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हालिया फिल्मों की कतरनें जोड़ कर बनाई – राजा शिवाजी

Raja Shivaji Movie Review: फिल्म ‘राजा शिवाजी’ शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित है. शिवाजी महाराज पर बौलीवुड से ले कर मराठी सिनेमा में कई फिल्मों से ले कर सीरियल्स भी बने हैं. हालफिलहाल ‘तान्हाजी छावा’ में उन के कुछ ग्लिम्प्सेस दिखाए गए हैं. मराठी सिनेमा में तो ‘छत्रपति शिवाजी’ और ‘सिंहगढ़’ जैसी फिल्में पहले ही रिलीज हो चुकी हैं. कई फिल्में तो मराठा साम्राज्य के सेनापतियों पर भी बन चुकी हैं. फिर सवाल यह कि इस फिल्म की क्या जरूरत थी? और क्या यह फिल्म कुछ अलग दिखा पाती है?

आजकल पीरियोडिक फिल्में खूब बनने लगी हैं, खासकर डायरैक्टर उन कहानियों में ज्यादा रुचि ले रहे हैं जिन में धर्मों के टकराव के एंगल को भुनाया जा सके. यह फिल्म भी इसी कड़ी में है.

‘राजा शिवाजी’ की कहानी एक स्ट्रौंग हिस्टोरिकल बैकग्राउंड से शुरू होती है. फिल्म 1629 के उस दौर से शुरुआत करती है जब दक्कन में सत्ता की लड़ाई अपने चरम पर थी. शिवाजी महाराज के जन्म से पहले ही उन के नाना लखुजी जाधव (महेश मांजरेकर) की हत्या कर दी जाती है, जो कहानी को एक इमोशनल और पौलिटिकल एंगल देती है. इस घटना के बाद शाहजी राजे को मुहली संधि के लिए जबरन राजी होना पड़ता है. और उन के पत्नी व बच्चों के साथ विस्थापन का दौर शुरू होता है. यहीं से फिल्म यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि शिवाजी का जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है, लेकिन यही शुरुआत आगे चल कर बहुत ‘डायरैक्ट’ और ओवरसिंप्लिफाइड हो जाती है.

फिल्म के शुरुआती हिस्से में सल्तनतों की आपसी सियासत दिखाई गई है, जिस में शाहजहां (फरदीन खान), बाजीपुर के शासक आदिल शाही (अमोल गुप्ते), सूबेदार शाहजी (सचिन खेड़ेकर) को ले कर खींचतान चलती है. यह वाला पार्ट ध्यान खींचने लायक है. कहानी तेजी से शिवाजी के बचपन और मां जिजाऊ के प्रभाव की ओर बढ़ती है. जिजाऊ (भाग्यश्री) को ऐसी मां के रूप में दिखाया गया है जो शिवाजी के मन में ‘स्वराज’ का बीज बोती हैं.

समस्या यह है कि बचपन से ही शिवाजी को एक ‘चुने हुए नायक’ या कहें ‘मसीहा’ की तरह दिखाया गया है, उन का अपना मानवीय संघर्ष कम दिखाया गया है, बस चीजें होती दिखा दी गई हैं. ‘स्वराज’ का विचार फिल्म के केंद्र में तो होता है, मगर स्वराज क्या है, बस, डायलौग कहलवा कर निबटा दिया गया है. शिवाजी महाराज के बारे में जितना पढ़नेलिखने में मौजूद हो पाया है, उस में समझ आता है कि वे छापामार रणनीति से युद्ध जीता करते थे. इसे मराठी में ‘गनिमी कावा’ कहा जाता है. इस का मतलब, सीधी लड़ाई से बचना, दुश्मन को थकाना और सही मौके पर अचानक हमला करना. इस के अलावा किलों के नैटवर्क और खुफिया तंत्र में भी वे मजबूत थे.

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे शिवाजी का बड़ा भाई संभाजी भोसले (अभिषेक बच्चन) को अफजल तोप से मार देता है. हालांकि, इस का उल्लेख सीधासीधा कहीं मिलता नहीं है. वहीं शिवाजी की मां अफजल को मार गिराने का वचन लेती है. फिल्म के पहले भाग तक चीजें बहुत तेजी से चलती है. लेकिन दूसरे भाग में कहानी का पूरा फोकस शिवाजी महाराज के अफजल खान (संजय दत्त) के साथ संघर्ष तक सीमित हो जाता है. अफजल खान को एक खतरनाक और क्रूर जनरल के रूप में पेश किया गया है, जो शिवाजी को खत्म करने के लिए निकलता है. फिल्म के अंत में दोनों के बीच राजनीतिक मुलाकात होती है जहां वाघनख से शिवाजी अफजल खान को मार देते हैं. यह हिस्सा थिएटर में तालियां जरूर बटोरता है लेकिन अगर आप इतिहास की बारीकियों की उम्मीद रखते हैं, तो यह काफी सतही लगता है.

शिवाजी महाराज के जीवन के कई अहम पड़ाव, जैसे किलों का निर्माण, प्रशासनिक सोच, मुगलों के साथ जटिल संबंध आदि सब को या तो बहुत जल्दीजल्दी निबटा दिया गया है या पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है. यहां तक कि फिल्म में मुगलों या विदेशी शासकों के खिलाफ हिंदू सैंटिमैंट को दिखाया गया है मगर यह नहीं बताया गया है कि शिवाजी के कार्यकाल में लगभग एकतिहाई सैनिक मुसलिम थे, कुछ तो सेनापति तक थे. दूसरे हाफ में यही कमजोरी और साफ दिखती है. फिल्म बारबार एक ही पैटर्न फौलो करती है, खतरा आता है, शिवाजी भाषण देते हैं, युद्ध होता है, जीत मिलती है. इस दोहराव की वजह से कहानी में नया कुछ महसूस नहीं होता और दर्शक धीरेधीरे थकने लगता है.

फिल्म में अधिकतर किरदार मराठी सिनेमा या कहें कि महाराष्ट्रियन ही हैं. रितेश देशमुख का परफौर्मेंस कहानी को पूरी तरह संभाल नहीं पाता. वे कई जगह ठीक लगते हैं, लेकिन जब कहानी को उन के कंधों पर आगे बढ़ना होता है, तो वे उतना असर नहीं छोड़ पाते. इस के उलट, बाजीपुर की बड़ी बेगम की भूमिका में विद्या बालन कमाल की दिखती हैं. फिल्म में सलमान खान का कैमियो भी दिया गया है, जिस में वह अफजल खान के अंगरक्षक को तब मार डालता है जब वह शिवाजी को लगभग मारने ही वाला होता है. यह एंट्री ताली बजाने वाली बन पड़ी है. सलमान खान ने इस में शिवाजी के अंगरक्षक जीवा महाले की भूमिका निभाई है. महाले पौराणिक संदर्भों में निचले तबके के माने जाते रहे.

फिल्म का अंत अफजल के खात्मे पर होता है, यानी संभावना है कि आगे इस का दूसरा पार्ट आएगा, जिस में मुगल सल्तनत से संघर्ष का जिक्र हो. बात करें फिल्म के ऐक्शन सीन की, तो बहुत ही औसत दर्जे के हैं. अभिषेक बच्चन जमता भी है पर रितेश बहुत फीका लगता है. रितेश ने भरसक ऐक्टिंग करने की कोशिश की है. संजय दत्त सिलसिलेवार तरह से अपनी पिछली फिल्मों वाले जोन में ही हैं, लगता नहीं उन्हें डायरैक्टर कुछ अलग रोल देना चाह रहे हों. पूरी फिल्म कई फिल्मों की कतरनें जोड़ कर बनाई गई लगती है.

फिल्म के वीएफएक्स तो निहायत ही खराब हैं. हाथी और भैंसों वाला सीन तो बिलकुल नकली दिखाई देता है. फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर, खासकर अजयअतुल का काम कहानी को ऊंचा उठाने की कोशिश करता है. कई सीन सिर्फ म्यूजिक की वजह से प्रभावी लगते हैं, वरना उन में उतनी ताकत नहीं होती. वहीं विजुअल्स और सिनेमेटोग्राफी, जिन से बहुत उम्मीद थी, औसत लगते हैं. फिल्म का बजट 100 करोड़ रुपए बताया जा रहा है, मगर उस हिसाब से काम दिखता नहीं है. Raja Shivaji Movie Review

 

 

महिला बनती मोहरा

Women Reservation Bill: साठसत्तर सालों से हिंदूहिंदू, हिंदू राष्ट्र, हिंदू आस्था, हिंदू अस्मिता आदि कहकह कर भारतीय जनता पार्टी ने देश के मंदिरों के लिए धर्म से मोटी कमाई का एक बड़ा साधन तो बना ही दिया वहीं, पौराणिक युग और मध्यकाल के राजाओं की तरह, इसी धर्म को खुद के लिए उस ने देश की सत्ता पर काबिज होने का भी साधन बना लिया.

संसद में महिला आरक्षण कानून के लिए विशेष अधिवेशन बुलाया जाना भी इसी कुत्सित कड़ी की एक और चाल है कि जिस से महिलाओं के बहाने उन के ज्यादा से ज्यादा वोट अपने पक्ष में पक्के किए जा सकें, साथ ही, जनता पर लोकतंत्र, विचारों की स्वतंत्रता, काम की स्वतंत्रता, नए निर्माणों आदि की जगह अलोकतांत्रिक, अंधविश्वासी और पाखंडी शासन थोपा जा सके.

संसद में पेश किया गया महिला आरक्षण संशोधन बिल दरअसल पौराणिक राजाओं की तरह का काम था जिस में एक ने अपनी पत्नी के अपहरण के बदले अपने विरोधी से युद्ध किया और दूसरे ने अपनी संयुक्त पत्नी के अपमान के बदले अपने चचेरे भाइयों से युद्ध किया. पौराणिक कहानियों को ऐतिहासिक तथ्य मानते हुए आज भी उन्हीं के नाम पर सिर फोड़े जा रहे हैं और देश की शिक्षित, कर्मठ महिलाओं को बराबरी की जगह धर्मकर्म और पतिपरमेश्वर की सेवा के  लिए उत्साहित किया जा रहा है. महिला आरक्षण संशोधन बिल की एक भी पंक्ति ऐसी नहीं कि जिस से आम महिलाओं को जरा सा भी कोई नया अतिरिक्त अधिकार आज या भविष्य में कभी मिलता.

राजनीति में और ज्यादा महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की चेष्टा को तब सच माना जाता जब उस के सांसदों और विधायकों में से आधी महिलाएं होतीं और वे महिलाओं पर बढ़ते जुल्मों का विरोध कर रही होतीं. संसद में ट्रेजरी बैंच, सत्ता पक्ष, आगे बैठने वालों में आखिर कितनी औरतें हैं? भाजपाशासित किस राज्य की मुख्यमंत्री महिला है जो अपने दमखम पर नेता बनी हो? भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों, विधायकों और नेताओं का उपयोग तो केवल तब किया जाता है जब विपक्ष की सरकार हो और उसे किसी मामले में नीचा दिखाना हो.

संसद में 50 फीसदी सीटें बढ़ा कर एकतिहाई को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का भाजपाई प्रस्ताव वैसा ही नाटक है जैसा हर प्रवचन में महिलाओं के लिए एक अलग इलाका नियत कर दिया जाता है और उन्हें अपने पति, पिता, ससुर, बेटे के साथ तक नहीं बैठने दिया जाता. संसद में जब भी कभी औरतों को आरक्षण मिलेगा, वहां चुपचाप बैठने वाली औरतों का ही जमावड़ा होगा. यह संशोधन प्रस्ताव शुरू से ही बहकाने की नीयत से लाया गया था ताकि भाजपा अपने मंचों से कह सके कि वह तो महिलाओं को ज्यादा आरक्षण देना चाहती है पर विपक्ष नहीं देना चाहता. Women Reservation Bill

 

बालिग का मौलिक अधिकार

Women Rights: प्रेम और स्वतंत्रता दो चीजें हैं जो भारतीय पौराणिक पाखंडी समाज को बिलकुल अच्छी नहीं लगतीं. इसलिए नहीं कि इन में इस समाज को कोई हानि होती है बल्कि इसलिए कि इस समाज वालों की दलाली पर फर्क पड़ता है. गंगायमुना के तथाकथित पूजापाठी राज्य उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के जैतपुर पुलिस स्टेशन में 18 साल से बड़ी एक लड़की के पेरैंट्स ने एफआईआर दर्ज कराई कि उन की बेटी ने एक शादीशुदा व्यक्ति के साथ रह कर अनैतिक अपराध किया है, उसे गिरफ्तार किया जाए.

गनीमत है कि भारतीय संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हुए हाईकोर्ट के न्यायाधीश जे जे मुनीर और तरुण सक्सेना ने न केवल पुलिस को इस जोड़े को गिरफ्तार करने पर पाबंदी लगाई बल्कि परिवार द्वारा दोनों को परेशान न किया जाए, यह दायित्व भी पुलिस को सौंपा. भारतीय संविधान अपने अनुच्छेद 21 के तहत हर बालिग को अपने अनुसार जीने का मौलिक अधिकार देता है. नया भगवाई आपराधिक कानून -भारतीय न्याय संहिता- भी चाह कर इस स्वतंत्रता को छीन नहीं पाया. अपराध तभी है जब जबरदस्ती किसी लड़की का अपहरण किया जाए, उस की मरजी के खिलाफ या उसे किसी धोखे में रख कर उस के साथ रहा जाए. यहां लड़की ने खुल कर अपनी इच्छा एक विवाहित पुरुष के साथ रहने की व्यक्त की.

