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Exclusive Interview : सुभद्रा महाजन – गर्भपात आज भी टैबू

Exclusive Interview : सुभद्रा महाजन का प्रोफैशनल कैरियर पत्रकारिता से शुरू हुआ और अब वे फिल्मसर्जक बन चुकी हैं. अपनी फिल्म में उन्होंने हिमाचली कल्चर को दिखाया है जिसे काफी सराहा भी गया है.

‘हर इंसान को जिंदगी दूसरा मौका देती है’ इस बात की वकालत करने के साथ भारत में टैबू समझे जाने वाले गर्भपात के मुद्दे पर आधारित अपनी पहली फीचर फिल्म ‘सेकंड चांस’ से ही पूरे विश्व में तहलका मचा देने वाली युवा फिल्मसर्जक सुभद्रा महाजन मूलतया शिमला, हिमाचल प्रदेश की रहने वाली हैं लेकिन उन की फिल्म भौगोलिक सीमाओं से परे कार्लोवी वैरी इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, बुसान इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, धर्मशाला इटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल सहित कई फिल्म फैस्टिवल्स में सम्मान बटोर चुकी है.

सुभद्रा महाजन पिछले 10-12 वर्षों से इंटरनैशनल फिल्मकार पैन नलिन के साथ जुड़ी हुई हैं. उन्होंने 2015 में रिलीज फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ की सहलेखक के रूप में पुरस्कार बटोरा था. उस फिल्म को विश्व के 60 देशों में दिखाया गया था तो वहीं वे औस्कर में जा चुकी फिल्म ‘द लास्ट शो’ में मुख्य सहायक निर्देशक थीं.

जब सुभद्रा से पूछा गया कि वे पत्रकार से फिल्मसर्जक बनने की यात्रा पर रोशनी डालेंगी, तो वे कहती हैं, ‘‘मैं ठेठ पहाड़ी हूं. मेरा जन्म, परवरिश और शिक्षा शिमला, हिमाचल प्रदेश में हुई. मेरी मां उमा महाजन लेखक हैं. उन की एक किताब ‘बिटवीन द वर्ल्ड’ काफी चर्चित हुई थी. इस वजह से मेरी भी क्रिएटिविटी व लेखन में रुचि रही है. मुझे मेरी स्कूल पत्रिका, ‘मेयो कालेज गर्ल्स स्कूल’ का संपादक बनाया गया था. उस के बाद मुझे यकीन हो गया कि मुझे पत्रकार बनना चाहिए.’’

‘‘मैं ने सेंट जेवियर्स कालेज, मुंबई से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री ली. मैं ने एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रिका और एक समाचार चैनल में इंटर्नशिप भी की. तब मुझे पता चला कि मैं सनसनी फैलाने और कौर्पोरेट एजेंडों के आगे झांकने के क्षेत्र में काम कर रही हूं, जबकि मेरे दिमाग में लोकतंत्र और चौथे स्तंभ का प्रहरी होने का जो उच्च आदर्श था, वह सच नहीं था.

‘‘उस समय मैं काफी निराश थी, लेकिन साथ ही, मैं कालेज में फिल्म क्लब में शामिल हो गई. वहीं पर मैं ने पहली बार विश्व सिनेमा देखा और उस ने मुझे चौंका दिया. वहां निकोलस, रे, सर्गेई, ईसेनस्टीन, आंद्रेई, टारकोवस्की और अकिरा कुरोसावा की क्लासिक फिल्में, साथ ही क्रिसटौफ किस्लोव्स्की, वोंग कार-वाई और पेड्रो अल्मोडोवर जैसे आधुनिक लेखक, कुछ ऐसे पहले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म निर्माता थे जिन से मेरा परिचय हुआ और शायद सब से ज्यादा प्रभाव डालने वाले माजिद माजीदी थे. फिर मैं ने सेंट जेवियर से ही फिल्म और टीवी में पोस्टग्रेजुएशन किया.

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि मुझे कालेज में भारतीय-फ्रैंच फिल्म निर्माता पैन नलिन के साथ पहली नौकरी मिली. मैं उन की बनाई पहली फिल्म ‘समसारा’ (2001) की बहुत बड़ी प्रशंसक थी. मैं ने पैन नलिन के साथ 10 साल से ज्यादा समय से काम कर रही हूं. बेशक सब से निचले पायदान से शुरू कर के अब उन की मुख्य सहायक निर्देशक और सहलेखक हूं. 2015 में ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ के सहलेखन से ले कर औस्कर जा चुकी फिल्म ‘द लास्ट शो’ में मुख्य सहायक निर्देशक के रूप में काम करते हुए मैं ने उन से बहुतकुछ सीखा. फिल्म मेकिंग में कला व क्रिएटिविटी के साथ बहुतकुछ क्राफ्ट व अनुशासन की जरूरत होती है. यह सब भी मैं ने पेन नलिन से सीखा. वे बहुत ही ज्यादा क्रिएटिव हैं और बहुत सुंदर स्क्रिप्ट लिखते हैं.

‘‘जब मुझे लगा कि अब मैं अपनी सोच वाली पहली हिमाचली फीचर फिल्म बना सकती हूं, तो मैं ने ‘सेकंड चांस’ का लेखन, निर्देशन व सहनिर्माण किया. मैं ने रंगीन फिल्मों के जमाने में इसे ब्लैक एंड व्हाइट में फिल्माया है. मेरे दिमाग में यह तय था कि मैं इसे हिमाचल प्रदेश में वहां की ठेठ पहाड़ी संस्कृति में ही जा कर फिल्माऊंगी.’’

सुभद्रा हिमाचल छोड़ कर लगभग 15 साल से मुंबई में बस गई थीं. ऐसे में हिमाचल में फिल्म की शूटिंग करने की बात क्यों दिमाग में आई, इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘हर इंसान की जिंदगी में कई पड़ाव होते हैं. एक बचपना होता है. फिर टीनएज की उम्र आती है जब उस के अंदर थोड़ा सा विरोध करने का स्वभाव आ जाता है. टीनएज उम्र में मेरे अंदर यह भाव आया था कि मैं अपने घर और पहाड़ों से दूर भागूं तो उस समय मैं मुंबई आ गई थी. फिर एक पड़ाव आता है जब घर की याद आती है तो ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ. मुझे भी घर और पहाड़ों की बहुत याद आई तो मैं लंबेलंबे समय के लिए हिमाचल प्रदेश यानी कि पहाड़ों पर जाने लगी.

‘‘मैं अपने घर कम जाती पर हिमाचल प्रदेश में अलगअलग जगहों पर अकेले घूमने जाती थी. वहां पर मैं ने ट्रेनिंग की, स्थानीय कल्चर से जुड़ी. पर्यावरण के मुद्दों को समझ. कई दोस्त बनाए. इस कारण भी मैं अपनी पहली फिल्म हिमाचल प्रदेश में ही बनाना चाहती थी. फिर हमारी हिमाचली फिल्म न के बराबर ही बनाई जाती हैं. मेरे मन में सवाल उठता रहा है कि हमारी हिमाचली फिल्में कहां हैं, जिन में हमारे लोग, हमारा कल्चर, ठेठ पहाड़ी पन्ना नजर आए और फिल्म की कहानियां भी औथैंटिक रूप से हिमाचली हों. सो, मैं इसी तरह की फिल्म बनाना चाहती थी.’’

कैसे सूझी यह फिल्म

जब उन से पूछा गया कि उन्हें पहली फिल्म ‘सेकंड चांस’ का बीज कहां से मिला तो वे कहती हैं, ‘‘कहानी का बीज कुछ तो मेरी जिंदगी से ही मिला. मैं आधी ठेठ पहाड़ी बन चुकी हूं तो आधी मौडर्न शहरी बन चुकी हूं. मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहती थी जो इन दोनों दुनिया को मिला दे.

‘‘मैं एक ऐसी कहानी बताना चाहती थी जिस में एक युवा लड़की दिल्ली या मुंबई जैसे शहर से किसी वजह से वापस पहाड़ों पर एकांत जगह पर जाती है. फिर उस का वहां का अनुभव क्या रहता है? और जिन लोगों से मिलती है उन की जिंदगी में जो कुछ हो रहा होता है, उस के साथ जुड़ती है तो क्या होता है.’’

वे आगे बताती हैं, ‘‘शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात थी कि मैं अपनी फिल्म में नए व ‘नौन ऐक्टर्स’ ही लूंगी. मैं ईरानियन सिनेमा से ज्यादा प्रभावित हूं. मैं ने देखा है कि दिल को छू लेने वाली फिल्में उन्होंने नौन ऐक्टर्स के साथ बनाई हैं. दूसरी बात, इन फिल्मों के कलाकार हमारे पहाड़ी भाईबहनों से काफी मिलतेजुलते हैं. तो ‘सेकंड चांस’ की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट तैयार होते ही मैं हिमाचल पहुंच गई और अपने घर के आसपास के गांवों में जा कर मैं ने कलाकारों की तलाश शुरू की. मैं ने किरदारों में फिट बैठें, ऐसे कलाकारों की तलाश की. मैं ने लोगों से बात की और उन के साथ कुछ कहानी बना कर शूट किया, जिस का हमारी फिल्म से कोई संबंध नहीं था पर इस अनुभव के आधार पर हम ने अपनी स्क्रिप्ट के दूसरे ड्राफ्ट में कुछ बदलाव किए.’’

अबौर्शन है मुद्दा

निया को अपने प्रेमी पर अविश्वास क्यों हुआ कि उस ने अबौर्शन का निर्णय लिया? इस सवाल के जवाब पर वे कहती हैं, ‘‘हमारी फिल्म की नायिका निया अपने जीवन के उस मोड़ पर है जहां वह अपने मातापिता के करीब नहीं है, उस की ऐसी कोई दोस्त भी नहीं जो उस की मदद के लिए आगे आए. वह एक तरह से आइसोलेटेड जिंदगी जी रही है जैसे कि आजकल शहरों में युवा पीढ़ी अकेलेपन से जूझ रही है.’’

‘‘आप फिल्म में देखेंगे कि उस ने कुछ बिजनैस की योजना बनाई थी पर वह आगे नहीं बढ़ा. यानी, उस की जिंदगी में कुछ भी हो नहीं पा रहा. सबकुछ ठप सा हो गया है. इस स्थिति में यदि एक युवती प्रैगनैंट हो जाए और ऐसा प्रेमी जो इस खबर को सुनने के बाद निया का फोन उठाना बंद कर दे तो लड़की स्वाभाविक निर्णय यही लेगी कि इस का गर्भपात करा लिया जाए.

‘‘निया ने इस के लिए दवा का सहारा लिया जोकि सर्जिकल गर्भपात से ज्यादा आसान होता है. लेकिन कई बार कुछ जटिलताएं भी हो जाती हैं. गर्भपात के लिए एक नियत समय के अंदर ही लड़की को कदम उठाना होता है या यों कहें कि निर्णय लेना होता है. गर्भपात कराने का निर्णय लेना आसान होता है पर उस के बाद उस का उस महिला के शरीर व दिमाग पर जो साइकोलौजिक असर होता है, वह काफी कठोर और लौंग टर्म हो सकता है. हमारी फिल्म में हम देखते हैं कि निया थोड़ा मैटेरियलिस्टिक है. उसे थोड़ा सा अपराधबोध, थोड़ा सा ट्रौमा भी हो सकता है. दवा से गर्भपात कराना हो या सर्जिकल कराना हो, समाज में गर्भपात का ऐसा टैबू बना हुआ है कि लड़की/महिला को अकेले ही डाक्टर के पास जाना पड़ता है. ऐसे में उस के अंदर एक डर भी रहता है. कभीकभी कुछ गड़बड़ी या दूसरे तरह की समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं, जैसा कि निया के साथ होता है.’’

आप को नहीं लगता कि युवा पीढ़ी के सामने इस तरह के हालात का पैदा होना या समस्याओं के पैदा होने के पीछे संयुक्त परिवारों का विघटन है? इस पर सुभद्रा कहती हैं, ‘‘जी, यह तो कड़वा सच है. लेकिन इस पर कुछ कमैंट करना मेरे लिए थोड़ा सा मुश्किल है. देखिए, ग्रामीण इलाके की बनिस्बत शहरों में संयुक्त परिवार खत्म होते जा रहे हैं और एकाकी परिवार जन्म ले रहे हैं. शहरों में तो हमें एकाकी परिवार ही नजर आते हैं. एकाकी परिवारों में भी वहां ज्यादा समस्या है जहां मातापिता दोनो कामकाजी हैं. इस वजह से कई बार पारिवारिक बंधन को मजबूत रखते हुए विश्वास को बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है. कुछ लोगों का एक बड़ा मित्र मंडल होता है.

‘‘लेकिन कोविड के बाद मैं देख रही हूं कि हर इंसान अपने मोबाइल फोन के साथ ही जुड़ा रहता है. पता चलता है कि 10 दोस्त कहीं इकट्ठा हुए हैं पर वे आपस में बात करने या एकदूसरे के बारे में कुछ नई जानकारी हासिल करने की बनिस्बत अपनेअपने मोबाइल में व्यस्त हैं तो इस तरह भी लोग आइसोलेटेड हो जाते हैं. मैं ने अपनी हमउम्र लोगों को देखा है कि वे अकेले पड़ रही हैं.

‘‘हमारी शिक्षा प्रणाली व वर्तमान सामाजिक रचना भी यही सिखाती है कि पैसा कैसे कमाएं. युवा पीढ़ी योजना इसी तरह बनाती है कि पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी पा जाएंगे. फिर विदेश घूमने जाएंगे. मकान खरीदेंगे व कार खरीदेंगे वगैरहवगैरह और इसी दिशा में सोचते हुए वे अपने आसपास के लोगों, दोस्तों तक से कट जाते हैं. हमारे यहां बच्चों को यह कभी नहीं सिखाया जाता कि अंदर से किस तरह मजबूत बनें, हर चीज, हालात का मुकाबला करने के लिए अपने इंटरनल सिस्टम को कैसे मजबूत बनाएं.

‘‘मैं ने अपनी सहेलियों में देखा है कि थोड़ी सी समस्या या मुसीबत आने पर वे उस से डील नहीं कर पाईं. आज की तारीख में कुछ ही लोगों को बाहर से मदद के लिए स्ट्रौंग फैमिली बौंड मिलता है. हर किसी को अतिविश्वसनीय दोस्त नहीं मिलते.’’

टूटते परिवारों के बीच सोशल मीडिया और मोबाइल की भूमिका पर वे कहती हैं, ‘‘सोशल मीडिया तो पैराडौक्सिल है. सोशल मीडिया से आप हर किसी से जुड़े रह सकते हैं पर सवाल है कि महज लाइक करने व शेयर करने के लिए या रील्स पर कमैंट करने के लिए? सोशल मीडिया का सही उपयोग कोई नहीं कर पा रहा है. हो यह रहा है कि लोग सोशल मीडिया के गुलाम बन गए हैं और सोशल मीडिया उन का उपयोग कर रहा है.’’

फिल्म के केंद्र में महिला किरदार

जब उन से पूछा गया कि उन की फिल्म की नायिका निया को अभिजात्य वर्ग का बताने की क्या वजह है तो इस पर वे कहती हैं, ‘‘फिल्म की नायिका निया भी मेरी तरह ही भारतीयों के अभिजात्य वर्ग से आती है- युवा मिलेनियल्स और जेन जेड, जो संपन्न परिवारों से आते हैं, के पास वे सभी अवसर खुले होते हैं जो न तो हमारे मातापिता के पास थे और न ही हमारे दादादादी के पास. दुनिया हमारी मुट्ठी में है और हम जो कुछ भी चाहते हैं वह हमारे स्मार्टफोन पर बस एक टैप की दूरी पर है. यह सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन मैं ने कई ऐसे उदाहरण देखे और अनुभव किए हैं जहां अनंत संभावनाओं के विशेषाधिकार के कारण बहुत भ्रम और उत्कृष्टता हासिल करने का बहुत दबाव पैदा हुआ है, क्योंकि आखिर हमें कौन रोक सकता है. इस परिदृश्य में ‘व्यापार’ अभी भी ‘कला’ से कहीं बेहतर है.

‘‘आज शैक्षिक और व्यावसायिक लक्ष्य आंतरिक संसाधनों की तुलना में भौतिक संपदा के इर्दगिर्द अधिक केंद्रित हैं. सोशल मीडिया ने पहले से ही इस अटपटे माहौल में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है. शहरीकरण के कारण और भी अकेलापन पैदा हुआ है. आत्महत्या के कारण एक से अधिक करीबी दोस्तों को खोने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हमारी पीढ़ी बहुत अधिक आंतरिक खालीपन और कमजोरी का सामना कर रही है.’’

‘‘इस पीढ़ी में एक युवा महिला होना और भी अधिक भ्रमित करने वाला है, क्योंकि भले ही हम यह मानने में चिढ़ जाते हैं कि हमारे पारंपरिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लैंगिक समानता बढ़ रही है, लेकिन यह बहुत हद तक सतही है. यह भ्रम को तोड़ने के लिए बस एक घटना की तरह है, जैसे कि आकस्मिक विवाहपूर्व गर्भावस्था और एक क्रूर रूप से बुरे समाज का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया जाना और यह वास्तव में इस पहले से ही खोई हुई, पराजित और आघातग्रस्त युवा महिला के लिए ‘दुनिया का अंत’ हो सकता है. यह वह वास्तविकता है जिस से निया का चरित्र पैदा हुआ.’’

इन दिनों युवा पीढ़ी किसी पर भी यकीन नहीं कर रही. ऐसे में समस्या से ग्रस्त निया पहाड़ पर जा कर एक केयरटेकर, 70 वर्षीया भेमी पर यकीन कैसे कर लेती है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘आप सही कह रहे हैं. आज की तारीख में हम बहुत ही ज्यादा कंडीशंड हो गए हैं पर निया को जरूरत है प्यार की और ऐसे इंसान की जो उसे संभाले. लेकिन वह ऐसा करने की इजाजत जल्दी किसी को न देगी. लेकिन हम ने दिखाया है कि निया पहले अपनेआप में खोई व सीमित रहती है लेकिन विंटर यानी कि ठंड का मौसम उसे भेमी के साथ जुड़ने में मदद करता है. ठंड बहुत है. वह पहाड़ पर है. बिजली चली गई है. ऐसे में उस के पास भेमी का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है, यही धीरेधीरे उसे भेमी से जोड़ता है.

‘‘दूसरी तरफ, सनी की नानी यानी कि भेमी जो बात बताती है वह जोक्स की तरह कहती है. वह सबक नहीं सिखाती, बल्कि हंस कर ऐसी बात कह जाती है जो निया के दिल तक पहुंच जाती है. भेमी इस तरह निया का विश्वास जीत लेती है. जहां तक सनी का सवाल है तो सनी का एजेंडा इतना है कि उसे अपने साथ खेलने के लिए कोई चाहिए क्योंकि उस के पिता व नानी दोनों काम में व्यस्त रहते हैं तो सनी, निया के साथ क्रिकेट खेलता है. इस से निया को अपना बचपना याद आता है और वह सनी के साथ उस के खेलों से जुड़ जाती है, जिस से उस के चेहरे पर मुसकराहट लौट आती है.’’

पर्सनल लाइफ से जुड़ी फिल्म

फिल्म ‘सेकंड चांस’ में खुद सुभद्रा कहां हैं, इस पर वे कहती हैं, ‘‘यह फिल्म मेरे लिए बहुत पर्सनल फिल्म है. हर संवाद में आप को सुभद्रा नजर आएगी.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘मुझे नहीं पता कि उन के दिमाग में क्या सवाल उठेंगे पर मुझे लगता है कि फिल्म देखने के बाद युवा पीढ़ी हिमाचल प्रदेश घूमने व ट्रैकिंग करने, वहां के कल्चर को समझने, वहां के रहनसहन, पहनावा, खानपान को समझने के लिए हिमाचल जाना चाहेगी.

‘‘निया की यात्रा देख कर हर दर्शक के मन में एक आशा, उम्मीद जगनी चाहिए. उन्हें एहसास होना चाहिए कि ‘सेकंड चांस’ केवल निया के लिए नहीं है, उन के लिए भी हो सकता है. मैं मानती हूं कि यह दुनिया काफी कठिन है, लेकिन अगर हमारे दिल में आशा न हो, पौजिटिविटी न हो तो जिंदगी जीना दूभर हो जाएगी.’’

सुभद्रा के लिए प्यार क्या है? इस सवाल पर उन का कहना था, ‘‘मेरे लिए प्यार केवल प्रेमी व प्रेमिका के बीच रोमांस नहीं है. यह प्यार मां व बेटे के बीच, बेटे व पिता के बीच भी हो सकता है. प्यार हर जगह है. कई बार आप की समझ में नहीं आएगा कि प्यार क्या है पर आप कहीं जाते हैं और एक बच्चा आप के साथ कुछ ऐसा करता है कि आप मुसकराते हैं तो वह भी प्यार है.’’

अकसर हिमाचल प्रदेश में हिमाचली कल्चर को दिखाने वाली फिल्में नहीं बनतीं, इस पर वे कहती हैं, ‘‘बौलीवुड के फिल्मकार अपनी फिल्म के गाने फिल्माने के लिए हिमाचल की खूबसूरत वादियों में जाते हैं. पहाड़ों व बर्फ में जाते हैं पर हिमाचली कल्चर व लोगों को ले कर उन का कोई रिसर्च, कोई ध्यान नहीं होता. लेकिन मैं अपनी हर फिल्म हिमाचल की अलगअलग वादियों में बनाना चाहूंगी.’’

सुभद्रा की फिल्म ‘सेकंड चांस’ को इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में पसंद किया गया. इस की वजह बताती हुई वे कहती हैं, ‘‘मैं तो इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में अपनी फिल्म को ले कर नर्वस थी पर लोगों ने हमारी फिल्म की कहानी व लोकेशन के साथ रिलेट किया. फिल्म में इमोशन, ह्यूमर व दर्द भी है. ये सारे इमोशन विदेशों में भी लोगों के दिलों को छू गए.

‘‘अमेरिका में लोगों ने हम से भारत में गर्भपात के कानूनी नियमों को ले कर बात की. गर्भपात को ले कर सामाजिक मापदंडों पर भी चर्चा हुई. अमेरिका में गर्भपात पर चर्चा इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि वहां गर्भपात के कानून को ले कर बहस छिड़ी हुई है. यहां तक कि यह चुनावी मुद्दा भी वहां पर रहा है लेकिन यूरोप में गर्भपात को ले कर बहुत कम चर्चा हुई.’’  Exclusive Interview

Hindi Love Stories : चार आंखों का खेल – क्या संध्या उसके खेल से बच पाई ?

Hindi Love Stories : चार आंखों का खेल मेरी नजर में दुनिया का सब से रोमांचक व खूबसूरत खेल है (कम से कम शुरू में तो ऐसा ही लगता है). इस खेल की सब से अच्छी बात यही है कि जो चार आंखें यह खेल खेलती हैं, इस खेलके बारे में बस उन्हीं को पता होता है. उन के आसपास रहने वालों को इस खेल का अंदाजा ही नहीं हो पाता है. मैं भी इस खेल में लगभग 1 साल पहले शामिल हुई थी. यहां मुंबई में जुलाई में बारिश का मौसम था. सोसायटी के गार्डन के ट्रैक पर फिसलने का डर था. वैसे मुझे बाहर सड़कों पर सैर करना अच्छा नहीं लगता. ट्रैफिक, स्कूलबसों के हौर्न का शोर, भीड़भाड़ से दूर मुझे अपनी सोसायटी के शांत गार्डन में सैर करना ही अच्छा लगता.

हां, तो बारिश के ही एक दिन मैं घर से 20 मिनट दूर एक दूसरे बड़े गार्डन में सैर के लिए जा रही थी. वहीं सड़क पर वह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हम दोनों ने अचानक एकदूसरे को देखा. पहली बार आंखों से आंखें मिलते ही जो होना था, हो चुका था. यह शायद आंखों का ही दोष है. किसी की आंखों से किसी की आंखें मिल जाएं, तो फिर उस का कोई इलाज नहीं रहता. शायद इसी का नाम चार आंखों का खेल है.

