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Parivarik Kahani : कशमकश – सीमा के चेहरे से मुस्कान क्यों गायब हो गई थी ?

Parivarik Kahani : ‘‘वाहभई, मजा आ गया… भाभी के हाथों में तो जैसे जादू की छड़ी है… बस खाने पर घुमा देती हैं और खाने वाला समझ ही नहीं पाता कि खाना खाए या अपनी उंगलियां चाटे,’’ मयंक ने 2-4 कौर खाते ही हमेशा की तरह खाने की तारीफ शुरू कर दी तो रसोई में फुलके सेंकती सीमा भाभी के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई.

पास ही खड़ी महिमा के भीतर कुछ दरक सा गया, मगर उस ने हमेशा की तरह दर्द की उन किरचों को आंखों का रास्ता नहीं दिखाया, दिल में उतार लिया.

‘‘अरे भाभी, महिमा को भी कुछ बनाना सिखा दो न… रोजरोज की सादी रोटीसब्जी से हम ऊब गए… बच्चे तो हर तीसरे दिन होटल की तरफ भागते हैं,’’ मयंक ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो लाख रोकने की कोशिशों के बावजूद महिमा की पलकें नम हो आईं.

इस के पास कहां इतना टाइम होता है जो रसोई में खपे… एक ही काम होगा… या तो कलम पकड़ लो या फिर चकलाबेलन… सीमा की चहक में छिपे व्यंग्यबाण महिमा को बेंध गए, मगर बात तो सच ही थी, भले कड़वी सही.

महिमा एक कामकाजी महिला है. सरकारी स्कूल में अध्यापिका महिमा को मलाल रहता है कि वह आम गृहिणियों की तरह अपने घर को वक्त नहीं दे पाती. ऐसा नहीं है कि उसे अच्छा खाना बनाना नहीं आता, मगर सुबह उस के पास टाइम नहीं होता और शाम को वह थक कर इतनी चूर हो चुकी होती है कि कुछ ऐक्स्ट्रा बनाने की सोच भी नहीं पाती.

महिमा सुबह 5 बजे उठती है. सब का नाश्ता, खाना बना कर 8 बजे तक स्कूल पहुंचती है. दोपहर 3 बजे तक स्कूल में व्यस्त रहती है. उस के बाद घर आतेआते इतनी थक जाती है कि यदि घंटाभर आराम न करे तो रात तक चिड़चिड़ाहट बनी रहती है. रात को रसोई समेटतेसमटते 11 बज जाते हैं. अगले दिन फिर वही दिनचर्या.

इतनी व्यस्तता के बाद महिमा चाह कर भी सप्ताह के 6 दिन पति या बच्चों की खाने, नाश्ते की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाती. एक रविवार का दिन उसे छुट्टी के रूप में मिलता है, मगर यह एक दिन बाकी 6 दिनों पर भारी पड़ता है. सब से पहले तो वह खुद ही इस दिन थोड़ा देर से उठती. फिर सप्ताह भर के कल पर टलने वालेकाम भी इसी दिन निबटाने होते हैं. मिलनेजुलने वाले दोस्तरिश्तेदार भी इसी रविवार की बाट जोहते हैं. इस तरह रविवार का दिन मुट्ठी में से पानी की तरह फिसल जाता है.

क्या करे महिमा… अपनी ग्लानि मिटाने के लिए वह बच्चों को हर रविवार होटल में खाने की छूट दे देती है. धीरेधीरे बच्चों को भी इस आजादी और रूटीन की आदत सी हो गई है.

महिमा महसूस करती है कि उस का घर सीमा भाभी के घर की तरह हर वक्त सजासंवरा नहीं दिखता. घर के सामान पर धूलमिट्टी की परत भी दिख जाती है. कई बार छोटेछोटे मकड़ी के जाले भी नजर आ जाते हैं. इधरउधर बिखरे कपड़े और जूते तो रोज की बात है. लौबी में रखी डाइनिंगटेबल भी खाने के कम, बच्चों की किताबों, स्कूल बैग, हैलमेट आदि रखने के ज्यादा काम आती है.

कई बार जब महिमा झुंझला कर साफसफाई में जुट जाती है, तो बच्चे पूछ बैठते हैं, ‘‘आज अचानक यह सफाई का बुखार कैसे चढ़ गया? कोई आने वाला है क्या?’’ तब वह और भी खिसिया जाती.

हालांकि महिमा ने अपनी मदद के लिए कमला को रखा हुआ है, मगर वह उस के स्कूल जाने के बाद आती है, इसलिए जो जैसा कर जाती है उसी में संतुष्ट होना पड़ता है.

स्कूल में आत्मविश्वास से भरी दिखने वाली महिमा भीतर ही भीतर अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी. यदाकदा अपनी तुलना सीमा भाभी से करने लगती कि कितने आराम से रहती हैं सीमा भाभी. घर भी एकदम करीने से सजा हुआ… अच्छे खाने से पतिबच्चे भी खुश.

दिन में 2-3 घंटे एसी की ठंडी हवा में आराम… और एक मैं हूं…. चाहे हजारों रुपए महीना कमाती हूं… कभी अपने पैसे का रोब नहीं झाड़ती… जेठानी के सामने हमेशा देवरानी ही बनी रहती हूं… कभी भी रानी बनने का गरूर नहीं दिखाती… फिर भी मयंक ने कभी मेरी काबिलियत पर गर्व नहीं किया. बच्चे भी अपनी ताई के ही गुण गाते रहते हैं.

वैसे देखा जाए तो वे सब भी कहां गलत हैं. कहते हैं कि दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. मगर मैं कहां इन दूरियों को तय कर पाई हूं… जल्दीजल्दी जो कुछ बना पाती हूं बस बना देती हूं. एक सा नाश्ता और खाना खाखा कर बेचारे ऊब जाते होंगे… कैसी मां और पत्नी हूं… अपने परिवार तक को खुश नहीं रख पाती… महिमा खुद को कोसने लगती और फिर अवसाद के दलदल में थोड़ा और गहरे धंस जाती.

क्या करूं? क्या इतनी मेहनत से लगी नौकरी छोड़ दूं? मगर अब यह सिर्फ नौकरी कहां रही… यह तो मेरी पहचान बन चुकी है. स्कूल के बच्चे जब मुझे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उन के अभिभावक बच्चों के सामने मेरा उदाहरण देते हैं तो वे कितने गर्व के पल होते हैं… वह अनमोल खुशी को क्या सिर्फ इतनी सी बात के लिए गंवा दूं कि पति और बच्चों को उन का मनपसंद खाना खिला सकूं. महिमा अकसर खुद से ही सवालजवाब करने लगती, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती.

इसी बीच महिमा की स्कूल में गरमी की छुट्टियां हो गईं. उस ने तय कर लिया कि इन पूरी छुट्टियों में वह सब की शिकायतें दूर करने की कोशिश करेगी. सब का मनपसंद खाना बनाएगी. नईनई डिशेज बनाना सीखेगी… घर को एकदम साफसुथरा और सजा कर रखेगी…

छुट्टी का पहला दिन. नाश्ते में गरमगरम आलू के परांठे देखते ही सब के चेहरे खिल उठे. भूख से अधिक ही खा लिए सब ने. उन्हें संतुष्ट देख कर महिमा का दिल भी खुश हो गया. मयंक टिफिन ले कर औफिस निकल गया और बच्चे कोचिंग क्लास. महिमा घर को समेटने में जुट गई.

दोपहर ढलतेढलते पूरा घर चमक उठा. लगा मानो दीवाली आने वाली है. मयंक और बच्चे घर लौट आए. आते ही बच्चों ने अपनी किताबें और बैग व मयंक ने अपनी फाइलें और हैलमेट लापरवाही से डाइनिंगटेबल पर पटक दिया. महिमा का मूड उखड़ गया, मगर उस ने एक लंबी सास ली और सारा सामान यथास्थान पर रख कर डाइनिंगटेबल फिर से सैट कर दी.

महिमा ने रात के खाने में भी 2 मसालेदार सब्जियों के अलावा रायता और सूजी का हलवा भी बनाया. सजी डाइनिंगटेबल देख कर मयंक और बच्चे खुश हो गए. उन्हें खुश देख कर महिमा भी खुश हो उठी.

अब रोज यही होने लगा. नाश्ते में अकसर मैदा, बेसन, आलू और अधिक तेलमिर्च मसाले का इस्तेमाल होता था. रात में भी महिमा कई तरह के व्यंजन बनाती थी. अधिक वैरायटी बनाने के चक्कर में अकसर रात का खाना लेट हो जाता था और गरिष्ठ होने के कारण ठीक से हजम भी नहीं हो पाता था.

अभी 15 दिन भी नहीं बीते थे कि मयंक ने ऐसिडिटी की शिकायत की. रातभर खट्टी डकारों और सीने में जलन से परेशान रहा. सुबह डाक्टर को दिखाया तो उस ने सादे खाने और कई तरह के दूसरे परहेज बताने के साथसाथ क्व2 हजार का दवाओं का बिल थमा दिया.

दूसरी तरफ घर को साफसुथरा और व्यवस्थित रखने के प्रयास में बच्चों की आजादी छिनती जा रही थी. महिमा उन्हें हर वक्त टोकती रहती कि इस्तेमाल करने के बाद अपना सामान प्रौपर जगह पर रखें. मगर बरसों की आदत भला एक दिन में छूटती है और फिर वैसे भी अपना घर इसीलिए तो बनाया जाता है ताकि वहां अपनी मनमरजी से अपने तरीके से रहा जाए. मां की टोकाटाकी से बच्चे घर वाली फीलिंग के लिए तरसने लगे, क्योंकि घर अब होटल की तरह लगने लगा था.

घर को संवारने और सब को मनपसंद खाना खिलाने की कवायद में महिमा पूरा दिन उलझी रहने लगी. हर वक्त कोई न कोई नई डिश या नया आइडिया उस के दिमाग में पकता रहता. साफसफाई के लिए भी दिन भर परेशान होती, कभी कमला पर झल्लाती तो कभी बच्चों को टोकती. नतीजन, एक दिन रसोई में खड़ीखड़ी महिमा गश खा कर गिर पड़ी. मयंक ने उसे उठा कर बिस्तर में लिटाया. बेटे ने तुरंत डाक्टर को फोन किया.

चैकअप करने के बाद पता चला कि महिमा का बीपी बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है. डाक्टर ने आराम करने की सलाह के साथसाथ मसालेदार, ज्यादा घी व तेल वाले खाने से परहेज करने की सलाह दी. साथ ही लंबाचौड़ा बिल थमाया वह अलग.

‘‘सौरी मयंक मैं एक अच्छी पत्नी और मां की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी,’’ महिमा ने मायूसी से कहा.

‘‘पगली यह तुम से किस ने कहा? तुम ने तो हमेशा अपनी जिम्मेदारियां पूरी शिद्दत के साथ निभाई है. मुझे गर्व है तुम पर,’’ मयंक ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘तो फिर वे हमेशा सीमा भाभी की तारीफें… वह सब क्या है?’’ महिमा ने संशय से पूछा.

‘‘अरे बावली, तुम भी गजब करती हो… पता नहीं किस आसमान तक अपनी सोच के घोड़े दौड़ा लेती हो,’’ मयंक ने ठहाका लगाते हुए कहा. महिमा अचरज के भाव लिए मुंह खोले उसे देख रही थी.

जब हमारी सगाई हुई थी उस के बाद से ही सीमा भाभी के व्यवहार में परिवर्तन नजर आने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि नौकरीपेशा बहू आने के बाद घर में उन की अहमियत कम हो जाएगी. यह भी हो सकता है कि तुम उन पर अपने पैसे का रोब दिखाओ.

बातबात में उन की तारीफ करते हैं ताकि वे किसी हीनभावना से ग्रस्त न हो जाएं. मगर इस सारे गणित में अनजाने में ही सही, हम से तुम्हारा पक्ष नजरअंदाज होता रहा. हम सब तुम्हारे गुनाहगार हैं,’’ मयंक ने शर्मिंदा होते हुए अपने कान पकड़ लिए.

यह देख महिमा खिलखिला पड़ी, ‘‘तो अब सजा तो आप को मिलेगी ही… आप सब को अगले 20 दिन और इसी तरह का चटपटा और मसालेदार खाना खाना पड़ेगा.’’

‘‘न बाबा न… इतनी बड़ी सजा नहीं… हमें तो वही सादी रोटीसब्जी चाहिए ताकि हमारा पेट भी हैप्पी रहे और जेब भी. क्यों बच्चो?’’ मयंक ने नाटकीयता से कहा. अब तक बच्चे भी वहां आ चुके थे.

‘‘ठीक है, मगर सप्ताह में एक दिन तो होटल जाने दोगे और हमें अपनी मनपसंद डिशेज खाने दोगे न?’’ दोनों बच्चे एकसाथ चिल्लाए तो महिमा के होंठों पर भी मुसकराहट तैर गई. Parivarik Kahani

Social Story In Hindi : सावित्री और सत्य

Social Story In Hindi : सावित्री को नींद नहीं आ रही थी. अभी पिछले साल ही उस के पति की मौत हुई थी. उस की शादीशुदा जिंदगी का सुख महज एक साल का था. सावित्री ससुराल में ही रह रही थी. उस का पति ही बूढ़े सासससुर की एकलौती औलाद था. ससुराल और मायका दोनों ही पैसे वाले थे. सावित्री अपने मायके में 4 बच्चों में सब से छोटी और एकलौती लड़की थी. मांबाप और भाइयों की दुलारी…

मैट्रिक पास होते ही सावित्री की शादी हो गई थी. पति की मौत के बाद उस का बापू उसे लेने आया था, पर वह मायके नहीं गई. उस ने बापू से कहा था कि आप के तो 3 बच्चे और हैं, पर मेरे सासससुर का तो कोई नहीं है. पहाड़ी की तराई में एक गांव में सावित्री का ससुराल था. गांव तो ज्यादा बड़ा नहीं था, फिर भी सभी खुशहाल थे. उस के ससुर उस इलाके के सब से धनी और रसूखदार शख्स थे. वे गांव के सरपंच भी थे. पहाडि़यों पर रात में ठंडक रहती ही है. थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी. सावित्री कंबल ओढ़े लेटी थी, तभी अचानक ही जोर के धमाके की आवाज से वह चौंक पड़ी थी. वह बिस्तर से नीचे उतर आई. शाल से अपने को ढकते हुए बगल में सास के कमरे में गई. वहां उस ने देखा कि सासससुर दोनों ही जोरदार धमाके की आवाज से जाग गए थे. उस के ससुर स्वैटर पहन कर टौर्च व छड़ी उठा कर बाहर जाने के लिए निकलने लगे, तो सावित्री ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं आप को रात में अकेले नहीं जाने दूंगी. मैं भी आप के साथ चलूंगी.’’

काफी मना मरने के बावजूद सावित्री भी उन के साथ चल पड़ी थी. जब सावित्री बाहर निकली, तो थोड़ी दूरी पर ही खेतों के बीच उस ने आग की ऊंची लपटें देखीं. गांव के कुछ और लोग भी धमाके की आवाज सुन कर जमा हो चुके थे. करीब जाने पर देखा कि एक छोटे हवाईजहाज के टुकड़े इधरउधर जल रहे थे. लपटें काफी ऊंची और तेज थीं. किसी में पास जाने की हिम्मत नहीं थी. देखने से लग रहा था कि सबकुछ जल कर राख हो चुका है. तभी सावित्री की नजर मलबे से दूर पड़े किसी शख्स पर गई, जिस के हाथपैरों में कुछ हरकत हो रही थी. वह अपने ससुर के साथ उस के नजदीक गई. कुछ और लोग भी साथ हो लिए थे. उस नौजवान का चेहरा जलने से काला हो गया था. हाथपैरों पर भी जलने के निशान थे. वह बेहोश पड़ा था, पर रहरह कर अपने हाथपैर हिला रहा था. तभी एक गांव वाले ने उस की नब्ज देखी और फिर नाक के पास हाथ ले जा कर सावित्री के ससुर से बोला, ‘‘सरपंचजी, इस की सांसें चल रही हैं. यह अभी जिंदा है, पर इस की हालत नाजुक दिखती है. इस को तुरंत इलाज की जरूरत है.’’ सरपंच ने कहा, ‘‘हां, इसे जल्द ही अस्पताल ले जाना होगा. प्रशासन को अभी इस की सूचना भी शायद न मिली हो. सूचना मिलने के बाद भी सुबह के पहले यहां पर किसी के आने की उम्मीद नहीं है. तुम में से कोई मेरी मदद करो. मेरा ट्रैक्टर ले कर आओ. इसे शहर के अस्पताल ले चलते हैं.’’