जो पुराण औरतों को बहलाफुसला कर, उन्हें अपहरण कर के, नीति के बिना संतानों, कितने ही पुरुषों और कितनी ही स्त्रियों के शारीरिक संबंधों की कहानियों से भरे हों, उन का हवाला दे कर समाज में नैतिकता को थोपना हमारे दोगलेपन की निशानी ही है जिस में हम ही क्या, हर धर्म माहिर है.

असल में हर धर्म ने स्त्रीपुरुष संबंधों पर कुछ उस तरह का पहरा लगा रखा है जैसा आजकल ईरान ने खाड़ी के संकरे रास्ते स्ट्रेट औफ होर्मुज पर लगा रखा है. धार्मिक अनुमति हो तो ही संबंध बना सकते हैं जबकि औरतों को तो यह अनुमति हरगिज नहीं है. वे धर्म की चौखट पर पहले खड़ी हों तब प्रेम, विवाह या संबंध बनाएं. हां, हर धर्म ने एक विशाल संख्या उन बेचारी औरतों की छोड़ रखी है जो इसे पेशा मानने को मजबूर हैं. इन स्त्रियों को कुछ पैसे दे कर सारे धार्मिक सनातनी तिलक लगा कर, तावीज टोपी आदि पहन कर भोग सकते हैं.

उच्च न्यायालय का फैसला कोई नया नहीं है, वह संविधान के 1950 से दिए गए अधिकारों को दोहराता है. अंगरेजों ने अपना जो इंडियन पीनल कोड बनाया था उस में भी इस तरह के मरजी से बनाए संबंधों को अपराध नहीं माना था. अंगरेजों के आने से पहले घर की लड़की का किसी भी से संबंध बना लेने का मतलब था उस की मौत ताकि परिवार की सामाजिक इज्जत बची रहे. अफसोस यह है कि औरतों को मिले इस अधिकार को छीनने में जब पुरुषों और धर्म के ठेकेदारों की भीड़ जुटती है तो उस में औरतें भी शामिल होती हैं, वे औरतें भी जिन्होंने अपनी जवानी में चोरीछिपे न जाने क्याक्या गुल खिलाए थे. Women Rights

 

कूटनीति या कूट-नीति

Indian Foreign Policy: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध को रुकवाने व सुलह करवाने की बातचीत करने के लिए इसलामाबाद को चुने जाने से भारत की विदेश नीति और कूटनीति का बाजा बज गया है. पिछले कई सालों से भारतीय मीडिया और विदेशों में बसे भारतीय मूल के कट्टर हिंदू व वहां की राजनीति में सक्रिय लोग यह साबित करने की कोशिश में लगे थे कि पाकिस्तान को आतंकवादी, अस्थिर, बिखरा हुआ गरीब देश साबित किया जा सके.

भारत के नरेंद्र मोदी ने सोचा था कि अमेरिका और इजराइल ईरान के विरुद्ध तैयारी कर रहे हैं तो वे इजराइल के माध्यम से अमेरिका पर प्रभाव डाल कर डोनाल्ड ट्रंप से अमेरिकी कस्टम ड्यूटियों में कुछ राहत पा लेंगे. उन्हें अपने को ‘विश्वगुरु’ बन जाने का गुमान कुछ ज्यादा ही था और वे यह साबित करने में लगे थे कि विदेशों में भारत की असली पहचान कराने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं.

बिना इंग्लिश समझे, बिना विश्व राजनीति या इतिहास का ज्ञान रखे, बिना विदेशों की सभ्यताओं की समझ रखे कूटनीति को समझना आसान नहीं है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेशों में न केवल घूम चुके थे, उन्होंने उन के तौरतरीके समझे, उन के इतिहास को पढ़ा, उन की भाषा समझ, उन के युवा व वरिष्ठ नेताओं से संपर्क भी साधे थे.

सिर्फ भारतीय मूल के ऊंची जातियों के विदेशों में बसे और सफल धर्मांध लोगों की भीड़ में हाथ हिलाने, गले लगने और फोटो खींच कर समझना कि उस देश पर सिक्का जमा लिया है जहां भारतीयों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है, नितांत मूर्खता है.

पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले से ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से संबंध बनाए हुए थे और पड़ोसी होने के नाते उन के ईरान से भी अच्छे संवाद थे, चीन से भी और सऊदी अरब से भी. क्षेत्र व अर्थव्यवस्था के मामले में भारत बड़ा है लेकिन कूटनीति के मामले में पाकिस्तान छोटा नहीं है. और, जब से बंगलादेश में उस की पैठ दोबारा हुई है उस की विदेश नीति और मजबूत हो गई है.

ईरान और अमेरिका को युद्धविराम के लिए सहमत कराने में पाकिस्तान ने पूरे 35-36 दिन मेहनत की जबकि भारत में अकेले विदेश विभाग संभाल रहे नरेंद्र मोदी को चुनाव आयोग और केरल व पश्चिम बंगाल के चुनावों की फिक्र थी. पाकिस्तान न केवल बाजी मार ले गया, वह तीसरा विश्वयुद्ध रुकवाने का ‘मैडल’ पाने का श्रेय भी लंबे समय तक के लिए झपट ले गया है. भारत की कूटनीति तो आजकल कूट-नीति सी हो कर रह गई है. शांति अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई पर बीच में अभी भी पाकिस्तान ही है, नरेंद्र मोदी कहीं नहीं.

 

Hindi Story: जीवन की डाटा एंट्री

Hindi Story: इधरउधर नजरें घुमा कर अनंत देसाई ने आफिस का मुआयना किया. उन्होंने आज ही अखबार के आधे पृष्ठ का रंगीन विज्ञापन देखा था. डेल्टा इन्फोसिस प्राइवेट लिमिटेड का नाम इस विज्ञापन में देख कर और उस की बारीकियां पढ़ कर देसाईजी ने चैन की सांस ली थी कि चलो, बेटे रोहित का कहीं तो ठिकाना हो सकता है. नौकरियां नहीं हैं तो क्या इस एम.एन.सी. (मल्टीनेशनल कंपनी) कल्चर ने रोजीरोटी के कुछ और रास्ते निकाल ही दिए हैं. उन से बेटे का हताशनिराश चेहरा अब और नहीं देखा जा रहा था.

रोहित एम.सी.ए. करने के बाद एक कंप्यूटर कंपनी की सेल्स मार्केटिंग में लगा हुआ था. सुबह 8 बजे का निकला रात के 8 बजे ही घर आ पाता था. धूप हो, बारिश हो या तबीयत खराब हो, वह छुट्टी की बात सोच भी नहीं सकता था, उस पर वेतन 2,500 रुपए. अपने जहीन बेटे की जिदंगी को 2,500 रुपए में गिरवी पड़ी देख कर अनंत देसाई को भारी छटपटाहट होती थी. उन्होंने एक दिन गुस्से में कहा भी था, ‘‘यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते?’’

रोहित ने लाचारी से आंखें उठाई थीं, ‘‘यह नौकरी छोड़ भी दूं तो करूंगा क्या? आप तो देख रहे हैं कि 2 वर्ष से लिखित परीक्षा पास कर के भी साक्षात्कार में मात खा रहा हूं. नौकरी हथिया लेता है कोई सिफारिशी लड़का या लड़की.’’

‘‘उच्च तकनीकी शिक्षा ले कर भी बाजार में नौकरी के लिए मारेमारे घूमते हो यह मुझ से देखा नहीं जाता है.’’

‘‘पापा, और रास्ता भी क्या है?’’ कह कर रोहित मायूस हो गया था.

अभी उसे नौकरी करते 5 महीने ही बीते थे कि रोहित बारबार बीमार पड़ने लगा जिस का असर उस के काम पर भी पड़ रहा था. इस से पहले कि

कंपनी वाले उसे नौकरी से निकाल देते उस ने नौकरी छोड़ दी. इस के बाद से ही रोहित ने अपने को कमरें में बंद कर लिया. न घूमने निकलता, न दोस्तों से मिलता. मम्मी कभी जबरन उसे टेलीविजन के सामने बैठा देतीं तो उस की आंखें टीवी के परदे पर स्थिर हो जातीं लेकिन ध्यान कहीं और भटकता रहता.

अनंत देसाई ने रोजगार समाचार के अलावा अन्य अखबार भी मंगाने शुरू कर दिए थे. वह रोहित के लिए नौकरियों के विज्ञापन को लाल स्याही के घेरे में तो ले लेते लेकिन एक भी नौकरी जीवन के घेरे में नहीं आ पा रही थी. पितापुत्र दोनों डेल्टा इन्फोसिस के कार्यालय की शानोशौकत से प्रभावित बैठे थे. यू आकार के काउंटर के पीछे 2 लड़के व 1 लड़की मुस्तैदी से काम कर रहे थे. दाईं तरफ बने एक केबिन को देख कर अनंत देसाई ने सोचा इस में जरूर डायरेक्टर नीलेश याज्ञनिक बैठे होंगे.

रिसेप्शन के गुदगुदे सोफे पर पहलू बदलते हुए अनंत देसाई ने धीमे से बेटे से कहा, ‘‘आफिस तो अच्छा है.’’

रोहित ने सिर हिला कर समर्थन किया. थोड़ी देर में चपरासी ने झुक कर कहा, ‘‘आप लोगों को सर बुला रहे हैं.’’

उन के अंदर आते ही नीलेश ने बड़ी गर्मजोशी से उन का स्वागत किया और दोनों से हाथ मिलाया. अनंत देसाई ने सीधे ही बता दिया, ‘‘देखिए, डाटा एंट्री के बारे में मैं थोड़ाबहुत जानता हूं. मैं अपने बेटे के लिए कोई काम ढूंढ़ रहा हूं. आप ने जो विज्ञापन दिया था उस के बारे में विस्तार से बताइए.’’

‘‘जरूर’’ नफासत से कंधे उचकाते हुए नीलेश ने कहना शुरू किया, ‘‘आजकल विदेशों में बड़े होटलों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के पास समय नहीं है इसलिए वे अपनी स्केन फाइल के दस्तावेज बनवाने के लिए हमारे पास भेजते हैं. आप ने शायद ओबलौग इ लाइब्रेरी का नाम सुना होगा?’’ नीलेश ने सीधे ही उन की आंखों में देख कर पूछा.

न जानते हुए भी उन के मुंह से ‘हां’ निकला तो नीलेश ने कहा, ‘‘बस, वही हमारे सब से बड़े क्लाइंट हैं.’’

‘‘आप का यह पहला आफिस है?’’

‘‘नहीं, हमारे मुंबई और दिल्ली में भी आफिस हैं. वहां की प्रगति देख कर मैं ने सोचा कि एक आफिस यहां भी खोला जाए.’’

‘‘मेरा बेटा डाटा एंट्री का काम करना चाहता है. इस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’

‘‘डाटा एंट्री करने वाले कंप्यूटर आपरेटर कहलाते हैं. इन से हम 2,500 रुपए सिक्योरिटी मनी के रूप में लेते हैं. वे यह काम घर बैठ कर भी कर सकते हैं.’’

‘‘जी, इस काम से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?’’

‘‘अजी साहब, अभीअभी तो यह काम शुरू हुआ है पर जो विदेशी कंपनियां भारत को काम दे रही हैं वे यहां के प्रतिभावान लोगों को अपने देश में भी बुला सकती हैं.’’

‘‘पहले काल सेंटर व ट्रांसक्रिप्शन का ऐसा ही शोर मचा था. कुछ काल सेंटर तो बंद भी हो गए.’’

‘‘उन के प्रबंधक नाकाबिल रहे होंगे. बड़े शहरों में तो अभी भी धड़ल्ले से काल सेंटर चल रहे हैं. मुझे कोई जल्दी नहीं है, आप सोच लीजिए. वैसे मेरे पास इतना काम है कि मैं 400 लोगों को काम दे सकता हूं.’’

अनंत देसाई ने फौरन कहा, ‘‘मैं 2,500 रुपए अभी देना चाहता हूं.’’

‘‘धन्यवाद, आप इस काम की पूरी जानकारी यहां के मैनेजर सोमी से ले लीजिए और उन्हीं के पास रुपए जमा कर दीजिए.’’

केबिन से बाहर आ कर उन्होंने देखा बाईं तरफ लकड़ी के केबिन के बाहर नेमप्लेट लगी थी ‘सोमी’.

देसाई और रोहित कुरसियां खींच कर सोमी के सामने बैठ गए. देसाई ने उन से कहा, ‘‘मैं अपने बेटे रोहित की सिक्योरिटी फीस देना चाहता हूं पर उस से पहले मैं यह शंका दूर करना चाहता हूं कि जो लोग यह काम करेंगे उन्हें पैसा किस हिसाब से मिलेगा.’’

‘‘देखिए, बहुराष्ट्रीय कंपनी हमें किसी फर्म की स्केन फाइल भेजती है. मान लीजिए उस में देख कर कोई आपरेटर 1 हजार करेक्टर यानी लैटर्स टाइप करता है तो हम उसे एक शब्द मान कर पेमेंट करेंगे. अभी यह कंपनी नई है इसलिए एक शब्द के लिए 6 रुपए देगी पर बाद में यह पैसा बढ़ा कर 20 रुपए प्रति शब्द कर देगी.’’

‘‘यह काम तो अमेरिका में भी हो सकता था.’’

