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तीज 2022: मुझे माफ करोगी सुधा- क्या गौरव को पता चला पत्नी और प्रेमिका में फर्क

शादी की धूमधाम में शहनाई के मधुर स्वर हवा में तैर रहे थे. रंग, फूल, सुगंध, कहकहे, रंगबिरंगी रोशनी सब मिला कर एक स्वप्निल वातावरण बना हुआ था. इतने में शोर उठा, ‘बरात आ गई, बरात आ गई.’

सब एकसाथ स्वागत द्वार की ओर दौड़ पड़े. सजीसंवरी दुलहन को उस की कुछ सहेलियां द्वार की ओर ला रही थीं. वरमाला की रस्म अदा हुई, पहली बार वर ने वधू की ओर देखा और जैसे कोई उस के कलेजे पर वार कर गया. सारे रंगीन ख्वाब टूट कर बिखर गए.

दूल्हा सोचने लगा, जिंदगी ने यह कैसा मजाक उस के साथ किया है. सांवला, दुबलापतला शरीर, गड्ढे में धंसी आंखें, रूखे मोटे होंठ, दुलहन का शृंगार भी क्या उस की कुरूपता को ढक पाया था लेकिन अब क्या हो सकता था. यह गले पड़ा ढोल तो उसे बजाना ही था. इस से अब वह बच नहीं सकता था.

पिता के कठोर अनुशासन ने गौरव को अत्यंत लजीला और भीरु बना दिया था. उन के सामने वह मुंह तक नहीं खोल सकता था. जो कुछ वे कहते, वह सिर झुका कर मान लेता.

यह रिश्ता गौरव के लालची पिता ने लड़की वालों की अमीरी देख कर तय किया था. लड़की के पिता की लाखों की संपत्ति, उस पर इकलौती संतान, वे फौरन ही इस रिश्ते के लिए मान गए थे. पैसे से उन का मोह जगत प्रसिद्ध था.

गौरव ने सुधा के स्वभाव के बारे में तो पहले ही धारणा बना ली थी, बड़े बाप की इकलौती, पढ़ीलिखी लड़की घमंडी और बदमिजाज तो होगी ही. उस के पिता को ऐसी बहू मिलेगी जो उस की तरह उन से नहीं दबेगी, उलटा वे ही कुछ न कह सकेंगे, यह सोच कर उस की पिता से बदला लेने की भावना को कहीं संतुष्टि मिली.

लेकिन आशा के विपरीत सुधा बहुत ही मधुरभाषिणी, कम बोलने वाली और संकोची प्रवृत्ति की निकली. बड़ों का आदरसम्मान, बच्चों में प्यार से घुलमिल जाना, हर समय हर किसी को खुश करने के लिए काम में जुटे रहना, अपने इन्हीं गुणों से उस ने धीरेधीरे घर भर का मन मोह लिया था.

गौरव की बहन अरुणा दीदी, जो उम्र में उस से काफी बड़ी थीं, सुधा की तारीफ करते न थकतीं. दीदी, जीजाजी और उन के बच्चे शादी के बाद कुछ दिन उन के पास रुक गए थे. इसी दौरान सुधा उन से यों घुलमिल गई थी मानो बरसों से उन्हें पहचानती हो.

आश्चर्य की बात यह थी कि सिवा गौरव के घर भर में कोई भी सुधा के रूपरंग का जिक्र न करता, सब उस के स्वभाव का ही बखान करते. गौरव पत्नी की तारीफ सुन कर खीज उठता. वह अपने दोस्तों में हमेशा सुधा की कुरूपता की चर्चा करता और अपने से उस की तुलना कर अपने खूबसूरत होने पर गर्व महसूस करता.

सुधा पति को प्रसन्न करने का हर तरह से प्रयत्न करती, उस की छोटीछोटी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखती लेकिन गौरव उस से बात तक न करता. जो कहना होता, मां से या नौकरों से कहता. सुधा धैर्यपूर्वक पलपल उस की बर्फीली बेरुखी सहती. उसे उम्मीद थी कि शायद कभी उस की जिंदगी का सूरज उदय होगा, जिस की आंच में यह बर्फ पिघल जाएगी और उस की कंपकंपाती जिंदगी को प्यार की नरम धूप का सेंक मिलेगा.

इस बीच गौरव का अपने दफ्तर की स्टेनो नंदिनी से मेलजोल बढ़ने लगा. नंदिनी उस पर काफी पहले से ही डोरे डाल रही थी. वह गौरव को फांस कर उस से शादी के सपने देखा करती. सुंदरसजीले गौरव पर बहुत सी लड़कियां मरती थीं, उस से दोस्ती करना चाहती थीं मगर गौरव शरमीले स्वभाव का होने के कारण लड़कियों से बहुत झेंपता, उन से बात करने में भी झिझकता और नजरें बचा कर निकल जाता.

शादी के बाद वही गौरव नारी के मांसल आकर्षण में अजीब खिंचाव और आनंद लेने लगा था. अब वह पहले सा लजीला, रूखा और नीरस युवक नहीं रह गया था. औरत के दैहिक सम्मोहन में आकंठ डूब चला था. सुधा की सूखी देह जब उस की बांहों में होती तो गौरव की कल्पना उसे नंदिनी की मांसल, आकर्षक देह बना देती. मगर वह क्षणिक दैहिक सुख गौरव को तृप्ति न दे पाता और वह प्यासा रह जाता, उस मिलन में उसे एक अधूरापन लगता.

नंदिनी गौरव के दिल की हालत समझ रही थी. उस ने सुन रखा था कि गौरव की पत्नी एक कुरूप नारी है. नंदिनी को अपनी सुंदरता और सुडौल शरीर पर बड़ा अभिमान था. वह रोज तरहतरह से अपने को सजासंवार कर दफ्तर आती और गौरव को रिझाने का प्रयास करती. आखिर गौरव भी कब तक धैर्य रखता. वह दिनोदिन उस की सुंदरता में डूबता जा रहा था.

आर्थिक रूप से गौरव सक्षम हो चुका था. दहेज में मिली लाखों की संपत्ति उस की थी. पिता बूढ़े हो रहे थे. गठिया के रोग से पीडि़त थे, चलफिर नहीं सकते थे, स्वत: ही उन का रोबदाब कम हो चला था. गौरव धीरेधीरे मनमानी पर उतर आया था.

सुधा को गौरव ने पत्नी का दर्जा कभी नहीं दिया था. बस, उस की झोली में एक प्यारा सा बेटा डाल कर उस के प्रति अपने कर्तव्य की इति समझ बैठा था. वह सारा दिन घर के कामकाज एवं सासससुर और बच्चे की देखभाल में जुटी रहती, इधर गौरव रातरात भर गायब रहता. उस के और नंदिनी के संबंध किसी से छिपे न रहे, लेकिन किसी की हिम्मत न थी जो उसे कुछ कह सके, पूरा घर उस से भयभीत रहने लगा था.

भीतर ही भीतर सुधा घुटती रहती मगर ऊपर से खामोश रहती. वह घर में किसी प्रकार की कलह नहीं करना चाहती थी. हीनभावना की गहराई में उस की अपनी अस्मिता कहीं डूब गई थी.

गौरव की ऐयाशी के किस्से जब एक दिन सुधा के मातापिता तक पहुंचे तो वे चुप न रहे. एक दिन जब गौरव नंदिनी के साथ कोई फिल्म देख कर लौटा तो अचानक अपने ससुर को वहां देख चौंक पड़ा.

‘‘कहां से आ रहे हो, गौरव?’’ ससुर कृष्णलाल ने व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा.

एकाएक गौरव से कोई उत्तर न बन पड़ा. धीरे से बोला, ‘‘दोस्तों के साथ फिल्म देखने गया था.’’

सुनते ही उस के ससुर कठोर स्वर में बोले, ‘‘यह मत समझो कि हमें तुम्हारी कारगुजारियों का पता नहीं. सोच रहे थे कि शायद तुम अपनेआप संभल जाओ. सुधा बेचारी ने तो आज तक तुम्हारे खिलाफ एक शब्द नहीं लिखा. हर पत्र में तुम्हारी तारीफ ही लिखती रहती थी. वह तो भला हो तुम्हारे पिताजी का जिन्होंने तार दे कर मुझे बुलवा लिया, अपने बेटे की चरित्रहीनता दिखलाने, उस की ‘कीर्ति’ सुनवाने.’’

