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Love Story In Hindi : क्षमादान – अदिति और रवि के बीच कैसे पैदा हुई दरार

Love Story In Hindi : रवि 3 महीने से दीवाली पर बोनस और प्रमोशन की आस लगाए बैठा था. 2 साल की कड़ी मेहनत, कम छुट्टियां और ओवर टाइम से उस ने अपने बौस का दिल जीत लिया था. वह अपने बौस मिस्टर राकेश का फेवरेट एंप्लोई बन चुका था. उस ने सोचा था कि इस बार दीवाली पर एक महीने की लंबी छुट्टी ले कर मम्मीपापा के साथ रहेगा. मम्मी पिछले साल से ही उस की शादी की कोशिश में जुटी थीं.

अपने साथ काम करने वाले मुकेश को कई बार वह अपनी छुट्टियों की प्लानिंग बता चुका था. उस के सारे सहकर्मियों को भरोसा था कि उसे अब की बार दीवाली पर बोनस के साथसाथ प्रमोशन भी मिलेगा. मिस्टर राकेश ने प्रमोशन की लिस्ट में रवि का नाम सब से ऊपर लिखा हुआ था और उसे वे कई बार बता भी चुके थे. हालांकि हैड औफिस से फाइनल लिस्ट आनी बाकी थी.

सप्ताह का पहला दिन था. रवि अपने सहकर्मियों को गुड मौर्निंग कहता हुआ अपने कैबिन में जा रहा था, तभी चपरासी गुड्डू रवि से बोला, ‘‘रवि साहब, आप को बौस ने बुलाया है.’’

‘‘मुझे,’’ रवि के मुंह से अचानक निकला था.

पास के कैबिन में बैठा मुकेश रवि की तरफ ही देख रहा था. उस का सवाल सुन कर वह बताने लगा, ‘‘अरे रवि, तुम्हें पता चला हमारे बौस राकेश साहब की मदर की तबीयत ज्यादा खराब है. इसलिए वे छुट्टी पर चले गए हैं.’’

‘‘अच्छा, कब तक के लिए,’’ रवि के चेहरे पर थोड़ी परेशानी झलक रही थी और सहानुभूति भी. परेशानी खुद की छुट्टी को ले कर थी. वह सोच रहा था कि अगर बौस छुटट्ी पर चले गए हैं तो उस की छुट्टी की कौन मंजूरी देगा और सहानुभूति अपने बौस के लिए थी.

‘‘यार, फिलहाल तो उन्होंने एक हफ्ते की ऐप्लिकेशन दी है, लेकिन कुछ नहीं कह सकते कि वे कब तक लौटेंगे,’’ मुकेश ने बताया.

रवि के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह अपनी छुट्टियां को ले कर संशय में था. अब जब उस के बौस छुट्टी पर थे, तो उसे पता नहीं ज्यादा दिन की छुट्टी मिल सकेगी या नहीं.

मुकेश ने उस के चेहरे के भावों को भांपते हुए कहा, ‘‘तू फिक्र मत कर, तुझे छुट्टी तो मिल ही जाएगी. 2 साल से लगातार हार्डवर्क जो कर रहा है तू.’’

रवि इस पर मुसकरा दिया. फिर धीमे से बोला, ‘‘फिर यह नया बौस कौन है, जो मुझे बुला रहा है?’’

‘‘कोई नई मैडम राकेश सर की जगह टैंपरेरी अपौइंट हुई हैं. सुना है मुंबई से हैं,’’ मुकेश ने बताया और बोला, ‘‘तू मिल ले जा कर, औफिस का वर्क इंट्रोड्यूस करवाने के लिए बुलवा रही होंगी तुझे.’’

‘‘चल, फिर मैं उन से मिल कर आता हूं,’’ रवि के चेहरे पर अब थोड़ी राहत झलक रही थी.

मुकेश की इस बात से उसे राहत पहुंची थी कि 2 साल से वह हार्डवर्क कर रहा था. कंपनी के पास उस की छुट्टी कैंसिल करने की कोई वजह भी नहीं थी.

ये सब सोचतेसोचते रवि बौस के रूम का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया.

‘‘प्लीज, मे आई कम इन मैम,’’ रवि कैबिन के दरवाजे को आधा खोल कर धीरे से बोला.

‘‘कम इन,’’ मैडम किसी फाइल को सिर झुका कर देख रही थीं.

रवि चुपचाप उन की टेबल के सामने जा कर खड़ा हो गया.

मैडम ने अचानक अपना सिर उठाया और शायद ‘सिट डाउन, प्लीज’ कहने ही वाली थीं कि रुक गईं.

रवि भी अपनी जगह बस खड़े का खड़ा ही रह गया. उसे इस बात की बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि वह उसे आज यहां अचानक इस तरह मिलेगी. वह अदिति थी. कालेज की पुरानी दोस्त नहीं, कालेज के दिनों की रवि की एकमात्र दुश्मन. दोनों ने कभी एकदूसरे से कालेज में बात भी नहीं की थी, लेकिन उन का झगड़ा फेसबुक चैटिंग पर पहले हो चुका था.

रवि का कालेज में पहला साल था. वह पढ़ाकू किस्म का लड़का था. उन दिनों वह अदिति की तरफ आकर्षित हो गया था, लेकिन उसे उस से बात करने में न जाने क्यों बहुत ज्यादा झिझक महसूस होती थी. अदिति अच्छी होस्ट होने के साथसाथ कविताएं लिखती और सुनाती भी थी. ऐसी कई बातों ने रवि को प्रभावित कर दिया था. लेकिन रवि चुप रहने वाला लड़का था. वह अदिति से बात करना तो चाहता था, पर कर नहीं पाता था.

2 सैमेस्टर पूरे होने के बाद रवि के कालेज में कुछ दिनों के लिए छुट्टियां हो गई थीं.

तभी एकाएक उसे फेसबुक जैसे माध्यम का साथ मिल गया. उस ने इंटरनैट पर फेसबुक आईडी बना ली और अदिति को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. अदिति ने उसे ऐक्सैप्ट भी कर लिया. अब जैसे रवि को नया आसमान मिल गया था, थोड़ाबहुत जो भी लिख लिया करता था, फेसबुक पर पोस्ट करता, उस के क्लासमेट्स भी अब उसे नोटिस करने लगे थे. फिर वह एकाएक अदिति को अकसर उस की कविताओं की तारीफ लिख कर भेजा करता, उस की तसवीरों पर कमैंट कर दिया करता. बदले में अदिति भी रिप्लाई करती थी.

एक दिन उस ने अदिति की एक तसवीर देखी और उस पर उसे कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ. उस दिन उस ने कमैंट में अपनी वे पंक्तियां न लिख कर अदिति की उस तसवीर को डाउनलोड कर अपनी टाइमलाइन से उन पंक्तियों के साथ अपलोड कर दिया और अदिति की टाइमलाइन पर वह तसवीर टैग के जरिए भेज दी. यह सब देखते ही अदिति ने रवि को मैसेज किया ‘अपलोड करने से पहले पूछ तो लेते.’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘जी, सौरी. आप को बुरा लगा हो तो मैं उस तसवीर को हटा देता हूं.’

रवि फेसबुक का नौसिखिया संचालक था. उसे मालूम नहीं था कि उस फोटो को पूरी तरह से हटाने के लिए उसे डिलीट के औप्शन पर जाना होगा. उस ने सामने दिख रहे ‘रिमूव’ के औप्शन से उस तसवीर को अपने प्रोफाइल से हटा लिया और सोचने लगा कि तसवीर पूरी तरह से हट चुकी है.

थोड़ी देर बाद अदिति का फिर मैसेज आया, ‘फोटो अभी तक हटा क्यों नहीं?’

रवि तो समझ रहा था कि वह हट चुका है, इसलिए रिप्लाई किया, ‘हटा तो दिया है.’

अदिति का इस बार थोड़ा तीखा रिप्लाई आया, ‘अपने मोबाइल अपलोड में देख.’

रवि ‘मोबाइल अपलोड’ नाम की बला को उस समय जानता ही नहीं था. उस ने फिर रिप्लाई किया, ‘कहां?’

‘मोबाइल अपलोड में देख,’ अदिति का रिप्लाई अब सख्त लग रहा था.

‘ओके,’ रवि ने नपातुला जवाब दिया.

उसे हलका सा धक्का लगा था. उसे अदिति के ‘अपने अपलोड में देख’ जैसे शब्दों से ठेस पहुंची थी, क्योंकि अब तक उन दोनों की बातचीत में हर जगह ‘आप देखिए’ जैसे शब्द ही शामिल थे.

रवि ने जैसेतैसे ‘मोबाइल अपलोड’ ढूंढ़ा. अब वह उस तसवीर पर गया, लेकिन वहां भी उसे डिलीट का औप्शन नहीं दिख रहा था.

तब तक अदिति का एक और तीखा रिप्लाई आ चुका था, ‘फोटो अभी तक नहीं हटा.’

फिर एक बार अदिति ने मैसेज किया, ‘मिस्टर, क्या चल रहा है यह सब?’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘कुछ टैक्निकल प्रौब्लम आ रही है. साइबर कैफे जा कर जल्दी ही उस मनहूस फोटो को हटाता हूं.’

रवि अब थोड़ा झुंझला सा गया था. उसे अदिति का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा था.

‘मनहूस…’ इस के आगे कुछ अपशब्द थे अदिति के रिप्लाई में.

अब रवि ने सब से पहले साइबर कैफे में एक व्यक्ति से पूछ कर उस फोटो को डिलीट किया. फिर अदिति को मैसेज किया, ‘आप का वह फोटो डिलीट हो चुका है. एक बात कहूंगा कि वह मेरी गलती थी, पर आप को यों ‘तू तड़ाक’ से तो पेश नहीं आना चाहिए.’

अब बात गरमा गई थी. धीरेधीरे रिप्लाई में भयंकर झगड़ा हो गया और फिर रवि जिस एकमात्र लड़की को अपनी क्लास में पसंद करता था, उस की फेसबुक फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

आखिर में रवि ने थोड़ा सोचा और एक लंबा सौरी मैसेज भेज दिया लेकिन तब तक वह अदिति की फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

छुट्टियों के बाद जब कालेज खुला, तो कालेज में बातें चल रही थीं कि रवि ने अदिति को प्रपोज किया था. रवि ने चुपचाप सब सुन लिया लेकिन इस बारे में कोई रिप्लाई नहीं किया.

वह जैसे अपनी ही नजरों में गिरता जा रहा था. अदिति ने ही शायद कालेज में यह बात फैलाई थी. फेसबुक से हुई एक गलती ने उसे संजीदा छात्रों की फेहरिस्त से बाहर कर दिया था और हर ओर कुछ महीने तक उस की हंसी उड़ाई गई थी.

एक दिन क्लास में उस के पीछे की सीट पर बैठ कर अदिति ने उस के दोस्तों के साथ मिल कर अप्रत्यक्ष रूप से रवि पर कई कटाक्ष कर दिए थे. वह उस की हंसी उड़ा रही थी, पर रवि कुछ नहीं बोला. वह अब तक खुद की ही गलती मान रहा था, लेकिन उस दिन से उस

ने अदिति से नफरत करना शुरू कर दिया था. अब अदिति को भी उस ने अपनी फ्रैंडलिस्ट से हटा दिया था और एकएक कर अदिति के दोस्त भी ब्लौक होते चले गए.

फिर न उस की अदिति से सामने कभी बात हुई और न ही फेसबुक पर, आज इतने साल बाद फिर वह उस के सामने थी और अब उस की बौस थी.

दोनों लगभग 10 मिनट तक स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. अदिति ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘सिट डाउन, प्लीज.’’

रवि चुपचाप बैठ गया. 5 मिनट तक कैबिन में खामोशी छाई रही. अदिति अभी फिर से अपनी फाइल में उलझ गई थी या शायद नाटक कर रही थी.

फिर नजरें उठा कर बोली, ‘‘रवि, मुझे कल तक इस औफिस की सभी जरूरी फाइलें दे दो.’’

‘‘जी मैम,’’ रवि ने धीमे से कहा. उस की नजरें झुकी हुई थीं.

‘‘ओके, आप जा सकते हैं,’’ अदिति ने कहा, इस बार उस की नजरें भी झुकी हुई थीं.

रवि कैबिन से बाहर आ गया था लेकिन अपने अतीत से नहीं.

उस रात उसे नींद नहीं आ रही थी. गुजरे हुए कल में जो हुआ था उसे तो वह नजरअंदाज कर चुका था, लेकिन अब उस से उस की वर्तमान जिंदगी प्रभावित होती दिख रही थी.

रवि को फिक्र सता रही थी कि उस की छुट्टियां अदिति अस्वीकृत न कर दे. वह लंबे समय से छुट्टियों का इंतजार कर रहा था और अब अदिति के रहते उसे छुट्टी मिलना मुश्किल लगने लगा था. उसे लग रहा था कि अदिति उस से पुरानी दुश्मनी जरूर निकालेगी.

अगले दिन वह परेशान सा औफिस पहुंचा. चपरासी ने पिछले दिन की तरह ही उसे आज फिर बताया कि बौस यानी अदिति ने उसे कैबिन में बुलाया है.

रवि वे जरूरी फाइलें ले कर कैबिन में पहुंचा, जो उसे पिछले दिन अदिति ने छांटने को कही थीं.

‘‘मे आई कम इन मैम,’’ रवि ने औपचारिकता निभाई.

‘‘यसयस,’’ अदिति ने उस की तरफ आज पहली बार मुसकरा कर देखा था. ‘‘वे फाइल्स?’’

‘‘जी मैम, ये रहीं,’’ रवि ने फाइलों का एक ढेर अदिति की टेबल पर रख दिया.

‘‘आप को एक महीने की छुट्टी चाहिए?’’ अदिति तीखी मुसकराहट के साथ कह रही थी.

‘‘जी मैम,’’ रवि सिर नीचे किए हुए था.

‘‘इस वक्त औफिस में राकेशजी नहीं हैं, तो आप को इतनी लंबी छुट्टी

मिलना तो मुश्किल है,’’ अदिति रवि की तरफ अब गंभीरता से देखते हुए कह रही थी.

‘‘ओके, मैम. आप जैसा कहें,’’ रवि ने हलका सा सिर उठा कर कहा.

‘‘रविजी, आप हमारी कंपनी के बैस्ट एंप्लोई हैं,’’ अदिति इतना कहते हुए रुकी और फिर एक कागज हाथ में उठा कर बोली, ‘‘और आप की छुट्टी मैं भी आप से नहीं छीन सकती.’’

अदिति मुसकरा रही थी. अब रवि ने वह कागज अदिति मैम के हाथ से ले लिया और उसे पढ़ कर अब वह भी मुसकरा उठा, ‘‘थैंक्यू मैम,’’ रवि ने खुश होते हुए कहा. रवि की आंखों में कृतज्ञता झलक रही थी.

‘‘इट्स ओके रवि,’’ अदिति अब गंभीर मुद्रा में कह रही थी

कैबिन में कुछ लमहों तक खामोशी छा गई थी. अदिति ने उस खामोशी को तोड़ा, ‘‘रवि, ये ‘इट्स ओके’ तुम्हारे उस 10 साल पहले के सौरी के लिए है, जो तुम ने फेसबुक पर मैसेज किया था.’’

रवि चुपचाप खड़ा हो गया था. फिर कुछ देर बाद बोला, ‘‘दरअसल, वह मेरी नासमझी थी. मैं ने फेसबुक माध्यम को समझने में ही गलती कर दी थी. मुझे नहीं मालूम था कि किसी की तसवीर बिना पूछे अपलोड कर देना गलत है.’’

‘‘आई एम आलसो सौरी,’’ अदिति कह रही थी.

‘‘किसलिए मैम,’’ रवि जैसे अब सारी नफरत भुला चुका था.

‘‘गलती मेरी भी थी. मैं जरूरत से ज्यादा ही तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार कर रही थी. मुझे वह प्रपोज वाली बात भी नहीं उड़ानी चाहिए थी,’’ अदिति की आंखों में भी जैसे कुछ पिघल रहा था, ‘‘मैं ने तुम्हें गलत समझा था.’’

‘‘इट्स ओके मैम,’’ रवि इतना कह कर चुप हो गया था.

अदिति ने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं चाहती तो तुम से बदला लेती. तुम्हारी छुट्टियां कैंसिल कर देती. एक बार मैं ने सोचा भी, पर…’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अदिति जैसे कोई सटीक बात ढूंढ़ कर बोली, ‘‘कल को हो सकता है तुम मेरी जगह हो और मैं तुम्हारी जगह. इस तरह नफरत से जिंदगी नहीं जी जाती.’’

कुछ देर तक फिर खामोशी छाई रही और अदिति ने फिर कहा, ‘‘उम्मीद है, तुम ने मुझे माफ कर दिया होगा.’’

‘‘औफकोर्स मैम,’’ रवि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘तो कल से तुम छुट्टी पर हो,’’ अदिति ने मुसकराते हुए रवि से पूछा.

‘‘जी मैम,’’ रवि ने भी हंस कर जवाब दिया.

‘‘ओके, ऐंजौय यौर्स हौलीडेज. तुम जा सकते हो,’’ अदिति इतना कह कर आंख बंद कर अपनी कुरसी पर पीठ टेक कर बैठ गई जैसे कोई भारी बोझ कंधे से उतार दिया हो.

