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मेरी गर्लफ्रेंड ने ब्रेकअप कर लिया है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 24 वर्ष है. मैं आजकल डिप्रैशन के दौर से गुजर रहा हूं. मैंने अपनी गर्लफ्रैंड को सच्चे दिल से चाहा था लेकिन उस ने मेरी फीलिंग्स की बिलकुल कद्र नहीं की. उस की जौब दूसरे शहर बेंगलुरु में लगी तो मेरी परवाह न करते हुए वहां चली गई. मैं ने यह भी सह लिया लेकिन एक महीने के अंदर वहां नया बौयफ्रैंड बना लिया और मु?ा से ब्रेकअप कर लिया. मु?ो लगता है उस ने मुझ से कभी प्यार किया ही नहीं था. अपनेआप पर गुस्सा आता है कि ऐसी लड़की को मैं ने क्यों चाहा, जिस के लिए मेरी हैसियत जीरो थी.

रातदिन उस के बारे में सोच कर दुखी रहता हूं. जानता हूं यह सब ठीक नहीं लेकिन क्या करूं. अपने को सम?ा नहीं पा रहा. बहुत डिप्रैस हो गया हूं. आप ही बताएं क्या करूं?

जवाब

माई डियर फ्रैंड, सब से पहले तो आप को यकीन करना होगा कि उस ने आप से कभी प्यार किया ही नहीं. वह बेवफा थी. वह आप के बारे में सोचती तक नहीं, फिर आप क्यों उस के पीछे अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं. एक खूबसूरत जिंदगी आप के सामने है और आप हैं कि अपने कदम थाम कर बैठ गए हैं और दुख के सागर में गोते लगाने में लगे हैं.

हम अच्छी तरह सम?ा रहे हैं कि दुनिया आप को नीरस लगने लगी है, जिंदगी का उत्साह खत्म हो गया है लेकिन दर्द में ही रहेंगे तो खुद को ही प्रौब्लम देंगे. इस में उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा इसलिए आप को कुछ ऐसा करना है कि आप अपनी जिंदगी दोबारा से हंसी-खुशी जी सकें.

सब से पहले तो सच को स्वीकार करते हुए एक नई एनर्जी के साथ अपने सपनों को पूरा करने में अपना वक्त बिताएं, जिस से आप का जीवन बेहतर बन सके और जिसे जान कर उस लड़की को ईर्ष्या हो कि आप को छोड़ कर उस ने बड़ी गलती की है.

हम इस बात से वाकिफ हैं कि आप का मन किसी से बात करने का नहीं करता होगा लेकिन अंदर ही अंदर न घुलें. कोई तो आप का ऐसा दोस्त होगा जिस से आप अपने दिल की बात शेयर कर सकते होंगे तो उस से अपने ब्रेकअप की बात करें, खुल कर उसे अपने ब्रेकअप के बारे में बताएं, आप को सुकून मिलेगा. किसी के सामने अपना गुबार निकालने से दिल हलका हो जाता है और दूसरे के सहानुभूति के शब्द आहत मन पर मरहम का काम करते हैं.

आप फ्री हैं और दोस्त लोग भी यदि फ्री हैं तो उन के साथ घूमेंफिरें. दोस्तों से मिलनेजुलने पर अच्छा लगेगा. जितना भी हो सके उस लड़की से जुड़ी बातों को जल्दी भूलने की कोशिश करें. इसलिए उस से जुड़ी हर चीज जैसे फोटो, ग्रीटिंग्स को फाड़ कर नष्ट कर दें. इस के अलावा उस के कौंटैक्ट नंबर, ईमेल, मैसेज सबकुछ डिलीट कर दीजिए. सोशल मीडिया पर अनफौलो कर दें और किसी भी तरह के संपर्क में रहने से बचें.

अपने शरीर और दिमाग को कहीं व्यस्त रखें. इसलिए आप किसी नए काम करने में, दोस्तों के साथ डांस करना, मूवी देखना, पढ़ाई करना, घूमना आदि कार्य कर के अपनेआप को व्यस्त रखें. जितना कम आप सोचेंगे उतना ही उसे भूलना आसान होगा.

दुख में गलत आदतों का शिकार होने की गलती बिलकुल मत कीजिए. इस से उस धोखेबाज लड़की को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बल्कि आप ही अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करेंगे. इसलिए अपने दिमाग से नकारात्मक विचार निकाल दें और हमेशा सकारात्मक सोच रखें. पौजिटिव थिंकिंग रखने वाले कभी हारते नहीं हैं.

वैसे बहुत लोग हैं जिन्हें प्यार में धोखा मिला है. आप अकेले व्यक्ति नहीं हैं, इसलिए यह बहुत सामान्य बात है. वक्त के साथसाथ धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. बस खुद पर भरोसा बनाए रखिए. जीवन के सफर में बहुत लोग मिलेंगे और यकीनन आप को कोई न कोई अपना लाइफ पार्टनर जल्दी ही मिल जाएगा, बस अपनी खोज जारी रखिए. हिम्मत न हारें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

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त्यौहार 2022: ऐसे बनाएं मेथी मटर मलाई रेसिपी

मटर की सब्जा सभी को पसंद आता है लेकिन अगर मटर में मेथी को एड करके बनाया जाए तो उसका स्वाद दोगुना बढ़ जाता है. तो आइए जानते हैं मेथी मटर मलाई बनाने का तरीका.

– हरी मेथी- 250 ग्राम (बारीक कटी हुई)

– हरे मटर के दाने (1/2 कप)

– टमाटर (3 मीडियम साइज के)

– क्रीम ( 1/2 कप)

– तेल (02 बड़े चम्मच)

– काजू (12 नग)

– धनिया पाउडर (01 छोटा चम्मच)

– हरी मिर्च (1-2 नग)

– लाल मिर्च पाउडर (01 छोटा चम्मच)

– अदरक (01 इंच का टुकड़ा)

– दाल चीनी (1/2 इंच का टुकड़ा)

– शक्कर (1/2 छोटा चम्मच)

– जीरा (1/2 छोटा चम्मच)

– काली मिर्च ( 6-7 नग)

– लौंग (2-3 नग)

– बड़ी इलाइची ( 02 नग)

– हींग (01 चुटकी)

– नमक (स्वादानुसार)

मेथी मटर मलाई बनाने की विधि

– सबसे पहले मेथी से पत्तियां तोड़ कर पानी से धो लें.

– इसके बाद एक बड़ी छन्नी में इन्हें रख दें, जिससे इनका पानी निथर जाये.

– पानी निथरने के बाद मेथी की पत्तियों को बारीक कतर लें.

– साथ ही मटर के दानों को धों लें.

– टमाटर को धो कर छोटा-छोटा काट लें.

– हरी हरी मिर्च के डंठल तोड़ लें.

– साथ ही अदरक को छील कर धो लें और छोटे-छोटे टुकड़े कर लें.

– इसके बाद टमाटर, हरी मिर्च, अदरक और काजू को मिक्सर मे डाल कर बारीक पीस लें.

