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न्यायाधीशों के निशाने पर याचिकाकर्ता

छत्तीसगढ़ में 16 आदिवासी एक मुठभेड़ में मार दिए गए. आरोप ये भी है कि तभी एक मासूम बच्चे की उंगलियां भी काट दी गईं थीं. उसी वक्त जांच के लिए आदिवासी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार ने साल 2009 में एक याचिका डाली. तब से अब 2022 तक इस याचिका पर कोई सुनवाई नहीं हुई.

अचानक से सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 14 जुलाई को इस याचिका को ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 5 लाख का जुर्माने का आदेश दे दिया. ये हत्याएं छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के वक्त हुईं थीं. याचिकाकर्ता जांच चाहते थे. सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल याचिकाकर्ता हिमांशु कुमार पर 5 लाख का जुर्माना लगाया है, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार से उन पर एक केस करने का आदेश भी दिया है.

यहां दिलचस्प बात ये है कि ये आदेश जस्टिस खानविलकर की बेंच ने दिया है. इन्होंने ही पिछले महीने गुजरात दंगों की दोबारा से जांच करने की मांग करने वाली जाकिया जाफरी की याचिका को भी ख़ारिज किया था. ना केवल ख़ारिज किया था बल्कि सेम पैटर्न पर याचिका डालने वाली एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के लिए कहा कि वे इस मुद्दे को अपने लिए भुना रही हैं और उन पर कार्रवाई हो, अगले ही दिन गुजरात सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया.

मतलब याचिकाकर्ताओं को ही अब टारगेट किया जा रहा है. इतना भारी जुर्माना लगाया जा रहा है कि आगे कोई पीड़ितों के लिए लड़ने की सोचे भी नहीं. ये याचिका 13 साल से पड़ी हुई थी, इस पर अब जा कर पहली बार सुनवाई हुई.

देश धनसंपदा लूट कर विजय माल्या की तरह विदेश भाग जाओ तो अवमानना पर सिर्फ 2000 रुपये जुर्माना लगेगा और निर्दोषों की हत्या के खिलाफ कोर्ट जाओगे तो 5 लाख रुपये जुर्माना लगेगा!

गजब के इंसाफ पर फैसले दर फैसले हो रहे हैं देश में. यह फैसला उन लोगों के लिए नसीहत है जो गरीबों, वंचितों, शोषितों के लिए लड़ रहे है कि चुपचाप बैठ कर अन्याय व अत्याचार के दृश्यों को फिल्मों की तरह देखें. बीच मे इन्टरवेल में कानाफूसी कर लें और अगले सीन के लिए इंतजार करें.

जनता मुर्गों की तरह बना दी गई है. सब के आगे मुफ्त राशन के दाने डाल दिये गए है. खाने में लगी हुई है. जिस मुर्गी को काटा जाता है बस वो ही कुकुडूकु करती है.

एक दिलचस्प कहानी है. एक मामले को ले कर ग्रामीण बुजुर्ग दरोगा के पास गया. दरोगा ने कहा कि 20 हजार में मामला निपटा दुंगा. बुजुर्ग ने पैसे देने से इनकार कर दिया. मामला कोर्ट में पहुंचा और 12 साल बाद फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि आप मुकदमा जीत गए हो. बुजुर्ग ने आशीर्वाद स्वरूप कहा कि भगवान आप को दरोगा बनाए.

जज ने कहा कि जज का पद बड़ा होता है. बुजुर्ग ने कहा कि पदों की जानकारी तो मुझे नहीं लेकिन जो मामला उसी दिन 20 हजार में दरोगा निपटा रहा था, वो मामला 12 साल बाद तकरीबन 1लाख रुपये खर्च करवा कर आप ने निपटाया है. ताकत तो दरोगा में ही ज्यादा है.

भविष्य में लोग न्यायालय जाने से डरने लगेंगे. अपने स्तर पर निपटने के प्रयास करेंगे. भ्रष्टाचार बढ़ेगा. कई जगहों पर तो देश मे लोग गुंडों/गैंगस्टर से मदद लेते है, उस को बढ़ावा मिलेगा. मी लार्ड ऐसा ना किया करो. इस तरह तो अकेली खड़ी इंसाफ की देवी की आंखों पर पट्टी भी नहीं बांधनी पड़ेगी.

हिंदूमुसलिम करने का स्वार्थ

मुसलिम इतिहास को मिटाने के चक्कर में हमारे कट्टरवादी न केवल चौराहों पर और धर्मसंसदों में अनापशनाप बोलते रहते हैं, वे अदालतों में भी ऐरेगैरे तथ्यों को ले कर खड़े रहते हैं कि कभी न कभी, कहीं तो कोई जज उन की सुन लेगा. उत्तर प्रदेश के एक शहर वाराणसी की ज्ञानवापी मसजिद और आगरा में स्थित ताजमहल को ले कर मामले अदालतों में ले जाए गए जिन का कोरा उद्देश्य यह था कि जनता के सामने जो मुद्दे हैं- गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, अराजकता, गंदगी, अस्तव्यस्त शहरी व ग्रामीण जीवन, आंसू बहाते अस्पताल, महंगी होती शिक्षा- उन को भुला कर बेकार के हिंदूमुसलिम विवाद पर कुछ कहा जाता रहे.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जजों डी के उपाध्याय व सुभाष विद्यार्थी ने तो एक पिटीशनर को डांट लगा कर याचिका खारिज कर दी पर ज्ञानवापी सर्वे का काम वाराणसी सिविल कोर्ट ने जारी रखवा दिया.

इस से हासिल क्या होता है, यह सब जानते हैं. धर्मरूपी ये विवाद खड़े रहें, यही सब से बड़ी उपलब्धि है. सैकड़ों सालों की गुलामी वह भी कुछ सौ लोगों की सेना के हाथों के इतिहास को नकार कर ये लोग आज लोकतंत्र के बल पर लोकतंत्र को नष्ट करने में लगे हुए हैं.

ताजमहल और ज्ञानवापी मसजिदें चाहे तोड़ दिए जाएं, यह याद रहेगा कि इस देश पर विदेश से आए लोगों ने राज किया, जम कर किया, बड़ेबड़े शहर बनाए, भवन बनाए.

विदेशों में किसी को छींक आती है तो आज भी भारत का उद्योग जगत बिस्तर पर पड़ जाता है. भारत चीन से उल?ाने की हिम्मत नहीं रखता. चीनी ऐप तो बंद कर दिए पर अरबों का व्यापार चालू है. भारत की प्रतिव्यक्ति आय महज 1,900 डौलर है जबकि छोटे से स्वीडन की 90,000 डौलर. इस की चिंता देश के थके ज्ञानियों को नहीं. उन को चिंता है तो कभी दिल्ली के कुतुबमीनार, कभी आगरा के ताजमहल, कभी वाराणसी की मसजिद, कभी मथुरा की कृष्णभूमि की.

भारत सरकार आज 95 करोड़ गरीबों को खाना दे रही है. सवाल यह है कि 95 करोड़ गरीब हैं ही क्यों जो गेहूं, चावल, दाल लेने के लिए लाइनों में लगते हैं. हमारा ज्ञान, हमारे वेद, पुराण, हमारे मठ, हवन, हमारे मंदिर चमत्कारिक ढंग से इन 95 करोड़ की गरीबी दूर नहीं कर सकते? सरकारी पक्ष को तो चिंता कुछ खंडहरों की है.

कठिनाइयां: लड़ाकू फौज के जवान ने उसके साथ क्या किया?

लड़ाकू फौज के जवान बहुत दिमागदार होते हैं. उन के पास हर समस्या का फौरी इलाज होता है. उन्होंने थोड़ी देर सोचा, फिर एक पुराना बड़ा बूट मेरी ओर बढ़ा दिया.

कठिनाइयां- भाग 1: लड़ाकू फौज के जवान ने उसके साथ क्या किया?