रवि जब बाहर जाने के लिए कैबिन का दरवाजा खोल रहा था, तब मुसकराते हुए अदिति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रवि, हैप्पी दीवाली.’’

रवि भी मुसकरा दिया और बोला, ‘‘आप को भी, अदिति मैम.’’

इतना कहते हुए रवि मुसकराता हुआ बाहर आ गया. उन दोनों के बीच खड़ी कई साल पुरानी दीवारें अचानक ढह गई थीं. जिंदगी खुशियां बांट कर, उन का कारण बन कर चलती है, नफरतें पाल कर नहीं.

दीवाली के इस अवसर पर क्षमादान के दीपकों की जलती हुई लौ में रवि और अदिति के दिलों में नफरतों से भरे कुछ अंधेरे कोने रोशन हो चुके थे. Love Story In Hindi 

Politics : उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम नेताओं की भागीदारी

Politics : उत्तर प्रदेश भारत की सब से अधिक आबादी वाला राज्य है. देश की कुल आबादी का 16.51 फीसदी यहीं बसता है. उत्तर प्रदेश की कुल आबादी करीब बीस करोड़ है और इस में लगभग चार करोड़ मुस्लिम हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुसलमान आबादी विधानसभा में ही नहीं बल्कि लोकसभा चुनावों में भी हारजीत का गणित तय करती है. सियासी शतरंजी बिसात पर मुस्लिम वोट बैंक की अहमियत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. इस में इसी आबादी से निकल कर आने वाले नेताओं की अहम भूमिका होती है. यहां विभिन्न राजनीतिक दलों की हारजीत का दारोमदार मुस्लिम नेताओं पर रहता है.

एक समय था जब प्रदेश की सभी क्षेत्रीय पार्टियों में कईकई बड़े और धुरंधर मुस्लिम नेता हुआ करते थे. मायावती की बहुजन समाज पार्टी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी, मुकीम खान, युसुफ मलिक और हाजी याकूब कुरैशी बड़े नाम थे. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी में आजम खान, मोहम्मद आजम कुरैशी, अबू आसिम आजमी और शफीकुर्रहमान बर्क के अलावा निर्दलीय चुनाव लड़ कर जीती हुई पार्टी के साथ जा मिलने वाले कद्दावर मुस्लिम नेताओं में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे नाम थे, जिन का प्रभाव मुस्लिम कम्युनिटी पर बहुत ज्यादा था.

वहीं पीस पार्टी के डा. अयूब और कांग्रेस में सलमान खुर्शीद जैसे नेता जब चुनाव प्रचार के लिए सड़क पर उतारते थे तो बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटरों को आकर्षित करते थे. प्रदेश की समाजवादी पार्टी तो मुस्लिम प्रेम के लिए इतनी मशहूर थी कि मुलायम सिंह यादव को ‘मुल्ला मुलायम’ के नाम से पुकारा जाने लगा था.

ईदबकरीद के मौके पर वे बाकायदा कंधों पर चेक वाला रूमाल ओढ़ कर मुसलमानों से गले मिलते और ईद की बधाई देते थे. उस जमाने में इफ्तार पार्टियां भी खूब होती थीं और मुसलमानों को रिझाने के लिए हर राजनीतिक पार्टी एक दूसरे से बढ़चढ़ कर इफ्तार पार्टी का आयोजन करती थी.

भारतीय जनता पार्टी के सत्ता पर काबिज होने के बाद यह प्रेम और सौहार्द का मौसम पतझड़ में बदल गया. आए दिन मुसलमानों की लिंचिंग, मुसलमानों का एनकाउंटर, लव जिहाद या गौहत्या का आरोप लगा कर उन्हें जेलों में ठूंसने का सिलसिला शुरू हुआ और मुस्लिम समुदाय में भय का वातावरण बनने लगा. इस के बाद शुरू हुआ मुस्लिम नेताओं को जेल भेजने का कार्यक्रम. ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग कर के तमाम मुस्लिम नेताओं को भाजपा सरकार ने जेलों में ठूंस दिया.

मुख्तार अंसारी और उन के कुनबे को समाप्त कर दिया गया. अतीक अहमद और उन के भाई को पुलिस की निगरानी में गोलियों से छलनी कर दिया गया. आजम खान जेल गए तो आजतक उन्हें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला. नसीमुद्दीन सिद्दीकी जो कभी मायावती के सब से खास और एक धुरंधर नेता थे, अब कांग्रेस के साथ हैं और हीरो से जीरो हो चुके हैं.

नई उभरती पीस पार्टी के मुखिया डा. अयूब को भी अनेक आरोप लगा कर जेल भिजवा दिया गया और उन की सारी तेजी और जूनून वक्त के साथ फीका पड़ गया. फिलहाल तो वे जेल से बाहर हैं मगर अब उन की राजनीतिक चमक धुंधली पड़ चुकी है.

फिर भी प्रदेश की चार करोड़ मुस्लिम आबादी का वोट हरेक राजनीतिक पार्टी के लिए महत्त्व रखता है. मगर इन्हें रिझाने के लिए आज जो कुछ गिनेचुने मुस्लिम नेता राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों में हैं उन की शक्लें और नाम चुनाव के वक्त ही नजर आते हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास मात्र चार मुस्लिम चेहरे हैं. जिस में पहले नंबर पर हैं दानिश आजाद अंसारी जो उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री (अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज) और विधान परिषद सदस्य हैं. दूसरे नंबर पर हैं मोहसिन रजा जो पहले इसी विभाग के राज्य मंत्री थे, और विधान परिषद में भी रहे. तारिक मंसूर पूर्व एएमयू उपकुलपति हैं जिन्हें विधान परिषद में मनोनीत किया गया.

बुक्कल नवाब शिया मुस्लिम नेता और विधान परिषद सदस्य हैं. मगर इन चारों नेताओं में वो दम नहीं दिखता कि मुस्लिम कम्युनिटी आसानी से इन की ओर खिंच आए. मात्र दानिश आजाद अंसारी का ही थोड़ा बहुत असर पसमांदा मुसलमानों के बीच है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास छह मुस्लिम नेता हैं, जिन में से एक दो को छोड़ कर बाकी नामों से आम जनता अनजान सी है. नदीम जावेद पूर्व विधायक (जौनपुर, 2012‑17) और औल इंडिया माइनौरिटी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं. वहीं जफर अली नकवी पूर्व लोकसभा सदस्य (लखीमपुर खीरी, 2009‑14) हैं.

रुही जुबेरी अल्पसंख्यक कोश तथा यूपी कांग्रेस कार्यकारिणी की सदस्य हैं. इमरान मसूद जरूर सहारनपुर के कद्दावर चेहरे माने जाते हैं और इन का अपने क्षेत्र पर काफी प्रभाव है. अहमद हमीद बागपत से आते हैं जो आरएलडी से कांग्रेस में आए हैं. वहीं शहनवाज आलम औल इंडिया कांग्रेस अल्पसंख्यक विंग के प्रमुख हैं.

वर्ष 2017 में बसपा के पास कुल 19 विधायक थे, जिन में से 5 मुस्लिम विधायक थे. मगर 2022 में इस का आंकड़ा गिरा और मुस्लिम विधायकों की संख्या घट कर मामूली रह गई. आज बसपा के पास कोई भी प्रभावशाली मुस्लिम नेता नहीं है. जो छोटेमोटे नेता हैं उन की संख्या पांच से भी कम है.

2021–22 के दौरान बसपा के कुछ प्रमुख मुस्लिम नेता जैसे – कादिर राणा, नूर सलीम राणा, माजिद अली आदि ने सपा या आरएलडी का दामन थाम लिया था. हालांकि बसपा स्थानीय निकायों और चुनावी उम्मीदवारों के रूप में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बढ़ा रही हैं, लेकिन उच्च स्तरीय नेतृत्व की संख्या लगभग नगण्य है. बसपा के अनेक नेता पिछले वर्षों में पार्टी छोड़ चुके हैं.

उत्तर प्रदेश में सपा के मुस्लिम प्रतिनिधित्व को दो हिस्सों में देख सकते हैं – विधानसभा और लोकसभा सांसद. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा से कुल 34 मुस्लिम विधायक चुने गए थे. इन में से 32 विधायक “अखिलेश यादव” के नेतृत्व वाली सपा के थे. बाकी दोदो विधायक राष्ट्रीय लोकदल और ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के थे. सपा के पास फि लहाल राज्य में 32 मुस्लिम विधायक हैं, जिन में इकरा हसन (कैराना), मोहिबुल्लाह नदवी (रामपुर), जिया उर रहमान (संभल) और अफजल अंसारी (गाजीपुर) ही कुछ दमदारकद्दावर नेताओं की श्रेणी में गिने जाते हैं.

हाल के चुनावों पर नजर डालें तो मुस्लिमों का झुकाव फिर से सपा की ओर बढ़ा है. पर भाजपा भी “सब का साथ” की नीति के तहत सीमित मुस्लिम प्रतिनिधित्व देने का प्रयास कर रही है. लेकिन हकीकत यह है कि वोट बैंक की राजनीति में मुस्लिम नेता अब केवल प्रतीकात्मक भूमिका में रह गए हैं. धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण मुस्लिम नेताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है. आज राजनीति में युवा मुस्लिम नेतृत्व की कमी बेतरह महसूस की जा रही है.

Fitness Tips : मौर्निंग वाक को बनाएं रोचक

Fitness Tips : मिसेज राणा अयूब बैंक की जौब से सेवानिवृत्त होने के बाद भी खुद को चुस्तदुरुस्त और ऊर्जावान बनाए रखने की पूरी कोशिश करती हैं. सुबह जल्दी उठ कर टेरेस पर जा कर थोड़ी एक्सरसाइज करना और फिर अपने ढेर सारे पौधों में पानी देना उन के नित्यकर्म में शामिल है.

जब से बेटे की शादी हुई और घर में बहू आई है, किचन के काम से उन को फुर्सत मिल गई है. पहले जौब पर जाने की जल्दी के साथ सुबह के चायनाश्ते से ले कर रात के डिनर तक की चिंता उन्हें अकेले ही करनी पड़ती थी. अब ये जिम्मेदारी उन की बहू ने उठा ली है तो मिसेज राणा के पास काफी समय खुद को देने के लिए बचता है.

ऐसे में एक दिन उन्होंने पड़ोस की कुछ महिलाओं के साथ सुबह की सैर की योजना बनाई. फिर क्या था जल्दी ही कुछ महिलाओं से उन की दोस्ती भी हो गई. अलसुबह पांच छह महिलाओं के साथ मिसेज राणा भी पास के एक पार्क की सैर को जाने लगीं. शुरू के कुछ दिन तो उन को बहुत अच्छा लगा. ताजीताजी हवा, नयीनयी सहेलियां, हंसीठिठोली लेकिन धीरेधीरे मिसेज राणा उस ग्रुप से उकता गईं.

वजह ये कि ज्यादातर महिलाएं जो लगभग उन्हीं की उम्र की थीं और जिन के घरों में बहुएं थी, सब की सब अपनी बहुओं की बुराइयां करने में ही लगी रहती थीं. ऐसा लगता था जैसे उन को अपने मन की भड़ास निकालने के लिए और कोई मिलता ही नहीं है. पार्क की सैर कर के जब सब वहां पड़ी बेंचों पर सुस्ताती, तब भी उन के बीच बहू पुराण ही चलता रहता. उन की बातों से तंग आ कर जल्दी ही मिसेज राणा ने वह ग्रुप छोड़ दिया.

वे कुछ दिन घर पर ही रहीं, फिर उन्होंने अपने पति को मौर्निंग वाक में साथ चलने के लिए राजी कर लिया. पर कुछ दिन बाद पति के साथ वाक करने में भी उन को ऊब लगने लगी. मिस्टर राणा भी वही घरगृहस्ती की बातों में उलझे रहते थे. वहां से निकले तो सेविंग और खर्चों की चिंता में उलझ जाते. जबकि मिसेज राणा चाहती थीं कि कम से कम सैर के वक्त तो आदमी कुछ हलकीफुलकी हंसीमजाक की बातें करे ताकि मन प्रसन्न, चिंतामुक्त और हल्का हो जाए.

कुछ दिन बाद मिसेज राणा अयूब अकेले ही वाक के लिए जाने लगीं. एक दिन उन की मुलाकात रंजन जोशी से हुई. रंजन उन के पुराने पड़ोसी थे और उन्हीं की उम्र के थे. रंजन जोशी के साथ उस रोज की वाक काफी अच्छी रही. वे अपने डौग को भी साथ लाते थे जो काफी क्यूट था. फिर रंजन अक्सर ही मिलने लगे और वे साथ में सैर करने लगे.

रंजन काफी प्रकृति प्रेमी थे. कवि भी थे. कभीकभी अपनी कविताएं भी सुनाया करते थे. फूलों की क्यारियों के पास रुक कर फूलों के विषय में बातें करते थे. उन की बातों में मिसेज राणा को कभी चिंता, तनाव, दूसरे की बुराई, किसी तरह की राजनीति या किस तरह की नकारात्मकता का अहसास नहीं होता था. लिहाजा उन की अच्छी दोस्ती हो गई.

पार्क की ओपन जिम में लगे झूलों पर भी दोनों काफी समय तक एक साथ एक्सरसाइज भी करने लगे. बहुत दिनों के बाद मिसेज राणा को सैर का सच्चा साथी मिला. लगा जैसे जीवन में कुछ समय तो रोचक और चिंताओं से मुक्त है. रंजन की सलाह पर राणा ने बहू से कहकर अपने लिए ट्रैक सूट और जूते भी मंगवा लिए. इन कपड़ों में जब वे वाक के लिए निकलीं तो लगा जैसे कुछ अतिरिक्त ऊर्जा उनके भीतर हिलोरे मार रही थी.

वे खुद को पहले से ज्यादा फिट और जवान सा महसूस कर रही थीं. जो खुशी उन को जीवन भर नहीं मिली वह सुबह सैर के दो घंटों में मिल रही थी. वजह थी सैर के लिए एक अच्छे साथी का मिलना.

सुबह की वाक न सिर्फ आपका मूड बेहतर बनाती है बल्कि आप के मस्तिष्क को भी तरोताजा रखती है. जिस के चलते आप फिजूल की परेशानियों से बच जाते हैं. लेकिन शर्त यह है कि सैर का साथी आप के मन माफिक होना चाहिए. आजकल के लोग शरीर से ज्यादा मानसिक समस्याओं, मानसिक बीमारियों में उलझ गए हैं. दिन भर की टेंशन, रिश्तों में तनाव, घर और जौब की परेशानियां. ये सभी शारीरिक से ज्यादा मानसिक रूप से परेशान करती हैं. ऐसे लोग जब किसी दूसरे से मिलते हैं तो अपनी परेशानियां और चिंताएं उन को बांटते हैं. ऐसे में उन के साथ सैर करने का कोई फायदा नहीं, बल्कि नुकसान होने की ज्यादा संभावना रहती है. कई बार आप उन की चिंताएं खुद पर ओढ़ कर आ जाते हैं और अपनेआप को तनावग्रस्त कर लेते हैं. याद रखें तनाव अनेक बीमारियों और झगड़ों की जड़ है.

सैर पर साथ जाने के लिए अगर अच्छा साथी मिल गया तो बहुत अच्छा, लेकिन नहीं मिला तो भी आप अपनी सैर को अन्य तरीकों से रोचक बना सकते हैं. बस कुंठित, घृणित विचारों वाले, चुगलियां करने वाले लोगों को खुद से दूर रखिए. अगर आप अकेले सैर पर जाते हैं तो जरूरी नहीं कि रोज एक ही रास्ते पर जाएँ या एक ही पार्क की सैर रोज करें.

हर दिन एक ही रास्ते पर चलने से बोरियत होने लगती है. इस से बचने के लिए हर दिन किसी नए रास्ते पर जाइए. अलगअलग रास्तों पर चलने से आप को नए दृश्य देखने को मिलेंगे और आप अपने आसपास की दुनिया का पता लगा सकते हैं. आप पार्क, नदी के किनारे, या शहर के अलगअलग हिस्सों में चल सकते हैं और अपनी सैर को रोचक बना सकते हैं.

सुबहसुबह अलगअलग समय पर चलने से आप को अलगअलग अनुभव हो सकते हैं. आप सूर्योदय के समय चल सकते हैं, जब आसमान रंगीन हो रहा होता है, या आप सुबहसुबह चल सकते हैं जब वातावरण बिलकुल शांत होता है. कभीकभी शाम की सैर भी करें जब सूरज ढल रहा हो.

आप अपने वाक को एक चुनौती में बदल सकते हैं, जैसे कि एक निश्चित दूरी तक चलना या एक निश्चित समय में चलना. आप एक दोस्त या परिवार के सदस्य के साथ प्रतिस्पर्धा भी कर सकते हैं कि कौन सब से तेज या सब से अधिक दूरी तक चल सकता है. इस से ऊर्जा भी बढ़ती है और जीवन के प्रति सकारात्मकता का उदय होता है.

आप अपने वाक को एक खेल में बदल सकते हैं, जैसे कि एक ‘वाक एंड टाक’ सत्र, जहां आप अपने दोस्त या परिवार के सदस्य के साथ चलें और बात करें. पुराने कालेज के समय को याद करें. पुराने प्रेम प्रसंगों को छेड़ें. आप एक ‘पिक्चर वाक’ भी कर सकते हैं, जहां आप रास्ते में सुंदर दृश्यों की तस्वीरें खींचें. प्रकृति की सुंदरता के बीच खड़े हो कर सेल्फी लें. उन्हें सोशल मीडिया में शेयर करें. रिश्तेदारों को व्हाट्सएप करें.