हां, तो जब हम दोनों ने एकदूसरे को देखा तो कुछ हुआ. क्या, यह बताना उस पल का वर्णन करना, उस एहसास को शब्दों का रूप देना मुश्किल है. हां, इतना याद रहा कि उस पूरा दिन मैं चहकती रही, न घर आते हुए बसों के हौर्न बुरे लग रहे थे, न सड़क पर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. सुबह के 7 बजे मैं हवा में उड़ती, चहकती घर लौट आई थी.

मेरे पति निखिल 9 बजे औफिस निकलते हैं. 22 वर्षीय बेटी कोमल कालेज के लिए 8 बजे निकलती है. मैं रोज की तरह कोमल को आवाज दे कर किचन संभालने में व्यस्त हो गई. दोनों के जाने के बाद मैं दिन भर एक अलग ही उत्साह में घिरी रही. अगले दिन भी मैं सैर करने के लिए फिर बाहर ही गई. वह फिर उसी जगह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हमारी आंखें फिर मिलीं, तनमन एक पुलक से भरते चले गए. फिर अगले 3-4 दिन मेरे सामने यह स्पष्ट हो गया कि उसे भी मेरा इंतजार रहता है. वह बारबार मुड़ कर उसी तरफ देखता है जहां से मैं उस रोड पर आती हूं. मैं ने उसे दूर से ही बारबार देखते देख लिया था.

चार आंखों का खेल बहुत ही खूबसूरती से शुरू हो गया था. दोनों खिलाड़ी शायद हर सुबह का बेचैनी से इंतजार करने लगे थे. मैं संडे को सैर पर कभी नहीं जाती थी, ब्रेक लेती थी, पर अब मैं संडे को भी जाने लगी तो निखिल ने टोका, ‘‘अरे, संध्या कहां…?’’

‘‘सैर पर,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर आज तो संडे है?’’

‘‘आंख खुल गई है, तो चली ही जाती हूं. तुम आराम करो, मैं अभी आई,’’ कह मैं तेज कदमों से भागी सी उस रोड पर चली जा रही थी. देखा, आज उस का बेटा नहीं था. सोचा संडे है, सो रहा होगा. आज वह अपनी पत्नी के साथ सैर कर रहा था. मैं ने गौर से उस की पत्नी को देखा. मुझे वह अच्छी लगी, काफी सुंदर व स्मार्ट थी. उस ने मुझे देखा, पत्नी की नजरें बचा कर आज पहली बार वह मुसकरा भी दिया तो मुझे लगा संडे को आना जैसे सार्थक हो गया.

अब कुछ तो जरूर था हम दोनों के बीच जिस ने मुझे काफी बदल दिया था. सुबह के इंतजार में मैं पूरा दिन, शाम, रात बिताने लगी थी. 10 दिन में ही मैं कितना बदल गई थी. पूरा दिन यह एहसास कि रोज सुबह इस उम्र में भी कोई आप का इंतजार कर रहा होगा, इतना ही बहुत है रोमांचित होने के लिए.

धीरेधीरे 1 महीना बीत गया. इस खेल के दोनों खिलाड़ी मुंह से कभी एक शब्द नहीं बोले थे. आंखें ही पूछती थीं, आंखें ही जवाब देती थीं.

एक दिन निखिल ने पूछा भी, ‘‘आजकल सोसायटी के गार्डन नहीं जा रही हो?’’

‘‘नहीं, फिसलने का डर रहता है.’’

‘‘पर तुम्हें तो सैर के समय बाहर का शोर अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘हां, पर अब ठीक लग रहा है,’’ कहते हुए मन में थोड़ा अपराधबोध सा तो महसूस हुआ पर चूंकि इस खेल में मजा आने लगा था, इसलिए सिर झटक कर अगली सुबह का इंतजार करने लगी.

बारिश का मौसम खत्म हो गया था, पर मैं अब भी बाहर ही जा रही थी. अक्तूबर शुरू हो गया था. चार आंखों का खेल अब और भी रोमांचक हो चुका था. मैं उसे सिर्फ देखने के लिए बाहर का शोरगुल पसंद न होते हुए भी बाहर भागी चली जाती थी, पहले से ज्यादा तैयार, संजसंवर कर. नईनई टीशर्ट्स, ट्रैक पैंट में, स्टाइलिश शूज में, अपने शोल्डरकट बालों को कभी खुला छोड़ कर, कभी पोनीटेल बना कर, बढि़या परफ्यूम लगा कर षोडशी सी महसूस करती हुई भागी चली जाती थी. सैर तो हमेशा करती आई थी पर इतनी दिलकश सैर पहले कभी नहीं थी.

उस से आंखें मिलते ही कितने सवाल होते थे, आंखें ही जवाब देती थीं. कभी छुट्टी वाले दिन देर से जाने पर कभी अस्वस्थता के कारण नागा होता था, तो उस की आंखें एक शिकायत करती थीं, जिस का जवाब मैं आंखों में ही मुसकरा कर दे देती थी. कभी वह नहीं देखता था तो मैं उसे घूरती थी, वह भी मुसकरा देता था फिर. अजीब सा खेल था, बात करने की जरूरत ही नहीं थी. सुबह से देखने के बाद एक जादुई एहसास से घिरी रहती थी मैं. दिन भर न किसी बात पर गुस्सा आता था, न किसी बात से चिढ़ होती थी. शांत, खुश, मुसकराते हुए अपने घर के  काम निबटाती रहती थी.

निखिल हैरान थे. एक दिन कहने लगे, ‘‘अब तो बारिश भी गई, अब भी बाहर सैर करोगी?’’

‘‘हां, ज्यादा अच्छी और लंबी सैर हो जाती है, सालों से गार्डन में ही सैर कर के ऊब गई हूं.’’

‘‘ठीक है, जहां तुम्हें अच्छा लगे,’’ निखिल भी सैर पर जाते थे, पर जब मैं आ जाती थी, तब.

फिर कमरदर्द से संबंधित शारीरिक अस्वस्थता के कारण मुझे परेशानी होने लगी थी. सुबह 20 मिनट जाना, 20 मिनट आना, फिर आते ही नाश्ता, दोनों के टिफिन, मेरी परेशानी बढ़ रही थी. पहले मैं आधे घंटे में घर आ जाती थी. डाक्टर ने कुछ दिन सैर करने का समय कम करने के लिए कहा तो मैं बेचैन हो गई. मेरे तो रातदिन आजकल उसे सुबह देखने से जुड़े थे. उसे देखने का मतलब था सुबह उठ कर 20 मिनट चल कर जाना, 20 मिनट आना, 40 मिनट तो लगने ही थे. अपनी अस्वस्थता से मैं थकने लगी थी.

अब वहां जाने का नागा होने लगा था, क्योंकि आते ही किचन में मुझे 1 घंटा लगता ही था. मैं अब इतनी देर एकसाथ काम करती तो पूरा दिन मेरी तकलीफ बढ़ी रहती. अब क्या करूं? इतने दिनों से जो एक षोडशी की तरह उत्साहित, रोमांचित महसूस कर रही हूं, अब क्या होगा? सब छूट जाएगा?

निखिल परेशान थे, मुझे समझा रहे थे, ‘‘इतने सालों से यहीं सैर कर रही हो न. अब सुबह सैर पर मत जाओ, तुम्हें और भी काम होते हैं. शाम को फ्री रहती हो, आराम से उस समय सैर पर चली जाया करो. सुबह सब एकसाथ करती हो तो तुम्हारी तकलीफ बढ़ जाती है.’’

डाक्टर ने भी निखिल की बात पर सहमति जताई थी. पर मैं नहीं मानी. एक अजीब सी मनोदशा थी मेरी. शारीरिक रूप से आराम की जरूरत थी पर दिल को आराम उसे देखने से ही मिलता था. मैं उसे देखने के लिए बाहर जाती रही. पर अब नागे बहुत होते थे.

उस का बेटा अब तक साइकिल सीख चुका था. अब वह अकेला ही वहां दिखता था. चार आंखों का खेल जारी था. अपनी हैल्थ की चिंता न करते हुए मैं बाहर ही जाती रही.

पहली जनवरी की सुबह पहली बार उस ने मेरे पास से गुजरते हुए ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोला. मैं ने भी अपने कदम धीरे करते हुए ‘थैंक्स, सेम टू यू’ कहा, इतने दिनों के खेल में शब्दों ने पहली बार भाग लिया था. मन मयूर प्रफुल्लित हो कर नाच उठा.

अब मेरी तबीयत खराब भी रहती तो मैं निखिल और कोमल से छिपा लेती. दोनों के जाने के बाद दर्द से बेहाल हो कर घंटो बैड पर लेटी रहती. कोमल बेटी है, बिना बताए भी चेहरा देख कर मेरे दर्द का अंदाजा उसे हो जाता था, तो कहती थी, ‘‘मौम, आप को स्ट्रैस लेने से मना किया है डाक्टर ने. आप मौर्निंग वाक पर नहीं जाएंगी, अब आप शाम की सैर पर ही जाना.’’

पर मैं नहीं मानी, क्योंकि मैं तो दुनिया के सब से दिलकश खेल की खिलाड़ी थी.

मई का महीना आया तो मेरे मन की उथलपुथल बढ़ गई. मई में मैं ने हमेशा शाम की ही सैर की थी. मुझे जरा भी गरमी बरदाश्त नहीं है. 8-10 दिन तो मैं गई. मुंबई की चिपचिपी गरमी से सुबह ही बेहाल, पसीनेपसीने लौटती. आ कर कभी नीबू पानी पीती, तो कभी आते ही एसी में बैठ जाती पर कितनी देर बैठ सकती थी. किचन के काम तो सब से जरूरी थे सुबह.

इस गरमी ने तो मेरे मन के भाव ही बदल दिए. इस बार की गरमी तो इस चार आंखों के खेल का सब से महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन कर सामने आई. बहुत कोशिश करने पर भी मैं गरमी में सुबह सैर पर रोज नहीं जा पाई. छुट्टी वाले दिन चली जाती, क्योंकि जब आते ही किचन में नहीं जाना पड़ता था. उसे देखने के मोह पर गरमी की तपिश भारी पड़ने लगी थी. पसीना पोंछती जाती. उसे देख कर जब वापस आती, तब यह सोचती कि नहीं, अब नहीं जाऊंगी. बहुत गरमी है. मैं कोई षोडशी थोड़े ही हूं कि अपने किसी आशिक को देखने सुबहसुबह भागी जाऊं. अरे, मैं एक मैच्योर औरत हूं, पति है, बेटी है और इतने महीनों से हासिल क्या हुआ? न मुझे उस से कोई अफेयर चलाना है, न मतलब रखना है किसी तरह का. जो हुआ, बस हो गया. इस का कोई महत्त्व थोड़े ही है. जैसेजैसे गरमी बढ़ रही थी, मेरी अक्ल ठिकाने आ रही थी.

सारा उत्साह, रोमांच हवा हो रहा था. गरमी, कमरदर्द और सुबह के कामों ने मिल कर मुझे इस खेल में धराशायी कर दिया था. दिल तो अब भी वहीं उसी पार्क के रोड पर जाने के लिए उकसाता था पर दिमाग अब दिल पर हावी होने लगा था.

मन में कहीं कुछ टूटा तो था पर खुद को समझा लिया था कि ठीक है, लाइफ है, होता है ऐसा कभीकभी. यह उम्र, यह समय, ये जिम्मेदारियां शायद इस खेल के लिए नहीं हैं.

चार आंखों के इस खेल में मैं ने अपनी हार स्वीकार ली थी और पहले की तरह अपनी सोसायटी के गार्डन में ही शाम की सैर पर जाना शुरू कर दिया था.  Hindi Love Stories

Family Story : फर्ज – एक पिता की मजबूरी की मार्मिक कहानी

Family Story : सावित्री जैसे ही अस्पताल पहुंची कमरे में चल रहा डा. सुदर्शन और पति दीनानाथ का वार्त्तालाप सुन कर उन के कदम ठिठक गए, ‘‘देखो दीनानाथ,’’ सुदर्शन कह रहे थे, ‘‘तुम मेरी बात से सहमत हो या नहीं, यह मैं नहीं जानता, पर मेरे विचार से तुम्हें भाभी को सबकुछ सचसच बता देना चाहिए. आखिर, कब तक छिपाओगे उन से?’’

‘‘कोई बताने लायक बात हो तो बताऊं भी उस बेचारी को. एक दिन तो पता चलना ही है, तब तक तो उसे निश्ंिचतता से जी लेने दो,’’ तभी दीनानाथ का स्वर सावित्री के कानों से टकराया और वह शीघ्र ही सकते में आ गईं. मानो एकाएक किसी ने उन के कानों में गरम सीसा उड़ेल दिया हो. उन्होंने तेजी से उस कक्ष का द्वार

खोला और तूफान की गति से कमरे में प्रवेश किया.

‘‘क्या हुआ है आप को?’’ सावित्री ने हांफते हुए पूछा.

उन्हें अचानक अपने सामने पा कर एक क्षण को तो दीनानाथ का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया था पर क्षणांश में ही उन्होंने खुद को संभाल लिया था.

‘‘अरे, सावित्री, क्या हुआ? बहुत बदहवास सी लग रही हो? क्या घर से भागी चली आ रही हो? दीनानाथ ने मुसकरा कर तनाव को कम करने की कोशिश की मगर सावित्री की भावभंगिमा में कोई अंतर नहीं आया.

‘‘यह मेरे प्रश्न का उत्तर तो नहीं हुआ. आखिर हुआ क्या है आप को?’’ सावित्री ने अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘वही तो… वही तो मैं डाक्टर से पूछ रहा हूं कि आखिर मुझे हुआ क्या है भाई जो मुझे यहां रोक रखा है? तुम नहीं जानतीं आजकल के इन डाक्टरों को, आप को जुकाम हुआ नहीं कि अतिथि सत्कार के मूड में आ जाते हैं. वैसे तुम्हें किस ने बताया कि मैं इस अस्पताल में हूं?’’ दीनानाथ धाराप्रवाह बोले जा रहे थे.

‘‘आप के औफिस फोन किया था. आप की सेक्रेटरी निरुपमा ने बताया कि आप औफिस में ही बेहोश हो गए थे. उसी ने यहां का पता भी दिया.’’

‘‘औफिस फोन किया था? क्यों? कोई खास बात थी क्या?’’ दीनानाथ ने प्रश्न किया.

‘‘खास बात ही तो थी. ऋचा का फोन आया था, मैडिकल कालेजों की सामूहिक प्रतियोगिता का परिणाम आ गया है. उस में ऋचा को अच्छा स्थान हासिल हुआ है. मैं ने उन सब को खाने पर बुला लिया. सोचा सब मिलजुल कर खुशी मनाएंगे पर कुछ विशेष खरीदारी करते हुए घर लौटने के लिए आप को औफिस फोन किया तो यह मनहूस समाचार मिला,’’ सावित्री की आंखें सजल हो उठीं.

‘‘देखा डाक्टर, तुम ने तो हमारी सावित्री को रुला ही दिया. अब तो मैं किसी की एक नहीं सुनूंगा. अब तो तुम्हें मुझे घर जाने की अनुमति देनी ही होगी,’’ दीनानाथ का चेहरा चमक उठा.

‘‘यह तो सचमुच अच्छी खबर सुनाई है भाभी ने. मैं तो खुद आप की इस खुशी में शामिल होना चाहता हूं पर क्या करूं, हमें तो कोई पूछता ही नहीं है,’’ डाक्टर सुदर्शन मुसकराए.

‘‘अरे, तो अब बुलाए लेते हैं. तुम हमारे साथ ही चलोगे. घर की ही बात है, इस में इतनी औपचारिकता दिखाने की क्या जरूरत है,’’ दीनानाथ ने चटपट निमंत्रण दे डाला था.

‘‘लेकिन आप की तबीयत? सुदर्शन भैया, इन्हें हुआ क्या है?’’ सावित्री घूमफिर कर पुन: उसी विषय पर आ गईं.

‘‘अरे, कुछ नहीं, यों ही जरा सी कमजोरी है. सभी तरह की जांच करवाने के लिए अस्पताल में भरती हो गया हूं, क्यों डाक्टर?’’ डाक्टर के मुंह खोलने से पहले ही दीनानाथ ने हलके अंदाज में कह दिया.

‘‘पर कमजोरी से बेहाश होते तो किसी को नहीं देखा,’’ सावित्री अब भी आश्वस्त नहीं हो पा रही थीं.

‘‘लो, इन की सुनो,’’ दीनानाथ ने नाटकीय अंदाज में डाक्टर सुदर्शन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान जापान की यात्रा पर गए थे. वह तो ठीक उस समय अपने होश खो बैठे थे जब उन के स्वागत में भोज का आयोजन किया गया था. फिर मैं तो बेहद साधारण सा प्राणी हूं. मेरे बेहाश होने पर तुम्हें आपत्ति क्यों? क्यों डाक्टर…’’ कहते हुए दीनानाथ ने ठहाका लगाया.

‘‘हां, ठीक ही तो है. बेहोश होना और फिर होश में आना तो हमारा राष्ट्रीय खेल होना चाहिए,’’ डाक्टर सुदर्शन ने उन की हां में हां मिलाई.

‘‘आप नहीं जानते डाक्टर भैया कि आप ने मेरे सीने से कितना बड़ा बोझ उतार दिया. मुझे तो इतनी चिंता हो गई थी कि किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था, इसीलिए सबकुछ छोड़ कर यहां दौड़ी चली आई. अब तो मैं साथ ले जाऊं न आप के मरीज को,’’ सावित्री ने लंबी सांस ली.

‘‘नहीं, अभी नहीं. बड़ी कठिनाई से तो पकड़ में आए हैं आप के पति. हम तो सभी तरह की जांच करवा कर स्वयं को संतुष्ट व आश्वस्त करना चाहते हैं.’’

‘‘ठीक ही तो है, हम दोनों साथ ही पहुंच जाएंगे. तुम चलो, अतिथियों के स्वागतसत्कार का विशेष प्रबंध भी करना है.’’

‘‘अच्छा, तो मैं चलती हूं, अपना खयाल रखिएगा. सच कहती हूं डाक्टर भैया, अपने स्वास्थ्य की तो इन्हें जरा सी भी चिंता नहीं है. आप दोनों समय से पहुंच जाइएगा. ऐसा न हो कि मेहमान आ जाएं और हम आप की राह देखते रहें,’’ सावित्री चलने का उपक्रम करती हुई बोलीं.

‘‘अब?’’ सावित्री के जाते ही डा. सुदर्शन के मुंह से निकला. कुछ क्षण तक खामोशी रही जिसे दीनानाथ ने ही तोड़ा,  ‘‘तुम ने तो उन आकर्षक आंखों के सपनों की उमंग देखी थी, सुदर्शन. तुम्हीं कहो, कैसे उस सपनों के घरौंदे को तहसनहस कर दूं?’’

दीनानाथ का उत्तर सुन कर डा. सुदर्शन चुप रह गए. फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘देरसवेर तो तुम्हें बताना ही पड़ेगा. जरा सोचो, इस भयंकर बीमारी की बात उन्हें किसी और से पता चली तब क्या होगा? वैसे भी उन्हें बता देना ही उचित होगा. कम से कम वह स्वयं को संभाल तो लेंगी. यह मत भूलो कि उन के सामने जीवन की सब से बड़ी परीक्षा की घड़ी

आई है.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहते हो. वैसे भी तुम ने तो मुझे लगभग 2 साल का समय दिया था और अब तो 3 साल पूरे होने जा रहे हैं. अब तो केवल चंद सांसें ही बाकी हैं. अत: सावित्री को सबकुछ बता कर मुझे अंतिम विदा की तैयारी शुरू कर लेनी चाहिए,’’ दीनानाथ का स्वर भर्रा गया था. न चाहते हुए भी आंखें भर आई थीं.

डा. सुदर्शन और दीनानाथ जब घर पहुंचे तो वहां उत्सव जैसा वातावरण था. ऋचा तो पिता को देखते ही उन के गले लग गई थी.

‘‘मुझे तुम पर गर्व है मेरी बच्ची,’’ दीनानाथ की आंखों में खुशी के आंसू थे.

‘‘आप को अपनी बेटी पर गर्व है तो हमें अपनी पुत्रवधू पर,’’ ऋचा के ससुर ने कहा.

दोनों परिवारों का उल्लास देखते ही बनता था. हंसतेगाते, नाचते कब आधी रात बीत गई किसी को पता ही नहीं चला.

दीनानाथ बेहद कमजोरी अनुभव कर रहे थे. अत: चुपचाप एक कोने में कुरसी पर बैठे अपने जीवन के उन अमूल्य क्षणों का आनंद ले रहे थे.

डा. सुदर्शन काफी देर पहले ही विदा ले कर जा चुके थे.

दीनानाथ अपने ही विचारों में खोए थे.

‘‘क्या बात है, पापा, बहुत थके हुए लग रहे हैं?’’ तभी अपने बेटे ऋषिराज का स्वर सुन कर वह चौंक पड़े.

‘‘ठीक हूं, बेटे, आजकल तो तुम्हारी सूरत देखने को तरस जाता हूं मैं. बहुत नाराज हो क्या मुझ से?’’ दीनानाथ ने बहुत थके हुए स्वर में कहा.

‘‘नहीं पापा, ऐसा कुछ नहीं है. नई नौकरी है, बहुत व्यस्त रहता हूं

इसलिए शायद आप को ऐसा आभास हुआ होगा.’’

‘‘मैं सब समझता हूं बेटे. हम तो चेहरा देख कर मन की बात भांप लेते हैं पर मेरी दुविधा तुम नहीं समझ सकोगे और न ही मैं तुम्हें समझा सकूंगा. बचपन से ही तुम्हारी उच्च शिक्षा के लिए तुम्हें विदेश भेजने की इच्छा थी पर कुछ नहीं हो सका. सारे सपने टूट गए…’’ दीनानाथ अपनी ही रौ में बहे जा रहे थे.

‘‘पापा, मैं सब समझता हूं. क्या मैं नहीं जानता कि ऋचा के विवाह में आप को कितना खर्च करना पड़ा था? रही विदेश जा कर पढ़ाई करने की बात, तो मैं अपनी इच्छा बाद में भी पूरी कर सकता हूं,’’ ऋचा ने पिता को आश्वस्त करना चाहा.

पितापुत्र के वार्त्तालाप के बीच ही ऋचा, उस के पति तथा अन्य परिवारजनों ने विदा ली. सावित्री और ऋचा उन्हें दरवाजे तक छोड़ने गए.

दीनानाथ को लगा कि अतिथियों को छोड़ने उन्हें भी दरवाजे तक जाना चाहिए. लिहाजा, वह धीरेधीरे उठे मगर स्वयं को संभाल न सके और वहीं पर गिर गए.

उधर ऋचा और उस का परिवार जा चुका था. उन्हें छोड़ कर अंदर आते हुए सावित्री और ऋषि ने दीनानाथ के कराहने का स्वर सुना तो लपक कर अंदर पहुंचे.

‘‘क्या हुआ, पापा?’’ ऋषि और सावित्री उन्हें झिंझोड़ रहे थे पर दीनानाथ को तो होश ही नहीं था.

‘‘ऋषि, जल्दी डाक्टर सुदर्शन के यहां फोन करो,’’ सावित्री रोंआसे स्वर में बोलीं.

ऋषि ने डाक्टर को पूरी स्थिति की जानकारी दी तो उन्होंने तुरंत उसे दीनानाथ के साथ अस्ताल पहुंचने को कहा.

बदहवास मांबेटे दीनानाथ को ले कर अस्पताल पहुंचे.

‘‘क्या हुआ डाक्टर भैया? आप ने तो कहा था इन्हें घर ले जा सकते हैं. कोई विशेष बात नहीं है,’’ सावित्री ने कातर स्वर में पूछा.