– अब इलाइची को छील लें, फिर इलायची सहित सभी खड़े मसालों को इमामदस्ता में डाल कर कूट लें.

– इसके बाद एक पैन में 1/2 कप पानी, मटर के दाने और मेथी डालें और पकायें.

– पैन में उबाल आने पर आंच धीमी कर दें और मटर के दाने नरम होने तक इन्हें पकने दें.

– अब एक कढ़ाई में तेल डाल कर गरम करें.

– तेल गर्म होने पर हींग और जीरा डाल कर तड़का लगायें.

– इसके बाद लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, पिसा हुआ मसाला डालें और अच्छी तरह से भून लें.

मसाले भुन जाने पर कढ़ाई में क्रीम डालें और 02 मिनट तक भून लें.

– इसके बाद कढ़ाई में गरम मसाला डाल कर मिला दें.

– साथ ही उबली हुई मेथी और मटर के दाने, शक्कर और ज़रूरत के मुताबिक पानी मिला दें और उबाल आने तक पका लें.

– इसके बाद गैस बंद कर दें.

– अब आपकी स्वादिष्ट मेथी मटर मलाई तैयार है, इसे गर्मा-गरम निकालें और  रोटी या पराठे के साथ आनंद लें.

क्रंदन: क्या पीयूष की शराब की लत छुड़वा पाई कोकिला

पीयूष ने दोनों बैग्स प्लेन में चैकइन कर स्वयं अपनी नवविवाहित पत्नी कोकिला का हाथ थामे उसे सीट पर बैठाया. हनीमून पर सब कुछ कितना प्रेम से सराबोर होता है. कहो तो पति हाथ में पत्नी का पर्स भी उठा कर चल पड़े, पत्नी थक जाए तो गोदी में उठा ले और कुछ उदास दिखे तो उसे खुश करने हेतु चुटकुलों का पिटारा खोल दे.

भले अरेंज्ड मैरिज थी, किंतु थी तो नईनई शादी. सो दोनों मंदमंद मुसकराहट भरे अधर लिए, शरारत और झिझक भरे नयन लिए, एकदूसरे के गलबहियां डाले चल दिए थे अपनी शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत करने. हनीमून को भरपूर जिया दोनों ने. न केवल एकदूसरे से प्यार निभाया, अपितु एकदूसरे की आदतों, इच्छाओं, अभिलाषाओं को भी पहचाना, एकदूसरे के परिवारजनों के बारे में भी जाना और एक सुदृढ़ पारिवारिक जीवन जीने के वादे भी किए.

हनीमून को इस समझदारी से निभाने का श्रेय पीयूष को जाता है कि किस तरह उस ने कोकिला को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया. एक सुखीसशक्त परिवार बनाने हेतु और क्या चाहिए भला? पीयूष अपने काम पर पूरा ध्यान देने लगा. रातदिन एक कर के उस ने अपना कारोबार जमाया था. अपने आरंभ किए स्टार्टअप के लिए वैंचर कैपिटलिस्ट्स खोजे थे. न समयबंधन देखा न थकावट. सिर्फ मेहनत करता गया. उधर कोकिला भी घरगृहस्थी को सही पथ पर ले चली.

‘‘आज फिर देर से आई लीला. क्या हो गया आज?’’ कामवाली के देर से आने पर कोकिला ने उसे टोका.

इस पर कामवाली ने अपना मुंह दिखाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं भाभीजी, कल रात मेरे मर्द ने फिर से पी कर दंगा किया मेरे साथ. कलमुंहा न खुद कमाता है और न मेरा पैसा जुड़ने देता है. रोजरोज मेरा पैसा छीन कर दारू पी आता है और फिर मुझे ही पीटता है.’’

‘‘तो क्यों सहती है? तुम लोग भी न… तभी कहते हैं पढ़लिख लिया करो. बस आदमी, बेटे के आगे झुकती रहती हो… कमाती भी हो फिर भी पिटती हो…,’’ कोकिला आज के समय की स्त्री थी. असहाय व दयनीय स्थिति से समझौते के बजाय उस का हल खोजना चाहती थी.

शाम को घर लौटे पीयूष के हाथ में पानी का गिलास थमाते हुए कोकिला ने हौले से उस का हाथ अपने पेट पर रख दिया.

‘‘सच? कोकी, तुम ने मेरे जीवन में इंद्रधनुषी रंग भर दिए हैं. हमारी गृहस्थी में एक और सदस्य का जुड़ना मुझे कितनी प्रसन्नता दे रहा है, मैं बयां नहीं कर सकता. बोलो, इस खुशी के अवसर पर तुम्हें क्या चाहिए?’’

‘‘मुझे जो चाहिए वह आप सब मुझे पहले ही दे चुके हैं,’’ कोकिला भी बहुत खुश थी.

‘‘पर अब तुम्हें पूरी देखभाल की आवश्यकता है.’’ पीयूष उसे मायके ले गया जो पास ही था.

इस खुशी के अवसर पर कोकिला के मायके में उस के और पीयूष के स्वागत में खानेपीने की ए वन तैयारी थी. उन के पहुंचते ही कोकिला की मम्मी उन्हें गरमगरम स्नैक्स जोर दे कर खिलाने लगीं और उधर कोकिला के पापा पीयूष और अपने लिए 2 गिलासों में शराब ले आए.

‘‘पापा यह आप क्या कर रहे हैं?’’ उन की इस हरकत से कोकिला अचंभित भी थी और परेशान भी. उसे अपने पापा की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी.

किंतु पीयूष को बुरा नहीं लगा. बोला, ‘‘तुम्हारे पापा ने इस मौके को सैलिब्रेट करने हेतु ड्रिंक बनाया है, तो इस में इतना बुरा मानने की क्या बात है?’’

फिर तो यह क्रम बन गया. जब भी कोकिला मायके जाती, पीयूष और उस के पापा पीने बैठ जाते. कोकिला अपने मायके जाने से कतराने लगी. किंतु उस की स्थिति ऐसी थी कि वहां आनाजाना उस की मजबूरी थी.

समय बीतने के साथ पीयूष और कोकिला के घर में जुड़वां बच्चों का आगमन हुआ. दोनों की प्रसन्नता नए आयाम छू रही थी. शिशुओं की देखभाल करने में दोनों उलझे रहते. शुरूशुरू में बच्चों की नित नई बातें तथा बालक्रीड़ाएं दोनों को खुशी से व्यस्त रखतीं. रोज शाम घर लौटने पर कोकिला पीयूष को कभी हृदय की तो कभी मान्या की बातें सुनाती. दोनों इसी बहाने अपना बचपन एक बार फिर जी रहे थे.

एक शाम घर लौटे पीयूष से आ रही गंध ने कोकिला को चौंकाया, ‘‘तुम शराब पी कर घर आए हो?’’