‘‘हां, हो तो सकता था किंतु वहां महंगा बहुत है. वहां उन्हें प्रति शब्द 2 डालर यानी कि 90 रुपए देने होते हैं. भारत में कमीशन देने के बाद भी उन्हें यह सस्ता पड़ता है और हां, साइज के हिसाब से भी टाइपिंग पेमेंट होगी.’’

अनंत देसाई प्रभावित हो गए और तुरंत ही रोहित का सिक्योरिटी फार्म भरकर 2,500 रुपए जमा कर दिए. 10 रुपए के स्टांप पेपर पर मैनेजर ने अपने व याज्ञनिक के हस्ताक्षर करवा कर उन्हें दे दिए.

उस दिन अपने आफिस के काम में देसाई का मन नहीं लग रहा था. इस समय कंप्यूटर खरीदने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी क्योंकि साल के अंदर ही शिखा की शादी करनी थी लेकिन अब तो कंप्यूटर खरीदना ही है, चाहे किसी भी हालत में. रोहित के चेहरे की हताशा को किसी तरह पोंछना ही होगा. जब से उन्होंने एक बेरोजगार युवक की आत्महत्या की बात पढ़ ली थी तब से दिल में एक डर सा बैठ गया था. घर की दशा को देखते हुए रोहित उन्हें बारबार समझा चुका था कि कोई पुराना कंप्यूप्टर ले लेना चाहिए लेकिन वह जिद पर अड़े थे कि बहुराष्ट्रीय कंपनी का मामला है, हर चीज उसी के स्तर की होनी चाहिए.

कंप्यूटर आते ही जैसे रोहित की जिदंगी में पंख निकल आए थे. वह 5-6 घंटे बैठ कर टाइप करता और जैसे ही काम पूरा होता वह दस्तावेज डेल्टा इन्फोसिस प्रा.लि. को दे आता. सोमी उसे तुरंत ही भुगतान कर देते. याज्ञनिक तो अकसर टूर पर बाहर रहते थे.

2 माह में ही रोहित ने अच्छीखासी रकम कमा ली. तब घर के कोनेकोने में जैसे खुशी की तरंगें मचलने लगी थीं. रोहित की मां बेटे की टाइपिंग स्पीड देख कर निहाल थीं लेकिन पिता की नजर बहुत दूर तक देख रही थी. उन्हें सपने में भी किसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी का बोर्ड नजर आता रहता जिस के पारदर्शी कांच के अंदर बैठे अपने बेटे का मुसकराता चेहरा देख कर वह खिल जाते थे. इसी सपने को पूरा करने के लिए वह याज्ञनिक से मिलना चाहते थे लेकिन अनेक शहरों में फैले काम की वजह से उन का यहां आना कम होता था. सोमी से उन्होंने कह रखा था कि जैसे ही याज्ञनिक साहब आफिस आएं उन्हें तुरंत खबर करें.

याज्ञनिक के शहर में आने की खबर पाते ही वह एक किलो मिठाई का डब्बा ले कर उन से मिलने चल दिए.

मिठाई का डब्बा थोड़ी आनाकानी के बाद लेते हुए याज्ञनिक मुसकराए, ‘‘देसाईजी, इस की क्या जरूरत थी?’’

‘‘साहब, यह मिठाई मैं नहीं एक पिता दे रहा है. आप ने मेरे बेटे के चेहरे की हंसी वापस लौटा दी है. वह आप के यहां का काम करते हुए प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है.’’

‘‘बहुत खूब, इस शहर के डाटा आपरेटरों में वही सब से होनहार है.’’

‘‘रियली,’’ कहते हुए देसाई की आंखों में सुदूर देश के किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के आफिस में लगी हुई बेटे की नेमप्लेट कौंध गई.

तभी नीलेश याज्ञनिक के मोबाइल की घंटी बज उठी. मोबाइल पर क्या बातें हुईं यह अनंत देसाई की समझ में नहीं आया लेकिन नीलेश के चेहरे की खुशी देख कर वह यह तो समझ गए कि कोई अच्छी खबर है.

मोबाइल का स्विच बंद करते ही उन्होंने बेहद गर्मजोशी से देसाई से हाथ मिलाया और उत्साह से कहा, ‘‘देसाई, आप की यह मिठाई मेरे लिए शुभ समाचार लाई है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अभी बताता हूं,’’ यह कह कर नीलेश ने घंटी दबा दी. कुछ पल बाद ही चपरासी आ कर खड़ा हो गया तो वह बोले, ‘‘गोपीराम, भाग कर आफिस में सभी के लिए बटरस्काच आइस्क्रीम लाओ.’’

‘‘ऐसी भी क्या खुशखबरी है जी?’’ अनंत देसाई ने पूछा.

‘‘यों समझिए कि एक माह से रुका पड़ा साढ़े 12 करोड़ रुपए का भुगतान हो गया है. इस पैसे के कारण दिल्ली और मुंबई के आपरेटरों का पेमेंट रुका हुआ था. कितना बुरा लगता है जब हमारे आपरेटर काम करते हैं और हम समय से उन्हें भुगतान नहीं दे पाते. अब मैं उन्हें भुगतान दे सकता हूं.’’

तीसरे दिन ही नीलेश ने आपरेटरों की एक मीटिंग रखी, ‘‘मैं सोच रहा हूं कि काम इतना बढ़ रहा है कि हर 3 दिन बाद आप लोगों को भुगतान करने में सोमी साहब परेशान हो जाते हैं तो क्यों न आप लोगों के काम के हिसाब से 15 या 30 दिन में भुगतान कर दिया करें. अब इस कंपनी का अकाउंट यहां केलोटस बैंक में है. आप चाहें तो इस की जांच कर लें. हम अब चेक से भुगतान करेंगे. अब आप लोग निर्णय लें कि आप 15 दिन भुगतान चाहते हैं या एक माह बाद?’’

आपरेटरों ने आपस में विचार कर 15 दिन बाद भुगतान लेने की बात पर सहमति जता दी. अगले माह के दोनों चेकों का बैंक ने भुगतान किया लेकिन उस के बाद के चेक बाउंस होने लगे. जब शोर मचने लगा तो सोमी ने समझाया, ‘‘हम इतना बड़ा आफिस ले कर बैठे हैं. कहीं भाग जाने वाले नहीं हैं? लीजिए, आप लोग याज्ञनिक सर से बात कर लीजिए.’’

सोमी ने तुरंत ही उन के मोबाइल का नंबर डायल किया और उन से बात कर के बोले, ‘‘सर, कह रहे हैं कि रोहित को फोन दो.’’

रोहित ने फोन पर कहा, ‘‘सर, हमारे चेक बाउंस हो रहे हैं.’’

‘‘देखो, एक बैंक की एल.सी. में कुछ स्पेल्ंिग की गलती है, उसे वापस भेजा है. जब दूसरी एल.सी. आएगी तब पैसा जमा होगा, तब आप लोगों का भुगतान हो जाएगा. सिक्योरिटी के लिए आप चेक लेते जाइए. एकसाथ भुगतान हो जाएगा.’’

‘‘ओ, थैंक्स, सर, आप ने हमारा संदेह दूर कर दिया.’’

रोहित ने अपने साथियों को इस बातचीत के बारे में बताया.

‘‘खैर, पेमेंट कहां जाएगा,’’ एक दादा टाइप लड़के ने कहा, ‘‘यदि पेमेंट नहीं दिया तो इस आफिस का फर्नीचर बेच कर अपना पैसा ले लेंगे.’’

इस तरह 3 महीने बीत गए. सभी आपरेटरों का गुस्सा सीमा पार करने लगा. अपने सामने मुसीबत खड़ी देख सोमी ने मोबाइल पर नीलेश और रोहित के बीच बात करा दी.

‘‘आप की एल.सी. पता नहीं कब जमा होगी. अब कोई आपरेटर इंतजार करने के लिए तैयार नहीं है,’’ रोहित जोर से चिल्लाया.

तभी दादा टाइप उस लड़के ने रोहित के हाथ से फोन छीन लिया और दहाड़ा, ‘‘सर, यदि कल तक हमें पेमेंट नहीं मिली तो हम सब आप के आफिस का सामान बेच कर अपना पैसा वसूल करेंगे.’’

‘‘ओ भाई, ऐसा मत करना,’’ नीलेश का स्वर हड़बड़ा गया, ‘‘चलो, मैं किसी भी तरह पैसे का इंतजाम कर के सुबह 10 बजे आफिस पहुंच रहा हूं. आप सब लोग भी आ जाइए.’’

दूसरे दिन सुबह का समाचारपत्र पढ़ कर 400 परिवार सन्न रह गए. हर समाचारपत्र का एक ही मजमून था कि प्रदेश के सब से बड़े डाटा एंट्री का भंडाफोड़…साथ में था पुलिस वालों के बीच मुंह लटकाए सोमी का फोटो.

अनंत देसाई ने धड़कते दिल से खबर पढ़ी, ‘‘सोमी गिरफ्तार लेकिन नीलेश याज्ञनिक तमाम आपरेटरों की जमा सिक्योरिटी ले कर और उन से मुफ्त में काम करा के 15 करोड़ रुपए का फायदा उठा कर फरार.’’

उस दादा टाइप लड़के ने अखबार पढ़ कर सोचा आफिस को फर्नीचर सहित आग लगा आए लेकिन आगे पढ़ कर वह सन्न रह गया क्योंकि आगे लिखा था कि आफिस व फर्नीचर नीलेश याज्ञनिक ने किराए पर ले रखा था.

उधर सोमी की मां बेटे की गिरफ्तारी से बेहोशी में थी. उन्हें जैसे ही होश आता चिल्लातीं, ‘‘सोमी, मैं ने पहले ही मना किया था कि तू इस कंपनी का मालिक मत बन. कोई वैसे ही लाखों रुपए का आफिस किसी के नाम नहीं करता.’’

और रोहित? वह अपने को संभालने की कोशिश कर रहा था. धीरेधीरे फिर वह अपने कमरे में बंद रहने लगा.  Hindi Story

दूध के दांत

Hindi Story: रोज की तरह स्कूल से घर लौट कर रोहित आटो पर बैठेबैठे ही जोर से चिल्लाया, ‘‘मां, मां, शेखूभाई को पैसे दो,’’ फिर पलट कर आटो वाले से बोला, ‘‘तुम रुकना भैया, मैं अभी पैसे ले कर आता हूं.’’

‘‘कल ले लूंगा भैयाजी, आज देर हो रही है, अभी चलता हूं,’’ कह कर आटो वाला चल दिया.

‘मम्मी सुन क्यों नहीं रहीं?’ रोहित ने अपनेआप से ही प्रश्न किया फिर एक जूता इधर उछाला, दूसरा उधर और हाथ का बैग मेज पर रख कर वह मां के कमरे की ओर भाग लिया.

घर में मां को हर जगह ढूंढ़ लेने के बाद रोहित एक जगह खड़ा हो कर सोचने लगा कि आखिर मम्मी कहां गईं तभी पास खडे़ रामू ने धीरे से बताया, ‘‘रोहित बाबा, आप की मम्मी तो अचानक बनारस चली गईं.’’

‘‘तो तुम ने पहले क्यों नहीं बताया. मैं कब से उन्हें ढूंढ़ रहा हूं,’’ रोहित गुस्से से बोला.’’

‘‘बाबा, आप के पापा ने कहा है कि जरूरत पडे़ तो रोहित से कहना वह फोन पर मुझ से बात कर लेगा.’’

पापा का नाम आते ही वह चुप हो गया.

रोहित का सारा गुस्सा शांत हो गया और मन ही मन वह सहम गया. घर में रोहित का मन नहीं लगा तो वह उदास हो कर बाहर बरामदे में आ कर बैठ गया और सोचने लगा, उस की किसी बात से मां कभी नाराज नहीं होतीं तो आज यों कैसे जा सकती हैं? किस से क्या कहे, क्या पूछे. पापा से तो वैसे ही उसे डर लगता है.

सामने के घर से डाक्टर आंटी ने झांका और उसे देख कर बाहर निकल आईं. रोहित के सिर पर हाथ रख कर पुचकारते हुए बोलीं, ‘‘रोहित, मम्मी तुम को बिना बताए चली गईं. बड़ी गंदी हैं न, यहां मेरे पास आओ. हम दोनों खेलेंगे. फिर मैं तुम्हारा होमवर्क पूरा करवा दूंगी, उस के बाद तुम सो जाना. चले आओ बेटे, चिंता न करो.’’

रोहित को तो मम्मी पर गुस्सा आ रहा था, अत: नाराज हो कर बोला, ‘‘नहीं, मैं तो मां के हाथ से ही सबकुछ करता हूं. आज मैं अपनेआप खा लूंगा. रामू, अंदर चलो. खाना लगाओ. मुझे खाना खा कर अपना होमवर्क पूरा करना है.’’

‘‘अच्छा, बड़े साहब आ जाएं तब पढ़ लेना, बाबा,’’ रामू की बात सुन कर रोहित एकदम से खड़ा हो गया.

पापा तो पूरे समय डांटते ही रहते हैं कि मांमां मत किया करो, अपनेआप काम करना सीखो और फिर मां से कहते रहते हैं कि तुम समझती क्यों नहीं, छोटा है कह कर तुम इसे बिगाड़ रही हो.

