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Romantic Story in Hindi : हम तुम कुछ और बनेंगे

Romantic Story in Hindi : बगल के कमरे से अब फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी. कुछ देर पहले तक उन की आवाजें लगभग स्पष्ट आ रही थीं. बात कुछ ऐसी भी नहीं थी. फिर दोनों इतने ठहाके क्योंकर लगा रहे? जाने क्या चल रहा है दोनों के बीच. वार्त्तालाप और ठहाकों का सामंजस्य उस की सोच के परे जा रहा था. उफ, तीर से चुभ रहे हैं, बिलकुल निशाना बैठा कर नश्तर चुभो रही है उन की हंसी. रमण का मन किया कि वह कोने वाले कमरे में चला जाए और दरवाजा बंद कर तेज संगीत चला दुनिया की सारी आवाजों से खुद को काट ले. परंतु एक कीड़ा था जो कुलबुला रहा था, काट रहा था, हृदय क्षतविक्षत कर भेद रहा था, पर कदमों में बेडि़यां भी उसी ने डाल रखी थीं. वह कीड़ा बारबार विवश कर रहा था कि वह ध्यान से सुने कि बगल के कमरे से क्या आवाजें आ रही हैं:

‘‘जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी,

खुशियों की कलियां झूमेंगी,

झूलेंगी, फूलेंगी,

जीवन की बगिया…’’ काजल इन पंक्तियों को गुनगुना रही थी.

‘रोहन को अब सीटियां बजाने की क्या जरूरत है इस पर? बेशर्म कहीं का,’ सोफे पर अधलेटे रमण ने सोचा. उस का सर्वांग सुलग रहा था. अब जाने उस ने क्या कहा जो काजल को इतनी हंसी आ रही है. रमण अनुमान लगाने की कोशिश कर ही रहा था कि रोहन के ठहाकों ने उस के सब्र के पैमाने को छलका ही दिया. रमण ने कुशन को गुस्से से पटका और सोफे से उठ खड़ा हुआ.

‘‘क्या हो रहा है ये सब? कितनी देर से तुम दोनों की खीखी सुन रहा हूं. आदमी अपने घर में भी कुछ पल चैनसुकून से नहीं रह सकता है,’’ रमण के गुस्से ने मानो खौलते दूध में नीबू निचोड़ दिया.

रोहन, सौरीसौरी बोलता हुआ उठ कर चला गया. पर काजल अभी भी कुछ गुनगुना रही थी. रोहन के जाने के बाद काजल का गुनगुनाना उस की रूह को मानो ठंडक पहुंचाने लगा. उस ने भरपूर नजरों से काजल को देखा. 7वां महीना लग गया है. इतनी खूबसूरत उस ने अपनी ब्याहता को पहले कभी नहीं देखा था. गालों पर एक हलकी सी ललाई और गोलाई प्रत्यक्ष परिलक्षित थी. रंगत निखर कर एक सुनहरी आभा से मानो आलोकित हो दिल को रूहानी सुकून पहुंचा रही थी. सदा की दुबलीपतली छरहरी काजल आज अंग भर जाने के पश्चात अपूर्व व्यक्तित्व की स्वामिनी लग रही थी.

कोई स्त्री गर्भावस्था में ही शायद सर्वाधिक रूपवती होती है. रोमरोम से छलकती मातृत्व से परिपूर्ण सुंदरता अतुलनीय है. रमण अपने दोनों चक्षुओं सहित सभी ज्ञानेंद्रियों से अपनी ही बीवी के इस अद्भुत नवरूप का रसास्वादन कर ही रहा था कि रोहन फिर आ गया और रमण हकीकत की विकृत सचाई से आंखें चुराता हुआ झट कमरे से निकल गया.

रोहन के हाथ में विभिन्न फलों को काट कर बनाया गया फ्रूट सलाद था.

इस बार रमण सच में कोने वाले कमरे में चला गया और तेज संगीत बजा वहीं पलंग पर लेट गया. म्यूजिक भले ही कानफोड़ू हो गया, परंतु उस कमरे से आती फुसफुसाहट को रोकने में अभी भी असमर्थ ही था. रोहन की 1-1 सीटी इस संगीत को मध्यम किए जा रही थी, साथ ही साथ बीचबीच में काजल की दबीदबी खिलखिलाहट भी. ऐसा लग रहा था कि दोनों कर्ण मार्ग से प्रवेश कर उस के मानस को क्षतविक्षत कर के ही दम लेंगे.

इसी बीच स्मृति कपाट पर विगत की दस्तक शुरू हो गई. इस नवआगंतुक ने मानो उस की सुधबुध को ही हर लिया. बगल के कमरे की फुसफुसाहट, तेज संगीत और अब स्मृतियों की थाप. इस स्वर मिश्रण ने उसे आभास दिला दिया कि शायद जहन्नुम यही है.

सच इन दिनों उसे आभास होने लगा है कि वह मानो जहन्नुम की अग्नि में झुलस रहा हो. जिस उत्कंठा से उस ने इस खुशी को पाने की तमन्ना की थी, वह इस अग्नि कुंड से हो कर निकलेगी, यह उस के लिए कल्पनातीत थी.

‘कुछ महीने पहले तक सब कितना मधुर था,’ रमण ने सोचा, ‘पर कैसे कहा जाए कि मधुर था तब तो कुछ और ही शूल चुभ रहे थे,’ चेतना की बखिया उधड़ने लगीं.

विवाह के 10 वर्ष होने को थे. शुरू के वर्षों में नौकरी, कैरियर, पदोन्नति और घर की जिम्मेदारियों के चलते रमण और काजल परिवार बढ़ाने की अपनी योजना को टालते रहे. आदर्श जोड़ी रही है दोनों की. कितना दबाव था सब का कि उन के बच्चे होने चाहिए. काजल के मातापिता, रमण के मातापिता, नातेरिश्तेदार यहां तक कि दोस्त भी टोकने लगे थे. रमण के सासससुर उस की शादी की 7वीं वर्षगांठ परआए थे.

‘‘तुम लोगों ने बड़ा ही अच्छा आयोजन किया अपनी 7वीं वर्षगांठ पर. इस से पहले तो तुम लोग वर्षगांठ मनाने के ही विरुद्ध होते थे. बहुत खुशी हो रही है.’’

रमण के ससुरजी ने ऐसा कहा तो काजल झट से बोल पड़ी, ‘‘हां पापा, इस बार बात ही कुछ ऐसी थी. मेरे देवर ने अपनी पढ़ाई बहुत हद तक पूरी कर ली है. अपने आगे की पढ़ाई का खर्च अब वह खुद वहन कर सकता है. मेरा देवर डाक्टर बन गया, हमारी तपस्या सफल हुई. वर्षगांठ तो बस एक बहाना है अपनी खुशियों को सैलिब्रेट करने का.’’

‘‘बहनजी, अब आप ही रमण और काजल को समझाएं कि ये जल्दी से हमें खुशखबरी सुनाएं. मेरी तो आंखें तरस गई हैं कि कोई शिशु मेरे आंगन में खेले. ऐसा न हो कि कहीं देर हो जाए,’’ रमण की मां ने अपनी समधिन से कहा.

‘‘हां बहनजी, आप सही कह रही हैं. हर चीज का एक वक्त होता है, जो सही वक्त पर पूरी हो जानी चाहिए. हम भी तो बूढ़े हो चले हैं,’’ रमण की सास ने कहा.

कुछ ही महीनों में काजल को यह भान होने लगा कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है. फिर शुरू हुआ जांचरिपोर्ट का अंतहीन सिलसिला. जब तक चाह नहीं थी तब तक इतनी बेसब्री और संवेदनाएं भी जाग्रत नहीं थीं. अब जब असफलता और अनचाहे परिणाम मिलने लगे तो दोनों की बच्चे के प्रति उत्कंठा भी उतनी ही तीव्र हो गई. घर के बुजुर्गों की आशंकाएं मूर्त हो रही थीं. रमण की प्रजनन क्षमता ही संदेह के दायरे में आ गई थी. किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि हर तरह से स्वस्थ दिखने वाले और स्वस्थ जीवनशैली जीने वाले रमण को यह समस्या होगी.

‘‘अब जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है, तो हर चीज का समाधान है. हम किसी अच्छे क्लिनिक या अस्पताल से बात करने की सोच रहे हैं, जहां से शुक्राणु ले कर मेरे गर्भ में निषेचित किया जाएगा,’’ पूरे परिवार के सामने काजल ने रमण के हाथ को थामे हुए रहस्योद्घाटन किया.

‘‘आप कहीं और जाने की क्यों सोच रहे हैं? मेरे ही हौस्पिटल में कृत्रिम शुक्राणु निषेचन का अच्छा डिपार्टमैंट है. मैं संबंधित डाक्टर से बात कर लूंगा. सब अच्छी तरह निष्पादित हो जाएगा,’’ रोहन ने कहा.

फिर तो दोनों के मातापिता सिर जोड़े इस समस्या के निदान में जुट गए. वहीं काजल और रमण ने बालकनी से नीचे पार्क में खेलते छोटे बच्चों को देख ख्वाबों का एक लिहाफ बुन लिया.

उन दिनों काजल उस का हाथ मानो एक क्षण को भी नहीं छोड़ती थी. रमण को उस ने यह एहसास ही नहीं होने दिया कि कमी उस में है. दोनों ने इस आती रुकावट को पार करने हेतु जमीनआसमान एक कर दिया. दोनों दो शरीर एक जान हो गए थे.

‘‘लेकिन…पर…’’ अपनी सास की बनतीबिगड़ती माथे की लकीरों को काजल भांप रही थी.

‘‘उस तरीके से जन्मा बच्चा क्या पूरी तरह स्वस्थ होगा?’’ रमण के पिताजी ने पूछा था.

‘‘फिर जाने किस कुल या गोत्र का होगा वह?’’ रमण की सास ने बुझी वाणी में कहा.

‘‘देर तक एक लंबी चुप्पी छाई रही. जब चुप्पी के नुकीले नख रक्तवाहिनियों से खून टपकाने की हद तक पहुंच गए तो रमण ने ही चुप्पी तोड़ी, हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है. हम चाहते तो किसी को कुछ नहीं बताते पर आप सब को जानने का हक है.’’

‘‘एक रास्ता है. यदि घर का ही कोई स्वस्थ पुरुष अपने शुक्राणु दान करे इस हेतु तो वह अनजाना कुलपरिवार की भांति नहीं रहेगा,’’ काजल के पिताजी ने कहा.

‘‘आप सब निश्चिंत रहें, बहुत लोग इस विधि से बच्चे प्राप्त कर रहे हैं. हर नए आविष्कार को संशय और अविश्वास की दृष्टि से देखा ही जाता है. मैं खुद ध्यान रखूंगा कि सब अच्छे से संपन्न हो,’’ रोहन के इस आश्वासन ने उन्हें फौरी तौर पर थोड़ी राहत दे दी.

आखिर वर्षों बाद वह दिन आया जब काजल के गर्भवती होने की डाक्टर ने पुष्टि की. काजल ने अपनी नौकरी से अनिश्चितकालीन छुट्टी ले ली. एक बच्चे की आहट से परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गई. आंगन में घुटनों के बल चलते शिशु की कल्पना से ओतप्रोत हरेक सदस्य अपनी तरह से खुशियां जाहिर कर रहा था. अचानक घर में काजल सब से महत्त्वपूर्ण हो गई. आखिर क्यों न होती? आती खुशियों को तो उसी ने अपने में सहेज रखा था.

रमण देखता उस की प्रिया उस से ज्यादा उस के मातापिता के साथ वक्त गुजार रही है. आजकल उस के सासससुर भी जल्दीजल्दी आते. रमण भी एक विजयी भाव से हर जाते पल को महसूस कर रहा था. पापापापा सुनने को बेचैन उस के दिल को कुछ ही दिनों में सुकून जो मिलने वाला था.

सब ठीक चल रहा था. डाक्टर हर चैकअप के बाद संतुष्टि जाहिर करते. माह दर माह बीत रहे थे. इस दौरान रमण महसूस कर रहा था कि आजकल रोहन भी कुछ ज्यादा ही जल्दीजल्दी आने लगा है. जल्दी आना तो तब भी चलता, आखिर उस का भी घर है, ऊपर से डाक्टर. सब को उस की जरूरत रहती. कभी मां को, कभी पिताजी को. बूढ़े जो हो चले थे. पर देखता जब रोहन आता, वह काजल की कुछ अधिक ही देखभाल करता. यह बात रमण को अब चुभने लगी थी. शक का बुलबुला उस के मानस में आकार पाने लगा था कि कहीं यह वीर्यदान रोहन ने तो नहीं किया है?

हालांकि उस के पास इस बात का कोई सुबूत नहीं था पर जब कमी खुद में होती है तो शायद ऐसे विचार उठने स्वाभाविक हैं.

रोहन को देखते ही उसे अपनी कमी और बड़ेबड़े स्पष्ट अक्षरों में परिलक्षित होने लगती. रोहन का काजल के साथ वक्त गुजारना उसे बड़ा ही नागवार गुजरता. धीरेधीरे उसे महसूस हो रहा था कि जब तक वह कुछ करने की सोचता है काजल के लिए, रोहन तब तक वह कर गुजरता है. रोहन सहित घर के सभी सदस्य जब आपस में हंसीमजाक कर रहे होते, रमण कोई न कोई बहाना बना वहां से खिसक लेता. धीरेधीरे रमण अपने पलकपांवड़े समेटने लगा जो बिछा रखे थे नव अंकुरण के लिए. एक अजीब सी विरक्ति हो चली उसे जिंदगी से. रमण खुद को बिलकुल अनचाहा सा महसूस कर रहा था. काजल बुलाती रह जाती. वह उस के पास नहीं जाता.

रोहन और काजल की घनिष्ठता उसे बेहद नागवार गुजर रही थी. रमण सोचता, ‘यदि बच्चे का पिता रोहन ही है तो मैं क्यों दालभात में मूसलचंद बनूं?’

इस सोच ने उस की दुनिया पलट दी थी. वह अपना ज्यादा वक्त दफ्तर में गुजारता. कभीकभी तो टूअर का बहाना कर कईकई दिनों तक घर भी नहीं आता था. गर्भावस्था के आखिर के दिन बड़े ही तकलीफदेह थे. काजल को बैठानाउठाना सब रोहन करता. रिश्ते बेहद उलझ गए थे. सिरा अदृश्य था और उलझनों का मकड़जाल पूरे शबाब पर. रमण को याद आता, जब उस की शादी हुई थी तब रोहन छोटा ही था. काजल को भाभी मां कहता था. काजल कितनी फिक्रमंद रहती थी उस की पढ़ाई के लिए.

‘छि: सब गडमड हो गया… इस से अच्छा बेऔलाद रहता.’ बेसिरपैर के खयालात रमण के सहभागी बन उस की मतिभ्रष्ट किए जा रहे थे. तभी रोहन की आवाज आई, ‘‘भैया जल्दी आइए भाभी की तबीयत खराब हो रही है. हौस्पिटल ले जाना होगा तुरंत.’’

‘‘तुम ले जाओ… मैं भला जा कर क्या करूंगा. कोई डाक्टर तो हूं नहीं. मुझे आज ही 15 दिनों के लिए हैदराबाद जाना है,’’ रमण ने उचटती हुई आवाज में कहा.

काजल को लग रहा था कि रमण की यह उदासीनता उस के अपराधभाव के कारण है कि वह होने वाले बच्चे का जैविक पिता नहीं है. डाक्टर ने पहले ही काजल को सचेत कर दिया था कि बहुत से पिता इस तरह का व्यवहार करते हैं और नकारात्मक रवैया अपनाते हैं. उस ने जानबूझ कर बखेड़ा नहीं खड़ा किया.

करीब 10 दिनों के बाद काजल भरी गोद वापस आई. इस बीच रमण एक बार भी हौस्पिटल नहीं गया. 15वें दिन वापस आया था.

मां से उसे पता चला. पहले दिन तो बच्चे को छुआ भी नहीं. काजल से बेहतर उस के मनोभावों को कौन समझता पर उस ने भी शायद अब वही रुख इख्तियार कर लिया था जो रमण ने. उस दिन उसी कोने वाले कमरे में तेज संगीत को चीरती एक मधुर सी रुनझुन संगीतमय लहरी रमण को बेचैन किए जा रही थी.

‘हां, यह तो बच्चे की आवाज है,’ रमण ने कानफोड़ू म्यूजिक औफ किया और ध्यानमग्न हो शिशु की स्वरलहरियों को सुनने लगा. जाने लड़का है या लड़की? उफ कोई चुप क्यों नहीं करा रहा. मन उद्वेलित होने लगा. एक क्षण को चुप्पी छाई फिर रुदन…

रमण कमरे में चहलकदमी करने लगा. अब तो लग रहा था जैसे बच्चे का कंठ सूख रहा हो. इस आरोहअवरोह ने शीत शिला को धीमी आंच पर पिघलाना आरंभ कर दिया. मां भी न जाने क्यों उन्हें छोड़ कर चली गईं. अभी कुछ दिन तो रहना चाहिए था.

इसी बीच उस का मोबाइल बजने लगा. जाने कौन है. नया नंबर है… सोचते उस ने कान से लगाया.