‘‘अरे, वह मोहित है न. आज उस ने पार्टी दी थी. दरअसल, उस की प्रमोशन हो गई है. सब दोस्तयार पीछे पड़ गए तो थोड़ी पीनी पड़ी,’’ कह पीयूष फौरन कमरे में चला गया.

1-2 दिन की बात होती तो शायद कोकिला को इतनी परेशानी न होती, किंतु पीयूष तो रोज शाम पी कर घर आने लगा.

‘‘ऐसे कैसे चलेगा, पीयूष? तुम तो रोज ही पी कर घर आने लगे हो. पूछने पर कभी कहते हो फलां दोस्त ने पिला दी, कभी फलां के घर पार्टी थी, कभी किसी दोस्त की शादी तय होने की खुशी में तो कभी किसी दोस्त की परेशानी बांटने में साथ देने हेतु. शायद तुम

देख नहीं पा रहे हो कि तुम किस राह निकल पड़े हो. तुम्हारी सारी मेहनत, इतने परिश्रम से खड़ा किया तुम्हारा कारोबार, हमारी गृहस्थी सब बरबाद हो जाएगा. शराब किसी को नहीं छोड़ती,’’ कोकिला को भविष्य की चिंता खाए जा रही थी.

‘‘तुम्हारा नाम भले ही कोकिला है पर तुम्हारी वाणी अब कौए समान हो गई,’’ पीयूष झल्ला कर बोला.

‘‘तो क्या रोजरोज पी कर घर आने पर टोकना गलत है?’’ कोकिला भी चिल्लाई.

गृहकलह को शांत करने का उपाय भी पीयूष ने ही खोजा. अगली सुबह सब से पहले उठ कर चाय बना उस ने कोकिला को जगाया और फिर हाथ जोड़ कर उस से क्षमायाचना की, ‘‘मुझे माफ कर दो, कोकी. देखो, यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो मैं आज से नहीं पीऊंगा. अब तो खुश?’’

और वाकई पीयूष ने शराब त्यागने का भरपूर प्रयास शुरू कर दिया. वे दोस्त छोड़ दिए जिन के साथ वह पीता था. जब उन के फोन आते तब पीयूष कोई न कोई बहाना बना देता. कोकिला बहुत खुश हुई कि अब इन की यह लत छूट जाएगी.

अभी 1 हफ्ता ही बीता था कि पीयूष के चाचाजी जो अमेरिका में रहते थे, 1 हफ्ते के लिए उन के घर रहने आए. वे अपने साथ एक महंगी शराब की बोतल लाए. किसी लत से लड़ते हुए इनसान के सामने उसी लत का स्रोत रख दिया जाए तो क्या होगा? ऐसा नहीं था कि पीयूष ने बचने का प्रयास नहीं किया.

‘‘चाचाजी, मैं ने शराब पीनी छोड़ दी है… मुझे कुछ परेशानी होने लगी है लगातार पीने से,’’ पीयूष ने चाचा को समझाने की कोशिश की.

किंतु चाचाजी ने एक न सुनी, ‘‘अरे क्या यार, इतनी सस्ती शराब पीता है, इसलिए तुझे परेशानी हो रही है. अच्छी, महंगी शराब पी, फिर देख. हमारे अमेरिका में तो रोज पीते हैं और कभी कुछ नहीं होता.’’

चाचाजी इस बात पर ध्यान देना भूल गए कि बुरी चीज बुरी होती है. फिर उस की क्वालिटी कैसी भी हो. जब रोज पूरीपूरी बोतल गटकेंगे तो नुकसान तो होगा ही न.

बस, फिर क्या था. पीयूष की आदत फिर शुरू हो गई. कोकिला के मना करने, हाथ जोड़ने, प्रार्थना करने और लड़ने का भी कोई असर नहीं.

‘‘तो क्या चाहती हो तुम? चाचाजी के सामने कह दूं कि आप अकेले पियो, मैं आप का साथ नहीं दूंगा? तुम समझती क्यों नहीं हो… मैं साथ ही तो दे रहा हूं. अब घर आए मेहमान का अपमान करूं क्या? चिंता न करो, जब चाचाजी लौट जाएंगे तब मैं बिलकुल नहीं पीऊंगा. मैं वादा करता हूं.’’

कुछ समय बिता कर चाचाजी चले गए. किंतु पीयूष की लत नहीं गई. वह पी कर घर आता रहा. एक रात कोकिला ने दरवाजा नहीं खोला, ‘‘तुम अपने सारे वादे भूल जाते हो, किंतु मुझे याद हैं. अब से जब भी पी कर आओगे, मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी.’’

‘‘सुनो तो कोकिला, बस इस बार घर में आने दो. आइंदा से बाहर से पी कर घर नहीं आया करूंगा. घर में ही पी लिया करूं तो इस में तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है न?’’

‘‘बच्चे क्या सोचेंगे पीयूष?’’

‘‘तो ठीक है, मैं बाहर गैरेज में बैठ कर पी लिया करूंगा.’’

वह कहते हैं न कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए, जिसे पीने की लत लग जाए, वह कैसे न कैसे पीने के अवसर ढूंढ़ ही लाता है. घर में सहर्ष स्वीकृति न मिलने पर पीयूष ने गैरेज में पीना आरंभ कर दिया. रोज शाम गैरेज में दरवाजा बंद कर शराब पीता और फिर सोने के लिए लड़खड़ाता घर चला आता. ‘‘कल रात फिर तुम ने पूरी बोतल पी? कुछ तो खयाल करो, पीयूष. तुम शराबी बनते जा रहे हो,’’ कोकिला नाराज होती.

‘‘मुझे माफ कर दो, कोकी. आज से बस 2 पैग लिया करूंगा,’’ सुबह होते ही पीयूष फौरन क्षमा मांगने लगता. लेकिन शाम ढलते ही उसे सिर्फ बोतल नजर आती.

उस रात जब फिर पीयूष लड़खड़ाता हुआ घर में दाखिल हुआ तो कोकिला का पारा 7वें आसमान पर था. उस ने पीयूष को कमरे में घुसने से साफ मना कर दिया, ‘‘मेरे और लीला के पति में इतना ही अंतर है कि वह उस के पैसे से पी कर उसे ही मारता है और तुम अपने पैसे से पी कर चुपचाप सो जाते हो, लेकिन गृहस्थियां तो दोनों ही उलझ कर रह गई हैं न… कल से पी कर आए, तो कमरे में आने की जरूरत नहीं है.’’

कोकिला के इस अल्टीमेटम के चलते दोनों में बहस छिड़ गई और फिर दोनों अलगअलग कमरे में सोने लगे. धीरेधीरे पीयूष और कोकिला एकदूसरे से और भी दूर होते चले गए. कोकिला पीयूष से नाराज रहने लगी. बारबार पीयूष के झूठ के कारण वह उस की ओर से हताश हो चुकी थी. हार कर उस ने उसे समझाना ही छोड़ दिया.

