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साथी : भाग 2

‘बेटा, तुम्हें तो खीर बहुत पसंद है न और लो थोड़ा सा,’ उन्होंने करीब आ कर कुछ इस तरह कहा कि कविता चौंक ही गई.

‘जी, आप को कैसे पता?’ कविता की जबान लड़खड़ा गई.

इस पर मां हंसीं, ‘अच्छा. मुझे कैसे पता? कपिल तुम्हें पिछले करीब 2 महीनों से जानता है न, समझ लो जितना वह तुम्हें जानता है उतना ही मैं भी जानती हूं.’

क्या बताया होगा कपिल ने अपनी मां को मेरे विषय में, कविता का दिल सोचने पर मजबूर हो गया.

शायद मांबेटे दोनों को एक ही सांचे में ढाला था, तभी तो कपिल की तरह उन्होंने भी उस से कोई ऐसी व्यक्तिगत बात नहीं पूछी जिस का जवाब देना उस के लिए कठिन हो. न ही यह पूछा कि वह कहां की रहने वाली है, घर में कौनकौन हैं, न यह कि शादीवादी हुई है या नहीं अब तक.

कविता की सोच का उस की उंगलियों की हरकत पर कोई असर नहीं पड़ा. उस की कौफी भी कपिल की कौफी के साथ खत्म हुई. गरम कौफी पी कर लगा, सचमुच इस की ही जरूरत थी उसे.

कपिल के साथसाथ कविता भी अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखतेदेखते उठ खड़ी हुई.

‘‘चलें,’’ दोनों हंस पड़े. उन के मुंह से एकसाथ ही निकला था यह शब्द.

‘‘चलिए, आज ही आप को अपने घर ले चलते हैं. इस समस्या का भी समाधान हो जाएगा और मां से मिलना भी. मां के दिल का भी अरमान पूरा हो जाएगा. जब देखो तब कहती रहती हैं, ‘कभी घर ले कर आ न कविता को. एक बार फिर उस से मिलने का बहुत दिल करता है मेरा,’ तो चलें?’’

चाह कर भी वह टाल न सकी कपिल के अनुरोध को और बोली, ‘‘लेकिन, एक शर्त पर, कपिल साहब, आप अपना वादा नहीं भूलेंगे.’’

‘‘कैसा वादा?’’ कपिल के चेहरे पर बनावटी अनभिज्ञता का आवरण था और होंठों पर एक शरारती मुसकान.

‘‘कैसा वादा? आप इतनी जल्दी कैसे मुकर सकते हैं अपने वादे से?’’ कविता के स्वर में झंझलाहट थी.

‘‘याद है बाबा, मुझे सबकुछ याद है. अपना वादा भी. कुछ नहीं भूला मैं. कल से ही जुट जाऊंगा अपने मिशन पर और जल्दी ही एक अच्छे फ्लैट की चाबी आप के हाथ में दूंगा.’’

‘‘अच्छा, तो चलिए इसी बात पर एकएक कौफी और हो जाए,’’ कविता की बात पर कपिल एक बार फिर दिल खोल कर हंस पड़ा. कविता इतनी सहजता से मान जाएगी उस के प्रस्ताव को, कपिल ने तो सोचा भी नहीं था. शायद इस हंसी में वह खुशी भी शामिल थी.

और, कपिल की मां, उन की तो मानो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा जब उन्हें इस बात का पता चला कि कविता यहीं रहेगी.

‘‘बेटा, तुम तो बस आज, अभी कपिल के साथ जा कर होटल से अपना सारा सामान ले आओ यहां,’’ कितनी बेसब्र हो उठी थीं वे, ‘‘मैं आज कितनी खुश हूं, तुम दोनों सोच भी नहीं सकते.’’

कविता को आज पता चला कि कपिल जितनी तारीफ करता है अपनी मां की, वह कम है. उस की मां तो उस से भी कहीं ज्यादा अच्छी हैं. उन के अपार उत्साह को देख कर कपिल यह भी नहीं कह सका कि कविता कोई हमेशाहमेशा के लिए यहां रहने नहीं आई है. वह तो बस, कुछ दिनों के लिए यहां रहना चाहती है, कविता देख रही थी, एक अजीब ही उलझन थी कपिल के चेहरे पर.

‘‘आज नहीं मां, कल. कल संडे भी है, हम दोनों फ्री भी रहेंगे,’’ कहने के साथ ही कपिल ने कविता की ओर देखा मानो उस की भी सहमति चाहता हो.

‘‘हां मां, कपिल ठीक कह रहे हैं,’’ कविता के कहते ही सुनंदा अचानक चौंक गईं. उस के मुंह से अनजाने में ही उन के लिए ‘मां’ शब्द निकल गया था. उसे न जाने उन में ऐसा क्या दिखा जो वह उन की तुलना अपनी मां से करने लगी.

‘‘तुम्हारे मुंह से ‘मां’ शब्द का संबोधन सुन कर बहुत अच्छा लगा. चलो, अब मां कहा है तो उस का मान भी रख लो. आज यहीं ठहर जाओ, मां के पास. साथ रहेंगे, इकट्ठे खाएंगेपीएंगे. ढेर सारी बातें करेंगे. आओ, मैं तुम्हें तुम्हारा कमरा भी दिखा दूं,’’ सुनंदा बहुत खुश थीं. मानो बरसों बाद उन्हें खुश होने का मौका मिला हो.

कपिल भी कविता को मां के हवाले कर मानो निश्ंिचत हो गया हो. वह उन्हें जाता देख बस, दूर से ही मुसकराता रहा.

‘‘बस, 10 मिनट, अभी आ कर चाय बनाती हूं,’’ कपिल को तसल्ली देती वे कविता के आगेआगे चल पड़ीं.

हवादार कमरा, कमरे से लगी बालकनी, बाहर का मनमोहक दृश्य. कविता ठिठक कर रह गई. कमरे में एकएक चीज करीने से संवार कर रखी गई थी मानो उस के आने की खबर उन्हें पहले से ही हो. वह तो अभी तक यह भी नहीं समझ पा रही थी कि यहां आने का उस का फैसला सही है या गलत.

‘‘क्या हुआ? ऐसे क्या देख रही हो? पसंद नहीं आई जगह?’’

‘‘नहीं तो, मैं तो बस.’’ कविता के शब्द होंठों के बीच लड़खड़ा कर रह गए.

‘‘बेटा, यह कमरा कपिल की बहन कोमल का है. तुम फ्रैश होना चाहो तो फ्रैश हो लो, जरूरत का सभी सामान मिल जाएगा यहां तुम्हें. मैं तब तक चाय बनाती हूं तुम दोनों के लिए,’’ कविता कुछ कहती, उस से पहले ही मां वापस जाने को मुड़ चुकी थीं.

आज की शाम में कुछ न कुछ खास बात तो अवश्य थी जो सभी खुश थे. कपिल, सुनंदा, कविता. सुनंदा के हाथों की बनी मठरी और बेसन के लड्डू खा कर तो बस, कविता का दिल ही भर आया. आज उसे अपनी मां की बहुत याद आई. कितनी समानता दिखी दोनों में. बचपन से ले कर आज तक के न जाने कितने पल पंख लगा उस के खयालों के इर्दगिर्द मंडराने लगे. एक मां ही तो थी जिस ने जिंदगी को देखने का नजरिया ही बदल डाला उस का. नहीं तो क्या वह कभी समाज से लड़ने का साहस जुटा पाती? उस दलदल से कभी निकल पाती? आज होती यहां जहां वह है? शायद नहीं.

प्लेट से पकौड़े उठातेउठाते कपिल ने अपनी मां को छेड़ा, ‘‘क्या बात है, मां, आज तो कविता के बहाने मेरी भी खातिरदारी हो रही है.’’

अपनी अपनी तैयारी : भाग 2

‘जी कहिए, बुरा मानने की क्या बात है. अब हम रिश्तेदार होने जा रहे हैं तो संकोच कैसा?’ पापा ने मुसकराते हुए कहा.

‘अब ये त्रिपाठीजी (प्रेरित के पापा) तो रिटायर हो गए हैं और आप के रिटायरमैंट में अभी वक्त है तो आफ्टर रिटायरमैंट आप लोगों ने क्या सोचा है?’

‘जी, मैं कुछ समझ नहीं?’ पापा ने कुछ चौंकते हुए से कहा.

‘मेरा मतलब है कि अब हमारे तो 2 बेटे हैं इसलिए हमें तो कोई चिंता नहीं है बुढ़ापे की, कभी इस के पास और कभी उस के पास रहेंगे. बस, इसी में जीवन कट जाएगा पर आप की तो एक ही बेटी है, सो रिटायरमैंट के बाद वृद्धावस्था में आप लोगों ने कहां रहने का प्लान बनाया है. यहीं इंदौर में या बेटी के पास?’ प्रेरित की मम्मी के इस प्रश्न को सुन कर मम्मीपापा ही नहीं, मैं और प्रेरित भी बुरी तरह चौंक गए थे. कुछ देर बाद मुझे समझ आया कि प्रेरित के मम्मीपापा घुमाफिरा कर जानना चाह रहे थे कि विवाह के बाद मेरे मम्मीपापा की जिम्मेदारी कहीं उन के लाड़ले बेटे को न उठानी पड़ जाए. अपनी मम्मी के इस बेतुके प्रश्न पर प्रेरित का चुप रह जाना मुझे अखर गया और उन के इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जैसे ही मैं ने अपना मुंह खोलना चाहा था कि मेरी मां ने आंख के इशारे से मुझे रोक दिया था.

‘मां खुद बड़े ही शांतभाव से बोलीं, ‘जी देखिए, पहले तो अभी तो हम ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं है, पर हां, उम्मीद करता हूं कि जीवन के अंतिम दिनों तक हम इतना फिट रहें कि हमें किसी का मुंह न देखना पड़े. फिर आज के जमाने में नौकरीपेशा लोगों के लिए बेटा और बेटी में फर्क ही कहां रह गया है क्योंकि दोनों ही तो अपनी नौकरी पर चले जाते हैं. न आप का बेटा आप के पास रहेगा और न हमारी बेटी. हां, जरूरत पड़ने पर मेरी बेटी ही मेरा सबकुछ है और इसे हम ने पढ़ायालिखाया भी जीभर के है. तो, देखना तो इसे ही पड़ेगा. वैसे, आप निश्ंिचत रहें, हम दोनों ही इंदौरप्रेमी हैं और यहां से कहीं जाने वाले नहीं.’

