के फाइब्रायड का इलाज चल रहा है. डाक्टर ने कहा है कि फाइब्राइड्स ख़त्म होने पर वह कंसीव कर पाएगी. यदि फिर भी गर्भ ना ठहरे हो वह आईवीएफ पद्धति से बच्चा पा सकती है जो आजकल बहुत नार्मल बात है.

कुसुम समझदार है इसलिए तांत्रिक के चक्कर से जल्दी निकल गई. मगर देश में आएदिन हजारों औरतें तंत्रमंत्र झाड़फूंक से बच्चा पैदा करने के मोह में तांत्रिकों और बाबाओं की आपराधिक साजिशों का शिकार हो कर अपना सबकुछ गंवा रही हैं. हर दिन अखबारों में किसी ना किसी महिला से बलात्कार और बाबा के कुकर्मों की खबर छपती है.

ग्वालियर शहर के थाटीपुर इलाके में रहने वाली एक महिला को शादी के 5 साल बाद भी संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ. बच्चे की चाह में महिला एक तांत्रिक के चंगुल में फंस गई. तांत्रिक ने पहले तो महिला को घर छोड़ दूसरे मकान में रहने की सलाह दी. कहा कि पुराना घर संतान उत्पत्ति में बाधा पैदा कर रहा है. पतिपत्नी तांत्रिक की बातों में आ कर अपना पुराना घर छोड़ किराए के मकान में रहने लगे. तांत्रिक वहां आ कर प्रतिदिन तंत्र क्रियाएं करने लगा. फिर एक दिन तांत्रिक एक बड़े संत से मिलवाने के बहाने महिला को चुपचाप अपने साथ दिल्ली ले गया और वहां पर 3 दिन होटल के कमरे में दुष्कर्म किया. वहां से राजस्थान ले गया. जैसेतैसे भाग कर आई महिला ने आरोपी के खिलाफ ग्वालियर में मामला दर्ज कराया. ये मामला सितम्बर 2023 का है.

उत्तर प्रदेश के कासगंज में बेटी को बच्चा नहीं होने से परेशान एक महिला को तांत्रिक ने अपने झांसे में ले कर 20 लाख रुपए की ठगी कर ली. इतना ही नहीं, उस ने महिला के अश्लील फोटो खींच लिए. फिर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. पीड़िता ने एसपी से मामले की शिकायत की.

कासगंज शहर की रहने वाली इस महिला का कहना है कि उन की बेटी की शादी को कई वर्ष हो गए थे, लेकिन बेटी को बच्चा नहीं हो रहा है. इस वजह से उस के ससुराल वाले उस को परेशान करते हैं. बेटी के लिए वह प्रभात नामक तांत्रिक के संपर्क में आई और उस के कहे अनुसार करती चली गई.

प्रभात ने कहा कि बुरी आत्माओं का साया होने के कारण उस की बेटी को बच्चा नहीं हो रहा है. तांत्रिक प्रभात ने महिला को बताया कि उन की बेटी के हाथ में संतान रेखा भी सही नहीं है. इस के लिए कुछ तंत्र क्रिया करनी होगी तो सब सही हो जाएगा. तंत्र विद्या करने के बहाने वह उस महिला के घर आने लगा और एक दिन उस ने महिला के कुछ आपत्तिजनक फोटो उस वक्त खींच लिए जब वह अपने बाथरूम में नहा रही थी. बाद में वह उन फोटो को वायरल करने की धमकी दे कर उसे ब्लैकमेल करने लगा. तांत्रिक को पैसे देने के लिए महिला ने अपने जेवर तक बेच दिए. यह मामला दिसंबर 2024 का है.

बरेली में शादी के बाद बच्चा न होने पर एक शख्स अपनी पत्नी को तांत्रिक के पास ले गया. जहां तांत्रिक ने तंत्रमंत्र की आड़ में पति की मौजूदगी में ही महिला को नशीला पेय पिला कर उस के देवरों से उस का रेप कराया. नशा उतरने पर युवती को जब अपने साथ हुए दुष्कर्म का भान हुआ तो उस ने स्थानीय थाने पर जा कर तांत्रिक, पति, दोनों देवरों और अन्य ससुरालियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और तुरंत ससुराल छोड़ मायके आ गई. युवती की शादी जून 2023 में हुई थी और शादी के बाद से ही उस के ऊपर बच्चा पैदा करने का दबाव ससुरालियों की तरफ से था. बाद में सास ने बेटेबहू को तांत्रिक के पास जाने की सलाह दी थी. यह घटना 3 जून 2025 को मीरगंज क्षेत्र के आमजपुर की है.

पिछले दिनों लखनऊ के किंग जौर्ज मैडिकल कालेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग और लोहिया संस्थान के ओब्स एंड गायनी विभाग ने एक साल में बांझपन की शिकार 200 महिलाओं की काउंसलिंग से जो तथ्य जुटाए उन से पता चलता है कि निसंतान 60% महिलाएं इलाज से पहले तांत्रिकों के फेर में फंसती हैं.