फिर कुछ रुक कर वे बोले, ‘‘लेकिन सुधा को मैं अब और अपमानित होने के लिए यहां नहीं रहने दूंगा. मैं उसे ले जा रहा हूं. हम सुबह की गाड़ी से ही आगरा चले जाएंगे. तुम ने अगर अपने रंगढंग नहीं बदले तो मजबूरन हमें सुधा को तुम से तलाक दिलवाना पड़ेगा,’’ इतना कह कर बिना एक पल रुके कृष्णकांत उठ खड़े हुए.

सुधा की बातों और धमकी से गौरव काफी परेशान हो गया. मन ही मन सोचने लगा कि इस समस्या का हल कैसे निकाला जाए. सुधा के जाने से तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाएगा. बेटे चंदन की देखभाल कौन करेगा? उस की पढ़ाई का क्या होगा?

नंदिनी गौरव के लिए सिर्फ दिल बहलाव का जरिया थी वरना उस के छिछले स्वभाव को गौरव समझता था. वह इतना नासमझ नहीं था जो जानता न हो कि इस तरह की लड़कियां दुख की साथी नहीं होतीं, उन्हें तो अपनी मौजमस्ती चाहिए.

दूसरे दिन लाख मिन्नतें करने के बावजूद गौरव के ससुर बेटी को अपने साथ ले गए. चंदन को उस के दादाजी के कहने पर मजबूरन उन्हें वहीं छोड़ना पड़ा वरना गौरव के कहने से तो वे कदाचित न मानते.

सुधा के जाते ही घर का पूरा नक्शा ही बिगड़ गया. गौरव को दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ी. उस ने नंदिनी से सहायता मांगी तो उस ने साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘गौरव, और कुछ करने को कहो लेकिन घर की देखभाल, न बाबा न, वो मेरा विभाग नहीं.’’

2-3 दिन की लगातार भागदौड़ के बाद उसे अपने एक दोस्त के जरिए एक नौकरानी मिल गई. करीब एक हफ्ते तो उस ने ठीक तरह से काम किया. 8वें दिन पता चला कि सुधा की अलमारी से सब साडि़यां और कुछ गहने ले कर वह चंपत हो गई है. बहुत कोशिश की, लेकिन उस का कुछ पता न चल सका.

चंदन हर वक्त मां को याद करता रहता, ‘‘पिताजी, मां कब आएंगी…कहां गई हैं? मुझे साथ क्यों नहीं ले गईं,’’ वह बारबार पूछता. मां के बगैर उसे खानापीना भी अच्छा न लगता. वह बहुत उदास और गुमसुम रहने लगा था. गौरव से अपने बेटे की यह हालत देखी न जाती. गौरव चाहता था कि सुधा लौट आए. उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था.

ऐसे में ही एक दिन गौरव को अरुणा दीदी की याद आई. ‘हां, दीदी ही सुधा को वापस ला सकती हैं.’ यह विचार मन में आते ही तुरंत ही वह बेटे चंदन को ले कर मेरठ चल दिया.

दीदी उसे अचानक आया देख हैरान रह गईं. आश्चर्यचकित हर्ष से पूछने लगीं, ‘‘अरे, गौरव, अचानक कैसे आना हुआ. सुधा कहां है?’’ भाई को देख कर उन का चेहरा स्नेह से भीग उठा था. अभी तक उन्हें गौरव की हरकतों का पता न लग पाया था.

गौरव फीकी हंसी से सुधा के न आने की बात टाल गया. दीदी समझ गई थीं कि जरूर कुछ गड़बड़ है वरना गौरव यों चंदन को ले कर अकेला क्यों आता. दीदी ने उस समय ज्यादा कुछ न पूछा.

रात को खाने पर जीजाजी के बारबार पूछने पर आखिर गौरव फूट पड़ा, ‘‘जीजाजी, सुधा अब कभी नहीं आएगी. अपनी ही गलती से मैं ने उसे खो दिया है. मैं ने उस की कद्र नहीं की…क्या मुंह ले कर अब मैं उस के पास जाऊं,’’ गौरव ने उन से कुछ न छिपाया, सारी बातें सचसच कह दीं.

गौरव पश्चात्ताप की आग में जल रहा है, यह देख कर दीदी ने उसे समझाया, ‘‘गौरव, यह तुम तीनों की जिंदगी का सवाल है. जाने को तो मैं जा कर सुधा को ला सकती हूं लेकिन इस तरह तुम्हारा प्रायश्चित्त अधूरा रह जाएगा. सोच लो, सुधा को जो खुशी तुम्हारे जाने से होगी वह मेरे जाने से नहीं, फिर इस बात का क्या भरोसा कि उस के मातापिता सुधा को मेरे साथ भेज ही देंगे.’’

गौरव के ससुराल आने पर सुधा के मातापिता को जरा भी हैरानी न हुई, उन्हें अपनी संकोची स्वभाव की गुणवान बेटी पर बहुत मान था. उन्हें पूरा यकीन था कि उस जैसी आदर्श पत्नी की कद्र गौरव एक दिन जरूर करेगा. इसी भरोसे पर तो वे अपनी बेटी को लिवा लाए थे कि दूर रह कर ही गौरव उस के गुणों को आंक पाएगा और हुआ भी वही.

अपने कमरे में सुधा उत्सुकता से गौरव के आने का इंतजार कर रही थी. गौरव एक क्षण दरवाजे पर ठिठका. फिर उस ने आगे बढ़ कर सुधा को बांहों में भर कर उदास स्वर में पूछा, ‘‘मुझे माफ करोगी, सुधा?’’

सुधा खामोश थी लेकिन उस की आंखों से बहते आंसुओं ने गौरव के सारे अपराध क्षमा कर दिए थे.

तीज 2022: पतिपत्नी के बीच रिश्ते का बदलता समीकरण

पतिपत्नी के रिश्ते का समीकरण काफी जटिल होता है. जब भी सत्ते का पलड़ा एक ओर झुक जाता है तो रिश्ते के बीच का संतुलन डगमगाने लगता है. प्रयास न किया जाए तो वह बिखर भी सकता है यानी बात तलाक तक जा पहुंचती है. तलाक से फायदा किसी को नहीं होता. दोनों के जीवन में  एक ब्रेक लग जाता है.

पीढ़ियों तक महिलाओं ने दबीकुचली जिंदगी जी. वे पढ़ीलिखी नहीं होती थी. आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह पति पर निर्भर होती थी इसलिए रिश्ते का पलड़ा कितना भी झुका होता है वे सब सह जाती थी. पर आधुनिक युग की महिलाओं ने अपने बल पर जीना सीख लिया है. थोड़ी सी बात बिगड़ी नहीं कि वे तलाक की पेशकश कर अपनी ताकत दिखाने का तरीका आजमाती है. भले ही इस ताकत की लड़ाई और अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने की चाह में महिलाएं भावनात्मक रूप से बुरी तरह टूट जाती है. मगर एक बार कदम बढ़ा लेने के बाद पीछे जाना स्वीकार नहीं करती. यही वजह है कि आजकल तलाक के मामले बढ़ रहे हैं.

एक समय था जब पुरुष विवाहेतर संबंधों में लिप्त रहते थे. वे बड़ी सहजता से पत्नी को धोखा देते रहते थे और पत्नी बेचारी घर के कामकाज में व्यस्त रहती थी. पर आज जब महिलाएं बाहर जाने लगी हैं तो उन के पास भी ऑप्शंस की कोई कमी नहीं है. एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स हमेशा से शादी टूटने की एक प्रमुख वजह रहा है. सामान्यतः पुरुष ऐसे में भी रिश्ते को कायम रखना चाहते हैं. लेकिन इस से दोनों की स्थिति दयनीय बन जाती है. किसी भी रिश्ते में विश्वास खो देना जिंदगी को बहुत कठिन बना देता है. परिवार की खुशियों के साथसाथ सदस्यों की मानसिक सेहत पर भी इस का असर बुरा पड़ता है.

कई दफा महिलाएं पुरुषों से जरुरत से ज्यादा अपेक्षा रखने लगती है और नतीजा यह होता है कि उन अपेक्षाओं को पूरा करने की जद्दोजहद में पुरुष नॉर्मल लाइफ नहीं जी पाते. उन के अंदर भय रहने लगता है कि कहीं वे पत्नी के अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे तो पत्नी उन की इज्जत नहीं करेगी. इस तरह मानसिक रूप से परेशान रहने के कारण वे चिडचिड़े हो जाते हैं और रिश्ते में दरार बढ़ने लगती है. वैसे तो पुरुष जरूरी कदम उठा कर जितना संभव हो समस्याओं को सुलझाने में भरोसा रखते हैं. लेकिन ऐसे रिश्तों में डर और अनिश्चितता दोनों ही रहती है.

