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पिता की संपत्ति पर बेटी का भी हक

आज रश्मि से मुलाकात हुई. उस की बातों ने    झक   झोर कर रख दिया. उस के भाई की पिछले साल दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. 2 बहनों का एकलौता भाई था. एक महीने के भीतर ही भाभी ने सब जमीनजायदाद अपने नाम लिखवा ली. मकान में ताला लगा दिया और खुद अपने पीहर के पास एक घर खरीद लिया. दोनों बहनों ने बात करने की कोशिश की, लेकिन उन को बेइज्जत कर के घर से निकाल दिया उन्होंने.

रश्मि के मातापिता कई साल पहले ही गुजर गए थे. छोटी बहन की तब तक शादी नहीं हुई थी. पिता की तेरहवीं के दिन भाई ने कोर्ट में ले जा कर दोनों बहनों से कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए थे. कारण बताया था कि पिता की जोड़ी हुई रकम बैंक से तब तक मिलेगी नहीं, जब तक कि तीनों बच्चों की लिखित सहमति नहीं होगी.

रिश्तेदारों ने भी भाई का ही साथ दिया था. बहनों ने भाई का सहयोग किया. लेकिन अब स्थिति ऐसी आ गई थी कि पिता के घर के दरवाजे उन के लिए बंद हो चुके थे. सुन कर मु   झे बहुत धक्का सा लगा. सहेली होने के नाते मैं रश्मि की मदद करना चाहती थी, इसलिए मैं ने कुछ महिलाओं से बात करने की ठानी.

सरकार ने महिलाओं को उन का हक देने के लिए जो कानून बनाए हैं या संशोधन किए हैं, क्या उन से महिलाओं को उन का हक मिल रहा है या स्थिति और भी बिगड़ गई है?

पड़ोस में रहने वाली काव्या की शादी को एक साल ही हुआ था. उस ने बताया कि शादी से पहले ही उस के भाई ने पिता से कह कर उस का राजीनामा ले लिया था कि विवाह के पश्चात वह पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मांगेगी. मेरी जिज्ञासा और बढ़ रही थी.

महल्ले में पिछले ही महीने एक अंकल की मृत्यु हुई थी. उन की पत्नी की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी. 2 ही बच्चे थे उन के. बहन ने अपना हिस्सा मांगा तो भाई ने बात करना ही बंद कर दिया.

बहन भी उच्च शिक्षा प्राप्त है. उस ने भाई के ऊपर कोर्ट में केस दर्ज कराया और अपनी ससुराल का घर छोड़ कर पिता के ही घर में दूसरी मंजिल पर आ कर रहना शुरू कर दिया. केस चल रहा है. दोनों भाईबहनों की मुलाकात कोर्ट परिसर में ही होती है. बातचीत तो बिलकुल बंद है.

मध्यवर्ग में लड़कियों को पिता की संपत्ति में अधिकार मिलने की यही जमीनी हकीकत है. अधिकार मिले या न मिले, लेकिन रिश्ते तो बिगड़ ही गए हैं. जहां लड़कियां चुप हैं, वहां उन की स्थिति ऐसे मेहमानों जैसी है जिन के आने से कोई खुश नहीं होता है, सिवा उन के मांबाप के. जो अपना अधिकार मांग रही हैं, उन्हें किसी का सहयोग मिलना तो दूर, उलटे, सब से अलगथलग रह कर जीवन बिताने पर मजबूर कर दिया जाता है. अपनों के विरुद्ध ही अदालत में जा कर लड़ाई लड़नी पड़ती है. कई बार तो मातापिता को भी बेटों का ही साथ देते हुए देखा जाता है क्योंकि उन्हें उसी घर में रहना है. पीहर की संपत्ति का यह हाल है तो क्या ससुराल में वे अपना अधिकार ले पा रही हैं?

सौम्या अपनी बहनों में सब से ज्यादा पढ़ीलिखी है. शादी हुई तो 4 भाईबहनों के परिवार में आ गई. विवाह के समय सास ने अपने पुराने गहने पहनाए. सब को लगा कि उसे बहुत अच्छी तरह रखेंगे ससुराल वाले पर विवाह के तुरंत बाद छोटीमोटी बातों को ले कर लड़के को सुनाना शुरू कर दिया. पति दूसरे शहर में नौकरी करता था. पति ने उसे अपने साथ ले जाना उचित सम   झा.

अब स्थिति ऐसी है कि ससुर ने रिटायरमैंट के बाद जो मकान बनाया, वह भी बड़े लड़के के नाम से है. दोनों बहनों ने अपने ससुराल वालों से सब रिश्ते खत्म कर रखे हैं. परिवार सहित पिता के घर में ही आतीजाती हैं. उन के बच्चे भी अधिकतर वहीं रहते हैं. जो जेवर सास ने चढ़ाए थे, वे भी बैंक में रखने के नाम पर ले लिए गए और फिर वापस नहीं मिले हैं.

सौम्या के पति की नौकरी से ही उन के परिवार का पूरा खर्च चलता है. वह भी ट्यूशन पढ़ा कर थोड़ीबहुत सहायता कर रही है. घर में सब का यही कहना है कि छोटा लड़का अपनी पारिवारिक (मातापिता के प्रति) जिम्मेदारियां नहीं निभा रहा है. सौम्या सम   झ ही नहीं पाती है कि उन की क्या गलती है, क्यों उन के साथ यह सब किया जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि जहां एक ही बेटा हो, वहां समस्या नहीं होती है. पति के साथ काम करने वाले एक लड़के की शादी मातापिता की मरजी से ही हुई. एकलौता लड़का है. बड़ी बहन की पहले ही शादी हो चुकी थी. शादी तक सब ठीक रहा. कुछ महीनों बाद ही मांबाप की बहू को ले कर शिकायतें शुरू हो गईं. ननद सर्विस करती है. उस की ससुराल भी उसी शहर में है. ननद अपनी बेटी को रोज सुबह ननिहाल में छोड़ती और फिर शाम को खाना खा कर, पति का खाना साथ ले कर वापस जाती.

बहू पहले तो सब चुपचाप करती रही, लेकिन गर्भ ठहर जाने के कारण उस की तबीयत खराब रहने लगी. मांबाप ने एकलौते बेटे को बहू के साथ घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया. पोते को देखने भी नहीं आए हैं. 2 साल का होने वाला है.

एक ही शहर में होने के कारण कभीकभार आपस में टकरा जाते हैं, लेकिन अनजान बन आगे बढ़ जाते हैं. अब लड़का दूसरे शहर में तबादले की कोशिश में जुटा हुआ है.

इन सब बातों को देखने पर लगता है कि मध्यवर्ग न तो कानून के अनुसार ही चल रहा है और न ही रिश्तों को बिखरने से बचा पा रहा है. लड़कियों को न तो अपने पिता की संपत्ति में हक मिल रहा है और न ही ससुराल में उन का कोई हक है. पढ़ने में बुरा लग सकता है, लेकिन पढ़ीलिखी लड़कियां भी इस कानून के मोह में आ कर ससुराल वालों के साथ तालमेल बिठाना ही नहीं चाह रही हैं. अपने पीहर से उन की केवल औपचारिक विदाई हो रही है. वैसे, मांबाप के जीवित रहने तक वे वहीं रह रही हैं. उन के पति और बच्चे भी वहीं आनाजाना रखते हैं.

