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Family Story in Hindi : आईना – दिखावे की शोभा कैसे बन गई यथार्थवादी?

Family Story in Hindi : आंखें फाड़फाड़ कर मैं उस का चेहरा देखती रह गई. शोभा के मुंह से ऐसी बातें कितनी विचित्र और बेतुकी सी लग रही हैं, मैं सोचने लगी. जिस औरत ने पूरी उम्र दिखावा किया, अभिनय किया, किसी भी भाव में गहराई नहीं दर्शा पाई उसी को आज गहराई दरकार क्यों कर हुई? यह वही शोभा है जो बिना किसी स्वार्थ के किसी को नमस्कार तक नहीं करती थी.

‘‘देखो न, अभी उस दिन सोमेश मेरे लिए शाल लाए तो वह इतनी तारीफ करने लगी कि क्या बताऊं…पापा इतनी सुंदर शाल लाए, पापा की पसंद कितनी कमाल की है. पापा यह…पापा वह,’’ शोभा अपनी बहू चारू के बारे में कह रही थी, ‘‘सोमेश खुश हुए और कहने लगे कि शोभा, तुम यह शाल चारू को ही दे दो. मैं ने कहा कि इस में देनेलेने वाली भी क्या बात है. मिलबांट कर पहन लेगी. लेकिन सोमेश माने ही नहीं कहने लगे, दे दो.

‘‘मेरा मन देने को नहीं था. लेकिन सोमेश के बारबार कहने पर मैं उसे देने गई तो चारू कहने लगी, ‘मम्मी, मुझे नहीं चाहिए, यह शेड मुझ पर थोड़े न जंचेगा, आप पर ज्यादा जंचेगा.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हैरान रह गई. सोमेश को खुश करने के लिए इतनी तारीफ कर दी कि वह भी इतराते फिरे.’’

भला तारीफ करने का अर्थ यह तो नहीं होता कि आप को वह चीज चाहिए ही. मुझे याद है, शोभा स्वयं जो चीज हासिल करना चाहती थी उस की दिल खोल कर तारीफ किया करती थी और फिर आशा किया करती थी कि हम अपनेआप ही वह चीज उसे दे दें.

हम 3 भाई बहन हैं. सब से छोटा भाई, शोभा सब से बड़ी और बीच में मैं. मुझे सदा प्रिय वस्तु का त्याग करना पड़ता था. मैं छोटी बहन बन कर अपनी इच्छा मारती रही पर शोभा ने कभी बड़ी बहन बन कर त्याग करने का पाठ न पढ़ा.

अनजाने जराजरा मन मारती मैं इतनी परिपक्व होती गई कि मुझे उसी में सुख मिलने लगा. कुछ नया आता घर में तो मैं पुलकित न होती, पता होता था अगर अच्छी चीज हुई तो किसी भी दशा में नहीं मिलेगी.

‘‘एक ही बहू है मेरी,’’ शोभा कहती, ‘‘क्याक्या सोचती थी मैं. मगर इस के तो रंग ही न्यारे हैं. कोई भी चीज दो, इसे पसंद ही नहीं आती. एक तरफ सरका देगी और कहेगी नहीं चाहिए.’’

शोभा मेरी बड़ी बहन है. रक्त का रिश्ता है हम दोनों में मगर सत्य यह है कि जितना स्वार्थ और दोगलापन शोभा में है उस के रहते वह अपनी बहू से कितना अपनापन सहेज पाई होगी मैं सहज ही अंदाजा लगा सकती हूं.

चारू कैसी है और उसे कैसी चीजें पसंद आती हैं यह भी मैं जानती हूं. मैं जब पहली बार चारू से मिली थी तभी बड़ा सुखद सा लगा था उस का व्यवहार. बड़े अपनेपन से वह मुझ से बतियाती रही थी.

‘‘चारू, शादी में पहना हुआ तुम्हारा वह हार और बुंदे बहुत सुंदर थे. कौन से सुनार से लिए थे?’’

‘‘अरे नहीं, मौसीजी, वे तो नकली थे. चांदी पर सोने का पानी चढ़े. मेरे पापा बहुत डरते हैं न, कहते थे कि शादी में भीड़भाड़ में गहने खो जाने का डर होता है. आप को पसंद आया तो मैं ला दूंगी.’’

कहतीकहती सहसा चारू चुप हो गई थी. मेरे साथ बैठी शोभा की आंखों को पढ़तीपढ़ती सकपका सी गई थी चारू. बेचारी कुशल अभिनेत्री तो थी नहीं जो झट से चेहरे पर आए भाव बदल लेती. झुंझलाहट के भाव तैर आए थे चेहरे पर, उस से कहां भूल हुई है जो सास घूर रही है. मौसी अपनी ही तो हैं. उन से खुल कर बात करने में भला कैसा संकोच.

‘‘जाओ चारू, उधर तुम्हारे पापा बुला रहे हैं. जरा पूछना, उन्हें क्या चाहिए?’’ यह कहते हुए शोभा ने चारू को मेरे पास से उठा दिया था. बुरा लगा था चारू को.

चारू के उठ कर जाने के बाद शोभा बोली, ‘‘मेरी दी हुई सारी साडि़यां और सारे गहने चारू मेरे कमरे में रख गई है. कहती है कि बहुत महंगी हैं और इतनी महंगी साडि़यां वह नहीं पहनेगी. अपनी मां की ही सस्ती साडि़यां उसे पसंद हैं. सारे गहने उतार दिए हैं. कहती है, उसे गहनों से ही एलर्जी है.’’

शोभा सुनाती रही. मैं क्या कहती. एक पढ़ीलिखी और समझदार बहू को उस ने फूहड़ और नासमझ प्रमाणित कर दिया था. नाश्ता बनाने का प्रयास करती तो शोभा सब के सामने बड़े व्यंग्य से कहती, ‘‘नहीं, नहीं बेटा, तुम्हें हमारे ढंग का खाना बनाना नहीं आएगा.’’

‘‘हर घर का अपनाअपना ढंग होता है, मम्मी. आप अपना ढंग बताइए, मैं उसी ढंग से बनाती हूं,’’ चारू शालीनता से उत्तर देती.

‘‘नहीं बेटा, समझा करो. तुम्हारे पापा  और अनुराग मेरे ही हाथ का खाना पसंद करते हैं.’’

अपने चारों तरफ शोभा ने जाने कैसी दीवार खड़ी कर रखी थी जिसे चारू ने पहले तो भेदने का प्रयास किया और जब नहीं भेद पाई तो पूरी तरह उसे सिरे से ही नकार दिया.

‘‘कोई भी काम नहीं करती. न खाना बनाती है न नाश्ता. यहां तक कि सजतीसंवरती भी नहीं है. अनुराग शाम को थकाहारा आता है, सुबह जैसी छोड़ कर जाता है वैसी ही शाम को पाता है. मेरे हिस्से में ऐसी ही बहू मिलने को थी,’’ शोभा कहती.

‘‘कल चारू को मेरे पास भेजना. मैं बात करूंगी.’’

‘‘तुम क्या बात करोगी, रहने दो.’’

‘‘किसी भी समस्या का हल बात किए बिना तो नहीं निकलेगा न.’’

शोभा ने साफ शब्दों में मना कर दिया. वह यह भी तो नहीं चाहती थी कि उस की बहू किसी से बात करे. मैं जानती हूं, चारू शोभा के व्यवहार की वजह से ही ऐसी हो गई है.

‘‘बस भी कीजिए, मम्मी. मुझे भी पता है कहां कैसी बात करनी चाहिए. आप के साथ दम घुटता है मेरा. क्या एक कप चाय बनाना भी मुझे आप से सीखना पड़ेगा. हद होती है हर चीज की.’’

चारू एक बार हमसब के सामने ही बौखला कर शोभा पर चीख उठी थी. उस के बाद घर में अच्छाखासा तांडव हुआ था. जीजाजी और शोभा ने जो रोनाधोना शुरू किया कि उसी रात चारू अवसाद में चली गई थी.

अनुराग भी हतप्रभ रह गया था कि उस की मां चारू को कितना प्यार करती हैं. यहां तक कि चाय भी उसे नहीं बनाने देतीं. नाश्ता तक मां ही बनाती हैं. बचपन से मां के रंग में रचाबसा अनुराग पत्नी की बात समझता भी तो कैसे.

अस्पताल रह कर चारू लौटी तो अपने ही कमरे में कैद हो कर रह गई. परेशान हो गया था अनुराग. एक दिन मैं ने फोन किया तो बेचारा रो पड़ा था.

‘‘अच्छीभली हमारे घर आई थी. मायके में सारा घर चारू ही संभालती थी. मैं इस सच को अच्छी तरह जानता हूं. हमारे घर आई तो चाय का कप बनाते भी उस के हाथ कांपते हैं. ऐसा क्यों हो रहा है, मौसी?’’

‘‘उसे दीदी से दूर  ले जा. मेरी बात मान, बेटा.’’

‘‘मम्मी तो उस की देखभाल करती हैं. बेचारी चारू की चिंता में आधी हो गई हैं.’’

‘‘यही तो समस्या है, अनुराग बेटा. शोभा तेरी मां हैं तो मेरी बड़ी बहन भी हैं, जिन्हें मैं बचपन से जानती हूं. मेरी बात मान तो तू चारू को कहीं और ले जा या कुछ दिन के लिए मेरे घर छोड़ दे. कुछ भी कर अगर चारू को बचाना चाहता है तो, चाहे अपनी मां से झूठ ही बोल.’’

अनुराग असमंजस में था मगर बचपन से मेरे करीब होने की वजह से मुझ पर विश्वास भी करता था. टूर पर ले जाने के बहाने वह चारू को अपने साथ मेरे घर पर ले आया तो चारू को मैले कपड़ों में देख कर मुझे अफसोफ हुआ था.

‘‘मौसी, आप क्या समझाना चाहती हैं…मेरे दिमाग में ही नहीं आ रहा है.’’

‘‘बस, अब तुम चिंता मत करो. तुम्हारा 15 दिन का टूर है और दीदी को यही पता है कि चारू तुम्हारे साथ है, 15 दिन बाद चारू को यहां से ले जाना.’’

अनुराग चला गया. जाते समय वह मुड़मुड़ कर चारू को देखता रहा पर वह उसे छोड़ने भी नहीं गई. 6-7 महीने ही तो हुए थे शादी को पर पति के विछोह की कोई भी पीड़ा चारू के चेहरे पर नहीं थी. चूंकि मेरे दोनों बेटे बाहर पढ़ते हैं और पति शाम को ही घर पर आने वाले थे इसीलिए हम दोनों उस समय अकेली ही थीं.

‘‘चारू, बेटा क्या लेगी? ठंडा या गरम, कुछ नाश्ता करेगी न मेरी बच्ची?’’