आज की जीवनशैली ही ऐसी है कि छोटीमोटी लड़ाईयां भी धीरेधीरे रिश्ता टूटने का कारण बन जाती है. पतिपत्नी खुल कर बात करने के बजाय अपनेअपने दायरे में सीमित रहते हैं. बड़ेबुजुर्ग या बड़े परिवार का साथ भी नहीं कि घरवाले उन दोनों के बीच पैचअप कराएं . वैसे भी लोग आजकल सोशल मीडिया के चक्कर में एकदूसरे को समझने के बजाय दूसरों को समझने में ज्यादा समय लगाते हैं. इस वजह से वे एकदूसरे को कहीं न कहीं इग्नोर करने लगते हैं.

एक स्वस्थ रिश्ता समानता, विश्वास और एकदूसरे के सम्मान पर टिका होता है. जब चीजें बिगड़ती है तो सवाल यह यह नहीं होता कि कौन अपनी भूमिका पर लंबे समय तक खड़ा रहता है बल्कि सवाल यह है कि कौन शांत होगा और तर्कपूर्ण ढंग से समाधान ढूंढने की कोशिश करेगा.

पत्नी का डर

साधारण रूप से आज के समय में किसी भी परिवार का रिमोट कंट्रोल पत्नी के हाथ में होता है. वह घर का करताधरता होती है सो उस से पंगा लेने का मतलब है खुद के लिए परेशानियां मोल लेना. वैसे जिंदगी में इंसान को किसी न किसी का डर रहना जरूरी है तभी वह कंट्रोल में रह कर सही दिशा में आगे बढ़ पाता है. बचपन में मांबाप का डर, कॉलेज में टीचर का डर और जॉब में बॉस का डर. शादी के बाद यह डर ट्रांसफर हो कर घरवाली के नाम हो जाता है.

पत्नी का डर भी कई तरह के होते हैं. अधिकांश पतियों को यह डर लगा रहता है कि कहीं बीवी रूठ कर मायके न चली जाए, खाना बना कर न खिलाए या फिर लड़झगड़ कर घर सर पर न उठा ले. इन सब से बढ़ कर पतियों को यह भी डर रहता है कि बात कहीं तलाक तक न पहुंच जाए क्यों कि टूटे हुए परिवार की हालत बहुत दयनीय हो जाती है. रातदिन का क्लेश बच्चों का भविष्य भी बर्बाद कर देता है. पतियों को डर रहता है कि क्या पता कहाँ छुप कर पत्नी उस की जासूसी कर रही हो या फिर उस पर नजर रखवा रही हो.

अच्छा है यह डर

पत्नी से डरना अच्छा है. इस से पति दुर्व्यसनों से बचे रहते हैं, गलत संगत में नहीं पड़ते, धोखेबाज लड़कियों के चंगुल में नहीं फंसते और सब से बढ़ कर यह कि पैसे इधरउधर बर्बाद नहीं करते. पत्नी पैसों का हिसाब रखती है. आनेजाने का हिसाब भी रखती है. पति कंट्रोल में रहे तो घर में सुखशांति कायम रहती है. पत्नी का डर कितना सार्वभौमिक है इस का उदाहरण पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा है. उन्होंने स्वीकार किया था कि पत्नी के डर से उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया.

पत्नी बिना सब सूना

देखा जाए तो रोजमर्रा की जिंदगी में सहजता बरकरार रखने और भावनात्मक जरूरतों की पूर्ति के लिए आज भी पुरुष महिलाओं पर निर्भर रहते हैं. पुरुष अपने मन की बात जाहिर करने से बचते हैं और वे स्त्रियां ही होती है जो पति के मन की हर बात बिना कहे भी समझ लेती है. यही नहीं पुरुषों के लिए बिना बीवी घर संभालना भी किसी सजा से काम नहीं होता.

पुरुष कई काम एक साथ नहीं कर सकते. बच्चों को संभालती हुए ऑफिस और घर के काम निपटाना उन के बस की बात नहीं. जब कि स्त्रियां सब काम एक साथ पूरी कुशलता से करने में माहिर होती हैं. ऐसे में आज के दौर में पतियों के समुदाय में पत्नी का डर बढ़ रहा है. कई मामलों में पत्नी पर निर्भरता की वजह से वे सुलह कर लेने में अपनी भलाई समझते हैं.

पहले के देखे आज के पुरुष ज्यादा सहनशील हो गए हैं. वे रिश्ते में आई समस्याओं को सुलझाने के लिए कदम उठाना चाहते हैं. लेकिन एक सच यह भी है कि ऐसा वे काफी समय बाद करते हैं. यदि शुरुआत में ही आवश्यक कदम उठा लिए जाए तो बात बिगड़ेगी ही नहीं.

सीबीआई और मनीष सिसोदिया के बहाने “भाजपा का सच”

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जिनके पास शिक्षा  और आबकारी विभाग हैं आजकल भारतीय जनता पार्टी के निशाने पर है. यह बात उतनी सच है जितना सूरज और तारे.

जी हां! सीबीआई जांच के साथ ही जिस तरह उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भारतीय जनता पार्टी के विभिन्न बड़े नेताओं द्वारा निरंतर निशाना बनाया जा रहा है उससे सिद्ध हो जाता है कि भाजपा की मंशा क्या है अगर भाजपा निष्पक्ष है और सीबीआई की कार्रवाई नहीं करवा रही है तो उसे मौन रहना चाहिए था. मगर कहते हैं ना “चोर की दाढ़ी में तिनका”. सीबीआई जांच कर रही है और भाजपा के सारे नेता आक्रमक हो गए है इसका सीधा सा संदेश देश की जनता में यही जा रहा है कि जिस तरह कौरवों ने चक्रव्यूह बना करके अभिमन्यु को मार डाला था आज की भाजपा भी “आप पार्टी” के खिलाफ एक चक्रव्यूह बुन रही है. भाजपा चाहती है कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी आप हाशिए पर चले जाए उसकी छवि देशभर में खराब हो जाए.

देश और दुनिया का एक सबसे निष्पक्ष कहे जाने वाला मीडिया संस्थान बीबीसी है. इसमें जब मनीष सिसोदिया के सीबीआई जांच का रिपोर्टिंग प्रसारित की गई तो आश्चर्यजनक तरीके से मनीष सिसोदिया के पक्ष में कमैंट्स देखे जा सकते हैं जिसमें लोगों ने उनका साथ दिया है और भाजपा को लताड़ा है इस समाचार बुलिटिन में कमेंट के रूप में बहुत सारे लोगों ने मनीष सिसोदिया को इमानदार और एक काम करने वाला राजनेता माना है और भाजपा की कटु निंदा की गई है. यह एक उदाहरण है जिसके माध्यम से आप पार्टी पर कसा जाने वाला सीबीआई का शिकंजा उसकी तथा कथा उजागर हो गई है.

न्यूयॉर्क टाइम्स में हो गई प्रशंसा

एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई. दुनिया के नामचीन मीडिया संस्थानों में एक न्युयॉर्क टाइम्स में दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की भूरी भूरी प्रशंसा की गई है यही नहीं यह भी सच है कि देश भर में आज दिल्ली की स्कूलों शिक्षा व्यवस्था और चिकित्सा व्यवस्था पर जोरदार चर्चा चल रही है. जिससे भारतीय जनता पार्टी चिंतित दिखाई देती है यही कारण है कि सीबीआई जांच और प्रवर्तन निदेशालय की जांच संभवत शुरू हो गई है. मगर यह सब “सांच को आंच क्या” कहावत को बदल नहीं सकते.

इधर,अमेरिकी अखबार ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था पर अपनी स्टोरी को ‘निष्पक्ष और जमीनी रिपोर्टिंग’ पर आधारित बताते हुए ‘पेड न्यूज’ के आरोपों को  को खारिज कर दिया है. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो  द्वारा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के आवास पर छापेमारी के बाद अखबार के आलेख को लेकर “भाजपा और आप” के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया था. आप नीत सरकार की आबकारी नीति को तैयार करने और  कथित अनियमितताओं को लेकर सीबीआइ ने यह कार्रवाई की. मनीषसिसोदिया के पास शिक्षा और आबकारी विभाग की भी जिम्मेदारी है आप ने कहा कि जब ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने शिक्षा के दिल्ली माडल पर सकारात्मक खबर छापी तो नरेंद्र मोदी नीत केंद्र सरकार ने सीबीआइ को सिसोदिया के घर भेज दिया, वहीं भाजपा ने खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर कहा – यह एक ‘पेड’ आलेख है. बिना सबूतों और जांच के आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह पेड न्यूज़ है?

