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Social Story In Hindi : फौजी – मेजर परम ने आखिर किस तरह अपना फर्ज निभाया ?

Social Story In Hindi : परम उस समय ड्यूटी पर था जब उसे पता चला कि वह बाप बनने वाला है. पत्नी तनु से फोन पर बात करते हुए परम का गला खुशी से भर्रा गया. उसे अफसोस हो रहा था कि वह इस समय तनु के साथ नहीं है. उस ने फोन पर ही ढेर सारी नसीहतें दे डाली कि यह नहीं करना, वह नहीं करना, ऐसे मत चलना, बाथरूम में संभल कर जाना.

कश्मीर के अतिसंवेदनशील इलाके में तैनात पैरा कमांडो मेजर परम जो हर समय कदमकदम पर बड़ी बहादुरी और जीवट से मौत का सामना करता है, आज अपने घर एक नई जिंदगी के आने की खुशी में भावुक हो उठा. न जाने कब आंखों में नमी उतर आई. आम लोगों की तरह वह इस समय अपनी पत्नी के पास तो नहीं हो सकता, लेकिन है तो आखिर एक इंसान ही. लेकिन क्या करे किसी बड़े उद्देश्य की खातिर, अपने देश की खातिर अपनी खुशियों की कुरबानियां तो देनी ही पड़ती हैं.

शाम को मेस में जा कर परम ने खुद सब के लिए सेंवइयों की खीर बनाई और सब को खिलाई. उस रात परम की आंखों से नींद कोसों दूर थी. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था.

परम बारबार तनु को फोन कर उस से पूछता, ‘‘तनु यह सच है न?’’

तनु को हंसी आ जाती, उस के और तनु के प्यार का अंश. उन का अपना बच्चा.

तनु आज और भी ज्यादा अपनी, और भी ज्यादा प्यारी तथा दिल के और करीब लग रही थी. परम ने सुबह 6 बजे से ही तनु को फोन करना शुरू कर दिया, ‘‘क्या कर रहा है मेरा बच्चा? भूख तो नहीं लगी? जल्दी से ब्रेकफास्ट कर लो, दवा ली?’’

कैलेंडर पर 1-1 कर के तारीखें आगे बढ़ रही थीं और परम के छुट्टी पर जाने के दिन भी करीब आते जा रहे थे. वैसे तो तनु से शादी होने के बाद से परम को हर बार ही छुट्टी पर जाने की जल्दी रहती थी, लेकिन इस बार तो उसे बहुत ही ज्यादा बेचैनी हो रही थी. हर दिन महीने जितना लंबा लग रहा था.

तनु को भी रात देर तक नींद नहीं आती थी. दिन तो फिर भी कट जाता था, लेकिन रात भर वह बेचैनी से करवटें बदलती रहती. परम ने अपनी रात की ड्यूटी लगवा ली. वह रोज रात को 11 बजे से ढाई बजे या 3 बजे तक ड्यूटी करता और पूरी ड्यूटी के दौरान तनु से बातें करता रहता. हर 10-15 मिनट पर वह सिटी बजा कर अगली पोस्ट पर अपने इधर सब ठीक होने की सूचना देता और फिर जब उधर से जवाब आ जाता तो फिर तनु से बातें करने लगता. दोनों काम हो जाते. पत्नी और देश दोनों के प्रति वह पूरी ईमानदारी से अपना फर्ज पूरा कर देता.

3 बजे वह रूम में आता. हाथमुंह धो कपड़े बदल मुश्किल से डेढ़दो घंटे सो पाता कि फिर सुबह उठ रैडी हो कर ड्यूटी जाने का समय हो जाता. फिर सारे दिन की भागादौड़ी. उस की यूनिट के लोग उस की दीवानगी देख कर उस पर हंसते, लेकिन उस की देश और परिवार दोनों के प्रति गहरी निष्ठा देख कर उस की सराहना भी करते.

इधर 2-3 ऐनकाउंटरों में मिलिटैंट्स के मारे जाने के बाद से पूरे सैक्टर में खामोशी सी छाई थी. लेकिन परम को हमेशा लगता रहता कि यह किसी जोरदार धमाके के पहले की शांति हो सकती है. हो सकता है अचानक जबरदस्त हमले का सामना करना पड़े. वह अपनी तरफ से हर समय चौकन्ना रहता. लेकिन पूरा महीना शांति से बीत गया. परम की छुट्टी मंजूर हो गई. अब उस की बेचैनी और ज्यादा बढ़ गई. दिन काटे नहीं कटते.

घर जाने के लिए यूनिट से सवा घंटा बस से जम्मू. जम्मू से ट्रेन पकड़ कर अजमेर और फिर अजमेर से दूसरी ट्रेन पकड़ कर अहमदाबाद पूरे

2 दिन का सफर तय कर वह अहमदाबाद बस स्टैंड पहुंचा.

टैक्सी ले कर 1 बजे अपने घर तनु के सामने खड़ा था.

तनु का चेहरा अपने हाथों में थाम कर

परम ने उस का माथा चूम लिया. 2 मिनट तक वह उसे एकटक देखता रहा. उस का प्यारा चेहरा देख कर परम की पिछले कई महीनों की थकान दूर हो गई, सारा तनाव खत्म हो गया. तनु के साथ जिंदगी एक बार फिर से प्यार भरी थी, खुशनुमा थी.

दूसरे दिन तनु का अल्ट्रासाउंड होना था. परम उसे क्लीनिक ले गया. उस ने डाक्टर से रिक्वैस्ट की कि वह तनु के साथ अंदर रहना चाहता है, जिसे डाक्टर ने स्वीकार लिया. मौनिटर पर परम बच्चे की छवि देखने लगा. खुशी से उस की आंखें भर आईं.

रात में जब दोनों खाना खाने बैठे तो परम को महसूस हो रहा था जैसे वह पता नहीं कितने बरसों के बाद निश्चिंत हो तनु के साथ बैठा है. एकदम फुरसत से. कितना अच्छा लग रहा है… दिमाग में तनाव नहीं… मन में कोई हलचल नहीं. सब कुछ शांत. सुव्यवस्थित ढंग से चलता हुआ. परम ने एक गहरी सांस ली कि काश, जीवन ऐसा ही होता शांत, सुव्यवस्थित, निश्चिंत. बस वह तनु, उन का बच्चा और घर. रात में नीचे किचन में जा कर परम अपने लिए कौफी और तनु के लिए दूध ले आया.

‘‘वहां भी ड्यूटी यहां भी ड्यूटी… आप को तो कहीं पर आराम नहीं है… वहां से इतना थक कर आए हैं और यहां भी चैन नहीं है,’’ तनु दूध का गिलास लेते हुए बोली.

‘‘इस ड्यूटी के लिए तो कब से तरस रहा था. भला तेरे लिए कुछ करने में मुझे थकान लग सकती है क्या?’’ परम प्यार से बोला.

‘‘कितना चाहते हो मुझे?’’ तनु विह्वल स्वर में बोली.

‘‘तू मेरी सांस है. तेरे प्यार के सहारे ही तो जी रहा हूं,’’ परम बोला.

सुबह उठते ही परम ने तनु से पूछा, ‘‘क्या खाएगा मेरा बच्चा आज?’’

‘‘कौर्नफ्लैक्स,’’ तनु बोली.’’

परम ने फटाफट दूध गरम कर उस में बादाम, पिस्ता डाल कर कौर्नफ्लैक्स तैयार कर के चाय की ट्रे के साथ बाहर बगीचे में ले आया. दोनों झूले पर बैठ गए. सुबह की ठंडी हवा चल रही थी. सामने सूरजमुखी के पीले फूलों वाला टी सैट था. साथ में तनु थी और वह पैरा कमांडो जो रातदिन देश की सुरक्षा की खातिर आतंकवादियों का पीछा करते मौत से जान की बाजी खेलता रहता, आज की खुशनुमा सुबह अपने घर पर था.

दोपहर का खाना दोनों ने मिल कर बनाया. छुट्टियों में तनु के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने के उद्देश्य से परम दोनों समय खाना बनाने में उस की मदद करता. बीच में बिरहा के बादल छंट जाते और प्यार की कुनकुनी धूप दोनों के बीच खिली रहती. दोपहर में वह उसे कोई कौमेडी फिल्म दिखाता, वही उस की पसंद के फल काट कर खिलाता. फिर खाना भी अपने हाथ से परोसता.

‘‘अरे मैं नीचे आ जाती न…. आप ऊपर क्यों ले आए खाना? कितने चक्कर लगाओगे?’’ तनु बोली.

‘‘तुम्हारे लिए अभी बारबार सीढि़यां चढ़नाउतरना ठीक नहीं है, इसलिए मैं खाना ऊपर ही ले आया,’’ परम थाली में खाना परोसते हुए बोला, ‘‘आप का पति आप की सेवा में हाजिर है.’’

‘‘कितनी सेवा करोगे जी?’’

‘‘हम तो सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैं जी. ड्यूटी पर भारत माता की सेवा करते हैं और छुट्टी में पत्नी की,’’ परम तनु को एक कौर खिलाते हुए बोला.

बीचबीच में परम अपनी पोस्टिंग की जगह भी फोन कर वहां के हालचाल पता करता रहता. आखिर वह एक कमांडो था और कमांडो कभी छुट्टी पर नहीं होता. हर बार पोस्टिंग की जगह से फोन आने पर उस का दिल डूबने लगता कि कहीं वापस तो नहीं बुला रहे… कहीं किसी इमरजैंसी के चलते छुट्टी कैंसिल तो नहीं हो गई. कुल 22-23 दिन वह तनु के साथ रह पाता है, उस में भी हर पल मन धड़कता रहता कि कहीं छुट्टी कैंसिल न हो जाए, क्योंकि पैरा कमांडो होने के कारण उस की जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा थीं.

परम की छुट्टियां खत्म होने को थीं. अब रोज रात को वह अफसोस से भर जाता कि तनु के साथ का एक और दिन ढल गया.

ऐसे ही दिन सरकते गए. परम रात में गैलरी में खड़ा सोचता रहता कि इस बार तनु को छोड़ कर जाना जानलेवा हो जाएगा. वह इस दौर में पूरा समय तनु के साथ रहना चाहता था. अपने बच्चे के विकास को महसूस करना चाहता था. इस बार सच में उस का जरा भी मन नहीं हो रहा था जाने का. उस ने मन ही मन कामना की कि कम से कम अगली पोस्टिंग ऐसी जगह हो कि वह 2 साल तो अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रह पाएं.

परम को एक और चिंता थी. अगर वह 3 महीने बाद फिर से छुट्टी पर आता है, तो अपने बच्चे के जन्म के समय तनु के पास नहीं रह पाएगा. इस का मतलब उसे बीच में छुट्टी लेने से बचना होगा तभी 2 महीनों की इकट्ठी छुट्टी ले पाएगा. यही सब सोच कर वह और परेशान हो जाता. ऐसे हालात में वह बीच के पूरे 5 महीनों तक तनु को देख नहीं पाएगा. वह जिस जगह पर है वहां तनु को किसी भी हालत में ले जाना असंभव है. फिर इस हालत में तो उस का सफर करना वैसे भी ठीक नहीं है, और वह भी इतनी दूर.

एक पुरुष अपने प्यार और फर्ज के बीच कितना बेबस, कितना लाचार हो जाता है. छुट्टी के आखिरी दिन वह सुबह तनु को डाक्टर के यहां ले गया. उस का चैकअप करवाया. सब नौर्मल था. घर आ कर उस ने पैकिंग की. इस बार अपनी पैकिंग के साथ ही उसे तनु के सामान की भी पैकिग करनी पड़ी, क्योंकि अब वह तनु को अकेला नहीं रख सकता. उसे उस के मातापिता के घर पहुंचा कर जाएगा. सामान बैग में भरते हुए उस ने कमरे पर नजर डाली. अब पता नहीं कितने महीनों तक वह अपने घर, अपने कमरे में नहीं रह पाएगा. उस की आंखें भीग गईं. उस ने चुपचाप शर्ट की बांह से आंखें पोंछ लीं.

‘‘क्या हुआ जी?’’ तनु ने तड़प कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ परम ने भरे गले से जवाब दिया.

‘‘इधर आओ मेरे पास,’’ तनु ने उसे अपने पास बुलाया और फिर उस का सिर अपने सीने पर रख कर उस के बाल सहलाने लगी. परम बच्चों की तरह बिलख कर रो पड़ा.

‘‘यह क्या… ऐसे दिल छोटा नहीं करते.

ये दिन भी बीत जाएंगे जी,’’ तनु उसे दिलासा देती रही.

वापस जाते हुए परम ने एक भरपूर नजर अपने घर को देखा और फिर तनु के साथ कार में बैठ गया. तनु के पिता का ड्राइवर उसे बस स्टैंड पहुंचाने आया था. वही वापसी में तनु को अपने मातापिता के घर पहुंचा देगा.

बसस्टैंड पहुंच कर परम ने अपना सामान निकाला और बस में चढ़ा दिया. वह चेहरे पर भरसक मुसकराहट ला कर तनु से बात कर रहा था औैर उसे तसल्ली दे रहा था. तनु अलबत्ता लगातार आंसू पोंछती जा रही थी. लेकिन परम तो पुरुष था न जिसे प्रकृति ने खुल कर रोने और अपना दर्द व्यक्त करने का भी अधिकार नहीं दिया है.

कोई नहीं समझ सकता कि कुछ क्षणों में एक पुरुष कितना असहाय हो जाता है. कितना टूट जाता है अंदर से जब दिल दर्द से तारतार हो रहा होता है और ऊपर से आप को मुसकराना पड़ता है, क्योंकि आप पुरुष हैं जो पौरुषेय और भावनात्मक मजबूती व स्थिरता का प्रतीक है. रोना आप को शोभा नहीं देता.

परम भी तनु को समझाता, सहलाता खड़ा रहा. बस चलने को हुई. बस ड्राइवर ने ऊपर चढ़ने का इशारा किया. तब परम ने तनु को गले लगाया और तुरंत पलट कर बस में चढ़ गया. सीट पर बैठ कर वह तनु को तब तक बाय करता रहा जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गईं.

परम ने अपना मोबाइल निकाला. मोबाइल के पारदर्शी कवर के अंदर एक छोटी सी रंगीन नग जड़ी बिंदी थी जो तनु के माथे से निकल कर न जाने कब रात में तकिए पर चिपक गई थी. परम ने उसे मन से सहेज कर अपने मोबाइल के कवर के अंदर चिपका लिया था. अब यही उस के साथ बिताई यादों का खजाना था जो अगल 3-4 या न जाने कितने महीनों तक उसे संबल देता रहेगा. रात के अंधेरे में अब कोई उस की कमजोरी देखने वाला नहीं था. एक पुरुष को रोते देख कर आश्चर्य करने या हंसने वाला कोई नहीं था. अब वह खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता था. जी भर कर रो सकता था… परम मोबाइल कवर के अंदर से झांकती तनु की बिंदी पर माथा रख कर बेआवाज रोने लगा… आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.

अपनी पत्नी से विदा ले कर एक फौजी ने वापस उस दुनिया के लिए यात्रा शुरू कर दी जहां कदमकदम पर सिर पर मौत मंडराती है. जहां से उसे नहीं पता कि वह कभी वापस आ कर पत्नी और बच्चे को कभी देख भी पाएगा या नहीं. बस हर पल जेब में सिंदूर की डिबिया रखे वह कुदरत से कामना करता रहता है कि बस इस बिंदी और उस अजन्मे बच्चे की खातिर उसे वापस भेज देना. Social Story In Hindi 

Family Story In Hindi : गली के मोड़ पे सूना सा इक दरवाजा

Family Story In Hindi : दिल के कहीं किसी कोने में कुछ दरकता सा महसूस हुआ. न जाने क्यों शिखा का मन ज़ारज़ार रोने को कर रहा था. पर उस के शिक्षित और सभ्य मन ने उसे डांट कर सख्ती से रोक लिया.

कितनी आसानी से हिमांशु ने कहा दिया था- “तुम भी न, क्या ले कर बैठ गई हो, क्या फर्क पड़ता है, तुम्हें कौन सा रहना है उस घर में, ईंट और गारे से बने उस निर्जीव से घर के लिए इतना मोह. अपने पापामम्मी को समझाओ कि फालतू में मरम्मत के नाम पर पैसा बरबाद करने की जरूरत नहीं. आज नहीं तो कल उन्हें उस घर को छोड़ कर बेटों के पास जाना ही पड़ेगा.”

निर्जीव…हिमांशु को क्या पता वह घर आज भी शिखा के तनमन में सांसें ले रहा था. पिछले साल की ही तो बात है, गरमी की छुट्टियों में शिखा को गांव वाले घर जाने का मौका मिला था. सच पूछो तो इस में नया क्या था, कुछ भी तो नहीं, साधारण सी तो बात थी. पर न जाने क्यों जर्जर होती उस घर की दीवारों को देख कर मन कैसाकैसा हो गया था. आखिर उस घर में बचपन बीता था उस का. चिरपरिचित सी दीवारें, घर का एकएक कोना न जाने क्यों शिखा को अपरचितों की तरह देख रहा था.

घर में नाममात्र के पड़े हुए फर्नीचर पर हाथ फेरने के लिए बढ़ाया हुआ शिखा का हाथ न जाने क्या सोच कर रुक गया. यादों के सारे पन्ने एकएक कर खुलने लगे. याद है उसे आज भी वह दिन. शादी के बाद पहली बार वह मम्मीपापा के साथ कुल देवता की पूजा करने आई थी. लाल महावर से रचे शिखा के पैरों ने जब घर की चौखट पर कदम रखा तो लगा मानो घर का कोनाकोना उस का स्वागत कर रहा था.

शायद इंसानों की तरह घरों की भी उम्र होती है. यह वही घर है जहां कभी रिश्तों की खिलखिलाहट गूंजती थी. बच्चों की किलकारियों से घर मंदमंद मुसकराता था. पर आज उस घर की दीवारों पर यहांवहां उखड़े पेंट नजर आ रहे थे. एक बार तो शिखा को ऐसा लगा मानो दीवारों पर उदास चेहरे उभर आए हों. घर के सामने खड़ा आम का विशाल पेड़ और उस की लंबीलंबी डालियों को देख कर आज भी उसे ऐसा लगा मानो वे गलबहियां के लिए तैयार हों. मां से छिप कर उस पेड़ की नर्म छांव में अपने भाइयों के साथ नमकमिर्च के साथ कितनी कैरियां खाई थीं उस ने.

पर पता नहीं क्यों आज उस की तरफ देखने का शिखा साहस नहीं कर सकी. शायद उस की आंखों में तैर आए मूक प्रश्नों को झेलने की शिखा में हिम्मत नहीं थी.

एकएक कर के उस घर के सारे परिंदे इस घोंसले को छोड़ कर नए घोंसलों में चले गए और यह घर चुपचाप जर्जर व उदास मन से उन्हें जाता देखता रहा. कल ही तो पापा का फोन आया था. पापा ने कितने उदास स्वर में कहा था. शिखा पीछे वाले अहाते की धरन टूट गई है, तेरी शादी के वक्त ही रंगरोगन करवाया था. तेरे भाइयों से कहा कि कुछ मदद कर दें तो वे अपना ही रोना ले कर बैठ गए. बेटा देखा नहीं जाता, तेरे बाबा और दादी की एक यही निशानी तो बची है.

क्या एक बार वह हिमांशु से बात कर के देखे पर हिमांशु के लिए तो यह सिर्फ निर्जीव और जर्जर मकान भर ही था. तो क्या मांजी..? शायद वे जरूर समझेंगी, आखिर वे भी तो…!!!

‘ये देखो देवी जी को, उलटी गंगा बहाने चली हैं. लोगों के यहां समधियाने से सामान आता है और ये वहां भेजने की बात कर रही हैं.’

‘मां जी, मैं उस घर की बेटी हूं, मेरा भी तो कुछ फर्ज है.’

शिखा का मुंह उतर गया था. घर के लोग उसे अजीब निग़ाहों से देख रहे जैसे उस ने कोई अजूबी बात कह दी हो. हिमांशु ने उसे जलती निग़ाहों से देखा. शायद उस का पुरुषत्व बुरी तरह आहत हो गया था. कमरें में जब सारी बात हो चुकी थी, फिर घर वालों के सामने यह तमाशा करने की क्या जरूरत है. वह अपनी मां के बारे में अच्छी तरह जानता था. उन्हें तो मौका मिलना चाहिए. आज शिखा की खैर नहीं, मां उसे उधेड़ कर रख देगी. हुआ भी वही.

‘शिखा, लोगों के मायके से न जाने क्याक्या आता है. पर हमारा ही समय ख़राब है कि सास बनने का सुख ही न जान सके. अरे भाई, मायके वाले कुछ दे न सके ठीक, पर दहेज में संस्कार भी न दे सके.’

शिखा की आंखें डबडबा गईं. शादी होने को 20 साल हो गए पर दहेज और संस्कार का ताना आज भी उस का पीछा न छोड़ पा रहे थे. उस ने बड़ी उम्मीद से हिमांशु की तरफ देखा. हिमांशु ने वितृष्णा से मुंह फेर लिया.

हिमांशु घर में सब से छोटे थे. बड़े भाइयों की शादियां अच्छे परिवारों में हुई थीं. अच्छे मतलब शादी में गाड़ी भर कर दहेज मिला था. मां जी की नजर में अच्छे परिवार का मतलब यही था. मां जी के पास कभी त्योहार तो कभी शगुन के नाम पर उपहारस्वरूप कुछ न कुछ समधियाने से आता ही रहता था. शिखा एक मध्यवर्गीय परिवार की इकलौती लड़की थी. पिता ने अपनी हैसियत के अनुसार सबकुछ दिया था. पर उस की जिंदगी मां जी की कसौटी पर कभी खरी न उतरी.

ऐसा नहीं था कि मां जी चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुई हों. बचपन से ले कर जवानी तक उन का जीवन संघर्षों में ही बीता था.पापा जी एक साधारण सी नौकरी ही करते थे. पर बच्चों के चलते धन की वर्षा होने लगी. मां जी की तो मानो मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. जो रिश्तेदार कब का उन से मुंह फेर चुके थे. एकएक कर जुड़ने लगे थे. मां जी भी उन पर खुलेहाथों से पैसा लुटातीं. शिखा ने कई बार दबे स्वर में हिमांशु से इस बात को कहा भी था कि इस तरह पैसा लुटाना कहां की समझदारी है. पर मां जी के फैसले के विरुद्ध जाने की किसी की भी हिम्मत न थी.

‘शिखा, मां का जीवन सिर्फ संघर्ष में ही बीत गया. अगर उन्हें इन सब चीजों से खुशी मिलती है तो तुम्हें क्या दिक्कत है?’

‘दिक्कत, हिमांशु, बात दिक्कत की नहीं पर मां जी जिस तरह से…’

‘तुम फालतू का दिमाग मत लगाओ. अगर भैयाभाभी को दिक्कत नहीं तो तुम क्यों फुदक रही हो.’