बात वर्ष 1975 की है. मेरी पहली संतान का जन्म होने वाला था. मैं उस समय हवलदार था और अरुणाचल प्रदेश के अलौंग में वर्कशाप की डिटैचमैंट में तैनात था. हमारी मेन यूनिट लेखाबाली में थी. मुझे इमरजैंसी में घर में बुलाया गया था. इस के लिए तार पहले मेन यूनिट में आया था. फिर मुझे भेजा गया था. मैं ने छुट्टी के लिए अप्लाई किया. छुट्टी मिल गई. पर मैं ऐसे ही छुट्टी पर नहीं जा सकता था, पूरे स्टोर की जिम्मेदारी मुझ पर थी. डिटैचमैंट में सभी कलपुर्जे और टूल्स की सप्लाई मेरी जिम्मेदारी थी.

जब तक मेन यूनिट से दूसरा स्टोरकीपर नहीं आ जाता, मैं छुट्टी पर नहीं जा सकता था. मेन यूनिट से दूसरा आदमी आने में 2 दिन लग गए. वह सोमवार को आया. मैं ने जल्दी से उसे चार्ज दिया और मंगलवार को मेन यूनिट में आने के लिए तैयार हुआ. वहां की सभी यूनिटों की छुट्टी पार्टी को ले कर गाड़ी केवल शनिवार को लेखाबाली जाती थी. मुझे मंगलवार को ही मेन यूनिट में पहुचना था. तभी बुधवार को मैं अपने घर जा सकता था.

सरकारी डाक ले कर ग्रैफ रोड बनाने वाली यूनिट की गाड़ी रोज लेखाबाली जाती थी. उन से गुजारिश की गई. बारिश वहां सारे साल होती है. ग्रैफ वालों ने कहा, ‘मौसम ठीक रहा तो गाड़ी जाएगी.’ मैं अपनी यूनिट की गाड़ी से वहां पहुचा. गाड़ी लेखाबाली जाने के लिए तैयार खड़ी थी. बारिश हो रही थी. सरकारी डाक को रोका नहीं जा सकता था.

गाड़ी में मैं था, ड्राइवर के साथ एक जवान था. जवान पीछे बैठ कर डंडामैन का काम करता था. पीछे से आने वाली गाड़ी को पास देना होता था तो डंडा मार कर ड्राइवर को सूचित करता था और वह पास दे देता था.

मेरे पहुंचते ही गाड़ी चल पड़ी. पता चला मौसम चाहे कैसा भी हो, गाड़ी जरूर जाती है. हम चले तो बारिश काफी तेज थी. रास्ते में कभी तेज हो जाती कभी कम. पहाड़ी रास्ता, घुमावदार सड़क, कच्चे पहाड़. डर केवल यह था कि स्लाइडिंग हो गई तो लेखाबाली पहुंचने में रात हो जाएगी. सड़क को साफ करने के लिए ग्रैफ यूनिट के जवान 24 घंटे तैयार रहते थे.

हलकीहलकी बारिश होती रही थी. एक मोड़ पर ड्राइवर से गाड़ी सीधी नहीं हुई और वह हजारों फुट नीचे खाई की ओर बढ़ी. पहाड़ी इलाके में गाड़ी तेज नहीं चलती है. ड्राइवर घबरा गया पर मैं होश में रहा. हम सैनिकों को ट्रेनिंग ऐसी दी जाती है, अगर सामने से गोलियां भी आ रहीं हों तो हम होश में रहें और अपना विवेक न खोएं. मैं ने तुरंत हैंडब्रेक खींची और ड्राइवर से कहा, ‘घबराओ मत, एक्सीलेटर से पैर हटा कर ब्रेक पर रखो. हलकेहलके ब्रेक लगाते रहो. स्पीड कम हो जाएगी और किसी न किसी वृक्ष के साथ जा कर रुक जाएगी.’

यह आश्चर्य ही था कि गाड़ी रुक गई. मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘ब्रेक से पैर मत हटाना. पहले पीछे बैठे जवान से बोला कि डाक ले कर नीचे उतर जाओ. पहले उस ने डाक का थैला फेंका और फिर आराम से उतर गया. फिर मैं ने ड्राइवर से बोला, ‘आप अपना दरवाजा खोल लें, मैं अपना खोल लेता हूं. हम दोनों इकट्ठे कूदेंगे और तुरंत किसी झाड़ी को पकड़ कर बैठ जाएंगे. गाड़ी की परवा मत करना. वह बाद में रिकवर हो जाएगी.’ हम दोनों कूदे, थोड़ा लुढ़के और फिर झाड़ियों को पकड़ लिया. धीरेधीरे झाड़ियों को पकड़ते हुए सुरिक्षत सड़क पर आ गए. गाड़ी कहां गई, पता न चला. छुट्टी के बाद कोर्ट औफ इंक्वायरी में पता चला कि ड्राइवर का कुसूर नहीं था. स्टेरिंग लौक हो गया था. 5 दिनों बाद गाड़ी रिकवर हो सकी थी.

हम कैसे बच गए, यह कुदरत का एक करिश्मा था. हम तीनों ने कुदरत का धन्यवाद किया. जिस टहनी से गाड़ी रुकी थी, वह निहायत पतली टहनी थी. कोई सोच भी नहीं सकता था कि इतनी बड़ी गाड़ी को इस पतली टहनी ने रोका है. पर सचाई को झुठलाया नहीं जा सकता था. सुबूत और निशान उपलब्ध थे.

अब समस्या यह थी कि ग्रैफ की रोड रिपेयर पार्टी को कैसे इनफौर्म करें. उस समय आज की तरह संचार के साधन नहीं थे. वैसे रिपेयर पार्टी को अंदाजा था कि अगर 11 बजे डाक गाड़ी चली है तो 5 बजे तक उन के पास पहुंच जानी चाहिए. उन को स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन था कि अगर 5 बजे तक डाक गाड़ी नहीं आती है तो उस की खोज में सर्च पार्टी भेजी जाए.

सर्च पार्टी को हम तक पहुंचने में एक घंटा लग गया. उन के पास संचार के साधन थे. उन्होंने यूनिट में बताया तो आदेश मिला कि अपनी गाड़ी में डाक और वर्कशौप के जवान को भेज दो. ड्राइवर को रोक लो. गाड़ी के लिए हम रिकवरी पार्टी भेज रहे हैं.

उन की गाड़ी में हम लेखाबाली के लिए निकले. लेखाबाली तक रास्ता साफ मिला पर वहां पहुंचतेपहुंचते रात के 11 बज गए. मैस बंद था. गेट पर खड़े संतरी को अपने आने की सूचना दे कर रात भूखे ही सो गया. सुबह छुट्टी की कार्रवाई की गई. दूसरे दिन अलौंग में ऐक्सिडैंट के बारे में पता चला तो वहां के अफसर इंचार्ज ने मुझ से बात की और इस नैरो एस्केप के लिए बधाई दी. मैं ने सर का आभार व्यक्त किया और कहा, ‘ सर, सच में यह नैरो एस्केप था. मैं सोच नहीं सकता था कि हम जिंदा बचेंगे.’

जानकारी: सड़क की जिम्मेदारी किसकी

कुछ समय पहले की बात है सुबह का वक्त था. समय करीब 6 बजे का रहा होगा. पुणे में संचेती फ्लाईओवर सीओईपी की ओर से पुणे विश्वविद्यालय की ओर जाता है. मैं उसी मार्ग पर अपनी स्कूटी से जा रही थी. एक मोड़ पर मु?ो मुड़ना था. वहां तेल बिखरा पड़ा था. मैं उसे नहीं देख सकी. मेरी स्कूटी फिसल गई. मेरे दाएं हाथ और पैर मैं फ्रैक्चर हो गया. हालांकि मैं बेहद धीमी गति से वाहन चलाने वाली महिला हूं. वाहन चलाते समय बेहद सचेत भी रहती हूं. बावजूद इस के, हादसा हो गया. एक तरफ सड़क पर लाइटों की चौंध, दूसरी तरफ सड़क पर बनी सफेद रंग की पट्टियां. उन्होंने ही मेरा संतुलन बिगाड़ दिया.