‘‘मैं तो शुरू से यही चाहता था कि इन के बारे में आप लोगों को सच बता दूं पर इन्होंने नहीं चाहा था कि उन के परिवार को मैं ऐसा दुख पहुंचाऊं, इसीलिए मैं अब तक चुप रहा पर अब…’’

‘‘पर अब क्या?’’ ऋषि ने प्रश्न किया.

‘‘तुम्हारे पिता कुछ ही दिनों के मेहमान हैं,’’ डा. सुदर्शन का स्वर बेहद सपाट और गंभीर था.

‘‘क्या कह रहे हो, भैया? शुभशुभ बोलो.’’

‘‘हां, भाभी, कब तक वास्तविकता से मुंह छिपाओगी? पर एक बात बता दूं, बहुत साहसी है मेरा मित्र. सारी घुटन, दुख और अकेलेपन से वह अकेले ही जूझता रहा पर अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने में जीजान से जुटा रहा.’’

‘‘उन्हें हुआ क्या है, डाक्टर अंकल?’’ बैंच पर अपना मुंह छिपाए बैठी सुबकती हुई मां को संभालते हुए ऋषि ने पूछा.

‘‘रक्त कैंसर.’’

‘‘क्या…’’

‘‘हां, और यह बात तुम्हारे पिता लगभग 3 साल से जानते थे. अब तो यह उन का अंतिम पड़ाव है.’’

यह सुन कर तो सावित्री हक्कीबक्की रह गईं. पिछले डेढ़ साल के दौरान दीनानाथ ने सचमुच कुछ ऐसे कार्य किए थे जो शायद साधारण परिस्थितियों में वे नहीं करते. कैसे वह इन संकेतों को नहीं समझ पाई थीं. पिछले कुछ दिनों की घटनाएं उन की आंखों के आगे चलचित्र की तरह तैर रही थीं.

‘बैठो न थोड़ी देर, कहां भागी जा रही हो,’ एक दिन अपनी पत्नी को काम में व्यस्त रसोई की ओर जाते देख दीनानाथ बोले.

‘क्या करूं, गैस पर सब्जी रखी है, जल जाएगी. फिर ऋषि आता होगा, उस के लिए नाश्ता भी तो बनाना है,’ सावित्री हैरानपरेशान स्वर में बोली.

‘कभीकभार थोड़ा समय हमारे लिए भी निकाल लिया करो,’ दीनानाथ ने कुछ ऐसे अंदाज में कहा कि सावित्री उन्हें अपलक ताकती रह गई थीं. जबान से एक बोल भी नहीं फूटा था.

‘बात क्या है? मेरे लिए तो कभी समय ही नहीं रहा आप के पास, फिर आज इस तरह पास बैठने का आग्रह?’ कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन की जबान से कुछ शब्द फूटे थे.

‘अरे, कुछ नहीं, तुम तो यों ही बाल की खाल निकालने लगती हो. जोओ, गैस बंद कर आओ. कुछ जरूरी बात करनी है,’ दीनानाथ मुसकराए थे.

‘ठीक है, अभी 2 मिनट में आई,’ कहती हुई सावित्री फुरती से गईं और गैस बंद कर के उन के पास आ बैठीं.

‘इस शुक्रवार को कुछ मेहमान आने वाले हैं. मैं चाहता हूं उन के स्वागतसत्कार में कोई कमी न रह जाए,’ सावित्री के बैठते ही दीनानाथ बोले.

‘ऐसे कौन से मेहमान हैं, जिन के बारे में मुझे पता नहीं है?’ सावित्री के स्वर में आश्चर्य झलक रहा था.

‘अपनी ऋचा को देखने कुछ लोग आ रहे हैं. घरवर दोनों ही बहुत अच्छे हैं.’

‘क्या कह रहे हैं आप? ऋचा को देखने? आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि ऋचा कभी तैयार नहीं होगी. आप को तो पता है कि वह डाक्टर बनना चाहती है. वह बचपन से यही सपना देखती आई है. अब एकाएक मैं कैसे कह दूं कि पढ़ाईलिखाई को तिलांजलि दे कर घरगृहस्थी में मन रमाओ…’’ सावित्री का स्वर न चाहते हुए भी रूखा हो आया था.

‘मुझे तो लगता है ऋचा से ज्यादा तुम इस विवाह के विरुद्ध हो. ऋचा विरोध भी करे तो तुम्हें उसे समझाना होगा. ऐसा अच्छा घरवर क्या भला रोज मिलता है? पढ़ाई ही करनी है न उसे तो विवाह के बाद कर लेगी. पितापुत्र दोनों ही डाक्टर हैं और उन्होंने मुझे आश्वासन दिया है कि यदि ऋचा पढ़ना चाहेगी तो वह उसे रोकेगे नहीं,’ दीनानाथ ने सावित्री को समझाना चाहा.

‘उन के कहने से क्या होता है. हमें भी तो अपनी बेटी का भलाबुरा सोच कर ही आगे कदम उठाना चाहिए. विवाह से पहले तो सब ऐसा ही कहते हैं पर बाद में सब के तेवर बदल जाते हैं. फिर विवाह के बाद उस के कंधों पर गृहस्थी का भार आ जाएगा, ऐसे में वह बेचारी क्या पढ़ाई कर पाएगी?’ सावित्री के स्वर में नाराजगी साफ झलक रही थी.

‘ऋचा नाराज होगी, यह तो मैं जानता था पर तुम से इतने विरोध की आशा नहीं थी. क्या मुझ पर विश्वास नहीं रहा तुम्हें?’ दीनानाथ धीरे से मगर दृढ़ स्वर में बोले थे.

‘मैं ने ऐसा कब कहा, और आप पर विश्वास न होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता,’ सावित्री का गला भर आया था.

‘तो मेरी बात मान लो और ऋचा को इस विवाह के लिए मनाने का काम भी तुम्हारा है.’

‘कोशिश करूंगी, मैं कोई आश्वासन नहीं दे सकती. मैं अपनी बेटी की आंखों में आंसू नहीं देख सकती,’ नाराज सावित्री उठीं और रसोई की ओर चली गईं. दीनानाथ एक फीकी सी मुसकान फेंक शून्य में ताकते बैठे रह गए थे.

रात को डाइनिंग टेबल पर ऋचा को न देख कर दीनानाथ ने पूछा, ‘ऋचा कहां है?’

‘बैठी रो रही है बेचारी अपनी नियति पर. वैसे भी उस के बिना ही खाने की आदत डाल लो तो अच्छा रहेगा,’ सावित्री बोलीं.

‘यह क्या तमाशा है? ऋषि, जाओ ऋचा को बुला कर लाओ,’ दीनानाथ ने अपने पुत्र को आदेश दिया. फिर वह सावित्री से मुखातिब हुए, ‘देखो, मैं ने तुम्हें पहले ही समझा दिया था कि मैं ने ऋचा के विवाह का निर्णय ले लिया है और मैं चाहता हूं कि तुम इस में मेरा साथ दो जिस से कि सबकुछ शांति से निबट जाएं.’

तभी ऋषि के साथ ऋचा आ गई तो वह बोले, ‘बैठो और खाना खाओ. देखो बेटी, घर के वातावरण को तनावमुक्त रखने की जिम्मेदारी हम सब के कंधों पर है और मैं नहीं चाहता कि तुम कुछ भी ऐसा करो जिस से मेरी परेशानी बढ़ जाए,’ उन्होंने इतनी दृढ़ता से कहा था कि सब चुप रह गए थे.

फिर तो उन्होंने किसी के विरोध की चिंता किए बिना ऋचा का विवाह कर दिया था.

उस के बाद उन्होंने जिद ठान ली थी कि गांव की जमीनजायदाद बेच कर शहर में मकान बनवाना है. उन की एक ही रट थी कि कौन देखभाल करेगा गांव की जायदाद की. सावित्री ने भरसक विरोध किया था फिर भी दीनानाथ नहीं माने थे.

मगर आज उन्हें अपने पर पछतावा हो रहा था. दीनानाथ ने समय पर प्रबंध न किया होता तो परिवार के पास सिर छिपाने के लिए छत भी न होती और फिर ऋषि का विदेश में उच्चशिक्षा का विरोध करते हुए उन्होंने सारे परिवार की नाराजगी झेली थी. ऋषि ने तो उन से बोलना तक बंद कर दिया था. सावित्री ने भी तो पति को पत्थर दिल बता कर मुंह मोड़ लिया था.

‘‘ऋषि,’’ वह बेटे को गले लगा कर बिलख रही थीं, ‘‘आज मुझे समझ आ रहा है कि वह तेरे विदेश जाने के इतने विरुद्ध क्यों थे.’’

‘‘कुछ मत कहो, मां. मैं तो स्वयं पर ही शर्मिंदा हूं. समझ नहीं आ रहा इस पितृऋण को मैं कैसे उतारूंगा,’’ ऋषि का चेहरा आंसुओं से भीग गया.

‘‘दीनानाथजी को होश आ गया है. आप लोगों को बुला रहे हैं,’’ तभी डा. सुदर्शन ने आ कर बताया.

‘‘अरे, तुम लोग रो रहे हो? देखो मैं ने भरपूर जीवन जिया है फिर मैं तो खुशहाल हूं कि मुझे इतना समय तो मिला जो मैं तुम लोगों के लिए जरूरी प्रबंध कर सका. ऋचा के लिए मैं अब बहुत खुश हूं. डाक्टर बनने का उस का सपना अब केवल सपना ही नहीं रहेगा. हां ऋषि, तुम्हारा मैं अपराधी जरूर हूं. मगर देखो बेटे, तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए सारे परिवार का भविष्य दांव पर लगाना पड़ता और वह खतरा मैं उठाना नहीं चाहता था.

‘‘सच कहूं तो मैं थोड़ा स्वार्थी हो गया था. मैं नहीं चाहता था कि मेरे बाद तुम्हारी मां निपट अकेली रह जाए,’’ दीनानाथ का स्वर इतना धीमा था मानो कहीं दूर से आ रहा हो.

‘‘पापा, मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए. आशीर्वाद दीजिए कि मैं भी आप की तरह साहसी बन सकूं,’’ ऋषि उन का हाथ अपने हाथों में थामते हुए बोला.

‘‘बेटा, तुम्हारी मां के लिए मैं कुछ विशेष नहीं कर सका, उस का भार मैं तुम्हारे कंधों पर छोड़ रहा हूं. और सावित्री, वादा करो, तुम रोओगी नहीं. याद रखना, मुझे आंसुओं से नफरत है,’’ कहते हुए दीनानाथ ने पुन: शांत हो कर आंखें मूंद लीं.

सावित्री और ऋषि अपने आंसुओं को रोकने का प्रयत्न कर रहे थे.  Family Story 

Social Story In Hindi : लांगो पंडित – पंडितजी की कट्टरपंथी उन्हीं पर पड़ गई भारी

Social Story In Hindi : जन्म से ही पैर टेढ़े थे. गांव में इस ऐब को ग्रहण लगना कहते हैं और ऐसे को ‘ग्रहण लगुआ’ कहा जाता है. बचपन में साथ खेलने वाले बच्चे और बड़े होने पर साथ पढ़ने वाले सहपाठी उन्हें लंगड़ालंगड़ा कह कर चिढ़ाया करते थे. मांबाप ने बड़े प्रेम से नाम रखा चंदन त्रिवेदी.

पिता बलदेव त्रिवेदी 3 भाई थे. चचेरे भाईबहन तो कई थे पर बलदेवजी के 2 ही पुत्र हुए- चंदन और बसंत. चंदन लंगड़ा तो था पर पढ़ने में अच्छा निकला, साथ ही, शैतानी में भी तेज था. धूर्तता, चापलूसी, डींगें हांकने इत्यादि गुणों में भी अव्वल निकला. सभी हंसते कि लंगड़ा है तब ऐसा है, कुदरत ने दोनों पैर ठीक रखे होते तो दुनिया को ही बेच देता. स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद उस ने कंपीटिशन दिए, केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बन गया और शहर में ही नौकरी लग गई. बसंत के लिए पढ़ाई मानो पहाड़ थी.

हां, उस में तोता रटंत की क्षमता कुछ ज्यादा ही थी और वह पिता के साथसाथ पुरोहिताई में लग गया. समय पर बलदेव पंडित ने अपने दोनों पुत्रों का विवाह किया. पोतेपोतियों का मुख देख उन्हें गोद में खिला कर चल बसे. उन की पत्नी भी कुछ वर्षों बाद दुनिया छोड़ गईं.

बचपन में हुआ नामकरण नौकरी में आगे चल कर साथियों द्वारा लांगो पंडित में बदल गया. इस के पीछे की कहानी यह है कि चंदन बाबू के कार्यालय में एक दिन उन के गांव का एक मित्र कुछ कार्यवश जा पहुंचा. लांगो पंडित ने कार्यालय में अपनी विद्वत्ता और परिवार के बड़प्पन की हवा फैला रखी थी और सबों से कह रखा था कि सभी उन्हें आचार्यजी के नाम से जानते हैं. बेचारे साथी ने चंदन बाबू का पुराना पुकारू नाम ले कर उन से मिलना चाहा तो कोई उसे कुछ नहीं बता पाया. उस सरल हृदय ने सरलता से बखान किया कि वह अपने मित्र ‘लांगो पंडित’ से मिलना चाहता है जिस का जन्म से ही पैर खराब है, वह इस तरह से चलता है. ऐसा कहते हुए उस ने लांगो पंडित के चलने के ढंग की नकल कर के लोगों को दिखाई. लोग हंस पड़े और उन्हें यह सम?ाते देर न लगी कि यह उन के साथी तथा कथित आचार्यजी हैं.

मित्र से मिला आचार्यजी का यह नया नाम जल्दी ही कार्यालय से हो कर पूरे विभाग में सबों की जबान पर जा चढ़ा. सामने तो नहीं पर पीठपीछे उन्हें अब सभी लांगो पंडित के ही नाम से संबोधित करने लगे.

आचार्यजी में कई गुण भी थे. काम करने और बहस करने में वे कभी पीछे नहीं हटा करते. किसी भी विषय पर अपनी सलाह देना उन की आदत बन चुकी थी. हवा के पुल बांधना और सामने वाले को दिन में रात का आभास करा देना उन के बाएं हाथ का खेल था. अपने सामने किसी को नहीं बोलने देना, खुद की प्रशंसा करते न थकना और आवश्यकता पड़ने पर सामने वाले के सामने स्वयं को बेहद दीनहीन होने का एहसास करा देना उन का विशेष गुण था.

सांस्कृतिक मामलों में वे बड़े कड़क थे. बालभर भी कोई आगेपीछे हटा नहीं कि उन की आलोचना का शिकार हुआ. उन के अनुशासन का दायरा उन के इर्दगिर्द घूमा करता चाहे वह उन का कार्यस्थल हो या फिर घर. एकएक कर उन की 4 संतानें हुईं. पहली दोनों लड़कियां थीं और फिर 2 लड़के. नौकरी छोटी थी और आवश्यकताएं उस से कहीं ज्यादा, इसलिए हमेशा कोशिश करते रहते कि कहीं से कुछ प्राप्त कर सके.

सभी तरह के कर्मकांड और पूजापाठ भी करवाया करते. पहनावे में धोतीकुरता, ललाट पर चंदनटीका और पैरों में बढि़या ब्रैंड की सब से सस्ती वाली चप्पलें. जाड़े के दिनों में चप्पलों की जगह जूता ले लेता. लोग उन की चप्पल पर टीकाटिप्पणी करते तो कहते, ‘मु?ो तो इसे छोड़ कर कोई दूसरी चप्पल पसंद ही नहीं आती.’

‘आचार्यजी, अब थोड़ा अपनेआप को बदलिए. कुछ दिनों में कंपनी इस चप्पल को बनाना ही बंद कर देंगी.’

‘अरे, आचार्यजी, इतना कमाते हैं. कमीज में चिप्पी…’ कोई व्यंग्य करता और वे बात काट कर कहते, ‘‘कपड़ों से क्या फर्क पड़ता है. आदमी का व्यक्तित्व तो उस के संस्कार से ही झलकता है. फिर मैं तो जन्मजात ब्राह्मण हूं. पूजापाठ और संस्कार तो मेरे रगरग में रचाबसा है. थोड़े में संतोष करना चाहिए. जीवन तो गरीबगुजारे का नाम है.’’

उन की भाषणबाजी चल ही रही होती कि कोई उन्हें चिढ़ा देता, ‘अरे भाई आचार्यजी तो फिर केवल तनख्वाह से संतोष क्यों नहीं करते, पूजापाठ और दानदक्षिणा, सब ढंग से क्यों बटोरते हैं?’

‘पूजापाठ कराना और दानदक्षिणा लेना यह तो ब्राह्मण का काम है. मैं नहीं कराऊंगा तो कौन कराएगा, दूसरे तो नहीं कराएंगे न…’ बात आईगई हो जाती, वे फिर से अपना दुखड़ा सुनाने लग जाते या कोई दूसरी बात निकल आती.

इन्हीं दिनों उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का विवाह तय कर दिया. उन का भरसक प्रयास रहा कि चमकदमक में कोई कमी न रहे. लोगों से उन्होंने बताया कि उन का होने वाला दामाद एक सरकारी उपक्रम में इंजीनियर है और दिल्ली में है. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि बरात में आए एक व्यक्ति की रिश्तेदारी कार्यालय के कर्मचारी से थी और लांगो पंडित की ढोल की पोल खुल गई. उसी ने बताया कि लड़का मामूली क्लर्क है. आने वाले कई दिनों तक लोग मुंह छिपा कर हंसते रहे. कुछ उन से खोदखोद कर पूछते भी रहे. लांगो पंडित के चेहरे पर मुर्दनी और क्रोध दोनों छाए रहे.

अभी 15 दिन ही गुजरे होंगे कि कार्यालय के एक कर्मचारी की बेटी ने अपने किसी सहकर्मी से अंतर्जातीय विवाह रचा लिया. लांगो पंडित के लिए तो मानो दाल में छौंक लग गई. उठतेबैठते, हर जगह इस प्रकरण को कुछ इस भांति उछालते कि उन के हाथ अलाउद्दीन का चिराग लग गया हो. आलोचना करते, अपनी संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते और घुमाफिरा कर बात स्वयं पर ले आते. गर्व से कहते, ‘‘लोग मेरी बात करते हैं. अब अपने गिरेबान में झांक कर देखें.’’

‘‘अरे, आचार्यजी, समय बदल रहा है. पुराने समय में कौन सी जाति व्यवस्था थी?’’

‘‘अब तो समय के साथ सब टूट रहा है,’’ दूसरे ने कहा.

‘‘कैसे नहीं थी, जरा हम भी तो सुनें?’’

‘‘मनुष्य आदिमानव ही तो था.’’

‘‘किस युग की बात कर रहे हैं, आप? अब हमआप सब पढ़ेलिखे हैं.’’

‘‘आचार्यजी, यह बताइए कि कल आप की पुत्री या पुत्र…’’

‘‘मैं कहता हूं ऐसा हो ही नहीं सकता, असंभव.’’ बात काटते हुए वे बोल उठे.

‘‘मान लीजिए कि यदि आप के यहां ही ऐसा हो गया तो?’’ एक और साथी ने उन्हें फिर से कुछ कहने का प्रयास किया.

‘‘आप कुछ भी कह देंगे और कोई मान जाएगा?’’ वाकयुद्ध छिड़ गया और लोग बीचबचाव करने लगे. रहीसही कसर भी उस दिन पूरी हो गई जिस दिन उन की भिड़ंत उस साथी से हो गई जिस की पुत्री ने अंतर्जातीय विवाह किया था. जम कर तूतू मैंमैं हुई. मुंहफट तो वे थे ही, सीधी तरह किसी को कुछ कह देना उन के लिए कठिन नहीं था, इसलिए एक ही ?ाटके में पूरे औफिस को लपेटे में लेते हुए कहा, ‘‘मेरी बेटी की शादी में तो ऐसी कोई बात नहीं थी पर आप के साथसाथ सबों ने चटखारे लेले कर बखान किया. खूब व्यंग्यबाण चलाए, अब मेरी बारी है…’’

लोगों ने दोनों को शांत कराया और सम?ाया कि एकदूसरे पर कोई कुछ न बोले, यही अच्छा रहेगा. सबों का अपना व्यक्तिगत जीवन है और किसी को उस में ताकझांक करने का कोई अधिकार नहीं. आचार्यजी की दूसरी पुत्री थोड़ी कम खूबसूरत थी. इसलिए उस के विवाह में उन्हें काफी दौड़धूप करनी पड़ी. वर्षभर बाद उन्होंने उस का भी विवाह कर दिया. लोगों को उन्होंने बताया कि उन का दामाद एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत है. बात जो भी रही हो लेकिन किसी को भी उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ.

6 माह गुजरे थे कि आचार्यजी ने एक दिन सबों को प्रसाद में लड्डू खिलाया और बताया कि बेटे का इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा हो गया है और उसे नौकरी मिल गई है. सबों ने उन्हें बधाई दी. आचार्यजी अब बेटे के विवाह के लिए लग गए. लड़की वाले भी उन के यहां रिश्ते के लिए आने लगे. सबकुछ ठीकठाक और सामान्य ढंग से चल रहा था. आचार्यजी से थोड़ा हंसीमजाक भी कभीकभी हो ही जाया करता था.

अचानक एक दिन वे कार्यालय नहीं आए. किसी का ध्यान इस पर नहीं गया पर जब 2-3 दिन गुजर गए तो कुछ लोग चिंतित हुए. जिन से उन की पटती थी, उन में से एक व्यक्ति ने उन्हें कौल लगाई पर घंटी बजती रही और कोई उत्तर नहीं मिल सका. अगले दिन उन का छोटा बेटा छुट्टी का आवेदन ले कर आया, तब लोगों को पता चला कि वे बीमार हैं और आज ही सुबह उन्हें एक नर्सिंग होम में भरती किया गया है. लोगों ने तय किया कि उन्हें देखने तो जाना ही चाहिए. 2 दोस्तों से उन की गहरी मित्रता थी. वे दोनों उन्हें देखने गए.

आचार्यजी बैड पर लेटे हुए थे. उन की आंखें शून्य में निहार रही थीं. दोस्तों ने उन से जानना चाहा कि उन की तबीयत कैसी है और उन्हें क्या कष्ट है? उन्होंने एक बार उन की तरफ देखा, उन के होंठ फड़फड़ाए पर वे कुछ नहीं कह सके. पंडिताइन लंबा घूंघट निकाले थीं. वे गांवगंवई की सरल हृदय महिला थीं और उन्हें ज्यादा कुछ समझ में नहीं आता था. वे भी कुछ नहीं बता सकीं. उन का छोटा बेटा वहां नहीं था. डाक्टर के कक्ष में बैठे जूनियर डाक्टर ने बताया कि आचार्यजी का ब्लडप्रैशर अचानक ही बढ़घट रहा है और उन्हें डिप्रैशन यानी गहरा सदमा लगा है. उसी समय उन का छोटा बेटा लौट आया. उसी ने बताया कि दोनों में से कोई भी बड़ी बहनें अभी तक नहीं आ सकी हैं.

‘‘क्या इसी कारण वे सदमे में हैं?’’

‘‘तुम्हारा बड़ा भाई क्यों नहीं आया अभी तक?’’

‘‘भैया के कारण ही तो पापा डिप्रैशन में हैं,’’ हठात ही उस के मुंह से निकल गया.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अब क्या बताऊं, पापा ने किसी को कुछ बताने से मना किया था. भैया से पापा की बीमारी के विषय में कह दिया है,’’ वह सिसकने लगा.

‘‘बात क्या है, कुछ पता तो चले. हम लोगों से जो हो सकेगा, उतना तो मदद करेंगे ही.’’