थोड़ी देर में ही 2-3 नौजवान ट्रैक्टर ले कर आ गए थे. उस घायल नौजवान को ट्रैक्टर से ही शहर के बड़े अस्पताल ले गए. सावित्री भी सरपंचजी के साथ शहर तक गई थी. अस्पताल में डाक्टर ने देख कर कहा कि हालत नाजुक है. पुलिस को भी सूचित करना होगा. यह काम सरपंच ने खुद किया और डाक्टर को तुरंत इलाज शुरू करने को कहा. इमर्जैंसी वार्ड में चैकअप करने के बाद डाक्टर ने उसे इलाज के लिए आईसीयू में भेज दिया. पर उस शख्स के पास से कोई पहचानपत्र या बोर्डिंग पास भी नहीं मिला. हादसे की जगह के पास से एक बुरी तरह जला हुआ पर्स मिला था. उस पर्स में ऐसा कुछ भी सुबूत नहीं मिला था, जिस से उस की पहचान हो सके. डाक्टर ने इलाज तो शुरू कर दिया था. सरपंचजी खुद गारंटर बने थे यानी इलाज का खर्च उन्हें ही उठाना था. सुबह होते ही इस हादसे की खबर रेडियो और टैलीविजन पर फैल चुकी थी.

पुलिस भी आ गई थी. पुलिस को सारी बात बता कर उस की सहमति ले कर सरपंचजी अपनी बहू सावित्री के साथ अपने घर लौट आए थे. शहर के एयरपोर्ट पर अफरातफरी का सा माहौल था. एयरपोर्ट शहर से 20 किलोमीटर दूर और गांव की विपरीत दिशा में था. लोग उस उड़ान से आने वाले अपने रिश्तेदारों का हाल जानने के लिए बेचैन थे. एयरलाइंस के मुलाजिमों ने तो सभी सवारियों और हवाईजहाज के मुलाजिमों की लिस्ट लगा रखी थी, जिस में सब को ही मरा ऐलान किया गया था. थोड़ी ही देर में टैलीविजन पर एक ब्रेकिंग न्यूज आई कि एक मुसाफिर इस हादसे में बच गया है, जिस की हालत नाजुक है, पर उस की पहचान नहीं हो सकी है. सब के मन में उम्मीद की एक किरण जग रही थी कि शायद वह उन्हीं का सगा हो. अस्पताल में भीड़ उमड़ पड़ी थी. डाक्टर ने कहा कि अभी वह वैंटिलेटर पर है और हालत नाजुक है. मरीज के पास तो अभी कोई नहीं जा सकता है, उसे सिर्फ बाहर से शीशे से देखा जा सकता है. लोग बाहर से ही उस को देख कर पहचानने की कोशिश कर रहे थे, पर यह मुमकिन नहीं था. उस का चेहरा काफी जला हुआ था. उस पर दवा का लेप भी लगा था.

इधर सरपंच रोज सुबह अस्पताल आते थे, अकसर सावित्री भी साथ होती थी. वह उन को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी, क्योंकि सरपंच खुद दिल के मरीज थे. कुछ दिनों के बाद डाक्टर ने सरपंच से कहा, ‘‘मरीज खतरे से बाहर तो है, पर वह कोमा में जा चुका है. कोमा से बाहर निकलने में कितना समय लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है. कुछ ही दिनों में उसे आईसीयू से निकाल कर स्पैशल वार्ड में भेज देंगे.

‘‘दूसरी बात यह कि उस का चेहरा बहुत खराब हो चुका है. अगर वह कोमा से बाहर भी आता है, तो आईने में अपनेआप को देख कर उसे गहरा सदमा लगेगा.’’

सरपंच ने पूछा, ‘‘तो इस का इलाज क्या है?’’

डाक्टर बोला, ‘‘उस के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करनी होगी, पर इस में काफी खर्च होगा. अभी तक के इलाज का खर्च तो आप देते आए हैं.’’

सरपंच ने कहा, ‘‘आप पैसे की चिंता न करें. अगर यह ठीक हो जाता है, तो मैं समझूंगा कि मेरा बेटा मुझे दोबारा मिल गया है.’’ कुछ दिनों के बाद उस मरीज को स्पैशल वार्ड में शिफ्ट किया गया था. वहां उस की देखभाल दिन में तो अकसर सावित्री ही किया करती थी, लेकिन रात में सरपंच के कहने पर गांव से भी कोई न कोई आ जाता था. तकरीबन 2 महीने बाद उस की प्लास्टिक सर्जरी भी हुई. उस आदमी को नया चेहरा मिल गया था. इसी बीच सरपंच के ट्रैक्टर की ट्रौली पर एक बैल्ट मिली. हादसे के बाद उस नौजवान को इसी ट्रौली से अस्पताल पहुंचाया गया था. शायद किसी ने उसे आराम पहुंचाने के लिए बैल्ट निकाल कर ट्रौली के एक कोने में रख दी थी, जिस पर अब तक किसी की नजर नहीं पड़ी थी. बैल्ट पर 2 शब्द खुदे थे एसके. उस बैल्ट को देख कर सरपंच को लगा कि उस आदमी की पहचान में यह एक अहम कड़ी साबित हो.

इस की सूचना उन्होंने पुलिस को दे दी. साथ ही, लोकल टैलीविजन चैनल और रेडियो पर भी इसे प्रसारित किया गया. अगले ही दिन एक बुजुर्ग दंपती उसे देखने अस्पताल आए थे. उन का शहर में काफी बड़ा कारोबार था, पर चेहरा बदल जाने के चलते वे उसे पहचान नहीं पा रहे थे. बैल्ट भी पुलिस को दे दी गई थी. वहां पर उन्होंने सावित्री को देखा, जो मन लगा कर मरीज की सेवा कर रही थी. अस्पताल से निकल कर वे सीधे पुलिस स्टेशन गए और वहां उस बैल्ट को देख कर कहा कि ऐसी ही एक बैल्ट उन के बेटे की भी थी, जिस पर एसके लिखा था. यह बैल्ट जानबूझ कर उन के बेटे ने खरीदी थी, क्योंकि एसके उस के नाम ‘सत्य कुमार’ से मिलती थी. फिर भी संतुष्ट हुए बिना उसे अपना बेटा मानने में कुछ ठीक नहीं लग रहा था. फिलहाल वे अपने घर लौट गए थे. पर सरपंच का मन कह रहा था कि यह सत्य कुमार ही है.

तकरीबन एक महीना गुजर चुका था. सरपंच और सावित्री दोनों ही सत्य कुमार की देखभाल कर रहे थे. एक दिन अचानक सावित्री ने देखा कि सत्य कुमार के होंठ फड़फड़ा रहे थे और हाथ से कुछ इशारा कर रहा था. उस ने तुरंत डाक्टर को यह बात कही. डाक्टर ने कहा कि दवा अपना काम कर रही है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि अब वह बिलकुल ठीक हो जाएगा. कुछ दिन बाद सावित्री उसे जब अपने हाथ से खाना खिला रही थी, सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर कुछ बोलने की कोशिश की थी. उसी शाम जब सावित्री अपने घर जाने के लिए उठी, तो सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर बहुत कोशिश के बाद लड़खड़ाती जबान में बोला, ‘‘रुको, मैं यहां कैसे आया हूं? मैं तो हवाईजहाज में था. मैं तो कारोबार के सिलसिले में बाहर गया हुआ था.’’ फिर अपने बारे में उस ने कुछ जानकारी दी थी. सरपंच और सावित्री दोनों की खुशी का ठिकाना न था. उन्होंने डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने उसे चैक कर कहा, ‘‘मुबारक हो. अब यह होश में आ गया है. इस के मातापिता को सूचना दे दें.’’ सावित्री और सरपंच अस्पताल में ही रुक कर सत्य कुमार के मातापिता का इंतजार कर रहे थे. वे लोग भी

खबर मिलते ही दौड़े आए थे. सत्य कुमार ने अपने मातापिता को पहचान लिया था और हादसे के पहले तक की बात बताई. उस के बाद का उसे कुछ याद नहीं था. सत्य कुमार के पिता ने सरपंच और सावित्री का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, ‘‘आप के उपकार के लिए हम लोग हमेशा कर्जदार रहेंगे. यह लड़की आप की बेटी है न?’’

सरपंच बोले, ‘‘मेरे लिए तो बेटी से भी बढ़ कर है. है तो मेरी बहू, पर शादी के एक साल के अंदर ही मेरा एकलौता बेटा हम लोगों को अकेला छोड़ कर चला गया, पर सावित्री ने हमारा साथ नहीं छोड़ा.

‘‘मैं तो चाहता था कि यह अपने मांबाप के पास चली जाए और दूसरी शादी कर ले, पर यह तैयार नहीं थी.’’

सत्य कुमार के पिता ने कहा, ‘‘अगर आप को कोई एतराज नहीं है, तो मैं सावित्री को अपनी बहू बनाने को तैयार हूं, क्यों सत्य कुमार? ठीक रहेगा न?’’ सत्य कुमार ने सहमति में सिर हिला कर अपनी हामी भर दी थी. फिर सेठजी ने सत्य कुमार की मां की ओर देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे सेठानी, तुम भी तो कुछ कहो.’’ सेठानी बोलीं, ‘‘आप लोगों ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली है. मेरे बोलने को कुछ बचा ही नहीं है.’’

फिर वे सावित्री की ओर देख कर बोलीं, ‘‘तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है?’’

सावित्री की आंखों से आंसू की कुछ बूंदें छलक कर उस के गालों पर आ गई थीं. वह बोली, ‘‘मैं आप लोगों की भावनाओं का सम्मान करती हूं, पर मैं अपने सासससुर को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती.’’ सरपंच ने सावित्री को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम सभी लोगों की खुशी इसी में है. और हम लोगों को अब जीना ही कितने दिन है, जबकि तुम्हारी सारी जिंदगी आगे पड़ी है.’’ सेठजी ने भी सरपंच की बातों को सही ठहराते हुए कहा, ‘‘तुम जब भी चाहो और जितने दिन चाहो, सरपंचजी के यहां बीचबीच में आती रहना.’’ सावित्री सेठजी से बोली, ‘‘सत्यजी को आप ने जन्म दिया है और बाबूजी ने इन्हें दोबारा जन्म दिया है, तो इन की भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है मेरे ससुरजी के लिए.’’

सेठजी बोले, ‘‘मैं मानता हूं और मेरा बेटा भी इतनी समझ रखता है. सत्य कुमार को तो 2-2 पिताओं का प्यार मिलेगा. सत्य कुमार सरपंचजी का उतना ही खयाल रखेगा, जितना वह हमारा रखता है.’’ सावित्री और सत्य दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. उन लोगों की बातें सुन कर वह कुछ संतुष्ट लग रही थी. उस दिन सारी रात लोगों ने अस्पताल में ही बिताई थी. सावित्री के मायके में भी सरपंच ने यह बात बता दी थी. सभी को यह रिश्ता मंजूर था. सरपंच ने धूमधाम से अपने घर से ही सावित्री की शादी की थी. Social Story In Hindi

Family Story : उपहार – क्यों बीवी के सामने गिड़गिड़ाया बैजू ?

Family Story : बैजू की साली राधा की शादी बैजू के ताऊ के बेटे सोरन के साथ तय हो गई. बैजू और उस की पत्नी अनोखी नहीं चाहते थे कि यह शादी हो, पर सोरन के बड़े भाई सौदान ने राधा के भाई बिल्लू को बिना ब्याज के कर्ज दे कर यह सब जुगाड़ बना लिया था. अब ऊपरी खुशी से बैजू और अनोखी इस शादी को कराने में जुट गए. शादी से पहले ही राधा ने जीजा से अपने लिए एक रंगीन टीवी उपहार में मांग लिया.

बैजू ने दरियादिली से मान लिया, पर जब अनोखी ने सुना, तो वह जलभुन गई. घर आते ही वह आंखें तरेर कर बोली, ‘‘अपने घर में कालासफेद टैलीविजन नहीं और तुम साली को रंगीन टीवी देने चले हो.

‘‘चलो, सिर्फ साली को देते तो ठीक था, लेकिन उस की शादी में टीवी देने का मतलब है कि सोरन के घर टीवी आएगा. हम टीवी दे कर भी बिना टीवी वाले रहेंगे और सोरन बिना पैसा दिए ही टीवी देखने का मजा उठाएगा.

‘‘तुम आज ही जा कर राधा से टीवी के लिए मना कर दो, नहीं तो मेरीतुम्हारी नहीं बनेगी.’’

बैजू अनोखी की बात सुन कर सकपका गया. उसे तो खुद टीवी देने वाली बात मंजूर नहीं थी, लेकिन राधा ने रंगीन टीवी उपहार में मांगा, तो वह मना न कर सका.

समाज के लोग कहेंगे कि मर्द हो कर अपनी जबान का पक्का नहीं है. यह भी कहेंगे कि वह औरत की बातों में आ गया. सब उसे जोरू का गुलाम कहेंगे.

बैजू इतना सोच कर अपनी बीवी के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘अनोखी, मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं. इतने पर भी तू न माने, तो मैं तेरे पैरों में गिर जाऊंगा. इस बार की गलती के लिए मुझे माफ कर दे. आगे से मैं तुझ से पूछे बिना कोई काम न करूंगा.

‘‘मैं ने राधा को टीवी देने की बात कह दी है, अब मैं अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता. तू खुद ही सोच कि क्या मेरी बदनामी में तेरी बदनामी नहीं होगी? लोग मुझे झूठा कहेंगे, तो तुझे भी तो झूठे की बीवी कहेंगे. महल्ले की औरतें ताने मारमार कर तेरा जीना मुहाल कर देंगी. मुझे मजबूर मत कर.’’

अनोखी थोड़ी चालाक भी थी. उसे पता था कि कहने के बाद टीवी न देने से महल्ले में कितनी बदनामी होगी. वह अपने पति से बोली, ‘‘ठीक है, इस बार मैं तुम्हें माफ कर देती हूं, लेकिन आगे से किसी की भी शादी में ऐसी कोई चीज न देना, जो हमारे घर में न हो…

‘‘और तुम यह मत समझना कि मैं बदनामी से डरती हूं. मैं तो केवल तुम्हारे मनुहार की वजह से यह बात मान गई हूं.’’

राधा और सोरन की शादी हुई. बैजू ने अपने दिल पर पत्थर रख कर रंगीन टीवी का तोहफा शादी में दे दिया.

अनोखी भी टीवी की तरफ देखदेख कर अपना दिल थाम लेती थी. मन होता था कि उस टीवी को उठा कर अपने घर में रख ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी.

अनोखी का सपना था कि उस के घर में भी रंगीन टीवी हो. उस टीवी पर आने वाले सासबहू की लड़ाई से लबरेज धारावाहिक धूमधाम से चलें. लेकिन ये सब अरमान सीने में ही दबे रह गए.

राधा सोरन के घर में आ कर रहने लगी. थोड़े ही दिनों में राधा ने सोरन से कह कर जीजा का दिया रंगीन टीवी चलाना शुरू कर दिया. टीवी इतनी तेज आवाज में चलता कि बगल में बने बैजू के घर में बैठी अनोखी के कानों तक सासबहू के भड़कते संवाद गूंजते.

अनोखी का दिल होता कि जा कर टीवी देख ले, लेकिन उस ने कसम खाई थी कि जब तक वह अपने घर में भी रंगीन टीवी न मंगवा लेगी, तब तक राधा के घर टीवी पर कोई प्रोग्राम न देखने जाएगी.

राधा ने एक दिन अपनी सगी बहन अनोखी से कहा भी, ‘‘जीजी, तू मेरे घर पर टीवी देखने क्यों नहीं आती? कहीं तुझे भी महल्ले के लोगों की तरह मुझ से जलन तो नहीं होती?’’