स्नेह से सिर पर हाथ फेरा तो मेरी गोद में समा कर वह चीखचीख कर रोने लगी. मैं प्यार से उसे सहलाती रही.

‘‘ऐसा लगता है मौसी कि मैं मर जाऊंगी. मुझे बहुत डर लगता है. कुछ नहीं होता मुझ से.’’

‘‘होता है बेटा, होता क्यों नहीं. तुम्हें तो सब कुछ आता है. चारू इतनी समझदार, इतनी पढ़ीलिखी, इतनी सुंदर बहू है हमारी.’’

चारू मेरा हाथ कस कर पकड़े रही जब तक पूरी तरह सो नहीं गई. एक प्रश्नचिह्न थी मेरी बहन सदा मेरे सामने, और आज भी वह वैसी ही है. एक उलझा हुआ चरित्र जिसे स्वयं ही नहीं पता, उसे क्या चाहिए. जिस का अहं इतना ऊंचा है कि हर रिश्ता उस के आगे बौना है.

शाम को मेरे पति घर आए तब उन्हें मेरे इस कदम का पता चला. घबरा गए वह कि कहीं दीदी को पता चला तो क्या होगा. कहीं रिश्ता ही न टूट जाए.

‘‘टूटता है तो टूट जाए. उम्र भर हम ने दीदी की चालबाजी सही है. अब मैं बच्चों को तो दीदी की आदतों की बलि नहीं चढ़ने दे सकती. जो होगा हो जाएगा. कभी तो आईना दिखाना पड़ेगा न दीदी को.’’

चारू की हालत देख कर मैं सुबकने लगी थी. चारू उठी ही नहीं. सुबह का नाश्ता किया हुआ  था. खाना सामने आया तो पति का मन भी भर आया.

‘‘बच्ची भूखी है. मुझ से तो नहीं खाया जाएगा. तुम जरा जगाने की कोशिश तो करो. आओ, चलो मेरे साथ.’’

रिश्ते की नजाकत तो थी ही लेकिन सर्वोपरि थी मानवता. हमारी अपनी बच्ची होती तो क्या करते, जगाते नहीं उसे. जबरदस्ती जगाया उसे, किसी तरह हाथमुंह धुला मेज तक ले आए. आधी रोटी ही खा कर वह चली गई.

‘‘सोना मत, चारू. अभी तो हम ने बातें करनी हैं,’’ मैं चारू को बहाने से जगाना चाहती थी. पहले से ही खरीदी साड़ी उठा लाई.

‘‘चारू, देखना तुम्हारे मौसाजी मेरे लिए साड़ी लाए हैं, कैसी है? तुम्हारी पसंद बहुत अच्छी है. तुम्हारी साडि़यां देखी थीं न शादी में, जरा पसंद कर के दे दो. यही ले लूं या बदल लूं.’’

चारू ने तनिक आंखें खोलीं और सामने पड़ी साड़ी को उस ने गौर से देखा फिर कहने लगी, ‘‘मौसाजी आप के लिए इतने प्यार से लाए हैं तो इसे ही पहनना चाहिए. कीमत साड़ी की नहीं कीमत तो प्यार की होती है. किसी के प्यार को दुत्कारना नहीं चाहिए. बहुत तकलीफ होती है. आप इसे बदलना मत, इसे ही पहनना.’’

शब्दों में सुलह कम प्रार्थना ज्यादा थी. स्नेह से माथा सहला दिया मैं ने चारू का.

‘‘बड़ी समझदार हो तुम, इतनी अच्छी बातें कहां से सीखीं.’’

‘‘अपने पापा से, लेकिन शादी के बाद मेरी हर अच्छाई पता नहीं कहां चली गई मौसी. मैं नाकाम साबित हुई हूं, घर में भी और नातेरिश्तेदारों में भी. मुझे कुछ आता ही नहीं.’’

‘‘आता क्यों नहीं? मेरी बच्ची को तो बहुत कुछ आता है. याद है, तुम्हारे मौसाजी के जन्मदिन पर तुम ने उपमा और पकौड़े बनाए थे, जब तुम अनुराग के साथ पहली बार हमारे घर आई थीं. आज भी हमें वह स्वाद नहीं भूलता.’’

‘‘लेकिन मम्मी तो कहती हैं कि आप लोग अभी तक मेरा मजाक उड़ाते हैं. इतना गंदा उपमा आप ने पहली बार खाया था.’’

यह सुन कर मेरे पति अवाक् रह गए थे. फिर बोले, ‘‘नहीं, चारू बेटा, मैं अपने बच्चों की सौगंध खा कर कहता हूं, इतना अच्छा उपमा हम ने पहली बार खाया था.’’

शोभा दीदी ने बहू से इस तरह क्यों कहा? इसीलिए उस के बाद यह कभी हमारे घर नहीं आई. आंखें फाड़फाड़ कर यह मेरा मुंह देखने लगे. इतना झूठ क्यों बोलती है यह शोभा? रिश्तों में इतना जहर क्यों घोलती है यह शोभा? अगर सुंदर, सुशील बहू आ गई है तो उस को नालायक प्रमाणित करने पर क्यों तुली है? इस से क्या लाभ मिलेगा शोभा को?

‘‘तुम, तुम मेरी बेटी हो, चारू. अगर मेरी कोई बेटी होती तो शायद तुम जैसी होती. तुम से अच्छी कभी नहीं होती. मैं तो सदा तुम्हारे अपनेपन से भरे व्यवहार की प्रशंसा करता रहा हूं. लगता ही नहीं कि घर में किसी नए सदस्य का आगमन हुआ था. अपनी मौसी से पूछो, उस दिन मैं ने क्या कहा था? मैं ने कहा था, हमें भी ऐसी ही बहू मिल जाए तो जीवन में कोई भी कमी न रह जाए. मैं सच कह रहा हूं बेटी, तुम बहुत अच्छी हो, मेरा विश्वास करो.’’

मेरे सामने सब साफ होता गया. शोभा अपने पुत्र और पति के सामने भी खुद को बहू से कम सुंदर, कम समझदार प्रमाणित नहीं करना चाहती.

दूसरी सुबह ही मैं ने पूरा घर चारू को सौंप दिया. मेरे पति ने ही मुझे समझाया कि एक बार इसे अपने मन की करने तो दो, खोया आत्मविश्वास अपनेआप लौट आएगा. बच्ची पर भरोसा तो करो, कुछ नया होगा तो उसे स्वीकारना तो सीखो. इस का जो जी चाहे करे, रसोई में जो बनाना चाहे बनाए. कल को हमारी भी बहुएं आएंगी तो उन्हें स्वीकार करना है न हमें.

चाय बनाने में चारू के हाथ कांप रहे थे. वह डर रही थी तो मैं ने उस का हौसला बढ़ाने के लिए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ कमी होगी तो हम पूरी कर लेंगे. तुम बनाओ तो सही. बनाओ, शाबाश.’’

मेरे इस अभियान में पति भी मेरे साथ हो गए थे. उन्हें विश्वास था कि चारू अच्छी हो जाएगी. शाम को घर आए तो पता चला कि 15 दिन की छुट््टी पर हैं. पूछा तो हंसने लगे, ‘‘क्या करता, आज शोभा का फोन आया था. कहती थी 2 दिन के लिए यहां आना चाहती है. उसे मैं ने टाल दिया. मैं ने कह दिया कि कल से बनारस जा रहे हैं हम, मिल नहीं पाएंगे. इसलिए क्षमा करें.’’

‘‘अच्छा? यह तो मैं ने सोचा ही न था,’’ पति की समझदारी पर भरोसा था मुझे.

‘‘अब चारू के बहाने मैं भी घर पर रह कर आराम करूंगा. चारू नएनए पकवान बनाएगी, है न बिटिया.’’

‘‘मेरी खातिर आप को कितना झूठ बोलना पड़ रहा है.’’

15 दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. सब बदल गया, मानो हमें बेटी मिल गई हो. सुबह नाश्ते से ले कर रात खाने तक सब चारू ही करती रही. मेरे कितने काम रुके पड़े थे जो मैं गरदन में दर्द की वजह से टालती जा रही थी. चारू ने निबटा दिए थे. घर की सब अलमारियां करीने से सजा दीं और बेकार सामान अलग करवा दिया.

घर की साजसज्जा का भी चारू को शौक है. फैब्रिक पेंट और आयल पेंट से हमारा अतिथि कक्ष अलग ही तरह का लगने लगा. नई सोच और नई ऊर्जा पर मेरी थक चुकी उंगलियां संतुष्ट एवं प्रसन्न थीं. काश, ऐसी ही बहू मुझे भी मिल जाए. क्या दीदी को ऐसा नहीं लगता? फिर सोचती हूं उस की उंगलियां थकी ही कब थीं जो बहू में सहारा खोजतीं. उस ने तो आज तक सदा अभिनय किया और दांवपेच खेल कर अपना काम चलाया है. मेरी बनाई पाक कला पर बड़ी सहजता से अपना नाम चिपकाना, बनीबनाई चीज और पराई मेहनत का सारा श्रेय खुद ले जाना दीदी का सदा का शौक रहा है. भला इस में मेहनत कैसी जो वह थक जाती और बहू का सहारा उसे मीठा लगता.

अनुराग का फोन अकसर आता रहता. चारू उस से बात करने से भी कतराती. पूछने पर बताने लगी, ‘‘बहुत परेशान किया है मुझे अनुराग ने भी. कम से कम इन्हें तो मेरा साथ देना चाहिए. मेरा मन नहीं है बात करने का.’’

एक दिन चारू बोली, ‘‘मौसी, मैं अपने मायके पापा के पास भाग जाना चाहती थी लेकिन डरती हूं कि पापा को मेरी हालत देख कर धक्का लगेगा. उन्हें भी तो दुखी नहीं करना चाहती.’’

‘‘इस घर को अपने पापा का ही घर समझो, मैं हूं न,’’ भावविह्वल हो कर मेरे पति बोले थे. बरसों से मन में बेटी की साध थी. चारू से इन की अच्छी दोस्ती हो गई थी. दोनों किसी भी विषय पर अच्छी खासी चर्चा कर बैठते.

‘‘बहुत समझदार और बड़ी सूझबूझ वाली है चारू, इसीलिए तुम्हारी बहन के गले में कांटे की तरह फंस गई. यह तो होना ही था. भला शोभा जैसी औरत इसे कैसे बरदाश्त करती?’’ मेरे पति बोले.

15 दिन बाद अनुराग आया और उस के सभी प्रश्नों के उत्तर उस के सामने थे. मेरे घर की नई साजसज्जा, दीवार पर टंगी खूबसूरत पेंटिंग, सोफों पर पड़े सुंदर कुशन, मेज पर सजा स्वादिष्ठ नाश्ता, सब चारू का ही तो कियाधरा था.

