Download App

‘‘क्या हिंदी बोलना शर्म की बात है?”: पंकज झा

बिहार के एक गांव से निकल कर मुंबई फिल्म नगरी में अपनी पहचान बना लेना आसान नही है और यह हर इंसान के वश की बात भी नही है. मगर बिहार के छोटे से गांव से निकलकर दिल्ली में सात वर्षों तक थिएटर करने के बाद 2009 से मुंबई में संघर्षरत अभिनेता पंकज झा ने अंततः 12 वर्षों बाद बतौर अभिनेता अपनी जबरदस्त पहचान बनायी.2009 से लगातार सीरियलों में काम करते आ रहे पंकज झा ने 2018 में लघु फिल्म ‘‘सीजंस ग्रीटिंग्स’’ में अभिनय कर लोगों को चैंकाया था. फिर 2021 में वेब सीरीज ‘‘महरानी’’ में अभिनय कर जबरदत लोकप्रियता बटोरी. और अब 25 अगस्त से वह ‘महारानी’ के ही दूसरे सीजन ‘‘महारानी 2’’ में भी नजर आने वाले हैं.

प्रस्तुत है पंकज झा से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के मुख्य अंश…

pankaj-jha

बिहार के छोटे से गांव में रहते हुए आपके अंदर अभिनय का प्रेम कैसे जागा? उसके बाद की आपकी यात्रा कैसी रही?

यह तो बहुत लंबी कहानी है. मैंने अभिनेता बनने का कोई निर्णय नहीं लिया था.सब कुछ अपने आप होता गया. मेरे पिता जी थिएटर ग्रुप चलाते हुए खुद नाटकों में अभिनय किया करते थे. मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था,तब एक नाटक का एक दृश्य मुझे याद आता है. मैं अपने दादा जी की गोद में बैठकर नाटक देख रहा था.उस नाटक के एक दृश्य में सामने वाले कलाकार ने उनके पेट में छूरा घोंप दिया और सारा खून निकला,जिसे देखकर मैं रोने लगा.तब मेरे दादा जी ने मुझे परदे के पीछे ले जाकर दिखाया कि कुछ नहीं हुआ है.पेट में लाल रंग का भरा हुआ गुब्बारा बंधा हुआ था. मेरे दादा जी सांस्कृतिक कार्यक्रम व नाटक करवाया करते थे. मेरे पिताजी काफी अच्छा गाते भी हैं.स्टेज पर भी गाते रहे हैं. वह अभिनय भी करते रहे हैं. लेकिन जैसे ही मैंने होकर संभाला, मेरी पढ़ाई लिखाई शुरू हुई, तो मेरे पिता जी ने यह सारी कलाकारी बंद कर दी.लेकिन उससे पहले मेरे दादाजी ने मुझे स्टेज पर छोटे कृष्ण और राम का चरित्र करवाया था.कहने का मतलब यह कि अभिनय की शुरूआत तो अनजाने में बचपन में ही हो गयी थी. शायद अभिनय मेरे जींस, मेरे खून में ही है.लेकिन मुझ पर पढाई का इतना दबाव था,कि यह दबा रहा. मेरे परिवार के लोग मुझे आईएएस अफसर बनाना चाहते थे, जबकि मैं डाक्टर बनने का सपना देख रहा था.

मैं मुजफ्फरपुर में पढाई के दौरान संगीत सीखता रहा.थिएटर करता रहा.यानी कि अभिनय वं सगीत की ट्ेनिंग भी सतत चल रही थी.लेकिन जब मैं उच्च शिक्षा के लिए बिहार से निकलकर दिल्ली पहुंचा,तो मेरे चक्कर मंडी हाउस में लगने लगे और मैं अभिनेता बन गया.

दिल्ली में आपने जो नाटक किए, उनमें से कौन से नाटक सर्वाधिक लोकप्रिय रहे?

थिएटर में दिलीप शंकर जी मेरे गुरू हैं. मैंने मोहन मह-िुनवजर्या सहित कई दिग्गज रंगकर्मियो के साथ थिएटर किया. मेरा सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक ‘प्रेमपरिभाषा’ था, जिसमें साठ के दषक के 99 गानों का कोलाज था.तीन ग्रुप थे.हर ग्रुप में एक पुरूष और एक लड़की का जोड़ा था.यह एक प्रयोग था.गाना पार्श्व में बजता था और हम उसमें अभिनय करते थे.दूसरा नाटक अंग्रेजी भाषा में ‘स्टीरियोटाइप’ था.फिर ‘टोकरियां’ नामक नाटक था. फिर मैंने म्यूजिकल रामायण किया, जिसमें राम का किरदार निभाया,जो कि गाना भी गाता है.तो पूरी तरह से म्यूजिकल रामायण का यह बेहतरीन शो हुआ था. मैंने अथैलो भी किया. बाबी बेदी निर्मित ‘कर्ण’ नाटक में मैं कर्ण के पिता का किरदार निभाता था.

मैने हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के नाटकों में मैंने अभिनय किया.

pankaj-jha

मुंबई पहुंचने के बाद किस तरह का संघर्ष रहा?

सच यह है कि मैं दिल्ली में बड़ी सहजता के साथ थिएटर कर रहा था. मेरा मुंबई आने का कोई इरादा ही नहीं था.लेकिन मेरे गुरू दिलीप शंकर व दो तीन अन्य लोगों ने मुझसे मुंबई आने के लिए कहा. उन्होंने मुझे समझाया कि आपको नाम व पैसे दोनों चाहिए. भवि-ुनवजयय में आपके खर्च ब-सजय़ेंगे और थिएटर में पैसे तो है नहीं.तब हिम्मत जुटाकर मैं 2009 में मुंबई आया. मुंबई में छह माह की दौड़ भाग के बाद मुझे लगा कि मेरे लिए दिल्ली ही ठीक है.दिल्ली में उमेश बिस्ट का एक शो ‘जीना इसी का नाम है’ कर रहा था,तो वह करने के लिए वापस दिल्ली चला गया.वहां पर वी के शर्मा के म्यूजिकल ‘रामायण’ के शो भी कर लिए. उसके बाद फिर दिल्ली में बेकार हो गया.तो अक्टूबर 2009 में फिर से मंुबई आकर अंधेरी में एक दोस्त के साथ किराए पर रहने लगा.

रंजीत कपूर ने मुझे दूरदर्शन के एक सीरियल के पायलट एपीसोड में काम करने का अवसर दिया.‘स्टार प्लस’ के एक सीरियल के प्रोमो की शूटिंग की. तो मुझे लगा कि मेरी तकदीर खुल गयी. दूसरी बार मुंबई पहुंचते ही तुरंत काम मिलने लगा.

लेकिन इन दोनों सीरियलों की कोई प्रगति नही हुई.सब कुछ शून्य हो गया. फिर संघर्ष शुरू हो गया.

तो कैरियर कैसे शुरू हुआ?

2011 में मुझे पहली बार ‘कलर्स’ चैनल के सीरियल ‘‘बालिका वधु’’ में एक कैमियो करने का अवसर मिला था.आनंदी की सहेली के भाई का किरदार निभाया.यह काफी चर्चित सीरियल रहा है.इससे मेरे कैरियर पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा. उसी दौरान मैने ‘आजतक’ चैनल के लिए मैंने एक सीरीज गांधी की. इसमें गांधी जी अलग अलग शहरों में घूमते हैं और लोगों की प्रतिक्रियाएं क्या होती है..यह सब था. यह एक नया प्रयोग था.‘‘इसका नाम था-ंउचयभ्र-ुनवजयटाचार मुक्त हिंदुस्तान, सबको सम्मति दे भगवान’.इसमें मैं गांधी बना था.दिल्ली में रहते हुए मैंने ‘दिल्ली 6’ और ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ फिल्मों में छोटे किरदार निभाए थे.उसके बाद ‘सावधान इंडिया’, ‘शपथ’ सहित कई एपीसोडिक सीरियल करता रहा.पर दिल की बात यह है कि मुझे टीवी सीरियलो में अभिनय करते हुए मजा नहीं आ रहा था. इसी बीच मुझे लघु फिल्म ‘‘सीजंस ग्रीटिंग्स’’ मिली. इसे विश्व के कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में कई अवार्ड मिले. काफी प्रशंसा मिली. ‘शिकागो’,‘लंदन फिल्म फेस्टिवल’, ‘लॉस एजेंल्स फिल्म फेस्टिवल’ सहित कई फिल्म समारोहो में इस फिल्म के प्रदर्शन के वक्त जाने का अवसर मिला था. 2018 में इस फिल्म को ‘दादा साहेब फालके अवार्ड’ भी मिला.इसके अलावा भी मैंने दो तीन लघु फिल्में की.

उसके बाद कोविड के चलते जब लॉकडाउन लगा, तो मुझे वेब सीरीज ‘‘महारानी’’ में एम एलए दिवाकर का किरदार निभाने का अवसर मिला.नवंबर 2020 में भोपाल में हमने इसकी षूटिंग षुरू की,तब मु-हजये अहसास हुआ कि यह तो काफी रोचक किरदार है.मैने मेहनत से इस किरदार को निभाया. जब इस सीरीज का प्रसारण हुआ, तो लोगों ने वेब सीरीज ‘महारानी’ के साथ ही मेरे दिवाकर के किरदार को भी काफी सराहा.अब 25 अगस्त से इसी वेब सीरीज का दूसरा सीजन यानी कि ‘‘महारानी 2’’ सोनी लिव पर प्रसारित होने जा रहा है. इसके अलावा विक्रमादित्य मोटावणे की वेब सीरीज ‘‘जुबली’’ की है,जो कि इसी व-ुनवजर्या आएगी. मधुर भंडारकर की फिल्म ‘‘लॉक इंडिया लॉक’’ में भी एक अच्छा किरदार निभाया है.

अब 25 अगस्त से ‘सेानी लिव’ पर स्ट्रीम होने वाली वेब सीरीज ‘‘महारानी 2’’ भी कर रहे हैं?

इस वेब सीरीज में मेरा किरदार वही एमएलए दिवाकर -हजया का ही है.दल बदल करता है. इससे अधिक बताकर दर्षकों की उत्सुकता को खत्म नही करना चाहता.पर इस बार दिवकार पहले की अपेक्षा कुछ कम समय के लिए परदे पर आएगा, मगर धमाल है.‘महारानी 2’ में कुछ नए किरदार भी जोड़े गए हैं.

‘‘महारानी 2’’ के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ाने के लिए निर्देशक को बदला गया है?

पूरी सीरीज के निर्देशक तो सुभा-ुनवजया कपूर ही हैं.पहले सीजन में करण शर्मा निर्देशक थे.इस सीजन का निर्देशन रवींद्र गौतम ने किया है.रवींद्र गौतम इससे पहले कई सफलतम टीवी सीरियलों के अलावा फिल्म ‘‘21 तोपों की सलामी’’ का निर्देशन कर चुके हैं. पर पूरा कंट्रोल तो सुभा-ुनवजया कपूर क ही है.

वही इस सीरियल के जन्मदाता हैं.पोलीटिकल ड्रामा में तो उन्हे महारत हासिल है.पहले सीजन में किरदार के सुर को पकड़ने में सुभा-ुनवजया कपूर ने मेरी काफी मदद की थी.