‘न्यूयार्क टाइम्स’ की बाह्य संचार निदेशक निकोल टायलर ने एक ई मेल में लिखा- ‘दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयासों के बारे में हमारी रिपोर्ट निष्पक्ष, जमीनी रिपोर्टिंग पर आधारित है.’

इसके साथ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की चर्चा देशभर के गली कूचे में हो रही है और जैसा कि हम जानते हैं सच को छुपाया नहीं जा सकता वह धीरे-धीरे लोगों तक पहुंच ही जाता है ऐसा ही कुछ दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था के साथ भी हो रहा है, और केंद्र में बैठी भाजपा सरकार जिस तरह आप पार्टी के नेताओं को प्रताड़ित कर रही है उससे देशभर में आप के नेताओं को समर्थन मिल रहा है संवेदनाएं मिल रहे हैं जो नरेंद्र दामोदरदास मोदी सरकार के लिए एक खतरे की घंटी कही जा सकती है.

सीबीआई क्या बोली!

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की

प्राथमिकी में कहा गया है कि मनोरंजन और इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ‘ओनली मच लाउडर’ के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) विजय नायर, पनड रिकार्ड के पूर्व कर्मचारी मनोज राय, ब्रिडको स्पिरिट्स के मालिक अमनदीप ढल और इंडोस्पिरिट्स के मालिक समीर महेंद्र अनियमितताओं में शामिल थे.

गुड़गांव में बडी रिटेल प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक अमित अरोड़ा, दिनेश अरोड़ा और अर्जुन पांडे, सिसोदिया के ‘करीबी सहयोगी’ हैं और आरोपी लोक सेवकों के लिए ‘शराब लाइसेंसधारियों से एकत्र किए गए अनुचित आर्थिक लाभ

के प्रबंधन और स्थानांतरण करने में सक्रिय रूप से शामिल थे.’ दिनेश अरोड़ा द्वारा प्रबंधित राधा इंडस्ट्रीज को इंडोस्पिरिट्स के समीर महेंद्र से एक करोड़ रुपए मिले। अरुण रामचंद्र पिल्लई, विजय नायर के माध्यम से समीर महेंद्र से आरोपी लोक सेवकों को आगे स्थानांतरित करने के लिए अनुचित धन एकत्र करता था. अर्जुन पांडे नाम के एक व्यक्ति ने विजय नायर की ओर से समीर महेंद्र से लगभग 2-4 करोड़ रुपए की बड़ी नकद राशि एकत्र की. सनी मारवाह की महादेव लीकर्स को योजना के तहत एल-1 लाइसेंस दिया गया था। यह भी आरोप है कि दिवंगत शराब कारोबारी पोंटी चड्ढा की कंपनियों के बोर्ड में शामिल मारवाह आरोपी लोक सेवकों के निकट संपर्क में था.

अधूरा रहा गया सोनाली फोगाट का ये सपना, पढ़ें खबर

बीजेपी नेता और बिग बॉस फेम सोनाली फोगाट (Sonali Phogat) के निधन से इंडस्ट्री में शोक की लहर छाई हुई है. इस खबर से फैंस को बड़ा झटका लगा है. 42 वर्ष के उम्र में सोनाली फोगाट का निधन हो गाया है. रिपोर्ट्स के अनुसार सोनाली फोगाट का निधन हार्ट अटैक से हुआ है.

सोशल मीडिया पर फैन्स के साथ-साथ सेलेब्रिटीज भी सोनाली को श्रद्धांजलि दे रहे हैं. बिग बॉस 14 में सोनाली के साथ नजर आ चुके एक्टर अली गोनी ने सोनाली की मृत्यु के बाद एक इमोशनल पोस्ट शेयर किया है और एक्टर ने बताया है कि सोनाली की  आखिरी इच्छा क्या थी?

 

अली गोनी ने बिग बॉस के दौरान का एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें अली और सोनाली एक-दूसरे के साथ खूबसूरत पल बिताते नजर आ रहे हैं. इस वीडियो को पोस्ट करते हुए अली ने लिखा है कि  समझ नहीं आ रहा क्या बोलूं. आपने मुझे 2 दिन पहले मैसेज किया था और बहुत सारा आशीर्वाद दिया था. आपने मुझे बताया था कि आपको मेरा नया गाना कितना पसंद आया है. आपने मुझसे पूछा था कि मैं भी आपके साथ इसी तरह का गाना करूंगी और मैंने आपको वादा किया था हम ऐसा करेंगे.

 

अली ने आगे लिखा कि मुझे माफ कर दीजिए सोनाली जी ये प्रोमिस अब अधूरा रह गया. आप बहुत याद आएंगी. भगवान आपकी आत्मा को शांति दे.

 

बता दें कि ‘बिग बॉस 14’ में सोनाली ने अली गोनी के लिए अपने प्यार का इजहार किया था. उन्होंने कहा था, मैं शादीशदा हूं और एक बच्चे की मां हूं. मैं काफी उम्रदराज हूं. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो मैं तुम्हें प्रपोज करती.

Anupamaa: होश में आते ही बरखा का राज खोलेगा अनुज, बिजनेस से करेगा बेदखल

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ टीआरपी लिस्ट में भी लगातार टॉप पर बना हुआ है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि कपाड़िया हाउस में जन्माष्टमी सेलिब्रेशन के दैरान वनराज अपनी बेटी पाखी के साथ पहुंचता है. वह अनुज से माफी मांगता और ठीक होने के लिए प्रार्थना करता है. तो दूसरी तरफ बरखा अनुपमा के चरित्र पर सवाल उठाती है और उसे खरी-खोटी सुनाती है. इसी बीच अनुज को धीरे-धीरे होश आने लगता है. शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में आपने देखा कि बरखा अनुपमा से कहती है कि तुमने मेरे देवर से प्रेम नहीं किया है, मेरे देवर ने सिर्फ तुमसे प्रेम किया है. और उसने तीन बच्चों की मां और एक तलाकशुदा औरत से शादी की. अनुपमा ने अनुज को धोखा दिया है. शो में आप ये भी देखेंगे कि अंकुश और बरखा, अनुपमा को लीगल नोटिस देंगे. जिसमें लिखा होगा कि जब तक अनुज को होश नहीं आता, वह उससे जुड़ा फैसला नहीं ले सकती है. इसके साथ ही इस परिवार का बिजनेस भी नहीं संभाल सकती है.

 

बरखा और अंकुश आगे अनुपमा पर सवाल खड़ा करने से पीछे नहीं हटते हैं. दोनों कहते हैं इतना बड़ा बिजनेस संभालने के लिए तुम्हारे पास अनुभव नहीं है, साथ ही क्या भरोसा कि कब तुम इसे अपने बच्चों के नाम कर दो. अंकुश, अनुपमा से कहता है कि कपाड़िया एंपायर को तुम नहीं मैं संभालुंगा.

 

शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि इसी बीच अनुज को होश आ जाएगा तो दूसरी तरफ बरखा और अंकुश को बड़ा झटका लगेगा. होश में आते ही अनुज, बरखा और अंकुश को अक्ल ठिकाने लगाएगा. वह बरखा का राज सबके सामने खोल देगा. वह बरखा और अंकुश को घर से निकालने का फैसला ले लेगा. अनुज उन दोनों को बिजनेस से भी बेदखल करेगा.

 

शो में आगे ये भी दिखाया जाएगा कि अनुज सबको बताएगा कि वनराज ने खाई में उसे धक्का नहीं दिया, उसने उसे बचाने की कोशिश की थी.

आजादी स्पेशल: पार्टीशन पर फिल्में और घाव महिलाओं में

पुणे की 90 वर्षीया रीना छिब्बर वर्मा की कहानी तब सुर्खियों में आई जब उन्होंने पाकिस्तान के रावलपिंडी में अपने घर को देखने के लिए कई बार वीजा की मांग की और उन्हें वीजा नहीं मिला. उन्होंने आशा छोड़ दी थी कि जीवन रहते वे अपने पैतृक घर को देख सकेंगी पर यह मौका उन्हें 75 साल बाद केवल 3 महीने के लिए मिला, जिस से वे अपने घर को देखने के लिए उत्सुक थीं.