काउंसलिंग के दौरान 60 फीसदी महिलाओं ने इलाज से पहले तांत्रिक और झाड़फूंक के उपाय अपनाने की बात कबूल की. कामयाबी न मिलने पर 20 प्रतिशत महिलाओं ने जड़ीबूटी और दूसरी पैथी का सहारा लिया. बाकी 20 फीसदी महिलाओं ने दिक्कत को भांपा. एक से दो साल तक संतान सुख के लिए इंतज़ार किया और सफलता न मिलने पर डाक्टर की सलाह पर इलाज शुरू किया.

जानीमानी गायनेकोलौजिस्ट डा. नीना बहल कहती हैं, ‘25 से 30 साल की उम्र परिवार बढ़ाने का सब से उपयुक्त समय है. 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं में बांझपन की आशंका बढ़ जाती है. समय पर इलाज हो जाए तो गोद भरने की उम्मीद बहुत ज्यादा होती है. कई बार महिलाओं की फेलोपियन ट्यूब ब्लौक होती है जिसे आसानी से खोला जा सकता है. कुछ महिलाओं को फाइब्राइड की समस्या होती है. कुछ में हार्मोनल असंतुलन होता है, वहीं अधिक उम्र में शादी, पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, मोटापा, यौन संचारित संक्रमण जैसे कई कारण होते हैं, जिस से गर्भ नहीं ठहरता है. इन का इलाज अब काफी आसान है. कई बार पुरुष में शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम होती है अथवा उन की क्वालिटी अच्छी नहीं होती है. इन सब का इलाज एलोपैथी में है. बहुत से दंपत्ति तांत्रिक बाबा, भूतप्रेत और दूसरी मान्यताओं में अपना कीमती समय गंवा देते हैं. जब कहीं से कोई फायदा नहीं होता तब एलोपैथी में इलाज ढूंढने आते हैं, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

डाक्टर की मानें तो गर्भ ना ठहरने के अनेक कारण होते हैं. यह स्त्री और पुरुष दोनों की वजह से हो सकता है मगर उस का समय से इलाज जरूरी है. महिलाओं में जहां 35 की उम्र के बाद प्रजनन क्षमता घटने लगती है वहीं पुरुष के शुक्राणुओं की क्वालिटी भी 40 की उम्र के बाद अच्छी नहीं रहती. ऐसे में तांत्रिकों और बाबाओं के चक्कर में समय खराब करने की बेवकूफी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इलाज सिर्फ एलोपैथी में है और कहीं नहीं.

डाक्टर के मुताबिक महिलाओं में गर्भ न ठहरने के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे – अनियमित ओवुलेशन, पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, थायरौइड गड़बड़ी (हाइपो या हाइपरथायरौइडिज़्म), समय से पहले रजोनिवृत्ति, फैलोपियन ट्यूब की रुकावट, पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिज़ीज, पुराने यौन संक्रामण (जैसे क्लैमाइडिया, गोनोरिया), एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय की समस्याएं – गर्भाशय में फाइब्राइड्स, पोलीप्स या असामान्य बनावट, एंडोमेट्रियल परत की गड़बड़ी, हार्मोनल असंतुलन – प्रोलैक्टिन का अधिक स्तर या इंसुलिन असंतुलन आदि.

आधुनिक जीवनशैली भी महिलाओं में बांझपन को बढ़ा रही है. अब महिलाएं भी पुरुषों की तरह घर से बाहर निकल कर नौकरियां कर रही हैं. औफिस और घर के बीच संतुलन न बैठने पर या काम का अधिक बोझ होने पर अत्यधिक तनाव में रहना, मोटापा या बहुत कम वजन, धूम्रपान, शराब या किसी अन्य तरह के नशे की लत, औटोइम्यून या जेनेटिक समस्याएं बांझपन को बढ़ाती हैं.

पुरुषों में भी अनेक समस्याएं होती हैं जो उन्हें संतान सुख से दूर रखती हैं. जैसे – शुक्राणुओं की गुणवत्ता या मात्रा में कमी – कम स्पर्म काउंट, कम गतिशीलता, असामान्य आकार आदि. इस के अलावा अंडकोष की समस्याएं भी अवरोध पैदा करती हैं. जैसे वैरिकोसील, संक्रमण, चोट या सर्जरी, हार्मोनल असंतुलन, टेस्टोस्टेरोन की कमी आदि. कुछ पुरुषों में शीघ्रपतन की समस्या होती है तो कुछ में इरैक्टाइल डिसफंक्शन जो शुक्राणुओं को उन के गंतव्य तक नहीं पहुंचने देता है. जीवनशैली भी इस में महत्वपूर्ण रोल अदा करती है. अधिक गरमी (जैसे गर्म पानी से स्नान) शुक्राणुओं को पैदा करने में बाधक है, वहीं धूम्रपान, शराब, स्टेरौइड्स का इस्तेमाल भी नपुंसक बनाता है.