मैं एक घटना का जिक्र करना चाहॅूंगा.जब मैं भोपाल में ‘महारानी’ के सेट पर पहली बार पहुंचा था,उस वक्त मुझे कुछ पता नहीं था. मैंने स्क्रिप्ट नहीं पढ़ी थी. जब मुंबई में इसका वर्कशॉप हुआ और स्क्रिप्ट प-सजय़ी जा रही थी, तब मैं लॉक डाउन के चलते गांव में था.तो मैंने सुभा-ुनवजया कपूर जी से पूछा कि इसका रिर्फेंस प्वाइंट क्या है.कुछ बताएं? तो उन्होंने मुझसे कहा कि प्रशांत किशोर को जानते हो.तो मैंने कहा कि हां! मैं उन्हे सोशल मीडिया पर फालो कर रहा हूं. उनकी आइडियोलौजी को समझ रहा हॅूं.वही आपका किरदार है.मैं उसी हिसाब से पूरी तैयारी करके शॉट देने के लिए सेट पर पहुंचा,तो पता चला कि यह तो बदला हुआ है.यह तो पूरी तरह से बिहारी प्रशांत किशोर है. यह तो प्रशांत किषोर की तरह गंभीर है

ही नही.दिवाकर तो कटाक्ष मारता रहता है.आपने भी देखा होगा कि पूरी सीरीज में दिवाकर कटाक्ष मार रहा है.मेरे ‘टेकनिकल सी एम’ के कटाक्ष के ही चलते रानी भारती, महारानी यानी कि मुख्यमंत्री बन जाती हैं. सुभा-ुनवजया कपूर मुझसे थोड़ा गुस्सा भी हुए थे और फिर उन्होंने बताया कि इस किरदार को इस तरह से पकड़ो.उसके बाद ही मैं किरदार का सही सुर पकड़ पाया था.

किसी भी किरदार को निभाने से पहले आपकी अपनी किस तरह की तैयारी होती है?

-थिएटर से होने के चलते मेरी जिस तरह की ट्रेनिंग है, उसके चलते मैं हमेशा किरदार के सोल/ आत्मा को पकड़ काम करने वाले कलाकारों की श्रेणी में आता हॅूं.आप इसे मैथड एक्टिंग भी कह सकते हैं. मुझे ऑन व आफ समझ में नही आता है.मेरी सोच यह है कि जब भी कोई किरदार निभाता हॅूं,तो उसके ‘सोल’ में घुस जाता हॅूं.मैं सोल तक पहुंचने का प्रयास करता हॅूं,अब मैं कहां तक सफल होता हॅूं,यह तो दर्शक तय करते हैं.लेकिन मैं अपनी तरफ से हर किरदार की सोल तक पहुंचते हैं.इसके लिए हमें काफी प्रैक्टिस करनी होती है.उसके मैनेरिजम और बौडी लैंगवेज को पकड़ना आवश्यक होता है. उसके थॉट प्रोसेस को समझना होता है.यदि पटकथा में नहीं लिखा होता है,तब भी मैं उसकी एक कहानी समझता हॅूं कि वह परिवार के अंदर किस तरह से रहता होगा.दोस्तों और घर से बाहर वह किस तरह से चलता होगा?किस तरह से बातें करता होगा?जब मैं ‘आज तक’ के लिए गांधी पर डाक्यूमेंट्री कर रहा था,तो गांधी जी के पुराने वीडियो देखे थे.मैंने भरसक कोशिश की कि उनकी बौडी लैंग्वेज व उनकी भाषा को पकड़ने का प्रयास किया.लोगों ने काफी तारीफ की थी.

सोशल मीडिया को लेकर आपकी क्या सोच है?

मैं सोशल मीडिया को काफी अच्छा मानता हॅूं.वैसे कुछ लोग इसे बहुत बुरा मानते हैं.जब आप पब्लिक फिगर हाते हैं,तो स्वाभाविक तौर पर लोग तरह तरह से रिएक्ट करते हैं,गालियां भी देते हैं.मेरी नजर में यदि कलाकार सोशल मीडिया का सही ढंग से इस्तेमाल करे, तो यह मुफ्त का पीआर है. मसलन मैं अपने हर काम की जानकारी सोशल मीडिया पर देता रहता हॅूं.बेमतलब कुछ नहीं लिखता. अपने काम या अभिनय से जुड़ी कोई बात हो. फेशबुक पर मेरे दो पेज हैं. एक वेरीफाइड पेज हैं और दूसरा नॉर्मल है. नॉर्मल पेज पर मैं कभी कुछ अपनी जिंदगी के बारे में लिख भी देता हॅूं, लेकिन वेरीफाइड पेज पर सिर्फ मेरा काम नजर आएगा.देखिए,हकीकत यही है कि सोषल मीडिया को इन दिनों हर कोई देख रहा है.आज की तारीख में यह काफी सशक्त हो गया है.यूट्यूब हो या इंस्टाग्राम हो या ट्वीटर हो,इस पर सिर्फ भारत के लोग ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया आपको देख रही है.कमाल की बात यह है कि सोशल मीडिया के फालोवअर्स के आधार पर कलाकार का फिल्म या सीरियल या वेब सीरीज के लिए चयन भी होने लगा है.अब यह तरीका सही है या गलत,इस पर मैं कुछ नही कह सकता.

तमाम लोग यूट्यूब पर अपना चैनल षुरू कर कंटेंट बनाकर पैसा कमा रहे हैं. लेकिन किसी भी चीज की अति नहीं होनी चाहिए. आपने एकदम सही. आज कल सोशल मीडिया के फालोवअर्स की संख्या बल पर कलाकार को काम दिया जा रहा है.जिसके चलते कई बार प्रतिभाशाली कलाकार को काम नहीं मिल पाता और यह रवैया कहीं न कहीं सिनेमा को बर्बादी की ओर ले जा रहा है?

मेरी राय में किसी भी कलाकार के फालोवअर्स के संख्या बल के आधार पर फिल्म सफल या असफल नही होती.फिल्म की सफलता तो उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है. कलाकार किसी भी इंस्टीट्यूट से हो,इसका भी असर नही होना चाहिए. फिल्म,सीरियल या वेब सीरीज के लिए कलाकार का चयन उसकी अभिनय प्रतिभा के बल पर पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए. अच्छे कलाकार को ही प्राथमिकता देना चाहिए.मेरी राय में फिलहाल औडीशन से बेहतर कोई रास्ता नही है.

ऑडीशन के दौरान कलाकार की प्रतिभा का आकलन हो जाता है.जो बड़े कलाकार हैं,जिनके साथ निर्देषककई बार काम कर चुके होते हैं,तो उनके औडीशन की जरुरत नही होती है.मैं यह नही मानूंगा कि हर जगह सिर्फ सोशल मीडिया के फालोवअर्स के बल पर ही काम दिया जा रहा हो.आज भी भारतीय सिनेमा में प्रतिभा की कद्र की जा रही है.कास्टिंग डायरेक्टर कलाकार का औडीशन लेने के बाद ही उसका चयन करता है.यह पारदर्शिता हर जगह होनी चाहिए.

आप बिहार से है और हिंदी आपकी मातृभाषा है.पर कई लोग मानते हैं कि हिंदी की वजह से काम करना मुश्किल होता है? आपके अनुभव..?

-देखिए,जब तक मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था,तब तक मेरा हिंदी उच्चारण एकदम शुद्ध नही था.भोजपुरी टच था. कुछ शब्दों का उच्चारण गलत होता था. मसलन ‘स’ व ‘श’ में अंतर नहीं होता था.पर सुमित टंडन ने मेरे उच्चारण दो-ुनवजया को खत्म करने में काफी मदद की. सुमित टंडन एनएफडीसी के निर्देशक रहे.राज्यसभा व लोकसभा टीवी में रहे. वह हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दूरदर्शन पर समाचार पढ़ा करते थे.उन्होंने मेरे हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मेरे उच्चारण दो-ुनवजया को ठीक कराया.इसके अलावा थिएटर करते समय स्क्रिप्ट रीडिंग के दौरान निर्देशक हमारा उच्चारण दो-ुनवजया ठीक कराता ही है.उस वक्त हम सीखते है कि नुक्ता कहां लगाना है और कहां नही लगाना है.इसके अलावा उस वक्त वह हमें हिंदी के अखबार व पत्रिकाएं भी पढ़ने पर जोर देते थे.तो मैंने अपने हिंदी उच्चरण को सुधारने के लिए काफी प्रैक्टिस की.

मेरा सवाल है कि हिंदी भाषा होने से बौलीवुड में काम करना कितना आसान होता है?

-देखिए,बौलीवुड में हिंदी में ही फिल्में बनती हैं, इसलिए हिंदी भाषा होना फायदे की बात है.माना कि यहां पर वर्क कल्चर में अंग्रेजी का प्रभाव है.पर मैंने तो दिल्ली में रहते हुए कई अंग्रेजी नाटकों में अभिनय किया है.माना कि कुछ हिंग्लिश फिल्में भी बन रही है.फिर भी मैं नहीं मानता कि कलाकार के अंग्रेजी आना जरुरी है.बशर्ते कलाकार बिना किसी हीनग्रंथि का शिकार हुए हिंदी में बात करे.क्या हिंदी बोलना शर्म की बात है?जी नहीं..यह बात हर कलाकार को अच्छी तरह से समझनी होगी.जो लोग मानते हैं कि बिना अंग्रेजी सीखे बिना हिंदी फिल्मों में काम नही मिलेगा,उनकी सोच गलत है. मैं ऐसा नहीं मानता.मैं तो हर जगह फर्राटेदार हिंदी में ही बात करता हॅूं.लोग तो मेरी तारीफ करते है कि में कितनी अच्छी हिंदी बिना हिचक के बोलता हूं. हिंदी मेरी मातृभाषा है,मातृभाषा में बात करने में शर्म कैसी?मैं देसी अंग्रेज नही हॅूं. मुझे अंग्रेज क्यों बनना है? नहीं बनना है.

कोई ऐसा किरदार है,जिसे आप निभाना चाहते हों?

कोई ऐसा एक किरदार तो नही है.मगर जब हम किरदार का विष्लेषण करते हैं,तो हमारे दिमाग में कई किरदार आते हैं.ईश्वर करे कि कभी मुझे ‘गॉड फादर’ का किरदार निभाने का अवसर मिले. मैं इफरान खान का फैन रहा हॅूं,जिस तरह के किरदार उन्होंने निभाए हैं,उस तरह के किरदार निभाने को मिल जाएं.मेरी इच्छा सदैव चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने की होती है.एक कलाकार की असली प्रतिभा चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने में ही निखरती है.पर जब तक निर्देशक को कलाकार की प्रतिभा पर विश्वास नहीं होगा,तब तक चुनौतीपूर्ण किरदार मिलना ही मुष्किल है.मैं तो हर निर्देषक व हर कास्टिंग डायरेक्टर से गुजारिश करता हॅूं कि वह एक बार मुझे चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने का अवसर देकर देखें कि मैं क्या कर पाता हूं.

आपके शौक क्या हैं?

लिखने का शौक है.कभी मैं कविताएं लिखा करता था.मैंने एक फिल्म की पटकथा भी लिख रखी है.तो जब भी समय मिलता है,कुछ न कुछ लिखता रहता हॅूं.तरह तरह के व्यंजन बनाने व खाने का शौक है.जिंदगी में बेवजह की भागादौड़ी करने में यकीन नहीं रखता. मुझे अतीत या भविष्य में नहीं,वर्तमान में ही जीना पसंद है.