संगीत सुनने से भी आप की मौर्निंग वाक मजेदार हो सकती है. वाक करते हुए आप अपने पसंदीदा गाने या पौडकास्ट सुन सकते हैं. सुरों के साथ चाल मिला कर देखिए आप खुद को हवा में उड़ता हुआ महसूस करेंगे.

सुबह की सैर सेहत को कई तरीके से फायदे पहुंचाती है. यह आप की फिजिकल और मेंटल हेल्थ दोनों का ध्यान रखती है. वाक को रुटीन का हिस्सा बना लेने से आप की मांसपेशियां और हड्डियों को मजबूती मिलती है. वहीं, शरीर का ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है. हालांकि, वाकिंग के ये सारे फायदे तभी मिल पाते हैं, जब आप सुबह की सैर सही तरीके से और सही साथी के साथ करेंगे.

Women : युद्ध किसी के बीच हो, खामियाजा स्त्री भुगतती है

Women : धरती पर मानव सभ्यताओं के विकास के साथ ही मानव समूहों में जमीन पर वर्चस्व को ले कर युद्ध हो रहे हैं. पहले युद्ध विभिन्न कबीलों के बीच होते थे, जब देश बने तो देशों के बीच युद्ध होने लगे. कहने को मनुष्य ने जंगल और जंगली जानवरों के बीच से निकल कर सभ्यताएं बसाईं, मगर सच्चाई यह है कि वह सभ्य होने की बजाए अधिक से अधिक जानवर बनता गया, सभ्यता का लबादा ओढ़े खूंखार जानवर.

सभ्यता, संस्कार और संस्कृति के नाम पर उस ने धर्म नामक चीज का आविष्कार किया. धर्म चूंकि पुरुष द्वारा ईजाद की गई चीज थी, लिहाजा उस ने खुद को सर्वोच्च रखते हुए अनेक नियमों से युक्त ग्रंथों की रचना की. इन ग्रंथों में स्त्री को दोयम दर्जे पर रख कर पुरुष ने उसे अपनी सेविका बनाए रखने की साजिश रची.

किसी भी धर्म की धार्मिक पुस्तक पढ़ कर देखें, स्त्री सदैव सेविका के समान पुरुष के आश्रय में प्रताड़ित और इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु के रूप में ही वर्णित है. कहीं वह उस के चरणों में बैठी उस के पैर दबा रही है तो कहीं वह उस के श्राप से प्रताड़ित आंसू बहाती नजर आती है.

कहीं वह नाजायज बच्चा पैदा कर के समाज के डर से अपनी ममता का गला घोंटने और अपने बच्चे को पानी में प्रवाहित करने के लिए मजबूर है, कहीं वह अपने चरित्र की परीक्षा देती धरती में समाती दिख रही है तो कहीं भरी सभा में उस के जिस्म से कपड़े नोचे जा रहे हैं. धार्मिक किताबों में कहीं भी स्त्री को राजकाज संभालते या निर्देश देते नहीं दिखाया गया है. यानी लीडर के रूप में उस की कल्पना कभी नहीं की गई. यानी पुरुष हमेशा औरत पर हावी रहा और पुरुषों के बीच जबजब युद्ध हुए उन्होंने दूसरे पक्ष की औरतों पर जुल्म करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा.

पुरुषों ने जबजब जमीन पर अपने वर्चस्व को ले कर युद्ध लड़े उस में हारे हुए पुरुष के राज्य की स्त्रियां सब से ज्यादा कुचली और सतायी गईं. दरअसल युद्ध केवल राष्ट्रों की सीमाओं को बढ़ाने के लिए सैनिकों के बीच होने वाला संघर्ष नहीं होता, बल्कि यह समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है, विशेष रूप से महिलाओं को.

युद्ध के दौरान और युद्ध के बाद औरतें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अनेक प्रकार की पीड़ाओं का सामना करती हैं. युद्ध के दौरान यौन हिंसा एक भयावह यथार्थ है. हारे हुए राज्य की महिलाएं बलात्कार, मानव तस्करी और यौन दासता का शिकार बनती हैं. कई बार उन्हें हथियार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, जिस से दुश्मन समुदाय को तोड़ा जा सके. उदाहरण: रवांडा, बोस्निया और सीरिया जैसे संघर्षों में बड़े पैमाने पर ऐसी घटनाएं सामने आई हैं.

युद्ध पुरुष वर्चस्व की मानसिकता पर आधारित कृत्य है. यह विध्वंस को बढ़ावा देता है. साथ ही सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से पुरुष तंत्र को मजबूत बनाता है. युद्ध का सब से नकारात्मक एवं विचारणीय पक्ष यह है कि यहां स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. युद्ध संबंधी सभी गतिविधियों में उस की हिस्सेदारी प्रत्यक्ष रूप में न के बराबर है.

इन सब के बावजूद युद्ध की त्रासदी की दोहरी मार स्त्रियां ही झेलती हैं. युद्ध के समय व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं पारिवारिक क्षति होती है. जिस में स्त्रियों के शरीर ही नहीं नोचे जाते बल्कि उस के बच्चे भी मारे जाते हैं.

महाभारत काल हो, इस्लाम के उदय का काल हो या आज का आधुनिक समय, धरती कभी भी युद्ध से मुक्त नहीं रही. कभी धर्म युद्ध, कभी राष्ट्र युद्ध, कभी विश्व युद्ध तो कभी गृह युद्ध बड़ी संख्या में मासूम और निर्दोष लोगों का जीवन लीलता रहा. वर्तमान समय में भी कई देशों के बीच घमासान युद्ध जारी हैं.

रूसयूक्रेन, ईरान इजरायल अमेरिका और हाल ही में हुआ भारत पाकिस्तान युद्ध. इन तमाम देशों के सत्ता शीर्ष पर बैठे नेताओं के दम्भ, अहंकार, महत्वाकांक्षाओं, मूर्खताओं, दिखावे और लालच ने पूरे राष्ट्र और उसके निर्दोष नागरिकों को युद्ध की आग में झोंक रखा है.

युद्ध का प्रभाव मासूम बच्चों और आम नागरिकों के जीवन पर गहरा और दीर्घकालिक होता है. युद्ध की विभीषिकाएं मानवता, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति सभी को झकझोर देती हैं.

धरती (क्षेत्र) राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक मानी जाती है. उसी प्रकार स्त्री, देश समुदाय, जाति और धर्म की इज्जत से जोड़ कर देखी जाती है. जिस प्रकार किसी राष्ट्र की सेना द्वारा दूसरे राष्ट्र की धरती पर कब्जा या वर्चस्व स्थापित कर उसे परास्त किया जाता है, ठीक उसी प्रकार किसी देश, समुदाय, जाति, परिवार और धर्म की स्त्री को अपहृत, प्रताड़ित, बलात्कार और अन्य तरह की हिंसा करके उस पूरे समुदाय को परास्त करने का प्रयास किया जाता है. इस प्रकार स्त्री शरीर युद्ध भूमि का वह क्षेत्र बना दिया गया है जहां देश, समुदायों, जातियों, परिवारों और धर्मों के बीच युद्ध लड़ा जाता है.

अतः किसी भी तरह का युद्ध हो उस में सब से ज्यादा पीड़ित और प्रभावित स्त्री ही होती है. स्त्री ही एक ऐसे ‘औब्जेक्ट’ के रूप में सामने आती है जो प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तौर पर हिंसा का शिकार होती है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के 2004 की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध में स्त्रियों के साथ बर्बरतापूर्ण यौन उत्पीड़न के सबूत मिलते हैं, जिस में बताया गया है कि स्त्रियों के जननांगों को काटना, उन के गुप्त अंगों के आसपास मारना, आदि युद्ध के दौरान सामान्य बातें हैं.

प्रथम और द्वितीय दो विश्व युद्धों में कई देशों में सैन्य व अर्द्ध सैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अंगिनल घटनाओं को अंजाम दिया. लेकिन आमतौर पर घटना के बाद की स्थितियों में इस प्रकार के विश्लेषण और आंकड़े नहीं के बराबर प्रस्तुत किए जाते हैं. बल्कि तथ्यों/मुद्दों को गौण कर देने का भरसक प्रयास किया जाता है.

युद्ध के दौरान बलात्कार सिर्फ एक दुर्घटना नहीं होता वरन क्रमबद्ध युद्ध राजनीति का हिस्सा होता है. जानीमानी लेखिका क्रिस्टीन टी हेगन अपने रिसर्च पेपर में लिखती हैं- द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लगभग 19 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ.

पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्लादेश की लगभग 2 लाख महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया. क्रोएशिया, बोस्निया तथा हर्जेगोविना में युद्ध के दौरान लगभग 60 हजार बलात्कार के मामले सामने आए.

1992 में हुए क्रोएशिया और सर्बिया के युद्ध में औरतों के साथ दिल दहला देने वाली दुर्दशा हुई. औरतें बारीबारी सैनिकों द्वारा ले जाए जातीं और बलात्कार के बाद लुटीपिटी घायल अवस्था में स्पोर्ट्स हौल में बंद कर दी जातीं. सेनाओं ने घरों, दफ्तरों और कई स्कूलों की इमारतों को यातना शिविरों में बदल डाला था.

1994 में हुए रवांडा के युद्ध में लगभग ढाई से पांच लाख महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किए गए. एक अनुमान के अनुसार युद्ध के दौरान 91 प्रतिशत बलात्कार सामूहिक होते हैं. जो महिलाएं युद्ध में यौन हिंसा या बंदी बनने जैसी पीड़ाओं से गुजरती हैं, उन्हें समाज में अपमान, बहिष्कार और कलंक का सामना करना पड़ता है. वे मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या की ओर भी धकेली जाती हैं.

युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा रुक जाती है. स्कूल बंद हो जाते हैं या असुरक्षित हो जाते हैं. स्वास्थ्य सेवाएं ठप हो जाती हैं, जिस से गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों की मृत्यु दर बढ़ जाती है. अफगानिस्तान में तालिबान अटैक के वक्त से ले कर आजतक स्त्रियों की स्थिति बदतर है.

युद्ध में कोई राष्ट्र जीते या हारे, मगर जो सैनिक मारे जाते हैं उन की विधवाओं की जिंदगी दूभर हो जाती है. युद्ध में पुरुषों के मारे जाने या अपंग होने के कारण महिलाओं को अकेले ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती हैं. असुरक्षा और डर उन के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं. हिंसा के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रभावों के अतिरिक्त युद्ध के दौरान अपने पति के मारे जाने, लापता होने अथवा नजरबंद होने से स्त्रियों पर अपने बच्चों और परिवार के भरणपोषण का दायित्व बढ़ जाता है और उपयुक्त नौकरी और भूमि जैसे संसाधनों पर स्वामित्व न होने के कारण उन की चुनौतियाँ और अधिक बढ़ जाती हैं.

फलतः अपने अस्तित्व की रक्षा तथा जीवन निर्वाह के लिए उन्हें गैर कानूनी कार्यों जैसे वैश्यावृत्ति, नशीले पदार्थों की तस्करी आदि का सहारा लेना पड़ता है. इस के कारण समाज में अपराधों की दर में वृद्धि होती है.

युद्ध की वजह से लाखों महिलाएं अपने घरों से विस्थापित हो जाती हैं. अगर जान बचा कर वे किसी तरह शरणार्थी शिविरों में पहुंच भी जाती हैं तो वहां भी उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता. उन्हें भोजन, चिकित्सा और मूलभूत सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है. वहां के अधिकारी उन के जिस्मों पर अपनी नजरें गड़ाए रखते हैं और मौका पाते ही उन से बलात्कार करते हैं.

अप्रवास के अंतर्राष्ट्रीय संगठन (International Organization for Migration) के मुताबि यूक्रेन में युद्ध के चलते देश छोड़ने वाले एक करोड़ से ज्यादा लोगों में महिलाओं और बच्चों की तादात आधी से भी ज्यादा है. परिवार की देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी अकेले निभाने की चुनौतियों के चलते उन्हें मानसिक सेहत की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है. वे चिंता, तनाव, डिप्रेशन और भय का शिकार हैं.

यूक्रेन के जिन क्षेत्रों पर रूसी सैनिकों ने कब्जे कर लिए हैं, वहां महिलाओं के यौन हिंसा के शिकार होने की आशंका इस कदर बढ़ गई है कि उन्हें अपने घरबार को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है. विदेश में जहां उन्होंने पनाह ली, उस नए माहौल में अपनी जान बचाने के लिए सैक्स करने या अपनी नाबालिग बेटियों का बाल विवाह करने की मजबूरी उन के सामने है. जिस से आखिरकार वे शोषण और जुल्म की और भी शिकार होती हैं.

यौन हिंसा के साथ साथ युद्ध के दौरान वैश्यावृत्ति की दर में तेजी देखी जाती है. सैनिक अड्डों के आसपास कई ऐसे सामाजिक ढांचे हैं जहां स्त्रियों को अगवा कर उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए बेचा जाता है.

वर्तमान परिपेक्ष्य में अगर देखा जाए तो स्थितियां और भी भयावह होती जा रही हैं. रूस की गोलीबारी और बमबारी के चलते महिलाओं द्वारा अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशनों पर बच्चे पैदा करने की मजबूरियां, रूसी सैनिकों द्वारा यूक्रेन की महिलाओं, यहां तक की दस साल की मासूम बच्चियों तक से बलात्कार की खबरें सोशल मीडिया पर हैं.

इस के बाद भी वास्तविक स्थिति को पूरी तरह छुपाया जा रहा है. युद्ध में महिलाओं के खिलाफ हो रहे जुर्म के आधिकारिक आंकड़े सामने नहीं आ रहे हैं.

वर्तमान में हो रही हिंसा पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि पहले के समाजों में स्त्री पर बिना हिंसा किये वर्चस्व बनाए रखने की प्रवृत्ति थी, वहीँ आज स्त्री शरीर पर हिंसा करते हुए उस समाज पर वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है.

यह स्थिति आज इतना विकराल रूप ले चुकी है की स्त्री शरीर को निशाना बनाए बगैर किसी भी तरह की हिंसा को अंजाम नहीं दिया जा रहा है. और न ही समाज पर वर्चस्व प्राप्त किया जा रहा है. इस प्रकार स्त्री शरीर न केवल वर्चस्व प्राप्त करने का एक साधन या जरिया है बल्कि ‘विजय संकेत’ के रूप में स्थापित होती जा रही है.

Hindi Kahani : अमेरिका की गोरी काली बहुएं

Hindi Kahani : करीब 4 दशकों पहले बिहार के दरभंगा से अमेरिका के न्यूजर्सी शहर में आए श्रीकांत के परिवार में सभी कुछ अच्छा ही चल रहा था कि अचानक दक्षिण अफ्रीका के एक मजदूर की बेटी ने उन के बेटे सुनील के जीवन में प्रवेश कर के उन के शांत परिवार में हलचल मचा दी.

श्रीकांत भले ही अमेरिकी संस्कृति में पूरी तरह से रचबस गए थे लेकिन उन की मानसिकता अभी भी भारतीय थी. सदियों से चली आ रही परंपराओं के जाल में उलझे ही रह गए थे. वही अंधविश्वास, वही पाखंड, वही रूढि़वादिता और वही आडंबरों की अमरबेल जो भारत से लाए थे उस से आज तक खुद को मुक्त नहीं कर पाए थे.

दूसरे को जीवनमुक्ति का संदेश देने वाले पंडित श्रीकांत इसे अपने दिल में कहां उतार पाए थे. यह बात और है कि उन्होंने न्यूजर्सी दुर्गा मंदिर में पूजाअर्चना करवा कर करोड़ों की संपत्ति अर्जित कर ली थी. पलक झपकते ही वे ग्रीनकार्ड हासिल कर के सालभर के बाद ही लंबी छलांग लगा कर अमेरिका के सम्मानित नागरिक भी बन गए थे. ज्यादातर लोग उन्हें पंडितजी कह कर ही बुलाते.

सभी धर्मों का यह लचीलापन ही है कि इन अकर्मण्यों का एक बड़ा समूह देशदुनिया के सभी वर्गों को अंगूठा दिखाते हुए घंटी, घंटा, बजा कर राज कर रहा है तो कहीं मीनारों से आवाज लगा कर कहर बरसाया जाता है. अंधविश्वासियों को ग्रहनक्षत्रों की तिलिस्मी दुनिया के चक्रव्यूहों में फंसा कर देखतेदेखते ही, बिना तिनका तोड़े, ये करोड़पति बन जाते हैं.

धर्मरूपी गलियारों को पार कर के कहीं सुदूर मिट्टी से जुड़े श्रीकांत आज अमेरिका के न्यूजर्सी में पैलेस औन व्हील में रह रहे हैं. सूर्योदय से रात के अंतिम पहर तक संस्कृत के कुछ गलतसलत मंत्र पढ़ कर घंटीशंख बजा कर डौलरों बटोर रहे हैं.