मम्मी के इतने नपेतुले और संतुलित शब्दों में दिए गए उत्तर से मैं तो प्रभावित ही हो गई थी पर अकेले में प्रेरित से मिलते ही फट पड़ी थी, ‘‘यह सब क्या है, प्रेरित? आज के समय में जब जीवन के हर क्षेत्र में महिलाएं नितनई बुलंदियों के झंडे गाड़ रही हैं, मातापिता अपनी बेटियों को पढ़ानेलिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे तो ऐसे में इस तरह की बातें, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहीं. मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे पेरैंट्स इस प्रकार की सोच रखते हैं. जरूरत पड़ने पर मैं अपने मांपापा का सहारा नहीं बनूंगी तो कौन बनेगा. मैं पहले ही स्पष्ट किए देती हूं कि जिस तरह तुम्हारे मातापिता के लिए तुम ठीक हो वैसे ही अपने मातापिता के लिए मैं हूं, उन के लिए कुछ भी करने के लिए न मैं तुम्हें रोकूंगी और न ही मेरे मातापिता के लिए तुम मुझे रोकोगे और भविष्य में अपनेअपने मातापिता को हम खुद ही डील करेंगे. हां, जहां आवश्यकता होगी, हम एकदूसरे की मदद करेंगे.’

‘मुझे खुद इस बारे में कुछ पता नहीं था कि वे लोग कुछ दकियानूसी सोच वाले हैं. तुम जरा भी चिंता मत करो, बाद में सब ठीक हो जाएगा.’ यह कह कर प्रेरित ने मुझे उस समय बहला दिया था और इस के कुछ दिनों बाद ही मैं प्रेरित की दुलहन बन कर कानपुर आ गई थी. थोड़े से प्रयास से प्रेरित ने हम दोनों की पोस्ंिटग भी कानपुर ही करवा ली थी.

मेरे आने के बाद मांपापा अकेले हो गए थे लेकिन सब से अच्छी बात यह थी कि अपने जौब के अलावा दोनों ने ही गीतसंगीत, बागबानी और कुकिंग जैसे अनेक शौक पाल रखे थे, सो, दोनों ही बहुत व्यस्त रहते थे. इस के अलावा दोनों ही मौर्निंग वाक और व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल किए हुए थे. सो, फिजिकली भी वे बेहद फिट थे.

वहीं, प्रेरित के परिवार में इस सब से कोई लेनादेना नहीं था. सब देर तक सोते. यही नहीं, सभी कनपुरिया अंदाज में खाने के भी बहुत शौकीन थे और इसी सब का नतीजा था कि मम्मीजी और पापाजी दोनों ही बीपी, शुगर और ओबेसिटी के शिकार थे और आएदिन डाक्टर के यहां चक्कर लगाते थे. मैं अभी इस सब में ही उलझ थी कि बाथरूम के दरवाजे पर प्रेरित की आवाज आई, ‘‘तुम कर क्या रही हो, सुशीला दीदी पूरा काम कर के चली गईं, मैं औफिस के लिए रेडी हो गया और तुम हो कि नहाने में ही लगी हो. औफिस चलना है या नहीं?’’

‘‘अरे, समय का पता ही नहीं चला. बस, दो मिनट में आई,’’ कह कर मैं ने अपने नहाने व विचारों को बाइंडअप किया और बाहर आ कर फटाफट दोनों का टिफिन तैयार कर के नाश्ता टेबल पर लगा दिया और तैयार हो कर औफिस के लिए निकल पड़े. अभी मैं कार में बैठी ही थी कि मां का फोन आ गया. हम दोनों मां से बात कर सकें, इस के लिए मैं ने फोन स्पीकर पर डाल दिया.

‘‘कैसे हो बच्चो, तुम लोगों को एक गुड न्यूज देनी थी,’’ मां बोलीं.

‘‘हम लोग बिलकुल अच्छे हैं, मां. बस, अभी औफिस के लिए निकले ही हैं. कौन सी गुड न्यूज है, मां, जल्दी बताइए. आप पहले न्यूज बताया कीजिए, फिर और बातें किया कीजिए,’’ मैं ने आतुरता से मां से कहा.

‘‘अगले हफ्ते तेरे पापा का सीनियर सिटीजन क्लब की तरफ से सिक्किम में एक सैमिनार है. सो, हम दोनों ही जा रहे हैं. सैमिनार के बाद एक हफ्ते और रुक कर घूमेंगे, फिर वापस आएंगे. कल ही पता चला तो आज तुम्हें बता दिया.’’

‘‘वाऊ मां, यह तो सच में बहुत अच्छी न्यूज है. जाइएजाइए, खूब घूमिएगा और रोज मुझे पिक्स भेजिएगा. ठीक है, मां. अभी फोन रखती हूं. शाम को घर पहुंच कर बात करूंगी,’’ यह कह कर मैं ने फोन रख दिया. इस बीच प्रेरित बिलकुल शांत थे मानो मेरे मातापिता की अपने मातापिता से तुलना कर रहे हों.

मैं प्रेरित से कुछ बोल पाती, इस से पहले ही कार पार्किंग में लग चुकी थी. मैं और प्रेरित दोनों ही एकदूसरे को बाय कह कर अपनीअपनी केबिन की तरफ बढ़ गए थे. औफिस के कामों में जो हम उलझे तो शाम को 7 बजे ही मिले. वापस आते समय शरीर और मन इतना अधिक थक जाता है कि हम दोनों आमतौर पर शांत ही रहते हैं. घर आ कर डिनर कर के जो बैड पर लेटी तो कुछ अधूरे पन्ने फिर फड़फड़ाने लगे थे.

‘पूर्णशिक्षित होने के बाद भी प्रेरित के मम्मीपापा, बेटाबेटी के फर्क से जरा भी अछूते नहीं थे. बेटे के विवाह में खासे दानदहेज की भी उम्मीद थी उन्हें लेकिन प्रेरित की पसंद ने उन के अरमानों पर पानी फेर दिया था क्योंकि मैं और मम्मी दोनों ही दहेज की सख्त विरोधी थीं और मम्मी ने शुरू में ही स्पष्ट शब्दों में कह दिया था-

‘देखिए बहनजी, हम अपनी बेटी के विवाह में न तो दहेज देंगे और न ही हम उस का कन्यादान करेंगे.’

‘अरेअरे, यह क्या कह रहीं हैं आप, ऐसे विवाह में दहेज की तो हम भी उम्मीद नहीं करते लेकिन कन्यादान तो एक जरूरी रस्म है जिसे हर लड़की के मातापिता करते हैं ताकि उन्हें पुण्य प्राप्त हो सके. क्या आप उस पुण्य को प्राप्त नहीं करना चाहेंगे?’ प्रेरित के मम्मीपापा ने कहा.

‘मेरी बेटी कोई दान की वस्तु नहीं है जो मैं कन्यादान की रस्म करूं. मेरी बेटी हमारे घर की शान, हमारा अभिमान और गरूर है. हमारी बेटी ने हमें मातापिता होने का गौरव प्रदान किया है. कोई अपने गरूर और गौरव का दान करता है भला. कन्यादान की जगह हम प्रेरित और प्रेरणा को एकदूसरे का हाथ सौंप कर पाणिग्रहण संस्कार करेंगे क्योंकि विवाह के बाद जीवन के समस्त उत्तरदायित्वों का निर्वहन इन्हें एकसाथ मिल कर करना है.’

मेरी मम्मी की इतनी तर्कपूर्ण बातें सुन कर प्रेरित के मम्मीपापा शांत हो गए थे और यही कारण था जिस से वे हमारे विवाह को राजी तो हो गए थे पर उतने खुश नहीं थे क्योंकि विवाह के बाद जब प्रेरित की ताईजी ने प्रेरित की मम्मी से पूछा, ‘बहू तो बढि़या है पर दानदहेज में क्याक्या मिला, वह भी दिखाओ या उसे सात परदों में रखने का विचार है.’

‘अरे जिज्जी, कैसी बातें करती हो. जो मिला, सो आप के सामने है. आप की जानकारी के लिए बता दें कि बहुरिया और उस के मम्मीपापा दानदहेज के सख्त विरोधी हैं,’ प्रेरित की मम्मी ने मेरी तरफ इशारा कर के निराशाभरे स्वर में कहा था.

आरोही : विज्ञान पर भरोसा करती एक डॉक्टर की कहानी – भाग 2

“बस भी करो आरोही, मैं तो तुम्हें खुश करने के लिए तुम्हारे साथ चल देता था. मुझे पहले भी यहांवहां भटकना पसंद नहीं था.”

“शायद, तुम्हें याद भी नहीं है कि आज मेरा बर्थडे है. सुबह से मैं तुम्हारे मुंह से ‘हैप्पी बर्थडे’ सुनने का इंतजार कर रही थी लेकिन छोड़ो, जब तुम्हें कोई इंटरैस्ट नहीं तो अकेला चना कहां तक भाड़ झोंकता रहेगा,” कहती हुई उस ने तेजी से कमरे के दरवाजे को बंद किया और लिफ्ट के अंदर चली गई. आंखों से आंसू बह निकले थे. उस ने अपने आंसू पोंछे और लिफ्ट से बाहर आ कर सोचने लगी कि अब वह कहां जाए?

तभी उस का मोबाइल बज उठा था. उधर उस की बहन अवनी थी, “हैप्पी बर्थडे दी… जीजू को आप का बर्थडे याद था कि नहीं?”

“उन के यहां यह सब चोंचले नहीं होते,” कह कर वह हंस दी.

“दी, क्या सारे आदमी एक ही तरह के होते हैं? यहां रिषभ का भी यही हाल है… उसे भी कुछ नहीं याद रहता… इस बार तो ऐनिवर्सरी भी मैं ने ही याद दिलाई तो महाशय को याद आई थी.”

वह जानती थी कि रिषभ इन सब बातों का कितना खयाल रखता है. आज सुबह सब से पहला फोन उसी का आया था. अवनी केवल उस का मूड अच्छा करने के लिए उसे बहलाने के लिए कह रही थी. वह थोड़ी देर तक सोसायटी के लौन में वौक करतेकरते बहन से बात करती रही फिर घर लौट आई.

डिनर का टाइम हो रहा था. श्यामा उन्हें देखते ही बोली,”मैडम, खाना लगाऊं?”

“चलो, मैं हाथ धो कर किचन में आती हूं.”

“सर ने कहा है कि आज सब लोग साथ में खाएंगे.”

अविरल अभी भी अपने फोन पर गेम खेल रहे थे. उसे उन का गेम खेलते देख मूड खराब हो जाता था. वह रातदिन काम करकर के परेशान रहती है और इन साहब को इतनी फुरसत रहती है कि बैठ कर गेम खेल रहे हैं. उन का कहना है कि गेम खेल कर अपना स्ट्रैस कम करता हूं. उसे भी अपनेआप को कंट्रोल करना चाहिए. उसे रिलैक्स करने के लिए बाहर जा कर शौपिंग करना या आइसक्रीम खाना पसंद है.

उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई थी. तब तक मांजी डाइनिंग टेबल पर बैठ चुकी थीं. श्यामा ने भी खाना लगा दिया था. उस ने डोंगा खोला तो छोला देख उस के मुंह में पानी आ गया था, “ओह आज कुछ खास बात है क्या?”

“मैडम, सर ने आज कुछ स्पैशल बनाने के लिए बोला था. आज मूंगदाल का हलवा भी बना है.”

मूंग दाल का हलवा हमेशा से उस का फेवरिट रहा है.

“मेरे तो मुंह में पानी आ रहा है, अवि जल्दी आओ प्लीज…” अविरल फोन पर किसी से बात कर रहा था.