शिखा हिमांशु को देखती रह गई. क्या कहती, दिक्कत तो सभी को थी पर मां जी से कहने की हिम्मत किसी की भी न थी. कितनी बार चौके में जेठानियों को कसमसाते देखा है.

पिछले साल मौसी जी के इलाज के लिए मां जी ने एक लाख रुपए दे दिए थे. तो अभी पिछले महीने घर में काम करने वाली की बिटिया की शादी के नाम पर 10 हजार रुपए और पैर पूजने के नाम पर कपड़े, बरतन व न जाने क्या-क्या डे दिया. कभी मंदिर तो कभी जागरण के नाम पर हर महीने कुछ न कुछ जाता है रहता था. उन की मांगें सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही थीं.

एक दिन बड़े भैया ने दबे स्वर में कहा भी था-
‘मां, आप इस तरह से कभी सामान तो कभी पैसे बांटती रहती हो, कल अगर हमें जरूरत पड़ेगी तो क्या हमें कोई देगा?’

‘मैं ने लेने के लिए थोड़ी दिया है. तेरे पापा की कमाई से तो घर ही चल जाता, वही बड़ी बात थी. पर अब जब प्रकृति ने दिया है तो फिर क्यों न करूं.’

शिखा को यह बात कभी समझ न आई कि जिन रिश्तेदारों ने कभी बुरे समय में उन का साथ तक न दिया, आज उन पर यों पैसे लुटाना कहां तक सही था. “शिखा, अपने कमरे में जाओ,” हिमांशु की आवाज सुन कर शिखा सोच की दलदल से बाहर निकल आई. पता नहीं क्यों एक अजीब सी जिद उस के मन में घर कर गई थी, आज वह बात कर के ही जाएगी.

“मां जी, गांव वाला मकान जर्जर हो गया है, उस घर से मेरा बहुत जुड़ाव है. बाबा-दादी की आखिरी निशानी है वह.”

“तो?” मां जी ने बड़े तल्ख स्वर में कहा.
शिखा अपनेआप को मजबूती बांधे से खड़ी हुई थी. हिमांशु हमेशा की तरह उसे अकेला छोड़ अपने परिवार के साथ खड़े थे. इन बीते सालों में शिखा इतना तो समझ ही चुकी थी कि आज वह खुद के लिए खड़ी नहीं हुई तो कोई भी उस के लिए खड़ा न होगा. वैसे भी, अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है. जानती थी वह कि यहां जो होगा, सो होगा. बंद कमरे में चारदीवारी के बीच महीनों तक शिखा और हिमांशु के मध्य एक शीत युद्ध भी चलता रहेगा. पर आज नहीं तो शायद वह कभी भी न कह पाएगी.

“मां जी, मैं…मैं उस घर की मरम्मत के लिए कुछ पैसा भेजना चाहती हूं?”

शिखा का गला सूख गया. पता नहीं अब कौन सा भूचाल आने वाला था. सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे अभी ही निगल जाएंगे.

“देख लो, क्या जमाना आ गया है. बहू बेशर्मों की तरह मायके के लिए पैसे मांग रही है. एक जमाना था लोग बेटी के घरों का पानी तक नहीं पीते थे और यह अपने मायके के लिए ससुराल से पैसे मांग रही है. तेरे भाई भी तो हैं, तेरे पापा उन से क्यों नहीं मांग लेते?”

“पापा ने उन से भी कहा था पर बड़े भैया के अपने ही बहुत सारे खर्चे हैं और छोटे वाले ने पहले ही अपने मकान के लिए लोन ले रखा है, इसलिए…”

“इसलिए, मतलब” यहां कोई पेड़ लगा है. कल बाप के मरने के बाद हिस्सा हथियाने तो सब से पहले चले आएंगे. एक बार भी नहीं सोचेंगे कि बहन का भी तो हक बनता है. जब उन्हें कोई चिंता नहीं तो तुम क्या हो, न तीन में न तेरह में. तुम काहे चिंता में गली जा रही.”

शिखा की अंतरात्मा शब्दों के बाणों से बुरी तरह छलनी हो चुकी थी पर बोली, “मां जी, बेटी का हक सिर्फ जीवनभर पाने का नहीं होता. नौ महीने तो उसे भी पेट में रखा होता है. फिर जिम्मेदारी के नाम पर यह भेदभाव क्यों? एक लड़की को जीवनभर यह समझाया जाता है कि उसे पराए घर जाना है पर वह पराया घर भी उसे ताउम्र पराया ही समझता है. जीवन गुजर जाता है एक लड़की को यह समझने में ही कि उस का अपना घर कौन सा है. आप भी तो इस घर की बहू हैं और मैं भी. पर हमारे अधिकारों और कर्तव्यों में यह भेद क्यों?

“आप खुलेहाथों से रिश्तेदारों, नौकरचाकर सभी को कुछ भी दे सकती हैं. आप से पूछने वाला कोई भी नहीं. पर जब बात बहू के मायके वालों की आती है तब दुनियादारी और संस्कार की बातें क्यों होने लगती हैं. क्या गरीब और जरूरतमंद सिर्फ सास या ससुराल के रिश्तेदार ही हो सकते हैं, बहू के नहीं. अगर गलती से बहू का मायके का कोई रिश्तेदार कमजोर हो तो बहू पूरे परिवार के लिए हंसी का पात्र क्यों हो जाती है. भाई की पढ़ाई के लिए पापा ने कैसेकैसे इंतजाम किए थे, हिमांशु से कुछ भी नहीं छिपा है. पर किसी ने एक बार भी यह जानने या समझने की कोशिश की कि इस के परिवार को भी कभी जरूरत पड़ सकती है. अब तो मायके की जमीनजायदाद में लड़कियों की भी हिस्सेदारी होती है. तो फिर मायके की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों में हिस्सेदारी क्यों नहीं?”

शिखा अपनी ही धुन में बोले जा रही थी, “वर्षों से जमा कितनाकुछ उस ने सब के सामने उड़ेल कर रख दिया था. जेठानियां आश्चर्य से उसे देख रही थीं. मां जी धप्प की आवाज के साथ सोफे पर बैठ गईं. एक अजीब सी नफरत उस ने उन की आंखों में महसूस की. सच सभी को पसंद होता बशर्ते वह सच खुद का न हो.

घर में एक गहरा सन्नाटा पसर गया, इतना गहरा कि अपनी सांसें भी सुनाई पड़ जाएं. शब्द कहीं खो से गए थे. इतने वर्षों में शब्द तो यदाकदा चुभते ही रहते थे पर आज सब का मौन बुरी तरह चुभ गया था. किसी के पास जवाब न था और शायद इस सवाल का जवाब कभी मिले भी न. हम जीवनभर इस बात के लिए लड़ते हैं कि सही कौन है. पर सही क्या है, क्या किसी ने कभी यह सोचा. लोग कहते हैं, औरत है तो घर घर है. पर क्या उस घर के फैसले भी? समझना आसान है पर समझाना कठिन.

शिखा भरे दिल और भरे कदमों से चुपचाप अपने कमरे में चली गई. Family Story In Hindi 

Social Story : खरीदी हुई दुल्हन – मंजू को किस बात का डर था ?

Social Story : 38 साल के अनिल का दिल अपने कमरे में जाते समय 25 साल के युवा सा धड़क रहा था. आने वाले लमहों की कल्पना ही उस की सांसों को बेकाबू किए दे रही थी, शरीर में झुरझुरी सी पैदा कर रही थी. आज उस की सुहागरात है. इस रात को उस ने सपनों में इतनी बार जिया है कि इस के हकीकत में बदलने को ले कर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा.

बेशक वह मंजू को पैसे दे कर ब्याह कर लाया है, तो क्या हुआ? है तो उस की पत्नी ही. और फिर दुनिया में ऐसी कौन सी शादी होती होगी जिस में पैसे नहीं लगते. किसी में कम तो किसी में थोड़े ज्यादा. 10 साल पहले जब छोटी बहन वंदना की शादी हुई थी तब पिताजी ने उस की ससुराल वालों को दहेज में क्या कुछ नहीं दिया था. नकदी, गहने, गाड़ी सभी कुछ तो था. तो क्या इसे किसी ने वंदना के लिए दूल्हा खरीदना कहा था. नहीं न. फिर वह क्यों मंजू को ले कर इतना सोच रहा था. कहने दो जिसे जो कहना था. मुझे तो आज रात सिर्फ अपने सपनों को हकीकत में बदलते देखना है. दुनिया का वह वर्जित फल चखना है जिसे खा कर इंसान बौरा जाता है. मन में फूटते लड्डुओं का स्वाद लेते हुए अनिल ने सुहागरात के लिए सजाए हुए अपने कमरे में प्रवेश किया.

अब तक उस ने जो फिल्मों और टीवी सीरियल्स में देखा था उस के ठीक विपरीत मंजू बड़े आराम से सुहागसेज पर बैठी थी. उस के शरीर पर शादी के जोड़े की जगह पारदर्शी नाइटी देख कर अनिल को अटपटा सा लगा क्योंकि उस का तो यह सोचसोच कर ही गला सूखे जा रहा था कि वह घूंघट उठा कर मंजू से बातों की शुरुआत कैसे करेगा. मगर यहां का माहौल देख कर तो लग रहा है जैसे कि मंजू तो उस से भी ज्यादा उतावली हो रही है.

अनिल सकुचाया सा बैड के एक कोने में बैठ गया. मंजू थोड़ी देर तो अनिल की पहल का इंतजार करती रही, फिर उसे झिझकते देख कर खुद ही उस के पास खिसक आई और उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया. यंत्रवत से अनिल के हाथ मंजू के इर्दगिर्द लिपट गए. मंजू ने अपनेआप को हलका सा धक्का दिया और वे दोनों ही बैड पर लुढ़क गए. मंजू ने अनिल के ऊपर झुकते हुए उस के होंठ चूमने शुरू कर दिए तो अनिल बावला सा हो उठा. उस के बाद तो अनिल को कुछ भी होश नहीं रहा. प्रकृति ने जैसे उसे सबकुछ एक ही लमहे में सिखा दिया.

मंजू ने उसे चरम तक पहुंचाने में पूरा सहयोग दिया था. अनिल का यह पहला अनुभव ऐसा था जैसे गूंगे को गुड़ का स्वाद, जिस के स्वाद को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं. एक ही रात में अनिल तो जैसे जोरू का गुलाम ही हो गया था. आज मंजू ने उसे वह तोहफा दिया था जिस के सामने सारी बादशाहत फीकी थी.

सुबह अनिल ने बेफिक्री से सोती हुई मंजू को नजरभर कर देखा. सबकुछ सामान्य ही था उस में. कदकाठी, रंगरूप और चेहरामोहरा सभी कुछ. मगर फिर भी रात जो खास बात हुई थी उसे याद कर के अनिल मन ही मन मुसकरा दिया और सोती हुई पत्नी को प्यार से चूमता हुआ कमरे से बाहर निकल गया.

मंजू जैसी भी थी, अनिल से तो इक्कीस ही थी. अनिल का गहरा सांवला रंग, मुटाया हुआ सा शरीर, कम पढ़ाईलिखाई सभीकुछ उस की शादी में रोड़ा बने हुए थे. अब तो सिर के बाल भी सफेद होने लगे थे. बहुत कोशिशों के बाद भी जब जानपहचान और अपनी बिरादरी में अनिल के रिश्ते की बात नहीं जमी तो उस की बढ़ती हुई उम्र को देखते हुए उस की बूआ ने उस की मां को सलाह दी कि अगर अपने समाज में बात नहीं बन रही है तो किसी गरीब घर की गैरबिरादरी की लड़की के बारे में सोचने में कोई बुराई नहीं है. और तो और, आजकल तो लोग पैसे दे कर भी दुलहन ला रहे हैं. बूआ की बात से सहमत होते हुए भी अनिल की मां ने एक बार उस की कुंडली मंदिर वाले पंडितजी को दिखाने की सोची.

पंडितजी ने कुंडली देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘बहनजी, शादी का योग तो हर किसी की कुंडली में होता ही है. किसीकिसी की शादी जल्दी तो किसी की थोड़ी देर से, मगर समझदार लोग आजकल कुंडली के फेर में नहीं पड़ते. आप तो कोई ठीकठाक सी लड़की देख कर बच्चे का घर बसा दीजिए. चाहे कुंडली मिले या न मिले. बस, लड़की मिल जाए और शादी के बाद दोनों के दिल.’’

अनिल की मां को बात समझ में आ गई और उन्होंने अपने मिलने वालों व रिश्तेदारों के बीच में यह बात फैला दी कि उन्हें अनिल के लिए किसी भी जातबिरादरी की लड़की चलेगी. बस, लड़की संस्कारी और दिखने में थोड़ी ठीकठाक हो.

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. एक दिन अनिल की मां से मिलने एक व्यक्ति आया जो शादियां करवाने का काम करता था. उसी ने उन्हें मंजू के बारे में बताया और अनिल से उस की शादी करवाने के एवज में 20 हजार रुपए की मांग की. अनिल अपनी मां और बूआ के साथ मंजू से मिलने उस के घर गया. बेहद गरीब घर की लड़की मंजू अपने 5 भाईबहनों में तीसरे नंबर पर थी. उस से छोटा एक भाई और भाई से छोटी एक बहन रीना. मंजू की 2 बड़ी बहनें भी उस की ही तरह खरीदी गई थीं.

25 साल की युवा मंजू उम्र में अनिल से लगभग 12-13 साल छोटी थी. एक कमरे के छोटे से घर में इतने प्राणी कैसे रहते होंगे, यह सोच कर ही अनिल हैरान हो रहा था. उसे तो यह सोच कर हंसी आ रही थी कि कैसी परिस्थितियों में ये बच्चे पैदा हुए होंगे.

खैर, मंजू को देखने के बाद अनिल ने शादी के लिए हां कर दी. अब यह तय हुआ कि शादी का सारा खर्चा अनिल का परिवार ही उठाएगा और साथ ही, मंजू के परिवार को 2 लाख रुपए भी दिए जाएंगे ताकि उन का जीवनस्तर कुछ सुधर सके. 50 हजार रुपए एडवांस दे कर अनिल और मंजू की शादी का सौदा तय हुआ और जल्दी ही घर के 4 जने जा कर मंजू को ब्याह लाए. बिना किसी बरात और शोरशराबे के मंजू उस की पत्नी बन गई.

मंजू निम्नवर्गीय घर से आई थी, इसलिए अनिल के घर के ठाटबाट देख कर वह भौचक्की सी रह गई. बेशक उस का स्वागत किसी नववधू सा नहीं हुआ था मगर मंजू को इस का न तो कोई अफसोस था और न ही उस ने कभी इस तरह का कोई सपना देखा था. बल्कि वह तो इस घर में आ कर फूली नहीं समा रही थी. जितना खाना उस के मायके में दोनों वक्त बनता था उतना तो यहां एक वक्त के खाने में बच जाता है और कुत्तों को खिलाया जाता है. ऐसेऐसे फल और मिठाइयां उसे यहां देखने और खाने को मिल रहे थे जिन के उस ने सिर्फ नाम ही सुने थे, देखे और चखे कभी नहीं.

‘अगर मैं अनिल के दिल की रानी बन गई तो फिर घर की मालकिन बनने से मुझे कोई नहीं रोक सकता’, मंजू ने मन ही मन सोच लिया कि आखिरकार उसे घर की सत्ता पर कब्जा करना ही है.

‘सुना था कि पुरुष के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. नहीं. पेट से हो कर नहीं, बल्कि उस की भूख की आनंददायी संतुष्टि से हो कर जाता है. फिर भूख चाहे पेट की हो, धन की हो या फिर शरीर की हो. यदि मैं अनिल की भूख को संतुष्ट रखूंगी तो वह निश्चित ही मेरे आगेपीछे घूमेगा. और फिर, तू मेरा राजा, मैं तेरी रानी, घर की महारानी’, यह सोचसोच कर मंजू खुद ही अपने दिमाग की दाद देने लगी.

‘बनो दिल की रानी’ अपने इस प्लान के मुताबिक, मंजू रोज दिन में 2 बार अनिल को ‘आई लव यू स्वीटू’ का मैसेज भेजने लगी. लंचटाइम में उसे फोन कर के याद दिलाती कि खाना टाइम पर खा लेना. वह शाम को सजधज कर अनिल को उस के इंतजार में खड़ी मिलती.

रात के खाने में भी वह अनिल को गरमागरम फुल्के अपने हाथ से बना कर ही खिलाती थी चाहे उसे घर आने में कितनी भी देर क्यों न हो जाए और खुद भी उस के साथ ही खाती थी. यानी हर तरह से अनिल को यह महसूस करवाती थी कि वह उस की जिंदगी में सब से विशेष व्यक्ति है. और हर रात वह अनिल को अपने क्रियाकलापों से खुश करने की पूरी कोशिश करती थी. उस ने कभी अनिल को मना नहीं किया बल्कि वह तो उसे प्यार करने को प्रोत्साहित करती थी. उम्र में छोटी होने के कारण अनिल उसे बच्ची ही समझता था और उस की हर नादानी को नजरअंदाज कर देता था.

कहने को तो अनिल अपने मांबाप का इकलौता बेटा था मगर कम पढ़ेलिखे होने और अतिसाधारण शक्लसूरत के कारण अकसर लोग उसे कोई खास तवज्जुह नहीं दिया करते थे. वहीं, उस की शादी भी नहीं हो रही थी. सो, अनिल हीनभावना का शिकार होने लगा था. मगर मंजू ने उसे यह एहसास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह कितना काबिल और खास इंसान है बल्कि वह तो कहती थी कि अनिल ही उस की सारी दुनिया है.

मंजू के साथ और प्यार से अनिल का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा. मंजू को पा कर अनिल ऐसे खुश था जैसे किसी भूखे व्यक्ति को हर रोज भरपेट स्वादिष्ठ भोजन मिलने लगा हो.

एक दिन मंजू की मां का फोन आया. वे उस से मिलना चाह रही थीं. रात में मंजू ने अनिल की शर्ट के बटन खोलते हुए अदा से कहा, ‘‘मुझे कुछ रुपए चाहिए. मां ने मिलने के लिए बुलाया है. पहली बार जा रही हूं. अब इतने बड़े बिजनैसमैन की पत्नी हूं, खाली हाथ तो नहीं जा सकती न.’’

‘‘तो मां से ले लो न,’’ अनिल ने उसे पास खींचते हुए कहा.

‘‘मां से क्यों? मैं तो अपने हीरो से ही लूंगी. वह भी हक से,’’ कहते हुए मंजू ने अनिल के सीने पर अपना सिर टिका दिया.

‘‘कितने चाहिए? अभी ये रखो. और चाहिए तो कल दे दूंगा,’’ अनिल ने निहाल होते हुए उसे 20 हजार रुपए थमा दिए और फिर मंजू को बांहों में कसते हुए लाइट बंद कर दी.

मंजू 15 दिनों के लिए मायके गईर् थी. मगर 5 दिनों बाद ही अनिल को उस की याद सताने लगी. मंजू की शहदभरी बातें और मस्तीभरी शरारतें उसे रातभर सोने नहीं देतीं. उस ने अगले ही दिन मंजू का तत्काल का टिकट बनवा कर आने के लिए कह दिया. मंजू भी जैसे आने के लिए तैयार ही बैठी थी. उस के वापस आने के बाद अनिल की दीवानगी उस के लिए और भी बढ़ गई. अब मंजू हर महीने अनिल से

10-15 हजार रुपए ले कर अपने मायके भेजने लगी. मंजू ने अनिल से उस का एटीएम कार्ड नंबर और पिन आदि ले लिया. जिस की मदद से वह अपनी बहनों और भाई के लिए कपड़े, घरेलू सामान आदि भी औनलाइन और्डर कर के भेज देती. मंजू के प्यार का नशा अनिल के सिर चढ़ कर बोलने लगा था. ‘सैयां भए कोतवाल तो अब डर काहे का.’ घर में मंजू का ही हुक्म चलने लगा.

बेटे की इच्छा को देख अनिल की मां को न चाहते हुए भी तिजोरी की चाबियां बहू को देनी पड़ीं. सामाजिक लेनदेन आदि भी सबकुछ उसी की सहमति या अनुमति से होता था. अनिल की मां उसे कुछ नहीं कह पाती थीं क्योंकि मंजू ने उन्हें भी यह एहसास करवा दिया था कि उस ने अनिल से शादी कर के अनिल सहित उन के पूरे परिवार पर एहसान किया है.

‘‘सुनिए न, मेरी बड़ी इच्छा है कि मेरा नाम हर जगह आप के नाम के साथ जुड़ा हो,’’ एक दिन मंजू ने अनिल से बड़े ही अपनेपन से कहा.

‘‘अरे, इस में इच्छा की क्या बात है? वह तो जुड़ा ही है. देखो, तुम मेरी अर्धांगिनी हो यानी मेरा आधा हिस्सा. इस नाते मेरी हर चलअचल संपत्ति पर तुम्हारा आधा हक हुआ न,’’ अनिल ने प्यार से मंजू को समझाया.

‘‘वह तो ठीक है, मगर यह सब अगर कानूनी रूप से भी हो जाता तो कितना अच्छा होता. मगर उस में तो कई पेंच होंगे न. चलो, रहने दो. बिना मतलब आप परेशान हो जाएंगे,’’ मंजू ने बालों की लट को उंगलियों में लपेटते हुआ कहा.

‘‘मेरी जान, मेरे तन, मन और धन… सब की मालकिन हो तुम,’’ अनिल ने उसे बांहों में भरते हुए कहा और फिर एक दिन वकील और सीए को बुला कर अपने घरदुकान, बैंक अकाउंट व अन्य चलअचल प्रौपर्टी में मंजू को कानूनन अपना उत्तराधिकारी बना दिया.

इधर एक बच्चे की मां बन कर जहां मंजू ने अनिल के खानदान को वारिस दे कर सदा के लिए उसे अपना कर्जदार बना लिया वहीं मां बनने के बाद मंजू के रूप और यौवन में आए निखार ने अनिल की रातों की नींद उड़ा दी. अनिल को अब अपनी ढलती उम्र का एहसास होने लगा था. वह यह महसूस करने लगा था कि अब उस में पहले वाली ऊर्जा नहीं रही और वह मंजू की शारीरिक जरूरतें पहले की तरह पूरी नहीं कर पाता. अपनी इस गिल्ट को दूर करने के लिए वह मंजू की हर भौतिक जरूरत पूरी करने की कोशिश में लगा रहता. अनिल आंख बंद कर के मंजू की हर बात मानने लगा था.