‘‘भैया, मैं रोहन बोल रहा हूं, प्लीज, फोन मत काटिएगा. मैं आज सुबह ही सिडनी, आस्ट्रेलिया आ गया हूं. यहां के एक अस्पताल में मुझे काम मिल गया है. साथ ही मैं कुछ कोर्स भी करूंगा. आप और भाभी मां ने जीवन में मेरे लिए बहुत कुछ किया है. भैया, पिछले कुछ महीनों में भाभी मां बेहद मानसिक संत्रास से गुजरी हैं. आप की बेरुखी उन्हें जीने नहीं दे रही. छोटा मुंह बड़ी बात हो जाएगी पर मैं कहना चाहूंगा कि आप ने भाभी मां को उस वक्त छोड़ दिया जब उन को सर्वाधिक आप की जरूरत थी,’’ इतना कह रोहन फूटफूट कर रोने लगा. एक लंबी सी चुप्पी पसरी रही कुछ क्षण रिसीवर के दोनों तरफ…

‘‘कितना बड़ा और समझदार हो गया है रोहन. मैं ने ही खुद को अदृश्य उलझनों और विकारों में कैद कर लिया था.’’

रमण शायद कुछ और भी कहता कि तभी रोहन बोल पड़ा, ‘‘भैया बच्चे क्यों रो रहे हैं? मुझे उन के रोने की आवाजें आ रही हैं.’’

‘‘बच्चे क्या जुड़वा हैं?’’ रमण उछल पड़ा और दौड़ पड़ा उन की तरफ. 2 नर्मनर्म गुलाबी रुई के फाहे हाथपैर फेंकते समवेत स्वर में आसमान सिर पर उठाए थे.

‘‘धन्यवाद रोहन, धन्यवाद भाई. घर जल्दीजल्दी आते रहना,’’ कह उस ने यह सोचते हुए बच्चों को छाती से लगा लिया कि क्या फर्क पड़ता है कि बच्चे रोहन के स्पर्म से पैदा हुए हैं या किसी और के. अब ये बच्चे उस के हैं. वही उन का पिता है. रोहन के होते तो शायद वह उन्हें छोड़ कर नहीं जाता. यह तसल्ली कम नही है. Romantic Story in Hindi 

Social Story : यह कैसा प्यार – युवा पीढ़ी आत्महत्या करने के लिए क्यों हो रही है प्रेरित ?

Social Story : ‘‘अब आप का बेटा खतरे से बाहर है,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘4-5 घंटे और आब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे वार्ड में शिफ्ट कर देंगे. हां, ये कुछ दवाइयां हैं… एक्स्ट्रा आ गई हैं…इन्हें आप वापस कर सकते हैं.’’

24 घंटे के बाद डाक्टर की यह बात सुन कर मन को राहत सी मिली, वरना आई.सी.यू. के सामने चहलकदमी करते हुए किसी अनहोनी की आशंका से मैं और पत्नी दोनों ही परेशान थे. मैं ने दवाइयां उठाईं और अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर में उन्हें वापस करने के लिए चल पड़ा.

दवाइयां वापस कर मैं जैसे ही मेडिकल स्टोर से बाहर निकला, एक अपरिचित सज्जन अपने एक साथी के साथ मिल गए और मुझे देखते ही बोले, ‘‘अब आप के बेटे की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब ठीक है, खतरे से बाहर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘चलिए, यह तो बहुत अच्छी खबर है, वरना कल आप लोगों की परेशानी देखते नहीं बन रही थी. जवान बेटे की ऐसी दशा तो किसी दुश्मन की भी न हो.’’

यह सुन कर उन के दोस्त बोले, ‘‘क्या हुआ था बेटे को?’’

मैं ने इस विषय को टालने के लिए उस अपरिचित से ही प्रश्न कर दिया, ‘‘आप का यहां कौन भरती है?’’

‘‘बेटी है, आज सुबह ही उसे बेटा पैदा हुआ है.’’

‘‘बधाई हो,’’ कह कर मैं चल पड़ा.

अभी मैं कुछ ही कदम आगे चला था कि देखा मेडिकल स्टोर वाले ने मुझे 400 रुपए अधिक दे दिए हैं. उस ने शायद जल्दी में 500 के नोट को 100 का नोट समझ लिया था.

मैं उस के रुपए वापस लौटाने के लिए मुड़ा और पुन: मेडिकल स्टोर पर आ गया. वहां वे दोनों मेरी मौजूदगी से अनजान मेरे बेटे के बारे में बातें कर रहे थे.

‘‘क्या हुआ था उन के बेटे को?’’

‘‘अरे, नींद की गोलियां खा ली थीं. कुछ प्यारव्यार का चक्कर था. कल बिलकुल मरणासन्न हालत में उसे अस्पताल लाया गया था.’’

‘‘भैया, इस में तो मांबाप की गलती रहती है. नए जमाने के बच्चे हैं…जहां कहें शादी कर दो, अब मैं ने तो अपने सभी बच्चों की उन की इच्छा के अनुसार शादियां कर दीं. जिद करता तो इन्हीं की तरह भुगतता.’’

शायद उन की चर्चा कुछ और देर तक चलती पर उन दोनों में से किसी एक को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया और वे चुप हो गए. मैं ने भी ज्यादा मिले पैसे मेडिकल स्टोर वाले को लौटाए और वहां से चल पड़ा पर मन अजीब सा कसैला हो गया. संतान के पीछे मांबाप को जो न सुनना पडे़ कम है. ये लोग मांबाप की गलती बता रहे हैं, हमें रूढि़वादी बता रहे हैं, पर इन्हें क्या पता कि मैं ने खुद अंतर्जातीय विवाह किया था.

मेरी पत्नी बंगाली है और मैं हिंदू कायस्थ. समाज और नातेरिश्तेदारों ने घोर विरोध किया तो रजिस्ट्रार आफिस में शादी कर के कुछ दिन घर वालों से अलग रहना पड़ा, फिर सबकुछ सामान्य हो गया. बच्चों से भी मैं ने हमेशा यही कहा कि तुम जहां कहोगे वहां मैं तुम्हारी शादी कर दूंगा, फिर भी मुझे रूढि़वादी पिता की संज्ञा दी जा रही है.

मेरा बेटा प्यार में असफल हो कर नींद की गोलियां खा कर आत्म- हत्या करने जा रहा था. आज के बच्चे यह कदम उठाते हुए न तो आगा- पीछा सोचते हैं और न मातापिता का ही उन्हें खयाल रहता है. हर काम में जल्दबाजी, प्यार करने में जल्दबाजी, प्यार में असफल होने पर जान देने की जल्दबाजी.

हमारे कुलदीपक ने 3 बार प्यार किया और हर बार इतनी गंभीरता से कि असफल होने पर तीनों ही बार जान देने की कोशिश की. पहला प्यार इसे तब हुआ था जब यह 11वीं में पढ़ता था. हुआ यों कि इस के गणित के अध्यापक की पत्नी की मृत्यु हो गई. तब उस अध्यापक ने प्रिंसिपल से अनुरोध कर के अपनी बेटी का सुरक्षा की दृष्टि से उसी कालिज में एडमिशन करवा लिया जिस में वह पढ़ाते थे, ताकि बेटी आंखों के सामने बनी रहे.

वह कालिज लड़कों का था. अकेली लड़की होने के नाते वह कालिज में पढ़ने वाले सभी लड़कों का केंद्रबिंदु थी, पर मेरा बेटा उस में कुछ अधिक ही दिलचस्पी लेने लगा.

वह लड़की मेरे बेटे पर आकर्षित थी कि नहीं यह तो वही जाने, पर मेरा बेटा अपने दिल का हाल लिखलिख कर उसे देने लगा और उसी में एक दिन वह पकड़ा भी गया. बात लड़की के पिता तक पहुंची…फिर प्रिंसिपल तक. मुझे बुलाया गया. सोचिए, कैसी शर्मनाक स्थिति रही होगी.

प्रिंसिपल ने चेतावनी देते हुए मुझ से कहा, ‘आप का बेटा पढ़ाई में अच्छा है और मैं नहीं चाहता कि एक होनहार छात्र का भविष्य बरबाद हो, अत: इसे समझा दीजिए कि भविष्य में ऐसी गलती न करे.’

घर आ कर मैं ने बेटे को डांटते हुए कहा, ‘मैं ने तुम्हें कालिज में पढ़ने  के लिए भेजा था कि प्यार करने के लिए? आज तुम ने अपनी हरकतों से मेरा सिर नीचा कर दिया.’

‘प्यार करने से किसी का सिर नीचा नहीं होता,’ बेटे का जवाब था, ‘मैं उस के साथ हर हाल में खुश रह लूंगा और जरूरत पड़ी तो उस के लिए समाज, आप लोगों को, यहां तक कि अपने जीवन का भी त्याग कर सकता हूं.’

मैं ने कहा, ‘बेटा, माना कि तुम उस के लिए सबकुछ कर सकते हो, पर क्या लड़की भी तुम से प्यार करती है?’

‘हां, करती है,’ बेटे का जवाब था.

मैं ने कहा, ‘ठीक है. चलो, उस के घर चलते हैं. अगर वह भी तुम से प्यार करती होगी तो मैं उस के पिता को मना कर तुम दोनों की मंगनी कर दूंगा, पर शर्त यह रहेगी कि तुम दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करोगे तभी शादी होगी.’

बेटे की इच्छा रखने के लिए मैं लड़की के घर गया और उस के पिता को समझाने की कोशिश की तो वह बडे़ असहाय से दिखे, पर मान गए कि  अगर बच्चों की यही इच्छा है तो आप जैसा कहते हैं कर लेंगे.

लेकिन जब उन की बेटी को बुला कर यही बात पूछी गई तो वह क्रोध में तमतमा उठी, ‘किस ने कहा कि मैं इस से प्यार करती हूं… अपनी कल्पना से कैसे इस ने यह सोच लिया. आप लोग कृपा कर के मेरे घर से चले जाइए, वैसे ही व्यर्थ में मेरी काफी बदनामी हो चुकी है.’

मैं अपमानित हो कर बेटे को साथ ले कर वहां से चला आया और घर आते ही गुस्से में मैं ने उसे कस कर एक थप्पड़ मारा और बोला, ‘ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही भला है.’

रात के करीब 12 बजे होंगे, जब बेटे ने जा कर अपनी मां को जगाया और बोला, ‘मां, मैं मरना नहीं चाहता हूं. मुझे बचा लो.’

उस की मां ने नींद से जग कर देखा तो बेटे ने अपने हाथ की नस काटी हुई थी और उस से तेजी से खून बह रहा था. पत्नी ने रोतेरोते मुझे जगाया. हम लोग तुरंत उसे ले कर नर्सिंग होम गए. वहां पता चला कि हाथ की नस कटी नहीं थी. खैर, मरहम पट्टी कर के उसे घर भेज दिया गया.

पत्नी का सारा गुस्सा मुझ पर फूट पड़ा, ‘जवान बेटे को ऐसे मारते हैं क्या? आज उसे सही में कुछ हो जाता तो हम लोग क्या करते?’

खैर, अब हम दोनों बेटे के साथ साए की तरह बने रहते. मनोचिकित्सक को भी दिखाया. किसी तरह उस ने परीक्षा दी और 12वीं में 62 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. अब समय आया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग का. प्यार का भूत सिर पर से उतर चुका था. बेटा सामान्य हो गया था. पढ़ाई में मन लगा रहा था. हम लोग भी खुश थे कि इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षाओं के पेपर ठीकठाक हो गए थे. तभी मेरे सुपुत्र दूसरा प्यार कर बैठे. हुआ यों कि पड़ोस में एक पुलिस के सब- इंस्पेक्टर ट्रांसफर हो कर किराएदार के रूप में रहने को आ गए. उन की 10वीं में पढ़ने वाली बेटी से कब मेरे बेटे के नयन मिल गए हमें पता नहीं चला.

कुल 3 हफ्ते के प्यार में बात यहां तक बढ़ गई कि एक दिन दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया, क्योंकि लड़की को देखने के लिए दूसरे दिन कुछ लोग आने वाले थे, पर उन का भागने का प्लान असफल रहा और वे पकड़े गए. लड़की के पिता ने बेटी की तो लानत- मलामत की ही दोचार पुलिसिया हाथ मेरे कुलदीपक को भी जड़ दिए और पकड़ कर मेरे पास ले आए.

‘समझा लीजिए अपने बेटे को. अगर अब यह मेरे घर के आसपास भी दिखा तो समझ लीजिए…बिना जुर्म के ही इसे ऐसा अंदर करूंगा कि इस की जिंदगी चौपट हो कर रह जाएगी.’

मैं कुछ बोला तो नहीं पर उसे बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा. वह भी चुपचाप नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया.

रात को बेटी और दामाद अचानक आ गए. उन लोगों ने हमें सरप्राइज देने के लिए कोई सूचना न दी थी. थोड़ी देर तक इधरउधर की बातों के बाद मेरी बेटी बोली, ‘पापा, राहुल कहां है…सो गया क्या?’

राहुल की मां बोली, ‘शायद, अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा होगा. जा कर बुला लाती हूं.’

‘रहने दो मां, मैं ही जा रही हूं उसे बुलाने,’ बेटी ने कहा.

ऊपर जा कर जब उस ने उस के कमरे का दरवाजा धकेला तो वह खुल गया और राहुल अचकचा कर बोला, ‘दीदी, तुम कैसे अंदर आ गईं, सिटकनी तो बंद थी.’

बेटी ने बिना कुछ बोले राहुल के गाल पर कस कर चांटा मारा और राहुल को स्टूल से नीचे उतार कर रोने लगी. दरअसल, राहुल कमरा बंद कर पंखे से लटक कर अपनी जान देने जा रहा था.

‘मुझे मर जाने दो, दीदी. मेरी वजह से पापा को बारबार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

‘तुम्हारे मरने से क्या उन का सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. अरे, अपना व्यवहार बदलो और जीवन में कुछ बन कर दिखाओ ताकि उन का सिर वास्तव में गर्व से ऊंचा हो सके.’

प्रवेश परीक्षाएं अच्छी हुई थीं.

इंजीनियरिंग कालिज में राहुल को प्रवेश मिल गया क्योंकि अच्छे नंबरों से उस ने परीक्षाएं पास की थीं. मित्रमंडली का समूह, जिन में लड़केलड़कियां सभी थे, अच्छा था. हम लोग निश्चिंत हो चले थे. वह खुद भी जबतब अपने प्रेमप्रसंगों की खिल्ली उड़ाता था.

इंजीनियरिंग का तीसरा वर्ष शुरू होते ही उस मित्रमंडली में से एक लड़की से राहुल की अधिक मित्रता हो गई. वे दोनों अब अकसर ग्रुप के बाहर अकेले भी देखे जाते. मैं एकआध बार इन की पढ़ाई को ले कर सशंकित भी हुआ, पर लड़की बहुत प्यारी थी. वह हमेशा पढ़ाई और कैरियर की ही बात करती, साथ ही साथ मेरे बेटे को भी प्रोत्साहित करती और जबतब वे दोनों विदेश साथ जाने की बात करते थे.

विदेश जाने के लिए दोनों ने साथ मेहनत की, साथ परीक्षा दी, पर लड़की क्वालीफाई कर गई और राहुल नहीं कर सका. लड़की को 3 साल की पढ़ाई के लिए विदेश जाने की खबर से राहुल बहुत टूट गया. हालांकि लड़की ने उसे बहुत समझाया कि कोई बात नहीं, अगली बार क्वालीफाई कर लेना.

धीरेधीरे लड़की के विदेश जाने का समय नजदीक आने लगा और राहुल को उसे खोने का भय सताने लगा. वह बारबार उस से विवाह की जिद करने लगा. लड़की ने कहा, ‘देखो, राहुल, हम लोगों में बात हुई थी कि शादी हम पढ़ाई के बाद करेंगे, तो इस प्रकार हड़बड़ा कर शादी करने से क्या फायदा? 3 साल बीतते समय थोड़ी न लगेगा.’

राहुल जब उसे न समझा सका तो हम लोगों से कहने लगा कि विधि के पापा से बोलिए न. शादी नहीं तो उस के जाने के पहले मंगनी ही कर दें.

बच्चों के पीछे तो मातापिता को सबकुछ करना पड़ता है. मैं विधि के घर गया और उस के मातापिता से बात की तो वे बोले, ‘हम लोग तो खुद यही चाहते हैं.’

यह सुन कर विधि बोली, ‘पर मैं तो नहीं चाहती हूं…क्यों आप लोग मंगेतर या पत्नी का ठप्पा लगा कर मुझे भेजना चाहते हैं या आप लोगों को और राहुल को मुझ पर विश्वास नहीं है? और अगर ऐसा है तो मैं कहती हूं कि यह संबंध अभी ही खत्म हो जाने चाहिए, क्योंकि वास्तव में 3 साल की अवधि बहुत होती है. उस के बाद घटनाक्रम किस प्रकार बदले कोई कह नहीं सकता. क्या पता मेरी विदेश में नौकरी ही लग जाए और मैं वापस आ ही न सकूं. इसलिए मैं सब बंधनों से मुक्त रहना चाहती हूं.’

मैं और पत्नी अपना सा मुंह ले कर लौट आए. भारी मन से सारी बातें राहुल को बताईं…साथ में यह भी कहा कि वह ठीक कहती है. तुम लोगों का प्यार सच्चा होगा तो तुम लोग जरूर मिलोगे.