Anupamaa: बर्थडे के दिन इस एक्ट्रेस ने कहा ‘वनराज’ को अंकल, पढ़ें खबर

टीवी सीरियल अनुपमा के वनराज यानी सुधांशु पांडे ने कल यानी 22 अगस्त को 48वां जन्मदिन सेलीब्रेट किया. फैंस और सेलिब्रिटी उन्हें लगातार बधाईयां और शुभकामनाएं दे रहे हैं. तो वहीं सीरियल अनुपमा के सितारे भी सुधांशु पांडे को जन्मदिन की बधाई दी हैं. उन्होंने सुधांशु पांडे के लिए खास पोस्ट शेयर की है.

काव्या यानी मदालशा शर्मा ने सुधांशु पांडे पर जमकर प्यार लुटाती नजर आईं. सुधांशु पांडे ने भी अपनी ऑनस्क्रीन पत्नी के धन्यवाद कहा है.

 

बा यानी अल्पना बुच ने एक वीडियो शेयर करके सुधांशु पांडे को जन्मदिन की शुभकामना दी है. टीवी एक्ट्रेस अल्मा हुसैन यानी सारा ने तस्वीरों के जरिए अपने होने वाले ऑनस्क्रीन ससुर को जन्मदिन विश किया है. इस दौरान अल्मा हुसैन ने सुधांशु पांडे को अंकल बता दिया.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Almaa??‍♀️? (@alma_hussein28)

 

पाखी ने भी अपने ऑनसक्रीन पिता वनराज के जन्मदिन को खास बनाने की कोशिश की है. सुधांशु पांडे ने सोशल मीडिया पर मुस्कान बामने के साथ तस्वीर शेयर की है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sudhanshu Pandey (@sudanshu_pandey)

 

अनुपमा के प्रोड्यूसर राजन शाही ने भी सुधांशु पांडे को बर्थडे विश किया है. सुधांशु पांडे के लिए राजन शाही ने एक पोस्ट शेयर की है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Rajan Shahi (@rajan.shahi.543)

 

अस्पताल में राजू श्रीवास्तव के साथ हुई घटना, आईसीयू में घुसा एक शख्स

देश के मशहूर कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव (Raju Srivastava) की हालत गंभीर बताया जा रहा है,जिससे फैंस हर समय उनका हेल्थ अपडेट का बेसब्री से इंतजार करते हैं. खबर आई थी कि राजू श्रीवास्तव अब धीरे-धीरे ठीक हो रहे है, पर वो अब भी वेंटिलेटर पर ही हैं. इसी बीच एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने सबको हैरान कर दिया है. आइए जानते हैं.

अस्पताल में राजू श्रीवास्तव के साथ कुछ ऐसा हुआ है, जिससे सभी हैरान हैं. रिपोर्ट के मुताबिक राजू श्रीवास्तव के साथ अस्पताल में एक घटना हुई है, जिसे जानने के बाद फैंस और परिवार वाले परेशान हो गए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राजू श्रीवास्तव जिस आईसीयू में भर्ती है, उस आईसीयू के अंदर एक अनजान शख्स सेल्फी लेने पहुंच गया.

 

इसके बाद कॉमियन के परिवार वालों ने हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन से इसकी शिकायत की हैं और सुरक्षा की मांग की है. इस घटना के बाद राजू श्रीवास्तव के सुरक्षा के लिए गार्ड्स भी लगा दिये गये हैं. हाल ही में बताया गया था कि कॉमेडियन की सेहत में कोई सुधार नहीं आ रहा है, लेकिन इसके बाद शेखर सुमन ने ट्वीट कर बताया था कि राजू श्रीवास्तव अब पहले से ठीक है.

 

आपको बता दें कि राजू श्रीवास्तव को 10 अगस्त को ट्रेडमिल पर दौड़ते समय हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया.

 

झगड़ातुर घाघ पति: पति-पत्नी के लङ़ाई-झगड़े का है अपना खास महत्व

जिन पतिपत्नियों के बीच झगड़े नहीं होते, उन पर शंका होती है कि वे पतिपत्नी भी हैं या कोई और जीव. भारतीय लड़कों को पति होना सिखाया जाता है. जब वे अच्छेखासे पति हो जाते हैं, तो पत्नी से लड़ने के होने वाले फायदों के मजे लेते हैं. एक घाघ पति वही होता है, जो पत्नी के हमलों का बेसब्री से इंतजार करे. पत्नियों के इन झगड़ों के महत्त्व को समझ कर अंतरराष्ट्रीय पति आयोग ने इन से होने वाले फायदों से हर एक पति को लाभ लेने हेतु आदेशित किया है.

पति आयोग के अध्यक्ष का कहना है कि दुनिया के सारे पति लोगों को पत्नी केंद्रित लड़ाईझगड़ों का जीवन में लाभ उठाना चाहिए. पत्नी से झगड़ने के आनंददायी फायदे हैं :

चंद लमहे सुख के : झगड़ा होते ही चुपचाप बिस्तर पर पड़ जाना होता है. “सुन रहे हो क्या? लाइट बंद करो. पंखा तेज करो. यह चादर इधर दो. सारे तकिए तुम ने ही ले लिए? इधर मुंह करो. खिड़की क्यों खोल दी? जरा बाम लगा दो. व्हाट्सऐप में ही घुसे रहोगे क्या…” जैसे तीखे बाणों से मुक्ति मिल जाती है.

परम आनंद के क्षण : झगड़े के कारण बातचीत बंद हो जाती है. एकदूसरे पर शस्त्र फेंकने का कार्य रुक जाता है. आंसुओं की नदियां सूख जाती हैं. युद्ध मैदान में इसे विराम अवस्था कहते हैं. यहां कोई तनाव नहीं रहता है. सारी किचकिचाहट खत्म हो जाती है. इस समय पति लोगों के जीवन में परम आनंद के क्षण अठखेलियां खेलने लगते हैं.

मस्ती भरी गतिशीलता : झगड़ा पूर्वकाल में पत्नियां पति लोगों पर बारबार ब्रैक लगा देती हैं. झगड़े के कारण इन ब्रैकों से मुक्ति मिल जाती है. फोन, व्हाट्सऐप आदि पर पत्नी के संदेश आने का कोई खतरा नहीं रहता है.

“क्या कर रहे हो? कहां हो? फोन क्यों नहीं उठाया? मुझ से 2 सैकंड और दूसरों से 3 घंटे तक बातें? मन नहीं लग रहा है. आज गरमी बहुत पड़ रही है. साड़ी फौल लेते आना. फ्रिज में सब्जियां भी नहीं हैं. घर जल्दी आना…” जैसे तीखे खंजरों से मुक्ति मिल जाती है. एक बार झगड़ा हो जाने पर 4-5 दिन तो उत्सव बना रहता है.

इज्जत बढ़ती है : प्रायः देखा गया है कि झगड़े के उत्तरार्धकाल में पति लोगों की इज्जत बढ़ जाती है. पति होने का एहसास पत्नियों को उन के खोने के बाद ही होता है. घुटाघुटाया नयापुराना पति निजी पत्नी के क्षेत्र में अपनी इज्जत दोगुना होने पर ही प्रवेश करता है. पत्नियों को एक अच्छे पालतू नौकर खोने का डर सदैव बना रहता है. इस कालखंड में चंद पत्नियां पति लोगों की चिरौरी भी करती हैं.

आत्मनिर्भर पतिदेव : झगड़ा होने के बाद कई प्रकार के कार्य स्वयं पति लोगों को ही करने पड़ते हैं. नहाने के बाद खुद कपड़े धोना. अपने लिए चाय बनाना. उठ कर पानी पीना. अपने मोजे ढूंढ़ना. कपड़ों को प्रेस करना. आंगन में पड़ा अखबार उठा कर लाना…जैसे कई श्रमसाध्य कठिन कार्य पति लोगों को खुद ही करने पड़ते हैं. इस से पति आत्मनिर्भर देश की ओर तेजी से बढ़ने लगते हैं. सियासत में ऐसे कई पति पार्टी बिखरे पड़े हैं. बेचारी जनता इन्हें ढोती रहती है.

आजादी का महामहोत्सव: 75 साल में महिलाएं

आज भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं. बड़ी बात यह है कि वे एक आदिवासी महिला हैं. एक ऐसा समुदाय (संथाल) जिस की 90 फीसदी आबादी आजादी के 75 सालों बाद भी हाशिए पर पड़ी प्रताडि़त, उपेक्षित, गरीब, अशिक्षित और बेबस है. मगर इसी समुदाय की एक लड़की ने सिर्फ अपनी शिक्षा के दम पर आज देश की प्रथम नागरिक होने का गौरव हासिल किया है.

द्रौपदी मुर्मू के मातापिता ने उन्हें शिक्षित करने का ‘दुस्साहस’ दिखाया. खुद द्रौपदी की दृढ़ इच्छाशक्ति ने उन्हें आगे बढ़ाया. उन को पढ़ाने वाले मास्टर बासुदेव बेहरा कहते हैं, ‘‘वे क्लास टौपर थीं. हमेशा सब से ज्यादा नंबर लाती थीं. नियम के मुताबिक मौनिटर उन्हें ही बनना चाहिए था, लेकिन क्लास में लड़कियों की संख्या काफी कम थी. 40 छात्रों में सिर्फ 8 लड़कियां थीं. इस वजह से हमारे मन में शंका थी कि लड़की हो कर वे पूरे क्लास को कैसे संभालेंगी, लेकिन द्रौपदी अड़ गईं. आखिरकार वही मौनिटर बनीं.’’

द्रौपदी ओडिशा के उपरवाड़ा गांव की अकेली लड़की थीं जो गांव के स्कूल में 7वीं कक्षा तक पढ़ने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए भुवनेश्वर गईं. उन्होंने अपने जीवन के तमाम फैसले खुद लिए और उन पर अड़ी रहीं. टीचर बनीं, अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी की, राजनीति में आने का फैसला किया और आज वे देश की राष्ट्रपति हैं. उन के जीवन में ऐसे बहुत से पल आए जिन्हें ‘भूचाल’ की संज्ञा दी जा सकती है, लेकिन मन को मजबूत रख कर उन्होंने हर संकट का सामना किया.

भारत की सफल महिलाओं में इंदिरा नूई एक जानामाना नाम है. जब भी पावरफुल और कामयाब महिलाओं की बात चलती है तो भारतीय मूल की अमेरिकी नागरिक इंद्रा नूई का नाम सामने आता है. तमिलनाडु में जन्मी नूई पेप्सिको की अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुकी हैं. साल 2018 में नूई पेप्सिको के सीईओ के पद से रिटायर हुईं. वे 2007 से 2019 तक पेप्सिको की अध्यक्ष रहीं.

इंद्रा नूई को यह कामयाबी यों ही नहीं मिल गई. इस कामयाबी के पीछे है उन की कड़ी मेहनत और लगन. नूई ने स्नातक की पढ़ाई मद्रास विश्वविद्यालय से की. उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान, कोलकाता से बिजनैस मैनेजमैंट में पोस्टग्रेजुएशन किया और फिर 1978 में उन्होंने येल स्कूल औफ मैनेजमैंट में दाखिला लिया. नूई जब येल में पढ़ रही थीं तो उन्होंने नाइट शिफ्ट में रिसैप्शसनिस्ट के तौर पर काम भी किया ताकि वे अपने पहले जौब इंटरव्यू के लिए एक वैस्टर्न सूट खरीदने के लिए पैसे जुटा सकें.

साल 2015 में फौर्च्यून ने सब से शक्तिशाली महिलाओं की लिस्ट में नूई को दूसरी सब से शक्तिशाली महिला का स्थान दिया.