अनोखी इस बात को सुन कर खून का घूंट समझ कर पी गई. उस ने राधा को कोई जवाब न दिया, लेकिन दोचार दिनों में ही आसपड़ोस की औरतों से उसे सुनने को मिला कि राधा सब से कहती है, ‘‘मेरी बड़ी बहन मुझ से दुश्मन की तरह जलती है. क्योंकि मेरे घर में रंगीन टीवी है और उस के घर कालासफेद टीवी भी नहीं है.’’

अनोखी इस बात को भी खून का घूंट समझ कर पी गई. लेकिन एक दिन अनोखी का लड़का रोता हुआ घर आया. जब अनोखी ने उस से रोने की वजह पूछी, तो उस ने बताया, ‘‘मां, मौसी ने मुझे टीवी नहीं देखने दिया.’’

अपने लड़के से यह बात सुन कर अनोखी का अंगअंग जल कर कोयला हो गया. आखिर उस के पति का दिया टीवी उसी का लड़का क्यों नहीं देख सकता? शाम तक अनोखी इसी आग में जलती रही.

जब बैजू घर आया, तो उस ने तुगलकी फरमान सुना दिया, ‘‘तुम अभी जा कर उस टीवी को उठा लाओ. आखिर तुम ने ही तो उस को दिया है. जब हमारा दिया हुआ टीवी हमारा ही लड़का न देख सके, तो क्या फायदा… और वह राधा की बच्ची सारे महल्ले की औरतों से मेरी बदनामी करती फिरती है. तुम अभी जाओ और टीवी ले कर ही घर में कदम रखना.’’

अनोखी की लाल आंखें देख बैजू सकपका गया. अनोखी को जवाब भी देने की उस में हिम्मत न हुई. वैसे, गुस्सा तो बैजू को भी आ रहा था. वह सीधा सोरन के घर पहुंच गया.

राधा टीवी देख रही थी. बैजू को देखते ही वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आओ जीजा, तुम भी टीवी देख लो.’’

बैजू थोड़ा नरम हुआ, लेकिन अनोखी की याद आते ही फिर से गरम हो गया. वह थोड़ी देर राधा को देखता रहा, फिर बोला, ‘‘राधा, यह टीवी तुम्हें वापस करना होगा. मैं ने ही तुम्हें दिया था और मैं ही वापस ले जाऊंगा.’’

बैजू के मुंह से टीवी की वापसी वाली बात सुन कर राधा के रोंगटे खड़े हो गए. वह बोली, ‘‘जीजा, तुम्हें क्या हो गया है? आज तुम ऐसी बातें क्यों करते हो? यह टीवी तो तुम ने मुझे उपहार में दिया था.’’

बैजू कुछ कहता, उस से पहले ही महल्ले की कई औरतें और लड़कियां राधा के घर में आ पहुंचीं. उन्हें रंगीन टीवी पर आने वाला सासबहू का सीरियल देखना था.

शायद बैजू गलत समय पर राधा से टीवी वापस लेने आ पहुंचा था. इतने लोगों को देख बैजू के होश उड़ गए. भला, इतने लोगों के सामने उपहार में दिया हुआ टीवी कैसे वापस ले जाएगा. महल्ले की औरतों को देख कर राधा की हिम्मत बढ़ गई.

एक औरत ने राधा से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है राधा बहन, इस तरह उदास क्यों खड़ी हो?’’

राधा शिकायती लहजे में उन सब औरतों को सुनाते हुए बोली, ‘‘देखो न बहन, जीजा ने पहले मुझे शादी के समय उपहार में यह टीवी दे दिया, लेकिन अब वापस मांग रहे हैं. भला, यह भी कोई बात हुई.’’

राधा की यह बात सुन कर बैजू सकपका गया. अब वह क्या करे. टीवी वापस लेने में तो काफी बदनामी होने वाली थी. उस ने थोड़ी चालाकी से काम लिया. वह गिरगिट की तरह एकदम रंग बदल गया और जोर से हंसता हुआ बोला, ‘‘अरे राधा, तुम तो बड़ी बुद्धू हो. मैं तो मजाक कर रहा था.

‘‘तुम मेरी सगी और एकलौती साली हो, भला तुम से भी मैं मजाक नहीं कर सकता. तुम बड़ी भोली हो, सोचती भी नहीं कि क्या मैं यह टीवी वापस ले जा सकता हूं… पगली कहीं की.’’

बैजू की इस बात पर राधा दिल पर हाथ रख कर हंसने लगी और बोली, ‘‘जीजा, तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी. फिर तुम बिना साली के भटकते फिरते. जिंदगीभर तुम किसी लड़की से जीजा सुनने को तरसते.’’

इस बात पर सभी औरतों की हंसी छूट पड़ी. सारा माहौल फिर से खुशनुमा हो गया. बैजू को एक पल भी वहां रहना अच्छा नहीं लग रहा था. वह राधा से बोला, ‘‘अच्छा राधा, अब मैं चलता हूं. मैं तो यह देखने आया था कि टीवी सही चल रहा है कि नहीं.’’ राधा अपने जीजा के मुंह से इतनी फिक्र भरी बात सुन खुश हो गई और बोली, ‘‘जीजा, तुम आए हो तो शरबत पीए बिना न जाने दूंगी. एक मिनट बैठ जाओ, अभी बना कर लाती हूं.’’

राधा ने खुशीखुशी शरबत बना कर बैजू को पिला दिया. शरबत पीने के बाद बैजू उठ कर अपने घर को चल दिया. उसे पता था कि अनोखी उस का क्या हाल करेगी. कहेगी कि साली की मुसकान से घायल हो गए. उस की मीठीमीठी बातों में फंस गए. उस ने शरबत पिला कर तुम को पटा लिया. उस के घर में ही जा कर रहो, अब तुम मेरे पति हो  ही नहीं. लेकिन बैजू भी क्या करता. भला उपहार को किस मुंह से वापस ले ले, वह भी इतनी औरतों के सामने. ऊपर से जिस से उपहार वापस लेना था, वह उस की सगी और एकलौती साली थी. बैजू ने सोच लिया कि वह बीवी का हर जुल्म सह लेगा, लेकिन दिया हुआ उपहार वापस नहीं लेगा. Family Story

Love Stories In Hindi : बंद किताब – क्या खत्म हुआ अभिषेक का 15 साल का इंतजार ?

Love Stories In Hindi : ‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

‘‘10 साल पहले किन हालात में तुम्हारी शादी हुई थी, वह भी मैं जानता हूं. उस समय तुम 20 साल की थीं और प्रोफैसर साहब 50 के थे. शादी से ले कर आज तक मैं ने तुम्हारी आंखों में खुशी नहीं देखी है. तुम्हारी हर मुसकराहट में मजबूरी होती है.’’

‘‘वह तो अपनाअपना नसीब है.’’

‘‘देखो, नसीब, किस्मत, भाग्य का कोई मतलब नहीं होता. 2 विश्व युद्ध हुए, जिन में करोड़ों आदमी मार दिए गए. इस देश ने 4 युद्ध झेले हैं. उन में भी लाखों लोग मारे गए. बंगलादेश की आजादी की लड़ाई में 20 लाख बेगुनाह लोगों की हत्याएं हुईं. क्या यह मान लिया जाए कि सब की किस्मत खराब थी?

‘‘उन में से हजारों तो भगवान पर भरोसा करने वाले भी होंगे, लेकिन कोई भगवान या खुदा उन्हें बचाने नहीं आया. इसलिए इन बातों को भूल जाओ. ये बातें सिर्फ कहने और सुनने में अच्छी लगती हैं. मैं सिर्फ 25 हजार रुपए लूंगा और बड़ी सफाई से तुम्हारे बूढ़े पति को रास्ते से हटा दूंगा.’’

अभिषेक की बातें सुन कर रत्ना चीख पड़ी, ‘‘चले जाओ यहां से. दोबारा अपना मुंह मत दिखाना. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं इतनी नीचता पर उतर आऊंगी?’’

‘‘अभी जाता हूं, लेकिन 2 दिन के बाद फिर आऊंगा. शायद तब तक मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाए,’’ इतना कह कर अभिषेक लौट गया.

रत्ना अपने बैडरूम में जा कर फफकफफक कर रोने लगी. अभिषेक ने जोकुछ कहा था, वह बिलकुल सही था.

रत्ना को ताज्जुब हो रहा था कि वह उस के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानता था. हो सकता है कि उस का कोई दोस्त रत्ना के कालेज में पढ़ता रहा हो, क्योंकि वह तो रत्ना के साथ कालेज में था नहीं. वह उस की कालोनी में भी नहीं रहता था.

रत्ना के पति बीमारी के पहले रोज सुबह टहलने जाया करते थे. हो सकता है कि अभिषेक भी उन के साथ टहलने जाता रहा हो. वहीं उस का उस के पति से परिचय हुआ हो और उन्होंने ही ये सारी बातें उसे बता दी हों. उस के लिए अभिषेक इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाना चाहता है. आखिर यह तो एक तरह की हत्या ही हुई. बात खुल भी सकती है. कहीं अभिषेक का यह पेशा तो नहीं है? बेमेल शादी केवल उसी की तो नहीं हुई है. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं. अभिषेक के चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता कि वह अपराधी किस्म का आदमी है. कहीं उस के दिल में उस के लिए प्यार तो नहीं पैदा हो गया है.

रत्ना को किसी भी तरह के सुख की कमी नहीं थी. प्रोफैसर साहब अच्छीखासी तनख्वाह पाते थे. उस के लिए काफीकुछ कर रखा था. 5 कमरों का मकान, 3 लाख के जेवर, 5 लाख बैंक बैलेंस, सबकुछ उस के हाथ में था. 50 हजार रुपए सालाना तो प्रोफैसर साहब की किताबों की रौयल्टी आती थी. इन सब बातों के बावजूद रत्ना को जिस्मानी सुख कभी नहीं मिल सका. प्रोफैसर साहब की पहली बीवी बिना किसी बालबच्चे के मरी थी. रत्ना को भी कोई बच्चा नहीं था. कसबाई माहौल में पलीबढ़ी रत्ना पति को मारने का कलंक अपने सिर लेने की हिम्मत नहीं कर सकती थी.

रत्ना ने अभिषेक से चले जाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन बाद में उसे लगने लगा था कि उस की बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था. रत्ना अपनेआप को तोलने लगी थी कि 2 दिन के बाद अभिषेक आएगा, तो वह उस को क्या जवाब देगी. इस योजना में शामिल होने की उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

अभिषेक अपने वादे के मुताबिक 2 दिन बाद आया. इस बार रत्ना उसे चले जाने को नहीं कह सकी. उस की आवाज में पहले वाली कठोरता भी नहीं थी. रत्ना को देखते ही अभिषेक मुसकराया, ‘‘हां बताओ, तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘कहीं बात खुल गई तो…’’

‘‘वह सब मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं सारी बातें इतनी खूबसूरती के साथ करूंगा कि किसी को भी पता नहीं चलेगा. हां, इस काम के लिए 10 हजार रुपए बतौर पेशगी देनी होगी. यह मत समझो कि यह मेरा पेशा है. मैं यह सब तुम्हारे लिए करूंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों?’’

‘‘सही बात यह है कि मैं तुम्हें  पिछले 15 साल से जानता हूं. तुम्हारे पिता ने मुझे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. मैं जानता हूं कि किन मजबूरियों में गुरुजी ने तुम्हारी शादी इस बूढ़े प्रोफैसर से की थी.’’

‘‘मेरी इज्जत तो इन्हीं की वजह से है. इन के न रहने पर तो मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम अकेली हो गई रत्ना, और आज तक अकेली हो.’’

‘‘मुझे भीतर से बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अगर भेद खुल भी जाता है, तो मैं सबकुछ अपने ऊपर ले लूंगा, तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आने पाएगा. मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूं रत्ना. मेरा और कोई दूसरा मकसद नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, तुम्हें पेशगी के रुपए मिल जाएंगे,’’ कह कर रत्ना भीतर गई और 10 हजार रुपए की एक गड्डी ला कर अभिषेक के हाथों पर रख दी. रुपए ले कर अभिषेक वापस लौट गया.

तय समय पर रत्ना के पति को नर्सिंग होम में भरती करवा दिया गया. सभी तरह की जांच होने के बाद प्रोफैसर साहब का आपरेशन किया गया, जो पूरी तरह से कामयाब रहा. बाद में उन्हें खून चढ़ाया जाना था. अभिषेक सर्जन राजेश की पूरी मदद करता रहा. डाक्टर साहब आपरेशन के बाद अपने बंगले पर चले गए थे. खून चढ़ाने वगैरह की सारी जिम्मेदारी अभिषेक पर थी. सारा इंतजाम कर के अभिषेक अपनी जगह पर आ कर बैठ गया था. रत्ना भी पास ही कुरसी पर बैठी हुई थी. अभिषेक ने उसे आराम करने को कह दिया था.

रत्ना ने आंखें मूंद ली थीं, पर उस के भीतर उथलपुथल मची हुई थी. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था. दिमाग में अनेकअनेक तरह के विचार पैदा हो रहे थे. अभिषेक ड्रिप में बूंदबूंद गिर कर प्रोफैसर के शरीर में जाते हुए खून को देख रहा था. अचानक वह उठा. अब तक रात काफी गहरी हो गई थी. वह मरीज के पास आया और ड्रिप से शरीर में जाते हुए खून को तेज करना चाहा, ताकि प्रोफैसर का कमजोर दिल उसे बरदाश्त न कर सके. तभी अचानक रत्ना झटके से अपनी सीट से उठी और उस ने अभिषेक को वैसा करने से रोक दिया.

वह उसे ले कर एकांत में गई और फुसफुसा कर कहा, ‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, रुपए भले ही अपने पास रख लो. मैं अपने पति को मौत के पहले मरते नहीं देख सकती. जैसे इतने साल उन के साथ गुजारे हैं, बाकी समय भी गुजर जाएगा.’’ अभिषेक ने उस की आंखों में झांका. थोड़ी देर तक वह चुप रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बड़ी कमजोर हो रत्ना. तुम जैसी औरतों की यही कमजोरी है. जिंदगीभर घुटघुट कर मरती रहेंगी, पर उस से उबरने का कोई उपाय नहीं करेंगी. खैर, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ इतना कह कर अभिषेक ने पेशगी के रुपए उसे वापस कर दिए. इस के बाद वह आगे कहने लगा, ‘‘जिस बात को मैं ने इतने सालों से छिपा रखा था, आज उसे साफसाफ कहना पड़ रहा है.

‘‘रत्ना, जिस दिन मैं ने तुम्हें देखा था, उसी दिन से तुम्हें ले कर मेरे दिल में प्यार फूट पड़ा था, जो आज बढ़तेबढ़ते यहां तक पहुंच गया है. ‘‘इस बात को मैं कभी तुम से कह नहीं पाया. प्यार शादी में ही बदल जाए, ऐसा मैं ने कभी नहीं माना.

‘‘मैं उम्मीद में था कि तुम अपनी बेमेल शादी के खिलाफ एक न एक दिन बगावत करोगी. मेरी भावनाओं को खुदबखुद समझ जाओगी या मैं ही हिम्मत कर के तुम से अपनी बात कह दूंगा.

‘‘इसी जद्दोजेहद में मैं ने 15 साल गुजार दिए. आज तक मैं तुम्हारा ही इंतजार करता रहा. जब बरदाश्त की हद हो गई, तब मौका पा कर तुम्हारे पति को खत्म करने की योजना बना डाली. रुपए की बात मैं ने बीच में इसलिए रखी थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझ न सको.

‘‘तुम ने इस घिनौने काम में मेरी मदद न कर मुझे एक अपराध से बचा लिया. वैसे, मैं तुम्हारे लिए जेल भी जाने को तैयार था, फांसी का फंदा भी चूमने को तैयार था.

‘‘मैं तुम्हें तिलतिल मरते हुए नहीं देख सकता था रत्ना, इसलिए मैं ने इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया था.’’

अपनी बात कह कर अभिषेक ने चुप्पी साध ली. रत्ना उसे एकटक देखती रह गई.

Family Story In Hindi : शादीलाल की ससुराल यात्रा

Family Story In Hindi : शादीलाल जैसा सामान धरती पर कम ही मिलता है. साढ़े 4 फुट की उस चीज का पेट आगे निकला हुआ था और गंजे सिर पर गिनने लायक बाल थे. मुझे यकीन था कि उस की शादी नामुमकिन है, पर शायद वह अपने माथे पर कुछ और ही लिखा कर लाया था.