‘मैं सब समझ रहा हूं,’ राहुल बोला, ‘जब से उस के विदेश जाने की खबर आई है वह मुझे अपने से कमतर समझने लगी है. जाने दो, मैं कोई उस के पीछे मरा जाता हूं. बहुत लड़कियां मिलेंगी मुझे.’

परसों रात को विधि का प्लेन गया और परसों ही रात को राहुल ने नींद की गोलियां खा लीं. मैं और राहुल की मां एक शादी में गए हुए थे. कल शाम को लौट कर आए तो बेटे की यह हालत देखी. तुरंत अस्पताल ले कर आए. तभी कानों में शब्द सुनाई पड़े, ‘‘पापा, चाय पी लीजिए.’’

सामने देखा तो बेटी चाय का कप लिए खड़ी थी. मैं ने उस के हाथों से कप ले लिया.

बेटी बोली, ‘‘पापा, क्या सोच रहे हैं. राहुल अब ठीक है. इतना सोचेंगे तो खुद बीमार पड़ जाएंगे.’’

मैं ने चाय की चुस्की ली तो विचारों ने फिर पलटा खाया. यह कोई सिर्फ मेरे बेटे की ही बात नहीं है. आज की युवा पीढ़ी हो ही ऐसी गई है. हर कुछ जल्दी पाने की ललक और न पाने पर हताशा. समाचारपत्र उठा कर देखो तो ऐसी ही खबरों से पटा रहता है. प्यार शब्द भी इन लोगों के लिए एक मजाक बन कर रह गया है. अभी हमारे एक हिंदू परिचित हैं. उन की बेटी ने मुसलमान से शादी कर ली. दोनों ही पक्षों में काफी विरोध हुआ. अंतर्जातीय विवाह तो फिर भी पचने लगे हैं पर अंतर्धर्मीय नहीं. मैं ने अपने परिचित को समझाया.

‘जब बच्चों ने विवाह कर ही लिया है तब आप क्यों फालतू में सोचसोच कर हलकान हो रहे हैं. खुशीखुशी आशीर्वाद दे दीजिए.’

एक साल में उन के यहां बेटा भी पैदा हो गया. पर नाम को ले कर दोनों पतिपत्नी में जो तकरार शुरू हुई तो तलाक पर आ कर खत्म हुई. बात सिर्फ इतनी थी कि पिता बेटे का नाम अमन रखना चाहता था और मां शांतनु. दोनों के मातापिता ने समझाया…दोनों शब्दों का अर्थ एक होता है, चाहे जो नाम रखो, पर वे लोग न समझ पाए और आजकल बच्चा किस के पास रहे इस को ले कर दोनों के बीच मुकदमा चल रहा है.

‘‘नानू, नानू, यह आयुषी है,’’ मेरा 6 वर्षीय नाती एक प्यारी सी गोलमटोल लड़की से मेरा परिचय कराते हुए कहता है.

मैं अपने विचारों की दुनिया से बाहर आ कर थोड़ा सहज हो कर पूछता हूं, ‘‘आप की फ्रैंड है?’’

‘‘नो नानू, गर्लफ्रैंड,’’ मेरा नाती कहता है.

मैं कहना चाहता हूं कि गर्लफ्रैंड के माने जानते हो? पर देखता हूं कि गर्लफ्रैंड कह कर परिचय देने पर उस बच्ची के गाल आरक्त हो उठे हैं और मैं खुद ही इस भूलभुलैया में फंस कर चुप रह जाता हूं. Social Story

Family Story : बंधन कच्चे धागों का

Family Story : पूजा अकसर अपनी सहेलियों व दोस्तों से कहा करती थी कि मैं सारी उम्र जगजीत सिंह की गजलों, गुलजार सिंह की गजलों और गुलजार की फिल्मों के सहारे बिताऊंगी. ये दोनों कमरे में हों तो कोई अकेला नहीं हो सकता.

संजय वर्मा को पूजा की बातें और अंदाज दोनों इस कदर पसंद थे कि कई बार वह उस से शादी की बात करने की सोच कर भी कह नहीं सका क्योंकि हिम्मत नहीं जुटा पाया था.

पूजा अकसर कैंटीन में चाय के साथ समोसे या पकौड़े खाते हुए अपने दोस्तों को अपने साथ बीती हुईं सड़कछाप आशिकों की कहानियां सुनाया करती.

‘‘मैं कल घर जा रही थी. दोपहर का समय था. 2 लड़के बेसुरा राग अलापते हुए बगल से गुजरे, ‘तुम हम से दोस्ती कर लो, ये हसीं गलती कर लो.’ मैं ठीक उन के सामने जा कर खड़ी हो गई और कहा, ‘ठीक है, चलो, दोस्ती करते हैं.’ मेरे इतना कहते ही वे दोनों लड़के सकपका गए और माफी मांगने लगे.’’

सीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें क्या पड़ी थी इस तरह प्रतिक्रिया जाहिर करने की?’’

‘‘क्या मैं सब्जी या गोबर हूं जो प्रतिक्रिया व्यक्त न करती. मैं उन लड़कों को छेड़खानी का वह मजा चखाती कि याद रखते.’’

‘‘क्या कर लेतीं तुम?’’

‘‘मैं उन के ‘आई कार्ड’ रखवा लेती. उन को यूनिवर्सिटी से निकलवा देती…’’

संजय बीच में बोला, ‘‘पूजाजी, आप जीवन को इतनी सख्ती से क्यों लेती हैं. क्या हुआ किसी का मन थोड़ा आवारा हो उठा तो.’’

‘‘नहीं, मु झे आवारगी पसंद नहीं. वह तो उन्होंने माफी मांग ली वरना…’’

‘‘आप को तो खुद संगीत से लगाव है.’’

‘‘हां, लेकिन सड़कछाप संगीत से नफरत है.’’

पूजा को खुद पता नहीं कि इधर वह कुछ ज्यादा ही सख्त मिजाज होती जा रही है. अगर कक्षा में कोई विषय अधूरा है तो वह बुखार में भी दवा की शीशी पर्स में डाल कर कक्षा में आ जाती. ऐसा लगता है जैसे इस एक प्राणी में अनेक और प्राणी आ बसे हैं- असफल समाजसुधारक, अकड़ू अफसर, अडि़यल क्लर्क और अधेड़ यौवना.

लेकिन 2-3 साल पहले तक ऐसा नहीं था. तब उस की अनेक सहेलियां और कई मित्र थे. दिन में जब यूनिवर्सिटी से लौटती तो उस की नजर अपने कंपाउंड के गुलमोहर पर पड़ती जहां अकसर कोई न कोई विद्यार्थी जोड़ा पढ़ाई के बहाने प्यार करता होता. प्रकृति के हरेपन के बीच उन की गुलाबी गुफ्तगू घंटों चलती.

पूजा को अकसर पुराने बीते दिन याद आते. कभी वह अपने 16वें तो कभी 21वें साल की यादों में डूब जाती. उसे लगता जैसे कल की ही बात थी जब वह रिकशा में बैठ कालेज जाने लगती तो उस के तीनों भाई उसे घेर लेते. एक रिकशे के आगे पायलट बन जाता, दूसरा, बगल में गार्ड और तीसरा, पीछे फुटमैन. तब इस बैंक रोड पर क्या मजाल जो कभी कोई फब्ती कसे या उसे घूरे. कालेज की अन्य लड़कियां जब उसे छेड़खानी के किस्से सुनातीं तो उसे अचंभा होता कि क्या लड़के ऐसे भी होते हैं? कभीकभी वह शीशे में अपनेआप को देखते हुए सवाल करने लगती, ‘क्या मैं सुंदर नहीं हूं? मु झे कोई कुछ क्यों नहीं कहता?’

एमएससी तक पहुंचतेपहुंचते पूजा की शादी के लिए कई प्रस्ताव आ चुके थे पर भाइयों को कोई भी लड़का अपनी बहन के काबिल नहीं लगा. एकाएक उस के पिताजी चल बसे. उन के स्थान पर उसे नौकरी मिल गई. इस के साथ ही जिंदगी की घड़ी कुछ अलग ढंग से टिकटिक करने लगी.

अब वह घर की बुजुर्ग थी. उस ने अपनी शादी का इरादा ताक पर रख भाइयों के भविष्य पर ध्यान दिया.

इस के बाद जिंदगी में कई  झटके लगे. मां का भी निधन हो गया. नए मिजाज की भाभियों का घर में आगमन, फिर भतीजेभतीजियों की चेंचेंपेंपें के साथ घर में कलह. अगर यह मकान पूजा के नाम न होता तो उसे यहां से कब का निकाल दिया गया होता. एकएक कर के सभी भाभियां अपने पति और सामान के साथ विदा हुईं. ऊपर से यह आरोप कि ये इतना लंबाचौड़ा मकान ले कर अकेली बैठी हैं और हम किराए के घरों में पड़े हैं.

पूजा किसकिस से कहे कि भाई सिर्फ नाम को अलग घर में रहते हैं. उन की आवाजाही और दखलंदाजी में कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा था.

बड़े भाई के दोनों बच्चे स्कूल के बाद सीधे उस के पास ही आते हैं. वे यहीं बैठ कर होमवर्क कर के वीडियो गेम खेलते और चाटकुल्फी खाने का मजा लेते. वापस जाते समय बच्चे ऐसे रोने लगते जैसे अपने घर नहीं, पराए घर जा रहे हों.

गरमी की छुट्टियों में जैसे ही भाभी का इरादा मां या अपने भाई के घर जाने का बनता, दोनों बच्चे तुरंत कह देते कि हम तुम्हारे साथ नहीं जाएंगे, बूआ के पास रह लेंगे. भाभी तुनक कर बच्चों का गाल नोचती और कहती, ‘बूआ के यहां लड्डू बंट रहे हैं क्या?’

तीनों भाभियों के तेवर इस बात पर तीखे बने रहते कि पूजा की खोजखबर रखने में भाइयों को कोई आलस नहीं होता था. छोटे भाई की शादी को सिर्फ डेढ़ साल हुआ था. छोटी भाभी शाम को तैयार हो कर अपने पति से कहती, ‘चलो, घूम आएं.’

पति साथ चल देता पर स्कूटर उस का पूजा के घर आ कर रुक जाता.

वैसे पूजा कहीं कम ही आतीजाती थी. बहुत जरूरी होने पर ही कहीं जाती थी. उस दिन वह चित्रकला प्रदर्शनी देखने चली गई थी. आने में देरी हुई तो भाई नंबर 3 आपे से बाहर हो गया, ‘तुम इतनी रात को बाहर क्यों गईं? जमाना बहुत खराब है, दीदी, तुम जानती नहीं.’

पूजा ने उस के आगे अपनी कलाईघड़ी कर दी और बोली, ‘तू तो बेवजह डर रहा है, अभी सिर्फ 9 बजे हैं.’

भाई गुर्राया, ‘नहीं, बस, कह दिया, 5 बजे के बाद तुम घर से निकलोगी नहीं.’

‘मैं इतनी बड़ी हो गई हूं, बता, मेरी चौकीदारी तू करेगा या तेरी चौकीदारी मैं?’

‘दीदी, मजाक की बात नहीं, वारदात कभी भी हो सकती है.’ और फिर दीदी, आप के हाथों में मोटेमोटे 3 तोले के कड़े देख कर तो कोई भी लूट लेगा,’ भाभी ने कह डाला.

भाई से हुई तूतूमैंमैं पूजा को बिलकुल सामान्य लग रही थी पर उस की बीवी की बात उसे डंक मार गई.

‘हमारे दफ्तर में तो लड़कियां इस से भी भारी कंगन पहन कर आती हैं,’ पूजा ने अपनी भाभी को जवाब दिया.

पूजा की कलाइयों में पड़े कंगनों का इतिहास यह था कि ये कंगन उस की मां की यादगार थे. मां इन्हें हमेशा पहने रहतीं. उन के मरने के बाद उन का गहनों का बक्सा पूजा ने तीनों भाभियों में बांट दिया पर मां के हाथों में पड़े ये कंगन पूजा नहीं दे पाई. इसलिए जबतब भाभियों को ये कंगन खटकते रहते.

पिताजी के मरने के बाद मझली भाभी उन की आरामकुरसी ले जाना चाहती थी. मां ने टोका, ‘नहीं बहू, यह बरामदे में रखी है तो मुझे लगता है वे बैठे हैं.’

म झले भाई ने जवाब दिया, ‘इसीलिए तो हम इसे कमरे में रखना चाहते हैं.’

मां नहीं मानीं. उस समय तो भाई चुप हो गए पर मां के चले जाने पर वे एक दिन आ कर आरामकुरसी ले गए. जब तक भाइयों के नए घर सामान से भर नहीं गए, वे महमूद गजनवी की तरह हर हफ्ते आते और कोई न कोई चीज उठा ले जाते.

ऐसे तजरबों ने पूजा को तल्ख बना दिया. इस में सब से खराब बात यह थी कि पूजा के अंदर दूसरों की अच्छाइयां देखने, परखने की जो कुदरती क्षमता थी वह खत्म होने लगी और वह हर वक्त आशंकाओं से घिरी रहती.

वैसे भाइयों के लिए अभी भी उस का हृदय जबतब उमड़ता रहता था. भाइयों को ही फुरसत नहीं थी. अकसर वे शाम को सचल दस्ते की तरह आते, बहन को घर में देख आश्वस्त हो लौट जाते.

रक्षाबंधन पूजा के घर का बड़ा त्योहार था. जब पूजा छोटी थी तो हफ्तों पहले तीनों भाइयों की कलाइयों की नाप ले कर फूलों की राखियां बनाती. बड़ी होने पर न उस के पास इतना समय था, न धीरज. फिर भी वह जयपुर की बनी कलावस्तु की राखियां ला कर फल, मिठाई से थाल सजा कर भाइयों का इंतजार करती. सारा दिन आमोदप्रमोद में व्यतीत होता. लेकिन धीरेधीरे इस त्योहार का छोटा रूप सामने आने लगा. कई बार भाई भाभी व बच्चों के साथ आते पर कई बार भाभी और बच्चे साथ न आ पाते.

पूजा यही सोच कर खुश थी कि उस के भाई अभी भी उसे एकदम से भूले नहीं हैं.

इस बार सभी भाई आए, लेकिन अलगअलग.

भाई नंबर एक ने कहा, ‘‘दीदी, औफिस में आज छुट्टी नहीं है. राखी बांध कर जल्दी से खाना खिला दो तो मेरी एक छुट्टी बच जाएगी.’’

पूजा ने जल्दी से भाई की कलाई पर प्यार का बंधन बांधा, मुंह मीठा कराया और घर ले जाने के लिए मिठाई का डब्बा दिया.

भाई उल झन में पड़ गया और बोला, ‘‘इस समय तो मैं सीधा दफ्तर जाऊंगा. तू डब्बा रख ले, मैं शाम को वापसी में इसे ले जाऊंगा.’’

भाई नंबर 2 बीवीबच्चों समेत आया. पूजा ने राखी बांधने के बाद खाना लगाने का उपक्रम किया. भाभी के माथे पर बल पड़ गए.

भाई बोला, ‘‘दीदी, अभी इन्हें अपने घर जा कर भाइयों को राखी बांधनी है. वहीं खानापीना होगा.’’

पूजा ने कहा, ‘‘चलो, खीर तो खाते जाओ.’’

भाभी ने यह कह कर खीर भी नहीं चखी कि आज उस का व्रत है.

छोटा भाई अकेला आया और बोला, ‘‘दीदी, जल्दी से राखी बांध दो, मु झे वापस घर जाना है.’’

‘‘अभी तो आए हो, ऐसी क्या जल्दी है,’’ पूजा बोली.

‘‘बिंदू को अकेले डर लगता है. पड़ोस के लोग सब बाहर गए हुए हैं.’’

‘‘उसे भी ले आते. अकेला क्यों छोड़ आए?’’ पूजा ने कहा.

‘‘वह सुबह से नाराज है क्योंकि वह अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए देहरादून नहीं जा सकी. उस का सारा कार्यक्रम मु झे छुट्टी न मिलने की वजह से बिगड़ गया. वैसे मैं ने कल ही स्पीडपोस्ट से उस की राखियां तो भेज दी हैं पर दुख तो होता ही है,’’ राखी बंधवाते ही भाई नंबर 3 चला गया.

पूजा का मन भारी हो गया. उसे लगा, शहर में ऐसा कोई नहीं जिसे वह अपना सगा कह सके. उस के ये तीनों भाई रक्षाबंधन के दिन भी ठीक से भाई नहीं बन सकते. वे इस कदर अपनी पत्नियों के गुलाम और अपने अफसरों के सेवक हैं कि बहन उन की सूची में शामिल ही नहीं है. हक जमाने, अंकुश लगाने के सिवा और इन का उस से कोई नाता नहीं है.

मेज पर 3 लिफाफे पड़े थे मानो त्योहार के 3 चंदे हों. पूजा ने खुद आज की छुट्टी ले रखी थी. उसे अपनी छुट्टी और स्थिति दोनों काफी बेतुकी लगीं. इस समय उन छोटीछोटी बातों को याद करने से कोई फायदा नहीं है, यह सोच कर कि उस के जीवन की रफ्तार में ये तीनों भाई 3 गतिरोधक थे, 3 लाल बत्तियां. 3 ताले.