अब पीयूष की तबीयत अकसर खराब रहने लगी. वह बहुत कमजोर होता जा रहा था. जब तक डाक्टर के पास पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी. पता चला कि पीयूष को शराब के कारण गैलपिंग सिरोसिस औफ लिवर हो गया है. अस्पताल वालों ने टैस्टों की लंबी सूची थमा दी. रातदिन डाक्टरों के चक्कर काटती कोकिला बेहाल लगने लगी थी. बच्चे भी कभी किसी रिश्तेदार के सहारे तो कभी किसी मित्र के घर अपना समय काट रहे थे.

देखते ही देखते अस्पताल वालोें ने क्व18 लाख का बिल बना दिया. कोकिला और पीयूष दोनों ही कांप उठे. कहां से लाएंगे इतनी रकम… इतना बड़ा बिल चुकाने हेतु सब बिक जाना पक्का था. जमीन, शेयर, म्यूचुअल बौंड, यहां तक कि घर भी.

एक शाम पैसों का इंतजाम करने हेतु पने निवेश के दस्तावेज ले कर पीयूष और कोकिला गाड़ी से घर लौट रहे थे. कोकिला बेहद उदास थी. उस की आंखें बरस रही थीं, ‘‘यह क्या हो गया है, पीयूष? हमारी गृहस्थी कहां से कहां आ पहुंची है… काश, तुम पहले ही होश में आ जाते.’’

कोकिला की बातें सुन, उस की हालत देख पीयूष की आंखें भी डबडबा गईं कि काश, उस ने पहले सुध ली होती. अपनी पत्नी, बच्चों के बारे में जिम्मेदारी से सोचा होता. डबडबाई आंखों से राह धुंधला जाती है. गाड़ी चलाते हुए आंखें पोंछने को जैसे ही पीयूष ने नीचे मुंह झुकाया सामने से अचानक तेजी से आते एक ट्रक ने उन की गाड़ी को टक्कर मार दी. पीयूष और कोकिला की मौके पर ही मृत्यु हो गई.

नन्हे हृदय और मान्या अब इस संसार में बिलकुल अकेले रह गए. कौन सुध लेगा इन नन्ही जानों की? जब नाविक ही नैया को डुबोने पर उतारू हो तो उस नाव में सवार अन्य लोगों की जिंदगी डोलना लाजिम है.

सास की अलग घर से चले मिसाइल

यह मीटिंग सोसायटी के क्लब हाउस में हो रही थी. मीटिंग सिर्फ बहुओं की थी. अब आप कहेंगे कि इस में नया क्या है? सासबहू में तो सदियों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. पीडि़त बहुएं तो घरघर मिल जाएंगी. हां, यह भी ठीक है. मगर ये बहुएं थोड़ा हट कर हैं. पढ़ीलिखी, अपडेट और सास से दूर पति संग अलग आशियाने में आजाद रहने वाली यानी इन की सासें परदेश में बसती हैं या यह भी कह सकते हैं कि ये सासूबाड़ी छोड़ कर परदेश में बसी हुई हैं. फिर दुख काहे का?

सास साथ नहीं रहतीं तो फिर कैसी टैंशन? यही तो बात है. ‘सासूमां साथ नहीं तो टैंशन नहीं’ लोग यही समझते हैं. घूमोफिरो मौज करो, जैसी मरजी वैसा जीने का नियम बनाओ. लेकिन जरा रूबी, सोनी, दीपा, स्वीटी, पल्लवी, सोनम, अर्चना, कनक… लंबी लिस्ट है. इन की दुखती रग पर हाथ रखो तो पता चलेगा कि सासें दूर रह कर भी कैसे इन पर हुक्म चलाती हैं और तब इन के दिल पर क्या बीतती है सहज अंदाजा लगा सकती हैं… त्राहित्राहि करती हैं ये बेचारियां. किस से करें फरियाद और कौन सुनेगा इन की फरियाद.

ये होपलैस बहुएं दूसरे शहरों में रहने वाली अपनी सासों से परेशान हो कर आज मीटिंग कर रही हैं. इस मीटिंग का धांसू आइडिया मिसेज अग्रवाल का है. वे यूएसए में रहती हैं. 2 साल बाद त्योहार पर भारत आईं है. होली मिलन समारोह में हंसीठट्ठे के बीच उन्होंने कुबूल किया, ‘‘यहीं से बैठेबैठे मेरी सास अपना शासन चलाती हैं. उफ, मैं तंग आ जाती हूं… कई बार लगता है सात समंदर पार रहने का कोई फायदा नहीं. बिंदी भले ही नहीं लगाती हूं, पर सास का हुक्म सिरमाथे पर लगा कर रहना पड़ता है.’’

हंसीमजाक में जो बात निकली तो दूर तक गई. मैडम सोनम ने ताड़ लिया कि मामला गड़बड़ है. अत: वे मिसेज अग्रवाल के पीछे पड़ गईं. उन्होंने उन से सास के कुछ राज भी उगलवा लिए. वे खुद भी दूसरे शहर में रहने वाली अपनी सासूमां से त्रस्त थीं. आरती अग्रवाल ने प्रस्ताव रखा, ‘‘कल हम लोग क्लब हाउस में मिलें और वहां अपनीअपनी बात रखें. हम सब मिल कर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करें कि कैसे सासू मां की दखलंदाजी नहींनहीं तीरंदाजी से छुटकारा पाया जाए.’’

सोसायटी की लगभग सारी बहुएं मीटिंग में आ गई थीं. मिसेज अग्रवाल ने मोरचा संभाला, ‘‘अपनीअपनी सासूमां से त्रस्त फ्रैंड्स, आप सब को पता है कि हम यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं? हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, इसलिए सब बिना किसी लागलपेट के अपनीअपनी परेशानी यहां रखें और फिर मिलजुल कर समाधान ढूंढ़ने का प्रयास करें.

आप लोग जानती ही हैं कि मैं सात समंदर पार रहती हूं. पता है सासूमां की जिद की वजह से मुझे इस होली पर यहां आना पड़ा. वैसे यहां आ कर घरपरिवार के लोगों से मिलनाजुलना मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन फ्रैंड्स इस बार मैं यहां इसलिए नहीं आना चाहती थी. क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. डाक्टर ने 2-3 महीनों तक लंबी यात्रा करने से मना किया था.

सासूमां ने अपने बेटे को औफिस में बारबार फोन कर परेशान कर दिया कि देखो तनु सिर्फ बहाने बना रही है और कुछ नहीं. वह यहां आना ही नहीं चाहती. एक बार नहीं आएगी तो फिर हर बार नए बहाने बनाएगी. बेटे को जाने क्या पाठ पढ़ाया कि उन्होंने टिकट ले कर सीधे मुझे फरमान सुना दिया कि तुम्हें होली मां के साथ ही मनानी है.