भारत में कई महिलाएं हैं जो आज व्यापार व उद्योग जगत का बड़ा नाम हैं. वे देश की प्रतिष्ठित कंपनियों में बड़े पद पर कार्यरत हैं. देश की पहली स्वनिर्मित अरबपति महिला की बात करें तो किरण मजूमदार शा का नाम सब से पहले आएगा. फोर्ब्स सूची में भारत की 5वीं सब से अमीर महिला घोषित किरण मजूमदार शा ने अपने दम पर यह मुकाम बनाया है. किरण मजूमदार शा भारत की सब से बड़ी लिस्टेड बायोफार्मास्युटिकल कंपनी बायोकौन की फाउंडर हैं. यह दवा उत्पादन के क्षेत्र की बड़ी कंपनी है. किरण ने साल 1973 में बेंगलुरु विश्वविद्यालय से बीएससी (जूलौजी औनर्स) की डिग्री हासिल की. इस के बाद उन्होंने वैलेरेट कालेज, मेलबर्न यूनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया से ‘मौल्ंिटग और ब्रूइंग’ विषय पर उच्चशिक्षा हासिल की.

मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ वह नाम है जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की फर्स्ट डिप्टी मैनेजिंग डायरैक्टर रहीं. भारतीय मूल का कोई व्यक्ति और वह भी एक महिला पहली बार आईएमएफ में इस पद पर पहुंचीं. गीता गोपीनाथ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कालेज से अर्थशास्त्र में औनर्स की पढ़ाई की. फिर दिल्ली स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अर्थशास्त्र में ही मास्टर की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद 1994 में वे वाशिंगटन यूनिवर्सिटी चली गईं. साल 1996 से 2001 तक उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की. पोस्टग्रेजुएशन के दौरान उन की मुलाकात इकबाल से हुई. दोनों ने बाद में शादी कर ली.

गीता गोपीनाथ कई साल पढ़ाने के बाद फैडरल रिजर्व बैंक औफ न्यूयौर्क की सलाहकार भी हैं. व्यापार एवं निवेश, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट, मुद्रा नीतियां, कर्ज और उभरते बाजारों की समस्याओं पर उन्होंने लगभग 40 शोधपत्र भी लिखे हैं.

भारतीय फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर आज अपनी बेबाक राजनीतिक टिप्पणियों के लिए ख्यात हैं. उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियां मिल चुकी हैं मगर स्वरा के स्वर ठंडे नहीं पड़े. स्वरा भास्कर ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की. स्वरा ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 2009 के माधोलाल कीप वाकिंग में एक सहायक भूमिका के साथ की थी. व्यावसायिक रूप से सफल रही फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ (2011) में उन की सहायक भूमिका से उन्हें पहचान मिली और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के नामांकन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया. स्वरा भास्कर एक हिम्मती और बेबाक महिला हैं जो सोशल मीडिया पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए पहचानी जाती हैं.

वहीं दूसरी ओर फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत भी अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर हैं. ये दोनों ही महिलाएं काफी जीवट प्रवृत्ति की, बेखौफ, हिम्मती और बेबाक हैं. वे निजी विचारों को खुल कर सामने रखने में नेताओं को भी आड़े हाथ लेने से संकोच नहीं करती हैं.

एक्सेंचर इंडिया की चेयरपर्सन रेखा एम मेनन को बीते साल नैशनल एसोसिएशन औफ सौफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (नैसकौम) की चेयरपर्सन नियुक्त किया गया है, जो सौफ्टवेयर लौबी गु्रप के 30 साल के इतिहास में शीर्ष पद प्राप्त करने वाली पहली महिला हैं. मेनन भारत में एक्सेंचर में चेयरपर्सन और वरिष्ठ प्रबंध निदेशक भी हैं.

मल्लिका श्रीनिवासन मैसी फर्ग्यूसन ट्रैक्टर और कृषि उपकरण बनाने वाली कंपनी टैफे (टीएएफई) की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं. उन्हें उद्योग जगत की आयरन लेडी के नाम से पुकारा जाता है. मल्लिका श्रीनिवासन ने 1986 में 27 वर्ष की उम्र में जब टैफे जौइन किया तब उन के पिता ने उन से कहा था, ‘‘पूरा परिवार तुम्हारे साथ है. कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कोई भी निर्णय लेने की पूरी आजादी है.’’ उन का नाम एशिया की 50 पावरफुल बिजनैस वुमन में शुमार होता है.

ये तमाम नाम ऐसी भारतीय महिलाओं के हैं जिन्होंने अपनी जीवटता, दृढ़ इच्छाशक्ति, जिद और लगन से उच्चशिक्षा हासिल की और अपने कैरियर में ऊंचा मुकाम प्राप्त कर अपनी शिक्षा व अनुभवों का फायदा देश और दुनिया को दे रही हैं.

मगर यह संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है. 140 करोड़ आबादी वाले भारत देश में ऐसी प्रतिभाशाली महिलाओं की संख्या लाखों में हो सकती थी अगर उन को शिक्षा पाने का समुचित मौका मिलता. लेकिन आजादी के 75वें साल को अमृत महोत्सव के रूप में मनाने वाले राष्ट्र में अगर औरतों की सही और तार्किक शिक्षा और अधिकारों की बात करें तो वह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है. अपने आसपास नजर डालें तो अधिकांश औरतें सिर्फ घरेलू काम करती, शादी कर के बच्चे पैदा करती और पति का घर संभालती ही नजर आती हैं. जो पढ़लिख रही हैं वे भी इसलिए कि उन की अच्छे घरों में शादियां हो जाएं.

सुबहसुबह घर में कामवाली बाई आई तो उस से यों ही पूछ लिया, ‘कुछ पढ़ाईलिखाई की है?’ उस ने ‘न’ में सिर हिला दिया. उस का नाम देवी है. उम्र कोई 22-23 साल. मध्य प्रदेश में जबलपुर के नजदीक के एक गांव की है. परिवार मजदूरी करने दिल्ली आया जब देवी 7-8 साल की थी. उस के मातापिता ने दिल्ली में ठेकेदारों के तहत मजदूरी की. जहांजहां नई बिल्ंिडग बनती, पूरा परिवार उसी जमीन पर तिरपाल डाल कर रहता था. देवी के अन्य परिजन भी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहते हुए मजदूरी करते हैं. फसल बुआई और कटाई के वक्त कुछ लोग गांव लौट जाते हैं और महीनेदोमहीने खेतों का काम कर के वापस आ जाते हैं.

देवी दिल्ली में बड़ी हुई. मां के साथ गारामिट्टी ढोते या कोठियों में बाई का काम करते हुए जवान हुई. यहीं सगी मौसी के लड़के से उस की शादी हो गई. हालांकि वह रिश्ते में भाई हुआ मगर उन के वहां रिश्तेदारी में शादी का प्रचलन है. (किसी सनातनी हिंदू के लिए यह कान खड़े कर देने वाली बात है मगर देश के कई गांवों में ये बातें नौर्मल हैं.) देवी की मौसी उस की सास भी है. अब देवी के पास 2 बेटे हैं. उस का पति राजकुमार, जो उम्र में देवी के बराबर ही है, दिल्ली के सरकारी स्कूल में 6ठी कक्षा तक पढ़ा है मगर देवी को नहीं पढ़ाया गया. उस के परिवार की किसी लड़की ने पढ़ाई नहीं की है जबकि सभी देश की राजधानी में रहते हैं.

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, तमिलनाडु से आ कर दिल्ली में काम करने वाले मजदूर परिवारों की संख्या लाखों में है. दिल्ली में इन की कई बस्तियां और ?ाग्गी?ांपडि़यां हैं. इन बस्तियों में बहुत बड़ी तादाद लड़कियों की है.

गांव में न सही मगर राजधानी में होते हुए तो इन्हें शिक्षा मिलनी चाहिए थी, कम से कम इतनी कि ये बच्चियां अपना नाम लिख सकें, मगर इन लड़कियों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा. ये घर में रहती हैं और चूल्हाचौका करती हैं, सरकारी नल से प्लास्टिक की बोतलों में जरूरतभर पानी भरभर कर लाती हैं, मां काम पर जाती है तो पीछे से अपनी मांओं के बच्चे पालती हैं, कपड़े धोती हैं, साफसफाई करती हैं. जहां 14-15 साल की हुईं, मां के साथ मजदूरी या कोठियों में बाई का काम करने निकल पड़ती हैं और 17-18 की होतेहोते ब्याह दी जाती हैं.

सुबह घरघर से कचरे की थैलियां उठाने वाली अनुसूचित जाति की 60 वर्षीया कमला भी अनपढ़ है और उस की 35 वर्षीया बहू शकुंतला भी अनपढ़ है. ये दोनों कचरा उठाने के साथसाथ कोठियों में साफसफाई का काम करती हैं.

पास की मंडी में बैठी सब्जी बेचने वाली सावित्री भी अनपढ़ है. सावित्री की उम्र 40 के आसपास होगी. दिल्ली में पैदा हुई, यहीं बड़ी हुई मगर स्कूल का मुंह कभी नहीं देखा. आप अपने आसपास दिखने वाली इन औरतोंबच्चियों से पढ़ाई के विषय में पूछिए, आप को ‘न’ में ही जवाब मिलेगा.

भारत के गरीब तबके में अनपढ़ औरतों और लड़कियों की बहुत बड़ी तादाद है. बचपन से राष्ट्रीय राजधानी में रह रही लड़कियां जब अक्षर ज्ञान से महरूम हैं तो अन्य छोटे शहरों, बस्तियों और गांवों में क्या हाल है, इस का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है.

भारत सरकार स्वतंत्र दिवस की 75वीं वर्षगांठ को ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ के तौर पर मना रही है. मगर आजादी के 75 सालों में भी भारत सरकार अपनी करोड़ों बेटियों के लिए प्राइमरी शिक्षा तक की व्यवस्था नहीं कर पाई. इस से बड़ी शर्म की बात क्या होगी? आप को जान कर हैरानी होगी कि आज भी भारत का हर चौथा बच्चा स्कूली शिक्षा से वंचित है.

जब हमें आजादी मिली थी उस समय 19 फीसदी आबादी साक्षर थी. भारत सरकार कहती है कि 75 साल में यह आंकड़ा 80 फीसदी तक पहुंच गया है, लेकिन इस दावे में कितनी सचाई है, यह बड़े शहरों में रहने वाले आप अपने आसपास काम करने वाले लोगों से, घरों में काम करने वाली औरतों से, बाजार में सब्जी बेचने वालों से, मजदूरों से, रिकशाचालकों से, सड़क की गंदगी साफ करने वालों से, कचरा उठाने वालों से पूछ कर सम?ा सकते हैं कि इस दावे में कितनी सचाई है.

भारत में शिक्षा की दर बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव लगातार बना रहता है. सरकारें शिक्षा नीतियां बनाती हैं, शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने और प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए समयसमय पर कुछ योजनाएं भी घोषित करती रहती हैं. फिर भी इतने सालों में अगर अपेक्षित परिणाम नहीं निकल पाए तो निश्चित रूप से इस में सरकारों और समाज की नीयत और नीतियों में बुनियादी खामियां हैं. 75 सालों में शिक्षा का शतप्रतिशत आंकड़ा प्राप्त न करना शासन की नाकामी है.

शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए 11 साल हो गए हैं. इस कानून के तहत 14 साल तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का वादा है. अनिवार्य शिक्षा का मतलब है कि सभी बच्चों को औपचारिक स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए. यह दायित्व सरकारी, निजी और सभी धार्मिक संस्थाओं के तहत चलने वाले स्कूलों पर डाला गया है कि वे इस कानून के तहत बच्चों को शिक्षा दें. लेकिन व्यवस्थागत खामियों के चलते बच्चे, खासकर लड़कियां, शिक्षा से दूर ही हैं.

