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एक साथी की तलाश: भाग 4- क्या श्यामला अपने पति मधुप के पास लौट पाई?

वे जानते थे. बहू जानबूझ कर इस समय चली गई घर से. लेकिन अब वे क्या करें. श्यामला तो बाहर  भी नहीं आ रही. बात भी करें तो कैसे. इतने वर्षों बाद अकेले घर में उन का दिल श्यामला की उपस्थिति में अजीब से कुतूहल से धड़क रहा था. थोड़ी देर वे वैसे ही बैठे रहे. अपनी घबराहट पर काबू पाने का प्रयत्न करते रहे. फिर उठे और अंदर चले गए. अंदर एक कमरे में श्यामला चुपचाप खिड़की के सामने बैठी बाहर की ओर देख रही थी.

‘‘श्यामला…’’ उसे ऐसे बैठे देख कर उन्होंने धीरे से पुकारा. सुन कर श्यामला ने पलट कर देखा. इतने वर्षों बाद मधुुप को अपने सामने देख श्यामला जैसे जड़ हो गई. समय जैसे पलभर के लिए स्थिर हो गया. आंखों में प्रश्न सलीब की तरह टंगा हुआ था, ‘क्या करने आए हो अब…?’

‘‘आप…’’ वह प्रत्यक्ष बोली.

.‘‘हां श्यामला, मैं…’’ इतने वर्षों बाद उसे देख कर वे एकाएक कातर हो गए थे.

‘‘तुम्हें लेने आया हूं,’’ वे बिना किसी भूमिका के बोले, ‘‘वापस चलो. मुझ से जो गलती हुई है, उस के लिए मुझे क्षमा कर दो. मैं समझ नहीं पाया तुम्हें, तुम्हारी परेशानियों को, तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को…’’

श्यामला अपलक उन्हें निहारती रह गई. शब्द मानो चुक गए थे. बहुतकुछ कहना चाहती थी वह, पर समझ नहीं पा रही थी कि कहां से शुरू करे. किसी तरह खुद को संयत किया.

थोड़ी देर बाद वह बोली, ‘‘इतने वर्षों के बाद गलती महसूस हुई आप को. जब खुद को जरूरत हुई पत्नी की, लेकिन जब तक पत्नी को जरूरत थी? आखिर मैं सही थी न, कि आप ने हमेशा खुद से प्यार किया. लेकिन मेरे अंदर अब आप के लिए कुछ नहीं बचा. अब मेरे दिल को किसी साथी की तलाश नहीं है. जिन भावनाओं को, जिन संवेदनाओं को जीने की इतनी जद्दोजहद थी मेरे अंदर, वह सब तो कब की मर चुकी है. फिर अब क्यों आऊं, आप के बाकी के जीवन जीने का साधन बन कर? मुझे अब आप की जरूरत नहीं है. मैं अब नहीं आऊंगी.’’

‘‘नहीं श्यामला,’’ मधुप ने आगे बढ़ कर श्यामला की दोनों हथेलियां अपने हाथों में थाम ली, ‘‘ऐसा मत कहो, साथी की तलाश कभी खत्म नहीं होती. हर उम्र, हर मोड़ पर साथी के लिए तनमन तरसता है, पशुपक्षी भी अपने लिए साथी ढूंढ़ते हैं, यही प्रकृति का नियम है, मुझ से गलती हुई है, इस के लिए मैं तुम से तहेदिल से क्षमा मांग रहा हूं.

“इस बार तुम नहीं, मैं आऊंगा तुम्हारे पास. इस बार तुम मेरे सांचे में नहीं, बल्कि मैं तुम्हारे सांचे में ढलूंगा. संवेदनाएं और भावनाएं कभी मरती नहीं हैं श्यामला, बल्कि हमारी गलतियों व उपेक्षाओं से सुप्तावस्था में चली जाती हैं, उन्हें तो बस जगाने की जरूरत है. अपने हृदय से पूछो, क्या तुम सचमुच मेरा साथ नहीं चाहती, सचमुच चाहती हो कि मैं चला जाऊं.’’

श्यामला चुपचाप डबडबाई आंखों से उन्हें देखती रह गई. कितने बदल गए थे मधुप. समय ने, अकेलेपन ने उन्हें उन की गलतियों का एहसास करा दिया था. पतिपत्नी में से अगर एक अपनी मरजी से जीता है तो दूसरा दूसरे की मरजी से मरता है.

‘‘बोलो श्यामला,’’ मधुप ने श्यामला को कंधों से पकड़ कर धीरे से हिलाया, ‘‘मैं अब तुम्हारे पास आ गया हूं और अब लौट कर नहीं जाऊंगा,’’ मधुरे पूरे विश्वास व अधिकार से बोले. लेकिन श्यामला ने धीरे से उन के हाथ कंधों से अलग कर दिए.

‘‘अब मुझ से न आया जाएगा मधुप. मेरे जीवन की धारा अब एक अलग मोड़ मुड़ चुकी है. कितनी बार जीवन में टूटूं, बिखरूं और फिर जुडूं, मुझ में अब ताकत नहीं बची. मैं ने अपने जीवन को एक अलग ही सांचे में ढाल लिया है, जिस में अब आप के लिए कोई जगह नहीं. मैं अब नहीं आ पाऊंगी, मुझे माफ कर दो,’’ कह कर श्यामला दूसरे कमरे में चली गई.

स्पष्ट संकेत था उन के लिए कि वे अब जा सकते हैं. मधुप भौंचक्के खड़े, पलभर में हुए अपनी उम्मीदों के टुकड़ों को बिखरते महसूस करते रहे. फिर अपना बैग उठा कर वे बाहर निकल गए वापस जाने के लिए. बेटे के आने का भी इंतजार नहीं किया उन्होंने.

जयपुर से वापसी का सफर बेहद बोझिल भरा था, सबकुछ तो उन्होंने पहले ही खो दिया था. अब एक उम्मीद बची थी. आज वे उसे भी खो कर आ गए थे.

घर पहुंचे तो उन्हें अकेले व हताश देख बिरूवा सबकुछ समझ गया. कुछ न पूछा. चुपचाप हाथ से बैग ले कर वह अंदर रख आया और किचन में चाय बनाने चला गया.

उधर श्यामला खिड़की के परदे के पीछे से थके कदमों से जाते मधुप को करुण निगाहों से देखती रही, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए. दिल कर रहा था कि दौड़ कर वह मधुप को रोक ले, लेकिन कदम न बढ़ पा रहे थे. जो गुजर गया वह सबकुछ याद आ रहा था.

मधुप चले गए, लेकिन श्यामला के दिल का नासूर फिर से बहने लगा. रात देर तक बिस्तर पर करवट बदलते हुए वह सोचती रही कि जिंदगी मधुप के साथ अगर बोझिल भरी थी तो उन के बिना भी क्या थी. क्या एक दिन भी ऐसा गुजरा, जब उस ने मधुप को याद न किया हो. उस के मधुप से अलग होने के निर्णय का दर्द बच्चों ने भी भुगता था. बच्चों ने भी तब कितना चाहा था कि वे दोनों साथ रहें. अपने विवाह के बाद ही बच्चे चुप हुए थे. पर पता नहीं कैसी जिद भर गई थी उस के खुद के अंदर, और मधुप ने भी कभी आगे बढ़ कर अपनी गलती मानने की कोशिश नहीं की और वउन दोनों का सारा जीवन यों वीरान सा गुजर गया. जो मधुप आज महसूस कर रहे हैं. काश, यही बात तब समझ पाते, तो उन की जिंदगी की कहानी कुछ और ही होती.

लेकिन, अब जो तार टूट चुके हैं, क्या फिर से वे जुड़ सकते हैं और जुड़ कर क्या उतने मजबूत हो सकते हैं?

एक कोशिश मधुप ने की, एक कदम उन्होंने बढ़ाया, तो क्या एक कोशिश उसे भी करनी चाहिए. एक कदम उसे भी बढ़ाना चाहिए. कहीं आज निर्णय लेने में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई. इसी उहापोह में करवटें बदलते सुबह हो गई. पूरी रात वह सोचती रही थी, फिर अनायास ही अपना बैग तैयार करने लगी. उस को तैयारी करते देख बेटेबहू आश्चर्यचकित थे, पर उन्होंने कुछ न पूछना ही उचित समझा. मन ही मन सब समझ रहे थे. खुशी का अनुभव कर रहे थे. श्यामला जब जाने को हुई तो बेटे ने साथ में जाने की पेशकश की, पर श्यामला ने मना कर दिया.

