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Social Story : छोटी जात की लड़कियां होती ही ऐसी हैं

Social Story : उषा ने शालू के प्रति अपनी जो सोच बना डाली थी, वह एक गांठ बन गई थी उस के मन में. बेशक आज शालू का वह नया रूप देख रही थी लेकिन फिर भी कुछ था जो उषा को उसे गले लगाने से रोक रहा था.

‘प जामा पार्टी के नाम पर घर को होस्टल बना कर रख दिया इन लड़कियों ने. रिया भी पता नहीं कब समझदार बनेगी. जब देखो तब ले आती है इन लड़कियों को. जरा भी नहीं सोचती कि मेरा सारा शेड्यूल गड़बड़ा जाता है. अपने कमरे को कूड़ाघर बना दिया. खुद तो सब चली गईं मूवी देखने और मां यहां इन के फैलाए कचरे को साफ करती रहे.’

बेटी रिया के बेतरतीब कमरे को देखते ही उषा की त्योरियां चढ़ आईं. एक बारगी तो मन किया कि कमरे को जैसा है वैसा ही छोड़ दें, रिया से ही साफ करवाएं. तभी उसे एहसास होगा कि सफाई करना कितना मुश्किल काम है. मगर फिर बेटी पर स्वाभाविक ममता उमड़ आई, ‘पता नहीं और कितने दिन की मेहमान है. क्या पता कब ससुराल चली जाए. फिर वहां यह मौजमस्ती करने को मिले न मिले. काम तो जिंदगीभर करने ही हैं.’ यह सोचते हुए उषा ने दुपट्टा उतार कर कमरे के दरवाजे पर टांग दिया और फैले कमरे को व्यवस्थित करने में जुट गई.2 दिन पहले ही रिया के फाइनल एग्जाम खत्म हुए हैं.

कल रात से ही बेला, मान्यता और शालू ने रिया के कमरे में डेरा डाल रखा है. रातभर पता नहीं क्या करती रहीं ये लड़कियां कि सुबह 10 बजे तक बेसुध सो रही थीं. अब उठते ही तैयार हो कर सलमान खान की नई लगी मूवी देखने चल दीं. खानापीना सब बाहर ही होगा. पता नहीं क्या सैलिब्रेट करने में लगी हैं. अरे, एग्जाम ही तो खत्म हुए हैं, कोई लौटरी तो नहीं लगी. उषा बड़बड़ाती हुई एकएक सामान को सही तरीके से सैट कर के रखती जा रही थी कि अचानक शालू के बैग में से एक फोल्ड किया हुआ कागज का टुकड़ा नीचे गिरा. उषा उसे वापस शालू के बैग में रखने ही जा रही थी कि जिज्ञासावश खोल कर देख लिया. कागज के खुलते ही जैसे उसे बिच्छू ने काट लिया. उस फोल्ड किए हुए कागज के टुकड़े में इस्तेमाल किया हुआ कंडोम था. देख कर उषा के तो होश ही उड़ गए. उस में अब वहां खड़े रहने का भी साहस नहीं बचा था.‘क्या हो गया आज की पीढ़ी को. शादी से पहले ही यह सब. इन के लिए संस्कारों का कोई मोल ही नहीं. कहीं मेरी रिया भी इस रास्ते पर तो नहीं चल रही. नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता.

मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है. वह शालू की तरह चरित्रहीन नहीं हो सकती.’ हक्कीबक्की सी उषा किसी तरह अपनेआप को घसीट कर अपने कमरे तक लाई और धम्म से बिस्तर पर ढेर हो गई. शाम को चारों लड़कियां चहकती हुई घर में घुसीं तो उन की हंसी से घर एक बार फिर गुलजार हो उठा. मगर थोड़ी ही देर में चुप्पी सी छा गई. उषा ने सोचा शायद लड़कियां चली गईं. उस ने अपनेआप पर काबू रखते हुए रिया को आवाज लगाई.‘‘गईं क्या सब?’’ उषा ने पूछा.‘‘बाकी दोनों तो चली गईं, शालू अभी यहीं है.

वह आज रात और यहां रुकेगी,’’ रिया ने मां के पास बैठते हुए कहा.‘‘रिया, तू शालू का साथ छोड़ दे, वह लड़की चरित्रहीन है. मैं नहीं चाहती कि उस के साथ रहने से लोग तेरे बारे में भी गलत धारणा बनाएं,’’ उषा ने रिया को समझते हुए कहा.‘‘यह आप कैसी बातें कर रही हो मां. आप उसे जानती ही कितना हो? और बिना किसी पुख्ता सुबूत के यों किसी पर आरोप लगाना आप को शोभा नहीं देता.’’ मां के मुंह से अचानक यह बातें सुन कर रिया कुछ समझ नहीं. मगर अपनी जिगरी दोस्त पर यह बेहूदा इलजाम सुन कर उसे अच्छा नहीं लगा.‘‘यह रहा सुबूत.

आज तुम्हारे रूम की सफाई करते समय मुझे शालू के बैग से मिला था,’’ कहते हुए उषा ने वह कागज का टुकड़ा रिया के सामने खोल कर रख दिया. एकबारगी तो रिया से कुछ भी बोलते नहीं बना, बस, इतना भर कहा, ‘‘मां, किसी के व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू उस के चरित्र को नापने का पैमाना नहीं हो सकता. शालू के बैग से इस का मिलना यह कहां साबित करता है कि इस का इस्तेमाल भी शालू ने ही किया है. यह भी तो हो सकता है कि किसी ने उस के साथ जानबूझ कर यह शरारत की हो.’’‘‘शरारत, सिर्फ उसी के साथ क्यों?

तुम्हारे या किसी और के साथ क्यों नहीं? तुम तो अपनी सहेली का पक्ष लोगी ही. मगर सुनो रिया, यह लड़की मेरी नजरों से उतर चुकी है. यह तुम्हारे आसपास रहे, यह मुझे पसंद नहीं,’’ उषा ने अपना दोटूक फैसला रिया को सुना दिया.‘‘मां, शालू एक सुलझ हुई और समझदार लड़की है. वह अच्छी तरह जानती है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए. देखना, आप को एक दिन उस के बारे में अपनी राय बदलनी पड़ेगी.’’‘‘हां, वह तो उस के लक्षणों से पता चल ही रहा है कि वह क्या चाहती है. पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं. अरे, ये छोटी जात की लड़कियां होती ही ऐसी हैं. ऊंचा उठने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकती हैं,’’ कहते हुए उषा ने मुंह बिचका दिया. रिया भी उठ कर चल दी.कालेज तो खत्म हो चुके थे.

अब कैरियर बनाने का वक्त था. रिया के पापा चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी को चुने. मगर रिया किसी अच्छी मल्टीनैशनल कंपनी में जाना चाहती थी. जब तक कोई ढंग का औफर नहीं मिलता तब तक रिया ने अपने पापा का मन रखने के लिए एक कोचिंग में ऐडमिशन ले लिया ताकि पढ़ाई से जुड़ाव बना रहे.उषा को बहुत बुरा लगा जब उसे पता चला कि शालू भी उसी कोचिंग में जा रही है. रिया को समझने का कोई मतलब नहीं था, वह अपनी सहेली के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. उषा की नाराजगी से बेखबर शालू का उस के घर आनाजाना बदस्तूर जारी था. हां, उषा के व्यवहार का रूखापन वह साफसाफ महसूस कर रही थी. वह देख रही थी कि पहले की तरह अब आंटी उस से हंसहंस कर बात नहीं करतीं बल्कि उसे देखते ही अपने कमरे में घुस जाती हैं.

कभी आमनासामना हो भी जाए तो बातबेबात उसे टारगेट कर के ताने सुनाने लगती हैं. उस के लिए तो चायपानी भी रिया खुद ही बनाती है. शालू ने कई बार पूछना भी चाहा मगर रिया ने हमेशा यह कह कर टाल दिया, ‘छोड़ न, मां थक जाती होंगी. वैसे भी हमें अब अपने काम खुद करने की आदत डाल लेनी चाहिए.’ और दोनों मुसकरा कर चाय बनाने में जुट जाती थीं. इधर उषा ने रिया पर कुछ ज्यादा ही कड़ाई से नजर रखनी शुरू कर दी.

वह जबतब रिया का मोबाइल ले कर उस के मैसेज, व्हाट्सऐप, फेसबुक अकांउट, आदि चैक करने लगी. कभीकभी छिप कर उस की बातें भी सुनने की कोशिश करती. यह सब रिया को बहुत बुरा लगता था, मगर वह मां के मन की उथलपुथल को समझ रही थी. ऐसे में उस का कुछ भी बोलना उन्हें आहत कर सकता था. उन्हें डिप्रैशन में ले जा सकता था या फिर हो सकता था कि गुस्से में आ कर मां उस के बाहर आनेजाने पर ही रोक लगा दें. यही सोच कर रिया चुपचाप मां की हर बात सहन कर रही थी. सर्दी के दिन थे. रात के 8 बज रहे थे. रिया अभी तक कोचिंग से नहीं लौटी थी.

रोज तो 7 बजे तक आ जाती है. क्या हुआ होगा. घड़ी की सुइयों के साथसाथ उषा की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी. तभी बदहवास सी रिया ने घर में प्रवेश किया. उस की हालत देखते ही उषा का कलेजा कांप उठा. बिखरे हुए बाल, मिट्टी से सने हाथपांव, कंधे से फटा हुआ कुरता. ‘‘क्या हुआ? ऐक्सिडैंट हो गया था क्या? फोन तो कर देतीं,’’

उषा ने एक ही सांस में कई प्रश्न पूछ डाले.‘‘हां, ऐक्सिडैंट ही कह सकती हो. कोचिंग के बाहर औटो का इंतजार कर रही थी कि अचानक कुछ लड़कों ने मुझे घेर लिया.’’ रिया सुबकते हुए अपने साथ हुए हादसे के बारे में बता ही रही थी कि उषा बीच में ही बोल पड़ी. ‘‘आखिर वही हुआ न जिस का मुझे डर था. अरे शालू जैसी छोटी जात की लड़की के साथ रहोगी तो यह दिन तो आना ही था. कितना समझाया था मैं ने कि उस से दूर रहो, मगर मेरी सुनता कौन है.’’

‘‘बस करो मां. आज शालू के कारण ही मैं सहीसलामत आप के सामने खड़ी हूं. उस ने वक्त पर आ कर मेरी मदद नहीं की होती तो आज मैं कहीं की न रहती. उसी छोटी जात की लड़की ने आज आप की लाडली के चरित्र पर दाग लगने से बचाया है,’’ रिया ने रोते हुए कहा और उषा को विचारों के जाल में उलझ छोड़ कर सुबकती हुई अपने कमरे में चली गई. लगभग 6 महीने की कोचिंग में शालू और रिया ने कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं और आखिरकार छोटी जात के विशेष कोटे में शालू का चयन वन विभाग में सुपरवाइजर के पद पर हो गया. रिया का चयन न होने से उस के पापा काफी निराश हुए.

मगर उषा बहुत खुश थी. वह सोच रही थी, ‘चलो, कैसे भी कर के आखिर उस शालू से पीछा तो छूटा.’कुछ ही महीनों में रिया ने भी अच्छे औफर पर एक मल्टीनैशनल कंपनी जौइन कर ली. हालांकि अब दोनों सहेलियों का प्रत्यक्ष मिलना कम ही होता था मगर फिर भी फोन और सोशल मीडिया पर दोनों का साथ बराबर बना हुआ था. रोज रात को दोनों एकदूसरे से दिनभर की बातें शेयर किया करती थीं. कभीकभार शालू लंचटाइम में आ कर? उस से मिल जाया करती थी.रिया की कंपनी अपनी शाखाओं का विस्तार गांवों और कसबों तक करना चाह रही थी. इसी सिलसिले में कंपनी के सीईओ ने उसे प्रोजैक्ट हेड बना कर एक छोटे कसबे में भेजने के आदेश दे दिए. हमेशा महानगर में रही रिया के लिए यह काम आसान नहीं था. उसे तो अपना कोई काम हाथ से करने की आदत ही नहीं थी.‘‘एक दिन की बात तो है नहीं, प्रोजैक्ट तो लंबा चलेगा. कसबों में रहनेखाने की कहां और कैसे व्यवस्था होगी.

सोचसोच कर रिया परेशान थी. उषा ने तो सुनते ही उसे यह प्रोजैक्ट लेने से मना कर दिया और नौकरी छोड़ने तक की सलाह दे डाली, मगर रिया समझती थी कि उस का यह प्रोजैक्ट करना कितना जरूरी है क्योंकि इनकार करने का मतलब नईनई नौकरी से हाथ धोना तो है ही, साथ ही, यह उस की इमेज का भी सवाल था.यों परेशानियों से घबरा कर अपने पांव पीछे हटाना उस के आगे के कैरियर पर भी सवाल खड़े कर सकता है.

उस ने शालू से अपनी परेशानी का जिक्र किया तो शालू ने उसे हिम्मत से काम लेने को कहा. उसे समझाया कि जिंदगी में आने वाली परेशानियों से ही आगे बढ़ने के रास्ते खुलते हैं. फिर शालू ने उस कसबे में अपने विभागीय रैस्ट हाउस में रिया के रहने की व्यवस्था करवाई और साथ ही, वहां के अटेंडैंट को हिदायत दी कि रिया को किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.रिया का नया प्रोजैक्ट मुंबई से लगभग 500 किलोमीटर की दूरी पर था. छोटा कसबा होने के कारण यातायात के साधन सीमित थे और इंटरनैट की उपलब्धता न के बराबर ही थी.

हां, फोन की कनैक्टिविटी ठीकठाक होने से उस की परेशानी कुछ कम जरूर हुई थी. अभी रिया को वहां गए महीनाभर भी नहीं हुआ था कि उषा की तबीयत अचानक खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में भरती करवाया गया तो जांच में पता चला कि उस के गर्भाशय में बड़ी गांठ है. गांठ को निकालने की कोशिश से उषा की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए औपरेशन कर के गर्भाशय ही निकालना पड़ेगा. खबर मिलते ही रिया तुरंत छुट्टी ले कर मुंबई आ गई.

उषा का औपरेशन सफल रहा और 10 दिनों तक औब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे हौस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया.उषा को एक महीना बैड रैस्ट की सलाह दी गई थी. चूंकि रिया का प्रोजैक्ट और नौकरी दोनों ही नए थे, इसलिए उसे ज्यादा छुट्टी नहीं मिली और अब उस के सामने 2 ही विकल्प थे- या तो वह नौकरी छोड़े या फिर मां को अकेले छोड़ कर जाए. रिया कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही थी. शालू को जब यह बात पता चली तो उस ने तुरंत एक महीने की छुट्टी ली और अपना सामान ले कर रिया के घर पहुंच गई. पूरा एक महीना वह साए की तरह उषा के साथ बनी रही. उषा के खानेपीने से ले कर वक्त पर दवाएं देने और उस के नहानेधोने तक का शालू ने पूरा खयाल रखा.उषा उस के इस दूसरे रूप को देख कर हैरान थी. एक छोटी जात की लड़की के बड़प्पन का यह दूसरा पहलू सचमुच उसे चौंकाने वाला था.

कभी शालू को चरित्रहीन समझने वाली उषा को आज अपनी सोच पर बहुत पछतावा हो रहा था. मगर न जाने क्या था जो अब भी उसे शालू को गले लगाने और उसे अपनी देखभाल करने के लिए थैंक्यू कहने से रोक रहा था. कल शालू की छुट्टी का आखिरी दिन था. उषा भी अब लगभग स्वस्थ हो चुकी थी. रात को खाना ले कर शालू उषा के कमरे में गई तो उस की आंखों में आंसू देख कर चौंक गई. ‘‘क्या हुआ आंटी? कुछ परेशानी है क्या?’’ शालू ने पूछा. उषा ने कोई जवाब नहीं दिया मगर दो बूंदों ने ढुलक कर उस के दिल का सारा हाल बयान कर दिया. शालू उस के पास गई. धीरे से उस का सिर अपने सीने से सटा लिया. उषा से अब अपनेआप को रोका नहीं गया और वह शालू से लिपट कर रो पड़ी.

‘‘मुझे माफ कर देना शालू, मैं ने तुम्हारे बारे में बहुत ही गलत राय बना रखी थी. अपने बचकाना व्यवहार के लिए मैं तुम से बहुत शर्मिंदा हूं.’’‘‘आप कैसी बातें करती हो आंटी? आप ने मेरे बारे में जैसी भी राय बनाई है, मैं ने तो हमेशा ही आप पर अपना अधिकार समझ है और इसी अधिकार के चलते मैं बेहिचक यहां आतीजाती रही हूं. सच कहूं, मुझे आप के तानों का जरा भी बुरा नहीं लगता था. कहीं न कहीं आप के दिल में मेरे लिए फिक्र ही तो थी जो आप को ऐसा करने के लिए मजबूर करती थी.

इसलिए अब पिछली सारी कड़वी बातों को भूल जाइए. कल रिया आने वाली है न, हमसब मिल कर फिर से पहले की तरह मस्ती करेंगे,’’ शालू ने चहकते हुए कहा और उषा से लिपट गई.उषा आज अपनी भूल पर बहुत पछता रही थी.

वह शिद्दत से महसूस कर रही थी कि किसी व्यक्ति का सिर्फ एक ही पहलू देख कर उस के बारे में अपनी पुख्ता धारणा बना लेना कितना गलत हो सकता है. और यह भी कि यह फोर्थ जेनरेशन कितनी प्रैक्टिकल सोच रखने वाली पीढ़ी है. सचमुच वह कागज का टुकड़ा, जो उसे शालू के बैग से मिला था, उस के चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं था. Social Story 

Family Story In Hindi : पुलिसवाले की बेटी

Family Story In Hindi : “पापा, आप को याद है न. कल इस सेशन की लास्ट पीटीएम है. मैम, फाइनल ऐग्जाम के लिए बहुत सारी बातें बतानी वाली हैं. आप को और मम्मी को समय से आना है,” 4वीं में  पढ़ने वाली लहर पापा से लाड़ से बोली.

“हां, बेटा, जरूर. अपनी लविंग डौल की बात भला मैं कैसे भूल सकता हूं?” उस के बालों को प्यार से सहलाते हुए विभव ने जब उसे प्रौमिस किया तो नन्ही लहर की खुशी का ठिकाना न रहा.

”पक्का वाला प्रौमिस न. पिछली बार की तरह भूल तो नहीं जाओगे?” उस के मन में पिछले पीटीएम में विभव के न आने से एक हलकी सी शंका अभी तैर रही थी.

”अरे, पक्का. इस बार कोई मिस्टेक नहीं होगी,” यह लहर के पापा ऐडिशनल डीसीपी विभव मल्होत्रा का अपनी बिटिया से कमिटमैंट है,” विभव ने ऐङियां बजाते हुए लहर को सैल्यूट ठोंका.

”यह हुई न बात,”  हाईफाई के लिए उठे लहर के नन्हे हाथों को पापा के हाथों का साथ मिल गया.

”अरे, बेटा 1 मिनट. मम्मा को तो तुम ने याद दिला दिया है न?”

”हां,  मैं उन्हें आप से पहले ही बता चुकी हूं और उन से पक्का वाला प्रौमिस भी ले चुकी हूं,” अपने होंठों को गोल करते हुए उस ने विभव को शरारत में चिढ़ाया.

पापबिटिया की अभी बातचीत चल ही रही थी कि दरवाजे पर स्कूल वैन की हौर्न सुनाई पड़ी.

