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राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ मंदिर दर्शन में क्यों बदल गई ?

भारत जोड़ो न्याय यात्रा के नवें दिन राहुल गांधी असम के नगांव पहुंचे. यहां वह बोर्दोवा में संत श्री शंकरदेव के जन्मस्थल पर दर्शन करने जाना चाहते थे. सुरक्षाबलों ने राहुल और अन्य कांग्रेसी नेताओं को बरगांव में रोक दिया. सुरक्षाबलों से बहस के बाद राहुल और अन्य कांग्रेसी नेता धरने पर बैठ गए. सभी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद 3 बजे मंदिर आने के लिए कहा गया. कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के मंदिर दर्शन को मुद्दा बना दिया. पुलिस ने गुवाहाटी सिटी जाने वाली सड़क पर बैरिकेडिंग कर दी. इस के बाद कांग्रेस समर्थक पुलिस से भिड़ गए. उन्होंने बैरिकेडिंग तोड़ दी. इस धक्कामुक्की में कइयों को चोटें भी आईं.

राहुल की न्याय यात्रा 18 जनवरी को नगालैंड से असम पहुंची थी. 20 जनवरी को यात्रा अरुणाचल प्रदेश गई, फिर 21 को असम लौट आई. इस के बाद यात्रा 22 जनवरी को मेघालय निकली और मंगलवार को एक बार फिर असम पहुंची. राहुल की न्याय यात्रा 25 जनवरी तक असम में रहेगी. भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में राहुल गांधी ने कहा ‘भाजपा देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अन्याय कर रही है. भारत जोड़ो न्याय यात्रा का लक्ष्य हर धर्म, हर जाति के लोगों को एकजुट करने के साथ इस अन्याय के खिलाफ लड़ना भी है’.

राहुल गांधी मैतेई और कुकी दोनों समुदायों के इलाकों से गुजरे. उन्होंने कांगपोकपी जिले की भी यात्रा की, जहां पिछले साल मई में दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाया गया था. अपनी इस यात्रा के बारे में राहुल गांधी ने कहा था ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा को मणिपुर से शुरू करने की वजह यह है कि मणिपुर में भाजपा ने नफरत की राजनीति को बढ़ावा दिया है. मणिपुर में भाईबहन, मातापिता की आंखों के सामने उन के अपने मरे और आज तक हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री मणिपुर में आप के आंसू पोछने, गले मिलने नहीं आए. ये शर्म की बात है.’

मंदिर दर्शन विवाद में फंसी न्याय यात्रा

66 दिनों तक चलने वाली भारत जोड़ो न्याय यात्रा देश के 15 राज्यों और 110 जिलों में 337 विधानसभा और 100 लोकसभा सीटों से हो कर गुजरेगी. इन राज्यों में मणिपुर, नगालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल है. राहुल गांधी जगहजगह रुक कर स्थानीय लोगों से संवाद करेंगे. इस दौरान राहुल 6,700 किमी का सफर तय करेंगे.

भारत जोड़ो न्याय यात्रा 20 मार्च को मुंबई में खत्म होगी. मगर इस यात्रा के बीच ही 22 जनवरी को मोदी और योगी सरकार द्वारा आयोजित अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम आ गया. जिस में कांग्रेस के नेताओं को बुलाया गया था. कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष नीति के उलट राम मंदिर न जाने के पीछे की वजह मंदिर का पूरा न बनना और राजनीति में धर्म का प्रयोग बताया. लेकिन इस को ले कर पूरी पार्टी दो भागों में बंटी दिखी.

एक तरफ केन्द्रीय नेताओं ने राम मंदिर समारोह में हिस्सा लेने से मना किया. दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूरी टीम प्रचारप्रसार के साथ अयोध्या गई, मंदिर दर्शन किया और सरयू में स्नान किया.

यही ऊहापोह राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में भी दिखी. राहुल गांधी की न्याय यात्रा भाजपा और संघ की नीतियों के खिलाफ है. भाजपा और संघ देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. कांग्रेस इस का विरोध करती आ रही थी. ऐसे में मंदिर दर्शन और धार्मिक आस्था की बातों को इस यात्रा से अलग रखना चाहिए था, मगर राहुल खुद मंदिर जाने की जिद में धरने पर बैठ गए. उन्हें धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर चल कर अपनी यात्रा जारी रखनी चाहिए थी तो वे इस जिद पर अड़ गए कि उन्हें मंदिर जाना है. इस ने यात्रा में खलल डाल दिया.

धर्म से कैसे मिलेगा न्याय ?

कांग्रेस सौफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रही है. उस से उस की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित होगी और वह धर्म की राजनीति का विरोध पुरजोर तरीके से नहीं कर पाएगी. इस वक्त बहुत जरूरी है कि कांग्रेस भाजपा और संघ के हिंदूराष्ट्र के खिलाफ लोगों को आह्वान करे. आज भी आधे से कम वोट ही भाजपा को मिलते हैं. ऐसे में यह साफ है कि देश के आधे से अधिक लोग भाजपा की धर्म वाली नीतियों से खुश नहीं हैं.

दुनिया में जितने देश धार्मिक कट्टरता की राह पर चल रहे हैं, वो विकास की राह पर बहुत पीछे हैं और आतंकी गतिविधियों का शिकार हैं. पाकिस्तान, अफगानिस्तान इस का मुख्य उदाहरण हैं. दोनों ही देश अपनी धार्मिक छवि के कारण पूरी दुनिया का विरोध झेल रहे हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना करें तो पाकिस्तान के मुकाबले कम कट्टरता वाला बांग्लादेश ज्यादा प्रगति कर गया.

बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2227 डौलर भारत की 1947 डौलर से कहीं अधिक है. भाजपा और संघ ने जब से देश को मंदिर आंदोलन में ढकेला उस के बाद से देश का धार्मिक ढांचा ही प्रभावित नहीं हुआ बल्कि यहां की आर्थिक हालत भी प्रभावित हुई है.

2007 में भारत की प्रति व्यक्ति आय अधिक थी. उस समय भारत की प्रतिव्यक्ति आय बांग्लादेश से दोगुना थी. धर्म से न तो आर्थिक प्रगति हो सकती है और न ही न्याय मिल सकता है. अगर धर्म से ही लोगों को न्याय मिल जाता तो आईपीसी बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

धर्म औरतों की आजादी की बात नहीं करता है. औरतों की सारी परेशानियां धर्म के ही कारण हैं. धार्मिक कुप्रथाएं और रूढ़ियां औरतों के पैरों में बेड़ियों की तरह जकड़ी हैं. दहेज प्रथा, सती प्रथा, पेट में लड़की की हत्या, विधवाओं की बढ़ती संख्या इस के प्रमाण हैं. धर्मं ने महिलाओं को पढ़नेलिखने और नौकरी करने के अधिकार से वंचित कर उन्हें कम उम्र में पत्नी के रूप में पुरुष की दासी और बच्चा पैदा करने वाली मशीन बना दिया.

