story in hindi
story in hindi
हाल ही में एन्वल स्टेट्स औफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) में ये बात सामने आई है कि देश में स्कूल जाने वाले 14 से 18 साल की उम्र के करीब एकचौथाई बच्चे अपनी क्षेत्रीय भाषा की कक्षा 2 की किताब तक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं. अंग्रेजी ज्ञान की तो बात ही छोड़ दें.
14 से 18 साल की आयुवर्ग के बच्चे आमतौर पर कक्षा 9 से 12 तक में होते हैं. गांवदेहातों के स्कूलों में अधिकांश बच्चे मिड डे मील के लालच में स्कूल जाते हैं. कुछ के मातापिता यह सोच कर उन को स्कूल भेजते हैं कि उन्हें यूनिफार्म मिल जाएगी. एक वक्त का खाना मिल जाएगा, कुछ सरकारी योजना का पैसा खाते में आ जाएगा और बच्चा अपना नाम लिखना सीख जाएगा.
स्कूल में मास्टर या मास्टरनी क्या पढ़ाते हैं, पढ़ाते भी हैं या नहीं, इस की पड़ताल करने कोई नहीं जाता. सरकारी स्कूल के तो टीचर्स तक ठीक से किताबें नहीं पढ़ पाते हैं. अंगरेजी का एक वाक्य नहीं बोल पाते हैं, तो शिक्षा का स्तर देश में क्या है, इस को समझना मुश्किल नहीं है. सरकार देशभर में साक्षरता मिशन चला ले, शिक्षा देने के ढोल पीट ले, बड़ीबड़ी योजनाएं कागजों पर बना ले, मगर हकीकत इस तरह की रिपोर्ट से सामने आ जाती है.
शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है. गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे ही नहीं, शहरी क्षेत्र के स्कूलों के बच्चे भी अपनी या अपने से निचले दर्जे की पाठ्यपुस्तकों को ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं. इस की वजह है.
विगत 2 दशकों में देश के भीतर सिर्फ धर्म का कारोबार बढ़ा है. पहले घरों में बूढ़ेबुजुर्ग सुबह का अखबार पढ़ते थे. अखबार हर घर में आता था. घर की देहरी पर 6-7 लोग इकट्ठा होते और एक व्यक्ति ऊंचे स्वर में अखबार की खबर पढ़ कर सब को सुनाता था. चौपाल पर बैठे लोग अखबार पढ़तेदेखते थे. घर के बच्चों पर भाषा सुधारने के लिए अखबार पढ़ने का दबाव होता था.
मगर आज घरघर में सुबहसुबह टीवी पर तेज आवाज में आरती पूजा चलती है. भजन सुने जाते हैं. अखबार, पत्रिकाएं घरों से गायब हो चुकी हैं. परलोक सुधारने की धुन में बूढ़े अब सुबहसुबह माला जपते नजर आते हैं. फिर बच्चों पर अखबारपत्रिकाएं पढ़ने का दबाव कौन बनाए? उन की पढ़ने के प्रति रुचि कौन जगाए?
पहले घरों में किताबों की अलमारियां होती थीं. लोग अच्छा साहित्य खरीद कर उन में सजाते थे. अधिकांश घरों के ड्राइंग रूम में एक अलमारी अच्छे साहित्य की अवश्य होती थी. इस के अलावा मेज पर पत्रिकाएं और अखबार अवश्य होते थे. ये चीजें घर के बच्चों की पढ़ने के प्रति जिज्ञासा पैदा करती थीं.
आज घरों से ही नहीं बल्कि बाजारों से भी बच्चों की पत्रिकाएं गायब हैं. बाल साहित्य की बात करें तो एक ‘चंपक’ के अलावा और कोई बाल पुस्तिका बाजार में नहीं दिखती. बाल साहित्य लिखने वाले लेखक गायब हो चुके हैं.