मांजी ने उस के माथे पर हाथ रखा और उस के हाथ पर अंगूठी का डब्बा रख दिया,”हैप्पी बर्थडे आरोही,” यह अविरल अपनी पसंद से लाया है.”

वह जानती थी कि यह काम अकेली मांजी का है, अविरल का दिमाग इन सब में चलता ही नहीं है, लेकिन उन के चेहरे की मंदमंद मुसकान देख उसे उन पर बहुत प्यार आ रहा था.

वह मुसकरा कर बोले,”सुबह जब मैं फ्रैश हो कर इधर आया तुम अस्पताल जा चुकी थीं. इसलिए मैं ने यह सरप्राइज प्लान कर लिया. कैसा लगा डा. आरोही, मेरा सरप्राइज?”

“ओह अविरल, यू आर वैरी क्यूट.”

वह खाना सर्व ही कर रही थी कि
तभी कौलबेल की आवाज हुई. मामाजी रोनी सी सूरत बना कर आए. माहौल बदल चुका था वह अपने हाथ में एक फाइल लिए हुए थे, “मैं ने कहा मेरी आरोही बहू इतनी बड़ी डाक्टरनी है. पहले उसे दिखाएंगे…” सब की निगाहें उस पर अटकी हुई थीं.

“लो, यह प्रसाद…माता वैष्णव देवी के प्रसाद से तुम्हारी मामी अब जल्दी ठीक हो जाएंगी. मुझे सपना आया था कि तुम हर महीने दर्शन करने जाओगे तो तुम्हारी पत्नी एकदम ठीक हो जाएंगी. मैं महीने में 1-2 बार तो हो आया. एक बार तो तुम्हारी मामी को भी ले गया था और उन्हें भी दर्शन करवा लाया. माता रानी की जरूर कृपा होगी और तुम्हारी मामी अब जल्दी ठीक हो जाएंगी,” उन्होंने सब को अलगअलग हाथों में प्रसाद दिया. आरोही के हाथ में उन्होंने फाइल भी पकड़ा दी थी.

“मामाजी, आप भी खाना खा लीजिए.”

“अरे डाक्टर बहू, तुम खाने की बात कर कही हो, यहां मेरी सांसें रुकी जा रही हैं.”

मजबूरन उस ने फाइल हाथ में ले ली, सरसरी निगाहों से देखा फिर बोली,”डाक्टर मयंक ने बायोप्सी के लिए लिखा है तो आप को सब से पहले बायोप्सी करवानी पड़ेगी.”

“बहू, तुम समझती क्यों नहीं, उन्हें दर्दवर्द बिलकुल नहीं है. तुम तो बेमतलब की बात कर रही हो. काटापीटी होगी तो बीमारी बढ़ नहीं जाएगी?”

वह पहले भी कई बार स्पष्ट रूप से सब से कह चुकी थी कि वह हार्ट की डाक्टर है, कैंसर के बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन मामाजी तो बस बारबार बहूबहू कर के पीछे पड़ कर रह गए हैं.

उस ने फाइल पकड़ाते हुए कहा,”बायोप्सी जरूरी है. यह आवश्यक नहीं कि कैंसर ही हो…फैब्रौएड भी हो सकता है. वह औपरेट कर के आसानी से निकाल दिया जाएगा.”

“अरे बहू, तुम तो इतनी बड़ी डाक्टर हो, कुछ और इलाज बता दो, औपरेशन न करवाना पड़े.”

यह पहली बार नहीं था. कभी मामाजी तो कभी मौसाजी, तो कभी कोई अंकल हर 8-10 दिनों बाद कोई न कोई समस्या ले कर आ खड़े होते.
मामाजी उस के लिए मुसीबत ही खड़ी कर रखी है. एक ही बात, कभी कहते कि फलां वैद्य का इलाज चल रहा है, मैं कहता था न कि अब गांठ एकदम छोटी हो गई है. तो कभी कहते कि वैद्यजी सही कह रहे थे कि डाक्टर तो बस अपना धंधा चलाते हैं. देखिएगा, मैं शर्तिया 15 दिनों में ठीक कर दूंगा. वह उस की ओर व्यंगभरी नजरों से देख कर कह रहे थे.

कुछ दिनों बाद पता लगा था कि अब कोई हकीम का इलाज कर रहे हैं और बहुत फायदा है. खुश हो कर आए थे.
स्वयं ही खबर दे गए थे. कभी किसी नैचुरोपैथी के कैंप में 10 दिनों के लिए गए थे, लेकिन वहां के इलाज से घबरा कर 3 दिनों में ही भाग कर आ गए थे. फिर कुछ दिनों तक होमियोपैथी का इलाज करने के बाद उस के पास फिर से आए तो उस ने कैंसर स्पैशलिस्ट डाक्टर मयंक के पास भेज दिया तो उन्होंने बायोप्सी करवाने को कहा तो वह फिर उस को परेशान करने के लिए आ गए थे. उस का मन तो कर रहा था कि मामाजी को डांट कर घर से बाहर कर दे और फाइल उठा कर फेंक दे लेकिन खुद को कंट्रोल करते हुए वह अपने कमरे में आ गई और अपनी मेल चैक करने लगी.

अब कुछ दिनों से वह मैडिकल कालेज में लैक्चर के लिए बुलाई जाती है. सर्जरी के क्षेत्र में अब वह पहचानी जाने लगी है. अपने स्टूडैंट टाइम से वह टौपर रही थी, हमेशा मेहनती छात्रा रही थी. एमएस में वह गोल्ड मैडलिस्ट रही थी. वह अपने अतीत में विचरण करने लगी…

जब वह 28 साल की हो गई तो शादी के लिए पेरैंट्स के दबाव के साथसाथ वह भी अपने अकेलेपन से ऊब चुकी थी. जब उसे कोई डाक्टर मैच समझ नहीं आ रहा था तो मैट्रिमोनियल साइट्स पर ढूंढ़ते हुए अविरल का बायोडाटा उसे पसंद आया था. अविरल आईटी के साथ आईएमएम से एमबीए थे. वे मल्टीनैशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर थे.

उस ने उन के साथ चैटिंग शुरू कर दी थी. कुछ दिनों की चैटिंग के बाद मिलनाजुलना शुरू हो गया. अविरल मुंबई में पोस्टेड थे और वह भी मुंबई में ही जौब कर रही थी, इसलिए उसे वहीं रहने वाला जीवनसाथी चाहिए था. सबकुछ ठीकठाक लग रहा था. बस, दूसरी जाति के कारण वह मन ही मन हिचक रही थी.

3 महीने तक मिलनेजुलने के बाद दोनों ने अपने पेरैंट्स को बता दिया, फिर धूमधाम से उन दोनों की रिंग सेरेमनी तो हो गई लेकिन चूंकि लगातार उस की सर्जरी की डेट फिक्स थी इसलिए वह शादी नहीं कर पा रही थी क्योंकि वह शादी को ऐंजौय करने के लिए हनीमून पर यूरोप जाना चाहती थी. लगभग 4 महीने के लंबे इंतजार के बाद दोनों की धूमधाम से शादी हो गई थी.

उस के ससुराल पक्ष के सारे रिश्तेदार चाचा, ताऊ, बुआ या फिर मामा आदि सब आसपास ही रहते थे. चूंकि बड़ा परिवार था इसलिए रोज ही कहीं न कहीं बर्थडे, ऐनिवर्सरी जैसे फंक्शन में जाना पड़ता था.

मांजी कहतीं,”बहू, साड़ी में तुम ज्यादा अच्छी लगती हो. गले में हार तो पहन लो…”

अविरल भी कहता कि साङी तुम पर बहुत जंचती है और वह उन लोगों की बातों में आ कर शुरूशुरू में साड़ी पहन कर तैयार हो जाती. लेकिन वहां पर तो वह सब के लिए फ्री की डाक्टर आरोही थी.

2-4 लोग अपनीअपनी बीमारियों के लिए दवा लिखवाने के लिए हाजिर ही रहते. वह परेशान हो कर रह जाती क्योंकि वह जनरल फीजिशियन तो थी नहीं कि हर मर्ज की दवा लिखती लेकिन कोशिश कर के कुछ लिख देती. कोई किडनी को ले कर परेशान है तो कोई लिवर से तो किसी को बच्चा नहीं हो रहा है तो आरोही से उम्मीद करते कि वह ऐसी दवा दे दे, जिस से वह प्रैगनैंट हो जाएं.

उन लोगों की बातें सुन कर उसे बहुत कोफ्त होती और यदि परहेज बताओ तो करना नहीं. यहांवहां किसी से पूछ कर दवा बता भी दो तो वे लोग शिकायत ले कर आ जाते कि बहूरानी तुम ने जाने कैसी दवा दे दी मुझे. इस तरह की रोजरोज की बातों से वह परेशान हो चुकी थी.

शादी के 2 साल तक वह किसी तरह से रिश्तेदारों को झेलती रही थी फिर अविरल से उस ने साफसाफ कह दिया कि इस तरह से मेरी स्थिति बहुत खराब हो जाती है. मैं हर मर्ज की दवा नहीं बता सकती. लेकिन वह भी अक्ल का कच्चा था,”डाक्टर हो तो इन छोटीमोटी बीमारियों में भला क्या सोचना… वह लोग तो तुम्हारी इतनी इज्जत करते हैं… कोई भाभी, कोई मामी सब कितना तुम्हें प्यार करते हैं…” वह मन ही मन कुड़कुड़ाई थी कि अविरल को जरा भी अक्ल नहीं है. वह सब प्यार का दिखावा कर के अपना मतलब साधते हैं. उस ने परेशान हो कर इस तरह की रिश्तेदारियां निभाना बंद कर दिया था.

जब भी कहीं कोई फंक्शन के लिए फोन आता वह अस्पताल में काम की व्यस्तता का बहाना बता देती और फिर अविरल का मूड खराब हो जाता. मांजी का भी मिजाज बिगड़ा रहता. वह अपना ज्यादा समय अस्पताल में बिता कर आती. जो ढंग से बोलता उस से बोल लेती नहीं तो अपना काम कर के गुड नाइट… कह देती. दोनों के बीच मूक समझौता हो गया था. तुम मेरे घर वालों के यहां नहीं जाओगी तो मैं तुम्हारे घर वालों के यहां भी नहीं जाऊंगा.

अविरल ने उस के बैंक अकाउंट में ताकझांक करना शुरू किया तो उस ने इशारोंइशारों में कह दिया कि मैं तो अपना अकाउंट खुद संभाल लेती हूं. यदि जरूरत पड़ी तो जरूर तुम्हारी मदद लूंगी. अविरल का मुंह बन गया था लेकिन उसे परवाह नहीं थी क्योंकि यदि वह साफसाफ न कहती तो वह उस के पैसे पर अधिकार जमाने लगता. वह उसे पसंद नहीं…
उस का और अविरल की पसंद में जमीनआसमान का अंतर था. उसे सुबहसुबह धीमी आवाज में संगीत सुनना पसंद था.