धार्मिक सत्ता से देश को आजादी दिलाने का काम कांग्रेस की जिम्मेदारी है. अब अगर कांग्रेस ही मंदिर मंदिर घूमेगी तो वह भाजपा और संघ की राह पर चल कर धर्म की सत्ता को मजबूत करने का ही काम करेगी.

राहुल गांधी 11 दिन की तपस्या करने में होड़ न करें. वह धर्म के शिकंजे में बारबार फंसने से खुद को बचाएं. यह काम देश की एक पार्टी कर रही है, उसे करने दें. अगर कांग्रेस भी यही करने लगी तो भारत को अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी.

राहुल को चाहिए कि वे अपनी न्याय की यात्रा को मजबूत कर देश को धार्मिक सत्ता से बाहर निकालने का काम करें ताकि देश की गरीब जनता को रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिल सके. राहुल को धर्म निरपेक्ष लोगों की आवाज बनना होगा. तभी उन की यात्रा सफल होगी और देश में डर का माहौल बदलेगा.

इंडिया गठबंधन में सब को है अपनी बात कहने का हक

असली लोकतंत्र वह होता है जहां विचारों की अभिव्यक्ति की खुली छूट हो. जहां आप अपनी बात रखते वक्त न डरें कि कोई आ कर आप की गर्दन उड़ा देगा या उठा कर जेल में ठूंस देगा. लोकतंत्र वह जिस में लोक यानी लोगों की बात को अहमियत दी जाए. जहां विचारविमर्श को जगह मिले, जहां तर्क का जवाब तर्क से दिया जाए न कि आस्था का विराम दंड लगा कर तर्क करने का रास्ता ही बंद कर दिया जाए. जैसा कि बीजेपी में है.

बीजेपी में या बीजेपी से लोगों को सवाल करने की छूट नहीं है. सवाल किया नहीं कि आप देशद्रोही घोषित कर दिए जाएंगे. यहां नेताओं तक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. बस धर्म के चाबुक से भेंड़बकरियों की तरह लोग हांके जा रहे हैं. कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, कोई सवाल नहीं कर सकता.

सत्ता की चरण वंदना करने वाले मीडिया संस्थान इंडिया गठबंधन को ले कर आएदिन यह ढोल पीटते हैं कि वहां एकजुटता नहीं है, लोग सीटों के लिए लड़ रहे हैं, आदिआदि. मगर सही मायनों में बातचीत, तर्कवितर्क, सवालजवाब आदि वहीं होते हैं जहां खुलापन हो, अपनी बात कहने की स्वतंत्रता हो, यानी लोकतंत्र हो.

बीजेपी में तो अपने मन की न कह सको, न कर सको, बस सिर झुका कर सत्ता प्रमुख के मन की बात सुनते रहो. मगर इंडिया गठबंधन में सिर उठा कर ऊंची आवाज में अपनी बात कहने अधिकार है. तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी अगर सीट बंटवारे को ले कर कोई बात कहती हैं तो अन्य क्षेत्रीय दल भी सीटों को ले कर अपनी अपनी पसंद बताते हैं. वहां अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देशभर में न्याय यात्रा निकालना चाहते हैं तो गठबंधन के अन्य दल उन के साथ चल पड़ते हैं.

गौरतलब है कि इंडिया ब्लौक में कुल 28 पार्टियां हैं. पश्चिम बंगाल में टीएमसी, कांग्रेस और माकपा का वाम मोर्चा अलायंस में सहयोगी दल हैं. गठबंधन के बाद से स्थानीय स्तर पर तीनों दलों के बीच सीटों को ले कर काफी बातचीत चल रही है, जिसे गोदी मीडिया नकारात्मक रंग देने के लिए अपनी खबरों में आंतरिक कलह का नाम देता है. इंडिया गठबंधन एकएक सीट को विजयी बनाने के लिए एकएक सीट पर चर्चा कर रहा है.

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपने गढ़ को न कमजोर होने देना चाहती हैं और न किसी दूसरे दल को अपना वोट बैंक ट्रांसफर करवाने के मूड में हैं. क्योंकि वह जानती हैं कि उन सीटों पर तृणमूल के लोग ही अपना दबदबा कायम रख पाएंगे, किसी और पार्टी के नेता को सीट दी गई तो सीट गठबंधन के हाथ से फिसल कर बीजेपी के खाते में जा सकती है. इसलिए ममता हर सीट पर बड़ी तीखी नजरें जमाए हुए हैं.

उल्लेखनीय है कि गठबंधन को ‘इंडिया’ नाम ममता ने ही दिया था और इसीलिए एक जिम्मेदारी समझते हुए एक अभिभावक की तरह ही हर सीट के लिए अपने विचार गठबंधन के अन्य नेताओं के सामने रखने में वे गुरेज नहीं कर रही हैं. वे पुरानी पार्टियों सीपीएम के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस को नसीहत देने और डांटने से भी नहीं चूकती हैं.

सोमवार को ममता ने कांग्रेस के सामने सीट शेयरिंग का नया फार्मूला दिया है. ममता ने बीजेपी को मात देने के लिए खास इलाकों में स्थानीय पार्टियों को कमान दिए जाने की वकालत की है. ममता ने एक सुझाव भी दिया कि कांग्रेस चाहे तो अपने दम पर 300 लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ सकती है, मैं उन की मदद करूंगी. मैं उन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ूंगी.

गौरतलब है कि ममता पिछले लोकसभा के नतीजों को ध्यान में रखते हुए सीट बंटवारे की रूपरेखा तैयार करना चाहती हैं. 2019 के चुनावों में पश्चिम बंगाल में टीएमसी को 22 सीटें मिलीं थी. जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 2 सीटें जीतीं थीं. बीजेपी ने राज्य में 18 सीटें हासिल की थीं. उस के बाद विधानसभा चुनाव में भी टीएमसी ने जबरदस्त जीत हासिल की और बीजेपी को हराया था.

इन दोनों चुनाव के नतीजे के आधार पर ही ममता बनर्जी अलायंस से सीट शेयरिंग का फार्मूला निकालने की बात पर जोर दे रही हैं. जो गठबंधन के लिए फायदेमंद होगा. पश्चिम बंगाल में बीजेपी को सीधे टक्कर देने की ताकत सिर्फ तृणमूल कांग्रेस ही रखती है.