जमीनी हकीकत

विभा की दोनों ननदें शादी के एक साल बाद ही ससुराल वालों से अलग हो गईं. उन की मां ने भी उन का पूरा साथ दिया. दोनों के ही पति प्राइवेट सैक्टर में कार्यरत हैं. सास ने ससुर से संपत्ति में अपना हक पूरा ले लिया और अब पूरी तरह मायके पर ही निर्भर हैं. उन के बच्चों के जन्मदिन से ले कर कालेज में एडमिशन तक की सारी जिम्मेदारी विभा के पति को ही निभानी पड़ती है. वे दुकान चलाते हैं, जिस पर ससुर भी साथ में बैठते हैं. पूरे साल उन का अनवरत आवागमन जारी रहता है, लेकिन उन के मातापिता में से कोई भी बीमार हो जाए या कोई और समस्या हो जाए तो उन्हें समय निकालना मुश्किल हो जाता है.

ये केवल कुछ ही उदाहरण हैं, जो अलगअलग जगहों से लिए गए हैं. इन के अलावा भी अनेक उदाहरण हैं, जिन में गृहक्लेश और घरेलू हिंसा का एक बड़ा कारण लड़की का विवाह के बाद भी अपने पीहर में बने रहना ही है.

इन सभी उदाहरणों में एक बात समान है कि किसी को भी मायके की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला है. बस, तनावपूर्ण जीवन उन की नियति बन गया है.

सरकार कोई भी कानून बनाने से पहले यदि एक सर्वे करवाए तो स्थिति बेहतर हो सकती है. इक्कादुक्का घटनाओं के अनुसार, कानून बनाने या उस में बदलाव करने से उचित परिणाम नहीं मिल सकते हैं.

कुछ परिवारों में आपसी सहमति से    झगड़े सुल   झ भी जाते हैं. रिंकी के ससुर का संपत्ति के नाम पर बस एक मकान ही था. पुराना और बड़ा मकान. रिंकी की ननद दूर दूसरे शहर में रहती थी. पिता के जाने के बाद उस ने अपना हक मांगा तो रिंकी के पति ने मकान का ऊपर वाला हिस्सा उन्हें दे दिया, लेकिन वह खुश नहीं थी. पिता को गए हुए सालभर भी नहीं हुआ था और मकान को बेचना पड़ा, क्योंकि उन्हें मकान की आधी कीमत चाहिए थी, मकान नहीं. मां ने अपनी बेटी का ही साथ दिया. मकान बिक गया. अब रिंकी एक बड़ा फ्लैट किराए पर ले कर रह रही है. उस की सास 6 महीने उन के साथ रहती है और 6 महीने बेटी के साथ. भाईबहन का रिश्ता केवल मां के कारण चल रहा है.

संपत्ति का बंटवारा

भौतिकतावादी युग में वैसे भी रिश्तेनाते अपना महत्त्व खो चुके हैं. रहीसही कसर इन कानूनों ने पूरी कर दी है. अब लड़की पढ़ीलिखी है, खुल कर अपने अधिकार के बारे में बोल सकती है, लेकिन छीन नहीं सकती है. घर को बचाने के लिए या कहें कि दोनों घरों की इज्जत बचाने की चाह में वह अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा पा रही है और क्लेशयुक्त जिंदगी जीने को मजबूर है.

कहना जरूरी सम   झती हूं कि बेटी को बाप की संपत्ति में हक देने के साथ ही यह भी अनिवार्य कर देना चाहिए कि विवाह के बाद दामाद ससुराल में ही रहे. तभी कानून व्यावहारिक रूप ले पाएगा या फिर मातापिता को बच्चों की गृहस्थी बसने से पहले अपनी वसीयत बना देनी चाहिए. लड़कियों को भी इस सच को नहीं नकारना चाहिए कि उन्हें मातापिता ने लड़कों के समान परवरिश दी है और किसी भी घर में 2 लड़कों में भी संपत्ति का बंटवारा समान रूप से नहीं होता है. मांबाप का किसी बच्चे से अधिक लगाव अथवा किसी एक का घर में दबदबा भी बंटवारे पर प्रभाव डालता है.

कानून बनाने वालों को फिर से इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि लड़कियों को लड़कों के बराबर हक देने के चलते हम वृद्धाश्रम की नींव खुद ही रख रहे हैं. वही लड़की किसी घर की बहू भी है. अपने हक के चलते यदि वह पीहर से ही नाता रखेगी तो ससुराल वालों से कैसे निभाएगी? दूसरी ओर बहू से इतनी अपेक्षाएं होते हुए भी ससुराल में उसे हक नहीं दिया जाना भी उस के मायके के प्रति लगाव को बढ़ावा देता है.

युवा लड़कियों से ही इस विषय पर सोचने के लिए आग्रह करूंगी क्योंकि कानून उन के लिए ही बनाया गया है. भाई के बराबर संपत्ति में हक मांगिए, लेकिन जिम्मेदारी भी उस के बराबर बांटिए. जब मातापिता को सहारा देना है, तब आप भाई के बराबर खड़ी रहिए तो बात बनेगी. हक आप लें और भाई की आलोचना करती रहें, दूसरी ओर मांबाप वृद्धाश्रम में रहें, यह स्थिति सुखद नहीं है.

दस्विदानिया : उसने रूसियों को क्या गिफ्ट दिया – भाग 3

दीपक बोला, ‘‘नहीं डाक्टर, आप को जाने की जरूरत नहीं है. आप अपना काम कर लें… अब नताशा आ गई है, तो मैं ठीक हो जाऊंगा.’’

डा. ईशा ने नताशा से पूछा, ‘‘तुम इंडिया कितने दिनों के लिए आई हो?’’

‘‘ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक रुक सकती हूं.’’

‘‘ठीक है, इन का बुखार उतरना शुरू हो गया है. उम्मीद है कल तक कुछ और आराम मिलेगा.’’

डाक्टर के जाने के बाद दीपक ने नताशा से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? थकीथकी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूं. तुम आराम करो. मैं अभी चलती हूं. फिर आऊंगी शाम को विजिटिंग आवर्स में.’’

नताशा डा. ईशा से मिलने उन के कैबिन में गई तो डा. ईशा बोलीं, ‘‘आप लंच मेरे साथ लेंगी… मेरे क्वार्टर में आ जाना, मैं वेट करूंगी.’’

लंच के बाद नताशा डा. ईशा से बैठी बातें कर रही थी. डा. ईशा ने कहा, ‘‘क्या बात है, इंडियन खाना पसंद नहीं आया? तुम ने तो कुछ खाया ही नहीं. तुम्हें तो इंडियन खाने की आदत डालनी होगी.’’

‘‘नहीं, खाना बहुत अच्छा था. मैं ने भरपेट खा लिया है.’’

‘‘दीपक तुम्हें बहुत चाहते हैं… तुम्हारे लिए लंबा इंतजार करने को तैयार हैं.’’

उसी समय नताशा के सिर में जोर का दर्द हुआ और नाक से खून रिसने लगा. डा. ईशा उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले गई, फिर बैड पर आराम करने के लिए लिटा दिया और पूछा, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है और ऐसा कितने दिनों से हो रहा है?’’

नताशा ने अपने बैग से दवा खाई और अपनी पूरी बीमारी विस्तार से बता दी. फिर अपनी फाइल और रिपोर्ट उन्हें दिखा कर कहा, ‘‘अब मेरी जिंदगी कुछ ही महीनों की बची है. डाक्टर ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा 1 साल. मैं चाहती हूं आप दीपक को धीरेधीरे समझाएं… हो सकता है मैं इस के बाद अब उस से मिल न सकूं, क्योंकि लंबी यात्रा के लायक नहीं रहूंगी.’’

अगले दिन दीपक को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अपने क्वार्टर में नताशा के साथ था. नताशा को अगले दिन जाना था. दीपक बोला, ‘‘मैं तो एअरफोर्स में हूं, मेरा विदेश जाना संभव नहीं है. तुम्हीं मिलने आ जाया करो. मुझे बहुत अच्छा लगता है तुम से मिल कर.’’

‘‘अच्छा तो मुझे भी लगता है, पर मुझे लगता है तुम्हारी देखभाल करने वाला कोई यहां होना चाहिए. मेरे इंतजार में कहीं तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े.’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं वेट कर लूंगा.’’