वह तुरंत बोलता,”तुम्हें शांति से रहना पसंद नहीं है. सुबह से ही शोर शुरू कर देती हो. यहां तक कि वह कई बार जा कर बंद कर देता.

वह सुबह वाकिंग पर जाना पसंद करती, लेकिन अविरल को सुबह देर तक बिस्तर पर लेटे रहना पसंद था. नाश्ते में यदि वह इडली खाती तो वह औमलेट. मांजी चीला पसंद करतीं. इसी तरह से खाने में वह चटपटा खाना पसंद करती तो उन लोगों को प्याजलहसुन वाला खाना चाहिए होता जबकि वह बहुत कोशिश कर के भी लहसुन और प्याज की सब्जियां नहीं खा पाती. वह हर तरह से इस परिवार के साथ ऐडजस्ट करने की कोशिश कर रही थी.

अविरल पति बनने के बाद उस पर बातबेबात रौब गांठने की कोशिश करने लगा था. वह रात में पढ़ रही थी, तो जोर से बोला,”बंद करो लाइट, मुझे सोना है.”

“कल मेरा लैक्चर है, मुझे उस की तैयारी करनी है. लाइट तुम्हारे चेहरे पर नहीं पड़ रही…” वह भुनभुनाता हुआ जोर से दरवाजा बंद कर के ड्राइंगरूम में जा कर दीवान पर सो गया.

ख्वाब पूरे हुए : भाग 2 – नकुल की शादी से क्यों घर वाले नाराज थे?

बहुत भागादौड़ी के बाद नकुल को एक नामी फूड स्टोर में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई.

जिस दिन नकुल अपनी पहली कमाई ले कर मामा के घर में बेइंतिहा खुशी से उमगते हुए घुसा, मामी ने उन्हें फरमान सुना दिया कि अब वे अपने रहने का कहीं और इंतजाम कर लें.

दोनों पर जैसे गाज गिरी. उस की छोटी सी कमाई में अपनी अलग गृहस्थी बसाना आसान न था.

बड़ी मुश्किल से शहर की कच्ची बस्ती में एक छोटी सी 10 बाई 12 की खोली का बंदोबस्त हुआ और दोनों पतिपत्नी उस में शिफ्ट हो गए. मकान का इंतजाम हो गया था, अब रोटी जुटाने की जद्दोजेहद बाकी थी.

दोनों को ही रत्तीभर भी गुमान न था कि महज एक जने की कमाई से दालरोटी जुटाना उन के लिए टेढ़ी खीर होगा. सो, मन्नो ने भी नौकरी के लिए हाथपांव मारने शुरू कर दिए. बहुत भागादौड़ी के बाद मन्नो को एक डिपार्टमैंटल स्टोर में सेल्सगर्ल की नौकरी मिल गई.

उस की नौकरी के बाद दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हुआ, लेकिन जिंदगी की इस संघर्ष भरी आपाधापी में उन की जिंदगी से मुहब्बत की चिड़िया फुर्र हो चुकी थी.

दोनों ही तड़के काम पर निकल जाते और देर रात घर में कदम रखते. उन की जिंदगी से प्याररोमांस हवा हो चुके थे.

तभी दूर कहीं रेलगाड़ी की सीटी से उस के ध्यान टूटा और वह वर्तमान में लौटी.

मन का गुस्सा आंसुओं के साथ बह चुका था और इसी के साथ उसे वास्तविकता का अहसास हुआ. वह सोच रही थी, ‘नाहक ही नकुल पर गुस्सा हुई.’

मन्नो ने करवट बदल कर नकुल को कंधों से थाम उसे अपनी ओर पलटने की कोशिश की. वह बोली, “नकुल, सौरी. मैं ने नाहक ही तुम्हें इतनी खरीखोटी सुना दी. वैरी सौरी. प्लीज गुस्सा थूक दो.

“प्लीज, नकुल, अब कभी तुम पर यों बेबात गुस्सा नहीं करूंगी. फिर से सौरी.”

यह सुन कर नकुल का गुस्सा कुछ कम हुआ और उस ने जीवनसाथी की ओर करवट बदल कर उसे अपनी बांहों में बांध लिया.

“क्या से क्या हो गया जानू. जिस प्यार के लिए हम ने पूरी दुनिया से लड़भिड़ कर अपना घर बसाया था, वह कहां खो गया?” नकुल ने आंसुओं से भीगे स्वर में जीवनसाथी से कहा.

“कहीं नहीं खोया,” कहते हुए मन्नो ने उसे अपनी बांहों में कस कर भींचते हुए उस के चेहरे पर चुंबनों की बौछार कर दी और बोली, “वादा करो, अब कभी मुझ से गुस्सा नहीं होगे.”

“पहले गुस्सा किस ने किया था, जरा बताना तो. मैं ने या तुम ने?” नकुल ने आक्रोश भरे स्वर में पत्नी मन्नो से पूछा.

“सौरी कह तो दिया, अब क्या मेरी जान लोगे?” कहते हुए मन्नो ने फिर से उसे अपने आलिंगन में जोर से बांध लिया.

म्दमाते प्रणय रस की चांदनी तले दोनों प्रेमी खिलखिला उठे और प्यार की मदहोशी में आकंठ डूब गए.

अगले दिन रात का एक बज चुका था. मन्नो बड़ी बेसब्री से बिस्तर पर करवटें बदलते हुए नकुल का इंतजार कर रही थी. मन ही मन वह सोच रही थी, ‘अब नकुल से कभी नहीं लड़ेगी.’ तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और मन्नो ने उठ कर दरवाजा खोला.

पति का पस्त चेहरा देख तनिक रूठते हुए उस से बोली, “आज फिर इतनी देर कर दी तुम ने? जल्दी आ जाया करो न, प्लीज, अब इतनी देर से क्या तो भूख बची होगी तुम्हारी? मैं ने भी अभी तक खाना नहीं खाया.”

“मन्नो, तुम्हें पता है न, रात 12 बजे तक ड्यूटी करे बिना इन्सेंटिव के रुपए नहीं मिलते.”

पति की बातें सुन मन्नो की आंखें चमक उठीं. मन्नो ने ललकते हुए नकुल से पूछा, “अरे वाह, तुम्हें इन्सेंटिव मिला है? कल तो हम ‘बादशाह दा ढाबा’ चलेंगे. मैं कल ड्यूटी से औफ ले लूंगी. तुम भी जरा जल्दी आ जाना. इतने दिनों से एक बार भी कहीं बाहर नहीं गए.

“मैं तो अपने मनपसंद नर्गिसी कोफ्ते और्डर करूंगी. हां… हाफ प्लेट नर्गिसी कोफ्ते और हाफ प्लेट तुम्हारी पसंद की दाल मखानी, फिर भोलू पनवाड़ी के यहां से बनारसी मीठा पान खा कर आएंगे, ठीक है न जान…”

मन्नो अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी कि तभी उस की नजर नकुल के उदास, मायूस आंसुओं से भीगे चेहरे पर पड़ी और वह अचानक बोलतेबोलते बीच में रुक गई, “क्या हुआ जान? तुम बहुत परेशान दिख रहे हो. अरे, तुम तो रो रहे हो. क्या हुआ, मुझे बताओ तो सही? नौकरी तो सहीसलामत है तुम्हारी, बताओ ना नकुल. मेरा जी बैठा जा रहा है.”

पत्नी के प्यार भरे बोल सुन नकुल बुक्का फाड़ कर रो पड़ा और सुबकते हुए विलाप कर उठा, “आज मुझे इन्सेंटिव मिला था. अभी घर आते हुए कुछ शोहदे मिल गए. उन्होंने मेरे फूड पैकेट छीन लिए और इन्सेंटिव के रुपए भी छीन लिए. मुझे पीटा भी. मैं तुझे कोई सुख नहीं दे पाया. सौरी, मैं बहुत शर्मिंदा हूं.”

“ओह, सारे रुपए गए?”

“हां,” एक बार फिर से सुबकते हुए नकुल बोला.

मन्नो ने उसे अपनी बांहों में बांध उसे दिलासा देने की कोशिश की, लेकिन उस के आंसू धारधार बह रहे थे.

“क्या करूं, सुबह से शाम तक इतनी कड़ी मेहनत कर के भी तुझे वह सबकुछ नहीं दे पा रहा, जो तुझे चाहिए. कल भी गुंडों के एक गैंग ने मेरी मोटरसाइकिल छीनने की कोशिश की थी. वह तो ऐनवक्त पर पुलिस वहां आ गई, तो किसी तरह वह बच गई. इस चक्कर में पिज्जा की डिलीवरी में देर हो गई, तो क्लाइंट ने मुझे कितना बुराभला सुनाया. आज एक ऊंची जाति के क्लाइंट ने तो मुझ से मेरी जाति पूछी, और उसे उस से कमतर जाति का बताने पर मेरे हाथ से फूड डिलीवरी लेने से इनकार कर दिया. बहुत जिल्लत महसूस हुई, लेकिन क्या करें? हमारे तो हाथ हर तरफ से बंधे हुए हैं. हम ने अपने लिए ऐसी जिंदगी की तो तमन्ना नहीं की थी.”

“कोई नहीं, ऐसे हिम्मत हारोगे तो कैसे चलेगा? अभी तो अपनी जिंदगी की शुरुआत है. मेरी  मां कहती हैं, हर किसी को जिंदगी में स्ट्रगल करनी पड़ती है. चलो, अभी तुम सोने की कोशिश करो, कल कुछ सोचेंगे. मुझे पूरा विश्वास है, हमारे भी अच्छे दिन आएंगे.”

“अच्छे दिनों की तो पता नहीं, लेकिन मैं इतना जरूर जान गया हूं कि इस लाइन में कोई सुरक्षित भविष्य नहीं है. आज पता है, क्या हुआ?”

“क्या हुआ नकुल?” मन्नो ने जिज्ञासावश पूछा.

“आज मेरे काम का टार्गेट पूरा होने ही वाला था कि तभी अचानक से कंप्यूटर ने दिखाया कि मैं अभी टार्गेट पूरा करने से दूर हूं. एक पुराने सहकर्मी ने मुझे बताया कि इन लोगों के पास एक ऐसा सौफ्टवेयर है, जो पूरे होते टार्गेट को अधूरे में बदल देता है. ऐसे में तो इन लोगों के लिए काम करना बिलकुल बेकार है. यहां अपनी दिनरात की हाड़तोड़ मेहनत की कोई वैल्यू ही नहीं. यह तो कोरी गुलामी से कम नहीं.”