रीना जब महज 15 साल की थीं तब विभाजन के बाद पाकिस्तान के रावलपिंडी से अपना घर छोड़ कर भारत आई थीं. हाल ही में वे सरहद पार कर अपना पुश्तैनी घर देखने के लिए रावलपिंडी गईं तो उन की आंखें भर आईं. वहां उन्होंने पुरानी यादें सा झा करते हुए बताया कि जिस याद और दर्द को उन्होंने 75 साल तक दबा कर रखा, उस का फल उन्हें मिला. उन्होंने घरवापसी की कल्पना कभी नहीं की थी, उन्होंने सपने में भी इसे नहीं सोचा था.

मिला सहयोग

पाक उच्चायोग द्वारा रीना छिब्बर वर्मा को सद्भावना के तौर पर 3 महीने का वीजा जारी किया गया है. वे 3 महीने तक पाकिस्तान में रह सकती हैं. पकिस्तान से भारत जाते हुए वे भावुक हो गईं. देश छोड़ने के 75 साल बाद रीना छिब्बर शनिवार को वाघाअटारी सीमा से पाकिस्तान अपने घर रावलपिंडी पहुंचीं.

रीना छिब्बर ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने मौडर्न स्कूल में पढ़ाई की है. उन के 4 भाईबहन भी उसी स्कूल में पढ़ने गए थे. उन के एक भाई और एक बहन ने मौडर्न स्कूल के पास स्थित गार्डन कालेज में पढ़ाई की है. विभाजन से पहले हिंदू और मुसलिम कोई मुद्दा नहीं था. सोशल मीडिया पर रीना के कई पाकिस्तानी दोस्त हैं. यहीं पर पाकिस्तानी नागरिक सज्जाद हैदर ने उन से संपर्क किया और रावलपिंडी में उन के घर की तसवीरें भेजीं. धीरेधीरे उन की कहानी पाकिस्तान में चर्चा का विषय बनी.

नहीं था कोई भेदभाव

रीना छिब्बर के अलावा ऐसी कई महिलाएं उस समय की रही होंगी जिन्हें पार्टीशन का घाव या सदमा सहना पड़ा. हालांकि पार्टीशन से पहले हिंदू और मुसलिम में कोई भेदभाव नहीं था. सभी अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुश थे. लेकिन इस पार्टीशन ने देश को बांटने के अलावा लोगों के भाव, सोच आदि को बांट दिया. कितनों ने सालों वीजा के इंतजार में यादों के साथ ही दम तोड़ दिए होंगे, जिस की गणना न तो पाकिस्तान और न भारत ने ही की होगी. यह एक ऐसी विडंबना है कि आज 75 साल बाद भी लोग इस भेदभाव के शिकार हो रहे हैं.

एक काली रात

एक अनुमान के अनुसार 1.4 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे. साल 1951 के विस्थापित जनगणना के अनुसार 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़ कर पाकिस्तान गए जबकि 72,49,000 हिंदू और सिख पाकिस्तान छोड़ कर भारत आए. 10 किलोमीटर की लंबी लाइन में लग कर सीमा के उस पार गए या इस पार आए. केवल 60 दिनों में सालों से रहने वाले अपना घरबार, दुकानें, जायदाद, संपत्ति, खेतीकिसानी छोड़ कर भारत आए या फिर पाकिस्तान गए.

भारत विभाजन के दौरान बंगाल, सिंध, कश्मीर, हैदराबाद, पंजाब में दंगे भड़क उठे, जिस से हजारों की संख्या में लोग मारे गए और बेघर हुए.

विभाजन का काला अध्याय आज भी खून के छींटों से भरा हुआ है जिसे याद कर लोगों के रोंगटे आज भी खड़े हो जाते हैं.

बंटवारे का दर्द जिन लोगों ने सहा जिस में कत्ल हुए, अपनों को खोया, बेघर हुए आदि को लेखकों और उपन्यासकारों व कहानीकारों ने अपनी लेखनी से बयां किया, जिस का मंचन नाटकों और फिल्मों के जरिए किया गया.

हुआ नाटकों का मंचन

इसी कड़ी में साल 1980 में असगर वजाहत की लिखी कहानी ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को निर्माता, निर्देशक दिनेश ठाकुर ने अंक थिएटर द्वारा देश और विदेश में करीब 400 से अधिक बार प्रस्तुत किया. इस में मुख्य भूमिका में प्रीता माथुर ठाकुर हैं. अभिनेत्री प्रीता कहती हैं कि गोधरा कांड के बाद दिनेश ठाकुर को रातरात भर नींद नहीं आती थी.

वे लोगों की ऐसी मानसिकता से सिहर उठे थे और हिंदूमुसलिम दंगे से हुए आम जनता की परेशानी और दर्द को बयान करने के लिए पहली बार नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ का मंचन किया. इस के निर्माता, निर्देशक और अभिनेता भी वह खुद थे.

दिनेश ठाकुर के इस नाटक ने सब का मन मोह लिया और एक के बाद एक शहरों व विदेशों में जा कर मंचन किया ताकि बंटवारे के दर्द से लोगों का परिचय करवाया जाए क्योंकि एक आर्टिस्ट आवाज नहीं उठा सकता, इसलिए कला के जरिए उन्हें सब के बीच अपनी बात रखनी पड़ती है.

इस नाटक में उन्होंने किसी दूसरे के एजेंडे को अपने जीवन में पाने का मकसद न बनाने की हिदायत दी है. सच्ची घटना पर लिखे इस नाटक में एक बूढ़ी महिला की अपनी हवेली से अंतिम सांस तक प्यार को दिखाया गया है.

जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ

प्रसिद्ध नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ की कहानी में स्वतंत्रता के बाद अचानक से भारतपाकिस्तान विभाजन की घोषणा हो जाती है. बूढ़ी माई भी इस त्रासदी में अपने परिवार को खो बैठती है. इधर सिकंदर मिर्जा भी हिंदुस्तान से पाकिस्तान का रुख करते हैं और लाहौर में उन्हें रहने के लिए यह 22 कमरे वाली हवेली अलौट की जाती है जहां एक बूढ़ी स्त्री रहती है. शुरू में वे लोग हवेली में माई की मौजूदगी पसंद नहीं करते और उन्हें वहां से हटाने के कई प्रयास करते हैं. वह हटना नहीं चाहती, मिलनसार स्वभाव के कारण सिकंदर मिर्जा और बाकी अन्य मुसलमानों से हिलमिल जाती है. उन्हें लाहौर से इतना प्रेम होता है कि वह इसे दुनिया का श्रेष्ठ स्थान बताती है और कहती है कि जिस ने लाहौर नहीं देखा, उस ने जन्म ही नहीं लिया अर्थात संसार में कुछ भी नहीं देखा.

वह मिर्जा परिवार को सैटल्ड होने में सहायता करती है और उन्हें उस हवेली में रखना चाहती है लेकिन खुद जाना नहीं चाहती. धीरेधीरे मिर्जा के परिवार वालों की दोस्ती उस बूढ़ी औरत से हो जाती है. इस नाटक में ह्युमन बिहेवियर को दिखाया गया है जिस में धर्म कोई भी हो, सम्मान देने के लिए नतमस्तक करना पड़ता है और हर व्यक्ति के खून का रंग लाल ही होता है. उस बुढि़या की मत्यु के बाद उस के धर्म के अनुसार अंत्येष्टि कर दी जाती है लेकिन अंत में विरोधी लोग मिर्जा का कत्ल कर देते हैं.

प्रीता आगे कहती है कि आज भी हमारे देश की मानसिकता बदली नहीं, जो सालों पहले थी. इसलिए अभी भी इस नाटक का मंचन लगातार कर रही हूं. आजादी के महोत्सव में भी इस नाटक का मंचन किया जाएगा. क्या इन 75 सालों में सभी ने कुछ नहीं सीखा.

ह्ल पार्टीशन पर बनी फिल्में

देश के विभाजन को ले कर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कई फिल्में बनाई गईं जिन्हें देख कर हमें आज भी उस दौर के दृश्य नजर आते हैं जब हम ने आजादी की कीमत देश के बंटवारे के रूप में चुकाई थी. आइए रूबरू होते हैं उस समय की पार्टीशन को ले कर बनीं कुछ फिल्मों से.

लाहौर

विभाजन की विभीषिका को भारतीय फिल्मकारों ने पहली बार 1949 में सिल्वर स्क्रीन पर दिखाया. एम एल आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘लाहौर’ में नरगिस और करन दीवान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. इस फिल्म की कहानी एक प्रेमीप्रेमिका के इर्दगिर्द घूमती है. इस में दिखाया गया है कि देश विभाजन के समय एक लड़की का कुछ लोग अपहरण कर उसे पाकिस्तान में रख लेते हैं जबकि उस का प्रेमी भारत आ जाता है. बाद में वह अपनी प्रेमिका (नरगिस) को लेने पाकिस्तान चला जाता है.