जी हां, जैसा हमारा प्यारा दोस्त शादीलाल था, ठीक वैसी ही उस की बीवी यानी मेरी भाभी आई थीं. वे भी करीब 37 साल की होंगी. शादीलाल की कदकाठी से ले कर मोटापा, लंबाई, ऊंचाई, निचाई, चौड़ाई सभी में जबरदस्त टक्कर देने वाली थीं.

मेरी भाभी का नाम पहले कुमारी सुंदरी था, पर अब श्रीमती सुंदरी देवी हो गया था.

पर भाभी का सुंदरी होना तो दूर, वे सुंदरी का ‘सु’ भी नहीं थीं, मगर ससुराल के नाम से बिदकने वाला मेरा यार गजब की तकदीर पाए हुए था. उस के 7 सगी सालियां थीं और सातों एक से बढ़ कर एक.

मैं भी शादी में गया था. सच कहता हूं कि मेरा ईमान भूचाल में जैसे धरती डोलती है, वैसे डोल गया था. अगर मेरी नकेल पहले से न कसी होती, तो मैं शादीलाल की सालियों के साथ इश्क कर डालता.

शादी में शादीलाल की सालियों ने उस की इतनी खिंचाई की थी कि वह ससुराल का नाम लेना ही भूल गया. शादी में उस से जूतों की पूजा कराई गई. धोखे में डाल कर सुंदरी देवी के पैर छुआए गए. सुंदरी देवी के नाम से झूठी चिट्ठी भेज कर उसे जनवासे से 7 फर्लांग दूर बुलवाया गया.

खैर, होनी को कौन टाल सकता था. आज शादीलाल की शादी को एक साल हो गया. सुंदरी देवी अपने मायके में थीं. वे न जाने कितनी बार वहां हो आईं, पर मेरे यार ने कभी वहां की यात्रा का नाम नहीं लिया.

वहां से ससुर साहब की चिट्ठी आई कि आप शादी के बाद से ससुराल नहीं आए. अब सुंदरी की विदाई तभी होगी जब आप खुद आएंगे, वरना नहीं.

यह वाकिआ मुझे तब पता चला, जब औफिस की बड़े बाबू वाली कुरसी पर शादीलाल को गमगीन बैठे देखा.

‘‘मेरे यार, क्या कहीं से कोई तार वगैरह आया है या गमी हो गई?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

शादीलाल ने अपना मुंह नहीं खोला. अलबत्ता, नाक पर मक्खी बैठ जाने पर भैंस जैसे सिर हिलाती है, वैसे न में सिर हिला दिया.

तब मैं ने पूछा, ‘‘क्या आप को सुंदरी देवी की तरफ से तलाक का नोटिस आया है? क्या वे बीमार हैं या सासससुर गुजर गए?’’

अब शादीलाल ने जो सिर उठाया, तो मेरा दिल बैठ गया. लाललाल आंखें आंसुओं से भरी थीं. चेहरा गधे सा मुरझाया था.

मैं ने उस के हाथ पर हाथ रखा, तो शादीलाल रो उठा और बोला, ‘‘देखो एकलौता राम, तुम मेरे खास दोस्त हो, तुम से क्या छिपाना. चिट्ठी आई है.’’

‘‘क्या कोई बुरी खबर है या कोई अनहोनी घटना घट गई?’’

‘‘नहीं, ससुरजी ने मुझे बुलाया है. इस बार वे साले के साथ सुंदरी को नहीं भेज रहे हैं. अब तो मुझे जाना ही होगा.’’

‘‘अरे, तो इस में घबराने की क्या बात है. ससुराल से बुलावा तो अच्छे लोगों को ही मिलता है. तुम तो

7 सालियों के आधे घरवाले हो, तुम जरूर जाओ.’’

‘‘नहीं यार, यही तो मुसीबत है. मैं उन सातों के मुंह में तिनके की तरह समा जाता हूं.’’

‘‘शादीलाल, तुम्हें क्या हो गया है? घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ मैं ने उसे हौसला बंधाया.

‘‘एकलौता राम, मुझे तुम्हीं पर भरोसा है. इस संसार में मेरा साथ देने वाले यार तुम्हीं हो. क्या तुम मेरे ऊपर एक एहसान करोगे?’’

‘‘कहो यार, मैं तो यारों का एकलौता राम हूं.’’

‘‘तुम को मेरे साथ मेरी ससुराल चलना होगा, वरना मेरी शैतान सालियां मुझे सतासता कर काढ़ा बना कर पी जाएंगी.’’

मैं ने शादीलाल को समझाना चाहा, पर वह मुझे अपनी ससुराल ले ही गया. इस तरह अब शादीलाल की ससुराल यात्रा और साथ में एकलौता राम की यादगार यात्रा शुरू हो गई.

87 किलोमीटर दूर ससुराल में पहुंचे, तो हमारी खूब खातिरदारी हुई. फिर सातों शैतान सालियों के कारनामे शुरू हो गए, जिन का हमें डर था.

थका होने की वजह से शादीलाल शाम 7 बजे से ही खर्राटे लेने में मस्त हो गया. तभी वे सातों आईं. उन्होंने मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया तो मैं समझ गया कि शादीलाल अब तो गया काम से.

मैं शादीलाल को जगाने के चक्कर में था कि 27 साला एक साली ने कहा, ‘‘आप खामोश रहिए, वरना आप की हजामत जीजा से भी बढ़ कर होगी.’’

मैं ने रजाई तानी और उस में झरोखा बना कर नजारा देखने लगा. शादीलाल के हाथों में एक साली ने नीली स्याही का पोता फेरा. दूसरी साली ने उस की नाक में कागज की सींक बना कर घुसा दी. नतीजतन, शादीलाल का हाथ नाक पर पहुंच गया और स्याही चेहरे पर ‘मौडर्न आर्ट’ बनाती गई.

मैं लिहाफ के अंदर हंसी नहीं रोक पा रहा था. आखिर में 6 सालियां बाहर चली गईं, केवल 7 साल की सुनीता बची, तो उस ने अपने जीजा के हाथों में उसी की हवाई चप्पलें उलटी कर के फंसी दीं और फिर उस के कानों में सींक घुमा कर भाग गई.

सींक से बेचैन हो कर शादीलाल ने अपने कानों पर हाथ मारे, तो चप्पलें गालों पर चटाक से बोलीं.

मैं ने किसी तरह झरोखा बंद किया. हंसहंस कर मेरा पेट हिल रहा था,

पर कान आहट ले रहे थे.

मेरा यार उठा. चप्पलें फेंकने की आवाज आई, फिर उस ने मेरी रजाई उठा दी. मैं तब भी हंस रहा था.

शादीलाल बरस पड़ा, ‘‘एकलौता राम, तू कर गया न गद्दारी. मेरी यह हालत किस ने की?’’

मैं ने आंख मलने का नाटक किया और पूछा, ‘‘क्या बात है यार?’’

‘‘बनो मत, मेरी हालत पर तुम हंस रहे थे.’’

‘‘क्या बात करते हो यार… मैं तो सपने में हंस रहा था. अरे, तुम्हारे चेहरे पर रामलीला का मेकअप किस ने किया?’’

‘‘उठ यार, मैं यहां पलभर भी नहीं ठहर सकता. वही कमबख्त सालियां होंगी,’’ उस ने आईने में अपना चेहरा देखते हुए कहा.

‘‘चलो ससुरजी के पास, मैं उन सब की शिकायत करता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर यार, ससुरजी ऐसा टैक्नीकलर दामाद देखेंगे तो क्या कहेंगे? आखिर मैं क्या करूं? मैं इसीलिए यहां नहीं आता हूं. तुझे बचाव के लिए लाया था, पर तू भी बेकार रहा.’’

‘‘शादीलाल, क्या मैं रातभर जाग कर तुम्हारी खाट के चक्कर लगाऊंगा? तुम भी तो घोड़े बेच कर सो गए. वहां जग में पानी रखा है, मुंह धो डालो.’’

बेचारा शादीलाल मुंह धो कर लेट गया. मैं सोने की कोशिश में था कि तभी पायल की आवाज सुन कर चौंका.

जीरो पावर का बल्ब जल रहा था. मैं ने देखा, वह भारीभरकम औरत शायद श्रीमती शादीलाल थीं. मैं ज्यादा रात तक जागने पर मन ही मन झल्लाया और करवट बदल कर लेटा रहा. मुझे आवाजें सुनाई पड़ रही थीं.

‘‘अरे तुम, देखो हल्ला नहीं करना. मेरा यार एकलौता राम सोया हुआ है. तुम खुद नहीं आ सकती थीं. तुम्हारी बहनों ने मेरा मजाक बना दिया.’’

ठीक तभी बिजली जलने की आवाज सुनाई दी और सामूहिक ठहाके भी. मैं ने फौरन हड़बड़ा कर रजाई फेंकी. देखा तो दंग रह गया. शादीलाल की 6 सालियां खड़ी थीं. बेचारा शादीलाल उन्हें टुकुरटुकुर देख रहा था.

साली नंबर 5 गद्दा, तकिया व साड़ी फेंक कर फ्राक में खड़ी हो गई और बोली, ‘‘हम सातों को जीजाजी शैतान कह रहे थे.’’

‘‘अरे, मैं तो पहले ही समझ गया था. मैं तो नाटक कर रहा था,’’ शादीलाल ने झेंपते हुए साली नंबर 5 को देखा.

इस मजाक के बाद अगला मजाक सुबह ही हुआ. मैं और मेरा यार जब कमरे से बाहर आए, तो आंगन में सालियों से दुआसलाम हुई.

तभी एक साली ने कहा, ‘‘जीजाजी, क्या आप रात को बड़ी दीदी के कमरे में गए थे?’’

‘‘नहीं सालीजी, तुम्हारे होते हुए मैं वहां क्यों जाता?’’ कह कर शादीलाल ने उसे गोद में उठा लिया.

‘‘पर जीजाजी, आप बड़ी दीदी की चप्पलें पहने हैं और आप की चप्पलें तो दीदी के कमरे में पड़ी हैं.’’

शादीलाल ने घबरा कर पैरों की ओर देखा. पैरों में लेडीज चप्पलें ही थीं.

शादीलाल के हाथ से साली छूट गई, पर मैं ने उसे संभाल लिया. फिर ठहाका लगा, तो शादीलाल की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

सब से ज्यादा मजा उस समय आया, जब शादीलाल पेट हलका करने शौचालय में घुसा. तब मैं आंगन में खड़ाखड़ा ब्रश कर रहा था. सालियों ने जो टूथपेस्ट दिया था, उस का स्वाद कड़वा सा था और उस से बेहद झाग भी निकल रहा था.

तभी शौचालय के अंदर के नल का कनैक्शन, जिस से पानी जाता था, एक साली ने बाहर से बंद कर दिया.

मैं ने सोचा कि शादीलाल तो गया काम से. इधर मैं थूकतेथूकते परेशान था कि शादीलाल की सास ने कहा, ‘‘बेटा, तुम कुल्ला कर लो. इन शैतानों ने टूथपेस्ट की जगह तुम्हें ‘शेविंग क्रीम’ दे दी थी.’’

मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. जल्दीजल्दी थूक कर भागा और सालियों के जबरदस्त ठहाके सुनता रहा.

शादीलाल एक घंटे बाद जब बिना पानी के ‘शौचालय’ से बाहर आया तो छोटी साली नाक दबा कर आई और बोली, ‘‘जीजाजी, फिर से अंदर जाइए. अब नल चालू कर दिया है.’’

शादीलाल दोबारा अंदर घुसा, फिर निकल कर नहाने घुस गया. उस का लगातार मजाक बनाया जा रहा था, पर वह ऐसा चिकना घड़ा था कि उस पर कोई बात रुकती नहीं थी.

2 दिन ऐसे ही सालियों की मुहब्बत भरी छेड़खानी में गुजरे. जब जाने का नंबर आया तो मेरे सीधेसादे यार शादीलाल ने सालियों से ऐसा मजाक किया कि सातों सालियां ही शर्म से पानीपानी हो गईं.

हुआ यों कि जब हमारे जाने का समय आया और रोनेधोने के बाद तांगे में सामान रख दिया गया, तब सालियां, उन की सहेलियां और महल्ले वालों की भीड़ जमा थी.

तभी शादीलाल ने कहा, ‘‘देखो सातों सालियो, मुझे यह बताओ कि कुंआरी लड़की को क्या पसंद है?’’

सातों सालियों ने न में सिर हिलाया. सब लोगों को यह जानने की बेताबी थी कि शादीलाल अब क्या कहेंगे. तभी शादीलाल ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, तुम लोगों को नहीं पता कि कुंआरी लड़कियों को क्या पसंद है?’’

‘नहीं,’ सातों सालियों ने एकसाथ फिर से वही जवाब दिया.

‘‘मुझे पहले ही तुम लोगों पर शक था,’’ शादीलाल ने नाटकीय लहजे में कहा.

उस समय सातों सालियों पर घड़ों पानी पड़ गया, जब उन की एक सहेली ने कहा, ‘‘तुम लोगों को जीजाजी ने बेवकूफ बना दिया. उन्हें तुम्हारे कुंआरे होने पर शक है. उन्होंने तुम सभी को शादीशुदा बना दिया है, क्योंकि तुम लोगों को कुंआरी लड़कियों की पसंद नहीं मालूम है.’’

और फिर तो सातों सालियों पर इतने जबरदस्त ठहाके लगे कि सभी दुपट्टे में मुंह छिपा कर अंदर भाग गईं. Family Story In Hindi 

Social Story : तुनकमिजाज बाई

Social Story : फरिश्ता कौंप्लैक्स में ममता नगरनिगम के लाल, हरे, काले रंगों के कचरे के बड़े डब्बे लिए एकएक घर की घंटी बजाती कचरा इकट्टा करने रोज की तरह आवाज लगाने लगी.

उसी समय बाकी कामवालियां भी अपनेअपने लगे घरों में साफसफाई करने को आ-जा रही थीं और कुछ रहवासी अपने कामधंधे के लिए घर से निकल रहे थे.

उस व्यस्त फ्लोर पर सभी ने एक बार में अपनेअपने कचरे खुद या अपने घर पर काम करने आई बाई के हाथ बाहर भिजवा दिए और कई सीधा उन डब्बों में अपने वेस्ट डाल अपने घरों के भीतर चले गए.

उस फ्लोर पर एक घर शेष था जिस में अभीअभी कोई नए लोग रहने आए थे. कल भी उन्होंने कचरा उस के जाने के बाद बाहर रखा और पूरा फ्लोर बदबूदार हो गया.

वह कल की तरह आज बिल्डिंग मैनेजर से डांट नहीं खाना चाहती थी, इसलिए ममता ने फिर घंटी बजाई. लेकिन कोई न आया. उस ने उस घर के सामने जा कर जोर से आवाज लगाई.

“दीदी, कचरा हो तो अभी दे दीजिए.”

सुबह के 9 बजे अपनी बदहवास नींद में चूर वे मेमसाहब अपनी नाकमुंह बिचका कर अपने घर के दरवाजे को आधा खोल, कचरे से पिलपिलाती झिल्ली उस के पैर की ओर जोर से फेंक कर झट से अपना दरवाजा बंद कर लेती हैं.

‘ये कचरा बिनने वाले दो कौड़ी के लोग सुबहसुबह हमारी नींद खराब करने को मुंह उठा कर चले आते हैं, गंवार कहीं के,’ वे अपने घर के भीतर बड़बड़ाती रहीं और दरवाजे के इस पार खड़ी ममता उन की बातें सुन हतप्रभ रह गई.

वह सोचती रह गई कि काम तो काम होता है, चाहे वह एअरकंडीशनर कमरे में बैठ कर कंप्यूटर चलाने वाला हो या गटर साफ करने वाला, अपनाअपना पेट पालने परिश्रम तो सभी करते हैं. उन की मेहनत आंकने को वह किसी से नहीं कह रही पर इस तरह से तिरस्कार करना क्या सही है?