एक सवाल है कि इस का जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन, पुलिस या फिर वह वाहन चालक जो सड़क पर तेल बिखरा कर चला गया. इस के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? इस से पहले भी एक बार मेरी स्कूटी फिसल गई थी. मैं अपनी सही दिशा व गति से चल रही थी, तभी अचानक देखा कि सामने से एक बाइक चालक विपरीत दिशा से तेजी से चला आ रहा है. वह जल्दी में था. उसे बचाने के चक्कर में मेरे पैर में हेयर लाइन फ्रैक्चर हो गया, जबकि बाइक चालक को कोई चोट नहीं लगी.

इन दुर्घटनाओं में जानमाल का नुकसान तो होता ही है, मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि ऐसी सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में हमारी भूमिका क्या है? खस्ताहाल सड़कें दुरुस्त नहीं की जाएंगी. आखिर इन सब से पीडि़त कौन होगा? हमेशा आदमी ही दुर्घटना का शिकार होता है.

सड़क दुर्घटनाओं में लोग अपंग हो जाते हैं. उन का जीवन दुश्वार हो जाता है. नौकरी छूट जाती है. शिक्षा छूट जाती है. सड़क हादसों से बचने के लिए जरूरी है कि सुरक्षा नियमों को जाना जाए, उन का पालन किया जाए. आज तेज रफ्तार और बेतरतीब तरीकों से वाहनों को सड़क पर दौड़ाना लोग जन्मसिद्ध अधिकार सम?ाते हैं.

गलत तरीके से आगे निकलने की कोशिश गलत है. लोग मान बैठे हैं कि सुरक्षा की जिम्मेदारी तो सरकार व प्रशासन की है. जबकि, ऐसा नहीं है. सरकार व प्रशासन के साथसाथ यह जिम्मेदारी हमारी भी है. हमें भी आगे आना होगा. साथ ही, प्रशासन की भी यह जिम्मेदारी है कि वह सड़कों पर जगहजगह पर सीसीटीवी कैमरे लगवाए. निगमों को चाहिए कि जिम्मेदार लोगों को जिम्मेदारी सौंपी जाए. सड़क निर्माण सामग्री को किनारे व्यवस्थित किया जाए. सड़क निर्माण हो जाने के बाद सामग्री हटाई नहीं जाती. लाइसैंस जारी करने से पहले ड्राइविंग टैस्ट होना चाहिए.

हमारी जिम्मेदारी धीमी गति से वाहन चलाएं. सतर्क रहें और सचेत रहें.

अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए समय निर्धारण सही तरीके से करें.

किसी तरह के नशे का सेवन कर के वाहन न चलाएं.

अभिभावक अपने किशोरवय बच्चों को वाहन न दें.

अपने वाहनों की फिटनैस नियमित चैक करते रहें.

अपनी ही दिशा में वाहन चलाएं, विपरीत दिशा घातक हो सकती है.

सिग्नल तोड़ने की कोशिश कतई न करें.

सड़क किनारे बैठे भिखारियों को नसीहत दें कि वाहनों के आगे न आएं.

दूसरे वाहनों से उचित दूरी बना कर ही वाहन चलाएं.

मोबाइल फोन का चलते वाहन पर प्रयोग न करें.

अंधेरे में वाहन और भी अधिक सजग हो कर चलाएं.

भारत भूमि युगे युगे: प्रह्लादी मुसलमान

मुसलमानों के प्रति अन्याय न हो लेकिन अगर उन के पूर्वजों ने कहीं अन्याय किया है तो वे उस अन्याय के समर्थक न बन कर भक्तराज प्रह्लाद की भूमिका पेश करें, यह नई नसीहत पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने देशभर के मुसलमानों को देते साल 2025 के अंत तक देश के हिंदू राष्ट्र बनने की आकाशवाणी भी की है. इस बाबत हवाला उन्होंने बदलते हालात का दिया है जिन के तहत रोज दंगेफसाद होते हैं और मुसलमानों को इतना परेशान किया जाता है कि वे खुद के हिंदू न होने पर अफसोस करने लगें.

भविष्यवाणी कोई भी कर सकता है लेकिन बात हिंदू राष्ट्र की हो तो बोलने का कौपीराइट इन्हीं मठाधीशों के पास है जो देश के प्रधान स्वामी हैं. बकौल निश्चलानंद, जल्द ही सभी मुसलमान जन्मना हों न हों, कर्मणा हिंदू हो जाएंगे, यानी नमाज पढ़ना छोड़ कर घंटा बजाना शुरू कर देंगे. उन की ?ि?ाक मिटाने के लिए मसजिदों पर केसरिया लहराने की शुरुआत हो ही चुकी है.

डिनर विद केजरीवाल

राजनेता अरविंद केजरीवाल तिरंगे से बेइंतहा प्यार करते हैं. जो लोग मुद्दत बाद दिल्ली जाते हैं उन्हें यह देख सुखद अनुभूति होती है कि वहां जगहजगह शान से तिरंगा लहरा रहा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक नई घोषणा पूरे ब्योरे के साथ पेश की है कि 15 अगस्त तक दिल्ली में 500 तिरंगे कमेटियों के जरिए फहराए जाएंगे. कुछ वर्षों बाद हर हाथ तिरंगा होगा और हम विश्वगुरु बन जाएंगे.

जाहिर है उन के साथ डिनर के लालच में नए वौलंटियर्स पूरे जोश से काम करेंगे. इन का एक बड़ा काम समाज कल्याण से जुड़े कामों की निगरानी का भी रहेगा. सम?ाने वाले ही उन की मंशा सम?ा पा रहे हैं कि यह केसरिया ?ांडे और भगवा गमछे वाले हुड़दंगियों पर नकेल कसने की चाल है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने क्लब कल्चर को अपना कर ही भगवा गैंग को मात दी थी. वैसे योजना इस लिहाज से भी अच्छी है कि युवा प्रोत्साहित हो कर देशप्रेम धर्मनिरपेक्ष ढंग से जताएं.

यह कैसी प्रज्ञा

प्रज्ञा का शाब्दिक अर्थ बुद्धि होता है जो सभी की अच्छी हो तो कहने क्या, लेकिन भगवा गैंग के कुछ सदस्यों की बुद्धि भ्रष्ट हुए एक जमाना हो गया है. ये वे लोग हैं जो अभद्र और अपशब्दों के इस्तेमाल को अपनी उपलब्धि मानते हैं. यह इन की पहचान है, वजूद है, रोजगार है, कारोबार है.

ये लोग कड़वा बोल कर मन का आपा खोने में भरोसा रखते हैं. बीते दिनों भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर को कथित तौर पर दुबई के एक मुसलमान ने जान से मारने की धमकी फोन पर दी तो वे बिफर पड़ीं और भूल गईं कि वे सांसद हैं और उन में व एक सड़कछाप गुंडे में क्या फर्क होना चाहिए.

माफिया और गैंगस्टर्स की ऐसी धमकियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन सांसद महोदया ने वायरल हो रहे वीडियो में जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है उस से नूपुर शर्मा भी शरमा सकती हैं. उन्होंने धमकी का मुंहतोड़ जवाब देते कहा, ‘‘अबे चुप साले… मियां की औलाद…’’ और इस के आगे का शब्द यहां लिखे जाने के काबिल नहीं क्योंकि इस से मुसलमानों की धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं.