‘‘पता चला, मैं क्यों कहती थी कि चारू को मेरे पास छोड़ जा. कुछ नहीं किया मैं ने, सिर्फ उसे मनचाहा करने की आजादी दी है. पिछले 15 दिन से मैं ने पलट कर भी नहीं देखा कि वह क्या कर रही है. जो लड़की मेरा घर सजासंवार सकती है, क्या अपने घर में निपट गंवार होगी? क्या एक कप चाय भी वह तुम्हें नहीं पिला पाती होगी? अपनी मां का इलाज कराओ अनुराग, चारू तो अच्छीभली है. जाओ, जा कर मिलो उस से, अंदर है वह.’’

शाम तक अनुराग हमारे ही साथ रहा. घर जाने का समय आया तो हम दोनों का भी मन डूबने लगा. अपने मौसा की छाती से लग कर चारू फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘नहीं बिटिया, रोना नहीं. तुम्हारा अपना घर तो वही है न. अब तुम्हें उसी को सजानासंवारना है. जब भी याद आए, मत सोचना तुम्हारे पापा का घर दूर है. नहीं तो एक फोन ही घुमा देना, हम अपनी बच्ची से मिलने आ जाएंगे.’’

हाथ में पकड़ी सुंदर टाप्स की डब्बी इन्होंने चारू को थमा दी.

‘‘पापा के घर से बिटिया खाली हाथ नहीं न जाती. जाओ बच्ची, फलो- फूलो, खुश रहो.’’

दोनों चले गए. हम उदास भी थे और संतुष्ट भी. पूरी रात अपने कदम का निकलने वाला नतीजा कैसा होगा, सोचते रहे. सुबहसुबह इन्होंने शोभा दीदी के घर फोन किया.

‘‘दीदी, हम बनारस से लौट आए हैं. आप आइए न, कुछ दिन हमारे पास,’’ और कुछ देर इधरउधर की बात करने के बाद हंसते हुए फोन रख दिया.

‘‘सुनो, अब तुम्हारी बहन परेशान हैं. क्या उन्हें भी बुला लें. कह रही हैं, चारू अनुराग के साथ कुछ दिनों के लिए टूर पर गई थी और अब लौटी है तो मेमसाहब के रंगढंग ही बदले हुए हैं. कह रही हैं कि अपना और अनुराग का नाश्ता वह खुद ही बनाएंगी.’’

हैरान रह गई मैं, ‘‘तो क्या बहू की चुगली दीदी आप से कर रही हैं. उन्हें शर्म है कि नहीं?’’

मेरे पति खिलखिला कर हंस पडे़ थे. हमारा प्रयोग सफल रहा था. चारू संभल गई थी. अब भोगने की बारी दीदी की थी. कभी न कभी तो उसे अपना बोया काटना ही पड़ता न, सो उस का समय शुरू होता है अब.

अब अकसर ऐसा होता है, दीदी आती हैं और घंटों चारू के उसी अभिनय को कोसती रहती हैं जिस के सहारे दीदी ने खुद अपनी उम्र गुजारी है. कौन कहे दीदी से कि उसे आईना दिखाया जा रहा है, यह उसी पेड़ का कड़वा फल है जिस का बीज उस ने हमेशा बोया है. कभी सोचती हूं कि दीदी को समझाऊं लेकिन जानती हूं वह समझेंगी नहीं.

भूल जाता है मनुष्य अपने ओछे कर्म को. अपने संताप का कारण कभीकभी वह स्वयं ही होता है. जरा सा संतुलन अगर रिश्तों में शोभा भी बना लेने का प्रयास करती तो न वह कल औरों को दुखी करती और न ही आज स्वयं परेशान होती. Family Story in Hindi

Editorial : सरित प्रवाह – चीन होने की महत्ता

Editorial : चीन आज न केवल भारी मात्रा में सस्ते कंज्यूमर गुड्स बना रहा है बल्कि नई वैज्ञानिक व तकनीकी खोजें भी निरंतर कर रहा है. अमेरिकी और यूरोपीय निर्माता चीन से आज उसी तरह भयभीत हैं जैसे 5 दशकों पहले वे जापान से थे.

चीन इलैक्ट्रिक व्हीकल्स बनाने में सब से आगे है. लाखों की गिनती में बीवाईडी व अन्य चीनी ब्रैंड्स यूरोप में छा गए हैं. स्टोर तो पहले से ही चीनी कपड़ों, खिलौनों, घरेलू सामान से लदे पड़े हैं.

आम चीनी अभी भी कम सुविधाओं के साथ रह सकता है, इसलिए उन के पास बहुतकुछ बचत होनी ही है जो देश निर्माण, शिक्षा, सड़कों, विशाल भवनों आदि में निवेश हो रही है. यूरोप और अमेरिका अपनी मेहनत व नए सामान का मोटा फायदा आज ही खा जाना चाहते हैं. चीन में विवाह न करने से एक बड़ी संख्या औरतों की है जो पुरुषों के बराबर काम कर रही हैं.

चीन की विशेषता उस के यहां धर्म न होना है. उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और भारत जैसे देश अपना काफी समय व शक्ति धर्म में लगा रहे हैं. भारत में तो सारी बचत धार्मिक गंगा में बहा दी जाती है जहां वह बदबूदार गटर के साथ मिल कर हर रोज नष्ट हो रही है.

चीन की प्रयोगशालाएं दुनिया को सिखा रही हैं, दुनिया से अब वे सीख नहीं रहीं. अमेरिका और यूरोप की सवाल करने की शक्ति अब धूमिल हो गई है. चीन की आंतरिक क्षेत्रीय प्रतियोगिता उसे लगातार बढ़ने को प्रेरित कर रही है. अमेरिका में जहां पहले नए निर्माण होते थे, अब घुसपैठियों को पकड़ने या उन्हें पकड़ने से रोकने के लिए समय लगने लगा है. इमीग्रेशन एंड कस्टम एनफोर्समैंट (आइस) में लोग ज्यादा भरती किए जा रहे हैं बजाय खोजी प्रवृत्ति जगाने वाली कंपनियों में.

आइस के कारण जो नए टैलेंट दूसरे देशों से अमेरिका पहुंचे थे और अमेरिकी कंपनियों को नया बनाने की प्रक्रिया में हाथ बंटा रहे थे, आज वे कांप रहे हैं कि कब उन पर कहर टूट जाए और रंग व भाषा के आधार पर उन्हें जेल में ठूंस दिया जाए.

चीन को यह डर नहीं है. वह लगातार नई चीजें बना रहा है और इतनी तादाद में बना रहा है कि दुनिया उस की बड़ी खरीदार है.

चीन का दवाओं का नया क्षेत्र दूसरे देशों की खरबों कमाने वाली पुरानी दवा कंपनियों को खोखला कर सकता है. भारत का दवा उद्योग भी डरासहमा हुआ है लेकिन हम तो घटिया सामान बनाने में माहिर हैं और चीन से भी सस्ता सामान अफ्रीकी देशों में बेच डालेंगे.

भारत हो, अमेरिका हो या हो यूरोप, फिलहाल सब को चीन के साथ समझोते करने होंगे, चीन की शर्तों पर चलना होगा. चीन व्यापारी है, उस की व्यापार की शर्तें मानने में कुछ गलत भी नहीं है. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – फिलमोर में चर्च : लोकतंत्र की आड़

Editorial : जैसा हमारे यहां मंदिरों में बोलबाला है वैसा ही अमेरिका में चर्चों का है. रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप सिरफिरे होने के बावजूद अगर राष्ट्रपति बन पाए हैं तो चर्चों की वजह से ही.

अमेरिका में चर्चों ने किस तरह अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा है, इस का एक उदाहरण यूटा नाम के राज्य में घाटे में चल रहे शहर फिलमोर के बारे में पता चलना है. 3,000 से कम आबादी वाले इस शहर में चर्चों की भरमार है. एक है सैंट्रल बैपटिस्ट चर्च, उस के हौल में 150 लोग एकसाथ बैठ कर पास्टर के प्रवचन सुन सकते हैं. हर रविवार को सुबह 10 बजे संडे मौर्निंग वर्शिप होती है. बच्चों के लिए संडे बाइबिल स्कूल 10 बजे शुरू होता है और सप्ताह में एक बार वयस्कों को 7 बजे शाम को बाइबिल की पट्टी पढ़ाई जाती है.

ओपन डोर बैपटिस्ट चर्च भी संडे मौर्निंग के प्रवचन के लिए बुलाता है.

होली फैमिली कैथोलिक मिशन नाम का एक और चर्च कैथोलिकों के लिए है. अमेरिका में प्रोटेस्टैंटों और कैथोलिकों के अलावा दूसरे कई और सैक्ट हैं और हरेक के चर्च वहां के हर छोटेबड़े शहर में स्टारबक्स और मैक्डोनल्ड की तरह हैं.

मौरमोनों के 5 चर्च हैं ताकि किसी को डोनेशन देने के लिए ज्यादा दूर जाना न पड़े. हर चर्च में दानपात्र हैं और चैक व बैंकट्रांसफर से पैसा चढ़ाने की सुविधा उपलब्ध है.

चर्च के बिना लोग न शादी कर सकते, न बच्चे को समाज में ला सकते हैं और न ही मौत पर चार लोगों को इकट्ठा कर सकते हैं.

आबादी कितना पैसा देती है, यह गुप्त है. लेकिन तसवीरें साफ बताती हैं कि सभी चर्चों के पास खासा पैसा है. ये सभी चर्च डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक हैं. ये बाइबल प्रवचन के बाद अकसर ट्रंप प्रवचन देते हैं. उम्मीद की जाती है कि हर भक्त अपनी आय का 10 फीसदी हिस्सा चर्च को दान करे और साथ ही, चर्च के कार्यक्रमों में खर्च भी करे.

फिलमोर में 18 बैड वाला अस्पताल भी है पर समझ नहीं आता जब इतने सारे चर्चों में लोग जा रहे हैं तो वे बीमार क्यों पड़ते हैं. चर्चों में आमतौर पर प्रवाचक यही कहते है कि गौड पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा.

यह चर्चों का झमेला है जो अमेरिका को अब गहरे गड्ढे में धकेल रहा है. लोकतंत्र की आड़ में अमेरिका के चर्च और भारत के मंदिर दरअसल जनता को बहकाने व चूसने में लगे हैं. Editorial

Mira Nair and Zohran Mamdani : व्यवस्था को चुनौती देते मां बेटे

Mira Nair and Zohran Mamdani : भले ही मीरा नायर और जोहरान ममदानी के कार्यक्षेत्र अलग हों, लेकिन दोनों सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते रहते हैं. मीरा अपनी फिल्मों के माध्यम से जहां दुनिया की सोई हुई चेतना को जगाती हैं, वहीं जोहरान नीतिगत बदलावों के जरिए न्यूयौर्क के सिस्टम को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं.