दो दशक पहले तक अपनी पाठ्य पुस्तकों के अलावा कहानी की किताबों, नावेल, कौमिक्स की तरफ बच्चों का खूब रुझान होता था. ये किताबें मनोरंजन भी करती थीं, ज्ञान भी बढ़ाती थीं, बच्चों को कुछ नया सीखने का मौका देती थीं और स्पष्ट पढ़ने की क्षमता का विकास करती थीं. बच्चे अपने खाली वक़्त में इन कहानी की किताबों को जब ऊंचे स्वर में पढ़ते थे तो उनकी बोलने की क्षमता विकसित होती थी और नए व कठिन शब्द आसानी से जुबान पर चढ़ जाते थे.
स्कूलों में टीचर्स बच्चों को खड़ा कर के चैप्टर पढ़वाते थे. ये एक्सरसाइज उन्हें बढ़िया वक्ता बनाती थी. क्या आज कहीं ऐसा होता है? आज तो हर बच्चे के हाथ में स्मार्ट फ़ोन है और वह मुंह पर ताला मारे बस आंखें गड़ाए औनलाइन पढ़ाई कर रहा है. क्लास में टीचर आते हैं, लैक्चर देते हैं और बस हो गई पढ़ाई. अब न क्लास में इमला बोली जाती है, न हैंड राइटिंग सुधारने वाली पुस्तकें लिखवाई जाती हैं, न क्लास में बच्चों को खड़ा कर के ऊंची आवाज में चैप्टर पढ़ने के लिए कहा जाता है. फिर बच्चों की वाक्शक्ति कैसे बढ़े? वो तो कुछ पढ़ने में हकलातातुतलाता ही रहेगा.
दरअसल बच्चों को बोल कर पढ़ने से दूर करने के साथ हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो भविष्य में अपनी बातें किसी के सामने तर्कों और तथ्यों के साथ रखने में अक्षम होंगे. जो अपनेआप को कभी एक्सप्रेस नहीं कर पाएंगे. क्योंकि उन के पास न तो शब्द हैं, न ही वाक्य और न ही वाकशक्ति.
हाल में एक रिपोर्ट आई थी कि जो बच्चे कोरोना महामारी के दौरान पैदा हुए उन में से अधिकांश बच्चे लम्बे वाक्य बोलने में असमर्थ हैं. वजह यह कि कोरोना काल में ज्यादातर चेहरे मास्क से ढके रहे. बच्चों ने लोगों को बोलते वक्त उन के लिप मूवमेंट नहीं देखे.
महामारी के कारण लोग बच्चों को ले कर बाहर नहीं निकले तो उन्होंने बाहरी लोगों को बातें करते नहीं सुना. घर में मातापिता कितनी बात करते होंगे? इन कारणों से बच्चे वाक्य गढ़ने और बोलने में फिसड्डी रह गए. दरअसल जिस चीज की जितनी अधिक प्रैक्टिस की जाती है इंसान उस में उतना ही माहिर होता जाता है. जिस चीज की प्रैक्टिस छोड़ दी जाए वह चीज वह जल्दी भूल जाता है.
कांग्रेस के बाद आम आदमी पार्टी ने ‘एक देश, एक चुनाव’ पर अपने विचार देते हुए कहा है कि आम आदमी पार्टी ‘एक देश एक चुनाव’ का पुरजोर विरोध करती है. ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ संसदीय लोकतंत्र के विचार, संविधान की मूल संरचना और देश की संघीय राजनीति को नुकसान पहुंचाएगा.
‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ त्रिशंकु विधायिका से निबटने में असमर्थ है. सक्रिय रूप से दलबदल विरोधी और विधायकों और सांसदों की खुली खरीदफरोख्त की बुराई को प्रोत्साहित करेगा. एक साथ चुनाव कराने से जो लागत बचाने की कोशिश की जा रही है वह भारत सरकार के वार्षिक बजट का मात्र 0.1 फीसदी है. इस के पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ को ले कर बनी उच्च स्तरीय समिति को पत्र में लिखा कि ‘संसदीय शासन व्यवस्था अपनाने वाले देश में एक साथ चुनाव कराने के विचार के लिए कोई जगह नहीं है और उन की पार्टी इस का पुरजोर विरोध करती है.