मां की याद फिर आ गई और अब की रोहित अपने को रोक नहीं पाया, उसे जोरों से रोना आ गया. मां उस को कितना प्यार करती हैं, उस की सारी बातें बिना कहे ही समझ जाती हैं. वह भी अपना सारा होमवर्क बिना कहे कर लेता है. बस, वह पास में बैठी भर रहें. उस को तो पूछने तक की  भी जरूरत नहीं पड़ती है. स्कूल के सभी अध्यापक उस की कितनी तारीफ करते हैं पर पापा जब भी पढ़ाने बैठेंगे, बिना मतलब के डांटेंगे.

पापा ने सुबह गोद में ले कर रोहित को नींद से जगाया. उस की लाल आंखों को देख कर वह समझ गए हैं कि जरूर मां की याद में देर तक सोया नहीं होगा. स्कूल जाने के लिए तैयारी करवाते समय बैग देखते हैं. उन का मूड अच्छा देख कर रोहित धीरे से पूछता है, ‘‘पापा, मुझे बिना बताए मां क्यों चली गईं? ऐसा तो मां ने पहले कभी नहीं किया. उन्होंने मेरी जरा भी चिंता नहीं की.’’

‘‘तुम्हारे नानाजी को अचानक दिल का दौरा पड़ा था,’’ अमित बोले, ‘‘तुम्हारे मामाजी का फोन आ गया तो मम्मी को अचानक बनारस जाना पड़ा.’’

‘‘तो मम्मी मुझे स्कूल में बता कर चली जातीं.’’

‘‘बेटे, तुम्हें बताने मम्मी स्कूल जातीं तो उन की गाड़ी छूट जाती इसलिए वह बिना तुम्हें बताए चली गईं और फिर मैं हूं न. तुम को चिंता करने की जरूरत नहीं है. चलो, तैयार हो कर स्कूल जाओ. शाम को दफ्तर से आ कर तुम्हारा सारा होमवर्क पूरा करा दूंगा. अब यह बातबात पर रोना छोड़ दो. देखो, आप कितने बडे़ हो गए हो.’’

बच्चे को समझातेसमझाते अमित का ध्यान पत्नी शोभा की तरफ गया तो उन का मन खराब हो गया. ऐसी बीवी मिली है कि अपने घरपरिवार और बच्चों की दुनिया से बाहर ही नहीं निकलती. उन्हें तो अपने मातापिता पर भी गुस्सा आता कि किस गंवार को उन्होंने मेरे गले मढ़ दिया है. उन का बस चलता तो वह अपनी पसंद की अच्छी, हाई सोसाइटी में उठनेबैठने वाली, अंगरेजी में बात करने वाली बीवी लाते. अब इस गंवार को कहां ले कर जाएं, न तो उसे बोलने का सलीका है न ही बच्चे को कुछ सिखा पा रही है, केवल लाड़प्यार से बिगाड़ने के. अच्छा है, कुछ दिनों तक रोहित से दूर रहेगी तो डा. रीता उन के बेटे को कुछ ढंग की बात सिखा देंगी.

डा. रीता का ध्यान आते ही अमित को कितना सुकून मिला था. वह भी कितनी आसानी से उन के दिल की सारी बातें समझ लेती हैं. उन में कितनी समझ है कि उन के दिल की इच्छा को वह फौरन भांप लेती हैं. उन के साथ बैठने के बाद आपसी गपशप व घरबाहर की समस्याओं पर चर्चा करने में कितनी जल्दी समय बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. अपनी पत्नी को कैसे समझाएं और फिर उस में डा. रीता जैसी बुद्धि कहां है जो उसे कोई तरीका भी आए.

जाने क्यों मां की बात चलते ही पापा का गुस्सा हमेशा बढ़ जाता है. मन ही मन यह सोचते हुए रोहित तैयार हो कर बोला, ‘‘पापा, मैं अपनेआप अपनी पढ़ाई कर लूंगा.’’

‘‘वैरीगुड, देखो बेटा, मेरे आफिस से वापस आने तक तुम बिलकुल नहीं रोना. रामू का कहना मानना और स्कूल से लौट कर उसे जरा भी परेशान नहीं करना. मां को जब आना होगा आ ही जाएंगी. ओ.के.’’

रोहित ने हां में सिर हिला दिया पर मन ही मन सोचने लगा कि दोनों मेरी देखभाल की बात करते हैं पर इन को यह भी पता नहीं कि मुझे गरम नहीं, बिलकुल ठंडा दूध पसंद है और मैं ब्रैड बिना सिकी खाता हूं.

तभी बाहर से शेखूभाई ने पुकारा और रोहित एक सांस में आधा गिलास दूध पी कर बिना कुछ कहे बाहर भाग गया. रामू पीछे से कहता रहा, ‘‘बाबा, यह टिफिन तो ले लो,’’ पर उस ने सुनाअनसुना कर दिया.’’

अब रोहित खामोश रहता है. पहले की तरह न तो बातबात पर गुस्सा करता न बहुत बोलता है. बस, अपनी ड्राइंग की कापी में चित्र बनाता रहता है. मन की सारी बातें उसी के जरिए जाहिर करता है. पापा ने घर में वीडियो गेम ला कर रख दिया पर उस ने उसे छुआ तक नहीं है. यहां तक कि अब वह रामू से कोई झगड़ा भी नहीं करता और न ही पापा से कोई जिद करता है. मम्मी को गए आज 15 दिन हो गए हैं. उसे विश्वास है कि मम्मी का मन वहां नहीं लग रहा होगा. पर आश्चर्य है कि वह आ क्यों नहीं रही हैं.

हां, आजकल पापा पहले की तरह देर से नहीं आते बल्कि जल्दी आ जाते हैं और थोड़ी देर तक उस के साथ खेल कर शाम होते ही सामने वाली रीता आंटी के घर चले जाते हैं या वह खुद ही आ जाती हैं. रोज यहीं खाना खाती हैं और पापा यह कहते हुए उन को रोक लेते हैं कि आप कहां अकेली खाना बनाएंगी. रामू भी कितना खुश रहता है, हंसहंस कर उन की खूब बात मानता है.

पापा और रीता आंटी अकसर अंगरेजी में ही बातें करते रहते हैं. रोहित जब भी उन की बातें ध्यान से सुनता है तो उसे बहुत कुछ समझ में आ जाता है. वह भी तब उन की बातों पर अधिक ध्यान देता है जब वे उस की मां के बारे में बात करते हैं. उसे तब बेहद गुस्सा आता है जब वे मां को पिछड़ा, गंवार या फूहड़ कहते हैं पर वह कुछ नहीं कर पाता.

रोहित सोचता, कब मां आएं और कब वह इस रीता आंटी की सब बातें उन से कहे. जब देखो तब उस से लाड़ लड़ाती हैं, पर वह क्या समझता नहीं कि पापा को दिखाने के लिए ही वह सब करती हैं. एक तो उसे रीता आंटी की ड्रेस बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती. जब देखो लड़कों की तरह पैंटशर्ट पहन कर चली आती हैं जबकि मम्मी साड़ी पहन कर कितनी प्यारी लगती हैं और उन के लंबे बालों को तो सब देख कर ही दंग रह जाते हैं.

वैसे तो उस के पापा बहुत अच्छे हैं पर मां को हमेशा क्यों सब के सामने ही जोर से डांट देते हैं. उसे खराब भी लगता है. इसीलिए मां भी शायद ज्यादा बोलना नहीं चाहतीं, चुप ही रहती हैं. वह इतना तो समझने लगा है. रीता आंटी इस आफिसर कालोनी में पहले से रहती हैं. रोहित को याद है कि जब वह मम्मीपापा के साथ यहां आया था तो वह उस के घर आ गई थीं और उन के साथ ही नौकर चाय भी ले कर आया था. उन्होंने अपने बारे में पापा को बताया था कि मैं यहीं के सरकारी अस्पताल में सी.एम.एस. हूं. मेरा नाम

रीता शर्मा है. कोई भी जरूरत पडे़ तो आप दोनों बेझिझक कहिएगा, अपना समझ कर. रोहित को आज भी यह याद है कि उस दिन मां ने कहा था, ‘बेटा, मौसीजी को प्रणाम करो,’ तो उन्होंने बडे़ तमक कर कहा था, ‘नहीं, मैं इस तरह के किसी रिश्ते को पसंद नहीं करती. तुम मुझे सिर्फ आंटी कहना, रोहित.’

रीता आंटी के जाते ही पापा, मां से सख्त नाराज हो कर बोले थे, ‘पहले ही दिन तुम ने अपना पिछड़ापन जता दिया न. सामने वाले को देख कर बातें किया करो कि किस से क्या बोलना है.’

इस के बाद तो रीता आंटी अकसर बिना समय देखे घर चली आतीं. एक दिन अचानक आ कर पापा से कहने लगीं, ‘आज मैं बहुत डिस्टर्ब हूं. घर से फोन आया था. बहन का एक्सीडेंट हो गया है. डाक्टर हो कर भी कुछ नहीं कर पा रही हूं,’ और फिर देर तक बैठी रही थीं.

पापा ने मां से कहा था, ‘आज इन का यहीं बिस्तर लगा दो, इन का घर में अकेले मन और घबराएगा.’

मां ने भी बिना कुछ सोचेसमझे सामने के ड्राइंगरूम में उन के सोने का अच्छा सा इंतजाम तुरंत कर दिया.

इस तरह रीता आंटी का उस ने घर आने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह चलता चला आ रहा है. पापा भी उन को आया देख कर बडे़ खुश रहते, उन दोनों की देर तक बातें होतीं. मां जब कभी वहां जा कर बैठ जातीं तो उन के सामने वे अंगरेजी में ही बातें किया करते. मां को लगता कि उन का अपमान हो रहा है पर वह कुछ कह नहीं पातीं क्योंकि उन्हें पता है कि पापा रीता आंटी के सामने ही उन को डांटने लगेंगे.

मां अपने नन्हें से बेटे से अपने मन की व्यथा कैसे कहें पर रोहित अपनी मां के मन की बात समझने की कोशिश करता. सोचता, सब लोगों की नजरों में मैं बहुत छोटा हूं पर अब मैं उन की बातों को खूब अच्छी तरह से समझने लगा हूं.

इधर अचानक जब से मां को बनारस जाना पड़ा है रीता आंटी के तो पूरे मजे हो गए हैं. पूरे समय आंटी उसे भी उस के पापा की तरह खुश रखना चाहती हैं. उस की पसंदनापसंद का खयाल वह रामू और पापा से पूछ कर खूब रखतीं पर पता नहीं क्यों उन के ऐसा करने से वह उसे और भी बुरी लगने लगतीं.

रोहित अब अपनेआप कोे खूब बड़ा समझने लगा है. पहली बार उस ने सोचा कि चलो, अच्छा हुआ जो मैं मां के साथ बनारस नहीं गया वरना यहां मेरे पापा को तो…नहीं अपने से बड़ों के बारे में मुझे यह सबकुछ नहीं सोचना चाहिए. मेरे लिए इतना ही सोचना काफी है कि रीता आंटी ठीक नहीं हैं.

एक दिन रीता आंटी आईं और आते ही पापा को विश किया. रोहित को पता है कि आज उस के पापा का बर्थ डे है. उस की मां पापा के साथ मिल कर उन का जन्मदिन हमेशा अपने तरीके से मनाती रही हैं. इस बार उस की मां के यहां न होने से उस ने कहीं जाने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया, न ही पापा से इस बारे में कुछ कहा, पर रीता आंटी को भला क्या पड़ी है जो सजधज कर चली आई हैं.

‘‘चलिए, अमितजी, आज हम लोग आप का बर्थ डे सैलिब्रेट करेंगे,’’ यह कह कर एक बड़ा सा गिफ्ट पैक उन्होंने पापा को थमा दिया साथ में एक छोटा सा उपहार भी दिया.

पापा ने अपना उपहार खोल कर देखा तो वह नोकिया का सुंदर फोन था जिस के लिए उस के पापा कई दिन से खरीदने की सोच रहे थे. शायद बातों में कभी  रीता आंटी से कह दिया होगा. तभी तो उन्हें लाने का मौका मिल गया.

पापा ने रीता आंटी को जन्मदिन उपहार के लिए धन्यवाद दिया तो आंटी ने कहा, ‘‘चलिए, आज हमारी शाम अशोक होटल में बुक है.’’

‘‘नहीं, मुझे तो कहीं और जाना है,’’ कह कर पापा ने टालना चाहा लेकिन आखिर उन्हें आंटी की बात माननी पड़ी.

‘‘चलो बेटा, तैयार हो जाओ, घूमने चलना है. पहले तुम्हारी पसंद का जू देखने चल रहे हैं. फिर आज का खाना बाहर खाएंगे,’’ फिर चिल्ला कर बोलीं, ‘‘रामू, आज कुछ नहीं बनेगा.’’

रोहित ने पहले तो साफ मना करना चाहा फिर ध्यान आया कि साथ न जाने से तो बड़ी गलती होगी. वह मां को उन की सारी बातें कैसे बता पाएगा. वह फौरन तैयार हो गया.

गाड़ी में रास्ते भर उस के पापा व डा. रीता आंटी उस की मां की कमियों पर ही बातें करते रहे. पापा कहते, ‘‘मेरी पत्नी शोभा पढ़ीलिखी तो है पर बस, घर बैठी रहती है. किसी बात का उसे कोई शौक ही नहीं है और अपनी तरह रोहित को भी बना रही है. कहता भी हूं कि कभी बाहर निकल कर दुनिया देखो तो, कितनी बड़ी है पर बस, कूपमंडूक ही बनी रहती है. रोहित 9 साल का हो गया लेकिन उस के बिना अपना एक काम नहीं कर सकता. ज्यादा कुछ कहो तो मुंह बना कर बैठ जाती है.’’