धर्मपुत्र

साल 1961 में आई फिल्म ‘धर्मपुत्र’ भारतपाकिस्तान के बंटवारे और धर्म पर आधारित दंगों को दिखाती है. फिल्म की कहानी में बंटवारे के दौरान एक हिंदू परिवार अपने साथ एक मुसलिम बच्चे को भारत ले कर आता है. इस फिल्म का गाना ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ हिंदूमुसलिम एकता को दर्शाता है.

गरम हवा

देश विभाजन की टीस भारतीय साहित्यकारों के साथसाथ फिल्मकारों पर थी कि उन्होंने सिनेमा और समाज को एक से बढ़ कर एक फिल्में दीं. इन में से 1973 में बनी फिल्मं ‘गरम हवा’ थी. पूरी तरह से देश विभाजन पर आधारित इस फिल्म में एक तरफ प्रेम कहानी दिखाई गई तो दूसरी तरफ एक नया देश पाकिस्तान बनने के बाद भारत में रह गए मुसलमानों के अंतर्द्वंद्व व दंश को प्रदर्शित किया गया. इस में लोगों के दिलों में खिंची इसी खूनी सरहद की वजह से हुए पार्टीशन के बाद 2 मुल्कों के अलग होने से उपजे दर्द से गुजरते हर परिवार की जिंदा शहादत की कहानी है.

तमस

वर्ष 1988 में आई फिल्म ‘तमस’ उपन्यासकार भीष्म साहनी के उपन्यास पर आधारित है. कहा जाता है कि यह फिल्म पाकिस्तान में स्थित रावलपिंडी में हुए दंगों की सच्ची घटना पर बनाई गई है. इस फिल्म में विभाजन के दौरान होने वाले दंगों की कहानियां बताई गई हैं. ‘तमस’ कुल 5 दिनों की कहानी को ले कर बुना गया उपन्यास है परंतु कथा में जो प्रसंग संदर्भ और निष्कर्ष उभरते हैं उन से यह 5 दिवस की कथा न हो कर 20वीं सदी के हिंदुस्तान के अब तक के लगभग सौ वर्षों की कहानी हो जाती है. इस फिल्म में भीष्म साहनी, एके हंगल, ओमपुरी, पंकज कपूर और सुरेखा सीकरी जैसे सितारों ने काम किया है.

ट्रेन टू पाकिस्तान

खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पर बनी फिल्म साल 1998 में रिलीज की गई थी. यह फिल्म पाकिस्तान में स्थित शहर मनीमाजरा के पास स्थित एक रेलवे लाइन की कहानी है. आजादी के पहले इस गांव में सिख बहुसंख्यक में हुआ करते थे, मुसलिमों की आबादी कम थी. इस के बावजूद भी लोग वहां मिलजुल कर रहते थे पर बंटवारे के बाद उस शहर की स्थिति दूसरी जगहों की तरह ही बदल जाती है. लोगों के बीच दंगे होते हैं जिन में लोग एकदूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं.

इस के निर्देशक पामेला रुक्स हैं. उन्होंने लोगों के इमोशंस को बखूबी दिखाया है. इस में जब पाकिस्तान से एक ट्रेन आती है जिस में भारत आने वाले लोगों के शव होते हैं, तब चीजें बदल जाती हैं. इसे दर्शकों ने खूब पसंद किया और इस फिल्म को कई पुरस्कार भी मिले हैं.

इस प्रसंग को आज भी गोधरा कांड से जोड़ा जा सकता है. 27 फरवरी, 2002 को गुजरात स्थित गोधरा शहर में लोगों से भरी रेलगाड़ी में एक समुदाय द्वारा आग लगाने से 90 यात्री मारे गए, जिस के परिणामस्वरूप गुजरात में साल 2002 में दंगे हुए और हजारों की संख्या में लोगों ने अपनों को खोया. उस दिन को भी इतिहास के काले अध्याय के रूप में जोड़ा गया जिस ने हिंदूमुसलिम के भाईचारे को आग लगा दी थी.

हे राम

साल 2000 में फिल्म ‘हे राम’ को दक्षिण के जानेमाने ऐक्टर, डायरैक्टर और फिल्म प्रोड्यूसर कमल हासन द्वारा बनाया गया. फिल्म में बंटवारे के समय की हिंसा को दिखाया गया है जिस में राम नाम के एक इंसान की पत्नी का दंगों के दौरान बलात्कार कर उस की हत्या कर दी जाती है. इस के साथ ही फिल्म में नाथूराम गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या की कहानी को भी परदे पर दिखाया गया है. इस फिल्म को औस्कर के लिए भी नौमिनेट किया गया.

गदर एक प्रेमकथा

साल 1999 में आई सनी देओल और अमीषा पटेल स्टारर फिल्म ‘गदर एक प्रेमकथा’ बंटवारे के समय की एक प्रेमकहानी को दिखाया गया है. कहानी में सरदार तारा सिंह दंगों के दौरान एक मुसलिम महिला सकीना की जान बचाता है, जिस के बाद वे दोनों शादी कर लेते हैं. सालों बाद सकीना को पता चलता है कि उस के मातापिता जिंदा हैं और वह उन से मिलने पाकिस्तान जाती है पर सकीना के मातापिता उसे जबरन वहीं रोक लेते हैं और उस के पति के पास नहीं जाने देते हैं. इस के बाद तारा सिंह अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए पाकिस्तान जाता है.

पिंजर

चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्देशित 2003 की फिल्म ‘पिंजर’ भारत के विभाजन के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों की समस्याओं के बारे में है. फिल्म अमृता प्रीतम द्वारा लिखित इसी नाम के एक पंजाबी उपन्यास पर आधारित है. उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी प्रमुख भूमिकाओं में हैं. आलोचकों की प्रशंसा के अलावा फिल्म ने राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता.

वीर जारा

साल 2004 की यशराज फिल्म्स की फिल्म ‘वीर जारा’ लगभग हर किसी ने देखी होगी. इस फिल्म में जितने अच्छे गाने हैं, उतनी ही अच्छी फिल्म की कहानी है. भारतीय पायलट वीर और एक पाकिस्तानी लड़की जारा को प्यार हो जाता है. जब वीर को पाकिस्तानी जेल में बंदी बनाया जाता है तो जारा उसे मृत मान लेती है और भारत आ कर उस के गांव के लोगों की सेवा करती है.

इस के अलावा निर्देशक गुरिंदर चड्ढा की ‘पार्टीशन 1947’, ‘ए मिडनाइट चिल्ड्रेन’ आदि कई फिल्में बंटवारे पर बनी हैं और बनाई जा रही हैं लेकिन जब भी बंटवारे पर फिल्में बनती हैं, दर्शकों के घाव फिर से हरे हो जाते हैं. फिर चाहे वह इंडिया, पाकिस्तान हो या भारत, बंगलादेश. सभी स्थानों पर रहने वाली महिलाएं, पुरुष और बच्चे जातिमजहब की अनगिनत मुश्किलों का सामना करते हुए कुछ दम तोड़ देते हैं तो बचे लोग आज भी शांति की कामना करते रहते हैं.

आखिर कब तब थमेगा जाति, धर्म, मजहब को ले कर कत्लेआम जिस में एजेंडा किसी और का और बलि कोई दूसरा चढ़ रहा है. शिक्षित युवा सम झो और इसे खत्म करो, हिंदी सिनेमाजगत के कलाकारों का यही आह्वान है. हिंदी फिल्म जगत आज पार्टीशन को नोट बटोरने का काम करने लगा है और उसे हिंदूमुसलिम विवाद के जख्मों को कुरेदने में ज्यादा सहायक है, उस पर मरहमपट्टी करने में कम.

हालत ए पंजाब

पंजाब में लोकसभा उपचुनाव में संगरूर सीट पर सिमरनजीत सिंह मान की जीत चिंता का विषय है. यह सीट आम आदमी पार्टी के अकेले लोकसभा सदस्य भगवंत सिंह मान के पंजाब के मुख्यमंत्री बनाए जाने पर दिए गए त्यागपत्र की वजह से खाली हुई थी. वर्तमान मुख्यमंत्री की सीट पर किसी और पार्टी की जीत तो आश्चर्यजनक है ही, बड़ी बात है सिमरनजीत सिंह मान की नीति.