विरासत : क्या लिखा था उन खतों में ? – भाग 2

अपराजिता ने उस लिफाफे को उठा कर पहले दोनों आंखों से लगाया. फिर नजाकत के साथ लिफाफे को खोला तो उस में एक गुलाबी कागज मिला. कागज को आधाआधा कर के 2 मोड़ दे कर तह किया गया था. चंद पल अपराजिता की उंगलियां उस कागज पर यों ही फिसलती रहीं… नानी के स्पर्श के एहसास के लिए मचलती हुईं. जब भावनाओं का ज्वारभाटा कुछ थमा तो उस की निगाहें उस कागज पर लिखे शब्दों की स्कैनिंग करने लगीं:

डियर अप्पू

‘‘जीवन में नैतिक सद््गुणों का महत्त्व समझना बहुत जरूरी है. इन नैतिक सद्गुणों में सब से ऊंचा स्थान ‘क्षमा’ का है. माफ कर देना और माफी मांग लेना दोनों ही भावनात्मक चोटों पर मरहम का काम करते हैं. जख्मों पर माफी का लेप लग जाने से पीडि़त व्यक्ति शीघ्र सब भूल कर जीवनधारा के प्रवाह में बहने लगते हैं. वहीं माफ न कर के हताशा के बोझ में दबा व्यक्ति जीवनपर्यंत अवसाद से घिरा पुराने घावों को खुरचता हुआ पीड़ा का दामन थामे रहता है. जबकि वह जानता है कि वह इस मानअपमान की आग में जल कर दूसरे की गलती की सजा खुद को दे रहा है.

‘‘अप्पू मैं ने तुम्हें कई बार अपने मांबाप पर क्रोधित होते देखा है. तुम्हें गम रहा कि तुम्हारी परवरिश दूसरे सामान्य बच्चों जैसी नहीं हुई है. जहां बाप का जिंदगी में होना न होना बराबर था वही तुम्हारी मां ने जिंदगी के तूफानों से हार कर स्वयं अपनी जान ले ली और एक बार भी नहीं सोचा कि उस के बाद तुम्हारा क्या होगा… बेटा तुम्हारा कुढ़ना लाजिम है. तुम गलत नहीं हो. हां, अगर तुम इस क्रोध की ज्वाला में जल कर अपना मौजूदा और भावी जीवन बरबाद कर लेती हो तो गलती सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही होगी. किसी दूसरे के किए की सजा खुद को देने में कहां की अक्लमंदी है?

‘‘मेरी बात को तसल्ली से बैठ कर समझने की चेष्टा करना और एकदम से न सही तो कम से कम अगले जन्मदिन तक धीरेधीरे उस पर अमल करने की कोशिश करना… बस यही तोहफा है मेरे पास तुम्हारे इस खास दिन पर तुम्हें देने के लिए.

‘‘ढेर सारा प्यार,’’

‘‘नानी.’’

वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था. अपराजिता अब इंजीनियरिंग के आखिरी साल में थी और अपनी इंटर्नशिप में मशगूल थी. वह जिस कंपनी में इंटर्नशिप कर रही थी, प्रतीक भी वहीं कार्यरत था. कम समय में ही दोनों में गहरी मित्रता हो गई.

बीते सालों में अपराजिता नानी से 18वें जन्मदिन पर मिले सौगाती खत को अनगिनत बार पढ़ा था. क्यों न पढ़ती. यह कोई मामूली खत नहीं था. भाववाहक था नानी का. अकसर सोचती कि काश नानी ने उस के हर दिन के लिए एक खत लिखा होता तो कुछ और ही मजा होता. नानी के लिखे 1-1 शब्द ने मन के जख्मों पर चंदन के लेप का काम किया था. उस आधे पन्ने के पत्र की अहमियत किसी ऐक्सपर्ट काउंसलर के साथ हुए 10 सैशन की काउंसलिंग के बराबर साबित हुई थी.

अब अपराजिता के मस्तिष्क में बचपन में झेले सदमों के चलचित्रों की छवि धूमिल सी हो कर मिटने लगी थी. मम्मीपापा की बेमेल व कलहपूर्ण मैरिड लाइफ, पापा के जीवन में ‘वो’ की ऐंट्री और फिर रोजरोज की जिल्लत से खिन्न मम्मी का फांसी पर झूल कर जान दे देना… थरथर कांपती थी वह डरावने सपनों के चक्रवात में फंस कर. नानी के स्नेह की गरमी का लिहाफ उस की कंपकंपाहट को जरा भी कम नहीं कर पाया था.

नानी जब तक जिंदा रहीं लाख कोशिश करती रहीं उस की चेतना से गंभीर प्रतिबिंबों को मिटाने की, मगर जीतेजी उन्हें अपने प्रयासों में शिकस्त के अलावा कुछ हासिल न हुआ. शायद यही दुनिया का दस्तूर है कि हमें प्रियजनों के मशवरे की कीमत उन के जाने के बाद समझ में आती है.

प्रतीक और अपराजिता का परिचय अगले सोपान  पर चढ़ने लगा था. बिना कुछ सोचे वह प्रतीक के रंग में रंग गई. कमाल की बात थी जहां इंटर्नशिप के दौरान प्रतीक उस के दिल में समाता जा रहा था तो दूसरी तरफ इंजीनियरिंग के पेशे से उस का दिल हटता जा रहा था.

वह औफिस आती थी प्रतीक से मिलने की कामना में, अपने पेशे की पेचीदगियों में सिर खपाने के लिए नहीं. ट्रेनिंग बोझ लग रही थी उसे. अपने काम से इतनी ऊब होती थी कि वह औफिस आते ही लंचब्रेक का इंतजार करती और लंचब्रेक खत्म होने पर शाम के 5 बजने का. कुछ सहकर्मी तो उसे पीठ पीछे ‘क्लौक वाचर’ पुकारते थे.

जाहिर था कि अपराजिता ने प्रोफैशन चुनते समय अपने दिल की बात नहीं सुनी. मित्रों की देखादेखी एक भेड़चाल का हिस्सा बन गई. सब ने इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया तो उस ने भी ले लिया. उस ने जब अपनी उलझन प्रतीक से बयां की तो सपाट प्रतिक्रिया मिली, ‘‘अगर तुम्हें इस प्रोफैशन में दिलचस्पी नहीं अप्पू तो मुझे भी तुम में कोई रुचि नहीं.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रतीक… प्यार से कैसी शर्त?’’

‘‘शर्तें हर जगह लागू होती हैं अप्पू…

कुदरत ने भी दिमाग का स्थान दिल से ऊपर रखा है. मुझे तो अपने लिए इंजीनियर जीवनसंगिनी ही चाहिए…’’

यह सुन कर अपराजिता होश खो बैठी थी. दिल आखिर दिल है, कहां तक खुद को संभाले… एक बार फिर किसी प्रियजन को खोने के कगार पर खड़ी थी. कैसे सहेगी वह ये सब? कैसे जूझेगी इन हालात से बिना कुछ गंवाए?

अगर वह प्रतीक की शर्त स्वीकार लेती है तो क्या उस कैरियर में जान डाल पाएगी जिस में उस का किंचित रुझान नहीं है? उस की एक तरफ कूआं तो दूसरी तरफ खाई थी, कूदना किस में है उसे पता न था.

अगले महीने फिर अपराजिता का खास जन्मदिन आने वाला था. खास इसलिए क्योंकि नानी ने अपने खत की सौगात छोड़ी थी इस दिन के लिए भी. बड़ी मुश्किल से दिन कट रहे थे… उस का धीरज छूट रहा था… जन्मदिन की सुबह का इंतजार करना भारी हो रहा था. बेसब्री उसे अपने आगोश में ले कर उस के चेतन पर हावी हो चुकी थी. अत: उस ने जन्मदिन की सुबह का इंतजार नहीं किया. जन्मदिन की पूर्वरात्रि पर जैसे ही घड़ी ने रात के 12 बजाए उस ने नानी के दूसरे नंबर के ‘लैगसी लैटर’ का लिफाफा खोल डाला. लिखा था:

‘‘डियर अप्पू’’

‘‘जल्दी तुम्हारी इंजीनियरिंग पूरी हो जाएगी. बहुत तमन्ना थी कि तुम्हें डिगरी लेते देखूं, मगर कुदरता को यह मंजूर न था. खैर, जो प्रारब्ध है, वह है… आओ कोई और बात करते हैं.’’

‘‘तुम ने कभी नहीं पूछा कि मैं ने तुम्हारा नाम अपराजिता क्यों रखा. जीतेजी मैं ने भी कभी बताने की जरूरत नहीं समझी. सोचती रही जब कोई बात चलेगी तो बता दूंगी. कमाल की बात है कि न कभी कोई जिक्र चला न ही मैं ने यह राज खोलने की जहमत उठाई. तुम्हारे 21वें जन्मदिन पर मैं यह राज खोलूंगी, आज के लिए इसी को मेरा तोहफा समझना.

‘‘हां, तो मैं कह रही थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम क्यों दिया. असल में तुम्हारे पैदा होने के पहले मैं ने कई फीमेल नामों के बारे में सोचा, मगर उन में से ज्यादातर के अर्थ निकलते थे-कोमल, सुघड़, खूबसूरत वगैराहवगैराह. मैं नहीं चाहती थी कि तुम इन शब्दों का पर्याय बनो. ये पर्याय हम औरतों को कमजोर और बुजदिल बनाते हैं. कुछए की तरह एक कवच में सिमटने को मजबूर करते हैं. औरत एक शरीर के अलावा भी कुछ होती है.

‘‘तुम देवी बनने की कोशिश भी न करना और न ही किसी को ऐसा सोचने का हक देना. बस अपने सम्मान की रक्षा करते हुए इंसान बने रहने का हक न खोना.

‘‘मैं तुम्हें सुबह खिल कर शाम को बिखरते हुए नहीं देखना चाहती. मेरी आकांक्षा है कि तुम जीवन की हर परीक्षा में खरी उतरो. यही वजह थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम दिया… अपराजिता अर्थात कभी न पराजित होने वाली. अपनी शिकस्त से सबक सीख कर आगे बढ़ो… शिकस्त को नासूर बना कर अनमोल जीवन को बरबाद मत करो. जिस काम के लिए मन गवाही न दे उसे कभी मत करो, वह कहते हैं न कि सांझ के मरे को कब तक रोएंगे.’’

‘‘बेटा, जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है. मेरा विश्वास है तुम अपनी मां की तरह हौसला नहीं खोओगी. हार और जीत के बीच सिर्फ अंश भर का फासला होता है. तो फिर जिंदगी की हर जंग जीतने के लिए पूरा दम लगा कर क्यों न लड़ा जाएं.

‘‘बहुतबहुत प्यार’’

‘‘नानी.’’

अपराजिता ने खत पढ़ कर वापस लिफाफे में रख दिया. रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था, किंतु कुछ महीनों से जद्दोजहद का जो शिकंजा उस के दिलोदिमाग पर कसता जा रहा था उस की गिरफ्त अब ढीली होती जान पड़ रही थी.

दूसरे दिन की सुबह बेहद दिलकश थी. रेशमी आसमान में बादलों के हाथीघोड़े से बनते प्रतीत हो रहे थे. चंद पल वह यों ही खिड़की से झांकती हुई आसमान में इन आकृतियों को बनतेबिगड़ते देखती रही. ऐसी ही आकृतियों को देखते हुए ही तो वह बचपन में मम्मी का हाथ पकड़ कर स्कूल से घर आती थी.