मंजू बेशक अनिल की प्रौपर्टी की मालकिन बन गई थी मगर उस ने भी अपने दिल का मालिक सिर्फ और सिर्फ अनिल को ही बनाया था. वह यह बात कभी नहीं भूल सकी थी कि जब उस के आसपड़ोस के लोेग उसे ‘खरीदी हुई दुलहन’ कह कर हिकारत से देखते थे तब यही अनिल कैसे उस की ढाल बन कर सामने खड़ा हो जाता था और उसे दुनिया की चुभती हुई निगाहों से बचा कर अपने दिल में छिपा लेता था. उस की सास ने उसे कभी अपने खानदान की बहू जैसा सम्मान नहीं दिया था मगर फिर भी अपनी स्थिति से आज वह खुश थी.

उस ने बहुत ही योजनानुसार अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल लिया था. मंजू ने मोमबत्ती की तरह खुद को जला कर अपने परिवार को रोशन कर दिया था. मंजू ने दुकान के काम में मदद करने के लिए अपने भाई को अपने पास बुला लिया. इसी बीच अनिल की मां चल बसीं, तो अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए मंजू ने अपने मांपापा और छोटी बहन रीना को भी अपने पास ही बुला लिया.

एक दिन वही दलाल अनिल के घर आया जिस ने मंजू से उस की शादी करवाई थी. रीना को देखते ही उस की मां से बोला, ‘‘क्या कीमत लगाओगे लड़की की? किसी को जरूरत हो तो बताना पड़ेगा न?’’

‘‘मेरी बहन किसी की खरीदी हुई दुलहन नहीं बनेगी,’’ मंजू ने फुंफकारते हुए कहा.

‘‘खरीदी हुई दुलहन, बड़ी जल्दी पर निकल आए. अपनी शादी का किस्सा भूल गई क्या?’’ दलाल ने मंजू पर ताना कसते हुए मुंह बनाया.

‘‘मेरी बात और थी. मैं तो बिना सहारे की बेल थी जिसे किसी न किसी पेड़ से लिपटना ही था. मगर रीना के साथ ऐसा नहीं है. देर आए दुरुस्त आए. कुदरत ने उसे अनिल के रूप मे सिर पर छत दे दी है और पांवों के नीचे जमीन भी. अभी मैं जिंदा हूं और अपनी बहन की शादी कैसे करनी है, यह हम खुद तय कर लेंगे. आप जा सकते हैं. लेकिन हां, अनिल को मेरी जिंदगी में लाने के लिए मैं सदा आप की कर्जदार रहूंगी, धन्यवाद,’’ मंजू ने दलाल से हाथ जोड़ते हुए आभार जताया. वहीं पीछे खड़ा अनिल मुसकरा रहा था. आज उस के दिल में मंजू के लिए प्यार के साथसाथ इज्जत भी बढ़ गई थी. Social Story 

Romantic Story In Hindi : ऐ दिल संभल जा – रीमा को किस बात की चिंता हो रही थी ?

Romantic Story In Hindi : रीमा की आंखों के सामने बारबार डाक्टर गोविंद का चेहरा घूम रहा था. हंसमुख लेकिन सौम्य मुखमंडल, 6 फुट लंबा इकहरा बदन और इन सब से बढ़ कर उन का बात करने का अंदाज. उन की गंभीर मगर चुटीली बातों में बहुत वजन होता था, गहरी दृष्टि और गजब की याददाश्त. एक बार किसी को देख लें तो फिर उसे भूलते नहीं. उन  की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के गुण सभी गाते थे. उम्र 50 वर्ष के करीब तो होगी ही लेकिन मुश्किल से 35-36 के दिखते थे. रीमा बारबार अपना ध्यान मैगजीन पढ़ने में लगा रही थी लेकिन उस के खयालों में डाक्टर गोविंद आजा रहे थे.

रीमा ने जैसे ही पन्ना पलटा, फिर डाक्टर गोविंद का चेहरा सामने आ गया जैसे हर पन्ने पर उन का चेहरा हो वह हर पन्ने के बाद यही सोचती कि अब नहीं सोचूंगी उन के बारे में.

‘‘रीमा, जरा इधर आना,’’ रमा की मम्मी किचन से चिल्लाई.

‘‘अभी आई,’’ कहती हुई रीमा मैगजीन रख कर किचन में आ गई.

‘इस लड़की ने जब से कालेज में दाखिला लिया है, इस का दिमाग न जाने कहां रहता है’ मम्मी बड़बड़ा रही थी.

रीमा मैनेजमैंट का कोर्स कर रही है. मम्मी उसे कालेज भेजना ही नहीं चाहती थी. वह हमेशा चिल्लाती रहती कि 20वां चल रहा है, इस के हाथ पीले कर दो, लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने से क्या लाभ.

रीमा की जिद और पापा के सपोर्ट की वजह से उस का दाखिला कालेज में हुआ. मम्मी कम पढ़ीलिखी थी. उन का पढ़ाई पर जोर कम ही था. मम्मी की बातों से रीमा कुढ़ती रहती. और जब से उस ने डाक्टर गोविंद को देखा है, उसे और कुछ दिखता ही नहीं.

डाक्टर गोविंद जब क्लास ले रहे होते, रीमा सिर्फ उन्हें ही देखती रह जाती. वे किस टौपिक पर चर्चा कर रहे हैं, इस की भी सुध उसे कई बार नहीं होती. यह तो शुक्र था उस के सहपाठी अमित का, जो बाद में उस की मदद करता, अपने नोट्स उसे दे देता और यदि कोई टौपिक उस की समझ में नहीं आता तो वह उसे समझा भी देता.

वैसे रीमा खुद भी तेज थी. कोई चीज उस की नजरों से एक बार गुजर जाती, उसे वह कभी नहीं भूलती. डाक्टर गोविंद भी उस की तारीफ करते. उन के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर रीमा को बहुत अच्छा लगता. शर्म से उस की नजरें झुक जातीं. उसे ऐसा लगता कि डाक्टर गोविंद सिर्फ उसे ही देख रहे हैं. उस के चेहरे को पढ़ रहे हैं.

डाक्टर गोविंद रीमा के रोल मौडल बन गए. वह हर समय उन की तारीफ करती रहती. कोई स्टूडैंट उन के खिलाफ कुछ कहना चाहता तो वह एक शब्द न सुनती. एक दिन उस की सहेली सुजाता ने यों ही कह दिया, ‘गोविंद सर कुछ स्टूडैंट्स पर ज्यादा ही ध्यान देते हैं.’ बस, इतनी सी बात पर रीमा उस से झगड़ पड़ी. उस से बात करनी बंद कर दी.

रीमा भावनाओं में बह रही थी. उस ने डाक्टर गोविंद को समझने की कोशिश भी नहीं की. उन के दिल में अपने सभी छात्रों के लिए समान स्नेह था. वे सभी को प्रोत्साहित करते और जहां जरूरत होती, प्रशंसा करते. यह सब रीमा को नजर नहीं आता. वह कल्पनालोक की सैर करती रहती. उसे हर पल, चारों ओर डाक्टर गोविंद ही नजर आते.

उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने दिल की बात डाक्टर गोविंद को जरूर बताएगी. कल वे मेरी ओर देख कर कैसे मुसकरा रहे थे. वे भी उस में दिलचस्पी लेते हैं. उस से अधिक बातें करते हैं. अगर वे मुझे पसंद नहीं करते तो क्यों सिर्फ मुझे नोट्स देने के बहाने बुलाते. देर तक मुझ से बातें करते रहते. शायद वे मुझ से अपनी चाहत का इजहार करना चाहते हैं लेकिन संकोचवश कर नहीं पाते.

रीमा को रातभर नींद नहीं आई, उनींदी में रात काटी और सुबह समय से पहले कालेज पहुंच गई. क्लास शुरू होने में अभी देर थी. मैरून कलर की कमीज, चूड़ीदार पजामा और गले में मैचिंग दुपट्टा डाले रीमा गजब की खूबसूरत लग रही थी. वह चहकती हुई सीढि़यां चढ़ रही थी. डाक्टर गोविंद अपनी क्लास ले कर उतर रहे थे. ‘‘अरे रीमा, तुम आ गई.’’

‘‘नमस्ते सर,’’ कहते हुए रीमा झेंप गई.

‘‘यह लो,’’ उन्होंने अपने हाथ में लिया गुलाब का फूल रीमा की ओर बढ़ा दिया.

‘‘थैंक्यू सर,’’ कह कर रीमा जल्दीजल्दी सीढि़यां चढ़ गई. वह क्लास में जा कर ही रुकी. उस की सांसें तेजतेज चल रही थी. वह बैंच पर बैठ गई. गुलाब का फूल देखदेख बारबार उस के होंठों पर मुसकराहट आ रही थी. उसे लगा उस का सपना साकार हो गया. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी अमित आ गया.

‘‘अकेली बैठी यहां क्या कर रही हो? अरे, गुलाब का फूल. बहुत खूबसूरत है. मेरे लिए लाई हो तो दो न. शरमा क्यों रही हो?’’ अमित ने गुलाब छूने के लिए हाथ बढ़ाया.

रीमा बिफर पड़ी. ‘‘यह क्या तरीका है? ऐसे क्यों बिहेव कर रहे हो, जंगली की तरह.’’

‘‘अरे, तुम्हें क्या हो गया? मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं किया. वैसे, बिहेवियर तो तुम्हारा बदला हुआ है. कहां खोई रहती हैं मैडम आजकल?’’

‘‘सौरी अमित, पता नहीं मुझे क्या हुआ अचानक…’’

‘‘अच्छा, छोड़ो इन बातों को. सैमिनार हौल में चलो.’’

‘‘क्यों? अभी तो गोविंद सर की क्लास है.’’

‘‘अरे पागल, गोविंद सर अब क्लास नहीं लेंगे. वे आज ही यहां से जा रहे हैं. उन का दिल्ली यूनिवर्सिटी में वीसी के पद पर चयन हुआ है. सभी लोग हौल में जमा हो रहे हैं. उन का विदाई समारोह है. उठो, चलो.’’

रीमा की समझ में कुछ नहीं आया. वह सम्मोहित सी अमित के पीछेपीछे चल प. सैमिनार हौल में छात्र जमा थे. रीमा को आश्चर्य हो रहा था कि इतना कुछ हो गया, उसे पता ही नहीं चला. वह कल्पनालोक में विचरती रही और हकीकत में उस का सारा नाता टूटता गया.

वह इन्हीं विचारों में मग्न थी कि गोविंद सर की बातों ने उस का ध्यान भंग किया.

‘‘मैं भले ही यहां से जा रहा हूं लेकिन चाहता हूं कि जीवन में किसी मोड़ पर कोई स्टूटैंट मुझे मिले तो वह तरक्की की नई ऊंचाई पर मिले. एक छात्र का एकमात्र उद्देश्य अपनी मंजिल पाना होना चाहिए. अन्य बातों को उसे नजरअंदाज कर के आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि एक बार मन भटका, तो फिर अपना लक्ष्य पाना अत्यंत मुश्किल हो जाता है. मेरे लिए सभी छात्र मेरी संतान के समान हैं. मैं चाहता हूं कि सभी खूब पढ़ें और अपना व अपने मातापिता का नाम रोशन करें.’’

तालियों की गड़गड़ाहट में उन की आवाज दब गई. सभी उन्हें विदा करने को खड़े थे. कई  छात्रों की आंखें नम थीं लेकिन होंठों पर मुसकराहट तैर रही थी. डाक्टर गोविंद के शब्दों में जाने क्या जादू था कि रीमा भी नम आंखों और होंठों पर मुसकराहट लिए अपना हाथ हिला रही थी. गुलाब का फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा था. Romantic Story In Hindi

Family Story – व्यावहारिक दीपाली – सेल्सगर्ल की क्या थी कहानी ?

Family Story : दी पाली की याद आते ही आंखों के सामने एक सुंदर और हंसमुख चेहरा आ जाता है. गोल सा गोरा चेहरा, सुंदर नैननक्श, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और होंठों पर सदा रहने वाली हंसी.

असम आए कुछ ही दिन हुए थे. शहर से बाहर बनी हुई उस सरकारी कालोनी में मेरा मन नहीं लगता था. अभी आसपड़ोस में भी किसी से इतना परिचय नहीं हुआ था कि उन के यहां जा कर बैठा जा सके.

एक दोपहर आंख लगी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने कुछ खिन्न हो कर दरवाजा खोला तो सामने एक सुंदर और स्मार्ट सी असमी युवती खड़ी थी. हाथ में बड़ा सा बैग, आंखों पर चढ़ा धूप का चश्मा, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती, वह बड़े ही अपनेपन से मुसकराती हुई भीतर की ओर बढ़ी.

कुरसी पर बैठते हुए उस ने कहा, ‘‘आप नया आया है न?’’ तो मैं चौंकी फिर उस के बाद जो भी हिंदीअसमी मिश्रित वाक्य उस ने कहे वह बिलकुल भी मेरे पल्ले नहीं पड़े. लेकिन उस का व्यक्तित्व इतना मोहक था कि उस से बातें करना हमेशा अच्छा लगता था. उस की बातें सुन कर मैं ने पूछा, ‘‘आप सूट सिलती हैं?’’

‘‘हां, हां,’’ वह उत्साह से बोली तो एक सूट का कपड़ा मैं ने ला कर उसे दे दिया.

‘‘अगला वीक में देगा,’’ कह कर वह चली गई.

यही थी दीपाली से मेरी पहली मुलाकात. पहली ही मुलाकात में उस से एक अपनेपन का रिश्ता जुड़ गया. उस से मिल कर लगा कि पता नहीं कब से उसे जानती थी. यह दीपाली के व्यवहार, व्यक्तित्व का ही असर था कि पहली मुलाकात में बिना उस का नामपता पूछे और बिना रसीद मांगे हुए ही मैं ने अपना महंगा सूट उसे थमा दिया था. आज तक किसी अजनबी पर इतना विश्वास पहले नहीं किया था.

वह तो मीरा ने बाद में बताया कि उस का नाम दीपाली है और वह एक सेल्सगर्ल है. कितना सजधज कर आती है न. कालोनी की औरतों को दोगुने दाम में सामान बेच कर जाती है. मैं तो उसे दरवाजे से ही विदा कर देती हूं. दीपाली के बारे में ज्यादातर औरतों की यही राय थी.

मैं ने कभी दीपाली को मेकअप किए हुए नहीं देखा. सिर्फ एक लाल बिंदी लगाने पर भी उस का चेहरा दमकता रहता था. उस का हर वक्त खिल- खिलाना, हर किसी से बेझिझक बातें करना और व्यवहार में खुलापन कई लोगों को शायद खलता था. पर मस्तमौला सी दीपाली मुझे भा गई और जल्द ही वह भी मुझ से घुलमिल गई.

उस के स्वभाव में एक साफगोई थी. उस का मन साफ था. जितना अपनापन उस ने मुझ से पाया उस से कई गुना प्यार व स्नेह उस ने मुझे दिया भी.

‘आप इतना सिंपल क्यों रहता है?’ दीपाली अकसर मुझ से पूछती. काफी कोशिश करने पर भी मैं स्त्रीलिंगपुल्ंिलग का भेद उसे नहीं समझा पाई थी, ‘कालोनी में सब लेडीज लोग कितना मेकअप करता है, रोज क्लब में जाता है. मेरे से कितना मेकअप का सामान खरीदता है.’

अकसर लेडीज क्लब की ओर जाती महिलाओं के काफिले को अपनी बालकनी से मैं भी देखती थी. मेकअप से लिपीपुती, खुशबू के भभके छोड़ती उन औरतों को देख कर मैं सोचती

कि कैसे सुबह 10 बजे तक इन का काम निबट गया होगा, खाना बन गया होगा और ये खुद कैसे तैयार हो गई होंगी.

दीपाली ने एक बार बताया था, ‘आप नहीं जानता. ये लेडीज लोग सब अच्छाअच्छा साड़ी पहन कर, मेकअप कर के क्लब चला जाता है और पीछे सारा घर गंदा पड़ा रहता है. 1 बजे आ कर जैसेतैसे खाना बना कर अपने मिस्टर लोगोें को खिलाता है. 4 नंबर वाली का बेटाबेटी मम्मी के जाने के बाद गंदी पिक्चर देखता है.’

मुझे दीपाली का इंतजार रहता था. मैं उस से बहुत ही कम सामान खरीदती फिर भी वह हमेशा आती. उसे हमारा खाना पसंद आता था और जबतब वह भी कुछ न कुछ असमी व्यंजन मेरे लिए लाती, जिस में से चावल की बनी मिठाई ‘पीठा’  मुझे खासतौर पर पसंद थी. मैं उसे कुछ हिंदी वाक्य सिखाती और कुछ असमी शब्द मैं ने भी उस से सीखे थे. अपनी मीठी आवाज में वह कभी कोई असमी गीत सुनाती तो मैं मंत्रमुग्ध हो सुनती रह जाती.

हमेशा हंसतीमुसकराती दीपाली उस दिन गुमसुम सी लगी. पूछा तो बोली, ‘जानू का तबीयत ठीक नहीं है, वह देख नहीं सकता,’ और कहतेकहते उस की आंखों में आंसू आ गए. जानू उस के बेटे का नाम था. मैं अवाक् रह गई. उस के ठहाकों के पीछे कितने आंसू छिपे थे. मेरे बच्चों को मामूली बुखार भी हो जाए तो मैं अधमरी सी हो जाती थी. बेटे की आंखों का अंधेरा जिस मां के कलेजे को हरदम कचोटता हो वह कैसे हरदम हंस सकती है.

मेरी आंखों से चुपचाप ढलक कर जब बूंदें मेरे हाथों पर गिरीं तो मैं चौंक पड़ी. मैं देर तक उस का हाथ पकड़े बैठी रही. रो कर कुछ मन हलका हुआ तो दीपाली संभली, ‘मैं कभी किसी के आगे रोता नहीं है पर आप तो मेरा अपना है न.’

मेरे बहुत आग्रह पर दीपाली एक दिन जानू को मेरे घर लाई थी. दीपाली की स्कूटी की आवाज सुन मैं बालकनी में आ गई. देखा तो दीपाली की पीठ से चिपका एक गोरा सुंदर सा लगभग 8 साल का लड़का बैठा था.

‘दीपाली, उस का हाथ पकड़ो,’ मैं चिल्लाई पर दीपाली मुसकराती हुई सीढि़यों की ओर बढ़ी. जानू रेलिंग थामे ऐसे फटाफट ऊपर चला आया जैसे सबकुछ दिख रहा हो.

‘यह कपड़ा भी अपनी पसंद का पहनता है, छू कर पहचान जाता है,’ दीपाली ने बताया.

‘जानू,’ मैं ने हाथ थाम कर पुकारा.

‘यह सुन भी नहीं पाता है ठीक से और बोल भी नहीं पाता है,’ दीपाली ने बताया.

वह बहुत प्यारा बच्चा था. देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि उसमें इतनी कमियां हैं. जानू सोफा टटोल कर बैठ गया. वह कभी सोफे पर खड़ा हो जाता तो कभी पैर ऊपर कर के लेट जाता.

‘आप डरो मत, वह गिरेगा नहीं,’ दीपाली मुझे चिंतित देख हंसी. सचमुच सारे घर में घूमने के बाद भी जानू न गिरा न किसी चीज से टकराया.

जाते समय जानू को मैं ने गले लगाया तो वह उछल कर गोद में चढ़ गया. उस बेजबान ने मेरे प्यार को जैसे मेरे स्पर्श से महसूस कर लिया था. मेरी आंखें भर आईं. दीपाली ने उसे मेरी गोद से उतारा तो वह वैसे ही रेलिंग थामे सहजता से सीढि़यां उतर कर नीचे चला गया. दीपाली ने स्कूटी स्टार्ट की तो जा कर उस पर चढ़ गया और दोनों हाथों से मां की कमर जकड़ कर बैठ गया.

‘अब घर जा कर ही मुझे छोड़ेगा,’ दीपाली हंस कर बोली और चली गई.

मैं दीपाली के बारे में सोचने लगी. घंटे भर तक उस बच्चे को देख कर मेरा तो जैसे कलेजा ही फट गया था. हरदम उसे पास पा कर उस मां पर क्या गुजरती होगी, जिस के सीने पर इतना बोझ धरा हो. वह इतना हंस कैसे सकती है. जब दर्द लाइलाज हो तो फिर उसे चाहे हंस कर या रो कर सहना तो पड़ता ही है. दीपाली हंस कर इसे झेल रही थी. अचानक दीपाली का कद मेरी नजरों में ऊपर उठ गया.

एक दिन सुबहसुबह दीपाली आई. मेखला चादर में बहुत जंच रही थी. ‘आप हमेशा ऐसे ही अच्छी तरह तैयार हो कर क्यों नहीं आती हो?’ मैं ने प्रशंसा करते हुए कहा. इस पर दीपाली ने खुल कर ठहाका लगाया और बोली, ‘सजधज कर आएगा तो लेडीज लोग घर में नहीं घुसने देगा. उन का मिस्टर लोग मेरे को देखेगी न.’

मुझे तब मीरा की कही बात

याद आई कि दीपाली के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था जो औरतों में ईर्ष्या जगाता था.

‘मैं भाग कर शादी किया था. मैं ऊंचा जात का था न अपना आदमी

से. घर वाला लोग मानता नहीं था,’ दीपाली कभीकभी अपनी प्रेम कथा सुनाती थी.

जहां कालोनी में मेरी एकदो महिलाओं से ही मित्रता थी वहां दीपाली के साथ मेरी घनिष्ठता सब की हैरानी का सबब थी. जानू हमारे घर आता तो पड़ोसियों के लिए कौतूहल का विषय होता. एक स्थानीय असमी महिला से प्रगाढ़ता मेरे परिचितों के लिए आश्चर्यजनक बात थी.

जब दीपाली को पता चला कि हमारा ट्रांसफर हो गया है तो कई दिनों पहले से ही उस का रोना शुरू हो गया था, ‘आप चला जाएगा तो मैं क्या करेगा. आप जैसा कोई कहां मिलेगा,’ कहतेकहते वह रोने लगती. दीपाली जैसी सहृदय महिला के लिए हंसना जितना सरल था रोना भी उतना ही सहज था. दुख मुझे भी बहुत होता पर अपनी भावनाएं खुल कर जताना मेरा स्वभाव नहीं था.

आते समय दीपाली से न मिल पाने का अफसोस मुझे जिंदगी भर रहेगा. हमें सोमवार को आना था पर किन्हीं कारणवश हमें एक दिन पहले आना पड़ा. अचानक कार्यक्रम बदला. दोपहर में हमारी फ्लाइट थी. मैं सुबह से दीपाली के घर फोन करती रही. घंटी बजती  रही पर किसी ने फोन उठाया नहीं, शायद फोन खराब था. मैं जाने तक उस का इंतजार करती रही पर वह नहीं आई. भरे मन से मैं एअरपोर्ट की ओर रवाना हुई थी.

बाद में मीरा ने फोन पर बताया था कि दीपाली सोमवार को आई थी और हमारे जाने की बात सुन कर फूटफूट कर रोती रही थी. वह मुझे देने के लिए बहुत सी चीजें लाई थी, जिस में मेरा मनपसंद ‘पीठा’ भी था.