यही नहीं, पाश्चात्य कलेवरों में सजी, फर्राटेदार अंगरेजी बोलते युवकयुवतियां जब इन के चरणस्पर्श करते हैं तो श्रीकांतजी की आंखों की चमक देखते ही बनती है. कैमरे की आंखों से छिपा कर भक्तजन जब इन की मुट्ठी गरम करते हैं तो इन की प्रसन्नता मंदिर में चारों ओर प्रतिष्ठित देवीदेवताओं की मूर्तियों की मुसकान में प्रतिबिंबित होने लगती है.

ऊंची आवाज में बात करने की मनाही होने पर भी जोरों का जयकारा लग ही जाता है. मेवे, मिष्ठान, फलों व उपहारों के ढेर से अगर कुछ उठा कर किसी भक्त को दे देते हैं तो वह अपनी सारी काबिलीयत भूल कर इन के चरणों में बिछ जाता है.

सूतकनातक के संस्कारों को विधिवत कराने वाले, लयबद्ध मंत्रों से ब्याह की रस्मों को संपन्न कराने वाले, ग्रह, नक्षत्रों की उलटी गति को मूंगा, मोती, हीरा, पन्ना, गोमेद आदि कीमती रत्नों को पहना कर चुटकियों में सीधा करने का दावा करने वाले, प्रसिद्धि के शीर्ष पर विराजमान पंडितजी की ऐसी नियति हो गई थी कि न मक्खी निगलते बन रही थी न उगलते. काली घटा, सारा, ही बदली बन कर पंडितजी के आंगन में बरसेगी, उन का सुपुत्र सुनील अड़ा हुआ था.

यह तो चर्चा थी पंडितजी की अद्भुत महिमा की जो बिना किसी डिगरी या शैक्षणिक योग्यता के दुनिया के सब से प्रभुत्वशाली देश अमेरिका में अपनी अल्पबुद्धि से विजयश्री का नगाड़ा बजा कर वारेन्यारे कर रहे थे. ऐसे सुख के एक छोटे तिनके के लिए भी बड़ेबड़े बुद्धिजीवी तरस कर रह जाते हैं.

4 साल पहले ही अपने बड़े बेटे सुशील का रिश्ता एक गोरी अमेरिकी किशोरी से कर के यही पंडितजी बिछेबिछे जा रहे थे तो आज जब उन का दूसरा बेटा किसी दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत लड़की के प्रति अनुरक्त था तो उस का इतना विरोध क्यों? अब प्रेमप्रीत की कोई जातिपांति तो होती नहीं है, वह तो अचानक ही दिल में होने वाली एक अति सुंदर प्रक्रिया है, जिस में भीगने वालों को किसी तरह का होश नहीं रहता है, अब श्रीकांतजी को कौन समझाए.

रोजाना विभिन्न देवीदेवताओं के अनुरक्त होने की, कमल नयनों के टकराने की रोचक गाथा, रस ले कर सुनाने वाले पंडितजी अपने सुपुत्र की चाहत क्यों नहीं समझ पा रहे हैं.

अति गोरे पंडितजी क्या उस दक्षिण अफ्रीकी के काले रंग पर तो नहीं अटक गए हैं? अब उन्हें कौन समझाए कि वह काली ही उन के बेटे के हृदय की मल्लिका बन बैठी है. अगर वे शादी की अनुमति नहीं भी देंगे तो इस की परवा ही कौन करता है. कानून उन्हें बांध कर एक कर ही देगा. ऐसे दिनरात काले राम, कृष्ण, काली, शनि आदि अति काले देवीदेवताओं का शृंगार कर के, उन के काले रंग पर प्रकाश डाल कर महिमा गान करने वाले पंडितजी की इस दोहरी मानसिकता पर कौन उंगली उठाए?

कथनीकरनी में फर्क करने वाले श्रीकांतजी को काली रंगत वाली सारा गले से नहीं उतर रही थी. सुनील को साम, दाम, दंड, व भेद सारी नीतियों से समझा चुके थे कि उस काली सारा का भूत अपने दिमाग से उतार दे जिस की मां मुसलिम है और बाप का पता तक नहीं है. पर सुनील इन की सुनने क्यों लगा. वह तो सिर से पांव तक उस काली बदली के प्यार की बौछार में भीग गया था. भारत होता तो यही पंडितजी 2-4 खड़ाऊं उसे लगा कर मन में भड़क रहे ज्वालामुखी को शांत कर लेते, पर इस परदेस की रीत ही निराली है. जहां आपा खोया नहीं कि पुलिस पकड़ कर सीधे जेल में डाल देती है.

अंधविश्वास, रूढि़वादिता व संकीर्णता के दलदल में फंसे रहने वालों का न्यारावारा करने वाले पंडितजी के पैर स्वयं ही धरती में धंसे जा रहे थे. उन्होंने तो सुनील को घर से निकल जाने की भी बात कह दी थी लेकिन उन की पत्नी ने ऐसी हायतोबा मचाई कि वे ऐसा नहीं कर सके. उन के दोनों बेटे तो ऐसा कुछ खास कमा नहीं रहे थे कि अलग अपनी गृहस्थी बसा लेते. फिर पंडितजी ठगीगीरी से कमाए गए अकूत धन के वारिस भी तो यही थे.

यह बात और थी कि बला की बुद्धि रखने वाले पंडितजी ने अपनी बड़ी बहू एलिस को कृष्ण की राधा की उपाधि दे कर अपने रहनसहन में ढाल लिया था. हिंदुस्तानी वेशभूषा में जब वह सज कर मंदिर के लंबेचौड़े प्रांगण में डोलती तो उस के अथाह छलकते रूप पर देखने वालों की आंखें हटाए नहीं हटती थीं. अपने टूटेफूटे शब्दों में जब वह गीता का श्लोक बोलती तो अंधविश्वास की भूलभुलैए में घूमते हिंदू चढ़ावे के साथ उस की भी चरण वंदना करने से नहीं चूकते थे. जिसे देख कर पंडितजी अपने द्वारा फेंके गए पाशे पर बलिहार जाया करते थे.

सुनील की जिद से उन की नींद का उड़ना ठीक ही था. अपने गाढ़े रंग से काली घटाओं को भी शर्माती आधी मुसलिम सारा पर पंडितजी कौन सी जादुई छड़ी घुमाते कि वह भी एलिस की तरह सफेद रोशनी सी चमचमाती. पंडितजी का वहां पर भी तो समाज था जो उन से ऊपरी सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए मन ही मन मनो लड्डू फोड़ रहा था.

सारा जैसी लड़कियों के माथे पर अब विश्व और ब्रह्मांड सुंदरी के ताज सज रहे हैं, ऐसे उदाहरणों से सुनील ने अपने व्यथित पिता को शीतल करना चाहा, पर असफल रहा. सारा को छोड़ कर किसी को भी जीवनसंगिनी बना ले, कह कर उन्होंने सुनील को समझाना चाहा पर वे उसे उस के निश्चय से डिगा नहीं सके.

निश्चित तिथि को सुनील ने सारा के साथ कोर्टमैरिज कर ली और उसे घर ले आया. पंडिताइन ने उन की आरती उतारी. पंडितजी के लाख मना करने के बावजूद हीरे, पन्ने, मोतियों आदि रत्नों से सजा अपना सतलड़ा हार सारा के गले में डाल दिया. इस असंभावित स्वागत से मुग्ध हो कर सारा ने उन्हें अपने से लिपटा लिया तो उस की विशाल काया में पंडिताइन की दुबलीपतली क्षीण काया लुप्त ही हो गई. अल्पशिक्षित पंडिताइन ने इसे अपना अच्छा समय समझा.

मन मार कर अपने मंदिर परिसर में अनेक मेहमानों को भ्रमित करते हुए पंडितजी ने सारा पर जरसी गाय का गोबर और गंगाजल छिड़क कर अग्नि के समक्ष अनगिनत मंत्रों का पाठ कर के, जो सभी की समझ से बाहर थे, उसे हिंदू बना लिया. सारा के काले, मोटे, भीमकाय रिश्तेदार पंडितजी की एकएक अदा पर झूम कर अपना वृहत मस्तिष्क झुलाते रहे थे.

न्यूजर्सी के सब से बड़े शानदार होटल में नई बहू के आगमन के उपलक्ष्य में पंडितजी ने बहुत बड़ी पार्टी दी. पार्टी में उन के अतिशिक्षित, उच्च पदस्थ भक्तजन कीमती तोहफों और बड़ेबड़े मौल के उपहारकार्डों के साथ सम्मिलित हुए. अमेरिकी भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे जो हमेशा की तरह उन की धार्मिक व सामाजिक उदारता को दर्शा रहा था. इस आयोजन में कौन, किस को अनुगृहित कर रहा था, समझ से परे था.

भारतीय दुलहन के लिबास में सारा जंच रही थी. यहां पर ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बेमिसालता अवर्णनीय हो जाती है जो बदसूरतों को भी कमनीय और खूबसूरत बना जाती है. सारा की रूपछटा पर जहां पंडितजी का सुपुत्र मुग्ध हुआ जा रहा था वहीं पर उस की हंसी काले बादल के बीच बिजली की तरह चमक कर पंडितजी की छाती को बेध, उन्हें भस्म किए जा रही थी.

सामूहिक पारिवारिक फोटो के लिए जब उन की दोनों बहुएं स्टेज पर एकसाथ खड़ी हुईं तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो दिनरात एकदूसरे से गले मिल रहे हों. दिखावे के लिए ही हो, पर पंडित अपनी पंडिताइन के साथ लोगों की बधाइयों के भार से दुहरे हुए जा रहे थे. मौमडैड कह कर सारा का उन दोनों से लिपटना पंडितजी के लिए असहनीय हो रहा था. रिश्तेदारों की कुटिल हंसी और चुभती नजर से आहत हो कर, विश्व बंधुत्व का राग हमेशा अलापने वाले पंडितजी उतनी ठंड में भी पसीने से भीग गए थे. Hindi Kahani

Kahani In Hindi : सौतन बनी सहेली

Kahani In Hindi : ‘‘चंदा, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की तो मैं जी नहीं सकूंगा,’’ मनोज ने चंदा से कहा. ‘‘पर, मेरे मांबाबूजी तो कभी इस शादी के लिए राजी नहीं होंगे, क्योंकि उन का कहना है कि तू नशा करता है और पूरे गांव में आवारागर्दी करता है,’’ चंदा बोली. ‘‘मैं नशा करता हूं तो तेरी याद में दुखी हो कर करता हूं. अगर आवारागर्दी करता हूं, तो तेरी याद में पागल बन कर… तू मुझे नहीं मिली तो मैं तो दुनिया ही छोड़ जाऊंगा,’’ मनोज ने आंखों में आंसू लाने का नाटक करते हुए कहा. कुछ इसी तरह की मीठीमीठी बातें कर के मनोज ने चंदा को अपनी बातों में फंसा लिया था और उसे इस बात का भरोसा दिलाया दिया कि दोनों भाग कर शादी कर लेंगे और जब मांबाबूजी का गुस्सा शांत हो जाएगा, तो वापस आ कर माफी मांग लेंगे.

चंदा भी मनोज की बातों में आ गई और एक रात उन दोनों ने गांव से भाग जाने का फैसला किया. यह कौन सा शहर था, चंदा को नहीं मालूम था. वह तो बस मनोज पर यकीन कर के ही उस के साथ चली आई थी. चंदा को ले कर मनोज एक बड़े से मकान में पहुंचा. उस कमरे में जरूरत की सारी चीजें पहले से ही मौजूद थीं. मनोज ने चंदा को बताया कि उन दोनों को आज ही मंदिर में शादी करनी होगी और इस के लिए उसे बाजार जा कर जरूरी सामान लाना होगा. मनोज के बाहर जाने के बाद चंदा वहीं पड़े एक बिस्तर पर लेट गई और उस की आंख लग गई. जब थोड़ी देर बाद चंदा की आंख खुली, तो कमरे में मनोज कहीं नहीं दिखाई दिया. कोने में एक आदमी बैठा हुआ था, जो उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था.

एक अजनबी को इस तरह से घूरता हुआ देख कर चंदा घबरा उठी. ‘‘कौन हो तुम? मनोज कहां है?’’ कहते हुए चंदा हकला रही थी. ‘‘मेरा नाम राज है… उस ने कुछ बताया नहीं तुझे क्या?’’ चालबाजी से मुसकराते हुए राज ने पूछा. ‘‘मुझे मेरे पति के पास जाना है,’’ चंदा की घबराहट अब बढ़ने लगी थी. ‘‘अब उसे भूल जा… वह तो तुझे मेरे हाथों बेच गया है… और बदले में 2 लाख रुपए ले कर गया है,’’ राज ने कहा. राज की बातें सुन कर चंदा चीखने लगी, ‘‘मेरा मनोज कहां है… मुझे वहीं पहुंचा दो.’’ राज इलाके का एक रसूख वाला आदमी था. चंदा का चीखना और रोना सुन कर उस को गुस्सा आ रहा था.

वह उठा और चंदा को मारने की गरज से उस ने हाथ उठाया ही था कि तभी कमरे में एक बूढ़ी औरत आई, वे राज की मां थीं, ‘‘अरे राज, तू इसे छोड़ दे… मैं समझाती हूं इसे. ‘‘देख लड़की… अब मेरा बेटा राज ही तेरा पति है और जिसे तू अपना पति कह रही है न, वह आदमी ही तुझे यहां आ कर बेच गया है.’’ बूढ़ी की बात सुन कर चंदा को भरोसा नहीं हो रहा था. वह सहम रही थी. ‘‘अब डरने से काम नहीं चलेगा लड़की… जैसा मैं कहती हूं वैसा करती चल, रानी बन कर राज करेगी यहां पर.’’ थोड़ा रुक कर फिर उस बूढ़ी मां ने बोलना शुरू किया, ‘‘देख, सचाई यह है कि मेरी बहू बच्चा पैदा नहीं कर पा रही है. वह दुष्ट हमारे घर को जायदाद का वारिस नहीं दे पाई है… इसलिए हमें एक ऐसी लड़की की जरूरत थी, जो हमारे ठाकुर खानदान को वारिस दे सके… अब तू आसानी से मान गई तो ठीक… नहीं तो हम मजबूर हो जाएंगे… समझी… ‘‘इस इलाके में औरतों की तादाद मर्दों के मुकाबले वैसे भी बहुत कम है, इसलिए यहां तो केवल मेरा बेटा ही तेरे साथ संबंध बनाएगा और वे सारे सुख देगा, जो ये अपनी असली पत्नी को देता है. तू ने अगर भागने की कोशिश की, तो बाहर कितने लोग तेरा बलात्कार करेंगे… तू गिन भी नहीं पाएगी.’’ ‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता… तुम लोग झूठ बोल रहे हो. मुझे मनोज के पास जाना है,’’ चंदा चीख रही थी. ‘‘हां… हां… चली जाना अपने मनोज के पास. एक बात कान खोल कर सुन ले… हमें भी तुम्हारी जरूरत नहीं है… हमें एक लड़का दे दे और फिर चली जाना यहां से,

’’ राज गुस्से में बोल रहा था. उस की बातें सुन कर चंदा कमरे में इधरउधर भागने लगी. ‘‘यह ऐसे नहीं मानेगी राज… ऐसा कर इसे रस्सियों में बांध कर डाल दे… कुछ दिनों में ही इस का दिमाग सही हो जाएगा,’’ बूढ़ी ने कहा. राज ने एक रस्सी मंगवा कर चंदा को बिस्तर के पाए से बांध कर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और चंदा को 2 दिन का समय सोचविचार करने के लिए दिया. चंदा कमरे में बंधी हुई सिसकती रही, उसे क्या पता था कि किसी से प्यार करने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी, आज उसे पछतावा हो रहा था. पूरे 24 घंटे हो चुके थे. चंदा ने कुछ भी नहीं खाया था. अचानक कमरे का दरवाजा खुला, चंदा किसी के आने की बात सोच कर अंदर तक दहल गई थी… उस ने अपनेआप को और भी समेट लिया था. ‘‘सुनो… कुछ खा लो… ऐसे कब तक पड़ी रहोगी,’’ यह एक औरत की आवाज थी.

आवाज सुन कर चंदा ने आंखें ऊपर की, तो देखा कि एक खूबसूरत औरत सिर पर पल्ला डाले, हाथों में खाने की थाली लिए उस के सामने खड़ी है. चंदा समझ गई कि ये राज की पत्नी है. ‘‘मेरा नाम मंजुला है और तुम्हें मुझ से डरने की जरूरत नहीं है. हालांकि मेरे आदमी को अपने बस में कर के तुम मेरी सौत बन सकती हो, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें खाना खिलाने आई हूं.’’ राज की पत्नी ने चंदा के बंधनों को खोला और चंदा के हाथमुंह को साफ किया. ‘‘ये कुछ कपड़े लाई हूं… चाहो तो नहा कर इन्हें पहन सकती हो और फिर खाना खा लो.’’ ‘‘आप मुझे इतना बता दीजिए कि अगर मेरी जगह आप होतीं तो क्या आप खानापीना खा सकती थीं? अगर आप ने किसी से प्यार किया होता और वे आप को धोखा दे दे तो आप को कैसा लगता?’’ ‘‘देखो, मैं यहां बरसों से हूं और मैं यहीं कहूंगी कि जो तुम से कहा जा रहा है उसे मान लो, क्योंकि तुम्हारे रोने का कोई भी असर इन पर नहीं होने जा रहा है,’’ मंजुला ने चंदा को समझाते हुए कहा.