‘एक साथ चुनाव कराने का विचार संविधान की मूल संरचना के खिलाफ है. अगर एक साथ चुनाव की व्यवस्था लागू करनी है तो संविधान की मूल संरचना में पर्याप्त बदलाव की जरूरत होगी. जिस देश में संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई हो, वहां एक साथ चुनाव के विचार के लिए कोई जगह नहीं है. एक साथ चुनाव कराने के सरकार के ऐसे प्रारूप संविधान में निहित संघवाद की गारंटी के खिलाफ हैं.’
केंद्र की मोदी सरकार ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ अपनाने के पहले एक समिति का गठन किया है. इस के मुखिया पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया गया है. देश के कुल 46 राजनीतिक दलों को भी अपने सुझाव देने के लिए कहा गया था. इन में से 17 राजनीतिक दलों ने अपने सुझाव समिति को सौंप दिए हैं. देश में बीते लंबे समय से एक राष्ट्र एक चुनाव के लिए बहस जारी है. केंद्र की मोदी सरकार भी देश में विधानसभा और लोकसभा चुनावों को एक साथ करवाने के लिए समर्थन जता चुकी है. विभिन्न विपक्षी दलों ने इस कदम का विरोध भी किया है.
भाजपा एक ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ की समर्थक है. उस का सब से बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. भाजपा के पास मोदी से बड़ा कोई नेता नहीं है. ऐसे में हर चुनाव में पार्टी उन का ही उपयोग करना चाहती है. पार्षद चुनाव से ले कर लोकसभा के चुनाव तक हर चुनाव मोदी नाम पर ही लड़ा जा रहा है. यही नहीं कोरोना काल में फ्री राशन के लिए जो बैग बनाए गए उन में भी मोदी का नाम था. राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में बहुत सारी आलोचनाओं के बाद भी केवल नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया. उन के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत ही दिखाई दिए.
भाजपा की कार्यशैली में आतंरिक लोकतंत्र कहीं दिखाई नहीं देता है. बड़ेबड़े आधार वाले नेताओं को दरकिनार कर दिया जाता है. मध्य प्रदेश चुनाव में जीत दिलाने वाले शिवराज चौहान हो या गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी या महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस एक लंबी लिस्ट है. भाजपा में ऐेसे नेताओं की जिन को एक झटके में दरकिनार कर दिया गया.
राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा में उन नेताओं को हाशिए पर रखा गया जिन्होंने इस आंदोलन की आधारशिला रखी थी. लालकृष्ण आडवाणी से ले कर उमा भारती, विनय कटियार तमाम नाम हैं. भाजपा चाहती है कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के जरीए वह इस तरह की चुनावी व्यवस्था करें जिस में एक नेता की मोनोपोली बनी रह सके.
अन्ना आंदोलन के समय जब जन लोकपाल कानून की बात उठी थी उसी समय ‘नोटा’ यानी ऊपर का कोई चुनावी प्रत्याशी पसंद नहीं और ‘राइट टू रिकौल’ को चुनावी सुधार में जरूरी था. इस में जनता को अपने चुने गए प्रतिनिधियों को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वापस बुलाने का अधिकार दिया जाना था. इस पर ध्यान नहीं दिया गया. ऐसे में ‘राइट टू रिकौल’ उपेक्षित हो कर रह गया.
चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार का इतिहास काफी पुराना है. प्राचीन काल में एंथेनियन लोकतंत्र से ही यह कानून चलन में था. बाद में कई देशों ने इस राईट टू रिकौल को अपने संविधान में शामिल कर लिया. इस कानून की उत्पत्ति स्विटजरलैंड में हुई थी. इस का चलन सर्वप्रथम अमेरिकी राज्यों में देखा गया. वर्ष 1903 में अमेरिका के लौस एंजिल्स की म्यूनिसपैलिटी, 1908 में मिशिगन और ओरेगोन में पहली बार ‘राइट टू रिकौल’ राज्य के अधिकारियों के लिए लागू किया गया था.
भारत में राइट टू रिकौल की बात सब से पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 4 नवंबर,1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान राइट टू रिकौल का नारा दे कर की थी. तब से ले कर अब तक राइट टू रिकौल सिर्फ घोषणाओं तक ही सीमित रहा है. इस बाबत किसी भी तरह के ठोस कानून बनाने को ले कर किसी भी राजनीतिक दल ने कोई पहल नहीं की है. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि राइट टू रिकौल वर्तमान स्थिति में सब से महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है जिस के माध्यम से लोगों को सशक्त किया जा सकता है और लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है.
कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया विधानसभा ने 1995 से रिकौल चुनाव को मान्यता दी. जिस के जरिए मतदाता अपने संसदीय प्रतिनिधि को पद से हटाने के लिए अर्जी दे सकते हैं. रिकौल चुनाव अमेरिका में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक सशक्त उपकरण है- अलास्का, जौर्जिया, कंसास, मिनेसोटा, मोंटाना, रोड आईलैंड और वाशिंगटन जैसे प्रांत धोखाधड़ी और दुराचार के आरोप पर रिकौल चुनाव की अनुमति देते हैं.
भारत में वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 के तहत लोगों ने 3 निर्वाचित स्थानीय निकाय के प्रमुखों का निर्वाचन रद्द कर दिया. मध्य प्रदेश और बिहार में भी राइट टु रिकौल स्थानीय निकाय स्तर पर अस्तित्व में है. 2008 में लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी राइट टू रिकौल का समर्थन किया था.
गुजरात के राज्य निर्वाचन आयोग ने राज्य सरकार को नगरपालिका, जिले, ताल्लुका और ग्राम पंचायतों में निर्वाचित सदस्यों को वापस बुलाने के लिए कानून में जरूरी संशोधन की सलाह दी थी.
जिन नगर निकायों में राइट टू रिकौल का प्रावधान लागू है वहां संबंधित वार्ड के 50 फीसदी से अधिक मतदाताओं को एक हस्ताक्षरित आवेदन नगर विकास विभाग को देना होता है. विभाग उस हस्ताक्षरित आवेदन पर विचार करता है और देखता है कि यह आवेदन कार्यवाही योग्य है या नहीं. यदि विभाग इस बात से सहमत है कि संबंधित वार्ड काउंसलर ने दोतिहाई मतदाताओं का विश्वास खो दिया है तो वह उक्त कांउसलर को पद से हटा सकता है.
लोकतंत्र में एक ऐसी सरकार की परिकल्पना की गई है जो लोगों की, लोगों के लिए और लोगों द्वारा चुनी गई हो. दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई बार बहुमत की चुनाव प्रणाली में हर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को लोगों का सच्चा जनादेश प्राप्त नहीं होता है. तर्क और न्याय का तकाजा है कि अगर लोगों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, तो उन्हें जनप्रतिनिधियों के कर्तव्यपालन में विफल रहने या कदाचार में लिप्त होने पर हटाने का भी अधिकार मिलना चाहिए.
जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 केवल कुछ अपराधों के मामले में जनप्रतिनिधियों को हटाने की मंजूरी देता है और जनप्रतिनिधियों की सामान्य अक्षमता और मतदाताओं की नाराजगी को उन्हें हटाने का कारण नहीं मानता. ‘राइट टू रिकौल’ लोकतंत्र के लिए एक जरूरी कदम होगा. इस को लागू करने के लिए फैसला लेना चाहिए.