कल रात वाले लैगसी लैटर को पढ़ने के बाद से ही वह खुद में एक परिवर्तन महसूस कर रही थी… कहीं कोई मलाल न था कल रात से. वह जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का निर्णय कर चुकी थी. औफिस जाने से पहले उस ने एक लंबा शावर लिया मानो कि अब तक के सभी गलत फैसलों व चिंताओं को पानी से धो कर मुक्ति पा लेना चाहती हो.

प्रतीक के साथ औफिस कैंटीन में लंच लेते हुए उस ने अपना निर्णय उसे सुनाया, ‘‘प्रतीक मैं तुम्हें भुलाने का फैसला कर चुकी हूं, क्योंकि मेरी जिंदगी के रास्ते तुम से एकदम अलग हैं.’’

‘‘यह क्या पागलपन है? कौन से हैं तुम्हारे रास्ते… जरा मैं भी तो सुनूं?’’ प्रतीक कुछ बौखला सा गया.

नादानियां : भाग 2

प्रथमा खिल उठी. फिलहाल तो उस ने कुछ नहीं मांगा मगर आगे की रणनीति मन ही मन तय कर ली. 2 दिनों बाद उस ने राकेश से कहा, ‘‘आज यह बच्ची आप से आप का दिया हुआ वादा पूरा करने की गुजारिश करती है. क्या आप मुझे कार चलाना सिखाएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं, अवश्य सिखाएंगे बालिके,’’ राकेश ने कहा. जब वे बहुत खुश होते हैं तो इसी तरह नाटकीय अंदाज में बात करते हैं.

अब हर शाम औफिस से आ कर चायनाश्ता करने के बाद राकेश प्रथमा को कार चलाना सिखाने लगा. जब राकेश उसे क्लच, गियर, रेस और ब्रेक के बारे में जानकारी देता तो प्रथमा बड़े मनोयोग से सुनती. कभीकभी घुमावदार रास्तों पर कार को टर्न लेते समय स्टीयरिंग पर दोनों के हाथ आपस में टकरा जाते. राकेश ने इसे सामान्य प्रक्रिया समझते हुए कभी इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर प्रथमा के गाल लाल हो उठते थे.

लगभग महीनेभर की प्रैक्टिस के बाद प्रथमा ठीकठाक कार चलाने लगी थी. एक दिन उस ने भी राकेश के ही अंदाज में कहा, ‘‘जहांपनाह, कनीज आप को गुरुदक्षिणा देने की चाह रखती है.’’

‘‘हमारी दक्षिणा बहुत महंगी है बालिके,’’ राकेश ने भी उसी अंदाज में कहा.

‘‘हमें सब मंजूर है, गुरुजी,’’ प्रथमा ने अदब से झुक कर कहा तो राकेश को हंसी आ गई और यह तय हुआ कि आने वाले रविवार को सब लोग चाट खाने बाहर जाएंगे.

चूंकि ट्रीट प्रथमा के कार चलाना सीखने के उपलक्ष्य में थी, इसलिए आज कार वही चला रही थी. रितेश अपनी मां के साथ पीछे वाली सीट पर और राकेश उस की बगल में बैठा था. आज प्रथमा को गुडफील हो रहा था. चाट खाते समय जब रितेश अपनी मां को मनुहार करकर के गोलगप्पे खिला रहा था तो प्रथमा को बिलकुल भी बुरा नहीं लग रहा था बल्कि वह तो राकेश के साथ ही ठेले पर आलूटिकिया के मजे ले रही थी. दोनों  एक ही प्लेट में खा रहे थे. अचानक मुंह में तेज मिर्च आ जाने से प्रथमा सीसी करने लगी तो राकेश तुरंत भाग कर उस के लिए बर्फ का गोला ले आया. थोड़ा सा चूसने के बाद जब उस ने गोला राकेश की तरफ बढ़ाया तो राकेश ने बिना हिचक उस के हाथ से ले कर गोला चूसना शुरू कर दिया. न जाने क्या सोच कर प्रथमा के गाल दहक उठे. आज उसे लग रहा था मानो उस ने अपने मिशन में कामयाबी की पहली सीढ़ी पार कर ली.

इस रविवार राकेश को अपने रूटीन हैल्थ चैकअप के लिए जाना था. रितेश औफिस के काम से शहर से बाहर टूर पर गया है. राकेश ने डाक्टर से अगले हफ्ते का अपौइंटमैंट लेने की बात कही तो प्रथमा ने कहा, ‘‘रितेश नहीं है तो क्या हुआ? मैं हूं न. मैं चलूंगी आप के साथ. हैल्थ के मामले में कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए.’’

दोनों ससुरबहू फिक्स टाइम पर क्लिनिक पहुंच गए. वहां आज ज्यादा पेशेंट नहीं थे, इसलिए वे जल्दी फ्री हो गए. वापसी में घर लौटते हुए प्रथमा ने कार मल्टीप्लैक्स की तरफ घुमा दी. तो राकेश ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, कुछ काम है क्या यहां?’’

‘‘जी हां, काम ही समझ लीजिए. बहुत दिनों से कोई फिल्म नहीं देखी थी. रितेश को तो मेरे लिए टाइम नहीं है. एक बहुत ही अच्छी फिल्म लगी है, सोचा आज आप के साथ ही देख ली जाए,’’ प्रथमा ने गाड़ी पार्किंग में लगाते हुए कहा.

राकेश को उस के साथ यों फिल्म देखना कुछ अजीब सा तो लग रहा था मगर उसे प्रथमा का दिल तोड़ना भी ठीक नहीं लगा, इसलिए फिल्म देखने को राजी हो गया. सोचा, ‘सोचा बच्ची है, इस का भी मन करता होगा…’

प्रथमा की बगल में बैठा राकेश बहुत ही असहज सा महसूस कर रहा था, क्योंकि बारबार सीट के हत्थे पर दोनों के हाथ टकरा रहे थे. उस से भी ज्यादा अजीब उसे तब लगा जब उस के हाथ पर रखा अपना हाथ हटाने में प्रथमा ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई बल्कि बहुत ही सामान्य भाव से फिल्म का मजा लेती रही. उन्होंने ही धीरे से अपना हाथ हटा लिया.

ऐसा ही एक वाकेआ उस दिन भी हुआ जब प्रथमा उसे पिज्जा हट ले कर गई थी. दरअसल, उन की बड़ी बेटी पारुल की ससुराल घर से कुछ ही दूरी पर है. पिछले दिनों पारुल के ससुरजी ने अपनी आंख का औपरेशन करवाया था. आज शाम राकेश को उन से मिलने जाना था. प्रथमा ने पूछा, ‘‘मैं भी आप के साथ चलूं? इस बहाने शहर में मेरी कार चलाने की प्रैक्टिस भी हो जाएगी.’’ सास से अनुमति मिलते ही प्रथमा कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर राकेश के साथ चल दी. वापसी में उस ने कहा, ‘‘चलिए, आज आप को पिज्जा हट ले कर चलती हूं.’’

‘‘अरे नहीं, तुम तो जानती हो कि मुझे पिज्जा पसंद नहीं,’’ राकेश ने टालने के अंदाज में कहा.

‘‘आप से पिज्जा खाने को कौन कह रहा है. वह तो मुझे खाना है. आप तो बस पेमैंट कर देना,’’ प्रथमा ने अदा से मुसकराते हुए कहा. न चाहते हुए भी राकेश को गाड़ी से उतरना ही पड़ा. पास आते ही प्रथमा ने अधिकार से उस की बांहों में बांहें डाल कर जब कहा, ‘‘दैट्स लाइक अ परफैक्ट कपल,’’ तो राकेश से मुसकराते भी नहीं बना.

पिज्जा खातेखाते प्रथमा बीचबीच में उसे भी आग्रह कर के खिला रही थी. मना करने पर भी जबरदस्ती मुंह में ठूंस देती. राकेश समझ नहीं पा रहा था कि उस के  साथ क्या हो रहा है. वह प्रथमा की इस हरकत को उस का बचपना समझ कर नजरअंदाज करता रहा. प्रथमा कुछ और जिद करे, इस से पहले ही वह रितेश का फोन आने का बहाना बना कर उसे घर ले आया.

‘‘यह देखिए. मैं आप के लिए क्या ले कर आई हूं,’’ प्रथमा ने एक दिन राकेश को एक पैकेट पकड़ाते हुए कहा.

‘‘क्या है यह?’’ राकेश ने उसे उलटपलट कर देखा.

दस्विदानिया : उसने रूसियों को क्या गिफ्ट दिया – भाग 2

कुछ देर सोचने के बाद दीपक ने कहा ‘‘एक आइडिया है, उम्मीद है काम कर जाएगा. उस का फोन नंबर तो होगा तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, मुझे होटल का नंबर और रूम नंबर पता है.’’

‘‘गुड, तुम उसे फोन लगाओ और कहो कि तुम्हें कस्टम वालों ने पकड़ लिया है. तुम्हारे पर्स में कुछ ड्रग्स मिले. तुम्हें खुद पता नहीं कि कहां से ड्रग्स पर्स में आ गए और अब वही तुम्हारी सहायता कर सकता है.’’

नताशा ने फोन कर उस बिजनैसमैन से बात कर वैसा ही कहा.

उधर से वह फोन पर गुस्सा हो कर

नताशा से बोला, ‘‘यू इडियट, तुम ने मेरे या

इस होटल के बारे में कस्टम औफिसर को क्या बताया है?’’

‘‘सर, मैं ने तो अभी तक कुछ नहीं बताया है… पर परदेश में बस आप का ही सहारा है. आप कुछ कोशिश करें तो मामला रफादफा हो जाएगा. मैं अपने डौलर तो साथ लाई नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूं. खबरदार दोबारा फोन करने की कोशिश की.

अब तुम जानो और तुम्हारा काम… भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारे 4000 डौलर,’’ और उस ने फोन काट दिया.

बिजनैसमैन की बातें सुन कर दोनों एकसाथ खुशी से उछल पड़े. नताशा बोली, ‘‘अब तो मेरे डौलर भी बच गए. पापा के घर का काफी कर्ज चुका सकती हूं. मेरा रिटर्न टिकट तो 2 दिन बाद का है. फिर भी मैं कोशिश करती हूं कि आज रात की फ्लाइट मिल जाए,’’ कह वह रसियन एअरलाइन एरोफ्लोट के काउंटर की तरफ बढ़ी.

दीपक ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रुको, इस की कोई जरूरत नहीं है. तुम अभी मेरे साथ चलो. कम से कम 2 दिन तो मेरा साथ दो.’’

दीपक ने नताशा को एक होटल में ठहराया. काफी देर दोनों बातें करते रहे. दोनोें एकदूसरे का दुखसुख समझ रहे थे. रात में डिनर के बाद दीपक चलने लगा. उसे गले से लगाते हुए होंठों पर ऊंगली फेरते हुए बोला, ‘‘नताशा, या लुवलुवा (आई लव यू). कल सुबह फिर मिलते हैं. दोबरोय नोचि (गुड नाइट).’’

‘‘आई लव यू टू,’’ दीपक के बालों को सहलाते हुए नताशा ने कहा.