पर फिर भी चंदा को मंजुला की बातें समझ नहीं आ रही थीं. उसे तो लग रहा था कि एक बार अगर वह यहां से भागने में कामयाब हो गई, तो सीधा अपने गांव जा कर मांबाबूजी से माफी मांग लेगी. पर शायद यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था, कुछ दिन बीतने के बाद राज की मां फिर से उस कमरे में आईं. उन के साथ में राज भी था. ‘‘सुन लड़की, जा कर नहाधो ले और साजसिंगार भी कर ले. वैसे तू सिंगार नहीं भी करेगी तो भी कोई असर नहीं पड़ने वाला है… और बेटे राज, तू आखिर किस दिन का इंतजार कर रहा है… अब समय आ गया है तुझे अपनी मर्दानगी साबित करनी होगी… दिखा दे दुनिया को, मेरा बेटा राज भी एक बेटा पैदा करने की ताकत रखता है.’’ राज को मानो इसी बात का इंतजार था. चंदा के लाख हाथपैर पटकने के बाद भी राज ने दरवाजा बंद किया और एकएक कर के चंदा के सारे कपड़े उतार फेंके और उस के अनछुए बदन को अपने बदन से रगड़ने लगा और उस का बलात्कार किया. 1-2 बार नहीं, बल्कि पूरे महीने तक, बिना नागा किए हुए राज चंदा के साथ बलात्कार करता रहा. चंदा रोती रही और बलात्कार का शिकार होती रही, पर उस का रोना सुनने वाला वहां कोई नहीं था.

एक दिन राज की मां चंदा के कमरे में आईं. उन के साथ एक डाक्टर भी थी. ‘‘इसे चैक कर के बताओ कि यह पेट से हुई भी है कि नहीं.’’ डाक्टर अपने काम में लग गई और चंदा के कुछ सैंपल ले कर उन की जांच की. कुछ देर बाद डाक्टर ने चंदा के पेट से होने की सूचना दी. राज को यह बात पता चली, तो वह खुशी से फूला न समाया. आज उसे अपनी मर्दानगी पर बड़ा घमंड हो रहा था और उस ने मान लिया था कि औरत बदलने से वह बेटे का बाप बन जाएगा. चंदा पेट से क्या हुई, उस के कमरे में सूखे मेवे, फल का अंबार लगा दिया गया. किसी चीज की कोई कमी नहीं रहने दी गई चंदा के आसपास. राज और उस की मां रोज आते और चंदा के पेट पर नजर डालते और इशारोंइशारों में ही खुश होते. एक दिन सुबह से ही चंदा की खूब आवभगत हो रही थी, क्योंकि राज उसे अपने साथ ले कर पास के अस्पताल में ले जा रहा था. राज वहां जा कर चंदा के पेट में पल रहे भ्रूण के लिंग की जांच कराता और अगर चंदा के पेट में लड़की पल रही होती तो उस का पेट गिरा देता. अपनी कार में चंदा को ले कर बहुत खुशी के साथ वह अस्पताल पहुंचा था, पर उस की खुशी तब काफूर हो गई जब उसे पता चला कि चंदा के पेट में लड़की पल रही है. ‘‘मेरे तो सारे पैसे बरबाद हो गए, मां, इस औरत के पेट में लड़की पल रही है… लगता है,

मेरी किस्मत में ही एक बेटे का सुख नहीं है,’’ रोने लगा था राज. ‘‘अरे, तू चिंता क्यों करता है… इस बार पेट में लड़की आ गई तो क्या… तू फिर से कोशिश कर, थोड़ा और बादाम खिला… और मुझे पोते का मुंह दिखवा दे… अभी भी रास्ता बंद नहीं हुआ है. इसे अस्पताल ले जा और बच्चा गिरवा दे.’’ राज की बीवी मंजुला ने मांबेटे में होने वाली बातें चुपके से सुन ली थीं. उस के कदम चंदा के कमरे की तरफ बढ़ चले. चंदा कमरे में अपने सिर को पैरों में डाल कर बैठी थी. उस की सूनी आंखों में जीवन खत्म होता हुआ सा दिख रहा था. मंजुला चंदा के करीब जा कर उसे पुचकारने लगी. ‘‘मुझे इस दर्द में देख कर तुम्हें तो बहुत ही अच्छा लग रहा होगा न, तुम तो ठहरी ठकुराइन, भला तुम मेरे दर्द को क्या समझोगी, आखिरकार तुम कैसी औरत हो?’’ चंदा का दुख अंदर से उमड़ पड़ा रहा था. ‘‘नहीं, मुझे तुम गलत मत समझो… जब भी मैं पेट से होती हूं, ये लोग मैडिकल जांच करा कर पेट में लड़का या लड़की होने का पता लगा लेते हैं. अगर लड़की होती है, तो मेरा बच्चा गिरवा देते हैं.

मेरी सास और मेरे पति ने मिल कर मेरा 2 बार बच्चा गिरवाया है. बेटा न पैदा कर पाने के लिए मुझ पर कितना जुल्म ढाया है, इन लोगों ने वह मैं जानती हूं… मैं तो खुद ही अभागी हूं,’’ मंजुला की आंखों में भी नमी थी. ‘‘तो फिर तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई… या फिर तुम ने भागने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ चंदा ने पूछा. ‘‘यहां से तो भागना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आसपास के इलाके में राज के आदमी फैले हुए हैं, जो उस के इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं. ‘‘मैं ने आवाज उठाई, तो मुझ पर कई तरह के जुल्म किए गए… और जब ये लोग मुझे शहर के एक अस्पताल में मेरा पेट गिरवाने ले गए, तब मैं बहाने से वहां के टौयलेट में गई… और मैं भागने की जगह तलाशने लगी… वहां खिड़की में लगे शीशे को सावधानी से हटा कर बाहर का रास्ता मिल सकता था और मैं ने वही किया, पर जैसे ही मैं पास ही बने एक पुलिस चौकी में पहुंचने वाली थी कि मेरे पति राज ने मुझे पकड़ लिया और मारते हुए घर ले आए…

तब से ले कर आज तक मैं यहीं कैद हो कर रह गई हूं,’’ सिसकियों में टूट गई थी मंजुला. चंदा ने उसे पानी पीने को दिया. मंजुला कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘ये लोग तुम्हें भी अस्पताल ले जा कर तुम्हारा बच्चा गिरवाने की कोशिश करेंगे… मुमकिन है कि यह वही अस्पताल हो, जहां मुझे ले जाया गया था. तुम टौयलेट में जा कर खिड़की के शीशे देखना. अगर तुम्हें लगे कि इन्हें हटा कर भागने में मदद मिल सकती है, तो तुम वहां से भाग जाना… पर मेरी तरह टौयलेट जाने का बहाना मत बनाना नहीं, तो इन्हें शक हो सकता है. ‘‘बेहतर होगा कि तुम किसी और बहाने से ऐसी जगह पहुंचो, जहां से बाहर भाग सको. बस तुम्हारी रिहाई का यही रास्ता है,’’ मंजुला ने चंदा को बताया. मंजुला गलत नहीं थी.

कुछ देर बाद ही राज चंदा को ले कर अस्पताल जाने के लिए रवाना हो गया. अस्पताल में चंदा का बच्चा गिरवाया जाना था, पर चंदा सावधान थी. उस ने नर्स से उलटी आने की बात कही. नर्स ने उसे बाथरूम दिखा दिया. यह वही अस्पताल था, जहां मंजुला को पहले लाया गया था. अंदर जा कर चंदा ने देखा कि खिड़की के शीशे को हटा कर भागा जा सकता है, पर ऐसा करने में बेहद सावधानी की जरूरत थी. कांच के टूटने की आवाज सुन कर बाहर बैठे राज को किसी भी तरह का शक हो सकता था, पर अपने ऊपर तरहतरह के जुल्मों की शिकार चंदा कोई भी रिस्क उठाने को तैयार थी. उस ने शीशे हटा कर खिड़की में इतनी जगह बना ली थी, जिस में से वह बाहर निकल सकती थी. आखिरकार उस की कोशिश कामयाब हुई और खिड़की से बाहर आ कर उस को एक नई ताजगी का अहसास हुआ. बाहर निकल कर चंदा सीधे पुलिस चौकी पहुंची और राज और उस की मां के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस राज के घर पहुंची और राज और उस की मां को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘पर इंस्पैक्टर साहेब.

.. इस बात का क्या सुबूत है कि मैं ने इस लड़की पर जुल्म किए हैं. इस के पेट में पल रहा मेरा बच्चा ही है,’’ राज तेज आवाज में बोल रहा था. ‘‘मैं देती हूं सुबूत आप को इंस्पैक्टर साहब,’’ मंजुला सामने से आती दिखाई दी. उसे इस रूप में इस तरह से बात करते हुए देख कर राज का मुंह खुला का खुला रह गया. ‘‘हां… मैं हूं गवाह… चंदा पर हुए हर जुल्म और सितम का… और न केवल चंदा पर, बल्कि मुझ पर भी इन लोगों ने एक लड़के की चाहत में अनगिनत जुल्म किए हैं… गिरफ्तार कर लीजिए इन को.’’ पुलिस ने राज और उस की मां को गुनाह साबित होने के बाद जेल भेज दिया. उस के बाद पुलिस ने मनोज की खोज शुरू की और जल्द ही पुलिस ने पाया कि मनोज लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसा कर भगा कर कहीं और ले जाता और बाद में उन्हें बेचने का काम बड़े पेशेवर ढंग से करता था. पुलिस ने मनोज को पकड़ कर जेल भेज दिया. प्यार में एक बार धोखा खाने के बाद चंदा ने फिर कभी किसी दूसरे मर्द पर भरोसा नहीं किया… हां… मंजुला ने उस की सौतन से उस की सहेली बन कर उस का यकीन जिंदगीभर के लिए हासिल कर लिया था.  Kahani In Hindi

Samajik Kahaniya : दर्प – जब एक झूठ बना कविता की जिंदगी का कड़वा सच

Samajik Kahaniya : आज पूरे दफ्तर में अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी. कई हफ्तों से चल रही चटपटी गपशप को अचानक विराम लग गया था. सुबह दफ्तर में आते ही एकदूसरे से मिलने पर हाय, हैलो,  नमस्ते की जगह हर किसी की जबान पर निदेशक, महेश पुरी का ही नाम था. हर एक के हाथ में अखबार था जिस में महेश पुरी की आत्महत्या की खबर छपी थी. महेश पुरी अचानक ऐसा कदम उठा लेंगे, ऐसा न उन के घर वालों ने सोचा था न ही दफ्तर वालों ने.  वैसे तो इस दुनिया से जाने वालोें की कभी कोई बुराई नहीं करता, लेकिन महेश पुरी तो वास्तव में एक सज्जन व्यक्ति थे. उन के साथ काम करने वालों के दिल में उन के लिए इज्जत और सम्मान था. 30 वर्षों के कार्यकाल में उन से कभी किसी को कोई शिकायत नहीं रही. महेश पुरी बहुत ही सुलझे हुए, सभ्य तथा सुसंस्कृत व्यक्ति थे. कम बोलना, अपने मातहत काम करने वालों की मदद करना, सब के सुखदुख में शामिल होना तथा दफ्तर में सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए रखना उन के व्यक्तित्व के विशेष गुण थे.

लगभग 6 महीने पहले उन की ब्रांच में कविता तबादला हो कर आई थी. कविता ज्यादा दिनों तक एक जगह टिक कर काम कर ही नहीं सकती थी. वह अपने आसपास किस्से, कहानियों, दोस्तों और संबंधों का इतना मजबूत जाल बुन लेती कि साथ काम करने वाले कर्मचारी दफ्तर और घर को भूल कर उसी में उलझ जाते. लेकिन जब विभाग के काम और अनुशासन की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती तो कविता का वहां से तबादला कर दिया जाता.  कविता जिस भी विभाग में जाती, वहां काम करने वाले पुरुष मानो हवा में उड़ने लगते. हंसहंस कर सब से बातें करना, चायपार्टियां करते रहना, अपनी कुरसी छोड़ कर किसी भी सीट पर जा बैठना कविता के स्वभाव में शामिल था. ऐसे में दिन का पता ही नहीं लगता कब पंख लगा कर उड़ जाता. कविता चीज ही ऐसी थी, खूबसूरत, जवान, पढ़ीलिखी तथा आधुनिक विचारधारा  वाली फैशनेबल लड़की.

नित नए फैशन के कपड़े पहन कर आना, भड़कीला मेकअप, ऊंची हील के सैंडिल, कंधों तक झूलते घने काले केश, गोराचिट्टा रंग, गठा शरीर और 5 फुट 3 इंच का कद, ऐसी मोहक छवि और ऐसा व्यवहार भला किसे आकर्षित नहीं करेगा?  सहकर्मी भी दिनभर उस से रस लेले कर बातें करते. कोई कितना भी कम बोलने वाला हो, कविता उसे कुछ ही दिनों में रास्ते पर ले आती और वह भी दिनभर बतियाने लगता. वह जिस की भी सीट पर जाती, उस सहकर्मी की गरदन तन जाती लेकिन शेष सहकर्मियों की गरदनें भले ही फाइलों पर झुकी हों परंतु उन के कान उन दोनों की बातों पर ही लगे रहते.

इतना ही नहीं, कविता जिस सैक्शन में होती वहां के काम की रिपोर्ट खराब होने लगती क्योंकि उस के रहते दफ्तर में काम करने का माहौल ही नहीं बन पाता. बस पुरुष कर्मचारियों में एक होड़ सी लगी रहती कि कौन कविता को पहले चाय क औफर करता है और कौन लंच का. किस का निमंत्रण वह स्वीकार करती है और किस का ठुकरा देती है.  हालांकि कविता को उस के इस खुले व्यवहार के बारे में समझाने की कोशिश बेकार ही साबित होती फिर भी उस की खास सहेली, रमा उसे अकसर समझाने की कोशिश करती रहती. लेकिन कविता ने कभी उस की एक नहीं सुनी. कविता का मानना था कि यह 21वीं सदी है, औरत और मर्द दोनों के बराबर अधिकार हैं. ऐसे में मर्दों से बात करना, उन के साथ चाय पीने, कहीं आनेजाने में क्या हर्ज है? आदमी कोई खा थोड़े ही जाते हैं? वह उन से बात ही तो करती है, प्यार या शादी के वादे थोड़े करती है जो मुश्किल हो जाएगी.  रमा का कहना था कि यदि ऐसी बात है तो फिर वह आएदिन किसी न किसी की शिकायत कर के अपना तबादला क्यों करवाती रहती है? कविता सफाई देते हुए कहती कि इस में उस का क्या कुसूर, पुरुषों की सोच ही इतनी संकुचित है, कोई सुंदर लड़की हंस कर बात कर ले या उस के साथ चाय पी ले तो उन की कल्पना को पंख लग जाते हैं फिर न उन्हें अपनी उम्र का खयाल रहता है न समाज का.

कविता को अपनी खूबसूरती का, उसे देख कर मर्दों के आहें भरने का, कुछ पल उस के साथ बिताने की चाहत का अंदाजा था तभी तो उस ने जब जो चाहा, वह पाया. आउट औफ टर्न प्रोमोशन, आउट आफ टर्न मकान और स्वच्छंद जीवन.  अगर कभी कोई उपहासपरिहास में मर्यादा की सीमाएं लांघ भी जाए तो भी कविता ने बुरा नहीं माना लेकिन कौन सी बात कविता को बुरी लग जाए और पुरुष सहकर्मी की शिकायत ऊपर तक पहुंच जाए, अनुमान लगाना कठिन था. परिणामस्वरूप कविता का तबादला दूसरी जगह कर दिया जाता. दफ्तर भी कविता की शिकायतें सुनसुन कर और तबादले करकर के परेशान हो गया था.

महेश पुरी के विभाग में कविता का तबादला शायद दफ्तर की सोचीसमझी नीति के तहत हुआ था. इधर पिछले कुछ वर्षों से कविता की शिकायतें बढ़ती जा रही थीं. दफ्तर के उच्च अधिकारियों के लिए वह एक सिरदर्द बनती जा रही थी. उधर, पूरे दफ्तर में महेश पुरी की सज्जनता और शराफत से सभी परिचित थे. कविता को उन के विभाग में भेज कर दफ्तर ने सोचा होगा कि कुछ दिन बिना किसी झंझट के बीत जाएंगे.  कविता भी इस विभाग में पहले से कहीं अधिक खुश थी. कविता की दृष्टि से देखा जाए तो इस के कई कारण थे. पहला, यहां कोई दूसरी महिला कर्मचारी नहीं थी. महिला सहकर्मी कविता को अच्छी नहीं लगती क्योंकि उस का रोकनाटोकना, समझाना या उस के व्यवहार को देख कर हैरान होना या बातें बनाना कविता को बिलकुल पसंद नहीं आता था. दूसरा मुख्य कारण था, इस ब्रांच के अधिकांश पुरुष कर्मचारी कुंआरे थे. उन के साथ उठनेबैठने, घूमनेफिरने, कैंटीन में जाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि उन्हें न अपनी बीवियों का डर होता और न ही शाम को घर भागने की जल्दी. अत: दोनों ओर से स्वच्छंदतापूर्ण व्यवहार का आदानप्रदान होता. यही कारण था कि कुछ ही दिनों में कविता जानपहचान की इतनी मंजिलें तय कर गई जो दूसरे विभागों में वह आज तक नहीं कर पाई थी.