इतना ही नहीं, सासूमां रोज वीडियो कौल कर के कोई न कोई हिदायत देती रहती हैं… कभी सुबहसुबह कहती हैं कि आज वृहस्पतिवार है. याद दिला रही हूं… तुम्हें तो कुछ याद रहता नहीं रहता … आज कपड़े मत धोना. और हां, सत्तू के पराठे मत बना लेना. तुम दोनों को बहुत पसंद हैं… जबतब बना लेती हो. वीडियो चैट में वे लंच बौक्स तक देखती हैं कि उस में सत्तू के परांठे तो नहीं हैं. मैं कितनी परेशान हूं बता नहीं सकती… ऐसीऐसी ऊलजलूल बातें करती हैं कि झेलना मुश्किल हो जाता है.

‘‘बेड़ा गर्क हो नैटवर्क कंपनियों का, जिन्होंने हमारी सासों के हाथों में फ्री नैटवर्करूपी मजबूत मिसाइल थमा दी है… क्या बताऊं यहां आने के 2 दिन पहले की बात है. हम लोग डिनर कर रहे थे. बड़े प्यार से इन्होंने खीरा, टमाटर और गाजर का सलाद काटा था. हम लोगों को यह सलाद बहुत पसंद है. सासूमां की नजर उस प्लेट पर पड़ गई. फिर क्या था उन्होंने उसी समय उसे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि रात में ये ठंडी चीजें क्यों खा रहे हो तुम लोग? याद नहीं सोमू को पिछले साल डाक्टर ने रात में सलाद खाने से मना किया था… फिर से सर्दीवर्दी हो गई तो… और तब तक वीडियो चैट करती रहीं जब तक कि हमारा डिनर खत्म नहीं हो गया.’’

‘‘उफ,’’ सब के मुंह से एकसाथ निकला. यह सब की आह थी.

मिसेज अग्रवाल ने सब की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. जब सब की सांस में सांस आई तो अंकिता ने अपनी बात रखी, ‘‘मेरी सासूमां गांव में रहती हैं, जो अब आधाअधूरा शहर हो गया है. उन का फरमान है कि हर पर्वत्योहार वहीं आ कर उन के साथ मनाएं. शादी के 12 साल बीत गए हैं. यह सिलसिला जारी है. वहां जा कर त्योहार क्या मनाना, सारा दिन किचन में ही बीत जाता है.

‘‘अब बेटियां भी बड़ी हो रही हैं. वे वहां नहीं जाना चाहतीं. वहां हम लोग न तो अपनी पसंद का खा सकते हैं, न ही पहन सकते हैं और न ही मौजमस्ती कर सकते हैं. मैं किसी फैस्टिवल पर अपने हिसाब से घर सजाने के लिए तरस गई हूं. पति से कुछ कहती हूं तो कहते कि निभाना तो पड़ेगा ही. अब जब त्योहार आने वाला होता है, तो मन बुझ जाता है.

औफिस में ज्यादा काम होने की वजह से इस बार होली में इन्हें सिर्फ 2 दिन की छुट्टी मिलने वाली थी. मैं और मेरी बेटियां खुश थीं कि इस बार हम अपने मनमुताबिक होली मनाएंगे. लेकिन आप लोगों ने देखा है न कि सासूमां होली से सप्ताहभर पहले खुद आ गईं और मोरचा संभाल लिया.’’

एक बार फिर सब की आह फिजां में फैल गई.

अब रागिनी ने बड़े दुखी स्वर में राग छेड़ा, ‘‘2-3 महीने पहले की बात है. मेरी ससुराल में दूर के रिश्ते की चाची का निधन हो गया. हमारी शादी को 14 साल हो गए हैं. मैं ने 1 बार भी उन्हें नहीं देखा. यहां तक कि वे किसी शादीब्याह में भी नहीं आती थीं. उन के परलोक गमन के बाद सासूमां का संदेशा आया कि हमारे यहां का रिवाज है कि किसी की मौत के बाद 10वीं तक घर में रोटी नहीं बनती. दालसब्जी में छौंक नहीं लगता. हलदीहींग भी नहीं डालते यानी उबला खाना खाते हैं.

मैं ने पति से कहा कि हम ये सारी रस्में कैसे निभा पाएंगे? फिर बच्चों को स्कूल के लिए लंच ले जाना होता है. वे क्या ले जाएंगे, क्या खाएंगे? लेकिन न सास मानीं, न पति. मैं ने जिद ठानी तो पति ने ऐलान किया कि ठीक है, तुम खाना मत बनाओ. मैं खुद बनाऊंगा. अब बताइए मैं क्या करती? यही नहीं हमारी ससुराल में 10वीं के दिन सिर मुड़ाने का रिवाज है. इन्होंने खुद का तो सिर मुड़वाया ही, 7 साल के बेटे का भी मुंडन करवा दिया. वह रोता रहा कि मुझे अपने बाल नहीं कटवाने… मुझे स्कूल में नाटक में भाग लेना है. उन्होंने उस की एक नहीं सुनी…’’

‘‘हाय रे बेचारा बच्चा,’’ सब के मुंह से निकला.

कुछ पलों के लिए वातावरण में सन्नाटा छा गया. फिर स्वीटी की स्वरलहरी हवा में तैरने लगी, ‘‘मेरी सास छोटे शहर में रहती हैं. शादी को 2 साल ही हुए हैं और मैं उन की हिदायतों से परेशान हो गई हूं. आप लोग जानती ही हैं कि मैं प्रैगनैंट हूं. वे वहीं से फोन कर कहती हैं कि शाम के समय बाहर न निकलूं. शाम में बुरा साया गर्भस्त शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है. मैं शाम को सैर करने के लिए तरस गई हूं.

‘‘न मैं किसी पार्टी में जा पाती हूं और न थिएटर या मौल में. पति शाम में आते हैं. वे बाहर ले जाना चाहते हैं, लेकिन इसी सोसायटी में रिश्ते की एक ननद रहती हैं. वे सासूमां को सारी इन्फौर्मेशन पहुंचा देती हैं और फिर सासूमां फोन पर मुझे डांटती हैं. पति की भी क्लास लगती है. इसलिए अब पति भी शाम के बाद कहीं नहीं ले जाते. अब तो किसी जरूरी चैकअप के लिए भी शाम में निकलने पर कांप जाती हूं कि न जाने सासूमां का कब कौन सा कहर टूट पड़े.’’

‘‘उफ,’’ एक तो प्रैगनैंट, उस पर सारा दिन घर में अकेली और शाम को दूर बैठी सास मिसाइल दागना शुरू कर देती हैं. लेकिन चारा क्या है.

1-1 कर सभी बहुएं अपनीअपनी मिसाइल रूपी सास का गुणगान करती गईं और साथ ही आह, ओह, हाय, उफ के साथ संवेदनशील खुसुरफुसुर भी करती रहीं. मीटिंग थी कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी और न ही कोई हल निकल पा रहा था.