”अरे, चलोचलो, स्कूल का टाइम हो गया है,” नव्या किचन से टिफिन बौक्स ले कर निकलती हुई लहर के बैकपैक में रखते हुए बोली, “बाकी बातें घर आ कर कर लेना.”

“ठीक है, ठीक है, लेकिन कल के पीटीएम का टाइम आप दोनों याद रखिएगा. मम्मीपापा को फ्लाइंग किस देते हुए लहर वैन में बैठ कर स्कूल चली गई.

”अरे, आप अभी गेट पर ही खड़े हैं. आप की लाडो तो कब की स्कूल जा चुकी है और हां, आप की चाय भी आप का इंतजार कर रही है,” लहर की भोलीमनुहारी बातों में डूबा विभव होम मिनिस्टर की काल सुन कर वर्तमान में वापस लौट आया,” अरे हां, अभी आया.”

”नव्या, इस बार लहर का पीटीएम किसी भी कीमत पर मिस नहीं करना है.”

”तो इस में परेशान होने की क्या बात है? कमिश्नर साहब को बता कर 1-2 घंटे की परमिशन पहले से ही ले लीजिए.”

”तुम ठीक कह रही हो, सर से रिक्वैस्ट कर लेता हूं.”

”तो यह लीजिये अपना फोन. नेक काम में देरी ठीक नहीं होती,” नव्या ने हंसते हुए विभव को उस का मोबाइल जैसे ही थमाया, उस ने फौरन बौस को व्हाट्सऐप पर रिक्वैस्ट भेज दिया. अभी चाय खत्म भी नहीं हो  पाई थी कि मोबाइल पर उन का रिप्लाई भी फ्लैश हो गया.

”नव्या, देखोदेखो  कमिश्नर साहब ने क्या लिखा है?” बिटिया के इस छोटे और भोले आग्रह को पूरा करने के लिए विभव के साथसाथ नव्या भी बहुत उत्सुक थी.

पुलिस की नौकरी में आएदिन के बवाल को देखते हुए छुट्टी हमेशा एक आकाश कुसुम चीज बनी रहती है.आशंका के इस भंवर के बीच विभव ने मैसेज को पूरा पढ़ने के लिए क्लिक किया, ”श्योर, यू आर परमिटेड ऐंड आल्सो गिव माई ब्लैसिंग्स टू आवर एंजेल,” बौस का मैसेज पढ़ कर विभव की आंखें खुशी से नम हो आईं.

दोपहर लगभग 1 बजे औफिस में विभव जरूरी फाइल निबटा रहा था, तभी मोबाईल पर नव्या के काल की रिंगटोन बजी,”नव्या, क्या बात है?”

उधर से नव्या की घबराई हुई आवाज आई,”पापा का फोन आया था कि मम्मी की तबियत अचानक से बिगड़ गई है. मुझे इलाहाबाद जाना होगा, पर समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? कल लहर का पीटीएम है और मैं ने आज तक कभी उसशका पीटीएम मिस नहीं किया है,” बोलतेबोलते उस का गला भर आया.

“ओह, बट डोंट वरी, तुम्हारा वहां जाना ज्यादा जरूरी है. मैं तुम्हारे लिए गाड़ी की व्यवस्था करता हूं. तुम तैयारी करो और हां, मेड को बता दो कि लहर स्कूल से आए तो वह उस का ध्यान रखेंगी. मैं भी आज औफिस से थोड़ा पहले घर आ जाऊंगा.”

”ठीक है, पर प्लीज जरूर याद रखिएगा कि कल उस का पीटीएम है.”

“हां, श्योर. तुम चिंता मत करो. मैं सब संभाल लूंगा.”

शाम को विभव जैसे ही घर आया लहर उस से चिपक गई, “पापा, मम्मी के बिना घर कितना बुरा सा लग रहा है. लेकिन कोई बात नहीं, नानीजी की देखभाल भी तो जरूरी काम है न,” लहर को बड़ोंबड़ों जैसी बातें करते हुए सुन कर विभव सोचने लगा कि बेटियां कम उम्र में ही घर के प्रति कितनी जिम्मेदार हो जाती हैं.

पापा को सोच में डूबा हुआ देख लहर थोड़ी देर खामोश रही, फिर धीरे से बोली,” पापा, कल मेरी पीटीएम है. आप को याद है न.”

प्यार से उस की नाक हिलाते हुए विभव ने उसे आश्वस्त किया,”अरे, यह भी भला कोई भूलने वाली बात है.” चलो, थोड़ी देर कार्टून देखते हैं.”

“वाह, यह हुई न बात,” लहर ने झट से टीवी औन कर दिया.

अभी पितापुत्री कार्टून देखते हुए मस्ती कर रहे थे कि विभव के मोबाइल फोन पर पुलिस कंट्रोलरूम की काल आई. मोबाइल पर काल रिसीव करतेकरते विभव की मुखमुद्रा गंभीर होती चली गई,” ओके, रैड अलर्ट कराइए. मैं पहुंच रहा हूं,” फोन कटते ही उस ने ड्राइवर को गाड़ी लगाने का और्डर दिया और फिर लहर से बोला, ”बेटा, शहर में कुछ जगह पर दंगा हो गया है. मुझे तुरंत जाना होगा. आया आंटी घर में तुम्हारे साथ रहेंगी.”

2 मिनट में तैयार हो कर जब विभव ड्यूटी के लिए निकलने लगा तो एक जोड़ी नन्ही उदास आंखें सोफे पर से उसे जाते हुए देख रही थीं.

”डोंट वरी बेटा, औल विल बी ओके. वेरी सून बीफोर योअर पीटीएम.”

”जी, पापा. आप निश्चिंत हो कर जाइए. आल द बैस्ट. मैं आप का इंतजार करूंगी.”

गाड़ी स्टार्ट होते ही विभव जब तक नव्या को फोन लगाता तब तक उस का फोन खुद आ गया, ”टीवी पर बहुत डरावनी न्यूज आ रही है. यह सब अचानक कैसे? तुम कहां हो?”

”मैं घटनास्थल के लिए रवाना हूं.”

”और लहर?”

”वह घर पर है, आया के साथ. मैं तुम्हें बाद में काल करता हूं.”

शहर में चारों ओर हाहाकार मचा था. ऐडिशनल डीसीपी होने के कारण अपने एरिया की नाकेबंदी करना, सर्च औपरेशन चला कर फोर्स को मोबिलाइज करना, सीनियर्स को अपडेट करना, आदि हजारों काम एकसाथ आन पड़े. एक हाथ में वायरलेस का माउथपीस और दूसरे में मोबाइल, आदेशनिर्देश का सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा था और इधर घायलों को अस्पताल पहुंचाने और पब्लिक को सुरक्षित रखने में रात कब सुबह में तब्दील हो गई, पता ही नहीं चला.

इधर पापा की राह तकती लहर पता नहीं कब सोफे पर ही सो गई. आया ने उसे उठा कर बैडरूम में लिटा दिया. सुबह आंखें खोलते ही उस ने आया आंटी से पूछा, ”पापा कहां हैं?”

आया के सिर हिला कर न कहते ही उस की आंखो में जाग रही आशा की किरण सहसा बुझ गई. थोड़ी देर तक वह बिस्तर पर यों ही गुमसुम बैठी रही फिर, उस ने विभव को काल लगाया,”पापा, आप कैसे हो? आप कल बिना खाना खाए चले गए थे? आप भूखे होंगे न?”

”बेटा, मैं बिलकुल ठीक हूं. सिचुएशन भी पहले से अच्छी है. तुम समय से पीटीएम के लिए तैयार हो जाना. मैं आने की कोशिश कर रहा हूं. फिर साथ चलेंगे.”

चूंकि उस समय तक दंगे की आंच कुछ धीमी हो गई थी, इसलिए उसे लगा कि वह थोड़ी देर के लिए समय निकाल कर पीटीएम में जरूर शामिल हो जाएगा. मगर थोड़ी देर बाद ही कमिश्नर साहब का मैसेज आया,”विपक्षी पार्टियों के नेताओं का 9 बजे दंगाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करने की सूचना प्राप्त हुई है. लेकिन उन के आने से कानूनव्यवस्था बिगड़ सकती है अतः उन्हें बौर्डर पर रोकने का निर्देश है. तुम तुरंत बौर्डर पर पहुंच कर उन्हें रोको,” पीटीएम में जाने की अभीअभी खिली आशा की कोंपले इस मैसेज के आते ही पलभर में मुरझा गई.

आज पहली बार ड्यूटी के आगे पिता का कर्तव्य पूरा न कर पाने का दुख उस पर भारी लग रहा था. यदि नव्या यहां होती तो वह इतना हैल्पलेस महसूस न करता. लेकिन अगले ही क्षण मन को मजबूत कर वह अगली ड्यूटी के लिए तैयार हो गया.

घड़ी में देखा तो 8 बज रहे थे, ‘ओह, लहर की वैन आती ही होगी. अब लहर के साथ स्कूल जाना तो संभव नहीं है. उसे दुख तो जरूर होगा लेकिन उसे बता देना भी आवश्यक है,’ यह सोच कर उस ने दिल को कड़ा कर लहर को फोन लगाया, ”बेटा, कुछ जरूरी काम आ गया है. तुम तैयार हो कर वैन से स्कूल पहुंचो, मैं सीधे वहीं आने की कोशिश करता हूं.”

”कोशिश? सब ठीक है, न पापा ?” आशा और हताशा दोनों उस की आवाज में डूबउतरा रहे थे.

”सब ठीक है, बेटा. कुछ जरूरी काम है. तुम स्कूल पहुंचो, मैं सीधे वहीं आता हूं और हां यदि मेरे पहुंचने तक तुम्हारा नंबर आ जाए तो क्लासटीचर नीना मैम से बोल देना कि पापा थोड़ी देर में आ रहे हैं, मेरा टर्न बाद में ले लीजिए.”

”ओके पापा, बाय. मैं आप का इंतजार करूंगी,” उस के पास इस समय कहने के लिए कोई और शब्द नहीं बचा था.

बौर्डर पर पहुंचने के ठीक पहले कमिश्नर साहब की काल फिर से आई, ”विभव, तुम से अच्छा सौफ्ट ऐंड निगोशिएशन स्किल किसी अन्य औफिसर में नहीं है. इसलिए तुम्हें भेजा है. जो कर सकते हो, करो. बौर्डर पर सिंचाई विभाग का डाक बंगला है, उन्हें किसी तरह वहां ले जाओ और वहीं इंगेज रखो.”

”जी सर, श्योर,” अभी बात समाप्त होती कि कमिश्नर साहब की आवाज फिर से गूंजी,”विभव, आई एम सौरी, तुम्हें आज बिटिया के पीटीएम में जाना था, मगर सब गड़बड़ हो गया न. आई एम रियली सौरी,” उन की आवाज में भी दुख साफसाफ झलक रहा था.

”कोई बात नहीं, सर. पुलिस की जौब इसलिए तो एक मिशन कही जाती है. आप को यह बात याद रही, यही मेरे लिए बहुत है.”

”ओके थैंक्स ऐंड बैस्ट औफ लक.”

नेता विपक्ष के आने के पहले बौर्डर की नाकेबंदी कर वह उन का इंतजार करने लगा. पर इस समय उसे रहरह कर लहर की बहुत याद आ रही थी. कभी वैन में अकेले बैठी लहर का उदास चेहरा तो कभी दूसरे बच्चों के मम्मीपापा की भीड़ में अपने पापा को ढूंढ़ती उस की मासूम निगाहें,

कल्पना में उभर रहे ये चित्र दृढ़ पुलिस अफसर के अंदर पिता के मुलायम दिल को रहरह कर विचलित कर रहे थे.

लगभग आधे घंटे विलंब से विपक्षी दलों के नेताओं का प्रतिनिधिमंडल एस कुमार के नेतृत्व में वहां आ पहुंचा. शुरुआत में तो उन्होंने खूब तेवर दिखाए. विभव भी कभी नरम तो कभी सख्त रूख अपनाते हुए दंगाग्रस्त क्षेत्र में न जाने के तर्क दे कर उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा था कि तभी उस के फोन पर लहर की नीना मैम की काल आई,”सर, आप आ रहे हैं न पीटीएम में?” अभी वह कुछ बोलता कि वह फिर से बोलीं, ” लीजिए, लहर बात करेगी.”

विपक्ष में होने के कारण यों तो विपक्ष का एस कुमार काफी आक्रमक थे, पर इंसान के तौर पर वे काफी मैच्योर एवं सुलझे हुए थे. विभव जब लहर को फोन पर यह समझा रहा था कि  वह एक बहुत महत्त्वपूर्ण ला ऐंड और्डर ड्यूटी में व्यस्त है तो वे उस की बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे. बात समाप्त हो जाने पर उन्होंने विभव से पूछा, ”क्या बात है औफिसर, कोई परेशानी?”

”नहीं सर, वह बिटिया का स्कूल से फोन था.”

“अरे भाई, हम भी फैमिली वाले हैं. बताओ क्या परेशानी है? राजनीति से अलग हट कर पूछ रहा हूं.”

”सर, आज उस का पीटीएम है और उस की नानी की तबियत अचानक खराब हो जाने के कारण उस की मां इलाहाबाद चली गई है इसलिए वह पीटीएम में मेरा इंतजार कर रही है.”

एस कुमारजी ने कुछ देर सोचा फिर भीड़ से थोड़ा अलग अकेले में ले जा कर वे विभव के कान में धीमे से बोले, ”मुझे डिटेन करने के लिए कोई जगह तो जरूर चुनी होगी आप लोगों ने?”

”जी सर, पास में ही सिंचाई विभाग का डाकबंगला है.”

“तो मुझे और मेरे समर्थकों को तुरंत वहां ले चलो,” उन की आंखें कुछ इशारा कर रही थीं. विभव को एक बारगी विश्वास ही नहीं हुआ.

तब एस कुमार ने कहा, ”देर मत करो, पार्टी वालों का कोई ठिकाना नहीं है कि कब मामला बिगड़ जाए.”

विभव उन्हें और उन के समर्थकों को योजनानुसार डाकबंगले में ले आया.

वहां पहुंचते ही वै बोले, ”अब आप निश्चिंत हो कर पीटीएम में जा सकते हो, अब हम कहीं नहीं जा रहे. हम यहीं पर विरोध कर लेंगे.”

”मगर सर…”

”अच्छा 1 मिनट. शायद तुम्हारे सीनियर्स को इतनी सरलता से समस्या सुलझ जाने पर विश्वास न हो. रुको, मैं तुम्हारे कमिश्नर साहब को खुद फोन कर आश्वस्त कर देता हूं,” कमिश्नर साहब के लाइन पर आते ही वे बोले,” कमिश्नर साहब, मैं आप का औफर स्वीकार कर गेस्ट हाउस में आ गया हूं. अब मेरा आगे का कोई प्रोग्राम नहीं है. अब कृपा कर इन्हें बिटिया के पीटीएम में जाने की अनुमति दे दीजिए.”

कमिश्नर साहब, ”व्हाई नौट, सर. विभव को बता दीजिए कि वह पीटीएम में निश्चिंत हो कर जा सकता है.”

एस कुमारजी विभव से बोले, “अब आप तुरंत स्कूल पहुंचो, बिटिया आप का इंतजार कर रही होगी.”

“थैंक्यू सर. मेरे पास आप को शुक्रिया अदा करने के लिए कोई शब्द नहीं हैं.”

“थैंक्यू… लेकिन अभी अपना समय बरबाद मत करो. तुरंत स्कूल पहुंचो.”

पीटीएम समाप्त होने में अब मात्र आधा घंटा ही बचा था और इस जगह से लहर का स्कूल करीब 10 किमी दूर था. विभव ड्राइवर से बोला,” जगदीश, चलो बिटिया के पास जाना है उस के स्कूल. पीटीएम खत्म होने में मात्र आधा घंटा बचा है.”

“जी सर, मुझे भी बिटिया की याद आ रही है.”

पीटीएम खत्म होने के ठीक 5-7 मिनट पहले जब विभव ने लहर के क्लासरूम में प्रवेश किया तो क्लासरूम में वह अकेली स्टूडैंट बची थी. पापा को देखते ही उस की खुशी का ठिकाना न रहा, “मैम, देखिए, मेरे पापा भी आ गए,” उस की आवाज की खनक से पूरा क्लासरूम झूम उठा.

नीना मैम बोली, “अरे आइए, सर. हमलोग आप का ही इंतजार कर रहे थे और लहर की निगाहें तो लगातार घड़ी और दरवाजे पर ही टिकी थीं.”

“मैम, पुलिस जौब में कुछ चीजें इतनी अचानक और महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं कि बाकी सबकुछ पीछे रह जाता है.”

नीना मैम बोली,” यू आर राइट सर. जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जहां हमारी सब से ज्यादा जरूरत होती है, पर हम वहां नहीं रह पाते और मुझे पता है कि आप की जौब में तो ऐसे पल अकसर आते रहते हैं.”

“धन्यवाद मैम, और यदि आप की इजाजत हो तो इस की मम्मी से आप की वीडियो काल पर बात करा दूं? वह भी पीटीएम में आने के लिए बहुत उत्सुक थी लेकिन अचानक…”

नीना मैम बोली,” औफकोर्स, प्लीज…”

वीडियो कालिंग के जरीए लहर की पीटीएम में शामिल हो कर नव्या को भी बहुत अच्छा लगा.

पीटीएम से निकलने के बाद लहर विभव के गले में हाथ डाल कर झूला झूलती हुई बोली, “पापा, एक बात बताऊं, जब सब के पेरैंट्स 1-1 कर आजा रहे थे और अंत में जब मैं क्लास में अकेली रह गई तो मुझे अंदर से बहुत रूलाई आ रही थी. लेकिन मुझे लग रहा था कि आप जरूर यहां आएंगे, थैंक्यू पापा.”

“लव यू बेटा…”

लेखक : चिरंजीव सिन्हा

Love Story In Hindi : प्यार का खतरनाक खेल

Love Story In Hindi : शिखा के पास उस समय नीरज भी खड़ा था जब अनिता ने उस से कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारी मम्मी को फोन कर के उन से इजाजत ले ली है.’’

‘‘किस बात की?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘आज रात तुम मेरे घर पर रुकोगी.

कल रविवार की शाम मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊंगी.’’

‘‘कोई खास मौका है क्या?’’

‘‘नहीं. बस, बहुत दिनों से किसी के साथ दिल की बातें शेयर नहीं की हैं. तुम्हारे साथ जी भर कर गपशप कर लूंगी, तो मन हलका हो जाएगा. मैं लंच के बाद चली जाऊंगी. तुम शाम को सीधे मेरे घर आ जाना.’’

नीरज ने वार्त्तालाप में हिस्सा लेते हुए कहा, ‘‘अनिता, मैं शिखा को छोड़ दूंगा.’’

‘‘इस बातूनी के चक्कर में फंस कर ज्यादा लेट मत हो जाना,’’ कह कर अनिता अपनी सीट पर चली गई.

औफिस के बंद होने पर शिखा नीरज के साथ उस की मोटरसाइकिल पर अनिता के घर जाने को निकली.

‘‘कल 11 बजे पक्का आ जाना,’’ नीरज ने शिखा को अनिता के घर के बाहर उतारते हुए कहा.

‘‘ओके,’’ शिखा ने मुसकरा कहा.

अनिता रसोई में व्यस्त थी. शिखा उन किशोर बच्चों राहुल और रिचा के साथ गपशप करने लगी. अनिता के पति दिनेश साहब घर पर उपस्थित नहीं थे. अनिता उसे बाजार ले गई. वहां एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में घुस गई. अनिता और दुकान का मालिक एकदूसरे को नाम ले कर संबोधित कर रहे थे. इस से शिखा ने अंदाजा लगाया कि दोनों पुराने परिचित हैं.