नताशा जा रही थी. दीपक से बिदा लेते समय उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. डाक्टर ने दीपक को एअरपोर्ट जाने से मना कर दिया था.

नताशा बोली, ‘‘दस्विदानिया, दोस्त.’’

डा. ईशा नताशा के साथ एअरपोर्ट आई थीं.

नताशा बोली, ‘‘डाक्टर, अब मैं दीपक से मिलने नहीं आ सकती हूं…आप समझ ही रही हैं न… मैं ने दीपक से कुछ नहीं कहा है. पर आप उसे सच बता दीजिएगा.’’

नताशा चली गई. डा. ईशा ने उस की बीमारी के बारे में दीपक को बता दिया. वह बहुत दुखी हुआ. डा. ईशा दीपक से अकसर मिलने आतीं और उसे समझातीं. लगभग 6 महीने बाद नताशा का आखिरी फोन उसे मिला. वह अस्पताल में अंतिम सांसें गिन रही थी.

नताशा ने कहा, ‘‘सौरी दोस्त, मैं अब और तुम्हारा इंतजार नहीं कर सकती हूं. किसी भी पल आखिरी सांस ले सकती हूं. टेक केयर औफ योरसैल्फ. दस्विदानिया, प्राश्चे नवसेदगा (गुड बाय सदा के लिए).’’

करीब आधे घंटे के बाद नताशा की मृत्यु की खबर दीपक को मिली. वह

बहुत दुखी हुआ. उस की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. डा. ईशा दीपक को सांत्वना दे रही थी.

बीमारी के बाद दीपक और ईशा दोनों अकसर मिलने लगे थे. एक दिन दोनों साथ बैठे थे. दीपक थोड़ा सहज हो चला था. वह बोला, ‘‘अकेलापन काटने को दौड़ता है.’’

‘‘आप देश के बहादुर सैनिक हो. अपना मनोबल बनाए रखो. ड्यूटी के बाद कुछ अन्य कार्यों में अपनेआप को व्यस्त रखो.’’

‘‘मैं नताशा को भुला नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘यादें इतनी आसानी से नहीं भूलतीं, पर कभीकभी यादों को हाशिए पर रख कर जिंदगी में आगे बढ़ना होता है. मैं भी उसे कहां भूल सकी हूं.’’

‘‘किसे?’’

‘‘फ्लाइंग अफसर राकेश से मेरी शादी तय हुई थी. हम दोनों एकदूसरे को चाहते भी थे, पर एक टैस्ट फ्लाइट के क्रैश होने से वह नहीं रहा.’’

‘‘उफ , सो सौरी.’’

कुछ दिन बाद क्लब में डा. ईशा और दीपक एक सीनियर अफसर स्क्वाड्रन लीडर उमेश के साथ बैठे थे. उमेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों की कहानी मिलतीजुलती है. क्यों न तुम दोनों एक हो कर एकदूसरे के सुखदुख में साथ दो.’’

डा. ईशा और दीपक एकदूसरे को देखने लगे. उमेश ने महसूस किया कि दोनों की आंखों से स्वीकृति का भाव साफ छलक रहा है.

वो जलता है मुझ से : विजय को तकलीफ क्यों होने लगी थी ? – भाग 3

‘‘मैं डरने लगा हूं अब उस से. उस का व्यवहार अब बहुत पराया सा हो गया है. पिछले दिनों उस ने यहां एक फ्लैट खरीदा है पर उस ने मुझे बताया तक नहीं. सादा सा समारोह किया और गृहप्रवेश भी कर लिया पर मुझे नहीं बुलाया.’’ ‘‘अगर बुलाता तो क्या तुम जाते? तुम तो उस के उस छोटे से फ्लैट में भी दस नुक्स निकाल आते. उस की भी खुशी में सेंध लगाते…अच्छा किया उस ने जो तुम्हें नहीं बुलाया. जिस तरह तुम उसे अपना महल दिखा कर खुश हो रहे थे उसी तरह शायद वह भी तुम्हें अपना घर दिखा कर ही खुश होता पर वह समझ गया होगा कि उस की खुशी अब तुम्हारी खुशी हो ही नहीं सकती. तुम्हारी खुशी का मापदंड कुछ और है और उस की खुशी का कुछ और.’’

‘‘मन बेचैन क्यों रहता है यह जानने के लिए कल मैं पंडितजी के पास भी गया था. उन्होंने कुछ उपाय बताया है,’’ विजय बोला. ‘‘पंडित क्या उपाय करेगा? खुशी तो मन के अंदर का सुख है जिसे तुम बाहर खोज रहे हो. उपाय पंडित को नहीं तुम्हें करना है. इतने बडे़ महल में तुम चैन की एक रात भी नहीं काट पाए क्योंकि इस की एकएक ईंट कर्ज से लदी है. 100 रुपए कमाते हो जिस में 80 रुपए तो कारों और घर की किस्तों में चला जाता है. 20 रुपए में तुम इस महल को संवारते हो. हाथ फिर से खाली. डरते भी हो कि अगर आज तुम्हें कुछ हो जाए तो परिवार सड़क पर न आ जाए.

‘‘तुम्हारे परिवार के शौक भी बड़े निराले हैं. 4 सदस्य हो 8 गाडि़यां हैं तुम्हारे पास. क्या गाडि़यां पेट्रोल की जगह पानी पीती हैं? शाही खर्च हैं. कुछ बचेगा क्या, तुम पर तो ढेरों कर्ज है. खुश कैसे रह सकते हो तुम. लाख मंत्रजाप करवा लो, कुछ नहीं होने वाला. ‘‘अपने उस मित्र पर आरोप लगाते हो कि वह तुम से जलता है. अरे, पागल आदमी…तुम्हारे पास है ही क्या जिस से वह जलेगा.

उस के पास छोटा सा ही सही अपना घर है. किसी का कर्ज नहीं है उस पर. थोड़े में ही संतुष्ट है वह क्योंकि उसे दिखावा करना ही नहीं आता. सच पूछो तो दिखावे का यह भूत तकलीफ भी तो तुम्हें ही दे रहा है न. तुम्हारी पत्नी लाखों के हीरे पहन कर आराम से सोती है, जागते तो तुम हो न. क्यों परिवार से भी सचाई छिपाते हो तुम. अपना तौरतरीका बदलो, विजय. खर्च कम करो. अंकुश लगाओ इस शानशौकत पर. हवा में मत उड़ो, जमीन पर आ जाओ. इस ऊंचाई से अगर गिरे तो तकलीफ बहुत होगी.

‘‘मैं शहर का सब से अच्छा काउंसलर हूं. मैं अच्छी सुलह देता हूं इस में कोई शक नहीं. तुम्हें कड़वी बातें सुना रहा हूं सिर्फ इसलिए कि यही सच है. खुशी बस, जरा सी दूर है. आज ही वही पुराने विजय बन जाओ. मित्र के छोटे से प्यार भरे घर में जाओ. साथसाथ बैठो, बातें करो, सुखदुख बांटो. कुछ उस की सुनो कुछ अपनी सुनाओ. देखना कितना हलकाहलका लगेगा तुम्हें. वास्तव में तुम चाहते भी यही हो. तुम्हारा मर्ज भी वही है और तुम्हारी दवा भी.’’ चला गया विजय. जबजब परेशान होता है आ जाता है. अति संवेदनशील है, प्यार पाना तो चाहता है लेकिन प्यार करना भूल गया है.