उन्हें उसे ऐसा कहते सुन टीस जरूर हुई और एकाएक ममता के कानों के साथ उस की भीगी आंखें उन के आलीशान करीगरी किए हुए दरवाजे पर जा अटकीं और एक पल को उन के कहे एकएक शब्द उस के दिमाग में घूमने लगे. इसी बीच उस की खोई हुई नजरों ने अपने पैरों के बीच कुछ बहता हुआ पाया. उस ने नीचे देखा और अपने जूते झट से अलग कर लिए.

उन के द्वारा प्रतिबंधित की जा चुकी नष्ट न होने वाली पन्नी, जो वर्ल्ड लाइफ फैडरेशन के आंकड़े के अनुसार प्रदेश में रोजाना 20 गायों की मौत का कारण बन रही है, को जोर से फेंकने से वह पूरी तरह से फट गई थी और उस से बदबू मारती उन के घर की सड़ीगली जूठन के साथ डिस्पोजेबल चम्मच, घड़ी के सैल, सैनेटरी पैड आदि साफ टाइल्स पर धरधरा कर जहांतहां फैल गए.

वह अपने दस्ताने पहने हाथों से उन्हें उठा वेस्ट अनुसार नगरनिगम के डब्बो में डाल तो देती है पर तब तक उस से निकल चुका गंदे कचरे का पानी फर्श पर फैल गया.

उस ने खुद को समझाया कि सालों से कुछ घरों से ऐसी ओछी प्रतिक्रिया मिलना उस के लिए तो आम बात थी, फिर इतना दिल से क्यों लगना, जाने दो.

‘एक ही झिल्ली में सब तरह का कचरा नहीं डाला जाता,’ यह बात नगरनिगम के कर्मचारी समयसमय पर खुद आ कर और पंफलेट द्वारा सालों से बतला रहे हैं.

मां तो अनपढ थी फिर भी उन्हें इतनी समझ थी पर इतने बड़े पढ़ेलिखे लोगों को भला यह आसान बात क्यों नहीं समझ आती. जिन्हें सूखा, गीला और प्रकृति के लिए जोखिम वाले सामान के डब्बों के बीच का फर्क नहीं पता.

बिना विभाजन किए किचन का वेस्ट, प्लास्टिक सामान, सैलबैटरीज, बिना लाल क्रौस किए पेपर में लपेट कर पैड-डायपर की अलग झिल्ली, टूटे कांच बिना सोचे कि उन के फेंकने के बाद उस कचरे को कुत्ते, गाय या कचरा बिनने वाले के खोलने पर वो चोटिल हो सकते हैं और न ही अपने घर से होती पर्यावरण को सुरक्षित रखने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी व दिनभर मोबाइल पर उंगलिया चलाने वाली अतिव्यस्त जनता समय के अभाव का बहाना कर सभी कचरा अलगअलग करने में असमर्थ हो एकसाथ ठूंस कर फेंक देती है, जबकि यही जनता सरकार को वायु, जल, मिट्टी के बढ़ते प्रदूषण के लिए बेझिझक कोसने में देर नहीं लगाती.

कचरा तो बिन गया पर गंदगी का वह लसलसा, लारदार पानी जस का तस था.

सफाई वाली तो आ कर जा चुकी और उस का काम कचरा इकट्टा करना है, गंदगी साफ करना नही. एक बार को कर भी दे पर उस के पास तो सफाई का सामान ही नहीं है, बाकी घरों से कचरा लेने के लिए देर भी हो रही है. उसे उस फ्लोर को ऐसे ही गंदगी के बीच छोड़ कर जाने के अलावा कोई रास्ता न सूझा और वह एक के बाद एक दूसरे फ्लोर में कचरा इकट्ठे करने यह सोच कर निकल गई कि जब सफाईवाली दिखेगी तो उस से कह कर यहां सफाई करवा देगी.

वहीं, कुछ घंटों बाद जब वे मेमसाहब सजधज कर, परफ्यूम मार, शौपिंग के लिए मौल को निकलने अपना दरवाजा बंद कर अपनी चिकनी हाई हील्स से लिफ्ट की ओर जाने मुड़ीं नहीं कि वे धम्म से उन मक्खियों से भिनकते अपने द्वारा फेंके कचरे में जा फिसलीं.

तभी सामने वाले घर से काम कर निकलती बाई ने उन्हें फर्श पर से अपने चिपचिपाते हाथों से उठने का बारबार असफल प्रयास करते पाया और दूसरी ओर से उसी समय ममता सफाईवाली को ले कर आ पहुंची.

वे तीनों उन की मदद करने को उन की ओर फुरती से बढ़ने लगीं.

“यह क्या तरीका है गवारों? न सफाई करने की अक्ल है न ही कचरा हटाने की. तुम लोग को नौकरी से नहीं निकलवाया तो मेरा नाम नहीं. रुको वहं, यहा मत आना. वहीं खड़ी रहो. अपने गंदे हाथों से मुझे छूना मत,” वे मेमसाहब गिरती-संभलती बड़बड़ाती हैं.

“हां, तो पड़ी रह वैसी. एक तो मदद कर रहे हैं, और ये अकड़ दिखा रही हैं. देखा था मैं ने, कैसे कचरा फेंक कर दे रही थी सुबह. देख, अब अपने किए पर कैसी लोट रही है.”

“चुप रह, अपनी औकात देख कर बात कर, अनपढ़.”

“हां मानते हैं, आप लोग जैसे बड़े स्कूलकालेज में नहीं गए पर कचरा का विभाजन कर फेंकने की तमीज हमारे पास आप से बहतर है. अनपढ़गंवार आप को हमें नहीं बल्कि हमें आप को कहना चाहिए.”

“दीदी माफ करिएगा,” ममता ने मामला बढ़ता देख उसे चुप करा दिया. जो वह आज सुबह न कह सकती थी, उस तुनकमिजाज बाई ने उसे सुना दिया.

सफाईवाली बिना कुछ कहे वह गंदगी साफ कर ममता के साथ चली गई और वे मेमसाहब अपना सिर झुकाए, अपनी पीठ सरका कर दरवाजे का सहारा लेते अपने महंगे कपड़ों से रिसती हुई बदबूदार लार को अपने साथ घर के भीतर ले जातीं यह सोचती रहीं कि असलियत में गंवार है कौन ? Social Story

Romantic Story in Hindi : प्रेम की शुरुआत

Romantic Story In Hindi : होली वाले दिन सुबह आंख खुली और बिस्तर से उतरने के लिए सरोज ने पैर नीचे रखे तो हैरान रह गई. पलाश के ढेर सारे फूल जमीन पर बिछे हुए थे. मन को लुभाते रंगीले फूलों ने सारी फिजा को रंगीन बना दिया और यही रंग सुमन के जीवन में बिखेर गया. ट्रेन की खिड़की से बाहर देखतेदेखते मन विभोर सा हो रहा था. पूरा जंगल पलाश के फूलों से लदालदा चंपई रंग में रंगा हुआ लग रहा था. बचपन में जब भी होली नजदीक आती थी तो सब बड़ों को कहते सुनते थे कि जंगल से पलाश के फूल लाएंगे और उन से होली के रंग तैयार करेंगे.

सच में ये रंग हैं ही इतने रंगीले, देख कर मन को खूब लुभाते हैं और सारी फिजा को रंगीन कर देते हैं. मेरे जीवन में भी यही रंग समाया है जब से सुमेर की प्रीत मन में जगी है. मन तो नहीं था उन्हें छोड़ कर आने को और वे भी तो कैसे तड़प कर बोले थे- ‘मत जाओ सरोज, मैं इतने दिन तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा.’ पर पगफेरी के लिए भी न आती तो लोग क्या कहते और मम्मीपापा का भी तो मन करता होगा बिटिया से मिलने का. ये रिश्ते भी कैसे पल में बदल जाते हैं कि जिस से कभी जानपहचान भी न थी, आज वही मन का मीत है, सब से प्यारा है, दिल का सहारा है. मु झे तो पहली ही नजर में सुमेर भा गए थे.

देखने दिखाने की रस्मों के बीच कब दिल मेरे पहलू से निकल कर उन का बन बैठा, पता ही नहीं चला. प्रीत ने अनछुए मन को ऐसा छुआ कि अब कुछ नहीं भाता था. सारे वक्त खोईखाई सी रहने लगी थी. मन उन्हीं की यादों में खोया रहता. पिछले साल यही तो दिन थे जब होली नजदीक आ रही थी. सगाई के बंधन में बंधे हम दोनों पूरी तरह एकदूसरे की प्रीत के रंग से सराबोर थे. सुमेर रोज शाम को औफिस से लौटते ही मु झे फोन करते और लगभग एकडेढ़ घंटे तक हम दोनों एकदूसरे की बातों में खो जाते.

उस रोज शाम होते ही मु झे उन की याद सताने लगी पर उन का फोन नहीं आया और जब मैं ने फोन किया तो कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था. मन की बेचैनी और अधीरता बढ़ती जा रही थी और कुछ आशंकाएं भी होने लगीं. जो हमें सब से प्यारा होता है उस के बारे में अकसर हम डरने लगते हैं, अपनी जान से ज्यादा उस की फिक्र करने लगते हैं. मन घबरा कर उलटासीधा सोच रहा था. ‘न जाने क्या हुआ होगा, फोन क्यों नहीं लग रहा, कहीं कुछ… नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ने अपने इस विचार को झटक दिया और फिर से कोशिश की पर अब भी उन का फोन नहीं लगा. जब बेचैनी हद से ज्यादा बढ़ गई तो मैं ने उस के परिवार की सब से करीबी दोस्त यानी उस की भाभी और मेरी प्यारी जेठानी को फोन करना उचित समझा क्योंकि वही हमारी हमउम्र और राजदार थीं.

उन के बारे में सुमेर अकसर बताया करता था. सो, मैं ने उन्हें फोन किया. मेरी आवाज सुन कर ही वे मेरी परेशानी भांप गईं और हंसती हुई बोलीं, ‘क्या हुआ देवरानीजी, आज देवरजी से बात नहीं हुई क्या जो इतनी बेचैन हो?’ मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘भाभी, सुमेर का फोन नहीं लग रहा, वे ठीक तो हैं न?’ ‘वह बिलकुल ठीक हैं, सरोज. असल में सुमेर अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है. उस ने मु झ से कहा था तुम्हें बता दूं पर मैं भूल गई, सौरी.’ इतना सुनते ही मेरी आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. बहुत गुस्सा आ रहा था सुमेर पर. मेरी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं उसे. जब अभी यह हाल है, आगे क्या होगा. दिल के भीतर कुछ टूट कर बिखरता सा लगा. उस शाम मैं ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था.

रोरो कर सूजी हुई आंखें ले कर मम्मी के पास गई तो मम्मी हैरान रह गईं. ‘क्या हुआ, तेरी आंखें क्यों सूजी हुई हैं, रोईर् है क्या?’ मम्मी ने बड़े प्यार से मु झे अपने पास बैठाया और सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘क्या बात है, हमेशा खिलखिलाती रहने वाली हमारी गुडि़या रानी आज इतनी उदास कैसे है?’ ‘मम्मी, आप यह सगाई तोड़ दो, मैं सुमेर से शादी नहीं करूंगी,’ मैं ने आंसू पोंछते हुए कहा. ‘सगाई तोड़ दो? क्या कह रही है तू, होश में तो है न?’ ‘हां मां, मैं पूरे होश में हूं. मैं उस से शादी नहीं करूंगी. उसे मेरी भावनाओं की कद्र नहीं. आज संडे था, मैं ने सारे दिन उस के फोन का इंतजार किया और शाम को खुद फोन किया तो पता चला वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है.

यहां मैं इंतजार कर रही हूं और वह है कि उसे अभी से मेरी परवा नहीं तो शादी के बाद क्या होगा, बोलो मम्मी?’ यह कह कर मैं ने अपना सिर मम्मी की गोद में रख दिया. मम्मी मेरे बालों को हौलेहौले सहलाने लगीं, बोलीं, ‘सुन बिटिया, ये रिश्ते बहुत नाजुक होते हैं, बिलकुल रेशम की डोरी की तरह, जरा से खिंचाव से टूट जाते हैं. हम स्त्रियां धैर्य और सहनशीलता की पर्याय मानी जाती हैं. क्या हुआ अगर आज सुमेर दोस्तों के साथ पार्टी में चला गया, रोज तो वह तु झ से बात करता है न. वह तु झ से प्यार करता है पर उस की भी अपनी जिंदगी है. और फिर, अभी शादी नहीं हुई तो वह आजाद भी है. तू देखना, शादी के बाद वह कैसे अपनी जिम्मेदारी निभाता है.’ मां ने मु झे बहुत सम झाया पर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही. किसी के सम झाने का मु झ पर असर नहीं हो रहा था.

सुमेर पार्टी से देररात घर आया और आते ही सुमन भाभी ने उन्हें मेरे फोन के बारे में बताया पर उसे मेरी नाराजगी का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और सो गया. फिर सुबह उठते ही औफिस चला गया. औफिस की व्यस्तता में उसे ध्यान नहीं आया. शाम को औफिस से लौटने के बाद उस ने मु झे फोन लगाया पर मैं ने नहीं उठाया. उधर फोन बज रहा था और इधर मेरी आंखें बरस रही थीं. जब बहुत देर तक फोन बजता रहा तो मैं ने गुस्से में फोन स्विच औफ कर दिया. सुबह देखा तो व्हाट्सऐप पर उस के मैसेज थे. ‘हाय सरोज, कैसी हो? भाभी ने तुम्हारे फोन के बारे में बताया था पर पार्टी से आने में देर हो गई थी, इसलिए सो गया. औफिस में बिजी था, इसलिए शाम को तुम्हें फोन किया पर तुम ने फोन नहीं उठाया.’ ‘क्या हुआ? नाराज हो मु झ से?’ मैं ने मैसेज पढ़ कर फोन पटक दिया. शाम को मम्मी के फोन पर उस का फोन आया तो मम्मी ने अपना फोन मु झे पकड़ा दिया. वह हैलोहैलो कर रहा था पर मैं ने बात नहीं की. वह कह रहा था-

‘सरोज कैसी हो? मैं जानता हूं तुम फोन पर हो. कुछ तो बोलो, तुम्हारी मीठी आवाज सुने हुए पूरे 2 दिन हो गए. इतने से कुसूर की इतनी बड़ी सजा क्यों दे रही हो मु झे? मु झ से बात करो, प्लीज.’ पर मैं ने बिना कुछ बोले ही मम्मी का फोन उन्हें लौटा दिया और अपनी सहेली के घर चली गई. उस के बाद कुछ दिनों तक उस का फोन नहीं आया और मैं ने भी नहीं किया. मां झुं झला कर कहती रहीं, ‘पता नहीं क्या जिद पकड़ी है इस लड़की ने. अरे, इतना अच्छा लड़का है, मना रहा था. लेकिन यह मानी नहीं. बस, अकड़ती जा रही है.’ ‘मम्मी, मैं आप की बेटी हूं और आप हो कि उसी की तरफदारी करती रहती हो?’ मैं ने तुनक कर कहा तो मम्मी डांटने लगीं. ‘जो सही है उसी का पक्ष ले रही हूं मैं.

इतना भी क्या अकड़ ले कर बैठी है. कल तेरी जेठानी का फोन आया था, कह रही थी, सुमेर आजकल बहुत उदास रहने लगा है.’ यह सुन कर अच्छा महसूस हुआ कि मेरी नाराजगी का असर हो रहा है पर फिर भी अकड़ी रही. होली वाले दिन सुबह आंख खुली और बिस्तर से उतरने के लिए पैर नीचे रखे तो हैरान रह गई. पलाश के ढेर सारे फूल जमीन पर बिछे हुए थे. मैं उन पर पैर रख कर चलने लगी तो देखा ये फूलों की बिछावन गार्डन तक जा रही थी और गार्डन में लगे झूले तक थी और झूला भी फूलों से सजा हुआ था.