हर मातापिता की इच्छा होती है कि उन का बेटा उन का नाम रोशन करे. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर फिल्मकार मीरा नायर के बेटे जोहरान ममदानी ने अमेरिका के न्यूयौर्क शहर का मेयर बन कर एक लंबी लकीर खींच दी है. आज की तारीख में जोहरान ममदानी अपनी मां मीरा नायर की सब से बड़ी शक्ति बन चुके हैं. लोग अब कहते हैं कि जोहरान ममदानी की मां हैं मीरा नायर. कुछ लोग इसे पहचान का संकट कहते हैं.

यह केवल परिचय या पहचान का बदलाव नहीं है, यह सृजन की सर्वोच्च अवस्था है. किसी भी क्रिएटिव इंसान के लिए इस से बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है कि उस की जीवंत रचना यानी कि उस का बेटा समाज की नियति लिखने लगे. पहचान में आए इस बदलाव को इस तरह से देखना होगा कि फिल्मकार मीरा नायर का काम बंद नहीं हुआ है, बल्कि उस का दायरा बढ़ गया है.

अभी तो वे अमृता शेरगिल पर ‘अमरी’ नामक फिल्म बना रही हैं, जो खुद एक विद्रोही कलाकार थीं. कुल मिला कर मां और बेटे, दोनों ही व्यवस्था को चुनौती देने की कला में माहिर हैं.

एक मां के रूप में मीरा नायर ने अन्याय के खिलाफ आवाज दी, जिसे उन के बेटे जोहरान के पास अब उस अन्याय को मिटाने की शक्ति है. लोग मीरा नायर व जोहरान के बहाने पहचान का संकट की बात कर रहे हैं, पर वे इस संयोग को नजरंदाज कर रहे हैं कि मीरा नायर ने अपनी फिल्म ‘द नेमसेक’ में जिस प्रवासी संघर्ष को दिखाया था, उन का बेटा जोहरान उसी न्यूयौर्क की असैंबली और मेयर पद को हासिल करने का संघर्ष कर दौड़ जीत चुका है.

जब किसी महान हस्ती या फिल्मकार की पहचान उन के अपने बेटे की सफलता से होने लगे तो यह न केवल उस मातापिता की जीत है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरा संदेश है. कम से कम मीरा नायर व उन के बेटे जोहरान की सफलता को केवल एक मांबेटे की सफलता की कहानी नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे सत्ता, कला और जवाबदेही के अंतर्संबंधों के रूप में देखा जाना चाहिए.

कौन हैं मीरा नायर?

मीरा नायर भारतीय सिनेमा और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जगत में एक महत्त्वपूर्ण नाम है, जो अपनी साहसी और संवेदनशील कहानियों के लिए जानी जाती हैं. लेकिन आज मीरा नायर परिवार की पहचान सिर्फ औस्कर नौमिनेटेड फिल्मों तक सीमित नहीं है. मीरा नायर जहां अपनी फिल्मों से सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती रही हैं, वहीं उन के बेटे जोहरान ममदानी न्यूयौर्क की सक्रिय राजनीति में एक नई क्रांति का चेहरा बन कर उभरे हैं.

मीरा नायर का जन्म 15 अक्तूबर, 1957 को ओडिशा के राउरकेला शहर के एक उच्च शिक्षित और सामाजिक रूप से जागरूक परिवार में हुआ था. उन के पिता अमृतलाल नायर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे और उन की मां परवीन नायर एक समाजसेवी थीं.

इस वजह से मीरा ने बचपन से ही सामाजिक मुद्दों के प्रति एक अलग दृष्टिकोण विकसित किया. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भुवनेश्वर और शिमला में पूरी की और दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से समाजशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की.

Mira Nair and Zohran Mamdani (1)
मीरा नायर के पति महमूद ममदानी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर हैं. वे राजनीति और अफ्रीकी अध्ययन के विशेषज्ञ माने जाते हैं.

इस के बाद उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्कौलरशिप मिली, लेकिन उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यह उन के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वे हमेशा अपने मन की सुनती थीं और नए अनुभवों के लिए तैयार रहती थीं.

अभिनेत्री से फिल्म निर्देशक

मीरा नायर ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत बतौर अभिनेत्री की थी. मीरा नायर ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में कालेज की पढ़ाई के दौरान नुक्कड़ नाटकों में अभिनय करते हुए कैरियर शुरू किया था. इस दौरान बैरी जौन और अमेरिकन रंगकर्मी जोसेफ चाइकिन के साथ काम किया. लेकिन जल्द ही उन की समझ में आ गया कि अभिनय उन के वश में नहीं है. वे तो फिल्म निर्देशक बन कर सामाजिक मुद्दों पर आधारित कहानियां सुना सकती हैं.

उन्होंने सब से पहले ‘जामा मस्जिद स्ट्रीट जर्नल’ नामक एक लघु फिल्म बनाई, जो दिल्ली की पुरानी गलियों पर आधारित थी. फिर अपनी दोस्त सूनी तारापोरवाला के साथ मिल कर ‘सलाम बौम्बे’ की स्क्रिप्ट लिखी. यह फिल्म मुंबई की झग्गियों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी को दर्शाती है.

‘सलाम बौम्बे’ ने न केवल भारतीय दर्शकों का दिल जीता, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी खूब प्रशंसा प्राप्त की. इसे औस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए नामांकित किया गया, जो किसी भारतीय फिल्म के लिए बड़ी उपलब्धि थी.

इस फिल्म में मीरा ने गरीबी, बच्चों की सुरक्षा और शहर की कठिनाइयों को संवेदनशीलता से दिखाया. उन की फिल्मों का हमेशा एक खास मकसद रहा है कि वे मनोरंजन के साथसाथ समाज में फैली पुरानी सोच में बदलाव लाएं. मीरा नायर की फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं.

मीरा ने की दो शादी

मीरा नायर ने अपनी जिंदगी में 2 बार शादी की. उन की पहली शादी मिच एपस्टीन से हुई थी. दोनों की मुलाकात हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में 1977 के दौरान फोटोग्राफी की क्लासेज के वक्त हुई थी. 1987 के दौरान उन का तलाक हो गया था. इस के बाद 1988 में मीरा नायर ने भारत व युगांडा के राजनीतिक वैज्ञानिक महमूद ममदानी से शादी की, जिन से उन का एक बेटा जोहरान ममदानी है. 

1988 में पहली फिल्म बनाई. 1990 में वे कान्स फिल्म फैस्टिवल में जूरी मैंबर थीं. हालांकि उन की फिल्म ‘मौनसून वेडिंग’ का एक घंटे का वीडियो फुटेज खो गया था इस के बावजूद कई अवार्ड जीत लिए. साल 2004 में चीजें बदल गईं जब वे ‘द नेमसेक’ के प्रीप्रोडक्शन में बिजी थीं.

उन्हें हैरी पौटर को निर्देशित करने का औफर मिला. इस के साथ ही ‘द और्डर औफ द फोनीयू’ और ट्वीलाइट सीरीज भी शामिल थी पर मीरा नायर ने मना कर दिया था. हालांकि, साल 2012 में उन्हें भारत सरकार ने तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया था.

माना जाता है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है और मीरा नायर ने अपने सिनेमा के माध्यम से न सिर्फ उस दर्पण को दिखाया, बल्कि उसे पत्थर मार कर तोड़ दिया ताकि पीछे की नग्न सच्चाई उजागर हो सके.

आज जब उन का बेटा, जोहरान ममदानी, न्यूयौर्क जैसे वैश्विक सत्ता केंद्र की कमान संभाल चुका है तो एक बड़ा सवाल खुदबखुद उठ रहा है कि क्या अब सिनेमाई परदे पर दिखाया गया सामाजिक विद्रोह, प्रशासनिक आदेश में बदलने वाला है?

इस तरह का सवाल उठने की सब से बड़ी वजह यह है कि मीरा नायर की फिल्मों में अकसर वह ‘असुविधाजनक सच’ होता है जिसे हम बंद कमरों में भी बोलने से डरते हैं. फिर चाहे फिल्म ‘सलाम बौम्बे’ के फटेहाल बच्चे हों या फिल्म ‘मिसी सिपी मसला’ में भारतीय प्रवासियों की जिंदगी और नस्लभेद का मुद्दा हो, या ‘कामसूत्र: प्रेम की एक कहानी’ में प्रेम, विवाह और भारतीय समाज की रूढि़यों पर सवाल उठाया गया हो, या 2016 में रिलीज फिल्म ‘क्वीन औफ कातवे’ हो, जिस में युगांडा की एक झग्गी से निकल कर शतरंज की चैंपियन बनने वाली लड़की की कहानी के जरिए महिला सशक्तीकरण का मुद्दा उठाया या फिल्म ‘मौनसून वेडिंग’ का वह ड्राइंगरूम जहां यौनशोषण का राक्षस बैठा है.

मीरा नायर ने हमेशा मौन के खिलाफ एक जंग लड़ी. 2001 में रिलीज हुई फिल्म ‘मौनसून वेडिंग’ में पारिवारिक बाल शोषण जैसा अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा उठाया.

फिल्म ‘सलाम बौम्बे’ में मीरा नायर ने गरीबी, बच्चों की सुरक्षा और शहर की कठिनाइयों को संवेदनशीलता से रेखांकित किया. फिल्म ‘मौनसून वेडिंग’ में उठाया गया मुद्दा ऐसा विषय है जिसे भारतीय समाज और मुख्यधारा के सिनेमा में अकसर पवित्र परिवार की छवि बचाने के लिए दबा दिया जाता है लेकिन मीरा नायर के साहस की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने फिल्मकार के तौर पर अपनी फिल्म में इस बात का चित्रण किया कि कैसे एक संपन्न परिवार के भीतर शोषण किया जाता है.

इस फिल्म का सब से शक्तिशाली मोड़ वह है जब रिया (शेफाली शाह) अपने परिवार के सामने अपने साथ हुए शोषण का खुलासा करती है. यह दृश्य समाज के उस डर पर प्रहार करता है जहां ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से ऐसे अपराधों पर चुप्पी साध ली जाती है.