गठबंधन की मुख्य पार्टी कांग्रेस करीब 100 सीटों पर सहयोगी दलों के साथ चुनाव लड़ना चाहती है. गठबंधन और अपने दम पर चुनाव लड़ने वाली सीटों की कुल संख्या 390 के आंकड़े तक पहुंच रही है. कांग्रेस ने 10 राज्यों में अकेले दम पर और 9 राज्यों में गठबंधन में चुनाव लड़ने की बात सब के सामने रखी है.

गुजरात, हरियाणा, असम, आंध्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और ओडिशा में कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव लड़ना चाहती है. उस को विश्वास है कि इन जगहों पर वह अकेले ही सारी सीटें निकाल लेगी. जबकि दिल्ली, बिहार, पंजाब, तमिलनाडु, यूपी, पश्चिम बंगाल, कश्मीर, झारखंड और महाराष्ट्र में वह अलायंस के सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग का फार्मूला खोज रही है.

जल्दी खाना सेहत के लिए हो सकता है खतरनाक, आज ही सुधार लें अपनी ये आदत

Disadvantages of Eating Fast : जल्दबाजी का काम यानी शैतान का काम, ये कहावत निर्णयों में ही नहीं बल्कि खाने में भी सही बैठती है. दरअसल भागदौड़ वाली जिंदगी के चलते ज्यादातर लोग जल्दी-जल्दी खाना खाते है, जो सेहत के लिए काफी नुकसानदायक होता है. इसलिए कहा भी जाता है कि खाने को जितना ज्यादा चबाचबा के खाया जाए, उतना ही सेहत को उसका फायदा मिलता है.

जबकि जल्दबाजी में खाना खाने से कई बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है. आइए जानते हैं जल्दबाजी में खाना खाने (Disadvantages of Eating Fast) से किन बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है.

खराब पाचन

आपको बता दें कि जब व्यक्ति जल्दबाजी में खाना खाता है तो इससे मुंह में मौजूद सलाइवा अपना काम ठीक से नहीं कर पाता है, जिससे मुंह में कार्ब्स पच नहीं पाते है. इससे अपच और पाचन की समस्या होने लगती है.

गले में अटक सकता है खाना

आमतौर पर कहा जाता है कि एक बाइट को कम से कम 15 से 32 बार चबाकर खाना चाहिए. इससे खाना आसानी से पच जाता है और गले में भी नहीं फंसता  है. लेकिन जो लोग जल्दी-जल्दी खाना (Disadvantages of Eating Fast) खाते हैं उससे न तो खाने में मौजूद पोषक तत्वों का लाभ मिलता है और गलें में खाना फंसने का भी भय रहता है.

कोलेस्ट्रॉल की समस्या

जो लोग जल्दबाजी में खाना (Disadvantages of Eating Fast) खाते हैं उनके शरीर में अक्सर गुड कोलेस्ट्रॉल की कमी देखी जाती है. इसके अलावा खाने को चबाचबा कर नहीं खाने से दिल की समस्याएं, स्ट्रोक और हार्ट अटैक आदि का जोखिम बढ़ता है.

वजन बढ़ना

जो लोग जल्दबाजी में खाना खाते हैं उनका पेट भी ठीक से नहीं भरता  है. इससे उन्हें बार-बार भूख लगती है और उनका वजन बढ़ने लगता है.

डायबिटीज

खाने को चबाचबा के नहीं खाने से वजन बढ़ता है, जिससे टाइप-2 डायबिटीज होने की संभावना होती है. इसलिए जरूरी है कि आप खाने को आराम से बैठकर और चबाचबा कर खाएं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डाक्टर से परामर्श लें.

टौयलेट में फोन का इस्तेमाल करना पड़ सकता है भारी, बढ़ जाता है इन बीमारियों का खतरा

Disadvantages of Using Phone in Toilet : आज के समय में मोबाइल फोन जरूरत बन गई है. आजकल हर एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा समय अपने फोन पर ही बीताता है. कई लोगों को तो इसकी इतनी लत लग गई है कि वो इसे टौयलेट में भी लेकर जाते हैं. हालांकि ऐसा करना उनके लिए काफी भारी पड़ सकता है. इससे न सिर्फ उनकी आंखों पर असर पड़ेगा, बल्कि इससे इंफेक्शन होने का भी खतरा है. इसलिए जरूरी है कि आप मोबाइल फोन का कम से कम इस्तेमाल करें. खासतौर पर टौयलेट में तो फोन को लेकर ही ना जाए.

आइए अब जानते हैं टौयलेट में फोन (Disadvantages of Using Phone in Toilet) का इस्तेमाल करने से कौन-कौन सी परेशानियां हो सकती हैं.

इंफेक्शन

वशरूम में मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने से इंफेक्शन होने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. दरअसल टौयलेट में कई हानिकारक जर्म्स मौजूद होते हैं. जो आसानी से फोन पर ट्रांसफर हो जाते हैं. फोन को आप धो भी नहीं सकते है, इसलिए इस पर आए बैक्टीरिया बहुत जल्दी आपके शरीर पर फैल जाते हैं, जिससे तरह-तरह की बीमारियों के होने का जोखिम बढ़ जाता है.

मस्कुलोस्केलेटल प्रौब्लम्स

लंबे समय तक टौयलेट की कमोड पर मोबाइल फोन लिए बैठे रहने से पोस्चर भी खराब होता है. इसके अलावा जो लोग अपनी गर्दन को झुकाकर फोन का इस्तेमाल करते हैं, उससे उन्हें गर्दन और पीठ दोनों में दर्द की समस्या हो सकती है.

जोड़ों में दर्द

जब व्यक्ति टौयलेट में फोन (Disadvantages of Using Phone in Toilet) लेकर जाता हैं तो अक्सर उसे ज्यादा समय लगता है. वह देर तक फोन के साथ बैठा रहता है, जिससे मांसपेशियों में अकड़न की समस्या तो होने ही लगती है. साथ ही जोड़ों में भी दर्द होने लगता है.

बवासीर

टौयलेट में ज्यादा देर तक एक ही पोजीशन में बैठे रहने से मलाश पर बहुत ज्यादा जोर पड़ता है, जिससे आप पाइल्स यानी बवासीर के भी शिकर हो सकते हैं.

ब्लड सर्कुलेशन की कमी

लंबे समय तक एक ही पोजीशन में बैठे रहने से पैरों की नसों पर अनआवश्यक दबाव पड़ता है, जिससे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन की कमी भी हो सकती है.