मैं ने कई बार फोन किया पर वह फोन शायद अब तक खराब पड़ा है. पत्र वह भेज नहीं सकती थी क्योंकि उसे न हिंदी लिखनी आती है न अंगरेजी और असमी भाषा मैं नहीं समझ पाती.

दीपाली का मेरी जिंदगी में एक खास मुकाम है क्योंकि उस से मैं ने हमेशा जीने की, मुसकराने की प्रेरणा पाई है. हमारे शहरों में बहुत ज्यादा दूरियां हैं पर अब भी वह मेरे दिल के बहुत करीब है और हमेशा रहेगी.  Family Story 

Obesity In India : देश में मोटापा बड़ी समस्या, आखिर क्या है उपचार जानिए विशेषज्ञों से

Obesity In India : दिल्ली में आईजेसीपी ग्रुप द्वारा आयोजित ओबेसिटास मिडटर्म 2025 सम्मेलन में, दक्षिण एशियाई मोटापा फोरम और एशियाई मोटापा जर्नल के सहयोग से, वहां मौजूद विशेषज्ञों ने मोटापे को एक दीर्घकालिक और बारबार लौटने वाली बीमारी के रूप में मान्यता देने और उस का गंभीर प्रबंधन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है.

उन्होंने कहा कि मोटापा भारत में गैर संक्रामक रोगों के संकट को बढ़ा रहा है, जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, जिगर की समस्याएं, प्रजनन जटिलताएं, श्वसन संबंधी समस्याएं और मानसिक व सामाजिक चुनौतियां. विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य प्रणाली और नीति निर्माताओं से इसे प्राथमिकता देने का आग्रह किया.

आईजेसीपी ग्रुप और मेडटौक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी निलेश अग्रवाल ने कहा, “मोटापा हमारे समय की प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती है. यह हर चिकित्सा क्षेत्र, हर परिवार और हर समुदाय को प्रभावित कर रहा है.”

वहां मौजूद डा. संजय कालरा, जो कि अंतरराष्ट्रीय एंडोक्रिनोलौजी सोसाइटी के शिक्षा कार्य समूह के अध्यक्ष हैं, ने कहा, “शिक्षा ही मोटापे की समस्या में बदलाव की नींव है. हमें चिकित्सकों को ऐसा ज्ञान उपलब्ध कराना चाहिए जो व्यावहारिक, सहज और सहानुभूतिपूर्ण हो.” और डा. दीना श्रेष्टा ने इसे एक दीर्घकालिक बीमारी बताया.
भारत समेत दुनियाभर में मोटापा बड़ी समस्या बन कर उभरा है. एनएफएचएस का डाटा बताता है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष का वजन सामान्य से अधिक है.

यूसीएमएस के एंडोक्रिनोलौजी विभाग के प्रमुख निशांत रायजादा, “हम विज्ञान और वास्तविक चिकित्सा अभ्यास के बीच पुल बना रहे हैं, जिस में पोषण संबंधी विज्ञान, आंत्रजीव विज्ञान, दवाओं का उपयोग और शस्त्रक्रिया शामिल हैं.”

वहीं प्रो. नितिन कपूर, एंडोक्रिनोलौजी विभाग, सीएमसी वेल्लोर ने छिपे हुए जोखिमों पर ध्यान दिलाया, उन्होंने कहा, “मांसपेशियों के नुकसान और अतिरिक्त वसा का संयोजन, यानी मांसपेशियों की कमजोरी के साथ मोटापा, अब विकलांगता का एक छिपा हुआ कारण बन रहा है. मोटापे की देखभाल में ताकत बनाए रखना, जटिलताओं को रोकना और दीर्घकालिक जीवन शक्ति सुनिश्चित करना जरूरी है.”

बता दें इस सम्मलेन में 400 से अधिक स्वस्थ्य पेशेवरों ने भाग लिया. जिसे में मोटापे के कारण, निदान और उपचार के पहलुओं पर चर्चा की गई. नई पद्धतियों पर चर्चा हुई. ख़ास बात इस में युवा शोधकर्ताओं के पेपर और पोस्टर का प्रस्तुतीकरण भी हुआ.  Obesity In India

Romantic Story In Hindi : प्यार के लम्हे – नारी के दुखों की दास्तान

Romantic Story In Hindi : व्यक्ति बढ़ती उम्र की दहलीज पर क्यों न खड़ा हो लेकिन मन में दबी प्यार की कसक, एहसास को हरदम महसूस करता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था.

फौज से रिटायर हो कर गांव आया तो मैं शरीर से स्वस्थ था. लेकिन मेरे हिस्से में आया बाऊजी का मकान जो जर्जर हो चुका था. उसे ठीक करवाने में 2 महीने लग गए. शुरू के 2 महीने मैं घर में ही व्यस्त रहा. मिस्त्री, मजदूरों से काम करवाना आसान न था. थोड़ा सा इधरउधर हो जाओ तो काम बंद हो जाता था.
2 महीने बाद जब मैं गांव में अपने खेतों के लिए निकला तो कई जानपहचान वाले पूछने लगे, ‘‘कब आए? ’’
2 महीने बताने पर वे हैरान होते. आज दिखाई दिए. मैं कहता, ‘‘मकान ठीक करवा रहा था.’’
मैं अपने खेतों की ओर निकल गया. फसल लहलहा रही थी. मैं यादों में खो गया.
तब मेरी उम्र शायद 16 साल की थी. भरपूर जवानी थी. हमारे खेतों के साथ वेदो के बापू के खेत थे. वेदो भी अपने बापू के साथ आ जाती थी. सुंदर और सजीली, दमकता गोरा रंग था. उस के बाएं गाल पर छोटा सा काला तिल था जो उस की सुंदरता को और बढ़ा देता था. बस थोड़ा सा मुंह टेढ़ा था. ध्यान से देखने पर पता चलता था. उस की उम्र भी मेरे जितनी थी.

मेरे साथ खेला करती थी. खेलतेखेलते उस के शरीर को छू लेना बहुत अच्छा लगता था. शायद उसे भी अच्छा लगता हो. वह कुछ नहीं बोलती थी, केवल मुसकराती रहती थी. जाने वे मस्तीभरे दिन कहां चले गए? आज भी उन्हें याद करता हूं तो रोमांचित हो उठता हूं.

मैं फौज में चला गया और वह मदीनपुर गांव में ब्याह दी गई. फिर वह मुझे कभी नहीं मिली. मैं आज भी उन दिनों की याद कर के सिहर उठता हूं. उस का शरीर बहुत गठीला था. हम दोनों पर हमेशा मस्ती छाई रहती थी.

मैं अपने खेत में खड़ा अब भी रोमांचित हो रहा था कि साथ के खेत में काम कर रहे वेदो के बापूजी ने आवाज दी, ‘‘फौजी साहब, कब छुट्टी पर आए और कब वापस जाना है? ’’
मैं ने कहा, ‘‘बापूजी, मैं पैंशन पर आ गया हूं. अब मुझे वापस नहीं जाना है. यहीं रह कर खेतों में काम करूंगा. ’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. खेतों की संभाल चंगी हो जाएगी. वैसे, गिरधारी बहुत अच्छा काम करता है.’’
‘‘जी बापूजी.’’
बातोंबातों में मैं ने वेदो के बारे में पूछा. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक ही होगी. उसे आए तो जमाना गुजर गया.’’
‘‘आप भी देखने नहीं गए?’’
‘‘गया था, एकदो बार देखने, फिर सोचा, लड़की है, उस के घर बारबार जाना ठीक नहीं है.’’
फिर वे जाने कहां खो गए थे. मैं समझ गया कि सबकुछ ठीक नहीं है. मैं ने कहा, ‘‘मदीनपुर में मेरी मौसी रहती है. मैं उस से मिलने जाऊंगा तो वेदो से मिलूंगा.’’
‘‘ठीक है, मिल लेना.’’
फिर वे अपने खेतों में काम करने लगे थे. मैं अपने दूसरे खेतों में चला आया. आसमान की ओर देखा तो बादल घिर आए थे. शायद बरसात आए. खेतों में ‘चैना’ यानी चावल लगे थे. बरसात की जरूरत भी थी, विशेषकर उन खेतों के लिए जिन के पास ट्यूबवैल नहीं थे.

मौसम सुहाना हो रहा था. खेत में बनाई झौंपड़ी तक पहुंचतेपहुंचते बारिश तेज हो गई थी. मैं भीग गया था. उस दिन भी ऐसी ही बारिश थी. वेदो बापूजी को रोटी दे कर मेरे पास झौंपड़ी में आ गई थी. पूरी तरह भीगी हुई थी. भीगने से उस का सारा शरीर निखर गया था. मैं उसे देखता ही रह गया था. मेरे ऐसा देखने पर वह शर्म से छुईमुई हो गई थी. बोली कुछ नहीं थी, केवल अपने शरीर को ढकती रही थी. उस दृश्य को याद कर के आज भी उस पर प्यार आ रहा था. प्यार के ऐसे लम्हे जीवन में फिर कभी नहीं मिले.

बारिश अपना जोर मार कर थम चुकी थी. दूर खेत में गिरधारी बारिश में भी काम करता रहा था. मैं उस के पास गया, पूछा, ‘‘क्या हो रहा है, गिरधारी?’’
‘‘चावल के खेत से घास निकाल रहा हूं.’’
‘‘और मजदूर मंगवा लेने थे.’’
‘‘बोला था, लेकिन बारिश के कारण नहीं आए. अब आ जाएंगे तो काम जल्दी हो जाएगा. तुसीं आराम करोजी. मैं सब कर लूंगा.’’
मैं घर आ गया. चंपा ने खाना बना रखा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘खाने में क्या बनाया है?’’
‘‘मक्की की रोटी और सरसों दा साग.’’
‘‘वाह, मजा आएगा. मक्की की रोटी का नाम सुन के भूख तेज हो गई है.’’
उस ने एक बड़ी मक्की की रोटी पर ही सरसों का साग डाल कर ऊपर काफी सारा मक्खन डाल दिया. गांवों में मक्की की रोटी को साग के साथ ऐसे ही खाते हैं. थाली नहीं लेते, चाहे, जमाना बदल गया है. खाने में कुछ नहीं बदला. दाल, चावल, महानी हाथ से ‘फुर्रे’ मार कर खाते हैं. खाते समय मुंह से ‘फुर्र’ की आवाज आनी चाहिए. जिस ने बनाया है उसे पता चलता है कि दाल, चावल, महानी स्वादिष्ठ बने हैं.
मक्की की रोटी बड़ी थी, साग भी बहुत स्वादिष्ठ बना था. एक रोटी में ही पेट भर गया था पर नीयत नहीं भरी थी. मैं ने चंपा से कहा, ‘‘सुबह ‘शाहवेले’ यानी नाश्ते में भी मक्की की रोटी
बना देना.’’
वह मुसकराई और किचन संभाल कर अपने घर चली गई.

मैं फिर अपने खयालों में खो गया. वेदो मेरे साथ स्कूल जाती थी, सिर्फ पढ़ाई की बातें होती थीं. पढ़ने में होशियार थी पर न जाने क्यों उसे मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ाया गया. पूछा तो बापूजी ने कहा, ‘‘आगे पढ़ कर क्या करेगी? घर का चूल्हाचौका ही तो संभालना है? उस की शादी कर
देनी है.’’
जाने क्यों लड़कियों को न पढ़ाने की मानसिकता आज भी गांवों में है. एक दिन मेरे पास आई और कहने लगी, ‘देखो, मेरे सुंदर कपड़े.’
भोलेपन से वह मुसकराई थी. मैं ने कहा, ‘तेरी शादी हो रही है?’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया और भाग गई थी. वह बहुत खुश थी. शादी के बाद हाथ की लकीरें बदल जाती हैं. कच्ची उम्र में, जिसे शादी का कुछ पता ही नहीं है, उस का जीवन कैसे होगा? मन में उठे इस प्रश्न का उत्तर आज भी नहीं पाता हूं. गांव में बहुत कम लड़कियां पढ़ पाती हैं.
सुबह उठा. अपने लिए चाय बनाई और सैर के लिए निकल गया. हमारी सैर की जगह हमारे खेत होते हैं. मैं घर के पास अपने खेत में गया तो वहां गरमी में उगाई जाने वाली सब्जियां लगी हुई थीं. चंपा वहां से सब्जियां तोड़ रही थी. अच्छा लगा. हम घर की ताजी सब्जियां खाते हैं. शहरों में ये दूरदूर तक नहीं मिलतीं.
चंपा ने पूछा, ‘‘यहां घीए बहुत लगे हैं और तुसी घीया खाते नहीं.’’
मैं ने कहा, ‘‘घीया नहीं खाता हूं, इस के कोफ्ते बना कर सब्जी बना लो,
खा लूंगा.’’
‘‘ठीक है जी, आज बनाती हूं.’’
‘‘पता है न, कैसे बनाते हैं?’’
‘‘हां जी.’’

मैं अपने आमों के बाग की ओर बढ़ गया. हमारे न जाने किन बुजुर्गों ने यह बाग लगाया था. मुझे बाऊजी की बात याद आ गई थी. ‘चोला’ छोड़ने से पहले उन्होंने कहा था, ‘ये खेतखलियान हमारे बुजुर्गों की धरोहर हैं. उन की जान इन में बसती है. इन्हें संभाल कर रखना. उन्होंने गरमीसर्दी, बरसात और आपदा में इन की संभाल की थी.’
मैं ने अपने किसी खेत और बाग को नहीं बेचा था. मेरे दोनों बेटे आते हैं और एंजौए कर के अपने काम पर चले
जाते हैं. मेरे बाद, मुझे नहीं लगता,
मेरी आगामी पीढ़ी इन खेतों को
संभाल पाएगी.
मेरी पत्नी संसार छोड़ गई थी. चंपा मेरे लिए खाना और घर के काम करती थी. बाल विधवा थी. उस की मां केवल उस के लिए मकान छोड़ गई थी. मैं उसे बचपन से जानता था, इसलिए उसे रख लिया. घर के मैंबर की तरह रहती थी. खाना मेरे यहां खा लेती थी.
चंपा ने जीवनभर गरीबी देखी थी. हमारे घर की उतरन से वह अपने शरीर को ढकती थी. शादी 7-8 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी. उस का ‘गौना’ होना था, लेकिन उस से पहले ही उस के आदमी की मौत हो गई थी. आदमी का सुख उसे कभी नहीं मिला. गरीबी इतनी थी कि रोटी, कपड़े के भी लाले थे. दूसरी शादी करना तो दूर की बात थी और कौन करता? मैं ने फौज में रहते उसे घर के काम के लिए रख लिया था. उसी पैसे से वह अपनी जरूरत की चीजें लेती थी. गांव में उसे किसी ने सहारा नहीं दिया था. हालांकि, उस के ताऊचाचा गांव में थे. ऐसे दुख नारी के हिस्से ही क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर दूरदूर तक नहीं पाता हूं.
मैं नाश्ता कर के खेतों में चला आया. बारिश हुई थी लेकिन अभी भी खेतों को पानी देने की जरूरत थी. मैं वहां पहुंचा तो गिरधारी ने ट्यूबवैल चला रखा था. चावल के खेतों में पानी खड़ा रहना चाहिए, तभी फसल चंगी होती है. आमों के बाग में गया. वहां भी खूब आम लगे थे, तरहतरह के शानदार आम थे. सफेदा आम, तोता आम, मालदा आम और लंगड़ा आम. सभी आम बहुत मीठे थे. मंडी में जा कर गिरधारी हाथोंहाथ बेच आता था. अच्छेखासे पैसे हो जाते थे. रखवाली के लिए अच्छे मजदूर रखने पड़ेंगे. गिरधारी को बोलूंगा, वह सब कर लेगा.

मैं ने घर आ कर फोन पर अपनी मौसी से बात की. वह बहुत खुश हुई, पूछा, ‘‘पुत्तर, छुट्टी कब आया और मेरे पास कब आ रहा है, वापस कब जा रहा है?’’
‘‘मौसीजी, मैं पैंशन पर आ गया हूं. अब वापस नहीं जाना है. यहीं रह कर खेतों को देखूंगा.’’
‘‘यह तो अच्छी बात है. मेरे पास कब आ रहा है?’’
‘‘सोचता हूं, कल आ कर मिल जाऊं. फिर बिजी हो जाऊंगा.’’
‘‘आजा, पुत्तर.’’
‘‘मौसाजी कैसे हैं? ’’
‘‘ठीक ने, उन्हें क्या होया है, हट्टेकट्टे ने,’’ उन की बात सुन मैं
हंस दिया.
मैं कल जब मौसी के घर पहुंचा तो मेरा बहुत जोरदार स्वागत किया गया. मौसाजी भी घर पर थे. बड़े प्यार से मिले. मैं घर की सब्जियां ले गया था. हालांकि मौसी के घर में भी किसी चीज की कमी नहीं थी. सब्जियां, फल घर के ही जाते थे.
मेरे लिए चूल्हे पर काढ़नी में कढ़ी बनाई थी, साथ में बासमती के चावल थे. बासमती चावल ऐसे कि बने तो चार घर खुशबू जाए. खाना खाने के बाद मैं ने वेदो के बारे में पूछा.

मौसी बहुत देर जवाब नहीं दे पाई. मुंह दूसरी तरफ कर लिया था. शायद वह रो रही थी. फिर कहा, ‘‘पुत्तर, यह रिश्ता मैं ने ही करवाया था. आई थी तो सारे गांव में दुहाई मच गई थी कि लड़की बहुत सोहनी है. बेचारी रुल गई.’’
‘‘मौसी, क्यों?’’ मेरे शब्दों में भी टीस थी, दुख था.
‘‘वही, कमीने खयालात. सास बड़ी लड़ाकी थी. ओ मरी तो वेदो को चैन आया. अब सब ठीक ए. मैं बुलांदी हां. तू पछान नहीं पाएगा.’’
वेदो आई तो सच में मैं उसे पहचान नहीं पाया. हट्टीकट्टी वेदो सूख कर कांटा हो गई थी. दुख से मेरा गला भर आया, पूछा, ‘‘कैसी है, वेदो? यह सब कैसे, क्या हो गया?’’
वह कुछ नहीं बोली थी. बहुत देर मौसी के गले लग कर रोती रही थी. उस की सीमा का बांध टूट गया था. मौसी ने कहा, ‘‘रो ले, पुत्तर, जी भरके रो ले, फेर तैनू रोन दा मौका नहीं मिलेगा. दिल हलका हो जाएगा.’’
मौसी प्यार से उस की पीठ पर हाथ फेरती रही थी. रोतेरोते उस की हिचकी बंध गई थी. मैं ने फिर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सब कर्मा दा खेल है. घर जा कर बापूजी नू कुछ न दसना. वे मर जाएंगे.’’
मैं ने हामी भरी. औरत चाहे कितनी भी बूढ़ी हो जाए वह मर कर भी दुख का सनेहा अपने मायके नहीं भेजती. कर्मों का खेल समझ कर सहती रहती है. वह इस मानसिकता से जीवनभर उबर नहीं पाती, क्यों? बस इस प्रश्न का उत्तर नहीं पाता हूं.
घर जाने लगी तो मैं ने कहा, ‘‘कभी बापूजी को मिलने आ जाओ.’’
‘‘आवांगी. थोड़ी सेहत ठीक हो जाए तो आवांगी. बापूजी नू मिले बहुत देर हो गई ए. वैसे कैसे ने?’’
‘‘ठीक ने, उम्र दे हिसाब नाल कमजोर हो गए ने.’’
मैं वेदो को उन की उदासी के बारे न बता सका. उन की पीड़ा को नहीं बता सका. नहीं बता सका कि तुम्हारे बारे में पूछने पर दुख से बहुत देर आसमान की ओर देखते रहे थे, केवल इतना कहा, ‘‘तू आएगी तो उन्हें तसल्ली हो जाएगी.’’

वह कुछ नहीं बोली थी. ‘हां’ में सिर हिला कर चली गई थी. मैं घर लौट आया. दूसरे दिन खेतों में गया तो वेदो के बापूजी धीरेधीरे चल कर मेरे पास आ गए. वे प्रश्नचिह्न बने हुए थे कि उन की वेदो कैसी है. मैं ने उन के चेहरे पर आए दुख को बहुत गहरे से महसूस किया और कहा, ‘‘वेदो ठीक ए. थोड़ी कमजोर है. ओ तुहानू मिलन आएगी.’’
‘‘अच्छा.’’ उन के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई, ‘‘मेरी लाड़ली आएगी.’’
‘‘हां, बापूजी.’’
‘‘कमजोर तो ओस वेले वी सी जब उस की सास मरी थी. मैं उस के सारे रीतिरिवाज कर आया था.’’

अपनी लाड़ली को याद कर के उन की आंखें भर आई थीं. भीगी आंखों से ही वे अपने खेतों में काम करने बढ़े, कहा, ‘‘आएगी तो मैं ने उसे एक हफ्ते में ही ठीक कर देना है, फौजी साहब, देख लेना. ’’

मैं इस सोच में डूब गया कि ये रिवाज किस ने बनाए हैं कि लड़की की ससुराल में कोई बुजुर्ग मर जाए तो रस्मपगड़ी के नाम पर सारा खर्चा लड़की के मायके वाले उठाएं? पहला बच्चा होना हो तो लड़की को मायके भेज दो. ये रिवाज आज भी मुंहबाए खड़े हैं. आज भी दृढ़ता से इन्हें निभाया जाता है, क्यों? बस इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, मिल जाते तो शायद समाधान भी मिल जाते.

2 हफ्ते बाद वेदो आई तो अपने बापूजी को खेतों में काम करते देख कर वहीं रुक गई. सामान सड़क पर ही रख कर बापूजी के पास आ गई. दोनों ने एकदूसरे को देखा और गले लग कर खूब रोए. आसमान की ओर देखा तो वह भी आंसू टपका रहा था. उन के मिलन से वह भी अपना मन हलका कर रहा था.

बहुत देर रोने के बाद वेदो के बापू ने कहा, ‘‘पुत्तर, तू आ गई ऐ है न. मैं जी जाऊंगा. तै नू मैं इक हफ्ते में ठीक कर देना है. कुछ दिन रहेगी न?’’
‘‘हां बापूजी, मैं इक महीने वास्ते आई हां.’’
बापूजी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘चंगा, अब घर जा. कुछ नईं करना. आराम करना, सामान मजदूर लै आनगे.’’

मैं फिर सोच में डूब गया. ये सारे दुख नारी के हिस्से में क्यों हैं? वह औफिस में काम करती है तो उसे अपने पति की चिंता रहती है, ‘हाय, वे थकटूट के औफिस से आएंगे, इन्हें कुछ खाने को मिला होगा या नहीं. इन्हें बनाना भी तो नहीं आता. सास ने मेरे बच्चे को दूध दिया होगा या नहीं? सास, बीमारी का बहाना बना कर बिस्तर पर पसरी होगी. बच्चा रोरो कर हैरान हो रहा होगा. ऐसी चिंताओं से वह स्वयं को हलाल कर रही होती है. चाहे उस के बच्चे का और पति का खूब खयाल रखा जा रहा हो.