अमित की ओर देख कर रीता आंटी ने कहा, ‘‘रियली, दिस इज ए ग्रेट प्राब्लम फार यू. आप का एक ही बेटा है उसे भी यों ही अपने जैसा बुद्धू बना कर छोड़ना चाहती हैं. कैसे सहन कर पा रहे हैं शोभा को आप,’’ फिर पीछे पलट कर रोहित को प्यार से बोलीं, ‘‘ओ, माई डियर. कब टूटेंगे तुम्हारे दूध के दांत.’’

रोहित कुछ न बोल पाया.

‘‘अब आप चिंता न करें अमितजी, रोहित की जिम्मेदारी मैं लेती हूं. सारे एटीकेट्स, मैनर्स मैं सिखा दूंगी,’’ रीता ने कहा.

रोहित को खुश रखने का प्रयास दोनों मिल कर करते रहे, कभी आइसक्रीम खिलाते, कभी जू दिखाते और फिर निश्चिंत हो कर बातें करते रहते. लेकिन उसे तो अपनी मां की गैर मौजूदगी में उन के लिए कही गई बातें बिलकुल भी पसंद नहीं आ रही थीं पर वह कर भी क्या सकता था. उन की अंगरेजी में की जा रही बातचीत को तो वह रोक नहीं पाता बस, सुनता जाता. वैसे भी मां सामने होतीं तो ही पापा को कौन सा फर्क पड़ जाता.

वे अशोक होटल पहुंच गए. डा. रीता ने अंदर का फेमिली केबिन बुक करवाया था. रोहित जा कर जैसे ही बैठा तो उसे बडे़ जोरों की भूख का एहसास हुआ. पिछली बार मां के साथ भी वह इसी होटल में आया था. तब जितना मजा आया था उसे आज तक वह कहां भूला है.

रीता आंटी ने बैठते ही पापा और अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया.

रोहित को देख कर बैरे ने पूछा, ‘‘लिटल मास्टर, आप की पसंद का क्या लेकर आऊं? यहां तो आप की पसंद का बहुत कुछ मिलता है. आप ने तो अपनी पसंद बताई नहीं. अपने मम्मीपापा की पसंद का ही सबकुछ लेंगे क्या?’’

रोहित के अंदर का काफी देर से भरा गुस्सा फट पड़ा और वह चिल्ला कर बोला, ‘‘यह मेरी मम्मी नहीं हैं और मुझे कुछ भी पसंद नहीं है, समझ गए तुम. न ही मुझे भूख लगी है.’’

अमित व रीता यह सुन कर एकदम हड़बड़ा उठे, अच्छा हुआ कि वह अंदर केबिन में बैठे हैं अन्यथा आसपास के लोगों का ध्यान उधर जाता ही. बेटे का व्यवहार देख कर अमित अपने को रोक न सके और खिन्न हो कर एक जोरदार झापड़ लगा दिया.

रोहित आज पापा का यह रूप देख कर एकदम चुप्पी लगा गया. बातबात में रोने वाले उस बच्चे की आंखों से आंसू तक नहीं गिरा, न ही उस ने कुछ कहा. बस, सिर नीचे कर के बैठ गया.

‘‘ओफ,  आप भी अमितजी. छोटे बच्चों को कैसे टैकिल करते हैं, समझते ही नहीं. इतना अच्छा दिन बिता कर अब हमारे रोहित का सारा मूड बिगाड़ रहे हैं,’’ कह कर रीता आंटी उसे गोद में बैठाना चाह रही थीं.

रोहित उन के हाथ को हटाता हुआ अंगरेजी में बोला, ‘‘आंटी प्लीज, आई एम ओ.के., सारी टू मेक यू डिस्टर्ब्ड विथ माई बैड मैनर्स एंड आई नो, माई डैड नैवर लाइक्स दिस.’’

एकदम गंभीरता से कह कर रोहित ने अपनी प्लेट में खाना लगा लिया. उस के पिता और डा. रीता देखते रह गए. उन्होंने भी चुपचाप अपना खाना निकाल लिया. उन के पास कहने को कुछ नहीं बचा. अमित भी समझ गए कि बेटे के मन में क्या है. उन को यह अंदाज भी हो गया कि केवल उन को बताने के लिए ही बेटे ने यह व्यवहार किया है.

होटल से घर पहुंचे तो अमित ने देखा कि बाहर वाले कमरे की सारी खिड़कियां खुली हैं और सारे बल्ब जल रहे हैं. रोहित को लगा मानो उस का पूरा घर खुशी से भर उठा है.  ‘‘हुर्रे, मां आ गई हैं. मुझे पता था कि पापा के बर्थ डे के दिन तक मम्मी आ ही जाएंगी,’’ और यह कहता हुआ वह तेजी से गाड़ी से नीचे उतर कर दरवाजे की ओर दौड़ पड़ा.

डा. रीता और अमित चुपचाप गाड़ी में ही बैठे रह गए. अमित ने अपने बच्चे के व्यवहार के लिए रीता से माफी मांगी तो वह बोलीं, ‘‘अरे, इस में माफी मांगने की क्या बात है. वह मेरा भी तो बे…टा है. मौसी जैसी हूं मैं उस की.’’

‘‘तुम कब आईं मम्मी,’’ कह कर रोहित अपनी मां से लिपट गया.

‘‘मैं तो सुबह ही आ गई थी,’’ शोभा  उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘बेटा, यों समझो कि तुम यहां से निकले हो और मैं आ गई.’’

‘‘मां, आज आप साथ रहतीं तो कितना मजा आता. मैं तो पूरे समय आप को ही याद करता रहा. पिछले साल आज के दिन हम ने कितना एंज्वाय किया था न, उसी जगह हम आज भी गए थे. पर तुम चलतीं तो…’’ इतना कह कर रोहित चुप हो गया.

मां ने रोहित के हाथ में एक पैकेट दे कर कहा, ‘‘तुम्हारी नानी व मामी ने देखो तुम्हारे लिए क्या भेजा है.’’

तभी रोहित को कुछ याद आया और बोला, ‘‘मम्मी, जब आप बनारस गईं तो मैं ने कितनी ढेर सारी ड्राइंग बनाई है, देखोगी तो देखती ही रह जाओगी,’’  और इसी के साथ अपने बनाए चित्रों को ला कर मां के सामने रख दिया.

मां ने उस के बनाए सभी चित्रों को बहुत ध्यान से देखा और सब के नीचे पेंटिंग के अनुसार गीत बना कर 4-4 पंक्तियां लिख दीं तो रोहित को लगा, मम्मी ने उस के मन की ही बात लिख दी है.

‘‘ओह, वंडरफुल माई डियर मौम,’’ अपने पापा के अंदाज में रोहित ने कहा. फिर जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, वह बोला, ‘‘मां, तुम ने खाना खा लिया, हम तो बाहर खा कर आए हैं, चलो, देखते हैं रामू ने क्या बनाया है.’’

‘‘बेटे, मुझे बिलकुल भूख नहीं है,’’ मां ने कहा, ‘‘तुम्हारे नानाजी की तबीयत अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाई है. मैं तो कुछ दिन और रुकती पर मुझे तुम्हारी चिंता लगी थी इसलिए चली आई.’’

‘‘अब आप मेरी चिंता करना छोड़ो, मां, देखो, मैं कितना बड़ा हो गया हूं. अकेले रह सकता हूं, अपनी देखभाल कर सकता हूं. पापा का भी ध्यान रख सकता हूं,’’ कह कर वह खिलखिला कर जोरों से हंसा तो शोभा को लगा जैसे अमित हंस रहे हैं.

‘‘रामू, मां के लिए रोटीसब्जी बनाओ, साथ में दही ले आना चीनी डाल कर,’’ रौब से रोहित ने कहा.

‘‘अच्छा, बाबाजी,’’ रामू ने जवाब दिया.

शोभा से कुछ न बोला गया.

आज बहुत दिनों बाद रोहित अपनी मां के पास लेटा है. उसे कितनी सारी बातें करनी हैं, पूछनी हैं और बतानी भी हैं. वह जानता है कि जब तक मां को अपनी एकएक बात न बता देगा मन नहीं मानेगा और आज तो उसे पापा ने रीता आंटी के सामने ही मारा है. यदि मारने वाली बात मां को बताएगा तो इस के लिए मम्मी उसे ही समझाएंगी. कभी सोचता, मां इतनी सीधी क्यों हैं? पापा से क्यों डरती हैं?

अपने ही सवालों में उलझा रोहित अचानक पूछ बैठा, ‘‘मां, तुम अंगरेजी में बात क्यों नहीं करतीं? जैसे डा. रीता आंटी करती रहती हैं. पापा को इसलिए तो उन से बातें करना अच्छा लगता है.’’

‘‘तुम तो जानते हो बेटे, मैं अंगरेजी समझ तो लेती हूं पर धारा प्रवाह बोलने के लिए प्रैक्टिस चाहिए.’’

‘‘मां,’’ रोहित बोला, ‘‘अब हम आपस में अंगरेजी में बात कर के इसे बोलना सीखेंगे.’’

कुछ देर की खामोशी के बाद पहलू बदल कर रोहित फिर बोला, ‘‘मां, आंटी की तरह तुम भी पैसे क्यों नहीं कमातीं? कार क्यों नहीं चलातीं? बाहर घूमने क्यों नहीं चलतीं? बड़ी पार्टियां क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘तुझे आज यह क्या हो गया है जो इस तरह की बहकीबहकी बातें कर रहा है. अब यह मत कह देना कि उन के जैसे कपडे़ क्यों नहीं पहन लेतीं. बेटा, वह बड़े अस्पताल की डाक्टर हैं और मैं एक घरेलू महिला. मेरा जीवन तुम लोगों तक ही सीमित है.’’

‘‘पर तुम मेरी मां हो, अपने को थोड़ा चेंज करो न मां.’’

शोभा समझ नहीं पा रही थीं कि आज रोहित को हो क्या गया है. बेटे से वह इस बारे में कुछ पूछतीं कि तभी अमित बाहर से आ गए. उन को देखते ही वह डर कर चुप हो गईं और सोचने लगीं कि रोहित के पापाजी ने इतना भी नहीं पूछा कि उस के  पिताजी की तबीयत कैसी है. दिल से न सही औपचारिकता तो निभा ही सकते हैं. न जाने इन को क्या होता जा रहा है, पहले तो ठीक ही व्यवहार करते थे. पर इधर ठीक ढंग से बातचीत तक नहीं करते.

मांबेटे को एकसाथ सोता देख कर अमित सोचने लगे, यही रोहित को बिगाड़ रही है अन्यथा वह इस तरह रीता को नहीं बोलता. पर अपने बेटे को इतनी जोर से उन्हें भी नहीं मारना चाहिए था. अपनी गलती का एहसास होते ही उन का मन ग्लानि से भर गया और वह अपनेआप को न रोक सके. धीरे से पूछा, ‘‘जाग रहे हो बेटा, ज्यादा जोर से तो नहीं लगी. आई एम सौरी.’’

‘‘क्या, चोट लग गई, कहां लग गई, कैसे लगी इसे, इस ने तो कुछ नहीं बताया,’’ घबरा कर शोभा उठ कर बैठ गईं और बोलीं, ‘‘चलो, उठो और मुझे अपनी चोट दिखाओ.’’

‘‘अरे, मां जरा सा गिर गया और लग गई. पापा तो यों ही चिंता कर रहे हैं. अंदरूनी चोट है, तुम को नहीं दिखेगी.’’

रोहित की बात सुन कर अमित सोचने लगे कि लगता है आज की घटना के बारे में रोहित ने अपनी मां को कुछ नहीं बताया है.

अमित को इधर कुछ दिनों से घर का माहौल एकदम अलग लगने लगा है. न किसी बात की चकचक रहती न झंझट होता. पत्नी शोभा और बेटा रोहित जाने क्या करते रहते हैं. बेटे को देखो तो वह कमरे में बंद रहता है. मां को देखो तो सुबह से शाम तक अपने काम में ही लगी रहती हैं. अमित भी इस दिनचर्या से खुश हैं कि चलो रीता से मिलने में कोई रोकटोक नहीं है.

उस दिन अमित जैसे ही अपने घर पहुंचे कि पीछे से किसी ने आवाज दी. पलट कर देखा तो कोरियर वाला था. उन्होंने लिफाफा ले लिया और पढ़ कर देखा तो पत्र बेटे के नाम से था. कौन भेज सकता है और कहां से आया है? अमित के दिमाग में एकसाथ कई प्रश्न कौंध गए फिर भी उन्होंने रोहित को बुला कर उसे पत्र पकड़ा दिया. उस ने लिफाफा खोला और पढ़ा तो उछल पड़ा और मारे खुशी में उछलते हुए उस ने कहा, ‘‘पापा, आप भी इसे पढ़ो.’’

अमित ने पत्र पढ़ा, ‘‘श्रीमती शोभा सिंह, इस बार की प्रादेशिक चित्रकला प्रतियोगिता में आप के बेहतरीन चित्र ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है. हमारी शुभकामनाएं. आप को ललित कला अकादमी में खुद आ कर यह पुरस्कार व सम्मान राज्यपाल महोदय से लेना होगा.

अमित ने पत्नी से पूछा, ‘‘ये शौक कब से लग गया?’’