आंखों से पानी आना

टौयलेट में फोन (Disadvantages of Using Phone in Toilet) का इस्तेमाल करने पर अनजाने में ज्यादा वक्त लगता है, जिससे आंखों पर भी असर पड़ता है. इसलिए जिन लोगों को चश्मा लगा हुआ है या जिन लोगों की आंखों से पानी आता है, उन्हें तो वशरूम में फोन का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए. नहीं तो इससे उनकी आंखों का नंबर बढ़ सकता है.

मेंटल हेल्थ पर असर

वशरूम में फोन को यूज करने से मेंटल हेल्थ भी प्रभावित होती है, क्योंकि यहां बैठकर व्यक्ति अपने बारे में सोचने की जगह फोन पर समय बर्बाद करता है, जिससे मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डाक्टर से परामर्श लें.

कोचिंग संस्थान को ले कर सरकार की नई नियमावली,जानें इस के प्लस माइनस

आज दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी की सरकार में सरकारी अफसर बिना किसी रोकटोक के अपनी मनमानी करके पीएमओ वाला राज लागू कर रहे हैं जिसमें हर तरह के अफसरों को फरमान जारी करने और फिर उनसे मोटा पैसा बनाने के अवसर मिल रहे हैं.

सरकार जल्दबाजी में नियमकायदे बनाती चली जा रही है. इस पर न तो संसद में विचारविमर्श हो पा रहा है और न ही समाज में. जो आने वाले समय में निश्चित रूप से नुकसानदायक सिद्ध होगा.

इसी लाइन में नरेंद्र मोदी सरकार देश में हर एक कानून में संशोधन करने के लिए उतावली है. अब गाज गिरी है कोचिंग क्लासेस पर.

केंद्र सरकार ने बिना जनता की राय लिए कोचिंग संस्थानों के लिए कुछ नियम उपनियम बना दिए हैं जिनका पालन करना अनिवार्य हो गया है. इन नियम उपनियमों से जहां कोचिंग संस्थानों पर अंकुश लगता दिखाई दे रहा है वहीं कुछ ऐसे प्रश्न खड़े हो गए हैं जिन का उत्तर अभी तक नहीं मिल पाया है.

जहां तक कोचिंग क्लासेस का सवाल है आज संपूर्ण देश में यह एक ऐसा व्यवसाय बन चुका है जो लाभ कमाने का जखीरे जैसा है. सुपर 30 जैसी कुछ फिल्में प्रदर्शित हुई हैं जो बताती है कि कोचिंग संस्थान किस तरह काम करते हैं. वहीं दूसरी तरफ कितने ही नौनिहालों ने आत्महत्या कर ली है.

इन खबरों से अकसर अखबार हमारे सामने होते हैं. इस आलेख में हम कोचिंग संस्थानों के हाल पर नजरडालते हुए यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि नए नियमों से किस तरह की विसंगतियां उपजने की संभावना है और क्या लाभ हो सकते हैं.

शिक्षाविद डाक्टर संजय गुप्ता के मुताबिक कम से कम 14 साल तक के बच्चों को कोचिंग संस्थानों को प्रवेश की इजाजत देनी चाहिए.

संगीत शिक्षक घनश्याम तिवारी के मुताबिक नए दिशानिर्देशों से वह खुश हैं. आम तौर पर स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक ही 100 विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाते थे, जबकि उन के पास सुविधाएं नहीं होती थी. अब जगह के मुताबिक सीमित संख्या में बच्चों को ही पढ़ाया जा सकेगा.

शिक्षकों की योग्यता के नियम भी अच्छे हैं, क्योंकि फिलहाल कोचिंग संस्थानों द्वारा साधारण शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को भी नियुक्त कर दिया जाता है.

सामाजिक कार्यकर्ता संजय जैन के मुताबिक कम उम्र से बच्चों को शिक्षित करने के फायदे हैं. वहीं कई नुकसान भी हैं जो लगातार हमने देखे हैं. कम उम्र के बच्चों को खेलनेकूदने का समय नहीं मिल पाता और उन पर पढ़ाई का बोझ बढ़ जाता है, जिससे उन का मानसिक विकास नहीं हो पाता. इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो कोचिंग संस्थानों पर नियमकायदे आवश्यक हैं.

दूसरी तरफ डाक्टरजी आर पंजवानी के मुताबिक अगर तैयारी के लिए कम समय मिलेगा तो बच्चों पर दबाव और बढ़ेगा. गायत्री विद्या मंदिर की प्राचार्य मंजू दुबे के मुताबिक विद्यार्थियों के लिए कोचिंग संस्कृति बिल्कुल ठीक नहीं है और यहशिक्षकों की अयोग्यता और खुद को गुरु समझने का परिणाम है जो दक्षिणा लेना हक समझता है.

मुश्किल यह भी है कि शासकीय स्कूलों के शिक्षकों पर खाली दिनों में अगर चुनाव, जनगणना आदि से जुड़े काम सौंप दिए जाते हैं तो वे हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं कि उन्हें पढ़ाने के अलावा बाकी सब कुछ करने होते हैं. वे चाहते हैं कि पुराने गुरुओं की तरह सिर्फ प्रवचन दें और दक्षिणा में अंगूठे तक कटवाएं.

कोचिंग संस्थानों के लिए जो दिशानिर्देश जारी किए हैं, उसे ले कर अभिभावकों और शिक्षकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है.कुछ नियमों के साथ तो सभी खड़े हैं लेकिन कुछ को लेकर आशंकाएं हैं.

रायपुर में रहने वाली क्षमा पांडे जिनका बेटा 12वीं के साथ जेईई की तैयारी कर रहा है. उन के मुताबिक यह अच्छी बात है कि सरकार कोचिंग क्लास को नियमों के दायरे में ले लाई है.इससे वहां योग्य शिक्षक ही नियुक्त होंगे और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी अभिभावक आश्वस्त होंगे. मगर उन का मानना है कि16 साल की आयु सीमा के जो नियमकायदे बनाएं है वह ठीक नहीं हैं. स्पर्धा परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बेहद कठिन होते हैं, साथ ही इन्हें पास करने के लिए भी निर्धारित उम्र है, इसलिए अभिभावक चाहते हैं कि उन के बच्चे जल्द तैयारी शुरू करें.

औनलाइन मजे के लिए फंसते हैं बुजुर्ग, कैसे रहें अलर्ट

इस 21 जनवरी को भिवानी में एक लड़की ने वीडियो कौल कर बुजुर्ग का न्यूड वीडियो बनाया और फिर डरा कर 37 लाख रुपए ठग लिए. बुजुर्ग को दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के नाम पर फोन कर जाल में फंसाया गया था.