‘‘घर की बात है. आप लोग किसी से न कहिएगा, वरना लोग मुझे… दरअसल, भैया ने ईसाई लड़की से विवाह कर लिया है.’’ Social Story In Hindi

Romantic Story In Hindi : तीन शब्द – राखी से वो तीन शब्द कहने की हिम्मत क्या जुटा पाया परम ?

Romantic Story In Hindi : परम आज फिर से कैंटीन की खिड़की के पास बैठा यूनिवर्सिटी कैंपस को निहार रहा था. कैंटीन की गहमागहमी के बीच वह बिलकुल अकेला था. यों तो वह निर्विकार नजर आ रहा था पर उस के मस्तिष्क में विगत घटनाक्रम चलचित्र की तरह आजा रहे थे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के नौर्थ कैंपस की चहलपहल कैंपस वातावरण में नया उत्साह पैदा कर रही थी. हवा में हलकी ठंडक से शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी. दोस्तों के संग कैंटीन के बाहर खड़े हो कर आनेजाने वाले छात्रों को देख कर परम सोचने लगा कि टाइमपास का इस से अच्छा तरीका और क्या हो सकता है.

संकोची स्वभाव के परम ने जब पहली बार उसे देखा था तो एक अजीब सी झुरझुरी उस के शरीर में दौड़ गई थी. राखी, हां, यही नाम था उस का. वह भी तो उसी क्लास की छात्रा थी, जिस में परम पढ़ता था.

क्लास में कभी जब चाहेअनचाहे दोनों की निगाहें मिलतीं तो परम बेचैन हो उठता और चाहता कि वह उस के सामने खड़ा हो कर बस, उसे ही निहारता रहे.

कई बार परम ने राखी के समक्ष खुद की भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास किया पर उस का संकोची स्वभाव आड़े आ जाता था. एक दिन संकोच को ताक पर रख कर उस ने उस का नाम मालूम होने पर भी अनजान बनते हुए पूछ लिया था, ‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

हलकी मुसकराहट के साथ उस ने उत्तर दिया था, ‘‘राखी.’’

मात्र नाम जानने से ही परम को ऐसा लगा कि जैसे उस ने पूरा जीवन जी लिया. वह जड़वत उस एक शब्द को प्रतिध्वनित होते हुए महसूस कर रहा था.

कुछ समय बाद कालेज की ओर से छात्रों का समूह शैक्षणिक भ्रमण पर शिमला जा रहा था. परम के मित्र संदीप और चंदर ने कई बार परम को भी चलने के लिए कहा पर वह मना करता रहा, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि राखी भी जा रही है, एकाएक उस ने भी हामी भर दी.

बस की यात्रा के दौरान हंसीमजाक के दौर के बीच उसे राखी से बात करने का मौका मिल ही गया. सादगी की प्रतिमूर्ति राखी भी उस की बातों में दिलचस्पी लेती नजर आई तो उस का हौसला और बढ़ गया. चीड़ और देवदार के पेड़ों से आती खुशबू ने मानो उस के मन को भांप लिया था और पूरे मंजर को खुशनुमा बना दिया था.

‘‘आप बहुत कम बोलती हैं?’’

‘‘जी, ऐसी तो कोई बात नहीं है,’’ और फिर बातों का सिलसिला आरंभ हो गया.

परम ने महसूस किया कि राखी भी उस के नजदीक आने का प्रयास कर रही थी. ज्यादातर दोस्त अपनेअपने चाहने वालों में मस्त थे. अनजाने में परम ने राखी के हाथ को हलके से क्या छू लिया उसे ऐसा लगा कि जैसे उस ने सारा जहां पा लिया हो.

लौटते समय दोनों एकसाथ बैठे. औपचारिक वार्त्तालाप खत्म होते ही दोनों एकदूसरे से बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर जबान साथ नहीं दे रही थी. गंभीर खामोशी के बीच अनवरत एकदूसरे को निहारते हुए परम और राखी चुप रहने के बाद भी आंखों से मानो सबकुछ कह रहे थे. इस खामोशी की आवाज दोनों के दिलों में गहरे तक उतरती जा रही थी.

शिमला से वापस लौटने के बाद कैंपस में वे अब साथसाथ नजर आने लगे. कैंटीन, लाइबे्ररी व कैंपस के पार्क उन की उपस्थिति के गवाह थे. बिना आवाज का यह सफर एक निष्कर्षहीन सफर था. उन दोनों के मध्य खामोशी ही उन की आवाज बन गई थी. खामोश रह कर सबकुछ कह देने का उन का अंदाज निराला था.

वे शांत बहती नदी की तरह ही थे. उन के दिल के हाल से प्रकृति भी खासी परिचित होती जा रही थी. पेड़, पत्ते, नदी, फूलों पर मंडराती तितलियां, सब ने ही तो उन के बारे में बातें करना शुरू कर दिया था.

कालेज कैंपस में उन के भविष्य को ले कर चर्चाएं आम होती जा रही थीं और वे स्वयं खयालों में डूबे एकदूसरे के पूरक बनते जा रहे थे.

शब्दों के बिना की अभिव्यक्ति यों तो सशक्त होती है पर कुछ भाव तो शब्दों के बिना व्यक्त हो ही नहीं सकते. कितना कठिन होता है केवल ‘3 शब्द’, ‘आई लव यू’ कहना.

यों तो वे खामोश रह कर भी हर पल यही दोहराते थे, पर उन दोनों के मध्य ये 3 शब्द तो थे, पर उन में आवाज नहीं थी. शायद वे दोनों किसी खास पल, खास माहौल का इंतजार कर रहे थे, जब इन शब्दों को मूर्त रूप दिया जा सके.

छुट्टियों के एक लंबे अंतराल के बाद इन 3 शब्दों के अभाव ने 5 शब्दों का प्रादुर्भाव कर दिया, ये 5 शब्द थे, ‘राखी की शादी हो गई.’ और फिर राखी लौट कर नहीं आई.

कैंटीन में बैठे हुए विगत को निहारते हुए परम ने खुद के हाथ का दूसरे हाथ से स्पर्श किया, जिस ने पहली बार राखी के हाथों का स्पर्श किया था, गहरे विषाद ने उस के अंतर्मन को झकझोर दिया. आखिर एक लंबे अरसे के बाद वह इस स्थान पर अकेला बैठा था. आज उस के साथ राखी नहीं थी.

एकांत में बैठा परम बारबार उन 3 शब्दों का उच्चारण कर रहा था, पर उसे सुनने वाला कोई नहीं था. अगर उस ने समय पर हिम्मत दिखाई होती तो चाहे जो होता, आज उसे गिला तो नहीं होता. वह कोने में यों अकेला तो न बैठा होता.  Romantic Story In Hindi 

Family Story In Hindi : अपनी मंजिल – अमिता ने क्यूं चुना ये रास्ता?

Family Story In Hindi : अमिता रात को पुरानी बातें याद करने लगती है.होस्टल में पलीबढ़ी अमिता के मम्मीपापा का तलाक हो चुका था. हर साल छुट्टियों में वह घर न जा कर कहीं न कहीं कैंप में चली जाती और पापा भी उसे भेजने को राजी हो जाते.

हालांकि पापा उसे बहुत प्यार करते थे, पर मां की कमी उसे महसूस होती. इस बार छुट्टियों में आतंकवादी गतिविधियों के कारण उन का कैंप रद्द हो गया तो वह पापा को सरप्राइज देने के लिए अकेली ही दिल्ली चली गई. पापा उसे देख कर पसोपेश में पड़ गए. तभी एक युवती से उस का सामना हुआ. तब उसे पता चला कि उन्होंने तो शादी कर के दुनिया ही बसाई हुई है. वह उलटे पांव वहां से लौट गई. अमिता फिर अपनी मां के पास कानपुर चली गई. अब आगे…

अमिता के सामने एक पल में सारा संसार सुनहरा हो गया. मां कभी बच्चे से दूर नहीं जा सकती. पापा ने बहुत कुछ किया पर मां संसार में सर्वश्रेष्ठ आश्रय है.

‘इतने दिनों के बाद मेरी याद आई तु झे?’ उन्होंने फिर चूमा उसे.

‘चल…अंदर चल.’

‘बैठ, मैं चाय बनाती हूं.’

बैग को कंधे से उतार कर नीचे रखा और सोफे पर बैठी. घर में पता नहीं कौनकौन हैं? वे लोग उस का आना पता नहीं किसकिस रूप में लेंगे. मम्मी अपनी हैं पर बाकी से तो कोई रिश्ता नहीं, तभी अमिता चौंकी. अंदर कर्कश आवाज में कोई गरजा.

‘8 बज गए, चाय बनी कि नहीं.’

‘बनाती हूं, बिट्टू आई है न इसलिए देर हो गई.’

‘कौन है यह बिट्टू? सुबह किसी के घर आने का यह समय है क्या?’

‘धीरे बोलो, वह सुन लेगी. मेरी बेटी है अमिता,’ मां के स्वर में लाचारी और घबराहट थी.

‘तुम्हारी बेटी, वह होस्टल वाली न. मेरे घर में यह सब नहीं चलेगा. जाने के लिए कह दो.’

‘अरे, मु झ से मिलने आई होगी. 2-4 दिन रहेगी फिर चली जाएगी पर तुम पहले से हल्ला मत करो.’

मां के शब्दों में अजीब सी याचना और विनती थी. आंखों के सामने उजली सुबह स्याह हो गई. ये उस को नहीं रखेंगे तो अब क्या करेगी? पापा होटल में रख रहे थे वह फिर भी अच्छा था. किसी की दया का पात्र तो नहीं बनती.

परीक्षाफल आने में अभी पूरा एक महीना पड़ा है. उस के बाद ही तो वह कहीं नौकरी तलाश कर सकती है पर तब तक का समय? होस्टल खुला होता तो लौट जाती. वहीं कोई छोटामोटा काम देख लेती पर कानपुर तो नई और अनजान जगह है. कौन नौकरी देगा?

तभी सुनीता ट्रे में रख कर चाय ले आईं. पीछेपीछे एक गैंडे जैसा आदमी चाय पीता हुआ लुंगी और बनियान में आ गया. लाललाल आंखें, मोटे लटके होंठ, डीलडौल मजदूरों जैसा, भद्दा हावभाव. उस की आंखों के सामने सौम्य, भद्र व्यक्तित्व वाले उस के पापा आ गए. मम्मी की रुचि इतनी विकृत हो गई है. छि:.

‘चाय ले, ये सतीशजी हैं मेरे पति.’

मन ही मन अमिता ने सोचा यह आदमी तो पापा के चपरासी के समान भी नहीं है. उस ने बिना कुछ बोले चाय ले ली. गैंडे जैसे व्यक्ति ने स्वर को कोमल करते हुए कहा, ‘अरे, तुम मेरी बेटी जैसी हो. हमारे पास ही रहोगी.’

सुनीता का चेहरा खुशी से खिल उठा.

‘यही तो मैं कह रही थी. तेरे 2 छोटे भाई भी हैं. अच्छा लगेगा तु झे यहां.’

अमिता उस व्यक्ति की आंखों में लालच और भूख देख सिहर उठी. बिना सोचेसम झे वह कहां आ गई. मम्मी खुशी से फूली नहीं समा रहीं.

‘चाय समाप्त कर, चल तेरा कमरा दिखा दूं. साथ में ही बाथरूम है. नहाधो कर फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता बनाती हूं. भूख लगी होगी.’

सुनीता बेटी को उस के कमरे मेें छोड़ आईं. मां के बाहर जाते ही उस ने अंदर से कुंडी लगा ली. उस की छठी इंद्री उसे सावधान कर रही थी कि वह यहां पर सुरक्षित नहीं है. उस का मन पापा का संरक्षण पाने के लिए रो उठा.

नहाधो कर अमिता बाहर आई तो 2 कालेकलूटे, मोटे से लड़के डाइनिंग टेबल पर स्कूल ड्रैस में बैठे थे. अमिता को दोनों एकदम जंगली लगे. सतीश नाश्ता कर रहा था. उसे फिर ललचाई नजरों से देख कर बेटों से बोला, ‘बच्चो, यह तुम्हारी दीदी है. अब हमारे साथ ही रहेगी और तुम लोग इस से पढ़ोगे,’ फिर पत्नी से बोला, ‘सुनो सुनीता, आज से ही टीचर की छुट्टी कर देना.’

‘टीचर की छुट्टी क्यों?’

‘अब इन बच्चों को यह पढ़ाएगी. 500 रुपए महीने के बचेंगे तो इस का कुछ तो खर्चा निकलेगा.’

अमिता ने सिर झुका लिया. सुनीता लज्जित हो गईं.

अमिता ने इस से पहले इतने भद्दे ढंग से बात करते किसी को नहीं देखा था और मम्मी यह सब  झेल रही हैं. जबकि यही मम्मी पापा का जरा सा गरम मिजाज नहीं  झेल सकीं और इस मूर्ख के आगे नाच रही हैं. उन की जरा सी जिद पर चिढ़ जाती थीं और अब इन दोनों जंगली बच्चों को  झेल रही हैं और चेहरे पर शिकन तक नहीं है. यही मम्मी हैं कि आज सतीश को खुश करने में कैसे जीजान से लगी हैं जबकि पापा की नाक में दम कर रखा था.

एक खटारा सी मारुति में दोनों बेटों को ले कर सतीश चला गया. बच्चों को स्कूल छोड़ खुद काम पर चला जाएगा. लंच में आते समय ले आएगा. सुनीता ने फिर 2 कप चाय का पानी चढ़ा दिया.

अमिता को अब मां से बात करना भी अच्छा नहीं लग रहा था. इस समय वह अपने भविष्य को ले कर चिंतित थी.

‘तू तो लंबी छुट्टी में कैंप में जाती थी… इस बार क्या हुआ?’

‘कैंप रद्द हो गया. जहां जाना था वहां माओवादी उपद्रव मचा रहे हैं.’

‘पापा के पास नहीं गई थी?’

अमिता को लगा कि हर समय सही बात कहना भी मूर्खता है. इसलिए वह बोली, ‘नहीं, अभी नहीं गई.’

‘तू ने कब से अपने पापा को नहीं देखा?’

‘क्या मतलब, हर दूसरेतीसरे महीने हम मिलते हैं.’

यह सब जान कर सुनीता बु झ सी गईं.

‘अच्छा, मैं सोच रही थी कि बहुत दिनों से…’

‘होस्टल का खर्चा भी कम नहीं. पापा ने कभी हाथ नहीं खींचा,’ बेटी को अपलक देखती हुई सुनीता कुछ पल को रुक कर बोलीं, ‘अब तो तू अपने पापा के साथ रह सकती है?’

अमिता ने सीधे मां की आंखों में देखा और पूछ बैठी, ‘क्यों?’

सुनीता की नजरें  झुक गईं. उन्होंने मुंह नीचा कर मेज से धूल हटाते हुए कहा, ‘मेरा मतलब…अब पढ़ाई तो पूरी हो गई, तुम्हारे लिए रिश्ता देखना चाहिए.’

अमिता के मन में कई बातें कहने की इच्छा हुई कि तुम तो बच्ची को एक  झटके में छोड़ कर चली आई थीं. 12 साल में पलट कर भी नहीं देखा. अब बेटी के रिश्ते की चिंता होने लगी? पर अपने को संभाला. इस समय उस के पैरों के नीचे जमीन नहीं है. आगे के लिए बैठ कर सोचने के लिए एक आश्रय तो चाहिए. अत: वह चुप ही रही. इस के बाद सुनीता ने बातचीत चालू रखने का प्रयास तो किया पर सफल नहीं हो पाईं. बेटी उठ कर अपने कमरे में चली गई.

ठीक 2 बजे सतीश अपनी खटारा गाड़ी में दोनों बच्चों को ले कर वापस आया. अमिता को फिर अपने पापा की याद आई. वह सारा दोष पापा को नहीं देती है. ढलती उम्र में स्त्री अकेली रह लेती है पर आदमी के लिए रहना कठिन है. वह कुछ सीमा तक असहाय हो जाता है. पापा का दोष इतना भर है कि अपनी पत्नी से बेटी की बात छिपाई और बेटी से अपने विवाह की वरना पापा ने पैसों से कभी हाथ नहीं खींचा.

मैं ने 100 रुपए मांगे तो पापा ने 500 दिए. साल में कई बार मिलते रहे. मेरी पढ़ाई की व्यवस्था में कोई कमी नहीं होने दी. उन का व्यवहार अति शालीन है. उन के उठने, बैठने, बोलने में शिक्षा और कुलीनता साफ  झलकती है. इस उम्र में भी वे अति सुदर्शन हैं. एक अच्छे परिवार की उन में छाप है और यह भौंडा सा व्यक्ति..छि:…छि:. मां की रुचि के प्रति अमिता को फिर से घृणा होने लगी.

उसे पूरा विश्वास है कि यह व्यक्ति व्यसनी, व्यभिचारी और असभ्य है. किसी अच्छे परिवार का भी नहीं है. उस व्यक्ति का सभ्यता, शालीनता से परिचय ही नहीं है. पहले मजदूर होगा, अब सुपरवाइजर बन गया है. इस आदमी के हावभाव देख कर तो यही लगता है कि यह आदमी मां की पिटाई भी करता होगा जबकि पापा ने कभी मां पर हाथ नहीं उठाया बल्कि मम्मी ही गुस्से में घर में तोड़फोड़ करती थीं. अब इस के सामने सहमीसिमटी रहती हैं. अब इस समय अमिता को मां की हालत पर रत्तीभर भी तरस नहीं आया. जो जैसा करेगा उस को वैसा  झेलना पड़ेगा.

रात को सोने से पहले अमिता ने कमरे का दरवाजा अच्छी तरह चैक कर लिया. उसे मां के घर में बहुत ही असुरक्षा का एहसास हो रहा था. मां का व्यवहार भी अजीब सा लग रहा था.

उस ने रात खाने से पहले टैलीविजन खोलना चाहा तो मां ने सिहर कर उस का हाथ पकड़ा और बोलीं, ‘सतीशजी को टैलीविजन का शोर एकदम पसंद नहीं. इसलिए जब तक वे घर में रहते हैं हम टैलीविजन नहीं चलाते. असल में फैक्टरी के शोर में दिनभर काम करतेकरते वे थक जाते हैं.’

अमिता तुरंत सम झ गई कि टैलीविजन चलाने के लिए इस घर में सतीश की आज्ञा चाहिए. मन में विराग का सैलाब उमड़ रहा था. यहां आना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल है. अब सहीसलामत यहां से निकल सके तो अपने जीवन को धन्य सम झेगी, पर वह जाएगी कहां? उसे याद आया कि इसी मां के धारावाहिकों के चक्कर में पापा का मैच छूट जाता था पर मम्मी टैलीविजन के सामने जमी रहती थीं.

इंसान हालात को देख कर अपने को बदलता है, पर इतना? यह सम झौता है या पिटाई का आतंक? पूरे दिन मां यही सम झाने का प्रयास करती रहीं कि सतीश बहुत अच्छे इंसान हैं. ऊपर से जरा कड़क तो हैं पर अंदर से एकदम मक्खन हैं. उस को चाहिए कि उन से जरा खुल कर मिलेजुले तभी संपर्क बनेगा.

अमिता के मन में आया कि कहे मु झे न तो यहां रहना है और न ही अपने को इस परिवार से जोड़ना है. तो फिर क्यों इस के लिए खुशामद करूं.

रात को पता नहीं कैसे चूक हो गई कि खाना खा कर अपने कमरे में आ कर अमिता को कुंडी लगाने का ध्यान नहीं रहा. बाथरूम से निकल कर बिस्तर पर बैठ क्रीम का डब्बा अभी खोला भी नहीं था कि सतीश दरवाजा धकेल कर कमरे में आ गया. अमिता को अपनी गलती पर भारी पछतावा हुआ. इतनी बड़ी भूल कैसे हो गई पर अब तो भूल हो ही गई थी. उस ने सख्ती से पूछा, ‘कुछ चाहिए था क्या?’

गंदे ढंग से वह हंसा और बोला, ‘बहुत कुछ,’ इतना कह कर वह सीधे बिस्तर पर आ कर बैठ गया, ‘अरे, भई, जब से तुम आई हो हमारा ठीक से परिचय ही नहीं हो पाया. अब समय मिला है तो सोचा जरा बातचीत ही कर लें.’

अमिता को खतरे की घंटी सुनाई दी. दोनों बेटे सोने गए हैं. मम्मी रसोई समेट रही हैं सो उन के इधर आने की संभावना नहीं है. उस के पैरों तले धरती हिल रही है. वह अमिता के नजदीक खिसक आया और उस के हाथ उसे दबोचने को उठे. अमिता की बुद्धि ने उस का साथ नहीं छोड़ा. उस ने यह जान लिया था कि इस घर में चीखना बेकार है. मम्मी दौड़ तो आएंगी पर साथ सतीश का ही देंगी. अमिता को जरा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर मम्मी उस के सामने यह सम झाने का प्रयास करेंगी कि यह तो प्यार है, उसे बुरा नहीं मानना चाहिए.

सतीश की बांहों का कसाव बढ़ रहा था. वैसे भी उस में मजदूर लोगों जैसी शक्ति है. पर शायद सतीश को यह पता नहीं था कि जिसे मुरगी सम झ कर वह दबोचने की कोशिश में है, वह लड़की अभीअभी ब्लैकबैल्ट ले कर आई है. हर दिन कैंप से पहले 10 दिन की ट्रेनिंग खुद के बचाव के लिए होती थी.

अमिता का हाथ उठा और सतीश पल में दीवार से जा टकराया. अमिता उठी, सतीश के उठने से पहले ही उस के पैर  पूरे ताकत से सतीश के शरीर पर बरसने लगे. वह निशब्द थी पर सतीश जान बचाने को चीखने लगा. सुनीता दौड़ कर आईं. वह किसी प्रकार लड़खड़ाता खड़ा ही हुआ था कि अमिता के हाथ के एक भरपूर वार से वह फिर लुढ़क गया.

‘थैंक्यू पापा,’ अमिता के मुंह से अनायास निकला. पैसे की परवा न कर के आप ने मु झे एक अच्छे कालेज में शिक्षा दिलवाई नहीं तो मैं आज अपने को नहीं बचा पाती.’

सुनीता रोतेरोते हाथ जोड़ने लगीं, ‘बस कर बिट्टू. माफ कर दे. इन के मुंह से खून आ रहा है.’

‘मम्मी, ऐसे कुत्तों को जीना ही नहीं चाहिए,’ दांत पीस कर उस ने कहा.

‘बेटी, मेरे 2 छोटेछोटे बच्चे हैं. माफ कर दे.’

मौका देख सतीश कमरे से भाग गया. सुनीता ने अमिता का हाथ पकड़ कर उसे समझाने का प्रयास किया तो अमिता गरजी, ‘रुको, मु झे छूने की कोशिश मत करना. मेरे पापा का जीना तुम ने मुश्किल कर दिया था. अच्छा हुआ तलाक हो गया क्योंकि तुम उस सुख भरी जगह में रहने के लायक ही नहीं थीं. नाली का कीड़ा नाली में ही रहना चाहता है. आज से मैं तुम्हारे साथ अपने जन्म का रिश्ता तोड़ती हूं.’

‘बिट्टू… मेरी बात तो सुन.’

‘मु झे अब आप की कोई बात नहीं सुननी. मु झे तो अपने शरीर से घिन आ रही है कि तुम्हारे शरीर से मेरा जन्म हुआ है. तुम वास्तव में एक गिरी औरत हो और तुम्हारी जगह यही है.’

दिमाग में ज्वालामुखी फट रहा था. उस ने जल्दीजल्दी सामान समेट बैग में डाला. जो छूट गया वह छूट गया. घर से निकल पड़ी और टैक्सी पकड़ कर सीधे स्टेशन पहुंची. वह इतनी जल्दी और हड़बड़ी में थी कि उस ने यह भी नहीं देखा कि कौन सी गाड़ी है. कहां जा रही है. वह तो भला हो कोच कंडक्टर का जो इस कोच में उसे जगह दे दी.