राजनीति गरीबी और अशिक्षा को अपने वोटबैंक के तौर पर भुनाती है. अगर गरीब शिक्षित हो गया तो खड़ा हो कर अपने अधिकार मांगने लगेगा, इसलिए उस के सामने सिर्फ शिक्षा का ?ान?ाना बजाते रहो मगर उस ?ान?ाने तक उस को पहुंचने न दो.

शिक्षा का बंटाधार

गांवकसबों के सरकारी स्कूलों में शिक्षक मोटी तनख्वाह के लालच में अपनी हाजिरी लगाने स्कूल जाते हैं. बच्चों को शिक्षित करने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि उन से कोई जवाब मांगने वाला नहीं है.

उत्तर प्रदेश के गांवों से कई बार यह खबर आई कि वहां 5वीं का बच्चा अपना नाम तक लिखना नहीं जानता है. इंग्लिश के शिक्षकों को इंग्लिश पढ़नीबोलनी नहीं आती. अंकगणित का टीचर 4 का पहाड़ा नहीं जानता. ऐसे शिक्षकों से भारत को शिक्षित करने के उपक्रम क्या हास्यास्पद नहीं हैं?

देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नगरनिगम के विद्यालयों में नर्सरी टीचर की एक क्लास में 100 से 150 बच्चे तक एक कमरे में कीड़ेमकोड़ों की तरह भरे दिखते हैं. एक टीचर के सिर पर सौडेढ़सौ बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी. ऐसे में वे क्या पढ़ेंगे जब चिलचिलाती गरमी में बैठे ये बच्चे इन कमरों में ठीक तरीके से सांस तक नहीं ले पाते हैं. वे अपनी कौपीकिताबों से खुद को पंखा ?ालते दिखाई देते हैं. बच्चों को कमरे में बंद कर टीचर्स स्टाफरूम में चायसमोसे का लुत्फ उठाते नजर आते हैं.

निगम के पुराने टीचर्स की तनख्वाहें आज एक से डेढ़ लाख रुपए महीना हैं, मगर उस के बदले में वे बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं, यह सचाई किसी भी स्कूल में जा कर देखी जा सकती है.

हर साल जुलाई महीने में स्कूल खुलने पर टीचर्स को टारगेट दिया जाता है कि आसपास तीनचार किलोमीटर के दायरे में जो ?ाग्गी?ांपड़ी और गरीब परिवारों, मजदूरों आदि के बच्चे हैं उन को मिड डे मील के बहाने, नकद पैसे देने के बहाने ला कर उन का एडमिशन निगम के स्कूलों में करवाया जाए और इस तरह सरकारी कार्यक्रम पूरा किया जाए. टीचर्स इस टारगेट को पूरा करते हैं मगर जब शिक्षा देने की बात आती है तो व्यवस्थाएं इतनी जर्जर हैं, नीयत इतनी खोटी है कि बच्चे स्कूल आ कर भी शिक्षा से वंचित ही रहते हैं.

खैर, यह एक बहुत बड़ा रिसर्च का विषय है. दिल्ली के सरकारी स्कूलों से ले कर गांवदेहात तक के स्कूलों की पड़ताल करना आसान भी नहीं है. मगर एक सवाल इस से भी ज्यादा अहम है कि अजादी के 75 सालों में मध्यम और उच्च वर्ग की जितनी लड़कियां और महिलाएं पढ़लिख गई हैं, क्या वे अपनी शिक्षा से आज देश को कुछ लौटा रही हैं?

आम राय यह है कि भारतीय परिवार जहां लड़कों को नौकरी करने के उद्देश्य से शिक्षित करते हैं वहीं वे अपनी लड़कियों को ग्रेजुएशन तक सिर्फ इसलिए पढ़ाते हैं ताकि उन की अच्छी शादी हो जाए. एक उच्चशिक्षा प्राप्त लड़की को भी ससुराल में चूल्हाचौके तक ही सीमित रहना पड़ता है. वह एक घरेलू नौकर से ज्यादा कुछ नहीं है.

दशकों से शहरी क्षेत्रों में उच्चवर्ग और मध्यवर्ग की लगभग सभी लड़कियां उच्चशिक्षा प्राप्त कर रही हैं. उच्चवर्ग की तो अधिकांशतया इंग्लिश मीडियम में पढ़ती हैं. मगर उन की शिक्षा राष्ट्र के कामों में, विकास और उन्नति में क्या योगदान देती है? क्या वे पढ़लिख कर नौकरी करती हैं? अधिकारीकर्मचारी बनती हैं? नहीं. अपनी शिक्षा के आधार पर नौकरी प्राप्त कर आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ी महिलाओं का प्रतिशत आधी आबादी का शायद 5 फीसदी ही होगा. उस में मध्यम और उच्चमध्य वर्ग की ज्यादा हैं.

उच्चवर्ग में भी लड़कियों से नौकरी कराने की इच्छा न के बराबर ही है. ऊंचीऊंची डिग्रियां पा कर वे बड़े सरकारी अधिकारियों, डाक्टरों, इंजीनियरों, व्यवसायियों से शादी कर के घरों में कैद हो जाती हैं.

उन की हालत रेशमी कपड़े पहने एक घरेलू नौकर की सी ही होती है. सब के खाने का इंतजाम करना, घर की साफसफाई करवाना, गेस्ट को एंटरटेन करना, बुजुर्गों की देखभाल करना, बच्चों की परवरिश करना, बस इसी तरह की जिम्मेदारियों का निर्वहन वे ताउम्र करती हैं, जबकि निम्नवर्ग की 90 फीसदी औरतें घरों से निकल कर काम करती हैं और पैसा कमाती हैं मगर वे अशिक्षित हैं.

देखा जाए तो एक उच्चवर्ग की उच्चशिक्षा प्राप्त गृहिणी और उस के घर में काम करने वाली अशिक्षित बाई दोनों एकजैसी ही हैं. एक पढ़लिख कर किचन संभाल रही है, दूसरी अनपढ़ हो कर उस के किचन के कामों में मदद कर रही है.

रेलवे के एक उच्चाधिकारी की पत्नी बीटैक है. बीटैक यानी इंजीनियर. अपने स्कूलकालेज में थ्रूआउट फर्स्ट डिवीजन रही. मांबाप ने उन की पढ़ाई पर कई लाख रुपए खर्च किए. मगर उन की योग्यताएं देश के काम नहीं आईं. शादी हुई तो अधिकारी पति ने बीवी से नौकरी करवाने में अपना अपमान सम?ा. अब उस बीटैक महिला का कार्यस्थल सिर्फ उस का किचन है जहां वह पति और बच्चों के पसंद के पकवान बनाती रहती है और घर में आने वाले पति के मेहमानों की खातिरदारी में अपना समय व्यतीत करती है.

शिक्षित महिलाएं किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होती हैं मगर ध्यान रहे, विवेकहीन, लक्ष्यहीन  और उपयोगहीन शिक्षा पूरे समाज को पतन की ओर ले जाती है. भारत को स्वतंत्र हुए 70 साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन महिलाएं, जो देश की 49 फीसदी आबादी का गठन करती हैं, अभी भी सुरक्षा, गतिशीलता, आर्थिक स्वतंत्रता, पूर्वाग्रह और पितृसत्ता जैसे मुद्दों से जू?ा रही हैं. हिंदू धर्म हो या इसलाम औरतों के अंगूठे के नीचे दिखना चाहता है और संवैधानिक अधिकारों के बावजूद पितृसत्तात्मक समाज पुरुषों को ही निर्णय लेने की शक्ति देता है लड़कियों को नहीं.

पढ़ने या काम करने के विकल्प से ले कर आर्थिक निर्णय और कमाई के इस्तेमाल तक अकसर महिलाओं को इन अहम मुद्दों पर अपनी राय रखने से मना कर दिया जाता है. उन का पढ़नालिखना उन के जीवन में कभी काम नहीं आता. वे पढ़लिख कर अपने जीवन के फैसले भी नहीं ले सकती हैं. शायद इसलिए, भारत दुनिया में सब से ज्यादा महिलाओं के प्रति हिंसा और कन्याभ्रूण हत्याओं का दोषी है.    द्य

आजादी का महामहोत्सव: आजादी के 75 साल- कुछ पाया, बहुत कुछ बाकी

आम जनता ने आजादी के 75 सालों में बहुतकुछ हासिल किया पर बहुत पाना अभी बाकी है. भारत की तुलना चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर से की जाए तो साबित होगा कि लोगों की हालत तो ठीक ही नहीं. ऐसे में शासन को खंगालने व वर्तमान को टटोलने की जरूरत है.

भारत देश आजादी के 75 साल पूरे कर चुका है. इस साल का आजादी दिवस हर साल की तरह खास इसलिए नहीं कि हम 76वें स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रहे हैं बल्कि यह दिन अपने इतिहास को खंगालने और वर्तमान को टटोलने का मौका होता है. यह दिन भविष्य की रूपरेखा भी तय करता है. यह गाड़ी में लगे उस साइड मिरर की तरह होता है जो पीछे के दृश्य तो दिखाता ही है साथ ही आगे की दुर्घटनाओं से आगाह भी कराता है.

यह गुलामी के उस काल की याद दिलाता है जिस के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी गई और कई देशवासियों की शहादत हुई. यह एक रिमाइंडर है जो आकलन करता है कि हम अपने कदम किस ओर बढ़ा रहे हैं, कहीं हम रुक तो नहीं गए या उलटी दिशा में तो नहीं जा रहे.

अगर पीछे मुड़ कर देखें तो आजादी का आंदोलन अपनेआप में बलिदानों की गाथा गाता है. कई जननायकों ने अपनी जवानी कालकोठरी में गुजार दी, कई युवाओं ने आजादी के लिए अपनी पढ़ाई व कैरियर दांव पर लगा दिया, कई हंसतेहंसते फांसी के तख्त को चूम गए, कई लाठीगोलियों से शहीद हो गए. यह इसलिए कि इन का एक न्यूनतम एजेंडा यह था कि आजादी के बाद देशवासी अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जी सकें. वे अपनी सरकार, अपने नेताओं को चुन सकें जो जनता को अशिक्षा, बदहाली व गरीबी से छुटकारा दिलाएं और हर स्तर पर मजबूत देश का निर्माण कर सकें. ऐसा देश जहां आर्थिक और सामाजिक उन्नति हो, जहां न कोई रंग और जन के आधार पर राज करने वाला हो न कोई गुलाम, न ऊंचा न नीचा.

आजाद भारत में लोगों का यह सपना केवल राजनीतिक ऊंचनीच से ही संबंधित नहीं था बल्कि लोग आर्थिक तथा सामाजिक बराबरी भी चाहते थे. 1947 में पार्टीशन का कड़वा घूंट पिए लोग धर्म के जंजालों में पड़ना नहीं चाहते थे, वे काफीकुछ खो चुके थे और अब शांति से देश को आगे बढ़ते देखना चाहते थे.

खैर, आजादी के 75 सालों बाद यह देशवासियों के लिए गनीमत रहा कि इतने साल देश का लोकतंत्र वोटतंत्र से ही सही पर चलता जरूर रहा. लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को चुन कर संसद व विधानसभाओं में भेजा. उन्होंने अपने अनुसार सहीगलत जो भी फैसले लिए या कानून बनाए, उन फैसलों ने देश को ठोकपीटधकेल कर आगे बढ़ाया.