एक दोपहर कविता महेश पुरी के कैबिन से बाहर निकली तो उस का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था. अपना आंचल ठीक करती, गुस्से से पैर पटकती, अंगरेजी में 2-4 मोटीमोटी गालियां देती वह कमरे से बाहर चली गई. पूरा स्टाफ यह दृश्य देख कर हतप्रभ रह गया. कोई कुछ भी न समझ पाया.  सब ने इतना अनुमान जरूर लगाया कि कविता ने दफ्तर के काम में कोई भारी भूल की है या फिर उस के खिलंदड़े व्यवहार और काम में ध्यान न देने के लिए डांट पड़ी है. दूसरी तरफ सब लोग इस बात पर भी हैरान थे कि साहब ने कविता को बुलाया तो था ही नहीं फिर उसे साहब के पास जाने की जरूरत ही क्या थी. फाइल तो चपरासी के हाथ भी भिजवाई जा सकती थी.

ब्रांच में अभी अटकलें ही लग रही थीं कि तभी कविता विजिलैंस के 3-4 उच्च अधिकारियों को साथ ले कर दनदनाती हुई अंदर आ गई. वे सभी महेश पुरी के कैबिन में दाखिल हो गए. मामला गंभीर हो चला था. कर्मचारियों की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. अधिकारियों का समूह अंदर क्या कर रहा था, किसी को कुछ पता नहीं लग रहा था? जैसेजैसे समय बीत रहा था, बाहर बैठे कर्मचारियों की बेचैनी बढ़ने लगी थी. वैसे तो वे सब फाइलों में सिर झुकाए बैठे थे, लेकिन ध्यान और कान दीवार के उस पार लगे थे.  कुछ देर बाद विजिलैंस अधिकारी बाहर, बिना किसी से कुछ बात किए, चले गए थे. उन के पीछेपीछे कविता भी बाहर आ गई. परेशान, गुस्से में लालपीली, बड़बड़ाती हुई अपनी सीट पर आ कर बैठ गई और कुछ लिखने लगी. किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि पूछे, आखिर हुआ क्या? पुरी साहब आखिर किस बात पर नाराज हैं? उन्होंने ऐसा क्या कह दिया?

कविता भी इस चुप्पी को सह नहीं पा रही थी. वह गुस्से से बोली, ‘समझता क्या है अपनेआप को? इस के अपने घर में कोई औरत नहीं है क्या?’

सुनते ही सब अवाक् रह गए. सब की नजरों में एक ही प्रश्न अटका था, ‘क्या महेश पुरी भी…?’ किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था. कविता फिर फुफकार उठी, ‘बहुत शरीफ दिखता है न? इस बुड्ढे को भी वही बीमारी है, जरा सुंदर लड़की देखी नहीं कि लार टपकने लगती है.’  इतना सुनते ही पूरी ब्रांच में फुसफुसाहट शुरू हो गई. कोई भी कविता की बात से सहमत नहीं लग रहा था. पुरी साहब किसी लड़की पर बुरी नजर रखें, यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि कविता अकारण तो गुस्सा न करती.  कोई कारण तो होगा ही. पुरी के मामले में लोगों का यकीन डगमगाने लगा.  थोड़ी देर बाद मुंह नीचा किए महेश पुरी तेज कदमों से बाहर निकल गए और उस के बाद फिर कभी दफ्तर नहीं आए. उस दिन से प्रतिदिन दफ्तर में घंटों उस घटना की चर्चा होती. पुरी साहब और कविता के बारे में बातें होने लगीं. कविता के चाहने वाले भी दबी जबान में उस पर छींटाकशी करने से नहीं चूक रहे थे तो दूसरी तरफ वर्षों से दिल ही दिल में पुरी साहब को सज्जन मानने वाले भी उन पर कटाक्ष करने से नहीं चूक रहे थे. वास्तव में यह आग और घी का, लोहे और चुंबक का रिश्ता है, किसे दोष दें?

पुरी साहब तो उस दिन के बाद से कभी दफ्तर ही नहीं आए, लेकिन कविता शान से रोज दफ्तर आती, यहांवहां बैठती, जगहजगह पुरी साहब के विरुद्ध प्रचार करती रहती. दिन में कईकई बार वह इसी किस्से को सुनाती कि कैसे पुरी ने उस के साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की. नाराज होते हुए सब से पूछती, ‘खूबसूरत होना क्या कोई गुनाह है?’ ‘क्या हर खूबसूरत लड़की बिकाऊ होती है?’ ‘नौकरी करती हूं तो क्या मेरी कोई इज्जत नहीं है?’ …वगैरह.   कविता की बातें मजमा इकट्ठा कर लेतीं. लोग पूरी हमदर्दी से सुनते फिर कुछ नमकमिर्च अपनी तरफ से लगाते और किस्सा आगे परोस देते. बात आग की तरह इस दफ्तर तक ही नहीं, दूर की ब्रांचों तक फैल गई. कविता के सामने हमदर्दी रखने वाले भी उस की पीठ पीछे छींटाकशी से बाज न आते.

दफ्तर में इस घटना के लिए एक जांच कमेटी नियुक्त कर दी गई थी. जांच कमेटी अपना काम कर रही थी. 1-2 बार पुरी साहब को भी दफ्तर में तलब किया गया. शर्मिंदगी से वे जांच कमेटी के आगे पेश होते और चुपचाप लौट जाते. वर्षों साथ रहे पुरी के पुराने दोस्तों की भी उन से बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि पुरी साहब से क्या कहें, क्या पूछें?  आज का अखबार पढ़ते ही रमा स्वयं को रोक न सकी और कविता के घर पहुंच गई. वह कुछ साल पहले महेश पुरी के साथ काम कर चुकी थी. कविता का चेहरा कुछ उतरा हुआ था. रमा को देख कर वह कुछ घबरा गई. गुस्साई रमा ने बिना किसी भूमिका के अखबार कविता के सामने पटकते हुए पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘शर्म से मर गया और क्या?’’

‘‘कविता, तू कुछ भी कहती फिर, लेकिन मुझे लगता है उस दिन उस ने तेरी नहीं बल्कि तू ने उस की इज्जत पर हाथ डाला था. उस दिन से वह शर्मिंदा हुआ मुंह छिपाए बैठा था और तू है कि जगहजगह अपनी इज्जत आप उछालती फिर रही है.’’

‘‘मुंह क्यों नहीं छिपाता वह? उस ने काम ही ऐसा किया था?’’

‘‘क्या किया था उस ने?’’ पूछते हुए रमा ने अपनी आंखें कविता की आंखों में गड़ा दीं.

‘‘तुझे क्या लगता है, मैं झूठ बोल रही हूं?’’

‘‘नहींनहीं, इसीलिए तो पूछ रही हूं. आखिर क्या किया था उस ने?’’

‘‘उस ने…उस ने…क्या इतना काफी नहीं कि उस ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला था. इस पर भी तू चाहती है कि मुझे चुप रहना चाहिए था? वह इज्जतदार था तो क्या मेरी कोई इज्जत नहीं है?’’

‘‘इसीलिए तो पूछ रही हूं कि आखिर उस ने किया क्या था?’’

‘‘अच्छी जिद है, तू नहीं जानती कि एक औरत की इज्जत क्या होती है?’’

‘‘इतना ही अपनी इज्जत का खयाल है तो उस दिन से जगहजगह…’’

‘‘फिर वही बात, अरे भई 21वीं सदी है. आज मर्द अपनी मनमानी करता रहे और औरत आवाज भी न उठाए?’’

‘‘21वीं सदी में ही क्यों अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का हक तो औरतों को हमेशा से है लेकिन कोई…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘लेकिन यह कि आवाज उठाने के लिए कोई बात तो हो? हवा देने के लिए चिंगारी तो हो.’’

‘‘रमा, तुझे तो हमेशा से मैं गलत ही लगती हूं. तू ही बता, एक औरत हो कर क्या मैं इतनी बड़ी बात कर सकती हूं?’’

‘‘यही तो मैं जानना चाहती हूं कि एक औरत हो कर तू कैसे…?’’

‘‘चल छोड़ रमा, अब तो वैसे भी किस्सा खत्म हो गया है.’’

‘‘एक भला आदमी अपने माथे पर कलंक ले कर जान देने पर मजबूर हो गया, उस का परिवार बेसहारा हो गया और तू कह रही है किस्सा खत्म हो गया?’’

‘‘बस कर रमा, मेरी दोस्त हो कर तुझे उस से हमदर्दी है? बस कर, मैं वैसे ही बहुत परेशान हूं.’’

‘‘तू क्यों परेशान होने लगी? उस दिन से आज तक दिन में बीसियों बार तू यही किस्सा तो सुना रही है. लोगों ने सुनसुन कर तिल का ताड़ बना दिया है. आज मैं पूछ रही हूं तो टाल रही है. बता तो सही, आखिर उस ने तेरे साथ क्या किया था?’’

‘‘उस ने वह किया था जो उसे नहीं करना चाहिए था,’’ कविता गुस्से से कांपने लगी.  ‘‘फिर भी क्या…?’’ रमा को जैसे जिद हो गई थी कि वह कविता के मुंह से सुन कर ही मानेगी.

कविता गुस्साई नागिन की भांति फुफकारने लगी.   रमा अभी भी निडर हो उस की आंखों में आंखें गड़ाए बैठी थी.

‘‘तू जानना चाहती है न उस ने मेरे साथ क्या किया था?’’

‘‘हां.’’

‘‘उस ने मेरा ऐसा अपमान किया था जो आज तक किसी मर्द ने नहीं किया. 6 महीने हो गए थे मुझे उस के सैक्शन में काम करते हुए, उस ने कभी आंख उठा कर मेरी तरफ नहीं देखा, इतनी उपेक्षा मेरे रंगरूप की, इतनी बेजारी मेरे बनावसिंगार से? जब से मैं ने होश संभाला है, मैं ने मर्दों को अपने पर मरते, फिदा होते पाया है. मैं जिस रास्ते से भी निकल जाऊं, मर्द मुझे मुड़ कर देखे बिना नहीं रहते. वह किस मिट्टी का बना हुआ था, मैं नहीं समझ पाई. अपना यह अपमान मैं नहीं सह पाई,’’ कविता एक सांस में कह गई.

‘‘क्या…?’’ रमा अवाक् रह गई.

‘‘जानती है उस दिन मैं ने नई डिजाइन की साड़ी पहनी हुई थी. सुबह से हर कोई मेरी तारीफ करता नहीं थक रहा था. मैं ने लंच तक 2 बार उस को बहाने से गुडमार्निंग की और वह बिना मेरी तरफ देखे जवाब में फुसफुसा कर चल दिया. लंच के बाद मैं एक जरूरी फाइल के बहाने से उस के कमरे में गई लेकिन उस ने आंख उठा कर नहीं देखा. अपने काम में व्यस्त बोला, रख दो.’’

‘‘कविता, तू पागल तो नहीं हो गई?’’ रमा लगभग चीख उठी.

‘‘तू नहीं समझेगी. पता है आज तक किसी ने मेरे साथ ऐसा नहीं किया.’’  चेतनाशून्य रमा वहां और खड़ी न रह सकी. काश कोई ऐसा आईना होता जो चेहरे के पीछे छिपी बदसूरती को दिखा पाता. आज कविता को उसी आईने की सख्त जरूरत है. कविता का यह कैसा प्रतिशोध था? रमा का जी चाह रहा था कि दफ्तर में जा कर जोरजोर से चिल्लाए और सब को बताए कि आखिर मरने वाले ने उस दिन कविता के साथ क्या किया था.  लेकिन कविता के झूठे आरोपों को महेश पुरी ने आत्महत्या कर के पुख्ता कर दिया था. कविता के झूठ को पुरी की आत्महत्या ने सच बना दिया था. झूठ इतना काला हो गया था कि अब उस पर सचाई का कोई भी रंग नहीं चढ़ सकता था. कहते हैं न, बारबार बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है, कविता ने यह साबित कर दिया था.  देखना तो यह है कि झूठ के जिस बोझ को महेश पुरी नहीं उठा पाए, क्या कविता उसे उठा कर जी पाएगी?  Samajik Kahaniya

Love Story In Hindi : एक हसीं भूल – हर बार कि तरह इस बार भी सभी को किसका इंतजार था

Love Story In Hindi : हर बार की तरह आज भी बड़ी बेसब्री के बाद यह त्योहार वाला दिन आया है. पूरा औफिस ऐसे खाली है, जैसे कोई बड़ा सा गुल्लक, लेकिन उस में एक भी चिल्लर न हो. आज मैं भी बहुत खुश हूं. आखिरकार पूरे 8 महीने बाद घर जा रहा हूं, जहां मां, पत्नी और अपनी ससुराल से अगर दीदी आई होंगी तो मेरा इंतजार कर रही होंगी. सब से खास बात यह कि त्योहार भी होली का ही है. हर तरफ खुशी का माहौल है. दुकानों पर रंगगुलाल बिकने लगे हैं. बच्चों का झुंड भूखे भेड़ के झुंड की तरह रंगों पर टूट पड़ा है. अजीब नजारा है और मन ही मन में मौज की लहरें दिल के सागर में गोता लगा रही हैं. इन सब को देख कर अपना बचपन किसी फिल्म की तरह सामने चलने लगता है.

यह सब देखतेदेखते मैं अपने क्वार्टर पर पहुंचा. भागदौड़ के साथ जल्दबाजी में एक बैग में कपड़े, चार्जर, लैपटौप वगैरह रख स्टेशन के लिए आटोरिकशा पकड़ने भागा. आटोरिकशा वाला मिला. मैं ने कहा, ‘‘चल भाई, झटपट स्टेशन पहुंचा दे.’’ आटोरिकशा वाला अपनी चिरपरिचित रफ्तार में आटोरिकशा ले कर चलने लगा और हमेशा की तरह मुंबई की सब से बड़ी मुसीबत ट्रैफिक जाम सुरसा की तरह रास्ते में मुंह फैलाए खड़ी थी. आज ट्रैफिक जाम बिलकुल वैसे लग रहा है, जैसे किसी प्रेमिका को सावन की ठंडी बूंदें भी तपती ज्वाला की तरह लगती हैं. हौलेहौले बढ़ता आटोरिकशा… मानो लग रहा है कि हर सैकंड में 24 घंटे का समय बिता दें.

ट्रैफिक खुला और आटोरिकशा सरपट भागा. अपनी मंजिल को पा कर ही आटोरिकशा रुका. मैं ने पैसे पहले ही निकाल कर रखे थे रोज के अंदोज से. मैं ने झट से उसे पैसे थमाए और अंदर की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए, तभी पीछे से आटोरिकशा वाले की आवाज आई, ‘‘भाई, बाकी पैसे ले लो.’’ मैं ने हाथ उठाते हुए कहा, ‘‘भैया, दीवाली का शगुन समझ कर रख लो.’’ वह मुसकराया और वापस मुड़ गया. मैं स्टेशन के अंदर दाखिल हुआ और गाड़ी का पता किया, जो पूरे एक घंटे की देरी से थी. चूंकि मेरी एयरकंडीशंड कंपार्टमैंट में सीट थी, तो कोई समस्या होने से रही. स्टेशन पर ही बगल की दुकान से मैं ने एक पत्रिका ली और समय बिताने के लिए वेटिंगरूम में आराम से बैठ गया. मैं ने पत्रिका खोली और नएनए मुद्दों पर लिखे लंबेचौड़े लेख पढ़ने लगा. खाली बैठने पर अकसर लोग यही करते हैं. वहां मुश्किल से 8 या 10 लोग होंगे और सब अपने फोन में बिजी दिख रहे थे. आजकल डिजिटलीकरण के दौर में उम्मीद भी यही की जा सकती है. मैं डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल कम ही करता हूं.

मैं किताबों का बड़ा शौकीन हूं. बचपन से मुझे पढ़ना बहुत पसंद है और समय मिलते ही मैं किसी न किसी पत्रिका या किताब में खो जाता हूं और उसे समझने की कोशिश करता हूं. मैं काफी देर से ही पत्रिका पढ़ रहा था, तभी मेरी नजर अचानक सामने वाले कौर्नर पर बैठी एक लड़की पर पड़ी. मैं उसे देखता रह गया. वह बेहद खूबसूरत थी, जिस की उम्र तकरीबन 25 साल रही होगी. गोरा बदन, हिरन जैसी आंखें, होंठ सुर्ख गुलाबी मूंगे जैसे चमक रहे थे. वह अपने फोन में बिजी थी. शायद वह कुछ देख रही थी या सुन रही हो, हैडफोन जो लगाया था उस ने. उस लड़की ने गुलाबी टौप और नीली जींस पहनी हुई थी, जो उस के बदन की कसावट में खुद को कसे जा रहे थे. मैं पत्रिका से छिपछिप कर उसे देखता रहा, तभी अचानक रेलवे की सूचना ने मेरी तंद्रा तोड़ी. मेरी ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गई थी और मैं अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. अभी ट्रेन चलने में 15 मिनट बाकी थे. मैं ने उतर कर पानी की बोतल खरीदी और चढ़ने लगा. बोगी में तभी वह लड़की मेरी तरफ आती दिखी. मैं डब्बे में लगे हैंडल को पकड़े उसे निहारने लगा. वह मेरे एकदम करीब आ कर बोली, ‘‘हैलो, रास्ता देंगे आप?’’ मैं अचानक खयालों की दुनिया से बाहर आया और उसे रास्ता दिया. वह मेरे ही कंपार्टमैंट में चढ़ गई और मेरे ही सीट के ठीक सामने वाली सीट पर बैठ गई. सच बताऊं, मैं तो मन ही मन बहुत खुश हुआ.