पूजा ने दरवाजा बंद किया और टेपरिकौर्डर पर जगजीत सिंह की गजल सुनने लगी. Family Story

Social Story In Hindi : मैं पापी हूं – सीमा ने दरवाजा क्यों बंद किया?

Social Story In Hindi : मैं पापी हूं. इस बात को आज मैं सार्वजनिक तौर पर मान रहा हूं. पिछले तकरीबन 40 साल से मैं ने इस बात को अपने सीने में दफन कर रखा है, लेकिन अब जिंदगी की गाड़ी और आगे खिंचती नहीं लगती. बात उन दिनों की है, जब मेरी जवानी उछाल मार रही थी. मैं ने ‘शहर के मशहूर समाजसेवी श्रीश्री डालरिया मल ने सभा की अध्यक्षता की…’ जैसी रिपोर्टिंग करतेकरते आगरा से निकलने वाली एडल्ट मैगजीन ‘मचलती जवानी’ के लिए भी लिखना शुरू कर दिया था. यह ‘मचलती जवानी’ ही मेरे पाप की जड़ है. एक दिन ‘मचलती जवानी’ के संपादक रसीले लाल राजदार की एक ऐसी चिट्ठी आई, जिस ने मेरी दुनिया ही बदल डाली.

उस चिट्ठी में उन्होंने लिखा था, ‘रहते हैं ऐसे महानगर में, जो सोनागाछी और बहू बाजार के लिए सारे देश मशहूर हैं, और आप हैं कि दमदार तसवीरें तक नहीं भिजवा सकते. भेजिए, भेजिए… अच्छी रकम दिलवा दूंगा प्रकाशक से.’ कैमरा खरीदने के लिए मैं ने सेठजी  से कहा कि कुछ पैसे दे दें. यह सुन कर सेठ डालरिया मल ‘होहो’ कर हंसे थे और शाम तक मैं एक अच्छे से कैमरे का मालिक बन गया था. बहू बाजार की खोली नंबर 34 में एक नई लड़की सीमा आई थी. चेहरा  किसी बंबइया हीरोइन से कम न था. एक दिन सीमा नहाधो कर मुंह में पान रख अपने अधसूखे बालों को धीरेधीरे सुलझा रही थी, तभी मैं उस की खोली में जा धमका.

सीमा ने तुरंत दरवाजा बंद कर सिटकिनी लगा दी और बोली, ‘‘मेरा नाम सीमा है. आप अंदर आइए, बैठिए.’’ मैं पलंग पर बैठते हुए बोला, ‘‘देखो, मैं कुछ करनेधरने नहीं आया हूं. बात यह है कि…’’

‘‘बेवकूफ कहीं के… आज मेरी बोहनी खराब कर दी. चल, निकल यहां से,’’ सीमा चीखते हुए बोली थी. मैं हकबका गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. मैं बोला, ‘‘मैं तुम्हारी बोहनी कहां खराब कर रहा हूं? लो ये रुपए.’’

यह सुनते ही सीमा चौंकी. वह बोली, ‘‘मैं मुफ्त के पैसे नहीं लेती.’’ ‘‘मैं मुफ्त के पैसे कहां दे रहा हूं? इस के बदले मुझे दूसरा काम है.’’

‘‘दूसरा काम…? क्या काम है?’’

‘‘मैं तुम्हारी कुछ तसवीरें खींचना चाहता हूं…’’ यह सुनना था कि सीमा मेरी बात बीच में ही काट कर ठहाका मार कर हंसी, ‘‘अरे, मां रे. ऐसेऐसे मर्द भी हैं दुनिया में?’’

फिर सीमा मेरी ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘मेरे तसवीर देखदेख कर ही मजे लेगा… चल, ले खींच. तू भी क्या याद करेगा…

‘‘और पैसे भी रख अपने पास. जरूरत है, तो मुझ से ले जा 10-20.’’ सीमा ने अंगरेजी हीरोइनों को भी मात देने वाले पोजों में तसवीरें खिंचवाईं. वे छपीं तो अच्छे पैसे भी मिले. जब पहला मनीऔर्डर आया, तो उन पैसों से मैं ने उस के लिए साड़ी और ब्लाउज खरीदा. जब मैं उसे देने गया, तो यह सब देख कर उस की आंखें भर आईं. वह बोली, ‘‘तुम आया करो न.’’ और मैं सीमा के पास आनेजाने लगा. यही मेरा पाप था. उस के लिए कुछ साल पीछे जाना होगा. बात शायद साल 1946 की है. मेरे मातापिता ढाका के धान मंडी इलाके में रहा करते थे, तब मैं प्राइमरी स्कूल की पहली क्लास में भरती हुआ था. स्कूल घर से एक मील दूर था, लेकिन मैं ने जो रास्ता दोस्तों के साथ कंचे खेलते हुए पता कर लिया था, वह चौथाई मील से भी कम था.

मेरे पिता लंबे रास्ते से ले जा कर मुझे स्कूल में भरती करा कर आए. लेकिन अगले दिन से मुझे अकेले ही आनाजाना था और इस के लिए मुझे शौर्टकट रास्ता ही पसंद आया. बहुत दिनों के बाद देश के बंटवारे के बाद जब मैं कलकत्ता आ गया, तो मुझे पता चला कि उस शौर्टकट रास्ते का नाम गली चांद रहमान था. एक दिन मैं ने जब मां से पूछा, ‘‘मांमां, उस रास्ते में बहुत सारी दीदियां और मौसियां अपनेअपने घरों के सामने बैठी रहती हैं. वे कौन हैं?’’

यह सुन कर मां ने मुझे डपटा था, ‘‘खबरदार, जो दोबारा उस रास्ते से गया तो…’’

इस के बाद 2-3 दिनों तक मैं मेन रोड से आया गया, लेकिन फिर वही गली पकड़ ली. एक दिन मैं ने मां को जब अच्छे मूड में देखा, तो अपना सवाल दोहरा दिया. वे बोलीं, ‘‘जा, उन्हीं से पूछ लेना.’’

एक मौसी मुझ से हर रोज बोला करती थीं, ‘‘ऐ लड़के, बदरू चाय वाले को बोल देना तो, लिली 4 कप चाय मांग रही है.’’ वे कभी मुझे एक पैसा देतीं, तो कभी 2 पैसे दिया करती थीं.

अगले दिन मैं ने हिम्मत कर के लिली से ही पूछ लिया, ‘‘मेरी मां ने पूछा है कि आप लोग कौन हैं?’’ मेरा यह सवाल सुन कर लिली के अलावा और भी मौसियां और दीदियां हंस पड़ीं. उन में से एक बोली थी, ‘‘बता देना, हम लोग धंधेवालियां हैं.’’

मां को जब एक दिन फिर अच्छे मूड में देखा, तो उन को बताया, ‘‘मां, वे कह रही हैं कि धंधेवालियां हैं.’’

लेकिन मां शायद अंदर से जलभुनी बैठी थीं. वे बोलीं, ‘‘जा, उन से यह भी पूछना कि कैसा चल रहा है धंधा?’’

मैं ने वाकई यह बात पूछ डाली थी. इस के जवाब में लिली ने हंस कर कहा था, ‘‘जा कर कह देना उन से कि बड़ा अच्छा चल रहा है. इतना अच्छा चल रहा है कि सलवार पहनने की भी फुरसत नहीं मिलती.’’ यह जवाब सुन कर मां ने इतनी जोर से तमाचा मारा था कि गाल सूज जाने की वजह से मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाया था. एक दिन पता नहीं क्या बात हुई कि लंच टाइम में ही छुट्टी हो गई. मास्टर ने कहा, ‘‘सभी सीधे घर जाना. संभल कर जाना.’’

जब मैं गली चांद रहमान से निकल रहा था, तो पाया कि सारी गली में सन्नाटा पसरा था. सिर्फ लिली मौसी ही दरवाजे पर खड़ी थीं और काफी परेशान दिख रही थीं. मुझे देखते ही वे बोलीं,  ‘‘तू हिंदू है?’’ हिंदू क्या होता है, तब मैं यह नहीं जानता था, इसलिए चुप रहा. वे फिर बोलीं, ‘‘सब्जी वाले महल्ले में रहता है न. वहां दंगा फैल गया है. जब तक सब ठीक न हो जाए, तू यहीं छिपा रह.’’ कर्फ्यू लग गया था. 3 दिनों के बाद हालत सुधरी और कर्फ्यू में ढील हुई, तो लिली ने बताया, ‘‘सब्जी वाले महल्ले में एक भी हिंदू नहीं है. लगता है, जो मारे जाने से बच गए हैं, वे कहीं और चले गए हैं.’’ अगले दिन वे मुझे ले कर मेरे टोले में गईं, लेकिन वहां कुछ भी नहीं था, सिर्फ जले हुए मकान थे.

यह देख कर मैं रोने लगा. वे मुझे अपने साथ ले आईं और अपने बेटे की तरह पालने लगीं. तकरीबन सालभर बाद की बात है. मैं गली में गुल्लीडंडी खेल रहा था, तभी कानों में आवाज आई, ‘‘अरे सोनू, तू यहां है? ठीक तो है न? तुझे कहांकहां नहीं ढूंढ़ा.’’ देखा कि मेरी मां और पिता थे. पिता बोले, ‘‘चल, देश आजाद हो गया है. हम लोगों को उस पार के बंगाल जाना है.’  तब तक लिली भी बाहर आ गई थीं.  उन की आंखों में छिपे आंसुओं को सिर्फ मैं ने ही महसूस किया था.

अब आज में लौट आते हैं. सीमा ने पहले दिन के बाद मुझ से कभी कोई पैसा नहीं लिया, बल्कि हर बार देने की कोशिश की. मैं उस के जरीए एक बच्चे का बाप भी बन गया और देखते ही देखते वह लड़का एक साल का हो गया. एक दिन दोपहर को उस के पास गया, तो वह बोली, ‘‘ऊपर से पेटी उतारना तो… मेरी मां ने मुझे चांदी के कंगन दिए थे. कहा था, तेरा बच्चा होगा तो मेरी तरफ से उसे पहना देना.’’ पेटी उतारी गई. कई तरह के पुराने कपड़े भरे हुए थे. उस ने सारी पेटी फर्श पर उलट दी और कहा, ‘‘लगे हाथ सफाई भी हो जाएगी.’’ ट्रंक के नीचे बिछाया गया अखबार उलट कर मैं पढ़ने लगा. तभी उस में से एक तसवीर निकल कर नीचे गिरी. मैं ने उठाई. चेहरा पहचाना हुआ लगा.

मैं ने पूछा, ‘‘ये कौन हैं?’’

‘‘मेरी मां है.’’

‘‘क्या तुम्हारी मां धान मंडी में रहती थीं?’’ मैं ने चौंक कर पूछा.

‘‘हां, तुम को कैसे मालूम?’’ सीमा ताज्जुब से मुझे देखने लगी.

मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी मां का नाम लिली है?’’

‘‘हां, लेकिन यह सब तुम को कैसे मालूम?’’ सीमा की हैरानी बढ़ती जा रही थी.

लेकिन उस के सवाल के जवाब में मैं ने बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी. मैं ने जोश में आ कर बता दिया, ‘‘मैं भी धान मंडी का हूं. बचपन में तुम्हारी मां ने मुझे अपने बेटे की तरह पाला था.’’ यह सुनना था कि सीमा का चेहरा सफेद हो गया.

उस दिन के बाद से सीमा गुमसुम सी रहने लगी थी. एक दिन वह बोली, ‘‘भाईबहन हो कर हम लोगों ने यह क्या कर डाला? कैसे होगा प्रायश्चित्त?’’ पर इस का कोई जवाब होता, तब न मैं उस को देता.

कुछ दिनों बाद मुझे बिहार में अपने गांव जाना पड़ गया. तकरीबन एक महीने बाद मैं लौटा, तो पता चला कि सीमा ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी. हमारा बेटा कहां गया, इस का पता नहीं चल पाया. अनजाने में हो गए पाप का सीमा ने तो जान दे कर प्रायश्चित्त कर लिया था, लेकिन मैं बुजदिल उस पाप को आज तक ढो रहा हूं. मेरे घर के पास ही फकीरचंद रहता था. वह टैक्सी ड्राइवर था. वह एक अच्छा शायर भी था. मेरी तरह उस का भी आगेपीछे कोई नहीं था. सो, हम दोनों में अच्छी पट रही थी. मैं जोकुछ लिखता था, उस का पहला पाठक वही होता था. एक दिन वह मेरे लिखे को पढ़ने लगा. वह ज्योंज्यों मेरा लिखा पढ़ता गया, उस की आंखें आंसुओं से भरती जा रही थीं और जब पढ़ना पूरा हुआ, तो देखा कि वह फफकफफक कर रो रहा था.

मैं ने हैरान होते हुए पूछा, ‘‘अरे, तुम को क्या हो गया फकीरचंद?’’

वह भर्राए गले से बोला, ‘‘हुआ कुछ नहीं. सीमा का बेटा मैं ही हूं.’’ Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : रहने के लिए एक मकान 

Family Story In Hindi : मैं अपने गांव लौटने लगा तो मेरे आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे. मेरे दोहेते अपने घर के बालकनी से प्रेम से हाथ हिला रहे थे,”बाय ग्रैंड पा, सी यू नाना…”

धीरेधीरे मैं बस स्टैंड की ओर चल दिया.

मैं मन ही मन सोचने लगा,’बस मिले तो 5 घंटे में मैं अपने गांव पहुंच जाऊंगा. जातेजाते बहुत अंधेरा हो जाएगा, फिर बस स्टैंड पर उतर कर वहां एक होटल है. उस में कुछ खापी कर औटो से अपने घर चला जाऊंगा.’

2 साल पहले मेरी पत्नी बीमार हो कर गुजर गई. तब से मैं अकेला ही हूं. मेरे गांव का मकान पुस्तैनी है. उस की छत टिन की है. पहले घासपूस की छत थी.

जब एक बार बारिश में बहुत परेशानी हुई तब टिन डलवा दिया था. मेरा एक भाई था वह भी कुछ साल पहले ही चल बसा था. अब इस घर में आखिरी पीढ़ी का रहने वाला सिर्फ मैं ही हूं.

मेरी इकलौती बेटी बड़े शहर में है अत: वह यहां नहीं आएगी. जब बारिश होती है तो छत से यहांवहां पानी टपकता है. एक बार इतनी बारिश हुई कि दूर स्थित एक बांध टूट गया और कमर भर पानी मकान के अंदर तक जा घुसा था. कई बार सोचा घर की मरम्मत करा दूं पर इस के लिए भी एकाध लाख रूपए तो चाहिए ही.

मैं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ हूं अत: मुझे पैंशन मिलती है. उम्र के साथ दवा भी खाने होते हैं मगर फिर भी इस खर्च के बाद थोड़ाबहुत बच जरूर जाता है.

2 महीने में एक बार मैं शुक्रवार को दोहेतो को देखने की उत्सुकता में बेटी के घर जा कर 2-3 दिन ठहर कर खुशीखुशी दिन बिता कर मैं वापस आ जाता हूं. इस से ज्यादा ठहरना मुझे ठीक नहीं लगता.

मेरे दामाद अपना प्रेम या विरोध कुछ भी नहीं दिखाते. मैं घर में प्रवेश करता तो एक मुसकान छोड़ अपने कमरे में चले जाते.

दामाद शादी के समय बिल्डिंग बनाने वाली बड़ी कंपनी में सीनियर सुपरवाइजर थे. जो मकान बने वे बिक न सके. बैंक से उधार लिए रुपए को न चुकाने के कारण कंपनी बंद हो गई थी. तब से वह रियल ऐस्टेट का ब्रोकर बन गया.

“कुदरत की मरजी से किसी तरह सब ठीकठाक चल रहा है पापा,” ऐसा मेरी बेटी कहती.

पति की नौकरी जब चली गई थी तब मेरी बेटी दोपहर के समय टीवी सीरियल न देख कर सिलाई मशीन से अड़ोसपड़ोस के बच्चों व महिलाओं के कपड़े सिल कर कुछ पैसे बना लेती.

“पापा, आप ने कहा था ना कि बीए कर लिया है तो अब बेकार मत बैठो, कुछ सीखना चाहिए. तब मैं सिलाई सीखी. वह अब मेरे काम आ रही है पापा,” भावविभोर हो कर वह कहती.

पिछली बार जब मैं गया था तो दोहेतो ने जिद्द की, “नानाजी, आप हमारे साथ ही रहो. क्यों जाते हो यहां से?”

बच्चे जब यह कह रहे थे तब मैं ने अपने दामाद के चेहरे को निहारा. उस में कोई बदलाव नहीं.

मेरी बेटी रेनू ही आंखों में आंसू ला कर कहती,”पापा… बच्चों का कहना सही है. अम्मां के जाने के बाद आप अकेले रहते हैं जो ठीक नहीं. आप बीमार भी रहते हो.”

वह कहती,”पापा, हमारे मन में आप के लिए जगह है पर घर में जगह की कमी है. आप को एक कमरा देना हो तो 3 रूम का घर चाहिए. रियल ऐस्टेट के बिजनैस में अभी मंदी है. तकलीफ का जीवन है. इस घर में बहुत दिनों से रहते आए हैं अत: इस का किराया भी कम है. अभी इस को खाली करें तो दोगुना किराया देने के लिए लोग तैयार हैं. क्या करें? इस के अलावा मेरा सिरदर्द जबतब आ कर परेशान करता है.”