क्या कुछ हासिल किया

आज जब बीते 75 सालों की बात हो रही है तो यह भूलना नहीं चाहिए कि आजादी के दौरान बंटवारे का घाव और शरणार्थियों की समस्या भारत के लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं थी. ऐसे में सब से बड़ी प्राथमिकता देश की एकता और अखंडता बनाए रखने की भी थी. लोग धर्मों में उल झ कर न रह जाएं और देश कई टुकड़ों में न बंट जाए, इस का ध्यान रखना जरूरी था.

इस के अलावा अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और उन में भारत की स्वतंत्र पहचान बनाना एक चुनौती थी. अंगरेजों के शासनकाल में कई लघु कुटीर उद्योग जर्जर हो गए थे. ऐसे में अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की समस्या, 20वीं सदी में यूरोप और अमेरिका के मुकाबले में औद्योगीकरण में पिछड़ जाने की चिंता, कृषि विकास की समस्या, स्वास्थ्य व शिक्षा की बदहाल स्थिति देश के आगे मुंहबाए खड़ी थीं. देश स्वदेशी पैरों पर खड़ा हो रहा था तो सबकुछ शुरू से शुरू करना था, फिर चाहे वह उद्योगों का निर्माण हो या स्कूल, अस्पतालों, भवनों का निर्माण हो. पहले बहाना था कि हम तो गोरों के गुलाम हैं इसलिए गरीब हैं.

आजादी के बाद 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ तो सारी व्यवस्थाओं को आकृति मिली, जिस में विधायिका देश के लोगों की चिंताओं का ध्यान रखने के लिए बनाई गई जिस का मूल काम कानून बनाने का रहा. कार्यपालिका सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू करने के लिए बनाई गई तथा सब से ऊपर न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या एवं न्याय देने और संविधान को लागू कराने के लिए बनाई गई.

ऐसा नहीं कि इन 75 सालों में देश ने कुछ हासिल नहीं किया. सब से जरूरी वोटिंग का अधिकार मिला. आज छोटेबड़े शहरों में बड़ीबड़ी चमचमाती इमारतें दिखाई देती हैं. उन इमारतों में कौर्पोरेट मंडियां सजी हुई हैं. कई शहरों में आईटी हब बन गए हैं. सड़कों और रेल पटरियों का जाल लगभग पूरे देश में बिछ चुका है. बिजली तकरीबन हर घरगांव में पहुंच गई है. बड़े महानगरों में मैट्रो सरपट दौड़ने लगी है. देश का डिजिटलाइजेशन हो चुका है. मोबाइल एक्सेस हर हाथ में है. उस के लिए सुदूर इलाकों में नैटवर्क टावर भी लग गए हैं.

बड़े शहरों से ले कर कई छोटे शहरों तक मौल, सिनेमाहौल और रैस्तरां खुल गए हैं. अमेरिका, यूरोप और दुनियाभर की इंटरनैशनल कंपनियां भारत में स्थापित हो गई हैं. इन देशों के बड़ेबड़े शोरूम लोकल इलाकों में भी खुल गए हैं. आयातनिर्यात सुचारु रूप से चलने लगा है. विदेशों से इनवैस्टमैंट भारत आ रहा है. देश में सैकड़ों सफल पूंजीपति और उद्योगपति उभरे हैं जिन में से कुछ दुनिया के टौप में जगह बना चुके हैं.

इस के अलावा इस लंबे अंतराल में देश में उच्चशिक्षा के लिए प्रशिक्षण संस्थान खुले. आईआईएम, आईआईटी और एम्स बने. कई जनकल्याण की नीतियां बनीं. ग्रामीण इलाकों तक में स्कूलों का निर्माण हुआ. बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिला. उन स्कूलों में लड़कियां और दलित, वंचित तबकों के बच्चों को स्वीकार्यता मिली. इन्हीं वंचित तबकों से निकले लोग बड़े अधिकारी पदों पर भी बैठे. ऐसे ही विज्ञान के क्षेत्र में भी इसरो जैसी संस्था का निर्माण हुआ जिस ने विज्ञान के क्षेत्र में अच्छा काम भी किया.

अभी बहुत पाना रह गया

सवाल हैं कि क्या यह सिर्फ हमारे देश में ही संभव हो पाया? तकनीक क्या यहीं आई? डिजिटलाइजेशन क्या यहीं हुआ? चमचमाती इमारतें और आईटी हब क्या हमारे देश में ही बने? सड़क और रेल का जाल क्या भारत में ही बिछा? बिजली क्या यहीं पहुंच पाई? दरअसल, ऊपर गिनाए गए बिंदु, दुनिया के कुछ बेहद पिछड़े गृहयुद्धों के मारे देशों को छोड़ दिया जाए तो लगभग हर देश में संभव हो चुके हैं.

जब हम अपने देश की बड़ाई करते हैं तो चीजें गिनती में आती तो हैं पर असल में भारत को जितना ध्यान तकनीकों के विकास के लिए लगाना चाहिए था वह लगाया ही नहीं गया. नई तकनीक विदेशों से हो कर हम तक तक पहुंचती है. घर में मौजूद किसी भी तकनीकी सामान, फ्रिज, टीवी, एसी, लैपटौप, इंटरनैट, मोबाइल किसी को भी उठा कर देखा जा सकता है, क्या ये खोजें भारत में हुईं? क्या फेसबुक या माइक्रोसौफ्ट, गूगल, यूट्यूब हमारे देश की पैदाइश हैं? जवाब है नहीं.

दरअसल हकीकत यह है कि साइंस और टैक्नोलौजी में जितने बजट की जरूरत होती थी, उतना कभी दिया ही नहीं गया. उलटे, जितना दिया जाता रहा उसे भी घटा दिया गया. इसी साल का आंकड़ा है केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय को 2022-2023 के केंद्रीय बजट में 14,217 करोड़ रुपए दिए गए हैं जो पिछले साल की तुलना में

3.9 प्रतिशत कम है, जो कि कुल केंद्रीय बजट 39,44,908 करोड़ रुपए का केवल 0.3 प्रतिशत ही बनता है.

इस से जुड़े वैज्ञानिकों और जानकारों ने सरकार के इस तरह के बजट को ले कर कई सवाल खड़े किए. शिक्षा के क्षेत्र में लगातार बजट कम किया गया, जो कि टोटल बजट का 2.5 फीसदी के आसपास है. जबकि इस से जुड़े जानकार इसे 10 प्रतिशत बढ़ाए जाने की मांग काफी सालों से करते रहे.

आज जब हम देश की आजादी की बात कर रहे हैं तो इस का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना जरूरी है, क्योंकि ऐसा कर के हम अपनी स्थिति का सही आकलन कर सकते हैं. तुलना उन देशों से जिन्होंने तकरीबन हमारे साथ अपनी यात्रा शुरू की, जो आजादी के समय हमारी ही तरह लगभग एक स्टार्टिंग पौइंट से अपना रास्ता तय कर रहे थे पर उस के बावजूद उन से हमारा फासला कोसों दूर का हो चला है.

1950 में साथ चले हौंगकौंग, मंगोलिया, जापान, ताइवान, साउथ कोरिया की जीडीपी पर कैपिटा इनकम के मामले में भारत से कहीं बेहतर हैं. कुछ लोगों का तर्क रहता है कि ये देश भारत के मुकाबले छोटे व कम जनसंख्या घनत्व वाले हैं पर हकीकत यह भी है कि इन देशों में जिस तरह की उठापटक और युद्ध जैसे हालात बने रहते हैं वैसे भारत में लंबे समय से रहे नहीं. साउथ कोरिया का नौर्थ कोरिया से और ताइवान का चीन से युद्ध जैसे टसल चलते रहते हैं और जहां तक जनसंख्या वाली बात है तो चीन हमारे सामने बड़ा उदाहरण बन कर सामने है जिस की जीडीपी पर कैपिटा भारत से काफी बेहतर है.

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत को चीन से व्यापार के कुछ गुर सीखने की जरूरत है, जो 1990 तक प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत से ‘गरीब’ देश था. आज चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत का 4.6 गुना है. हम इन देशों से अपनी तुलना कभी नहीं करते, हमेशा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश जैसे देशों को चुनते हैं, क्योंकि ये देश हमें तुलना के लिए सहज दिखाई देते हैं.

कुछ वर्षों पहले खबर आई कि भारत जापान को पछाड़ कर परचेजिंग पावर पैरिटी में अमेरिका, चीन के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच गया. इस पर होहल्ला हुआ कि देश तीसरे नंबर की इकोनौमी बन गया पर फैक्ट यह कि यह सिर्फ इसलिए हो पाया कि हमारे देश की जनसंख्या इतनी है कि किसी भी समय वह टौप 5 में ही रहेगी.

कोई यह क्यों नहीं कहता कि हम ने तकनीक के मामले में जापान को पछाड़ दिया है, क्योंकि यह बात हास्यास्पद लगेगी, जो कि दुनिया में तकनीक के मामले में पहले नंबर पर है. स्वतंत्रता से देश को वह मुकाम नहीं मिल पाया जो कोरिया, जापान, चीन, ताइवान सिंगापुर ने पा लिया, जो लगभग एक समय हम जैसे फटेहाल व गरीब थे.

आजादी का मतलब

आजादी होती क्या है? आजादी जैसे विषयों पर तार्किक विचार करना शायद कुछ लोगों को देशविरोधी लगे पर इस प्रश्न से बचा तो नहीं जा सकता.

कितना मुश्किल है इसे सम झना कि देश लोगों से बनता है, इसलिए देश की आजादी का मतलब लोगों की आजादी होनी चाहिए पर हकीकत यह है कि आजाद भारत आज गरीब लोगों का अमीर देश है. हमें दुनिया के टौप अमीरों में हमारे अमीर तो दिखाई देते हैं पर असंख्य गरीब दिखाई नहीं देते. जिन उपलब्धियों की बात ऊपर गिनाई गई, वे उपलब्धियां किन के लिए उपयोगी हो पाईं, इस पर सोचविचार किया जाए तो देश की 80 फीसदी आबादी अभी भी दूर दिखाई देगी.

भारत की आजादी से संसाधनों पर भारत के लोगों का हक कायम हुआ पर हम क्या देख रहे हैं कि आज भी उन संसाधनों पर मुठ्टीभर लोगों का ही अधिकार है. ‘भारत माता की जय’ का नारा तो बराबर लगवाया जा रहा है पर उसी मां के सपूतों में भारी आर्थिक विषमताएं दिखाई देती हैं जो बढ़ती ही जा रही हैं.

इस समय भारत के एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 58.4 प्रतिशत है, वहीं देश की 70 प्रतिशत जनता के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का केवल

7 प्रतिशत ही है. वहीं, 85 फीसदी आबादी 2 डौलर यानी 150-160 रुपए से भी कम में अपना गुजारा कर रही है.

एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संकट में 2018 के मुकाबले 2021 में आम आदमी का कर्ज दोगुना हो चुका है. अमीरों और गरीबों की संपत्ति में फैलते फर्क को ले कर सरकारी सर्वे कहता है कि भारत की 10 प्रतिशत सब से अमीर आबादी देश की आधी से भी ज्यादा संपत्ति की मालिक है. वहीं

50 प्रतिशत आबादी के पास देश की 10 प्रतिशत से भी कम संपत्ति है. क्या आर्थिक आजादी के माने में देश बेहतर साबित हो पाया? जवाब इस देश की भुखमरी, कुपोषण और गैरबराबरी के कई आंकड़ों से मिल जाएंगे.