मीरा का साहसिक कदम

बौलीवुड में शादियों को अकसर केवल नाचगाने और आदर्श रिश्तों के उत्सव के रूप में दिखाया जाता रहा है. जबकि मीरा नायर ने इस चमकधमक के पीछे छिपे पितृसत्तात्मक पाखंड और घरेलू हिंसा के काले सच को उजागर करने का साहस किया, जिसे उठाने से व्यावसायिक फिल्मकार अकसर बचते हैं. इतना ही नहीं, मीरा नायर ने तो ‘मौनसून वेडिंग’ से पहले 1996 में रिलीज अपनी फिल्म ‘कामसूत्र: अ टेल औफ लव’ (ज्ञातव्य है कि इस फिल्म को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया था) में महिला कामुकता का खुल कर चित्रण किया था, जबकि यह उस समय के सामाजिक मानदंडों के खिलाफ था. मीरा नायर के बेटे जोहरान की राजनीति को इसी ‘युद्ध’ का विस्तार माना जा सकता है.

आप खुद सोचिए, क्या यह महज संयोग है कि जिस मां यानी कि मीरा नायर ने हाशिए के लोगों को परदे पर जगह दी, उसी के बेटा न्यूयौर्क की सड़कों पर प्रवासियों के अधिकार, किफायती आवास और न्यूयार्क के टैक्सी ड्राइवरों के कर्जमाफी जैसे मुद्दों को उठाया. वे अपनी मां की तरह ही बेबाक हैं और न्यूयौर्क के एस्टोरिया क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए आम जनता की बुनियादी जरूरतों के लिए लड़ते हैं.

भले ही मीरा नायर और जोहरान के कार्यक्षेत्र अलग हों, लेकिन दोनों सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते हैं. जहां मीरा अपनी फिल्मों के माध्यम से दुनिया की सोई हुई चेतना को जगाती हैं, वहीं जोहरान नीतिगत बदलावों के जरिए सिस्टम को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं. यदि मीरा नायर व उन के बेटे जोहरान की कार्यशैली पर गहराई व गंभीरता से विचार किया जाए तो साफतौर पर नजर आता है कि यह विरासत पैसों की नहीं, सहानुभूति की है लेकिन यहां सोचने वाली बात यह है, क्या एक राजनेता उतना ही ईमानदार रह पाएगा जितना एक कलाकार होता है?

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नायर ने जहां सिनेमा के जरिए समाज की सच्चाइयों को दुनिया तक पहुंचाया है वहीं उन के बेटे जोहरान ममदानी युवाओं की आवाज बन कर राजनीति में अपनी पहचान बना रहे हैं.

मीरा नायर और जोहरान दोनों को जानने वाले लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब जोहरान सत्ता के शीर्ष पर होंगे तो क्या मीरा नायर एक फिल्म निर्देशक के तौर पर अपने बेटे की सत्ता से उसी तरह से सवाल पूछ पाएंगी, जिस तरह से अब तक अपनी फिल्मों के माध्यम से पूछती आई हैं?

क्या एक फिल्मकार की मुखरता तब भी बरकरार रहेगी जब उस का अपना ही अंश ‘सिस्टम’ का हिस्सा हो?

यह कहना बिलकुल सटीक होगा कि मीरा नायर की वैचारिक मुखरता और उन के सिनेमाई दृष्टिकोण ने जोहरान ममदानी के राजनीतिक व्यक्तित्व को गढ़ने में एक बुनियादी नींव का काम किया है. मीरा नायर की फिल्में केवल मनोरंजन का साधन कभी नहीं रहीं, बल्कि मीरा ने फिल्मों के माध्यम से सहानुभूति और सक्रियता का पाठ पढ़ाया. उन के बेटे जोहरान ममदानी ने अपनी मां की उस कलात्मक मुखरता को राजनीतिक मुखरता में तबदील कर दिया.

मीरा नायर की चर्चित फिल्में

सलाम बौम्बे : मीरा नायर की पहली फिल्म ‘सलाम बौम्बे’ 1988 में रिलीज हुई थी, जिस में सड़क किनारे जीवनयापन करने वालों को दिखाया गया है. कहानी 10 साल के कृष्णा की है, जिसे उस की मां ने छोड़ दिया है. वह मुंबई में अकेले रहने को मजबूर है. वह सड़क किनारे एक चाय की दुकान पर काम करता है और घर लौटने के लिए 500 रुपए बचाने का सपना देखता है. रास्ते में उस की दोस्ती चिल्लम (एक नशेड़ी), सोला साल (एक वेश्यालय में फंसी एक युवती), और मंजू (एक डर और उपेक्षा में जी रही एक बच्ची) से होती है.

कामसूत्र : 1997 में रिलीज फिल्म ‘कामसूत्र’ ऐतिहासिक कहानी है जो 16वीं सदी के भारत में घटित होती है. इस की कहानी एक उत्साही दासी माया और उस की शाही मालकिन तारा पर केंद्रित है. बदले की भावना से माया, तारा के होने वाले पति को बहकाती है और उसे दरबार से निकाल दिया जाता है. फिर उसे एक शिक्षक अपने साथ ले जाता है, जो उसे वेश्या बनने की कला सिखाता है. आखिरकार, वह महल लौटती है.

मानसून वेडिंग : 2001 में रिलीज फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ दिल्ली में एक पंजाबी परिवार की उथलपुथल को दर्शाती है जब वह परिवार एक भव्य अरेंज मैरिज की योजना बनाता है. बारिश से भीगे 4 दिनों में दुलहन एक गुप्त प्रेम संबंध से जूझती है, जबकि उस का पिता आर्थिक और भावनात्मक दबाव से जूझता है. यह फिल्म हास्य, संगीत, दबे हुए राज और पारिवारिक कलह का मिश्रण है.

द नेमसेक : झम्पा लाहिड़ी के बैस्टसेलिंग उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘द नेमसेक’ 2006 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म न्यूयौर्क में बंगाली प्रवासियों के घर जन्मे गोगोल गांगुली के जीवन पर आधारित है. अपने नाम से शर्मिंदा और अमेरिकी जीवन में ढलने के लिए बेताब वह अपनी जड़ों से दूर हो जाता है जब तक कि त्रासदी उसे पहचान, अपनेपन और विरासत के बोझ का सामना करने के लिए मजबूर नहीं कर देती. समान रूप से कोमल और हृदयविदारक, द नेमसेक, नायर की सब से भावनात्मक रूप से प्रभावित करने वाली फिल्मों में से एक है.

अ सूटेबल बौय : विक्रम सेठ के उपन्यास पर आधारित यह फिल्म आजादी के बाद के भारत में एक ऐतिहासिक नाटक में रूपांतरित करती है. कहानी लता पर केंद्रित है, जिस की मां उस के लिए एक ‘उपयुक्त लड़का’ ढूंढ़ने पर अड़ी है. कबीर, हरेश और अमित के बीच उलझ लता की यात्रा, नवस्वतंत्र राष्ट्र की परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष को दर्शाती है.

मां व बेटे में सच बोलने का साहस

मीरा नायर ने कभी भी विवादों या सैंसरशिप के डर से अपने विषयों को नहीं बदला. उन्होंने फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ में परिवार के भीतर के सच को उजागर किया. जोहरान ने भी यही निर्भीकता अपनी राजनीति में अपनाई. न्यूयोर्क के मेयर पद के चुनाव (2025-26) की दौड़ में वे एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में उभरे जो सत्ता के सामने कड़े सवाल पूछने और श्रमिक वर्ग की आवाज बनने से नहीं डरते.

मीरा नायर का अधूरा सपना

हर इंसान के सभी सपने पूरे नहीं होते, तो मीरा नायर के सभी सपने कैसे पूरे हो जाते. मीरा नायर को अवार्ड के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली लेकिन बौलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन और जौनी डेप के साथ ‘शांताराम’ नामक फिल्म बनाने का उन का सपना अधूरा रहा. यह फिल्म एक उपन्यास पर आधारित थी, जिसे बनाने के लिए 2008 के दौरान बातचीत शुरू हुई थी, लेकिन कभी हड़ताल तो कभी दूसरी वजह से यह फिल्म आगे नहीं बढ़ पाई और ठंडे बस्ते में चली गई. Mira Nair and Zohran Mamdani

Rental Housing Crisis : किराएदारों की मुश्किलें और बदलती शहरी व्यवस्था

Rental Housing Crisis : शहरों में किराएदारी एक अनिवार्य सामाजिक आवश्यकता बन चुकी है. रोजगार, पढ़ाई और छोटे व्यवसायों के लिए गांवों से शहरों की ओर जाने का सिलसिला जितनी तेजी से बढ़ा है, रहने की जगह ढूंढ़ना उतना ही कठिन होता गया है. प्रवासी मजदूर, कामकाजी युवकयुवतियां, छोटे परिवार और छात्र, इन सब की सब से पहली जरूरत एक कमरे या छोटे मकान की होती है परंतु यह जरूरत आज संघर्ष में बदल गई है.

बड़े शहरों में आज किराए के मकानों को सामान्यतया 4 प्रकारों में समझ जा सकता है.

पहली श्रेणी वे इलाके हैं जिन्हें सहज रूप से कैटेगरी ए कहा जा सकता है. ये वे महल्ले हैं जहां गाडि़यां खड़ी दिखती हैं, सड़कों पर साफसफाई रहती है और मकान नए, चौड़े व व्यवस्थित होते हैं. यहां किराया अधिक है. एक साधारण 2 कमरों का सैट 15-20 हजार रुपए तक में मिलता है. एक कमरे वाला अटैच्ड कमरा भी 6-7 हजार रुपए से कम में नहीं मिलता. यह सुविधा उन परिवारों या पेशेवर लोगों के लिए है जिन की आय स्थिर है.

इस के बाद आती है बी कैटेगरी, जो भारत के शहरों में सब से अधिक दिखाई देती है. ये इलाके व्यवस्थित होते हैं, मकान आमतौर पर पक्के और अधिसूचित होते हैं और आसपास की आबादी मध्यम आयवर्ग की होती है. यहां बाइकें अधिक दिखती हैं, छोटा बाजार पास ही होता है और लोग एकदूसरे को पहचानते भी हैं.

2 कमरों का सैट 7-12 हजार रुपए तक और एक कमरा 4-6 हजार रुपए तक में मिल जाता है. यही वह श्रेणी है जिस में सब से अधिक किराएदार सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट नौकरी वाले, मजदूर और छोटे व्यापारी रहते हैं.

सी कैटेगरी के इलाके थोड़े तंग परंतु किफायती हैं. यहां एक कमरा, हवापानी की सामान्य सुविधा और साधारण निर्माण मिलता है. छात्र, अकेले नौकरी करने वाले लड़केलड़कियां और कम आय वाले लोग इन इलाकों को चुनते हैं, क्योंकि 2-3 हजार रुपए में एक कमरा मिल जाता है.

Rental Housing Crisis (2)
किराए के मकान में रहते हुए आसपास के लोगों से बना कर रखने में समझदारी है. समस्या होने पर बातचीत से समाधान निकालें.