सिमरनजीत सिंह मान न भारतीय जनता पार्टी के सदस्य है, न कांग्रेस के और न पंजाब में बरसों राज किए शिरोमणी अकाली दल के. सिमरनजीत सिंह मान सिख राजनीति के कट्टरवादियों में से कहे जाने चाहिए, वे धार्मिक एजेंडे के समर्थक हैं.

पंजाब 1980 के आसपास सुलगने लगा था और तब न केवल सैकड़ों मारे गए, ब्लूस्टार औपरेशन हुआ और इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या भी हुई. राजीव गांधी ने जैसेतैसे कर के उस मामले को सुलटाया था पर अब हिंदू कट्टरता के चलते सिख कट्टरता भी सिर उठाने लगी है और जहां पंजाब में शिरोमणी अकाली दल (बादल) और भारतीय जनता पार्टी दोनों हाशिए पर आ गए हैं, सत्ता आम आदमी पार्टी के नौसिखिए हाथों में आ गई है.

सिमरनजीत सिंह मान की जीत के पीछे एक वजह यही है कि जनता सम झती है ‘आप’ के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान मात्र कठपुतली हैं जिन्हें राज चलाना नहीं आता. सिर्फ अच्छा गायक होना काफी नहीं है. पंजाब के धर्म के कट्टर लोगों ने पहले शिरोमणी अकाली दल के प्रति गुस्सा कांग्रेस को जिता कर दिखाया था, फिर आम आदमी पार्टी को जिता कर और अब सिमरनजीत सिंह को.

पंजाब का आज उबलना देश के लिए खतरनाक है. वैसे ही भगवा नीतियों के कारण देशभर के मुसलमान, दलित और पिछड़ों के बहुत से हिस्से राजनीति, नौकरी, सुरक्षा के सवालों पर हाशिए पर होने के कारण बेहद खफा हैं. ऐसी हालत में पंजाब, जो जम्मूकश्मीर से सटा है, पाकिस्तान से सीमा जुड़ी है, नाराज होने लगा तो बहुत भारी पड़ेगा.

धर्मजनित राजनीति किसी देश, समाज को कभी नहीं भाई. समाज को हमेशा धर्म ने लूटा है, बहकाया है व आगे बढ़ने से रोका है. धर्म लोकप्रिय इसलिए नहीं है कि वह अच्छी बात बताता है बल्कि इसलिए है कि वह निठल्ले कार्यकर्ताओं को जमा कर लेता है, उन्हें खूब  झूठी कहानियां बोलने की ट्रेनिंग देता है और फिर घरघर जा कर बहकाने की लगातार कोशिश करता है. पंजाब में अब क्या 1980 के दिन लौट रहे हैं जहां धर्म के सहारे न जाने क्याक्या किया जाएगा और फिर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्र को इंदिरा गांधी की तरह कुछ अनावश्यक करना होगा. अगर ऐसा हुआ तो जिम्मेदारी उन की होगी जिन्होंने पिछले 40 वर्षों के दौरान राजनीति को भगवा रंग की बालटी में डुबो कर रखने की सफल कोशिश की है, वे भूल गए कि इस बालटी में दूसरे रंगों के भी टुकड़े पड़े हैं.

अगस्त माह में खेती से जुड़े काम

किसानों के लिए वैसे तो हर महीना खास होता है, लेकिन अगस्त का महीना खेती के लिए इसलिए ज्यादा अहम होता है कि इस महीने में मानसून जोरों पर होता है और वर्षा वाले क्षेत्रों में ?ामा?ाम बारिश भी होती है.

अगस्त महीने में होने वाली बारिश जहां फसलों के लिए फायदेमंद होती है, वहीं कई तरह के कीड़ेमकोड़े भी पनपते रहते हैं, जो फसल और पशुओं के साथसाथ हमारी सेहत के लिए भी नुकसानदायक होते हैं.

इस महीने पशुओं में खुरपकामुंहपका रोग का प्रकोप भी बढ़ जाता है, वहीं अधिक बारिश से फसलों में भी कीटों व बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है.

इस समय बारिश अधिक होने से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों की तादाद काफी बढ़ जाती है, जो बोई गई फसल की पत्तियों का रस, फूल व फलों को अपना भोजन बनाते हैं. इस से पैदावार में काफी कमी आ जाती है. ऐसे में अगर कीटों का प्रकोप फसल में दिखाई पड़े, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा विशेषज्ञ से संपर्क कर समाधान पा सकते हैं.

इस के अलावा फसल में बहुत सी बीमारियां भी फैलती हैं, जिस से उपज में कमी के साथसाथ गुणवत्ता भी गिर जाती है. इन बीमारियों से बचने के लिए किसानों को रोगरोधी किस्मों का चयन और बीजोपचार का उपाय अपनाना चाहिए.

किसान खरीफ फसल के रूप में सब से ज्यादा धान की खेती करते हैं और अगस्त महीने तक धान की रोपाई का काम पूरी तरह से पूरा हो चुका होता है. ऐसे में धान की फसल को पानी की ज्यादा जरूरत पड़ती है.

अगस्त महीने में बारिश अच्छी होती है. ऐसी अवस्था में खेतों के चारों ओर मेंड़ों को मजबूत करें, जिस से बरसात का पानी खेत से बह कर बाहर न जाने पाए.

अगर अगस्त महीने में बारिश अच्छी न हो, तो फसल में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए उचित अंतराल पर सिंचाई करते रहें.

धान की रोपाई के 25-30 दिन बाद अधिक उपज वाली प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 65 किलोग्राम यूरिया और सुगंधित प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 33 किलोग्राम यूरिया की टौप ड्रैसिंग करें. नाइट्रोजन की इतनी ही मात्रा की दूसरी व अंतिम टौप ड्रैसिंग रोपाई के 50-55 दिन बाद करनी चाहिए.

खैरा रोग की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट

व 2.5 किलोग्राम चूना या 20 किलोग्राम

यूरिया को 1,000 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

दानेदार यूरिया के नुकसान से बचने के लिए इफको का नैनो लिक्विड यूरिया का छिड़काव करें. इस से मिट्टी, पानी और वायु प्रदूषण में कमी आती है. साथ ही, फसल को पूरी नाइट्रोजन मिलती है, जिस से फसल की बढ़वार और उत्पादन दोनों बढ़ जाते हैं.

धान की फसल में फास्फोरस भी 2 बार दिया जा सकता है. धान की फसल में जिंक डालना न भूलें, क्योंकि यदि जिंक नहीं दिया हो, तो 3 हफ्ते बाद धान की फसल पीली पड़ सकती है और पत्तों पर भूरे धब्बे आ जाते हैं.

बीमारियों में तना गलन पौधों के तनों को गला देते हैं, पौधे जमीन पर गिर पड़ते हैं और तना चीरने पर सफेद रुई जैसी फफूंद व काले रंग के पिंड पाए जाते हैं.

इस बीमारी की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले खेतों व मेंड़ों पर पडे पिंडों और ठूंठों को जला दें. खेत में हर हफ्ते पानी बदल दें और रोगग्रस्त खेत का पानी स्वस्थ खेत में न जाने दें.

ब्लास्ट रोग में पत्तियों पर धब्बे बनते हैं, तने पर गांठें चारों ओर से काली हो जाती हैं और पौधा गांठ से टूट जाता है.

रोकथाम के लिए लक्षण नजर आने पर प्रति एकड़ 200 ग्राम कार्बंडाजिम को

200 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

अगस्त में गन्ने को बांधें, ताकि फसल गिरने से बचे, क्योंकि इस माह काफी कीट व बीमारियों के लगने का डर रहता है. अगोला बेधक, पायरिल्ला, गुरदासपुर बोरर, जड़ बेधक कीटों का प्रकोप दिखने पर रोकथाम के लिए कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें.

अगस्त महीने में वर्षा का पानी मक्का के खेत में रुकने न पाए. इस का निकास लगातार करते रहें. साथ ही, खरपतवार भी खेत से बराबर निकालते रहें.

देर से बोई जाने वाली फसल में पौधे घुटनों की ऊंचाई पर आ गए होंगे, वहां नाइट्रोजन की दूसरी बार की मात्रा समय से देना न भूलें.

इस महीने बाजरे में फूल आने की स्थिति होती है. ऐसे समय पर खेत में नमी बनाए रखें. भारी वर्षा होने पर फालतू पानी तुरंत निकाल दें.