‘‘पेंटिंग का शौक तो मुझे बचपन से  ही था लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया,’’ उत्साहहीन भाव से शोभा ने कहा, ‘‘बेटे ने मेरे द्वारा बनाए गए साधारण से चित्र को कब इस प्रतियोगिता में भेज दिया मुझे नहीं पता और उस चित्र में ऐसा क्या है यह भी मैं नहीं जानती, क्योंकि मैं ने तो यों ही कूंची चला दी थी. पर इतना बड़ा पुरस्कार मिला. यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है.’’

अमित कुछ बोले नहीं. बस, चुपचाप अपने कमरे में आ कर बैठ गए. सोचने लगे कि इतने दिनों तक पत्नी को वह कितना अपमानित करते रहे हैं. उस ने उफ तक न की. हां, उन के लिए उन के परिवार के लिए अपनी प्रतिभा को उस ने ताले में जरूर बंद कर दिया और वह अपने पाश्चात्यता के फैशन में पत्नी को इस तरह का कोई मौका ही नहीं दे पाए और न ही उस के मन को कभी समझना चाहा. पत्नी की असली कीमत तो उन्हें अब समझ में आ रही है और बच्चों

को भी कभी कम कर के नहीं आंकना चाहिए. वे कभी बड़ों से भी ज्यादा समझदार हो जाते हैं. इस तरह अमित को शादी के बाद पहली बार अपनी पत्नी पर गर्व हुआ.

मन की उधेड़बुन में फंसे अमित ने टेलीविजन खोला तो उन के कानों में ये शब्द सुनाई पडे़, ‘‘अब आप होनहार बाल कलाकार रोहित और उस की चित्रकार मां शोभा सिंह से मिलिए. आप को यह जान कर खुशी होगी कि एक बेहतरीन चित्रकार की प्रतिभा को आम लोगों के बीच लाने का श्रेय एक 9 साल के बच्चे को मिला है जो उन्हीं का बेटा है.

अमित टेलीविजन को देखने लगे. स्क्रीन पर रोहित का हंसता चेहरा नजर आया जो कह रहा था, ‘‘पिछले दिनों पापा की एक पत्रिका में मैं ने छिपी प्रतिभाओं को ढूंढ़ निकालने की इस प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा तो मां की बनाई हुई अपनी पसंद की एक पेंटिंग भेज दी. मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि मम्मी का बनाया यह चित्र अवश्य ही पसंद किया जाएगा. हां, प्रथम पुरस्कार प्राप्त होगा यह मुझे पता नहीं था. मां की कलाकृतियों की विशेषता है, किसी भी चित्र को देख कर उस के नीचे स्वरचित लिखित कुछ विशेष पंक्तियां जो उस चित्र को सुंदर, उत्कृष्टता और भव्यता देती हैं. मेरी मां की लगन व पापा का सहयोग ही हमें आगे कार्य करने को निरंतर उत्साहित करेगा.’’

अमित इस साक्षात्कार को देखने में इतने तल्लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि रोहित कब आ कर उन की बगल में बैठ गया. साक्षात्कार समाप्त होने के बाद बगल में रोहित को बैठा देख कर अमित बोले, ‘‘हां, तो मास्टर रोहित, यह साक्षात्कार कब हो गया और तुम ने मुझे बताया भी नहीं.’’

‘‘पापा, वह कल घर आए थे. मां से भी कहते रहे पर उन को कुछ कहने में झिझक हो रही थी. पर मैंने अच्छा कहा न.’’

इसी के बाद अमित के पास अपने लोगों की बधाइयां आने लगीं जिस में इस शहर के कुछ जानेमाने लोगों के भी बधाई संदेश शामिल थे. अब अमित की समझ में आया कि घर में तो हीरा छिपा है. और वह पत्नी को सदा हीनता का ही बोध कराते रहें, कितनी गलती करते रहे थे, जो काम उन को करना चाहिए वह उन के बेटे ने कर दिखाया है. उन्हें लग रहा  था कि उन का बेटा अब उन से भी बड़ा हो गया है. कितनी शालीनता से उस ने उन को सही मार्ग दिखला कर घरौंदे को बिखरने से बचा लिया है.

पीछे पलट कर देखते हैं तो उन को बधाई देने वालों में डाक्टर रीता भी शामिल हैं.

वे भीगी आंखों से सब की बधाइयां स्वीकार करते रहे और पत्नी कितनी निर्विकार हो कर मुसकरा रही थीं. उन के अपने घर में इतनी बड़ी कलाकार बैठी है और वह घर के बाहर भटकते रहे हैं. मन ने जैसे एक निश्चय किया. नहीं, अब वह अपने पथ से विचलित नहीं होंगे.

पहली बार अमित अपनी पत्नी की ओर हाथ बढ़ा कर बोले, ‘‘चलो शोभा, आज बाहर कहीं इस खुशी को सेलिब्रेट करने चलें.’’

शोभा भी अदा से कहती है, ‘‘थैंक्यू, अमितजी, कांग्रेचुलेट टू अवर सन फार दिस ग्रेट अचीवमैंट.’’

अपनी पत्नी के मुंह से अंगरेजी में कही बातों पर अमित फिर विस्मय से पहले पत्नी और फिर बेटे को देखते हैं.

रोहित वही नन्हा बालक बन कर कहता है, ‘‘पापा, हम पहले आइसक्रीम खाएंगे, चिडि़याघर देखेंगे, पिज्जा खाएंगे और तब घर आएंगे.’’

‘‘श्योर,’’ अमित बोले, ‘‘आज जो चाहोगे वही मिलेगा. फिर घर आ कर मां के हाथ की बनी खीर का मजा लेंगे.’’

शोभा का मन खुशी से खिल उठा हाथ में बंधी घड़ी पर नजर जाते ही वह बोली, ‘‘अब चलें, कितने काम पैंडिंग पडे़ हैं, शीघ्र पूरे करने हैं.’’

एकदूसरे की खुशी में सराबोर, हाथों में हाथ डाले वे घर लौट आए हैं. घर का दरवाजा खोलते हुए अमित सोचने लगे, ‘कौन कहता है कि मेरे बेटे रोहित के दूध के दांत अभी नहीं टूटे हैं.’ Hindi Story

लखक – अलका मधुसूदन

सोशल मीडिया की वजह से लड़कियों की आत्महत्या का बढ़ता खतरा

Suicide Cases: आज के समय हर लड़की सोशल मीडिया की जद में है. एक परफैक्ट फोटो, फिल्टर लगा चेहरा, लाइक्स की भूख और कमैंट्स. ये सब लड़कियों को कुछ पल की खुशी तो देता है लेकिन कई बार अंदर से उन के आत्मसम्मान को भी चूरचूर कर देता है. यही वजह है की हाल के वर्षों में लड़कियों में आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़े हैं और इस का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया की लत ही है.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में भारत में कुल 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज की गईं. इन में छात्रों की संख्या रिकार्ड 13,892 थी. इस में पिछले एक दशक में 65 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. युवाओं की आत्महत्याओं में लड़कियों की तादात चिंताजनक रूप से बढ़ रही है. 18 से 29 साल की लड़कियां सोशल मीडिया से सब से ज्यादा प्रभावित हो रही हैं जिस से लड़कियों में आत्महत्या की दर बढ़ती जा रही है. जहां दोस्ती सोशल मीडिया प्रोफाइल्स तक सीमित हो गई है वहां आत्महत्या के मामले ज्यादा हैं. युवा लड़कियां फेसबुक, इंस्टाग्राम, रील्स और औनलाइन गेमिंग की दुनिया में इतना खो जाती हैं कि असल जिंदगी उन के लिए बोझ बन जाती है.

क्यों बढ़ रही हैं ये घटनाएं?

सोशल मीडिया लड़कियों के लिए सब से खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह उन की इंटेलिजैंस इंडिपेंडैंसी को खत्म कर रहा है. सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताने वाली लड़कियां खुद को उन परफैक्ट लाइफस्टाइल से कम्पेयर करने लगती हैं जो स्क्रीन पर दिखाई जाती है. पतला शरीर, ग्लैमरस मेकअप, महंगे कपड़े और विदेश यात्राएं यह सब बातें लड़कियों को खींचती हैं. इन के अलावा कई चीजें तो फिल्टर और एडिटिंग का जादू होती हैं जिसे लड़कियां हकीकत मान बैठती हैं. नतीजा यह होता है की उन्हें अपनी बौडी में कमियां नजर आने लगती हैं और उन्हें खुद की इमेज खराब लगने लगती है. ऐसे में कई लड़कियां खुद को दूसरों से कमतर समझने लगती हैं और डिप्रैशन में चली जाती हैं.

अध्ययनों के अनुसार सोशल मीडिया पर कम समय बिताने वाली लड़कियों की तुलना में वे लड़कियां जो सोशल मिडिया पर ज्यादा समय बिताती हैं मैंटल हेल्थ की समस्याओं से दोगुनी प्रभावित होती हैं.

लड़कियों को बर्बाद करने में एक बड़ा कारण साइबर बुलिंग है. एक गलत रील, कोई पुरानी फोटो या किसी लड़के द्वारा शेयर की गई तस्वीर. बस, ट्रोलिंग शुरू हो जाती है. अपशब्द, सैक्सुअल कमेंट्स, ब्लैकमेलिंग ये सब कुछ एक क्लिक में होता है. हाल ही में कई घटनाएं सामने आई हैं जहां लड़कियां रील्स पर ताने सुन कर या औनलाइन दोस्ती के चक्कर में फंस कर आत्महत्या कर चुकी हैं. एक 22 साल की लड़की को उस के दोस्त ने रील्स पर चिढ़ाया तो उस ने जान दे दी. दिल्ली एनसीआर में तीन बहनों का खौफनाक केस हुआ जिस में औनलाइन गेमिंग की लत ने उन्हें नौवीं मंजिल से कूदने पर मजबूर कर दिया.

लाइक्स’ और ‘फौलोअर्स’ की लत के कारण लड़कियां अपनी वैलिडेशन स्क्रीन पर ढूंढने लगती हैं. कम लाइक्स मतलब कम वैल्यू. रातरात भर स्क्रौलिंग से नींद खराब तो होती ही है. पढ़ाई और कैरियर भी बर्बाद हो जाता है इस के अलावा परिवार से दूरी बढ़ती जाती है. सोशल मिडिया पर सैंकड़ों दोस्त होने के बावजूद अकेलापन बढ़ता है. आर्थिक सर्वेक्षण भी कहता है कि 15-24 वर्ष की उम्र की लड़कियों में सोशल मीडिया की लत चिंता, डिप्रेशन और कम आत्मसम्मान का कारण बन रही है.

यह सिर्फ लड़कियों का मुद्दा नहीं है बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता की बात है. लड़कियां देश का भविष्य हैं. अगर उन की मानसिक सेहत बिगड़ रही है तो आने वाली पीढ़ी भी प्रभावित होगी. लड़कियां अपनों से बात करना भूल रही हैं. सोशल मीडिया कंपनियां एल्गोरिदम ऐसे बनाती हैं कि लड़कियां घंटों चिपकी रहें. सरकार अभी भी उम्र सीमा और डिजिटल लिटरेसी पर सख्त कदम नहीं उठा पाई है.

Youth Review: टीनेज लाइफ की हल्कीफुल्की लेकिन भावुक कहानी

Youth Movie Review: ग्रीक माइथोलौजी में महत्त्वाकांक्षा और लापरवाही के बारे में इकारस की एक कहानी है. इकारस, डेडलस का बेटा था, जो शहर का शानदार कारीगर और आविष्कारक था. दोनों को क्रीट द्वीप के राजा किंग माइनस ने कैद कर लिया था. वहां से भागने के लिए डेडलस ने एक अनोखा तरीका निकाला, उस ने पंख और मोम से दो जोड़ी पंख बनाए, ताकि वे उड़ कर भाग सकें. उड़ान से पहले डेडलस ने इकारस को सख्त चेतावनी दी.

पहली, बहुत नीचे मत उड़ना वरना समुद्र की नमी पंखों को भारी कर देगी. दूसरी, बहुत ऊपर भी मत उड़ना वरना सूरज की गरमी मोम को पिघला देगी. लेकिन उड़ते समय इकारस एक्साइटेड हो गया. वह चेतावनी भूल गया और ऊंचा, और ऊंचा उड़ता चला गया, सूरज के नजदीक. हुआ यह कि उस के पंख पिघलने शुरू हो गए और वह गिर कर समुद्र में डूब गया.

फिल्म ‘यूथ’ इकारस की तरह समुद्र और सूरज के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है, मगर हिचकोले खाती रहती है. फिल्म पूरी तरह अपने मकसद में डूब गई

है, ऐसा नहीं कहा जा सकता पर जो कहने की कोशिश करती है वह नया भी नहीं है. कहानी का नायक प्रवीन (केन करुनस) एक टीनऐज लड़का है. उस का पढ़ाई में मन

नहीं लगता. 10वीं के बोर्ड एग्जाम में मुश्किल से पास हुआ है. उस की लाइफ की एक समस्या है कि उसे कोई लड़की भाव नहीं देती.

उस की मां सरोजा (देवदर्शिनी) उसे खूब लाड़प्यार करती है. वहीं उस का बाप (सूरज) उसे निकम्मा समझता है, दोनों बाप बेटे में बनती नहीं है. परिवार फाइनैंशियली कमजोर है. प्रवीण का अपनी लाइफ को ले कर कोई गोल नहीं है. उसे बस अपनी लाइफ में प्यार की तलाश है. वह स्कूल में ज्यादातर समय अपने 4 दोस्तों के साथ मिल कर टपोरीगीरी करता

है. शक्लसूरत में वह साधारण सा है. स्कूल में उस का एक ही रूटीन है कि रोज पनिशमैंट में क्लास के बाहर खड़े रहना. यहां उस की पहली मुलाकात प्रेशिका (मिनाक्षी दिनेश) से होती है. धीरेधीरे वे रिलेशनशिप में आ जाते हैं. उस की लाइफ बदलती है और स्कूल में उसे सैलिब्रिटी स्टेटस मिल जाता है.