संसार के मैल से मन का शीशा मैला सा हो गया है. उस मैल के साथ भी जिआ नहीं जा रहा और उस मैल के बिना भी गुजारा नहीं. मैल को ही जीवन मान बैठा है. प्यार और मैल के बीच एक संतुलन नहीं बना पा रहा इसीलिए एक प्यारा सा रिश्ता हाथ से छूटता जा रहा है. क्या हर दूसरे इनसान का आज यही हाल नहीं है? खुश रहना तो चाहता है लेकिन खुश रहना ही भूल गया है. किसी पर अपनी खीज निकालता है तो अकसर यही कहता है, ‘‘फलांफलां जलता है मुझ से…’’ क्या सच में यही सच है? क्या यह सच है कि हर संतोषी इनसान किसी के वैभव को देख कर सिर्फ जलता है?

कैसा यह इश्क है : पूर्वी ने खुद को कैसे माफ किया ?

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अब इंटैंसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू (ICU) में बढ़ेगा सरकारी दखल

इंटैंसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू में मरीज को भरती कर अनावश्यक रूप से अस्पताल पैसे बनाने का काम करते हैं. ये शिकायतें आम हो रही हैं. इन हालात को देखते हुए सरकार ने आईसीयू में भरती के कुछ नियम बना दिए हैं. इस से आईसीयू भरती में सरकारी दखल बढ़ेगा. कोरानाकाल में यह देखने को मिला था जब मरीज को भरती करने के लिए सीएमओ का रैफरल लैटर जरूरी होता था. उस दौर में तमाम मरीज रैफरल लैटर के इंतजार में ही जान गंवा बैठते थे.

आईसीयू में सरकारी दखल के बाद सरकारी अफसर अस्पतालों पर अपना दबाव बढ़ाने लगेंगे. उन के लिए चढ़ावे का एक और रास्ता खुल जाएगा. सरकार को यह लगता है कि उस के विभाग बहुत ईमानदार हैं. वह यह नहीं सोचती कि जितने कानून बनेंगे, चढ़ावे का चलन बढ़ता जाएगा. दिशानिर्देशों का प्रयोग एक सीमा तक ही सही है. उस को बहुत जरूरी या कानून जैसा बना दिया गया तो दिक्कतें बढ़ जाएंगी. सबकुछ पीएमओ जैसे अफसरों की दखल में हो, यह जरूरी नहीं होना चाहिए.

मरीज और घर वालों की मरजी जरूरी

आईसीयू में मरीजों को कब दाखिला देना और कब उन्हें आईसीयू में नहीं रखना है, इस को ले कर सरकार ने दिशानिर्देश जारी किए हैं. देखने में ऐसा लगता है जैसे इस से मरीजों की दिक्कतें कम हो जाएंगी. असल में इस से अस्पताल में मरीजों की भरती होने पर सरकारी दखल बढ़ेगा. आईसीयू में इलाज की आवश्यकता को बताने के लिए क्रिटिकल केयर मैडिसिन के जानकार 24 शीर्ष डाक्टरों के एक पैनल ने ये नियम तैयार किए हैं.

दिशानिर्देशों में उन इलाज की उन जरूरतों को बताया गया है जिन में मरीज को आईसीयू में प्रवेश की आवश्यकता होती है. इस में यह भी बताया गया है कि कब मरीज को आईसीयू में नहीं रखा जाना चाहिए और कब उसे आईसीयू से डिस्चार्ज कर दिया चाहिए.

भारत सरकार के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय द्वारा जारी इन दिशानिर्देशों में बताया गया है कि अधिकांश विकसित देशों में संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए रोगियों का परीक्षण करने के लिए प्रोटोकौल हैं. दिशानिर्देशों में ऐसे करीब 7 मानदंड तय किए गए हैं जिन के अनुसार मरीज को आईसीयू में भरती किया जा सकता है.

इस में कहा गया है कि सिर्फ किसी अंग के फेल हो जाने, किसी अंग से जुड़ी बाहरी मदद की स्थिति, गहन निगरानी की आवश्यकता वाली गंभीर बीमारी के मामले, रोगी को श्वसन सहायता की आवश्यकता होने, सर्जरी के बाद के मामलों में हालत बिगड़ने से रोकेने, चेतना का स्तर परिवर्तित हो जाने आदि स्थितियों में ही मरीज को आईसीयू में भरती किया जाए.

मरीज की वसीयत में या मरीज के रिश्तेदारों की मरजी के खिलाफ रोगी को आईसीयू में भरती नहीं किए जाने का निर्देश हैं. जब मरीज को ऐसी बीमारी हो जिस में ठीक होने की संभावना सीमित हो या फिर जब उपचार से लाभ होने की संभावना न हो तो भी मरीज को आईसीयू में भरती न किया जाए.

नियमकानून नहीं, स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ाएं

इंडियन सोसाइटी औफ क्रिटिकल केयर मैडिसिन एक्सपर्ट्स कमेटी के चेयरमैन डाक्टर नरेंद्र रूंगटा का मानना है कि आईसीयू में मरीज की भरती का मानदंड यह होना चाहिए कि हम मरीज के शेष बचे दिनों में जीवन का संचार कर सकें न कि उस के जीवन में मात्र कुछ दिन जोड़ सकें. कई बार मरीज को डाक्टर के हाथों इलाज के बजाय अपनों के बीच देखभाल की जरूरत होती है. ऐसे हालात में मरीज को आईसीयू में भरती करना मरीज के साथ अत्याचार है. साथ ही, इस से मरीज की जेब पर अनावश्यक रूप से खर्च भी आता है.

प्राइवेट अस्पतालों में आईसीयू बैड की कीमत जनरल बैड की जगह पर 5 से 10 गुनी अधिक होती है. आईसीयू के बैड कम होते हैं. ऐसे में उन का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए. इन दिशानिर्देशों को डाक्टर के विवेक पर छोड़ना ही सही होगा क्योंकि वही जानता है कि मरीज को किस तरह के इलाज की जरूरत है. इस की एक वजह यह भी है कि हमारे यहां आईसीयू के बैड कम हैं.

सरकारी अस्पतालों में बैड हैं तो उन पर काम करने वाला मैडिकल स्टाफ नहीं है. सरकार मशीन और बैड तो खरीद लेती है पर स्टाफ नहीं रखती, जिस से मशीनें और बैड धूल खाते हुए खराब हो जाटे हैं. ऐेसे मे सरकार को नियमकानून बनाने के साथ ही साथ संसाधन बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए. स्वास्थ्य सेवाओं पर केवल पैसे वालों का ही हक नहीं होना चाहिए. गरीब मरीज भी स्वास्थ्य लाभ ले सके, इस का प्रबंध सरकार को करना चाहिए.

उदासी मन काहे को करे तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार

उम्मीद की जानी चाहिए कि 22 जनवरी के सूर्योदय के साथ ही आम लोगों की जिंदगी में कोई समस्या, कमी या अभाव नहीं रह जाएगा. चारों तरफ खुशहाली होगी, कोई बेरोजगार नहीं रहेगा, कोई बीमार नहीं पड़ेगा, किसी को कोई दैहिक या दैविक कष्ट नहीं होगा, सभी बराबर होंगे, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीने लगेंगे, सामाजिक तौर पर देखेंगे तो एक समतामूलक समाज की स्थापना हो जाएगी, देवालयों में यज्ञभजनकीर्तन हो रहे होंगे, सभी लोग विष्णु की आराधना कर रहे होंगे, धरती बिना मेहनत किए अनाज उगल रही होगी, पेड़ फूलों और फलों से लदे होंगे. रामराज की महिमा के बखान का संक्षिप्त उपसंहार इस बात से किया जा सकता है कि गायें तक बिना गाभिन हुए ही दूध दे रही होंगी.