नारी चाहे बूढ़ी हो जाए वह अपना कर्तव्य निभाने में कभी पीछे नहीं हटती. वह बीमार होते सारे काम कर जाती है पर इस सोच का क्या किया जाए जो उसे चिंतामुक्त नहीं होने देती? समांतर रेखाएं कभी नहीं मिलतीं. सासबहू, ननदभाभी ऐसी रेखाएं हैं जो जीवनभर एकदूसरे की विरोधी रहती हैं वेदो की सास जैसी लड़ाकी औरतें तो बहुओं का जीना मुहाल कर देती हैं. वेदो का इस तरह सूख कर कांटा हो जाना इसी का परिणाम है. नारी नारी की दुश्मन होती है, यह भी सत्य है.

मैं जाने कब तक सोच में डूबा रहता, चंपा ने नाश्ता रखा तो मैं होश में आया. एक महीने बाद वेदो अपनी ससुराल गई तो वह बचपन की तरह बहुत प्यारी लग रही थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘ऐसी ही बनी रहना.’’ वह मुसकराई और चली गई. वह मुझे जवानी के प्यार के लम्हों का एहसास दे गई.  Romantic Story In Hindi 

Hindi Love Stories : रहने दो रिपोर्टर – अतीत के काले साए से बचती युवती

Hindi Love Stories : विमल ने बीती बातों को भुला कर गंगा को अपनाया था. गंगा भी सब से उबरने की कोशिश कर रही थी लेकिन यह समाज कहां किसी का दुख समझता है.

वह आज पूरी तरह छुट्टी मनाने के मूड में था. सुबह देर से उठा, फिर धीरेधीरे चाय पीते हुए अखबार पढ़ता रहा था. अखबार पूरी तरह से चाटने के बाद उस का ध्यान घर में छाए सन्नाटे की तरफ गया. आज न पानी गिरने की आवाज, न बरतनों की खटरपटर, न झाड़ूपोंछे की सरसराहट, जबकि घर में कुल 2 छोटेछोटे कमरे हैं. वह एकाएक ही किसी आशंका से पीडि़त हो उठा. गंगा इतनी शांति से क्या कर रही है?
बरामदे में पैर रखते ही वह सहम सा गया. गंगा वाशबेसिन के पास चुपचाप बैठी हुई थी और सामने रखी बोतल को ध्यान से देख रही थी.
‘‘गंगा, वह तेजाब की बोतल है,’’ उस ने आशंकित स्वर में कहा, ‘‘मैं बाथरूम साफ करने के लिए लाया था. काई जमी हुई है न, रोज तुम रगड़ती रहती हो. देखना, इसे जरा सा डाल कर रगड़ने से एकदम साफ हो जाएगा किंतु तुम उसे नहीं छूना.’’
‘‘अच्छा,’’ उस ने कहा लेकिन अभी भी जैसे वह सोच में डूबी हुई थी.
‘‘क्या सोच रही हो, गंगा?’’ उस ने कंधा पकड़ कर उसे झकझोर दिया.
‘‘सोच रही हूं कि इस के लगाने से चेहरा बदल जाएगा, तब कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा, पहचान भी ले तो… लेकिन तुम्हारी भावनाएं क्या होंगी?’’
‘‘मेरी भावनाओं का आदर करती हो तो अब से कभी यह विचार मन में
न लाना.’’
‘‘पता नहीं क्यों, भय लगता है.’’
‘‘तुम भयभीत क्यों होती हो? मैं ने सबकुछ जानने के बाद ही तुम से विवाह किया है, हमारा विवाह कानूनसम्मत है, कोई हमें अलग नहीं कर सकता, समझं.’’

तभी दरवाजे पर आहट हुई. विमल ने द्वार खोला. पड़ोसी जोशीजी की छोटी बेटी लतिका थी. बाहर से ही बोली, ‘‘काकी, आज हमारे घर में हलदी- कुमकुम होना है. मां ने तुम को बुलाया है. दिन में 2 से 5 बजे तक. जरूर आ जाना. अच्छा, मैं जाती हूं. मुझे बहुत घरों में बोलने जाना है.’’
गंगा ने प्रश्नभरी आंखों से पति की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि आज जोशीजी के घर क्या है?
‘‘सुहागिन महिलाओं को घर बुलाते हैं. टीका करने के बाद नाश्तापानी, गानाबजाना होता है. मेरे घर तो आज पहली बार इस तरह का बुलावा आया है और पहले आता भी कैसे, सुहागिन तो अभी आई है.’’
गंगा मुसकराई, फिर गंभीर हो उठी. विमल ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘सोचा था दिनभर साथसाथ घूमते रहेंगे. जोशीजी को भी आज का ही दिन मिला.’’
‘‘मैं अपनी हाजिरी लगा कर शीघ्र ही आ जाऊंगी.’’
‘‘नहींनहीं, जब सब उठें तभी तुम भी उठना. पहली बार बुलाया है उन्होंने. मेरी चिंता न करो, तुम्हारे वापस आने तक मैं सोता रहूंगा.’’
‘‘कैसा रहा आज,’’ जोशी के घर से वापस आने पर विमल ने गंगा से पूछा.
‘‘बहुत अच्छा. बड़े अच्छे लोग हैं. मैं तो अभी किसी से मिली ही नहीं थी. आसपास की सभी महिलाएं आई थीं और सभी ने मुझ से खूब प्यार से
बातें कीं.’’
‘‘अच्छा, सब की बोली समझ
में आई?’’
‘‘हां, थोड़ीबहुत तो समझ में आ ही जाती है. वैसे, मुझ से तो हिंदी में ही बोल रही थीं.’’

मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला जो बढ़ता ही रहा. विमल खुश था कि गंगा का मन बहल गया है. अब वह पहले जैसी सहमीसहमी नहीं रहती बल्कि अब तो वह अपनी नईनई गृहस्थी की सुखद कल्पनाओं में खोई रहती है.
एक दिन बेहद खुश हो कर गंगा ने विमल से कहा, ‘‘सुनो, मैं भी सब को हलदीकुमकुम का बुलावा दे रही हूं. जोशी काकी ने कहा है कि वे सब तैयारी करवा देंगी. मैं ने सामान की सूची बना ली है.’’
‘‘ठीक है, हम कल शाम को बाजार चल कर सब सामान ले आएंगे.’’
बाजार में जाते हुए विमल फूलों की वेणी वाले को देख कर रुक गया. गंगा वेणी लगाने में सकुचाती थी. विमल ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम अपनी सहेलियों की तरह वेणी लगाया करो. हलदीकुमकुम करोगी, वेणी नहीं लगाओगी?’’

तभी विमल को किसी ने टोकते हुए कहा, ‘‘नमस्ते, साहब. ऐसा लगता है, आप को कहीं देखा है.’’
‘‘मुझे. जी, मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’
‘‘आप वही विमल साहब हैं न जिन्होंने अपना नाम समाचारपत्र में देने से मना किया था.’’
‘‘जी, मैं आप को नहीं पहचानता,’’ और गंगा का हाथ पकड़ कर सामने से आते रिकशे को रोक कर उस पर बैठते हुए विमल ने कहा, ‘‘चलो गंगा, घर चलते हैं.’’
दूसरे दिन सुबह चाय का प्याला लिए विमल अपनी बालकनी में बैठा धूप की गरमाहट महसूस कर ही रहा था कि द्वार पर आहट हुई.
‘‘नमस्कार, मैं जयंत हूं. आप जो समाचारपत्र पढ़ रहे हैं, मैं उसी का एक अदना सा रिपोर्टर हूं.’’

विमल का चेहरा बुझ गया. अनमने मन से स्वागत कर उन के लिए चाय मंगाई.
जयंत कहे जा रहा था, ‘‘कहते हैं कि बड़े लोग विनम्र होते हैं, आप तो साक्षात विनम्रता के अवतार लगते हैं. इतने उदार, समाज सुधारक, अभिमान तो नाम को नहीं.’’
विमल ने प्रतिवाद किया, ‘‘ऐसा लगता है आप किसी भ्रम में हैं. मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं.’’
‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि आप जैसा महान व्यक्ति प्रचार से दूर रहना चाहता है पर आप ने जो कुछ किया उसे जान कर मुझे गर्व का अनुभव हुआ.’’
‘‘मैं ने क्या किया, मैं तो किसी प्रशंसा के लायक नहीं.’’
‘‘आप संकोच न करें, गुप्ताजी ने मुझे सब बता दिया है. अरे, वही गुप्ताजी जो कल आप से मिले थे. आप ने उन्हें नहीं पहचाना पर वे तो आप को पहचान गए हैं. आप की पत्नी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की हैं न?’’

विमल मना न कर सका. रसोई के दरवाजे पर खड़ी गंगा का चेहरा उतरा हुआ था.
‘‘देखिए, मेरा कोई स्वार्थ नहीं,’’ रिपोर्टर जयंत ने कहा, ‘‘कोई लांछन का उद्देश्य नहीं, आप की इज्जत जितनी है वह आप को नहीं मिल रही है. मैं तो केवल इसलिए आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से सबक मिले. ऐसा समाज सुधारक छिप कर नहीं बैठता है. इसलिए मैं आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से प्रेरणा मिले. लोग जानेंगे कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं. प्यार आदमी को बदल देता है.
‘‘यह चित्र विवाह के बाद का है न,’’ कमरे में कोने की मेज पर गंगा का चित्र रखा हुआ देख कर उस ने उठा लिया, ‘‘मैं अभी आप को दे जाऊंगा, यह सिगरेट लीजिए न, विदेशी है. मेरा पेशा ही ऐसा है भाई, लोग बहुत आवभगत करते हैं समाचारपत्र में अपना नाम देखने के लिए. मेरा रुतबा ही इतना है. भाभी, आप का एक चित्र लेना है रसोई में काम करते हुए, लोग देखेंगे कि कैसी सुघड़ गृहिणी हैं, कैसी सुंदर गृहस्थी है. हां, तो आप ने जानकी को गंगा नाम दिया. बहुत ठीक, गंगा तो पवित्र है, गंगा मैली थोड़े होती है.
‘‘अच्छा, धन्यवाद, मैं चलता हूं,’’ वह कागजकलम समेट कर उठ गया. विमल नीचे तक पहुंचा कर आया तो गंगा वैसे ही दीवार से सटी खड़ी थी. मौन, चिंतित, भयाक्रांत, प्रशंसा के मद से मस्त. विमल को देर हो रही थी, ध्यान नहीं दिया.
शाम को उस ने हलदीकुमकुम के लिए सामान लाने को कहा तो गंगा ने मना कर दिया, ‘‘अभी ठहर कर लाऊंगी.’’
तीसरे दिन समाचारपत्र के तीसरे पेज पर वही चित्र था जो उन के घर की मेज पर रखा था. दूसरा चित्र गंगा का रसोई में काम करते हुए. साथ में संक्षेप से उस की यातना की कहानी के साथ ही विमल की महानता की कहानी छपी थी.

विमल को उठने में देर हो गई थी. समाचारपत्र ऊपरऊपर से देख कर वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगा कि उस से मिलने वाले एकएक कर आने लगे. फ्लैट के सभी लोग आए और उस के उदार नजरिए पर बधाई दी.
‘‘प्रचारप्रसार से इतनी दूर कि आज का समाचारपत्र तक नहीं देखा, जबकि अपने बारे में आप को छपने की आशा थी.’’
‘‘वाह, आप धन्य हैं. आप दोनों सुखी रहें, हमारी कामना है.’’
गंगा भोजन तैयार न कर सकी और न नाश्ते का डब्बा ही. वह अपने अंदर एक अज्ञात भय महसूस कर रही थी.
विमल तैयार हो कर आया तो बोला, ‘‘मैं वहीं कुछ खा लूंगा, तुम अपना ध्यान रखना.’’

पुरुषों के जाने के बाद महिलाओं की
बारी आई. एकएक कर सब गंगा
का हाल पूछने पहुंच गईं. सब में यह बताने की होड़ लगी थी कि सब से पहले किस ने समाचारपत्र देखा और कैसे एकदूसरे को जानकारी दी. फिर सभी ने एक स्वर में कहा कि हमें नहीं पता था कि आप का नाम जानकी है. वैसे, नाम तो हम लोग भी पतिगृह का दूसरा रखते हैं, आप के गांव में ऐसा नहीं होता क्या?
‘‘जानकी तो पतिव्रता स्त्री का
नाम था,’’ एक के मुंह से निकला तो दूसरी ने कहा, ‘‘बेचारी औरत का क्या दोष.’’
इस तरह सभी ने गंगा से सहानुभूति दिखाई. खाली चौका देख कर कई घरों से खाना आ गया. जबरन कौरकौर खिलाया और आंसू पोंछे. अपने प्रति कोमल भावनाएं देख कर गंगा को लगा कि उस की आशंका निर्मूल थी, वह व्यर्थ ही इतनी भयभीत हो रही थी कि उस का अतीत जान कर कहीं लोग उस से घृणा न करने लगें, फिर भी वह आश्वस्त न हो पाई.
विमल ने सुबह कहा था कि शाम को तैयार रहना, डाक्टर को दिखाना है और बाजार भी जाना है. किंतु शाम को वह कहीं नहीं गई. 3 दिन हो गए, वह घर से निकली ही नहीं.
काशी बाई 2 दिनों बाद आई तो बाहर से ही बोली, ‘‘मैडम, मेरी पगार जितनी बनती है, दे दो.’’
गंगा चकित हो उस से काम न करने का कारण पूछने ही वाली थी कि तभी सुना, ‘‘जूठा साफ करते हैं तो क्या, हमारा धरमईमान तो बना है. ऐसे घर पर कौन काम करेगा.’’
कूड़ा फेंकने वाली मीनाबाई ने भी कहा, ‘‘गंदा साफ करते हैं तो क्या हुआ, हमारा भी धरम है, अपने मरद के लिए तो मैं सच्ची हूं.’’
भाजी वाला आया था. गंगा साहस कर के नीचे उतरी ताकि कुछ सब्जीभाजी खरीद ले. गोभी, मटर का भाव पूछते ही वह मुसकराया, ‘‘अजी, आप जो चाहे दे दें.’’
गंगा ने यथार्थ समझ लिया था. अंदर ही अंदर घुटती रही. एक घर से गीतों का बुलावा आया हुआ था. विमल ने कहा, ‘‘दिन में थोड़ी देर को चली जाना और शगुन दे देना.’’

गंगा कहीं जाने को तैयार नहीं थी. विमल समझता रहा, ‘‘देखो, हमें कमजोर नहीं पड़ना है. हम ने कोई बुरा काम तो किया नहीं है. मजबूरी ने जो करा दिया उस के लिए लज्जित क्यों हों? तुम अवश्य जाओ और सब के बीच में मिलोजुलो अन्यथा लोग हमें गलत समझेंगे, दोषी समझेंगे. उन के घर लड़की का विवाह है. तुम को गीतों में बुलाया है. नहीं जाओगी तो कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं कि पास में रह कर भी नहीं आई.

गंगा दुविधा में थी. जोशी काकी के मुख से सुन ही लिया था और लोग भी ऐसा ही कहें तब. उधर विमल का कहा भी मन में गूंजता रहा तो वह बड़ा साहस जुटा कर वहां गई थी.

गाना चल रहा था. कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं. हंसीखुशी का वातावरण था. उसे देखते ही नृत्य थम गया, गाना बंद हो गया और सब की नजर उस की ओर थी. उसे याद आया जब पहले वह जोशी काकी के घर गई थी तो वहां भी गानाबजाना हो रहा था किंतु उस के जाते ही सब ने उस का स्वागत किया था और उन नजरों में कुतूहल था पहचान का, परिचय का किंतु स्नेह का भाव भी था.

आज पहले तो सब एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं, घर की मालकिन ने उसे बैठने का संकेत किया तो पास की महिलाएं इस तरह सरक कर बैठीं जैसे उस के स्पर्श से बच रही हों.

परस्पर फुसफुसाहट हुई पर उस से न बोलने की चुप्पी का प्रहार इतना मुखर था कि गंगा अधिक देर वहां बैठ न सकी. शगुन का लिफाफा हाथ में ही रह गया. वह उठी तब भी उस से किसी ने बैठने को न कहा, न जल्दी जाने का कारण पूछा.

कुहराम मचा हुआ था. गंगा ने स्नान घर में मिट्टी का तेल छिड़क कर अपने को जला लिया था. विमल के नाम एक पत्र रखा था जिस में लिखा था :
‘‘औरत पर कलंक लग जाए तो कलंक के साथ ही जीना होता है. आप पुरुष हैं, दूसरा विवाह कर लेंगे किंतु मेरे साथ रह कर आप भी कलंकित ही रहेंगे. मैं इस लांछन को सह भी लेती पर मैं मां बनने वाली हूं. बेटा होगा तो वह भी कलंक का टीका ले कर, बेटी होगी तो और भी विडंबना होगी.
‘‘आत्महत्या कर के मैं पाप कर रही हूं पर आप को इन सब से मुक्ति दे रही हूं.
‘‘मुझे क्षमा करना. समाचारपत्र वाले फिर पूछने आएंगे. उन्हें यह पत्र दे देना, शायद मेरा चित्र लेना चाहें तो ले लेंगे.’’

विमल से पढ़ा नहीं जा रहा था. पत्र हाथ से छूट गया. क्या लिखा है, क्या कारण है, कई लोग पत्र पढ़ चुके थे. अब पत्र पकड़ते हुए जिसे देखा, विमल आक्रोश से
फट पड़ा.
‘‘तसवीर भी ले लो न, वह भी.’’
रिपोर्टर ने सहम कर देखा, पत्र उस के हाथ से छूट गया.  Hindi Love Stories

Family Story In Hindi : कारवां – परिवार के मायने समझाती कहानी

Family Story In Hindi : शादी जीवन का एक अहम फैसला होता है, जिसे वे चारों दोस्त ले चुके थे लेकिन उस फैसले में उन्हें अपने मातापिता की भी पूर्ण सहमति चाहिए थी क्योंकि वे अकेले नहीं, सब को साथ ले कर चलना चाहते थे.

कैंटीन में कोने की सीट पर चार दोस्तों की महफिल जमी थी. आसपास की चहलपहल से दूर वे अपनी ही बातों में गुम थे. चायकौफी की चुस्कियों के साथ उन का हंसीमजाक बदस्तूर जारी था. उन में कोई मितभाषी था तो कोई अंतर्मुखी, कोई चंचल तो कोई शांत पर दोस्ती चतुर्भुज जैसी जो सभी धर्मजाति से परे एक ऐसा वर्ग था जिस की समान आकार की भुजाएं चार दोस्त विजय, नंदिनी, अमन और शैली थे.

विजय, रवि और रमाजी का इकलौता बेटा था. विजय जब 17 वर्ष का था तब रविजी दिल्ली आ बसे थे. उन की कालोनी में ही नंदिनी का परिवार रहता था. विजय तब 11वीं कक्षा उत्तीर्ण कर के आया था और 12वीं कक्षा में एडमिशन के लिए काफी प्रयासरत था तब नंदिनी के पापा अनिलजी से हुए परिचय के कारण विजय का एडमिशन नंदिनी के ही स्कूल में हो गया था.

नंदिनी भी 12वीं कक्षा में ही थी और उस के बाद दोनों ने कालेज में एडमिशन भी एकसाथ ही लिया था. नंदिनी का एक बड़ा भाई था जो अपनी नौकरी के सिलसिले में लखनऊ में रहता था.

एडमिशन के दौरान काउंटर पर पेपर्स जमा करते हुए विजय और अमन की बातचीत हुई थी तो पता चला कि अमन भी उन्हीं की तरह कालेज में प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था. इस तरह तीनों ने एकसाथ ही क्लास में प्रवेश किया.

शैली अपने भैयाभाभी के साथ रहती थी. उस के मातापिता एक दुर्घटना के शिकार हो असमय ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे तब वह 16 वर्ष की थी. जौन और लीना ने उस के भाईभाभी हो कर भी मातापिता का फर्ज निभाया था.

मातापिता को खोने के बाद शैली शांत हो गई थी पर जौन और लीना के वात्सल्य ने शैली को संभाल लिया. स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उस का मन कुछ उचाट सा रहता था पर लीना चाहती थी कि शैली अभी हंसेखेले, अपनी उम्र के दोस्तों के साथ घुलेमिले इसलिए उस ने बहुत प्यार और संयम के साथ शैली को समझाया. शैली भी लीना को बहुत मानती थी, सो, उस ने भी खुलेमन से कालेज में एडमिशन लिया.

कालेज के पहले 2 दिन वह अनुपस्थित रही पर तीसरे दिन गई तो नंदिनी से हुई दोस्ती की वजह से जल्दी ही वह विजय और अमन की भी अच्छी दोस्त बन गई और इस तरह इन चारों का ग्रुप बन गया.

रविजी को नया शहर काफी रास आ गया था. यहां उन्होंने अपने बिजनैस में तेजी से तरक्की की. संपन्नता और बढ़ी तो उन्होंने अपना मकान भी बदल लिया. एक छोटी सी कोठी बनवाई थी उन्होंने जो नंदिनी के घर से थोड़ी दूरी पर थी. घरों में बेशक थोड़ी दूरियां बढ़ गई थीं परंतु दोनों परिवारों के संबंधों में कोई दूरी नहीं आई थी.

विजय, नंदिनी, अमन और शैली तब सन नब्बे के बैच में थे. अब तो उन चारों की दोस्ती भी काफी मशहूर हो रही थी. क्लासरूम में नंदिनी और शैली आगे की सीट पर और विजय और अमन ठीक उन के पीछे बैठते थे. दोस्ती गहराती गई तो चारों एकसाथ कभीकभी क्लास भी बंक करने लगे. नंदिनी और शैली ने अर्थशास्त्र लिया था, इसलिए केवल अर्थशास्त्र के पीरियड में ही चारों अलग होते थे वरना कैंटीन हो या लाइब्रेरी, चारों साथ ही रहते थे.