अनीता भाभी बड़ी देर से सिर पर हाथ रख कर कुछ सोच रही थीं. तीर मारने वाले अंदाज में उठीं और बड़े जोश में हवा में हाथ लहरा कर बोलीं, ‘‘लेकिन हमारे पति तो अपनी मां को समझा सकते हैं न… अगर वे लोग उन्हें समझाएं तभी कुछ बात बने… चुगली करने वाले रिश्तेदारों को भी पाठ पढ़ाना पड़ेगा…’’

अभी वो कुछ और कहना चाहती थीं कि अचानक लेकिन कहतेकहते रुक गईं और मुख्य दरवाजे की ओर इशारा करने लगीं.

सब ने देखा सलोनी मिश्रा की सास अचानक प्रकट हो गई थीं. भारीभरकम डीलडौल, भराभरा गोलमटोल चेहरा, मोटीमोटी काली आंखें… हरदम अपने साथ छाता रखतीं, हर मौसम में. उस छाते को उन्होंने मिसेज अग्रवाल की ओर ऐसे ताना जैसे मिसाल छोड़ रही हों, ‘‘अरे ओ मैडम, सलोनी कहां है, बताएंगी? इतनी भीड़ में कहां खोजूं उसे… हम इतनी दूर से आए हैं और वह हम से आंखमिचौली खेल रही है… और तुम लोग यहां एकसाथ क्यों जमा हुई हैं. कोई साजिश रच रही हैं क्या? चलोचलो… कोई कामधाम है या नहीं?’’

सलोनी को ढूंढ़ती उन की आंखें ऐसे बाहर निकली जा रही थीं जैसे सब को खा जाएंगी. सलोनी ने तेजी से उठ कर सासूमां के पैर छुए और उन के साथ ही निकल गई.

मीटिंग में जैसे भूचाल आ गया हो. अब गु्रप में बंट कर बहुएं खुसुरफुसुर करने लगी थीं… मिसेज अग्रवाल कब कहां गायब हो गई किसी को पता ही नहीं चला. एक मिसाइल ही सब पर भारी पड़ गया.

मुगल शहंशाह, मोदी बादशाह!

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी क्या एक नया इतिहास रच रहे हैं – अगर उनके सवा 8 वर्षों के कार्यकाल पर दृष्टि फेरें तो देखते हैं कि देश को नए संसद भवन के अलावा उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशालतम प्रतिमा की स्थापना करवा यह संकेत दिया है. अब सेंट्रल विस्टा और राजपथ से कर्तव्य पथ उसके दो अन्य आयाम हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की बहुप्रतीक्षित सेंट्रल विस्टा 8 अगस्त को देश को समर्पित किया गया है . दरअसल, नरेंद्र मोदी के संपूर्ण कार्य व्यवहार और मानसिकता को देखते हुए कहा जा सकता है – नरेंद्र मोदी भारत जैसे लगभग 130 करोड़ की विशाल जनसंख्या जैसे विकासशील देश के प्रधानमंत्री नहीं, मानो एक मुगल शहंशाह जैसे हैं.

इतिहास में मुगल बादशाह और शहंशाह भी देश की जनता के दुख त्रासदी से परे कभी लाल किला बनवाया करते तो कभी ताजमहल, और कभी कोई मुगल बाग बगीचा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी से क्षमा याचना के साथ, इस आलेख में यह कहना चाहता हूं कि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री महोदय, आपका मिजाज भी मुगल शहंशाह शाहजहां जैसा है जो जनता की समस्याओं और भूख की लड़ाई के बीच रास्ते पर छोड़ कर के अपनी खुशी और महत्वाकांक्षा के लिए ताजमहल बनवाने में लगे रहे. आप के कार्यकाल को भी अगर हम देखें तो पाते हैं कि आपने जब से सत्ता संभाली है जनता के दुख की अपेक्षा कुछ ऐसा निर्माण करते रहते हैं जिससे आने वाले समय में लोग आपको याद रखें कि माननीय नरेंद्र मोदी ने देखो यह बनवाया था, आप अमर हो जाना चाहते हैं. आपकी सिर्फ एक यही इच्छा है कि लोग आपको कभी न भूलें. यही कारण है कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशालकाय मूर्ति से लेकर अपने नाम पर आपने स्टेडियम भी बनवा लिया है और नियम कायदे से परे देश के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से उद्घाटन भी करवाया है. आप नित्य राजाओं, बादशाहों जैसे नए निर्माण कराने और सैर सपाटे में अभिरुचि रखते हैं और चाहते हैं कि कुछ ऐसी चीजें बन जाए कि आने वाली पुश्ते आपको कभी भुला ना सकें.

यही कारण है कि आपने देश की जनता पर नोट बंदी थोप दी. आपने नया संसद भवन जिसकी कभी कोई मांग ही नहीं की गई थी बनाने में जुट गए हैं. इस सब की जगह अगर आम जनता को आप खुशियां दे सकें उन्हें महंगाई और बेरोजगारी से थोड़ी भी राहत दे सकें तो क्या अच्छा नहीं होगा.

सेंट्रल विस्टा और कर्तव्य पथ

देश की जनता का करोड़ों रुपए खर्च करके सेंट्रल विस्टा आपने बनवाया और अपने नाम एक बार फिर पहले जैसी उपलब्धि दर्ज कराई है. आपने राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया है. ऐसा प्रतीत होता है कि सरदार वल्लभभाई पटेल की विशाल प्रतिमा बनवाने और देश को नई संसद देने के उपलब्धि के रूप में देश की जनता पता नहीं याद करेगी कि नहीं मगर शहरों और रास्ते के नाम बदलने वाले प्रधानमंत्री के रूप में आपका नाम सदैव याद किया जाएगा.

आइए! आपको बताते चलें कि सेंट्रल विष्टा निर्माण के आगे पीछे का सच क्या है.

20 महीने बाद 9 सितंबर से इंडिया गेट और उसके आस-पास का इलाका आम जनता के लिए खुलने वाला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार 8 सितंबर की शाम विजय चौक से इंडिया गेट तक के खंड का उद्घाटन किया, इस खंड को सेंट्रल विस्टा एवेन्यू नाम दिया गया है .

उद्घाटन के दिन जनता को इंडिया गेट से मान सिंह रोड तक जाने की इजाजत नहीं थी. मगर हां, वहां कई सारी नई सुविधाएं विकसित की गई हैं. साथ ही नए प्रतिबंध भी लगाए गए हैं.

पहले इंडिया गेट के पास घास पर बैठकर आम लोग पिकनिक यानी खुशियां मनाया करते थे. अब इस तरह की गतिविधियों की अनुमति नहीं होगी. यानी अब लोग इंडिया गेट के पास घास पर बैठकर पिकनिक नहीं मना सकते. अगर आप पिकनिक मनाने बैठ जाए तो पुलिस वाले डंडे लेकर आपके पीछे होंगे.

दरअसल,नई सुविधाओं को नुकसान से बचाने और चोरी जैसी घटनाओं को रोकने के लिए वहां करीब लगभग 80 सुरक्षा गार्ड मौजूद रहेंगे.