भारत राममय हो रहा है. राम ज्योति जलाने की अपील हो रही है. लोगों से आह्वान किया जा रहा है कि वे 22 जनवरी को जितना ज्यादा हो सके, पूजापाठ करें, मंदिरों में जाएं, रामधुन पर नाचेंगाएं. देश के 5 लाख मंदिरों में उत्सव होगा. अयोध्या की झांकी सीधे प्रसारित की जाएगी. आखिर, 500 साल बाद देश में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना जो हो रही है . रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी जिस के गवाह बनने के लिए लाखों लोग अयोध्या पहुंच रहे हैं. यही लोग  सद्कर्मी और राम के प्रिय हैं. अधर्मी, विधर्मी और नास्तिक, वामपंथी तो न्योता दिए जाने के बाद भी राममहिमा समझ नहीं पा रहे. विधाता ने उन की बुद्धि हर रखी है. अभी उन के उद्धार और मुक्ति का समय नहीं आया है

एक तीर से कई निशाने

साल 2014 में नरेंद्र मोदी ने जो कहा था उसे उन्होंने कर दिखाया है. राममंदिर निर्माण भाजपा का वादा था, जो अब पूरा हो गया है. सो, जनता से अब कहा जा रहा है कि जो भी मांगना है, मंदिरों में जा कर मांगो. रोजगार अब भगवानजी देंगे, महंगाई भी वही कम करेंगे. अस्पताल, सड़कें और स्कूल जितना हो सकता है, हम बनवा ही रहे हैं और ज्यादा चाहिए तो इस के लिए भजनकीर्तन करो, पूजापाठ से प्रभु को प्रसन्न करो.

यह ठीक है कि मौजूदा भगवा सरकार पूजापाठी है. देश के अधिकतर लोग भी पूजापाठी हैं और अब 22 जनवरी के बहाने उन्हें और उकसाया जा रहा है, जिस का मकसद यही है कि लोग सरकार से उस के किए का हिसाबकिताब न मांगें. जो मांगना है, भगवान से मांगें और इस के लिए मंदिर जाएं. वहां भी कुछ मुफ्त में नहीं मिलता है बल्कि पंडेपुजारियों को दक्षिणा चढ़ानी पड़ती है. इस से पैसा ब्राह्मणों को मिलता है. असल सत्ता तो वही चलाते हैं.

यही लोग भाजपा को वोट दिलाते हैं कि देखो, बड़ी धार्मिक सरकार है, यही कल्याण कर सकती है और लोग वोट दे देते हैं. 2024 के आम चुनाव के मद्देनजर भाजपा के पास एयरस्ट्राइक सरीखा कोई वोटकमाऊ मुद्दा है नहीं, सो उस ने राममंदिर को मुद्दा बना लिया है. अब वह मंदिर निर्माण की दक्षिणा मांग रही है तो कोई गुनाह नहीं कर रही क्योंकि जनता ने उसे चुना भी इसी मुद्दे पर था.

किसे क्या मिल रहा है

22 जनवरी को देशभर के मंदिरों में पूजापाठ के एवज में लोग जेब और दिल खोल कर दानपत्रों में पैसा डालेंगे, यही सरकार का मकसद भी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग पूजापाठ की मानसिकता के शिकार हों. इसे ही मानसिक गुलामी कहते हैं कि जनता खुद से जुड़े मुद्दे भूल कर सरकार की मंशा के मुताबिक नाचे. पूजापाठ से कुछ मिलता होता तो अब तक मिल चुका होता. यह दुनिया का सब से बड़ा कारोबार है जिस में लोगों को मिलता कुछ नहीं है, उलटे, वे जिंदगीभर कि अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा धर्म के दुकानदारों को बतौर धर्म टैक्स देते रहते हैं.

जो माहौल अभी अयोध्यामय दिख रहा है वह तात्कालिक या 22 जनवरी को ही खत्म हो जाने वाला नहीं है. वह अब सालोंसाल चलेगा. लोग भव्य अयोध्या और राममंदिर देखने सालोंसाल वहा जाएंगे. सरकार अभी लोगों को अयोध्या जाने को जो प्रोत्साहित कर रही है वह किसी प्रोडक्ट के प्रचार जैसा है. इस के बाद उसे कुछ नहीं करना. अयोध्या भी काशी, मथुरा, उज्जैन और तिरुपति जैसा हो जाएगा. तब तक मुमकिन है भाजपा फिर केंद्रीय सत्ता में हो. और फिर वह कोई नया शिगूफा ढूंढ लेगी.

आमलोग धर्म के जनून में डूबे सोच ही नहीं पा रहे हैं कि इस से उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है. जो जेब से जा रहा है वह साफ दिख रहा है. यही नहीं, उसे एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार से जो मिलना चाहिए था, उस से भी वह वंचित हो रहे हैं.

मीडिया बिक चुका है, विपक्ष हताश है, आम लोग अफीम के नशे में झूम रहे हैं और यह माहौल बनाने वाले कह रहे हैं, तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को करे.

रोजाना सुबह खाली पेट पिएं शहद और नीबू पानी, शरीर को मिलेंगे ढेरों फायदे

Lemon & Honey Water Benefits : खराब लाइफस्टाइल और भागदौड़ वाली जिंदगी के चलते कई लोगों को अपनी सेहत का ख्याल रखने का समय नहीं मिलता है. ऐसे में न चाहते हुए भी उनको कई बीमारियां अपने चपेट में ले लेती हैं. अगर आपको भी लगता है कि आपकी लाइफस्टाइल खराब हो रही है. तो आज हम आपको एक ऐसे उपाय के बारे में बताएंगे, जिसे अपनाने से कुछ ही समय में आपकी एक या दो नहीं बल्कि कई सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

दरअसल, एक शोध में खुलासा हुआ है कि रोज सुबह खाली पेट नींबू और शहद का पानी पीने से शरीर को कई लाभ मिलते हैं. नींबू, जहां विटामिन-C का समृद्ध स्रोत होता है. तो वहीं शहद इम्युनिटी को मजबूत बनाने में काफी मददगार होता है. ऐसे में इन दोनों के मिश्रण से शरीर की कई समस्याएं छूमंतर हो जाती हैं. तो आइए जानते हैं प्रतिदिन नींबू और शहद के पानी (Lemon & Honey Water Benefits) को पीने से मिलने वाले फायदों के बारे में.

शहद और नींबू का पानी पीने के 6 आश्चर्यजनक लाभ

1. शरीर रहता है डिटॉक्स

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन के अनुसार, रोजाना सुबह एक गिलास गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद (Lemon & Honey Water Benefits) को मिलाकर पीने से शरीर डिटॉक्स रहता है. दरअसल, नींबू और शहद के संयोजन से बने मिश्रण में बहुत सारे शक्तिशाली रोगाणुरोधी गुण होते हैं. जो कि बैक्टीरिया के साथ-साथ कीटाणुओं की शक्ति को भी कम करने में फायदेमंद होते है. इसी वजह से खाली पेट इसे पीने से शरीर में मौजूद सभी हानिकारक तत्व बाहर निकल जाते हैं.

2. कम करता है वजन

शहद-नींबू में मौजूद तत्व मेटाबॉलिज्म की दर को बढ़ाते है, जिससे आसानी से वजन कम होता है. साथ ही इसे पीने से शरीर भरा-भरा रहता है, जिससे बार-बार भूख नहीं लगती है और शरीर हाइड्रेट रहता है.

3. पाचन में करता है मदद

प्रतिदिन खाली पेट नींबू और शहद का पानी (Lemon & Honey Water Benefits) पीने से पाचन संबंधी समस्याएं भी दूर होने लगती हैं. साथ ही पाचन तंत्र और मल त्याग बेहतर होता है. इसके अलावा पेट फूलने की समस्या और सूजन की समस्या से भी छुटकारा मिलता है.

4. त्वचा होती है साफ

नियमित नींबू और शहद का पानी पीने से पिंपल्स और दाग-धब्बों की समस्या भी खत्म होती हैं. दरअसल, ये पेय जीवाणुरोधी होता है तो सुबह-सुबह इसे पीने से शरीर में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया मर जाते हैं, जिससे त्वचा संबंधी समस्याएं अपने आप कम होने लगती हैं.