अगले दिन जब दीपक नताशा से मिलने आया तो वह स्कारलेट कलर के सुंदर लौंग फ्रौक में बैठी थी. बिलकुल उसी तरह जैसे मास्को के होटल में मिली थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. क्रासावित्सा (गुड मौर्निंग, ब्यूटीफुल).’’

‘‘कौन ब्यूटीफुल है मैं या तृसिकी?’’ वह हंसते हुए बोली

‘‘दोनों.’’

‘‘यू नौटी बौय,’’ बोल कर नताशा दीपक से सट कर खड़ी हो गई.

दीपक ने उसे अपनी बांहों में ले कर कहा, ‘‘अब तुम कहीं नहीं जाओगी. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं कल ही अपनी शादी के लिए औफिस में अर्जी दे दूंगा.’’

‘‘आई लव यू दीपक, पर मुझे कल जाने दो. मैं ने पिता की निशानी बचाने के लिए अपनी अस्मिता दांव पर लगा दी… मुझे अपने देश जा कर सबकुछ ठीक करने के लिए मुझे कुछ समय दो.’’

अगले दिन नताशा एरोफ्लोट की फ्लाइट से मास्को जा रही थी. दीपक उसे छोड़ने दिल्ली एअरपोर्ट आया था. उस के चेहरे पर उदासी देख कर वह बोली, ‘‘उम्मीद है फिर जल्दी मिलेंगे. डौंट गैट अपसैट. बाय, टेक केयर, दस्विदानिया,’’ और वह एरोफ्लोट की काउंटर पर चैक इन करने बढ़ गई. दोनों हाथ हिला कर एकदूसरे से बिदा ले रहे थे.

कुछ दिनों बाद दीपक ने अपने सीनियर से शादी की अर्जी दे कर इजाजत मांगने

की बात की तो सीनियर ने कहा, ‘‘सेना का कोई भी सिपाही किसी विदेशी से शादी नहीं कर सकता है, तुम्हें पता है कि नहीं?’’

‘‘सर, पता है, इसीलिए तो पहले मैं इस की इजाजत लेना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम सोचते हो तुम्हें इजाजत मिल जाएगी? यह सेना के नियमों के विरुद्ध है, तुम्हें इस की इजाजत कोईर् भी नहीं दे सकता है.’’

‘‘सर, हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. मैं शादी उसी से करूंगा.’’

‘‘बेवकूफी नहीं करो, अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है?’’

‘‘बेशक नहीं है सर, पर प्यार तो एक से ही किया है मैं ने, सिर्फ नताशा से.’’

‘‘तुम अपना और मेरा समय बरबाद कर रहे हो. तुम्हारा कमीशन पूरा होने में कितना वक्त बाकी है अभी?’’

‘‘सर, अभी तो करीब 12 साल बाकी हैं.’’

‘‘तब 2 ही उपाय हैं या तो 12 साल इंतजार करो या फिर नताशा को अपनी नागरिकता छोड़ने को कहो. और कोई उपाय नहीं है.’’

‘‘अगर मैं त्यागपत्र देना चाहूं तो?’’

‘‘वह भी स्वीकार नहीं होगा. देश और सेना के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य बनता है जो प्यार से ज्यादा जरूरी है, याद रखना.’’

‘‘यस सर, मैं अपनी ड्यूटी भी निभाऊंगा… मैं कमीशन पूरा होने तक इंतजार करूंगा,’’ कह वह सोचने लगा कि पता नहीं नताशा इतने लंबे समय तक मेरी प्रतीक्षा करेगी या नहीं. फिर सोचा कि नताशा को सभी बातें बता दे.

दीपक ने जब नताशा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘12 साल क्या मैं कयामत तक तुम्हारा इंतजार कर सकती हूं… तुम बेशक देश के प्रति अपना फर्ज निभाओ. मैं इंतजार कर लूंगी.’’

नताशा से बात कर दीपक को खुशी हुई. दोनों में प्यारभरी बातें होती रहती थीं. वे बराबर एकदूसरे के संपर्क में रहते. धीरेधीरे समय बीतता जा रहा था. करीब 2 साल बाद एक बार नताशा दीपक से मिलने इंडिया आई थी. दीपक ने महसूस किया उस के चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं थी. स्वास्थ्य भी कुछ गिरा सा लग रहा था.

दीपक के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है, सफर की थकावट और थोड़ा सिरदर्द है.’’

दोनों में मर्यादित प्रेम संबंध बना हुआ था. एक दिन बाद नताशा ने लौटते समय कहा, ‘‘इंतजार का समय 2 साल कम हो गया.’’

‘‘हां, बाकी भी कट जाएगा.’’

बेलारूस लौटने के बाद से नताशा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. कभी जोर से सिरदर्द, कभी बुखार तो कभी नाक से खून बहता. सारे टैस्ट किए गए तो पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है. डाक्टर ने बताया कि फिलहाल दवा लेती रहो, पर 2 साल के अंदर कुछ भी हो सकता है. नताशा अपनी जिंदगी से निराश हो चली थी. एक तरफ अकेलापन तो दूसरी ओर जानलेवा बीमारी. फिर भी उस ने दीपक को कुछ नहीं बताया.

इधर कुछ महीने बाद दीपक को 3-4 दिनों से तेज बुखार था.

वह अपने एअरफोर्स के अस्पताल में दिखाने गया. उस समय फ्लाइट लैफ्टिनैंट डाक्टर ईशा ड्यूटी पर थीं. चैकअप किया तो दीपक को 103 डिग्री से ज्यादा ही फीवर था.

डाक्टर बोली, ‘‘तुम्हें एडमिट होना होगा. आज फीवर का चौथा दिन है…कुछ ब्लड टैस्ट करूंगी.’’

दीपक अस्पताल में भरती था. टैस्ट से पता चला कि उसे टाईफाइड है.

डा. ईशा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं, आई मीन वाइफ, बच्चे?’’

‘‘मैं बैचलर हूं डाक्टर… वैसे भी और कोई नहीं है मेरा.’’

‘‘डौंट वरी, हम लोग हैं न,’’ डाक्टर उस की नब्ज देखते हुए बोलीं.

बीचबीच में कभीकभी दीपक का खुबार 103 से 104 डिग्री तक हो जाता तो वह नताशानताशा पुकारता. डा. ईशा के पूछने पर उस ने नताशा के बारे में बता दिया. डाक्टर ने नताशा का फोन नंबर ले कर उसे फोन कर दिया. 2 दिन बाद नताशा दीपक से मिलने पहुंच गई. उस दिन दीपक का फीवर कम था. नताशा उस के कैबिन में दीपक के बालों को सहला रही थी.

तभी डा. ईशा ने प्रवेश किया. बोलीं, ‘‘आई एम सौरी, मैं बाद में आ जाती हूं. बस रूटीन चैकअप करना है. आज इन्हें कुछ आराम है.’’

मजबूरियां -भाग 1: ज्योति और प्रकाश के रिश्ते से निशा को क्या दिक्कत थी

‘‘अब सिर दर्द कैसा है आप का?’’ थोड़ी देर बड़े प्रेम से सिर दबाने के बाद ज्योति ने प्रकाश से पूछा.

‘‘तुम्हारे हाथों में जादू है, ज्योति,’’ प्रकाश उस की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराया, ‘‘दर्द उड़नछू हो गया. अब मैं खुद को बिलकुल तरोताजा महसूस कर रहा हूं, पर यह कमाल हर बार तुम कैसे कर देती हो?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘कौन सा कमाल?’’ ज्योति बोली.

‘‘मेरे थकेहारे शरीर और दिलोदिमाग में जीवन के प्रति उमंग और उत्साह भरने का कमाल,’’ प्रकाश ने जवाब दिया.

‘‘मैं कोई कमाल नहीं करती जनाब, उलटा मैं जब आप के साथ होती हूं तब मेरी जीवन बगिया के फूल खिल उठते हैं,’’ ज्योति ने कहा.

‘‘और जरूर उन्हीं खूबसूरत फूलों की शानदार महक मु झे यों मस्त और तरोताजा कर जाती है, डार्लिंग,’’ अपनी गरदन घुमा कर प्रकाश ने एक छोटा चुंबन ज्योति के गुलाबी होंठों पर अंकित कर दिया.

‘‘बड़ी जल्दी शरारत सू झने लगी है, साहब,’’ कहते हुए ज्योति के गोरे गाल शर्म से गुलाबी हो उठे.

‘‘तुम कितनी सुंदर हो,’’ अपना मुंह उस के कान के पास ला कर प्रकाश ने कोमल स्वर में कहा, ‘‘एक बात मु झे अभी भी बहुत हैरान कर जाती है.’’

‘‘कौन सी बात?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हमारी जानपहचान अब 5 साल पुरानी हो गई है. सैकड़ों बार मैं तुम्हें प्रेम कर चुका हूं. पर अब भी मेरा छोटा सा चुंबन तुम्हारे रोमरोम को पुलकित कर जाता है. यही बात मु झे हैरान करती है.’’

‘‘है न कमाल की बात. अब जवाब दो कि जादूगर मैं हुई कि आप?’’ ज्योति शरारती अदा से मुसकराई तो प्रकाश ने इस बार एक लंबा चुंबन उस के होंठों पर अंकित कर दिया.

अपनी सांसें व्यवस्थित करने के बाद प्रकाश ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘जादूगरनी तो तुम हो ही ज्योति. पहली मुलाकात के दिन से ही तुम्हारा जादू मेरे सिर चढ़चढ़ कर बोलने लगा था.’’

‘‘याद है आप को हमारी वह पहली मुलाकात?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘बिलकुल याद है, मीठे खरबूजे चुनने में तुम ने मेरी खुद आगे बढ़ कर मदद की थी,’’ प्रकाश बोला.

‘‘और मैं ने जब अपने खरीदे खरबूजे प्लास्टिक के थैले में डाले तो थैला ही फट गया और थैले में रखे आलूप्याज भी चारों तरफ बिखर गए थे. कितनी चुस्ती दिखाई थी आप ने उन्हें समेटने में. भला 3-4 आलूप्याज निकालने को खरबूजे वाले के ठेले के नीचे घुसने की क्या जरूरत थी आप को?’’ पुराना दृश्य याद कर के ज्योति खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘अरे, अगर ठेले के नीचे न घुसता तो कील में अटक कर मेरी कमीज न फटती. अगर कमीज न फटती तो तुम अफसोस प्रकट करने की मु झ से ढेरों बातें न करतीं. तब हमारा आपस में न परिचय होता, न हम साथसाथ थोड़ी देर पैदल चलते. उस 15 मिनट के साथसाथ चलने में ही तो हमारे दिलों में एकदूसरे के लिए प्रेम का बीज पड़ा था, मैडम. इसलिए मेरा ठेले के नीचे घुसना बड़ा जरूरी था. यदि मैं ऐसा न करता तो दुनिया की सब से खूबसूरत, सब से प्यारी सर्वगुणसंपन्न युवती के प्यार से वंचित रह जाता या नहीं?’’ प्रकाश का बोलने का नाटकीय अंदाज ज्योति को हंसाहंसा कर उस के पेट में बल डाल गया.