रात भर अमिता बड़ी चैन की नींद सोई. जब आंख खुली तब धूप निकल आई थी. ब्रश, तौलिया ले वह टायलेट गई. फ्रेश हो कर लौटी. बाल भी संवार लिए थे. ऊपर की दोनों सीट खाली थीं. सामने एक वयोवृद्ध जोड़ा बैठा था. पति समाचारपत्र पढ़ रहे हैं और पत्नी कोई धार्मिक पुस्तक.

अमिता ने बिस्तर समेट कर ऊपर डाल दिया फिर सीट उठा कर आराम से बैठी. खिड़की का परदा हटा कर बाहर देखा तो खेतखलिहान, बागबगीचे यहां तक कि मिट्टी का रंग तक बदला हुआ था. यह अमिता के लिए नई बात नहीं क्योंकि हर साल वह दूरदूर कैंप में जाती थी, आसाम से जैसलमेर तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक का बदलता रंगढंग उस ने देखा है. राजस्थान  की मिट्टी से मेघालय की तुलना नहीं तो ‘गोआ’ से ‘चंडीगढ़’ की तुलना नहीं.

चाय वाले को बुला कर अमिता ने चाय ली और धीरेधीरे पीने लगी. आराम- दायक बिस्तर और ठंडक से अच्छी नींद आई थी तो शरीर की थकान काफी कम हो गई थी. सामने बैठे वृद्ध दंपती के संपूर्ण व्यक्तित्व से संपन्नता और आभिजात्यपन  झलक रहा था. देखने से ही पता चला रहा था कि वे खानदानी अमीर परिवार से हैं. महिला 60 के आसपास होंगी तो पति 65 को छूते.

इन्हें भी आजमाइए

घर में हुए पेंट की गंध दूर करने के लिए कमरे में पानी से भरी बालटी रख कर उस में खाने का सोडा डाल दें और थोड़ीथोड़ी देर में पानी बदलते रहें. गंध धीरेधीरे दूर होती जाएगी.

बरसात या नमी के कारण अलमारी में रखे कपड़ों से सीलन की महक आने लगती है. इसे दूर करने के लिए अलमारी में किसी प्लास्टिक के मग में थोड़ा सा चूना रख दें. यह पूरी रात में नमी सोख लेगा.

यदि लैदर की कुरसियों का रंग खराब हो गया हो तो उन पर अलसी के तेल की पौलिश करें.

यदि वालपेपर न चिपक रहा हो तो पेस्ट को वालपेपर के बजाय दीवार पर लगा कर वालपेपर चिपकाएं,आसानी से चिपक जाएगा.

डबल चिन या ठुड्डी पर जमा चरबी दूर करने के लिए चपटे तकिए का प्रयोग करें. ठुड्डी का व्यायाम करें. सिर को धीरेधीरे पहले दाईं ओर घुमाएं और ठुड्डी को कंधे पर ले जाएं, फिर सिर पीछे ले जाएं. फिर सिर बाईं ओर घुमाएं.

अपने बगीचे को ऐसे फूलों से सजाएं जिन में कम पानी की आवश्यकता हो. इस से पानी की बचत होगी.

यदि आप का औफिस छोटा है तो भारी फर्नीचर के बजाय केन, रौट आयरन और पार्टिकल बोर्ड फर्नीचर खरीदें. इस से औफिस बड़ा लगेगा.  Family Story In Hindi 

Social Story : सैल्फी के ताजा रेट – सैल्फी के चक्कर में भाव खाती हुई दाल

Social Story : महीनों से घर से दाल, सब्जियां गायब हैं. सुखचैन तो खैर उसी दिन से गायब हो गया था जिस दिन मोतीचूर का लड्डू आया था. चंद्रमुखी आजकल सूरजमुखी चल रही है. सूरजमुखी ने नाक में दम कर रखा है कि बहुत हो गया दालसब्जियों से मुंह छिपाना. अब और बहाने मत बनाओ. मर्द हो तो मर्द वाला करतब कर के दिखाओ. घर में तो बड़े मर्द बने फिरते हो. मगर जब बाजार से सब्जीदाल लाने को कहती हूं तो बाजार जाने से ऐसे डरते हो जैसे…

मेरे लिए न सही तो न सही, कम से कम उस के लिए ही सही, किलोआधकिलो कोई भी दाल ले ही आओ. दाल का मुंह देखे बिन अब किचन काटने को आती है. मैं तो तुम्हें पतिदेव मानती रही और तुम पति कहलाने के लायक भी नहीं. सोचा था, ‘जिंदगीभर तुम्हारे साथ मटरपनीर खाऊंगी पर तुम, अरहर तो छोड़ो, चने की दाल खिलाने के लायक भी नहीं. सच पूछो तो अब मैं अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार बहुत पछता रही हूं. इस उम्र में कहीं और जाने से भी रही.’

वैसे तो मेरे जैसा पति, पत्नी के तानों से कभी तंग नहीं आता पर पहली बार पता नहीं क्या हुआ, क्यों हुआ कि मेरे लिजलिजे अहं को पत्नी के ताने प्र्रभावित कर गए और मैं बिना एक पल गंवाए पत्नी के तानों से आहत हो गया.

जिस तरह कभी पत्नी के तानों से आहत हो कर तुलसीदास घर छोड़ कर कथाकथित प्रभु की खोज में निकले थे उसी तरह अपनी बीवी के तानों से तंग आ कर मेरा मन भी बाजार जा, दाल पाने को मचल उठा. मैं बाजार की ओर बिन सोचेविचारे, कांधे पर झोला लटकाए दाल की खोज में निकल पड़ा. अब जो होगा, देखा जाएगा. सिर दिया बाजार में, तो रेट से क्या डरना.

मुझे लगता है कि कई बार बहुत से काम बिन सोचेविचारे ही, बस रेले में करने पड़ते हैं. जो उन के बारे में यह सोचा कि इस काम को करने से पहले सोच लिया जाए तो सोचने के बाद पता चलता है कि इस काम को करने की मैं कितनी बड़ी बेवकूफी कर रहा था.

ज्यों ही बाजार के गेट से पहला कदम भीतर धरा, टांगें जवाब देने लगीं. लगा, वैराग्य की राह जैसी कठिन है बाजार की राह, बल्कि उस से भी कठिन. वैराग्य की राह से पार पाना बाजार की राह की अपेक्षा आसान है. जिस तरह जीव को माया अपने वश में कर उसे प्रभु से मिलने नहीं देती, उसी तरह बाजार के भाव उसे डरा अपनी बीवी में उठने नहीं देते.

बाजार के जलते अंगारों पर आंखें बंद कर कदम रखता, बीवी के तानों का स्मरण करता अपनी नस्ल की दाल के चरणस्पर्श करने को हुआ ही कि लाला ने हड़काते रोका, ‘‘धूर्त, क्या कर रहे हो? दाल से छेड़छाड़ करने का इरादा है क्या? पुलिस बुलवाऊं? पता नहीं कहां से चले आते हैं. छेड़छाड़ करने को अब दालें ही रह गईं इन बदतमीजों को.’’ यह कह उस ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, मैं तो बस दाल के चरणस्पर्श कर इन का आशीर्वाद लेना चाहता था, लालाजी. इन का आशीर्वाद पा, इन्हें डोली में बिठा, अपने घर सादर ले जाना चाहता हूं,’’ मैं दास्यभाव के भक्त सा घिघियाया.

‘‘200 रुपए प्रति किलोक्राम रेट है इन का आजकल,’’ लाला ने मेरी जब में झांकते हुए पूछा, ‘‘कितनी दूं?’’

‘‘200 ग्राम दे दो भगवन,’’ मैं ने कहा तो लाला गुस्साया, ‘‘पता नहीं कहां से चले आते हैं भिखारी बाजार में. अपनी इज्जत का तो खयाल ही नहीं, दाल की इज्जत का भी खयाल नहीं रखते. किलो से कम दाल बेचना पाप है, मेरे बाप,’’ लाला ने बाजारू पापपुण्य के बीच की मायावी रेखा से अवगत कराया.

‘‘लाला, फ्री में दालसंग एक सैल्फी तो ले सकता हूं न?’’ मैं ने रिरियाते कहा तो लाला मूंछों पर ताव देता बोला, ‘‘माश दाल संग पर सैल्फी 50 रुपए, अरहर संग पर सैल्फी 60 रुपए, चने संग सैल्फी पर 40 रुपए. कहो, किस के साथ सैल्फी लेनी है?’’

मैं समझ गया, बाजार में कुछ भी फ्री नहीं है, सैल्फी भी नहीं.  Social Story

Udaipur Files : फिर विवादित विषय पर खुली एक और फाइल

Udaipur Files : आजकल हमारे गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 3 महीने में जातीय जनगणना कराए जाने की बातें जोरशोर से की जा रही हैं. गृहमंत्री ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के बारे में कहा कि यह कानून पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय राष्ट्रीयता प्रदान करने के लिए बनाया गया है न कि नागरिकता छीनने के लिए.

दूसरी ओर हमारी सरकार ने मुसलमानों की वक्फ बोर्ड की जमीनें हथियाने पर कानून बनाया. इस से देशभर में मुसलमान भड़क गए और भाजपा भगवाधारियों को खुश करने में लगी रही. इसी का फायदा उठा कर कुछ कट्टरपंथियों ने मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया और कहना शुरू कर दिया, ‘सिर कलम से जुदा.’ इस का असर यह हुआ देशभर में मुसलिमों द्वारा छिटपुट हिंसा भी की गई.

इसी के तहत 28 जून, 2022 को उदयपुर के एक 40 साल के दरजी कन्हैयालाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई. यह ह्त्या धार्मिक कट्टरता के चलते हुई. यह एक ऐसी हत्या थी जिस ने पूरे देश को झकझोर दिया. हत्यारों ने घटना का वीडियो बनाया और उसे औनलाइन वितरित कर दिया. आरोपी थे मोहम्मद रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद.

कन्हैयालाल उदयपुर के धानमंडी इलाके में दरजी की दुकान चलाते थे. उन का परिवार दुकान और रोजमर्रा की जिंदगी में ही उलझ रहता था. लेकिन एक सोशल मीडिया पोस्ट ने उन की जिंदगी बदल कर रख दी. उन्होंने भाजपा नेता रहीं नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट डाली थी. कन्हैया लाल ने सोशल मीडिया अकाउंट पर पैगंबर मोहम्मद साहब पर एक विवादित पोस्ट शेयर कर दी थी. इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई तो पुलिस ने कन्हैयालाल को गिरफ्तार कर लिया. धमकियां मिलने पर उन्होंने सुरक्षा की मांग भी की थी.

28 जून, 2022 को 2 युवक रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद कन्हैयालाल की दुकान पर कपड़े सिलवाने आए और बहाने से कन्हैयालाल को बुला कर धारदार हथियार से उन की हत्या कर दी.

आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई. यह मामला अभी जयपुर की अदालत में लंबित है. हाईकोर्ट ने फिल्म निर्माताओं से जवाब भी मांगा है.

‘उदयपुर फाइल्स’ बस इसी घटना पर बनाई गई फिल्म है. इसे ‘ताशकंद फाइल्स’, ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘केरला फाइल्स’, ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ जैसी कैटेगरी में गिना जा सकता है. बौलीवुड में इन जैसी फिल्मों को बनाने वाला और देखने वाला एक तबका हाल के वर्षों में उभरा है. इन फिल्मों का सिंपल सा जोड़गणित है. धार्मिक और राजनीति से देश में उभरी भावनाओं पर फिल्म बनाओ, इस में प्रचार पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता, थोड़ा सत्ता समर्थक बन जाओ, इस से फिल्म टैक्सफ्री करवा लो. ऐसी फिल्में विवादित होती हैं तो चर्चाओं में बन ही जाती हैं.

‘उदयपुर फाइल्स’ जल्दबाजी में बनाई गई फिल्म दिखाई देती है. फिल्म को दर्शक इसलिए भी नसीब नहीं हुए क्योंकि हालफिलहाल में ही यह घटना घटी है और अधिकतर लोग इस घटना के क्रमबद्ध तरीके से वाकिफ हैं. इन घटनाओं को ड्रामेटिक अंदाज में पहले ही कई न्यूज चैनल तमाम एआई माध्यमों से दिखा चुके हैं. वहीं, इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो नया जान पड़ता है.

दरअसल, यह बात इस फिल्म के निर्देशक भी जानते हैं मगर उन्होंने बनाई है क्योंकि वे इस घटना से उपजे सांप्रदायिक तनाव और भावों का फायदा उठाना चाहते हैं. वैसे भी, आजकल सच्ची घटनाओं पर फिल्में बनने का दौर चल पड़ा है, इस में निर्देशक और पटकथा लेखक को मेहनत कम ही लगती है.

फिल्म में कहीं भी इस बात का संकेत नहीं दिया गया कि इस की जड़ भारत में तेजी से बढ़ रही सांप्रदायिक राजनीति है, जिस का जिम्मेदार मौजूदा सत्तापक्ष है. वह अलगअलग समुदायों को आपस में भड़काने वालों को आश्रय दे रहा है.

इस से पहले भी कई मौबलिंचिंग की घटनाएं घटीं, जिस में दूसरे समुदाय के लोगों को गौरक्षकों द्वारा टारगेट किया गया.

फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ टाइप बनाने की कोशिश की गई है. हालांकि फिल्म में बहुत सारे कट लगाए गए हैं. फर्स्ट हाफ तो खराब है, इंडिया, पाकिस्तान जरूरत से ज्यादा किया गया है, जो अखरता है. सैकंड हाफ में कहानी हिलाती है. सपोर्टिंग कास्ट काफी खराब है, सिर्फ कन्हैयालाल वाले सीन जानदार हैं. गाने बेकार हैं. कहानी फिल्म के साथ इंसाफ नहीं करती.

विजय राज ने बढ़िया ऐक्टिंग की है. उस के एक्सप्रैशंस बढ़िया हैं. वे आप को रुला देते हैं. रजनीश दुग्गल का काम भी अच्छा है. निर्देशन साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.  Udaipur Files

Hindi Satire : कष्ट निवारक कुत्ता

Hindi Satire : हाए री सरला, पंडितजी के बताए उपाय में ऐसे उलझ कि कष्ट निवारक काले कुत्ते को ढूंढ़ना महंगा पड़ गया. इतना महंगा कि कभी सड़क की खाक छानती तो कभी घरघर घीरोटी ले जाती फिरती. मगर कष्ट जहां का तहां ही रहा.

आज फिर से मनसुख भाई और उन की पत्नी सरला के बीच अच्छीखासी नोंकझोंक हुई. इधर कुछ दिनों से पतिपत्नी के बीच खटपट तेज हो गई थी. मनसुख कपड़े की दुकान चलाते थे जबकि सरला सीधीसादी गृहिणी थी. घर के काम के साथ वह टीवी के भक्ति चैनलों पर भी अच्छा समय दिया करती थी.
‘‘सरला बहन, आज फिर से मनसुख भाई की तेज आवाज हमारे घर में अंदर तक पहुंच रही थी.’’ दोपहर में सरला को बालकनी में कपड़े फैलाते देख पड़ोसिन मालती ने कहा.
‘‘सरला बहन, मैं कब से बोल रही हूं कि यह सब ग्रह का फेर है. एक बार पंडितजी से मिल ही लो. कोई न कोई राह तो जरूर निकल आएगी.’’
पड़ोसिन मालती की बात सुन कर सरला का मन भी डोल गया. वह पंडितजी के पास जाने के लिए तैयार हो गई.

बाजार में चौक वाले मंदिर पर एक पंडितजी बैठते थे. मालती सरला को ले कर उन्हीं के पास गई. वहां जा कर सरला ने हाथ जोड़ कर अपनी समस्या बताई. जिस प्रकार शरीर में कुछ तकलीफ होने पर व्यक्ति किसी डाक्टर के पास निदान के लिए जाता है, उसी प्रकार सरला अपनी गृहस्थी की समस्या दूर करने के लिए पंडितजी के पास आई थी.

सारी बात सुन कर पंडितजी ने एक सरसरी निगाह सरला पर डाली और बोले, ‘‘आप के ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि आप के ऊपर शनि की साढ़े साती सवार है और आप का गुरु भी बहुत कमजोर है.’’
‘‘पंडितजी, इस से नजात कैसे मिलेगी?’’ चिंता के भाव के साथ हाथ जोड़े सरला बोली.
‘‘गुरु को भारी करने के लिए कुछ विशेष पूजा और हवन करना होगा. शनि देव को प्रसन्न करने के लिए घी में चुपड़ी रोटी सुबहशाम काले कुत्ते को खिलाएं. शनि देव की कृपा के साथ काल भैरव की भी विशेष कृपा मिलेगी.’’

पंडितजी की यह बात सुन कर सरला के मन में दुविधा पनपने लगी. उसे मालूम था कि उस के पति मनसुख इन फालतू के पूजाहवन के लिए रुपए खर्च करने से रहे. अब क्या किया जाए!

वह सोच रही थी कि तभी मालती ने उसे हिलाया, ‘‘पंडितजी की दक्षिणा दे दो, सरला बहन. किस सोच में पड़ी हो?’’ पंडितजी को 2,100 रुपए देने का सुन कर सरला फिर असमंजस में पड़ गई. वह अपने पर्स को देखने लगी. सरला के मन को भांपते हुए मालती ने दक्षिणा कम करवा कर पंडितजी को 501 रुपए दिलवाए.

पंडितजी को दक्षिणा दे कर सरला मालती के साथ घर लौटी. उस ने मनसुख को मनाने की पूरी कोशिश की कि वह पूजाहवन के लिए मान जाए. आखिर गुरु को भारी जो करना था. लेकिन मनसुख भाई तो ठहरे कपड़े की दुकानदारी चलाने वाले, राहुकेतु की दुकानदारी चलाने वाले की बात वे नहीं माने.

अब सरला सोची कि गुरु कमजोर रहता है तो रहे, उसे फिर कभी बलिष्ठ बना लेंगे. कम से कम काले कुत्ते को घी चुपड़ी रोटी खिला कर शनिदेव को तो प्रसन्न कर लें और काल भैरव की कृपा भी लगेहाथ प्राप्त कर लें. फिर क्या था, अगले दिन से ही सरला काल भैरव के प्रतिछाया (कुत्ता) की तलाश में सुबहशाम सड़क पर निकलने लगी. हाथ में घी लगी दो रोटियां और उस में भी अंदर गुड़ डाल कर. थोड़ी देर तक सड़क पर टहलने पर उसे एक काला कुत्ता दिख गया. मगर वह 4-5 अन्य कुत्तों के साथ इधरउधर पूंछ हिलाते चल रहा था, मानो सब वाक पर निकले हों.

सरला उन कुत्तों की तरफ आगे बढ़ी और डरतेडरते दूर से ही काले कुत्ते के पास रोटी फेंक दी. लेकिन हाय रे समय, शनि देव इतनी जल्दी कहां प्रसन्न होने वाले थे. सरला की राह में तो बाधाओं की शुरुआत अब हो रही थी. अचानक रोटी का टुकड़ा आया तो काले कुत्ते से पहले बाकी कुत्ते छीनाझपटी करने लगे. पहले मैं पहले मैं की होड़ उन में ऐसी मची कि रोटी के टुकड़ेटुकड़े हो गए. सरला तो बिना पीछे देखे तेज कदमों से वहां से निकल ली.

घर आ कर सोचने लगी कि उस का प्रयास व्यर्थ गया. लेकिन वह हिम्मत नहीं हारी. वह फिर से काले कुत्ते की तलाश और उसे रोटी खिलाने की मशक्कत के लिए सड़क पर निकल पड़ी. उसे एक कुतिया दिखी. उस के कई छोटे बच्चे थे. संयोग से उस में एक बच्चा पूरे काले रंग का था. सरला उस के आगे रोटी फेंक कर वापस मुड़ गई. लेकिन अफसोस, यह निवाला भी काले कुत्ते को न मिला. उस कुतिया ने ही रोटी खा ली. सुबह की तरह भौंभौं की घमासान सुनाई नहीं पड़ी तो सरला ने पलट कर देखा. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘चलो, कुतिया के दूध में ही मिल कर वह रोटी का अंश उस के बच्चे (काले कुत्ते) के पेट में चला जाएगा.’

इन मेहनतकश हालात को महीना बीत गया लेकिन सरला के जीवन में अच्छी बातें फलित नहीं हुईं. वह फिर पंडितजी से मिली. पंडितजी ने बताया कि जब तक श्रद्धा भाव से काले कुत्ते को पूरी रोटी नहीं खिलाएगी तब तक सकारात्मक परिणाम नहीं दिखेंगे. सरला से पंडितजी ने इस बार भी दक्षिणा में 501 रुपए लिए.

अब सरला ने सोचा कि किसी पालतू काले कुत्ते को रोटी खिलाना सही होगा. उसे सड़क के दूसरी तरफ एक गली में काला पालतू कुत्ता होने की जानकारी मिली. सरला घी वाली रोटी ले कर चुपके से उधर निकल पड़ी. उस घर से अनजान, घर वाले से अनजान और कुत्ता तो बिलकुल अपरिचित. मुख्य दरवाजे के पास ही काला कुत्ता जंजीर से बंधा खड़ा था. सरला जैसे ही उस की तरफ बढ़ी, कुत्ते ने भूंकना शुरू कर दिया. सरला उस कुत्ते को रोटी खिलाती, उस के पहले ही घर में चोरचोर की आवाज सुनाई देने लगी. उसे समझते देर न लगी कि घर वालों ने कुत्ते के भूंकने से उसे चोर समझ लिया है. वह बिना रोटी खिलाए उलटे पैर वहां से भागी. बेहिसाब भागने में सड़क पर भी ध्यान नहीं दिया और एक गाड़ी के नीचे आतेआते बची. गाड़ी वाला अचानक ब्रेक न लगाता तो वह आज सीधे शनि देव के पास पहुंच गई होती.

शनि देव को प्रसन्न करने और काल भैरव का विशेष आशीर्वाद पाने के लिए काले कुत्ते को रोटी खिलाना सरला के लिए बड़ी टेढ़ी खीर साबित हो रही थी. अब वह निराश हुई जा रही थी. उसे महसूस हो रहा था कि लगता है अब शनि देव की कृपा पाने से वंचित रह जाएगी. यों ही घर में शनि की वक्री दृष्टि और साढ़ेसाती अपनी धाक जमाए रहेगी. लेकिन तभी उसे उम्मीद की रोशनी दिखी.

सरला को मालूम हुआ कि महल्ले के अवस्थीजी के यहां कुत्ता आया है. सुखद बात यह कि वह काले रंग का है. उस का नाम शेरा रखा गया था. सरला ने राहत की सांस ली.

चलो, अब अवस्थीजी के घर अपना आनाजाना तो है ही. ऐसे में उन के शेरा से मित्रता कर के उसे बड़े प्यार से रोटी खिलाऊंगी. अब रोटी की कौन कहे, उसे तो चावलसब्जी आदि भी दे जाऊंगी. तब हमारे सभी संकट निश्चित दूर हो जाएंगे.

सरला का अवस्थीजी के घर आनाजाना बढ़ गया. वह शेरा से भी दोस्ती बढ़ाने लगी. बातोंबातों में उस ने शेरा को रोटी खिलाने की इजाजत भी ले ली. शेरा और सरला समान अक्षर के नाम वाले थे, इसलिए शायद उन के हृदय की कुंडली के सारे गुण मिल गए. दोनों परम मित्र बन गए. सरला का मन गदगद था. लेकिन हां, शेरा सरला की दी घी वाली रोटी कभी कोई टुकड़ा खाता, कभी पूरा छोड़ देता. मगर इतने में भी सरला खुश थी. उसे विश्वास हो रहा था कि अब उस के सारे कष्ट निश्चित ही दूर हो जाएंगे और शेरा भी उस की रोटियां चाव से चट करने लगेगा.