मैं बेटी को समझाता,”बेटा रो मत. यह सब कुछ मुझे पता है. अब गांव में भी क्या है? मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है ऐसा भी नहीं. पड़ोस में एक कमरे का घर मिल जाए तो भी मैं रह लूंगा. मैं अभी ₹21 हजार पैंशन पाता हूं. ₹6-7 हजार भी किराया दे कर रह लूंगा. अकेला तो हूं. तुम्हारे पड़ोस में रहूं तो मुझे बहुत हिम्मत रहेगी,” यह कह कर मैं ने बेटी का चेहरा देखा.

“अरे, जाओ पापा… अब सिंगलरूम कौन बनाता है? सब 2-3 कमरों का बनाते हैं. मिलें तो भी किराया ₹10 हजार. यह सब हो नहीं सकता पापा,” कह कर बेटी माथे को सहलाने लग जाती.

अगली बार जब मैं बेटी के घर गया, तब एक दिन सुबह सैर के लिए निकला. अगली 2 गलियों को पार कर चलते समय एक नई कई मंजिल मकान को मैं ने देखा जो कुछ ही दिनों में पूरा होने की शक्ल में था.

उस में एक बैनर लगा था,’सिंगल बैडरूम का फ्लैट किराए पर उपलब्ध है.’

मुझे प्रसन्नता हुई और उत्सुकता भी. वहां एक बैंच पर सिक्योरिटी गार्ड बैठा था. मैं ने उस से जा कर पूछताछ की.

“दादाजी, उसे सिंगल बैडरूम बोलते हैं. मतलब एक ही हौल में सब कुछ होता है. 1-2 से ज्यादा नहीं रह सकते. आप कितने लोग हैं?” वह बोला.

“मैं बस अकेला ही हूं. मेरी बेटी पड़ोस में ही रहती है. इसीलिए यहां लेना चाहता हूं.”

“अच्छा फिर तो ठीक है. घर को देखिएगा…” कह कर अंदर जा कर चाबी के गुच्छों के साथ बाहर आया.

दूसरे माले में 4 फ्लैट थे.

“इन चारों के एक ही मालिक हैं. 3 फ्लैटों के पहले ही ऐडवांस दे चुके हैं.”

उस ने दरवाजे को खोला. लगभग 250 फुट चौड़ा और लंबा एक हौल था. उस में एक तरफ खाना बनाने के लिए प्लेटफौर्म आधी दीवार खींची थी. दूसरी तरफ छोटा सा बाथरूम बड़ा अच्छा व कंपैक्ट था.

“किराया कितना है?” मैं ने पूछा.

“मुझे तो कहना नहीं चाहिए फिर भी ₹ 7 हजार होगा क्योंकि इसी रेट में दूसरे फ्लैट भी दिए हैं. ऐडवांस ₹50 हजार है. रखरखाव के लिए ₹500-600 से ज्यादा नहीं होगा. मतलब सबकुछ मिला कर ₹7-8 हजार के अंदर हो जाएगा दादाजी,” वह बोला.

“ठीक है भैया, इसे मुझे दिला दो. मालिक से कब बात करें?”

“अभी बात कर लो. एक फोन लगा कर बुलाता हूं. आप बैठिए,” वह बोला.”

वहां एक प्लास्टिक की कुरसी थी. मैं उस पर बैठ कर इंतजार करने लगा.

सिक्योरिटी गार्ड ने बताया,“वे खाना खा रही हैं. 10-15 मिनट में पहुंच जाएंगी. तब तक आप यह अखबार पढ़िए.”

मालिक से बात कर किराया थोड़ा कम करने के बारे में पूछ लूंगा. फिर एक औटो पकड़ कर घर जा कर लड़की को भी ला कर दिखा कर तय कर लेंगे. बेटी इस मकान को देख कर आश्चर्य करेगी.

ऐडवांस के बारे में कोई बड़ी समस्या नहीं है. मैं पास के एक बैंक में हर महीने जो पैसे जमा कराता हूं उस में ₹30 हजार के करीब तो होंगे ही.बाकी रुपयों के लिए पैंशन वाले बैंक से उधार ले लूंगा. फिर एक दिन शिफ्ट हो जाऊंगा.

यहां आने के बाद एक आदमी का खाना और चाय का क्या खर्चा होगा?

‘आप खाना बनाओगे क्या पापा,’ ऐसा डांट कर बेटी प्यार से खाना तो भिजवा ही देगी.

खाना बनाने का काम भी बच जाएगा. पास में लाइब्रैरी तो होगा ही. वहां जा कर दिन कट जाएगा.

सामने की तरफ थोड़ी दूर पर एक छोटा सा टी स्टौल था. मैं ने सोचा 1 कप चाय पी कर हो आते हैं. तब तक मकानमालकिन भी आ ही जाएगी.

वहां कौफी की खुशबू आ रही थी. मैं ने सोचा कि कौफी पी लूं. यहां रहने आ जाऊंगा तो नाश्ते और चाय की कोई फ्रिक नहीं रहेगी.

पैसे दे कर वापस आया तो सिक्योरिटी गार्ड बोला,“घर के औनर आ गए हैं. वे ऊपर गए हैं. आप वहीं चले जाइए.”

मैं धीरेधीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा. ऊपर पहुंच कर औनर को नमस्कार बोला.

पीठ दिखा कर खड़ी वह महिला धीरे से मुड़ी तो वह मेरी बेटी रेणू थी. Family Story In Hindi

Vegan Diet : शाकाहारी बनना चौयस वीगन बनना ढोंग

Vegan Diet : आजकल सोशल मीडिया पर नएनए वीगन बने लोगों का पशुप्रेम पागलपन की हद तक नजर आने लगा है. वीगनिज्म के नाम पर मांसाहारी लोगों को गालियां बकी जा रही हैं. वीगन लोगों का मानना है कि सभी लोग वीगन हो जाएं तो दुनिया की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. क्या है सच, आइए जानते हैं.

वेजिटेरियन होना और वीगन होना दोनों में अंतर है. वेजिटेरियन होने का अर्थ है शाकाहारी होना और वीगन होने का अर्थ है शाकाहारवादी होना.

कोई भी आइडिया या विचार जब वाद की श्रेणी में आ जाता है तब वह विचारधारा बन जाता है. कुछ लोग ऐसी विचारधारा के गुलाम बन कर रह जाते हैं. यही नहीं, वे अपनी उस विचारधारा को दुनिया पर थोपना शुरू कर देते हैं. उन्हें लगता है कि उन की वह विचारधारा ही दुनिया का आखिरी सत्य है और उस से ही दुनिया को बदला जा सकता है. वीगनिज्म ऐसी ही एक विचारधारा है. लोग तेजी से इस विचारधारा के गुलाम होते जा रहे हैं.

मांस के उत्पादन और इस के उपभोग की प्रक्रिया से कई प्रकार की ग्रीनहाउस गैसें उत्पन्न होती हैं, जैसे कार्बन डाईऔक्साइड, मीथेन, नाइट्रस औक्साइड वगैरह. इसे मांस का कार्बन फुटप्रिंट कहा जाता है. मांस का कार्बन फुटप्रिंट चूंकि पर्यावरण के लिए घातक साबित होता है इसलिए मांसभक्षण की आदतों को कम करना पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी है. ऐसे में दुनिया को शाकाहार के लिए प्रेरित करना एक समझदारी भरा कदम जरूर है लेकिन वीगनिज्म के नाम पर मांस उद्योग, डेयरी फार्म, अंडा उद्योग और पशुआधारित अन्य व्यवसायों व उत्पादों के विरुद्ध खड़े हो जाना ठीक नहीं है.

वीगन होना व्यक्तिगत पसंद हो सकती है लेकिन इसे सभी के लिए अनिवार्य करने की मानसिकता गलत है. वीगनिज्म पर आधारित जीवनशैली हर व्यक्ति के लिए व्यावहारिक या उपयुक्त नहीं हो सकती. इस से पोषण की जरूरतों, जैसे विटामिन बी12, आयरन को पूरा नहीं किया जा सकता. धनी लोग वीगनिज्म अपना सकते हैं और मांस से मिलने वाले प्रोटीन के महंगे विकल्प प्राप्त कर सकते हैं लेकिन गरीबों के लिए वीगनिज्म कभी भी जीवनशैली का हिस्सा नहीं हो सकता.

पूरी दुनिया में 90 फीसदी लोग मांस खाते हैं और बाकी के 10 फीसदी लोग जो खुद को वेजिटेरियन कहते हैं वे भी विशुद्ध शाकाहारी नहीं होते. जरा बताइए कि मांस से परहेज कर दूध, दही, घी, मक्खन, पनीर आदि सब खाने वाले किस कैटेगरी में आएंगे?

बहुत से लोग चमड़े का जूता पहनते हैं, चमड़े की बैल्ट पहनते हैं, जेब में लैदर का पर्स रखते हैं फिर भी वीगन बनने का ढोंग करते हैं. भारत में मांसभक्षण सदियों से कल्चर का हिस्सा रहा है. बलिप्रथा के नाम पर मारे जाने वाले जानवरों का मांस बड़ी श्रद्धा के साथ खाने का रिवाज था.

कई लोग जो शाकाहारी बनने का ढोंग करते हैं वे भी चोरीछिपे मांस खाते हैं. उत्तर भारत की हिंदू औरतों को मांसभक्षण से दूर रखने का कारण यह था कि उन्हें पुरुषों की तुलना में कम प्रोटीन मिले ताकि वे पुरुषों की गुलाम बनी रहें.

मांस से जुड़ा रोजगार

भारत में चमड़ा उद्योग लगभग 40-50 लाख लोगों को रोजगार देता है. भारत पूरी दुनिया में चमड़ा उत्पादन का लगभग 13 फीसदी हिस्सा रखता है और यह उद्योग कमजोर वर्गों, सामान्य लोगों और महिलाओं के लिए रोजगार का एक प्रमुख स्रोत है.

वैश्विक चमड़ा उद्योग 5-7 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, जिस में टैनरी, उत्पादन, डिजाइन, निर्यात और वितरण जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

दुनिया के 28 प्रतिशत लोगों का सीधा रोजगार मांस पर आधारित है. केवल चिकन और अंडा पर आधारित इंडस्ट्री करोड़ों लोगों को रोजगार देती है और केवल अमेरिका में ही यह इंडस्ट्री 15 लाख लोगों को रोजगार देती है.

चिकन इंडस्ट्री 15,17,797 नौकरियां देती है. इस इंडस्ट्री से 417 बिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था जेनरेट होती है. वहीं, इस से सरकार को 25.5 बिलियन डौलर का रेवेन्यू मिलता है. मछली उद्योग की बात करें तो यह इंडस्ट्री पूरी दुनिया में 260 मिलियन लोगों को जौब देती है.

मछली और चिकन के अलावा दूध से जुड़े प्रोडक्टस, जैसे दूध, दही, घी, पनीर, मक्खन और चीज पर आधारित इंडस्ट्री 240 मिलियन लोगों को रोजगार देती है.

दुनियाभर में 24 करोड़ लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर डेरी के कामों से जुड़े हुए हैं और लगभग 15 करोड़ डेरी फार्म हैं.

भारत जैसे विकासशील देश में जहां बेरोजगारी विकराल रूप में मौजूद है एक बड़ी आबादी चिकन फार्मिंग, मछलीपालन, पशुपालन और दूध से जुड़े लघु व्यवसायों से रोजगार हासिल करती है.

पूरी दुनिया विशुद्ध रूप से मांसाहार छोड़ दे और वीगन बन जाए, ऐसा कहना या सोचना भी एक तरह की जबरदस्ती है. इंसान स्वाभाविक तौर पर मांसाहारी ही है. विकासक्रम के लाखों वर्षों के इतिहास में इंसान मांसाहारी ही था.

एग्रीकल्चर टैक्नोलौजी में आई क्रांति की वजह से ही आज खाने के ढेरों विकल्प पैदा हुए हैं वरना 100 साल पहले तक दुनिया ऐसी नहीं थी. 100 साल पहले तक नौनवेज 90 परसैंट आबादी के खानपान का जरूरी हिस्सा था और जो 10 प्रतिशत लोग शाकाहारी होने का ढोंग करते थे वे भी दूध, दही, घी के बिना नहीं रह सकते थे.

यह बिलकुल सही है कि इंसान को जीव पर करुणा बनाए रखना चाहिए और पूरी दुनिया इस करुणा का हिस्सा बने, ऐसी सोच रखने में कोई बुराई नहीं लेकिन वीगनिज्म के नाम पर मांसाहारी लोगों को कोसने का कोई औचित्य नहीं.

मांसभक्षण मानवता की कड़वी सच्चाई है, साथ ही, यह दुनिया की एक बड़ी आबादी की जरूरत होने के अलावा करोड़ों लोगों की परंपरागत मजबूरी भी है. इन पर वीगनिज्म थोपना इंसानियत के खिलाफ है.

समस्त मानव जाति का कल्याण हो, यही मानवता है लेकिन समस्त मानव का कल्याण होगा कैसे? बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और इंसानियत के बीच की हिंसा के रहते मानवता का कल्याण संभव ही नहीं है. सो, आप को वीगन बनने से पहले इंसान बनने की जरूरत है. इस के लिए इंसानियत के कल्याण में खड़ी बाधाओं से लड़ने की जरूरत है. पहले इंसानियत की मुश्किलें हल की जाएं, विगनिज्म उस के बाद का स्टैप है.

आज मानव जाति का दुश्मन कौन है? स्वयं मानव ही न. वीगनिज्म का ढोंग रचने से पहले मानव और मानव के बीच की नफरत कैसे खत्म हो, इस पर काम कीजिए. इंसान की हत्या इंसान करता है. युद्ध, हिंसा, दंगे इन सब में इंसान के हाथों इंसान मरता है. रेप होते हैं, मौबलिंचिंग होती है तब आप की संवेदनाएं कहां गुम हो जाती हैं?

इंसान नफरतों से आजाद हो जाएगा, तभी वह इंसान बन पाएगा. जब हम दुनिया से इंसान और इंसान के बीच की नफरत को पूरी तरह खत्म कर दें तब हम वीगनिज्म की वकालत करें तो ही उचित होगा.

आप शाकाहार को प्रमोट कीजिए, अपने आसपास के लोगों को शाकाहार के लिए प्रेरित कीजिए, उन में जीवों के प्रति करुणा का भाव पैदा कीजिए लेकिन वीगनिज्म के नाम पर शाकाहारवाद की नौटंकी मत कीजिए.

सहारा में बसने वाले लोग, पहाड़ों में रहने वाले लोग, जंगलों में बसे आदिवासी और नदियों या समुद्री किनारे बसे ट्राइबल लोगों को वीगनिज्म समझ नहीं आएगा. इस का अर्थ यह नहीं कि ये लोग पशुओं के प्रति क्रूर हैं बल्कि सच यह है कि ये लोग हम से कहीं ज्यादा नेचर की समझ रखते हैं और जीवों के प्रति करुणा के मामले में भी ये लोग वीगनिज्म का ढोल पीटने वालों से ज्यादा संवेदनाएं रखते हैं.

मांसाहार पर अनैतिकता कैसी

गौर कीजिए कि इंसान आज जो मांस खा रहा है वह नेचर से छीन कर नहीं खा रहा बल्कि उस की मैन्युफैक्चरिंग कर रहा है. पूरी दुनिया में मांस का 60 प्रतिशत चिकन के रूप में है और यह चिकन इंसान ने पैदा किया है. बड़े पैमाने पर मछलियों का भी उत्पादन होता है. बड़े जानवरों का भी इसी तरह उत्पादन किया जाता है जिस में मांस के साथ दूध से जुड़े उत्पाद हासिल होते हैं.

स्वाद के लिए मांसभक्षण गलत हो सकता है. भौगोलिक रूप से जहां मांसाहार ‘नीड टू किल’ की श्रेणी में आता है वहां यह गलत नहीं है लेकिन पूरी दुनिया के वे इलाके जहां हजारों प्रकार की सब्जियां उपलब्ध हैं वहां मांसाहार ‘विल टू किल’ की श्रेणी में आता है, इसलिए वहां के लोगों को सिर्फ अपने स्वाद के लिए जीवहत्या से परहेज करना चाहिए.

मांसाहार बुरा नहीं है, बल्कि मानव के विकास के लिए यह जरूरी है. यदि पूरी दुनिया शाकाहारी हो जाए तब 800 करोड़ लोगों को खाने के लाले पड़ जाएंगे. अन्न, सागसब्जी उगाने की पर्याप्त भूमि कम पड़ जाएगी. नतीजतन, करोड़ों लोगों को भुखमरी, कुपोषण और अकाल का दंश झेलना पड़ेगा.

मांसाहार मानव सभ्यता की मजबूरी है लेकिन यह मानव सभ्यता के नाम पर कलंक तब बन जाता है जब बेजबान पशुओं की हत्या पर उत्सव मनाया जाने लगता है. पेट के लिए पशु को मारना भूखे की मजबूरी है लेकिन जन्नत या स्वर्ग के लालच में निरीह को मारना क्रूरता और जाहिलपन के सिवा कुछ नहीं.

पशुओं के प्रति करुणा के आधार पर शाकाहार अपनाना इंसानियत की सब से श्रेष्ठ अवस्था है लेकिन जो लोग मांस खाते हैं उन्हें गलत साबित करना उचित नहीं.