एक दिन कैंटीन में विजय ने पूछा, ‘‘इस रविवार का क्या प्रोग्राम है?’’
‘‘मुझे तो अपनी आंटी के घर जाना है,’’ शैली ने समोसा खाते हुए जवाब दिया.
‘‘और मुझे तो पापा ने शोरूम के लिए कुछ सामान लाने का काम सौंपा हुआ है,’’ अमन चाय की चुस्की लेता हुआ बोला.
‘‘और नंदिनी, आप कहां व्यस्त हैं?’’ विजय ने नंदिनी को देखते हुए पूछा.
‘‘कहीं नहीं, मैं बिलकुल फ्री हूं. तुम बताओ, क्या प्रोग्राम बनाना चाह रहे हो?’’ नंदिनी चुहलभरे स्वर में बोली.
‘‘अरे, मैं सोच रहा था कि संडे को औटो एक्सपो का आखिरी दिन है तो चलते हैं सब.’’
‘‘औटो एक्सपो और मैं सोच रही थी तुम किसी फिल्म की बात करोगे,’’ शैली तुनक कर बोली.
‘‘चल हट यार, ये फिल्म कहां से आ गई बीच में?’’
‘‘अमन, तू तो चल यार, सामान फिर किसी दिन ले अइयो. यों भी संडे एक्सपो का आखिरी दिन है.’’
‘‘हां यार चल, वहां तो मुझे भी जाना है और नंदिनी, तुम तो नहीं चलोगी न, तुम्हें कोई फिल्म देखने जाना होगा?’’
‘‘अरे वाह, क्यों नहीं चलूंगी, गाडि़यों पर क्या सिर्फ तुम लड़कों का ही कौपीराइट है. मैं भी चलूंगी और अपनी पसंद की गाडि़यां भी देखूंगी,’’ नंदिनी इतराते हुए बोली.
‘‘हां, और वापस लौटते हुए खरीद भी लूंगी,’’ विजय हंसते हुए बोला तो उस की यह बात सुन कर अमन और शैली भी जोर से हंस पड़े.

नंदिनी का मुंह बन गया तो अमन ने हंसते हुए उस की पीठ पर हलके से धौल जमा दी, उस पर नंदिनी खिलखिला पड़ी.
‘‘मम्मी, परसों हम लोग औटो एक्सपो देखने जा रहे हैं.’’
‘‘औटो एक्स्पो, तुम्हें कब से गाडि़यों में दिलचस्पी होने लगी?’’
‘‘अरे, क्या हो गया है सब को, क्यों नहीं जा सकती मैं औटो एक्सपो में?’’ नंदिनी मुंह ही मुंह में बोलती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ चली.
तभी अनिलजी के आने की आहट हुई तो नंदिनी ‘पापापापा’ कहते हुए उन की ओर दौड़ गई.
‘‘पापा, परसों मैं प्रगति मैदान जाऊं, वहां फेयर लगा है.’’
‘‘और यह तो पूछिए कि कैसा फेयर, गाडि़यों का औटो एक्सपो, वहां जाना है मैडम को,’’ ऊषाजी भी उन दोनों के नजदीक चली आईं.
‘‘कौनकौन जा रहा है, तुम चारों ही जा रहे हो न?’’ अनिलजी विजय के साथसाथ अमन और शैली को भी भलीभांति जानते थे.
‘‘नहीं पापा, शैली नहीं जा रही है. मैं, विजय और अमन जाएंगे, जाऊं न मैं, मेरे अच्छे पापा?’’ नंदिनी बच्चे समान मचल उठी.
यह देख कर अनिलजी की हंसी छूट गई और उन्होंने हां में सिर हिला दिया.
‘‘कालेज खत्म होने को है और बचपना अभी भी नहीं गया है,’’ ऊषाजी यह कह कर रसोई में चली गईं.
रात को बैडरूम में अनिलजी कोई किताब पढ़ रहे थे, ऊषाजी आईं और पानी का गिलास साइड टेबल पर रखते हुए बोलीं, ‘‘काफी रात हो गई है, अब सो जाइए.’’ इतना कह कर वे भी लेट गईं.
अनिलजी ने किताब बंद कर दी और ऊषाजी से मुखर हुए, ‘‘तुम्हें विजय पसंद है?’’
यह सुन कर ऊषाजी ने एक पल को अनिलजी की ओर देखा और फिर बोलीं, ‘‘आप नंदू के लिए सोच रहे हैं?’’
‘‘हां, बुराई क्या है? अच्छा लड़का है.’’
‘‘तो क्या अपनी नंदू भी उसे चाहती होगी?’’ ऊषाजी ने अपनी सवालिया नजरें अनिलजी पर टिका दीं.
‘‘अपनी नंदू को कहां कोई गाडि़यों का शौक है. औटो एक्सपो में किस लिए जा रही है जबकि शैली भी नहीं जा रही. जाहिर है, कालेज के अलावा भी विजय का और साथ पाने के लिए.’’
यह सुन कर ऊषाजी बोलीं, ‘‘हां, जोड़ी तो अच्छी है और फिर विजय है भी काफी समझदार जो अपनी नंदू के लिए बहुत अच्छी बात है. अब की बार रवि भाईसाहब से मिलें आप तो बातों ही बातों में जिक्र कर दीजिएगा.’’

कालेज का आखिरी वर्ष था. फेयरवैल की तैयारियां जोरोंशोरों से चल रही थीं. चारों ने एकसाथ ही जाने का निर्णय लिया. नंदिनी ने शैली को अपने घर में ही बुला लिया था और अमन विजय के घर पहुंचने वाला था. वहां से वे नंदिनी के घर जाने वाले थे और ऐसे सब इकट्ठे हो कर कालेज पहुंचने वाले थे.

फेयरवैल वाले दिन रमाजी ने नंदिनी को खुद तैयार किया. हलके गुलाबी रंग की साड़ी, सौम्य मेकअप और लंबे खुले बालों में नंदिनी का रूप यों दमका कि रमाजी उस की नजर उतारने को मजबूर हो गईं. नंदिनी खिलखिला कर मां के गले लग गई.

दोनों नीचे पहुंचीं तो शैली ड्राइंगरूम में पहले से बैठी हुई थी. नंदिनी को इस रूप में देख कर उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे वाह, मेरी हीरोइन. अरे मैडम, आज हमारे कालेज का फेयरवैल है, तेरा इस घर से फेयरवैल नहीं है,’’ फिर एक उंगली ठोड़ी पर टिकाते हुए बोली, ‘‘अरे बिटिया, अभी ससुराल जाने का वक्त नहीं आया.’’

‘‘चलचल, ज्यादा बातें मत बना,’’ नंदिनी उस की ऐक्टिंग देख कर हंसते हुए बोली.
‘‘हां, जल्दी चल. विजय बाहर गाड़ी में इंतजार कर रहा है.’’
‘‘अमन नहीं आया? ये दोनों तो साथ में आने वाले थे न,’’ नंदिनी ने पूछा.
‘‘हां, वह कुछ काम पड़ गया है उसे तो अब वह सीधा कालेज ही पहुंचेगा.’’
ऊषाजी भी बाहर आईं, देखा, विजय गाड़ी की स्टेयरिंग सीट पर था. नंदिनी उस के साथ आगे बैठ गई और शैली पीछे वाली सीट पर बैठी. ऊषाजी ने हाथ हिला कर सब को हंसते हुए विदा किया.

परीक्षा परिणाम आए 3 महीने हो चुके थे. विजय अपने पापा के साथ उन के व्यवसाय में जुट गया और नंदिनी ने फैशन डिजाइनिंग कोर्स में दाखिला लिया था.

शैली के पापा बैंक में काम करते थे. शैली भी बैंक में ही जौब करना चाहती थी, इसलिए उस ने बैंकिंग की पढ़ाई करने का निश्चय किया हुआ था और वह वही कर रही थी.

अमन के पापा का ‘फर्नीचर मार्ट’ था और काफी अच्छा चलता था. शोरूम में उन का भांजा भी भरपूर सहायता करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी थी और इन सब बातों को देख कर ही अमन ने फोटोग्राफी का कोर्स करने की इजाजत मांगी, जिस की हामी उसे परिवार से सहज ही मिल गई थी.

वक्त अपनी गति से चल रहा था. 2 वर्ष और बीत गए. अब विजय के घर में उस की शादी की चर्चा काफी जोर पकड़ने लगी थी. उस के घर की टेबल लड़कियों की तसवीरों से भरी रहती थी और कुछ ऐसा ही हाल नंदिनी के घर पर भी था हालांकि उसे तसवीरें नहीं दिखाई जा रही थीं पर अब उस के मातापिता भी उस के विवाह की तीव्र इच्छा रखे हुए थे.

शैली अब बैंक में कार्यरत हो चुकी थी और अमन ने अपना छोटा सा फोटो स्टूडियो खोल लिया था.

पूरी दुनिया को मुट्ठी में कैद करने वाला यंत्र ‘मोबाइल’ तब नहीं था परंतु घर पर ट्रिनट्रिन करती लैंडलाइन की तार ने इन चारों दोस्तों की दोस्ती के तार को जोड़ रखा था.

हर 15 दिनों में एक दिन इन चारों की मुलाकात का दिन होता था. हंसीमजाक, सुखदुख, अपनेअपने क्षेत्र के अनुभव को कहनेसुनने में वक्त कैसे बीत जाता था, उन चारों को पता भी न चलता. हर मुलाकात का अंत अगली मुलाकात की तारीख निश्चित करने के साथ होता.

रविजी ने विजय के लिए एक और नई फैक्ट्री खोलने का फैसला किया. दिन और तारीख तय हुए तो मुहूर्त में सम्मिलित होने के लिए सभी को निमंत्रण देना था. रविजी ने विजय से कहा कि नंदिनी का घर पास ही है, वहां वे खुद ही हो आएंगे. उस के बाद विजय अमन और शैली के घर जा कर उन्हें सपरिवार आने का निमंत्रण दे आया था.

रविजी रमाजी के साथ नंदिनी के घर पहुंचे तो वह घर पर नहीं थी. अनिलजी और ऊषाजी ने बेहद खुलेदिल से उन का स्वागत किया. चाय का दौर चला तो घंटा, डेढ़ घंटा कब व्यतीत हो गया, पता न चला.

उन लोगों के जाने के बाद नंदिनी के मातापिता काफी संतुष्ट नजर आ रहे थे जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो. रवि और रमाजी ने उन से नंदिनी का हाथ मांगा था विजय के लिए जिस के लिए दबे शब्दों में उन लोगों ने हां भी कर दी थी. अब उन्हें केवल नंदिनी की हां का इंतजार था.
‘‘नंदू, कल रवि भाईसाहब और रमा भाभी आए थे,’’ ऊषाजी ने नाश्ते की टेबल पर नंदिनी को बताया.
‘‘अच्छा, हां, वह अंकल की नई फैक्ट्री का इनोग्रेशन है न, इसलिए, पता है मम्मी, यह नई फैक्ट्री अंकल ने विजय को सौंपनी है.’’
‘‘पता है बेटा और साथ ही अब वे लोग विजय की शादी भी करवाना चाह रहे हैं,’’ ऊषाजी ने टोहने वाले स्वर में नंदिनी से कहा.
‘‘मम्मी, जैसे आप लोग मेरे पीछे पड़े हैं न, वैसे ही अंकलआंटी भी विजय के पीछे पड़े हैं,’’ नंदिनी खुल कर हंसते हुए बोली.
‘‘तो इस में गलत क्या है, अब तुम लोग अपनीअपनी लाइफ में सैटल हो चुके हो और फिर, उम्र का तकाजा भी यही है कि अब तुम दोनों की शादी भी हो जानी चाहिए,’’ ऊषाजी उत्साहित स्वर में बोलीं.
‘‘मम्मी, मैं काफी समय से नोट कर रही हूं कि आप को मेरी शादी की बहुत जल्दी है. तो ठीक है, मैं शादी के लिए तैयार हूं पर लड़का मेरी पसंद का होगा, बताइए मंजूर है?’’ नंदिनी ने शरारती स्वर में ऊषाजी से पूछा.

‘‘नंदू, तेरे पापा और मैं ने हम दोनों ने ही हमेशा तेरी हर जायज मांग को पूरा किया है. जो पढ़ना चाहा वो पढ़ी, जो कैरियर चुनना चाहा वही चुनने दिया पर यह तेरी शादी का सवाल है, इस में केवल तेरी मरजी नहीं चलेगी, लड़का हमें भी पसंद आना चाहिए वरना फिर तुझे हमारी पसंद से ही शादी करनी होगी,’’ ऊषाजी तनिक तीखे स्वर में बोलीं.
‘‘ओ मेरी प्यारी मम्मी, फिकर नौट, लड़के को आप सालों से जानती हैं. उस की फैमिली के बारे में भी आप को पता है. बस, जल्दी ही आप लोग उस का चेहरा भी देख लेंगे,’’ इतना कह कर नंदिनी ने अपना बैग उठाया और रमाजी को बाय कह कर घर से निकल गई.
शाम की चाय पीते हुए अनिलजी बोले, ‘‘अब वह हमें लड़के से क्या मिलवाएगी, उस की बातों से तो पूरा पता चल ही गया है कि विजय ही है वह लड़का.’’
‘‘मेरा भी यही खयाल है और जरूर विजय ने भी अपने घर में ऐसी ही बात की होगी तभी तो रवि भाईसाहब ने सीधे ही नंदू को मांग लिया.’’
‘‘चलो, अच्छी बात है. दोनों बच्चों ने अपनेअपने जीवनसाथी अपनी मरजी से और बहुत अच्छे चुने हैं,’’ अनिलजी बेहद नरम स्वर में बोले.

फैक्ट्री के उद्घाटन वाले दिन वहां काफी चहलपहल थी. विजय की दादी ने फीता काटा तो उन चारों की मित्र मंडली ने सब से ज्यादा तालियां बजाईं. माहौल काफी खुशगवार था. तभी माइक हाथ में ले कर रविजी ने सब को संबोधित किया.

‘‘मेरे सभी प्रियजन, आज आप सब इस खास अवसर पर उपस्थित हुए हैं, इस के लिए मैं आप सब का दिल से आभारी हूं. आप सभी का बहुतबहुत धन्यवाद और आज इस खुशी के मौके पर ही मैं आप सब से एक और दूसरी खुशी बांटना चाहता हूं.’’ यह सुन कर विजय, नंदिनी, अनिल और शैली चारों की ही आंखों में उत्सुकता नजर आई.
विजय तो बोल भी पड़ा, ‘‘जल्दी बताइए न पापा.’’
यह सुन कर रविजी हंसते हो बोले, ‘‘बताता हूं, अच्छा तुम यहां आओ मेरे पास.’’

विजय रमाजी के साथ उन के पास पहुंचा तो रविजी दोबारा सभी मेहमानों से संबोधित हुए, ‘‘वह दूसरी खुशखबरी यह है कि आप सब बहुत जल्द ही विजय को दूल्हे के रूप में देखेंगे और जो प्यारी सी बेटी उस की दुलहन बनेगी, वह भी यहीं मौजूद है और वह है मेरे अजीज दोस्त की बेटी नंदिनी.’’ यह कह कर अनिलजी ने विजय को देखा.

चारों तरफ तालियों का शोर था पर उस शोर में विजय सहित नंदिनी, अमन और शैली चारों ही सकते की सी अवस्था में थे और एकदूजे का मुंह ताक रहे थे.

विजय ने रविजी के हाथ से माइक ले कर साइड में रखा और धीमे स्वर में उन से बोला, ‘‘पापा, यह क्या कह रहे हैं, नंदिनी और मैं, हमारी शादी, यह विचार कैसे आया आप को और आप ने मुझ से पूछा भी नहीं?’’

‘‘अरे, यह कैसी बातें कर रहे हो, कुछ दिनों पहले जबजब तुम्हारी मां और मैं ने तुम से शादी की बात की थी तो तुम ने ही कहा था कि एक लड़की है और उस के परिवार को हम लोग जानते हैं और सब से बड़ी बात, तुम ने कहा कि वह तुम्हारे साथ ही पढ़ती थी तो अब इस बात पर और सोचने की गुंजाइश ही कहां थी कि वह लड़की नंदिनी के अलावा कोई और हो सकती है.’’

विजय मुसकरा पड़ा यह सुन कर, ‘‘क्यों पापा, शैली नहीं हो सकती क्या वह लड़की?’’
आश्चर्यचकित रह गए रविजी यह बात सुन कर, ‘‘क्या कह रहे हो?’’
रमाजी तो ‘काटो तो खून नहीं’ की अवस्था में आ गईं.
‘‘विजय, तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है, वह एक क्रिश्चियन परिवार और हम कट्टर ब्राह्मण. समाज में हमें मुंह दिखाना है या नहीं,’’ रमाजी की आंखों में तो जैसे खून तैर गया हो.
‘‘ठीक कह रहा हूं, पापा. और अब एक और जरूरी बात है वह यह कि नंदिनी भी मु?ो नहीं, किसी और को पसंद करती है.’’
विजय जैसे एक के बाद एक राज का खुलासा किए जा रहा था.
‘‘पर यह फैसला मेरे अकेले का नहीं है, बल्कि कुछ देर पहले नंदिनी के मम्मीपापा से बात कर के मैं ने आज यह बात कही.’’
रविजी की बात सुन कर विजय ने कुछ दूर खड़ी नंदिनी को देखा जो अपने मम्मीपापा से शायद उन्हीं बातों पर उलझ रही थी जो बातें विजय अपने पापा से कर रहा था.
शैली और अमन के चेहरों पर भी दिल और दिमाग में चल रही उथलपुथल की छाया थी.

यह परिस्थिति और अजीब मोड़ ले, इस से पहले ही अब सब को सच्चाई से अवगत होना होगा, बस, इसी खयाल के साथ विजय ने धीमे से रमाजी का हाथ थामा और रविजी को भी साथ लिया और नंदिनी की ओर बढ़ चला.
उस के करीब पहुंच कर वह उस के मम्मीपापा से मुखातिब हुआ.
‘‘अंकलजी, आंटीजी, मुझे लगता है नंदिनी ने अब तक आप को सबकुछ बेहतर तरीके से बता दिया होगा, हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं पर आपस में शादी का विचार हम दोनों के ही दिलों में कभी नहीं उपजा. मैं, दरअसल, शैली को पसंद करता हूं.’’

यह सुन कर अनिलजी और ऊषाजी भी हैरान हो गए और हैरानीभरी निगाहों से उन्होंने रविजी की ओर देखा.

माहौल भारी सा हो उठा था कि तभी नंदिनी ने जैसे एक और बम फोड़ा हो, ‘‘मम्मी, दरअसल, मैं और अमन एकदूसरे को पसंद करते हैं.’’
‘‘क्या?’’ अनिल और ऊषाजी के एक बार फिर से चौंकने की बारी थी.
‘‘यह सब क्या उलटापुलटा हो रहा है. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा,’’ ऊषाजी यह कह कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं.
‘‘मैं समझती हूं, मम्मी. दरअसल, आप लोगों को गलतफहमी हो गई और हम लोगों से गलती हो गई कि मैं ने और विजय, हम दोनों ने ही आप लोगों को अपनीअपनी पसंद का सही नाम नहीं बताया.’’
‘‘और पापा, उस का नतीजा यह हुआ कि आप लोगों को लगा कि मैं और नंदिनी आपस में एकदूसरे से…’’ विजय ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
तभी उन सभी के पीछे से एक बारीक आवाज आई, वह आवाज थी अमन की मम्मी सुरेखाजी की.

‘‘माफ कीजिएगा, आप लोगों के बीच दखल दे रही हूं पर अब सभी बातें खुल चुकी हैं और जहां तक अब मैं समझती हूं, हमें बच्चों की पसंद को खुलेदिल से अपना लेना चाहिए.’’
सभी हैरानपरेशान से उन की तरफ देखने लगे.
‘‘आप सभी की तरह मुझे भी अमन से यह बात अभी ही पता लगी है,’’ सुरेखाजी के मुंह से यह सुन कर विजय और नंदिनी ने उस की ओर देखा.
‘‘विजय, जा तू अपने दोस्त के पास, भाईसाहब की घोषणा के बाद उसे तेरे सहारे की बहुत जरूरत है,’’ सुरेखाजी ने हंसते हुए कहा.
विजय अमन की तरफ बढ़ा तो नंदिनी भी धीमे कदमों से उस के पीछे चल दी. सम?ा गई थी कि सभी परिवार के लोग अब आपस में बात करना चाहते हैं.
‘‘इन बच्चों ने किस दुविधा में डाल दिया है,’’ रमाजी के मुंह से निकला.
‘‘दुविधा ने अभी दुविधा का रूप लिया नहीं, रमा बहन. अच्छा हुआ जो पूरी बात आज यहीं खुल गई जब हम सब एक ही जगह एकत्रित हैं. बच्चों ने अपना फैसला बता दिया है और जबरदस्ती अपनी मरजी बच्चों पर थोपने का समय अब रहा नहीं. सभी परिवार एकदूजे से भलीभांति परिचित हैं, सालों से व्यवहार में रहे हैं, ऊषा बहन, मुझे दिल से बहुत खुशी होगी अगर नंदिनी मेरे घर बेटी बन कर आएगी.’’

सुरेखाजी की यह बात सुन कर ऊषाजी ने अनिलजी की ओर देखा.
‘‘और रवि भाईसाहब, शैली बिटिया बेहद गुणी और सहज स्वभाव की है. आप के और रमा बहन के रूप में उसे अपने मातापिता का प्यार मिल जाएगा. मेरी तो बस इतनी सी विनती है कि आप इस बात पर जरूर विचार कीजिएगा,’’ सुरेखाजी ने अपनेपन से कहा.
घर आते ही रमाजी बिलकुल बिफर गईं.
‘‘विजय, यह आज क्या किया है तुम ने? विवाह के लिए जीवनसाथी चुना भी दूसरे धर्म से. दोनों ही परिवार बिलकुल ही विभिन्न धर्मों वाले. न हमें उन के धर्म के बारे में कुछ ज्ञान है न वे हमारे धर्म के बारे में कुछ जानते हैं. और ये सब कब, कैसे हो गया?’’
विजय चुपचाप सब सुन रहा था और रविजी जैसे गहरी सोच में थे.
रमाजी रविजी से फिर बोलीं, ‘‘अरे, आप भी कुछ कहिए न. हैरान हूं मैं कि आप कैसे शांत बैठे हैं, क्या आप नहीं जानते कि इस की शादी के लिए मैं ने क्याक्या सोच रखा है, क्याक्या अरमान संजोए हुए हैं?’’
रविजी ने अपनी नजरें रमाजी के चेहरे पर टिका दीं और जैसे ही उन्होंने उन के कंधे पर हाथ रखा तो रमाजी की रुलाई फूट पड़ी.
विजय ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की तो रवि ने आंखों ही आंखों में उसे फिलहाल वहां से जाने का इशारा किया. लगभग घंटेभर बाद वे विजय के कमरे में पहुंचे तो देखा, विजय अधलेटी अवस्था में पलंग पर था. उन्हें देखते ही वह उठ कर बैठ गया. रविजी भी उस के नजदीक ही पलंग पर बैठ गए.
‘‘पापा, मम्मी कैसी हैं अब?’’
‘‘अपने कमरे में हैं. काफी रोई हैं, अभी लेटी हुई हैं.’’
‘‘पापा, उन्हें समझाइए न.’’