‘‘तुम से उस दिन मिल कर पहली नजर में ही मु झे ऐसा लगा था जैसे मु झे अपने सपनों का राजकुमार मिल गया हो,’’  प्रकाश की गोद में सिर रख कर लेटते हुए ज्योति ने भावुक स्वर में कहा.

‘‘और जब बाद में तुम्हें यह मालूम चल गया कि तुम्हारे सपनों का राजकुमार शादीशुदा है, 2 बच्चों का पिता है तब तुम ने उस की तसवीर को अपने दिल से क्यों नहीं निकाल फेंका?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘बुद्धू, इतने सोचविचार में ‘प्रेम’ कहां पड़ता है. प्रेम को अंधा कहा जाता है, जनाब. जिस से हो गया, हो गया. जिस से नहीं, तो नहीं. कोई जोरजबरदस्ती नहीं चलती प्रेम में.’’

‘‘ठीक कहती हो तुम, निशा के साथ मेरी शादी हुए 18 साल से ज्यादा समय बीत चुका है. हमारे बीच प्रेम का अंकुर कभी जड़ ही नहीं पकड़ सका. एकदूसरे के दिलों में जगह नहीं बना पाए

कभी हम. तुम्हारे मेरे साथ संबंधों  की जानकारी होने के बाद उस से मेरे संबंध बहुत बिगड़ गए हैं, ज्योति,’’ प्रकाश बोला.

‘‘मेरे कारण आप उन से मत उल झा करें, प्लीज. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मैं आप के जीवन में समस्याएं पैदा करूं. मेरा प्रेम आप की सुखशांति और खुशियों के अलावा और कुछ भी नहीं मांगता,’’ कहते हुए ज्योति की आंखों में आंसू  िझलमिला उठे.

‘‘तुम कुछ मांगती नहीं. और मैं जो तुम्हें देना चाहता हूं वह दे नहीं सकता. अपनी मजबूरियां देख कर कभीकभी मु झे लगता है, मैं ने तुम से प्रेमसंबंध जोड़ कर तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है,’’  कहता हुआ प्रकाश उदास हो उठा.

‘‘बिलकुल गलत,’’ ज्योति फौरन हंस कर बोली, ‘‘तुम्हारा प्रेम मेरे लिए अनमोल है. प्रेम से मिलने वाला सुख सात फेरों का मुहताज नहीं होता. बस, मु झे तुम्हारे होंठों पर हंसी नजर आती रहे तो मैं अपने जीवन से, अपने हालात से कभी शादी न करने के अपने फैसले से, तुम्हारे प्रेम से पूरी तरह संतुष्ट हूं.’’

निर्णय : भाग 2

मन की कड़वाहट मन में ही दबा ली थी उस ने इस समय. कुछ ही देर पहले तो मां ने छोरियां जनने वाली डायन कहा था उसे. ‘मुझे तो पहले से ही शक था कि यह इस का अपना जाया नहीं है,’ जिज्जी बोली थीं. दोनों आंगन में चारपाई डाले साग बीन रही थीं. उन्हें पता नहीं था कि वह आंगन के ठीक ऊपर लगे लोहे के जाल की मुंडेर पर खड़ी सुन रही है. अभी नहा कर निकली थी वह. सफर में पहने अपने व सोनू के कपड़े धो डाले थे उस ने. तार पर सूखने को डाल रही थी. ‘इस औरत ने पता नहीं क्या जादू कर रखा है. अपना नीलाभ तो ऐसा कभी नहीं था. इतने साल भनक तक न लगने दी सचाई की. अब जो भी है, इस अपाहिज से पीछा तो छुड़ाना ही होगा भाई का,’ जिज्जी की जहरीली फुफकार से उस का रोमरोम जल उठा था. कोई स्त्री इतनी कठोर कैसे हो सकती है. मां कहती हैं, उन का बेटा उस के बहकावे में आ गया है. बेशक, अलग गृहस्थी बसा कर बैठी है, पर बहू है घर की, बहू बन कर रहे. सिर पर चढ़ कर नाचने न देंगे. नीलाभ अनाथ नहीं है, उस के सिर पर मां का साया है अभी. बहू हो कर इतना बड़ा निर्णय लेने का उस अकेली को कोई हक नहीं.’

कलेजा बर्फ हो गया था उस का. हाथपांव सुन्न हो गए थे. घरभर के ठंडे व उपेक्षित व्यवहार का कारण पलभर में उसे समझ आ गया था. उसे ट्रेन पर बिठाते ही नीलाभ ने इन लोगों के आगे वह सारा सच उगल दिया था जिसे वे दोनों आज तक अपनी परछाईं से भी छिपा कर रखते थे. मां ने क्या आग उगली, जिज्जी ने क्या दंश दिए, सब बेमानी हो गए थे नीलाभ के विश्वासघात के आगे. अपना वश नहीं चला तो उस पर घर वालों का दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे नीलाभ. यहीं चूक गए नीलाभ. पहचान नहीं पाए उसे. वह तो उसी क्षण उसी रात पूर्णरूपेण मां बन गई थी बेटे की. ममता भी कहीं आधीअधूरी होती है. अब शरर में कुछ दोष है तो है. इस नन्ही सी जान की सेवा के लिए परिवार या नीलाभ कौन होते हैं रोड़ा अटकाने वाले. अब यह तो नहीं हो सकता कि एक दिन अचानक से एक अनजान बालक को गोद में डाल दिया और कहा, ‘यह लो, बेटा बना लो. फिर कह दिया, नहीं, यह बेटा नहीं हो सकता, छोड़ आओ कहीं.’ वह हैरान थी कि कमी उजागर होते ही बेटे पर जान न्योछावर करने वाला पिता इतना कठोर हृदय कैसे हो सकता है.

भीतर की सारी उथलपुथल भीतर ही समेटे ऊपर से सामान्य दिखने की कोशिश में अपनी सारी ऊर्जा खर्च करती वह बूआ के घर में सब से मिलतीमिलाती रही थी. नामकरण से लौट कर रात को मां तथा जिज्जी ने उसे आ घेरा था. उन्हें हजम ही नहीं हो रहा था कि उस ने सब से इतना बड़ा झूठ बोला कैसे. शक तो पहले से ही था. न दिन चढ़ने की खबर लगने दी, न दर्द उठने की, सीधा छोरा जनने की खबर सुना दी थी. छोरा न हुआ, कुम्हड़ा हो गया कि गए और तोड़ लाए. ‘अब नीलाभ नहीं चाहता है तो तू क्यों सीने से चिपकाए है छोरे को. छोड़ क्यों नहीं देती इसे. पता नहीं किस जातकुजात का पाप है. अच्छा हुआ कि छोरा अपाहिज निकला वरना हमें कभी कानोंकान भनक न होती.’ बिफर तो सुबह से ही रही थीं दोनों, पर पता नहीं कैसे जब्त किए बैठी थीं. शायद उन्हें डर था कि ये सब बातें उठते ही क्लेश मच जाएगा घर में. उस के रोनेबिसूरने, विरोध तथा विद्रोह के स्वर इतने ऊंचे न हो जाएं कि उन की गूंज बूआ के घर एकत्र हुए मेहमानों तक पहुंच जाए. सब को पता था कि वह आई हुई है विशेष तौर पर समारोह में सम्मिलित होने. बिफर कर कहीं वहां जाने से इनकार कर देती तो बिरादरी में मां सब को क्या बतातीं उस के न आने का कारण.

सिर झुकाए बैठी वह सोच रही थी कि यदि सोनू की मां का कुछ अतापता होता तो नीलाभ अवश्य ही उसे वापस सौंप देते बच्चा. पर वह फिलहाल अनजान लड़की तो आसन्नप्रसवा थी जब नीलाभ के नर्सिंग होम में पहुंची थी. आधी रात का समय, स्टाफ और मरीज अधिक नहीं थे उस समय. बस, एक आपातकालीन मरीज की देखभाल करने के लिए रुके हुए थे नीलाभ. कुछ ही पलों में बच्चा जना और पता नहीं चुपचाप कब बच्चा वहीं छोड़ कर भाग निकली थी वह लड़की. पहले तो घबरा गए नीलाभ, पुलिस को सूचना देनी होगी. फिर अचानक उन की छठी इंद्रीय सक्रिय हो उठी. लड़का है. जो यों इसे पैदा कर के छोड़ कर भाग निकली है, वह वापस आने से तो रही. उन्होंने तुरंत उसे फोन किया तथा अस्पताल बुला लिया. एक बिस्तर पर लिटा कर पास ही पालने में वह नवजात शिशु लिटा दिया. सुबह  होतेहोते यह खबर चारों ओर फैल गई कि रात में पुत्र को जन्म दिया है डाक्टर साहब की पत्नी ने. सब हैरान थे. अच्छा, मैडम गर्भवती थी, पता ही न चला. अड़ोसपड़ोस भी हैरान था. सब को डाक्टर साहब ने अपनी बातों से संतुष्ट कर दिया. वैसे भी वह कहां ज्यादा उठतीबैठती थी पड़ोस में. छोटे शहरों में भी आजकल वह बात नहीं रही. कौन किस की इतनी खबर रखता है. बधाइयां दी गईं, मिठाइयां बांटी गईं, जश्न हुए. यही मां और जिज्जी बलाएं लेती न आघाती थीं. और अब इतना जहर. 5 बजे की ट्रेन थी उस की वापसी की. उस के निकलने से घंटा भर पहले सरिता आ पहुंची थी उस से मिलने. कोई और वक्त होता तो वह सौ गिलेशिकवे करती अपनी प्यारी ननद, अपनी बचपन की सखी सरिता से. पर जब से आई थी, इतने तनाव, क्लेश और परेशानियों में फंसी थी कि उसे स्वयं भी कहां याद रहा था एक बार सरिता को फोन ही कर लेना.

मेरे पति मुझे अपने साथ कहीं भी ले जाना पसंद नहीं करते हैं, अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी शादी हुए अभी 2 वर्ष ही हुए हैं. मैं दिखने में बहुत खूबसूरत नहीं हूं जबकि मेरे पति काफी हैंडसम हैं जिस कारण वे मुझे अपने साथ कहीं भी ले जाना पसंद नहीं करते. इस से धीरेधीरे मैं तनाव में रहने लगी हूं. खुद को कैसे खूबसूरत बनाऊं ताकि मेरे पति मेरी ओर आकर्षित हो सकें?

जवाब

हर पुरुष की यही ख्वाहिश रहती है कि उस की पत्नी खूबसूरत हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप के पति आप को इग्नोर करें. पतिपत्नी का रिश्ता परस्पर प्यार की बुनियाद पर टिका होना चाहिए. जरूरी नहीं कि इंसान का चेहरा ही खूबसूरत हो. आप अपनी बातों, ड्रैसिंग स्टाइल, बात करने के अंदाज, नखरों और सैक्स अपील से पति को आकर्षित कर सकती हैं. हताश हो कर बैठने के बजाय आप खुद को बदलिए, फिर देखिए.

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