शतकवीर खेल मंत्री

आईपीएल, टी20 और वनडे क्रिकेट की कारोबारी चमकदमक कभी का सब से बड़ी घरेलू प्रतिस्पर्धा रही रणजी ट्रौफी को निगल गई है जो भरतीय क्रिकेट टीम में दाखिले के लिए एंट्रैंस टैस्ट हुआ करती थी. सालों बाद क्रिकेट प्रेमियों की दिलचस्पी रणजी में पिछले दिनों बढ़ी जब पश्चिम बंगाल के 36 वर्षीय खेल मंत्री मनोज तिवारी ने इस प्रतिस्पर्धा में लगातार 2 शतक जड़ डाले. लोगों के मुंह से बरबस ही निकला कि खेल मंत्री हो तो ऐसा जो अपने मंत्रालय के नाम को सार्थक कर सके.

टीएमसी जौइन करने के बाद मनोज ने हावड़ा की शिवपुर विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार रतिंद्रनाथ को 32 हजार वोटों से धूल चटाने के पहले भी क्रिकेट में ?ांडे गाढ़े हैं. वे भारतीय टीम की तरफ से वनडे और टी20 भी खेल चुके हैं. यानी, सियासत से खेल पर फर्क नहीं पड़ता.

मेरे पति का औफिस की एक लड़की से अफेयर चल रहा है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं शादीशुदा महिला हूं. विवाह को 15 वर्ष हो चुके हैं. मैं अपने पति को बहुत प्यार करती हूं और वे भी मुझे बहुत प्यार करते हैं. हमारा दांपत्य जीवन सुखपूर्वक बीत रहा था कि एक रोज मुझे पता चला कि उन का अपने औफिस की एक लड़की से अफेयर चल रहा है और दोनों के शारीरिक संबंध भी बन चुके हैं. मैं ने जब इस बाबत उन से पूछा तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और गलती के लिए माफी भी मांगी. मैं ने उन्हें माफ तो कर दिया, लेकिन उन की बेवफाई को चाह कर भी भुला नहीं पा रही. समझ में नहीं आता कि क्या करूं?

जवाब

यह सच है कि जिसे हम प्यार करते हैं, वह जब बेवफाई करता है तो बहुत दुख होता है. इसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता पर दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है.

पतिपत्नी का रिश्ता परस्पर विश्वास पर टिका होता है, इसलिए आप के पति ने यदि अपनी गलती स्वीकार ली है, आप से माफी भी मांग ली है और आइंदा आप को शिकायत का मौका न देने का भरोसा दिलाया है, तो आप को उन पर यकीन कर लेना चाहिए. पर साथ ही आप को भविष्य के लिए थोड़ा सतर्क रहना चाहिए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

‘अनुपमा’ की मालविका को इस वजह से करना पड़ता है ट्रोलिंग का सामना, पढ़ें खबर

अनुपमा की मालविका यानी अनेरी वजानी अपने किरदार से दर्शकों के दिल में जगह बनाने में कामयाब रही हैं. शो छोड़ने के बाद भी अनेरी वजानी सुर्खियों में छायी रहती हैं. कुछ दिन पहले ही अनेरी वजानी को सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा. आइए बताते हैं, क्या है पूरा मामला…

अनेरी को पतले होने पर उन्हें ट्रोल किया जाता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, एक्ट्रेस ने ट्रोलिंग के बारे में बात करते हुए कहा है कि  सच कहूं तो मैं कभी इन बॉडी शेमिंग कमेंट्स से परेशान नहीं होती. मैं कभी-कभी उन्हें कहती हूं कि ‘अंगूर नहीं मिले तो अंगूर खट्टे’ क्योंकि वो चाहकर भी ऐसे नहीं हो सकते और ऐसा ही मैं किसी और की तरह नहीं हो सकती.

 

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एक्ट्रेश ने आगे कहा, जब भी कोई मुझे कहता है कि ‘अरे कितनी पतली है’ तो मैं सिर्फ इतना कहती हूं कि अंगूर खट्टे हैं, बस अपने आप को देखो.’ अनेरी ने कहा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे लगता है कि अच्छे जीन मिले हैं जिनकी वजह से मैं भाग्यशाली हूं. मैं जब चाहूं वजन बढ़ा सकती हूं और अगर मैं अपना वजन कम करना चाहती हूं, तो मैं इसे बहुत आसानी से कर सकती हूं.

 

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अनेरी ने आगे कहा कि दूसरों को 2-3 घंटे जिम जाना पड़ सकता है लेकिन मुझे सिर्फ 30 मिनट एक्सरसाइज करनी है. पतला होना और अनफिट होना दो अलग-अलग हैं चीजें. मैं पतली हूं लेकिन मैं अनफिट नहीं हूं.

 

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Anupamaa के 2 साल पूरे होने पर रुपाली गांगुली ने फैंस को दिया तोहफा, देखें Video

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘अनुपमा’  ने 2 साल का सफर पूरा कर लिया है. फैस शो के 2 साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर जश्न मना रहे हैं. इसी बीच रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) यानी अनुपमा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर दिया है. इस वीडियो के जरिये उन्होंने फैंस को शुक्रिया कहा है.

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि रुपाली गांगुली जमकर डांस करती नजर आ रही हैं. सोशल मीडिया पर अनुपमा का ये वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. फैंस इस खूब पसंद कर रहे हैं.

 

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अनुपमा ने इस वीडियो के कैप्शन में  अपने फैंस के लिए लिखा है, यह मेरी डिजिटल फैमिली के लिए है क्योंकि आपलोग इतने प्यारे जो हो.

 

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शो की बात करे तो अनुपमा में इन दिनों पाखी का ट्रैक चल रहा है. अधिक पाखी का इस्तेमाल कर रहा है, और उसे अपने प्यार की जाल में फंसा रहा है. तो दूसरी तरफ कपाड़िया परिवार में छोटी अनु की एंट्री होने वाली है. अनुज-अनुपमा को इस पल का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. अनुज, अनुपमा को ये खुशी देने के लिए शुक्रिया कहता है.

 

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तो दूसरी तरफ बरखा, अंकुश और अधिक को छोटी अनु के बारे में कुछ नहीं पता है, वे सोच में है कि अनुज- अनुपमा आखिर किसे घर लेकर आ रहे है.

 

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शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि कपाड़िया हाउस में छोटी अनु की एंट्री होगी. अनुपमा उसके लिए लिए केक लेकर आएगी और उससे केक कटवाएगी तो वहीं जीके उसे पायल देंगे. अनुज छोटी अनु के पारे में बसको बताएगा. बरखा, अंकुश, अधिक को झटका लगेगा.

दुनियाभर में खुल गईं भगवाई कट्टरपंथी की परतें

भारत भूषण श्रीवास्तव व रोहित

सत्ता देश की जनता को किसी को पराया घोषित करने की खुली छूट देगी तो नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल की जैसी सांप्रदायिक व नफरती बातें मुंह से निकलेंगी ही. धर्म का कोई दुकानदार अपने धर्म के बारे में सच सहन नहीं कर सकता पर वह दूसरे धर्म के बारे में न कही जाने वाली बातें बोलेगा ही. नूपुर शर्मा का मामला दर्शाता है कि धर्म आधारित राजनीति करना ?ाल में जमी बर्फ पर नाचनाकूदना है, न जाने कब कमजोर बर्फ की परत टूट जाए और भयंकर ट्रैजडी हो जाए.

सैय्यदा उज्मा परवीन लखनऊ की जानीमानी नेता हैं जो महिला और मानवाधिकारों के लिए भी काम करती हैं. सोशल मीडिया पर उज्मा का विवादों से गहरा नाता है. राजनीति में भी उन्होंने हाथ आजमाने की कोशिश की थी पर नाकामी मिली थी. सीएए आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने बच्चे को ले कर धरनाप्रदर्शन में हिस्सा लिया था. इस के एवज में लखनऊ वालों ने उन्हें ‘?ांसी की रानी’ कहना शुरू कर दिया था. इस के बाद वे चर्चा में तब आईं जब पिछले साल स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त) के मौके पर सार्वजनिक तौर पर घंटाघर प्रांगण में वे तिरंगा ?ांडा फहराना चाहती थीं लेकिन पुलिस ने उन्हें हाउस अरैस्ट कर दिया.