बुजुर्ग अपने घर में था तभी उसके पास एक लड़की ने व्हाट्सऐप पर वीडियो कौल की. उस लड़की ने उस से कहा कि वह बाथरूम में जाए. लड़की के कहने पर वह बाथरूम में चला गया और इसी दौरान लड़की ने वीडियो कौल में ही अपने सभी कपड़े उतार दिए और उसके साथ अश्लील हरकत करने लगी.

इस दौरान स्क्रीन रिकौर्डिंग ने उसका चेहरा वीडियो देखते हुए रिकौर्ड कर लिया. इसके बाद बुजुर्ग के पास एक दूसरी कौल आई. जिस पर किसी ने कहा कि वह दिल्ली क्राइम ब्रांच से बोल रहा है और उसके खिलाफ यूट्यूब की तरफ से लड़की के साथ अश्लील हरकत करते हुए एक वीडियो आई है. आप को जल्द गिरफ्तार किया जाएगा. बुजुर्ग डर गया और बचाव का समाधान पूछने लगा. उस शख्स ने यूट्यूबर का नंबर दिया. उस नंबर पर बात करने पर कहा गया कि 2,49,500 रुपए जमा करा दो तो वीडियो डिलिट करा देंगे और 2,500 रुपए चार्ज काट कर बाकी पैसा वापस भेज देंगे.

बुजुर्ग ने बताए गए खाते में पैसे जमा करा दिए. उस के बाद उसे बताया गया कि उस का वीडियो 5 जगह वायरल हुआ है. इस पर फिर से 10 लाख रुपए मांगे गए. इसी तरह कई बहाने बना कर उस से 36,84,300 रुपयों की ठगी कर ली गई. पीड़ित बुजुर्ग ने बाद में मामले की शिकायत साइबर क्राइम पुलिस थाना में की. इस पर अज्ञात के खिलाफ धोखाधड़ी सहित संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ है.

ऐसा ही कुछ दिल्ली की एक 65 वर्षीया बुजुर्ग महिला के सतह भी हुआ. कुछ अपराधियों ने पहले वौइस कौल के जरिए 65 वर्षीय महिला को कौल किया. उस के बाद महिला को बताया गया कि उस ने एक औनलाइन पार्सल भेजा है जिस के अंदर कुछ पासपोर्ट, ड्रग्स और कपड़े मौजूद है.

आरोपी ने महिला को डराते हुए कहा कि ड्रग्स और फर्जी पासपोर्ट की वजह से आप को जेल हो सकती है. इस बात से बुजुर्ग महिला घबरा गई. आरोपियों ने विश्वास दिलवाने के लिए स्काइप के जरिए वीडियो कौल की. उस में यह दिखाया गया कि एक सीबीआई के दफ्तर से आप को कौल की गई है. वीडियो में दोतीन लोग मौजूद थे और पीछे दीवार पर सीबीआई का लोगो लगा हुआ था. तब बुजुर्ग महिला को यकीन हो गया कि वाकई में उसे एनफोर्समेंट एजेंसी की तरफ से कौल आई है.

वीडियो कौल पर आरोपी ने महिला को डराया की आप को डिजिटल अरैस्ट किया जा चुका है जिस के बाद महिला काफी ज्यादा घबरा गई और रोने लगी. आरोपियों ने फिर दूसरी चाल चली और बताया कि उस के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर के उस को फंसाया गया है. आरोपियों ने महिला से कहा कि उस के सारे अकाउंटस वेरीफाई करने होंगे. इसलिए सभी अकाउंट का पैसा एक सेपरेट अकाउंट में डाल दे. महिला ने ऐसा ही किया. उसके बाद अपराधियों ने धीरेधीरे कर के अकाउंट से 35 लाख रुपए निकाल लिए.

तब महिला ने अपने रिश्तेदारो में यह जानकारी दी. बाद में पीड़िता के परिजनों ने आईएफएसओ का दरवाजा खटखटाया. लंबी जांच के बाद अपराधी पकड़ में आ गए.

दरअसल बुजुर्ग अपराधियों के इजी टारगेट होते हैं. बुजुर्गों के साथ समस्या यह आती है कि वह बहुत जल्दी बहकावे में आ जाते हैं. अगर सामने वाला उन्हें कुछ कहता है तो वह उसे सच मान लेते हैं. मोबाइल फोन या डिजिटल प्लेटफौर्म पर अगर कोई अनजान शख्स बुजुर्ग महिला से इतनी बड़ी बात कहता है तो उसे तुरंत सच मान लेना और उस के हिसाब से पैसे ट्रांसफर कर देना कहां तक तर्कसंगत है? इसी तरह अगर वीडियो कौल पर कोई लड़की गलत हरकत कर रही है और बुजुर्ग उस का मजा लेने लगे तो इस में गलती तो बुजुर्ग की ही हुई न. इसी वजह से ऐसे कांड होते हैं.

अगर वे मामले की शुरुआत में ही अपने बच्चों से बात करें कि सामने वाला ऐसा कह रहा है तो यकीनन बच्चों द्वारा उन्हें सही सलाह दी जाएगी. मगर अकसर बुजुर्ग खुद ही फैसला कर लेते हैं. कई बार शर्मिंदगी की वजह से जैसे की न्यूड वीडियो के मामले में हुआ तो कई बार हड़बड़ाहट की वजह से वे ऐसा कर डालते हैं.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बुजुर्गों में भी अब पढ़ने की आदत कम हो गई है. अब घरों में अखबार और मैगजीन भी कम आते हैं. लोग दिनप्रतिदिन के न्यूज और दीनदुनिया से जुड़े नहीं होते. बुजुर्ग भी अपनी ही खामोश दुनिया में रहे आते हैं. कभी घर वालों को कोसने में, कभी अपनी बीमारियों के चक्कर में या कभी ऐसे ही उदास टीवी के आगे बैठे रहते हैं. बुजुर्ग महिलाएं भी कभी घरपरिवार के कलह में, कभी हमउम्र महिलाओं के साथ अपने दुखड़े रोने में और कभी बहू को बात सुनाने या कोसने में दिन बिता देती हैं.