5. इम्युनिटी होती है मजबूत

रोजाना सुबह गर्म पानी में शहद और नींबू का रस (Lemon & Honey Water Benefits) मिलाकर पीने से इम्युनिटी मजबूत होती है. साथ ही फ्लू, खांसी और सर्दी-जुकाम की समस्या से भी छुटकारा मिलता है.

6. इन्फ्लेमेशन होता है दूर

नींबू और शहद का मिश्रण इन्फ्लेमेशन को कम करने में भी मददगार होता है. साथ ही ये डायबिटीज, किडनी स्टोन, अलसर, कोलेस्ट्रोल और वात आदि की समस्या को भी कम करता है.

सुबह उठते ही शुरू हो जाता है सिरदर्द, तो जानें कारण और बचाव के उपाय

Morning Headache Causes and Preventive Measures : सिरदर्द, ये एक ऐसी समस्या है. जो आमतौर पर सभी लोगों को रहती ही है. जहां कुछ लोगों को कभी-कभी सिरदर्द होता है. तो वहीं कुछ लोगों का सिर हर समय भारी-भारी रहता है. इसके अलावा कुछ लोग तो ऐसे भी है, जिन्हें सुबह उठते ही सिरदर्द की समस्या होने लगती है. अगर आपको भी रोजाना सुबह उठते ही सिरदर्द होने लगता है. तो आज हम आपको इस आर्टिकल में इसके कारण और बचाव के उपायों (Morning Headache Causes and Preventive Measures) के बारे में बताएंगे.

क्यों होता है सिरदर्द ?

  1. आपको बता दें कि सुबह उठते ही होने वाला सिरदर्द ज्यादातर टेंशन की वजह से होता है.
  2. इसके अलावा जो लोग शिफ्ट्स में काम करते हैं. उन्हें भी अक्सर सुबह उठते ही सिरदर्द (Morning Headache Causes) का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन लोगों की नींद का समय बदलता रहता है. ऐसे में उनकी बॉडी को रुटीन चेंज करने में दिक्कत होती है और नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे सुबह उठते ही सिरदर्द होने लगता है.
  3. वहीं इंसोमनिया की समस्या के कारण भी सुबह उठते ही सिरदर्द की समस्या रहती है. इस समस्या में व्यक्ति सोने का प्रयास करता है, लेकिन उसे नींद नहीं आती. ऐसे में उसे सुबह उठते ही सिरदर्द का एहसास होता है.
  4. इसके अलावा सही तकिया ना होने पर भी सुबह सिरदर्द की समस्या होने लगती है.
  5. डिप्रेशन और एंग्जाइटी की वजह से भी कई लोगों को सुबह उठते ही सिरदर्द होने लगता है.
  6. वहीं कुछ दवाइयां लेने से भी नींद प्रभावित होती है, जिससे सुबह सोकर उठने पर व्यक्ति को सिरदर्द का सामना करना पड़ता है.

गौरतलब है कि अगर आपको कभी भी सिरदर्द होता है तो इसमें कोई घबराने की बात नहीं है लेकिन जब सामान्य से अधिक सिरदर्द होने लगे तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

सुबह के सिरदर्द होने के लक्षण

आपको बता दें कि, सिरदर्द (Morning Headache Symptoms) होने के सभी लोगों में अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं. जैसे कि-

  1. जिन लोगों को आधे सिर में बहुत तेज दर्द होता है, तो उन्हें माइग्रेन की समस्या हो सकती है.
  2. इसके अलावा जब क्लस्टर सिरदर्द की समस्या होती है, तो सिर और आंखों के आसपास बहुत अधिक जलन का एहसास होता है.
  3. वहीं साइनस से होने वाला सिरदर्द ज्यादातर किसी इंफेक्शन या बीमारी की वजह से होता है. जो अक्सर नाक के साथ-साथ आंखों और माथे में भी होता है.

सिरदर्द से बचने के उपाय

  1. आपको बताते चलें कि माथे पर कोल्ड पैक रखने से माइग्रेन से होने वाले सिरदर्द (Morning Headache Preventive Measures ) में राहत मिलती है. इसके लिए आइस पैक को ब्रेक-ब्रेक पर कम से कम 15 मिनट के लिए माथे पर रखें.
  2. इसके अलावा सिरदर्द की समस्या में गर्दन और सिर के पीछे हीटिंग पैक रखने से भी राहत मिलती है.
  3. सुबह उठते ही अगर आपको सिरदर्द की समस्या रहती है. तो ऐसे में गर्म पानी से नहाने से काफी राहत मिलती है.
  4. वहीं जिस समय आपको सिरदर्द हो रहा है उस समय टेंशन न लें और बालों को खुला छोड़ दें. इससे सिरदर्द में काफी राहत मिलती है.
  5. इसके अलावा अगर आप च्युइंग गम ज्यादा चबाते है तो ऐसा न करें. इससे न सिर्फ जबड़ों में दर्द होता है. साथ ही सिरदर्द भी होने लगता है. इसलिए सिरदर्द में ज्यादा हार्ड चीजें न चबाएं और हल्की डाइट लें.
  6. सिरदर्द की समस्या में थोड़ी मात्रा में कैफीन का सेवन करना भी फायदेमंद होता है.
  7. अधिक मात्रा में शराब पीने से भी कुछ लोगों को सिरदर्द और तनाव का सामना करना पड़ता है. ऐसे में सिरदर्द व माइग्रेन की समस्या में शराब पीने से बचें.

वो जलता है मुझ से : विजय को तकलीफ क्यों होने लगी थी ? – भाग 2

‘‘जिस नौकरी में तुम्हारा वह दोस्त है न वहां लाखों कमा कर तुम से भी बड़ा महल बना सकता था लेकिन वह ईमानदार है तभी अभी तक अपना घर नहीं बना पाया. तुम्हारी अमीरी उस के लिए कोई माने नहीं रखती, क्योंकि उस ने कभी धनसंपदा को रिश्तों से अधिक महत्त्व नहीं दिया. दोस्ती और प्यार का मारा आता था. तुम्हारा व्यवहार उसे चुभ गया होगा इसलिए उस ने भी हाथ खींच लिया.’’ ‘‘तुम्हें क्या लगता है…मुझ में उच्च गं्रथि का विकास होने लगा है या हीन ग्रंथि हावी हो रही है?’’

‘‘दोनों हैं. एक तरफ तुम सोचने लगे हो कि तुम इतने अमीर हो गए हो कि किसी को भी खड़ेखडे़ खरीद सकते हो. तुम उंगली भर हिला दोगे तो कोई भी भागा चला आएगा. यह मित्र भी आता रहा, तो तुम और ज्यादा इतराने लगे. दोस्तों के सामने इस सत्य का दंभ भी भरने लगे कि फलां कुरसी पर जो अधिकारी बैठा है न, वह हमारा लंगोटिया यार है. ‘‘दूसरी तरफ तुम में यह ग्रंथि भी काम करने लगी है कि साथसाथ चले थे पर वह मेज के उस पार चला गया, कहां का कहां पहुंच गया और तुम सिर्फ 4 से 8 और 8 से 16 ही बनाते रह गए. अफसोस होता है तुम्हें और अपनी हार से मुक्ति पाने का सरल उपाय था तुम्हारे पास उसे बुला कर अपना प्रभाव डालना. अपने को छोटा महसूस करते हो उस के सामने तुम. यानी हीन ग्रंथि.