‘‘दीपक, अपनी इस सहेली को मुझे एक बढि़या टीशर्ट गिफ्ट करनी है. टौप क्वालिटी की जल्दी से दिखा दो,’’ अनिता ने मुसकराते हुए दुकान के मालिक को अपनी इच्छा बताई.

शिखा गिफ्ट नहीं लेना चाहती थी, पर अनिता ने उस की एक न सुनी. दीपक खुद अनिता को टीशर्ट पसंद कराने के काम में दिलचस्पी ले रहा था. अंतत: उन्होंने एक लाल रंग की टीशर्ट पसंद कर ली.

शिखा के लिए टीशर्ट के अलावा अनिता ने रिचा और राहुल के लिए भी कपड़े खरीदे फिर पति के लिए नीले रंग की कमीज खरीदी.

दुकान से बाहर आते हुए शिखा ने मुड़ कर देखा तो पाया कि दीपक टकटकी बांधे उन दोनों को उदास भाव से देख रहा है. शिखा ने अनिता को छेड़ा, ‘‘मुझे तो दाल में काला नजर आया है, मैडम. क्या यह दीपक साहब आप के कभी प्रेमी रहे हैं?’’

‘‘प्रेमी नहीं, कभी अच्छे दोस्त थे… मेरे भी और मेरे पति के भी. इस विषय पर कभी बाद में विस्तार से बताऊंगी. पतिदेव घर पहुंच चुके होंगे.’’

‘‘अच्छा, यह तो बता दीजिए कि आज क्या खास दिन है?’’

‘‘घर पहुंच कर बताऊंगी,’’ कह कर अनिता ने रिकशा किया और घर आ गईं.

वे घर पहुंचीं तो दिनेश साहब उन्हें ड्राइंगरूम में बैठे मिले. शिखा को देख कर उन के होंठों पर उभरी मुसकान अनिता के हाथ में लिफाफों को देख फौरन गायब हो गई.

‘‘तुम दीपक की दुकान में क्यों घुसीं?’’ कह कर उन्होंने अनिता को आग्नेय दृष्टि से देखा.

‘‘मैं शिखा को अच्छी टीशर्ट खरीदवाना चाहती थी. दीपक की दुकान पर सब से

अच्छा सामान…’’

‘‘मेरे मना करने के बावजूद तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई उस की दुकान में कदम रखने की?’’ पति गुस्से से दहाड़े.

‘‘मुझ से गलती हो गई,’’ अनिता ने मुसकराते हुए अपने हाथ जोड़ दिए, ‘‘आज के दिन तो आप गुस्सा न करो.’’

‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का सब से मनहूस दिन है,’’ कह कर गुस्से से भरे दिनेशजी अपने कमरे में चले गए.

‘‘मैडम, जब आप को मना किया गया था तो आप क्यों गईं दीपक की दुकान पर?’’

आंखों में आंसू भर कर अनिता ने उदास लहजे में जवाब दिया, ‘‘आज मैं तुम्हें 10 साल पुरानी घटना बताती हूं जिस ने मेरे विवाहित जीवन की सुखशांति को नष्ट कर डाला. मैं कुसूरवार न होते हुए भी सजा भुगत रही हूं, शिखा.

‘‘दीपक का घर पास में ही है. खूब आनाजाना था हमारा एकदूसरे के यहां. दिनेश साहब जब टूर पर होते, तब मैं अकसर उन के यहां चली जाती थी.

‘‘दीपक मेरे साथ हंसीमजाक कर लेता था. इस का न कभी दिनेश साहब ने बुरा माना, न दीपक की पत्नी ने, क्योंकि हमारे मन में खोट नहीं था.

‘‘एक शाम जब मैं दीपक के घर पहुंची, तो वह घर में अकेला था. पत्नी अपने दोनों बच्चों को ले कर पड़ोसी के यहां जन्मदिन समारोह में शामिल होने गई थी.’’

अपने गालों पर ढलक आए आंसुओं को पोंछने के बाद अनिता ने आगे बताया, ‘‘दीपक अकेले में मजाक करते हुए कभीकभी रोमांटिक हो जाता था. मैं सारी बात को खेल की तरह से लेती क्योंकि मेरे मन में रत्ती भर खोट नहीं था.

‘‘दीपक ने भी कभी सभ्यता और शालीनता की सीमाओं को नहीं तोड़ा था.

‘‘दिनेश साहब टूर पर गए हुए थे. उन्हें अगले दिन लौटना था, पर वे 1 दिन पहले

लौट आए.

‘‘मेरी सास ने जानकारी दी कि मैं दीपक के घर गई हूं. वह तो सारा दिन वहीं पड़ी रहती है. ऐसी झूठी बात कह कर उन्होंने दिनेश साहब के मन में हम दोनों के प्रति शक का बीज बो दिया.

‘‘उस शाम दीपक मुझे पियक्कड़ों की बरात की घटनाएं सुना कर खूब हंसा रहा था. फिर अचानक उस ने मेरी प्रशंसा करनी शुरू कर दी. वह पहले भी ऐसा कर देता था, पर उस शाम खिड़की के पास खड़े दिनेश साहब ने सारी बातें सुन लीं.

‘‘उस शाम से उन्होंने मुझे चरित्रहीन मान लिया और दीपक से सारे संबंध तोड़ लिए. और… और… मैं अपने माथे पर लगे उस झूठे कलंक के धब्बे को आज तक धो नहीं पाई हूं, शिखा.’’

‘‘यह तो गलत बात है, मैडम. दिनेश साहब को आप की बात सुन कर अपने मन से गलतफहमी निकाल देनी चाहिए थी,’’ शिखा ने हमदर्दी जताई.

‘‘वे मुझे माफ करने को तैयार नहीं हैं. वे मेरे बड़े हो रहे बच्चों के सामने कभी भी मुझे चरित्रहीन होने का ताना दे कर बुरी तरह शर्मिंदा कर देते हैं.’’

‘‘यह तो उन की बहुत गलत बात है, मैडम.’’

‘‘मैं खुद को कोसती हूं शिखा कि मुझे खेलखेल में भी दीपक को बढ़ावा नहीं देना  चाहिए था. मेरी उस भूल ने मुझे सदा के लिए अपने पति की नजरों से गिरा दिया है.’’

‘‘जब आप को पता था कि दिनेश साहब बहुत गुस्सा होंगे, तब आप दीपक की दुकान पर क्यों गईं?’’

शिखा के इस सवाल के जवाब में अनिता खामोश रह उस की आंखों में अर्थपूर्ण अंदाज में झांकने लगी.

कुछ पल खामोश रहने के बाद शिखा सोचपूर्ण लहजे में बोली, ‘‘मुझे दिनेश साहब का गुस्सा… उन की नफरत दिखाने के लिए आप जानबूझ कर दीपक की दुकान से खरीदारी कर के लाई हैं न? मेरी आंखें खोलने के लिए आप ने यह सब किया है न?’’

‘‘हां, शिखा,’’ अनिता ने झुक कर शिखा का माथा चूम लिया, ‘‘मैं नहीं चाहती कि तुम नीरज के साथ प्रेम का खतरनाक खेल खेलते हुए मेरी तरह अपने पति की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाओ.’’

‘‘मेरे मन में उस के प्रति कोई गलत भाव नहीं है, मैडम.’’

‘‘मैं भी दीपक के लिए ऐसा ही सोचती थी. देखो, तुम्हारा पति भी दिनेश साहब की तरह गलतफहमी का शिकार हो सकता है. तब खेलखेल में तुम भी अपने विवाहित जीवन की खुशियां खो बैठोगी.

‘‘तुम अपने पति से नाराज हो कर मायके में रह रही हो. यों दूर रहने के कारण पति के मन में पत्नी के चरित्र के प्रति शक ज्यादा आसानी से जड़ पकड़ लेता है. पति के प्यार का खतरा उठाने से बेहतर है ससुराल वालों की जलीकटी बातें और गलत व्यवहार सहना. तुम फौरन अपने पति के पास लौट जाओ, शिखा,’’ अत्यधिक भावुक हो जाने से अनिता का गला रुंध गया.

‘‘मैं लौट जाऊंगी,’’ शिखा ने दृढ़ स्वर में अपना फैसला सुनाया.

‘‘तुम्हारा कल नीरज से मिलने का कार्यक्रम है…’’

‘‘हां.’’

‘‘उस का क्या करोगी?’’

शिखा ने पर्स में से अपना मोबाइल निकाल कर उसे बंद कर कहा, ‘‘आज से यह खतरनाक खेल बिलकुल बंद. उस की झूठीसच्ची प्रशंसा अब मुझे गुमराह नहीं कर पाएगी.’’

‘‘मुझे बहुत खुशी है कि जो मैं तुम्हें समझाना चाहती थी, वह तुम ने समझ लिया,’’ अपनी उदासी को छिपा कर अनिता मुसकरा उठी.

‘‘मुझे समझाने के चक्कर में आप तो परेशानी में फंस गईं?’’ शिखा अफसोस से भर उठी.

‘‘लेकिन तुम तो बच गईं. चलो, खाना खाएं.’’

‘‘आप को शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं और कामना करती हूं कि दिनेश साहब की गलतफहमी जल्दी दूर हो और आप उन का प्यार फिर से पा जाएं.’’

‘‘थैंक यू,’’ शिखा की नजरों से अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को छिपाने के लिए अनिता रसोई की तरफ चल दी.

शिखा का मन उन के प्रति गहरे धन्यवाद व सहानुभूति के भाव से भर उठा था. Love Story In Hindi

Hindi Stories Love : शादीशुदा लाइफ में पर्सनल स्पेस

Hindi Stories Love : आज औफिस में मैं बिलकुल भी ढंग से काम नहीं कर सका था. इस कारण बौस से तो कई बार डांट खानी पड़ी ही, सहयोगियों के साथ भी झड़प हो गई थी.

आखिर में तंग आ कर मैं ने औफिस से1 घंटा पहले जाने की अनुमति बौस से मांगी, तो उन्होंने तीखे शब्दों में मुझ से कहा, ‘‘मोहित, आज सारा दिन तुम ने कोई भी काम ढंग से नहीं किया है. मुझे छोटीछोटी बातों पर

किसी को डांटना अच्छा नहीं लगता. मुझे उम्मीद है कि कल तुम्हारा चेहरा मुझे यों लटका हुआ नहीं दिखेगा.’’

‘‘बिलकुल नहीं दिखेगा, सर,’’ ऐसा वादा कर मैं उन के कक्ष से बाहर आ गया.

औफिस से निकल कर मैं मोटरसाइकिल से बाजार जाने को निकल पड़ा. मुझे अपनी पत्नी नेहा के लिए कोई अच्छा सा गिफ्ट लेना था.

हमारी शादी को अभी 4 महीने ही हुए हैं. वह मेरे सुख व खुशियों का बहुत ध्यान रखती है. मेरी पसंद पूछे बिना मजाल है वह कोई काम कर ले.

पिछले गुरुवार को उस का यही प्यार भरा व्यवहार मुझे ऐसा खला कि मैं ने उसे शादी के बाद पहली बार बहुत जोर से डांट दिया था.

उस दिन हमें रवि की शादी की पहली सालगिरह की पार्टी में जाना था. जगहजगह टै्रफिक जाम मिलने के कारण मुझे औफिस से घर पहुंचने में पहले ही देर हो गई थी. ऊपर से ये देख कर मेरा गुस्सा बढ़ने लगा कि नेहा समय से तैयार होना शुरू करने की बजाय मेरे घर पहुंचने का इंतजार कर रही थी.

‘‘इन में से मैं कौन सी साड़ी पहनूं, यह तो बता दो?’’ आदत के अनुरूप उस ने इस मामले में भी मेरी पसंद जाननी चाही थी.

‘‘नीली साड़ी पहन लो,’’ अपना व उस का मूड खराब करने से बचने के लिए मैं ने अपनी आवाज में गुस्से के भाव पैदा नहीं होने दिए थे.

‘‘मुझे लग रहा है कि मैं ने इसे तब भी पहना था, जब हम रवि के घर पहली बार डिनर करने गए थे.’’

‘‘तो कोई दूसरी साड़ी पहन लो.’’

‘‘आप प्लीज बताओ न कि कौन सी पहनूं?’’

इस बार मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं उस पर जोर से चिल्ला उठा, ‘‘यार, तुम जल्दी तैयार होने के बजाय फालतू की बातें करने में समय बरबाद क्यों कर रही हो? हर काम करने से पहले मेरी जान खाने की बजाय तुम अपनेआप फैसला क्यों नहीं करतीं कि क्या किया जाए, क्या न किया जाए? मुझे ऐसा बचकाना व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगता है.’’

पार्टी में पहुंच कर उस का मूड पूरी तरह से ठीक हो गया, पर मेरा मूड उस के चिपकू व्यवहार के कारण खराब बना रहा.

रवि मेरा कालेज का दोस्त है. उस पार्टी में शामिल होने कालेज के और भी बहुत से दोस्त आए थे. मैं कुछ समय अपने इन पुराने दोस्तों के साथ बिताना चाहता था, पर नेहा मेरा हाथ छोड़ने को तैयार ही नहीं थी.

कुछ देर के लिए जब वह फ्रैश होने गई, तब मैं अपने दोस्तों के पास पहुंच गया था. मेरे दोस्त मौका नहीं चूके और नेहा का चिपकू व्यवहार मेरी खिंचाई का कारण बन गया था.

मुंहफट सुमित ने मेरा मजाक उड़ाते हुए कह भी दिया, ‘‘अबे मोहित, ऐसा लगता है कि तू ने तो किसी थानेदारनी के साथ शादी कर ली है. नेहा भाभी तो तुझे बिलकुल पर्सनल स्पेस नहीं देती हैं.’’

‘‘शायद मोहित शादी के बाद भी हर सुंदर लड़की के साथ इश्क लड़ाने को उतावला रहता होगा, तभी भाभी इस की इतनी जबरदस्त चौकीदारी करती हैं,’’ कुंआरे नीरज के इस मजाक पर सभी दोस्तों ने एकसाथ ठहाका लगाया था.

अपने मन की खीज को काबू में रखते हुए मैं ने जवाब दिया, ‘‘वह थानेदारनी नहीं बल्कि बहुत डिवोटिड वाइफ है. तुम सब अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि वह कितनी केयरिंग और घर संभालने में कितनी कुशल है.’’

‘‘अपना यार तो बेडि़यों को ही आभूषण समझने लगा है,’’ नीरज के इस मजाक पर जब दोस्तों ने एक और जोरदार ठहाका लगाया, तो मैं मन ही मन नेहा से चिढ़ उठा था.

पार्टी में हमारे साथ पढ़ी सीमा भी मौजूद थी. वह कुछ दिनों के लिए मुंबई से यहां मायके में अकेली रहने आई थी. पति के साथ न होने के कारण वह खूब खुल कर कालेज के पुराने दोस्तों से हंसबोल रही थी. मेरे मन में उस के ऊपर डोरे डालने जैसा कोई खोट नहीं था, पर कुछ देर उस के साथ हलकेफुलके अंदाज में फ्लर्ट करने का मजा मैं जरूर लेना चाहता था.

नेहा के हर समय चिपके रहने के कारण मैं उस के साथ कुछ देर भी मस्ती भरी गपशप नहीं कर सका. अपने सारे दोस्तों को उस के साथ खूब ठहाके लगाते देख मेरा मन खिन्न हो उठा.

मुझे थोड़ा सा भी समय अपने ढंग से जीने के लिए नहीं मिल रहा है, मेरे मन में इस शिकायत की जड़ें पलपल मजबूत होती चली गई थीं.

मैं खराब मूड के साथ पार्टी से घर लौटा था. मेरे माथे पर खिंची तनाव की रेखाएं देख कर नेहा ने मुझ से पूछा, ‘‘क्या सिर में दर्द हो रहा है?’’

‘‘हां, मुझे भयंकर सिरदर्द हो रहा है, पर तुम सिर दबाने की बात मुंह से निकालना भी मत,’’ मैं ने रूखे लहजे में जवाब दिया.

‘‘मैं सिर दबा दूंगी तो आप की तबीयत जल्दी ठीक हो जाएगी,’’ मेरी रुखाई देख कर उस का चेहरा फौरन उतर सा गया था.

‘‘मुझे सिरदर्द जल्दी ठीक नहीं करना है. अब तुम मेरा सिर खाना बंद करो, क्योंकि मैं कुछ देर शांति से अकेले बैठना चाहता हूं. मुझे खुशी व सुकून से जीने के लिए पर्सनल स्पेस चाहिए, यह बात तुम जितनी जल्दी समझ लोगी उतना अच्छा रहेगा,’’ मैं उस के ऊपर जोर से गुर्राया, तो वह आंसू बहाती हुई मेरे सामने से हट गई थी.

अगले दिन मैं ने उस के साथ ढंग से बात नहीं की. वह रात को मुझ से लिपट कर सोने लगी, तो मैं ने उसे दूर धकेला और करवट बदल ली. मुझे उस का अपने साथ चिपक कर रहना फिलहाल बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रहा था.

अगले दिन शनिवार की सुबह मैं जब औफिस जाने को घर से निकलने लगा, तब उस ने मुझ से दुखी व उदास लहजे में कहा था, ‘‘आपस का प्यार बढ़ाने के लिए पर्सनल स्पेस की नहीं, बल्कि प्यार भरे साथ की जरूरत होती है. मैं आप से दूर नहीं रह सकती, क्योंकि आप के साथ मैं कितना भी हंसबोल लूं, पर मेरा मन नहीं भरता है. आज अपने भाई के साथ मैं कुछ दिनों के लिए मायके रहने जा रही हूं. मेरी अनुपस्थिति में आप जी भर कर पर्सनल स्पेस का मजा ले लेना.’’

मैं ने उसे रुकने के लिए एक बार भी नहीं कहा, क्योंकि मैं सचमुच कुछ दिनों के लिए अपने ढंग से अकेले जीना चाहता था.

नेहा से मिली आजादी का फायदा उठाने के लिए मैं ने उस दिन औफिस खत्म होने के बाद अपने दोस्त नीरज को फोन किया. उस ने फौरन मुझे अपने घर आने की दावत दे दी, क्योंकि वह मुफ्त की शराब पीने को हमेशा ही तैयार रहता था.

हम दोनों ने उस के ड्राइंगरूम में बैठ कर शराब पी. हमारी महफिल सजने के कारण उस की पत्नी कविता का मूड खराब नजर आ रहा था, पर हम दोनों ने अपनी मस्ती के चलते इस बात की फिक्र नहीं की.

शराब खत्म हो जाने के बाद मुझे मालूम पड़ा कि मेरा दोस्त बदल चुका था. नीरज ने कविता के डर के कारण मुझे डिनर कराए बिना ही घर से विदा कर दिया.

मैं ने बाहर से बर्गर खाया और घर लौट कर नीरज को मन ही मन ढेर सारी गालियां देता पलंग पर ढेर हो गया.

पार्टी के दिन सीमा से खुल कर हंसीमजाक न कर पाने की बात अभी भी मेरे मन में अटकी हुई थी. इतवार की सुबह मैं ने रवि से उस का फोन नंबर ले कर उस के साथ लंच करने का कार्यक्रम बना लिया.