अब हमारे साथ सिर्फ रात और एक लंबा सा सफर था. मैं भी अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. थोड़ी देर बाद ट्रेन चल दी और मैं ने हिम्मत कर के उस का नाम पूछा. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘प्रिया.’’ प्रिया की मीठी आवाज ने मन को अजब ही सुकून दिया, फिर हमारी औपचारिक बात शुरू हो गई जैसे काम, छुट्टी, मुंबई की वगैरह. बातों ही बातों में पता चला कि वह यहां फैशन मौडलिंग की पढ़ाई और मौडलिंग दोनों करती है. मैं ने उस से बोल दिया, ‘‘आप बेहद खूबसूरत हैं. मन करता है कि आप को देखता रहूं.’’ यह सुन कर वह मुसकरा दी. हमारी बातें आगे बढ़ीं और मुझे ऐसा लग रहा था, वह भी मेरे करीब आ रही है. तभी खाने का और्डर लेने वाला आया और हम ने और्डर दिया. अब मैं फिर उस से बातें करने लगा और धीरेधीरे हम मुंबई को पीछे छोड़ रहे थे, लेकिन एकदूसरे के करीब आ रहे थे. मैं घरपरिवार, अपनी सीमाओं को दिमाग में न याद आने वाले हिस्से में छोड़ कर पुराने समय में जब मैं कुंआरा था, वहां प्रवेश कर चुका था. उस से पता चला कि वह मेरे शहर में उस की दीदी के यहां जा रही है.

वह उन से 5 साल बाद मिल रही है, जो उन की बूआ की बेटी हैं. धीरेधीरे हम दोनों में अच्छी बौंडिंग बन गई. हम ने खुल कर बातें करनी शुरू कर दीं और कई बार मैं ने उसे नौनवैज चुटकुले सुनाए, जिस पर उस ने कंटीली मुसकान दी. मैं ने मौडलों के बारे में सुना था कि वे बड़ी तेज होती हैं और आज देख भी लिया. प्रिया ने यह भी बताया कि उस का एक बौयफ्रैंड था, जिस से उस का अब ब्रेकअप हो गया है, क्योंकि वह किसी और को भी डेट कर रहा था. मैं ने उस से झूठ बोल दिया कि मैं तो सिंगल हूं. उस की खूबसूरती में इतना डूबा था कि अपना वजूद ही भूल गया था कि मेरा तो सबकुछ वह है, जो घर पर मेरा इंतजार कर रही है. तभी अचानक बोगी के बाहर आवाज हुई. खाने वाला आया था. हम दोनों ने खाना खाया. उस के बाद हम ने सोने की तैयारी की और अपनीअपनी सीट पर लेटेलेटे हम दोनों बातों में फिर मशगूल हो गए. बातोंबातों में कभीकभी मैं अपने हाथ उस की पीठ पर छू देता था, लेकिन उस ने कभी बुरा नहीं माना. वह भी मेरे ऐसा ही कर रही थी.

धड़धड़ की आवाज से रेल अपनी तेज रफ्तार में पटरियों को पीछे धकेल रही थी और बाहर कितने गांव, गली, शहर पीछे छूटते जा रहे थे. हम दोनों बाहरी दुनिया से बिलकुल अनजान थे. बस अपनीअपनी दुनिया में बिजी थे. रात के 1 बज गए थे, दिनभर के काम और भागदौड़ के बाद भी आंखों में नींद का अतापता नहीं था. उसे भी नींद नहीं आ रही थी. लेकिन हम दोनों लेकिन करीब जरूर आ रहे थे. तकरीबन एक घंटा और बीता होगा यानी आधी रात कट चुकी थी. रात पूरे शबाब पर थी और रेल की चाल भी. प्रिया अब अपनी सीट से उठ कर मेरी सीट पर थी. हम दोनों एकदूसरे के मन में उतर रहे थे. जैसेजैसे रात बढ़ी, हमारी दूरियों में कमी आई. प्रिया की सांसों की बढ़ती तेजी मेरी सांसों को पूरी तरह से छू रही थी. उस के जिस्म और जवानी का जोश मुझ पर अपनी पूरी ताकत से वार कर रहा था, जैसे समुद्र के किनारे बैठे किसी शख्स को उस की तेज लहरें नहला कर चली जाती हैं.

लेकिन वह भीग कर मजा पाता है, ठीक वैसे ही मैं भी हर पल मस्ती में डूब रहा था. मेरे मन में यही था कि यह वक्त यहीं ठहर जाए. उस के साथ हो रहे प्रेम हवन में दोनों के जिस्म अपनीअपनी आहुति पूरे मन से दे रहे थे. न वक्त की परवाह और न ही जगह, न ही सफर. बस अजीब सी मंजिल की तलाश में दो मुसाफिर चल रहे थे. हम दोनों एकदूसरे में उतर गए थे और अब दोनों के चेहरे पर अलग मुसकान थी. उस ने प्यार से मेरे गालों को चूमा और फिर मेरे सीने पर सिर रख कर किसी बच्चे की तरह सोने लगी. मैं भी उस के सिर पर हाथ फेरने लगा और दोनों नींद की गोद में आ गए. सुबह हुई, हमारा स्टेशन आया और हम दोनों आखिरी बार गले मिले और अपनीअपनी मंजिल को निकल लिए. हम इतने करीब आए, लेकिन मैं ने न उस का फोन नंबर लिया और न ही उस का कोई सोशल मीडिया का पता.

शायद ये मेरी बेवकूफी भी थी. मैं स्टेशन से सीधे बाजार गया और मिठाई व कुछ दूसरा सामान लिया, फिर तकरीबन 2 घंटे की देरी से घर पहुंचा. अमूमन मुझे स्टेशन से घर आने में आधे घंटे का समय लगता है. घर पहुंचने पर मातापिता के पैर छुए और फिर पत्नी भी मिली. मैं अपने कमरे में आया, तभी मेरी पत्नी ने थोड़ी देर रुक कर कहा, ‘‘सुनोजी, मुझे आप को किसी से मिलाना है. मेरी बहन, जो शादी में न आ पाई थी, मैं ने उसे त्योहार पर घर बुलाया है.’’ ‘‘जी…’’ मैं ने भी सहमति दी. तभी उस ने आवाज लगाई. आवाज सुन कर एक लड़की पीले सूट में कमरे में आई. उसे देखते ही मैं चौंक गया, क्योंकि वह कोई और नहीं बल्कि वही थी, जो रातभर मेरी सहयात्री थी. उस ने मुझे देखा, मुसकराई और नमस्ते बोल कर चली गई. उसे देख कर मेरी तो जैसे जबान ही बंद थी. तकरीबन एक घंटे बाद मैं उस से अकेले में मिला, तब मैं ने उस से कहा, ‘‘सौरी, हम से शायद भूल हो गई.’’ प्रिया ने कहा, ‘‘भूल हम दोनों से हुई जीजाजी. अब भूल को भी भूल कर आप त्योहार का मजा लीजिए. एक हसीं सपना समझ कर उसे भूल जाइए और मैं भी. दीदी को कुछ पता न चले, वरना वे बहुत दुखी होंगी.’’ इतना कह कर प्रिया अपनी दीदी के पास चली गई. मैं अकेले बैठ कर उसी हसीं भूल के बारे में सोचता रहा. Love Story In Hindi

लेखक : शुभम पांडेय गगन

Family Story In Hindi : सास का दूसरा रूप

Family Story In Hindi : करण और चैताली ने प्रेम विवाह किया था. दोनों साथसाथ एमबीए कर रहे थे. करण मार्केटिंग में था और चैताली एचआर में, कैंपस में दोस्ती हुई और धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को चाहने लगे और पढ़ाई पूरी होने तक उन्होंने एकदूसरे के साथ रहने का फैसला कर लिया. दोनों को अच्छी प्लेसमैंट मिली, पर करण को पुणे और चैताली को मुंबई औफिस मे रिपोर्ट करना था. यह बात दोनों को ही नागवार गुजरी. पर चूंकि पैकेज अच्छा था, इसलिए दोनों ने स्वीकार कर लिया.

करण पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखता था और चैताली बंगाल से थी. जब दोनों ने इस का जिक्र अपनेअपने घरों मे किया तो जैसा कि डर था, पहले तो दोनों ही परिवारों ने अपनीअपनी असहमति दिखाई. करण के परिवार वाले शुद्ध शाकाहारी थे और चैताली का परिवार बिलकुल इस के विपरीत था. इस के अलावा भी बहुत सारे मुद्दे थे जिन पर सहमति के आसार दूरदूर तक नजर नहीं आते थे. पर करण और चैताली भी अपनी जिद पर अड़े थे. दोनों ने तय कर लिया था कि शादी तो करनी है, चाहे देर में ही सही, पर दोनों परिवारों की रजामंदी से ही.

लंबे समय तक चले मानमनुहार के बाद आखिर दोनों के परिवार वाले शादी के लिए मान गए और अगले महीने में शादी की तारीख भी तय कर दी गई. दोनों की मनचाही मुराद पूरी हो रही थी, इसलिए दोनों ही बहुत खुश थे. पर करण की मां की एक शर्त चैताली को बहुत परेशान कर रही थी. मां यह चाहती थीं कि शादी के बाद चैताली छुट्टी ले कर कम से कम एक महीने उन के परिवार के साथ रहे, करण बेशक चाहे तो पुणे जौइन कर ले या साथ रहे. चैताली को यह शर्त ही अजीब सी लगी. पर करण ने इस पर ज्यादा तवज्जुह नहीं दी. उस ने चैताली को बड़े ही सहज तरीके से सम झाया था.

‘‘देखो चैताली, अगर मां ऐसा चाहती हैं तो इस में बुराई क्या है. उन का भी तो मन करता होगा कि उन की बहू कुछ दिन उन के साथ रहे. रह लो न. कौन सा तुम वहां हमेशा के लिए रहने वाली हो.’’

चैताली कोई भी दलील देती तो करण उसे मानने से इनकार कर देता था. उसे कई बार महसूस होता था कि कहीं उस ने गलत निर्णय तो नहीं ले लिया. क्या शादी के बाद भी करण पहले जैसा ही रहेगा या बदल जाएगा? जबकि करण उसे हमेशा ही बड़े प्यार से सम झाया करता था और फिर उस का विश्वास लौट आता था.

इसी ऊहापोह में शादी की तारीख कब करीब आ गई, पता ही न चला. शादी दिल्ली में होनी थी जहां करण का घर था, क्योंकि उस के दादाजी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे. चैताली के घर से सभी लोग 2 दिन पहले ही दिल्ली आ चुके थे और सभी खुशीखुशी शादी की तैयारियों में व्यस्त थे.

पर, चैताली एक अनजाने डर से परेशान थी. कैसे रहेगी वह इतने दिन बिना करण के? करण की मां और बाकी लोगों का व्यवहार कैसा होगा? उस के घर के तौरतरीके कैसे होंगे? करण की मां बहुत सख्त मिजाज और उसूलों वाली हैं, ऐसा करण ने खुद बताया था. चैताली की मां शायद यह सब सम झ रही थीं, इसीलिए उन्होंने भी उसे सम झाया था. पर फिर भी, उस अज्ञात भय का डर उसे बारबार सता रहा था.

आज वह घड़ी भी आ ही गई जब उस ने करण के संग 7 फेरे ले ही लिए. सभी लोग उसे बधाई दे रहे थे. दोस्त, यार, रिश्तेदार, पूरा माहौल खुशियों से भरा हुआ था. करण भी अपने प्यार को शादी में बदलते देख बेहद खुश नजर आ रहा था.

अब विदाई का वक्त था, चैताली की मां और पापा दोनों के चेहरे गमगीन दिख रहे थे. कुछ औपचारिकताओं के बाद उसे करण के साथ गाड़ी में बैठा दिया गया. उस की आंखें भर आई थीं. करण ने उस के हाथों को अपने हाथ में ले लिया. उस की आंखों से टपके आंसू करण के हाथों को भिगो रहे थे.

करण के घर पहुंचते ही सब ने उस का खूब स्वागत किया. वह एक पल के लिए भी अकेली नहीं रही. घर के सभी लोग उस की खूबसूरती, उस की पढ़ाई और उस की नौकरी की खूब तारीफ कर रहे थे. करण अपने रिश्तेदारों के साथ बातें कर रहा था और बीचबीच में आ कर उस से मिल कर चला जाता था. उस के दोस्तयार उस का मजाक भी उड़ाते थे. उसे यहां पलभर के लिए भी नहीं लगा कि वह किसी नई जगह आ गई है. पर जैसे ही उसे करण की मां की बात याद आती कि वह फिर उसी अज्ञात भय की गिरफ्त में आ जाती. वह कुछ क्षणों के लिए ही अकेली रही होगी कि करण की मां कमरे में आती हुई दिखीं. वह उन्हें देख कर खड़ी हो गई. उन्होंने उसे इशारे से बैठने के लिए कहा और खुद उस की बगल में बैठ गईं.

‘‘यहां अच्छा लग रहा है बेटा?’’ उन की आवाज में स्नेह और दुलार दोनों ही था.

‘‘हां, मम्मी,’’ उस ने धीरे से कहा.

‘‘बेटे, यह तुम्हारा ही घर है. इसे तुम्हें ही संभालना है. तुम करण की पसंद जरूर थीं पर अब तुम हम सब की पसंद हो. अगर तुम यहां खुश रहोगी तो हम सभी खुश रहेंगे. मु झे करण ने बताया था कि तुम एक महीने रहने वाली बात से काफी डरी हुई हो. पगली, इस में डरने जैसा क्या है.

‘‘मैं भी तुम्हारी मां ही हूं. जब साथ रहोगी, तभी तो मु झे, हम सभी को सम झ पाओगी. मु झे भी तो चाहिए जिस से मैं अपना दुखसुख शेयर कर सकूं. उस से अपने मन की बात कह सकूं.

‘‘मेरी कोई बेटी तो है नहीं, बस, यही सोच कर मैं ने कहा था. बेटे, अपनापन अपना सम झने से ही बढ़ सकता है. अब यह तुम पर है, तुम अगर करण के साथ जाना चाहती हो तो मु झे कोई प्रौब्लम नहीं है.’’

चैताली सास का दूसरा रूप ही देख रही थी. उन की बातों से उसे बहुत सुकून मिला. उस ने सास का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप जब कहेंगी तभी जाऊंगी. आप की बातों ने मु झे बहुतकुछ सम झा दिया है. प्लीज, मु झे माफ कर दें.’’ उस की आंखें भर आईं.

‘‘मेरे बच्चे, रोते नहीं,’  यह कहते हुए सास ने उसे गले से लगा लिया. Family Story In Hindi

लेखक : राजेश कुमार सिन्हा

Hindi Stories Love : प्रतियोगिता – रोहित और शैली की दोस्ती से लोगों को दिक्कत क्यों होने लगी थी

Hindi Stories Love : रोहित और शैली की दोस्ती सोसाइटी के लोगों को नागवार गुजर रही थी. फिर दोनों ने एक दिन मिल कर एक फैसला किया और फिर… रोजकी तरह आज भी शैली सुबहसुबह सोसाइटी के पार्क में टहलने पहुंची. 32 साल की शैली खुले बालों में आकर्षक लगती थी. रंग भले ही सांवला था, मगर चेहरे पर आत्मविश्वास और चमक की वजह से उस का व्यक्तित्व काफी आकर्षक नजर आता था. वह एक सिंगल स्मार्ट लड़की थी और एक कंपनी में ऊंचे पद पर काम करती थी. उसे अपने सपनों से प्यार था. शैली करीब 3 महीने पहले ही इस सोसाइटी में आई थी. खुद को फिट और हैल्दी बनाए रखने के लिए शैली हर संभव प्रयास करती. हैल्दी खाना और हैल्दी लाइफस्टाइल अपनाती. रोज सुबह वाक पर निकलती तो शाम में डांस क्लास जाती. आज ठंड ज्यादा थी, इसलिए उस ने वार्मर के ऊपर एक स्वैटर भी पहन रखा था.