और सब से अंत में आती है डी कैटेगरी, जहां रहना अकसर मजबूरी होती है. ये वे जगहें हैं जहां गलियां बहुत संकरी होती हैं, ज्यादातर घर अनधिकृत होते हैं, बिजलीपानी की स्थिति अस्थिर रहती है और किराया भी उसी अनुसार कम होता है. कुछ सौ से 1,500-2,000 हजार रुपए में भी कमरा मिल जाता है पर सुविधाएं सीमित रहती हैं.

इन 4 श्रेणियों का यह पूरा ढांचा बताता है कि भारत में किराएदारी का बाजार कितना बड़ा और बहुस्तरीय है.

किराए का घर ढूंढ़ने का संघर्ष और डीलरों की भूमिका

शहर में कमरा ढूंढ़ना धीरेधीरे एक चुनौतीपूर्ण काम बन गया है. किराएदार के सामने पहली मुश्किल यह होती है कि कौन सा इलाका उस के बजट में आएगा और किस मकान मालिक की शर्तें वह पूरी कर सकेगा. कई बार डीलर कमरा दिखा देते हैं पर उसी कमरे को कोई अन्य किराएदार अधिक किराए पर ले जाए तो डीलर उसी समय किराया बढ़ा देता है. डीलर की फीस भी कम नहीं. अकसर एक महीने का किराया या उस का आधा, वह भी बिना रसीद के.

कई मकान मालिक किराया देने वालों को भी वर्गीकृत करते हैं, कई कहते हैं कि परिवार को देंगे, लड़कों को नहीं. कहीं लड़कियों को कमरा मिलना मुश्किल हो जाता है. कई जगह छात्रों को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है. कई मकान मालिक कालोनी की मर्यादा का हवाला दे कर अस्वीकार कर देते हैं. इस सामाजिक वर्गीकरण ने किराएदार के सामने मानसिक बोझ और बढ़ा दिया है.

इस के बाद आती है पहचानपत्र और सत्यापन की प्रक्रिया. यह प्रक्रिया आवश्यक है पर कई मकान मालिक सारा बोझ किराएदार पर डाल देते हैं. कई युवकयुवतियां पढ़ाई या नौकरी में नए होते हैं, उन्हें सत्यापन के लिए बारबार थाने जाना भी भारी लगता है.

किराएदार की चिंता बिजली, पानी और मरम्मत

किराए पर रहने वाले लोगों की सब से गंभीर शिकायत बिजली के बिल को ले कर होती है. पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों में जहां सरकार ने उपभोक्ताओं के लिए अलगअलग स्लैब तय किए हैं, अनेक मकान मालिक एक ही रेट 10 से 12 रुपए प्रति यूनिट बिना किसी हिसाबकिताब के वसूल लेते हैं. सबमीटर की रीडिंग में फेरबदल की शिकायतें भी आती रहती हैं.

पानी के मामले में भी कई जगह अतिरिक्त राशि ली जाती है. कुछ मकान मालिक मोटर चलाने का खर्च भी किराएदार से वसूलते हैं, जबकि सरकार की तरफ से जलापूर्ति पर अलगअलग सब्सिडी पहले से उपलब्ध होती है.

मरम्मत का मामला और भी पेचीदा है. सामान्यतया पाइपलाइन, टंकी, बिजली के खराब तार, टौयलेट की दिक्कतों की जिम्मेदारी मकान मालिक की होती है, लेकिन कई मालिक यह कहते हुए किनारा कर लेते हैं कि ‘जैसा कमरा देखा था, वैसा ही है, अब मरम्मत तुम्हारी जिम्मेदारी.’ मजबूरी में किराएदार खुद अपने पैसे से मरम्मत करवाता है.

कुल्लू की सीमा देवी का उदाहरण इस पूरे संकट को स्पष्ट कर देता है-

‘पाइपलाइन लीक हो गई पर मकान मालिक ने हाथ खड़े कर दिए. मरम्मत मुझे ही करवानी पड़ी.’

इस के साथ ही अचानक कमरे खाली करने का नोटिस किराएदार के लिए सब से बड़ा तनाव बन जाता है. मकान मालिक महीने के अंत से पहले भी अचानक कमरे की मांग कर लेते हैं. कई बार किराएदार नौकरी के तनाव में होता है, ऊपर से यह चिंता उसे और अस्थिर कर देती है.

पंजीकरण की स्थितिहर जगह अलग, व्यवस्था कहीं नहीं

किराएदारी की समस्या इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि देश में कोई एकीकृत पंजीकरण व्यवस्था नहीं है.

पंजाब में पुलिस स्टेशन स्तर पर सत्यापन होता है पर यह सभी जिलों में अनिवार्य नहीं.

हिमाचल में सरकारी भवनों तक ही रिकौर्ड सीमित है, निजी किराएदारों का कोई केंद्रीय डेटा नहीं.

जम्मूकश्मीर में एक विस्तृत फौर्म मौजूद है पर वहां भी प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर ही चलती है.

हरियाणा ने एक पोर्टल बनाया है, जो अपेक्षाकृत व्यवस्थित है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में ऐसा तंत्र नहीं है.

इस असंगत व्यवस्था के कारण किराएदार और मकान मालिक दोनों ही अनिश्चितता में रहते हैं.

देश के अन्य राज्यों में भी हालात कुछ अलग नहीं

दिल्ली, मुंबई, पुणे, जयपुर, कोटा, लखनऊ, भोपाल हर जगह किराएदार बिजली, पानी और मरम्मत जैसी समस्याओं से जूझते हैं. महानगरों में तो बिना लिखित समझते के अतिरिक्त राशि वसूलना आम बात है.

मुंबई और पुणे जैसे शहरों में ‘रेंटिंग ब्लैक मार्केट’ एक अलग ही व्यवस्था बन चुका है, जहां दिखाया कुछ जाता है, लिया कुछ जाता है और लिखित समझता कहीं पीछे छूट जाता है. शिकायत करने पर महीनों तक मामला चलता रहता है, इसलिए गरीब और प्रवासी लोग शिकायत दर्ज ही नहीं करवा पाते.

Rental Housing Crisis (1)
शहरों में प्रौपर्टी डीलर मकान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इन का सकारात्मक पक्ष यह है कि ये जल्दी मकान ढूंढ़ने में मदद करते हैं और इलाके की जानकारी देते हैं.

मकान मालिक की अपनी कठिनाइयां भी कम नहीं

हर विवाद के 2 पहलू होते हैं. जैसा कि किराएदार परेशान होता है, वैसा ही मकान मालिक भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करता है.

पिछले कुछ वर्षों में मकानों की निर्माण लागत बहुत बढ़ गई है सरिया, सीमेंट, ईंट, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन सब महंगे. किराया इस लागत के बराबर अब भी नहीं पहुंच पाया है. मकान मालिक के पास यदि 2 कमरे हैं और वह उन्हें किराए पर देता है तो उस से उस की लागत नहीं निकलती.

दूसरी चिंता किराया रुक जाने की होती है. कई मकान मालिक बताते हैं कि किराएदार महीनों किराया रोके रखते हैं और बाहर जाने से इनकार कर देते हैं. कोर्ट में मकान खाली कराने का मामला वर्षों तक चलता है. इस डर से कई लोग अपनी पूरी ऊपरी मंजिल किराए पर देने से बचते हैं.

इस के अलावा गलत गतिविधियों का खतरा भी रहता है. कुछ जगह देररात पार्टी, झगड़ा, शराबबाजी या अवैध गतिविधियों की शिकायतें भी आती हैं. इन सब का सीधा भार मकान मालिक पर आता है, क्योंकि पुलिस सब से पहले उसी से जवाब मांगती है.

क्या कहता है कानून?

मौडल टैनेंसी एक्ट 2021 में स्पष्ट प्रावधान हैं कि किराएदारी हमेशा लिखित समझते के साथ होनी चाहिए. सुरक्षा राशि सीमित हो, बिजलीपानी का वास्तविक बिल ही लिया जाए और विवादों के निबटारे के लिए समयबद्ध प्रक्रिया हो.

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कुछ फैसलों में मकान मालिक के अधिकारों की भी पुष्टि की है यदि किराएदार बिना अनुमति मकान का उपयोग बदल देता है तो मकान मालिक उसे बाहर कर सकता है.

समाज का रवैया और प्रवासी जीवन की असली तसवीर

कुछ घटनाएं किराएदारी के सामाजिक पहलू को भी सामने लाती हैं. होशियारपुर के न्यू दीप नगर में हुई एक घटना के बाद एक पूरी पंचायत ने फैसला किया कि वे अपने गांव में प्रवासियों को किराए पर कमरा नहीं देंगे. ऐसे निर्णय समाज को विभाजित करते हैं और उन लोगों के प्रति अविश्वास बढ़ाते हैं जो अपना घर छोड़ कर शहरों का सहारा लेते हैं.

समाधान की दिशा सरल, मानवीय और संतुलित व्यवस्था

भारत में किराएदारी को सुधारने के लिए कुछ कदम आवश्यक हैं :

एक ऐसी केंद्रीय प्रणाली जहां किराएदार और मकान मालिक दोनों का पंजीकरण हो सके.

ऐसा तंत्र जहां विवाद का समाधान महीनों नहीं, हफ्तों में हो.

बिजली और पानी के अलग मीटर अनिवार्य हों.

और सब से महत्त्वपूर्ण किराएदारों तथा मकान मालिकों दोनों को उन के अधिकार व जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से पता हों.

यदि किराएदारी व्यवस्था को बैलेंस कर के बनाया जाए तो ही किराए के लिए मकान बनेंगे और लोगों को आसानी से मकान मिल सकेंगे. सही व्यवस्था वह है जिस में लोग अपने काम की जगह के आसपास ही मकान आसानी से किराए पर ले सकें.

जब हर स्तर के होटल शहर के हर कोने में खुल सकते हैं तो किराए के मकान क्यों न मिलें. सरकारों की दखलंदाजी और अदालती देर ने मकान मालिक और किराएदार के संबंधों को लौटरी सा बना दिया है.

किराए के मकान में रहना एक व्यवस्था नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी है जो आज लाखों प्रवासी परिवारों की सच्चाई है. Rental Housing Crisis

Satirical Story In Hindi : चुरा लिया है तुम ने जो डाटा… : डिजिटल मीडिया के सफेदपोश चोर

Satirical Story In Hindi : यह हमारा साइकोलौजिकल डाटा था. सारे का सारा उन्होंने चुरा लिया. सिर्फ चुराया ही नहीं, उस का राजनीतिक इस्तेमाल भी किया. वो भारत आएं, तो हम उन से पूछेंगे कि क्या मिला उन्हें हमारा डाटा उड़ा कर? इस डाटा में यों समझिए कि हमारी जिंदगी की पूरी कहानी दर्ज थी. आप को भी इस डाटाचोरी के दर्द का एहसास हो सके, इस के लिए शब्द दर शब्द यहां पेश हैं (इसे छिपाने का अब कोई फायदा नहीं, पहले से ही उड़ाया जा चुका है) :

लड़की ने पूछा, ‘‘डू यू लव मी?’’ हम ने कहा, ‘‘औफ्कोर्स नौट…’’

उधर से जवाब आया, ‘‘चल झूठ…ठे.’’ यह डाटा उड़ा लिया गया, इस का पता हमें चुनावों में चला.