शेरा ने सरला को अपना बना लिया था. भले ही रोटी का टुकड़ा कभी कम खाता या कभी न खाता मगर सरला को देख कर वह पूंछ हिलाना शुरू कर देता था. सरला की आवाज सुन कर वह अपनी गरदन उठा कर देखने भी लगता था. सरला को याद आया कि पंडितजी ने उसे बताया था कि यदि कुत्ता आप के सामने पूंछ हिलाए तो सम?ा जाना कि शनि देव आप पर प्रसन्न हैं और यह आप के लिए एक शुभ संकेत है. यदि वह गरदन उठा कर आप को निहारने लगे तो समझ जाना कि आप का रुका हुआ कार्य शीघ्र पूरा होने वाला है.

पंडितजी की बताई बात याद आते ही सरला का मन गदगद हो गया. वह शेरा के माध्यम से काल भैरव और शनि देव की विशेष कृपा पाने ही वाली थी कि फिर से एक बाधा उत्पन्न हो गई.

दरअसल, हुआ यों कि शेरा अचानक बीमार पड़ गया. अवस्थीजी की पूरी फैमिली परेशान. होती भी क्यों नहीं, शेरा को अपने परिवार का सदस्य जो मानते थे. बहुत नाजों से उसे पाल रहे थे. खानेपीने से ले कर खेलने व सोने तक की पूरी व्यवस्था उच्च स्तरीय. उस का ऐशोआराम देख कर सामान्य लोगों के मन में भी ‘अगले जनम मोहे कुत्ता ही कीजो’ की आकांक्षा पनपने लगी. घर के सारे सदस्य शेरा पर खूब प्यार लुटाते.

बीमार शेरा को शहर के बड़े डौग स्पैशलिस्ट के पास ले जाया गया. डाक्टर ने उसे कड़वी दवाइयों के साथ इंजैक्शन भी दिया. तबीयत सही होने तक शेरा के खानपान को ले कर सतर्कता बरतने की सलाह दी गई. इस वजह से सरला को रोटी न खिलाने की हिदायत मिल गई. सरला के ऊपर शनि देव की कृपा हुई या नहीं लेकिन समस्या और संघर्ष ने जरूर अपनी कृपादृष्टि डाल दी थी.

आज फिर से सरला स्वयं को वहीं खड़ी मान रही थी, अर्थात काले कुत्ते की सेवा करना अभी मुश्किल था. सरला ने एक फैसला लिया जिसे उस ने घर में फरमान की तरह सुना दिया कि उसे खुद का एक काला कुत्ता अपने ही घर में पालना है. मनसुख भाई ने बहुत सम?ाया लेकिन सरला तो अपनी जिद पर अड़ी थी.

थकहार कर उस की जिद के आगे मनसुख भाई को अपना शीश झुकाना पड़ा. डौगशौप से एक काले रंग का सैकंडहैंड कुत्ता खरीद कर आया. सैकंडहैंड इसलिए क्योंकि वह पहले एक घर में अपनी उपस्थिति और सेवा दे चुका था. दरअसल, उस कुत्ते के मालिक को विदेश जाना था इसलिए उसे यहां शौप में बेचना पड़ा.

सरला भी उसे यह समझ कर ले आई कि कम दाम में पलापलाया ट्रेंड कुत्ता मिल रहा है तो अच्छा है. इसे घर में रहने के तौरतरीके बताने नहीं पड़ेंगे. लेकिन इस काल भैरव की प्रतिछाया (काला कुत्ता) को भी घी चुपड़ी रोटी खिलाना सरला के लिए चुनौती ही बन गया.

पता चला कि यह कुत्ता तो बड़ा ही वीआईपी जीवन जीने का आदी है. इस के नाजनखरे और शौक के क्या ही कहने. घर के सामान्य शौचालय में जाना इसे गवारा नहीं था. उसे तो कमोड की आदत थी. मनसुख भाई ठहरे सामान्य आदमी. इन का जीवन भी वैसा ही था जैसा मध्यवर्गीय लोग गुजारते हैं. तत्काल राहत के लिए कुत्ते को सुबहशाम वाक के बहाने बाहर ले कर जाना पड़ा. कुत्ता महाराज फ्रैश तो हो जाते मगर किसी न किसी से सरला और मनसुख भाई का पंगा भी हो जाता. आखिर कोई अपने घर के बाहर कुत्ते की टट्टी को कैसे बरदाश्त कर सकता था. जिस दिन उसे बाहर न ले जाते उस दिन घर में ही गंदगी पसर जाती. सरला को नाक बंद कर के साफ करना पड़ता. मनसुख भाई की फटकार झेलनी पड़ती, सो अलग.

खाने में भी जनाब के नखरे कम नहीं थे. हमेशा मांस, अंडे और हड्डियों के लिए जीभ लपलपाते रहते. शाकाहारी खाने को मुंह भी न लगाते. सरला का परिवार शुद्ध शाकाहारी था. मजबूरी में कुछ महंगे डौग बिस्कुट ला कर खिलाए गए. लेकिन आखिर बिस्कुट के सहारे कितना पेट भरता. कुत्ते का पेट और स्वास्थ्य दोनों कुप्रभावित हो गए. कुत्ते के शौच पर और मनसुख भाई को अपने क्रोध पर कंट्रोल नहीं रहा. बेचारी सरला शनि देव का आशीर्वाद पाने के बदले उन की साढ़ेसाती और ढैया दोनों में पिस रही थी. इधर काल भैरव भी कुछ सहारा नहीं दे पा रहे थे.

काल भैरव का आशीर्वाद तो न मिला ऊपर से कुत्ते की सेवा में सरला की हालत खराब हो रही थी. मनसुख भाई का क्रोध उबाल मार रहा था सो अलग. आज वह दुकान के लिए भूखे ही निकल पड़े. घर में चाय तक न बन पाई थी. इधर सरला कुत्ते की पोटी साफ कर रही थी कि लापरवाही से उस की चेन खुली रह गई. बेचारा एक तो भूखा, ऊपर से बीमार, खीझ तो उस के अंदर भी रही होगी. तेज गति से निकल गया सड़क पर हड्डी व मांस की तलाश में. खाने की तलाश में 3-4 लोगों को काट लिया. वे लोग सरला के घर पहुंच गए शिकायत करने लगे कि उस के कुत्ते ने सड़क पर कितना आतंक मचाया है. शिकायत झगड़े में बदल गई.

बेचारी सरला अकेले उन के क्रोध का सामना कर रही थी. उसे एहसास हुआ कि जब शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काल भैरव के इस प्रतिछाया (काला कुत्ता) के चक्कर में नहीं पड़ी थी तो सिर्फ पति मनसुख का ही क्रोध झेलना पड़ता था वह भी कभीकभी. लेकिन अब तो कुत्ते को ले कर महल्ले वालों की भी की भौंक और धौंक सुननी पड़ रही है.

कुत्ता किसी और की चमड़ी उधेड़ता, उस से पहले ही सरला ने नगरनिगम वाले को बुला कर उसे ले जाने की याचना कर डाली. अब सरला ने कान पकड़े और कहा कि हे शनि देव, आप अपनी कृपा मुझ पर यों ही बरसा देना. इस काल भैरव के प्रतिछाया को संभालना और खिलाना मेरे वश की बात नहीं.  Hindi Satire

Creation Of Universe : सृष्टि की शुरुआत – धर्म ने बहकाया साइंस ने बताया

Creation Of Universe : पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ, धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इंसान को किस ने बनाया जैसे प्रश्न अकसर पूछे जाते हैं. ये प्रश्न मानव कुतूहल के स्वाभाविक प्रश्न नहीं हैं. मानव कुतूहल से उपजे प्रश्न मानव के अस्तित्व से जुड़े थे- परिस्थितियों के अनुकूल कैसे जीना है, प्राकृतिक आपदाओं से कैसे बचना है, जंगली जानवरों से अपनी और अपने झुंड की सुरक्षा कैसे करनी है, अपने मवेशियों के लिए बेहतर चरागाह कहां ढूंढ़ना है?

मानव की जिज्ञासाएं यहीं तक सीमित थीं. बारिश, तूफान, आग, बिजली और भूकंप जैसी आपदाओं के पीछे के कारणों को आदिकाल का मानव नहीं जानता था, न ही जानना चाहता था. इन प्राकृतिक आपदाओं के डर से ही आदिमानव ने इन्हें पूजना शुरू कर दिया होगा. यहां भी मानव के कुतूहल में केवल अपने सर्वाइवल से जुड़े प्रश्न थे.

अमेजन के जंगलों में रहने वाले ट्राइब्स हों या अफ्रीका के आदिवासी कबीले, आज भी उन की सहज जिज्ञासाएं उन के सर्वाइवल तक ही सीमित हैं. ये आदिवासी लोग मानव के लाखों वर्षों के विकासक्रम की जिंदा तसवीर हैं. दूरदराज के जंगलों में रहने वाले जो आदिवासी कबीले बाहरी धर्मों के संक्रमण से बच गए उन की संस्कृति में आज भी कोई धर्म या अल्लाह, भगवान या गौड नहीं है. पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ, धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इंसान को किस ने बनाया जैसे प्रश्नों का आदिवासी संस्कृतियों में कोई मतलब नहीं था और न आज है. आज भी आदिवासी संस्कृति केवल सर्वाइवल से जुड़े प्रश्नों पर ही आधारित है.

दुनिया की अलगअलग जगहों पर 10 से 12 हजार वर्षों पहले खेती की शुरुआत हुई. इस से मानव समूहों का इधरउधर भटकना कम हुआ और गांव, नगर, कसबे बसने शुरू हो गए. यह सभ्यताओं का शुरुआती दौर था. कृषि और पशुपालन पर आधारित सभ्यताओं में हर व्यक्ति के पास काम था हालांकि कुछ निठल्ले लोग भी थे जिन्होंने मानव के सर्वाइवल से जुड़े प्रश्नों को मोड़ कर नए कुतूहल पैदा कर दिए. जैसे, मरने के बाद क्या होता है, दुनिया किस ने बनाई, इंसान को किस ने पैदा किया आदि व इस तरह के अन्य प्रश्नों से लोगों को बरगलाने का प्रयास शुरू किया गया.

कृषि पर आधारित सभ्यताओं के शुरू होने के नतीजे में आम लोगों का शिकार के लिए भटकना बंद हो गया था. फसल काटने के बाद से फसल उगाने के बीच लोगों के पास समय था. उस खाली समय में ही निठल्ले लोगों ने सृष्टि और सृष्टि रचयिता से जुड़े प्रश्नों को समाज के अवचेतन में बिठाना शुरू किया. लोगों के बीच प्रश्न उठाए जाते कि बताओ, तुम्हें अन्न कौन दे रहा है, तुम क्यों पैदा हुए, जन्म लेने से पहले तुम कहां थे और मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा आदि.

इन प्रश्नों के जाल में साधारण मेहनतकश लोग फंसते चले गए. तब इन प्रश्नों के मनमरजी के जवाब गढ़े गए और भ्रामक कहानियां बनाई जाने लगीं. उन ?ाठी कहानियों को गढ़ने वाले निठल्ले लोग ही शुरुआती समाज में पुरोहित बन गए. उन पुरोहितों ने ही विभिन्न धर्मों के आविष्कार कर दिए.

भ्रम पैदा करती धार्मिक कथाएं

हर धर्म में भ्रम पैदा करने वाली कथाएं मौजूद हैं. धर्मों की ये कहानियां चमत्कारिक देवताओं, अवतारों, दूतों और सृष्टिकर्ता के प्रतीकों की होती हैं जिन से लोगों को बहकाया जाता है. इन धार्मिक कहानियों के नाम पर आस्था का व्यापार खड़ा करना आसान हो गया है. आस्था के नाम पर काल्पनिक प्रतीकों की पूजा, आराधना, दान और इबादत करवाई गई और लोग अपनी आस्थाओं की खातिर मरनेमारने को तैयार हो गए. आस्था में अंधी जनता यह न पूछ ले कि जिन प्रतीकों के नाम पर उन से दान देने और मरनेमारने को कहा जा रहा है, आखिर इन काल्पनिक प्रतीकों का सच क्या है, ये हैं कौन, इस षड्यंत्र को छिपाने के लिए सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न और उस का उत्तर बहुत उपयोगी हो जाते हैं.

मानव यह तो देखता है कि उस के चारों ओर तरहतरह के निर्माण हैं, नदियां हैं, सागर हैं, पहाड़ हैं, मरुस्थल हैं, पेड़पौधे, पशुपक्षी हैं, बादल है, चांद, सितारे, सूर्य हैं लेकिन इन की उत्पत्ति कैसे हुई या इन्हें किस ने बनाया जैसे प्रश्नों से आम जनता का कोई लेनादेना नहीं होता. मेहनतकश को इन प्रश्नों से कोई लेनादेना कभी नहीं रहा. सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े ये प्रश्न षड्यंत्रकारी पुरोहितों की देन हैं और आज भी यह षड्यंत्र जारी है.

स्वामी नित्यानंद सरस्वती का यूट्यूब पर एक वीडियो है जिस में स्वामीजी से 5वीं कक्षा का छात्र पूछता है कि पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा की उत्पति कैसे हुई. स्वामी नित्यानंद इस वीडियो में उत्पत्ति की पौराणिक कल्पित कहानी न कह कर पृथ्वी के काल्पनिक गुणों का बखान करने लगते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि 5वीं कक्षा के छात्र को जो सवाल स्कूल में पूछना चाहिए वह एक बाबा से पूछ रहा है. लेकिन, उसे भी पौराणिक कथा न सुना कर मनगढ़ंत बातों से बहकाया जा रहा है.

आप ने ऐसे तमाम वीडियो यूट्यूब पर देखे होंगे जिन में जनता की भीड़ से कोई व्यक्ति उठ कर ऐसे ही प्रश्न पूछता है और धर्मगुरु उस प्रश्न का जवाब देता है. मुसलमानों के बीच तारिक जमील बहुत फेमस है. एक वीडियो में उस से एक नौजवान ने पूछा कि कायनात कैसे बनी तो वे इसलामिक कहानियों के जरिए कायनात के जन्म की कहानी सुनाते हैं.

सवाल यह है कि उत्पत्ति के रहस्यों का उत्तर धर्मगुरुओं से क्यों पूछा जाता है. बेरोजगारी, गरीबी, शोषण, हिंसा और दंगों से जुड़े प्रश्न क्यों नहीं पूछे जाते? इन धर्मगुरुओं का परमात्मा जो सृष्टि की रचना कर सकता है वह दुनिया से गरीबी और अन्याय क्यों नहीं मिटा सकता?

सृष्टि रचना से जुड़े सवाल तो उन से पूछने चाहिए जो प्रकृति के अनुसंधानों में लगे हैं. जो पत्थरों, पानी, मौसम, चांद, सितारों, सूर्य की गति का अध्ययन करने में अपना जीवन खपाते हैं.

हिंदू प्रवचनों में, ईसाई चर्चों में, मसजिदों में, बौद्ध मठों में ऐसे ही सवाल अकसर पूछे जाते हैं और तमाम धर्मगुरु इन प्रश्नों के उत्तर के लिए अपनी उन्हीं पौराणिक कहानियों को आधार बनाते हैं जिन के पीछे छिपा होता है उन का अपना प्रवर्तक. अपनेअपने काल्पनिक प्रवर्तकों की आड़ में ही ये पुरोहित अपनेअपने भक्तों पर राज करते हैं. दरअसल, यह कोरा षड्यंत्र है. लोगों से ये सवाल पुछवाए जाते हैं और फिर अपने धर्म व प्रवर्तक पर फिट कर के एक कहानी सुनाई जाती है.

आज मौजूद सभी धर्म उस युग के हैं जब विज्ञान एकदम शैशव स्थिति में था. मानव ने मकान बनाने सीख लिए थे. मानव पत्थरों को काट सकता था. आग जला सकता था. पहिया बना सकता था. कपड़ा बुन सकता था. जानवरों को पालतू बना सकता था. बस्तियों का निर्माण कर सकता था. बोलने की कला विकसित हो चुकी थी. शब्द ज्ञान आ चुका था. सभी आधुनिक धर्म तब पनपे जब बहुत से आविष्कार हो चुके थे.

पर ऐसा कोई धर्म नहीं है जिस को शुरू करने वाला जंगलों में पेड़ के नीचे बिना कपड़ों के रहता था, अपना खाना खुद बनाता था. आज दुनिया के सभी धर्म जो सृष्टि निर्माण की कहानियां बनाते फिरते हैं वे उस युग के हैं जब मानव सभ्यता खासी विकसित हो चुकी थी. आज के सभी धर्म 21वीं सदी की वैज्ञानिक तकनीकों के सहारे चल रहे हैं लेकिन इन धर्मों का आधार सभ्यताओं से भी प्राचीन मनगढ़ंत कहानियों पर ही टिका है.

आज जो भक्त धर्मों के बिजनैस सैंटरों में जा रहे हैं उन्हें आज भी प्रेरित किया जा रहा है कि वे जरूरी बातों को भूल कर उन प्रश्नों को पूछें जिन के माध्यम से पुरोहितों के षड्यंत्र को पोषण मिलता हो. यह आकाश, पृथ्वी, आकाशगंगा, लाखों तरह के जीवजंतु, वायरलैस की क्षमता वाली तरंगें आखिर बनाईं किस ने? तुम्हें अन्न कौन दे रहा है? तुम क्यों पैदा हुए? जन्म लेने से पहले तुम कहां थे और मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा? ये व इस जैसे प्रश्न एक साजिश के तहत पुछवाए जाते हैं.

अनसुलझे सवालों का नाम धर्म

आज के पुरोहितों द्वारा प्रायोजित इन कृत्रिम सवालों के जवाब 2,000 से 4,000 साल पहले के ग्रंथों के हवाले से दिए जाते हैं. हर कहानी का ग्रंथ एक भगवान से जुड़ा है, उस भगवान से जो हर दूसरे धर्म के भगवान से अलग है. हर धर्म में सृष्टि उत्पत्ति की कथा कुछ अलग है क्योंकि हर धर्म को सृष्टि उत्पत्ति के रहस्यों को अपने प्रतीकों से जोड़ना जो है.

राघवाचार्यजी महाराज का मार्च 2022 का एक वीडियो है जिस में वे बताते हैं कि सृष्टि का निर्माण ब्रह्मा ने किया. ब्रह्मा ने अपने शरीर के 2 भागों से स्त्री और पुरुष का निर्माण किया. 3 लाख लोगों ने इस वीडियो को देखा. राघवाचार्यजी उत्पत्ति की कहानी के माध्यम से ब्रह्मा को संपूर्ण पृथ्वी, संपूर्ण मानव जाति का निर्माता बता देते हैं और इस तरह बिना कहे ही वे खुद को 21वीं सदी में सृष्टिकर्ता का एजेंट घोषित कर देते हैं.

मुल्लामौलवी अपने भक्तों को यह इसलामिक कहानी सुनाते हैं कि अल्लाह ने सब से पहले आदम को मिट्टी से बनाया और आदम की दाईं पसली से हौवा को बनाया. इस कहानी के जरिए ये लोग खुद को आदम की संतान घोषित करते हैं और साथ ही, भक्तों के अवचेतन में यह बिठा देते हैं कि अल्लाह की नजर में मर्द जात ही श्रेष्ठ है. औरतें तो मर्दों की पसलियों से जन्मीं हैं, उन में अपना दिमाग नहीं होता, उन का अपना कोई वजूद नहीं होता.

राघवाचार्य यह भी कह डालते हैं कि ब्रह्माजी ने पुरुष को अपनी बुद्धि से पैदा किया और स्त्री को उस के हृदय से. यानी दोनों में भेद है. एक में बुद्धि है, दूसरे में है ही नहीं. औरतों को नीचा दिखाने और नीचा बनाए रखने की साजिश इस सृष्टि बनाने की कहानियों में पहले ही फिट कर दी गई है.

इस तरह की कहानियां विष्णु पुराण, शिव पुराण, नारद पुराण और वेदों में दोहराई गई हैं पर जब भी ये पुराण रचे गए थे तब तक तो मानव सभ्यता काफी विकसित हो चुकी होगी. किसी किताब में यह वर्णन नहीं है कि स्त्री और पुरुष को भाषा किस ने सिखाई, भाषा कहां से आई, तब स्त्रीपुरुष कपड़े पहनते थे या नहीं, उन्हें कपड़े पहनना या कपड़े बनाना किस ने सिखाया, वे शिशु अवस्था में पैदा हुए या वयस्क अवस्था में आदि.

सब से रोचक बात यह है कि सभी धर्मों में सृष्टि की उत्पत्ति की कहानी एक सी है लेकिन हरेक का प्रवर्तक अलग है जो दूसरे धर्मों वालों को भटका हुआ मानता है और दूसरे धर्म के मानने वाले का सिर फोड़ने का आदेश देता है.

धर्म इस दुनिया का सब से पुराना बिजनैस है जिस में धरती पर जीवन की शुरुआत की कथा सब से महत्त्वपूर्ण प्रोडक्ट है. धर्म की मार्केटिंग करने वाले लोगों ने मानव की सहजता और उस की कमजोरियों का फायदा उठा कर ही धर्म के इस सब से पुराने धंधे को आज तक बरकरार रखा है. एजेंट इसे बेचने का सब से पुराना हथकंडा अपनाते हैं; वे खुद ही यह सवाल गढ़ते हैं कि बताओ, दुनिया किस ने बनाई. आम आदमी इस प्रश्न में फंस जाता है तब धर्म के प्रवर्तक अपनी प्राचीन संस्कृति के पुनरुत्थान के नाम पर और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इस प्रश्न का जवाब देते हैं.

सृष्टि रचना का श्रेय वे अपने द्वारा गढ़े गए किसी काल्पनिक शक्ति को देते हैं और उस शक्ति के उपासक बन कर धर्म का धंधा करते हैं. धर्म प्रवर्तकों द्वारा आम जनता को इस तरह भरमाया जाता है कि उस का ईश्वर, जो इस सृष्टि की रचना कर सकता है, तुम्हारा कल्याण भी कर सकता है.

बुनियादी सवालों से भटकाने का जरिया धर्म

धर्मों के आविष्कारक बड़े चालाक किस्म के प्राणी थे. उन्होंने लोगों की बुनियादी जरूरतों, जैसे भूख, सुरक्षा और संसाधन जुटाने में कोई योगदान नहीं दिया. रोजमर्रा की जिंदगी में संघर्षशील इंसान की सहूलियत के लिए भी कुछ नहीं किया न पुल बनाए, न हल चलाए, न दवाएं ढूंढ़ीं और न रास्ते खोजे. बस, कहानियां बनाईं और इन कपोलकल्पित कहानियों से जनता को भरमाया.

आश्चर्य है कि आज 98 फीसदी आबादी विज्ञान की खोजों के बावजूद युगों पुरानी इन धार्मिक कहानियों को सच मानती है, जबकि, इस्तेमाल वह विज्ञान की खोजों से पैदा सामान को करती है चाहे वह आग जलाना हो या रौकेट उड़ाना.

जब से इंसान सोचनेसमझने लायक विकसित हुआ है तभी से उस के मन में सिर्फ सर्वाइवल से जुड़े प्रश्न उठते रहे कि प्राकृतिक आपदाओं और खूंखार जंगली जानवरों से कैसे बचा जाए, उपजाऊ और सुरक्षित स्थानों को कैसे ढूंढ़ा जाए. लेकिन शातिर लोगों ने इंसान के इन जरूरी व स्वाभाविक प्रश्नों को मोड़ दिया और उन से यह पूछना शुरू कर दिया कि आखिर जीवों को किस ने पैदा किया. जिंदगी के बारे में इस बुनियादी सवाल पर आज के लगभग सभी धर्मों की नींव रखी हुई है. इन धर्मों ने सदियों तक इंसानी जिज्ञासाओं को किसी काल्पनिक ईश्वर तक समेटे रखने की चालाकियां की हैं.