रविजी ने कुछ पल शांत भाव से उस की ओर देखा और फिर बोले, ‘‘बेटा, हमारे लिए तो तुम हमेशा बच्चे ही रहोगे पर क्या असल जिंदगी में भी अभी छोटे बच्चे ही हो? शादी जैसे फैसले को क्या खेल समझ रखा है.’’

नंदिनी के परिवार को हम बेहतर जानते थे. वे लोग हमारी ही बिरादरी वाले हैं. लड़की दिखने में सुंदर है, सुशील है. और फिर, हम सब को अच्छी तरह जानतीसम?ाती थी पर अब अगर वह किसी और को चाहती है तो जाहिर है कि अब तुम्हारे लिए हम कोई और लड़की पसंद करते पर यह काम भी तुम ने खुद ही कर लिया. इस के लिए हमें कोई एतराज नहीं पर बिलकुल ही विपरीत धर्म की लड़की से विवाह आसान बात नहीं है.

‘‘चाहे हम शैली के परिवार को जानते हैं पर वह हम से बिलकुल अलग है, विजय. रीतिरिवाज, खानपान, पहनावा सभी कुछ तो अलग है. इस बात को तो तुम भी समझ.’’
‘‘पर पापा, मैं शैली को अच्छे से जानता हूं. वह हमारे घर आएगी तो हमारे तौरतरीके अच्छे से अपना लेगी. आप जानते हैं, वह तो मांसाहार से भी परहेज करती है.’’
‘‘देखो विजय, प्रेम संबंधों के शुरुआती दौर में यह ‘दुनिया से लड़ कर एकदूजे को अपनाएंगे’ ऐसी बातें बहुत अच्छी लगती हैं पर शादी के बाद जब हकीकत की जमीन पर कदम रखोगे न तो पांव जख्मी हो जाएंगे और वे जख्म भविष्य में नासूर बन कर रह जाएंगे.’’
विजय बेहद असमंजस की स्थिति में आ चुका था.
एक गहरी सांस ले कर रविजी बोले, ‘‘और बेटा, क्या शैली शादी के बाद अपने घर से रिश्ता तोड़ देगी, नहीं न, तो क्या तुम्हारी होने वाली संतान वहां के तौरतरीके से अनजान रहेगी? नहीं बेटे, ऐसा नहीं होगा और इन परिस्थितियों में जो सब से ज्यादा पछताएंगे, वे होंगे तुम और शैली क्योंकि अपनेअपने परिवार को खुश रखने का सारा भार तुम दोनों के कंधों पर ही होगा. इन बातों पर गौर करो, बेटा.’’

रविजी तो यह समझ कर वहां से चले गए पर अब विजय का सिर फटने को हो रहा था.
ऐसा नहीं था कि शैली और उस ने कभी इन बातों को सोचा नहीं था परंतु इतनी गहराइयों से वे इन सब बातों पर कभी विचार न कर पाए थे. इस रिश्ते के लिए ‘चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनेअपने घर वालों को मना लेंगे’ बस यही बातें होती थीं उन की.

रविजी की बातों को सुनने के बाद वह पूरी रात बेचैनी से कमरे में टहलता रहा. सुबह रविजी ने ही रमाजी के लिए चाय बनाई और बैडरूम में ले कर पहुंचे. धीमे से उन्होंने रमाजी को उठाया. उन की आंखें सूजी सी थीं. उन्होंने चाय पीने से इनकार कर दिया. रविजी से बोलीं, ‘‘समझ दिया न आप ने विजय को कि यह शादी नहीं होगी. हम दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे? सभी रिश्तेदारों को हम पर हंसने का मौका मिल जाएगा. सभी कहेंगे कि अपनी बिरादरी से हम अपने इकलौते बेटे के लिए एक लड़की नहीं ढूंढ़ सके.’’
‘‘मैं ने उसे काफी समझाया है. अब तुम सब्र से काम लो. अभी मिलोगी तो गुस्से से बात मत करना और शैली की बात चले तो कुछ भी अनापशनाप मत बोलने लग जाना, अपना व्यवहार रोजमर्रा जैसा ही रखना.’’
रविजी के यह समझने पर विजय के घर पर तो कोई अप्रिय बात नहीं हुई परंतु नंदिनी के घर पर इन्हीं बातों की चर्चा हो रही थी.
जाहिर है, अनिलजी और ऊषाजी बीते दिन हुई घटना से उबर नहीं पाए थे.
‘‘नंदिनी, तुम ने कभी अमन के बारे में इस तरह तो नहीं बताया था कि तुम उस से शादी करना चाहती हो. हम दोनों तो विजय को ही तुम्हारे भावी वर के रूप में सोचते रहे,’’ अनिलजी ने नंदिनी से कहा.

‘‘पापा, मैं ने मम्मी से कहा था कि विजय की फैक्ट्री के मुहूर्त वाले दिन लड़के से मिलवा दूंगी, मैं उस दिन अमन का नाम आप लोगों को बताना चाहती थी पर उस से पहले ही अंकल ने…’’

अनिलजी और ऊषाजी ने एकदूजे को देखा और क्योंकि अब विजय ही शैली से शादी करना चाहता था तो विजय का नाम तो अब नंदिनी से जोड़ना फुजूल था पर अमन के परिवार से रिश्ता उन लोगों के लिए अकस्मात आया हुआ था तो इसे ले कर वे लोग अभी दुविधा में थे.

बेशक अमन की मांजी ने बीते दिन ही नंदिनी को खुले दिल से अपनी बहू बनाने की इच्छा नंदिनी के मम्मीपापा के समक्ष रखी थी पर फिर भी, इस नए रिश्ते को अपनाने में अनिल और ऊषाजी दोनों ही कुछ अनिश्चितता की अवस्था महसूस कर रहे थे और अभी कुछ समय के लिए यह बात उठाना नहीं चाहते थे.

उधर शैली के घर में जौन और लीना आपस में बात कर रहे थे, ‘‘लीना, आखिर शैली को अपनी कम्युनिटी में कोई लड़का नहीं मिला क्या जो उस ने विजय से शादी करने के बारे में सोचा?’’
‘‘सोचा नहीं जौन, वे दोनों एकदूजे को चाहते हैं. शैली सरल स्वभाव वाली एक समझदार लड़की है. अगर यह रिश्ता हुआ तो यकीन मानो, शैली कभी इस घर का नाम खराब नहीं करेगी. तुम चिंता मत करो, सब ठीक होगा.’’ लीना ने जौन के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा.
जौन की आंखों में चिंता की लकीरें कुछ कम हुईं तो उन्होंने पूछा, ‘‘तुम ने शैली से बात की?’’
‘‘हां, रात को ही की थी. वह बहुत रोई जैसे उस से उस ने प्यार नहीं, कोई अपराध कर दिया हो. जब मैं उसे संभाल रही थी तो वह रोतेरोते बोली कि वह कभी हम दोनों का दिल नहीं दुखाना चाहती थी. उस ने और विजय ने तो यह तय कर रखा है कि यदि दोनों के ही परिवार इस शादी की रजामंदी नहीं देते तो वे दोनों ही अपनेअपने परिवारों का मान रखेंगे.

घर छोड़ कर जाना या कोर्ट मैरिज जैसे कदम वे कभी न उठाते बल्कि फैमिली की रजामंदी ही उन दोनों के लिए सब से जरूरी है. तभी तो कह रही हूं, अपनी शैली को अब उस की पसंद से शादी की इजाजत दे दो. उस का मुरझाया चेहरा देखना अब मेरे बस में नहीं है. लीना की आंखों से आंसू बह चले तो जौन ने उसे सीने से लगा लिया.

अमन के पिता सुधीरजी सीधेसादे मगर व्यावहारिक व्यक्ति थे. सुरेखाजी ने उन्हें सारी बातें बताईं और साथ ही, यह भी बताया कि उन्हें काफी समय पहले से ही नंदिनी अमन के लिए बहुत पसंद है.

‘‘सिर्फ तुम्हारी पसंद से ही बात नहीं बनने वाली, नंदिनी के मातापिता भी इस रिश्ते को दिल से स्वीकारें, यह भी जरूरी है. अब तुम्हीं बताओ, उस दिन जब तुम ने अपना प्रस्ताव उन लोगों के समक्ष रखा तो उन लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? अमन और नंदिनी ने आपस में प्रेमसंबंध तो जोड़ लिया लेकिन विवाहसंबंध जोड़ने के लिए तो मातापिता की खुशी भी तो जरूरी है.’’

‘‘आप की बात समझती हूं मैं, पर उस वक्त तो स्थिति इतनी अजीब सी हो गई थी कि मैं आप को क्या बताऊं. रमा बहन तो बिलकुल ही नाखुश दिख रही थीं. मुझे नहीं लगता कि विजय का परिवार विजय की पसंद को अपनाएगा.’’

‘‘शादीब्याह का मामला है और फिर अंतर्जातीय. नाजुक हालात हैं उन लोगों के लिए. सोचनेसमझने में उन लोगों को वक्त तो लगेगा ही.’’

‘‘अमन, सबकुछ कितना डांवांडोल सा लग रहा है. ऐसी भूलभुलैया सी लग रही है जिस में से निकलने का कोई रास्ता सुझाई नहीं दे रहा,’’ नंदिनी काफी परेशानीभरे स्वर में बोली.

‘‘कई बार समस्याएं अथाह गहरे समुद्र समान दिखती हैं जो दिखने में भयावह होता है पर भला कोई समुद्र के पानी के बहाव को रोक सका है, न कोई दीवार न कोई पहाड़. जिस तरह पानी अपना रास्ता खुद खोज लेता है उसी तरह इस परेशानी का भी कोई हल जरूर निकलेगा. तुम चिंता मत करो बल्कि शैली को थोड़ी हिम्मत दो. मैं भी कल विजय से मिलूंगा,’’ इतना कह कर अमन ने फोन का रिसीवर नीचे रख दिया.

चारों ही परिवारों के लिए अगले कुछ दिन अजीब सी कशमकश में बीते पर कहते हैं न, रात इतनी भी लंबी नहीं होती कि अंधेरे को लीलने वाले सूरज को अपने साए में छिपा ले. सूरज उदय होता है और अंधेरे में डूबी हर चीज साफसाफ नजर आने लगती है.

रविजी के पुराने और गहरे दोस्त विशाल कपूर जो सालों पहले लंदन चले गए थे, उन का किसी जरूरी काम से अगले कुछ दिनों में दिल्ली आना तय हुआ. जैसे ही रविजी को यह पता चला, वे काफी खुश हुए. बहुत अरसे बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात होने जा रही थी वरना तो चिट्ठियां और फोन ही जरिया थे दोनों की बातों के.

विशालजी ने अपने जरूरी काम निबटाए और अगले दिन जाने से पहले उन्होंने रविजी से रात के खाने के बाद घर के माहौल का जिक्र किया.
‘‘रवि यार, घर में कुछ शांत सा माहौल है, भाभी चुप सी रहती हैं और विजय, विजय तो जवान लड़का है पर एक अजीब सी उदासी उस के चेहरे पर दिखाई देती है, आखिर बात क्या है?’’
रविजी ने एक गहरी सांस ले कर विशालजी को सारी बात बताई.
सारी बात जानने के बाद विशालजी धीमे से हंस दिए.
रविजी चुपचाप उन्हें देखते रहे.

‘‘यार, मुझे तेरी दोस्ती पर बड़ा मान है पर ये धर्म, जाति की बातें बीच में न ला. तेरा खुद का मानना है कि लड़की अच्छी है, परिवार अच्छा है तो सिर्फ तेरी बिरादरी से नहीं है, इस वजह से तुम लोग वहां विजय की शादी नहीं करना चाहते, ये सब दकियानूसी विचार कम से कम मेरे सामने तो न रख. अमन और नंदिनी भी तो एक बिरादरी के नहीं हैं तब भी अमन का परिवार खुले हाथों से नंदिनी का स्वागत करने को तैयार है तो वहां नंदिनी के मातापिता राजी नहीं हो रहे. अरे, सभी उंगलियां एकसमान नहीं होतीं पर साथ मिलती हैं तभी मुट्ठी बनती है. तू भी यह बात समझ और अनिल भाई को भी समझ.’’

‘‘भारत में यह कोई छोटीमोटी बात नहीं है, शादी करनी है इकलौते बेटे की, हजार बातें सोचनी पड़ती हैं.’’
‘‘समाज की सोचना चाहता है अपने बेटे की खुशी को कुरबान कर के. अच्छा, एक बात बता, अगर तुम दोनों की बात मान कर विजय शैली से शादी न भी करे तो क्या गारंटी है कि वह तुम लोगों की पसंद से शादी कर ही लेगा. अगर उस ने शादी ही न करने का फैसला ले लिया तो तेरा समाज खुश हो जाएगा?

‘‘और, जिस बिरादरी की वकालत तू कर रहा है, जरा याद कर के बता दे कि तेरे कितने बिरादरी वालों ने अपनेअपने घर, अपने बच्चों की परवरिश, उन की शादियां तुझ से पूछ कर की हैं. देख यार, बात लाख पुरानी सही पर बिलकुल सटीक है कि कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना.’’
‘‘मैं अगर मान भी जाऊं तो भी विजय की मां नहीं मानेगी, उस के बहुत सपने हैं विजय की शादी को ले कर.’’
‘‘अरे, तो कर न उन के सारे सपने पूरे. बस, अपने बच्चे की खुशी की कीमत पर नहीं, सारी रस्में, सारी खुशियां सब मना यार, तेरे बेटे की शादी है.’’
बातें खत्म हो गईं और साथसाथ रात भी ढल गई. भोर का उजाला देखते हुए रवि जी ने काफीकुछ सोच लिया था. विशालजी तो वापस चले गए पर रविजी के आगे बहुतकुछ स्पष्ट कर गए थे.

अब सब से पहले उन्हें रमा को मनाना था. ‘‘नहीं, नहीं. ये कैसी बातें कर रहे हैं आप, क्या कहेंगे सब?’’ रमाजी आज भी उन्हीं बातों पर अडिग थीं. ‘‘रमा, हमें अपने बेटे के बारे में सोचना है और यह मत भूलो कि जोरजबरदस्ती से विजय की शादी तो क्या ही करवा पाएंगे, कहीं विजय को न खो दें.’’
‘‘चुप रहिए आप, मत कीजिए ऐसी बातें,’’ रमा के आंसू बहने लगे.
‘‘रमा, मान जाओ, विजय की खुशी के बारे में सोचो और किसी के बारे में नहीं.
यह क्या कम है कि आज के वक्त में बालिग बच्चों ने कोई कदम खुद नहीं
उठाया बल्कि हम बड़ों को यथासंभव मान दे रहे हैं. मैं कल ही अनिलजी से मिलता हूं और शैली के घर भी जाता हूं. बहुत वक्त जाया हो गया, अब और नहीं. और रमा, ये सब तुम्हारे साथ के बिना संभव नहीं. बोलो, साथ हो न मेरे?’’
रमाजी ने कुछ पल उन्हें देखा और फिर मुसकरा कर हां की मुद्रा में सिर हिला दिया.
‘‘रवि भाई साहब, ये सब क्या हो गया है. हम ने तो ये सब कभी सोचा भी नहीं था,’’ अनिलजी का स्वर कुछ बुझ सा था.

‘‘अनिल भाई, यदि सोचने मात्र से ही सब काम अपने मनमुताबिक हो जाएं तो इंसानी जीवन का महत्त्व ही क्या, जीवन मिला है कुछ अच्छा करने के लिए, नई दिशा में कदम बढ़ाने के लिए, आज का वक्त धर्म, जाति, बिरादरी से ऊपर उठ कर समाज को एकसाथ ले कर चलने का है.’’
‘‘उम्र के इस मोड़ पर भी मेरा दोस्त मुझे सही राह पर चलना सिखा सकता है तो मैं भी उस के विचारों को सर्वोपरि रख कर उस राह पर कदम बढ़ा सकता हूं और चाहता हूं कि इस फैसले में मुझे चारों परिवारों का साथ भी मिले जो समाज में एकता का संदेश दें. पिछड़े विचारों को किनारे कर नई पीढ़ी को समझ कर उन के साथ खुशी से जीवनयापन करें’’
‘‘यदि हमारे इस फैसले से कुछ परिवार भी समझदारी से काम लें और अपने रिश्तों को बनाए रखें तो हमारा जीवन सार्थक हो जाएगा.’’
‘‘आप सही कह रहे हैं भाईसाहब, केवल अपने ही विचारों की धुंध में अपने ही बच्चों पर विश्वास करने की जो इबारत स्पष्ट नहीं दिख रही थी, अब आंखों के आगे साफसाफ दिख रही है. आइए, अपनेअपने समधियों के घर चलें’’ अनिलजी बेहद खुश नजर आ रहे थे.
‘‘और अब की बार रिश्ता जोड़ने में कोई जल्दबाजी नहीं करूंगा,’’ यह कह कर रविजी ठहाका मार कर हंस पड़े और अनिलजी ने भी उन का खुल कर साथ दिया.

जौन और लीना विजय को पसंद तो शुरू से ही करते थे पर अब वे उसे दूसरी ही नजरों से देख रहे थे. शैली के जीवनसाथी के रूप में स्वीकारने में हिचकिचा रहे थे पर रविजी और अनिलजी की बातों से बेहद प्रभावित हुए और उन के दिलों को काफी सुकून मिला जब रविजी ने उन्हें यह बताया कि रमाजी की भी इस रिश्ते के लिए पूर्ण सहमति है और वे लोग अब किसी संशय में न रहें. दोनों ही अब शैली को ले कर संतुष्ट हो गए थे.

सुधीरजी और सुरेखाजी को आरंभ से ही इस रिश्ते के लिए कोई मलाल न था. बस, वे लोग केवल इतना चाहते थे कि नंदिनी के मातापिता भी खुशीखुशी नंदिनी को अमन से शादी करने की इजाजत दें ताकि भविष्य में सभी के संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें.

अनिलजी ने उन लोगों से भली प्रकार इस रिश्ते के बारे में बातें कीं. उन्होंने अमन के मातापिता को विश्वास दिलाया कि बच्चों की खुशी में ही उन की सच्ची खुशी है और वे अब इस रिश्ते को दिल से अपनाते हैं.

दोनों विवाह एक ही दिन संपन्न हुए. चार प्यारे दोस्त आज 2 खूबसूरत वैवाहिक जोड़े के रूप में दुनिया के सामने थे और उन चारों की खुशी देखते ही बनती थी.

सभी कुछ सुचारुरूप से चलने लगा. विजय और शैली ने बहुत संयम का परिचय दिया. चारों परिवार सारे तीजत्योहार मिल कर मनाते थे. रविजी और रमाजी ने शैली को अपनी बेटी की तरह अपना लिया था. शैली भी उन दोनों में अपने मातापिता की परछाईं देखती थी. अपनी समझदारी और लगन से जल्दी ही उस ने सब के दिल जीत लिए. रमाजी तो अब शैली के व्यव्हार की कायल हो चुकी थीं. अमन और नंदिनी ने भी कभी किसी परिस्थिति में अपने दोस्तों को अकेला नहीं छोड़ा.

रविजी के फैसले ने सभी बच्चों का उन की खुशियों से मिलन करवाया था. अब तो सभी लोग, चाहे वे पासपड़ोस से हों या उन के रिश्तेदार, इन परिवारों की एकता की मिसाल देते थे. जब भी किसी भी मौके पर सभी एकत्रित होते थे तो रविजी के दिल से एक ही बात निकलती थी कि ‘मैं तो अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया.’ और यह कारवां था सब की खुशियों का, जो अब सामाजिक एकता का जीताजागता उदाहरण था.  Family Story In Hindi 

लेखिका : साहिबा टंडन

Family Story : टपरी – रिश्तों को रिचार्ज करती कथा

Family Story : चलो, थोड़ा रुकते हैं, थोड़ा जीते हैं. मोबाइल को जेब में रख, किसी अपने की आंखों में झांकते हैं. यही तो मन करता था नंदा का लेकिन वक्त के साथसाथ सब बदल रहा था.

मुंबई में बारिश के मौसम के बारे में कोई आम इंसान यहां सालों रहने के बाद भी अंदाजा नहीं लगा सकता. कभी लगता है, घर से निकल रहे हैं, तेज बारिश होने वाली है, छाता भी ले लो, बारिश वाले शूज भी पहन लो, ऐसे कपड़े पहन लो जो भीग कर तन से चिपट न जाएं और जब घर से बाहर निकलो तो सब सूखा. 2 घंटे बाद घर आओ तो लगता है कुछ ज्यादा ही तैयारी कर ली थी. एक बूंद भी न बरसा और कभी आसमान इतना साफ लगता है कि पक्का यकीन हो जाता है कि छाते को ढोने की कतई जरूरत नहीं है.

बीस सालों से बारिश के मौसम से नंदा यही आंखमिचौली खेल रही है या यह भी कह सकते हैं कि बारिश नंदा से आंखमिचौली खेलती है. प्रकृतिप्रेमी नंदा 45 साल की हाउसवाइफ है. वह अपने बच्चों रेयान और काव्या को कालेज और पति विजय को औफिस भेज कर 8 बजे सैर के लिए जरूर निकलती है.

पहले वह अपनी 2 सहेलियों अंजू और रेनू के साथ सैर पर जाती थी, बातें करतेकरते, हंसतेबोलते बढि़या सैर होती थी. फिर धीरेधीरे पहले अंजू, फिर रेनू गार्डन के ट्रैक पर एकदो राउंड के बाद एक बैंच पर बैठ कर रील्स देखने लगतीं, नंदा का मूड औफ हो जाता. फिर उन दोनों ने सैर पर आना ही छोड़ दिया. नंदा भी सोचती, ठीक है, साथ आ कर भी क्या कंपनी मिलती थी, दोनों फोन से ही चिपकी रहती थीं.

रोज सैर पर दिखते लोगों से भले ही कभी बात न हो, कोई जानपहचान न हो पर रोज दिखने से एक अबूझ रिश्ता सा बनता चला जाता है. ऐसे ही नंदा 2 लोगों को एक लंबे वक्त से देख रही थी. एक, फिट और हंसमुख से बुजुर्ग अकेले सैर करते दिखते थे जिन्हें अब नंदा गुडमौर्निंग कहती आगे बढ़ने लगी थी. वे भी जवाब दे कर मुसकरा कर आगे बढ़ जाते. दूसरा, करीब 32 साल का लड़का भी सैर पर नियमित दौड़ता, भागता दिखता था.

गार्डन के बाहर एक टपरी थी जहां सैर से लौटते लोग कभीकभी रुक कर चाय पीते. नंदा का बड़ा मन करता कि कभी ऐसे ही वह भी, पुरुषों की तरह, खड़ी हो कर चाय पी ले पर वहां कोई महिला कभी अकेली न दिखती. कभी कोई रुकती भी तो उस के पति साथ होते. सालों से उस का मन होता कि वह भी किसी के साथ यहां रुके, चाय पिए, हंसेबोले. सच बात तो यह थी कि नंदा किसी से दिल खोल कर बातें करना चाहती थी पर उस के आसपास की दुनिया अब फोन में खोती जा रही थी. कभीकभी तो सैर करते हुए लोग अपने फोन में देख रहे होते थे. नंदा को ये लोग चलतेफिरते जौम्बी लगते.