इसके विपरीत यदि वे देशदुनिया में हो रही घटनाओं में अपना दिमाग लगाएं और विभिन्न मुद्दों से संबंधित सटीक जानकारी रखें यानी अपडेट रहें तो एक तो उन का माइंड डाइवर्ट होगा, वे सही दिशा में सोच सकेंगे, अपराधियों का टारगेट नहीं बनेंगे,फालतू बातों में दिमाग लगाने या उदास बैठे रहने की बजाय उन के अंदर नई सोच विकसित होगी. यही नहीं पोतेपोतियों से बात करने के लिए उन के पास नए जमाने के टौपिक्स और जानकारी होगी. बच्चों को उन से बातें करने में मजा आएगा.

दिल्ली प्रैस की पत्रिकाओं में भी इस तरह की घटनाओं के विश्लेषण होते हैं. समस्याओं को उजागर करने के साथ उन का समाधान भी बताया जाता है. मनोहर कहानियां मैगजीन का टैग लाइन ही है ‘अपराधों को जानिए, सुरक्षित रहिए.’

इस पत्रिका में इस तरह के आपराधिक घटनाओं का पूर्ण विश्लेषण होता है. ऐसी हर समस्या से अलर्ट रहने और बचने के उपाय डिटेल में बताए जाते हैं. इस के हर इशू में नई ताजा आपराधिक घटनाएं ली जाती हैं. अगर कोई बुजुर्ग मनोहर कहानियां नियमित रूप से पढ़े तो उसे ऐसी समस्याओं से कभी रूबरू नहीं होना पड़ेगा. वे इस तरह की मुसीबत के दलदल में फंसने के बजाए समय पर सही फैसला ले सकेंगे.

Salt Uses: क्या आप जानते हैं नमक के बारे में ये जरूरी बातें

नमक हमारे खाने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. अगर खाने में नमक कम या ज्यादा हो जाए तो हमारा स्वाद पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है. खाना बेकार हो जाता है. नमक केवल स्वाद के लिहाज से खाने में इस्तेमाल नहीं होता. बल्कि सेहत के लिहाज से भी ये बेहद अहम है. कैसे नमक की कमी या अधिकता हमारे सेहत को प्रभावित करती है, इस खबर में हम आपको बताएंगे.

खाने में उपर से कच्चा नमक डालना है खतरनाक

जानकारों की माने तो पके हुए खाने के उपर से नमक का सेवन करने से कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. असल में पकने के बाद नमक में मौजूद आयरन आसानी से खाने में सोख लिया जाता है. जबकि कच्चे नमक की सेवन से शरीर को कई परेशानियां होती है. इसमें एक समस्या ब्लड प्रेशर भी है.

नमक का कम सेवन भी है हानिकारक

कई जानकारों का मानना है कि जैसे नमक का अधिक सेवन सेहत के लिए हानिकारक होता है, उसी तरह से इसका कम सेवन भी सेहत के लिए हानिकारक होता है. कई तरह के शोधों में ये बात सामने आई है.

बिना पका हुआ नमक होता है सेहत के लिए हानिकारक

जानकारों का मानना है कि जरूरत से अधिक मात्रा में नमक का सेवन करने से ब्लड प्रेशर, मोटापा, अस्थमा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है. वहीं बिना पका हुआ नमक खाने से दिल और किडनी की बीमारी का खतरा तेज हो जाता है.

नमक की कितनी मात्रा है सही

सेहत के जानकारों के मुताबिक व्यक्ति को एक दिन में सिर्फ 2 छोटे चम्मच ही नमक का सेवन करना चाहिए. वहीं, जिन लोगों को ब्लड प्रेशर की समस्या है उनको दिनभर में सिर्फ आधे चम्मच नमक का ही सेवन करना चाहिए.

मैं अपने पति से अलग होना चाहती हूं, इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल

मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. एक बेटा भी है. मैं अपनी शादी से खुश नहीं हूं और पति से अलग होना चाहती हूं पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाहते, बावजूद इस के कि वे मुझे पसंद नहीं करते. हमेशा लड़ते रहते हैं. कई बार तो मारते पीटते भी हैं. मुझे समझ में नहीं आता कि उन से छुटकारा कैसे पाऊं? कृपया मेरी समस्या का कोई समुचित हल बताएं?

जवाब

आप ने पूरा खुलासा नहीं किया कि आप के पति आप को नापसंद क्यों करते हैं और आप लोगों में झगड़ा क्यों होता है? जहां तक आप के पति के आप को मारनेपीटने की बात है तो वह उचित नहीं है. इस के लिए पहली बार ही जब उन्होंने आप पर हाथ उठाया था आप को अपने सासससुर से इस की शिकायत करनी चाहिए थी.

आप की शादी को 3 साल हो चुके हैं. इतने सालों में आप पति के स्वभाव को जान चुकी होंगी, इसलिए कोशिश कर सकती हैं कि कोई ऐसा काम न करें, जिस से गृहकलह की नौबत आए. अब आप का बच्चा भी है और घर की अशांति का बच्चों की परवरिश पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. जहां तक आप के द्वारा पति को छोड़ने की बात है तो हम परिवार जोड़ने की सलाह देते हैं तोड़ने की नहीं. अत: पति को छोड़ने का विचार मन से निकाल दें. पति से तालमेल बैठाने का प्रयास करें.

Parenting Tips: क्या आप भी अपने बच्चे को घर पर छोड़ते हैं अकेला, तो जरूर फॉलो करें ये टिप्स

माता पिता की जगह और कोई नहीं ले सकता. किसी भी मातापिता के लिए उन के बच्चे ही उन की दुनिया होते हैं. बच्चों की उपस्थिति मात्र से ही उन की जिंदगी अर्थपूर्ण हो जाती है. मातापिता बच्चों की सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं और इस कोशिश में उन्हें न चाहते हुए भी बच्चों को घर पर अकेले छोड़ने का कठोर निर्णय तक लेना पड़ता है. माना कि बच्चों को घर पर अकेला छोड़ना 21वीं सदी की एक आवश्यकता और पेरैंट्स के लिए एक मजबूरी बन गई है, लेकिन यह मजबूरी आप के नौनिहालों के व्यक्तित्व और व्यवहार में क्या बदलाव ला सकती है, यह किसी भी पेरैंट्स के लिए जानना बेहद जरूरी है.  शेमरौक ऐंड शेमफोर्ड ग्रुप औफ स्कूल्स की डायरैक्टर मीनल अरोड़ा के अनुसार मातापिता की गैरमौजूदगी में अकेले रहने वाले बच्चों के व्यवहार में निम्न समस्याएं देखने में आती हैं:

डरने की प्रवृत्ति

घर पर अकेले रहने से बच्चों में खाली घर में सामान्य शोर से भी डरने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है, क्योंकि उन्हें बाहरी दुनिया का बहुत कम अनुभव होता है. इस के अतिरिक्त अकेले रहने वाले बच्चे पेरैंट्स से अपना डर शेयर नहीं करते, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन्हें अभी भी बच्चा समझा जाए. कई बार बच्चे अपनी सुरक्षा को ले कर पेरैंट्स को चिंतित नहीं करना चाहते, इसलिए भी वे अपने मन की बात छिपा जाते हैं.