टहलतेटहलते उस की नजरें किसी को ढूंढ़ रही थीं. रोज की तरह आज वह लड़का उसे कहीं नजर नहीं आ रहा था जो सामने वाले फ्लैट में रहता था और रोज इसी वक्त टहलने के लिए आता था. टीशर्ट के ऊपर पतली सी जैकेट और स्लीपर्स में भी वह शैली को काफी स्मार्ट नजर आता था. अभी दोनों अजनबी थे, इसलिए बस एकदूसरे को निगाह भर कर देखते और आगे बढ़ जाते. इधर कुछ दिनों से दोनों के बीच हलकी सी मुसकान का आदानप्रदान भी होने लगा था. आज उस लड़के को न देख कर शैली थोड़ी अचंभित थी, क्योंकि मौसम कैसा भी हो यानी कुहासे की चादर फैली हो या फिर बारिश हो चुकी हो, वह लड़का जरूर आता था. अगले 2 दिनों तक शैली को वह नजर नहीं आया तो वह उस के लिए थोड़ी चिंतित हो उठी. कोई रिश्ता न होते हुए भी उस लड़के के लिए वह एक अपनापन सा महसूस करने लगी थी. वह सोचने लगी कि हो सकता है उस के घर में कोई बीमार हो या वह कहीं गया हुआ हो. तीसरे दिन जब वह लड़का दिखा तो शैली एकदम से उस के करीब पहुंच गई और पूछा,

‘आप कई दिनों से दिख नहीं रहे थे… सब ठीक तो है?’’ ‘‘कई दिनों से कहां, केवल 2 दिन ही तो…’’ ‘‘हां वही कह रही थी… सब ठीक है न?’’ ‘‘यस ऐवरीथिंग इज फाइन. थैंक यू… वैसे आज मुझे पता चला कि आप मुझे ऐब्जौर्ब भी करती हैं,’’ चमकीली आंखों से देखते हुए उस ने कहा. ‘‘अरे नहीं वह तो रोज देखती थी न…’’ शैली शरमा गई. ‘‘ऐक्चुअल मेरे नौकर की बेटी बीमार थी. उसी के इलाज के चक्कर में हौस्पिटलबाजी में लगा था,’’ उस ने बताया. ‘‘आप अपने नौकर की बेटी के लिए भी इतनी तकलीफ उठाते हैं?’’ शैली ने आश्चर्य से पूछा. ‘‘क्यों नहीं आखिर वह भी हमारे परिवार की सदस्य जैसी ही तो है.’’ ‘‘नाइस. आप के घर में और कौनकौन हैं?’’ ‘‘बस अपनी मां के साथ रहता हूं. पत्नी से तलाक हुए 3 साल हो चुके हैं. मे आई नो योर गुड नेम प्लीज?’’ कहते हुए उस ने परिचय के लिए हाथ बढ़ाया. शैली ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं यहां अकेली रहती हूं, अब तक शादी नहीं की है. मेरा नाम शैली है और आप का?’’ ‘‘माईसैल्फ रोहित. नाइस टू मीट यू.’’ इस के बाद काफी समय तक दोनों वाक करने के साथ ही बातें भी करते रहे. आधे घंटे की वाक पूरी करतेकरते दोनों के बीच अच्छीखासी दोस्ती हो गई. मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान भी हो गया. अब दोनों फोन पर भी एकदूसरे से कनैक्टेड रहने लगे.

धीरेधीरे दोनों की जानपहचान गहरी दोस्ती में बदल गई. दोनों को ही एकदूसरे का साथ बहुत पसंद आने लगा. दोनों फिटनैस फ्रीक होने के साथसाथ स्ट्रौंग मैंटल स्टेटस वाले लोग थे. दूसरों की परवाह न करना, अपने काम से काम रखना, रिश्तों को अहमियत देना और काम के साथसाथ स्टाइल में जीवन जीना. जीवन के प्रति दोनों की ही सोच एकजैसी थी. अब वे काफी समय साथ बिताने लगे थे. वक्त गुजरता जा रहा था. इधर उन दोनों की दोस्ती सोसाइटी में बहुत से लोगों को नागवार गुजर रही थी खासकर रोहित की पड़ोसिन माला बहुत अपसैट थी. उस की कभीकभार शैली से भी बातचीत हो जाती थी. उस दिन भी शैली घर लौट रही थी तो रास्ते में वह मिल गई. फौर्मल बातचीत के बाद माला शुरू हो गई, ‘‘यार मैं ने कितनी कोशिश की कि रोहित मुझ से पट जाए… उस के लिए क्याक्या नहीं किया. कभी उस की पसंद का खाना बना कर उस के घर ले गई तो कभी उस के लिए अपने बालों की स्मूथनिंग कराई. कभी उसे रिझाने के लिए एक से बेहतर एक कपड़े खरीदे तो कभी उस के पीछे अपना पूरा दिन बरबाद किया. ‘‘मगर उस ने कभी मेरी तरफ ढंग से देखा भी नहीं. देख जरा कितनी खूबसूरत हूं मैं. कालेज में सब मुझे मिस ब्यूटी कहते थे… एक बात और उस की तरह मैं भी राजपूत हूं.

उबलता हुआ खून है हम दोनों का, मगर देख न मेरा तो चक्कर ही नहीं चल सका. अब तू बता, तूने ऐसी कौन सी घुट्टी पिला दी उसे जो वह…’’ ‘‘जो वह? क्या मतलब है तुम्हारा?’’ ‘‘मतलब तुम दोनों के बीच इलूइलू की शुरुआत कैसे हुई?’’ ‘‘देखिए इलूविलू मैं नहीं जानती. मैं बस इतना जानती हूं कि वह मेरा दोस्त बन चुका है और हमेशा रहेगा. इस से ज्यादा न मैं जानती हूं न तुम से या किसी और से सुनना या बात करना चाहती हूं,’’ टका सा जवाब दे कर शैली अपने फ्लैट में घुस गई. शैली के जाते ही पड़ोस की रीमा आंटी माला के पास आ गई. माला गुस्से में बोली, ‘‘आंटी, तेवर तो देखो इस के. सोसाइटी में आए दिन ही कितने बीते हैं और इस चालाक लोमड़ी ने रोहित को अपने जाल में फंसा लिया.’’ ‘‘बहुत ऊंचा दांव खेला है इस लड़की ने. सोचा होगा कि इस उम्र में कुंआरे कहां मिलेंगे. चलो तलाकशुदा को ही पकड़ लिया जाए और तलाकशुदा जब रोहित जैसा हो तो कहने ही क्या.

धनदौलत की कमी नहीं. देखने में भी किसी हीरो से कम नहीं लगता. मैं ने तो अपनी नेहा के लिए इस से कितनी बार बात करनी चाही पर यह हमेशा ऐसा नादान बन जाता है जैसे कुछ समझ ही न रहा हो.’’ ‘‘नेहा कौन आंटी, आप की भतीजी?’’ ‘‘हां वही. जब भी मेरे घर आती है तो रोहित की ही बातें करती रहती है. रोहित के घर भी जाती है, उस की मां से भी अच्छी फ्रैंडशिप कर ली है, पर वह उसे भाव ही नहीं देता.’’ ‘‘आंटी नेहा तो अभी बच्ची है. आप उस के लिए कोई और लड़का देख लीजिए. मैं तो अपनी बात कर रही थी. बताओ मुझ में क्या कमी है?’’ माला ने पूछा. ‘‘सही कह रही है माला. मेरे लिए तो जैसे नेहा है वैसी ही तू है. मेरी नेहा न सही वह तुझ से ही शादी कर ले तो भी मैं खुश हो जाऊंगी. फूल सी बच्ची है तू भी पर आजकल तेरी शक्ल के 12 क्यों बजे रहते हैं? कई दिनों से ब्यूटीपार्लर नहीं गई क्या?’’

रीमा आंटी ने माला को गौर से देखते हुए कहा. ‘‘हां आंटी आप सच कह रही हो. कल ही पार्लर जा कर आती हूं. अपना लुक बिलकुल बदल डालूंगी, फिर देखूंगी रोहित कैसे मुझे छोड़ कर किसी और पर नजर भी डालता है?’’ ‘‘सही है. मैं भी अपनी नेहा के लिए लेटैस्ट फैशन के कुछ कपड़े और ज्वैलरी लाने जाने वाली हूं,’’ आंटी ने आंख मारते हुए कहा तो दोनों हंस पड़ीं. शैली और रोहित को साथ देख कर इन की तरह कुछ और लोगों के सीने पर भी सांप लोटने लगा था. शैली के पड़ोस में रहने वाली देवलीना आंटी को अपने बेटे के लिए शैली बहुत पसंद थी. जौब करने वाली, इतनी कौन्फिडैंट और खूबसूरत लड़की को ही वे अपनी बहू बनाना चाहती थीं. शैली दिखने में आकर्षक होने के साथसाथ कमाऊ लड़की भी थी, जबकि उन के इकलौते पीयूष का बिजनैस ठीक नहीं चल रहा था. जाहिर था कि अगर शैली उनके घर में आ जाती तो सबकुछ चमक जाता. इसी चक्कर में पिछले 2 महीनों से उन्होंने अपने बेटे के लुक पर मेहनत करनी शुरू कर दी थी.

उन के बेटे का पेट थोड़ा निकला हुआ था. वह ऐक्सरसाइज वगैरह से दूर भागता था, जबकि शैली को उन्होंने जिम जाते और मौर्निंग वौक करते देखा था. देवलीना आंटी ने बेटे को जिम भेजना शुरू कर दिया था ताकि वह भी आकर्षक नजर आए. इस बीच शैली और रोहित को साथ मौर्निंग वाक करते देख आंटी के मन में कंपीटीशन की भावना बढ़ने लगी. सुबह 7 बजे भी बेटे को सोता देख कर उन्होंने उस की चादर खींची और चिल्लाती हुई बोलीं, ‘‘रोहित जानबूझ कर शैली के साथ वौक करने लगा है ताकि उस के करीब आ सके और एक तू है…तू क्या कर रहा है? चादर तान कर सो रहा है? चल उठ और पता कर कि शैली जिम करने किस समय जाती है. कल से तुझे भी उसी समय जिम जाना होगा.’’ बेटे ने भुनभुनाते हुए चादर फिर से ओढ़ ली और बोला, ‘‘यार मम्मी मुझे नहीं जाना जिमविम.’’ ‘‘समय रहते चेत जा लड़के. ऐसी लड़की घर की बहू बन कर आ गई तो पैसों की कमी नहीं रहेगी. तेरा बिजनैस तो सही चलता नहीं है, कम से कम बहू तो कमाऊ ले आ. चल उठ मैं ने कोई बहाना नहीं सुनना.

खुद तो बात आगे बढ़ा नहीं पाता बस उसे देख कर दांत भर निकाल देता है. कभी यह कोशिश नहीं करता कि कैसे उसे अपने प्यार में पागल किया जाए.’’ ‘‘उफ मम्मी, प्यार जबरदस्ती नहीं किया जाता… जिस से होना होगा हो जाएगा.’’ ‘‘तो क्या बुढ़ापे में प्यार होगा और शादी भी बुढ़ापे में करेगा?’’ ‘‘मम्मी अरेंज्ड मैरिज कर लूंगा. डौंट वरी. मुझे सोने दो,’’ उनींदी आवाज में पीयूष ने कहा और करवट बदल कर सो गया. आंटी को गुस्सा आ गया. इस बार उन्होंने एक गिलास पानी उस के मुंह पर उड़ेल दिया और चिल्लाईं, ‘‘चल उठ और जिम हो कर आ. चल जा…’’ शैली को रोहित के साथ देख कर ऐसी हालत केवल देवलीना आंटी की ही नहीं थी बल्कि कुछ और लोग भी थे जो शैली को अपनी बहू या बीवी बनाने के सपने देख रहे थे. उन के दिल में भी रोहित को ले कर प्रतियोगिता की भावना घर करने लगी थी. सब अपनेअपने तरीके से इस प्रतियोगिता को जीतने की कोशिश में लग गए. निलय तो शैली के घर ही पहुंच गए. शैली का निलयजी से सिर्फ इतना ही परिचय था कि वे इसी सोसाइटी में रहते हैं और किसी कंपनी में मैनेजर हैं. उन्हें अपने घर देख कर शैली चकित थी. चाय वगैरह पूछने के बाद शैली ने आने की वजह पूछी तो निलय बड़े प्यार से शैली से कहने लगे, ‘‘बेटा, तू जिस कंपनी में है उस में मेरा दोस्त भी काम करता है.

उस ने तेरे बारे में एक बार बताया था. इतनी कम उम्र में तूने कंपनी में अपनी खास जगह बना ली है. मेरा बेटा विकास भी इसी फील्ड में है. ‘‘तभी मैं ने सोचा कि तुम दोनों की दोस्ती करा दूं. वैसे तो दोनों औफिस चले जाते हो इसलिए एकदूसरे से मिल नहीं पाते. मगर यह तुझे कभी भी आतेजाते देखता है तो तारीफ करता है. मेरी वाइफ भी तुझे पसंद करती और जानती है हम भी इलाहाबाद के वैश्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं. हम भी महाराजा अग्रसेन के वंशज हैं. तेरे घर के बुजुर्ग हमारे परिवार को जरूर जानते होंगे.’’ ‘‘जी अंकल हो सकता है. मुझे आप और विकास से मिल कर अच्छा लगा. कभी जरूरत पड़ी तो मैं विकास को जरूर याद करूंगी.’’ ‘‘अरे बेटा कभी जरूरत पड़ी की क्या बात है? हम एक ही जगह से हैं, तुम दोनों एक ही फील्ड के हो, एक ही जाति के हो… आपस में मिलते रहा करो. समझ रही है न बेटी? मेरा विकास तो बहुत शर्मीला है. तुझे ही बात करनी होगी. स्विमिंग पूल की बगल वाली बिल्डिंग के 5वें फ्लोर पर हम रहते हैं. मैं तो कहता हूं आज रात तू हमारे यहां खाने पर आ जा.’’ ‘‘जी अंकल बिलकुल मैं खयाल रखूंगी, मगर खाने पर नहीं आ पाऊंगी, क्योंकि मुझे आज औफिस में देर हो जाएगी. अच्छा अंकल मुझे अभी औफिस के लिए निकलना होगा.

आप बताइए चायकौफी कुछ बना दूं?’’ शैली ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा. ‘‘अरे नहीं बेटा. बस तुझ से ही मिलने आया था.’’ शैली की बिल्डिंग के सब से ऊपर फ्लोर पर रहने वाले अमितजी भी एक दिन लिफ्ट में मिल गए. वे शैली से पूछने लगे, ‘‘तुम इलाहाबाद की हो न?’’ ‘‘जी,’’ शैली ने जवाब दिया. ‘‘मेरा दोस्त भी उधर का ही है और वह भी बनिया ही है. उस के बेटे के फोटो दिखाता हूं… यह देख कितना स्मार्ट है. तुझे बहुत पसंद करता है,’’ अमितजी ने मौका देखते ही निशाना साधने की कोशिश की थी. ‘‘अरे यह तो सूरज है. मैं जब बास्केटबौल खेलने जाती हूं तो एक कोने में खड़े रह कर मुझे देखता रहता है. जिम जाती हूं तब भी नजर आता है और औफिस जाते समय भी…’’ शैली ने उसे पहचानते हुए कहा. ‘‘तू गौर करती न इस पर, असल में यह बस तुझे नजर भर कर देखने को ही तेरा पीछा करता है. दिल का बहुत अच्छा है बस बोल नहीं पाता.’’ ‘‘पर अंकल मैं तो इसे स्टौकर समझ कर पुलिस में देने वाली थी.’’ ‘‘अरे बेटा यह कैसी बात कर रही है? यह तो बस इस का प्यार है,’’ अमितजी ने समझने के अंदाज में कहा. ‘‘बहुत अजीब प्यार है अंकल. इसे कहिए थोड़ा ग्रूम करे,’’ कह कर हंसी छिपाती शैली वहां से निकल गई. इस तरह शैली और रोहित की दोस्ती ने सोसाइटी के बहुत सारे लोगों के दिलों में दर्द पैदा कर दिया था. शैली और रोहित इन लोगों के बारे में एकदूसरे को बता कर खूब हंसते. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन की दोस्ती इतने लोगों के दिलोदिमाग में खलबली मचा देगी.

दोनों एकदूसरे का साथ ऐंजौय करते. अब वे सोसाइटी के बाहर भी एकदूसरे से मिलने लगे थे. धीरेधीरे उन की दोस्ती प्यार में तबदील होने लगी. दोनों काबिल थे. एकदूसरे को पसंद करते थे. रोहित की मां को भी इस रिश्ते से कोई गुरेज नहीं था. 10 दिन बाद शैली का जन्मदिन था. रोहित ने तय किया था कि वह इस बार शैली को बर्थडे पर सरप्राइज देगा. इस के लिए उस ने एक रिजोर्ट बुक कराया. शानदार तरीके से उस का बर्थडे मनाया. रात 12 बजे केक काटा गया. उस रात रोहित ने प्यार से शैली से पूछा, ‘‘आज के दिन तुम मुझ से जो भी मांगोगी मैं उसे पूरा करूंगा. बताओ तुम्हें मुझ से क्या चाहिए?’’ ‘‘रियली?’’ ‘‘यस.’’ ‘‘तो फिर ठीक है. मुझे आज कुछ लोगों की आंखों का सपना छीन कर उसे अपना बनाना है.’’ ‘‘मतलब?’’ ‘‘मतलब जिन की आंखों में तुम्हें या मुझे ले कर सपने सजते रहते हैं उन्हें उन के सपनों से हमेशा के लिए दूर करना है. उन सपनों को अपनी आंखों में सजाया है यानी तुम्हें अपना बनाना है,’’ शैली ने एक अलग ही अंदाज में कहा और फिर मुसकरा उठी. रोहित को जैसे ही बात समझ में आई उस ने शैली को अपनी बांहों में भर लिया और उसी अंदाज में बोला, ‘‘तो ठीक है सपनों को नया अंजाम देते हैं… इस रिश्ते को प्यारा सा नाम देते हैं,’’ और फिर दोनों की आंखों में उमंग भरी एक नई जिंदगी की मस्ती घुल गई और दोनों एकदूसरे में खो गए. 1 महीने के अंदर शादी कर शैली रोहित की बन गई और इस के साथ ही बहुतों के सपने एक झटके में टूट गए.  Hindi Stories Love

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