हम 12 बजे एक चाइनीज रेस्तरां में मिले. पहले मैं ने उसे बढि़या लंच कराया और फिर हम बाजार में घूमने लगे. उस की खनकती हंसी और बातें करने का दिलकश अंदाज लगातार मेरे मन को गुदगुदाए जा रहा था.

कुछ देर बाद मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या हम मैटनी शो देखने चलें?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने अपनी आंखों में शरारत भर कर जवाब दिया.

‘‘क्यों मना कर रही हो?’’ मैं ने हंसते हुए पूछा.

‘‘हाल के अंधेरे में तुम अपने हाथों को काबू में नहीं रख पाओगे.’’

‘‘मैं वादा करता हूं कि बिलकुल शरीफ बच्चा बन कर फिल्म देखूंगा.’’

‘‘सौरी मोहित, शादी के बाद तुम्हें नेहा के प्रति वफादार रहना चाहिए.’’

उस का यह वाक्य मेरे मन को बुरी तरह चुभ गया. मैं ने उस से चिढ़ कर पूछा, ‘‘क्या तुम अपने पति के प्रति वफादार हो?’’

‘‘मैं उन के प्रति पूरी तरह से वफादार हूं,’’ उस का इतरा कर यह जवाब देना मेरी चिढ़ को और ज्यादा बढ़ा गया.

‘‘फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अगर मैं जरा सी भी कोशिश करूं, तो तुम मेरे साथ सोने को राजी हो जाओगी.’’

‘‘शटअप.’’ उस ने मुझे चिढ़ कर डांटा, तो मैं उस का मजाक उड़ाने वाले अंदाज में हंस पड़ा था.

मेरे खराब व्यवहार के लिए उस ने मुझे माफ नहीं किया और कुछ मिनट बाद जरूरी काम होने का बहाना बना कर चली गई. मुझे उस के चले जाने का अफसोस तो नहीं हुआ, पर मन अजीब सी उदासी का शिकार जरूर हो गया.

मैं ने अकेले ही फिल्म देखी और बाद में देर रात तक बाजार में अकारण घूमता रहा. उस रात भी मैं ढंग से सो नहीं सका, क्योंकि नेहा की याद बहुत सता रही थी. बारबार उस से फोन पर बातें करने की इच्छा हो रही थी, पर उस के साथ गलत व्यवहार करने के अपराधबोध ने ऐसा नहीं करने दिया.

सोमवार को औफिस में दिन गुजारना मेरे लिए मुश्किल हो गया था. काम में मन न लगने के कारण बौस से कई बार डांट खाई. जब वहां रुकना बेहद कठिन हो गया, तो बौस से इजाजत ले कर मैं घंटा भर पहले औफिस से बाहर आ गया था.

औफिस से निकलने के घंटे भर बाद मैं ने नेहा को फोन कर के उलाहना दिया, ‘‘तुम इतनी ज्यादा निर्मोही कैसे हो गई हो? आज दिन भर फोन कर के मेरा हालचाल क्यों नहीं पूछा?’’

‘‘मैं ने तो आप की नाराजगी व डांट के डर से फोन नहीं किया,’’ उस की आवाज का कंपन बता रहा था कि मेरी आवाज सुन कर वह भावुक हो उठी थी.

‘‘तुम्हारा फोन आने से मैं नाराज क्यों होऊंगा?’’

‘‘मैं फोन करती तो आप जरूर डांट कर कहते कि मैं मायके में रह कर भी आप को चैन से जीने नहीं दे रही हूं.’’

‘‘मैं पागल हूं, जो तुम्हें अकारण डांटूंगा. मुझे लगता है कि मायके पहुंच कर तुम्हें मेरा ध्यान ही नहीं आया.’’

‘‘जिस के अंदर मेरी जान बसती है, उस का ध्यान मुझे कैसे नहीं आएगा?’’

‘‘तो वापस कब आओगी?’’

‘‘आप आज लेने आ जाओगे, तो आज ही साथ चल चलूंगी.’’

‘‘मैं तो आ गया हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि दरवाजा क्यों नहीं खोल रही है, पगली?’’

‘‘क्या बारबार घंटी आप बजा रहे हो?’’

‘‘दरवाजा खोल कर देख लो न मेरी जान.’’

‘‘मैं अभी आई.’’

उस की उतावलेपन व खुशी से भरी आवाज सुन कर मैं जोर से हंस पड़ा था.

दरवाजा खोल कर जब नेहा ने मुझे फूलों का बहुत सुंदर सा गुलदस्ता हाथ में लिए खड़ा देखा, तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. अपना उपहार स्वीकार करने के बाद वह मेरी छाती से लिपट कर खुशी के आंसू बहाने लगी.

मुझे इस समय उस की वह बात ध्यान आ रही थी, जो उस ने मायके आने से पहले कही थी, ‘आपस का प्यार बढ़ाने के लिए पर्सनल स्पेस की नहीं, बल्कि प्यार भरे साथ की जरूरत होती है. मैं आप से दूर नहीं रह सकती, क्योंकि आप के साथ मैं कितना भी हंसबोल लूं, पर मेरा मन नहीं भरता है.’

मैं ने उस का माथा चूम कर भावुक लहजे में कहा, ‘‘मेरी समझ में यह आ गया

है कि तुम्हारे अलावा मेरी जिंदगी में खुशियां भरने की किसी के पास फुरसत नहीं है. मुझे अपनी जिंदगी में पर्सनल स्पेस नहीं, बल्कि तुम्हारा प्यार भरा साथ चाहिए. भविष्य में मेरी बातों का बुरा मान कर फिर कभी मुझे अकेला मत छोड़ना.’’

‘‘कभी नहीं छोड़ूंगी.’’ अपनी मम्मी की उपस्थिति की परवाह न करते हुए उस ने मेरे होंठों पर छोटा सा चुंबन अंकित किया और फिर शरमा भी गई.

उस ने कुछ देर बाद ही मेरे साथ सट कर बैठते हुए ढेर सारे सवाल पूछने शुरू कर दिए. मुझे उस के सवालों का जवाब देने में अब कोई परेशानी महसूस नहीं हो रही थी. उस से दूर रहने के मेरे अनुभव इतने घटिया रहे थे कि मेरे सिर से पर्सनल स्पेस में जीने का भूत पूरी तरह से उतर गया था.

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Hindi Kahani : एक पिता की खुदकुशी

Hindi Kahani : मेरी नजरें पंखे की ओर थीं. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मैं पंखे से झूल रहा हूं और कमरे के अंदर मेरी पत्नी चीख रही है. धीरेधीरे उस की चीख दूर होती जा रही थी. सालों के बाद आज मुझे उस झुग्गी बस्ती की बहुत याद आ रही थी जहां मैं ने 20-22 साल अपने बच्चों के साथ गुजारे थे.

मेरे पड़ोसी साथी चमनलाल की धुंधली तसवीर आंखों के सामने घूम रही थी. वह मेरी खोली के ठीक सामने आ कर रहने लगा था. उसी दिन से वह मेरा सच्चा यार बन गया था. उस के छोटेबड़े कई बच्चे थे. समय का पंछी तेजी से पंख फैलाए उड़ता जा रहा था. देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए. चमनलाल का बड़ा बेटा जो 20-22 साल का था, बुरी संगत में पड़ कर आवारागर्दी करने लगा. घर में हुड़दंग मचाता. छोटे भाईबहनों को हर समय मारतापीटता.

चमनलाल उसे समझाबुझा कर थक चुका था. मैं ने भी कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. जब भी चमनलाल से इस बारे में बात होती तो मैं उसे ही कुसूरवार मान कर लंबाचौड़ा भाषण झाड़ता. शायद उस के जख्म पर मरहम लगाने के बजाय और हरा कर देता.

सुहानी शाम थी. सभी अपनेअपने कामों में मसरूफ थे. तभी पता चला कि चमनलाल की बेटी अपने महल्ले के एक लड़के के साथ भाग गई. चमनलाल हांफताकांपता सा मेरे पास आया और यह खबर सुनाई तो उस के जख्म पर नमक छिड़कते हुए मैं बोला, ‘‘कैसे बाप हो? अपने बच्चों की जरा भी फिक्र नहीं करते. कुछ खोजखबर ली या नहीं? चलो साथ चल कर ढूंढ़ें. कम से कम थाने में तो गुमशुदगी की रिपोर्ट करा ही दें.’’

चमनलाल चुपचाप खड़ा मेरी ओर देखता रहा. मैं ने उस का हाथ पकड़ कर खींचा लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. मैं ने अपनी पत्नी से जब यह कहा तो वह रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘गरीब अपनी बेटी के हाथों में मेहंदी लगाए या उस के अरमानों की अर्थी उठाए…’’

मैं अपनी पत्नी का मुंह देखता रह गया, कुछ बोल नहीं पाया. जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गई. लोग तरहतरह के लांछन लगाने लगे. जिस के मुंह में दांत भी नहीं थे, वह भी अफवाहें उड़ाने और चमनलाल को बदनाम कर के मजा लूट रहा था. किसी ने भी एक गरीब लाचार बाप के दर्द को समझने की कोशिश नहीं की. किसी ने आ कर हमदर्दी के दो शब्द नहीं बोले.

चमनलाल अंदर ही अंदर टूट गया था. उस ने चिंताओं के समंदर से निकलने के लिए शराब पीना शुरू कर दिया. गम कम होने के बजाय और बढ़ता गया. घर की सुखशांति छिन गई. रोज शाम को वह नशे की हालत में घर आता और घर से चीखपुकार, गालीगलौज, लड़ाईझगड़ा शुरू हो जाता. चमनलाल जैसा हंसमुख आदमी अब पत्नी को पीटने भी लगा था. वह गंदीगंदी गालियां बकता था.

इधर, मिल में हड़ताल हो गई थी. दूसरे मजदूरों के साथसाथ चमनलाल की गृहस्थी का पत्ता धीरेधीरे पीला होने लगा था. आधी रात को चमनलाल ने मेरा दरवाजा खटखटाया. मेरे बच्चे सो रहे थे. मैं ने दरवाजा खोला और चमनलाल को बदहवास देखा तो घबरा गया.

‘‘क्या बात है चमनलाल?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. चमनलाल उस वक्त बिलकुल भी नशे में नहीं था. वह रोनी सूरत बना कर बोला, ‘‘मेरा बड़ा बेटा दूसरी जात की लड़की को ब्याह लाया है और उसे इसी घर में रखना चाहता है लेकिन मैं उसे इस घर में नहीं रहने दे सकता.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे कहा नहीं कि दूसरी जगह ले कर रखे?’’ ‘‘नहीं, वह इसी घर में रहना चाहता है. मेरी उस से बहुत देर तक तूतू मैंमैं हो चुकी है,’’ चमनलाल बोला. मैं ने कहा, ‘‘रात में हंगामा खड़ा मत करो. अभी सो जाओ. सुबह देखेंगे.’’

अगली सुबह मैं जरा देर से उठा. बाहर भीड़ जमा थी. मैं हड़बड़ा कर उठा. बाहर का सीन बड़ा भयावह था. चमनलाल की पंखे से लटकी हुई लाश देख कर मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

उस के बाद से पुलिस का आनाजाना शुरू हो गया. कभी भी, किसी भी समय आती और लोगों से पूछताछ कर के लौट जाती. चमनलाल की मौत से लोग दुखी थे वहीं पुलिस से तंग आ गए थे. मेरे मन में कई बुरे विचार करवट लेते रहे. क्या चमनलाल ने खुदकुशी की थी या किसी ने उस की… फिर… किस ने…? कई सवाल थे जिन्होंने मेरी नींद चुरा ली थी.

मेरी पत्नी और बच्चे डरेसहमे थे. पुलिस बारबार आती और एक ही सवाल दोहराती. हम लोग इस हरकत से परेशान हो गए थे. इस बेजारी के चलते और बच्चों की जिद पर मैं उस महल्ले को छोड़ कर दूसरे शहर चला गया और उस कड़वी यादों को भुलाने की कोशिश करने लगा.

लेकिन सालों बाद चमनलाल की याद और उस की रोनी सूरत आंखों के सामने घूमने लगी. उस का दर्द आज मुझे महसूस होने लगा, क्योंकि आज मेरी बड़ी बेटी पड़ोसी के अवारा लड़के के साथ… वह मेरी… नाक कटा गई थी. मैं खुद को कितना मजबूर महसूस कर रहा था. आज मैं चमनलाल की जगह खुद को पंखे से लटका हुआ देख रहा था. Hindi Kahani

Gold Smuggling : अब चीनी सोने की तस्करी जोरों पर

Gold Smuggling : अभी तक तो चीन अपना सस्ता इलैक्ट्रोनिक सामान भारत के बाजारों में खपा रहा था मगर अब चीन से भारी मात्रा में सोने की तस्करी की ख़बरें भी सामने आ रही हैं. सोने के अवैध कारोबार से तस्कर हर महीने 15 से 20 करोड़ की कमाई कर रहे हैं. चीन से छुपा कर भारत लाए जा रहे सोने की खपत सब से ज्यादा लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में हो रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि तस्करी के सोने की शुद्धता 99.9 फीसदी होती है.

उत्तर प्रदेश से लगते नेपाल बौर्डर से सोने की तस्करी धड़ल्ले से हो रही है. लग्जरी बसों और अवैध ट्रेवलर से तस्कर इन्हें तय अड्डों पर पहुंचा कर हर माह करीब 15 से 20 करोड़ की कमाई कर रहे हैं. जून में बरामद 20 करोड़ के अवैध सोने की खेप की कड़ी मुंबई, आगरा और पंजाब तक भी जुड़ी. यहां की मंडी भी चीन के सोने से चमक रही है.

पिछले दिनों मथुरा निवासी प्रमोद से एक किलो सोने की छड़ बरामद हुई थी, जिसे वह सिद्धार्थनगर से ले कर जा रहा था. यह सोना नेपाल से सिद्धार्थनगर पहुंचा था. वाराणसी निवासी संजय से बड़ी मात्रा में सोना बरामद हुआ, जिसे वह बहराइच के रुपईडीहा से ले कर जा रहा था. यह सोना उसे लखनऊ के सराय माली खां चौक पर देना था. यह तो बस चंद उदाहरण हैं.

डीआरआई ने मई 2025 में मुंबई निवासी हितेश, राजेश कुमार और विजय कुमार के पास से 18 करोड़ रुपए का सोना जब्त किया. तीनों बिहार संपर्क क्रांति ट्रेन से ट्रौली बैग में कपड़ों के अंदर सोना छिपा कर ले जा रहे थे. यह सोना हांगकांग से नेपाल पहुंचा और फिर वहां से नेपाल होते हुए बिहार लाया गया. मुंबई में इसे पिघला कर राजस्थान के कोटा में आभूषण तैयार किया जाना था. इस के बाद उसे पंजाब, हिमाचल व लखनऊ के अलगअलग व्यापारियों को बेचना था.

तस्करों ने अब सड़क मार्ग को अपनाया है. चीन से सोना पहले नेपाल और फिर वहां से महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच व श्रावस्ती के रास्ते पर्यटक परमिट के नाम पर चलने वाली अवैध लग्जरी बसों और ट्रेवलर से भारत में दाखिल हो रहा है. सीमावर्ती जिलों से पंजाब, चंडीगढ़, गुजरात, राजस्थान, हैदराबाद व गोवा के लिए चलने वाले अवैध वाहनों को तस्करों ने माध्यम बना लिया है. इस रूट से तस्करों को एक किलो सोना लाने में करीब 14.48 लाख का मुनाफा हो रहा है.

Elderly loneliness : बुढ़ापे के अकेलेपन से डरे नहीं, इस को रचनात्मक बनाएं

Elderly loneliness : कई लोग अकसर इसी सोच में दुबले हुए जाते हैं कि बुढ़ापा आएगा तो वे भी बाकियों की तरह अकेले हो जाएंगे. जबकि इसे रचनात्मक तरीके से हैंडल किया जाए तो बुढ़ापा भी मनोरंजक बनाया जा सकता है.

50 की उम्र आतेआते हम भारतीय स्वयं को काफी अकेला महसूस करने लगते हैं. इस उम्र तक बच्चे बड़े हो जाते हैं और अपनी दुनिया में मस्त हो जाते हैं. उन की पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद जीवन में एक खालीपन सा आ जाता है, साथ ही इस उम्र तक आतेआते परिवार के लोगों से वार्तालाप भी बहुत सीमित हो जाता है. अपनी भावनाएं और तकलीफें भी अपने तक ही रखने लगते हैं, किसी को बताते नहीं हैं.

फ्लैट कल्चर में महल्लेदारी वाली बात तो होती नहीं है जहां चार बुजुर्ग किसी एक के घर के आगे चौकड़ी जमा कर दुख सुख की बातें कर लेते थे. बुजुर्ग महिलाएं भी दरवाजे पर खाट बिछा कर हाथ में बुनाई की सलाइयां चलाते हुए गपशप करती दिखती थीं. मगर संयुक्त परिवार टूटने और फ्लैट कल्चर में रहने की मजबूरी ने बुजुर्गों को घर में बंद रहने के लिए मजबूर कर दिया है. उन के दिन या तो टीवी देखते बीतते हैं या बालकनी में बैठ कर अकेले चाय सुड़कते हुए गुजर जाते हैं. अनेक बुजुर्गों का अपने घर के युवाओं के साथ तालमेल नहीं बैठता क्योंकि वे नई तकनीक लैस होते हैं और उस तकनीक से अपने दादादादी या नानानानी को अपडेट करना उन्हें अपने समय की बरबादी लगती है.

भारत में जो बुजुर्ग फोन इस्तेमाल करते हैं उन में से 71% बुजुर्गों के पास बेसिक मोबाइल फोन ही हैं. केवल 41% के पास ही स्मार्टफोन हैं. इंटरनेट या सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ 13% बुजुर्ग करते हैं. तकनीक को ले कर बुजुर्ग अकसर उलझन में रहते हैं और उन्हें गलती करने का डर भी रहता है. साइबर क्राइम का आसान शिकार बुजुर्ग ही होते हैं. अरमान के दादाजी के पास स्मार्ट फोन आया तो उन्होंने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ढेर सारे दोस्त बना लिए. सुबह से शाम तक वे अपने फोन में ही बिजी रहते थे. फिर एक दिन उन का फोन किसी ने हैक कर लिया. हैकर ने उन के नंबर से उन के रिश्तेदारों और दोस्तों को मैसेज भेजे कि ‘मेरी तबियत बहुत ख़राब है, इमरजैंसी में हूं, कृपया 5000 रुपए तुरंत इसी नंबर पर भेज दो.’

दो रिश्तेदारों ने पैसा भेज भी दिया. एक अन्य ने अरमान को फोन कर के उस के पिता का हाल जानना चाहा और उस मैसेज के बारे में बताया तब पता चला कि उन का फोन हैक हो गया है. इस बीच हैकर ने उन के बैंक अकाउंट को भी खाली कर दिया था. अरमान ने परेशान हो कर अपने पिता से स्मार्ट फोन वापस ले लिया और उन को 1200 रुपए का बेसिक फोन पकड़ा दिया जिस पर अब वे सिर्फ बात कर सकते हैं. इस वजह से वे खुद को अब बेहद अकेला महसूस करने लगे हैं.