प्यार इक बंधन है जिस में इक सुर मेरा, इक तुम्हारा. शादी भी किसी सुरीले सरगम से कम नहीं. दो दिल एक बंधन में बंधते हैं. शादी में दो परिवार भी मिल कर एक होते हैं. इक दूजे के दुखसुख में साथ निभाने का संकल्प करते हैं. इस सरगम में यदि दोनों परिवारों की ओर से एक भी सुर ढीला हो जाए तो रिश्ता बेसुरा हो जाता है. शायद इसीलिए समधी और समधिन आपस में इस नए रिश्ते की शुरुआत मीठे बोलों से, गले मिल कर, मुंह मीठा करवाने की रस्म के साथ करते हैं.
समधी और समधिन का रिश्ता बेटीबेटे की शादी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. मुंह की मिठास कभी फीकी न पड़े, कड़वाहट में तबदील न हो, इस के लिए इकदूजे को फूलों के हार पहनाए जाते हैं. उपहार दिए जाते हैं. इतना ही नहीं परिवारों के खानदानी, संस्कारी होने के दावे भी पेश किए जाते हैं. सच में यह रिश्ता बहुत मीठा होता है. उस की मिठास बनी रहे, यह आप के अपने ही हाथों में है.
मौजूदा युग में रिश्ते इंटरनैट के जरिए बनने लगे हैं. वैबसाइट पर लड़कालड़की के बायोडाटा दिए जाते हैं. दोनों को ठीक लगा तो रिश्ता पक्का हो गया. मातापिता के बारे में, उन के रिश्तेनातेदारों, खानदान आदि के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं होती. पहले तो घर का कोई बड़ा बुजुर्ग, रिश्ता सुझाता था, फिर दोनों परिवार वालों के बारे में विस्तार से चुपकेचुपके जानकारी हासिल कर ली जाती थी.
आज के दौर में जोडि़यां मैट्रीमोनियल वैबसाइट्स पर बनती हैं. युवा कितने भी आधुनिक हो जाएं, उन्हें अपनी जैसी समझ रखने वाले जीवनसाथी मिल जाएं, मगर मातापिता की जरूरत को बदलते समाज में भी झुठलाया नहीं जा सकता. दोनों परिवारों का मकसद रहता है युगल जोड़ी एकदम खुश रहे, परिवार को जोड़ कर रखे. अच्छे समधी, समधिन कैसे बनें, जानने के लिए मिलते हैं कुछ ऐसे ही परिवारों से-
आप हैं शुभचिंत सोढ़ी-पंजाब के जानेमाने ज्वैलर ढेरासिंह के परिवार की 2 सुशील संस्कारी बेटियों की मां, सुलझी हुई. प्यारी सी समधिन. इन की बड़ी बेटी पटियाला शहर में ब्याही है. संभ्रांत परिवार है पिंकी चन्नी का. शुभचिंत सोढ़ी और पिंकी चन्नी दोनों पुरानी सहेलियां हैं. 13-14 वर्ष पहले एक महिला क्लब से दोस्ती शुरू हुई और यह कब रिश्तेदारी में बदल गई, पता ही नहीं चला. पिंकी चन्नी बताती हैं, ‘‘मेरा बेटा और शुभचिंत की बेटी साथ पढ़ते थे. दोनों एकदूसरे को पसंद करते थे. दोनों में प्यार हो गया. जब मुझे पता चला तो मेरी पहली प्रतिक्रिया थी, अरे यह तो बहुत अच्छा है. मैं तो लड़की को जानती हूं और उस की मां को भी. खातेपीते लोग हैं. हमारी तो खूब जमेगी. बस फिर क्या था, सभी कुछ बेतकल्लुफी से हुआ.