दरअसल, किसी भी धर्म के पास इन प्रश्नों का कोई तथ्यजनक उत्तर नहीं था, इसलिए धर्म के धंधेबाजों ने ऐसी कहानियां गढ़ लीं जो सुनने में अच्छी लगती हैं. जब ये काल्पनिक कहानियां लोगों के अवचेतन में बैठने लगीं तब बड़ी चालाकी से ऐसी हर धार्मिक कहानी के कहानीकार ने स्वयं को ईश्वर के एजेंट के रूप में स्थापित कर लिया. पीढ़ी दर पीढ़ी कहानीकारों के वारिस इस धंधे का लाभ उठाते आ रहे हैं.

सृष्टि रचना के बारे में हिंदू धर्म क्या कहता है

हिंदू धर्मशास्त्रों में सृष्टि उत्पत्ति से जुड़ी अनेक बेसिरपैर की कहानियां मौजूद हैं, कहीं ब्रह्माजी को सृष्टि का रचयिता बताया गया है तो कहीं विष्णुजी को और कहीं देवी दुर्गा को संपूर्ण सृष्टि की निर्माणकर्ता घोषित किया गया. इन शक्तियों या देवताओं की पूजा करने के नियम बनाए गए और इन कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया गया. इन कर्मकांडों को करने से देवताओं का आशीर्वाद और न करने से अनिष्ट का डर दिखा कर लोगों को भक्त बनाया गया और इन भक्तों के कारण ही आज भी युगों पुराने धर्म जिंदा हैं. कर्मकांड करने पर आर्थिक लाभ एजेंट को ही होता था.

हिंदू धर्म के अनुसार, सृष्टि की रचना से पहले पूरा संसार जल में डूबा हुआ था. जब सृष्टि की रचना का समय आया तो भगवान नारायण की नाभि से एक प्रकाशमान कमल प्रकट हुआ. उसी कमल से वेद मूर्ति ब्रह्माजी प्रकट हुए. ब्रह्माजी के 4 मुंह हैं और उन के 4 हाथ हैं. ब्रह्माजी ने सब से पहले 4 पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार की उत्पत्ति की. इस के बाद उन्होंने अपने शरीर के अंशों से ही मनु और शतरूपा की रचना की, जिन से फिर मनुष्य की उत्पत्ति हुई. हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु और शिव का भी सृष्टि की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है.

वेदों के अनुसार, ब्रह्मांड का व्यास 50,00,00,000 योजन बताया गया है. यह योजन कितने किलोमीटर के बराबर है, इस की नाप भी आज के एजेंटों ने बताई है.

श्रीमद देवी महापुराण में सृष्टि रचना

देवी भागवत पुराण के अनुसार, नारदजी ने अपने पिता ब्रह्मा से पूछा था, ‘हे पिताश्री, इस ब्रह्मांड की रचना आप ने की या श्री विष्णुजी इस के रचयिता हैं या शिवजी ने इसे रचा है? सचसच बताने की कृपा करें.’

ब्रह्माजी ने बताया, ‘बेटा नारद, मैं ने अपनेआप को कमल के फूल पर बैठा पाया था, मु?ो नहीं मालूम कि अचानक उस अगाध जल में मैं कहां से उत्पन्न हो गया था. स्वयं की उत्पत्ति के बाद मैं एक हजार वर्ष तक पृथ्वी का अन्वेषण करता रहा. सृष्टि में चहुंओर जल ही जल था. फिर आकाशवाणी हुई कि तप करो. मैं ने एक हजार वर्ष तक तप किया और फिर सृष्टि करने की आकाशवाणी हुई.

‘मैं ने सृष्टि रचना आरंभ की ही थी कि मधु और कैटभ नाम के 2 राक्षस आए. उन के भय से मैं कमल का डंठल पकड़ कर नीचे उतरा. वहां भगवान विष्णुजी शेष शैय्या पर अचेत पड़े थे. उन में से एक स्त्री (प्रेतवत प्रविष्ट दुर्गा) निकली. वह आकाश में आभूषण पहने दिखाई देने लगी, तब भगवान विष्णु होश में आए.

‘अब सृष्टि में मैं और विष्णु 2 थे. इतने में भगवान शंकर भी आ गए. देवी ने हमें विमान में बैठाया और ब्रह्मलोक में ले गई. विष्णु ने कहा, यह हम तीनों की माता है, यही जगत जननी प्रकृति देवी है. मैं ने इस देवी को तब देखा था जब मैं छोटा सा बालक था, यह मुझे पालने में झुला रही थी.’

-श्रीमद देवी महापुराण, तीसरा स्कन्द, अध्याय 1.3 (गीता प्रैस, गोरखपुर से प्रकाशित, अनुवादकर्ता हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा चिमनलाल गोस्वामी. पृष्ठ संख्या 114 से 128 देवी महापुराण की उपरोक्त कथा को पढ़ कर प्रश्न उठता है कि किसे सृष्टि रचयिता माना जाए? ब्रह्मा ने जब आंखें खोलीं तो खुद को किसी फूल पर बैठा पाया. ब्रह्मा को पता ही नहीं चला कि उस अथाह जल में वे अचानक कहां से उत्पन्न हो गए. स्वयं की उत्पत्ति के बाद ब्रह्मा एक हजार वर्ष तक पृथ्वी का अन्वेषण करते रहे. इस का मतलब यह कि सृष्टि रचना से पहले अथाह जल और पृथ्वी का अस्तित्व था.

फिर आकाशवाणी हुई कि तप करो और उन्होंने एक हजार वर्ष तक तप किया. इस तप के पूरा होने के बाद सृष्टि करने की आकाशवाणी हुई. इस का अर्थ यह हुआ कि ब्रह्मा जिस पृथ्वी पर अथाह जल में एक फूल पर प्रकट हुए थे, वे सब तो पहले से बनी सृष्टि का ही हिस्सा थे. ब्रह्मा ने जैसे ही, अपने शब्दों में, नई सृष्टि रचना आरंभ की तो मधु और कैटभ नाम के 2 राक्षस आ गए. यहां प्रश्न खड़ा होता है कि ये दोनों राक्षस सृष्टि रचना से पहले कहां से पैदा हो गए. इन दोनों राक्षसों के भय से ब्रह्मा कमल का डंठल पकड़ कर भाग खड़े हुए. ब्रह्मा रसातल में नीचे उतरे. रसातल पृथ्वी बनने से पहले कैसे बन गया? वहां उन्हें विष्णु शेष शैय्या पर अचेत पड़े मिले.

क्या ये सब मजेदार, रोचक, रोमांचक, कपोलकल्पित कहानियां नहीं हैं? नारद ने एक कहानी सुनाई और हम इसे सच मान लें, क्या यह बेवकूफी नहीं है? यदि इन बातों को सच मान भी लें तो बताइए कि आज ये सब प्राणी कहां हैं? वह कमल, वह शेषनाग, वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब आज कहां गए? शास्त्रों में इन सभी के गायब होने की बात कहीं नहीं लिखी. हिंदू धर्म के धर्मप्रवर्तकों को तो ये सब नजर आने चाहिए न.

हिंदू धर्म की सृष्टि रचना की कहानियों में विरोधाभास तो है ही, साथ ही, ये कहानियां अवैज्ञानिक भी हैं. इन कहानियों को सिर्फ कहानी मान कर चलें तो ये बालमन के मनोरंजन का साधन तो हो सकती हैं लेकिन वैज्ञानिक सत्य नहीं हो सकतीं. इन धार्मिक कहानियों का विज्ञान से दूरदूर तक कोई नाता नहीं है. सवाल यह है कि आज भी बहुत से लोग इन भ्रामक कहानियों को सत्य क्यों मानते हैं?

दरअसल, पीढ़ी दर पीढ़ी ये कहानियां समाज के सब से शक्तिशाली वर्ग, पुरोहित, द्वारा दोहराई जाती हैं और जो भी इन का विरोध करता है उसे नास्तिक, मलेच्छ, दानव, दैत्य व चांडाल कह कर समाज से निकाल दिया जाता है और अकसर मार भी डाला जाता है.

ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 90, मंत्र 1 में उस विराट ब्रह्म का वर्णन है जिस ने यह सृष्टि बनाई. गीता, अध्याय 10-11, मंत्र नं. 46, में भी सृष्टिकर्ता ब्रह्म का ऐसा ही वर्णन है. अर्जुन ने कहा है, ‘हे सहस्रबाहु अर्थात हजार भुजा वाले, आप अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिए जिस के हजारों हाथपैर, हजारों आंखें कान आदि हैं, वह विराट रूप जो प्रभु अपने अधीन सर्वप्राणियों को पूर्ण काबू कर के 20 ब्रह्मांडों को गोलाकार परिधि में रोक कर स्वयं इन से ऊपर 21वें ब्रह्मांड में बैठा है. हर धर्म में ईश्वर को ले कर इस तरह की कल्पनाएं भरी पड़ी हैं और सभी धर्म अपने ईश्वर की पूजा या इबादत का विधान करते हैं और स्वयं अपने तथाकथित ईश्वर का एजेंट बन कर लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाते हैं.

सृष्टि रचना के बारे में ईसाई धर्म क्या कहता है

सृष्टि रचना से जुड़ी बाइबिल की अवैज्ञानिक बातें- बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी जिस में उस ने पेड़पौधे, जीवजंतु, पहाड़नदियां और मनुष्य को अलगअलग 6 दिनों में बनाया था. परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी बनाए (जब सूरज और पानी बने ही नहीं थे तब ये कहां से आए, यह न पूछो, बस, मानते चले जाओ). दूसरे दिन उस ने आसमान बनाया. तीसरे दिन पानी को एक जगह इकट्ठा कर ईश्वर ने धरती और समुद्र बनाए और धरती पर पेड़पौधे लगाए. चौथे दिन परमेश्वर ने तारों का निर्माण किया. 5वें दिन परमेश्वर ने समुद्र में रहने वाले जीवजंतुओं के साथ उड़ने वाले पक्षियों को बनाया और 6ठे दिन परमेश्वर ने धरती और जानवरों पर अधिकार के लिए अपनी छवि में इंसान की रचना की और उसे गिनती में बढ़ने का आशीर्वाद दिया.

6 दिनों में सृष्टि रचना कंप्लीट हो जाने के बाद परमेश्वर ने 7वें दिन आराम किया. बाइबिल के उत्पत्ति ग्रंथ में (विशेष रूप से पृष्ठ संख्या 2, अ. 1:20 – 2:5) परमेश्वर द्वारा 6 दिनों में दुनिया की रचना की बात दर्ज है.

बाइबिल के अनुसार, बारिश का पानी आकाश के छोटेछोटे छिद्रों से धरती पर आता है. इस के अलावा बाइबिल में सूर्य के स्थिर रहने (यहोशू 10:13), समुद्र के 2 भागों में विभाजित होने (निर्गमन 14:21-22) जैसी अवैज्ञानिक बातें भी भरी पड़ी हैं.

यहां प्रश्न यह है कि परमेश्वर को सृष्टि रचने में 6 दिनों का समय क्यों लगा? परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी के निर्माण किए जोकि बिलकुल अवैज्ञानिक बात है. आज के विज्ञान के अनुसार, हमारा सूर्य बिगबैंग के 8 अरब वर्षों बाद किसी अज्ञात नेबुला में गुरुत्त्वाकर्षण के कारण हाइड्रोजन के बादलों के सघन होने की प्रक्रिया के नतीजे में अस्तित्व में आया. बाइबिल कहती है कि पहले ही दिन परमेश्वर ने सूर्य का निर्माण किया जोकि विज्ञान के अनुसार तथ्यहीन बात साबित होती है.

ईसाई धर्म के एजेंट आम ईसाइयों को बरगलाते हैं. वे जीसस को ईश्वर का पुत्र कहते हैं और खुद परमेश्वर के पुत्र के सेवक बन कर लोगों के चंदों से वेटिकन जैसे आलीशान चर्च बनवा लेते हैं. दुनियाभर के चर्च आसपास के मकानों से कहीं ज्यादा सुंदर और भव्य बने होते हैं. इन भव्य इमारतों में बैठे परमेश्वर के एजेंट बिना मेहनत के आलीशान जिंदगी जीते हैं और भक्तों पर राज करते हैं.

सृष्टि रचना के बारे में इसलाम धर्म क्या कहता है कुरान के अनुसार, अल्लाह जब किसी चीज की इच्छा जाहिर करता है तो उसे केवल यह कहना होता है कि ‘हो जा’ और वह हो जाता है.

‘‘अल्लाह आकाशों और धरती जैसी अनोखी चीज को पैदा करने वाला है, इसलिए जब वह किसी काम का निर्णय करता है तो उस के लिए बस कह देता है कि ‘हो जा’ और वह हो जाती है.’’ (सूरह अल-बकरा, आयत 117, कुरान).

यहां सवाल यह उठता है कि जब अल्लाह को सृष्टि का निर्माण करना था तब उसे 6 दिनों का समय क्यों लग गया?

कुरान के सूरह हूद, आयत-7 में लिखा है- ‘‘वही है जिस ने आकाशों और धरती को 6 दिनों में पैदा किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में से कर्म में कौन सब से अच्छा है. इस से पहले उस का सिंहासन पानी पर था.’’

इन विरोधाभासी दोनों आयतों से पता चलता है कि ‘हो जा’ कहने भर से काम नहीं चलता. निर्माण के लिए सालों की मेहनत करनी पड़ती है और उपरोक्त आयत से अल्लाह के सृष्टि निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट होता है कि उस ने कायनात को इसलिए रचा ताकि वह लोगों की परीक्षा ले सके.

इस से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि अल्लाह सर्वज्ञानी नहीं है, तभी तो वह परीक्षा के माध्यम से लोगों के अच्छेबुरे कर्म जानना चाहता है. कायनात को बनाने से पहले पानी कहां से आ गया? क्या पानी कायनात का हिस्सा नहीं? सृष्टि रचना से जुड़ी इस तरह की कपोलकल्पनाओं से अज्ञानी लोगों को भरमाया जा सकता है लेकिन विज्ञान की समझ रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि ये बातें इतिहास के नासमझ लोगों की कोरी कल्पनाएं मात्र हैं.

विज्ञान के अनुसार सृष्टि का जन्म कैसे हुआ

हमारी धरती जीवन की विविधताओं से भरी हुई है. हरेभरे मैदानों से ले कर सूखे रेगिस्तानों तक और ऊंचे पहाड़ों से ले कर समुद्र की गहराइयों तक हमें धरती का हर हिस्सा जीवन से परिपूर्ण नजर आता है और हम इंसान धरती पर जीवन की इसी विविधता का हिस्सा हैं.

आदिकाल का मनुष्य सृष्टि के रहस्यों को नहीं जानता था, इसलिए वह प्रकृति में घटने वाली घटनाओं से बहुत डरता था. इंसान के इसी स्वाभाविक डर ने कई प्रकार के अंधविश्वासों को पैदा कर दिया जो बाद में अलगअलग धर्मों के रूपों में स्थापित हो गए.

धरती कैसे बनी? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई? इंसान कैसे बना? धरती कैसे काम करती है? रात और दिन कैसे होते हैं? पिछले 200 वर्षों के वैज्ञानिक शोधों द्वारा इन प्रश्नों का जवाब ढूंढ़ निकाला जा चुका है. आइए, इन प्रश्नों का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं.

बिगबैंग से हुई सृष्टि की शुरुआत

लगभग 13 अरब 70 करोड़ वर्षों पहले हमारे इस विराट अनंत और हैरतअंगेज यूनिवर्स का जन्म हुआ. ब्रह्मांड के जन्म की इसी थ्योरी को हम बिगबैंग थ्योरी कहते हैं. बिगबैंग से पहले क्या था, इस पर वैज्ञानिक अलगअलग थ्योरी देते हैं. स्टीफन हौकिंग के अनुसार, ‘हमारा ब्रह्मांड 3 तत्त्वों से बना है. ये 3 तत्त्व हैं टाइम, स्पेस और मैटर. तीनों का अस्तित्व बिगबैंग से ही प्रारंभ होता है. बिगबैंग से पूर्व समय का ही अस्तित्व नहीं था, तब यह मानने का कोई औचित्य ही नहीं है कि बिगबैंग से पहले भी कुछ था.’

हमारा यूनिवर्स अपनी शुरुआत से ही फैलता चला गया. बिगबैंग की शुरुआती अवस्था में जो ऊर्जा पैदा हुई उस से मैटर और एंटीमैटर पैदा हुए. उन दोनों के घर्षण से शुरुआती 12 प्रकार के एलिमैंट बने जिन में से एक हाइड्रोजन था.

हाइड्रोजन के अणुओं से ही हीलियम बना. हाइड्रोजन और हीलियम से बने अरबोंखरबों सितारे और असंख्य आकाशगंगाएं. 6 अरब वर्ष पहले 2 विशालकाय सितारे आपस में टकराए जिसे सुपरनोवा विस्फोट कहा जाता है. इन्हीं सितारों के नेबुला से तकरीबन साढ़े 5 अरब साल पहले सूरज का जन्म हुआ.

हमारे यूनिवर्स की शुरुआत के 8 अरब वर्षों के बाद हमारी आगशगंगा, मिल्कीवे, के किसी कोने में हाइड्रोजन के बादल सघन हो रहे थे. ग्रेविटी के कारण हाइड्रोजन के विशाल बादलों ने हमारे सूर्य का रूप लेना शुरू किया.

करीब 5 अरब वर्षों पहले शुरू हुई यह प्रक्रिया 50 करोड़ वर्षों तक चलती रही. सूर्य बनने की प्रक्रिया के बाद बची धूल और गैस ने सैकड़ों पिंडों का रूप धारण किया. ये सभी पिंड गुरुत्व के कारण केंद्र में स्थित बड़े पिंड का चक्कर लगाने लगे. इस तरह बना हमारा सौरमंडल.

शुरुआती सौरमंडल में सैकड़ों ग्रह थे, हजारों पिंड थे, लाखों उल्का पिंड थे और करोड़ोंअरबों की तादाद में विशाल पत्थर थे जो अंतरिक्ष में सूर्य का चक्कर लगा रहे थे. साढ़े 4 अरब वर्षों पहले के उस सौरमंडल में कुछ बृहस्पति से भी बड़े ग्रह थे और कुछ प्लूटो से भी छोटे.

समय के अंतराल में इन में से अधिकांश ग्रह आपस में टकरा गए जिस से ग्रहों की संख्या कम हो गई. इन ग्रहों की टक्कर से बिखरे मलबों से इन ग्रहों के चंद्रमा बने.

4 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के ग्रहों के बीच एक विशाल पिंड से दूसरे बड़े पिंड की भयंकर टक्कर हो गई. इस टकराव से उस पिंड का 25 प्रतिशत भाग मलबे में तबदील हो गया और शेष बचे भाग ने धीरेधीरे एक ग्रह का रूप धारण किया. इस तरह हमारी पृथ्वी का जन्म हुआ और इस टक्कर से पैदा हुए मलबों के ढेर ने धीरेधीरे एक और छोटे पिंड का रूप धारण किया जो चंद्रमा कहलाया.

शुरुआती पृथ्वी आज की पृथ्वी से एकदम अलग थी. साढ़े 4 अरब वर्ष पहले की धरती पर ठोस धरातल नहीं था. धरती की सतह पर धरती के गर्भ से निकलने वाले मैग्मा और लावा की भरमार थी. तापमान 400 से 1,600 डिग्री सैल्सियस था. न कोई पहाड़, न नदी, न समुद्र. चारों ओर आकाश से बरसते आग के गोले और धरातल पर बहती आग की नदियां ही थीं.

ऐसी थी हमारी शुरुआती पृथ्वी. करीब 3.8 अरब वर्ष पहले तक पृथ्वी का तापमान कुछ कम हुआ. धरती पर 20 करोड़ वर्षों तक धधकते लावा और मैग्मा के बादल बरसते रहे. इस तेजाबी बारिश ने विशाल रासायनिक समुद्र का निर्माण कर दिया. 3.7 अरब साल पहले विशाल समुद्र से पृथ्वी का 80 प्रतिशत भाग पानी में डूब चुका था. शेष 20 प्रतिशत जो भाग बचा था उसे पेनिजिया लैंड कहा जाता है. यह पेनिजिया महाद्वीप भी टूटने लगा. इस के कई भाग एकदूसरे से अलग हो कर दूर खिसकने लगे. धरती के गोल होने के कारण एकदूसरे से अलग हुए ये भूखंड फिर से एकदूसरे से टकराने लगे. विशाल भूखंडों के इस महाटक्कर से विशाल पर्वतों के निर्माण हुए.

पर्वतों के निर्माण ने फिर से धरती को बदला. समुद्र का पानी सूर्य की प्रचंड गरमी से वाष्पित हो कर इन पहाड़ों पर बरसता और इस तरह करोड़ों वर्षों में बड़ेबड़े ग्लेशियरों के निर्माण होने लगे.

30 करोड़ वर्षों में पृथ्वी का वातावरण बनने लगा. मौसमचक्र बनने लगे. हालांकि ये परिवर्तन जीवन के अनुकूल नहीं थे, फिर भी समुद्र की गहराइयों में जीवन की इकाइयों के संकेत दिखाई देने लगे.

पृथ्वी पर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं ने शुरुआती एक कोशिका वाले जीवों का निर्माण किया. जीवन के इन शुरुआती तत्त्वों ने पृथ्वी पर स्थित कार्बन डाइऔक्साइड को सोख कर औक्सीजन का निर्माण करना शुरू कर दिया.

इन माइक्रो और्गेनिज्म से कई प्रकार के सूक्ष्म बैक्टीरिया विकसित होने लगे. उस के बाद के करोड़ों वर्षों में इन एक कोशिका वाले सूक्ष्म जीवों से बहुकोशिकीय जीव विकसित हुए.

करीब 3 अरब वर्ष पहले की पृथ्वी काफी बदल चुकी थी. अब पृथ्वी पर पर्याप्त रूप में औक्सीजन था, पानी था, नदियां थीं. समुद्र के गर्भ में अनेक छोटे जीव पल रहे थे व विकसित हो रहे थे. इसी दौर में जीवों की अनेक नई प्रजातियां पैदा हुईं.

जीवन का यह खेल केवल समुद्र में ही हो रहा था. महाद्वीप सुनसान थे. वहां अभी जीवन के नाम पर काई जैसा तत्त्व ही उपलब्ध था जो विकसित हो रहा था. धीरेधीरे द्वीपों की बंजर जमीन भी हरियाली में बदलने लगी. वहां भी शुरुआती घास पैदा होने लगी. जीवन की जो प्रतिस्पर्धा समुद्र में चल रही थी वह द्वीपों पर भी होने लगी. लेकिन पृथ्वी की सतह पर यह होड़ विभिन्न प्रकार की घास की प्रजातियों में थी जो अलगअलग पेड़पौधों का रूप ले रही थी. वहीं समुद्र की गहराइयों में बहुकोशिकीय जीव विभिन्न प्रकार के कीड़ेमकोड़े और मछलियों के रूप में विकसित होने लगे थे.

विकास की इस चरम प्रतियोगिता के दौर में कुछ समुद्री जीवों ने समुद्र से बाहर निकल कर धरातल पर कदम रखा जहां उन के लिए प्रतिस्पर्धा बिलकुल नहीं थी, बस, उन्हें नए माहौल के हिसाब से खुद को बदलना था.

2 अरब साल पहले समुद्र से निकल कर धरती पर सब से पहले कदम रखने वाली मछलियों के वंशजों ने विकास की बेहद कठिन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए विशाल जीवों का रूप धारण कर लिया.

आगे चल कर यही विशाल जीव डायनासोर के रूप में विकसित हुए जिन्होंने लंबे अरसे तक पृथ्वी पर राज किया. करीब 6 करोड़ साल पहले पृथ्वी से एक भयंकर धूमकेतु टकराया जिस ने डायनासोरों के विशाल साम्राज्य को एक झटके में खत्म कर दिया.

इस टक्कर ने पृथ्वी से बड़े जीवों का बिलकुल सफाया कर दिया. पृथ्वी के लगभग 90 प्रतिशत जीव खत्म हो गए. जो छोटे जीव बच गए उन्होंने परिस्थितियों का सामना किया और लाखों वर्षों के विकासक्रम में खुद को कई अलगअलग प्रजातियों में विकसित कर लिया.