उधर उस दिन दोपहर को सोए हुए मधुप की जब शाम को नींद खुली, तो वह शाम और दूसरी शाम की तरह ही थी. पर, पता नहीं मधुप आज अपने अंदर हलकी सी तरंग क्यों महसूस कर रहे थे. तभी बिरूवा चाय बना कर ले आया. उन्होंने चाय का पहला घूंट भरा ही था कि डोरबेल बज उठी.

‘‘देखना बिरूवा कौन आया है?’’ मधुप ने आवाज दी.

‘‘अखबर वाला होगा. पैसे लेने आया होगा, शाम को वही आता है,’’ कह कर बिरूवा बाहर चला गया. लेकिन पलभर में ही खुशी से उमगता हाथ में बैग उठाए अंदर आ गया. मधुप आश्चर्य से उसे देखने लगे.

‘‘कौन है बिरूवा? कौन आया है और यह बैग किस का है?’’

‘‘बाहर जा कर देखिए साब. समझ लीजिए, पूरे संसार की खुशियां चल कर आ गई हैं आज दरवाजे पर,’’ कह कर बिरूवा घर में कहीं गुम हो गया. वे जल्दी से बाहर गए. देखा, दरवाजे पर श्यामला खड़ी थी. वे आश्चर्यचकित, किंकर्तव्यविमूढ़ से उसे देखते रह गए.

‘‘श्यामला तुम,’’ उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘हां मैं…’’ वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहोगे.’’

‘‘श्यामला…’’ खुशी के अतिरेक में उन्होंने आगे बढ़ कर श्यामला को गले लगा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

‘‘बस, अब कुछ मत कहो… आप भी मुझे माफ कर दो. जो कुछ हुआ वह सब भूल कर आई हूं.’’

दोनों थोड़ी देर ऐसे ही खड़े रहे. तभी पीछे कुछ आवाज सुन कर दोनों अलग हुए. मुड़ कर देखा तो बिरूवा आरती का थाल लिए खड़ा था. मधुर और श्यामला दोनों हंस पड़े.

‘‘आज तो बहुत ही खुशी का दिन है साब.’’

‘‘हां बिरूवा क्यों नहीं. आज मैं तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोकूंगा,’’ कह कर मधुप श्यामला की बगल में खड़े हो गए और बिरूवा उन दोनों की आरती उतारने लगा.

अनमोल रिश्ता : भाग 3

फिर आगे बोला, ‘‘यदि आप की तबीयत ठीक न हो तो इतना लंबा सफर मत करना, मैं इन्हें सकुशल उदयपुर पहुंचा दूंगा.’’

‘‘शुक्रिया बेटा, लो अपने अंकल से बात करो,’’ मेरा मन हलका हो गया था.

‘‘बेटा, हम परसों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. तुम्हें तकलीफ तो दे रहे हैं, पर सलीम भाई से बात नहीं हुई. वे कहां हैं?’’ इन्होंने संशय के साथ पूछा.

‘‘अंकल, वह कोच्चि में ही हैं. आजकल उन की भी तबीयत ठीक नहीं है. अच्छा मैं फोन रखता हूं.’’

‘‘चलो, मन को तसल्ली हो गई कि परदेस में भी कोई तो अपना मिला. यह कहते हुए मैं लेट गई. जल्दी से जल्दी टैक्सी से पहुंचने में भी हमें समय लग गया. अशरफ ने हमें अस्पताल और रूम नंबर बता दिया था, सो हम सीधे कोच्चि के अस्पताल में पहुंच गए.

वाकई अशरफ वहां के एक बड़े अस्पताल में सब जांच करवा रहा था, आरुषि के 2-3 फ्रैक्चर हो गए थे, उस के प्लास्टर बंध गया था.

राजीव के दिमाग में तो कोई चोट नहीं आई थी. पर बैकबोन में लगने से वह हिलडुल नहीं पा रहा था. चक्कर भी पूरे बंद नहीं हुए थे. एक पांव की एड़ी में भी ज्यादा चोट लग गई थी.

डाक्टर ने 10 दिन कोच्चि में ही रहने की सलाह दी. ऐसी हालत में इतनी दूर का सफर ठीक नहीं है, सीमा ठीक थी और वही सब को संभाल रही थी.

पोते आयुष को हम अपने साथ अस्पताल से बाहर ले आए और अशरफ से होटल में ठहरने की बात की.

‘‘अंकल, आप क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं. घर चलिए, अब्बाजान आप का इंतजार कर रहे हैं.’’

हमारी हिचक देख कर वह बोला, ‘‘अंकल, आप चिंता न करें. आप के धर्म को देख कर मैं ने इंतजाम कर दिया है.’’

‘‘अरे, नहीं बेटा, दोस्ती में धर्म नहीं देखा जाता है,’’ ये शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे.

अशरफ हमें सलीम भाई के कमरे में ले गया. सलीम भाई ने एक हाथ उठा कर अस्फुट शब्दों में बोल कर हमारा स्वागत किया. उन की आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. हमारे मुंह से बोल नहीं निकल रहा था. इन्होंने सलीम भाई का हाथ पकड़ कर हौले से दबा दिया. 10 मिनट तक हम बैठे रहे, सलीम भाई उसी टूटेफूटे शब्दों में हम से बात करने की कोशिश कर रहे थे. अशरफ ही उन की बात समझ रहा था.

खाना खाने के बाद अशरफ ने बताया, ‘‘अब्बाजान जब भी उदयपुर से आते थे आप की बहुत तारीफ करते थे. हमेशा कहते थे, ‘‘मुझे जिंदगी में इस से बढि़या आदमी नहीं मिला और चाचीजान के खाने की इतनी तारीफ करते थे कि पूछो मत.’’

उस के चेहरे पर उदासी आ गई. एक मिनट खामोश रह कर बात आगे बढ़ाई, ‘‘आप के यहां से आने के चौथे दिन बाद ही अम्मीजान की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. बे्रस्ट में ब्लड आ जाने से एकदम चिंता हो गई थी. कैल्लूर के डाक्टर ने तो सीधा मुंबई जाने की सलाह दी.

‘‘जांच होने पर पता चला कि उन्हें बे्रस्ट कैंसर है और वह भी सेकंडरी स्टेज पर. बस, सारा घर अम्मीजान की सेवा में और पूरा दिन अस्पताल, डाक्टरों के चक्कर लगाने में बीत जाता था.

‘‘इलाज करवातेकरवाते भी कैंसर उन के दिमाग में पहुंच गया. अब्बाजान तो अम्मीजान से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. अम्मी 2 साल जिंदा रहीं पर अब्बाजान ने उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा. मैं उस समय सिर्फ 20 साल का था.

‘‘ऐसी हालत में व्यापार बिलकुल चौपट हो गया. फैक्टरी बेचनी पड़ी. अम्मीजान घर से क्या गईं, लक्ष्मी भी हमारे घर का रास्ता भटक गई.

‘‘अकसर अब्बाजान आप का जिक्र करते थे और कहते थे, ‘एक बार मुझे उदयपुर जाना है और उन का हिसाब करना है, वे क्या सोचते होंगे कि दोस्ती के नाम पर एक मुसलमान धोखा दे गया.’?’’

हमारी आंखें नम हो रही थीं, इन्होंने एकदम से अशरफ को गले लगा लिया और बात बदलते हुए पूछा, ‘‘सलीम भाई की यह हालत कैसे हो गई?’’

अशरफ गुमसुम सा छत की ओर ताकने लगा, मन की वेदना छिपाते हुए आगे बोला, ‘‘अंकल, जब मुसीबत आती है, तो इनसान को चारों ओर से घेर लेती है. अभी 2 साल पहले अब्बाजान ने फिर से व्यापार में अच्छी तरह मन लगाना शुरू किया था. हमारा कैल्लूर छूट गया था. हम कोच्चि में ही रहने लगे. मैं भी अब उन के संग काम करना सीख रहा था.