अब बीती 5 जून को उज्मा ने ट्वीट किया, ‘‘आज मेरे घर के नीचे बल तैनात किया गया, स्पैशल स्कौट भेजा गया है. आखिर कोई बताएगा कि मेरा कुसूर क्या है. सिर्फ इतना कि मैं ने नूपुर शर्मा को गिरफ्तार किए जाने के लिए आवाज उठाई, जिस ने हमारे नबी की शान में गुस्ताखी की. मैं डरने वाली नहीं हूं, न दबने वाली हूं. मु?ो अल्लाह के सिवा किसी का डर नहीं.’’

उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रियाएं मिलने पर उज्मा ने एक के बाद एक ट्वीट करने का रिवाज निभाते और भी ट्वीट किए जिन में योगी सरकार पर ताना कसने सहित संविधान और कानून की भी दुहाई दी और खुद के हाउस अरैस्ट होने व नूपुर शर्मा के खुले घूमने पर एतराजनुमा हैरानी जताई थी. उज्मा का एतराज आना भी था, क्योंकि इसी प्रकार का बयान अगर कोई मुसलिम या दलित किसी हिंदू देवीदेवता के लिए दे देता तो पुलिस इतनी चाकचौबंद रहती कि खुद ही एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तार कर लेती. जैसा कि हालफिलहाल में कई मुसलिमों को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर शिवलिंग को ले कर ‘आपत्तिजनक कमैंट’ किए. ऐसे ही दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के दलित प्रोफैसर रतन लाल को शिवलिंग पर किए गए उन के सोशल मीडिया पोस्ट के चलते गिरफ्तार किया गया. उन्हें नोटिस नहीं भेजा गया, जैड सिक्योरिटी नहीं दी गई, बल्कि सीधे थाने में बंद कर दिया गया.

‘नबी के बारे में ?ाठ’ किसी भी मुसलमान के लिए उतना ही संवेदनशील और भड़काऊ मुद्दा है जितना किसी हिंदू के लिए राम, कृष्ण, शंकर या किसी दूसरे देवीदेवता के सही?ाठ के बारे में होता है.

नूपुर शर्मा ने सारी हदें पार करते हुए पैगंबर मोहम्मद पर अपमानजनक टिप्पणी कर डाली थी जिस का देशभर के मुसलमानों ने उज्मा सरीखा विरोध किया. बहुत जगह विरोध हिंसक भी हो उठा और उस के बाद की सरकारी कार्यवाही तो एक कदम आगे जा पहुंची, जिस पर बाद में आया जाएगा.

नूपुर शर्मा ने टाइम्स नाउ न्यूज चैनल पर नाविका कुमार के प्राइम टाइम शो, जो ‘ज्ञानवापी विवाद’ को ले कर चल रहा था, में कहा, ‘‘तुम्हारे उड़ते हुए घोड़े… कुरान में लिखा है बाकायदा, उस का मजाक बनाना शुरू कर दें…’’ कहते हुए कुछ तथ्य देने शुरू कर दिए. गोदी पत्रकार धार्मिक डिबेट टीवी पर रातदिन चलाएंगे, एक तरफ भगवा बिग्रेड और दूसरी तरफ मौलाना बिग्रेड की धार्मिक फौजों को दिनरात बैठाएंगे तो वे एकदूसरे के धर्म के खिलाफ लफ्फाजी तो उगलेंगे ही, फिर वह चाहे उन के खुद के धर्म और धर्मग्रंथों में महिलाओं को दबाए रखने की लंबीचौड़ी दास्तान ही क्यों न लिखी हो.

खैर, धर्म के कारोबार और राजनीति के खेल में औरतों का इस्तेमाल कोई नई या हैरानी की बात नहीं रह गई है. यह तो धर्म की पैदाइश से होता आ रहा है जिस का मकसद दुकानदारी को और चमकाना रहता है, ताकि लोग धार्मिक अंधता में डूबते हुए एकदूसरे का सिरफुटौवल करते रहें और किसी भी हाल में चंदे की दुकानदारी बरकरार रहे. नूपुर और उज्मा दोनों इस धूर्तता को सम?ा नहीं पा रहीं और दौलत व शोहरत के लिए अपनी मरजी से मोहरा बन रही हैं.

धर्म के अंधे कुएं में एक के बाद एक छलांग लगाते जा रहे हैं और उन्हें भड़काने वाले गिरोह जश्न मना रहे हैं क्योंकि सालों बाद देश में सांप्रदायिकता और कट्टरता का नंगा नाच हो रहा है. हिंदू स्वाभाविक रूप से भारी पड़ रहे हैं क्योंकि सबकुछ उन के हक में है. यह और बात है कि अक्ल और धर्म के इन अंधों को यह सम?ा नहीं आ रहा कि यह दरअसल, एक मिशन और औपरेशन है जिस का अगला निशाना दलित व पिछड़े ही होंगे, या यों कहें कि ये साथ ही साथ निशाना बनते चले जा रहे हैं. औरतें चाहे किसी भी जाति या धर्म की हों, लगातार धर्म की गुलामी के फंदों में और फंसती जा रही हैं.

धीरेधीरे इस धार्मिक जनून में दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिलाएं भगवा गैंग की रीतिनीतियों के रडार में आने लगे हैं. मुसलिमों को तो जैसा लताड़ा जा सके लताड़ लिया जाए, पर इस की आड़ में यह गैंग ‘एंटी रिजर्वेशन कैंपेन’ चला रहा है. इस भगवा गैंग वाले दलितपिछड़ों को उन के हक व अधिकारों से वंचित रखने की बातें करते हैं. वे औरतों को पूजापाठ में धकेलना चाहते हैं.

नफरती भगवा गैंग वाले दलित, आदिवासियों को निचले और मैलेकुचैले बनाए रखना चाह रहे हैं. सरकारी नौकरियों में कटौती से वे इस काम को आधिकारिक तौर पर तो अंजाम दे ही चुके हैं. महिलाओं के पैरों में बेडि़यां जकड़ने का काम तो शुरू भी कर चुके हैं. बजाय इस के कि महिलाओं को सुरक्षा की गारंटी मिले, महिला समानता के मुद्दों पर कोई रोडमैप हो, हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला बन चुके उत्तर प्रदेश में तो महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर रात को नौकरी करने से भी उन्हें रोका जा रहा है और अस्पतालों, होटलों व रैस्तराओं  में उन की भरती बंद किए जाने की कोशिश की जा रही है ताकि वे सिर्फ बच्चे पालें व मंदिरों में जाएं.

सजा या इनाम

नूपुर शर्मा के नफरती बयान पर देशविदेश में हल्ला मचना ही था. पहले देश में, फिर देश के बाहर जब बवाल बढ़ने लगा तो भाजपा ने नूपुर शर्मा सहित अपने एक और प्रवक्ता नवीन जिंदल को पार्टी से निष्कासित कर कड़वा घूंट पी लिया. यह सोचना बेमानी होगी कि पार्टी की तरफ से मिला यह निष्कासन कोई सजा है. अगर यह सजा ही होती तो भाजपा देश में मुसलिम नागरिकों के भारी विरोध के बाद ही या ऐसा बयान देने के तुरंत बाद ही नूपुर शर्मा व नवीन जिंदल को पार्टी से निकाल देती, इतनी देर न लगाती और भारतीय मुसलमानों के विरोध की लाज रख लेती पर प्रधानमंत्री के 56 इंच के सीने को अपने नागरिकों के आगे ?ाकने के बजाय खाड़ी देशों के आगे ?ाकना ज्यादा बेहतर लगा.

दरअसल यह भाजपा की बड़ी मजबूरी भी हो गई कि इसलामिक राष्ट्र, जिन के साथ भारत के अतीत में मजबूत रिश्ते हुआ करते थे, एतराज जताने लगे थे जिसे धौंस कहना ज्यादा सटीक होगा. ओमान में प्रमुख मुफ्ती शेख अहमद बिन हमद अल-खलील का ट्वीट इस का उदाहरण है कि किस प्रकार की प्रतिक्रिया इसलामिक देशों से आई, जिस में उन्होंने कहा, नूपुर शर्मा की टिप्पणी ‘हर मुसलमान के खिलाफ युद्ध’ घोषित करने के समान थी.