आधुनिक मनुष्यों के पूर्वज 2 लाख वर्ष पहले अफ्रीका के इथियोपिया में विकसित हुए और करीब 80 हजार वर्ष पहले इंसानों का एक छोटा सा दल नई दुनिया की तलाश में अफ्रीका से यमन के रास्ते 16 किलोमीटर का समुद्री रास्ता पार करते हुए यूरोप पहुंच गया. उस ने 200 वर्षों की वैज्ञानिक खोजों और परीक्षणों पर आधारित सृष्टि रचना की. इस थ्योरी को अच्छी तरह समझने के लिए कुछ और बातों को जानना जरूरी है.

धर्म के ठेकेदार स्वयं को ईश्वर का सेवक कहते हैं. जबकि, वे ईश्वर की सेवा के नाम पर जनता से लूटी गई दौलत से आलीशान जिंदगी जीते हैं. इस के उलट, सृष्टि और इंसान की जिंदगी से जुड़ी नित नई खोज करने वाले वैज्ञानिक स्वयं को ईश्वर का दलाल घोषित नहीं करते. ये वैज्ञानिक साधारण जिंदगी जीते हैं. साधारण घरों में रहते हैं. साधारण खाना खाते हैं. स्वयं की मूर्तियां नहीं बनवाते. आइजेक न्यूटन, गैलीलियो गैलिली, चार्ल्स डार्विन और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिकों की जहां मूर्तियां बनी हैं वहां कोई पुजारी नहीं बैठा. जिन पुस्तकों में दुनिया का वास्तविक ज्ञान है वे पुस्तकें पुस्तकालयों में हैं; किसी धर्म के खास चर्चों, मसजिदों या मंदिरों में नहीं. जिन महान वैज्ञानिकों ने सृष्टि के बड़े रहस्यों को सुलझाया, लोगों को उन वैज्ञानिकों के नाम तक नहीं मालूम क्योंकि ये वे महान लोग थे जिन्हें भक्तों की जरूरत नहीं थी.

सर्वप्रथम फ्रेडरिक वोहलर ने दी ईश्वर को चुनौती

धर्म के ठेकेदारों का मानना था कि नेचर में मौजूद हरेक तत्त्व सिर्फ ईश्वर ही पैदा कर सकता है. इंसान के बस की बात नहीं कि वह कुछ भी पैदा कर सके. लेकिन, फ्रेडरिक वोहलर ने 1828 में यूरिया को लैब में तैयार कर ईश्वर को चुनौती दे डाली थी तब धार्मिकों ने इसे खुदा की अवहेलना माना और दुनियाभर में सर फ्रेडरिक वोहलर की निंदा की गई. तमाम तरह के फतवे जारी हुए. जान से मारने की धमकियां दी गईं लेकिन यह सब वोहलर जैसे वैज्ञानिकों के लिए कोई नई बात नहीं थी.

जीवन की उत्पत्ति के बारे में इंसानी समझ कभी आगे न बढ़ पाती अगर गैलीलियो गैलिली, कोपरनिकस, जियोर्दानो ब्रूनो और चार्ल्स डार्विन जैसे महान लोग धर्म की युगों पुरानी घेराबंदियों को लांघने की हिम्मत न करते.

जीवन की उत्पत्ति के बारे में धार्मिक मान्यताओं से अलग विज्ञान ने आज कई पहेलियों का हल ढूंढ़ लिया है. आज हम जानते हैं कि धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत कोई

ईश्वर नहीं बल्कि विकासवाद (एवोल्यूशन) है. एवोल्यूशन के हजारों सुबूत हमें मिल चुके हैं लेकिन अभी तक हमारे पास इस सवाल का ठोस जवाब नहीं है कि धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई.

धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हमें यह समझना होगा कि जीवन है क्या? यह प्रश्न भी मानव की खोजी प्रवृत्ति से जुड़ा है. आदिमानव हमेशा से अपने सर्वाइवल के लिए जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है. नदी के उस पार क्या है? पहाड़ के पीछे क्या है? समुद्र के उस पार क्या है? गुफा के अंदर क्या है? आदिकाल के मनुष्य के लिए इस तरह के प्रश्नों का हल ढूंढ़ने की प्रक्रिया हजारों वर्षों तक चली. शुरू में मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति सिर्फ उस के संघर्ष और विकास से जुड़ी रही. आगे चल कर इंसान की यह प्रवृत्ति उत्सुकता में बदली, जिस का फायदा हर कदम पर पुरोहितों ने उठाया.

जीवन की परिभाषा क्या

जीवन की परिभाषा क्या है? इस सवाल पर ज्यादातर वैज्ञानिकों की कौमन राय यह है कि वह मौलिक्यूल जो जानकारियों को स्टोर कर सके और अपनी नकल तैयार कर सकने के काबिल हो, उसे नस्ल कहते हैं. हर नई नस्ल पुरानी पीढ़ी से थोड़ी एडवांस भी होनी चाहिए ताकि यह नेचर में अपनी उपस्थिति कायम रख सके. इस के साथ ही, यह मौलिक्यूल एनर्जी के किसी स्रोत पर निर्भर हो कर मेटाबौलिज्म को करने में सक्षम भी हो. ऐसे किसी भी मौलिक्यूल को हम जीवन की एक इकाई कह सकते हैं.

सरल भाषा मे कहें तो वह कोई भी तत्त्व जिसे भोजन यानी एनर्जी की जरूरत होती हो, उस में स्वयं को सुरक्षित रखने के गुण हों और जो प्रजनन कर अपनी नस्ल को आगे बढ़ा सकता हो, उस को हम जीवन कह सकते हैं.

कैसे काम करता है हमारा शरीर

शरीर के काम करने को बेहतर ढंग से समझना हो तो हमारे पास उदाहरण के लिए हमारा शरीर है. यह शरीर कई और्गनों से मिल कर बना है. शरीर को जीवित बनाए रखने के लिए किडनी, दिल, फेफड़े, स्किन, धमनियां और दिमाग मिल कर काम करते हैं. शरीर के ये हिस्से बने हैं टिश्यूज से और ये टिश्यूज बने हैं सेल्स यानी कोशिकाओं से.

एक सिंगल सेल में वे सभी गुण होते हैं जिसे हम जीवन कह सकते हैं. एक सिंगल सेल भोजन करता है, खुद की सुरक्षा कर सकता है और अपनी कौपी बना सकता है. ऐसी खरबों कोशिकाओं का बना हमारा शरीर भी मेटाबौलिज्म करता है, खुद की सुरक्षा कर सकता है और दो शरीर मिल कर अपने से मिलतीजुलती अनगिनत कौपीज बना सकते हैं. खरबों जीवित कोशिकाओं की इसी संयुक्त इकाई को हम जिंदा शरीर कहते हैं. धरती के तमाम जीव इसी तरह बने हैं यानी धरती पर हम जिन जीवों को देखते हैं उन का वजूद खरबों कोशिकाओं की संयुक्त कार्यप्रणाली की वजह से है.

जिस तरह हम खुद में एक जिंदगी हैं उसी तरह हमारे शरीर का हरेक सेल अपनेआप में एक जीवन है और धरती पर जिन भी तत्त्व को हम जीवन कहते हैं वे सभी इन्हीं छोटे सेल्स की कंबाइन इकाई होते हैं.

धरती पर जीवन की शुरुआत में यही सिंगल सैलुलर जीव वजूद में आए थे जो अरबों वर्षों के क्रमिक विकास में मल्टीसैलुलर जीव बने. सिंगल सेल से खरबों प्रजातियां कैसे इन्वौल्व हुईं, इस के लिए हमें एवोल्यूशन को समझना होगा.

एवोल्यूशन क्या है

जीवन के आनुवंशिक गुणों में पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले बदलाव को क्रम विकास या एवोल्यूशन कहते हैं. धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत क्रम विकास ही है.

चार्ल्स डार्विन ने सर्वप्रथम इंसान और बाकी सभी जीवों के क्रमिक विकास की थ्योरी दी थी. चार्ल्स डार्विन के शोध के अनुसार, इतिहास में बहुत पीछे जाने पर सभी जीवों की ओरिजिन का स्रोत जीवन की किसी एक शाखा से ही जुड़ता है. सीधे शब्दों में कहें तो सभी जीवों के पूर्वज एक ही रहे होंगे.

इस नजरिए से डार्विन ने यह साबित किया कि जीव की हर प्रजाति चाहे वह इंसान हो, जीवजंतु हों, पेड़पौधे हों या समुद्री जीव हों, सभी एकदूसरे के रिश्तेदार हैं जो करोड़ों वर्षों के प्राकृतिक चयन (नैचुरल सिलैक्शन) की वजह से अलगअलग प्रजातियों में विकसित हुए. इसी को थ्योरी औफ एवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत कहा जाता है. सर चार्ल्स डार्विन के एवोल्यूशन के सिद्धांत को स्थापित हुए 150 वर्ष गुजर चुके हैं. इस बीच अनेक जीव वैज्ञानिकों ने डार्विन के विकासवाद की पुष्टि की है. आज के जीव विज्ञान के लिए एवोल्यूशन एक बुनियादी मापदंड है.

बहुकोशिकीय जीवन की शुरुआत कैसे हुई

अफ्रीका के गैबोन से 2.1 बिलियन वर्ष पुरानी चट्टानों में पहले के बहुकोशिकीय जीवाश्म पाए गए हैं. इस से यह साबित होता है कि 2 अरब साल पहले भी बहुकोशिकीय जीव धरती पर मौजूद थे. इस जीवाश्म के शोध से पता चला कि यह बहुकोशिकीय जीवन का बिलकुल शुरुआती चरण था. बहुकोशिकीय जीवन सिंगल सैलुलर जीवों का ही एडवांस्ड रूप है. तकरीबन 2.5 अरब साल पहले एकल कोशिकाओं का एक समूह एक अलग द्रव्यमान में इकट्ठा हुआ, जिसे ग्रेक्स कहा जाता है. एक अरब वर्ष के विकासक्रम के दौरान यही ग्रेक्स बहुकोशिकीय इकाई के रूप में विकसित हो गया. आज धरती पर मौजूद तमाम तरह के जीव इसी विकासक्रम का परिणाम हैं. जीवाश्म वैज्ञानिकों के शोध बताते हैं कि बहुकोशिकीय पौधे 470 मिलियन साल पहले शैवाल से विकसित हुए थे.

अब सवाल यह कि सिंगल सेल वाले जीव कैसे बने, इन की शुरुआत कहां से हुई? आणविक जीव विज्ञान ने साबित किया कि सभी जीव एक ही माइक्रोमौलिक्यूल्स (डीएनए, आरएनए और प्रोटीन) को साझा करते हैं और इन अणुओं यानी माइक्रोमौलिक्यूल्स के बीच सूचना स्थानांतरित करने के लिए एक ही आनुवंशिक कोड होता है. इस शोध से यह स्थापित हो गया कि धरती पर मौजूद सभी प्रकार के जीव 3.7 अरब साल पहले के किसी एक ही पूर्वज को साझा करते हैं.

1996 में एक फाउंडेशन द्वारा फ्रांस में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान इस साझे पूर्वज का नामकरण कर इसे लुका (लास्ट यूनिवर्सल कौमन एंसेस्टर) नाम दिया गया. लुका के जीनोमिक्स के डेटा के परीक्षण यह बताते हैं कि आज की जीवित दुनिया के 3 डोमैन, आर्किया, बैक्टीरिया और यूकेरियोट्स, का साझा पूर्वज लुका ही था.

इसे और ठीक से समझने के लिए हमें एक बार फिर सेल को समझना होगा. एक सिंगल सेल, कई माइक्रो एलिमैंट्स से मिल कर बना होता है. इन में सब से महत्त्वपूर्ण एलिमैंट प्रोटीन होता है जो बनता है अमीनो एसिड से और अमीनो एसिड बनता है एटम्स से. हम जानते हैं कि एक एटम खुद में जीवन नहीं होता और न ही हम अमीनो एसिड या न्यूक्लिक एसिड को ही जीवन कह सकते हैं. प्रोटीन मैंबरैंस और माइटोकौंड्रिया भी खुद में जीवन नहीं हैं लेकिन ये सब मिल कर जिस सिंगल सेल का निर्माण करते हैं वह जीवन कहलाता है. यानी, कुछ निर्जीव कैमिकल्स मिल कर एक जीवित सेल का निर्माण कर देते हैं और इस तरह जियोग्राफी में मौजूद कैमिस्ट्री से बायोलौजी की हैरतअंगेज शुरुआत हो जाती है.

सवाल यह है कि कैमिस्ट्री से बायोलौजी के बीच की इस यात्रा को कैसे समझ जाए? तकरीबन 4 अरब साल पहले की धरती का वातावरण ऐसा था कि जीवन के बुनियादी एलिमैंट्स बन सकें. सतह पर मौजूद कुछ कैमिकल्स का संपर्क जब आसमानी बिजली से हुआ तब धरती पर अमीनो एसिड का निर्माण हुआ.

अमीनो एसिड को तो हम लैब में भी तैयार कर चुके हैं. वर्ष 1952 में 2 वैज्ञानिकों ने लैब में अमीनो एसिड तैयार कर दिया था जिसे मिलर यूरी एक्सपैरिमैंट कहते हैं. सरल गैसों से कार्बनिक अणुओं के बनने की प्रक्रिया को दिखाने वाले इस मिलर-यूरे प्रयोग को अमेरिकी रसायनज्ञ स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने अंजाम दिया था. दोनों वैज्ञानिकों ने लैब के अंदर कैमिकल रिऐक्शन की ऐसी कंडीशन तैयार की जैसी शुरुआती धरती पर थी और नतीजतन, उन्होंने प्रयोगशाला में अमीनो एसिड तैयार कर दिखाया. इस प्रयोग से यह साबित होता है कि 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती के गर्भ से बायोलौजी का जन्म कैमिकल रिऐक्शन की वजह से ही हुआ.

जीवन के बुनियादी तत्त्व में जीवन कहां से आया

अमीनो एसिड और न्यूक्लिक एसिड जैसे जीवन के सब से बुनियादी एलिमैंट्स धरती पर ही नहीं बल्कि हमारे सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर भी मौजूद होते हैं. ये मंगल पर भी हैं और अंतरिक्ष में भटकते धूमकेतुओं पर भी. 3 अरब 80 करोड़ साल पहले अंतरिक्ष से लगातार बरसते धूमकेतू भी जीवन का यह रा मैटीरियल धरती तक पहुंचा सकते थे.

सवाल यह नहीं है कि जीवन के बुनियादी तत्त्व कैसे बने बल्कि सवाल यह है कि इन बुनियादी तत्त्वों से जीवन कैसे बना?

हम अब तक यह जान चुके हैं कि धरती पर जीवन की शुरुआत 3 अरब 80 करोड़ साल पहले हुई और उस वक्त के वातावरण में कुछ ऐसे कैमिकल रिऐक्शन हुए जिन से शुरुआती कोशिकीय जीव वजूद में आए लेकिन कैमिस्ट्री से बायोलौजी के बीच की बहुत सी गुत्थियां अब भी अनसुलझ ही हैं.

धरती पर जीवन की शुरुआत कहां पर हुई

जड़ से चेतन कैसे बना? इसे और बारीकी से समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती पर जीवन की शुरुआत कहां पर हुई. फौसिल रिकौर्ड के जरिए हमें धरती पर जीवन की अरबों साल पुरानी विकासयात्रा के पुख्ता सुबूत मिल चुके हैं लेकिन जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इस बात के ठोस प्रमाण हम अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं. इस सवाल का हल तब ही मिल सकता है जब हम यह जान लें कि धरती पर जीवन की शुरुआत ठीकठीक कहां पर हुई.

3 अरब 80 करोड़ साल पहले की धरती की सतह पर जीवन के पनपने लायक एनवायरमैंट मौजूद नहीं था. सो, क्या जीवन की शुरुआत महासागरों के गर्भ में हुई? समुद्र की गहराइयों में मौजूद ज्वालामुखीय क्षेत्रों में जीवन के पनपने की संभावनाएं मौजूद हो सकती थीं लेकिन नए एक्सपैरिमैंट्स यह बताते हैं कि समुद्र की गहराइयों में शुरुआती जीवन का पनपना नामुमकिन बात है. इसे हम ‘वाटर पैराडौक्स’ कहते हैं. तो फिर, जीवन की शुरुआत जमीन पर कहां हुई?

अब नए शोध के नतीजे में यह बात निकल कर आई है कि तकरीबन 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती की सतह पर मौजूद छोटे तालाबों में जीवन की शुरुआत हुई होगी. लेकिन अब ऐसे तालाबों को धरती पर ढूंढ़ना नामुमकिन है क्योंकि समय के लंबे अंतराल के बाद ऐसे तमाम स्थानों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है.

धरती पर 3 अरब 80 करोड़ साल पुरानी वह जगह अब कहीं है ही नहीं जहां हम जीवन की शुरुआत के सुबूत ढूंढ़ सकें तो क्या हम कभी यह नहीं जान पाएंगे कि जियोग्राफी पर कैमिस्ट्री से बायोलौजी की शुरुआत कैसे हुई? क्या इस सवाल का जवाब ढूंढ़े बिना हमें हार मान कर बैठ जाना चाहिए?

नहीं, विज्ञान कभी हार नहीं मानता. धरती पर न सही तो मंगल पर सही, सवाल है तो जवाब भी जरूर मिलेगा, यही विज्ञान है. जी हां, अगर धरती पर ऐसी कोई जगह मौजूद नहीं है तो क्यों न हम ऐसी जगह की तलाश मंगल पर करें?

मंगल पर जीवन की उत्पत्ति की खोज

मंगल भी लगभग उतना ही पुराना है जितनी धरती. मंगल ग्रह की सतह भी धरती से काफी मिलतीजुलती है. मंगल पर कई क्रैटर्स हैं जिन में कभी पानी मौजूद था. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अरबों साल पुराने मंगल के इन गड्ढों के आसपास जीवन की उत्पत्ति के वे सुबूत मिल सकते हैं जो हमारी जिज्ञासाओं को शांत कर सकते हैं क्योंकि अपने शुरुआती समय में मंगल और पृथ्वी दोनों लगभग एकजैसे ही थे. मंगल की सतह पर मौजूद आज सूखे हुए क्रैटर्स अपने अंदर बीते हुए वक्त के बहुत से राज ताजा किए हुए हो सकते हैं. इन में अरबों सालों से अब तक ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. मंगल पर एक ऐसा ही क्रैटर है जिस का नाम है जजेरो क्रैटर.

पर्सिवियरैंस नाम के एक रोवर को नासा ने 30 जुलाई, 2020 को मंगल की ओर रवाना किया जो 18 फरवरी, 2021 को मंगल की सतह पर लैंड हुआ. तब से यह रोवर मंगल के जजेरो क्रैटर पर कैमिस्ट्री और बायोलौजी के बीच की उस कड़ी को ढूंढ़ने में लगा है जो धरती पर जीवन की शुरुआत की गुत्थी को सुलझ सकती है.

बेशक, हम अभी तक यह न जान पाए कि जड़ से चेतन कैसे बना लेकिन इतना तो जान ही गए हैं कि जड़ से चेतन को बनाने में किसी ईश्वर, अल्लाह या गौड का कोई हाथ नहीं है.

धरती पर जीवन किसी ईश्वर की वजह से नहीं है. इस कड़वे सच को समझते ही ईश्वर का रोल, ईश्वर से जुड़ी मान्यताएं और ईश्वर की जरूरत भी खत्म हो जाती है. ईश्वर की मान्यताओं के खत्म होते ही ईश्वर पर आधारित धर्मों की वाहियात दलीलें भी खत्म हो जाती हैं और इन दलीलों के खत्म होते ही धर्म के दलालों का खेल भी खत्म हो जाता है.

लेकिन विडंबना यह है कि दुनिया के तमाम धार्मिक गिरोह हमेशा इस कोशिश में लगे रहते हैं कि आम आदमी तक सत्य की रोशनी पहुंच ही न पाए और आम इंसान हमेशा धार्मिक गिरोहों की बनाई मनगढ़ंत कहानियों में अपनी जिंदगी का हल ढूंढ़ता फिरे.

पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में विज्ञान के पास कोई अंतिम उत्तर नहीं है और न ही विज्ञान यह दावा करता है कि यहीं से उत्पत्ति हुई और विकास प्रारंभ हुआ. हां, उस खोज में वैज्ञानिकों ने ऐसी बहुत सी खोजें कीं जिन का लाभ आज हम टैक्नोलौजी और मैडिसिन व अन्य रूपों में उठा रहे हैं. धार्मिक काल्पनिक कहानियों को सुनसुन कर, पढ़पढ़ कर, गागा कर न टैक्नोलौजी पैदा होती है न मैडिसिन बनती है. जो भी दावों के साथ मानव उत्पत्ति का रहस्य धार्मिक पुस्तकों से बताते हैं, वे खुद अस्पतालों के चक्कर लगाते हैं, मोटरगाड़ियों से चलते हैं, मोबाइल व कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं जो विज्ञान के ही आविष्कार हैं.

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मनुष्य की प्राचीन अभिव्यक्ति में नहीं दिखे देवीदेवता

पूरी दुनिया में मनुष्य की अभिव्यक्ति के सब से पुराने प्रमाण भित्ति चित्रों के रूप में मिलते हैं. इंडोनेशिया के सुलावेसी की एक गुफा में जंगली सूअर के शिकार के चित्र उकेरे गए हैं जो लगभग 51,200 साल पुराने हैं. भारत के मध्य प्रदेश में भीमबेटका की गुफाओं में 30,000 साल पुराने चित्र हैं. चट्टानों पर उकेरे गए चित्रों में शिकार, नृत्य और दैनिक जीवन की झलक साफ नजर आती है. ये गुफा चित्र मानव सभ्यता की शुरुआती रचनात्मकता और पर्यावरण के साथ उस के संबंध को दर्शाते हैं, साथ ही, ये गुफा चित्र प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, कला और संस्कृति को समझने का एक अनमोल स्रोत भी हैं.

दक्षिणपश्चिम फ्रांस में डोर्डोग्ने इलाके में लास्को गुफा चित्र और अल्टामिरा गुफा चित्र लगभग 20,000 साल पुराने हैं. इन दोनों गुफा चित्रों में घोड़े, हिरण, बैल के खूबसूरत चित्र बने हैं, साथ ही, शिकार के दृश्यों को लाल, काले और पीले रंगों में उकेरा गया है. इन चित्रों को ‘पाषाण युग का सिस्टिन चैपल’ कहा जाता है, क्योंकि ये मानव कला और सांस्कृतिक इतिहास की शुरुआत को दर्शाते हैं.

यहां सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन गुफा चित्रों में कहीं भी किसी भगवान या देवीदेवता का कोई चित्र नहीं है. ये तमाम गुफा चित्र मनुष्य के सर्वाइवल की कहानी कहते हैं. मनुष्य के संघर्ष की लंबी कहानी में मनुष्य को कहीं भी भगवानों की जरूरत पड़ी हो, ऐसा इन गुफा चित्रों में कहीं नजर नहीं आता. भगवान, देवीदेवता और अल्लाह मानव के लाखों वर्षों के एवोल्यूशन में कहीं नहीं थे. ये तब आए जब मनुष्यों ने खेती करना सीखा और गांव बसने शुरू हुए. सभ्यताओं की शुरुआत के इस दौर में कुछ धूर्त और चालाक लोगों ने ईश्वर, देवीदेवता और खुदाओं की खोज कर दी और इन्हें जबरन लोगों पर थोपना शुरू कर दिया ताकि लोग पुरोहितों को ईश्वर का प्रतिनिधि मान कर उन की बनाई कपटपूर्ण कहानियों को सच मानें और उन्हें मुफ्त में दान व स्त्रियां मिल सकें.

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