एक दिन उसे फेसबुक पर सोनल (प्रियंका यादव) का टैक्स्ट आता है. अब टीनेज मन चंचल है तो इस पर फिसल जाता है. मामला गड़बड़ा जाता है और वह रिलेशनशिप, चीटिंग दोनों से हाथ धो बैठता है. हालांकि, वह फिर एक और लड़की पर दिल दे बैठता है. इस बीच, फिल्म स्कूलटाइम के उस नोस्टालजिया में ले जाने की कोशिश करती है जो लगभग सभी ने अपनी टीनेज उम्र में एक्सपीरिएंस की होगी, जैसे दोस्तों का मजाक बनाना, प्रेयर टाइम पर टीचर का फालतू लैक्चर सुनना, खाली पीरियड में ग्रुप बना कर मस्ती करना, स्टूडैंट के आपसी झगड़ों में पेरैंट्सटीचर की मीटिंग होना, दोस्तों के साथ फालतू टौपिक्स पर बातें करना वगैरह.

फिल्म के फाइनल पार्ट में उस की मां को माइनर हार्टअटैक आता है. उस का बाप जैसेतैसे पैसे इकठ्ठा कर अस्पताल का बिल भरता है. प्रवीण के लिए घर और स्कूल में चीजें बिगड़ती चली जाती हैं. वह धीरेधीरे अपनी लाइफ को ले कर सीरियस होने लगता है. पढ़ाई पर ध्यान लगाता है और बोर्ड एग्जाम में आखिरकार 9वीं रैंक हासिल करता है. अंत आतेआते प्रवीण पूरी तरह बदल जाता है. यह फिल्म रोमकौम है. अच्छी बात यह है कि कोई भाषण नहीं देती. न मातापिता से भाषण दिलवाती है. फिल्म का टीनेज किरदार गलतियां करता है तो करता है, उस की वजहों में फिल्म नहीं घुसती. न ही यह दुनियादारी की सीख देती है. फिल्म में किसी किरदार को नैगेटिव शेड नहीं दिया गया है. कौमेडी की बात करें तो कुछ जगह जरूर हंसी आती है. फिल्म बीचबीच में खिंचीखिंची दिखाई देती है.

दिलचस्प यह कि फिल्म का डायरैक्शन खुद केन करुनस ने किया है, वह सिर्फ 25 साल का है. वह इस से पहले धनुष की फिल्म ‘असुरन’ में दिखा था. छोटी उम्र में उस की समझ बढ़िया है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक ठीकठाक है. गाने स्टोरी टैलिंग के फोर्मेट में हैं, जो ठीक से लैंड नहीं करते. सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. सभी कलाकारों ने अपनी भूमिकाएं ठीकठाक निभाई हैं. Youth Movie Review

 

अब पहले सा आसान नहीं रहा विधवाओं की संपत्ति हड़पना

Widow Rights: हिंदू समाज में कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही विधवाओं की बदतर हालत की बड़ी वजह उन के पास संपत्ति का न होना थी. यह अधिकार अब विधवाओं को मिलने लगा है लेकिन अभी भी सीमित है क्योंकि विधवाओं को उन के कानूनी अधिकारों की सटीक जानकारी नहीं है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम कैसे उन की मदद करता है, पढ़िए इस लेख में.

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के भोजपुरा थाने में बीती 16 फरवरी को माया पाल (बदला नाम) ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उस के पति अमित पाल की मौत 27 मई, 2025 को संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. पति की मौत के बाद से ही ससुराल वाले उस की संपत्ति पर नजर रखे हुए थे जिसे हड़पने के लिए उसे घर से निकाल देना चाहते थे. इस बाबत उसे हर कभी शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था. उस के 10 महीने के बच्चे को जेठ जान से मारने की धमकी देता रहता था.

किसी की रोकटोक न होने से जेठ सुनील पाल अकसर माया के साथ छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें करता रहता था. 3 अक्तूबर, 2025 को तो उस ने छेड़छाड़ की हदें पार करते बलात्कार करने की कोशिश कर डाली जिस का विरोध करने पर उस के साथ मारपीट जेठ ने तो की ही, उस का साथ सास रूपदेई और ससुर मोहनलाल ने भी दिया. इन तीनों ने मारपीट के अलावा उस के घर में तोड़फोड़ भी की. बेरहमी से मारकुटाई करने के बाद माया का सामान घर से फेंक दिया गया और जेवर छीन लिए और फिर, घर में ताला लगा कर उसे भगा दिया गया. इस का वीडियो माया के पास है.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है. अब मामला अदालत जाएगा जहां से तय है कि माया को उस के अधिकारों के साथसाथ न्याय भी मिलेगा. न्याय इसलिए मिलेगा कि अब माया जैसी विधवाओं को इकलौता और अहम सहारा कानून का मिलने लगा है वरना तो अकेली और असहाय, कमजोर विधवाओं को परेशान तो पहले की तरह किया ही जा सकता है. लेकिन उन की जायदाद पहले की तरह आसानी से नहीं हड़पी जा सकती. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 कैसे उन्हें यह हक दिलाती है, इसे समझने से पहले एक नजर माया जैसे मामलों में अदालती फैसलों पर डालें तो स्पष्ट यह भी होता है कि उन्हें घर से भी नहीं निकाला जा सकता.

पहला मामला नागपुर का है जहां पति की मौत के बाद ससुराल वालों ने बहू को घर से निकाल दिया. पीड़िता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. निचली अदालत ने फैसला उस के हक में यह कहते दिया कि उसे पति के घर में रहने का हक है, उसे बेघर नहीं किया जा सकता. पीड़िता के जेठ ने बौम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की, जो खारिज हो गई. जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के ने अपने फैसले में कहा कि किसी विधवा को उस की ससुराल में रहने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. ऐसा न करना घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत घरेलू हिंसा के बराबर है.

इस अधिनियम की धारा 17 साझा घर में रहने वाली प्रत्येक महिला, चाहे वह वहां लगातार रही हो या न रही हो, को कानूनन रहने का हक देती है. विधवा को संपत्ति तक पहुंचने से रोकना घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आर्थिक शोषण के बराबर है.

ऐसा ही एक फैसला साल 2025 में ही दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दिया था. इस मामले में भी पति की मौत के बाद ससुराल वालों ने विधवा बहू को घर से निकाल दिया था. बहू ने याचिका दायर की तो कोर्ट ने फैसला दिया कि विधवा को उसी घर यानी ससुराल में रहने का हक है, ससुराल वाले उसे जबरन नहीं निकाल सकते. जस्टिस संजीव नरूला ने अपने फैसले में व्यवस्था दी कि एक बार शादी के बाद महिला उस घर में रहने लगे तो वह साझा घर हो जाता है. इस मामले में दिलचस्प बात, ससुराल वालों की दलील जिस से अदालत ने इत्तफाक नहीं रखा, यह थी कि पीड़िता के पति को परिवार से अलग कर दिया गया था.

सार यह कि अगर शादी के बाद एक दिन भी महिला ससुराल में रह जाए तो उसे घर पर मालिकाना हक मिले न मिले लेकिन वह घर की सदस्य हो जाती है जिसे कानूनन घर से बेदखल नहीं किया जा सकता. यह और बात है कि यह कहने भर की बात है नहीं तो पति की मौत के बाद महिला की जिंदगी नरक से भी बदतर हो जाती है. उसे दरदर भटकने को मजबूर कर दिया जाता है. वृंदावन, काशी जैसे शहर तो विधवाओं के गढ़ सदियों से बने हुए हैं.

घर से निकालने का गणित

दुनिया के आसान कामों में से एक है विधवा के माथे पर मनहूस होने का लेबल चस्पां कर उसे घर से बेघर कर देना. इस से कई मकसद एकसाथ पूरे होते हैं. इन में से पहला है उस के हिस्से की जायदाद हड़पना यानी न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. साफ है जब विधवा को घसीट कर घर से भगा दिया जाएगा तो वह अपने हिस्से की जायदाद कैसे मांगेगी. दूसरा मकसद धार्मिक, पौराणिक या रूढ़िवादी होता है जिस के तहत विधवा को मनहूस करार दिया गया है. सुबहसुबह उस का चेहरा देखने से दिन बेकार जाता है. इस मानसिकता की कीमत आज भी विधवाएं चुका रही हैं. फिर चाहे वह झुग्गीझोंपड़ियों की हों या आलीशान भव्य इमारतों की हों, अनपढ़ हों या शिक्षित, दोनों में कोई फर्क नहीं है. जैसे दलित दलित होता है वैसे ही विधवा विधवा होती है. वह बहिष्कृत और तिरस्कृत थी और है.

यह रिवाज सदियों पुराना है जो आज के तथाकथित आधुनिक शिक्षित और सभ्य समाज में भी कायम है. थोड़ेबहुत बदलाव आए हैं लेकिन वे आटे में नमक जितने हैं जिन पर संतुष्टि नहीं जताई जा सकती. उलटे, अफसोस इस बात पर जताया जा सकता है यह तथाकथित सभ्यता भी किसी क्रूरता, खासतौर से पौराणिकता, से कम नहीं होती.
इकलौती तसल्ली इस बात पर जताई जा सकती है कि आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ी विधवाएं पैसों के मामले में किसी की मुहताज नहीं हैं. लेकिन ऐसी विधवाओं की तादाद बहुत कम है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण यानी एनएफएचएस के एक ताजे आंकड़े के मुताबिक देश में कोई 7 करोड़ तक विधवाएं हैं जिन में से 10 फीसदी के लगभग को ही पैसों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता.

अधिकतर को मुंह इसलिए ताकना पड़ता है कि उन्हें पति और ससुराल की संपत्ति में से उन का हिस्सा नहीं मिलता. आजादी के पहले की तो पति की मौत के साथ ही महिलाओं की बदतर हालत रोंगटे खड़ी कर देने वाली है. विधवा को अगर घर में रहने भी दिया जाता था तो उस के साथ व्यवहार जानवरों सरीखा किया जाता था. उसे घर के किसी एक कोने में पटक दिया जाता था. उस के खाने के बरतन अलग कर दिए जाते थे, सोने के लिए एक दरी या चटाई भर दी जाती थी. नए कपड़े, मेकअप और घूमनाफिरना तो आज की विधवा के लिए भी सपना ही है. कल की बहूरानी देखते ही देखते मुफ्त की नौकरानी बन जाती है.

पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार के पीछे पौराणिक वजहें तो थीं हीं लेकिन एक और अहम वजह संपत्ति थी जिस पर विधवा का कोई हक नहीं माना जाता था. वह यह हक न मांगे, इस के लिए उस पर कहर ढाए जाते थे और शारीरिक शोषण भी पुरुष करते थे. साहित्य इन जुल्मोंसितम से भरा पड़ा है. राजकपूर निर्देशित फिल्म ‘प्रेम रोग’ में इस रोग को बहुत बारीकी से दिखाया गया है कि आलीशान हवेलियों में भी विधवाएं महफूज नहीं थीं.

फिल्म ठाकुरों की पृष्ठभूमि पर बनी थी जिस में नायिका पद्मिनी कोल्हापुरे के पति विजेंद्र घाटगे की मौत के बाद ससुराल में रहने मजबूर किया जाता है. बरसात की एक रात उस का जेठ रजा मुराद उस का बलात्कार करता है. इस पर उस की पत्नी तनूजा चुप रहने को मजबूर बताई गई है. कोई युवती जब विधवा होती है तो उस पर किए जाने वाले तरहतरह के अत्याचारों और क्रूरता को भी ‘प्रेम रोग’ में पूरी ईमानदारी और शिद्दत से दिखाया गया है. मसलन, विधवा की चूडियां फोड़ना, उसे सफ़ेद साड़ी पहनने को मजबूर करना, सादा खाना वह भी अछूतों की तरह देना, जमीन पर सोने को मजबूर करना और सब से हृदयविदारक दृश्य था उस के लंबे व काले बालों को काट देने की पूरी तैयारी करना.

1956 में मिले अधिकार

वह हिंदी फिल्म थी जिस में सुखांत अनिवार्यता होती है. फिल्म का ब्राह्मण नायक ऋषि कपूर विधवा पद्मिनी कोल्हापुरे से तमाम अड़गों को पार कर शादी कर लेता है. उसे नाम व पहचान देता है लेकिन हकीकत इस से कोसों दूर है. हिंदू समाज में विधवा विवाह न के बराबर होते हैं. अब जो थोड़ेबहुत होने लगे हैं, उन में भी उन के ज्यादा होते हैं जिन के पास जायदाद या फिर जौब है. यानी, आर्थिक स्थायित्व एक बड़ा फैक्टर विधवा विवाह में है. ठीकठाक पैसे वाली विधवा की शादी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. कई सामाजिक अध्ययनों के मुताबिक विधवा विवाह की औसत दर 10 फीसदी भी नहीं है. खुद को उदार, आधुनिक और प्रगतिशील मानने वाली सवर्ण जातियों- ब्राह्मण, बनियों, ठाकुरों और कायस्थों में तो यह 5 फीसदी भी नहीं है.