शाकाहार किसी भी धर्म का हिस्सा है ही नहीं क्योंकि सभी धर्मों में मांसभक्षण को जायज ठहराया गया है. बलिप्रथा और कुरबानी के नाम पर हर साल लाखोंकरोड़ों जीवों की हत्याएं की जाती हैं. जो लोग शाकाहार को धर्म से जोड़ते हैं, दरअसल, वे ढकोसला करते हैं.

शाकाहार तो नैतिकता और मानवता का एक उत्कृष्ट रूप है जिस में आप करुणा के आधार पर जीवहत्या से परहेज करते हैं लेकिन शाकाहार की यह उत्कृष्ट सोच जब वीगनिज्म के रूप में शाकाहारवाद बन जाती है तब यह विशुद्ध नौटंकी बन जाती है.

दुनिया के 10 सब से खुशहाल देशों को ही देख लीजिए, वहां के 99 फीसदी लोग मांसाहारी हैं. इस के बावजूद पर्यावरण और प्रकृति को संरक्षित रखने में किसी वीगन से ज्यादा समझ रखते हैं. हमारे देश भारत में नएनए वीगन बने लोगों को पशुओं की चिंता है लेकिन अपने देश के पर्यावरण और प्रकृति की कोई चिंता नहीं है. इन मौडर्न वीगन लोगों को सब से पहले यमुना-गंगा जैसी जीवनदायी नदियों के नाला बन जाने की चिंता होनी चाहिए.

जल, जंगल, जमीन को प्राइवेट कंपनियों को कौडि़यों के भाव बेचा जा रहा है. पढ़ेलिखे युवाओं के पास रोजगार नहीं है. भूख और कुपोषण से हर साल 20 लाख से ज्यादा बच्चे मर जाते हैं. देश की एक बड़ी आबादी के पास रहने को एक अदद छत भी मयस्सर नहीं. देश के 20 प्रतिशत लोग फुटपाथों और झुग्गियों की सड़ांध में जिंदगी काटने को मजबूर हैं. 2 करोड़ औरतें वेश्यावृत्ति के नरक में पड़ी हैं. नएनए वीगनों को जब इंसानियत की इस भीषण बरबादी से कोई फर्क नहीं पड़ता तो फिर वीगनिज्म के नाम पर पशुप्रेम की नौटंकी किसलिए? शाकाहारी बनिए लेकिन इन नए बने वीगनों से परहेज कीजिए.

Bridge Collapse : पुल टूटे “जनता भुगते”

Bridge Collapse : भारत के ज्यादातर राज्यों में बरसात के मौसम में अकसर पुल ढहने की घटनाएं घटती हैं. इन्हें आपदाओं का हिस्सा मान लिया जाता है जबकि ये प्राकृतिक कम व मानवनिर्मित घटनाएं ज्यादा होती हैं.

भारत में बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से तो हो रहा है लेकिन हाल के वर्षों में बारबार होने वाली पुल ढहने की घटनाएं इस प्रगति पर सवाल उठाती हैं. ये हादसे न केवल जानमाल के नुकसान का कारण बनते हैं, बल्कि निर्माण गुणवत्ता, रखरखाव और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करते हैं. बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में हाल की घटनाएं, जैसे 2025 में पुणे और वडोदरा में हुए हादसे, इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करते हैं. वहीं, असम में बना देश का सब से पुराना पुल ‘नामदांग ब्रिज’ आज भी मजबूती से खड़ा है और लोगों व वाहनों के प्रयोग में है.

यह पुल (नामदांग ब्रिज) 1703 में अहोम राजा रुद्र सिंह द्वितीय द्वारा नामदांग नदी पर बनवाया गया था. इस की खासीयत यह है कि इसे एक ही पत्थर के टुकड़े से बनाया गया है. वहीं, इस के निर्माण में चावल, अंडे, काली दाल और नीबू जैसी सामग्रियों का उपयोग किया गया था. यह पुल 3 शताब्दियों से अधिक समय तक भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को सहन कर आज भी मजबूत स्थिति में है और उपयोग में है. यही नहीं, इस के अलावा कुछ अन्य ऐतिहासिक पुल, जैसे जौनपुर का शाही पुल (1568-69 में बादशाह अकबर द्वारा निर्मित) और इलाहाबाद का नैनी ब्रिज (1865 में अंगरेजों द्वारा निर्मित) भी उपयोग में हैं.

शताब्दियां गुजरने के बाद भी ये पुल न केवल उपयोग में हैं बल्कि प्रयागराज के नैनी पुल पर से तो दिनभर में दिल्ली, हावड़ा और पूर्वोत्तर की दर्जनों जोड़ी ट्रेनें पूरी रफ्तार से गुजरती भी हैं. हर साल बारिश में यह पुल यमुना नदी का उफान भी आराम से ?ोलता है तो सवाल यहीं खड़ा होता है कि आखिर हाल के बने पुल या कुछ वर्षों पहले के पुल कभी बरसात में या बिना बरसात के भी हादसों के क्यों शिकार हो रहे हैं? तकनीकी जानकार तो बस यही कहते हैं कि पुलों की डिजाइनों में तकनीकी त्रुटियां, जैसे गलत लोड गणना, पर्यावरणीय कारकों (जैसे भूकंप या हवा) की अनदेखी और अपर्याप्त नींव डिजाइन हादसों का कारण बनते हैं.

ढहते अधकचरे पुल

हाल में मध्य प्रदेश के भोपाल में एक निर्माणाधीन पुल इसलिए चर्चित हो गया कि उस में एक जगह 90 डिग्री का मोड़ आ गया. कुछ निलंबन के बाद मामला फिलहाल ठंडा है. एक और उदाहरण देखिए, 2022 में गुजरात के मोरबी में मच्छू नदी पर बना केबल पुल ढह गया, जिस में विशेषज्ञों ने डिजाइन और मरम्मत में खामियों को जिम्मेदार ठहराया.

एक शैक्षिक अध्ययन 2019 के अनुसार, डिजाइन की कमियां 20-25 फीसदी पुल हादसों में योगदान देती हैं. निर्माण में निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री का उपयोग, जैसे कमजोर सीमेंट, सरिया या अन्य सामग्री, पुलों की संरचनात्मक अखंडता को प्रभावित करता है.

पुलों के निर्माण में गलत डिजाइन की बात तो होती है लेकिन गुणवत्ता पर चर्चा कम ही होती है. एक तकनीकी जानकार का कहना है कि पुल पर सड़क हादसे डिजाइन में तकनीकी गड़बड़ी से तो हो सकते हैं लेकिन उस के ढहने के पीछे अधिकांश मामलों में निम्न गुणवत्ता ही होती है.

काबिले गौर है कि बिहार में 2024 में हुए 15 पुल हादसों में ठेकेदारों पर निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री और खराब कारीगरी के आरोप लगे थे. उदाहरण के लिए, भागलपुर में 1,717 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा अगुवानी-सुल्तानगंज पुल तीन बार ढह चुका है, जिसे विशेषज्ञों ने खराब सामग्री और निर्माण प्रक्रिया से जोड़ा. पुलों पर निर्धारित क्षमता से अधिक भार डालना, जैसे भारी वाहनों या भीड़ का दबाव, ढहने का एक प्रमुख कारण है.

क्या कारण है इन हादसों का

2022 के मोरबी हादसे में पैदल पुल पर क्षमता से अधिक भीड़ के कारण 141 लोगों की मौत हुई. इसी तरह, बिहार के सहरसा में एक पुराना पुल ओवरलोडेड ट्रैक्टर के कारण ढह गया. शोध के अनुसार, 3-5 फीसदी पुल हादसे ओवरलोडिंग से संबंधित होते हैं. पुराने पुलों का नियमित रखरखाव न होना एक गंभीर समस्या है. कई पुल, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, दशकों तक बिना निरीक्षण या मरम्मत के उपयोग में रहते हैं. 2025 में वडोदरा में गंभीरा पुल (40 वर्ष पुराना) ढहने की घटना में रखरखाव की लंबे समय से अनदेखी को कारण बताया गया.

भारतीय पुल प्रबंधन (आईबीएमएस) के अनुसार, देश में 1,72,517 बड़े और छोटे पुल हैं, जिन में से कई पुराने और जर्जर हैं. उधर नदियों में अवैध बालू खनन से पुलों की नींव कमजोर होती है, जिस से उन के ढहने का खतरा बढ़ता है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह एक आम समस्या है. उदाहरण के लिए, कोसी नदी पर बने कई पुलों के ढहने में अवैध खनन को एक कारक माना गया.

निर्माण प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, जैसे लागत कम करने के लिए नियमों की अनदेखी, निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री का उपयोग और अपर्याप्त निरीक्षण हादसों के प्रमुख कारण हैं. जैसे, मोरबी हादसे में मरम्मत के बाद बिना फिटनैस सर्टिफिकेट के पुल को खोलना लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण था.

बिहार में 2024 में हुए हादसों में ठेकेदारों और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, लेकिन जवाबदेही तय करने में कमी देखी गई. प्राकृतिक आपदाएं, जैसे बाढ़, भारी बारिश और भूकंप भारत में पुल ढहने के प्रमुख कारण हैं. नदियों में तेज प्रवाह और बाढ़ के कारण होने वाला स्काउर प्रभाव (नींव के पास मिट्टी का क्षरण) पुलों की नींव को कमजोर करता है. उदाहरण के लिए, 2016 में महाराष्ट्र के महाद में सावित्री नदी पर बना 100 साल पुराना पुल भारी बारिश के कारण ढह गया, जिस में 28 लोगों की मौत हुई. इसी तरह, बिहार में कोसी और गंगा जैसी नदियों पर बने कई पुल बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं.

क्या कहते हैं शोध

एक शोध के अनुसार, 80 फीसदी से अधिक पुल हादसे प्राकृतिक कारकों से जुड़े हैं. भारत में पुलों की औसत आयु 34.5 वर्ष है, जो वैश्विक औसत (50 वर्ष) से काफी कम है. यह भी गौरतलब है कि केवल बिहार में 2024 के हादसों में 1,200-1,700 करोड़ रुपए के प्रोजैक्ट प्रभावित हुए. 2020 में एक अध्ययन किया गया था. इस का नाम था ‘भारत में 1977 से 2017 तक पुलों के टूटने का विश्लेषण’. यह अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ‘स्ट्रक्चर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग’ में प्रकाशित हुआ था.

इस अध्ययन में कहा गया कि पिछले 40 सालों में 2,130 पुल ढह गए. उन में से अधिकांश निर्माण चरण में थे. वहीं 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक सड़क परिवहन मंत्रालय ने राज्यसभा को जानकारी दी थी कि पिछले 3 सालों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 21 पुल ढह गए. इन में से 15 पुल बने हुए थे और 6 निर्माणाधीन थे. इस दौरान एक और अध्ययन सामने आया है. अध्ययन में 2,010 पुलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. इस में पाया गया कि भारत में पुलों के टूटने का सब से बड़ा कारण प्राकृतिक आपदाएं हैं. लगभग 80.3 फीसदी पुल प्राकृतिक आपदाओं के कारण टूटे.

इस के अलावा, 10.1 फीसदी पुल सामग्री की खराबी के कारण टूटे, जबकि 3.28 फीसदी पुल ओवरलोडिंग के कारण टूटे.

जांच, पर आंच नहीं

देश में हादसों के बाद जांच कमेटी बनती है,जांच होती है लेकिन नतीजा कभी नहीं निकलता. कुछ निलंबन तक कार्रवाई सिमट जाती है. भारत में पुल गिरने की घटनाएं एक जटिल और बहुआयामी समस्या है, जिस में प्राकृतिक, तकनीकी और मानवीय कारक शामिल हैं. ऐसा नहीं है कि समस्या का समाधान नहीं है. है, दरअसल, इन हादसों से बचने के लिए पुलों का नियमित निरीक्षण, परीक्षण और मरम्मत करना बहुत जरूरी है.

पुलों के नियमित निरीक्षण, परीक्षण और मरम्मत के साथ पुलों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलों पर ओवरलोडिंग न हो. अगर हम ये कदम उठाएंगे तो हम लोगों की जान बचा सकते हैं. नियमित निरीक्षण, परीक्षण, रिपोर्टिंग और बहाली के लिए सुधारात्मक उपाय ऐसी आपदाओं को कम करेंगे.

हाल के वर्षों में पुल ढहने की कई घटनाएं घटित हुई हैं. ये बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को उजागर करती हैं. यह मुद्दा जटिल है और विभिन्न पक्षों के बीच जवाबदेही व सुधारों पर मतभेद हैं. इन हादसों को रोकने के लिए सरकार, इंजीनियरिंग समुदाय और नागरिकों को मिल कर एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो गुणवत्तापूर्ण निर्माण, नियमित रखरखाव और जवाबदेही सुनिश्चित करे, केवल तभी भारत सुरक्षित और टिकाऊ बुनियादी ढांचे की दिशा में आगे बढ़ सकता है.

USA : चुनाव का हक छीनने को बेचैन ट्रंप भी

USA : भारत की ही तरह अमेरिका में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराता जा रहा है. लगातार वहां की संवैधानिक संस्थाओं पर मागावाद का प्रहार हो रहा है, जिस की लगाम खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में है और वे वहां लोकतंत्र को लगातार कमजोर करने की जुगत में रहते हैं.

भारत की तरह अमेरिका में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराता जा रहा है. यह धु्रवीकरण कई स्तरों पर दिखाई दे रहा है- राजनीतिक विचारधाराओं, मीडिया, सामाजिक मुद्दों और यहां तक कि वैज्ञानिक तथ्यों पर भी गहरी असहमति दिखाई दे रही है.

जिस तरह भारत में 2 बड़ी राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद, नफरत और एकदूसरे पर आरोपोंप्रत्यारोपों की बौछार करने की प्रवृत्ति चरम पर है, उसी तर्ज पर अमेरिका में भी दोनों प्रमुख सियासी पार्टियों रिपब्लिकन और डैमोक्रेट्स के बीच वैचारिक दूरी बढ़ रही है.

रिपब्लिकन और डैमोक्रेटिक पार्टियों के बीच विचारधारा का फासला पिछले कुछ दशकों में बढ़ा है, जिस के चलते देश को सफलतापूर्वक चलाने का उन का आपसी सहयोग चरमरा गया है, खासकर, डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में दोबारा आने के बाद गन कंट्रोल, अबौर्शन, माइग्रेशन, वोटिंग राइट्स आदि मुददों पर विपक्ष ही नहीं, आम अमेरिकी भी ट्रंप सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं.

ट्रंप की बयानबाजी

अमेरिका में नस्लीय असमानता, पुलिस की बर्बरता और श्वेत बनाम गैरश्वेत मुद्दे काफी गर्म हैं. उस पर ट्रंप की शैली और बयानबाजी ने अमेरिकी राजनीति में ध्रुवीकरण को और तेज किया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नीत रिपब्लिकन पार्टी ध्रुवीकरण की बदौलत उसी तरह सत्ता में मजबूती बनाए रखना चाहती है जैसे भारत में भारतीय जनता पार्टी. दोनों ही देशों में ध्रुवीकरण का खेल शैक्षिक स्तर पर सब से अधिक नजर आने लगा है.

भारत में जहां शिक्षा नीति बिलकुल फेल हो चुकी है, देश के एक बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या निरंतर घटती जा रही है, स्कूलों का विलय कर बच्चों को शिक्षा से दूर किया जा रहा है, वहीं अमेरिका में भी बच्चों की शिक्षा के प्रति कोई खास दिलचस्पी ट्रंप सरकार की नहीं है. अमेरिका में आएदिन स्कूलों में बच्चों द्वारा गोलीबारी किए जाने की खबरें आती रहती हैं.

रिपब्लिकन नेता रूढि़वादी मानसिकता से ग्रस्त हैं. वे स्त्रियों को स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे संघ और भाजपा की मानसिकता स्त्रियों को सिर्फ घर और धर्म के चक्रव्यूह में फंसाए रखने की है. उस के नेता पढ़ेलिखे हों या न हों, मगर पूजापाठी अवश्य हों. बिलकुल यही सोच रिपब्लिकन पार्टी की भी है. रिपब्लिकन उन मतदाताओं का अधिक प्रतिनिधित्व करते हैं जिन के पास कालेज की डिग्री तो नहीं है मगर वे गोरी चमड़ी वाले और जीसस क्राइस्ट में गहरा विश्वास रखने वाले हैं. इस के विपरीत विपक्षी डैमोक्रेट्स प्रामाणिक विशेषज्ञों का पक्ष लेते हैं और शिक्षा व विज्ञान को ज्यादा महत्त्व देते हैं.

मुश्किल दौर में अमेरिका

रिपब्लिकन विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थाओं के प्रति संदेह जताते हैं. डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद बढ़ते ध्रुवीकरण के कारण अमेरिका में विधायी गतिरोध पैदा हो गया है. स्वास्थ्य सेवा, आप्रवासन और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे इस गतिरोध के शिकार बन गए हैं. जाहिर है, ऐसे गतिरोध लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कम करते हैं और दबाव वाले मुद्दों से निबटने में सरकार की क्षमता को प्रभावित करते हैं.