बांझपन का इलाज समय रहते करा लेना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि समय के साथ पुरुष और महिला दोनों की प्रजनन क्षमता कम हो सकती है. अगर शादी के एक साल बाद भी नियमित प्रयासों के बावजूद गर्भ न ठहरे, तो डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए. क्योंकि उम्र बढ़ने से अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता घटती है. कई बार कारण मामूली होते हैं जिन्हें समय रहते ठीक किया जा सकता है. देर होने पर मानसिक तनाव बढ़ता है, जो और ज्यादा असर डालता है.

अगर प्राकृतिक रूप से गर्भ ठहरने में कठिनाई हो रही है और अन्य उपचार (जैसे दवाएं या आईयूआई) से भी फायदा नहीं मिल रहा है तो इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक आम और प्रभावी विकल्प है. आजकल यह तकनीक बहुत आम हो गई है. इस में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि जितनी देर होती जाएगी होने वाले बच्चे को स्वास्थ समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाएगी.

आधुनिक तकनीक की मदद से आईवीएफ की सफलता दर पहले से कहीं बेहतर हो गई है. इसे सामाजिक स्वीकार्यता भी मिल चुकी है. अब लोग खुल कर आईवीएफ के बारे में बात करते हैं और इसे अपनाने में हिचक महसूस नहीं करते. भारत सहित कई देशों में आईवीएफ क्लीनिक हर छोटेबड़े शहर में उपलब्ध हैं. बढ़ती उम्र और तनाव भरे जीवन में जब प्राकृतिक रूप से गर्भधारण मुश्किल होता है, तो आईवीएफ एक उम्मीद की किरण बनता है.

Porn And Mythology : पोर्न हो या पौराणिक, दोनों बरगलाते ही हैं

Porn And Mythology : सुखी जीवन के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं इस के लिए जिस तरह धर्म मोक्ष को आखिरी मंजिल बताता है उसी तरह सैक्स ओर्गज्म को, लेकिन ये दोनों ही भ्रामक सुख और अवस्थाएं हैं. ये सहज क्या मुश्किल से भी मिलने बाली चीजें नहीं हैं बल्कि इन के लिए कई कर्मकांडों को करते रहना पड़ता है. सुख प्राप्ति के लिए कब, क्या, क्यों और कैसे करना है यह हम आप नहीं बल्कि सुखों के ठेकेदार तय करते हैं.

ईश्वर प्राप्ति यानी मोक्ष के जो जो मुख्य मार्ग धर्म ग्रन्थों ने बताए हैं वे हैं कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्ग. इन में भी सब से सरल है भक्ति मार्ग क्योंकि उस में वही करते रहना पड़ता है जो धर्म के ठेकेदार बताते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो आदमी अपनी हैसियत के मुताबिक दान दक्षिणा दे कर और बहुत सा वक्त बर्बाद कर मोक्ष मिलने न मिलने की झंझट और डर से मुक्त हो जाता है. ओर्गज्म इसी तरह का शाब्दिक सुख है जिस का एक बड़ा जरिया इन दिनों पोर्न फिल्में हैं. इन फिल्मों का सेवन भक्ति के नशे जैसा ही होता है जिस में कुछ देर झूमझाम कर लोग वापस वास्तविक जीवन में आ कर यह मान बैठते हैं कि यही सुख था.

पोर्न फिल्मों में आखिर ऐसा होता क्या है जिस का जूनून इतने सर चढ़ कर बोल रहा है, इस मसले पर दुनिया भर की अदालतें भी असमंजस में हैं. हाल ही में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला देते कहा है कि पोर्न बेबसाइटों को यह तय करना होगा कि उन की साइट्स देखने वाले बालिग यानी 18 साल से बड़ी उम्र के हैं. इस के लिए उन्हें यूजर्स से सरकारी पहचान पत्रों या दूसरे तरीकों से उम्र की पुष्टि करनी होगी. अगर कोई वेबसाइट ऐसा नहीं करती है तो उसे हर दिन 10 हजार डौलर का जुर्माना देना पड़ेगा. अगर कोई नाबालिग उन की वेबसाइट देखते पाया गया तो यह जुर्माना बढ़ कर 25 हजार डौलर तक होगा.

दरअसल में टेक्सास ने साल 2023 में एक कानून ( एचबी 1181 ) पारित किया था जिस का मकसद नाबालिगों को औन लाइन पोर्नोग्राफी से बचाना है. इस कानून को वयस्क मनोरंजन उद्योग का प्रतिनिधित्व करती संस्था फ्री स्पीच कोएलिशन ने यह दलील देते चुनौती दी थी कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और निजता के अधिकार का उल्लंघन है. निचली अदालत ने इस कानून के कुछ हिस्सों को असंवैधानिक करार दिया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उलट दिया. हालांकि फैसला देने बाले 6 जजों में से 3 निचली अदालत के फैसले से सहमत थे.