अकेलापन

घर पर अकेले रहने वाले बच्चों को उन के दोस्तों से मिलने, किसी भी ऐक्स्ट्रा क्यूरिकुलर ऐक्टिविटी में भाग लेने अथवा कोई सोशल स्किल विकसित करने की अनुमति नहीं होती. इस से उन की सोशल लाइफ प्रभावित होती है और वे अकेलेपन का शिकार होते हैं. ऐसे बच्चे अपनी चीजों को शेयर करना भी नहीं सीख पाते हैं. वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. बाहर की दुनिया से कटे रहने के कारण वे स्वार्थी, दब्बू और चिड़चिड़े हो जाते हैं.

सेहत के लिए खतरा

घर पर रहने वाले बच्चे शरीर को ऐक्टिव रखने वाली कोई भी आउटडोर ऐक्टिविटी नहीं करते, जिस से आलस बढ़ता है और अधिकांश बच्चे मोटे हो जाते हैं. ऐसे बच्चों में खानपान, सेहत व विकास संबंधी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं. अकेले रहने के कारण ऐसे बच्चे डिप्रैशन का शिकार भी हो जाते हैं. उन की रोजमर्रा की जिंदगी अस्तव्यस्त हो जाती है. कई बार समय न होने की कमी के चलते अभिभावक बच्चों की हर जिद पूरी करते हैं, यह आदत उन्हें स्वार्थी बना देती है और वे अपनी हर जरूरी गैरजरूरी जिद, मांग पूरी करवाने लगते हैं.

जिद्दी व स्वार्थी

घर पर अकेले रहने वाले बच्चों के लिए मातापिता कुछ नियम तय करते हैं जैसेकि टीवी देखने से पहला अपना होमवर्क पूरा करना, अजनबियों से बात नहीं करना, उन की गैरमौजूदगी में किसी दूसरे व्यक्ति को घर में नहीं आने देना आदि. लेकिन ऐसे में अगर उन पर नजर रखने वाला कोई नहीं हो, तो उन्हें अपनी मनमरजी से कुछ भी करने की आजादी मिल सकती है. इस के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं. हालांकि कोई भी 2 बच्चे एकजैसे नहीं होते. वे भिन्न हालात में अलगअलग तरह से व्यवहार करते हैं. इसलिए यह जानना पेरैंट्स की ही अकेली जिम्मेदारी होती है कि क्या उन के बच्चे वास्तव में घर पर अकेले रहने के लिए तैयार हैं. अगर हां, तो बच्चों को घर पर अकेला छोड़ने से पहले कुछ खास बातों को ध्यान में रखना चाहिए जैसेकि बच्चे की उम्र एवं मैच्युरिटी.

उदाहरण के लिए घर पर छोड़े गए बच्चों की उम्र 7 साल से कम नहीं होनी चाहिए, उन के घर पर अकेले रहने का समय उदाहरण के लिए 11-12 साल के बच्चों को कुछ घंटों के लिए घर अकेले छोड़ा जा सकता है पर सिर्फ दिन के समय. बच्चों पर नजर रखने के लिए पड़ोसियों की उपलब्धता सब से महत्त्वपूर्ण यह कि जब बच्चों को घर पर छोड़ा जाए तो वे वहां सुरक्षित महसूस करें. यदि आप ने निम्न बातों को ध्यान में रखते हुए अपने बच्चों को घर में छोड़ने का मन बना लिया है, तो उन की सुरक्षा के लिए निम्न उपाय जरूर अपनाएं: – बच्चे से संपर्क का एक समय निर्धारित कर लें. इस से आप को यह पता रहेगा कि बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं. घर से दूर रहते समय भी उन पर निगरानी रखें. दिन में बच्चों को फोन कर के उन की खैरियत पूछते रहें. उन्होंने लंच किया या नहीं, स्कूल में उन का दिन कैसा बीता, स्कूल या पढ़ाई से संबंधित उन की समस्याओं की जानकारी लें और उन का समाधान सुझाएं. आप का ऐसा करना आप को बच्चों से जोड़े रखेगा.

– बच्चों को बताएं कि किसी अजनबी के लिए दरवाजा कतई न खोलें. इस के अलावा दरवाजे की घंटी कोई बजाए तो विंडो या डोरआई से देखें कौन है. अगर कोई जानकार, रिश्तेदार या पड़ोसी है तो तुरंत पेरैंट्स को सूचना दें. घर को चाइल्डप्रूफ रखें. घर में सिक्युरिटी लगवाएं ताकि आप के पीछे से बच्चों के साथ कोई दुर्घटना न घटे और बच्चे सुरक्षित रहें.

– बच्चों को इस बात की भी जानकारी दें कि घरपरिवार के बारे में कौन सी बातें और कितनी बातें किसी को बतानी हैं. यही नहीं, उन्हें बड़ों की गैरमौजूदगी में गैस जलाने या किसी धारदार चीज से काम करने की कतई अनुमति न दें.

– घर में अलकोहल या अन्य किसी भी प्रकार का नशीला पदार्थ न रखें. कार या बाइक की चाबी छिपा कर रखें.

– आप की अनुमति के बिना किसी पड़ोस के घर में अकेले न जाने का निर्देश दें. लेकिन साथ ही इमरजैंसी की स्थिति में किसी पड़ोसी के बारे में जरूर बताएं ताकि इमरजैंसी की स्थिति में आप के घर पहुंचने तक वह उन के संपर्क में रहे.

– इमरजैंसी काल की स्थिति के लिए उन्हें स्थानीय अथवा दूर के रिश्तेदारों के फोन नंबर दें. अपने खास पड़ोसी को अपनी गैरमौजूदगी  के बारे में सूचित करें. उन से बच्चों की देखरेख के लिए कहें.

परदे: भाग 1- क्या स्नेहा के सामने आया मनोज?

Writer- अपूर्वा चौमाल

पिछले दिनों ग्रुप एडमिन ने कुछ नए मैंबर्स ग्रुप में जोड़े थे. स्नेहा उन में से एक थी. जब से वह जुड़ी है, ग्रुप जैसे जिंदा हो गया. दिनभर में कभीकभार ही बजने वाली नोटिफिकेशन की घंटी इन दिनों जबतब टनटनाने लगी थी. स्नेहा का रिप्लाई हरेक पोस्ट पर तो अनिवार्यतया होता ही है, यही नहीं, अपने रिप्लाई के रिप्लाई पर भी वह रिप्लाई जरूर देती है.