अमेरिका इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा है. आप्रवासन एक बड़ा विभाजनकारी मुद्दा बना हुआ है. ट्रंप प्रशासन ने कई आक्रामक नीतियां लागू की हैं, जिन से इस मसले पर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है और बड़े पैमाने पर ट्रंप सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं. सरकार के आदेश पर अनेक देशों के आप्रवासी लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें जंजीरों में जकड़ कर उन के देश वापस भेजा गया. भारत उन में से एक है.

अनुमान है, आने वाले वक्त में ट्रंप के कार्यकाल में लाखों अवैध आप्रवासियों को अमेरिका से निकाला जाएगा. इस के लिए उन्होंने ‘वन बिग ब्यूटीफुल बिल’ भी पेश किया है. यह एक व्यापक विधायी प्रस्ताव है, जो इन कदमों के लिए अरबों डौलर आवंटित करता है. इन में सालाना 10 लाख लोगों को अमेरिका से बाहर निकालने और सीमाओं पर दीवार खड़ी करने के लिए धन मुहैया कराना शामिल है.

मतदान का मुद्दा

जिस तरह भारत में चुनाव आयोग ने लोगों की नागरिकता की जांच के नाम पर वोटर लिस्ट से लाखों नागरिकों के नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की है, बिलकुल उसी तरह अमेरिका में ट्रंप प्रशासन अमेरिकियों से उन के मत का अधिकार छीनने की कोशिश में है.

वर्ष 2017-2021 के बीच भी डोनाल्ड ट्रंप ने मतदान अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की थी. इस के लिए उन्होंने ‘मेल इन वोटिंग’ का विरोध किया था, यानी आप चिट्ठी या मेल द्वारा अपने मत का इस्तेमाल नेता को चुनने के लिए नहीं कर सकते. इस के लिए ट्रंप ने तर्क दिए कि मेल द्वारा मतदान धोखाधड़ी को बढ़ावा देता है, जबकि उन के वक्तव्य के पीछे कोई ठोस प्रमाण नहीं था.

दरअसल, 2020 के चुनाव में कोविड-19 के कारण बहुत से लोग मेल से मतदान करना चाहते थे. लेकिन ट्रंप ने इसे ले कर देशभर में अविश्वास फैलाया और मतदाता पहचानपत्र के साथ मतदान केंद्र पर होने वाले मतदान को ही वास्तविक चुनाव करार दिया. उन के इस प्रोपेगेंडा के कारण कई बुजुर्ग, महिलाएं और कोविड से पीडि़त लोग मतदान के अपने हक से वंचित रह गए.

तब डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, ‘मैं मानता हूं कि बहुत से लोग ईमेल से मतदान में फर्जीवाड़ा करेंगे. मेरा मानना है कि लोगों को मतदाता पहचानपत्र के साथ मतदान करना चाहिए. मैं मानता हूं कि मतदाता पहचानपत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है और यही वजह है कि वे मतदाता पहचानपत्र नहीं चाहते क्योंकि वे फर्जीवाड़ा करना चाहते हैं.’

अगस्त 2020 में एसपीएस (डाक सेवा) को फंड देने का ट्रंप ने विरोध किया था, जिस के पीछे असली मकसद मेल-इन वोटिंग को अवरुद्ध करना था. हाल ही में मार्च 2025 में उन्होंने एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिस में फैडरल वोट के लिए नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता और चुनाव के बाद आने वाले मेल-इन बैलेट्स को अमान्य करने जैसे प्रावधान हैं. ट्रंप के इस ई-और्डर को ले कर कई राज्यों ने फंडिंग के दबाव या कानूनी चुनौतियों के चलते मेल-इन वोटिंग को सीमित करने का निर्णय लिया है.

विपक्षी पार्टी के समर्थकों, अल्पसंख्यकों, गरीबों, बुजुर्गों और काले अमेरिकी नागरिकों को मतदान से दूर रखने के लिए ट्रंप आईडी कानून यानी सख्त पहचानपत्र की जरूरत को अनिवार्य करने की कोशिश कर रहे हैं. इस के साथ ही, वहां मतदान केंद्रों की संख्या को भी कम कर दिया गया है. नतीजा यह कि मतदान केंद्र दूरदूर होने से अधिक उम्र के मतदाता और महिलाएं अपने मत का प्रयोग नहीं कर पाएंगे.

तीसरा काम अमेरिका में मतदाता सूची से नागरिकों के नाम हटाने का चल रहा है जैसे यहां बिहार में चुनाव आयोग द्वारा किया जा रहा है. ट्रंप प्रशासन ने फैडरल और राज्य स्तर पर ऐसी व्यवस्था की है जिस से विरोधी विचारधारा के मतदाताओं को वोट देने से रोका जा सके. ट्रंप प्रशासन नागरिक मताधिकार को सीधे छीनने की दिशा में तो मूव नहीं कर रहा लेकिन संघीय डेटा संग्रह और एसएवीई डेटाबेस को वोटर सूची से जोड़ कर यह प्रक्रिया तैयार की जा रही है.

मतदाता सूचियों में हस्तक्षेप करने की साजिश

गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के न्याय विभाग यानी डीओजे, ट्रंप प्रशासन के निर्देशन में, कम से कम 9 राज्यों, जैसे न्यू हैम्पशायर, कोलोराडो, मिनेसोटा आदि से उन की पूरी वोटर लिस्ट, सक्रिय और निष्क्रिय मतदाताओं के नामों सहित, मांगी है. यह मांग फैडरल मिड टर्म 2026 की तैयारी के तहत की जा रही है. यह संघीय स्तर पर मतदाता सूचियों में हस्तक्षेप करने की साजिश है.

इस के साथ ही आंतरिक सुरक्षा की एससीआईएस इकाई एसएवीई का दायरा बढ़ाया गया है, ताकि यह एक राष्ट्रीय नागरिकता डेटाबेस के रूप में काम करे. ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य इसे नागरिकता सत्यापन में इस्तेमाल करना है, खासकर, वोटर सूची से उन गैरनागरिकों को हटाने के लिए जो दशकों से वहां रह रहे हैं.

ट्रंप ने मार्च 2025 में एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिस में डौक्यूमैंट्री प्रूफ औफ सिटिजनशिप को अनिवार्य करना और मेल-इन वोटों में कड़ाई लाना शामिल है. इस के तहत फैडरल वोटर पंजीकरण फौर्म में नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण (पासपोर्ट/सिटिजन प्रमाणपत्र) अनिवार्य किया गया है. मेल-इन वोटों को तभी स्वीकार किया जाएगा जब वे चुनाव के दिन ही प्राप्त होंगे. ट्रंप के आदेश को अनफौलो करने वाले राज्यों पर संघीय निधि रोकने का प्रावधान किया गया है ताकि राज्य दबाव में इन आदेशों का पालन करें.

लोकतंत्र के लिए खतरा

ट्रंप के फैसले न सिर्फ एक बड़े लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं बल्कि लोगों से उन के सिविल राइट्स छीन रहे हैं. 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद ट्रंप ने बिना ठोस सुबूत के बारबार यह दावा किया कि चुनाव ‘चोरी’ हुआ है. इस से जनता का चुनावी प्रक्रिया में विश्वास कमजोर हुआ और लोकतंत्र की नींव, यानी शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण, पर एक अनदेखा हमला हुआ.

6 जनवरी, 2021 को ट्रंप के समर्थकों ने अमेरिकी संसद भवन (कैपिटल हिल) पर हमला किया, जिस में ट्रंप की भड़काऊ भाषण की बड़ी भूमिका मानी जाती है. उस घटना ने भी लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून के शासन पर सीधा हमला किया.

ट्रंप ने अपने कार्यकाल में न्याय विभाग, एफबीआई और अन्य स्वतंत्र एजेंसियों को निजी हितों के लिए प्रभावित करने की कोशिश की. इस से संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर सवाल उठे. यह बिलकुल वैसा ही है जैसे भारत में भाजपा नीत केंद्र सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों- सीबीआई, एनआईए या प्रवर्तन निदेशालय का दुरुपयोग अपने हित साधने के लिए करती है.

आलोचकों का मानना है कि ट्रंप की नीतियां अमेरिकी लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाली हैं. संवैधानिक संस्थाओं, प्रैस और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली पर हमले लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सकते हैं.

गौरतलब है कि स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है, जिसे कमजोर करना लोकतंत्र के लिए खतरा है. ट्रंप ने मीडिया को ‘देश का दुश्मन’ कहा और असहमति रखने वाले पत्रकारों पर व्यक्तिगत हमले किए. लोकतंत्र के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिहाज से ये सब बेहद चिंताजनक हैं न सिर्फ अमेरिका के लिए बल्कि भारत सहित दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक देशों के लिए भी, जो अमेरिका को एक आदर्श के रूप में देखते आए हैं.

Social Story In Hindi : पप्पू प्रसाद का बाघ दर्शन

Social Story In Hindi : पप्पू प्रसाद को एक ही दुख है कि उस ने अब तक जंगल में जिंदा बाघ नहीं देखा. जंगलात की नौकरी करते हुए उसे 20 साल बीत गए लेकिन जंगल में विचरते हुए जिंदा बाघ नहीं देखा. बड़े साहब के साथ क्षेत्रीय दौरे के दौरान वनों का चप्पाचप्पा छान डाला लेकिन पशुराज से आमनेसामने मुलाकात अब तक नहीं हो पाई.

पप्पू प्रसाद के दिवंगत पिता हरिहर प्रसाद वन विभाग में वनरक्षक थे. 16 साल की उम्र में ही पितृवियोग हो जाने पर पप्पू की मां नाबालिग पप्पू को ले कर वन विभाग के बड़े साहब के पास जा कर बोली, ‘‘साहब, अब हमारे घर में रोटी कमाने वाला कोई नहीं रह गया. इस बालक के प्रति आप को कृपा करनी ही होगी.’’

पप्पू की मां बहुत रोई. रोती हुई मां का हाथ पकड़ कर खड़े बेचारे नाबालिग पप्पू को देख कर बड़े साहब की मेमसाहिबा ने उसे वन विभाग में नौकरी दिलाने के लिए बड़े साहब से सिफारिश की.

बड़े साहब ने कहा, ‘‘बच्चा अभी छोटा है, फिलहाल यह लड़का दैनिक मजदूर के तौर पर खलासी का कार्य करता रहे, समय आने पर पक्का कर दिया जाएगा.’’

तभी से पप्पू प्रसाद बड़े साहब के घर पर खलासी का काम करता आ रहा है. जब कभी बड़े साहब जंगल के निरीक्षण के लिए दौरा करते पप्पू साहब का सामान ले कर जीप की पीछे वाली सीट पर बैठ कर साथ जाता था.

पप्पू के पिता हरिहर प्रसाद जब जीवित थे तब वे वनरक्षक चौकी पर सरकारी आवास में अपने परिवार के साथ ही रहते थे. पप्पू बचपन में हिरण, खरगोश, लोमड़ी, सियार, नील गाय वगैरह देखा करता था. तब भेडि़यों से जंगल के लोग बहुत डरेडरे रहते थे. रात में भेडि़यों की आवाज से सभी लोग भयभीत होते थे क्योंकि पालतू जानवरों के साथसाथ कभीकभी भेडि़ए छोटे बच्चों को भी पकड़ कर ले जाते थे. शाम होते ही हर आंगन में आग जलाई जाती थी और बच्चों को कमरे के अंदर बंद कर दिया जाता था. पप्पू ने इस प्रकार डरावने माहौल में बचपन बिताया था.

जंगल में बाघ तो देखा नहीं, लेकिन पप्पू ने बाघ के बारे में बहुत कुछ सुना था कि जंगल का ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो बाघ से डरता न हो. हर वन्यप्राणी की कोशिश यही रहती है कि बाघ से किस प्रकार बचा रहे. पप्पू ने यह भी जाना कि बाघ जब भी जंगल में घूमताफिरता है तब जंगल के अन्य पशुपक्षी अलगअलग तरह की त्रासदी भरी आवाज निकाल कर एकदूसरे को सचेत किया करते हैं ताकि जंगल के निरीह वन्यजीव अपना और अपने छोटेछोटे बच्चों का बचाव करने का प्रयास कर सकें.

बड़े साहब का खलासी होने के बाद पप्पू प्रसाद की योगेन यादव के साथ दोस्ती हुई. योगेन यादव व्याघ्र संरक्षण परियोजना में वनरक्षक था. योगेन यादव से पप्पू प्रसाद को जानकारी मिली कि जंगल में बाघों की संख्या बहुत कम हो चुकी है. पप्पू की सम?ा में नहीं आया कि सब से शक्तिशाली बाघ का विनाश कैसे हो रहा है? आएदिन तो सुनाई देता है कि गांव में पालतू पशुओं को बाघ मार देता है. बडे़ साहब बहुत परेशान रहते हैं.

एक दिन पप्पू प्रसाद ने बड़े साहब के साथ जंगल में गश्त करते वक्त नदी के किनारे एक मरे हुए बाघ को देखा. बाघ की हड्डियां, उस के नाखून, दांत और जननेंद्रिय निकाल कर कोई ले गया था. आंख, दांत, हड्डीविहीन मरे हुए बाघ को देख कर पप्पू को नहीं लगा कि बाघ बहुत शक्तिशाली प्राणी है.

मरे पशुराज की हालत देख कर पप्पू को दुख हो रहा था. बगल में खड़े योगेन यादव से उस ने फुसफुसा कर पूछा, ‘‘बाघ की ऐसी हालत किस ने बनाई?’’

योगेन धीरे से बोला, ‘‘इस के पीछे बहुत बड़ा गिरोह है,’’ इतना कह कर वह चुप हो गया, क्योंकि मरे बाघ की जांच पड़ताल के लिए नापजोख चल रही थी. पप्पू ने देखा कि मरे बाघ के सामने वाले बाएं पैर का पंजा लोहे के बनाए फंदे में फंसा हुआ था. पंजे का आधे से ज्यादा हिस्सा कट कर फंदे के दोनों फलक के बीच में मजबूती से कसा हुआ था. असहाय बाघ के पैर में फंसे फंदे को निकालने की कोशिश का सुबूत नजदीक की जमीन पर पंजों की निशानी के रूप में था.

गांव वालों से पूछताछ करने पर जानकारी मिली कि कुछ दिन पहले एक बाघ अपने जख्म से रात भर कराहता रहा जिस की आवाज गांव वालों को सुनाई दी. जांचपड़ताल का नतीजा यह निकला कि शिकारी तस्करों ने बाघ के आनेजाने के रास्ते पर लोहे का फंदा छिपा कर रखा था, उस में उस का पैर फंस गया. फंदे में फंसे पैर की तीव्र पीड़ा से बाघ रात भर आर्तनाद करता रहा. बाद में घाव विषाक्त हो जाने से उस की मृत्यु हो गई.

पप्पू सोचने लगा कि तस्कर शिकारी कितने नृशंस हैं कि बाघ जैसे निर्भीक जानवर को निर्ममता से मारते हैं. उस की समझ में यह नहीं आया कि बाघ की हड्डियों, दांतों, नाखूनों तथा जननेंद्रिय को किस ने तथा क्यों निकाला होगा?

जांचपड़ताल में शाम हो चुकी थी. जांचदल के साथ पप्पू वन विश्रामगृह में वापस आया. रात को खाने के लिए योगेन यादव के यहां निमंत्रण था. वहां पर पप्पू ने यह बात छेड़ी, ‘‘मरे हुए बाघ की हड्डियों, दांतों को किस ने निकाला होगा?

योगेन यादव ने निराशा भरे भाव से कहा, ‘‘तस्कर शिकारियों ने.’’

फिर गले में भरी खराश को निकालते हुए योगेन ने बताना शुरू किया, ‘‘बाघ तस्कर बडे़ ही शातिर होते हैं. वे लोग बंजारों के रूप में जंगल के किनारे डेरा डालते हैं और सरल वनवासियों से बाघों के बारे में सूचना जमा करते हैं. समुचित जानकारी के बाद वे बाघ के आवागमन के रास्ते पर लोहे का फंदा बिछा कर या बंदूक की गोली से उन का शिकार करते हैं.’’

बीच में पप्पू ने फिर पूछा, ‘‘बाघों की हड्डियों, दांतों, नाखूनों एवं जननेंद्रिय क्यों निकाली जाती हैं?’’

योगेन यादव ने उदासी भरी आवाज में बताया, ‘‘यही तो सब से बड़ी विडंबना है. विदेशों में यह माना जाता है कि बाघ की हड्डियां, नाखून, दांत तथा जननेंद्रिय शक्ति से भरे रहते हैं और इन सब से बनी शक्तिवर्धक दवाएं पीने से आदमी भी बाघ की तरह जोशीले, शक्तिशाली एवं बलवान हो जाएंगे. वहां बाघों की हड्डी, चमड़ा आदि का बहुत बड़ा बाजार है. शिकारी तस्कर पैसा कमाने के लिए मरे हुए बाघ की खाल, हड्डियां आदि चोरी से विदेशों में भेजते हैं.’’

पप्पू यह सुन कर अचंभित हो गया. बाघ जैसे शक्तिशाली जीव के प्रति उस को दया आने लगी. दूसरे दिन सुबह जब बड़े साहब की जीप में पीछे बैठ कर पप्पू वापस जा रहा था तब उस के दिल में यह विचार आया कि बाघ को चोरीछिपे मारने वाले तस्कर तो बाघ से भी ज्यादा बुद्धिमान एवं बलवान हैं. तब उन तस्करों की हड्डियों आदि अंगप्रत्यंगों से अधिक शक्तिशाली दवा बनाने की सोच मनुष्य के दिमाग में क्यों नहीं आई.

