लेखिका -डा. रंजना जायसवाल

आदित्य और वसुंधरा की शादी एक महीना पहले हुई थी. घर के सारे मेहमान चले गए थे. अम्मा दिनभर फैले हुए घर को समेटने में लगी रहतीं. आदित्य ने कई बार कहा, “अम्मा, वसुंधरा को खाना बनाने दिया करो, ज्यादा नहीं तो कम से कम वह तुम्हारी मदद तो कर ही देगी."

पर, अम्मा तो अम्मा थीं. "अभी सवा महीना भी नहीं हुआ है शादी को हुए, दुनिया क्या कहेगी. बहू के हाथ की अभी मेहंदी भी नहीं छुटी और उसे चूल्हे में झोंक दिया. तुम लोग तो नए जमाने के बच्चे हो, कुछ भी कहतेकरते हो पर दुनियादारी तो हमें देखनीसमझनी है."

वसुंधरा मांबेटे के बीच दर्शक की तरह ताकती रहती थी. "अम्मा, अम्मा." "क्या है आदि?" अम्मा सब्जी छौंकने में व्यस्त थीं. "अम्मा, बाहर लल्लू चाचा आए हैं.” "अरे, लल्लू भाईसाहब आए हैं." लल्लू चाचा मेरे बाबू जी के बचपन के दोस्त थे. सुखदुख, अमीरीगरीबी के साथी. पहले तो बगल वाले घर में रहते थे. लल्लू चाचा...पड़ोसी कम, रिश्तेदार ज्यादा थे. आज के जमाने में तो रिश्तेदार भी इतना नहीं सोचते जितना कि ये दोनों परिवार एकदूसरे के लिए सोचा करते थे. पर समय ने करवट बदली और लल्लू भाईसाहब को यह महल्ला छोड़ कर दूसरे महल्ले में जाना पड़ा.

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"अम्मा, चलोगी भी कि बस यहीं खड़ेख़ड़े मुसकराती रहोगी," आदित्य ने अम्मा का कंधा हिलाया. "आदित्य, बेटा जरा दौड़ कर नुक्कड़ से गुलाबजामुन ले आ. तुम्हारे चाचा को हरिया की दुकान के गुलाबजामुन बहुत पसंद हैं." आदित्य अम्मा की बात सुन कर मुसकराने लगा.

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