‘पता नहीं कितनी ठाली है ये लड़की. इसे कोई कामधंधा नहीं है क्या?’ मनोज जैसे कई लोग शायद यही सोचते होंगे.

लेकिन इस बात से किसी सूरत में इनकार नहीं किया जा सकता कि गजब की लड़की है स्नेहा. कमाल का सैंस औफ ह्यूमर है. हर पोस्ट पर कोई न कोई चुटकी, कुछ न कुछ चटपटा, कोई ऐसा अतरंगा कमैंट कि वह बरबस मुसकराने को विवश कर दे.

‘लेकिन स्नेहा क्या सचमुच कोई लड़की ही है? कोई प्रौढ़ या उम्रदराज महिला भी तो हो सकती है. प्रोफाइल पिक्चर देखने से तो कुछ भी अंदाजा नहीं हो रहा,’ स्नेहा के बारे में जिज्ञासु होता जा रहा मनोज इन दिनों शेरेलक होम्स बना हुआ है. दिनभर में न जाने कितनी दफा स्नेहा के नाम पर टैब कर के देखता है कि कौन जाने किसी समय कोई सुराग मिल ही जाए. मगर स्नेहा भी कहां कच्चे कंचों से खेली थी, जो आसानी से पकड़ में आ जाती. बेशक वह हर दिन अपनी डीपी बदलती थी, लेकिन मजाल है कि किसी एक दिन भी उस का दीदार हुआ हो. हां, तसवीर में लगने वाले फूल जरूर हर दिन अलग होते हैं. कभी कली, कभी खिलता फूल तो कभीकभी भरपूर खिले हुए फूलों का गुच्छा.

इन फूलों के आधार पर ही मनोज उस की उम्र का अंदाजा लगाने की कोशिश करता रहता, लेकिन जासूसी की कसम… कभी किसी सटीक निर्णय पर वह नहीं पहुंच सका. किसी दिन वह उसे कली सी कमसिन युवती तो अगले ही दिन खिले फूल सी भरपूर महिला महसूस होती और कभी लगती किसी पुष्प गुच्छ सी, जिंदगी का भरपूर अनुभव लिए उम्रदराज महिला सी.

‘पता नहीं, लोग डीपी में अपनी खुद की तसवीर क्यों नहीं लगाते,’  झुं झलाता हुआ मनोज सिर पटक कर रह जाता, लेकिन स्नेहा का दीदार नहीं पा सका.

एक बार दिल ने कहा भी कि हथियार डाल कर सीधेसीधे ग्रुप एडमिन से पूछ ही लो न, या फिर कर लो वीडियोकौल. एक ही  झटके में सब बेपरदा हो जाएगा. लेकिन जो मजा खुद पतीली चढ़ा कर पकाने में है, वह परोसी हुई थाली खाने में कहां?

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‘स्नेहा की पहेली तो मैं खुद ही सुल झाऊंगा और वह भी बिना किसी की मदद के,’ मनोज ने मन ही मन ठान लिया. ठानने को तो उस ने ठान लिया, लेकिन अब बात आगे कैसे बढ़े. इसलिए एक दिन उस ने डरतेडरते, हिम्मत करतेकरते स्नेहा के एक कमैंट पर कंटीला सा कमैंट कर दिया. स्वभाव के अनुसार तुरंत स्नेहा हाजिर थी.

‘‘जे बात, क्या करारा जवाब आया है. तबीयत तर हो गई. जियो बंधु,’’ स्नेहा ने चटक मूड में मनोज के जवाब को  झटक दिया और इस के साथ ही मनोज को पटक भी दिया. मनोज की हिम्मत बढ़ी. उस ने स्नेहा की इसी रिप्लाई को लक्ष्य करते हुए उसे व्यक्तिगत नंबर पर स्माइली वाले 2 स्टिकर मय आभार भेज दिए.

लेकिन हाय रे, उसे अपने व्यक्तिगत कमैंट का कोई व्यक्तिगत जवाब न मिला. मनोज जरा सा निराश हुआ. हां… हां, जरा सा ही. लेकिन निराश ही हुआ, हताश नहीं.

अब पहली पटकनी पर ही मैदान छोड़ने वाले भी कभी सफल जासूस बन सके हैं भला? मनोज ने भी निराशा को परे  झटक दिया और उम्मीद की टौर्च जला कर स्नेहा को सोशल मीडिया पर तलाश करने लगा.

गूगल पर ‘स्नेहा’ नाम सर्च करते ही

सैकड़ों लिंक स्क्रीन पर दिखने

लगे. हर उम्र की स्नेहा अपने हर रूप में वहां मौजूद थी.

यह देख मनोज चकरा गया. सरनेम और शहर के फिल्टर भी डाल कर देखे, लेकिन सूची पर कुछ विशेष कैंची

नहीं चली.

‘इन में मेरी वाली कौन सी है,’ मनोज ने कान खुजाया. वह स्नेहा को तो नहीं पहचान पाया, लेकिन ‘मेरी’ शब्द दिमाग में आते ही उस के दिल की धड़कन एकाएक बढ़ गई. अभी यदि ईसीजी की जाए तो निश्चित रूप से डाक्टर कंफ्यूज होगा ही होगा. कुछ दिन दिल को आराम करने की सलाह के साथ धड़कन पर काबू पाने वाली दवा भी सु झा दे तो कोई आश्चर्य नहीं.

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‘बातों से तो यह 25-30 साल की लगती है. इस से कमसिन उम्र होती तो इस ग्रुप में न होती और यदि उम्रदराज होती तो इस की बातों में भी अनुभव वाली गंभीरता होती. हो सकता है कि

40 के आसपास हो,’ मनोज की अपनी सम झ के अनुसार लगते कयास अपने चरम पर थे, लेकिन अभी तक स्नेहा की उम्र का स्थायी आकलन नहीं हो पाया था.

यह एक रचनाधर्मियों का ग्रुप है जिस में 200 से अधिक नएपुराने, नौसिखिए व अनुभवी लेखक, साहित्यकार, गायक, चित्रकार और रंगकर्मी जैसे सृजनशील लोग जुड़े हुए हैं. इन में से अधिकांश तो देश के ही विभिन्न शहरोंराज्यों से हैं, कुछ प्रवासी भी हैं. सब लोग यहां अपनी रचनात्मकता सा झा करते रहते हैं. कभी अपना कोई नया सृजन तो कभी कोई अन्य उपलब्धि भी.

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