आम इंसान के लिए आजादी का मतलब है कि वह अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सके, अपनी इच्छा के अनुसार अपना भोजन चुन सके, पसंद के अनुसार सिनेमा देख सके तथा अपना पहनावा खुद चुन सके और सब से जरूरी यह कि बिना डरे सवाल कर सके. ये सब अधिकार हमें आजादी के बाद हमारे संविधान ने दिए हैं. लेकिन वर्तमान में ये सब अधिकार कूड़ा पेटी में डाल दिए गए हैं. विभिन्न तरीकों से आम नागरिक को पाबंद किया जा रहा है.

सत्ताधारी जनता के नेता नहीं शासक

75 साल देश में कई सरकारें आईंगईं, अधिकतर राजपाट कांग्रेस-भाजपा के हाथ में रहा. तकरीबन 55 साल कांग्रेस और मोदी के 8 साल के कार्यकाल को मिला कर 14 साल भाजपा सत्ता में रही. देश में 15 प्रधानमंत्री बने. कुछ के कार्यकाल 2 या उस से अधिक बार भी रहे पर इतनी स्थिरता के बावजूद देश की स्थिति सतही बढ़ती रही.

जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुई प्रधानमंत्रियों की गिनती नरेंद्र मोदी तक पहुंच चुकी है. इस बीच गुलजारीलाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, एच डी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे. फिलहाल नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं.

नेहरू के काल में चुनौतियां जरूर थीं पर उन चुनौतियों को पार पाने व जिस तरह का सुनहरा विजन ले कर वे सत्ता में आए, उस से वे भी बहुत बदलाव लाने में असफल रहे. उस के बाद लालबहादुर शास्त्री कम समय के लिए आए. इंदिरा गांधी काल आया तो ‘जनता का नेता’ कम, शासक वाली छवि भारतीय राजनीति में पनपती दिखाई दी. सत्ता की ललक नेताओं पर हावी होने लगी. राजीव गांधी के बाद राजनीति में टूटफूट, जोड़तोड़ खूब हुई.

इस के बाद जोड़तोड़ राजनीति और देश में धार्मिक चैप्टर के शुरू होने से देश इन्हीं मसलों में उल झा रहा. समस्या यह कि इन मसलों को सुल झाने वाले नेता ही इन्हें उल झाते रहे. ध्यान देने वाली बात यह कि यह वही दौर था जिस समय चीन, जो हम से पिछड़ा था, वह प्रगति पथ पर दौड़ लगा रहा था और हम इन  झमेलों में फंसते रहे.

वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, एच डी देवगौड़ा व गुजराल कमकम समय के लिए सरकार में आए. 1996 के बाद तो 2 वर्षों के भीतर

3 प्रधानमंत्री बने. अटल बिहारी वाजपेयी, पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री, 1999 से 2004 तक अपना कार्यकाल पूरा कर पाए पर उन 5 सालों में वे भी देश को दिशा नहीं दे पाए.

10 साल मनमोहन काल से परेशान जनता ने आखिरकार 2014 में प्रधानमंत्री मोदी को चुना पर जनता के विश्वास के बावजूद चीजें बनने की जगह बिगड़ती चली गईं. मोदी काल के पिछले 8 साल देश फिर उन्हीं धार्मिक और जातीय मसलों में फंसा रह गया. ‘फूट डालो राज करो’ की नीति देश में चलाई जा रही है. हालत यह है कि लोगों में पहले के मुकाबले असुरक्षा की भावना ज्यादा बढ़ी. देश इकोनौमी के मामले में पिछड़ता जा रहा है. गृहयुद्ध जैसे हालात बनने लगे हैं.

समस्याएं जो खत्म होनी चाहिए थीं

आजादी के 75 साल बाद भी आज तक हम उन्हीं समस्याओं से लड़ रहे हैं जो कब की खत्म हो जानी चाहिए थीं. सही मानो में हम ने कभी उन समस्याओं को हल करने की दिशा में काम नहीं किया. हमारे नेता जनता के नेता बनने की जगह उन के शासक बनने लगे हैं. हमारे राजनीतिज्ञ वही करते रहे हैं जो 200 वर्ष तक अंगरेज भारत में किया करते थे.

उन्होंने 2 संप्रदायों के बीच फूट डाली, आजकल हमारे राजनीतिज्ञ भी यही कर रहे हैं. जाति भावना की प्रबलता अभी तक गई नहीं. इन सभी के चलते राजनेताओं की नीतियों ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिन का जवाब ढूंढ़ा जाना चाहिए. बदलती सरकारों के साथ बस जवाब बदलते रहे हैं, कोई हल नहीं मिला.

दिक्कत यह कि जिन देशों से तुलना में हम सहूलियत महसूस करते भी हैं उन से भी कुछ मामलों में हमारे आंकड़े चिंताजनक हंगर इंडैक्स रिपोर्ट बताती है कि भारत, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों के मुकाबले खराब हालत में 101वें स्थान पर है. यह तब की हालत है जब सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है.

तमाम कानून होने के बावजूद दलितों को सिर उठाने की सजा तो ऊंची जाति के लोग आज भी दे ही देते हैं. यही कारण भी है कि देश में जाति आधारित अपराधों में हर साल बढ़ोतरी दर्ज हो रही है. अल्पसंख्यक विरोधी घटनाओं में वृद्धि हुई है. बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं. स्वास्थ्य को ले कर तैयारियां किस स्तर पर हैं, यह हम कोरोनाकाल में देख ही चुके हैं. बेरोजगारी के आंकड़े किसी से छिपे नहीं.

डैमोक्रेसी इंडैक्स में भी हम कोई बहुत अच्छे पायदान पर नहीं. प्रैस फ्रीडम में देश रिकौर्ड खराब 150वें पायदान पर पहुंच गया है. जाहिर है जिस देश में आर्थिक, सामाजिक चिंताएं खड़ी होती हैं वहां लोग भी खुश नहीं रहते. यही कारण है कि वर्ल्ड हैप्पीनैस इंडैक्स में भी 136वें पायदान पर गिर चुके हैं, जो पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे देशों से भी खराब है.

कर्तव्य जरूरी

यह अच्छी बात है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दिन को ग्रैंड बनाने के लिए 21 मार्च, 2021

को अहमदाबाद से ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ कैंपेन की शुरुआत कर चुके हैं, वहीं देशवासियों से अपील भी कर चुके हैं कि 13 से ले कर 15 अगस्त तक अपने घरों में तिरंगा फहराएं. आजादी दिवस एक राष्ट्रीय गर्व का दिन है तो इस का सैलिब्रेशन भी बड़ा होना

चाहिए पर सवाल यह कि जिन घरों में तिरंगा फहराने की बात हो रही है उन घरों को नौकरी देने की बात क्यों नहीं हो रही?

यह बिलकुल सही है, इस आजादी दिवस को जज्बे के साथ मनाना हमारी जिम्मेदारी है क्योंकि यह हमारी आजादी है, हमारे पुरखों ने बेहतर कल के लिए इस आजादी को हासिल किया है पर यह ध्यान रखना होगा कि देश की आजादी का मतलब है लोगों की आजादी. सिर्फ 2 प्रतिशत लोगों की नहीं. जब लोग गरीबी, जाति, मनुवाद, पितृसत्ता के गुलाम रहेंगे तो आजादी का जश्न भी फीका पड़ जाता है. ऐसे में जरूरी है कि सब से पहले इस गुलामी से खुद को आजाद किया जाए.

ऑडिट- भाग 2: क्या महिमा ऑफिस में घपलेबाजी करने से रोक पाई

‘‘छोडि़ए न मैडमजी, आप तो यह गरमागरम चाय पी कर तरोताजा हो जाइए. याद रखेंगी शीतल के हाथ की बनी चाय को,’’ औफिस की लेडी प्यून ने एक कप चाय उस की टेबल पर रख दी तो महिमा मुसकरा उठी.

बेचारी शीतल, अभी कोई उम्र है उस की नौकरी करने की. अभी 20 की ही तो हुई है. लेकिन क्या करे. घर की सारी जिम्मेदारी भी तो उसी के कंधों पर आ गई. सच में, सिर पर पिता का हाथ होना बहुत जरूरी है. महिमा की सोच की सूई अब औडिट से हट कर शीतल की तरफ घूम गई. सलवारसूट पहने हुए शीतल को देख उसे तरस आ गया.

शीतल के पिताजी इसी औफिस में बाबू थे. सालभर पहले एक सड़क दुर्घटना में उन की मृत्यु होने के बाद इसे अनुकंपा के आधार पर यहां चपरासी की नौकरी मिल गई. हालांकि शीतल ने आगे की पढ़ाई जारी रखी हुई है ताकि उसे क्लर्क की पोस्ट मिल जाए लेकिन इन सब कामों में वक्त लगता है.

खूबसूरत, चुलबुली शीतल पूरे औफिस की लाड़ली है. सब उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करते हैं. महिमा के भी खूब मुंह लगी है. महिमा चाय पीने लगी. चाय वाकई अच्छी बनी थी. अदरक का अलग स्वाद आ रहा था. उस का दिमाग एक बार फिर से राकेश के हिसाब में उलझ गया.

क्या होगा अगर औडिट में कोई औब्जैक्शन लगा भी तो. जवाब दे दिया जाएगा. यदि वह अपना काम ईमानदारी से कर रही है तो फिर उसे डरने की क्या जरूरत है. आखिर उस ने तय किया कि वह राकेश की इस डील को स्वीकार नहीं करेगी.

उस ने सभी सैक्शन अधिकारियों को निर्देश दिए कि हर एंट्री में पूरी सावधानी बरती जाए. पिछले वर्षों में हुए औडिट के औब्जैक्शन पढ़ कर उन्हें पहले ही दुरुस्त करने की हिदायत भी दी. वह खुद इन सब पर बराबर नजर रखे हुए थी. एक सप्ताह की मेहनत के बाद अब वह पूरी तरह से संतुष्ट थी. कहीं किसी कमी की गुंजाइश उसे नहीं लग रही थी.

‘‘मैडम, मैं औडिट पार्टी से उत्तम बोल रहा हूं. हमारी पार्टी कल सुबह 8 बजे  पहुंच जाएगी. आप स्टेशन पर गाड़ी भिजवा दीजिएगा,’’ महिमा के पास फोन आया.

‘‘आप टैक्सी या औटो ले लीजिए. हमारी गाड़ी तो कल सुबह जल्दी ही साइट पर निकलेगी,’’ महिमा ने दोटूक जवाब दिया. दूसरी तरफ कुछ देर के लिए शांति सी रही.

‘‘चलिए, कोई बात नहीं. आप होटल का ऐड्रेस मेरे नंबर पर व्हाट्सऐप कर दीजिए,’’ उत्तम ने आगे कहा.

‘‘होटल तो नहीं है. आप चाहें तो आप के रुकने की व्यवस्था औफिशियल गैस्टहाउस में करवा सकती हूं. बहुत ही नौर्मल रेट पर अच्छी सुविधा आप को मिल जाएगी,’’ महिमा ने कहा, तो दूसरी तरफ फिर से शांति छा गई.