अब आगे जो भी हो लेकिन हालफिलहाल टेक्सास में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स ने पोर्न फिल्में दिखाना बंद कर दी हैं. क्योंकि यह उन के लिए वाकई मुश्किल और महंगा काम है कि वे दर्शकों की उम्र का सत्यापन करती फिरें. टेक्सास सहित अमेरिका के कुछ अन्य राज्यों के लोग भी अब पोर्न सुख से वंचित हो गए हैं. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वे पोर्न फिल्में देखना बंद कर देंगे या पोर्न इंडस्ट्री को कोई भारी नुकसान होगा कहने का मतलब यह कि लोग धर्म की तरह सैक्स को नहीं छोड़ सकते अब वे चोरी से पोर्न फिल्मे देखेंगे. एक दफा लोग धर्म को छोड़ सकते हैं सैक्स को नहीं ( इस की मिसाल नास्तिक हैं ).

कोरोना काल भी इस का उदाह्ररण है जब मंदिर, मस्जिद, चर्च गुरूद्वारे वगैरह के द्वार बंद थे इस के बाद भी लोग घरों से भक्ति कर रहे थे लेकिन तब भक्ति की तादाद कम हो गई थी और सैक्स व पोर्न फिल्मों की बढ़ गई थी.

जब सब कुछ सामान्य हो गया तो देखते ही देखते धर्म का बाजार फिर गरमा उठा. लोगों ने बिना कोई तर्क किये मान लिया कि संकट और मुसीबतों का यह दौर उपर बाले की नाराजी की वजह से था अब दोबारा ऐसा न हो इस के लिए जरुरी है कि धर्म स्थलों में पैसा चढ़ाया जाता रहे सो इफरात से लोग दान दक्षिणा दे रहे हैं.

धर्म ग्रन्थ पौराणिक किस्सेकहानियों से भरे पड़े हैं जो लोगों को बताते हैं कि सुख कैसे हासिल किया जा सकता है. इस के लिए भक्तों को बरगलाने चमत्कारिक प्रसंगों की भरमार है. हरेक धर्म का नायक बहुत ताकतवर और सुपरमेन दिखाया गया है. ईसा मसीह, राम, कृष्ण मोहम्मद वगैरह अतिमानव बताए गए हैं और कुछ इस तरह बताए गए हैं कि उन की लीलाओं के बाबत कोई सवाल या तर्क नहीं करता. आइए कुछ प्रसंगों से समझें कि कैसेकैसे उटपटांग किस्से हरेक धर्म ने गढ़ रखे हैं.

ईसा मसीह बीमार लोगों को बिना किसी डाक्टरी इलाज के सेकंडों में तो ठीक कर देते थे. वे भूतप्रेत भी भगा देते थे लेकिन एक बार तो उन्होंने 120 गेलन पानी को शराब में बदल दिया था. उत्पत्ति 2 – 18 – 25 व मत्ती 1.11-13 के मुताबिक गलील के काना में एक शादी समारोह में उन्होंने यह करिश्मा कर दिखाया था. यह शराब भी उम्दा क्वालिटी की थी यह पीने वालों ने बताया. यह किस्सा शिर्डी वाले साईं बाबा के पानी से दिए जलाने वाले प्रसंग से मिलताजुलता है.

इन मनगढ़ंत बातों पर लोग सदियों से भरोसा कर रहे हैं तो भला पोर्न फिल्मों के कारोबारी क्यों न इस फार्मूले की कौपी करें. अब उन का नायक लगातार 8 – 10 बार सहवास कर रहा है तो इस में गलत किया अगर उस में भी कुछ गलत नहीं है तो पोर्न फिल्में यही तो बताती हैं कि आप कैसेकैसे आर्गेज्म और फोरप्ले सहित दूसरे सैक्स सुख प्राप्त कर सकते हैं लेकिन चूंकि यह तथाकथित रूप से अनैतिक है इसलिए भक्ति की तरह खुलेआम नहीं किया जा सकता.

पोर्न फिल्में देख लोग उत्तेजित होते हैं यह एक तरह की आस्था और ध्यान नहीं तो क्या है. ओशो यानी रजनीश ने लोगों की इन दोनों कमजोरियों और जरूरतों पर एक चर्चित और विवादित किताब ही लिख डाली थी जिस का नाम था सम्भोग से समाधि तक. वह इन दोनों को ही चेतना और ऊर्जा मानते थे. हालांकि यह मशहूर मनोविज्ञानी सिंगमड फ्रायड की थ्योरी का विस्तार था जिसे उन्होंने सरल तरीके से समझाया था.