मैं आश्चर्य से भरी आंखें मलती फूलों पर चलतीचलती झूले पर जा कर बैठी ही थी कि किसी ने पीछे से आ कर मेरे गालों पर गुलाल मल दिया. पीछे मुड़ कर देखा, सुमेर और उस के दोस्त खड़े थे और मु झे देख कर मुसकरा रहे थे. एक दोस्त बोला, ‘भाभीजी, सुना है आप हम से और हमारे दोस्त से बहुत नाराज हैं?’ मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘नहीं तो.’ और मैं मुसकरा दी. ‘अब नानुकुर मत कीजिए, भाभी. आप को पता भी है, हमारे दोस्त की क्या हालत हो गई है? बेचारा देवदास बन कर रह गया है, देखिए,’ दूसरा दोस्त बोला. मैं ने सुमेर की ओर देखा तो वह मुंह लटका कर खड़ा था. यह देख कर मु झे जोर से हंसी आ गई. तीसरा दोस्त बोला, ‘अरे भाभीजी, आप को मनाने के लिए हम सब ने मिल कर कितनी मेहनत की है, पता भी है आप को? कल जंगल जा कर जितने भी पलाश के फूल मिले, तोड़ लाए और आज जल्दी उठ कर आप के लिए फूलों की डगर बनाई. अब तो मान जाइए.’ मैं जरा सी मुसकराई तो जैसे उन सब को ग्रीन सिग्नल मिल गया और सब ने मिल कर मु झे रंग डाला. मैं ने भी अपनी पिचकारी से उन सब को खूब भिगोया. हमारे प्रेम की शुरुआत की होली सच में यादगार बन गई. Romantic Story In Hindi 

Social Story In Hindi : गुटरगू

Social Story In Hindi : पक्षियों की अलग ही दुनिया है. कभी सोचती थी कि पक्षी स्वतंत्र हैं, वे हमारी तरह समाज व कानून की जंजीरों से जकड़े हुए नहीं हैं. पर, नजदीक जा कर मामूल हुआ कि उन का भी अपना समाज है, अपनी निराली दुनिया व अनुभूतियां हैं. एक वर्ष बीत गया, पर वह जोड़ा मैं अभी तक नहीं भूल सकी.

मुझे काफी दिनों से मकान की तलाश थी, क्योंकि जिस मकान में हम रह रहे थे, वह मकान कम, दड़बा अधिक जान पड़ता था. खैर, तलाश पूरी हुई. मेरे पतिदेव ने काफी अच्छा फ्लैट तलाश कर लिया. ग्राउंड फ्लोर पर दो कमरे का यह फ्लैट पा कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. दिल्ली जैसे शहर में खुला, हवादार व सस्ता मकान सौभाग्य से ही मिलता है.

कुछ दिन यों ही सामान सेट करने में व्यतीत हो गए. लेकिन जब जरा व्यस्तता से फुरसत मिली तो यह देख कर सुकून हुआ कि सामने के पेड़ की एक बड़ी सी टहनी हमारी खिड़की के शीशे को छू रही है. खिड़की कम ही खोली जाती थी, क्योंकि दिल्ली की पौल्यूटेड एयर में एयर कंडीशनर ही चलाना पड़ता है.

एक दिन मैं बाजार जाने के लिए जैसे ही बाहर निकली, ऊपर की पड़ोसनें आपस में बतिया रही थीं. उन्होंने मुझे देखा नहीं था, पर चलतेचलते कुछ शब्द कानों में पड़ ही गए, “अरे, इस में फिर कोई आ गया…”

यह बात हमारे बारे में ही थी, इस में कोई शक नहीं था. मैं सोचने लगी, ‘आखिर इस में लोग ठहरते क्यों नहीं?’

मुझे तो अभी तक कोई दोष नजर नहीं आया. क्या चोरी होती है यहां या फिर किसी भूतप्रेत का चक्कर है? क्योंकि मैं भूतों में विश्वास नहीं रखती, सो मेरे दिमाग से यह विचार शीघ्र ही निकल गया.

दूसरे ही दिन निमंत्रित किए मेहमान की तरह एक जोड़ी मेरी खिड़की के पीछे ठकठक करने लगी. शीशे से भी गुटरगूंगुटरगूं का शोर आने तक एक कबूतरकबूतरी को पेड़ की डाल पर देख मैं ने माथा सिकोड़ लिया. मैं बारबार बाहर जा कर उन्हें उड़ाती, वह फिर हठी बालक से वहीं जम जाते. मुझे लगा कि वे ड्राइव को रोज गंदा करेंगे.
एकाएक मुझे याद आया और मैं ने कहा, “अच्छा बच्चू, अब देखती हूं कि कैसे आते हो?”

मैं ने एक लंबा सा डंडा उठाया और डरा कर टहनी से ही डंडा सटा दिया और फिर इत्मीनान से रसोई का काम निबटाने लगी.

रसोई का काम समाप्त कर सोचा, लेट ही लूं. सचमुच बच्चों के बिना घर कैसा सूना लगता है. काश, मेरे पास कोई नन्हामुन्ना होता.

मैं अपने ही विचारों में डूबनेउतरने लगी.

अभी पलकें बोझिल हो कर मुंदने ही वाली थी कि गुटरगूं की आवाज सुन कर चौक पड़ी. वह जोड़ी फिर उस डाल पर आ गई थी. वहां ऊपर दृष्टि गई तो देखती ही रह गई. शायद शीशे के पीछे उन्हें मेरे वहां होने का अहसास न था.

सलेटी रंग पर काली धारियां लिए वह जोड़ी बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. वे जब अपनी चमकीली गरदन मटकाते, उन की भूरी आंखें गजब का आकर्षण पैदा कर देतीं. उसी दिन मुझे विश्वास हुआ कि पक्षियों में सौंदर्य भरपूर होता है.
कबूतर कबूतरी की गरदन पर चोंच मारता और कबूतरी आंख मूंद कर कभी गरदन को इधर और कभी दूसरी ओर फेर लेती. फिर थोड़ी देर बाद कबूतर ने उस के अंगों पर चोंच से गुदगुदी करनी आरंभ की.

अब कबूतरी ने आंखें झपका कर खोल दीं और एकदो बार इधरउधर देखा, बिलकुल उस कामिनी की तरह जो प्रेमी को प्रेम का प्रतिदान देने से पूर्व निश्चित हो जाती है. और फिर वही क्रिया दोहराई कबूतरी ने, कबूतर और कबूतरी पीछे सरकते चले गए और थोड़ी देर बाद सुनाई पड़ने लगा पंखों के फड़फड़ाने का स्वर.

सांझ घिर आई थी. मैं ने जैसे ही परदे डाले, कबूतरकबूतरी उड़ चले बादलों की ओर.

जब पतिदेव पधारे तो सब से पहली बात मैं ने यही बताई, “सुनिए, आज कबूतरों ने नाक में दम कर दिया. सारे ड्राइव पर बीट कर दी. बारबार धोना पड़ा.”

*कबूतरों ने या कबूतरकबूतरी ने. अरे, मनाने दो उन्हें भी हनीमून,” हंस कर वह बोले.

और बात आईगई हो गई.
लेकिन अगले 4 दिनों में मैं परेशान हो गई. कभी देखती, बाहर रखी कुरसी पर बीट पड़ी है, तो कभी गाड़ी पर. उन्होंने चित्रकारी कर दी है, तो अपना काम छोड़छोड़ कर उन्हें भगाती. पर, वे कहां मानने वाले थे.
पहले कुछ दिनों वे शी… शी का स्वर सुन कर भाग भी जाते, लेकिन कुछ दिनों पश्चात वे डरते ही न थे. मैं कई तरह से डरातीधमकाती. वे बड़े मजे से चहलकदमी करते रहते. शायद वे जान गए थे कि मुझ से उन्हें कोई खतरा नहीं है. मुझे बहुत क्रोध आता, पर यह रहा कितने दिन. खिड़की खोल कर भी हटाना चाहा, पर वे माने नहीं. अब डाल काटना तो मेरे बस का था नहीं.

मैं धीरे से परदा हटा कर देखती तो उन का प्रणय दृश्य देख शरमा जाती. दोनों चोंच से चोंच मिलाए मस्त. कभी देखती कबूतर धीरे से पुकारता ‘गुटरगूं’ तो वह उड़ कर उस के पास जा बैठती.

कबूतर मैं ने देखा न हो, ऐसी बात नहीं है. बहुत जगह मैं उस ‘गुटरगूं’ के स्वर से ऊबी हूं, पर उस प्यार की टेर में जो मिठास है, आनंद है, वह वर्णित नहीं किया जा सकता.

उन्हीं दिनों मेरी तबीयत कुछ खराब रहने लगी और जब हम को मालूम हुआ कि मैं मां बनने वाली हूं तो हम दोनों जैसे झूम उठे. सचमुच अच्छी खुशी के सम्मुख मैं उस जोड़े को कई दिनों तक भूले रही.

इतवार का दिन था. यह रसोई में आए और बोले, “देखो, इंदू, तुम्हें एक चीज दिखाऊं.”

“क्या दिखाएंगे, यहीं बता दो न.”

“नहीं, यहां नहीं,” वह बोले और लगभग खींचते हुए बेडरूम में ले गए.

“शी…” इन्होंने उंगली से चुप रहने का इशारा किया और धीरे से कान में बोले, “बाहर डाल पर देखना.”

मैं ने देखा तो शरमा गई, “बड़े बेशर्म हैं आप.”

“अच्छा.”

“कितना प्यार है इन में. शिक्षा लेनी चाहिए इन से,” ऐसा कह कर मैं वहां से भाग आई.

कबूतर डरते तो हैं नहीं, फिर इन के पीछे क्यों समय नष्ट किया जाए, यह सोच कर मैं बेफिक्र सी हो गई. बारबार उठने में आलस्य सा आने लगा. अब जो थोड़ीबहुत झिझक थी, वह भी दूर हो गई. वे बड़े मजे से मेरे गेट के आसपास भी पांव के पास घूमते और शोर ऐसे मचाते जैसे पालतू हों.

कबूतरों को शांतिप्रिय पक्षी कहा जाता है, पर ऐसा नहीं है. जब यह एक जगह कब्जा कर लेते हैं, तो दूसरे को वहां झांकने भी नहीं देते. और यदि कोई दूसरा जोड़ा ऐसा दुस्साहस करता भी है, तो इन में जम कर लड़ाई होती है.

एक बार जब खिड़की खुली थी तो देखा कि एक दूसरा जोड़ा डाल पर आ गया तो उस जोड़े ने उस की ऐसी दुर्गत बनाई कि पूछो मत.

और एक दिन क्या देखती हूं कि साफ किए छोटे से बाग में छोटीछोटी डंडियां बिखरी पड़ी हैं. कुछ समझ में नहीं आया. हार कर… फेंक दीं.

देखते ही देखते कबूतर और कबूतरी ने 8-10 फेरे लगाए. वे हर बार सूखी सी डंडियां लाते और ऊपर रख कर चले जाते. मैं सोचने लगी कि आखिर क्या करेंगे यह इन का.

शाम को जब मैं ने उन्हें बताया, तो उन्हें मेरी भावभंगिमा पर हंसी आ गई. मुझे बहुत खीज हुई, “हूं, मरदों को बस हंसना आता है. नहीं बताते, न सही.”

यह तौलिया उठा कर बाथरूम में चले गए. थोड़ी देर में जब मुंहहाथ धो कर लौटे, तो बोले, “बता दूं.”

“बताना है तो बता दीजिए, नहीं तो रहने दीजिए,” मैं ने भी ऐसे कहा, जैसे मुझे दिलचस्पी न हो.

“तो खिलाओ लड्डू, तुम मौसी बनने वाली हो.”

“क्या कहा…?”

“कबूतरी तुम्हारी बहन, तो तुम मौसी नहीं बनोगी उस के बच्चों की.”

“ठेंगे से,” मैं ने अंगूठा दिखा दिया. नारी को नारी जाति से हमदर्दी हो जाती है, खासकर ऐसी स्थिति में. मैं ने उन पर कोई रुकावट नहीं डाली.

और एक दिन साहब ने फरमाया, “दो बच्चों की मौसी बन गई हो, मुबारक हो.”

“अंडे कहो न, अभी बच्चे कहां से आए. सुनो, मैं भी देख लूं.”

मैं ने खिड़की से परदा हटा कर देखा.

“अरे, क्या बचपना करती हो? ऐसी हालत में खिड़की न खोल देना,” यह बोल उठे.
मैं मन मसोस कर रह गई.

अब कबूतरी रातदिन अंडों को सेती और कबूतर दाना ले कर आता. कितनी तन्मयता थी उन में, यह देख कर ही मालूम होता है. दोनों रातदिन जुटे रहते.

मैं स्वयं कल्पना में खो गई. मैं भी मां बनूंगी. कैसा होगा वह. फिर मैं भी उसे सीने से लगा कर रखूंगी.

कभी सोचती, जब अंडों से बच्चे निकल आएंगे, तब दोनों उसे दाना खिलाएंगे, उड़ना सिखाएंगे और फिर वे भी अपने मांबाप की तरह गुटरगूं का शोर करेंगे.

रातरात भर कबूतरी अंडों को सेती और अपनी चोंच से उन डंडियों को तोड़तोड़ कर गोलाई में रखती, ताकि वे उस घेरे से निकल कर नीचे न गिर जाएं. और वह दिन भी आया, जब अंडों से दो बच्चे निकले, एक नर, एक मादा.

एक बार हम दोनों ने घर भर की सफाई की. पति पेड़ पर चढ़ कर कुछ फालतू डंडिया जो नीचे लटक रही थीं, तोड़ने लगे. मैं ने चिल्ला कर कहा, “देखो, बच्चों को तंग मत करना.”

“बहुत खयाल है मौसी को.”

“हां है. अब बताओ, कैसे हैं दोनों?” मैं अपनी जिज्ञासा को न दबा पाई.

“अरे बाबा, यहां तो बड़ी बदबू है,” पति बोले और फिर एक स्वर सुनाई दिया, “बहुुत शरारती है तू, मेरे घर में मुझे ही आंखें दिखाता है.”

“सुनो, नीचे आ जाओ. कबूतरी आ गई तो समझेगी कि इन्हें उड़ा रहे हैं, कहीं वह चोंच मार दे.” और ये तुरंत नीचे उतर आए.

इस के आगे की घटना दुखद है. मौत कितनी भयावह है, कितने रूप हैं इस के. जीवन का कठोर सत्य है यह. मैं रसोई में थी. इन की आवाज आई, “देखो, क्या हो गया?”

मैं ने देखा तो चीख निकल गई. बाहर के बरामदे में एक बच्चे को बिल्ली मुंह में उठाए सामने से गुजर गई और दूसरा नीचे मरा पड़ा था.

कबूतरी ने करुण स्वर में पुकारा, ‘गुटरगूं.’

मेरे आंसू पलकों पर जम गए. मुझे लगा, कबूतरी की आंखें नम हैं. वह उड़ गई. और थोड़ी देर बाद दोनों कबूतरकबूतरी भयभीत दृष्टि से चारों ओर देख रहे थे. दो दिन वे शायद भ्रम मिटाने के लिए आते रहे और फिर चले गए नियति के मारे.

उन दिनों मेरा जी बहुत खराब रहा. लगा, जैसे किसी निकट परिचित की मौत हो गई हो.

इस के बाद हम दोनों ने निश्चय कर लिया कि अब किसी पक्षी को अपने पेड़ पर आश्रय न लेने देंगे. भला कौन इन की रक्षा कर सकता है. मेरी कल्पनाएं बिखर गईं. मैं सहम गई. अपने होने वाले बच्चे की सुखद अनुभूतियों के बीच एक भय समा गया. ओह, काल के आगे किस की क्या बिसात. इन सब का यही परिणाम हुआ कि मैं चिड़ियों को भी उड़ाती रहती. मैं उन्हें न रहने देती और सारे दिन बाहर ‘शी… शी’ का स्वर गूंजा करता. ऊपर वाली पड़ोसनें मुझे देख कर मंदमंद मुसकराती.

एक दिन सोचा कि गीले कपड़ों को पंखे की हवा में बाहर वाले बरामदे में सुखा लूं. फुलस्पीड पर पंखा चला कर मैं बाल सुलझाने लगी. न जाने कब वही कबूतर टांड पर आ बैठा. हाथ में कंघी लिए जैसे ही मैं ने उसे देखा तो खीज उठी. और मुंह से निकला, ‘शी…शी.’

कबूतर घबरा कर जैसे ही उड़ा तो पंखे से टकरा कर पंख छितराए और नीचे जमीन पर छटपटाने लगा. मेरी चीख घुट कर रह गई. ओह, मेरे पांव में इतनी शक्ति भी नहीं रही कि दो कदम चल सकूं. सिर से पांव तक कंपकपी. कुछ क्षणों में मैं ने अपने पर काबू पाया और भाग कर पानी ले आई और जैसे ही मैं ने कबूतर के मुख में पानी की बूंदें टपकाई, वह खून के कतरे उगल कर शांत हो गया.

तभी कबूतरी डाल पर आ बैठी और चारों तरफ गरदन घुमाघुमा कर देखने लगी और नीचे जैसे ही उस ने अपने साथी को देखा, वही करुण स्वर उभरा- ‘गुटरगूं.’
प्रत्युत्तर न पा कर वह सहम गई.

उस की ऐसी दशा देख कर मेरे आंसू निकल पड़े. मन पुकार उठा, ‘यह ठीक है कि उस की मौत की जिम्मेदार मैं हूं, पर ये सब अनजाने में हुआ. तुम मुझे कोई बददुआ न देना. मैं तुम से माफी चाहती हूं.’ उस की दृष्टि को सहना मेरे बूते से बाहर था. मैं ने नजर झुकाई और वह उड़ गई.

मैं ने इन के सीने से लग कर कहा, “आज मुझे खाना खाने के लिए मजबूर न करो. मेरा मन बहुत खराब है.”

यह समझे कि मैं बुरी तरह भयभीत हो गई हूं. कई तरह से समझायाबुझाया, पर कोई सांत्वना मुझे उस घटना की चोट से उबार न सकी.

कबूतरी कई बार आती. डाल पर मैं खिड़की से देख फिर वह वैसे ही वापस हो जाती, शायद खोए हुए साथी के मिलने की आस बाकी थी.

मुझे उस पर दया आती. उस के लिए यह पेड़ कितना खराब रहा, जहां उसे अपने बच्चे, अपना पति खो देना पड़ा है.

मैं कई बार बाहर ड्राइव वे पर गेहूं के दाने रख देती. उन दोनों को दाने चुगते देख मुझे असीम संतुष्टि का आभास होता.

और एक दिन मैं मोबाइल पर मैसेज पढ़ रही थी. और कबूतरी डाल पर बैठी थी. मैं ने देखा, ऐसा लगा जैसे वह अतीत में खोई है, कितनी स्मृतियां सिमटी हैं इस घर में. काश, जो हो गया वह न होता तो वह किती सुखी और संतुष्ट होती. अचानक जैसे भूकंप आ गया. बिल्ली ने इतनी जोर से झपट्टा मारा था कि कबूतरी विरोध भी न कर सकी. बिल्ली विजय भाव आंखों से मुसकराती कबूतरी की गरदन दबाए भाग गई और मेरे मुंह से निकला, ‘उफ्फ, तेरी कहानी खत्म हो गई.’

लेकिन आज सोचती हूं, नहीं, कहानी खत्म नहीं हुई, वह आज भी ताजा है, मेरे दिलोदिमाग पर. Social Story In Hindi

Love Stories In Hindi : किताबों के लेनदेन वाली प्रेम कहानी

Love Stories In Hindi : मैंने मोबाइल में समय देखा. 6 बजने में 5 मिनट बाकी थे. सुधा को अब तक आ जाना चाहिए था,

वह समय की बहुत पाबंद थी. मेरी नजर दरवाजे पर टिकी थी. डेढ़, पौने 2 साल से यही क्रम चला आ रहा था. इस का क्या परिणाम होगा, मैं भी नहीं जानता था. फिर भी मैं सावधान रहता था. जो भी हो रहा था, वह उचित नहीं था, यह जानते हुए भी मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था.

माना कि वह मुझ पर मुग्ध थी, पर शायद मैं कतई नहीं था. मेरा हराभरा, भरापूरा संसार था. सुंदर, सुशील, गृहस्थ पत्नी, 2 बच्चे, प्रतिष्ठित रौबदाब वाली नौकरी.

15 साल के वैवाहिक जीवन में पत्नी से कभी किसी तरह की कोई किचकिच नहीं. यह अलग बात है कि कभी पल, 2 पल के लिए किसी बात पर तूतूमैंमैं हो गई हो. फिर भी अंदर से व्यवहारिक गृहस्थ कट रहा था कि अभी समय है, यहीं रुक जाओ, वापस लौट आओ.

वैसे सुधा के साथ मेरे जो संबंध थे, वे इतने छिछोरे नहीं थे कि एक झटके में तोड़े जा सकें या अलग हुआ जा सके. सब से बड़ी बात यह थी कि हम ने कभी मर्यादा लांघने की कोशिश नहीं की. हमारे रिश्ते पूरी तरह स्वस्थ और समझदारी भरे थे. कुछ हद तक मेरे बातचीत करने के लहजे और कलात्मक स्वभाव की वजह से वह मेरी ओर आकर्षित हुई थी. इस में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था.

आप से 10 साल छोटी युवती आप से जबरदस्त रूप से प्रभावित हो और आप संन्यासी जैसा व्यवहार करें, यह संभव नहीं है. मैं ने भी खुद को काबू में रखने की कोशिश की थी, पर मेरी यह कोशिश बनावटी थी, क्योंकि शायद मैं उस से दूर नहीं रह सकता था. कोशिश की ही वजह से आकर्षण घटने के बजाय बढ़ता जा रहा था. लगता था कि यह छूटेगा नहीं. उस की नौसिखिया लेखकों जैसी कहानियां को मैं अस्वीकृत कर देता, वह शरमाती और निखालिस हंसी हंस देती. फिर फटी आंखों से मुझे देखती और अपनी कहानी अपने ही हाथों से फाड़ कर कहती, ‘‘दूसरी लिख कर लाऊंगी.’’

कह कर चली जाती. हमारे बीच किताबों का लेनदेन होने लगा था. उस की दी गई किताबें ज्यादातर मेरी पढ़ी होती थीं. कुछ मुझे पढ़ने जैसी नहीं लगती थीं, मैं उन्हें वापस कर देता था.

वह मेरे अहं को झकझोरती रहती थी. शायद मैं उसे हैरान करने वाली युक्तियों से ठंडक पहुंचाता रहता था. क्योंकि मैं पुरुष था. हमारे संबंध यानी रिश्ते भले ही चर्चा में नहीं थे, पर खुसरफुसर तो होने ही लगी थी. यहां एक बात स्पष्ट कर दूं कि हमारे बीच किसी भी तरह का शारीरिक संबंध नहीं था. इस तरह के रिश्ते के बारे में हम ने कभी सोचा भी नहीं था.

सुधा से इस तरह की मैं ने कभी अपेक्षा भी नहीं की थी. न ही मेरा कोई इरादा था. उस से मेरा रिश्ता मानसिक स्तर का था. जिस तरह लोगों के बीच समान स्तर का होता है, उसी तरह मेरा और उस का बौद्धिक रिश्ता था. ऐसा शायद समाज के डर से था, पर मैं उस से रिश्ता तोड़ने से घबरा रहा था. हमारा समाज स्त्रीपुरुष की दोस्ती को स्वस्थ नजरों से नहीं देखता. यह सत्य भी है, पर ये रिश्ते स्थूल थे. धरातल के थे. यह मान लेना चाहिए कि मेरे और सुधा के बीच रिश्ते पवित्र थे. उस के मन में मेरे प्रति जो आदर था, उसे मैं सस्ते में नहीं ले सकता था. इस बात पर मुझे जरा भी विश्वास नहीं था. कल शाम उस का फोन आया, ‘‘सर, कल शाम को 6 बजे मिल सकते हैं?’’

मना करने का मन था, इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘ऐसा क्या काम है?’’

‘‘काम हो तभी मिल सकते हैं क्या सर?’’

‘‘ऐसा तो नहीं है, पर… ओके मिलते हैं, बस.’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया.

मेरे फोन रखते ही पत्नी ने पूछा, ‘‘कौन था?’’

मैं कुछ जवाब दूं, उस के पहले ही बोली, ‘‘सुधा ही होगी?’’

‘‘हां, मिलना चाहती है.’’

‘‘तुम नहीं मिलना चाहते?’’ बेधड़क सवाल. पत्नी के इस सवाल का जवाब हां या न में नहीं दिया जा सकता था.

मैं ने कहा, ‘‘डरता हूं सुरेखा, वह भी मेरी तरह लेखक बनना चाहती है. स्त्रीपुरुष का भेद किए बगैर मुझे उस की मदद करनी चाहिए, पर…’’

‘‘वह स्त्री है और सुंदर भी, इसीलिए तुम उदार बन रहे हो न? अगर ऐसा है तो घमंडी कहलाओगे.’’ कह कर पत्नी हंस पड़ी. 10वीं पास गांव की पत्नी का अलग ही रूप.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या करूं?’’

‘‘मिलने के लिए तो कह चुके हो, अब पूछ रहे हो?’’

‘‘मैं उस अर्थ से नहीं पूछ रहा, मैं पूछ रहा हूं कि उस के साथ के रिश्ते को कैसे रोकूं सुरेखा. मुझे मेरी नहीं, उस की चिंता है. उसकी अभी नईनई शादी हुई है, वह मुझ पर मुग्ध है. उस की यह मुग्धता उस के दांपत्य में आग लगा सकती है. आई एम रियली कंफ्यूज्ड सुरेखा. वह बहुत ही प्यार करने वाली है.’’

‘‘स्पष्ट और सख्ती से कह दो, तुम्हें फोन न करे. जितना हो सके, उतना दूर रहो उस से.’’ पत्नी की सलाह व्यवहारिक थी.

मेरे भीतर का व्यवहारकुशल आदमी उस की बात से सहमत था पर बवाली मन? वह नहीं चाहता था. उसे इस बात में बिलकुल विश्वास नहीं था. वह सोच रहा था, जो तुम्हें पवित्रता से चाहे, तुम्हारा आदर करे, तुम्हारी दोस्ती के बदले गर्व महसूस करे, उस का अपमान, उस की उपेक्षा ठीक नहीं. इस तरह के आदमी की फिक्र तो सामान्य आदमी भी नहीं करता, तुम तो लेखक हो. लेखक तो समाज से ऊपर उठ कर सोचता है.

उस रात नींद नहीं आई. पूरी रात करवटें बदलता रहा. दिन में औफिस के समय बेध्यान हो जाता. पौने 6 बजे डायरेक्टर से अनुमति ले कर कौफी हाउस के लिए निकल पड़ता. कौफी हाउस नजदीक ही था. मैं गाड़ी से 5 मिनट में पहुंच गया. 6 बजने में 5 मिनट बाकी थे. मैं ने 2 कप कौफी का और्डर कर दिया.

‘अभी तक आई क्यों नहीं?’ मैं ने घबरा कर मोबाइल देखा. मुझे वहां आए करीब 10 मिनट हो गए थे. कोई मुश्किल तो नहीं आ गई. आजकल के पतियों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. जबरदस्त नजर रखते हैं पत्नियों पर. मोबाइल पर रिसीव्ड और डायल्ड नंबर चैक करते हैं. वाट्सऐप और फेसबुक पर फ्रैंड लिस्ट के साथ मैसेंजर चैक करते हैं. कोई गलत संदेश तो नहीं भेज रहा.

मैं ने माथे का पसीना पोंछा. दरवाजे की तरफ देखा. खिड़की की तरफ ताका तो शाम की गुलाबी धूप छंटने लगी थी. मैं ने सामान्य हो कर बैठने की कोशिश की. आनेजाने वाले असहजता भांप सकते. आखिर 6 बज कर 10 मिनट पर सुधा आई. ब्लैक टीशर्ट और गाढ़ी नीली जींस में आकर्षक लग रही थी. मैं ने मन को लताड़ा, ‘‘तू तो कहता है कि शारीरिक आकर्षण नहीं है, मानसिक दोस्ती है तो फिर…’’

‘‘सौरी सर, आई एम लेट.’’

‘‘बैठो, मैं ने कौफी का और्डर कर दिया है.’’

‘‘थैंक्स सर, सब कुछ ठीक तो है न?’’

‘‘पर ज्यादा समय तक नहीं रहेगा.’’

वातावरण भारी हो उठा. इतना कह कर मैं चुप हो गया था. वह भी चुप थी. थोड़ी देर बाद उस ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं आप को परेशान करती हूं न? सौरी सर, न चाहते हुए भी मैं ने आप को फोन किया. बात यह है कि एक सप्ताह के लिए मैं बाहर घूमने जा रही हूं, इसलिए सोचा कि सर को…’’

‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘जी गुजरात. द्वारिकाधीश.’’

‘‘पति के साथ जा रही हो, साथ में और कौनकौन जा रहा है?’’ मैं ने पूछा.

इसी के साथ मैं ने लंबी सांस छोड़ी. बेयरा 2 कप कौफी रख गया था. एक कप अपनी ओर खिसका कर दूसरा कप उस की ओर खिसका दिया. उसे कौफी ठंडी कर के पीने की आदत थी. मैं ने अपना कप उठा कर मुंह से लगाया.

कप टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘एंजौय करने का टाइम है, करो.’’

‘‘ईर्ष्या हो रही है क्या? मैं तो वही करना चाहती हूं, जो आप को अच्छा लगे. पर पास रहती हूं तो भी आप को अच्छा नहीं लगता और दूर जा रही हूं तो भी आप को अच्छा नहीं लग रहा. आखिर मैं करूं तो क्या करूं, मर जाऊं?’’

‘‘कौफी अच्छी है.’’ कह कर मैं ने चुस्की ली.

वह वैसे ही बैठी रही. वह कौफी ठंडी कर रही थी. मैं अपनी कौफी पी गया. कप टेबल पर रख कर उस की ओर देखा. पत्नी की याद आ गई. मन में आया कि कह दूं कि यह हमारी अंतिम मुलाकात है. अब हम आगे से नहीं मिलेंगे. तुम अपने परिवार में मन लगाओ, मैं अपने परिवार के साथ खुश सुखी हूं. तुम भी अपने परिवार के साथ खुश और सुखी रहो.

अब हमारी उम्र तुम्हारे साथ फाग गाने की नहीं रही. तुम मेरी आंखों के नीचे गड्ढे देख सकती हो. फैलते रेगिस्तान जैसा मेरा सिर. अब इस की विशालता पर गर्व महसूस नहीं किया जा सकता. मेरी बदरूपता का ढिंढोरा पीटता मेरा यह पेट…यह सब तो ठीक है, पर मैं एक जिम्मेदार व्यक्ति हूं सुधा.

‘‘कुछ मंगाना है गुजरात से? नमकीन, किताबें या कुछ और?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं मंगाना.’’

‘‘कोई ख्वाहिश…मन्नत..?’’

‘‘कौन पूरी करेगा?’’

‘‘द्वारिकाधीश.’’ कहते हुए उस की आंखों में सावित्री की श्रद्धा थी.

मैं खिलखिला कर हंस पड़ा. पर उस की श्रद्धा की ज्योति जरा भी नहीं डगमगाई.

‘‘आप को हंसी आ रही है?’’ उस ने एकदम शांति से पूछा, धैर्य खोए बिना. एकदम अलग रूप. उस समय उस की आधुनिकता अदृश्य थी. मेरी नास्तिकता से वह अंजान नहीं थी. फिर भी उस का इस तरह से कहना मुझे हंसने के लिए प्रेरित कर रहा था. इस में कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था. पढ़ीलिखी महिलाओं की इस तरह की इच्छाओं को मैं हंसी में उड़ाता था.

‘‘बोलो, क्या चाहते हो?’’ वह अभी भी पहले की ही तरह गंभीर थी.

मुझे मजाक सूझा, ‘‘मांगूं?’’

उस ने आंखों से ही ‘हां’ कहा.

‘‘सुधा, तुम मुझे पसंद नहीं या तुम्हारे प्रति आकर्षण नहीं, यह कह कर मैं खुद के साथ छल नहीं करूंगा. भगवान के प्रति मुझे जरा भी श्रद्धा नहीं है, पर तुम्हारी श्रद्धा की भी हंसी उड़ाने का मुझे कोई हक नहीं है. मुझे अब कोई लालसा नहीं है. मुझे जो मिला है, वह बहुत है. पत्नी, बच्चे, प्रतिष्ठा, पैसा और…’’

‘‘…और?’’