‘‘धन्यवाद मैडम, आप कष्ट न करें. हम अपनी व्यवस्था देख लेंगे. आप अपनी देख लीजिएगा,’’ उत्तम ने धमकीभरे स्वर में कहा और फोन कट गया. महिमा मानसिक रूप से अपनेआप को औडिट के लिए तैयार करने लगी. उस ने राकेश, विमल सहित सभी कर्मचारियों को समय से औफिस पहुंचने के निर्देश दिए और स्वयं साइट पर जाने की तैयारी करने लगी. शीतल से भी आवश्यक रूप से पूरा समय औफिस में रुकने को कहा गया. उसे हिदायत थी कि वह मेहमानों को 2 समय चायपानी करवा दे.

सुबह ठीक साढ़े 9 बजे उत्तम अपनी टीम के साथ औफिस में मौजूद था. आते ही उस ने कर्मचारियों का हाजिरी रजिस्टर मांगा. महिमा को टूर पर देख कर उस का पारा चढ़ गया. शेष सभी कर्मचारी औफिस में उपस्थित थे. राकेश विनम्रता से झुका हुआ उस के सामने खड़ा था.

‘‘क्या बात है राकेशजी, मैडम नई हैं या उन के लिए यह काम नया है? बहुत अकड़ में रहती हैं,’’ उत्तम ने अपनी कड़वाहट राकेश पर उतारी.

‘‘यह सब नई फसल है साहब, धीरेधीरे सीख जाएंगी. आप तो अपना काम शुरू कीजिए. हम हैं न आप की सेवा में. आप मुझे आदेश कीजिए,’’ राकेश ने उत्तम को खुश करने की कोशिश की. फिर उस ने शीतल को आवाज लगाई, ‘‘अरे शीतल, चायपानी का इंतजाम करो, भई.’’ थोड़ी ही देर में शीतल मुसकराती हुई चाय के साथ समोसे भी ले आई. समोसे देख कर उत्तम का मूड कुछ ठीक हुआ.

‘‘हूं, मैडम को साइट पर जाने का बहुत शौक है न, चलो, औडिट की शुरुआत मैडम की गाड़ी की लौगबुक से ही करते हैं. राकेशजी, पिछले 2 वर्षों की लौगबुक मंगवा दीजिए,’’ उत्तम ने समोसे खा कर एक लंबी सी डकार मारी. शीतल लौगबुक ले आई. उत्तम उस की एकएक एंट्री को बड़े गौर के साथ चैक करने लगा. वह साथसाथ एक सादे कागज पर नोट्स भी बनाता जा रहा था.

लौगबुक के बाद उस ने स्टौक रजिस्टर, बजट का इस्तेमाल, हाजिरी रजिस्टर, फर्नीचर आदि का हिसाब, टैलीफोन का बिल रजिस्टर आदि की जांच की. 2 दिन लगातार इस काम में जूझते उत्तम की मुलाकात महिमा से नहीं हुई. जानबूझ कर या काम की अधिकता, इन 2 दिनों में महिमा लगातार टूर पर ही बनी हुई थी. आज औफिस में औडिट का आखिरी दिन था. राकेश ने महिमा से औफिस में रह कर उत्तम से डिस्कस करने का अनुरोध किया.

ठीक साढ़े 9 बजे महिमा अपनी सीट पर थी. कुछ ही देर में राकेश उत्तम के साथ आता हुआ दिखाई दिया. महिमा ने देखा कि उत्तम नाटे कद का सांवला सा व्यक्ति है जिस की तोंद कुछ बाहर को निकली हुई है. पेट बड़ा होने के कारण पैंट बारबार कमर से लुढ़क कर नीचे आ रही थी जिसे वह बैल्ट से पकड़ कर ऊपर खींच रहा था. उस की यह हरकत देख कर महिमा के होंठों पर बरबस मुसकान आ गई. उसी समय शीतल कुछ फाइलें ले कर वहां आई. उसे उत्तम की हरकत पर मुसकराता देख कर शीतल भी खिलखिला दी.

‘‘नमस्कार मैडमजी, आज आखिर आप के दर्शन हो ही गए. मुझे तो लगा था आप से बिना मिले ही जाना होगा,’’ उत्तम के शब्दों में छिपे व्यंग्य को महिमा आसानी से समझ रही थी. उस ने उस को कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ बैठने का इशारा किया.

‘‘आप के औफिस में तो घपला ही घपला है, मैडमजी. जहां हाथ रखिए, वहीं दर्द है,’’ उत्तम ने एक पुरानी फिल्म के गाने की पंक्ति के साथ बत्तीसी खोल कर अपने पान से रंगे दांत दिखा दिए. उस के साथ ही उस के मुंह से आती गुटखे की गंध पूरे चैंबर में फैल गई. महिमा ने कुछ पल को अपनी सांस रोक कर उस गंध को हवा में लुप्त होने दिया, फिर हाथ को नाक के सामने लहराते हुए सांस ली. उत्तम उस की नाखुशी को समझ गया था. वह बाहर जा कर पीक थूक आया.

‘‘जी, दिखाइए, क्या घपला है,’’ महिमा ने उस से कागज मांगे.

मेरी पत्नी सारे पैसे मायकेवालों पर खर्च करती है, क्या करूं?

सवाल

मैं 39 साल का एक शादीशुदा मर्द हूं. मेरी शादी को 12 साल हो गए हैं. आज भी मेरी पत्नी अपने मायके वालों के कहे मुताबिक चलती है और घर में झगड़े का माहौल बना कर रखती है. वह चोरीछिपे अपने छोटे भाइयों को पैसे देती हैजो उस पैसे को बरबाद कर देते हैं.

मैं इस बात से बहुत ज्यादा परेशान रहता हूंक्योंकि मैं अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता हूं. मैं उसे कैसे अपनी ससुराल वालों के चंगुल से निकालूं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?

जवाब

पत्नियों का मायके से ज्यादा लगाव होना आम बात है. कई बार इस चक्कर में वे अपनी घरगृहस्थी पर भी ध्यान नहीं देती हैं. पत्नी से प्यार करना अच्छी बात हैलेकिन उस की गलतियों को नजरअंदाज करना यह बताता है कि आप उस के सामने कमजोर पड़ जाते हैं.

अगर वाकई जरूरत हैतो मायके वालों की मदद करना हर्ज की बात नहीं हैलेकिन आप की मेहनत की कमाई को साले ऐयाशी में उड़ाएंतो यह तकलीफदेह बात है.

आप अब पत्नी के सामने पैसों की कमी का रोना शुरू कर दें. ससुराल वालों से दूरी बना कर रखना भी बेहतर होगा. आप थोड़ी सख्ती दिखाएं. इस से समस्या पूरी तरह हल तो नहीं होगीलेकिन कुछ कम जरूर होगी. 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

पंजाबी डिश: डिनर में बनाएं एग मसाला रेसिपी

सामग्री

– अंडे (3)

– नमक (स्वादानुसार)

– हरा धनिया (½ कप)

– गार्निशिंग के लिए पुदिने की पत्तियां

– प्याज (1)

– टमाटर (2)

– हरी मिर्च (मध्यम आकार के)

– ½ कप तेल

– 6 टे​बल स्पून अदरक

– लहसुन का पेस्ट

– 1 टी स्पून हल्दी पाउडर

– ½ टी स्पून जीरा पाउडर

– 1 टी स्पून नमक

– 2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर

– 1 टी स्पून चिकन मसाला पाउडर

– 2 टी स्पून पानी

बनाने की विधि

– एक पैन में अंडे डालें.

– अब इसी पैन में इतना पानी डालें कि अंडे डूब जाए.

– फिर एक टी स्पून नमक डालकर, इसे 15 मिनिट तक अंडों के सख्त होने तक उबाले.

– इसी बीच एक प्याज लेकर उसका ऊपरी और निचला हिस्सा काट लें.

– अब इसे आधे-आधे हिस्से में काट कर मध्यम आकार के टूकड़ों में काट लें.

-एक टमाटर लें और ऊपर का सख्त हिस्सा हटा दें.

– अब आधे हिस्से में कटते हुए मध्यम आकार के टूकड़ें कर लें.

– फिर हरी मिर्च ले और इसे छोटे-छोटे टूकड़ों में काटें.

– अब आधा कप हरा धनिया लेकर, उसे बारिक काटें.

– इसी तरह पुदिने की पत्तियां लेकर उन्हें महिन- महिन काट कर साइड में रख दें.

– अब एक गर्म पैन में तेल डालें.

– फिर कटे हुए प्याज डालकर एक मिनिट के लिए अच्छे से भूनें.

– अब कटी हुई हरी मिर्चों को अदरक और लहसुन के पेस्ट के साथ डालकर बढ़िया से मिक्स कर लें.

– इसके बाद इसमें कटा हुआ पुदिना डालकर हल्का सा भून ताकि पुदिने के कच्चेपन की महक चली जाएं.

– फिर हल्दी और जीरा पाउडर मिक्स करें.

– अब नमक और लाल मिर्च पाडर डालें.

– मसाले को ढंग से फ्राई करें.

– अब कटे हुए टमाटर डालकर, उनके मुलायम होने तक उन्हें पकाएं.

– फिर आधे कप पानी के साथ चिकन मसाला पाउडर डालें.

– मसाले के ग्रेवी बनने तक इसे पकाते रहें

– अब उबले हुए अंडों को छील कर बाउल में निकाल लें.

– फिर अंडों को आधे-आधे हिस्से में काट लें.

– और अब इन अंडों को ग्रेवी में रख दें.

– अब ग्रेवी को हर अंडे के उपर रखते जाए.

– अब एक प्लेट में निकाल लें और हरे धनिए से गार्निंश कर गर्मा-गर्म परोसें.

Anupamaa को कपाड़िया हाउस से बाहर करेगी बरखा, आएगा बड़ा ट्विस्ट

टीवी सीरियल अनुपमा में इन दिनों लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो का ट्रैक काफी दिलचस्प है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुपमा अनुज को कपाड़िया हाउस लाई है और घर पर ही उसकी देखभाल कर रही है. तो दूसरी तरफ बरखा और अंकुश नयी चाल चल रहे हैं. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते है, शो के नए एपिसोड के बारे में…

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि अंकुश-बरखा ने अनुज और अनुपमा के बेडरूम में एक सीसीटीवी कैमरा लगवाया. ऐसे में अनुपमा ने खुशी-खुशी उन दोनों को ये काम करने दिया. तो दूसरी ओर अंकुश और बरखा एक वकील से बात कर रहे होंगे ताकि वे अनुपमा को सबक सिखा सके.

 

शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि, शाह परिवार और कपाड़िया परिवार जन्माष्टमी मनाएगा और बरखा और अंकुश इस दौरान अनुपमा के जीवन में तूफान लाएंगे.

 

शो में आप देखेंगे कि अनुज के तबीयत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. अनुपमा, अनुज की ठीक होती तबीयत को देखकर खुश हो रही हैं. शो में दिखाया जाएगा कि बरखा, अनुपमा को बुरी तरह से बेइज्जती करेगी और उसे बतायेगी कि वो अनुज और कपाड़िया मेंशन को संभालने के काबिल नहीं हैं. वह अनुपमा को कपाडिया मेंशन से बाहर निकाल देगी.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by @love.u.anupamaa_

 

शो में आप देखेंगे कि  अनुपमा खुद को सही साबित नहीं कर पायेगी और वो कपाड़िया हाउस छोड़ देगी. तो दूसरी तरफ वनराज खुद को अनुज का गुनाहगार मान रहा है. वनराज अनुपमा से कहेगा कि वह शाह हाउस में वापस आ जाये. शो में अब देखना ये होगा कि अनुपमा शाह हाउस वापस लौटेती है या नहीं?

 

View this post on Instagram

 

A post shared by anupamaa (@anupamaa_love_you)

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें