मेरे रिटायरमैंट का दिन नजदीक आते ही मेरे आसपास के लोग मेरा मन बहलाने के लिए मुझे सपने दिखाते रहे कि रिटायर होने के बाद जो मजा है, वह सरकारी नौकरी में रहते नहीं. लेकिन रिटायरमैंट के बाद मेरे जो क्विक लौस हुए उन्हें मैं ही जानता हूं.

रिटायर होने के 4 दिनों बाद ही पता चल गया कि रिटायर होने के कितने क्विक लौस हैं. लौंग टर्म लौस तो धीरेधीरे सामने आएंगे. आह रे रिटायरी. बीते सुख तो कम्बख्त औफिस में ही छूट गए रे भैये. रिटायरमैंट के बाद के सब्जबाग दिखाने वालो, हे मेरे परमादरणियो, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें कभी समय पर पैंशन न मिले.

बंधुओ, घर के कामों से न मैं पहले डरता था, न अब डरता हूं. इन्हीं कम्बख्त घर के कामों के कारण ही तो हर रोज लेट हो जाने के बाद अगले दिन समय पर औफिस जाने की कसम खा कर भी रिटायर होने तक समय पर औफिस न पहुंचा.

वैसे मु झे इस बात पर पूरा संतोष है कि मैं ने सरकारी नौकरी में रहते घर के कामों को औफिस के कामों से अधिक प्राथमिकता दी, इन की, उन की, सब की तरह. औफिस के कामों का क्या? वे तो होते ही रहते हैं. आज नहीं तो कल. कल नहीं तो परसों. परसों नहीं तो चौथे. और जो ज्यादा ही हुआ तो अपना काम सरका दिया किसी दूसरे की ओर. पर घर के काम तो भाईसाहब आप को ही करने होते हैं, अपने हिस्से के भी, अपनी बीवी के हिस्से के भी घर में शांति रखनी हो तो. वरना, महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र ढूंढ़ने की कतई जरूरत नहीं.

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