बयान और खाड़ी दबाव

नूपुर के बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सोशल मीडिया पर विदेशी मुसलमान खुलेआम कोसने लगे. सोशल मीडिया हैशटैग ‘स्टौप इनसल्ंिटग प्रौफेट मोहम्मद’ ट्रैंड करने लगा, जिसे भारी संख्या में अरब लोग ट्रैंड कराते रहे. मोदी की ग्लोबल लीडर की इमेज बिगड़ने लगी. कतर में तो ‘बायकौट इंडिया’ कैंपेन शुरू कर दिया गया. भारतीय सामानों के बहिष्कार की बातें शुरू हो गईं. कुवैत के डिपार्टमैंटल स्टोर पर भारतीय उत्पादों के खिलाफ नोटिस लगाए गए. इस नोटिस के कथित वीडियो सोशल मीडिया पर अब भी वायरल हो रहे हैं. कुछ वीडियोज में भारतीय उत्पादों को स्टोर से हटाए जाने वाले चलचित्र दिखाई दे रहे हैं.

अब हम चीन सरीखे तो हैं नहीं कि वहां की फुल?ाड़ी लाइट का बायकौट कर मन ही मन उन्हें सबक सिखा दें और उन्हें बाल बराबर भी फर्क न पड़े. हमारी इकोनौमी वैसे ही ढुलमुल हो चुकी है और बड़े पूंजीपतियों का दबाव अलग से प्रधानमंत्री पर पड़ने लगा तो लाइनहाजिरी देते भारतीय दूतावास को कहना पड़ गया कि यह भाजपा और भारत सरकार की सोच नहीं है, ये तो फ्रिंज एलिमैंट्स हैं.

यूएई, ओमान, इंडोनेशिया, इराक, मालदीव, जौर्डन, लीबिया और बहरीन जैसे देश दुनिया के उन देशों की बढ़ती सूची में शामिल हो गए हैं जिन्होंने पैगंबर के खिलाफ बीजेपी नेताओं की टिप्पणी की निंदा की है. इन नफरती भाजपाइयों के बयां के चलते ही तीन-दिवसीय कतर यात्रा पर गए भारत के उपराष्ट्रपति

एम वेंकैया नायडू के सम्मान में कतर के उप अमीर द्वारा आयोजित रात्रिभोज को रद्द कर दिया गया.

खैर, विरोध जता रहे देशों की इस सूची में अब तक करीब 15 देशों ने भारत से अपना विरोध जताया है, जिस की शुरुआत कुवैत, ईरान, सऊदी अरब से हुई थी. इस के अलावा 57 सदस्यीय देशों का इसलामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) ने भी नूपुर शर्मा व नवीन कुमार के खिलाफ टिप्पणी की कड़ी आलोचना की और कड़े शब्दों में कहा कि भारत में मुसलिमों के खिलाफ हिंसा हो रही है, मुसलिमों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं. स्थिति ऐसी आ गई कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों से भी भारत को खरीखरी सुननी पड़ रही है.

गौर किया जाए तो साल 92 में बाबरी मसजिद तोड़े जाने के बाद जब पूरे दक्षिण एशिया में दंगे हो रहे थे, तब खाड़ी देशों ने वहां रहने वाले लाखों भारतीयों की जानमाल की हिफाजत की थी और कहीं से भी एक घटना तक सुनने को नहीं मिली थी क्योंकि बाबरी मसजिद गिराने में कांग्रेस सरकार का हाथ नहीं था.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने ओआईसी की ओर से निंदा के बाद अपने बयान में कहा कि ‘भारत सभी धर्मों का सम्मान करता है. एक धार्मिक व्यक्तित्व को बदनाम करने वाले आपत्तिजनक ट्वीट और टिप्पणियां कुछ लोगों द्वारा की गई थीं. वे किसी भी रूप में भारत सरकार के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करती हैं. उन व्यक्तियों के खिलाफ संबंधित संस्थाएं पहले ही कार्यवाही कर चुकी हैं.’

जाहिर है जिस तरह का रिऐक्शन खाड़ी देशों से मिला वह भारत के लिए चिंता का विषय है. आज खाड़ी देशों में भारतीयों की अच्छीखासी संख्या बसी है. यूएई में भारत के एनआरआई और पीआईओ को मिला कर 34 लाख 25 हजार हैं, जोकि वहां की कुल आबादी के 34 प्रतिशत के आसपास हैं. ऐसे ही सऊदी अरब में 26 लाख भारतीय बसे हैं जिन का कुल पौपुलेशन का साढ़े 7 प्रतिशत है. यह संख्या अपनेआप में बहुत बड़ी है, जिस में बड़ी तादाद में हिंदू हैं.

ऐसे ही कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन में बड़ी संख्या में भारतीय लोग बसे हैं. अतीत में खाड़ी देशों के साथ भारत के शुरू से अत्यंत मैत्रीपूर्ण संबंध रहे. आज हमारे देश के कई परिवार गल्फ से आने वाले पैसे पर निर्भर हैं. ये लोग गल्फ देशों में कमाई और भारत में खर्च कर भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का ही काम कर रहे हैं. यह सिर्फ रोजगार मुहैया कराने का मसला नहीं, भारत आज के समय क्रूड औयल का बड़ा हिस्सा इन्हीं खाड़ी देशों से आयात भी करता है. देश में क्रूड औयल का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मुसलिम देशों से निर्यात होता है.

आज से पहले इन देशों से कभी भारतविरोधी आवाज सुनने को नहीं मिली थी. यह इस बात को दर्शाता है कि पहले की सरकारों ने कितनी मेहनत से इन खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाया था पर धन्य हो भगवा गैंग का जिस ने भारत की इज्जत मिट्टीपलीद करने का कृत्य कर दिया है.

जो होगा देखा जाएगा

आज भारत सरकार के तारतार हो गए सम्मान को बचाने के लिए उस धर्मनिरपेक्षता को काम में लाया गया जिसे भगवा गैंग रोज छलनी करता रहता है, गालियां देता है, जिस का मजाक उड़ाता है और अंगरेजी सैकुलरिज्म को सिकमूलरजिम यानी बीमार वाद कहता है. नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को पार्टी से निकालते भाजपा ने बड़ी मासूमियत से कहा कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है और किसी धर्म के पूजनीय लोगों का अपमान स्वीकार नहीं करती है. यह वही भाजपा है जिस के मदर संगठन की हर रोज सुबह की केवल पुरुषों की पाठशाला की कखगघ ही दूसरे धर्म के प्रति घृणा की भावना पैदा कर के होती है, जहां हिंदू राष्ट्र बनाने की कसमें खिलाई जाती हैं, वह हिंदू राष्ट्र जो धर्म के आधार पर बनेगा.

नूपुर के पहले कई उद्दंड, कट्टर और भड़काऊ विशेषज्ञ साध्वियां भगवा नर्सरी से निकल चुकी हैं जिन में उमा भारती, ऋतंभरा और प्रज्ञा भारती के नाम उल्लेखनीय हैं. बीमार और बूढ़ी होती इन उग्र साध्वियों की जगह नूपुर जैसी नए दौर की साध्वियों की भरती भगवा गैंग एक खास मकसद से ही कर रहा है. पुरानियों को मरी मक्खियों की तरह निकाल दिया.

पेशे से वकील 37 वर्षीय नूपुर शर्मा का लिबास भले ही आमतौर पर भगवा न रहता हो लेकिन उन के विचार पूरी तरह गेरुए हैं. नूपुर शर्मा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कानून विभाग से अपनी पढ़ाई की है. उन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत साल 2008 में उस वक्त की जब वे हिंदूवादी आरएसएस की छात्र संघ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की उम्मीदवार के तौर पर दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ की अध्यक्ष चुनी गईं.

लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से इंटरनैशनल बिजनैस लौ में मास्टर्स करने के बाद जब वे भारत लौटीं तो आक्रामक शैली के चलते उन का राजनीतिक कैरियर ग्राफ तेजी से आगे बढ़ने लगा. अंगरेजी और हिंदी में निपुण नूपुर को उन की कार्यक्षमता के चलते 2013 दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा मीडिया कमेटी का हिस्सा बनाया गया. 2 वर्षों बाद जब फिर से चुनाव हुए तो उन्हें आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बीजेपी की तरफ से उतारा गया.

चुनाव हारने के बाद भगवा एजेंडे को आगे बढ़ाने में वे तनमनधन से जुट गईं. भाजपा की दिल्ली इकाई का प्रवक्ता बनाया गया और फिर 2020 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया. पैगंबर के बारे में उन के शब्द उसी विचार के सीखेसिखाए हिस्से रहे हैं जो बचपन से सुने थे. पैगंबर पर दी टिप्पणी उसी मानसिकता की देन है.

नूपुर ने सफाई देते यह भी कहा कि टीवी डिबेटों में अपने आराध्य महादेव शंकर का रोजरोज अपमान किया जा रहा था. मेरे सामने यह कहा जा रहा था कि वह शिवलिंग नहीं फौआरा है. मु?ा से यह भी कहा गया कि दिल्ली के फुटपाथ पर बहुत शिवलिंग पाए जाते हैं, जाओ, जा कर पूजा कर लो. हमारे महादेव शिवजी का अपमान मैं बरदाश्त न कर पाई और मैं ने गुस्से में आ कर कुछ चीजें कह दीं.

इस में 2 बातें निकलती हैं. गोदी मीडिया की रोजरोज की टीवी डिबेट धर्म के इर्दगिर्द ही बुनी जा रही है. इन टीवी डिबेट को किस के इशारे पर और क्यों करवाया जा रहा है, यह बात चाहे मोदीभक्त हों या मोदीविरोधी सब सम?ाने लगे हैं. अब इन चैनलों से यकीनन इस तरह की भड़काऊ बयानबाजी निकलना कोई को-इंसिडैंट नहीं या कोई उकसावा नहीं, बल्कि धार्मिक विवादों की ये फुजूल बहसें ही अन्य फुजूल बहसों को जन्म देती हैं. यह आपराधिक कृत्य करने का बेसिक फार्मूला है जिसे लगातार व खुल्लमखुल्ला अंजाम दिया जा रहा है.

नूपुर शर्मा की बौखलाहट की एक बड़ी वजह यह थी कि एक मुसलमान ने एक मार्के की बात कह दी थी जिस से कोई भी हिंदू मुकर नहीं सकता. फुटपाथों पर न केवल शिवलिंग बल्कि दीगर देवीदेवताओं की मूर्तियां, तसवीर वगैरह बिकना आम बात है. तीजत्योहारों के दिनों में तो ये तसवीरें कूड़े के ढेर में पाई जाती हैं. ?ांकियों के बाद हजारों मूर्तियां विसर्जन के इंतजार में नदी और तालाबों के किनारे पड़ी नजर आती हैं और इस पर खुद हिंदूवादी अकसर चिंता जताते रहते हैं लेकिन आम लोगों की पूजापाठ की लत है कि वे बाज नहीं आते.

हकीकत में तो किसी भी धार्मिक सिद्धांत या उपासना पद्धति की जरूरत ही देश को नहीं. देश को जरूरत है स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, कारखानों, फैक्टरियों और रोजगार की, क्योंकि मंदिरों की तरह इन पर भी सभी तरह के हिंदुओं का हक नहीं है. हम कैसे इन बुनियादी जरूरतों से धर्म और जानबू?ा कर पैदा किए जा रहे धार्मिक विवादों की आड़ में भ्रमित, वंचित और शोषित किए जा रहे हैं. इस पर सरिता के मई (द्वितीय) अंक में विस्तार से लेख ‘भड़काऊ नैरेटिव की गुलामी’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है. उस में बताया गया कि भगवा गैंग का ‘फूट डालो और राज करो’ का फार्मूला तबीयत से गुल खिला रहा है.

हकीकत यह है कि सांप्रादायिक उग्रता के प्रसार से समाज का धु्रवीकरण होता है. इस में जो जिस खेमे की बात जोरशोर से उठा ले जाए वह उस के वोट बटोर लेता है. आज तथ्य यही है कि सांप्रदायिकता की इस खेमेबंदी में भाजपा हिंदू वोट बटोर ले जाती है. इसे उलट कर ऐसे भी कहा जा सकता है कि भाजपा अगर सांप्रदायिक खेमेबंदी न करे तो उस की राजनीतिक पैंतरेबाजी चंद सालों तक भी न चल पाए. सांप्रदायिक खेमेबंदी उस के लिए जीवन निवारक की तरह है. इस के बगैर वह सांस नहीं ले सकती. इन सब चीजों से चुनाव में भाजपा को फायदा तो होता है पर देश… उस का क्या होता है?

वर्ष 2019 में भाजपा के लोकसभा चुनाव दोबारा जीतने के बाद कोई समय ऐसा नहीं रहा जब हिंदूमुसलिम विवाद देश में न पसरा हो. जैसेजैसे भाजपा शासनकाल में देश के आर्थिक हालात खराब होते गए वैसेवैसे इस में तीव्रता आई है. वर्ष 2014 से 2020 के बीच लगातार हेट स्पीच के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. साल 2014 में जहां 336 मामले दर्ज थे वहीं साल 2020 में लगभग 600 गुना की बढ़ोतरी के साथ 1,804 मामले हेट स्पीच को ले कर दर्ज किए गए. हैरानी की बात यह है कि जैसेजैसे हेट स्पीच की संख्या बढ़ती रही, वैसेवैसे इन में सजा मिलने की दर घटती रही है. पिछले एक साल से तो धार्मिक विवाद रुकने का नाम ही नहीं ले रहे. रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, दलित उत्पीड़न, महिला सुरक्षा के मामले तो जैसे देश में अहमियत ही नहीं रखते.

आज संभव है कि ज्ञानवापी विवाद, कानपुर हिंसा, कश्मीर में हिंदुओं की टारगेट किलिंग और खाड़ी देशों की चिंता को देखते भगवा गैंग अब कुछ विराम चाहता हो पर मुमकिन है इस के पीछे गहरी साजिश है.

विराम नहीं, मध्यांतर

छिपे फार्मूले के तहत पहले तो हिंदुओं को तरहतरह से मुसलमानों के खिलाफ भड़काया गया, फिर अब पुचकार कर उन्हें खामोश रहने का उपदेश दिया जा रहा है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर के प्रशिक्षण शिविर में कुछ ऐसी ही ज्ञान की बातें कहीं जिन्हें कांग्रेसी अपनी पैदाइश से कहते रहे हैं, लेकिन बड़ा फर्क यह है कि मोहन भागवत बेकाबू होते हालात को देख कर ऐसा कह रहे हैं और भविष्य के लिए फिर विवादों की गुंजाइश छोड़ रहे हैं. उन्होंने कहा-

ज्ञानवापी एक मुद्दा है. यह इतिहास है जिसे हम बदल नहीं सकते. इसे न आज के हिंदुओं ने बनाया और न ही आज के मुसलमानों ने. यह उस समय घटा.

आज के मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे.

आपस में मिलबैठ कर सहमति से कोई रास्ता निकालिए लेकिन हर बार नहीं भी निकलता.

ज्ञानवापी के बारे में हमारी कुछ श्रद्धाएं हैं परंतु हर मसजिद में शिवलिंग क्यों देखना?

संघ मंदिरों को ले कर आगे कोई आंदोलन नहीं करेगा.