‘‘सत्य तो यह है कि तुम उसे कम वैभव में भी खुश देख कर जलते हो. वह तुम जितना अमीर नहीं फिर भी संतोष हर पल उस के चेहरे पर झलकता है…इसी बात पर तुम्हें तकलीफ होती है. तुम चाहते हो वह दुम हिलाता तुम्हारे घर आए…तुम उस पर अपना मनचाहा प्रभाव जमा कर अपना अहम संतुष्ट करो. तुम्हें क्या लगता है कि वह कुछ समझ नहीं पाता होगा? जिस कुरसी पर वह बैठा है तुम जैसे हजारों से वह निबटता होगा हर रोज. नजर पहचानना और बदल गया व्यवहार भांप लेना क्या उसे नहीं आता होगा. क्या उसे पता नहीं चलता होगा कि अब तुम वह नहीं रहे जो पहले थे. प्रेम और स्नेह का पात्र अब रीत गया है, क्या उस की समझ में नहीं आता होगा? ‘‘तुम कहते हो एक दिन उस ने तुम्हारी गाड़ी में बैठने से मना कर दिया. उस का घर तुम्हारे घर से ज्यादा दूर नहीं है इसलिए वह पैदल ही सैर करते हुए वापस जाना चाहता था. तुम्हें यह भी बुरा लग गया. क्यों भई? क्या वह तुम्हारी इच्छा का गुलाम है? क्या सैर करता हुआ वापस नहीं जा सकता था. उस की जराजरा सी बात को तुम अपनी ही मरजी से घुमा रहे हो और दुखी हो रहे हो. क्या सदा दुखी ही रहने के बहाने ढूंढ़ते रहते हो?’’

आंखें भर आईं विजय की. ‘‘प्यार करते हो अपने दोस्त से तो उस के स्वाभिमान की भी इज्जत करो. बचपन था तब क्या आपस में मिट्टी और लकड़ी के खिलौने बांटते नहीं थे. बारिश में तुम रुके पानी में धमाचौकड़ी मचाना चाहते थे और वह तुम्हें समझाता था कि पानी की रुकावट खोल दो नहीं तो सारा पानी कमरों में भर जाएगा.

‘‘संसार का सस्तामहंगा कचरा इकट्ठा कर तुम उस में डूब गए हो और उस ने अपना हाथ खींच लिया है. वह जानता है रुकावट निकालना अब उस के बस में नहीं है. समझनेसमझाने की भी एक उम्र होती है मेरे भाई. 45 के आसपास हो तुम दोनों, अपनेअपने रास्तों पर बहुत दूर निकल चुके हो. न तुम उसे बदल सकते हो और न ही वह तुम्हें बदलना चाहता होगा क्योंकि बदलने की भी एक उम्र होती है. इस उम्र में पीछे देख कर बचपन में झांक कर बस, खुश ही हुआ जा सकता है. जो उस ने भी चाहा और तुम ने भी चाहा पर तुम्हारा आज तुम दोनों के मध्य चला आया है. ‘‘बचपन में खिलौने बांटा करते थे… आज तुम अपनी चकाचौंध दिखा कर अपना प्रभाव डालना चाहते हो. वह सिर्फ चाय का एक कप या शरबत का एक गिलास तुम्हारे साथ बांटना चाहता है क्योंकि वह यह भी जानता है, दोस्ती बराबर वालों में ही निभ सकती है. तुम उस के परिवार में बैठते हो तो वह बातें करते हो जो उन्हें पराई सी लगती हैं. तुम करोड़ों, लाखों से नीचे की बात नहीं करते और वह हजारों में ही मस्त रहता है. वह दोस्ती निभाएगा भी तो किस बूते पर. वह जानता है तुम्हारा उस का स्तर एक नहीं है.

‘‘तुम्हें खुशी मिलती है अपना वैभव देखदेख कर और उसे सुख मिलता है अपनी ईमानदारी के यश में. खुशी नापने का सब का फीता अलगअलग होता है. वह तुम से जलता नहीं है, उस ने सिर्फ तुम से अपना पल्ला झाड़ लिया है. वह समझ गया है कि अब तुम बहुत दूर चले गए हो और वह तुम्हें पकड़ना भी नहीं चाहता. तुम दोनों के रास्ते बदल गए हैं और उन्हें बदलने का पूरापूरा श्रेय भी मैं तुम्हीं को दूंगा क्योंकि वह तो आज भी वहीं खड़ा है जहां 20 साल पहले खड़ा था. हाथ उस ने नहीं तुम ने खींचा है. जलता वह नहीं है तुम से, कहीं न कहीं तुम जलते हो उस से.

तुम्हें अफसोस हो रहा है कि अब तुम उसे अपना वैभव दिखादिखा कर संतुष्ट नहीं हो पाओगे… और अगर मैं गलत कह रहा हूं तो जाओ न आज उस के घर पर. खाना खाओ, देर तक हंसीमजाक करो…बचपन की यादें ताजा करो, किस ने रोका है तुम्हें.’’ चुपचाप सुनता रहा विजय. जानता हूं उस के छोटे से घर में जा कर विजय का दम घुटेगा और कहीं भीतर ही भीतर वह वहां जाने से डरता भी है. सच तो यही है, विजय का दम अपने घर में भी घुटता है. करोड़ों का कर्ज है सिर पर, सारी धनसंपदा बैंकों के पास गिरवी है. एकएक सांस पर लाखों का कर्ज है. दिखावे में जीने वाला इनसान खुश कैसे रह सकता है और जब कोई और उसे थोड़े में भी खुश रह कर दिखाता है तो उसे समझ में ही नहीं आता कि वह क्या करे. अपनी हालत को सही दिखाने के बहाने बनाता है और उसी में जरा सा सुख ढूंढ़ना चाहता है जो उसे यहां भी नसीब नहीं हुआ.

अपनों का सुख: बूढ़े पिता के आगे शुभेंदु को अपना कद बौना क्यों लग रहा था- भाग 2

‘अब लेकिनवेकिन कुछ नहीं पिताजी. हमें पुणे जाना है, तो जाना है.’ निष्ठुर शुभेंदु ने निर्लज्जता से जवाब दिया.

‘ठीक है बेटा, जैसा तुम अच्छा समझो,’ व्यथित मन से शिवजी साह ने कहा.

“मैम, क्या सोचने लगीं. लीजिए गरमगरम पकौड़े और कौफी पीजिए, तनाव खत्म हो जाएगा,” मीणा की आवाज सुन कर सुधा चौंकी और अपने खयालों से वापस आई.

कौफी की चुस्कियां लेते हुए सुधा ने कहा, “मीणा, शुभेंदु के पिता को तुम्हीं फोन करो, उन से बात करने की मुझ में हिम्मत नहीं है.”

“ऐसा नहीं कहते मैम, अपनों से बात हिम्मत से नहीं, अपनत्व की भावना से की जाती है. कहा गया है कि पुत्र भले कुपुत्र हो जाए, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती. आप अपना मोबाइल मुझे दीजिए, नंबर लगा देती हूं. आप बात करें,” मीणा ने उत्सुकता से कहा.

“नहीं, नहीं, तुम ही बात करो.”

“इस का मतलब यह हुआ कि अब भी आप उन्हें अपना नहीं समझतीं. तब तो फुजूल की बहस करने से क्या लाभ. अब मैं चली,” गुस्सा में मीणा ने उलाहना दिया और जाने के लिए दरवाजे की ओर अपना रुख किया.

“गुस्ताख़ी माफ़ करो, मीणा. मैं अपने ससुर से बात करूंगी. उन से पुणे आने के लिए विनती करूंगी.” मीणा से माफी मांगते हुए सुधा की आंखें भर आईं. उस ने मोबाइल का स्पीकर औन कर भर्राई आवाज में कहा,

“हैलो, हैलो, मैं सुधा पुणे से बोल रही हूं.”

“हां, हां, बोलो, क्या बात है, बहू? मैं सुनंदा, तेरी सास बोल रही हूं,” आवाज पहचानते ही सुनंदा ने पूछा.