‘‘तुम्हारी जैसी सहृदय मित्र. आखिर और क्या चाहिए? बस, मुझे तुम से एक वचन चाहिए.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हमारे बीच यह पवित्रता इसी तरह बनी रहे. हमारी इस विरल मित्रता के बीच शरीर कभी न आए. मित्रता की पवित्रता हम इसी तरह बनाए रखें. हमारे बीच नासमझी की दीवार न खड़ी हो. बोलो, यह संभव है?’’

मेरे इतना कहतेकहते उस की आंखें भर आईं. कौफी का कप खिसका कर वह बोली, ‘‘मुझ पर विश्वास नहीं है सर, आप ने मुझे बहुत सस्ती समझा. स्त्री हूं न, इसीलिए. पर चिंता मत कीजिए, मैं वचन देती हूं कि…’’

इस के बाद बची कौफी एक बार में पी कर बोली, ‘‘आप लेखक हैं. हैरानी हो रही है कि आप लेखक हो कर भी कितने कठोर हैं. लेखक तो बहुत कोमल होता है. आप की तरह पत्थर दिल नहीं.’’

मैं सन्न रह गया. शायद अस्वस्थ भी. मैं ने अपना हाथ छाती पर रख कर देखा, दिल धड़क रहा है या नहीं. Love Stories In Hindi 

Family Story : एक और कोशिश – कैसा था मोहित का बचपन

Family Story : ‘‘किसे बारबार फोन कर रहे हो मोहित, कोई परेशानी है?’’

‘‘कब से फोन कर रहा हूं मां को, उठा ही नहीं रही हैं.’’

‘‘तो पापा को लगाओ न.’’

‘‘वे भी कहां उठा रहे हैं. कैसे हैं ये लोग, उफ्फ.’’

‘‘हो सकता है दोनों कहीं बाहर घूमने या फिर किसी काम से निकले होंगे और शोरगुल में फोन की आवाज सुन नहीं पा रहे होंगे. आप चिंता मत कीजिए, मिस्ड कौल देखेंगे तो खुद ही फोन करेंगे.’’

‘‘तुम्हें तो पता है न, रचिता, कि दोनों कैसे हैं. एकदूसरे से ठीक से बात तो करते नहीं हैं, घूमने क्या जाएंगे साथ में?’’

‘‘जब से औफिस से आए हो, परेशान दिख रहे हो. कोई बात हो गई, क्या? मेरा मतलब है कि क्या कोई जरूरी बात करनी है आप को मां से? थोड़ी देर में फिर से कोशिश करना, तब तक खाना खा लो.’’

‘‘देखो, अब तो दोनों का फोन स्विच औफ जा रहा है, क्या करूं?’’

‘‘हो सकता है फोन की बैटरी चार्ज न हो. वैसे भी, पटना में बिजली की हालत अच्छी नहीं है.’’ मेरी बातों पर तो मोहित का जरा भी ध्यान नहीं था. बस, बारबार फोन लगाए जा रहे थे. ‘‘दीदी को फोन करो, मोहित.’’

जैसे ही वे दीदी को फोन करने जा रहे थे वैसे ही दीदी का फोन आ गया.

‘‘दीदी, मैं आप को ही फोन कर रहा था. देखो न, कब से मांपापा को फोन कर रहा हूं, लग नहीं रहा है. कुछ पता है आप को?’’ मोहित बकबक किए जा रहे थे और दीदी कुछ बोल ही नहीं रही थीं, ‘‘दीदी सुन रही हो?’’

‘‘तू चुप होगा तब बोलूंगी न, मैं भी कब से फोन कर रही हूं. वैसे, तुम चिंता मत करो, मोहित. तुम्हें पता तो है कि मांपापा कैसे हैं. खुद तो मस्त रहते हैं, दूसरों को टैंशन देते हैं और शुरू से तेरी आदत है बेवजह चिंता करने की, अभी सो जा, सुबह बात हो जाएगी.’’

मोहित ने सोचा शायद दीदी ठीक ही कह रही हैं. पर मम्मीपापा फोन तो उठा ही सकते थे. एक बार और लगा कर देखता हूं, सोचते हुए उस ने फिर फोन लगाया पर अब भी उन्होंने फोन नहीं उठाया.

‘‘ऐसे मत देखो, रचिता, चिंता तो होती है न,’’ लेटी हुई रचिता उसे देख रही थी तो वह झुंझला कर बोला.

‘‘मैं समझती हूं, मोहित.’’

रातभर मोहित ठीक से नहीं सोए. जब भी रात को जाग कर देखा तो जाग ही रहे थे और सुबह भी जल्दी जाग गए. मैं ने कहा, ‘‘अभी तो 4:30 ही बजे हैं, मांपापा सो रहे होंगे’’

‘‘फिर भी फोन कर के देखता हूं, रचिता.’’

मोहित का चेहरा बता रहा था कि अभी भी फोन नहीं उठा रहे थे मांपापा. ‘‘आप मौसीजी को फोन लगाओ फिर से, शायद लग जाए,’’ रचिता ने सुझाया.

‘‘हां, वही करता हूं…क्या, कब हुआ, अभी मां कहां हैं मौसी? आप मां का खयाल रखो, मैं जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करता हूं.

‘‘रचिता, देखो वही हुआ जिस का मुझे डर था, हमें कल ही निकलना पड़ेगा,’’ मोहित सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘मौसी ने क्या बोला, यह तो बताओ.’’ मोहित की बेचैनी बता रही थी कि कुछ तो हुआ है, ‘‘मोहित क्या हुआ?’’

‘‘मां मौसी के घर पर हैं. बहुत झगड़ा हुआ है मांपापा में. मां के सिर पर चोट आई है. डाक्टर को दिखा दिया है मौसी ने, अब मां ठीक हैं. ट्रेन का तत्काल का टिकट करवाते हैं, तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी न?’’

‘‘हां, मिल जाएगी, आप चिंता मत कीजिए.’’

मोहित ट्रेन में भी चुपचाप बैठे रहे. ‘‘मोहित क्या सोच रहे हो? मांपापा इतना लड़ते हैं आपस में तो कभी भी आप ने, दीदी ने, नानानानी ने या फिर मौसी ने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की? बोलो मोहित, मैं कोई बाहर की नहीं हूं. क्या मैं समझा सकती हूं उन दोनों को, मैं कोशिश कर के देखूं?’’

‘‘सब हार गए दोनों को समझासमझा कर, तुम पापा को नहीं जानती. जब कोई कुछ नहीं कर सका तो तुम क्या करोगी? जब से हम भाईबहन ने होश संभाला है तब से दोनों को लड़तेझगड़ते ही देखा है.’’

लगता है रचिता सो गई. मोहित विचारों में खो गया. रचिता क्या सोचती होगी कि कैसे घर में उस की शादी हो गई. हमारा बचपन तो जैसेतैसे ही बीता. याद है मुझे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ा करते रहते थे मांपापा दोनों और धीरेधीरे वह झगड़ा विकराल रूप धारण कर लेता था. डर के मारे हम नानी को फोन कर देते थे और जब वे सब आते, मांपापा को समझाते तो पापा उन की भी बेइज्जती कर देते थे. सो, सब ने हमारे घर आना छोड़ दिया. पापा के परिवार वालों ने भी दोनों के खराब आचरण के चलते आना छोड़ दिया. इन के झगड़ों से पड़ोसी भी परेशान रहने लगे. एक बार पेरैंटटीचर मीटिंग में दोनों का स्कूल जाना अनिवार्य था.

मेरी क्लासटीचर ने कहा, ‘मोहित पढ़ने में तो ठीक है पर स्कूल की किसी भी गतिविधि में भाग नहीं लेना चाहता. क्लास में पीछे की बैंच पर ही बैठता है. कुछ पूछती हूं तो डर जाता है. आप दोनों को जरा ज्यादा ध्यान देना होगा.’

टीचर के इतना कहते ही दोनों एकदूसरे पर आरोप मढ़ने लगे और वहीं शुरू हो गए. मैं शर्म से गड़ा जा रहा था. मैं अपनी टीचर को देख रहा था कि वे क्या सोच रही होंगी. वही दोनों को शांत करने लगीं. वे समझ गई होंगी कि मैं ऐसा क्यों हूं. रास्तेभर लड़ते रहे दोनों. एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

अपर्णा दीदी सही थीं अपनी जगह. 10वीं पास करने के बाद होस्टल चली गईं. मांपापा ने भी जिम्मेदारी से बचने के लिए होस्टल में डाल दिया. काश, मैं भी दीदी की तरह होस्टल जा पाता लेकिन डरता था कि पापा, मां को मार देंगे.

जब नानानानी का आना बंद हो गया तो मां अकसर वहां चली जाया करती थीं और कितनी बार नानाजी कहते थे कि कुछ दिन वहीं रहो. इस बात को ले कर पापा ने नाना के नाम का परचा छपवा दिया और पूरे शहर में बंटवा दिया कि नाना अपनी बेटी को मेरे प्रति भड़काते हैं और हमारा तलाक करवाना चाहते हैं.

मामा और पापा में इस बात को ले कर बहुत लड़ाई हुई थी. जब भी मैं मौसामौसी को हंसते, बातें करते देखता तो लगता था कि काश, मेरे मांपापा भी ऐसे ही होते. दीदी तो ज्यादा नहीं रहीं हमारे साथ, पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर अपने ही पसंद के लड़के के साथ शादी कर के चली गईं. इस बात के लिए भी बहुत बवाल हुआ घर में पर दीदी ने तो शुरू से वही किया जो वे चाहती थीं. अब सोचता हूं कि दीदी अपनी जगह सही थीं. शादी तो मैं ने भी अपनी पसंद की लड़की से की पर मांपापा की मरजी से.

याद है मुझे जब फूफाजी बढ़ैया के मशहूर रसगुल्ले ले कर आए थे. मैं यही मनाता रहा कि इन के सामने ये लोग शुरू न हो जाएं. जैसे ही फूफाजी गए, पापा रसगुल्ले गिनने लगे कि कितने पीस हैं और सख्त हिदायत दी कि कोई भी उन से बिना पूछे रसगुल्ला नहीं खाएगा. तब मैं बच्चा ही था करीब 10-11 साल का, बारबार फ्रिज खोलता पर खाता नहीं था, डर जो था. पर मां तो मां होती है. उन्होंने एक कटोरे में 4 रसगुल्ले निकाल कर मुझे खाने को दे दिए. उस दिन की बातें आज भी मुझे रुलाती हैं. झगड़ा तो बहुत हुआ ही, और मां को मार भी पड़ी थी.

मां भी कहां चुप बैठने वाली थीं. उन्होंने रसगुल्ले का मटका ही तोड़ दिया और गुस्से के मारे सारे रसगुल्लों को अपने पैरों से कुचल दिया और बोला, ‘लो, अब खाओ जितने खाने हैं रसगुल्ले.’ और तब पापा मां के बाल खींचते हुए कमरे में ले गए. मैं रोए जा रहा था. महल्ले वालों ने आ कर बीचबचाव किया और फिर मौसी हमें कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गई थीं. ऐसी कितनी बातें हैं जो मेरे मन में हमेशा के लिए घर कर गई हैं.

‘‘उठ गई रचिता?’’ मैं खयालों से बाहर निकल आया था.

‘‘आप सोए नहीं, तब से क्या सोच रहे हैं? सब ठीक हो जाएगा, मोहित.’’

‘‘अब क्या ठीक होगा, यही सोचता हूं कि कोई भी ऐसी सुखद याद नहीं है बचपन की जिसे सोच कर हम मुसकराएं या किसी के साथ बांटे.’’

जैसे ही हम मौसी के घर पहुंचे, मुझे देखते ही मां रो पड़ीं. सिर पर पट्टी बंधी थी. थोड़ी देर रुक कर, मां को ले कर हम अपने घर चले आए.

‘‘प्रणाम, पापा.’’

‘‘हूं.’’

ठीक से जवाब भी नहीं दिया पापा ने. एक दिन की चुप्पी के बाद मोहित ही बोले, ‘‘पापा, मैं मां को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जा रहा हूं.’’

‘‘हां, हां, ले जाओ, मेरे खिलाफ भड़का रही है मेरे ही बच्चों को, फौज बुलाई है मुझे मरवाने के लिए.’’

मोहित को पापा पर गुस्सा आया, ‘‘चुप रहिए, कब से सुन रहा हूं आप की बकबक. पता भी है कि क्या बोले जा रहे हैं आप? अपने जैसा ही समझ रखा है मुझे. पता नहीं किस भ्रम में जीते आया मैं कि एक न एक दिन आप दोनों सुधर जाओगे. पर नहीं, मैं ही गलत था. शर्म नहीं आती आप दोनों को. उम्र देखी है 70 के होने वाले हो. मुझे शर्म आती है. मेरा भी घर नहीं बसने देंगे आप लोग. वहां हम जीतोड़ मेहनत करते हैं. कभी कुछ मांगा है आप से? बस, शांति दे दीजिए हमें. तभी मैं ने मोहित का हाथ पकड़ लिया और मांपापा दोनों चुप हो कर मुझे ही देख रहे थे.’’

‘‘हफ्तेभर से परेशान हैं मोहित आप दोनों के लिए. रातरातभर ठीक से सो नहीं पा रहे हैं. जहां इन के साथीदोस्त प्रोमोशन के लिए क्याकुछ नहीं कर रहे हैं वहां आप के बेटे आप दोनों की चिंता में घुले जा रहे हैं. मैं ने देखी है इन के आंखों में वह बेचैनी आप दोनों के लिए, बहुत प्यार करते हैं मोहित आप दोनों से. मुंबई में लाखों की भीड़ में रोज ट्रेन पकड़ कर औफिस जानाआना, अगर इन्हें कुछ हो गया तो…हाथ जोड़ती हूं मत कीजिए झगड़ा, कुछ नहीं रखा है प्यार के सिवा जिंदगी में. आप को खुश होना चाहिए कि आप दोनों साथ हैं, तंदुरुस्त हैं और आप के बच्चे समझदार हैं. कभी दूसरों के घरों में झांक कर देखिए, कितनी जद्दोजेहद से अपनी जिंदगी जी रहे हैं लोग. प्लीज, आप दोनों प्यार से रहिए और कुछ नहीं चाहिए हमें.’’

अब बारी मोहित की थी, ‘‘इन्हें मत समझाओ प्यार की भाषा, मैं कहता हूं जब एकदूसरे से बनती ही नहीं है तो अलग हो जाइए न, क्या जरूरत है समाज के सामने पतिपत्नी का ढकोसला करने की. मैं वकील को फोन लगाऊं बोलिए तो.’’

‘‘मोहित, क्या कर रहे हैं आप? पापा, मेरी बात का बुरा मत मानिएगा पर इस उम्र में आ कर तो पतिपत्नी का एकदूसरे के लिए प्यार और बढ़ जाता है. आप को पता है मेरे पापा मेरी मां से बहुत प्यार करते थे. जब मेरी मां को एक लाइलाज बीमारी हो गई तो कहांकहां नहीं इलाज करवाया पापा ने. हालांकि मां फिर भी नहीं बच पाईं. आज मेरे पापा मां की यादों के सहारे ही जिंदा हैं, मां की हर वे चीजें संभाल कर रखे हैं जो मां को बहुत प्रिय थीं. काश, आज मेरी मां जिंदा होतीं तो मेरे पापा दुनिया के सब से खुश इंसान होते. आप दोनों में भी प्यार है, अगर नहीं होता तो इतने सालों तक एकसाथ नहीं रहते. बोलिए मांपापा, क्या जी पाएंगे एकदूसरे के बगैर? नहीं आएगी एकदूसरे की याद? अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिए खुद से.’’

रचिता की बातें सुन कर दोनों चुप थे. रचिता ने मां के सिर पर हाथ रखा तो उन्होंने दोनों हाथों से पकड़ लिया पर बोलीं कुछ नहीं. पिताजी न जाने कहां चले गए. थोड़ी देर में वे आए तो देखा उन के हाथ में 2 गजरे थे, उन्होंने मां के सिरहाने रख दिए और कमरे की खिड़की के पास बाहर खड़े हो कर देखने लगे. आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो अहं पिघल कर बह रहा हो.

भावविभोर हो कर रचिता को मोहित ने मातापिता के सामने ही बांहों में भर कर चूम लिया. उसे अपना वह संसार मिल गया जिसे बचपन से ढूंढ़ रहा था. Family Story

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