ध्यान रखें कि मूंग, उड़द, लोबिया, अरहर, सोयाबीन वगैरह दलहनी फसलों में फूल आने पर मिट्टी में हलकी नमी बनाए रखें. इस से फूल ?ाड़ेंगे नहीं और अधिक फलियां लगेंगी व दाने भी मोटे और स्वस्थ होंगे. परंतु खेतों में वर्षा का पानी खड़ा नहीं होना चाहिए और जल निकास अच्छा होना चाहिए.

जिन किसानों ने मूंगफली की फसल ले रखी है और अगर मूंगफली में फूल आने की अवस्था है, तो सिंचाई जरूर करें. दूसरी सिंचाई फल लगने पर जरूरी है.

जिन किसानों ने बैगन व टमाटर की नर्सरी डाल रखी हो, वह अगर जुलाई के अंत में पौधों की रोपाई नहीं कर पाए हैं, तो अगस्त माह में रोपाई जरूर पूरी कर लें. अगर रोपाई का काम जुलाई में पूरा कर लिया गया हो, तो अगस्त माह में खरपतवार नियंत्रण व खेत में उचित नमी बनाए रखें. साथ ही, अतिरिक्त पानी को निकालते रहें.

जिन किसानों ने खीरे की खेती कर रखी हो या इस के अलावा दूसरी सब्जियां भी लगा रखी हों, उन सब्जियों में फल छेदक कीड़ों के प्रकोप का खतरा बना रहता है. ऐसे में कीड़ों के नियंत्रण के लिए फसल सुरक्षा विशेषज्ञ से संपर्क करें.

पत्तागोभी व फूलगोभी की अगेती खेती करने वाले किसान अगस्त माह के अंत तक नर्सरी डाल दें. पत्तागोभी की उन्नत किस्मों में गोल्डन, पूसा मुक्ता व फूलगोभी की पूसा सिंथेटिक, पूसा सुभद्रा और पूसा हिम ज्योति किस्में चुनें. बीज को उपचारित कर के 1 फुट चौड़े व सुविधानुसार लंबे व ऊंची नर्सरी बैड में डालें. बीच में अच्छी चौड़ी नालियां रखें.

नर्सरी में बीज डालने के पहले सड़ीगली खाद अच्छी मात्रा में जरूर मिलाएं. नर्सरी में बीज डालने के बाद उचित नमी बनाए रखें और धूप से भी बचाएं. अगस्त में डाली गई नर्सरी के पौध की रोपाई सितंबर माह में करें.

गाजर और मूली की अगेती खेती करने वाले किसान अगस्त महीने में बोआई कर सकते हैं. गाजर की पूसा केसर और पूसा मेघाली किस्मों को 2-2.7 किलोग्राम बीज को एक फुट की दूरी पर लाइनों में आधा इंच गहरी लगाएं. वहीं मूली की पूसा देशी किस्म का

3-4 किलोग्राम बीज एक फुट की दूरी पर लाइनों में और 6 इंच की दूरी रख कर लगाएं.

अगस्त का महीना नीबू व लीची में

गूटी बांधने के लिए सब से मुफीद माना गया है. इस समय बगीचों से जलनिकास और खरपतवार नियंत्रण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है.

पपीते की खेती करने वाले किसान इस माह के अंत तक पपीते की पौध भी गड्ढों में लगा सकते हैं. इस के लिए अच्छी मिट्टी व देशी खाद से ऊपर तक गड्ढे भर लें.

अगस्त महीने में बबूल, शीशम और नीम को बंजर भूमि में लगा सकते हैं. इन की लकड़ी ईंधन, उद्योगों का कच्चा माल, बिजली के खंभे, फर्नीचर बनाने के काम आते हैं और काफी लाभदायक हैं. बबूल और नीम भेड़बकरियों का चारा भी है.

अगस्त के महीने में हमारे खेतों में बोई गई फसल के बीच और मेंड़ों पर घासफूस उग आते हैं, जो फसल की वृद्धि की दर को रोक देते हैं. ऐसे में यह सुनिश्चित कर लें कि फसल में खरपतवार बिलकुल ही न उगने पाएं. अगर खरपतवार उग आए हों, तो निराईगुड़ाई कर के उन्हें फसल से निकाल दें.

इस समय यह भी ध्यान दें कि फसल में कोई रोगग्रस्त पौधा दिखाई दे, तो उसे निकाल कर नष्ट कर दें. इस से बीमारियों को पूरी फसल में फैलने से रोकने में मदद मिलती है.

अगस्त महीने के शुरुआती हफ्ते तक धान की रोपाई का काम पूरा हो चुका होता है. ऐसे में किसान अपने ट्रैक्टर और लेव लगाने वाले यंत्रों की साफसफाई करें. अगर इन का रखरखाव ठीक से नहीं होता है, तो कृषि के कामों में काफी बुरा असर पड़ता है.

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क्या देवरानी जेठानी में बिलकुल नहीं बनती है?

सवाल

अगले महीने मेरी शादी होने वाली है. अच्छा घरबार है. होने वाले पति अच्छी जौब में हैं. घर में सब खुश हैं कि मैं खातेपीते घर में जा रही हूं. लेकिन मैं एक बात से जरा कन्फ्यूज्ड हूं, ससुराल में मेरे जेठजेठानी होंगे. सब साथ ही रहेंगे. मैं ने अधिकतर देखा है कि देवरानी जेठानी में बिलकुल नहीं बनती और संयुक्त परिवार में अकसर लड़ाई झगड़े होते हैं. इस कारण मैं परेशान हूं. मैं शादी के बाद कोई लड़ाई झगड़ा नहीं चाहती. मुझे वहां कैसे रहना चाहिए? मुझे कुछ सूझ नहीं रहा.

जवाब

आप अभी से इतनी दूर की क्यों सोच रही हैं. शादी कर के आप ससुराल जा रही हैं तो अपनी सोच को पौजिटिव रख कर वहां कदम रखिए. माना कि संयुक्त परिवार में लड़ाई?ागड़े हो जाते हैं इसलिए एकल फैमिली का चलन चल पड़ा लेकिन अब फिर लोगों को सम?ा आने लगा है कि अपनों का साथ जिंदगी में कितना जरूरी है. मातापिता का साया सिर पर होना कितना सुकून देता है और यह बात तब ज्यादा सम?ा आती है जब खुद का परिवार बनता है यानी जब बच्चे होते हैं. अपनों के बीच बच्चे का पालनपोषण कितना सुरक्षित और देखभाल भरा होता है, यह उन्हें तब पता चलता है.

रही बात जेठानी की तो छोटीछोटी बातों का आप ध्यान रखेंगी तो जेठानी के साथ प्रेममोहब्बत के साथ रह सकती हैं. कोई भी यदि जेठानी के बारे में कुछ कहता है तो डायरैक्ट उन से बात कर के सब क्लीयर करें.

एकदूसरे को ठीक से सम?ाने का बैस्ट तरीका है कि आप साथ में समय बिताएं. शौपिंग बैस्ट औप्शन है. साथ में जाएं. इस से रिश्ता मजबूत बनेगा. घर के काम भी यदि मिलजुल कर करते हैं तो लड़ाई?ागड़े का चांस नहीं मिलेगा.

खाली समय में अपने अलग कमरे में घुस कर न बैठे रहें बल्कि साथ में मिल कर गप्पें मारें. फिल्म देखें या कुछ और मस्ती कर लें. ये सभी काम आप के बीच प्रेम बढ़ाएंगे. घर में जब मां या बहन बीमार हो जाती है तो हम उस की सेवा करते हैं. काम में हाथ भी बंटाते हैं. बस, इसी सोच के साथ जेठानी का खयाल रखें. यदि आप उसे दिल से बहन मान लोगी और उस की बहुत केयर करोगी तो सामने वाली भी आप से प्रेम करने लगेगी.

वैसे तो आप को जेठानी के साथ रहना चाहिए लेकिन इतना भी न चिपके रहना कि उस का सांस लेना भी मुश्किल हो जाए. खासकर, निजी मामलों में आप को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए, जब तक कि वह आप से कुछ न कहे. मानसम्मान और बराबरी देवरानी और जेठानी को ससुराल में समान रूप से मिलना चाहिए और यह बात जेठानीदेवरानी दोनों को सम?ानी चाहिए. यदि आप ‘मैं तु?ा से बेहतर हूं,’ के कौंसैप्ट में उल?ा रहोगी तो कभी शांति से नहीं रह पाओगी.

इन सब बातों को गौर से पढ़ें और सम?ों और दिल की सारी उल?ान बाहर फेंक कर अपने आने वाले भविष्य के बारे में अच्छा सोचते हुए नई शुरुआत करें.

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