‘‘पहले वाला मार्बल का काम बिलकुल ठप्प पड़ गया था. कर्जदारों का बोझ बढ़ गया था. व्यापार की हालत खराब हुई तो लेनदार आ कर दरवाजे पर खड़े हो गए. पर देने वालों ने तो पल्ला ही झाड़ लिया. आजकल मोबाइल नंबर होते हैं, बस, नंबर देखते ही लाइन काट देते थे.

‘‘जैसेतैसे थोड़ी हालत ठीक हुई तो अब्बाजान को लकवे ने आ दबोचा. चल- फिर नहीं पाते और जबान भी साफ नहीं हुई, इसलिए एक बार फिर व्यापार का वजन मेरे कंधों पर आ गया.’’

यों कहतेकहते अशरफ फूटफूट कर रो पड़ा. मेरी भी रुलाई फूट रही थी. मुझे आत्मग्लानि भी महसूस हो रही थी. कितनी संकीर्णता से मैं ने एकतरफा फैसला कर के किसी को मुजरिम करार दे दिया था.

राजीव की सारी जांच की रिपोर्टें आने के बाद कोई बीमारी नहीं निकली थी. हम सब ने राहत की सांस ली. मन की दुविधा निकल गई थी. हमें देख कर आज भी सलीम भाई के चेहरे पर वही चिरपरिचित मुसकान आ जाती थी.

10 दिन रह कर हमारे उदयपुर लौटने का समय आ गया था. अशरफ के कई बार मना करने के बावजूद इन्होंने सारा पेमेंट चुकाते हुए कहा, ‘‘बेटा, मैं तुम्हारे पिता के समान हूं. एक बाप अपने बेटे पर कर्तव्यों का बोझ डालता है पर खर्चे का नहीं. अभी तो मैं खर्च कर सकता हूं.’’

अशरफ इन के पांवों में झुक गया. इन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम ने जिस तरह से अपने पिताजी की शिक्षा ग्रहण की है और कर्तव्य की कसौटी निभाई है वह बेमिसाल है.’’

फिर एक बार सलीम भाई के गले मिले. दोनों की आंखें झिलमिला रही थीं.

चलते समय अशरफ ने झुक कर आदाब किया. इन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘बेटा, आज से अपने इस चाचा को पराया मत समझना. तुम्हारे एक नहीं 2 घर हैं. हमारे बीच एक अनमोल रिश्ता है, जो सब रिश्तों से ऊपर है.’’

‘कभी कभी इत्तेफाक से‘: 73 साल की उम्र में अभिनेता पेंटल करेंगे छोटे परदे पर वापसी

बहुत जल्द ‘स्टार प्लस’ पर नवाबों के शहर लखनउ पर आधारित सीरियल ‘कभी कभी इत्तेफाक से ‘प्रसारित करने वाला है, जिसमें फिल्म व टीवी जगत की हस्ती 73 वर्षीय अभिनेता पेंटल अहम किरदार में नजर आने वाले हैं. इस सीरियल में एशा रूघानी (गुनगुन) और मनन जोशी (अनुभव) की मुख्य भूमिकाएं हैं.

1970 से फिल्मों में अभिनय करते आ रहे अभिनेता कंवरजीत पेंटल उर्फ पेंटल जी ने अपने अभिनय से कई दशक से अपनी छाप छोड़ते आए हैं. अब वह सीरियल ‘‘कभी कभी इत्तफाक से ’ में अनुभव के तायाजी यानी कि चारूदत्त के किरदार में नजर आएंगे.

51 वर्षों से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय पेंटल जी राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, राज कुमार, रणधीर कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा आदि के साथ सिनेमाई परदे पर अपनी धाक जमाते रहे हैं. उनकी गिनती ऐसे कुशल अभिनेता के रूप मे होती है, जो हर किरदार में खुद को ढाल लेते हैं.

हमेशा किरदारों को लेकर चूजी रहे पेंटल ने अब तक लगभग 140 से अधिक फिल्मों और 17 टीवी सीरियलों में अभिनय किया है. 73 वर्ष की उम्र में भी अपनी कला व अभिनय के प्रति उनका प्रेम और जुनून बरकरार है.वह अपनी बेजोड़ प्रतिभा और हर चीज के प्रति समर्पण भाव के चलते हर किरदार में दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते रहे हैं.

सीरियल ‘कभी कभी इत्तफाक से ’’का जिक्र छिड़ने पर पेंटल कहते हैं- ‘‘जिस क्षण मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, मैने तय कर लिया कि मुझे इसका हिस्सा बनना है. यह सीरियल अपने साथ एक अनूठा शांत वातावरण लेकर आता है, जिसकी अधिकांश लोगों को आवश्यकता है. यह कला का एक जीवंत टुकड़ा है, जिसका हर आयु वर्ग के लोग आनंद लेंगे. मैं इस सीरियल में तायाजी की मुख्य भूमिका निभा रहा हूं और मेरे किरदार में इतना कुछ है कि कभी-कभी एक अभिनेता के रूप में एक बार में इतना कुछ चित्रित करना भारी पड़ जाता है. फिर भी मुझे अपना किरदार बहुत पसंद आ रहा है और मैं इससे खुद को जोड़ कर देख पा रहा हूं.”

पेंटल ने आगे कहा-“इसमें मेरे सभी सह-कलाकार बेहद प्रतिभाशाली हैं और उन्हें हर दिन अपने शिल्प में अपना शत-प्रतिशत डालते हुए देखना मुझे खुश करता है. उन्होंने हमेशा मेरा सम्मान किया है.

‘‘रक्षाबंधनः रसाल बनी अपने भाई की ढाल’‘ की कास्ट से मिलने पहुंचे अमरीकी फैन

जब से ‘दंगल’ टीवी ने सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत सीरियलों का प्रसारण शुरू किया है, तब से इसके दर्शक देश ही नही विदेशों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं. इसी चैनल पर प्रसारित हो रहा सीरियल ‘रक्षाबंधनः रसाल बनी अपने भाई की ढाल’’ की ख्याति अमरीका तक पहुंच चुकी है.

अपने प्रसारण के 150 एपीसोड पूरे करने जा रहे सीरियल ‘रक्षाबंधन…’’के सभी कलाकार उस वक्त हैरान रह गए जब अमरीका से आए उनके सीरियल के फैन उनसे मिलने सेट पर पहुंचे. अमरीका से आए इन फैंस ने न सिर्फ सीरियल की शूटिंग देखी, बल्कि कलाकारों संग तस्वीर भी खिंचवायी और उनसे बातचीत भी की.

अपनी इस खुशी का इजहार करते हुए सीरियल ‘रक्षाबंधन…’’ में शिवराज का किरदार निभा रहे अभिनेता निशांत मल्कानी ने कहा -‘‘हमें यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि अमरीका में भी हमारा सीरियल ‘रक्षाबंधन…’ उतना ही लोकप्रिय है, जितना भारत में. अमरीका से आए हमारे कुछ फैंस हमसे हमारे सेट पर मिलने आए. यह हमारे लिए सम्मान की बात रही. मैं बहुत हैरान था कि अमरीका से हमारे फैंस हमसे मिलने और हमारे सीरियल की शूटिंग देखने आए हैं.’’

सीरियल में ‘चकोरी’के किरदार में नजर आ रही नायरा बनर्जी ने कहा- ‘मुझे यह जानकर बड़ी हैरत वाली खुशी हुई कि हमारा सीरियल अमरीका में भी देखा जाता है. हमारे जो अमरीकन फैंस सेट पर आए, उनके साथ एक बेहद क्यूट छोटा बच्चा भी था. वह हमारा सबसे प्यारा फैन था. निशांत और हम सभी ने उनके साथ तस्वीरें भी भी खिंचवाईं.’’

रसाल का किरदार निभा रही वर्षा शर्मा ने कहा-‘‘जब हमारा कोई फैन हमसे मिलने आता है, तो हमें खुशी होती है. यह पहली बार था जब कोई फैन अमरीका से अपने पूरे परिवार के साथ हमसे मिलने आया था. इसलिए इस बार हमारी खुशी कई गुना बढ़ गयी थी. सीरियल ‘रक्षाबंधन..’ की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है. मैं बहुत खुश हूं और एक्साइटेड भी हूं कि हमारा सीरियल पूरी दुनिया में देखा और सराहा जा रहा है. वैसे हमारा सीरियल काफी इंटरेस्टिंग है और आगे और भी ट्विस्ट टर्न आने वाले हैं जो फैंस के लिए रोचक होंगे.’’

संपादकीय: नरेंद्र मोदी और चुनाव

यह बात थोड़ी अजीब नहीं है कि क्या चुनाव चाहे पश्चिम बंगाल में हो, उत्तर प्रदेश में हो गोवा  में हो, उत्तरखंड में हो या कहीं और किसी विधानसभा के हों, भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी का है मोर्चो पर खड़ा करना होता है. चुनावी भाषण मोदी को देने खूब आते थे पर धीरेधीरे उन का नयापन खत्म हो रहा है और किराए की भीड़ भी सुनने को कोई खास बेचैन नहीं होती पर फिर भी पार्टी को उन्हीं को बुलाना पड़ता है.

जो पार्टी नेताओं से भरी हो, जिस के मेंबर गलीगली में हो, जो हर दंगे में हजारों की भीड़ जमा कर देती हो, उसे विधानसभाओं के छोटे चुनावों में भी प्रधानमंत्री की एक बार नहीं दसियों बार बुलाना पड़े, यह तो बहुत परेशानी की बात है. प्रधानमंत्री का काम चुनाव लडऩा नहीं होता देश चलाना होता है. ऐसे समय जब देश में महंगाई का नारा बढ़ रहा है. बेरोजगारी का कोई उपाय नहीं दिख रहा है, टैक्स बढ़ रहे हों, हिंदूमुसलिम दंगूे भडक़ रहे हों, पढ़ाई बिखर रही हो, किसान रोना रो रहे हो, विदेशों में देश की इज्जत को खतरा प्रधानमंत्री छोटेछोटे कस्बों शहरों में जा कर भाषण देकर कांग्रेस या दूसरी पाॢटयों को कोसने का काम करें, यह शर्म की बात है.

गलती नरेंद्र मोदी की नहीं है. गलती तो पूरी पार्टी की है कि उस का कोई मुख्यमंत्री ऐसा नहीं है जो अपने बलबूते पर चुनाव जीत कर आ सके. ममता बैनर्जी ने पश्चिमी बंगाल का चुनाव अपने बलबूते पर जीता. तमिलनाडू का चुनाव स्टालिन ने अपने बलबूते पर जीता था. कांग्रेस सरकारों में भी पहले अशोक गहलोट में राजस्थान का चुनाव अपने बलबूते पर जीता था और पंजाब का चुनाव कैप्टन अमङ्क्षरद्र ङ्क्षसह जो अब भाजपा से मिल रहे हैं, चुनाव अपने बलबूते पर जीता. इन के साथ दूसरी पाॢटयां या कांग्रेस पार्टी थी पर इन्हें किसी प्रधानमंत्री की तो जरूरत नहींं  पड़ी.

भारतीय जनता पार्टी में ऐसा क्या कमजोरी है कि उस के पास नरेंदद्र मोदी के अलावा कोई और चेहरा नहीं है जिस पर लोग भरासोसा कर सकें. पहले कनार्टक में यदुरप्पा इशारे करते में जो अपने बलबूते पर विधानसभा का चुनाव कई बार जीत चुके हैं पर उन के अलावा भारतीय जनता पार्टी में और कोई नेता नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी तो सब के विकास की बात करती है, तो उस के पास नेताओं की खान होती चाहिए. भारतीय जनता पार्टी हर सांस में परिवारबाद को कोसती है पर उस के पास परिवार तो क्या अकेला नरेंद्र मोदी बचा है तो क्यों. क्यों नहीं भारतीय जनता पार्टी में समझदारी, तेज, होशियार, पढ़ेलिखे, जनता की सेवा करने वाले जमा हो रहे जो भरोसे के हों और ……कों नरेंद्र मोदी की जगह ले सकें.

वैसे हमारा पैराणिक इतिहास भी यही सा कुछ कहता है. पांडवों के बाद कुरूक्षेत्र समाप्त हो गया, राम के बाद उन का राज समाप्त सा हो गया. कम से कम महाभारत और रामायण अगर वे एतिहासिक दस्तावेज है तो यही कहते हैं. तो क्या भारतीय जनता पार्टी भी पौराणिक किस्सों को दोहराने की तैयारी में है. आज उस के हजारों सांसा, विधायक, पार्षद, जिलाध्यक्ष कल को प्रधानमंत्री को याइद नहीं करेंग? अगर ऐसा हुआ तो देश को चाहे नुकसान न हो, भाजपा भक्तों को बहुत नुकसान होगा.

भारत भूमि युगे युगे: सांवली सियासत

फ्री में बहुतकुछ देने के वादे सभी दल करते हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल की ब्रैंड बनती मुफ्त की राजनीति से सभी दल हलकान हैं. इन में नया नाम पंजाब के नएनवेले मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी का भी जुड़ गया है क्योंकि उन के लिए वहां अकाली दल से बड़ा खतरा ‘आप’ है. ?ाल्लाए चन्नी ने केजरीवाल को काला अंगरेज कह दिया तो जवाब में आस्तीन चढ़ाते हुए पूरी विनम्रता से केजरीवाल ने कहा, ‘मैं सांवला हूं और सांवला आदमी कभी ?ाठे वादे नहीं करता.’

धर्मकर्म और जातपांत की राजनीति वाले देश में पहली दफा त्वचा के रंग पर श्रेष्ठ होने का दावा किया गया. केजरीवाल का इशारा सोनिया गांधी की तरफ था या नहीं, यह तो उन का उजला दिल ही जाने लेकिन भक्तिकाल के बाद बड़े पैमाने पर श्याम रंग की महिमा विष्णु के सांवले अवतारों पर की जा रही राजनीति को और भी गरमा सकती है.

रासलीला

महिलाएं एक पुरुष में क्याक्या देख कर री?ा जाती हैं, यह जानने के इच्छुकों को 65 वर्षीय  कांग्रेसी सांसद शशि थरूर की शागिर्दी हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए, जो केवल परफैक्ट और सैक्सी ही नहीं, बल्कि कुछकुछ बुद्धिजीवी भी हैं और जिन के अकसर महिलाओं से घिरे फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं.

पिछले दिनों जाड़े में सियासी माहौल और गरमा उठा जब उन्होंने संसद के बाहर देश की खूबसूरत 6 युवा महिला सांसदों मिमी चक्रवर्ती, सुप्रिया सुले, नुसरत जहां, परनीत कौर, थमिजाची थंगापडियन और एस जेथिमनी से घिरी अपनी तसवीर शेयर करते लिखा कि, ‘कौन कहता है कि संसद काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है.’

जलने वालों के तनबदन में आग लगी और उन्होंने इसे महिलाओं का अपमान बता डाला. कुढ़ने वालों को सबक यह लेना चाहिए कि वे भी बुढ़ापे में बनसंवर कर रहें, महिलाओं को इम्प्रैस करने की कोशिश करें और, इस से भी अहम बात, उन का सम्मान करना सीखें.

मैन आफ द मैच – सीएम

हेमंत सोरेन जब बच्चे रहे होंगे तब क्रिकेट महल्ला स्तर पर इफरात से खेला जाता था. तब बेशरम की डंडी स्टम्प और कपड़े धोने वाली मोगरी बल्ले का काम करती थी. रबर की गेंद से मैच खेलते बच्चे लाला अमरनाथ और सुनील गावस्कर बनने के सपने लिए गलियों में प्रतिभा बिखेरा करते थे. जो थोड़ाबहुत पैसे वाला बच्चा फिश कवर का बैट और कौर्क की बौल ले आता था उसे उसी रईसी के आधार पर मैच के पहले ही मैन आफ द मैच घोषित कर दिया जाता था और अकसर आउट भी चौथी बार में माना जाता था.

हेमंत सोरेन अब मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने रांची के बिरसा मुंडा स्टेडियम में 2 फ्रैंडली मैच आयोजित कर डाले, जिन पर बिना टैंडर्स के ही ज्यादा नहीं कोई 42 लाख रुपए खर्च हुए. मीडियाकर्मियों और विधायकों ने सचिन और धोनी बनने का अपना सपना पूरा कर लिया लेकिन मैन आफ द मैच महज 11 रन बनाने वाले मुख्यमंत्री ही घोषित किए गए क्योंकि बैट-विकेट वगैरह उन्हीं के थे. अब इस फुजूलखर्ची पर धार्मिक जलसों में अरबों फूंक देने वाली भाजपा बवाल मचा रही है तो मचाती रहे, फर्क किसे पड़ता है.

सिर पर टोपी लाल…

यह बात किसी से छिपी नहीं रह गई है कि उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाओं से ज्यादा भीड़ सपा प्रमुख अखिलेश यादव की सभाओं में उमड़ रही है और वह ढो कर भी नहीं लाई जाती. इसे बदलाव के तौर पर देखे जाने की कल्पना मात्र से भगवा गैंग सिहर उठता है और हिंदूमुसलिम करने लगता है.

यही उस ने पश्चिम बंगाल में किया था और जैसे ही मोदी ने एक खास ड्रामाई अंदाज में ‘दीदी ओ दीदी…’ कहा था तो लोगों को यह बड़ी कमजोरी लगी थी. गोरखपुर के एक सरकारी कार्यक्रम में मोदीजी ने बौखला कर ‘ये लाल टोपी वाले…’ का जिक्र किया तो अखिलेश यादव का भाव सट्टा बाजार में बढ़ गया. यह एक गैरजरूरी हमला था जो अखिलेश यादव के बढ़ते कद की तरफ भी इशारा करता है.

बुराई: ऊंची जातियों की शराब , कमजोर जातियों को करे खराब

शराब की कहानी ठेके के बाहर लाइन में लग कर खरीदने वाले लोगों की नहीं है, ये तो मोहरे हैं, असल कहानी उन की है जो इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड हैं, जिन का फायदा लोगों को नशे में डुबोए रखने से होता है.

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार जब देवता और दानवों के बीच समुद्र मंथन होने वाला था तो यह तय हुआ कि जो भी चीजें निकलेंगी उन्हें दोनों बारीबारी से बांट लेंगे. देवताओं ने बड़ी होशियारी से अच्छीअच्छी चीजें अपने पास रख लीं और नुकसान पहुंचाने वाली चीजें दानवों को दे दीं. सुरा यानी शराब ले कर जब देवी वारुणी प्रगट हुईं तो देवताओं ने उन को दानवों के हवाले कर दिया, जिस से दानव नशे में रहें और देवता मनमानी तरीके से समुद्र मंथन में निकली चीजों का बंटवारा कर सकें.

यह पंरपरा आगे भी चलती रही. ऊंची जातियों के लोग शराब का कारोबार करने लगे. कमजोर और गरीब लोगों को शराब पीने को देते रहे ताकि उन का शोषण किया जाता रहे. यही नहीं, कई मंदिरों में शराब को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है. इस के पीछे की वजह यह है कि लोग यह मान लें कि शराब कोई खराब चीज नहीं है. यह देवताओं पर भी चढ़ती है.

तमाम फैक्ट्री, खदान, भट्ठों पर काम करने वाले लोगों को मालिक शराब इसी कारण पिलाता है जिस से वह गरीब और कमजोर बना रहे. वह अपने अधिकार और श्रम पर बात न कर सके. सरकारें भी यही चाहती हैं कि गरीब पहले शराब पिए तो पैसा दे और जब शराब पी कर बीमार हो जाए तो फिर पैसा दे.

शराब से ले कर अस्पताल तक जो पैसा जा रहा है वह ऊंची जाति के लोगों के पास जा रहा है. जहां गरीबी अधिक है वहां खराब किस्म की शराब का सेवन अधिक किया जाता है. जहरीली शराब पी कर मरने वालों में सब से अधिक संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में है.

‘चखने’ की दुकान से उद्योगपति बनने का सफर

शराब पीने वाला फायदे में होता है या बेचने वाला? इस बात को सम?ाने के लिए उत्तर प्रदेश में लिकर किंग के नाम से मशहूर गुरुदीप सिंह चड्ढा उर्फ पौंटी चड्ढा की कहानी को देखना चाहिए. वैसे तो पौंटी चड्ढा अब जीवित नहीं है पर उस की कहानी शराब की दुनिया में मशहूर है. पौंटी चड्ढा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का रहने वाला था. उस का परिवार बेहद गरीब था. पौंटी को बचपन में पतंग उड़ाने का शौक था. 10 से 11 साल की उम्र में पतंग उड़ाते समय पतंग बिजली की हाईटैंशन लाइन में फंस गई. पौंटी लोहे के तार से पतंग को छुड़ाने की कोशिश करने लगा. इस से उस को करंट लग गया. बायां हाथ कुहनी से एकदम खत्म हो गया. दायां हाथ से भी 2 उगंलिया गायब हो गईं. हथेली में भी चोट आई.

लंबे इलाज के बाद जब वह ठीक हुआ तो अपने पिता के साथ दुकान संभालने लगा. उस के पिता शराब की दुकान के सामने शराब के साथ खाया जाने वाला नमकीन यानी चखना बेचने का काम करता था. इस के बाद उस के पिता को शराब बेचने की दुकान खोलने का लाइसैंस मिल गया. यहीं से पौंटी के दिन बदलने शुरू हो गए. कुछ ही दिनों में पौंटी चड्ढा लिकर किंग के नाम से मशहूर हुआ.

उत्तर प्रदेश और पंजाब में शराब बिक्री की पौलिसी उस के हिसाब से तय होने लगी. साल 2005 में मुलायम सरकार में इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोजैक्ट का बड़ा ठेका पौंटी को मिला. इसे ले कर कई विपक्षी नेताओं ने सरकार पर उंगली उठाई थी. वर्ष 2007 में बसपा की सरकार आने पर पौंटी को सपा सरकार से अधिक मजबूती मिली. साल 2009 में चढ्डा ग्रुप के इशारे पर ही यूपी की आबकारी नीति में बदलाव किया गया. यही नहीं, बसपा शासन में ही राज्य की 21 चीनी मिलों में से 11 नीलामी के बाद पौंटी को मिली थीं.

पौंटी चड्ढा को समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का करीबी माना जाता था. 2007 में जब प्रदेश में मायावती की सरकार बनी तो पौंटी ने पाला बदल लिया और मायावती सरकार में उसे कई रियल एस्टेट परियोजनाओं के अलावा प्रदेश में शराब के रिटेल कारोबार पर अकेले ही काबिज होने का मौका मिला.

आज चड्ढा ग्रुप का पूरा साम्राज्य लगभग 6,000 करोड़ रुपए से अधिक का आंका जाता है. आज भले ही पौंटी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश के शराब बाजार पर चड्ढा परिवार का कब्जा है. पौंटी चड्ढा की यह कहानी बताती है कि शराब बेचने वाला कितना मजबूत होता है. वह ज्यादा से ज्यादा शराब पिलाने के लिए सरकारों की पौलिसी बदलवाने का काम भी करवा लेता है.

शराब पी कर मर रहे लोग

पौंटी चड्ढा का नाम मिसाल के रूप में लिया है. देशभर में ऐसे तमाम शराब कारोबारी हैं जिन्होंने दूसरों को शराब पिला कर अपना बिजनैस किया पर खुद शराब नहीं पीते. उत्तर प्रदेश में शराब के एक कारोबारी जय प्रकाश जायसवाल हैं. वे खुद शराब नहीं पीते और अपनी रकम को अधिक से अधिक दूसरे कारोबार में लगाते जाते हैं.

जय प्रकाश जायसवाल कहते हैं, ‘‘हमारे जायसवाल समाज में तमाम ऐसे लोग हैं जो बड़े कारोबारी हैं पर शराब नहीं पीते हैं. हमारे कारोबार में अब जायसवाल बिरादरी से अधिक दूसरी बिरादरी के लोग आ रहे हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि शराब के कारोबार में बहुत लाभ है. असल बात यह है कि हर सरकार यह चाहती है कि लोग खूब शराब पिएं और सरकार को पैसा दें. शराब कारोबारी से अधिक मुनाफा सरकारों को होता है.’’

बहुत सारे ऐसे तथ्यों के बाद भी आम आदमी शराब पीना छोड़ना नहीं चाहता.

5 अप्रैल, 2016 को बिहार की नीतीश सरकार ने शराब के बेचने, रखने, पीने, शराब बनाने और लाने व ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस के बाद भी बिहार में जनवरी से 31 अक्तूबर तक 70 से अधिक लोग शराब पी कर मर गए.

तमाम लोग ऐसे हैं जो अंधे हो चुके हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि शराब पर प्रतिबंध लोगों की भलाई के लिए लगाया गया है. बहुत सारे लोग इस के पक्ष में हैं तो कुछ लोग इस के खिलाफ भी हैं. शराब पर प्रतिबंध लगाने के बाद यह माना जा रहा था कि नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव हार जाएंगे. इस के बाद भी नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव जीत कर दोबारा मुख्यमंत्री बन गए.

उत्तर प्रदेश में पिछले 9 माह में शराब पी कर मरने के 11 बड़े कांड हुए. उन में 176 लोगों की मौत हुई. जब बिहार में 2016 में शराब बंदी हुई तो यह उम्मीद की जा रही थी कि 2017 में भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश में शराबबंदी करेगी. लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उत्तर प्रदेश में शराबबंदी नहीं हुई. यहां सरकार लोगों को अधिक से अधिक शराब पिलाने की पौलिसी बनाने लगी. शराब के प्रचारप्रसार पर पैसा खर्च किया जाने लगा. हालत यह है कि आबकारी नीति के मुकाबले मद्य निषेध पौलिसी उपेक्षित हो गई है.

उत्तर प्रदेश की शराब पौलिसी

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपनी पौलिसी में शराब खरीदने के लिए उम्र तय कर दी है. सरकार के नए आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 21 साल से कम उम्र के लोगों को शराब और बीयर नहीं मिलेगी. अगर कोई इस नियम की अवहेलना करते हुए 21 साल से कम उम्र के व्यक्ति को शराब या बीयर बेचता है तो ऐसा करने वाले को सजा के साथ ही उस पर जुर्माना लगाया जाएगा.

सरकार का यह नियम देखने व सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इस की जमीनी हकीकत उलट है. उत्तर प्रदेश सरकार ने 2021-22 में शराब से 6,000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई करने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार ने यह तय किया है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को शराब पिलाई जाए.

राज्य सरकार की तरफ से इजाजत है कि अब घरों में भी लोग शराब रख सकते हैं. इस के लिए उन को कुछ नियमों का पालन करना होगा. सरकार का मकसद है कि इस से शराब से होने वाली आय को बढ़ाया जा सकेगा. आबकारी नीति के तहत अगर आप घर में तय मात्रा से अधिक शराब रखते हो तो आप को विभाग से लाइसैंस लेना जरूरी होगा. यह लाइसैंस 12,000 रुपए में एक साल के लिए दिया जाएगा. लाइसैंस के अलावा सरकार को 51,000 रुपए की सिक्योरिटी भी जमा करनी होगी. आबकारी नीति के तहत घर में शराब रखने का लाइसैंस लेने के वे लोग ही अधिकृत होंगे जो बीते 5 साल से इनकम टैक्स भर रहे हों.

घर में शराब रखने वाले को लाइसैंस के आवेदन के समय ही इनकम टैक्स भरने का प्रमाणपत्र देना जरूरी होगा. इनकम टैक्स प्रमाणपत्र के साथ आधार कार्ड और पैन कार्ड की प्रति भी जमा करनी होगी. घर में शराब रखने का लाइसैंस लेने के लिए आवेदकों को एक शपथपत्र देना अनिवार्य किया गया है. इस शपथपत्र में उन्हें यह बताना होगा कि घर में जिस जगह शराब रखी जाएगी वहां पर 21 वर्ष से कम उम्र के लोगों को प्रवेश नहीं देंगे. इस लाइसैंस को सिर्फ शराब रखने के लिए ही मंजूर किया जाएगा. शपथपत्र में यह भी बताना होगा कि शराब के अलावा वे कोई अन्य मादक पदार्थ घर पर नहीं रखेंगे.

दावे से अलग जहरीली शराब से मरते लोग

आबकारी नीति में सरकार ने दावा किया था कि गुणवत्ता वाली शराब पीने से लोगों की सेहत ठीक रहेगी. आबकारी नीति के तहत कम कीमतों में अच्छी गुणवत्ता की शराब उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने पहल की है. अनाज ईएनए से बनी यूपी मेड शराब बेची जाएगी. यह टेट्रापैक और केवल 42.8 प्रतिशत की स्ट्रैंथ वाली होगी.

2020-21 में अनुमानित राजस्व 28,340 करोड़ रुपए के मुकाबले, 2021-22 के लिए अपेक्षित राजस्व 34,500 करोड़ रुपए है. राज्य में शराब के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय रूप से उत्पादित फलों से बनी शराब को 5 साल की अवधि के लिए उत्पाद शुल्क से छूट दी जाएगी. शराब की खुदरा बिक्री की अनुमति दी जाएगी.

कम अल्कोहल पेय पदार्थ की बिक्री की अनुमति बीयर की दुकानों के अलावा विदेशी शराब की खुदरा दुकानों, मौडल शौप्स और प्रीमियम खुदरा दुकानों में दी जाएगी. बीयर पर उत्पाद शुल्क घटाया गया है और बीयर की शेल्फ लाइफ 9 महीने होगी. हवाई अड्डों पर प्रीमियम रिटेल वैंड की अनुमति दी जाएगी. शराब पीने के दुष्प्रभावों पर जनता में जागरूकता के लिए विशेष अभियान शुरू किया जाएगा. अभियान मुख्य रूप से कम उम्र में शराब पीने, नशे में ड्राइविंग के लिए जागरूक करने वाला होगा. इस जागरूकता अभियान के लिए एक करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे.

आबकारी नीति के तहत व्यवसाय को आसान बनाने और बढ़ावा देने के लिए ब्रैंड पंजीकरण, लेबल अनुमोदन, बार और माइक्रो-शराब की भट्ठी के लाइसैंस अब हर साल मंजूर नहीं कराना होगा. इसे 3 वर्षों में एक बार नवीनीकृत कराना होगा.

हालांकि उत्तर प्रदेश में जहरीली शराब पी कर मरने वालों की तादाद में बेहद तेजी आई है. शराब के अर्थतंत्र को देखें तो यह साफ हो जाता है कि इस की कमाई कर के ऊंची जातियों के लोग अमीर से और अमीर बनते रहे हैं. इस को पीने वाली कमजोर जातियां गरीब से और गरीब होती जा रही हैं. नेता और सरकारें यही चाहती हैं ताकि वोट देने वाले शराब के नशे में वोट देते रहें. उन की सत्ता बनती रहे.

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं लेकिन अब वह खिंचाखिंचा लगता है, इसे क्या समझूं?

सवाल

मैं 25 वर्षीय युवती हूं. एक लड़के से प्यार करती हूं. कुछ समय पहले उस ने मेरे मोबाइल पर किसी लड़के का मैसेज देख लिया था. मुझ से उस की बाबत उस ने कुछ पूछने की जरूरत भी नहीं समझी और बात करनी बंद कर दी. आजकल वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है, इसलिए काफी व्यस्त है. मैं ने 1-2 बार उस से संपर्क करने का प्रयास किया पर वह खिंचाखिंचा लगता है. इसे क्या समझूं? क्या वह अब मुझ से प्यार नहीं करता या व्यस्तता के कारण ऐसा व्यवहार कर रहा है?

जवाब

यदि आप का बौयफ्रैंड आप से प्यार को ले कर संजीदा है, तो संभवतया अपनी पढ़ाई की व्यस्तता के कारण ही वह तटस्थ है. उसे कुछ समय दें. वह इतमीनान से अपनी परीक्षा दे ले उस के बाद आप खुल कर उस से बात कर सकती हैं. यदि वह वाकई आप से प्यार करता है, तो बेवजह नाराज नहीं होगा. यदि किसी तरह की गलतफहमी हो गई है, तो उसे भी आप लोग मिलबैठ कर दूर कर सकते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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रेटिनोपैथी है गंभीर समस्या

सुमति जब नींद से उठी तो उस की आंखों के आगे दीवार पर कालेकाले धब्बे दिखाई दिए. ऐसा लग रहा था मानो आंखों में कुछ डाला गया हो. सुमति को कुछ पता नहीं चल पा रहा था और हर चीज उसे धुंधली दिख रही थी. सुमति ने घर में रखी एक आईड्रौप आंखों में डाली, जिस से धीरेधीरे आंख कुछ ठीक हुई, लेकिन फिर आंखों में खून के थक्के दिखाई पड़ने लगे.

मोबाइल के बटन भी धुंधले दिख रहे थे. अब उसे चिंता सताने लगी और वह आंख के डाक्टर के पास गई. डाक्टर ने जांच की और उसे कुछ जांच करवाने की सलाह दी. जांच के बाद पता चला कि उस का शुगर लैवल 204 था, जिसे काफी अधिक माना जाता है.

सुमति अब डायबिटीज के डाक्टर के पास गई, जहां उसे नियमित मधुमेह की दवा लेने की सलाह दी गई. लेकिन तब भी सुमति अपनी आंखों को ले कर चिंतित थी क्योंकि आज हर काम के लिए मोबाइल का प्रयोग करना पड़ता है. ऐसे में आंखों पर अधिक जोर पड़ने से उस की आंखों में दर्द भी होता था. हालांकि, नियमित डाक्टर की सलाह और दवा से वह कुछ ठीक हुई है.

असल में डायबिटीज रोगी की आंखों में सामान्य व्यक्ति की तुलना में रोशनी गंवाने की आशंका 20 गुना अधिक होती है. इसलिए समय रहते अगर इसे काबू में न किया जाए तो आंखों की समस्या बढ़ती जाती है. डायबिटीज की वजह से होने वाली आंखों की इस समस्या को रेटिनोपैथी कहा जाता है. इस बीमारी के लगातार बढ़ने और जागरूकता को बढ़ाने के लिए हर साल 14 नवंबर को वर्ल्ड डायबिटीज डे मनाया जाता है.

इस बारे में ‘साइटसेवर्स’ संस्था के आई एक्सपर्ट डा. संदीप बूटान कहते हैं, ‘‘भारत में मधुमेह के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं और अब तक यह बीमारी 6.5 करोड़ वयस्कों को प्रभावित कर चुकी है. इस बीमारी से प्रभावित होने वाले रोगियों की संख्या वर्ष 2045 तक बढ़ कर 13 करोड़ से अधिक होने की संभावना है.

‘‘डायबिटीज के सभी केसेज में लगभग हर 5वें व्यक्ति को आंखों से संबंधित कुछ गंभीर समस्याएं विकसित होने की संभावना होती है. इन समस्याओं में से सब से ज्यादा होने वाली समस्या डायबिटिक रेटिनोपैथी की है. डायबिटिक रेटिनोपैथी पहले से ही दक्षिण एशिया में कम दृष्टि और अंधेपन का एक महत्त्वपूर्ण कारण रही है. यह बीमारी तब तक बढ़ेगी जब तक डायबिटिक रेटिनोपैथी के मामलों को कम करने व उस के इलाज को प्रभावी तरीके से अपनाया नहीं जाएगा.’’

शुरुआती लक्षण

ज्यादातर शुरुआती केसेज में आंखों पर किसी प्रकार के महत्त्वपूर्ण लक्षण नहीं दिखाई देते. कुछ मामलों में आंखों के सामने छोटेछोटे काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं और केवल कुछ रोगियों को ही धुंधली दृष्टि की शिकायत हो सकती है, क्योंकि ये शुरुआती मैकुलर एडीमा (आंखों के पीछे की तरफ सूजन) के लक्षण हैं.

रोकने के उपाय

डा. संदीप का कहना है, ‘‘शुरुआती दिनों में आंखों की गंभीर समस्याओं के बढ़ने और इन्हें फैलने से रोकने के लिए ब्लडशुगर और ब्लडप्रैशर पर सख्त नियंत्रण रखना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. आंखों में शुरुआती बदलावों (आंखों के पीछे की ओर छोटी रक्त वाहिकाओं से रिसाव) का उपचार लेजर थेरैपी से किया जा सकता है और रेटिना (मैक्यूलर ऐडिमा) के केंद्रीय भाग में सूजन आने की स्थिति में इंट्रा-विट्रियल इंजैक्शन की आवश्यकता पड़ सकती है.

‘‘अधिक गंभीर मामलों में बढ़ी रेटिनल सर्जरी की आवश्यकता होती है, लेकिन इस के द्वारा रोग का सफलतापूर्वक निदान होने की संभावना बहुत ही कम होती है. डायबिटिक रेटिनोपैथी के लिए किसी भी उपचार का परिणाम काफी हद तक उस चरण पर निर्भर करता है जिस में इस का इस्तेमाल किया जाता है. खासकर, शुरुआती चरणों में इस के सफल होने की संभावना अधिक होती है.’’

रोगियों की बढ़ती संख्या

डायबिटीज के रोगियों में रोग की बढ़ती अवधि के दौरान रेटिनोपैथी के विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है. डायबिटीज के लगभग 10 से 25 प्रतिशत रोगियों में रेटिना में परिवर्तन होने की संभावना होती है और इन में से लगभग 10वें भाग तक के रोगियों में यह एडवांस्ड स्टेज में होती है, जिन्हें जल्दी उपचार कराने की जरूरत होती है.

क्या है सही इलाज

डा. संदीप कहते हैं कि ‘‘डायबिटिक रेटिनोपैथी का सही ट्रीटमैंट इसे जल्दी पता कर और मेटाबोलिज्म को कंट्रोल कर इलाज करवाना है. इस के अलावा नियमित व विस्तृत नेत्र परीक्षण हर साल करवाने से इस का जल्दी पता चल जाता है. मुख्य बीमारी को नियंत्रण में रखने के लिए उचित आहार, सही आदतें और जीवनशैली में बदलाव भी इस बीमारी की गति को रोकने में सफल होते हैं. साथ ही, समय पर रोज डायबिटीज की दवा लेना और शुगर लैवल चैक करना भी जरूरी है, खासकर, महिलाओं को इस बारे में अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है.’’

अदरक एक गुण अनेक: 5 तरह की होती हैं सौंठ, जानें कैसे बनता है अदरक का तेल

लेखक- डा. किरन पंत, कृषि विज्ञान केंद्र, ढकरानी, देहरादून

मसालों के साथसाथ अदरक को दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. पहले किसान फसल को बाजार की मांग के मुताबिक बेचते थे और बाकी बचे अदरक की ओर ध्यान न दे कर उसे किसी इस्तेमाल में न ला कर उसे यों ही फेंक देते थे. जब किसान ताजा अदरक मंडी में भेजता है, तो उसे अपने उत्पाद के पूरे दाम नहीं मिल पाते थे, इसलिए इस अरदक के ऐसे व्यावसायिक पदार्थ बनाए जाएं तो फसल से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा उठाया जा सकता है. अदरक का इस्तेमाल अचार, चटनी और उद्योगों में भी किया जा सकता है.

खाना खाने से पहले अदरक की फांकों को नमक के साथ खा लेने से भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया भी तेज हो जाती है. इस के सेवन से गले का बलगम घट जाता है. वायु, कफ, खांसी, वात वगैरह में राहत मिलती है. यह जोड़ों के दर्द, सूजन, भूख में कमी वगैरह में फायदेमंद साबित होता है.

अदरक का भंडारण

* पके अदरक को भंडारण करने से पहले उसे अच्छी तरह साफ कर लेते हैं. उस की जड़ें काट कर, मिट्टी से साफ कर के पानी में धोते हैं और कमरे में 3-4 दिन तक फैला कर सुखाते हैं. बिना बीमारी वाले और साफसुथरे अदरक को छांट कर अलग कर देते हैं. उस के बाद अदरक को छायादार और ठंडी जगह पर रख कर उपचारित करते हैं.

* बीज के लिए प्रकंदों का भंडारण छाया में बनाए गए गड्ढों में करना चाहिए.

* बीज प्रकंदों के भंडारण के लिए कच्चे गड्ढों की अच्छी तरह सफाई करें और उसे एक हफ्ते तक धूप में खुला छोड़ दें, जिस से कि गड्ढे में नमी न रहे.

* भंडारण करने से पहले प्रकंदों को कार्बंडाजिम (100 ग्राम) + मैंकोजेब (250 ग्राम) + क्लोरोपायरीफास (250 मिलीलिटर) को 100 लिटर पानी में मिला कर घोल में प्रकंदों को एक घंटे तक उपचारित करें.

* उपचारित अदरक को ठंडे और सूखी जगहों पर गड्ढों में स्टोर किया जा सकता है. स्टोरेज में 65 फीसदी नमी और 12-13 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान होना चाहिए.

* गड्ढे में प्रकंदों को पूरी तरह न भरें और गड्ढों को ऊपर से लकड़ी के तख्ते से ढक दें.

अदरक को सुखाना

आमतौर पर निर्यात करने के मकसद से रंगीन और रंगहीन अदरक बनाया जाता है. चाहे इस में ऊपर की छाल नहीं हो. रंगीन, साफ चमका हुआ अदरक बनाने के लिए सब से पहले इस के टुकड़े, जिन्हें गांठें कहते हैं, धोया जाता है, फिर खुली धूप में सुखा लेते हैं.

इस विधि द्वारा सुखाए अदरक का आकार बराबर गांठों को खुरच कर और धो कर खुली धूप में सुखाया जाता है और कई बार ब्लीचिंग करने के लिए सल्फर का धुआं या फिर थोडे़ समय के लिए चूने के घोल में डाल लें.

अदरक की सौंठ

यह पके अदरक से बनने वाला सब से प्रचलित उत्पाद है, जिस का इस्तेमाल कई तरह के मिक्स मसालों, सूप, कंफेक्शनरी और आयुर्वेदिक दवा बनाने में किया जाता है, इसलिए अगर किसान अदरक की सोंठ बना कर बेचें तो वे ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.

सब से पहले अदरक को धोया जाता है, ताकि गंदगी जैसे मिट्टी और दूसरे कण वगैरह गांठों से निकल जाएं और सब से अहम बात इस को छीलना है. इस के द्वारा एक तो छिलका निकल जाता है और दूसरी ओर सुखाने की प्रक्रिया तेज करता है.

छिलका उतारने के लिए बोरी और बांस की टोकरी को इस्तेमाल में लाया जाता है. अब धोने के बाद अदरक को खुली धूप में तकरीबन एक हफ्ते के लिए सुखाया जाता है और उस के बाद फिर मसला जाता है, ताकि उस में चमक आ जाए.

इस काम के द्वारा तकरीबन 16-25 फीसदी तक सौंठ हासिल होती है. हर इलाके की सौंठ तैयार करने की अपनी अलग तकनीक होती है, जैसे कालीकट की सौंठ, कोचीन की सौंठ, जैमायका की सौंठ, नाइजीरियन सौंठ, आस्ट्रेलियाई सौंठ वगैरह इलाकों के नाम से जानी जाती हैं.

तकनीक के आधार पर सौंठ 5 तरह की होती है,

  1. कोटैड सौंठ,
  2. काली सौंठ, 
  3. स्क्रैप्ड सौंठ,
  4. अनकोटैड सौंठ और
  5. ब्लीच्ड सौंठ.

कोटैड या अनपील्ड सौंठ :

कोटैड या अनपील्ड सौंठ बिना छिले अदरक से बनाते हैं. अदरक की गांठों को तोड़ कर उन पर लगी मिट्टी की सफाई करते हैं. जड़ वगैरह काट कर निकाल देते हैं और पानी में अच्छी तरह से धो कर धूप में सुखाते हैं. छिलकेदार अदरक होने से उस के गूदे को नुकसान नहीं होता है, इसलिए सौंठ ज्यादा मिलती है और उस में तेल व ओलियोरेजिन की मात्रा ज्यादा होती है. कोटैड सौंठ का इस्तेमाल तेल निकालने और ओलियोरेजिन के लिए किया जाता है.

काली सौंठ :

इसे बनाने के लिए बिना छिले अदरक को पानी में 10-15 मिनट तक उबालते हैं, उसे रगड़ कर छील देते हैं. ऐसी सौंठ का रंग काला हो जाता है.

रफ स्क्रैप्डसौंठ :

इसे बनाने के लिए अदरक साफ कर के उस की बड़ीबड़ी गांठें तोड़ लेते हैं. इस तरह से छिले अदरक को धूप में सुखाते हैं.

भारत की कोचीन और कालीकट सौंठ इसी विधि से बनाई जाती है. अदरक को रातभर पानी में भिगोने से छीलने में आसानी होती है.

पील्ड या अनकोटैड सौंठ :

पील्ड या अनकोटैड सौंठ और स्क्रैप्ड सौंठ पूरी तरह छिले अदरक से बनाई जाती है. इसे बनाने के लिए अदरक पर से छिलका हटा देते हैं.

छीलने के लिए बांस के नुकीले टुकड़ों या स्टील के चाकू की नोक का इस्तेमाल करते हैं.

छिलका ऐसे हटाते हैं, जिस से गूदे पर खरोंच न आने पाए. छिले हुए अदरक को पानी में रखते हैं. पानी में 1 फीसदी की दर से नीबू का रस डालने से अदरक ज्यादा सफेद लगता है और वह नीबू जैसा महकने लगता है.

छिले हुए अदरक को ज्यादा नहीं धोना चाहिए. क्योंकि उस के कई तत्त्व पानी में बह जाते हैं. अब अदरक को धूप में तकरीबन एक हफ्ते तक सुखाते हैं. पील्ड सौंठ चिकनी व सुंदर होती है.

ब्लीच्ड सौंठ :

ब्लीच्ड सौंठ भी छिले हुए अदरक से बनाते हैं. छीलने के बाद अदरक को चूने के पानी में भिगोते हैं और धूप में थोड़ा सुखाते हैं. यह काम कई बार करते हैं, जिस से अदरक पर चूने की एक परत चढ़ जाए. अदरक सूखने में तकरीबन 10 दिन का समय लगता है.

अब इस सौंठ को मोटे कपड़े या बोरे के बीच में हलका सा रगड़ते हैं, जिस से उस पर चिपका फालतू चूना और छिलका छूट जाए. इस काम से सौंठ चिकनी, सफेद और आकर्षक बन जाती है.

अदरक को नमक के घोल में परिरक्षित करना

इस तरह से बनाए गए पदार्थ को बिना खराब हुए एक साल से भी ज्यादा समय तक सुरक्षित रख सकते हैं और फिर इस का इस्तेमाल सलाद, सब्जी पकाने के लिए और अचार बनाने के लिए भी करते हैं.

इस घोल में परिरक्षित करने के लिए अदरक को छील कर, टुकड़ों में काट कर शीशे के मर्तबान और जार में रखते हैं.

अदरक को नमक के घोल में परिरक्षित करने के लिए 1 भाग अदरक के टुकड़ों, 1.25 भाग नमक का घोल बनाने के लिए एक लिटर पानी में 50 ग्राम नमक मिलाएं. 12 मिलीलिटर एसिटिक एसिड और 11 मिलीग्राम पोटैशियम मैटाबाई सल्फाइड डालें.

अदरक का तेल

इस तेल में अदरक की महक पाई जाती है. इस का इस्तेमाल परफ्यूम, साबुन उद्योग और दवा बनाने में किया जाता है.

इस के लिए सौंठ को मोटा पीसते हैं और स्टीम डिस्टिलेशन विधि से तेल निकालते हैं.

इसे बनाने के लिए कोटैड सौंठ का इस्तेमाल करना चाहिए. 100 किलोग्राम सौंठ से 1.5-3.0 किलोग्राम तक तेल हासिल होता है.

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