यही धर्म के दुकानदारों ने किया, मसलन हजरत मोहम्मद चांद को दो हिस्सों में बांट सकते हैं, कृष्ण उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा सकते हैं तो पोर्न फिल्मों के नायक नायिका तरहतरह से सैक्स और सहवास क्यों नहीं कर सकते. इन फिल्मों पर लगता यह आरोप गलत कहीं से नहीं है कि ये दर्शकों को भरमाती और बरगलाती हैं जिस से लोगों की सैक्स लाइफ क्वालिटी गिरती है और सुखी नहीं रह जाती. तो फिर पौराणिक किस्से कहानियों में आस्था क्यों जबकि वे भी यही करती हैं पौराणिक धार्मिक चक्करों में तो पूरी लाइफ ही ख़राब हो जाती है.

दिक्कत तो यह है कि नैतिकता की परिभाषा और उदाहरण धर्म के धंधेबाजों ने तय किए. उन के नाम पर लोगों को डराया पाप पुण्य मोक्ष मुक्ति स्वर्ग नरक वगैरह के सांप बिच्छू दिखाए जब इन्हें यह लगा कि उन्मुक्त सैक्स दुकान खराब कर सकता है तो उन्होंने इसे वर्जित अनैतिक और समाज को बिगाड़ने वाला घोषित कर दिया और ऐसे किया कि लोग सैक्स को पाप ही समझने लगे.

आज के दौर के टीनएजर्स भले ही कितने आस्थावादी हो जाएं इफरात से पोर्न फिल्में चोरी छिपे देखते हैं और फिर हस्तमैथुन कर अपनी उत्तेजना शांत करते हैं.

कपल्स मनमाफिक तरीकों से सहवास करते हैं

विवाहितों के सैक्स प्रयोग चर्चा का विषय कम ही बनते हैं लेकिन शामत अविवाहितों की होती है जो हस्तमैथुन करने के बाद कुंठा और ग्लानि से भर जाते हैं. इस समस्या पर एक सटीक फिल्म ‘ओ माई गोड – 2’ साल 2023 में निर्देशक अमित राय ने बनाई थी. एक टीनएजर अपनी सैक्स अज्ञानता के चलते आत्महत्या करने तक उतारू हो जाता है क्योंकि स्कूल के बाथरूम में हस्तमैथुन करते उस का वीडियो दोस्तों ने बना कर वायरल कर दिया था. इस किशोर को यह वहम भी हो गया था कि उस का पेनिस आम या सामान्य आकार से छोटा है. सैक्स के लिए वह नीम हकीमों के चक्कर में भी पड़ जाता है और वियाग्रा भी खरीदता है जो नकली निकलती है.

किशोर मानसिकता पर बनी यह पहली फिल्म है जिसे शिक्षाप्रद कहा जा सकता है. निर्देशक ने सेंसर के प्रकोप से बचने शंकरजी को भी ठूंस दिया है जो पीड़ित परिवार की मदद किया करते हैं. यानी भगवान भी सैक्स समस्याएं हल करता है और सैक्स को वर्जित नहीं मानता. खजुराहों के मंदिरों की तो थीम ही सैक्स और सहवास है कि यह कैसे कैसे किया जा सकता है. बात आज के लिहाज से अजीब तो है कि मंदिरों के अंदर देवीदेवताओं भगवानों की मूर्तियां हैं और बाहर दीवारों पर यौन क्रियाओं को उसी तरह चित्रित किया गया है जैसा पोर्न चलचित्रों में दिखाया जाता है. इन चित्रों में वह सब कुछ है जो पोर्न फिल्मों में दिखाया जाता है और वह भी जो मस्तराम टाइप की नीली पीली किताबों में लिखा होता है.

इन मंदिरों और मूर्तियों का मकसद यौन शिक्षा देना ही माना जा सकता है क्योंकि मैथुनरत मूर्तियों की पूजा कोई नहीं करता लेकिन शिव और विष्णु की करते हैं. यह धर्म के धंधेबाजों की साजिश ही है कि उन्होंने धर्म और सैक्स को नदी के दो किनारों की तरह कर दिया है. गौर और बारीकी से पढ़ें और देखें तो धार्मिक साहित्य में भी इफरात से पोर्न है यह और बात है कि उस की चर्चा कोई कथाकार या धर्म गुरु नहीं करता.

यह सच है कि पोर्न फिल्में जागरूकता को बढ़ावा दे सकती हैं लेकिन उन के निर्माताओं और कारोबारियों ने ज्यादा पैसा कमाने के लालच में इन का कचरा कर दिया है ठीक वैसे ही जैसे धर्म गुरुओं ने पौराणिक साहित्य का कर रखा है. इन फिल्मों से कल्पनाशीलता गलत दिशा में बढ़ती है तो पौराणिक साहित्य भी कोई सही दिशा नहीं दिखाता जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को प्रोत्साहन देता रहता है.