नूपुर शर्मा जैसे नेता शायद वक्त की कमी के चलते इस शाकाहारी वक्तव्य को सुन और सम?ा नहीं पाए जो यह मान कर चल रहे थे कि हमारा काम तो मुसलमानों को कोसना और उन्हें यह एहसास कराना है कि तुम बाहरी हो, पराए हो इसलिए चलते बनो और अगर यहीं रहना चाहते हो तो रोजरोज की जलालत बरदाश्त करना सीख लो. इस पर भी वे चुप रहें तो सीधे उन के आराध्य के बारे में अपशब्द कह दो जिस से वे चुप न रह पाएं.

इन की भी यही जबां

मोहन भागवत के नागपुर के संबोधन के कुछ दिनों पहले ही जमीयत उलेमा ए हिंद के मुखिया मौलाना अरशद मदनी भी देवबंद में उन्हीं की तरह ज्ञान बांट रहे थे. मोहन भागवत की बातें सुन कर लगा यही कि वे मदनी की कौपी ही कर रहे हैं पर मदनी की पीड़ा मुसलमानों को दोयम दरजे का बना देने को ले कर ज्यादा थी. उन्होंने कहा-

नफरत फैलाने वालों के सामने सरकार की खामोशी बहुत हैरान कर देने वाली है. हमें हमारे ही मुल्क में अजनबी बना दिया गया है. हमारा चलना मुश्किल कर दिया गया है.

इस जुल्म के आगे मुसलमान ?ाकेंगे नहीं. हम हर चीज से सम?ाता कर सकते हैं लेकिन न तो अपने ईमान से सम?ाता करेंगे और न ही अपने देश के सम्मान से, यह ताकत हमें कुरआन ने दी है.

हम अगर मोहब्बत और प्यार का पालन करेंगे तो आग लगाने वाले खुद खत्म हो जाएंगे. दादरी में भीड़ द्वारा अखलाक की हत्या के बाद जिन लोगों ने अपने पुरस्कार वापस किए थे उन में ज्यादातर हिंदू थे.

मदनी मोहन भगवत की इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक थे और कई हिंदू, मुसलमान बन गए थे. इन बातों से किसी को कुछ हासिल होगा, यह सोचना फुजूल की बात है. तुक और चिंता की बात नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल जैसे युवाओं की फौज है जिसे भाईचारे के इन उपदेशों से कोई सरोकार नहीं.

यहां गौरतलब यह भी है कि मोहन भागवत सभी हिंदुओं के और मदनी सभी मुसलमानों के सर्वमान्य मुखिया नहीं हैं. ये उन लोगों के नेता हैं जो इन के डमरू पर नाचने में ही अपनी भलाई सम?ाते हैं. कश्मीर और कानपुर की हिंसा ने इन दोनों को ही चिंता में डाल दिया है क्योंकि इन के आधे अनुयायी हालात देख कर घबराने लगे हैं और आधे और ज्यादा उग्र होने लगे हैं.

भगवा गैंग को यह सम?ा आ गया है कि मुसलमान न तो ?ाकेंगे और न ही जरूरत से ज्यादा डरेंगे, इसलिए अब वह भाईचारे टाइप की बातें कर लीपापोती की कोशिश कर रहा है. लेकिन उस की लगाई आग आसानी से बु?ोगी, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि आफ्टर औल ये लोग कर तो राजनीति ही रहे हैं.

टूटता सामाजिक तानाबाना

भगवा गैंग की व उस की भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति से देश का सामाजिक तानाबाना पूरी तरह से टूट चुका है. रिपोर्ट लिखे जाने तक नूपुर की गिरफ्तारी नहीं हो पाई. नूपुर पुलिस प्रोटैक्शन भोग रही है. उस के बयान को कट्टर हिंदू संगठन खुला समर्थन दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, देश के मुसलिमों का एक तबका ‘नबी की शान’ के नाम पर हिंसक प्रदर्शन पर उतारू है. मामले को सम?ाने व गंभीरता से हल करने की जगह सरकारें बुलडोजर कुनीति से मुसलिमों को डराने में लगी हुई हैं.

ऐसे में आज यह सोचना जरूरी बन गया है कि हम किन हालात में आ गए हैं, जहां हर तरफ धर्म का ही राग बजाया जा रहा है. वर्ष 1990 तक हमारे समानांतर चलने वाला चीन हम से कितना आगे निकल गया है. इसे इस बात से सम?िए कि हम अपनी तुलना पाकिस्तान, अफगानिस्तान और हम से छोटेमोटे व गिरेपड़े देशों से कर रहे हैं. वही चीन जो कभी हमारे बराबर हुआ करता था, वह गरदन ऊंची कर सीधे अमेरिका से मुकाबला कर रहा है. आखिर ऐसा क्यों हुआ, क्या इस पर कभी सोचा है?

90 के बाद नई आर्थिक नीति आई, देश ने तेजी से विकास तो किया पर साथ में दक्षिणपंथ ने भी तेजी से पैर पसारने शुरू किए. चीन में भले एक दल की कठोर सरकार शासन में रही पर धर्म के मसलों से वहां की सरकार किनारे रही. वहीं भारत में धर्म की अधिकाधिक घुसपैठ होने लगी. बाबरी मसजिद के विवाद ने धर्म की राजनीति के दावे को मजबूती दी. धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल कर आप आसानी से वोट पा सकते हैं और अपने अंध कट्टर समर्थक बना सकते हैं, यह बात भाजपा ने सम?ा ली. यही कारण रहा कि विकास और समाज कल्याण की राजनीति पिछड़ती चली गई और धर्म की राजनीति हावी होने लगी.

जनहित के मुद्दे गायब

आज देश में सारे मुद्दे गायब हैं. रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य जैसे जरूरी मुद्दे बहस में हैं ही नहीं. हर तरफ धर्म का शोर मचा हुआ है. बंगलादेश, भूटान और नेपाल जैसे देश अपने देश की बेहतरी व आर्थिक तरक्की के लिए आगे बढ़ रहे हैं जबकि हम मसजिदों की खुदाई करने में व्यस्त हैं. भारत का सामाजिक तानाबाना टूट रहा है. लोग एकदूसरे पर विश्वास नहीं कर रहे. एक समुदाय दूसरे समुदाय से या तो डर में जी रहा है या आशंकित है. यह डर सिर्फ लोगों में नहीं, बल्कि बड़ेबड़े इन्वैस्टरों में भी पनपने लगा है.

कोई देश तभी तरक्की कर सकता है जब देश शांत हो और उथलपुथल न के बराबर हो. जिस देश में हर रोज तमाशे हो रहे हों, खासकर धार्मिक तमाशे, वहां कोई इन्वैस्टर अपना इन्वैस्ट करने से बचता है. हालिया हिजाब, हलाल जैसे बेबुनियाद उठाए विवादों और रामनवमी व हनुमान चालीसा के जुलूसों के बाद आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और बायोकोन की संस्थापक व प्रमुख किरण मजूमदार शा ने इस बात को ले कर भारत को चेताया भी कि अल्पसंख्यक विरोधी छवि भारतीय प्रोडक्ट्स के लिए बाजार को नुकसान पहुंचा सकती है. इस तरह की सांप्रदायिक घटनाएं हमारे वैश्विक नेतृत्व को नष्ट कर देंगी.

ये बातें अनायास नहीं कही गईं. आज जिस तरह के हालात बनते दिख रहे हैं उस से यही लगता है कि भारत विश्वगुरु ऐसे तो कतई नहीं बन सकता, क्योंकि यह गुरु गैरबराबरी की मूल भावना पर चल रहा है. नूपुर शर्मा का मामला दर्शाता है कि धर्म व नफरत पर आधारित राजनीति करना ?ाल में नईनई जमी बर्फ पर नाचनाकूदना है. न जाने कब कमजोर बर्फ की परत टूट जाए और ट्रैजडी हो जाए, जैसे भारत के साथ विश्व मंच पर हो गई.

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