हालांकि अकेलेपन की ऐसी समस्या पश्चिमी देशों के बुजुर्गों के साथ नहीं है क्योंकि वे जीवन को पूरी जीवंतता से जीते हैं. वे मानते हैं कि 40 साल के बाद तो असल जीवन शुरू होता है. वे नई तकनीक से खुद को अपडेट रखते हैं. चाहे मोबाइल फोन हो, टेबलेट हो या लैपटौप उन को इन गैजेट्स को चलाने में कोई हिचकिचाहट नहीं है. उन के किचन से ले कर बाथरूम तक में तरह तरह के इंस्ट्रूमेंट्स लगे होते हैं जिन का संचालन वे बखूबी करते हैं. मजे की बात यह है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर वे दुनिया घूमने निकल पड़ते हैं. दुनियाभर में अपने दोस्त बनाते हैं, अलगअलग देशों की संस्कृति से रूबरू होते हैं. सोशल मीडिया पर अपने अनुभवों को साझा करते हैं, ब्लौग लिखते हैं और तस्वीरें साझा करते हैं. इन सब कार्यकलापों के बीच उन्हें अकेलेपन का अहसास तो कतई नहीं होता.

भारत में जीवनसाथी की मृत्यु हो जाए तो जीवित साथी दूसरी शादी इस संकोच में नहीं करता कि उस के जवान बच्चे और रिश्तेदार क्या कहेंगे. फिर संपत्ति बंटवारे का डर उन के कदम रोक लेता है. मगर पश्चिमी सभ्यता के लोग एक साथी की मृत्यु के बाद या तलाक हो जाने पर दूसरा, तीसरा और चौथा जीवनसाथी ढूंढने में देर नहीं लगाते हैं. हम सात जन्मों के फेर में पड़े हैं. जीवनसाथी इस जन्म में साथ छोड़ गया तो अगले जन्म में फिर मिलेगा, धीरज रखो, ऐसी सोच हम पर हावी है, परन्तु पश्चिमी देशों में जहां ईसाइयत है वहां अगले जन्म का कोई कांन्सेप्ट नहीं है. जो है बस इसी जीवन में है. लिहाजा इस जीवन को जितनी जीवंतता और मौजमस्ती से जी सकते हो, जी लो. इसके आगे कुछ भी नहीं है. इसलिए वे अकेलेपन दर्द और छटपटाहट से मुक्त हैं.

दरअसल हमें अब ऐसा समाज बनाने की जरूरत है जो उम्र के हिसाब से सब को साथ ले कर चले, चाहे देखभाल का मामला हो, डिजिटल लिटरेसी का हो, जीवन भर कुछ ना कुछ नया सीखने की इच्छा का हो, बुजुर्गों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास दुनिया की सब से बड़ी युवा आबादी और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग जनसंख्या है. भारत में 12% लोग 60 वर्ष और उस से अधिक उम्र के हैं, जो 2050 तक 19% होने की संभावना है. अनेक रोगों का इलाज मिलने और जीवन प्रत्याशा बढ़ने से अब लोग 90 साल तक की उम्र भी पा रहे हैं. पहले जहां 60-65 की उम्र में ही रोगग्रस्त हो कर इंसान मृत्यु को प्राप्त हो जाता था वह अब 25 से 30 साल अतिरिक्त जीने लगा है. वहीं देश में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की संख्या 36.5 करोड़ से अधिक है.

सर्वे में पाया गया है कि 68% बुजुर्ग और 69% युवा मानते हैं बढ़ती उम्र का ‘अकेलापन’ जीवन के प्रति नीरसता को बढ़ाता है. 83% बुजुर्ग जीवन के चौथे पड़ाव में परिवार के साथ रहना चाहते हैं. ऐसे में युवाओं और बुजुर्गों के बीच बेहतर समझ और तालमेल बनाना आवश्यक हो गया है. इस की शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए. स्कूलों में बुजुर्गों के प्रति सम्मान सिखाने वाले प्रोग्राम शुरू किए जाने चाहिए. युवाओं को बुजुर्गों की मदद करने वाले कार्यक्रमों में शामिल किया जाए और युवाओं के जरिए बुजुर्गों को मोबाइल और इंटरनेट सीखने में मदद दी जाए तो बुजुर्गों को वक्त की रफ़्तार से कदम मिला कर चलने में आसानी होगी और वे अपने अकेलेपन से निकल सकेंगे.

युवा पीढ़ी जनरेशन गैप को स्वीकार करती है और इसे पाटने के लिए भी तैयार है. विशेष रूप से 18-24 साल के युवा अपने दादादादी, नानानानी के साथ मजबूत भावनात्मक रिश्ते रखते हैं, खासकर जब वे एक साथ रहते हैं. वे चाहते हैं कि एकैडमिक इंस्टिट्यूट भी उन्हें बुढ़ापे को समझाने में मदद करें और पीढ़ियों के बीच गतिविधियां भी रखी जाएं.

युवा मानते हैं कि बुजुर्ग डिजिटल डिवाइस सीखने में दिलचस्पी नहीं दिखाते, जबकि बुजुर्गों को लगता है कि युवा उन्हें सिखाने के लिए धैर्य नहीं रखते. सर्वे में दोनों पीढ़ियों ने यह माना कि युवाओं की व्यस्तता के कारण बातचीत कम हो रही है. जो व्यक्ति ज्यादा समय के लिए अकेले रहते हैं, उन्‍हें डिप्रेशन की समस्या होने लगती है. अगर उम्र बढ़ने के साथ, व्‍यक्‍त‍ि तनाव महसूस करता है, तो इस का बुरा असर उस की शारीरिक सेहत पर भी पड़ता है. मेंटल हैल्‍थ खराब होने के कारण इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है और शरीर आसानी से बीमारियों का शिकार हो जाता है. मेंटल हैल्‍थ खराब होने के कारण व्यक्ति को शारीरिक समस्याओं से खुद को बाहर निकालने में ज्‍यादा समय लगता है.

हर व्यक्ति की अपनी प्राइवेसी होती है लेकिन अगर आप समाज से जुड़े नहीं रहेंगे, तो आप को अकेलापन और एंग्जाइटी का एहसास तो होगा. इसलिए बुजुर्गों को सोशल ग्रुप्‍स के साथ जुड़ना चाहिए. दोस्‍त और रिश्तेदारों के साथ समय बिताना चाहिए. अकेलेपन से बचने और अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए कुछ समय के लिए घर से बाहर भी निकलें और समाज को करीब से देखें. इस के लिए आप किसी स्थानीय पार्क या शौपिंग सेंटर जा सकते हैं या फिर किसी पुराने दोस्त से मिलने का प्रोग्राम भी बना सकते हैं. नया माहौल आप की नीरसता को पूरी तरह बदल देगा. इस के अलावा आपको ऐसी गतिविधियों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिन में आप की रुचि हो.

अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें

अकेलेपन में अपनी खराब सेहत का ख्याल कहीं ज्यादा परेशान करता है. वहीं आप मानसिक तौर पर भी परेशान रहते हैं. ऐसे में खुद को सक्रिय रखने के अलावा आप इस दौरान अपने स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. इस के लिए आप किसी जिम में या टहलने के लिए किसी पार्क में जा सकते हैं. इस से आप बेहतर महसूस करेंगे.

अधिक रचनात्मक बनें

कई लोग उम्र बढ़ने के साथ अपना समय अपने शौक में लगाने लगते हैं. चाहे वह किताबें लिखना पढ़ना हो या फिर संगीत, कला में अपना समय लगाना. ये चीजें मन को प्रसन्न करती हैं. ऐसे में आपको भी अपना समय उन चीजों में लगाना चाहिए जिन्हें आप पसंद करते हैं. इस के लिए आप कला या संगीत सीख सकते हैं. कुछ बेहतर लिख सकते हैं. एकाकीपन को दूर करने के लिए पढ़ना सब से अच्छा तरीका है जो ज्ञानवर्धन भी करता है.

बेहतर समय को याद करें

जैसेजैसे उम्र बढ़ती है, लोग सोचने लगते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में क्या बेहतर किया और क्या वे नहीं कर पाए. कुछ विफलताएं जीवन के इस मोड़ पर उन्हें निराश करती हैं. यह एक ऐसी समस्या है, जो अकसर बड़ी उम्र के लोगों को परेशान करती है मगर जीवन जिस तरह है, उसे उसी तरह स्वीकार करना चाहिए. आप के पास जो है और जो सम्मान आपने पाया है, उस के बारे में सोचें. जीवन की बेहतर घटनाओं को याद करें. अपने दोस्तों के साथ और परिवार के अपनेपन को महसूस करें. इस से निराशा आपको घेर नहीं पाएगी.

घर ले आएं कोई पालतू जानवर

अगर आप अकेले रहते हैं तो जानवरों को पालना अच्छा जरिया हो सकता है अकेलापन दूर करने का. इस से आप को एक साथी मिल जाएगा. आप का समय उन की देखभाल करने में व्यतीत होगा और आप एक बार फिर महसूस करेंगे कि आप के जीवन में कोई है जो आप पर निर्भर है और आप की परवाह करता है.

Samajik Kahaniya : मैंटिनैंस – दिमाग पर हावी धार्मिक संकीर्णता की कहानी

Samajik Kahaniya : अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण हिंदूमुसलिम का भेदभाव सक्षम के दिलोदिमाग में चढ़ कर बैठा था. पत्नी होने के नाते मैं परेशान हो गई उन की इस संकीर्णता से लेकिन एक हादसे ने जैसे सबकुछ बदल दिया.

‘‘तुम सुनना नहीं चाहते और मैं यहां के लोगों की बातें सुनसुन कर थक गई हूं,
मुझे अब नीचे उतरते भी डर लगता है कि कब कोई मुझ से कुछ कह न दे.’’ मैं किचन में काम करतेकरते पति सक्षम को सुनाने के उद्देश्य से जोरजोर से बोलती जा रही थी पर किचन के सामने ही डाइनिंग टेबल पर बैठे सक्षम मेरी हर बात को अनसुना कर के अपना पूरा ध्यान पेपर में लगाए थे मानो आज उसे न्यूजपेपर पर रिसर्च करनी हो.
‘‘तुम्हें सुनाई दे रहा है न कि मैं क्या बोल रही हूं,’’ अपनी बात का उधर कोई असर न होते देख मैं एकदम उस के पास जा कर जोर से बोली, ‘‘सक्षम, पेपर हटाओ सामने से, सुनाई पड़ रहा है न तुम्हें कि मैं क्या कह रही हूं.’’
और कोई चारा न देख कर सक्षम ने पेपर हटाया और अनजान बनते हुए बोला, ‘‘हूं, क्या कहा, मैं सुन नहीं पाया.’’
‘‘सक्षम, नाटक मत करो, तुम ने सब सुन लिया है. मुझे बस, अपनी बात का जवाब चाहिए,’’ मैं एकदम सामने सोफे पर बैठती हुई बोली.

‘‘तो उत्तर यह है कि मैं एक भी पैसा नहीं दूंगा जब तक कि मेरा स्कूटर नहीं मिल जाता. जिस को जो करना है, कर ले.’’

यह कह कर सक्षम अपना तौलिया उठा कर बाथरूम में चले गए. मैं अकेली ही बैठी बड़बड़ाती रही, ‘कैसे समझाऊं इन्हें, 2 बच्चों के बाप होने के बाद भी कुछ सुनने को तैयार नहीं. जब पिता का ही यह अडि़यल रवैया है तो बच्चे आगे चल कर क्या करेंगे.’ खैर, अभी तो फिलहाल ब्रेकफास्ट की तैयारी करती हूं वरना दुकान जाने में देर हो जाएगी, यह सोचते हुए मेरे कदम किचन की ओर बढ़़ गए.

इंसान जब दिमागी तौर पर अशांत हो तो उस का शरीर तो काम करता है पर मन कहीं और ही होता है. सो, मेरे हाथ तो परांठे बना रहे थे पर मन आज से 15 वर्ष पहले जा पहुंचा जब मैं संयुक्त परिवार में बहू बन कर आई थी जिस में सासससुर, जेठजेठानी, भतीजेभतीजी सभी थे. कुछ वर्षों बाद जब मेरे भी 2 बच्चे हो गए तो सब के दिलों के दायरे बड़े होने के बाद भी जगह कम पड़ने लगी. यों भी आजकल के परिवारों में पतिपत्नी तो क्या, बच्चों को भी अपना पर्सनल स्पेस चाहिए होता है, फिर यहां तो बड़े ही 6 जने थे, ऊपर से 4 किशोर होते बच्चे.

वक्त की जरूरत को समझते हुए 5 वर्ष पहले ससुरजी ने उसे यह छोटा सा 3 बीएचके फ्लैट खरीद कर एक तरह से दोनों बेटों को अलगअलग कर दिया. सासससुर ने समयसमय पर दोनों के साथ ही रहना तय किया. कहना न होगा इस बंटवारे से सब को अपना पर्सनल स्पेस मिला था. सो, सभी खुश थे.

अब नए फ्लैट में एक तरह से उस की नईनवेली गृहस्थी बस रही थी. सो, सासुमां ने अपने दिल के दरवाजे खोलते हुए कहा था, ‘बेटा, तुझे इस घर में से जो चाहिए हो, वह ले जा.’ वह सिर्फ जरूरतभर का सामान ले कर इस छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गई थी.

अपना घर जिस का सपना हर लड़की देखती है, उसे उस ने और सक्षम ने बड़े मन से सजाया था. बहुत बड़ी तो नहीं, 12 फ्लैट की 3 मंजिली छोटी सी सोसाइटी थी. हर फ्लोर पर 4-4 फ्लैट थे. सभी परिवार अच्छे और मिलनसार थे.

सक्षम कट्टर हिंदूवादी हैं, बातबात पर उन का हिंदुत्व जागता रहता है, अपने धर्म के अलावा सारे धर्म उन्हें बेकार लगते हैं. जबतब मेरी उन से इस बात पर बहस हो जाती है. अपने इसी हिंदुत्व के कारण फ्लैट खरीदते समय सक्षम ने सब से पहले सुनिश्चित किया कि पूरी सोसाइटी में सभी परिवार हिंदू ही हों.

मेरी सोसाइटी की सभी महिलाओं से कुछ ही समय में गहरी दोस्ती हो गई थी. मैं ने यहां की किटी पार्टी भी जौइन कर ली थी ताकि सभी सदस्यों से भलीभांति परिचय हो सके. सक्षम एक तो बहुत कम मिलनसार हैं, दूसरे, सुबह से शाम तक दुकान पर काम करने के बाद उन के पास इस सब के लिए समय भी नहीं रहता.

सक्षम यों तो बहुत सुलझे हुए इंसान हैं पर बिजनैसमैन होने के कारण पैसे के मामले में बहुत कंजूस हैं, पैसों के मामले में उन्हें घर के छोटेछोटे खर्चों का भी हिसाब चाहिए होता है. एकएक पैसा उन की जेब से बहुत मुश्किल से निकलता है. बच्चों के खर्चों को ले कर भी अकसर टोकाटाकी होती रहती. मुझे भी कहां कभी सक्षम का यह व्यवहार अखरा, हमेशा यही सोचती कि आज पैसा बचेगा तभी तो जुड़ेगा और कल काम आएगा. बच्चों को भी पैसे की अहमियत तभी समझ आएगी जब उन के खर्चों पर अंकुश लगाया जाएगा पर पिछले कुछ दिनों से तो सक्षम का यह बनिया स्वभाव ही मेरे लिए अपमान का कारण बनता जा रहा है.

जिस सोसाइटी की महिलाएं 5 सालों से दिन में दस बार मुझ से मिलने आती थीं, मेरे साथ फोन पर गप्पें लगाती थीं, वे आज मुझे देख कर मुंह फेर लेती हैं. पिछले एक साल से यही सब झेल झेल कर मैं पेरशान हो गई हूं. अभी मैं इसी झंझावत में उलझ थी कि डोरबेल की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, दरवाजा खोला तो सामने अध्यक्ष की कार साफ करने वाला लड़का हाथ में रजिस्टर लिए खड़ा था. मैं ने रजिस्टर हाथ में ले कर पढ़ा तो लिखा था, ‘कल रविवार को सुबह 10 बजे सोसाइटी की होने वाली मीटिंग में आप आमंत्रित हैं.’ रजिस्टर पर साइन कर के मैं वापस किचन में आ गई.

अब तक सक्षम तैयार हो कर नाश्ते के लिए डाइनिंग टेबल पर आ गए थे. नाश्ता लगाते हुए रविवार की मीटिंग के बारे में मैं ने सक्षम को सूचना दी तो सक्षम बोले, ‘‘कोई जरूरत नहीं जाने की, करतेधरते तो कुछ हैं नहीं, जब देखो तब मीटिंग ही करते रहते हैं ये लोग और जब से इस मुल्ला को अध्यक्ष बनाया है तब से पूरी सोसाइटी का कबाड़ा हो गया है. क्या पूरी सोसाइटी में कोई हिंदू ऐसा नहीं था जिसे अध्यक्ष बनाया जाता. इन को इतना मानसम्मान देने की जरूरत नहीं है, एक दिन हमारे ही सिर चढ़ कर नाचेंगे.’’
‘‘जिन्हें तुम मुल्ला कह रहे हो वे सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं, इस सोसाइटी के सभी लोगों से अधिक योग्य और समझदार तभी तो सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनाया गया है उन्हें. तुम्हारे अलावा किसी को भी उन से कोई भी समस्या नहीं है. 4 सालों से गुप्ताजी थे तो अध्यक्ष, कुछ करते ही नहीं थे और तैयबजी ने तो एक साल में ही सोसाइटी का कायाकल्प कर दिया है.

इतनी पुरानी होने के बाद भी यह सोसाइटी कितनी अच्छी लगने लगी है. देखा नहीं, पिछली मीटिंग में जब सैकंडफ्लोर के वर्माजी और फर्स्ट फ्लोर के गुप्ताजी आपस में इतने अधिक भिड़ गए थे कि बात हाथापाई तक पहुंचने ही वाली थी वे तैयबजी ही थे जिन्होंने न्यूट्रल भाव से सारे मामले को रफादफा कर दिया था. यही नहीं, उन की पत्नी सलीमाजी तो मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी हैं. कितनी सुंदर और केंद्रीय विद्यालय से रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं वे.’’
‘‘तुम तो ऐसे उन का पक्ष ले रही हो जैसे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों. अरे, साले पूरे देश में तो दंगा कराते रहते हैं, यहां क्या खाक मामले सुलटाएंगे. मैं तो नहीं जाऊंगा और न मेरे पास इतना फालतू टाइम है कि उस मुल्ला की बातें सुनूं. तुम्हें जाना हो तो चली जाना. यों भी स्कूटर वाली घटना के बाद की लगभग सभी मीटिंग्स तुम अकेली ही अटैंड करती हो.

अपना अदालती फरमान सुना कर सक्षम दुकान चले गए पर मेरा मन बेहद अशांत हो गया. ‘कैसे सुलझाऊं इस अजीब सी समस्या को’ यह सोचते हुए मुझे एक साल पुरानी वह घटना याद आ गई जो इस फसाद की जड़ थी. उस दिन सुबहसुबह सक्षम दुकान जाने के लिए निकले थे कि नीचे पार्किंग के कोने में 3 साल से खड़े अपने पुराने स्कूटर को जगह पर न देख कर भन्ना गए और सीधे सोसाइटी के अध्यक्ष शफीक उल्ला तैयबजी के पास जा पहुंचे,
‘यहां 2 साल से मेरा स्कूटर खड़ा था, वह अब अपनी जगह पर नहीं है. लगता है चोरी हो गया.’
‘अरे जैन साहब, नाराज क्यों होते हो, आइए, अंदर आइए, बैठ कर बात करते हैं,’ तैयबजी ने बड़े विनम्र भाव से कहा. सक्षम गुस्से में कुछ नहीं देखते, सो, आवेश में बोले, ‘क्या बैठ कर बात करते हैं, सोसाइटी का मैंटिनैंस हर महीने देते हैं, फिर भी स्कूटर चोरी हो गया?’
‘मियां कैसी बात करते हैं, आप जानते हैं कि सोसाइटी की मैंटिनैंस चार्ज केवल 500 रुपए प्रतिमाह है जिस में सभी फ्लैट्स की साफसफाई और लाइट जैसी आवश्यक जरूरतें ही पूरी हो पाती हैं. मैं सोसाइटी का अध्यक्ष हूं, गार्ड नहीं जो आप के स्कूटर के लिए जवाबदेह होऊं. ले गया होगा कोई कबाड़ा समझ कर, आप भी तो उसे कबाड़ में ही देते न?’ अब तैयबजी का स्वर भी तल्ख हो चुका था, साथ ही, शोरशराबा सुन कर सोसाइटी के अन्य लोग भी आ चुके थे.

‘यह मियांवियां क्या होता है, मैं सक्षम हूं, आप मेरा नाम लीजिए. आप कुछ नहीं कर सकते तो ठीक है जब तक मेरा स्कूटर नहीं मिलेगा मैं एक भी पैसा मैंटिनैंस के नाम पर नहीं दूंगा.’ यह कह कर सक्षम कार स्टार्ट कर के दुकान चले गए थे और पीछे छोड़ गए थे लोगों की तमाम तरह की बातें. मुझे तो शाम को पूरा घटनाक्रम पता चला जब फर्स्ट फ्लोर पर रहने वाली मिसेज शर्मा ने शिकायती लहजे में सारे वाकए को मिर्चमसाला लगा कर सुनाया.

उस समय मैं ने सोचा था कि शाम को सक्षम को समझ दूंगी पर रात को दुकान से वापस आने के बाद सक्षम इतने थके होते हैं कि किसी विशेष मुद्दे पर उन से बात नहीं की जा सकती. अगले दिन सुबह नाश्ते के समय जब मैं ने बात करने की कोशिश की तो सक्षम बिफर गए, ‘किस बात का मैंटिनैंस देते हैं हम, आज पुराना स्कूटर गया है, कल कार चली जाएगी तब भी ये यही कहेंगे. मुझे

पहले मेरा स्कूटर चाहिए, उस के बाद ही कोई पैसा दूंगा. वैसे भी, मुझे तो लगता है कि अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष मिल कर गड़बड़घोटाला करते हैं. अब इस बारे में तुम भी मुझ से कोई बात नहीं करोगी,’ कह कर सक्षम नाश्ता करने लगे.

‘सक्षम, समझने की कोशिश तो करो, हम यहां रहते हैं, यहां के लोगों से कट कर नहीं रह सकते. वक्तजरूरत पर यही लोग काम आएंगे. फिर तैयबजी तथा अन्य पदाधिकारी अपना इतना समय देते हैं, तभी अपनी सोसाइटी साफसुथरी और मैंटेन रह पाती है. वे कोई अपने लिए तो नहीं मांगते मैंटिनैंस, सोसाइटी के लिए ही न. वैसे भी फ्लैट का तो कल्चर भी यही होता है कि इंसान को केवल अपने नहीं बल्कि सब के हिसाब से चलना पड़ता है.

फिर उस सैकंडहैंड खरीदे स्कूटर को तुम ने पिछले 4 वर्षों से हाथ तक नहीं लगाया है. वह तो खड़ेखड़े ही कबाड़ हो गया था. तुम भी तो उसे किसी को देने की ही बात कर रहे थे न. तो ले गया कोई बेचारा,’ मैं ने सक्षम को समझते हुए कहा.

‘हमें किसी की जरूरत नहीं है. ये लोग कभी किसी के सगे नहीं हो सकते. देश के सभी दंगों में इन का ही हाथ होता है. मैं ने सबकुछ देखभाल कर अपना फ्लैट लिया था. रिसेलिंग वालों ने सब गड़बड़ कर दिया और 2 मुल्लों को सोसाइटी में बसा दिया. मेरा वश चले तो मैं अपनी इस सोसाइटी में किसी भी मुल्ले को नहीं रहने देता और ये मूर्ख सोसाइटी वाले जिन्होंने उसे ही अध्यक्ष बना दिया और कोई मिला ही नहीं इन्हें. तुम्हारी फिलौसफी तुम अपने पास रखो.

‘जब तक मेरा स्कूटर नहीं मिलता, मैं एक भी पैसा नहीं देने वाला,’ कह कर सक्षम अपना बैग ले कर दुकान चले गए. बस, उस दिन से ले कर आज तक मैं सोसाइटी मैंबर्स की उपेक्षा झेल रही थी और इस बात को अब लगभग एक साल होने जा रहा था. हर मीटिंग में सक्षम अपना वही घिसापिटा जुमला दोहरा देते हैं, ‘स्कूटर मिलेगा तो ही मैंटिनैंस दूंगा और तो ही मीटिंग में आऊंगा.’

3 महीने पहले की बात है. एक दिन जब मैं और सक्षम सुबह मौर्निंग वाक कर के लौट रहे थे कि सोसाइटी के कुछ लोगों ने हमें घेर लिया. मैं तो डर ही गई थी कि कहीं झगड़ा न हो जाए पर तैयबजी आगे आए और प्यार से सक्षम के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘बेटा, आज मुझे अपने स्कूटर के कागज ला कर दे देना ताकि मैं आज थाने जा कर रिपोर्ट कर दूं और पुलिस अपनी कार्यवाही कर सके.’ उस दिन पहली बार मैं ने सक्षम का स्याह चेहरा देखा. वे कनखियों से मुझे देखने लगे क्योंकि स्कूटर का तो कोई भी कागज हमारे पास नहीं था, हम ने तो खुद ही उसे सैकंडहैंड खरीदा था और अपने नाम पर उसे करवाने में 2,400 रुपए लग रहे थे और बिना वजह इतने रुपए खर्च करना सक्षम को पसंद नहीं था. सो, इतने दिनों से स्कूटर अपने पहले मालिक के नाम पर ही चल रहा था.

‘जी, मैं भिजवाता हूं,’ कह कर किसी तरह सक्षम ने अपना पीछा छुड़ाया और घर आ गए. पहली बार सक्षम ने स्कूटर के मुद्दे पर कोई बात नहीं की. कुछ दिनों तक सक्षम ने स्कूटर के बारे में कोई भी बात नहीं की. इसी तरह जिंदगी चल रही थी और मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि सक्षम को कैसे समझाऊं.

एक रात जब सक्षम घर लौटे तो बहुत बेचैन से लग रहे थे. पिछले कुछ दिनों से बहुत थकान का अनुभव भी कर रहे थे पर डाक्टर के पास जाने से कतरा रहे थे. रात को 2 बजे तो स्थिति इतनी बेकाबू हो गई कि सक्षम को तुरंत डाक्टर के पास जाने की जरूरत लगने लगी. हमारे दोनों बच्चे बाहर पढ़ रहे थे और मैं अकेली थी. तैयबजी की पत्नी मेरी अच्छी दोस्त थीं और ड्राइविंग भी अच्छी तरह कर लेती थीं, सो, मैं ने उन्हें फोन पर सक्षम के बारे में बताया.

चूंकि वे हमारे फ्लोर के जस्ट नीचे वाले फ्लोर पर ही रहते थे सो 2 मिनट में वे आ ही गए और जल्दी से हम सक्षम को ले कर हौस्पिटल पहुंचे. सच कहूं तो मैं तो इतनी बदहवास सी हो गई थी कि कुछ समझ नहीं आ रहा था. तैयबजी और सलीमाजी ने ही हौस्पिटल की सारी औपचरिकताएं पूरी कीं और सक्षम को एडमिट करवाया. तैयबजी और सलीमाजी तब तक मेरे साथ रहीं जब तक कि उसी शहर में रहने वाले सक्षम के बड़े भाई नहीं आ गए.

अगले दिन सक्षम की सारी रिपोर्ट्स आ गई थीं जिन में सक्षम को हेपेटाइटिस बी हुआ था, हीमोग्लोबिन का लैवल बहुत कम था और डाक्टर्स ने ब्लड चढ़ाने की जरूरत बताई थी. सुबहसुबह तैयबजी, सलमा तथा सोसाइटी के कुछ अन्य लोग चायनाश्ता और दोपहर का खाना ले कर हौस्पिटल आ गए. जब उन्हें पता चला कि सक्षम को ब्लड की जरूरत है तो सभी ने अपनेअपने लैवल से प्रयास किए. बड़ी मुश्किल से तैयबजी के ही एक रिलेटिव का ब्लड ग्रुप सक्षम के ग्रुप से मैच हुआ और सक्षम को चढ़ाया गया. 10 दिनों तक हौस्पिटल में रहने के बाद जब 11वें दिन सक्षम को डिस्चार्ज किया गया तो सक्षम बहुत खुश थे.

घर आते ही सलीमा चाय बना कर ले आई थीं. यही नहीं, मेरे घर की पूरी साफसफाई भी करवा दी थी उन्होंने. आज सक्षम ने भी सलीमाजी के हाथ की चाय पी और उन्हें थैंक्यू भी कहा. कुछ देर बैठ कर सब चले गए और मैं काम में व्यस्त हो गई. शाम को घंटी बजी, मैं ने दरवाजा खोला तो सलीमा और तैयबजी सोसाइटी के अन्य मैंबर्स के साथ केक ले कर खड़े थे. मैं चौंक गई,
‘‘केक, क्यों कैसे?’’
‘‘आज क्या है, बताओ जरा… सब भूल गईं क्या?’’ सलीमा ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘आज, 20 जून. ओहो, हमारी शादी की 25वीं सालगिरह. अरे, सक्षम की बीमारी के चक्कर में मुझे तो कुछ याद ही नहीं रहा.’’
सलीमा ने मुझे चेंज करने को कहा और टेबल पर केक व साथ लाया कुछ नाश्ता लगा दिया. जैसे ही हम दोनों केक काटने लगे तो सलीमाजी ने दोनों बच्चों को वीडियोकौल पर ले लिया. दोनों ही बड़े खुश हो गए. काफी देर तक गप्पें लगा कर जब सब जाने लगे तो सक्षम तैयबजी की तरफ मुखतिब हो कर बोले, ‘‘आप लोगों को हमारे कारण बहुत परेशानी उठानी पड़ी.’’
‘‘बेटा, इस में परेशानी की क्या बात है. हम सब एक परिवार हैं. 25वीं सालगिरह बारबार नहीं आती, इसलिए अच्छे मन से सैलिब्रेट करो. बीमारीहारी तो आतीजाती रहती है.’’ तैयबजी की बातों से हम दोनों का ही मन प्रसन्न हो गया.

कुछ दिनों के आराम के बाद सक्षम ठीक हो गए. सोसाइटी की बात होने पर सक्षम अब प्रतिरोध करने के स्थान पर शांत हो जाया करते थे और एक दिन सक्षम स्वयं ही एक साल का 6,000 रुपया मैंटिनैंस ले कर तैयबजी के पास पहुंच गए और बोले, ‘‘सर, आप ठीक ही कह रहे थे कि स्कूटर को मैं भी कबाड़ में ही देता. इसलिए उस मुद्दे को भूल कर आप यह राशि रखिए, साथ ही, सोसाइटी के लिए यदि मैं कुछ और भी कर सकता हूं तो प्लीज बताइएगा.’’

मैं बहुत खुश थी कि भले ही सक्षम को यह देर में समझ आया पर आया तो कि आप के शहर में परिवार में कितने ही सदस्य हों परंतु आवश्यकता पड़ने पर सब से पहले पड़ोसी ही काम आता है. इसलिए आसपड़ोस से हमेशा बना कर रखनी चाहिए, साथ ही, हिंदू, मुसलमान सब की रगों में बहने वाले खून का रंग एक ही होता है.

फ्लैट में रहते समय छोटीछोटी बातों को इग्नोर कर के, सब के हिसाब से चलना चाहिए. फिर जहां हम निवास करते हैं वहां की सुविधाओं के उपभोग के लिए निर्धारित राशि देना हर निवासी का दायित्व है. साथ ही, जो लोग सोसाइटी के लिए काम करते हैं उन पर आक्षेप लगाने के स्थान पर उन्हें सहयोग करना चाहिए.  Samajik Kahaniya

Suicide : बढ़ती आत्महत्याएं – जिम्मेदार सामाजिक विसंगतियां

Suicide : दुनियाभर में हर साल कोई 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं और इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाना आसान नहीं है कि क्यों कोई आत्महत्या करता है और इस के पहले सिर्फ और सिर्फ यही क्यों सोचता रहता है कि इसे कैसे अंजाम देना है. क्यों नहीं वह अपने मन की भड़ास किसी से शेयर कर पाता?

‘आत्महत्या मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि सामाजिक समस्या है’, प्रसिद्ध फ्रैंच समाजशास्त्री एमाइल दुर्खीम द्वारा 1897 में प्रकाशित फ्रैंच भाषा की पुस्तक, ‘ले सुसाइड: एट्यूड डे सोशियोलौजी’ में यह बात कही गई है. आज जैसेजैसे वास्तविक दुनिया से कट कर लोग सोशल मीडिया की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं वैसेवैसे वे डिप्रैशन और फ्रस्ट्रेशन के शिकार भी होते रहे हैं.

हैरत की बात यह है कि अधिकतर आत्महत्याएं अचानक कम बल्कि सुनियोजित तरीके से ज्यादा हो रही हैं. इन्हें रोका तो नहीं जा सकता लेकिन कम तो किया जा सकता है बशर्ते विक्टिम के पास कोई सही सलाह देने वाला हो. लेकिन, वह है कौन? आइए देखते हैं-

राजधानी दिल्ली के भारत नगर इलाके में 12 मई को एक दंपती और उन के 2 बच्चों ने सुबह कैमिकल पी लिया. इस घटना में पति व दोनों बच्चों की इलाज के दौरान मौत हो गई. पुलिस की शुरुआती जांच में आर्थिक तंगी की वजह से खुदकुशी करने की बात सामने आई.

पुलिस के मुताबिक 45 वर्षीय हरदीप सिंह, पत्नी हरजीत कौर और 2 बच्चों के साथ चंदर विहार में रहते थे. परिजनों के मुताबिक, हरदीप पत्नी और बच्चों सहित रात से ही गायब थे. सुबह वे संगम पार्क स्थित अपनी दुकान में पहुंचे. वहां जंग रोकने वाला कैमिकल रखा हुआ था जिसे चारों ने पी लिया. जब उन की तबीयत बिगड़ने लगी तो बेटे ने अपनी बूआ अवनीत कौर को फोन कर आत्महत्या करने की बात बताई.

ऐसी खबर को पढ़ कर कुछ देर के लिए हर किसी का मन खिन्न हो जाता है लेकिन उन के बारे में ज्यादा सोचने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ती जिन्हें, चाहे जो वजह हो, आत्महत्या या परिवार सहित आत्महत्याएं करने जैसा आत्मघाती कदम उठाना पड़ता है.

कितना अकेला हो गया होगा हरदीप और उन का परिवार जो बिलकुल सांसें उखड़ते वक्त ही अपनी मौत की खबर नजदीकी रिश्तेदार को दी. न भी देते तो क्या होता, कुछ घंटों बाद ही परिजन पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाते और ऐसा नहीं होता तो 2-3 दिन बाद दुकान से बदबू आनी शुरू हो जाती और सूचना मिलने पर पुलिस आती, शटर तोड़ती, पंचनामा बनाती, रिपोर्ट लिखती, फिर इन्वेस्टिगेशन करती. कुछ दिनों बाद वह मामले की फाइल क्लोज कर देती.

क्या यह सोचा जाना वाजिब और अहम नहीं है कि हरदीप के बेटे ने अगर कुछ घंटों या कुछ दिनों पहले अवनीत कौर को फोन कर यह बताया होता कि बूआ, हम लोग आत्महत्या की प्लानिंग कर रहे हैं या सोच रहे हैं तो क्या होता. खुद हरदीप भी बहन को अपनी परेशानी बता कर मशवरा ले सकता था, अपने दिल पर पड़ा बोझ हलका कर सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया गया तो सहज समझ जा सकता है कि उन्हें किसी पर भरोसा नहीं रह गया था या वे इस की जरूरत ही महसूस नहीं कर रहे थे.

अगर भरोसा होता तो यह नौबत ही न आती. एक अच्छाखासा परिवार यों ही देखते ही देखते उजड़ गया तो क्या इस के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार है, उस से जुड़े दूसरे लोग नहीं?

सामाजिक दबाव है वजह

इस सिचुएशन के बारे में एमिल दुर्खीम का यह कथन सटीक बैठता है कि आत्महत्या की दर तब बढ़ जाती है जब समाज में लोगों के बीच सामाजिक बंधन या तो बहुत मजबूत होते हैं या फिर पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं होते. एक तरह से उन का यह कथन प्लेटो के इस विचार का खंडन ही है कि आत्महत्या करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है.

दुर्खीम हालांकि पूर्ण नास्तिक नहीं थे लेकिन सैक्युलर थे. मशहूर मनोविज्ञानी सिगमंड फ्रायड के आत्महत्या संबंधी दर्शन या विचारों को भी दुर्खीम की थ्योरी नकारती है जो आत्महत्या को अचेतन से जोड़ते थे. अब यह बहुत स्पष्ट होता जा रहा है कि सामाजिक दबाव जब नाकाबिले बरदाश्त हो जाते हैं तब आत्महत्याएं ज्यादा होती हैं.

कम ही दार्शनिकों ने आत्महत्या को ईश्वर से हट कर देखा है. नास्तिक दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्से उन में प्रमुख हैं. उन की नजर में आत्महत्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय से जुड़ा फैसला है. हालांकि वे जीवन की चुनौतियों का सामना करने और जीवन का अर्थ खोजने पर जोर देते हैं और हार मान कर आत्महत्या कर लेने को गलत मानते हैं. दार्शनिकों के बीच पसरे इस विरोधाभास का मौजूदा समाज से कोई सीधा कनैक्शन नहीं दिखता है.

भारत में सामाजिक संबंधों के बारे में पूरे दावे और आत्मविश्वास से कहा जा सकता है कि ये बेहद कमजोर और टूटन के दौर से गुजर रहे हैं. किसी से किसी को कोई सरोकार नहीं रह गया है.

धर्म और जाति के नाम पर तो खाई गहरी ही है, साथ ही, कालोनियों और अपार्टमैंटों में पड़ोस के घर में क्या हो रहा है, यह जानना तो दूर की बात है, लोगों को यही नहीं मालूम रहता कि पड़ोस में रहता कौन है.

जहां तक बात आत्महत्या की बढ़ती दर की है तो आंकड़े इस की गवाही देते हैं कि यह बहुत अनियंत्रित तरीके से बढ़ रही है. दुनियाभर में हर साल कोई 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं. भारत में साल 2022 में एक लाख 71 हजार मामले आत्महत्याओं के दर्ज किए गए थे जो साल 2021 के मुकाबले 4.2 फीसदी और 2018 के मुकाबले 27 फीसदी ज्यादा थे.

इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाना आसान नहीं है कि, क्यों कोई आत्महत्या करता है और इस के पहले सिर्फ और सिर्फ यही क्यों सोचता रहता है कि इसे कैसे अंजाम देना है कि किसी को भनक न लगे. हरदीप के मामले में तो एकसाथ 4 लोगों ने दुनिया से खुद को दिमागी तौर पर छिपाए रखा था.