“मैं मुसीबत में घिर गई हूं. मां, आप पिताजी को ले कर जल्द पुणे पहुंचिए. आप का लाडला बेटा जेल में बंद है.”

“ओह, यह तो बहुत ही दुखद बात है. लेकिन बहू, घबराना नहीं, हम आ रहे हैं,” सुनंदा ने व्यग्रता के साथ उस से कहा.

तभी शिवजी साह सुनंदा के पास पहुंचे और पूछा, “किस का फोन है?”

“पुणे से, बहू का”

“बहू, सुधा का” अचरज के साथ शिव जी ने आश्चर्य प्रकट किया. उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उन के परिवार में बेटा और बहू भी हैं. उन्होंने सुनंदा से मोबाइल अपने हाथ में ले लिया और पूछा, “हैलो, हैलो, कैसी हो बहू, तेरा ससुर बोल रहा हूं.”

“शुभेंदु जेल में है पिताजी, मैं क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है?”

“वह जेल में कैसे बंद हो गया?” धैर्य के साथ शिव जी ने पूछा.

“एक पब में शुभेंदु का जाट ग्रुप के युवकों से झगड़ा हो गया था. जिस के कारण शुभेंदु पर केस हो गया है,” संयत हो कर सुधा ने जवाब दिया.

“ओह, चिंता न करो बहू. हम पैसे का इंतजाम कर तुरंत पहुंचते हैं.”

“ठीक है पिता जी, जल्द आइए. मैं आप का इंतजार करूंगी.”

” ठीक है, तुम अपने को अकेला न समझना.”

शिव जी ने कहने के लिए तो कह दिया कि अकेला न समझना, लेकिन वे स्वयं 20 वर्षों से अकेले थे, जब से शुभेंदु का अचार, विचार और व्यवहार बदल गया था. वे उस से बहुत ही आहत रहते थे. सोचे थे कि जवान बेटा की शादी के बाद उन के आंगन में खुशियां दिल खोल कर नाचेंगी. बहू के पायलों की रुनझुन से घर में छाई मनहूसियत भागेगी. नन्हेमुन्ने शिशुओं की किलकारियों से घरआंगन गुलज़ार होगा. लेकिन यह क्या हो गया. उन के सुखशांति में किस की बुरी नजर लग गई.

उस वक्त बहू सुधा और शुभेंदु द्वारा बीमार सुनंदा को छोड़ कर चले जाने से सुनंदा तनाव में आ गई. जिस के कारण उस का शुगर और बीपी बढ़ गया. चक्कर आने के बाद सुनंदा बाथरूम में गिर कर घायल हो गई.

संयोग अच्छा था कि उस समय शिवजी घर में ही थे. किसी तरह अपने पड़ोसी की मदद से सुनंदा को पास के अस्पताल में भरती कराया. एक सप्ताह इलाज के बाद सुनंदा स्वस्थ हो गई. लेकिन वह बहुत कमजोर थी. खुद अपना दैनिक कार्य भी नहीं कर पाती थी. प्रत्येक कार्य में उसे अपने पति का सहयोग लेना पड़ता था.

झरिया जैसे छोटे शहर में कोई ढंग की दाई तक नहीं थी. मध्यवर्गीय परिवार के लोग अपने घर का काम खुद या पड़ोसियों की मदद से करते थे. खासकर बहू सुधा के नहीं रहने से घरेलू स्थित और भी डगमगा गई थी.

इसी तरह दिन, महीने और साल गुजरते गए. धीरेधीरे शिवजी साह की बिगड़ी स्थिति उन के धैर्य, साहस और आत्मविश्वास से सुधरने लगी थी. उन का स्नेह, प्यार और यथोचित सम्मान पा कर पत्नी सुनंदा भी स्वास्थ रहने लगी. दोनों के तालमेल से उन के गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर आ गई थी. इसी बीच शुभेंदु के जेल जाने की खबर एक दिन पुणे से बहू सुधा ने फोन पर दी.

शुभेंदु के जेल जाने की खबर ने शिवजी साह और उन की पत्नी सुनंदा के दिल की धड़कनें बढ़ा दी थीं. उन का व्याकुल मन बारबार शुभेंदु का चेहरा देखने के लिए बेचैन हो रहा था. वे चाहते थे कि जल्द से जल्द   पुणे पहुंच कर उसे जेल से बाहर लाएं.

शिवजी गांव में रहते थे पर उन्हें कोर्टकचहरी का अनुभव बहुत था क्योंकि गांवों में अकसर झगड़े होते रहते हैं. उन के एक वकील नारायण बाबू का बेटा बी के दास पूना में प्रैक्टिस कर रहा था. उन्होंने अपने परिचित वकील से कह कर शुभेंद्र का  केस लेने के लिए बी के दास को तैयार कर लिया.

उस के बाद उन्होंने गांव के सारे परिचितों को फोन कर के सारी बातें बताईं और पूछा कि उन में से किसकिस के जानकार पूना में हैं. मालूम हुआ कि मनोज का साडू दीपक सिंह पुणे में  सैशन जज है. औपचारिक बातचीत के बाद उस ने शिवजी की बात जज से करा दी. जज ने कहा, वे संबंधित मजिस्ट्रेट से न्याय करने को बोल देंगे.

गांवों में वक्त पर लोग बहुत सहायक होते हैं. इस मुसीबत में  बहुतों ने शिवजी को खुल कर उधार दे दिया.

उन्होंने अपने शहर के एक रेलवे  ठेकेदार सफीक अली से 25 हजार रुपए सूद पर लिया और जसीडीह-पुणे साप्ताहिक एक्सप्रैस से रविवार के दिन पुणे रवाना हो गए.

तीसरे दिन मंगलवार को शिवजी पुणे पहुंच गए. वहां अपनी बहू को साथ ले कर कोर्ट गए. जहां फौजदारी के चर्चित अधिवक्ता बी के दास से मिले और कहा,

“झरिया के अधिवक्ता नारायण बाबू ने  आप के पास भेजा है.”

” ओ हो, आप ही हैं शिवजी साह. आप के बारे में कल पिताजी से बात हुई थी.”

“जी सर. शुभेंदु मेरा पुत्र है जो जेल में बंद हैं. उस की  जमानत के लिए आया हूं, सर.”

“आप का पुत्र शुभेंदु क्या करता है?” अधिवक्ता ने शिवजी से पूछा.

“वह एक बैंक में लिपिक है.

“आप मेरे परिचित हैं, इसलिए समझा रहा हूं.   अगर आप केस ठीक ढंग से नहीं लड़े तो बेटा को सजा भी हो सकती है और नौकरी हाथ से निकल जाएगी. उस के जीवन में काला दाग लग जाएगा. फिर कहीं उसे नौकरी नहीं मिलेगी. सोच लीजिए, कैसे केस लड़ना है,” अधिवक्ता ने उसे हरकारा.

“सर,  हम आप के पास ही क्यों आए हैं, बेटा को जेल से बाहर निकालने और उस की नौकरी बचाने के लिए ही न. आप जैसा केस लड़ें, मुकदमा जीतना तो आप को ही है. सर, मैं तो गांवदेहात का एक व्यक्ति ठहरा.  थोड़ाबहुत  झगड़ा तो गांव में भी होता है. कोर्टकचहरी की जानकारी रखते हैं. बहरहाल, जो खर्च लगता है, उस की पूर्ति करूंगा. मुझे क्या करना है, उचित आदेश दें,”  शिवजी ने खुलेदिल से अपने मन की बात रखी.

“जब आप को मेरे ऊपर इतना भरोसा है तो मैं केस को झूठा साबित कर आप के परिवार की रक्षा करूंगा,” अधिवक्ता बी के दास ने हंसते हुए कहा.

“सर, अभी बेटे की जमानत के लिए मुझे क्या करना होगा?”

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