अगले दिन उस ने नया अकाउंट बना कर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. हम ने रिक्वैस्ट को मनाने से इनकार कर दिया. उस के पहले वाले अकाउंट पर लिखा, ‘‘आलिया का चेहरा लगाने से कोई फायदा नहीं. हम ने पहचान लिया है. कहीं और मुंह मारो.’’ जवाब आया, ‘‘चोट…टे…कमीने.’’

अहा, हम प्रफुल्लित हुए कि हम ने चोरी पकड़ ली. हम ने पहचान लिया था कि उधर कौन था. बाद में पता चला कि चोरी तो हमारे डाटा की हुई थी. महल्ले के चुनावों के वक्त हमारे पास सीधा संदेश पहुंचाया गया कि वोट गज्जू भैया को ही देना है वरना अपना डाटा कहीं दिखाने लायक नहीं रहोगे. हम ने डरना कहां सीखा था, लेकिन मुंह पर जवाब नहीं दिया. वोट जिसे देना था, उसे ही दिया और उस के अकाउंट पर आ कर लिख दिया, ‘‘देखना, इस दफा टुल्लूजी जीतेंगे.’’

उस ने पूछा, ‘‘काहे?’’ हम ने लिखा, ‘‘हम ने उन्हें वोट जो दिया है.’’

शाम होतेहोते हम पीट दिए गए. पीटते समय तमाम गालियों में सब से ज्यादा जोर कमीने पर था. ‘‘अपनी चलाएगा…कमीने.’’

‘‘जिसे चाहेगा, उसे वोट देना… कमीने.’’ ‘‘महल्ले का दादा है तू… कमीने.’’

‘‘और हां, घर की बहूबेटियों से सोशल मीडिया पर चैट करता है…क्यों बे, कमीने.’’ साफ था कि हमारा डाटा किसी ने चोरी कर लिया था. उन्हें पता चल गया था कि गज्जू भैया अगर हारे हैं, तो इस में हमारा भी कम योगदान न था.

इत्ता होने के बाद भी हम ने नया डाटा रिलीज किया, ‘‘ये डैमोक्रेसी है. मारमार कर मुंह सुजा दो, एक आंख फोड़ दो, लेकिन वोट उन्हें हरगिज न देंगे, जिन का तुम ने इशारा किया है.’’ इस डाटा पर भी हाथ साफ कर के हमारी दोनों मंशाएं अगले रोज पूरी कर दी गईं. सूजा मुंह और फूटी आंख देख कर डाक्टर ने पूछा, ‘‘तुम्हारा डाटा भी चोरी हुआ है क्या?’’ हम चौंके, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

‘‘इस हालत में तुम 15वें हो,’’ डाक्टर ने बताया. यह तो हद है. एक तो डाटा चोरी, ऊपर से सीनाजोरी. हम ने शपथ ली कि इस जोरजुल्म की टक्कर में सारा डाटा हमारा है. आखिरी बात हम जोर से बोल गए. डाक्टर ने आंखें तरेर कर हमारी बेशर्मी पर लानत फेंकी, ‘‘अपना डाटा संभाला नहीं जाता. दूसरों का डाटा लेने चले हैं.’’

हम ने उस दिन को कोसा जिस दिन हमारी जैसी पीढ़ी को चैट की चाट लगी थी. तब लगा न था कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमें परम और दूसरों को तुच्छ लगने वाली बातें दूसरों को परम और हमें तुच्छ लगने लगेंगी. हालत यह हो जाएगी कि हमारे तुच्छ को परम मान कर वे उस से प्रेम करने लगेंगे, उस से अपना रैम भरने लगेंगे और हम अगर उन के प्रेम को समझ कर भी न समझने का नाटक करेंगे, तो हमारा रैमनेम सत्य कर दिया जाएगा. इतना सब हो चुकने के बाद बोलचाल फिर शुरू हुई.

नया मैसेज आया, ‘‘एक चुनाव और है. जल्दी ही होगा. तब तक अपनी टांग जुड़वा लो…’’ हम ने हैरानी प्रकट की, ‘‘टांग को क्या हुआ, फूटी तो आंख थी?’’

‘‘नहीं जैसा एटिट्यूड है, उस में अगला नंबर टांग का है,’’ साफ धमकी दी गई. हम ने अकाउंट ही बंद करने की सोची. इस बारे में सिर्फ सोचा ही था, जनाब. लेकिन दूसरी धमकी आई, ‘‘खबरदार, जो अपना अकाउंट बंद किया. तुम्हारी सारी फ्रैंडलिस्ट देख रखी है हम ने. उन के डाटा में तुम्हारी सारी कारस्तानियां दर्ज हैं. सब ओपन हो जाएंगी. कहीं मुंह, आंख, टांग इत्यादि दिखाने लायक न रहोगे.’’

मरता क्या न करता. अकाउंट चालू रख कर कुछ दिनों के लिए चैट ही बंद कर दी. हफ्तेभर में नया संदेश प्रकट हुआ, ‘‘मर गए क्या? क्योंकि मरने के बाद भी इधर लोगों का अकाउंट चालू रहता है.’’

हम ने जवाब न देना बेहतर समझा. रात में ढाबे से लौटते वक्त 2 साए अगलबगल हो कर चलने लगे. एक कह रहा था, ‘पड़ोसी मुल्क में तो लोग इंसान का गोश्त भी खा जाते हैं.’

दूसरे ने कहा, ‘अपने यहां भी कहां पता चल रहा आजकल कि गोश्त किस का है? मीट है कि बीफ है?’

मैंकांप उठा. सोचने लगा कि डाटा चुराने वाले यह सब भी करने लगे हैं. धमकीवमकी तक ठीक था. एकाध बार पीट लेने में भी हर्ज न था, लेकिन अब तो बात जान पर बन आई है. यह आत्मज्ञान का दौर था. हमारी डाटेंद्रियां जाग उठीं और रैम कुलबुलाने लगा. मोबाइल औन किया तो ऐसा प्रकाश फूटा मानो साक्षात प्रकृति के दर्शन कर लिए हों. स्क्रीन पर हमारी उंगलियां सरपट दौड़ने लगीं.

पहला शब्द हम ने लिखा, ‘‘सरैंडर.’’ जवाब फौरन आया, ‘‘अक्ल आ गई.’’

हम ने लिखा, ‘‘नहीं, बात आत्मज्ञान की है. हमें संसार की, संसार के सारे डाटा की तुच्छता का एहसास हो गया है.’’ वहां से रिप्लाई आया, ‘‘हम ने पहले ही कहा था, क्या करोगे अपना डाटा छिपा कर. यों, हम से तुम्हारा कुछ छिपा थोड़े ही है.’’

‘‘सत्य वचन,’’ हम ने लिखा, फिर पूछा, ‘‘क्या आज कहीं मिलने का प्रोग्राम बन सकता है?’’ उधर से जवाब आया, ‘‘मिल तो लेंगे पर गज्जू भैय्या से मिल कर करोगे क्या. तुम्हारा वोट ही काफी है हमारे लिए.’’

हम सदमे में हैं तब से. भरोसा उठ गया है डाटागीरी से. भला कोई फेक अकाउंट बना कर उस का डाटा भी चोरी करता है क्या..

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Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : सर चीयर्स डौंट फीयर्स : जब डर गए यमराज

Satirical Story In Hindi : धरती पर धर्म की जडे़ं मजबूती से जमाने का ठेका लिए, मौडर्न संस्कृति की हिफाजत के लिए पैदा हुए तन, मन और अंधभक्तों के धन के बलबूते अनगिनत शोषणों में लीन एक आत्मा कोर्ट से बाइज्जत बरी होने के बाद ब्रह्मलोक में जाने के बजाय यमराज के दरबार में पहुंची तो यमराज उसे देख कर डर गए. सदियों से किस्मकिस्म की आत्माओं का सामना करते रहने वाले यमराज उस वक्त उस आत्मा का सामना नहीं कर पा रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे वे भीतर ही भीतर डर रहे हैं, कमजोर पड़ रहे हैं. कभी वे उस आत्मा को देख कर घबरा रहे थे तो कभी उस के साथ सच्चा सौदा करने से कतरा रहे थे. पहली बार उन्होंने महसूस किया कि वे कमजोर पड़ते जा रहे हैं.

तब पहली बार बड़ी देर बाद यमराज का कोर्ट चालू हुआ. अनगिनत शोषणों में शामिल वह आत्मा जब सिर गर्व से ऊंचा किए यमदूतों के साथ यमराज के कोर्ट में पेश हुई तो यमराज ने उस के स्वागत में अपना सिर नीचा कर लिया. यमराज ने पंचकुला में हुए हादसे से सीख लेते हुए वैसे तो यमलोक में फैसला सुनाने से पहले ही सिक्योरिटी के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे, पर फिर भी पता नहीं अब की बार उन्हें अपनी व्यवस्था पर यकीन क्यों नही रहा था? इस से पहले कि आत्मा के कल्याण की कानूनी प्रकिया शुरू होती, डरेडरे से यमराज चित्रगुप्त के कान में फुसफुसाए, ‘‘चित्रगुप्त, क्यों न इस धर्मपरायण आत्मा के केस की सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी जाए? पता नहीं क्यों आज मेरे सिर में दर्द हो रहा है.

‘‘मुझे आज पहली बार जज की कुरसी पर बैठे हुए चक्कर से आ रहे हैं. पता नहीं मुझे आज क्यों सारा यमलोक जलने का डर सता रहा है. लग रहा है, जैसे सारा यमलोक जलने को बेचैन हो.’’ ‘‘महाराज, इस आत्मा के यमलोक में हुए फैसले के बाद होने वाले दंगों की नाक में नकेल डालने के पुख्ता इंतजाम हो चुके हैं. दूसरे, यहां तो वे मरे हुए लोग हैं जो नीचे मरमर कर जीने के बाद ही पहुंचे हैं. जीतेजी जो अपने लिए नहीं लड़ सके, वे अब यहां आ कर क्या हुड़दंग मचाएंगे सर? आप कोई टैंशन न लें प्लीज.

‘‘आप बेखौफ हो कर अपना फैसला दे कर धर्मराज होने का एक बार फिर सुबूत दीजिए. हम ने कौन सा चुनाव में इस आत्मा केसमर्थकों के वोट लेने हैं या लिए हैं जो इसे सजा देने से हमें डरना है. हमें कौन से तांत्रिक हो कर लोकतांत्रिक चुनाव लड़ने हैं.’’