शनिवार की रात पीपल के पेड़ के नीचे दिया रखने से अगर सारे कष्ट दूर होते और जीवन सुखी होता तो दुनिया में कोई हैरान परेशान नहीं होता. करवा चौथ का व्रत रखने से अगर अखंड सुहाग मिलता तो देश में लाखों करोड़ों विधवाए न होतीं.

पोर्न और पौराणिक दोनों ही भ्रमित करने वाले हैं लेकिन इन से बचा भी नहीं जा सकता क्योंकि सैक्स कुदरती जरूरत है तो धर्म एक ऐसी परिकल्पना है जिस ने सदियों से लोगों के दिमाग को जकड़ रखा है. पोर्न तो जिंदगी के एक पहलू को डसता है लेकिन धर्म जन्म से पहले से ले कर मरने के बाद तक पीछा नहीं छोड़ता.

Parivarik Kahani : गुलाम – क्या शहर में मधुलिका अपने सपने को पूरा कर पाई?

Parivarik Kahani : यह कैसा वातावरण था विश्वविद्यालय का, जहां दिन में तो सब शांत दिखता था मगर शाम ढलते ही एक अजीब सी मदहोशी छा जाती थी. खुलेपन की चाह लिए छात्रछात्राएं शराब और दैहिक सुख को ही असल आजादी समझते थे. ऐसे में गांव से अपना कैरियर बनाने आई मधुलिका करे भी तो क्या करे…

मुझ को जैसे ही यह खबर मिली कि मैं दिल्ली के एक मशहूर विश्वविद्यालय में एमफिल के लिए चयनित हो गई हूं तो खुशी के कारण मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. इस विश्वविद्यालय में एमफिल के लिए चयनित होने का मतलब सीधा सा था, कैरियर की ऊंची उड़ान.
एमफिल के बाद पीएचडी और फिर किसी विश्वविद्यालय में प्रोफैसर के पद पर नियुक्ति, बड़ी पगार और सम्मान का जीवन.

मैं सपनों का महल बनाने लगी थी और बस उसे अब सच के धरातल पर उतारना भर था. मुझ जैसी देहाती लङकी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. यहां तो कोई पुलिस की नौकरी भी पा जाता है तो गांव भर में मिठाई बंटती है, नाचगाना होता है और इलाके में नाम हो जाता है.

विश्वविद्यालय में प्रवेश की सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मुझे छात्रावास में कमरा नंबर 303 आवंटित किया गया. कमरे में सामान ले कर पहुंची तो हक्कीबक्की रह गई. कमरे की दीवारों पर अश्लील भाषा लिखी हुई थी, टौयलेट की दीवारों पर भारत के महापुरुषों के बारे में अपशब्द लिखे हुए थे. इसे देख कर ऐसा प्रतीत हुआ कि पिछली बार यहां पर कोई निहायत ही बदतमीज लङकी रही होगी जो मेरी नजरों में छात्रा कहलाने लायक भी नहीं थी.

मैं ने सफाईकर्मी को बुलाने के बजाय खुद ही एक गीले कपड़े से दीवारों पर लिखी अश्लील भाषा और अपशब्दों को मिटा दिया. आखिर देश के महापुरुष मेरे भी तो महापुरुष थे. यदि हम उन का आदर नहीं कर सकते तो उन का अपमान करने का भी तो हमें कोई अधिकार नहीं.

विश्वविद्यालय का महौल भी कुछ अजीबोगरीब लग रहा था, लेकिन यह सोच कर कि जल्दी ही मैं खुद को इस माहौल में ढाल लूंगी, मैं ने एक लंबी और गहरी सांस ली. पर मुझे जल्दी ही यह एहसास हो गया कि इस विश्वविद्यालय के माहौल को मैं जितना असामान्य समझ रही थी, यह उस से भी अधिक असामान्य था. शाम के समय विश्वविद्यालय में अजीब सी मदहोशी छाने लगती थी. रातों के रंगीन होने की तो बातें ही क्या? ऐसी बातें सोच कर भी मेरे दिमाग में अजीब सी सिहरन दौड़ जाती थी.

जल्दी ही मेरी दोस्ती वैशाली से हो गई. वह जोधपुर के पास की रहने वाली थी. मेरी और उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि लगभग एक जैसी थी. मेरे ही छात्रावास में उस का भी कमरा था. हम दोनों को हमेशा विश्वविद्यालय के बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा रहती थी. हम इस बात पर खूब हंसा करती थीं कि कई छात्र तो यहां के प्रोफैसरों से भी ज्यादा गंजे हैं. पता ही नहीं चलता कौन छात्र है, कौन प्रोफैसर है.