पहले की तरह विक्टिम अब इस बात की परवा नहीं करता कि उस के पीछे घर, परिवार और दोस्तों पर क्या गुजरेगी. शायद इसीलिए वाकई में जो लोग किसी आत्महत्या से वास्तविक और सीधेतौर पर प्रभावित होते हैं उन से भी जीने का अधिकार घर का मुखिया छीन लेता है.

हैरानी तो इस बात पर ज्यादा होती है कि आत्महत्या करने वाले अधिकतर लोग धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं लेकिन अपनी जान लेते वक्त वे ईश्वर से डरते नहीं. हरेक धर्म ने आत्महत्या को पाप मानते इस से बचने की सलाह बड़े खौफनाक तरीके से दी है.

धर्मग्रंथों में आत्महत्या बुरी चीज

सब से पहले बात हिंदू धर्म की करें तो मरने के बाद के जीवन पर लिखी गई किताब गरुड़ पुराण कहती है कि जो मनुष्य आत्महत्या करने का पाप करता है उसे परलोक में भी जगह नहीं मिलती. उस की आत्मा भटकती रह जाती है. उसे नरक में 60 हजार साल बिताने पड़ते हैं. यह पुराण आत्महत्या को ईश्वर के प्रति पाप बताता है.

अब अगर किसी ने आत्महत्या करने का पाप किया है तो उस का प्रायश्चित्त भी पंडेपुजारी करवाते हैं और विक्टिम के घर वाले मारे डर के उन के बताए आदेशोंनिर्देशों पर अमल भी करते हैं.

घर में 10 दिन नियमित गरुड़ पुराण का पाठ कराया जाता है जिस से अकाल मौत मरने वाले को गरुड़ पुराण में वर्णित भीषण नारकीय यातनाएं न भुगतनी पड़ें. इस के लिए तबीयत से दानदक्षिणा पंडा लेता है जिस में भूमिदान, गौदान, स्वर्णदान, अन्न और वस्त्रदान, शय्या दान जैसे दर्जनभर दानों के नाम पर विक्टिम के घर वाले लुटते हैं.

अब कहा जा सकता है कि जीतेजी ही विक्टिम का हर तरह से खयाल रखा होता तो वह आत्महत्या करता ही क्यों. जाहिर है, आत्महत्या में परिजन अपनी भूमिका देख डर और सहम जाते हैं. वे इस बात से खौफ खाते हैं कि कहीं उन का सगा वाला भूतप्रेत बन कर परेशान न करे.

बिना गरुड़ पुराण या दूसरा कोई धर्मग्रंथ पढ़ा हर कोई जानता है कि अकाल मौत मरने वाले को मुक्ति नहीं मिलती लेकिन पंडा चाहे तो मुक्ति दिला सकता है. जो वह लाखपचास हजार रुपए ले कर दिलाता भी है. मरने वाला तो ईश्वरीय सत्ता को नकार कर चला गया लेकिन उस के खौफजदा परिजन ईश्वरीय सत्ता नहीं नकार पाते, जो मृतक के फैसले या इच्छा की अनदेखी ही है.

एक अजीब और दोहरी बात यह भी है कि सनातन धर्म में सती होने को आत्महत्या नहीं माना गया था बल्कि इसे पुण्य कार्य माना जाता था. एक पत्नी पति की चिता पर जिंदा जल जाए तो उस का महिमामंडन और पूजापाठ होने लगता था. समाज द्वारा धर्म के नाम पर बलात जिंदा जला दी गई औरत सती मैया करार दे दी जाती थी.

वह तो भला हो राजा राममोहन राय का जिन्होंने अभियान चला कर इस का विरोध किया और लौर्ड विलियम बेटिक से कानून बनवा कर इस कुप्रथा पर अंकुश लगवाया नहीं तो आज गलीगली में सती मैय्या के मंदिर बने होते और पंडा वहां भी पूजापाठ करता, दोनों हाथों से दक्षिणा बटोर रहा होता. इसी तरह राजपूत महिलाओं की सामूहिक आत्महत्याओं यानी जौहर को भी आत्महत्या जैसे जघन्य पाप की श्रेणी से बाहर रखा गया है.

इसलाम में भी आत्महत्या करने वालों को तबीयत से डराया गया है. एक हदीस के मुताबिक जो आदमी खुदकुशी करता है उसे कयामत के दिन उसी तरह की सजा दी जाएगी जिस तरह से उस ने आत्महत्या की है. जैसे अगर वह फांसी लगा कर मरा है तो उसे बारबार फांसी दी जाएगी. अगर उस ने जहर खा कर जान दी है तो उसे बारबार जहर पीने की सजा दी जाएगी. (सहीह बुखारी, किताब अल-जनाइज हदीस न. 1,365, सहीह मुसलिम किताब अल-ईमान हदीस न. 110).

यानी, इस तर्ज पर तो अगर कोई ट्रेन से कट कर मरा है तो उसे बारबार ट्रेन से कट कर मरने की सजा दी जानी चाहिए. अब ऊपर ट्रेनें कहां से और कैसे ले जाई जाएंगी, यह अल्लाह, कहीं हो तो, जाने. हकीकत में कुरान लिखते वक्त ट्रेनें नहीं थीं, इसलिए उन का जिक्र बतौर उदाहरण भी नहीं दिया जा सकता था. इसलिए सजा आत्महत्या के तत्कालीन तौरतरीकों तक सिमटी है जो ऊपर की दुनिया की पोल खोलती हुई है कि वह दुनिया कहीं होती ही नहीं सिवा धर्मग्रंथों के पन्नों के.

दुनिया के सब से बड़े धर्म ईसाई धर्म में भी आत्महत्या को पाप करार दिया गया है. यह ईश्वर द्वारा दिए गए जीवन का अपमान है. लेकिन बाइबिल में इस पाप की कोई सजा निर्धारित नहीं की गई है. (कैथोलिक चर्च की केटकेसिस 2260 – 2263) में कहा गया है कि आत्महत्या एक पाप है. लेकिन गंभीर तनाव, मानसिक बीमारी या अन्य परिस्तिथियों के कारण इस की गंभीरता कम हो सकती है.

कुछ दशकों पहले तक आत्महत्या करने वालों को चर्च के कब्रिस्तान में दफनाने की इजाजत नहीं थी लेकिन अब मिलने लगी है. कैथोलिक प्रोटैस्टैंट और और्थोडौक्स चर्च इस पाप की बाबत ईश्वर से क्षमाप्रार्थना करते हैं.

जैन धर्म में भी आत्महत्या को पाप और मोक्ष में बाधक माना गया है. लेकिन सल्लेखना को नहीं और दिलचस्प बात यह कि सल्लेखना धर्मगुरुओं की निगरानी में समारोहपूर्वक की जाती है. इस में साधक धीरेधीरे मरता है क्योंकि वह क्रमश: खानापीना छोड़ देता है और मरने के लिए यह जरूरी भी है. कहीं साधक डर कर यह मृत्युव्रत बीच में छोड़ या तोड़ न दे, इस बाबत धर्मगुरु और उस के परिजन उस का उत्साह बढ़ाने को मौजूद रहते हैं. वे इसे आध्यत्मिक यात्रा कहते हैं.

क्यों नहीं छोड़ा सुसाइड नोट

हरदीप सिख धर्म से था जिस में आत्महत्या को वाहेगुरु की इच्छा के खिलाफ कार्य माना जाता है, जो आत्मा के जन्ममरण यानी चक्र को प्रभावित कर सकता है. ऐसा माना जाता है कि आत्महत्या करने वाले को मोक्ष नहीं मिलता. इस का आखिरी फैसला वाहेगुरु करते हैं.

ईसाई धर्म की तरह सिख भी अब मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने लगे हैं. वे इसे अत्यधिक तनाव या मानसिक बीमारी की देन मानने लगे हैं. इस के लिए संगतसेवा की सलाह दी जाती है क्योंकि यह तनाव से नजात पाने का बेहतर तरीका है. लेकिन यह तरीका अगर कारगर होता तो हरदीप परिवार सहित आत्महत्या न करता बल्कि कहीं संगत की सेवा में लगा होता.

पुलिस की मानें तो हरदीप का हाथ इन दिनों तंग था. यानी, वह आर्थिक तनाव से ग्रस्त और त्रस्त थे. आजिज आ कर उन्होंने सपरिवार आत्महत्या का फैसला लिया. मुमकिन है कि यह सच हो लेकिन आजकल के दूसरे कई ऐसे हादसों की तरह इस में भी हैरत की बात यह है कि सुसाइड नोट नहीं छोड़ा गया था. जबकि तय है कि हरदीप खासे पढ़ेलिखे होंगे और दोनों बच्चे हाईस्कूल में थे. अब से कोई 20 साल पहले तक आत्महत्या करने वाला कुछ और करे न करे, सुसाइड नोट लिखने की रस्म जरूर निभाता था. लेकिन अब यह चलन कम हो रहा है.

सोशल मीडिया जब से रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है तब से लोगों के पढ़नेलिखने की आदत छूट रही है. सिर्फ स्कूली बच्चे ही पेन, पैंसिल और कौपी का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर वे लोग कर रहे हैं जिन का काम बिना पढ़ेलिखे नहीं चलना, मसलन प्रिंट मीडिया और अदालतें वगैरह.

कहने का मतलब यह कि अब ‘वह’ पढ़नालिखना खत्म सा है जिस से जानकारियां, ज्ञान, समाचार, तर्क, विश्लेषण, मशवरा वगैरह मिलते थे और कुछ इस ढंग से मिलते थे कि बुद्धि और तर्कक्षमता भी निखरती थी और किसी भी विषय पर सोचने के काफी कुछ पहलू मिलते थे.

अब जब सबकुछ औनस्क्रीन है तब गिनती के लोग ही पत्रपत्रिकाएं पढ़ रहे हैं. उन लोगों की गिनती तो उंगलियों पर की जा सकती है जो अपने काम से इतर कुछ लिख रहे हैं. अब फिर से बात हरदीप और उन के परिवार की जिन से सुसाइड नोट भी लिखते न बना. क्यों, क्योंकि वे भी स्मार्टफोन के आदी हो गए थे. एक ऐसी आभासी दुनिया में और लोगों की तरह वे भी रह रहे थे जहां कहने को ही हजारों लोग आपस में जुड़े रहते हैं जबकि हकीकत में इर्दगिर्द कोई नहीं होता सिवा मैं और मेरे स्मार्टफोन के जिस ने लोगों को कुछ इस तरह तनहा कर दिया है कि वे अपनी तनहाई से भी बात नहीं कर सकते.

रिश्तों में पड़ती दरार

हरदीप दुनिया, समाज, परिवार और दोस्तों से इतने कट गए थे कि उन्हें कोई अपना नजर नहीं आ रहा था जिस से वे अपनी परेशानी शेयर कर पाते. आर्थिक तंगी कोई ऐसा बड़ा या अहम मसला नहीं होता जिसे हल न किया जा सके. फिर हरदीप का ठीकठाक कारोबार था, घर था, दुकान थी, कारोबारी दोस्त और रिश्तेदार थे. मांगते तो कोई तो उन की मदद करता पर इस तरफ लगता है उन्होंने सोचा ही नहीं और अगर सोचा भी होगा तो उन के स्वाभिमान ने किसी के सामने हाथ फैलाने की इजाजत उन्हें न दी होगी.

यहां बात एमाइल दुर्खीम की थ्योरी के मुताबिक समाज और रिश्तों पर आ कर अटक जाती है कि क्यों कोई किसी को इस लायक भी नहीं समझता कि उस से सलाह ले सके, अपनी समस्या का समाधान पूछ सके. अब से कुछ सालों पहले तक यह काम एक सीमा तक पत्रपत्रिकाएं करते थे. उन के लेखों और कहानियों में एक समस्या और उस का समाधान भी होता था.

पाठक अपनी समस्या पढ़ कर उन से कनैक्ट हो जाता था या फिर सीधे पत्र लिख कर संपादक से पूछ सकता था. समस्याओं के समाधान के लिए एक स्तंभ ही अलग से होता था. आज भी जो चुनिंदा पत्रिकाएं छप और बिक रही हैं उन में आज भी यह कौलम है. दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं सरिता, मुक्ता, गृहशोभा और सरस सलिल में ये स्तंभ किसी न किसी नाम से जारी हैं.

पत्रिकाओं की रचनाओं में मनोरंजन भी होता था और विविधता भी होती थी. सोशल मीडिया जैसा भोथरा और खोखला ज्ञान नहीं होता था जिन से कुछ हल मिलने के बजाय कचरा सामग्री ज्यादा मिलती है जो किसी काम की नहीं होती. मुट्ठी में कैद इस स्क्रीन ने लोगों से लिखनेपढ़ने की आदत छीन ली जो अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हुआ करती थी. ऐसा नहीं कि तब लोग आत्महत्या नहीं करते थे. करते थे, लेकिन उस की दर कम थी क्योंकि यह आखिरी विकल्प हुआ करता था.

आर्थिक दिक्कतें बनीं वजह

हरदीप उस दौर में होते तो अव्वल यह नौबत आने की संभावना कम थी कि बाहर से तो वे पैसे वाले दिखते लेकिन हकीकत में थे नहीं. पढ़ाईलिखाई के दौर से ले कर अब तक लेख और कहानियां यह नसीहत देते रहे हैं कि अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च मत करो. चादर के मुताबिक पैर पसारने की बात अब कम ही सुनने में आती है क्योंकि हर तरह का लोन अब आसानी से मिल रहा है. लोग दिखावे के लिए बेतहाशा खर्च कर रहे हैं. आम आदमी बैंकों के कर्जे में गलेगले तक डूबे ब्याज की दलदल में धंसे जा रहे हैं. यही हरदीप के साथ हो रहा था.

दूसरे, हरदीप के बच्चे महंगे स्कूल में पढ़ रहे थे जिन की फीस भी उन्हें भारी पड़ने लगी थी. पैसा हो तो महंगे स्कूल की पढ़ाई एतराज की बात नहीं लेकिन आप फीस भी अफोर्ड न कर पा रहे हों तो बच्चों को सस्ते स्कूल में पढ़ाने का मशवरा सोशल मीडिया पर नहीं मिलता. वह पत्रिकाओं में ही मिलता है. अब आप अगर पत्रिकाएं पढ़ ही न रहे हों तो इस की कीमत तो आप को चुकानी पड़ेगी ही.

सुसाइड नोट लिखना छोड़ना इसलिए भी कम हो रहा है कि 20-25 हजार रुपए का फोन रखने वालों के पास 5-10 रुपए का पेन और मुफ्त के भाव का कागज भी नहीं होता. यह एक मनोवैज्ञानिक सच है कि जब आप कुछ लिखते हैं, खासतौर से अपनी कोई समस्या, तो आप का मन हलका होता है और कई बार लिखतेलिखते ही समस्या का समाधान दिखाई देने लगता है या कि महसूस होने लगता है. इस से जीने की ललक बढ़ती है और निराशा कम होती है.

एक आंकड़े के मुताबिक, आत्महत्या करने वालों में से लगभग 15 से 40 फीसदी ही सुसाइड नोट छोड़ते हैं. जापान जैसे देश में यह दर 30 फीसदी है. भारत के बारे में आंकड़ा उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस दिशा में कोई काम या अध्ययन नहीं हो रहा. लेकिन समाचारपत्रों में छप रही खबरों पर गौर करें तो 50 फीसदी मामलों में ही लोग सुसाइड नोट छोड़ रहे हैं. भोपाल के 10 मामलों में से 5 में सुसाइड नोट नहीं मिल रहे हैं, यह हालत देशभर की भी हो सकती है.

सुसाइड नोट क्यों जरूरी

सुसाइड नोट लिखने का अपना एक अलग मकसद हुआ करता है या था जिसे साहित्यिक व दार्शनिक भाषा में कहें तो स्वयं को उद्घाटित कर देने का है. अगर विक्टिम किसी से पीड़ित है तो उसे कठघरे में जरूर खड़ा करता था. एक तरह से यह आत्मअभिव्यक्ति थी कि मरने के बाद लोग अन्यथा कुछ कयास न लगाने लगें.

दूसरे, पुलिस परिजनों को परेशान न करे, यह अपील हर दूसरे सुसाइड नोट में हुआ करती थी कि मैं अपनी मरजी से आत्महत्या कर रहा/रही हूं. मेरी मौत के बाद मेरे परिवार वालों को परेशान न किया जाए.

इस का कम होता रिवाज बताता है कि लोग खुद को व्यक्त ही नहीं कर पा रहे हैं. इस की भी वजह यह है कि सोशल मीडिया ने उन से यह मौका या अधिकार कुछ भी कह लें छीन लिया है. वहां सिर्फ दूसरों की सुननी पड़ती है जिन से आप का दूरदूर तक कोई वास्ता नहीं होता.

भोपाल के एक कालेज के प्रोफैसर बताते हैं कि 80 के दशक में कालेज के दिनों में मैं प्यार के चक्कर में पड़ गया था और असफल होने पर आत्महत्या करने का भी मन बना चुका था. लेकिन एक दिन कालेज की लाइब्रेरी में एक मैगजीन में एक लेख पड़ा जिस में यह बताया गया था कि आप के बाद आप के अपनों पर क्या गुजरती है.

सोशल मीडिया पर इतनी गहराई तो क्या उथलेपन से भी यह पढ़ने को नहीं मिलता कि प्यार या पढ़ाई में या जिंदगी के किसी भी मोरचे पर नाकाम होने पर आत्महत्या की बात सोचना अपनों के साथ ज्यादती है, क्रूरता है और आदमी दुख सह कर, झटके खा कर हौसला रखे यानी जिंदा रहे तो काफीकुछ हासिल कर सकता है.

वह सबकुछ आज मेरे पास है जिस के अरमान मैं ने जवानी के दिनों में संजोए थे और सपने देखे थे. इन प्रोफैसर साहब के मुताबिक, अगर उस वक्त वे अपने फैसले पर अमल कर डालते तो सब से ज्यादा दुख उन के मांबाप और भाईबहनों को होता जिन्होंने एमपी पीएससी में मेरे सलैक्ट होने पर जश्न मनाया था.

अब तो खासतौर से बड़े शहरों में जश्न मनाने और अर्थी को कंधा देने को भी चार लोग जुटाना मुश्किल होता जा रहा है. समाज में आए बदलावों की वजहें कुछ भी हों, उन्होंने आदमी को भी इतना बदल दिया है कि वह एक हद तक ही दुनिया में खुद को फिट और सहज महसूस करता है. और जब यह हद भी टूट जाती है या बरदाश्त नहीं होती तो वह झट से खुदकुशी कर लेता है.

सोशल फिटनैस है जरूरी

सोशल फिटनैस के लिए किसी तरह की उल्लेखनीय पहल कहीं होती नहीं दिख रही है. यह सोचना बेमानी है कि धर्म और राजनीति वे प्लेटफौर्म्स हैं जो लोगों को जोड़े रखे हुए हैं. हकीकत तो यह है कि इन्हीं दोनों की वजह से लोगों में गोत्र तक की दूरियां बढ़ रही हैं.

भीड़ इकट्ठी होना सोशल फिटनैस या मेलमिलाप का उदाहरण नहीं होता, खासतौर से तब जब यह भीड़ अपनी खुदगर्जी और कारोबार के लिए जुटाई जाती हो. फसाद की असल जड़ समाज का तेजी से विघटित होना है जिस का असर हरदीप जैसे खासे खातेपीते लोगों पर कुछ इस तरह पड़ता है कि किसी को हवा भी नहीं लगती कि असल में वे किस परेशानी से हार रहे हैं.