मजे की बात आपको बताते चलें की लुई किंग्सवे से देश की आजादी के बाद राजपथ और अब कर्तव्य पथ यानी 100 साल में तीन नाम, का यह तमाशा हमेशा याद रखा जाएगा और दिल्ली आने वाले पर्यटकों को आने वाले समय में गाइड यह फलसफा हंसकर बताएंगे.

यही नहीं, आने वाले लोगों के लिए आइसक्रीम खाने और बेचने की जगह भी तय कर दी गई है. सेंट्रल विस्टा एवेन्यू में आठ वेंडिंग प्लाजा बनाए गए हैं जहां आइसक्रीम विक्रेता और दूसरे वेंडर अपना सामान बेच सकेंगे. इससे पहले शाम के समय पूरे राजपथ पर आइसक्रीम की बिक्री होती थी.अब आइसक्रीम गाड़ियों को केवल वेंडिंग जोन में ही अनुमति होगी.

कुल मिलाकर – अब राजपथ से कर्तव्य पथ, रेस कोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग, जॉर्ज पंचम की जगह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस. यही है नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का भारत .

बारिश का एक दिन…

कहीं मुस्कुराता, कहीं गीत गाता
कहीं चहचहाता, कहीं बल खाता
अपनी ही धुन में गुनगुनाता, बारिश का एक दिन-
बारिश का एक दिन…

कहीं बच्चों सा हँसता, कहीं यौवन सा खिलखिलाता
कहीं रूठों को मनाता, कहीं नई फसल सा लहलहाता
आसमाँ की बलन्दी को छूता, बारिश का एक दिन-
बारिश का एक दिन…

कहीं गर्म पकौड़ी खाता, कहीं कुल्हड़ की चाय पीता
कहीं चूल्हे का रस लेता, कहीं ऐशवर्य की मदिरा पीता
पेट की अग्नि के लिए कर्म करता, बारिश का एक दिन-
बारिश का एक दिन…

कहीं खेतों की मेड़ रौंदता, कहीं गड्ढ़ों को डबडबाता
कहीं बाँध को तोड़ता, कहीं बिजली को कौंधाता
शहरों की भागमभाग रफ्तार को रोकता, बारिश का एक दिन-
बारिश का एक दिन…

हे! प्रभु इतनी कृपा करो
बारिश ऐसी दो, दया करो-
हर बालक कान्हा सा उल्लसित हो, हर बालिका राधा मयूरी हो
हर नायक में राम सी चितवन हो, हर नायिका में सीता सा समर्पण हो
हर माँ पार्वती सी पुलकित हो, हर पिता शिव सा नटराजन हो

हर खेत बारिश से झूम उठे, हर नदी जीवन संचार करे
हर बदरी में इन्द्रधनुष रहे, जनजीवन सरल प्रवाह रहे
हर घर सुख से भरा रहे, तन स्वस्थ रहे, मन तृप्त रहे

जीवन फूलों सा मुस्कुराता रहे, भंवरों सा गीत गाता रहे
चिड़ियों सा चहचहाता रहे, सर्पों सा बल खाता रहे
“सरिता” का हृदय आज बच्चा है, सपना उसका यह सच्चा रहे
सब शुभ मंगल और अच्छा रहे, आशीष रहे, आशीष रहे.

वनराज के साथ अनुपमा ने निभाई दादा-दादी की रस्म, फैंस ने किया ट्रोल

टीवी सीरियल अनुपमा में लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में दिखाया जा रहा है कि शाह हाउस में किंजल की बेटी का धूमधाम से स्वागत किया जा रहा है. शाह परिवार के साथ इस खुशी को सेलिब्रेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है.

शो में आपने देखा कि वनराज-अनुपमा दादा-दादी बनने पर सारे गिले-शिकवे भूलाकर खुशियां मनाते नजर आ रहे हैं. इस दौरान सभी काफी खुश दिखे तो वहीं शाह परिवार ने नन्ही परी का रस्म के साथ स्वागत कर रही है.

 

इस दौरान एक रस्म है जिसमे परिवार के लोग झूले में नन्ही परी को गोद में लेकर बैठते हैं. तब बा कहती है कि दादा-दादी अब पोती को लेकर झूले में बैठेंगे. अनुपमा फिर वनराज के साथ झूले में बैठती है.

 

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तो दूसरी तरफ इस अनुज वीडियो कॉल पर यह सब देखता है और वह काफी डिस्टर्ब हो जाता है भले ही वीडियो कॉल के जरिए वह ज्यादा रिएक्ट नहीं करता, लेकिन इसके बाद जब बरखा और अंकुश आते हैं उसे भड़काने तो वह काफी भड़क जाता है. और उसे बार-बार वनराज-अनुपमा का साथ होना याद आता है.

 

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तो अब वहीं अनुज के फैंस भी इस सीन को देखकर भड़क गए हैं. और इस सीन को लेकर शो के मेंकर्स को ट्रोल कर रहे हैं. फैंस का कहना है कि अनुपमा वहां वनराज के साथ अनुज को घर पर अकेला छोड़कर दादी बनने की खुशी मना रही हैं.

 

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GHKKPM: विराट से अपना बच्चा वापस मांगेगी सई! आएगा ये ट्विस्ट

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी में लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो के मेंकर्स कहानी में कुछ न कुछ ट्विस्ट डालते रहते हैं, जिससे फैंस का इंटरेस्ट बना रहे. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि सई-विराट एक-दूसरे को देखकर हैरान हो जाते हैं. विराट गुस्से में वहां से विनायक को लेकर निकल जाता है. वह सोचता है कि सई जिंदा होने के बावजूद भी वापस नहीं लौटी. तो वहीं दूसरी तरफ सई सोचती है कि इतने दिनों बाद मिलने का बाद भी विराट ने मुंह फेर लिया. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए जानते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में…

एक रिपोर्ट के मुताबिक सई विराट से विनायक को छीनने की कोशिश करेगी. दरअसल सई अभी तक यह मान रही थी कि एक्सीडेंट में वह अपना बेटा खो चुकी है. तो वहीं विराट को लग रहा था कि वह एक्सीडेंट में सई को खो चुका है.

 

तो वहीं सई को पता लगेगा कि विनायक विराट का बेटा है तो वह उसे धोखेबाज समझेगी. तो दूसरी तरफ विराट भी सवि को सई की बेटी समझकर उसे धोखेबाज समझ रहा है.

 

शो में आपने देखा कि विराट सई से विनायक का इलाज नहीं करवाता है. विनायक उससे पूछता है कि डॉक्टर आंटी को क्यों नहीं दिखाया तो विराट जवाब देता है कि वह सई से इलाज नहीं करवाएगा. विराट और सई की मुलाकात के बाद दोनों बच्चे भी कन्फ्यूज हो जाते हैं.

 

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बताया जा रहा है कि सई को ये पता चलेगा कि विराट ने किसी और से नहीं बल्कि पाखी से शादी की है. और विनायक उसका ही बेटा है तो वह अपने बच्चे को वापस लेने का फैसला लेगी.