धीरेधीरे लाइब्रेरी, कैंटीन आदि स्थानों पर सीनियर छात्राओं का साथ भी मिलने लगा. उन्होंने इशारों ही इशारों में विश्वविद्यालय की अनेक अंदरूनी जानकारी दे दी, जिन से नए छात्र शुरू में अनजान रहते हैं. कौन सा प्रोफैसर कौन सी विचारधारा का है, कौनकौन से प्रोफैसर शोध के दौरान कैसे मदद करते हैं, कौन से प्रोफैसर के क्या शौक हैं, कौन सा प्रोफैसर अपने छात्रों के कैरियर के लिए कितना गंभीर है, कौन सा प्रोफैसर रंगीला है वगैरहवगैरह.

एक दिन में और वैशाली शाम के समय अपने एक सीनियर छात्रा शिखा के साथ विश्वविद्यालय के कैंपस में टहल रही थीं. तभी मुझे वहां एटीएम का बूथ दिखाई दिया. मैं ने वैशाली और शिखा से कहा, ‘‘मुझे कुछ पैसे निकालने हैं, अभी एटीएम से हो कर आई.’’

यह सुन कर शिखा हंस पड़ी,”मधुलिका, यह एटीएम नहीं. यह कंडोम निकालने का एटीएम है. सुरक्षित यौन संबंध बनाने के लिए सरकार ने विश्वविद्यालय में जगहजगह पर कंडोम निकालने के एटीएम लगवाए हैं. यहां लङकों से ज्यादा लड़कियां आती हैं. लङके तो खुले सैक्स का आनंद लेना चाहते हैं लेकिन गर्भ ठहरने का खतरा तो लड़कियों को होता है.’’

वैशाली और मेरे लिए यह बड़ी चौंका देने वाली बात थी. लेकिन शिखा के अपने तर्क थे और वह इस की आवश्यकता पर बल दे रही थी और हमें एहसास दिला रही थी कि हम दकियानूसी हैं. शिखा ने बताया, ‘‘मधुलिका, यह वह विश्वविद्यालय है जहां लड़कियों को वास्तव में लङकों  की बराबरी का एहसास होता है. इसलिए यहां रात के समय एकदूसरे के छात्रावासों में जाने के लिए लङकेलड़कियों को कोई मनाही नहीं है. वास्तविक आजादी तो यहीं है. तू भी ऐसी आजादी का आनंद लूटना चाहे तो स्वागत है.’’

‘‘धत… हम यहां पढ़ने के लिए आई हैं. ऐसी आजादी के मजे लूटने नहीं.’’

‘‘तो मधुलिका, जो ऐसा कर रहे हैं, क्या वे पढ़ नहीं रहे हैं? यहां विद्वानों की कतार लगी है कतार. अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक सम्मेलनों के लिए यह विश्वविद्यालय सर्वोत्तम स्थल है.’’

मैं ने शिखा की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा, ‘‘लेकिन पढ़ तो वे भी रहे हैं, जो ऐसी आजादी का जश्न नहीं मनाते. अच्छा अब चलते हैं, खाने का समय हो रहा है.’’

मैं ने बात को आगे बढ़ाने की बजाय, बात का रूख बदलने की कोशिश की. लेकिन ऐसा लगा जैसे मेरी बात शिखा को चुभ गई हो.

उस रात मैं शिखा की बातों को फिर से याद कर रोमांचित हो रही थी. कितनी आजादी है यहां औरत के लिए. मेरी बाली उमर मुझे धिक्कार रही थी कि आजादी की इस लहर का हिस्सा मैं क्यों नहीं बन रही हूं. लेकिन मेरे अंदर कुछ था जो मुझे ऐसा करने से रोकता था. देहातीपन, शर्म और हया या फिर छुट्टी में पिलाई गई नैतिकता.

शिखा ने बहुत कोशिश की कि मैं जल्दी से जल्दी उस माहौल में आत्मसात हो जाऊं. मेरा देहातीपन हमेशा हिचक पैदा करता था और मेरा यौवन उस हिचकिचाहट को कुरबान कर देना चाहता था. मेरी कश्ती डांवाडोल थी. वह कभी आजादी के उस तूफान में बह जाना चाहती थी, कभी किनारे लगना चाहती थी.

एक दिन शिखा मुझे अपने कमरे में ले गई. कमरे में सिगरेट के धुएं की गंध समाई हुई थी. कमरे में पहुंचते ही उस ने सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट अपने लिए निकाली और फिर सिगरेट का पैकेट मेरी ओर बढ़ा दिया. मेरे मना करने पर वह बोली, ‘‘मधुलिका, शरमाओ मत. मैं भी पहले ऐसी ही थी. मुझे भी तुम्हारी तरह लज्जा का एहसास होता था. लेकिन इस नशे ने मुझे जिंदगी जीने की कला सिखाई. दुनिया के सारे गम सिगरेट के धुएं के छल्लों में उड़ जाते हैं. यह जिंदगी हमें जीने के लिए मिली है, मधुलिका. इसे खुल कर जिओ, यार. क्या रखा है पाप और पुण्य में. भगवान तो हमें डराने के लिए बनाया गया है.’’