उस बार भी विषादग्रस्त पप्पू का मन जिंदा बाघ न दिखाई पड़ने पर खेद से भर गया.

एक दिन बड़े साहब के पास खबर आई कि गांव के जंगल की सीमा पर चरवाहे के छप्पर के नजदीक एक मरा बाघ मिला है. बड़े साहब तुरंत घटना की तफतीश करने के लिए निकल पड़े. जीप में पीछे बैठे पप्पू को लगा कि शायद इस बार मरे बाघ के साथसाथ वह एक जिंदा बाघ का भी दर्शन कर ले. दिनभर जीप से चलने के बाद बड़े साहब जब मरे बाघ के पास पहुंचे तब पप्पू प्रसाद ने देखा कि योगेन यादव पहले से ही वहां पहुंच चुका था और बाघ के मरने से संबंधित सूचनाएं जमा कर चुका था.

योगेन यादव के अनुसार बाघ ने कुछ दिन पहले चरवाहों की एक भैंस को मार डाला था. गांव वाले चरवाहों ने मृत भैंस के मांस में विषाक्त पदार्थ डाल कर बाघ को मार डाला. पप्पू को यह जानकारी मिली कि बाघ एक बार शिकार करने के बाद कई दिन तक घूमफिर कर उसी शिकार को खाता रहता है. बाघ की इस आदत के बारे में चरवाहों को अच्छी तरह जानकारी थी. गांव वालों ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया.

इसी दौरान योगेन यादव को एकांत में मिलने पर पप्पू ने पूछा, ‘‘गांव वाले ऐसी स्थिति में बाघ को मारते क्यों हैं? क्या उन को जानकारी नहीं है कि हमारे देश की धरोहर इन बाघों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है?’’

योगेन ने हंसतेहंसते कहा, ‘‘भैया, बाघ की संख्या कम हो या बढ़े इस से गरीब चरवाहों को क्या लेनादेना? उन के रोजगार के सीमित साधनों में से एक भैंस का मर जाना कितना नुकसानदेह है, यह बात उन के सिवा और कोई नहीं समझ सकता.’’

पप्पू प्रसाद के मन में यह सुन कर विषाद छा गया. उस को लगा कि जिस दर से बाघों की संख्या कम होती जा रही है उस को देखते हुए अब जीवित बाघ का दर्शन नामुमकिन है.

बड़े साहब के साथ मुख्यालय वापसी के समय पप्पू के मन में आया कि क्यों न बाघ परियोजना की आय से ग्रामीण गरीबों को जोड़ा जाए जिस से उन को अपने जंगलों में रह रहे बाघों के प्रति लगाव हो, लेकिन वह तो महज एक चपरासी है. उस की बात कौन सुनेगा?

एक बार तो जंगल के बीचोंबीच रेल लाइन के ऊपर एक बाघिन और उस के 2 बच्चे टे्रन से कट कर मरने की जांच में बड़े साहब के साथ पप्पू भी जंगल गया था. दरअसल, अंगरेजों के समय में जंगल से लकड़ी ढोने के लिए यह रेल लाइन बनाई गई थी जो बाद में वनवासी यात्रियों के लिए इस्तेमाल होने लगी. अब हर वर्ष रेलगाड़ी से कुचल कर कई जंगली जानवर मर जाते हैं. योगेन यादव ने यह भी बताया कि टे्रन के आनेजाने और इंजन की आवाज से जंगली जानवरों का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और इस का उन की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है.

एक बार बड़े साहब के परिवार के साथ पिकनिक मनाने के लिए जीप में पीछे बैठ कर पप्पू जंगल गया. उस पार्टी में बड़े साहब के साथ उन का बेटा और मेमसाहिबा भी थीं. यह तय हुआ कि हाथी पर सवार हो कर बड़े साहब, मेमसाहिबा और उन का बेटा दलदली क्षेत्र में जाएंगे. बड़े साहब के बेटे को संभालने के लिए पप्पू को भी हाथी पर जाने का मौका मिला.

इस प्रकार घूमतेघूमते कब दिन ढल गया किसी को पता ही नहीं चला. सूर्यास्त के वक्त हाथी के महावतों के बीच में कुछ शोर सा उठा. फुसफुसाहट से पप्पू को पता चला कि दलदली बेंत के जंगल के बीच कोई बाघ लेटा है. सभी लोग हाथियों पर बैठ कर सांस थामे बाघ के दर्शन के लिए प्रतीक्षा करने लगे. हाथियों को भी बाघ के नजदीक होने का आभास हुआ. वे बारबार अपनी सूंड ऊंची कर हवा में बाघ की गंध पा कर उस की मौजूदगी का एहसास करने लगे.

पप्पू के लिए समस्या यह थी कि बाघ हाथी के सामने की ओर छिपा था. बड़े साहब और मेमसाहिबा सामने बैठी थीं. बाघ का स्पष्ट रूप से दर्शन हो नहीं सकता था. जब सभी लोग बाघ के बारे में फुसफुसा रहे थे तभी पप्पू ने इधरउधर झांका, क्योंकि वह बाघ दर्शन का यह अवसर कतई खोना नहीं चाहता था. उधर शाम की वेला थी. सूर्यास्त हो चुका था. निशब्द अंधकार धीरेधीरे छा रहा था. कोई उपाय न देख कर पप्पू हाथी पर खड़ा हो गया. तब बेंतों के जंगलों में एक पूंछ हिलती हुई दिखाई दी. पप्पू के खड़े होते ही बड़े साहब ने जोर से धमकी दी और पूरी पार्टी वापस चल दी. धमकी से आहत पप्पू ने अपने मन को भरोसा दिया, ‘‘जंगल के अंधेरे में चेहरा छिपा कर जो जीव अपने अस्तित्व का संकेत पूंछ हिला कर देता है उसी का नाम बाघ है.’’ Social Story In Hindi 

Family Story In Hindi : ठीक हो गए समीकरण

Family Story In Hindi : ‘प्रैक्टिकल होने का क्या फायदा? लौजिक बेकार की बात है. प्रिंसिपल जीवन में क्या दे पाते हैं? सिद्धांत केवल खोखले लोगों की डिक्शनरी के शब्द होते हैं, जो हमेशा डरडर कर जीवन जीते हैं. सचाई, ईमानदारी सब किताबी बातें हैं. आखिर इन का पालन कर के तुम ने कौन से झंडे गाड़ लिए,’’ सुकांत लगातार बोले जा रहा था और उसे लगा जैसे वह किसी कठघरे में खड़ी है. उस के जीवन यहां तक कि उस के वजूद की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. सारे समीकरण गलत व बेमानी साबित करने की कोशिश की जा रही है.

‘‘जो तुम कमिटमैंट की बात करती हो वह किस चिडि़या का नाम है… आज के जमाने में कमिटमैंट मात्र एक खोखले शब्द से ज्यादा और कुछ नहीं है. कौन टिकता है अपनी बात पर? अपने हित की न सोचो तो अपने सगे भी धोखा देते हैं और तुम हो कि सारी जिंदगी यही राग अलापती रहीं कि जो कहो, उसे पूरा करो.’’

‘‘तुम कहना चाहते हो कि झूठ और बेईमान ही केवल सफल होते हैं,’’ सुकांत की

इतनी कड़वी बातें सुनने के बावजूद वह उस की संकीर्ण मानसिकता के आगे झुकने को तैयार नहीं थी. आखिर कैसे वह उस की जिंदगी के सारे फलसफे को झुठला सकता है? जिस आदमी को उस ने अपनी जिंदगी के 25 साल दिए हैं, वही आज उस का मजाक उड़ा रहा है, उस की मेहनत, उस के काम और कबिलीयत सब को इस तरह से जोड़घटा रहा है मानो इन सब चीजों का आकलन कैलकुलेटर पर किया जाता हो. हालांकि जिस तरह से सुकांत की कनविंस व मैनीपुलेट करने की क्षमता है, उस के सामने कुछ पल के लिए तो उस ने भी स्वयं को एक फेल्योर के दर्जे में ला खड़ा किया था.

‘‘अगर तुम ने यह ईमानदारी और मेहनत का जामा पहनने के बजाय चापलूसी और डिप्लोमैसी से काम लिया होता तो आज अपने कैरियर की बुलंदियों को छू रही होती. सोचो तो उम्र के इस पड़ाव पर तुम कहां हो और तुम से जूनियर कहां निकल गए हैं. अचार डालोगी अपनी काबिलीयत का जब कोई पूछने वाला ही नहीं होगा,’’ सुकांत के चेहरे पर एक बीभत्सता छा गई थी. लग रहा था कि आज वह उस का अपमान करने को पूरी तरह से तैयार था. अपनी हीनता को छिपाने का इस से अच्छा तरीका और हो भी क्या सकता था उस के लिए कि वह उस के सम्मान के चीथड़े कर दे.

‘‘फिर तो तुम्हारे हिसाब से मैं ने जो ईमानदारी और पूर्ण समर्पण के साथ तुम्हारे साथ अपना रिश्ता निभाया, वह भी बेमानी है. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था,’’ उस ने थोड़ी तलखी से कहा.

‘‘मैं रिश्ते की बात नहीं कर रहा. दोनों चीजों को साथ न जोड़ो. मैं तुम्हारे कैरियर के बारे में बात कर रहा हूं,’’ सुकांत जैसे हर तरह से मोरचा संभाले था.

‘‘क्यों, यह बात तो हर चीज पर लागू होनी चाहिए. तुम अपने हिसाब से जब चाहो मानदंड तय नहीं कर सकते… और जहां तक मेरी बात है तो मैं अपने से संतुष्ट हूं खासकर अपने कैरियर से. तुम ने कभी न तो मुझे मान दिया है और न ही दे सकते हो, क्योंकि तुम्हारी मानसिकता में ऐसा करना है ही नहीं. किसे बरदाश्त कर सकते हो तुम,’’ न जाने कब का दबा आक्रोश मानो उस समय फूट पड़ा था. वह खुद हैरान थी कि आखिर उस में इतनी हिम्मत आ कहां से गई.

‘‘ज्यादा बकवास मत करो नीला, कहीं मेरा धैर्य न चुक जाए,’’ बौखला गया था सुकांत. इतना सीधा प्रहार इस से पहले नीला ने उस पर कभी नहीं किया था.

‘‘तुम्हारा धैर्य तो हमेशा बुलबुलों की तरह धधकता रहा है… मारोगे? गालियां दोगे? इस के सिवा तुम कर भी क्या सकते हो? अच्छा यही होगा हम इस बारे में और बात न करें,’’ नीला बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी. फायदा भी कुछ नहीं था. सुकांत जब पिछले 24 सालों में नहीं बदला तो अब क्या बदलेगा. जो अपनी पत्नी की इज्जत करना न जानता हो, उस से बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला था.

नीला को बस इसी बात का अफसोस था कि वह अपने बेटे को सुकांत के इन्फलुएंस से बचा नहीं पाई थी. पता नहीं क्यों नीरव को हमेशा लगता था कि पापा ही ठीक हैं. संस्कारों की जो पोटली उस ने बचपन में नीरव को सौंपी थी वह उस ने बड़े होने के साथ ही कहीं दुछती पर पटक दी थी. उस के बाद उसे कभी खोलने की कोशिश नहीं की. वह बहुत समझाती कि नीरव खुद अपनी आंखों से दुनिया देखो, पापा के चश्मे से नहीं. पर वह भी उस की बेइज्जती कर देता. उस की बात अनसुनी कर पापा के खेमे में शामिल हो जाता. वह मनमसोस कर रह जाती. स्कूलकालेज और उस के बाद अब नौकरी में भी वह पापा के बताए रास्ते पर ही चल रहा है.

अपने बेटे को गलत रास्ते पर जाते देखने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पा रही थी.

उस पीड़ा को वह दिनरात सह रही थी और नीरव की जिंदगी को ले कर ही वह उस समय सुकांत से लड़ पड़ी थी. विडंबना तो यह थी कि नीरव की बात करने के बजाय सुकांत उस की जिंदगी के पन्नों को ही उलटनेपलटने लगा था. यह सच था कि वह डिप्लोमैसी से सदा दूर रही और सिर्फ काम पर ही उस ने ध्यान दिया और इस वजह से वह बहुत तेजी से उन लोगों की तुलना में कामयाबी की सीढि़यां नहीं चढ़ पाई जो खुशामद और चालाकी की फास्ट स्पीड ट्रेन में बैठ आगे निकल गए थे. लेकिन उसे अफसोस नहीं था, क्योंकि उस की ईमानदारी ने उसे सम्मान दिलाया था.

कई बार सुकांत के रवैए को देख कर उस का भी विश्वास डगमगा जाता था पर वह संभल जाती थी या शायद उस की प्रवृत्ति में ही नहीं था किसी को धोखा देना.

‘‘और जो तुम नीरव को ले कर मुझे हमेशा ताना मारती रहती हो न, देखना एक दिन वह बहुत तरक्की करेगा. सही राह पर चल रहा है वह. बिलकुल वैसे ही जैसे आज के जमाने की जरूरत है. लोगों को धक्का न दो तो वे आप को धकेल कर आगे निकल जाते हैं.’’

नीला का मन कर रहा था कि वह जोरजोर से रोए और उस से कहे कि वह नीरव को मुहरा न बनाए. नीला को परास्त करने का मुहरा. सुकांत उसे देख रहा था मानो उस का उपहास उड़ा रहा हो.

कितनी देर हो गई है, नीरव क्यों नहीं आया अब तक. परेशान सी नीला बरामदे के चक्कर लगाने लगी. रात के 10 बज रहे थे. मोबाइल भी कनैक्ट नहीं हो रहा था उस का. मन में अनगिनत बुरे विचार चक्कर काटने लगे. कहीं कुछ हो तो नहीं गया… औफिस में भी कोई फोन नहीं उठा रहा था. सुकांत को तो शराब पीने के बाद होश ही नहीं रहता था. वह सो चुका था.

अचानक नीला का मोबाइल बजा. कोई अंजान नंबर था. फोन रिसीव करते हुए उस के हाथ थरथराए.

‘‘नीरव के घर से बोल रहे हैं?’’

नीला के मन की बुरी आशंकाएं फिर से सिर उठाने लगीं, ‘‘क्या हुआ उसे, वह ठीक तो है न? आप कौन बोल रहे हैं?’’ उस का स्वर कांप रहा था.

‘‘वैसे तो वे ठीक हैं, पर फिलहाल जेल में हैं, उन्हें अरैस्ट किया गया है. अपनी कंपनी में कोई घोटाला किया है उन्होंने. कंपनी के मालिक के कहने पर उन्हें हिरासत में ले लिया गया है.’’

तभी लाइन पर नीरव के दोस्त समर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आंटी मैं हूं नीरव के साथ. बस आप अंकल को भेज दीजिए. उस की जमानत हो जाएगी.’’

पूरी रात जेल में बीती उन तीनों की. नीला को नीरव को सलाखों के पीछे खड़ा देख लग रहा था कि वह सचमुच एक फेल्योर है. हैरानी की बात थी कि सुकांत एकदम चुप थे. न नीरव से, न ही नीला से कुछ कहा, बस उस की जमानत कराने की कोशिश में लगे रहे.

नीला को लगा नीरव को कुछ भलाबुरा कहना ठीक नहीं होगा. उस के चेहरे पर पछतावा और शर्मिंदगी साफ झलक रही थी. शायद मां ने उसे जो ईमानदारी का पाठ बचपन में सिखाया था, उसे ही वह आज मन ही मन दोहरा रहा था.

शाम हो गई थी उन्हें लौटतेलौटते. अपने को घसीटते हुए, अपनी सोच के दायरों में

चक्कर काटते हुए तीनों ही इतने थक चुके थे कि उन के शब्द भी मौन हो गए थे या शायद कभीकभी चुप्पी ही सब से बड़ा मरहम बन जाती है.

‘‘मुझे माफ कर दो मां,’’ नीरव उस की गोद में सिर रख कर सुबक उठा.

‘‘तू क्यों माफी मांग रहा है? गलती तो मेरी है. मैं ने ही तेरे मन में बेईमानी के बीज बोए, तुझे तरक्की करने के गलत रास्ते पर डाला. आज जो भी कुछ हुआ उस का जिम्मेदार मैं ही हूं और नीला मैं तुम्हारा भी गुनहगार हूं. सारी उम्र तुम्हें तिरस्कृत करता रहा, तुम्हारा उपहास उड़ाता रहा. सारे समीकरण गलत साबित कर दिए थे मैं ने. प्रिंसिपल ही जीवन में सब कुछ होते हैं, सिद्धांत खोखले लोगों की डिक्शनरी के शब्द नहीं वरन जीवन जीने का तरीका है. सचाई, ईमानदारी किताबी बातें नहीं हैं,’’ सुकांत लगातार बोले जा रहा था और नीला की आंखों से आंसू बहते जा रहे थे.

नीरव को जब उस ने सीने से लगाया तो लगा सच में आज उस की ममता जीत गई है. उस का खोया बेटा उसे मिल गया है. सारे समीकरण ठीक हो गए थे उस की जिंदगी के. Family Story In Hindi 

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