ऐसे ही बारिश के मौसम का एक दिन था. नंदा साफ मौसम देख कर बिना छाते के सैर पर आ गई थी. देखते ही देखते आसमान काला हो गया और बारिश शुरू हो गई. नंदा तेज कदमों से गार्डन से निकली. उस ने देखा, वे बुजुर्ग और वह रोज आने वाला लड़का उस टपरी के अंदर खड़े हो गए हैं. बारिश होने पर टपरी वाला जल्दी से बैंच अंदर खींच देता था. नंदा को टपरी में जाने का यह मौका बड़ा लुभावना लगा. वह उन बुजुर्ग और उस लड़के को मुसकरा कर देखती हुई उन लोगों के साथ खड़ी हो गई. अपने लिए टपरी वाले को चाय का और्डर देते हुए लड़के ने बुजुर्ग और नंदा से कहा, ‘‘आप लोग चाय पियोगे?’’
नंदा ने जरा संकोच से कहा, ‘‘मैं सैर पर न तो फोन लाती हूं, न पर्स. बस, घर की चाबी ले कर आ जाती हूं.’’
‘‘तो क्या हुआ, इतना अच्छा मौसम है, आज चाय मेरी तरफ से.’’
बुजुर्ग ने ‘हां’ में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगली बार मेरी तरफ से चाय होगी.’’
नंदा हंसी, ‘‘उस से अगली बार मैं पर्स ले आऊंगी. वैसे, मेरा नाम नंदा है. ‘दोस्ती’ सोसाइटी में रहती हूं.’’
‘‘मेरा नाम अजय है, ‘कंचनपुष्प’ में रहता हूं.’’
‘‘मैं शेखर, ‘दर्शन’ में रहता हूं.’’

टपरी वाले ने तीनों को चाय दी. नंदा आज बहुत खुश थी. परिवार के साथ बड़ेबड़े होटल्स में खाना खाना अलग, आज यहां बेफिक्र, अनजान लोगों के साथ टपरी में तेज बारिश में चाय पीना, अनोखा एहसास. बुजुर्ग ने पूछ लिया, ‘‘वैसे, तुम फोन के बिना कैसे? आजकल तो बारबार फोन देखे बिना किसी को चैन नहीं आता और तुम फोन लाती ही नहीं, कमाल की बात है.’’
‘‘कुछ समय तो इंसान ऐसा बिताए जो फोन के बिना गुजरे. फोन ने तो लाइफ ही बदल कर रख दी, कोई साथ में भी हो तो भी अकेलापन लगता है. अरे, बारिश रुक गई. मैं अब भागती हूं. थैंक यू, अजय. आज मेरा एक सपना पूरा हुआ.’’
‘‘कौन सा सपना?’’
‘‘यहां टपरी पर चाय पीने का सपना. कोई साथ नहीं मिलता था.’’ वे दोनों हंसने लगे. नंदा तेजी से दोनों से ‘कल सुबह मिलते हैं’ कह कर वहां से निकल गई.

आज घर जा कर नंदा का तनमन खिला हुआ था. वह एक ताजगी से भरी थी. दिनभर के काम उस ने बहुत उत्साह से निबटाए. शाम को जब विजय और बच्चे आ गए तो वह आज उन्हें अपना टपरी का अनुभव बताना चाहती थी पर जैसा कि आज के समय में एक ही घर के लोग मीलों दूर बैठे लोगों से तो चैट कर सकते हैं पर घर में ही एकदूसरे के मन की थाह पाने में किसी को कोई रुचि नहीं. डिनर के बाद तीनों हमेशा की तरह फोन पर बिजी थे. उस ने कई बार चाहा कि सब को एकसाथ बुला कर टपरी का किस्सा सुनाए पर उसे लगा, नहीं, रहने देती हूं, विजय उपदेश देंगे कि अजनबियों से दूर रहो, बच्चे थोड़ा मजाक बना लेंगे. फिर अपनेअपने फोन में घुस जाएंगे. विजय अब तक ट्विटर पर थे. नंदा का मन नहीं माना. वह उन के पास गई, ‘‘आज की एक मजेदार बात बताऊं?’’
फोन से बिना नजरें हटाए विजय ने ‘हूं’ कहा तो नंदा ने कहा, ‘‘फोन तो रखो.’’
‘‘कुछ पढ़ रहा हूं.’’
‘‘क्या?’’
‘‘ट्रोलर्स के जवाब. मजा आ जाता है, यार. सैलिब्रिटीज के तो पीछे पड़े रहते हैं. इन लोगों के मुंह से एक शब्द निकला नहीं कि बवाल खड़ा कर देते हैं.’’

नंदा के मन में कुछ चटक सा गया. अपने मन की बात किस से करे. बच्चों के रूम में ?झांका, दोनों रील्स देखदेख कर हंस रहे थे. वह चुपचाप अपने बाकी के काम निबटाने लगी. दिल आजकल उदास रहता है. हर रिश्ते में डिजिटल तकनीक घुस आई है. उसे लगता है, यह डिजिटल तकनीक हर रिश्ते को दीमक की तरह एक दिन खा जाएगी.
बातें खत्म होती जा रही हैं. कोई बात करना चाहता है तो सुनने वाला कोई नहीं है. अगले दिन वह फिर सैर पर गई. शेखर और अजय आज अपने से लगे. दोनों उसे देख कर मुसकराए. तीनों रोज की तरह अपनीअपनी सैर अलगअलग करते रहे. फिर वहां रखी एक बैंच पर शेखर बैठे दिखे तो नंदा भी उन के पास जा कर बैठ गई. अजय भी उन दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया, पूछा, ‘‘आप लोगों की सैर हो गई?’’
‘‘हां, आज आने का मूड नहीं था, सोचा, घर पर भी क्या करूंगा, फिर आ ही गया.’’
‘‘मैं तो अंकल को बैठा देख रुक गई.’’
‘‘और मैं आप दोनों को बैठा देख रुक गया.’’ तीनों हंसे. नंदा ने कहा, ‘‘अब किसी दिन बारिश हो तो टपरी पर फिर चाय पिएं. मुझे कल बड़ा मजा आया.’’
शेखर ने कहा, ‘‘बारिश का क्या वेट करना, चलो, चाय पी लेते हैं.’’
अजय ने कहा, ‘‘बस मैं 2 राउंड और दौड़ कर आया.’’
‘‘ओके,’’ नंदा ने थम्स अप किया. शेखर ने पूछा, ‘‘और बताओ, घर पर कौनकौन है?’’
‘‘पति और 2 कालेज जाने वाले बच्चे. आप के घर पर कौनकौन है?’’
‘‘बेटा, बहू और एक पोता. तीनों कामकाजी. और मैं रिटायर्ड आदमी. पत्नी
रही नहीं.’’
‘‘आंह, सौरी.’’
नंदा ने कनखियों से शेखर को देखा, उन का चेहरा उदास था.
थोड़ी देर में पसीने से तर अजय आ गया, ‘‘चलें?’’

पता नहीं क्या बात थी, नंदा को इन 2 अजनबियों से बात करते हुए जरा भी डर नहीं लगा, न कोई संकोच हुआ. किसीकिसी की वाइब्स इतनी पौजिटिव होती हैं, नंदा यह साफसाफ महसूस कर रही थी. वैसे भी, एक लंबे समय से दोनों को देख तो रही ही थी. उस के मन में बहुत दिनों से एक ख्वाहिश रहती थी कि उस के कुछ ऐसे दोस्त बन जाएं जो डिजिटल तकनीक की दुनिया से कुछ दूर रहने वाले हों, कुछ ब्रेक लेने वाले हों, जिन से वह कुछ बातें करे, हंसे, बोले.

वह बातें करने के लिए तरसने लगी थी. सहेलियों से कई बार कहती, ‘शौपिंग के लिए निकलें? कुछ चाटवाट खा कर गप्पें मारते हुए आ जाएंगे.’ वे कहतीं, ‘शौपिंग तो औनलाइन हो जाती है, कौन दुकानों पर, मौल में धक्के खाए.’
हां, कभी खानेपीने का प्रोग्राम बन जाता तो वहां भी उन्हें खाने की चीजों की फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड करने की जल्दी रहती. सैल्फी लेने में व्यस्त रहतीं. जो परेशानी नंदा को घर में महसूस होती, वही अब सहेलियों के साथ भी होती. मन का अकेलापन बढ़ता जा रहा था. ऐसे में मिले ये दोनों अजनबी उसे अपने से लगने लगे. वह दिल खोल कर उन दोनों से बातें करती.
टपरी में आज बाहर खड़े हो कर नंदा ने चाय पी. उस का उत्साह देख कर शेखर हंस दिए, ‘‘नंदा, टपरी में चाय पी कर कोई इतना खुश हो सकता है, यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था.’’
‘‘खुश होने की 2 वजहें एकसाथ मिल गईं. बातें करने वाले 2 दोस्त बन गए और टपरी में चाय तो कब से पीनी थी. अजय, तुम्हारे घर पर कौनकौन है?’’
‘‘मेरी वाइफ, कंचन. अभी हम 2 ही लोग हैं.’’
‘‘वह सैर पर नहीं आती?’’
‘‘नहीं, उसे शौक नहीं. वह सोशल मीडिया की मारी है. इस शौक ने उसे थोड़ा आलसी बना दिया है. पहले अच्छीभली अपनी फिटनैस पर ध्यान देने वाली लड़की थी, अब तो उस का हर काम फोन पर ही हो जाता है. पहले तो यहां मुझ से भी तेज दौड़भाग कर जाती थी पर जैसेजैसे आलस बढ़ा, उस का सब छूट गया. वैसे, एमबीए किया है, जौब की तलाश में है.’’
शेखर कहने लगे, ‘‘मुझे लगता था कि मैं इस उम्र में अकेला जी रहा हूं, अब लग रहा है, शायद सब अकेले होते जा रहे हैं.’’
‘‘आप सही सोच रहे हैं,’’ कह कर अजय चाय के पैसे देने लगा.

नंदा बड़े हलके, खुश मन से घर लौटी. कितना अच्छा लग रहा था आज. उस के जीवन में एक ही कमी थी, वह पूरी होती दिख रही थी. उसे दोस्त मिल गए थे, अनजान थे, अजनबी थे पर दोस्त बन रहे थे. उसे उन दोनों के साथ बातें करने में, समय बिताने में जरा सा भी अपराधबोध नहीं हो रहा था. नए दोस्तों से जुड़ाव उसे कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा पाएगा, वह यह भी महसूस कर रही थी.

शेखर उस से बहुत बड़े हैं, उन की बातों में सिर्फ स्नेह दिखा है. अजय उस से बहुत छोटा है. वह एक स्त्री है जिस की सिक्स्थ सैंस कमाल होती है. उसे इन दोनों से कभी कोई परेशानी नहीं हो सकती, यह उसे समझ आ गया है. अगर कभी कोई शंका हुई भी तो वह अपने रास्ते बदल लेगी. प्यार, मोहब्बत, धोखे जैसी चीज यहां होने वाली नहीं है.

सब को एक अकेलापन महसूस हो रहा है जो शायद आज घरघर की परेशानी है पर कोई मान नहीं रहा है. घर के काम करतेकरते उस ने सोचा, अरे हां, कल एक छोटे से स्ंिलग बैग में पैसे ले कर जाएगी. कल उन दोनों को चाय वह पिलाएगी. टपरी वाला बनमस्का भी तो रखता है, आज कोई खा रहा था, बढि़या लग रहा था. कल वह भी अपने दोस्तों के साथ खाएगी. सालों से टपरी पर लोगों को दोस्तों के साथ रुकते, चाय पीते देख रही है. अब जा कर उसे दोस्त मिले हैं. वह भी सैर के बाद रोज टपरी पर रुकेगी जब तक रुक पाएगी.
इतने में विजय का फोन आया, ‘‘अरे, कहां थीं? इतनी देर से फोन कर रहा हूं.’’
‘‘सैर पर. क्या हुआ?’’
‘‘यार, तुम फोन ले कर जाया करो.’’
‘‘नहीं, मुझे जरूरत नहीं लगती. ले गई तो मैं भी जौम्बी की तरह मशीनी सैर करने लगूंगी. वैसे भी, फोन देखते सैर करते हुए लोगों से खुद ही बचना पड़ता है. फोन क्यों किया था?’’
‘‘टैंथ फ्लोर वाले मित्तल साहब की तबीयत खराब है, उन्हें हौस्पिटल ले गए हैं. उन की वाइफ के पास कोई नहीं है, तुम उन्हें फोन कर लेना और हौस्पिटल चली जाना.’’
‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’
‘‘मित्तल साहब ने फेसबुक पर स्टेटस डाला था, ‘गोइंग टू हौस्पिटल, नौट वैल.’
‘‘तुम औफिस में भी फेसबुक देख रहे हो? वैरी गुड,’’ नंदा ने मन ही मन अपना सिर पीट लिया.
‘‘उन के पास कोई नहीं है? वे तो कहती हैं, सोशल मीडिया पर मित्तल साहब के सोसाइटी में ही बहुत फौलोअर्स हैं. उन्हें तो किसी से मिलनाजुलना भी पसंद नहीं है.’’
‘‘सारे ताने मुझे सुनाए जा रहे हैं न?’’
नंदा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस इतना कहा, ‘‘सिंधु बाई काम कर के चली जाए तो जाती हूं. उन्हें फोन अभी कर लूंगी.’’

नंदा को याद आया, एक दिन उस ने मित्तल साहब की पत्नी नैना से कहा था, ‘बिल्ंिडग का एक गेटटुगेदर शुरू कर लें, सब से मिलतेजुलते रहना चाहिए. एक सर्कल बनना चाहिए, मिलतेजुलते रहने से अच्छा लगेगा.’
‘नहीं, क्या करना है मिलजुल कर. तुम फ्री हो तो किसी और से बात कर लो. अपना कोई ग्रुप बना लो.’

नंदा ने फिर किसी से इस बारे में बात नहीं की थी. रेनू और अंजू से दोस्ती थी ही. नंदा ने नैना से बात की, पता चला, मित्तल साहब को सीने में दर्द हुआ था. टैस्ट हो गए थे, सब ठीक था. उन्हें शायद एसिडिटी ज्यादा थी. वे शाम तक घर आने वाले थे.
नंदा ने पूछा, ‘‘आप लोगों के लिए कुछ खाना ले आऊं?’’

नैना ने कहा, ‘‘हां, प्लीज, मेरे लिए कुछ हलका सा खाना ले आओ. इन की हैल्थ के तनाव में मेरा शायद बीपी हाई हो गया है. यहीं पर चैक भी करवा लूंगी. कैंटीन में मु?ो कुछ अच्छा नहीं लगा. बस, कुछ थोड़ा सा ले आओ. बेटी बाहर ही रहती है, उसे अभी कुछ नहीं बताया, परेशान हो जाएगी.’’
नंदा को लगा, नैना सचमुच टैंशन में हैं, बात करना चाहती है, बोलती जा रही थी. ‘‘ठीक है, आप चिंता न करें, मैं कुछ ले आती हूं.’’
‘‘थैंक यू, नंदा.’’

नंदा जल्दी ही उन के लिए परांठा और सब्जी बना कर ले गई. 61 साल के मित्तल साहब अब बेहतर थे. औब्जरवेशन में रखा गया था. 55 वर्षीया नैना को नंदा ने प्यार से नाश्ता करवाया. थोड़ी देर बाद वहां से चलते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का डिनर भी मैं बना लूंगी. आप आराम कर लेना. किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे फोन कर देना.’’
‘‘फ्री हो तो रुको न थोड़ी देर.’’

नंदा ने सोचा, आज किसी से बात करने की नैना को कितनी जरूरत महसूस हो रही है वरना आज का इंसान अपनेआप में ही सिमट कर रहने लगा है. उसे याद आया, एक दिन लिफ्ट में नैना और नंदा साथ ही थे, नैना ने उसे देख कर बस सिर हिलाया था और फोन में कुछ देखने लगी थी. पता नहीं कितने लोग अब लिफ्ट में भी नजरें मिलाए बिना फोन में ही नजरें गड़ाए रखते थे. जितना नंदा यह सब नोट कर रही थी, उस का दिल और उचाट होता रहता.

ऐसा नहीं कि वह इस डिजिटल तकनीकी विकास के खिलाफ थी, बस उसे लगता कि इस तकनीक ने एक इंसान को दूसरे इंसान से दूर कर दिया है. अब वे बातें नहीं हैं, खिलखिलाहटें नहीं हैं, गप्पें नहीं हैं. उस के चारों तरफ एक मशीनी सा जीवन है. उसे कई बार लगता कि आने वाले समय में कहीं इंसान एक मशीन बन कर न रह जाए, कोमल भावनाएं खत्म न हो जाएं. घर जा कर उस ने विजय को बता दिया कि वह हौस्पिटल से आ गई है. उस ने रेनू और अंजू को भी फोन पर नैना के बारे में बताया तो दोनों ने कहा, ‘‘ठीक है, यार. फोन पर कल या परसों पूछ लेंगे. मित्तल साहब ठीक तो हैं ही, अच्छा है.’’
‘‘जा कर मिल लेना, नैना को अच्छा लगेगा. इंतजार क्यों करना कि किसी को कुछ हो तो हाजिरी लगाएं.’’
‘‘ओके, मैडम.’’ नंदा को हंसी आ गई. फिर वह मित्तल दंपती के लिए डिनर की तैयारी में लग गई.

विजय औफिस से आए, तब तक रेयान और काव्या भी घर आ कर अपने प्रोजैक्ट पर काम कर रहे थे. नंदा ने विजय से कहा, ‘‘तुम मित्तल साहब को डिनर भी दे आओ, उन से मिल भी लो.’’
‘‘तुम ही दे आओ, मैं जा कर क्या करूंगा.’’
नंदा को गुस्सा आ गया, ‘‘फिर मुझे क्यों हौस्पिटल भेजा था?’’
‘‘तुम्हें सब से मिलनेजुलने का शौक है न, इसलिए.’’ नंदा ने विजय को गुस्से में घूरा, उस ने कहा, ‘‘अच्छा बाबा, ठीक है, चलता हूं. सोचा था, ओटीटी पर एक नया शो आया है, अभी खाना खा कर शुरू करूंगा पर ठीक है, फटाफट खाना लगाओ, फिर खाना खा कर चलते हैं.’’
नंदा विजय के साथ जा कर नैना को खाना दे आई. मित्तल दंपती नंदा को बारबार थैंक्स कहते रहे. जब दोनों घर वापस आए, रेयान ने कहा, ‘‘अब ऊपर वाले आंटीअंकल ठीक हैं?’’
‘‘हां.’’
विजय ने नंदा को चिढ़ाया, ‘‘आज तुम्हारी मम्मी बहुत खुश हैं पड़ोसिन ने बात की.’’
नंदा ने कुछ नहीं कहा. रेयान और काव्या का पूरा ध्यान अपनेअपने फोन पर था. नंदा ने कहा, ‘‘फोन पर इतना व्यस्त तो पीएम भी न रहते होंगे. सब ने हद कर रखी है.’’
जवाब हाजिर था, ‘‘आप को कैसे पता, पीएम फोन पर हम से ज्यादा व्यस्त नहीं रहते होंगे?’’ नंदा चुप रही, रूटीन चलता रहा.

अगली सुबह शेखर और अजय उस का स्लिंग बैग देख कर हंस दिए. अजय ने कहा, ‘‘आज तो आप टपरी पार्टी के लिए रेडी हो कर आई हैं.’’
‘‘हां, एक सरप्राइज भी है.’’
‘‘क्या?’’
‘‘पहले अपनी अपनी सैर खत्म कर लें.’’ तीनों अपनीअपनी स्पीड में सैर करते रहे. गार्डन बहुत बड़ा था. कई ट्रैक्स थे. बहुत से लोग यहां सैर करने आते, खूब रौनक रहती थी. बहुत हरियाली वाला एरिया था. दूरदूर से लोग यहां कारों से, बाइक्स से आते, गाडि़यां बाहर खड़ी कर के बढि़या सैर करते. सैर हो गई तो नंदा शेखर को ढूंढ़ती हुई उन की बैंच तक पहुंच गई और उन्हें पिछली शाम का मित्तल दंपती का किस्सा सुनाने लगी. शेखर ने कहा, ‘‘मतलब, तुम पड़ोसिन अच्छी हो.’’
नंदा खुले मन से हंसी. शेखर को अजय और नंदा का साथ खूब भाता. सुबह के नए दोस्त उन्हें दिन में भी कई बार याद आते. दौड़ताभागता अजय भी जल्दी ही उन के पास आ गया, बोला, ‘‘चलो, बताओ, क्या सरप्राइज है?’’
‘‘टपरी पर तो चलो.’’
तीनों टपरी पर आ गए. नंदा ने बच्चों की तरह उत्साहित हो कर कहा, ‘‘आज चाय के साथ बनमस्का भी खाएंगे. कल बड़ी अच्छी खुशबू आ रही थी.’’
दोनों ने उस का मुंह देखा, फिर जोर से हंसे. अजय ने कहा, ‘‘भाई, मेरी भागदौड़ बेकार हो जाएगी. बटर तो मैं खाता नहीं.’’
शेखर ने कहा, ‘‘मैं भी घर जा कर बस फल खाता हूं, इस सब की तो मुझे आदत नहीं.’’

नंदा का मुंह उतर गया. अजय ने फौरन कहा, ‘‘नहीं, अंकल, ऐसा करते हैं, हफ्ते में एक दिन तो खा ही सकते हैं. चलेगा, एक दिन में कुछ नहीं होता.’’ फिर टपरी वाले से कहा, ‘‘हां भाई, आज बनमस्का भी खिला दो.’’

नंदा का चेहरा खिल उठा, ‘‘ठीक है, हफ्ते में एक दिन खा लिया करेंगे,’’ नंदा बड़ा प्यारा मुसकराई. अजय ने मजाक किया, ‘‘आज तो किसी चीज की खुशबू नहीं आ रही आप को?’’

शेखर और नंदा हंस दिए. चाय के साथ बनमस्का खाते हुए नंदा का मन खिलाखिला जा रहा था. देखने में बात कितनी छोटी सी थी लेकिन नंदा, शेखर और अजय के लिए यह बात कितनी बड़ी थी, वे ही जानते थे. वे तीनों छोटीछोटी बातों के लिए तरस रहे थे, एक ऐसे साथ के लिए तरस रहे थे जहां उन के पास किसी इंसान का साथ हो, बातें हों, हंसी हो, सुकून हो. इस टपरी ने 3 एकजैसे लोगों को कैसे मिलवा दिया था, इस बात पर तीनों मन ही मन हैरान थे और खुश भी. Family Story 

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