‘‘तो शिखा, तुम भगवान से नहीं डरतीं?’’

शिखा मेरी इस बात पर हंसी और फिर सिगरेट का कश भरते हुए कहा, ‘‘मधुलिका, मेरी विचारधारा में भगवान का कोई स्थान नहीं. ये पापपुण्य, स्वर्गनरक अज्ञानियों के इजाद किए हुए शब्द हैं. ये सब ढकोसले हैं. और धर्म, जिसे तुम धर्म कहती हो न, यह वह अफीम है जिस का नशा कभी उतरता ही नहीं.’’

‘‘लेकिन शिखा सोचो, तुम्हारे होने वाले पति को जब इन सब बातों का पता चलेगा, तब क्या होगा?’’

‘‘पति…कैसा पति? कौन पति?’’ शिखा ने बड़े आश्चर्य से कहा. फिर उस ने सिगरेट के राख को चुटकी मार कर गिराते हुए कहा, ‘‘मधुलिका, हमारे लिए पति ठोकरों पर होते हैं. हमें पति की जरूरत ही क्या है? हम जैसी आजाद खयालों की लड़कियां पति के बंधन में बंध कर गुलाम नहीं बनतीं. ये शादीविवाह के बंधन दकियानूसी और रूढ़िवादी लोगों के लिए हैं. गृहस्थी, परिवार, बच्चे, पति सासससुर की सेवा, छी, ये भी कोई काम है.’’

‘‘तो शिखा, फिर तुम्हारी नजरों में काम क्या है?’’

‘‘जिंदगी की मौज. हर बंधन को तोङना, आदमी को बंधनों से मुक्त करना. आजादी, आजादी, आजादी, बस आजादी. यही हमारे जीवन का मकसद है.’’

‘‘लेकिन शिखा, आजादी तो वे मांगते हैं जो गुलाम हों. तुम तो आजाद हो. फिर, तुम्हें किस बात की आजादी चाहिए?’’

शिखा ने सिगरेट में एक जोरदार कश और मारा और मुझ पर अपनी आजादी का रौब गालिब करने के लिए अलमारी से शराब की बोतल निकाल कर मेज पर रख दी,”ओह मधुलिका, तुम अभी नई हो इसलिए हमारे विचारों को समझती नहीं. ये जो धर्म और जाति की दीवारें हैं न, इन्होंने समाज को बांट रखा है. हमें ये दीवारें गिरानी हैं. हमें सब को बराबर के पायदान पर लाना है. सरकारों के नियमों और कानूनों ने इंसान का जीना हराम कर दिया है. इंसान अपनेआप को हर जगह गुलाम सा महसूस करता है. हमें ये सब बंधन तोङने हैं जो गुलामी का एहसास कराते हैं. इसलिए हम अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को भी नहीं मानते. इस धरती पर सभी इंसानों को स्वतंत्रतापूर्वक रहने का अधिकार है.’’

‘‘लेकिन शिखा, ये नियम और कानून तो सभ्य समाज की स्थापना के लिए हैं. ये नियम कानून नहीं होंगे तो जंगल राज स्थापित हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन मधुलिका, यह भी तो समझो कि जंगल में सब आजाद रहते हैं. खुली हवा में सब सांस लेते हैं. धर्म के संस्कार तो गुलाम बनाने के सिवाय कुछ करते ही नहीं. जातियां विभेद की दीवारें खड़ी करती हैं. जब तक यौन उन्मुक्त नहीं होगा तब तक  स्वतंत्रता की बात करना ही बेईमानी है. श्रेष्ठ मानव तभी जन्मेंगे जब एक औरत अलगअलग मर्दों से बच्चे जनेगी. एक मर्द की औलादें शक्लसूरत और बुद्धि से अपवादों को छोड़ कर एकजैसी ही होती हैं. इसलिए एक औरत को चाहिए कि वह अलगअलग मर्दों…’’

तभी शिखा के फोन की घंटी बज उठी,”हैलो, जतिन…’’

‘‘कहां हो शिखा?’’ उधर से जतिन की आवाज आई.

‘‘कमरे पर ही हूं. आ रहे हो क्या?’’

‘‘आ नहीं रहा हूं, आ चुका हूं.’’

‘‘अच्छा, तो एक मिनट रुको,’’ यह कह कर शिखा ने फोन काट दिया. उस की आंखों में इशारा था कि मैं वहां से दफा हो जाऊं. शिखा के कुछ कहने से पहले ही मैं उठ कर कमरे से बाहर आ गई. बाहर जतिन खड़ा था.
जतिन ने कमरे में दाखिल होते हुए पूछा, ‘‘शिखा, कौन थी यह?’’
शिखा ने हंसते हुए कहा, ‘”गुलाम.'”  Parivarik Kahani 

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