‘‘नहीं यार, नीचे जो हुआ उसे देख कर मेरे तो जज की कुरसी पर बैठने से पहले ही हाथपैर फूले जा रहे हैं. भूल गए अपने धर्म क्षेत्र में धर्म के रौकस्टार को जब बलात्कार से जुड़ा होने की सजा सुनाई गई थी तो उस के भक्तों ने कानून को धता बताते हुए क्याक्या किया था?’’ ‘‘महाराज, वे उन के भक्त नहीं बल्कि समर्थक थे. समर्थक और भक्त में फर्क होता है. समर्थक राजनीति में होते हैं और भक्त भक्ति की फील्ड में. पर अब वहां उलटा हो चला है. सब गड़बड़ वहीं से हो रही है.

‘‘आज राजनीति में समर्थकों की जगह भक्तों ने ले ली है और भक्ति में भक्तों की जगह समर्थकों ने. हाड़मांस का नर जब अपने को नारायण के रूप में पेश करता है तो ऐसा ही होता है प्रभु,’’ चित्रगुप्त यमराज को फैसला देने के लिए उन्हें हिम्मत दिलाते हुए उन के कान में फुसफुसाए तो यमराज ने दोबारा कहा, ‘‘पर ऐसा क्यों हो रहा है चित्रगुप्त?’’ ‘‘प्रभु, वहां नैतिकता पर अनैतिकता हावी है. जिस ने अपनी अनैतिकता को छिपाने के लिए चमत्कारी चोला पहना है वही आज समाज में असरदार है.

‘‘नैतिकता का चोला पहन कर माया से दूर रहने वाले सैकड़ों हाथों से माया जोड़ नहीं बल्कि बटोर रहे हैं. ‘‘सरकारें पिछले हादसों से सबक लेने के बजाय एकदूसरे को सबक सिखाने में जुटी हैं. औरतों की हिफाजत के दावे करने वाले यौन शोषण के केसों में चुप्पी साध रहे हैं और समर्थक अपने नकली भगवान को रो रहे हैं.

‘‘नीचे की सरकारें अपना काम करें या न, पर आप अपना काम कीजिए बस. कम से कम हमारी साख तो बची रहे. डरने की कोई बात नहीं है प्रभु. एक इश्तिहार भी कहता है कि डर के आगे जीत है.’’ ‘‘एक बार डीजीपी से फिर पूछ

लो कि सिक्योरिटी के इंतजाम सच में पूरी तरह चाकचौबंद हैं या…? वाईआरसीएफ के बल तैनात कर दिए गए हैं न?’’ यमराज ने अपनी बात रखी. ‘‘हांहां प्रभु, सब किया जा चुका है. आप बस…’’

‘‘हमारे पुलिस वाले उन के पुलिस वालों की तरह पीछे तो नहीं हटेंगे?’’ ‘‘वे आप का नमक खाते हैं सर. नमकहरामी नहीं करेंगे. कीप इट अप.’’

‘‘तो उन के पुलिस वाले क्या खाते हैं?’’ यमराज ने पूछा. ‘‘अब मेरा और दिमाग न खाओ सर. यहां सब ठीक है प्रभु. मुझ पर भरोसा करो. आप डर क्यों रहे हो? इंसाफ कीजिए.

‘‘इस आत्मा के समर्थकों के हुड़दंग पर काबू पाने के लिए आठ लोकों से सशस्त्र बल बुला लिए गए हैं,’’ चित्रगुप्त झल्लाए. ‘‘कोर्ट… शु… कोरट शु … को…’’ इतना कहते हुए यमराज का गला अचानक फिचफिच करने लगा तो चित्रगुप्त ने जेब में हाथ डालने के बाद कुछ गोलियां सी निकाल कर उन के हाथ पर रखते कहा, ‘‘प्रभु, मिक्स की गोली लो, फिचफिच दूर करो.’’

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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Satirical Story In Hindi : प्रेमिका को खुश रखने के नायाब नुस्खे

Satirical Story In Hindi : हर प्रेमी को अपनी प्रेमिका को खुश रखने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए. हर जोखिम उठाना चाहिए. कई बार प्यार की खातिर जान की बाजी भी लगानी पड़ती है. आशा का आंचल थामे रखना पड़ता है. प्रेमी को आशा करनी चाहिए कि एक न एक दिन उस की प्रेमिका उस की पत्नी अवश्य आज के जमाने में कुछ प्रेमी तो बढ़ती उम्र में भी प्यार की गोटियां जमाने में लगे रहते हैं. अपनी युवा या पक्की उम्र की प्रेमिका को रिझाने व खुश करने में लगे रहते हैं. उन को पत्नी के रूप में दिल के सिंहासन पर विराजमान करने हेतु लालायित रहते हैं. ऐसे प्रेमियों को कौन अपना दिल नहीं देना चाहेगा? हां, इन महान प्रेमियों से प्रेरणा ले कर प्रत्येक युवाप्रेमी को अपनी प्रेमिका को खुश रखने का भरपूर प्रयास करना चाहिए, तभी तो उसे अपनी जानेमन से भरपूर प्यार मिलेगा.

प्रेमिका को खुश रखने के ढेरों नुसखे मौजूद हैं. उसे अलगअलग मौकों पर अलगअलग खूबसूरत नामों से पुकारना चाहिए. जैसे माई स्वीट हार्ट, माई हार्ट बीट. हाय रूपसी, ओ मेरी हंसिनी, रूप की रानी, चांद की चांदनी, महकती कली या हुस्न परी आदि

अगर प्रेमी के दिमाग की बंजर भूमि में खूबसूरत नाम न उगते हों यानी उसे ऐसे नाम न सूझते हों, तो उसे आशिकमिजाज किसी कवि या गीतकार से मदद लेनी चाहिए. कवियों और गीतकारों को युवतियों के बहुत सुंदरसुंदर नाम सूझते हैं. ये कवि और गीतकार बेहद आशिकमिजाज यानी रोमांटिक होते हैं. सुर्ख गुलाब जैसी, तीखी भौं व बड़ीबड़ी आंखों वाली, घनी, काली जुल्फों वाली, पतले होंठों एवं पतली कमर वाली ऊंचीलंबी कोई प्रेमिका हो, तब उस के रूपसौंदर्य की प्रशंसा करना कतई मुश्किल नहीं होता. हां, एक मुसीबत अवश्य होती है कि बला की खूबसूरत प्रेमिका को खुश रखना बहुत मुश्किल होता है. फिर भी उस से प्यार पाने हेतु, उसे खुश रखने की जीतोड़ कोशिश तो करनी ही पड़ती है. अत: हिम्मत व हौसले से उसे खुश रखने में जुट जाना चाहिए.

प्रेमिका यदि खूबसूरत न हो तब भी दिल खोल कर उस के हुस्न की तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि प्रेम दिल से किया जाता है और दिल किस पर कब फिदा हो जाए कहा नहीं जा सकता. वैसे भी मुहब्बत का तकाजा है कि कद्र और तारीफ गुणों की व योग्यता की होनी चाहिए. बाहरी सुंदरता से कहीं श्रेष्ठ होती है अंदरूनी सुंदरता. बाहरी तौर पर दिखने में सुंदरसलौनी प्रेमिका किसी बात पर नाराज हो कर अपने घर वालों से या पुलिस वालों से पिटवा दे या फिर गुंडेबदमाशों से हड्डीपसली तुड़वा दे तो दिन में तारे नजर आ जाते हैं. हिंदी कवि जयशंकर प्रसाद ने कहा भी है कि कटार यदि सोने की भी हो, तो उसे अपने सीने में भोंका नहीं जा सकता. इसलिए सोने की कटार जैसी आकर्षक व सुंदर मगर स्वभाव की तीखी प्रेमिका से बहुत सावधानी से प्रेम करना पड़ता है, निभाना पड़ता है. प्रेमी का हौसला और सीना फौलाद जैसा मजबूत होना चाहिए. प्रेमी को अपनी प्रेमिका की दिल खोल कर प्रशंसा करने के अलावा बटुआ, तिजोरी खोल कर या फिर बैंक, एटीएम से रुपए निकलवा कर या क्रैडिट कार्ड का उपयोग कर प्रेमिका की प्रत्येक ख्वाहिश, फरमाइश पूरी करने की कोशिश करनी चाहिए.

कई आशिक अपनी माशूका को खुश रखने के लिए बैंकों में डाका डालते हैं. जेसीबी मशीन द्वारा एटीएम उखाड़ ले जाते हैं. जेबतराशी या चोरी करने का काम करते हैं. जेल जाने से डरते नहीं. कुछेक को तो फांसी पर चढ़ना भी कबूल होता है. शायद वे शादी के बाद की कैद या गुलामी भोगने से बचना चाहते हैं. किंतु गैरकानूनी ढंग अपना कर आशिकों को माशूकाओं की मुहब्बत, हासिल करने की अपेक्षा कानूनी व अच्छे ढंग अपनाने चाहिए. आशिक बेशक अपना जन्मदिन याद न रखे, लेकिन अपनी प्रेमिका का जन्मदिन कभी नहीं भूलना चाहिए. अपने पास पैसे न हों, तो भी किसी से उधार ले कर प्रेमिका को उस के जन्मदिन पर ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ कहते हुए कोई बढि़या उपहार भेंट करना चाहिए ताकि बदले में प्यार हासिल हो सके. माशूका के परिजनों की चिरौरीचाकरी करनी चाहिए. वे बेशक माने हुए ठग या बेईमान हों, दिल खोल कर, झूठी ही सही, उन की प्रशंसा करनी चाहिए. अब कई युवकयुवतियों के परिजन बहुत समझदारी से काम लेते हैं. वे धमकाते नहीं हैं. अदालत में प्रेमविवाह करने पर अपने युवा बेटेबेटियों को फोकट में अपना आशीर्वाद ही तो देना होता है. अत: हंसतेहंसते दे देते हैं. यों भी आजकल महगाई के कारण एक शादी पर बहुत रुपए खर्च हो जाते हैं. फिर मातापिता की खुशी व सहमति समाज की खुशी व सहमति से कहीं बढ़ कर होती है.

आपसी समझबूझ, प्यार और स्नेह से प्रेमविवाह गारंटीड सफल होते हैं. हां, फैशन और प्रेमविवाह के दौर में गारंटी की परवा करता ही कौन है? इसलिए मनचाहा प्यार पाने की कोशिश करते रहना चाहिए. खुशीखुशी प्यार बांटते व लुटाते रहना चाहिए और अपनी प्रेमिका को खुश रखना चाहिए.

VIDEO : मरीन नेल आर्ट

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