कुछ तादाद में ही सही, विधवा विवाह होना इसलिए भी मुमकिन हुआ क्योंकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 ने विधवाओं को पहली दफा जायदाद का हक दिया, वरना इस के पहले विधवाओं को खानेपीने के भी लाले पड़े रहते थे. इस अधिनियम ने हिंदू समाज में खलबली मचा दी थी. अभी तक विधवाओं को संपत्ति में नाममात्र के भी अधिकार नहीं थे. पति की मौत के बाद उसे कुछ नहीं मिलता था लेकिन इस अधिनियम ने उसे विभिन्न धाराओं के तहत ये अधिकार दिए जिन्हें हर महिला को जानना और न मिलें तो लेना व छीनना आना चाहिए.

– हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की अहम धारा 14 है, जिस के तहत विधवा का अपनी संपत्ति पर पूरा मालिकाना हक मिलता है. पहले यह अधिकार भरणपोषण तक सीमित था. यानी, वह अपनी संपत्ति बेच सकती है, गिरवी रख सकती है, दान कर सकती है और उस की वसीयत भी कर सकती है. लेकिन इस की उपधारा यानी 14 (2) के तहत अगर किसी महिला को संपत्ति उपहार, दान वगैरह में मिलती है तो विधवा के अधिकार सीमित यानी वही होंगे जो दस्तावेज में लिखे गए हैं. अगर दस्तावेज में यह लिखा है कि महिला संपत्ति का जिंदगीभर इस्तेमाल कर सकती है, उसे बेच नहीं सकती तो धारा 14 (1) लागू नहीं होगी जो महिला को पूरा मालिकाना हक देती है.

– धारा 8 के तहत यदि पति की मौत बिना वसीयत किए हो जाती है जैसा कि पहले आमतौर पर होता था तो उस की पहली उत्तराधिकारी उस की विधवा होती है. इस के बाद संतानें अगर हैं तो उन्हें भी संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलता है. इसी श्रेणी में मां और नातीपोते भी आते हैं लेकिन यदि मृतक ने कोई वसीयत की हो तो फिर वही लागू होगी.
– इस अधिनियम की धारा 9 वारिसों की प्राथमिकता तय करती है जिस में विधवा का हक सब से ऊपर आता है.

– धारा 10 में यह प्रावधान किया गया है कि अगर किसी पुरुष की एक से ज्यादा विधवाएं हैं तो उन को संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलेगा. असल में आजादी के बाद तक पुरुष एक से ज्यादा शादी कर सकते थे जिस पर बाद में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के बाद रोक लगी थी. कानूनन पहली शादी ही मान्य होने लगी थी, दूसरी शादी आईपीसी की धारा 494 के तहत गैरकानूनी मानी जाने लगी थी.

– अगर विधवा की भी मृत्यु हो जाती है तो धारा 15 यह तय करती है कि उस के प्रथम श्रेणी के वारिस कौनकौन होंगे. जाहिर है, सब से पहले उस की संतानें और अगर वह निसंतान मरती है तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति के दावेदार होंगे. पति के वारिस और मातापिता, भाईभतीजे इस श्रेणी के तहत आते हैं. ये भी न हों तो पहले पिता और फिर मां के उत्तराधिकारियों को संपत्ति मिलती है.

– धारा 19 के तहत एक से ज्यादा वारिस होने पर जायदाद सभी उत्तराधिकारियों में बराबर बंटती है. इस में अधिकार संयुक्त या मिलाजुला नहीं होगा बल्कि हरेक वारिस का हिस्सा अलग होता है. अगर किसी के 3 वारिस हैं और उन में से किसी एक की मौत हो जाती है तो उस का हिस्सा बाकी 2 वारिसों में नहीं बंटेगा बल्कि उस के वारिसों को मिलेगा.

धारा 30 पुरुष को वसीयत का अधिकार देती है जिस के तहत पुरुष किसी को भी अपनी संपत्ति दे सकता है. वह अगर चाहे तो पत्नी को भी जायदाद से बेदखल कर सकता है. अगर पति की मौत बगैर वसीयत किएर होती है तो बंटवारा धारा 8 के तहत होता है, यानी, पत्नी पहली हकदार होती है.
जब ये कानून लागू हो गए तो अदालतों में मामले भी आने लगे और विधवाओं को संपत्ति का हक मिलने लगा. इस से काफी हद तक वैधव्य की दुश्वारियां कम होने लगीं. लेकिन इस कानून का विरोध भी कट्टर हिंदूवादियों ने जम कर किया था.

गौरतलब है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 उस हिंदू कोड बिल का हिस्सा था जिसे संघियों, जनसंघियों, हिंदूमहासभाइयों, रामराज्य परिषद के नेता करपात्री सहित तमाम हिंदू धर्मगुरुओं ने ज्यों का त्यों लागू नहीं होने दिया था. सड़क से ले कर संसद तक इन्होंने गदर मचाते जो बवाल काटा था उसे पाठक सरिता के ही पिछले अंकों में श्रृंखलाबद्ध रूप में विस्तार से पढ़ चुके हैं. बाद में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इसे 3 टुकड़ों में संसद में पारित किया था.

पर नजरिया नहीं बदला

कानून बने, लागू भी हुए और विधवाओं को उन का फायदा भी मिला. लेकिन इस से पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता और विधवाओं के प्रति उन का संकीर्ण नजरिया कुछ खास और उम्मीद के मुताबिक नहीं बदला. अभी भी विधवाओं के साथ बदसलूकियां होना आम बात है. वे धार्मिक और सामाजिक समारोहों से बहिष्कृत हैं. उन का वजूद बंदिशों के ढेर तले दबा है. विधवा विवाह भी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रहे. कुल जमा, विधवाएं अभिशप्त जिंदगी जीने को मजबूर हैं तो इस का पहला जिम्मेदार धर्म और दूसरा वह तथाकथित सभ्य और शिक्षित समाज है जो आधुनिकता की फटी चादर ओढ़े हुए है.

गांवदेहातों में तो हाल और भी बदतर हैं. वहां विधवाएं खासतौर से शारीरिक शोषण का शिकार ज्यादा हैं- कोई देवर, जेठ या ससुर ही उन का भक्षक बना हुआ है. अशिक्षित या कम पढ़ीलिखी होने के कारण उन से मनमुताबिक कागजों पर दस्तखत करा कर उन के हिस्से की जमीनजायदाद बदस्तूर हड़पी जा रही है. दो वक्त की रोटी और सिर पर छत के एवज की कीमत उन से वसूली जाती है जो जायदाद की कीमत के आगे कुछ भी नहीं.

दिक्कत तो यह है कि क़ानूनी जागरूकता अभी शहरों तक में भी एक वर्ग विशेष तक ही सिमटी हुई है. विधवाओं को उन के क़ानूनी अधिकार बताने वाला कोई नहीं क्योंकि लोगों ने जागरूक करने वाली सामग्री पढ़नालिखना छोड़ रखा है. उन के हाथ में वह स्मार्टफोन है जो उन्हें पिछड़ा बनाए रखने की साजिश का बड़ा हिस्सा है.
ऐसे में विधवाओं को चाहिए कि वे क़ानूनी लड़ाई के जरिए अपने अधिकार लें, किसी दबाव में न आएं, कम से कम इस शर्त पर तो बिलकुल नहीं कि तुम हमें अपनी संपत्ति दे दो हम तुम्हें रोटीपानीछत देंगे.

बौक्स 1

संपत्ति और दूसरी शादी – 2005 में दूर हुई खामी

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में कुछ खामियां भी थीं जिन्हें मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2005 के संशोधनों के जरिए दूर किया था. इस अधिनियम की धारा 24 के तहत अगर कुछ खास किस्म की विधवाएं दूसरी शादी करती थीं तो वे अपने मृत पति की जायदाद का हक खो देती थीं. यह धारा मृत बेटे की विधवा, मृत बेटे के बेटे की विधवा और भाई की विधवा पर लागू होती थी. इस से विधवाओं की शादी में बाधाएं तो पैदा हो ही रही थीं लेकिन यह सवाल भी उठ खड़ा हो रहा था कि एक बार किसी को संपत्ति देने के बाद उस से वह छीन ली जानी क्या अन्याय नहीं.

खामी यह थी कि अगर कोई विधवा शादी कर दोबारा घरगृहस्थी बसाना चाहे तो उस की कीमत जायदाद दे कर उसे चुकाना पडती थी जो कि एक तरह की ज्यादती ही थी. जबकि पुरुषों यानी पतियों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था. इसे लैंगिक भेदभाव गलत नहीं माना गया था. 2005 के संशोधनों में धारा 24 को रद्द कर दिया गया तो विधवाओं की दूसरी शादी की अड़चन खत्म हो गई. अब पहले पति से मिली संपत्ति दूसरी शादी के बाद उस से छीनी नहीं जा सकती. विधि आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) के खिलाफ माना था, जो विधवा के जीवन के अधिकार वाले (अनुच्छेद 21) में दखल था.

बौक्स 2

भरण पोषण और ससुर
यह हर मामले में जरूरी नहीं था कि विधवा के पास पति की छोड़ी हुई संपत्ति हो. इसलिए हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 19 में यह व्यवस्था की गई थी कि ऐसी विधवा जिस के गुजारे का कोई साधन न हो वह अपने ससुर से गुजारा भत्ता लेने की हकदार होगी. अगर विधवा के पास आमदनी का कोई जरिया न हो और वह पति की संपत्ति से गुजर न कर पा रही हो तो ससुर को उसे गुजारा राशि देना पडती है लेकिन उसी सूरत में जब ससुर के पास आमदनी के पर्याप्त साधन हों. यानी, यह पूर्ण

अधिकार नहीं बल्कि एक शर्तिया अधिकार है जिस की एक शर्त यह भी है कि विधवा को मायके से भी कोई आर्थिक सहायता या संपत्ति न मिली हो.
इस विषय पर ताजा फैसला बीती एक अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की बैंच ने देते हुए कहा है कि पति की मौत के बाद भी महिला ससुर से गुजारा भत्ता मांग सकती है. यह तयशुदा नियम है कि पति पर पत्नी के भरणपोषण की जिम्मेदारी होती है. यह जिम्मेदारी पति की मौत के बाद भी जारी रहती है और कानून विधवा को अपने ससुर से भरणपोषण का दावा धारा 21 (8) के तहत करने की इजाजत देता है बशर्ते विधवा ने दूसरी शादी न की हो. Widow Rights

नरेंद्र मोदी की गिरती वैश्विक छवि : टाइम 100 की लिस्ट से गायब ‘सुपरमैन’

India Global Status: टाइम मैगजीन ने अपनी 2026 की सालाना ‘TIME 100’ लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट में दुनिया के 100 सब से प्रभावशाली लोगों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीन के शी जिनपिंग, इजराइल के बेंजामिन नेतन्याहू और नेपाल के 35 वर्षीय युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह जैसे नाम चमक रहे हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम इस बार पूरी तरह गायब है. यह मोदी की गिरती वैश्विक शाख का साफ संकेत भी है और भारत की जियो पौलिटिकल हैसियत का पैमाना भी है.

पिछले एक दशक से ज्यादा समय तक नरेंद्र मोदी की वैश्विक नेता की छवि बनाने के लिए विदेश दौरे हुए, कभी इंटरनैशनल योग दिवस का डंका पीटा गया, कभी जी 20 की बारीबारी से मिलने वाली अध्यक्षता की गाथा गाई गई. इस के बावजूद वो 2026 की टाइम लिस्ट से गायब हो गए. मतलब दुनिया अब नरेंद्र मोदी को उतना प्रभावशाली नहीं मानती जितना पहले मानती थी. हैरानी की बात यह है कि नेपाल जैसे छोटे देश का नया प्रधानमंत्री बालेन शाह, जो महज कुछ महीने पहले ही सत्ता में आए हैं, लिस्ट में जगह बना लेते हैं.

टाइम मैगजीन की लिस्ट में इस बार भारत से जुड़े सिर्फ 3 नाम शामिल हुए. टैक्नोलौजी के क्षेत्र से विदेशी नागरिकता ले चुके सुंदर पिचाई, सिनेमा से रणबीर कपूर और खानपान के मामले से जुड़े विकास खन्ना लेकिन सब से बड़ा सवाल यह है कि सत्ता के केंद्र में बैठे मोदी का नाम इस लिस्ट में क्यों नहीं? क्या मोदी की स्ट्रौंगमैन इमेज अब सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित रह गई है? और क्या वैश्विक मंच पर उन की छवि कमजोर पड़ रही है?

हाल के वर्षों में भारत की आंतरिक चुनौतियां इंटरनैशनल खबरों तक पहुंची है जिस की वजह से नरेंद्र मोदी की छवि कमजोर पड़ी है. बेरोजगारी, महंगाई, सांप्रदायिकता, सामाजिक ध्रुवीकरण और पड़ोसियों के साथ तनाव की खबरें दुनिया के बड़े अखबारों में लगातार छपी हैं. विदेश नीति में भारत का कभी रूस की ओर भागना तो कभी अमेरिका व इजराइल की तुष्टि करना महंगा पड़ा है. इस सब से मोदी की अंतर्राष्ट्रीय छवि प्रभावित हुई है.

टाइम लिस्ट राजनीतिक कद का आईना होती है. इस बार यह आईना मोदी को वह चेहरा दिखा रहा है जो अब उतना चमकदार नहीं है जितना पहले दर्शाया जाता था.

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