हरेक आत्महत्या की वजह देखनेसुनने में ही अलग लगती है, जिन्हें एक सूत्र में पिरोया जाए तो वजह थोपे गए सामाजिक कायदे, कानूनों और बंदिशों को मानने की मजबूरी ही निकलती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पारिवारिक समस्याओं के चलते 32.4 फीसदी लोग आत्महत्या करते हैं. इस के बाद दूसरी वजह बीमारियों से तंग आए लोगों की है जिन का फीसदी 17.1 है.

नशे की गिरफ्त में आ कर 5.6 फीसदी लोग खुदकुशी करते हैं तो 5.5 फीसदी लोग विवाह संबंधी मुद्दों को ले कर अपनी जान दे देते हैं. प्रेमप्रसंग के चलते 4.5 फीसदी, तो कर्ज में डूब कर आत्महत्या करने वालों की संख्या 4.2 फीसदी है. बेरोजगारी, परीक्षा में असफलता के चलते 2-2 फीसदी लोग आत्महत्या करते हैं. इस के बाद जो कारण आत्महत्या के हैं उन में से हरेक का फीसदी एक से कम है. मसलन प्रियजन की मृत्यु, अवैध संबंध, बां?ापन और नपुंसकता व सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट होना आदि.

इन में से असाध्य बीमारियों वाली वजह को छोड़ दें तो लगभग सारी वजहें किसी न किसी रूप में समाज के इर्दगिर्द की ही हैं. लेकिन हैं तो, अब जरूरत आत्महत्याओं की दर को कम करने की है क्योंकि जीने का हक सभी को है.

यह सच है कि आत्महत्या किसी के लिए भी आखिरी विकल्प होता है पर उस तक पहुंचने से पहले हरदीप जैसों को कैसे रोका जाए, इस पर गौर किया जाना जरूरी है. मौजूदा सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए जरूरी है कि हम सभी मानसिक रूप से मजबूत समाज के निर्माण में भागीदार बनें.

Family Story In Hindi : बहुरूपिए ससुराल वाले

Family Story In Hindi : हाथी के दांत खाने के और होते हैं और दिखाने के और, यह बात पलक को तब समझ आई जब उस के संस्कार की बात करने वाले बहुरूपिए ससुराल वालों की असलियत सामने आई.

मटन का पैकेट किचन प्लेटफौर्म पर रखते हुए घर का नौकर संजू बोला, ‘‘बीबीजी, दादा साहब ने यह 2 किलोग्राम मटन भिजवाया है, उन्होंने कहा है कि आज दोपहर के खाने में मटन बिरयानी और मटन कबाब बनाना है.’’

इतना कह कर संजू वहां से चला गया. राजेश्वरी, जो किचन का ही कुछ काम कर रही थीं, अपने हाथों को रोके बगैर ही किचन में खड़ी अपनी बहू पलक, जो हरी पत्तेदार सब्जियां सुधार रही थी, से बोलीं, ‘‘पलक बेटा, पहले मटन को धो कर गलाने के लिए चढ़ा दो क्योंकि मटन को गलने में टाइम लगेगा. तब तक मैं बाकी तैयारियां कर लेती हूं.’’

राजेश्वरी के ऐसा कहते ही पलक ने कुछ कहने की मंशा से अपनी सासुमां की ओर देखा, लेकिन राजेश्वरी अपनी ही धुन में काम में लगी हुई थीं. असल में पलक अपनी सासुमां से यह कहना चाहती थी कि मम्मीजी, कल ही तो फिश बनाई थी तो आज मटनबिरयानी और कबाब बनाना क्या जरूरी है? लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाई और चुपचाप मटन धोने लगी.

जब से पलक इस घर में ब्याह कर आई है तब से वह देख रही है मंगलवार और शनिवार को छोड़ कर हर दिन दोनों टाइम दोपहर और रात के खाने में हरी सब्जियों के अलावा नौनवेज भी बनता ही है. मंगलवार और शनिवार को घर पर नौनवेज नहीं बनने के पीछे भी एक कारण है. इस घर के मुखिया यानी राजेश्वरी के ससुरजी, पलक के दादाससुर इन दोनों दिनों में केवल सात्विक भोजन ही करते हैं और राजेश्वरी को घर पर नौनवेज नहीं बनाने की सख्त हिदायत है.

घर पर नौनवेज अवश्य इन दोनों दिनों में नहीं बनता लेकिन राजेश्वरी के पति और बेटे मतलब पलक के ससुर और पति दोनों ही घर के बाहर नौनवेज खा ही लेते हैं. बाहर खाने में कोई रोकटोक नहीं है, केवल मंगलवार और शनिवार को घर के किचन में सात्विक भोजन ही बनता है.

पलक का ब्याह 4 महीने पहले शहर के जानेमाने राजनीतिक व रसूखदार परिवार में हुआ है. उस के दादा ससुर ठाकुर भानु प्रताप सिंह पूर्व विधायक रह चुके हैं. ससुर ठाकुर अभय प्रताप सिंह वर्तमान में सांसद हैं और पलक के पति ठाकुर अनुराग सिंह राजनीति में अपने पैर जमा रहे हैं या यों कह सकते हैं कि उन्हें विरासत में जमाजमाया राजपाट मिल ही गया है. कुल मिला कर पूरा का पूरा परिवार जनसेवा, राष्ट्रीय सेवा में तल्लीन है. पलक भी कोई छोटेमोटे परिवार से ताल्लुक नहीं रखती है, वह भी शहर के प्रतिष्ठित परिवार से है. उस के पिता शहर के सम्मानित, प्रतिष्ठित व शहर के बहुत बड़े जानेमाने उद्योगपति हैं. शहर में दोनों ही परिवारों का डंका बजता है.

हाथी के दांत खाने के और होते हैं और दिखाने के और, यह कहावत ऐसे ही प्रसिद्ध नहीं है. अकसर यह देखा गया है कि हमारे आसपास और इस दुनिया में ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें समझ पाना आसान नहीं है. इस तरह के लोग जैसा दिखते हैं वैसे होते नहीं है. ये लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ. उन का वास्तविक रूप कुछ और होता है. वे दुनिया के समक्ष खुद को कुछ और ही रूप में प्रस्तुत करते हैं. हम उन्हें बहुरूपिए की संज्ञा भी दे सकते हैं जो अकसर समय के साथ अपना रूप व स्वभाव बदलते ही रहते हैं या फिर गिरगिट भी कह सकते हैं.

साधु बन कर संस्कार, संस्कृति और संयम का पाठ पढ़ाने वाले ये बहुरूपिए असल जिंदगी में चांडाल होते हैं. यही हाल पलक के ससुराल वालों का भी है. उन का राजनीतिक चेहरा कुछ और ही है और वास्तविकता कुछ और.

ठाकुर परिवार की पूरी राजनीति धर्म, धर्म की रक्षा, नारी सुरक्षा और उस की आजादी पर ही टिकी हुई है. पलक जब इस घर में ब्याह कर आई तो वह इस बात से बेखबर थी कि उस का ससुराल जिन मुद्दों को ले कर आवाज उठाता है, प्रैस कौन्फ्रैंस करता है, असल में उन्हें उन मुद्दों से कोई लेनादेना है ही नहीं. वह तो बस एक राजनीतिक एजेंडा है जिस के जरिए ये सब बस अपना स्वार्थ साधते हैं. अपनी रोटियां सेंकने के लिए ही यह सारा प्रपंच करते हैं और भोलीभाली जनता उन्हें अपना और अपने धर्म का रक्षक समझ कर सिरआंखों पर बिठाए रखती है.

पलक जब ब्याह कर आई तो उस की पलकों में अनगिनत सपने थे जिन्हें वह साकार रूप देना चाहती थी. शादी से पहले पलक एक समाजसेवी संस्था से जुड़ी हुई थी जिस के जरिए वह गरीब, लाचार व घरपरिवार से प्रताडि़त महिलाओं की मदद किया करती थी. उन्हें जीने की नई राह दिखाती थी. पलक को इस बात का अंदेशा ही नहीं था कि शादी के बाद उस के जीवन में इतना बड़ा बदलाव आ जाएगा. दूसरों के इंसाफ व अधिकार के लिए लड़ने वाली को खुद अपने अधिकार व स्वतंत्रता के लिए भी एक दिन लड़ना पड़ेगा.

पलक इस खुशफहमी में थी कि वह ऐसे परिवार में ब्याह कर जा रही है जहां नारी सुरक्षा और नारी स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को गंभीरता से लिया जाता है, उस पर आवाज उठाई जाती है और आंदोलन भी किए जाते हैं. लेकिन पलक की यह खुशफहमी कुछ ही दिनों में काफूर हो गई जब उस के पति अनुराग ने उस से कहा, ‘‘पलक, अब तुम्हें किसी संस्था के लिए काम करने की जरूरत नहीं है. हमारे घर की बहुएं काम नहीं करतीं.’’

अनुराग का सख्त लहजे में इस तरह कहना पलक को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा, उस ने पलट कर जवाब देते हुए अनुराग से कहा, ‘‘मैं उस संस्था के लिए काम नहीं करती. अपनी सेवाएं मुफ्त में देती हूं. बदले में संस्था से कोई पैसा नहीं लेती. मैं स्वेच्छा से यह सब करती हूं. मैं उन महिलाओं की सहायता करती हूं जो लाचार, असहाय और अपने परिवार से सताई व ठुकराई गई हैं. यह सब तो आप के पार्टी एजेंडा में भी है. फिर, मैं करती हूं तो इस में परेशानी क्या है?’’
‘‘तुम अपनी छोटी सी संस्था की तुलना हमारी पार्टी से न ही करो तो अच्छा है. एक और बात अच्छी तरह समझ लो, हमारे घर की बहूबेटियां घर से बाहर नहीं निकलती हैं.’’

अनुराग का यह खुद के पुरुष होने का हुंकार था, जो वह पलक के समक्ष दहाड़ रहा था. लेकिन पलक कहां डरने वाली थी, वह अनुराग के संग भिड़ गई और दोनों के मध्य संस्था में जाने और नहीं जाने को ले कर बहस बढ़ गई. जब पलक के तर्कों पर अनुराग खुद को अक्षम पाने लगा तो उस ने पलक पर हाथ उठा दिया और वहां से चला गया.

अनुराग की इस बदसुलूकी की जानकारी पलक ने अपने सास, ससुर और दादा ससुर को दी लेकिन उन सभी ने कुछ इस तरह से व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही न हो. यह देख पलक को बहुत आश्चर्य हुआ और वह गुस्से से तिलमिला उठी. जो लोग हर बार अपने भाषण में आम जनता को संबोधित करते हुए बस एक ही बात दोहराते हैं कि हम नारी का सम्मान, उस का अधिकार और उस की सुरक्षा चाहते हैं वही लोग अपने ही घर की महिलाओं को अपने जूते की नोंक पर रखना अपने पुरुषत्व की शान समझते हैं.

पलक पढ़ीलिखी और साहसी होने के साथसाथ एक जानेमाने धनाढ्य व दबंग परिवार की बेटी थी. उस ने फौरन अपने मायके अपनी मां को फोन लगाया और बताया कि अनुराग ने उस पर हाथ उठाया और वह नहीं चाहता कि वह संस्था के लिए काम करे.

पलक की सारी बातें सुनने के पश्चात पलक की मां ने उस से जो कहा उसे सुन कर पलक की आंखें नम हो गईं और उस का मनोबल लड़खड़ा गया. पलक की मां ने उस से कहा, ‘‘देखो पलक, अब तुम्हारा ससुराल ही तुम्हारा अपना घर है जहां तुम्हें ताउम्र गुजारनी है. तुम जितनी जल्दी यह समझ जाओ उतना अच्छा होगा तुम्हारे लिए भी और हमारे लिए भी. अपनी ससुराल में तालमेल बिठाना सीखो और वहां के तौरतरीके अपना लो. इस तरह छोटीछोटी सी बात पर यहां फोन मत किया करो. यदि तुम्हारा पति नहीं चाहता कि तुम घर से बाहर जाओ, काम करो, तो मत करो न, क्या जरूरत है समाज सेवा करने की. इज्जतदार और खानदानी लड़कियां अपने ससुराल की इज्जत इस तरह नहीं उछालतीं, यह बात गांठ बांध कर रख लो.’’

इतना कह कर पलक की मां ने फोन रख दिया. उस दिन पलक बहुत रोई. उस के बाद फिर कभी पलक ने अपनी मां से अपनी किसी भी परेशानी का जिक्र नहीं किया क्योंकि वह समझ चुकी थी कि एक लड़की आज भी अपने ही मातापिता के लिए अपने ही घर में पराई है.

यही सब सोचते हुए गैस चूल्हे पर पलक ने बेमन से मटन धो कर गलाने के लिए चढ़ा दिया और किचन का बाकी काम करते हुए राजेश्वरी से बोली, ‘‘मम्मीजी, मैं सोच रही हूं क्यों न हम एक कुक रख लें. किचन में इतना ज्यादा काम हो जाता है कि हम खाना बनाने के अलावा कुछ और दूसरा काम कर ही नहीं पाते हैं.’’

पलक के इतना कहते ही काम कर रही राजेश्वरी के हाथ खुद ही रुक गए और वह पलक के करीब आ उस की हथेलियों को अपनी हथेलियों में ले, थपथपाते हुए बोली, ‘‘बेटा, यह बात दोबारा मत कहना. तुम तो अपने पति, ससुरजी और दादा ससुरजी को बहुत अच्छी तरह से जानती हो, वे कभी नहीं चाहेंगे कि घर पर खाना नौकर बनाएं या कोई दूसरी जाति या धर्म का व्यक्ति किचन के भीतर प्रवेश करे तो इस तरह की बात फिर कभी मत कहना.’’

अपनी सासुमां के ऐसा कहने पर पलक ने कुछ और नहीं कहना ही उचित समझ और चुपचाप किचन के कामों में लगी रही. दोपहर के समय जब तीनों पिता, पुत्र और पोता खाना खाने बैठे, मटन कबाब खाते हुए ठाकुर अभय प्रताप सिंह बोले, ‘‘बाबूजी, 2 दिनों बाद चैत्य नवरात्र शुरू होने वाला है. हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिस से हमारी और हमारी पार्टी की छवि में और अधिक कट्टर सनातनी की छाप बने जिसे देख कर जनता आगामी चुनाव में हमें ही वोट करे.’’

इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ठाकुर अनुराग सिंह बोला, ‘‘पापा, क्यों न हम एक प्रैस कौन्फ्रैंस कर मीडिया वालों को बुलाएं और शहर में भव्य पूजा व भंडारा का आयोजन कराएं.’’

‘‘नहीं, इस का जनता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. कुछ ऐसा करना होगा जिस से शहर में थोड़ी तनाव की स्थिति उत्पन्न हो, लोग उत्तेजित हों. आस्था और धर्म खतरे में है, ऐसा कुछ माहौल बने,’’ राजनीति के अनुभवी और पुराने खिलाड़ी ठाकुर भानु प्रताप सिंह बोले.
‘‘तो फिर ऐसा क्या करना चाहिए, बाबूजी आप ही बताइए?’’ ठाकुर अभय प्रताप सिंह मटन बिरयानी चटखारे ले कर खाते हुए बोले.

‘‘एक आइडिया है मेरे पास, इस चैत्र नवरात्र में क्यों न हम यह मांग रखें कि पूरे 9 दिनों तक हमारे शहर में मटन और चिकन की सारी दुकानें बंद कर दी जाएं क्योंकि इस समय सभी सनातनी धर्म के श्रद्धालु माता की उपासना व आराधना करते हैं. ऐसे में मटन व चिकन की खुलेआम बिक्री सनातन धर्म की आस्था को ठेस पहुंचाने का काम करती है,’’ चेहरे पर कुटिल भाव लाते हुए ठाकुर भानु प्रताप सिंह बोले.

इस बात पर ठाकुर अभय प्रताप सिंह बोले, ‘‘अरे वाह बाबूजी, आप ने क्या बेहतरीन तरकीब निकाली है. इस खबर को तो हर मीडिया, हर अखबार, हर चैनल हाथोंहाथ लेगा, बड़ी ही प्रमुखता के साथ दिखाएगा. हमारी पार्टी वैसे भी सनातनी धर्म की पक्षधर कहलाती है. इस विरोध के पश्चात तो और अधिक लोकप्रियता बढ़ जाएगी. कल से ही इस नवरात्र पर मटनचिकन की बिक्री पर विरोध का मोरचा खोल देते हैं.’’

अपने पिता के ऐसा कहते ही अनुराग बोला, ‘‘इस का मतलब पूरे 9 दिनों तक हमें मटनचिकन खाने को ही नहीं मिलेगा.’’

अनुराग की इस बात पर ठाकुर भानु प्रताप सिंह और ठाकुर अभय प्रताप सिंह जोर से ठहाका लगा कर हंसने लगे, फिर अनुराग के पिता अभय प्रताप सिंह बोले, ‘‘अरे बुड़बक, कहीं का हमें खाना नहीं छोड़ना है. हमें केवल दुकान बंद कराना है.’’

तीनों पिता, पुत्र और पोते की सारी बातें खाना परोस रही पलक और उस की सासुमां राजेश्वरी सुन रही थीं. राजेश्वरी पर इन तीनों की बातों का कोई असर नहीं हुआ लेकिन पलक का मन विचलित हो गया. वह सोचने लगी कि कुछ वोट पाने और सत्ता में बने रहने के लिए कुछ नेता किस तरह षड्यंत्र रचते हैं और उस में जनता फंस जाती है. 9 दिनों तक यदि कोई दुकानदार अपनी दुकान बंद रखेगा तो उस की रोजीरोटी और घर कैसे चलेगा? पलक इस का विरोध करना चाहती थी लेकिन वह यह भी जानती थी कि इस तरह का विरोध और बहस अंतहीन है. वह शांत रही.

9 दिनों तक नवरात्र पर मटन मार्केट बंद रखा जाए, इस पर खूब मोरचे निकाले गए, विज्ञप्ति सौंपी गई. इस क्रिया की प्रतिक्रिया हुई. नवरात्र के प्रारंभ दिन पर दोपहर के भोजन में पलक ने अपनी सासुमां को जानकारी दिए बगैर ही बिना प्याजलहसुन के सात्विक भोजन बना कर परोस दिया, जिसे देखते ही तीनों पिता, पुत्र और पोता पलक पर भड़क उठे. अनुराग गुस्से में तमतमाते हुए बोला, ‘‘इस तरह का बेस्वाद खाना बनाने को तुम्हें किस ने कहा.’’
पलक शांत भाव से बोली, ‘‘किसी ने नहीं कहा. मैं ने सोचा, जब आप सभी पूरे शहर में मटन मार्केट बंद करने के लिए आह्वान कर रहे हैं तो आप लोग भी सादा सात्विक भोजन करना ही पसंद करेंगे.’’

पलक के इतना कहते ही ठाकुर भानु प्रताप सिंह चिल्लाते हुए बोले, ‘‘अरे पागल औरत, तुझे पता नहीं, हम राजनेताओं की कथनी और करनी में अंतर होता है.’’

पलक मुसकराई और मन ही मन बुदबुदाते हुए बोली, ‘मुझे मालूम है, हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं, और वह वहां से चली गई.

अनुराग तीनों के लिए औनलाइन सींककबाब और्डर करने लगा. यह पलक का पहला कदम था जो उस ने अपनी ससुराल वालों के विरोध में उठाया था. यह जंग अभी काफी लंबी चलनी थी लेकिन इस बार पलक ने भी कमर कस ली थी. Family Story In Hindi

लेखिका : डा. प्रेमलता यदु 

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