धार्मिक कवच में रैपिस्ट

धर्म प्यार, सद्भावना, सदाचार, सहयोग सिखाता है, यह प्रचार हर तरह के प्रवचनों में सुना जा सकता है. अमेरिका में गन लौबी जो बंदूक रखने के संवैधानिक अधिकार की रक्षा में लगातार लगी है, धार्मिक स्थलों पर बंदूकों से की जा रही हत्याओं के बावजूद टस से मस नहीं हो रही और उसे अमेरिका के तरहतरह के चर्चों का खुला समर्थन मिल रहा है. कुछ ही धर्मप्रचारक ऐसे हैं जो कहते हैं कि न्याय करने का काम ईश्वर का है, जबकि ज्यादातर इस बात का समर्थन करते हैं कि उन की बाइबिल उन्हें धर्म की रक्षा करने के लिए अस्त्र रखने की इजाजत देती है और अब पिस्टल तो क्या, अगर औटोमैटिक राइफल भी रखी जाए तो भी वह धर्म सम्मत है.

यह तब है जब बाइबिल में विश्वास रखने वाले अकसर धर्मसभाओं में निहत्थों, निर्दोषों, बच्चों, औरतों, वृद्धों, अपाहिजों पर बेदर्दी से गोलियां चलाते रहे हैं. 5 अगस्त, 2012 को अमेरिका के विस्कौन्सिन राज्य में गोरे कट्टरवादी ने सिख गुरुद्वारे पर बंदूकों से हमला कर 7 को मार दिया, 4 घायल हुए. 13 अगस्त, 2016 को न्यूयौर्क में एक इमाम को मसजिद के सामने मार डाला गया.

24 सितंबर, 2017 को अमेरिका के टैनिसी राज्य में एक चैनल में एक औरत को मारा गया, कई घायल हुए. पिट्ससबर्ग में 27 अक्तूबर, 2018 को यहूदियों के चर्च में 11 लोगों को एक गनमैन ने मार दिया. 27 अप्रैल, 2019 को 19 साला युवक ने यहूदी सिनागौड में एक को मारा. दिसंबर 2019 को एक युवक ने फ्रीवे चर्च में 2 को गोलियों से निशाना बना डाला. 2015 में अमेरिका के साउथ कैरोलिना में मैथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च में प्रेयर करने आए लोगों पर एक युवक ने 70 गोलियां चला डालीं जिस में 9 की मृत्यु हो गई. 2017 में बैप्टिस्ट चर्च के अंदर और बाहर जाते हुए भक्तों पर एक पूजापाठी गोरे युवा ने 700 गोलियां चला कर 26 को मार डाला, 20 को घायल किया.

इस तरह के हर हादसे पर चर्च, गुरुद्वारे, मसजिद व ???…सोचगौडा…? के प्रचारकों ने शांति की अपील की, सद्भाव की बात की पर किसी ने यह नहीं कहा कि इस तरह की हत्याओं के लिए ईश्वर दोषी है जिस ने अपने ही भक्तों को गोलियां चलाने वाली बंदूकें दीं.

यह सब याद किया जा रहा है इसलिए कि जिन 15 लोगों को बिलकिस बानो के रेप व उस के बच्चों की हत्याओं के लिए बड़ी मुश्किल से आजीवन कैद की सजा अहमदाबाद के 2002 के दंगों के बाद मिली थी उन्हें इस अगस्त में छोड़ दिया गया और उन्हें छोड़ देने के बाद उन का भव्य स्वागत किया गया, लड्डू बांटे गए और भगवा समर्थक यह कहते नजर आए थे कि अपराधी संस्कारी हैं और 15 से 18 वर्ष की जेल के बाद छोडऩे पर कोई हानि नहीं हुई.

जो फोटो प्रकाशित हुए उस से साफ लगता है कि इन का 15 साल जेल में अच्छाखासा ख़याल रखा गया और सब हृष्टïपुष्ट थे. चेहरे चमक रहे थे. नतीजा यह है धर्म चाहे ईसाई हो, हिंदू हो, बौद्ध हो या इसलाम हिंसा का पाठ पढ़ाता है, हिंसा को समर्थन देता है.

धर्म का घर में शांति लाने में कोई योगदान नहीं होता. दहेज हत्याओं के अकसर सजायाफ्ता दोषी खासे पूजापाठी होते हैं. लडक़े की चाह में कन्या भ्रूणहत्या करने वाले धार्मिक आदेशों के तहत पिंडदान करने के वास्ते लडक़े का जन्म देने को एक औरत को बारबार गर्भवती होने को मजबूर करते हैं और अगर लड़की पैदा हुई तो उसे मार तक देते हैं.

धर्म आपस में शांति का पाठ पढ़ाता है, यह बिलकिस बानो के मामले ने एक बार फिर गलत साबित कर दिया है. 1947 के विभाजन के दौरान लाखों हत्याएं धर्म के कारण ही हुईं और आज तक परिवार उन का दर्द भोग रहे हैं. हिटलर ने धर्म के नाम पर यहूदियों को गैस चैंबरों में मारने के लिए बड़ेबड़े भवन बनवाए और लगभग 60 लाख निहत्थों, निर्दोषों को मार डाला. हिटलर के सारे अफसर अपने धर्म का कट्टर पालन करते थे. रूसी आज यूक्रेन में हत्याएं कर रहे हैं जबकि रूसी व यूक्रेनी दोनों और्थोडौक्स क्रिश्चियन हैं पर उन के मठ अलग हैं. ऐसे में फिर यह कैसा प्यार है जो धर्म सिखाता है.

मेरे घर में नौकरी करने वाली लड़की को अच्छा नहीं माना जाता है, क्या करूं?

सवाल

मैं 23 साल की लड़की हूं और पढ़ाई में भी काफी अच्छी हूं. मैं टीचर बनना चाहती हूं और फिलहाल घर पर ट्यूशन भी पढ़ाती हूं. लेकिन मेरी समस्या यह है कि हमारे घर में पढ़लिख कर नौकरी करने वाली लड़की को ज्यादा अच्छा नहीं माना जाता है.

मेरे मातापिता की सोच है कि लड़की तो पराई होती है. लिहाजा, उस की शादी करो और छुटकारा पाओ. उन की इस सोच से मेरे सपने दम तोड़ रहे हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

अपने सपनों को जिंदा रखें और उन्हें हकीकत में भी बदलें. आप के दकियानूसी घर वाले भी लड़कियों को बोझ समझते हैं और नहीं चाहते कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो कर गैरत की जिंदगी जिएं.

आप ट्यूशन के साथसाथ टीचर की नौकरी के फार्म भी भरती रहें. अच्छे से तैयारी करेंगी, तो सरकारी नौकरी मिल भी सकती है. तब तक किसी प्राइवेट स्कूल में नौकरी की कोशिश करें.

जितना जल्दी हो सके, बीऐड की डिगरी ले लें. इस से नौकरी मिलने में सहूलियत रहेगी. अगर आप आज घर वालों के दबाव में आएंगी, तो जिंदगीभर पछताती रहेंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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