‘‘दरअसल, रिश्ते तो सम्मान मांगते हैं, आदर मांगते हैं और आप जानते हैं जहां प्यार हो, सम्मान व आदर स्वयं ही हो जाता है. हमें गर्व है हमारी बहू ने आज तक मुझे शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. फिर भला हम मांबाप रिश्ते को प्यार से क्यों न निभाएं. हमारे संबंध किसी औपचारिकता के मुहताज नहीं. हम कभी भी एकदूजे के यहां चले जाते हैं. यहां तक कि रात के 10-11 बजे भी बेधड़क शुभचिंत के घर यानी बेटी की ससुराल पहुंच जाते हैं और कौफी की चुसकियां लेते हैं. मैं तो सीधे किचन में घुस जाती हूं. हम दोनों मिल कर झटपट चाय की ट्रे तैयार कर लेती हैं. पता ही नहीं चलता समय कैसे पंख लगा कर उड़ जाता है. खुशी तब दोगुनी हो जाती है जब लोग बच्चों को देख कर कहते हैं, ‘वाह, क्या जोड़ी है’ और हम दोनों सहेलियों को देख कर लोग कह उठते हैं, ‘समधिन हो तो शुभी पिंकी जैसी.’ ’’
जब शादीब्याह की बात पक्की होती है तो एक नए रिश्ते का जन्म होता है. पंजाबी में इसे कुड़म-कुड़माचारी कहा जाता है. कुड़माचारी है बहुत गजब की चीज. इस में दायित्व का, रस्मोरिवाज का, लेनदेन का एक अनकहा बोझ होता है. यही बोझ रिश्ते को हंसतेहंसते निभाने की वजह बनता है. दोनों पक्ष यह मानते हैं कि क्या हुआ मेरे दामाद या बहू के भी मांबाप हैं. उस का परिवार है. यदि हम उन के आने पर आवभगत करते हैं, उन का सम्मान करते हैं, तो देखा जाए तो एक प्रकार से हम सब वही तो कर रही हैं जिस की हम अपेक्षा करते हैं. ऐसा ही मानना है बीएसएनएल में कार्यरत नरिंदर नागपाल का.
मिसेज नागपाल का मानना है कि समधीसमधिनों का रिश्ता बहत ही मधुर है, बहुत ही मीठा है. जो इस रिश्ते को दिलोजां से निभाता है तो सच मानो, वह अपनी औलाद को जीजान से प्यार करता है, उन की गृहस्थी सुखी बनाता है. यह प्यार ही ऐसी शक्ति है जो रिश्ते को खींचता है और रिश्ता पुष्पित व पल्लवित होता है. और फिर गृहस्थी खुशहाल रहती है.
रिश्ते की लाज रखें
वे अपना किस्सा सुनाती हुई आगे बताती हैं, ‘‘हमारे बच्चों का रिश्ता यानी मेरे बेटे का रिश्ता तो उसी न्यूज चैनल में काम करते समय चैनल प्रमुख की ओर से सुझाया गया था. मुझे गर्व महसूस हुआ कि मेरे बेटे का व्यक्तित्व, उस का व्यवहार न्यूज चैनल के मालिक को भा गया और उन्होंने अपनी ओर से मेरे बेटे के लिए पढ़ीलिखी लैक्चरर लड़की का रिश्ता, चैनल के सिक्योरिटी हैड की बेटी के लिए सुझाया.
मुझे लगा बतौर मांबाप, हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम इस रिश्ते की लाज रखें. अच्छे से निभाएं.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘रिश्तेदार अच्छे होते हैं, सुखदुख में एकदूजे के काम आते हैं, इस तथ्य को झुठलाएं नहीं. इस नए अजन्मे रिश्ते को एक अच्छा नाम दें. समधीसमधिन प्यार दो, प्यार लो. एकदूसरे को बेलौस मुहब्बत दें, कमियां निकालें. अनचाही बातों को नजरअंदाज कर दें. अपेक्षा न रखें. बहू के मां बाप का पूरा आदरसम्मान करें. बेरहम हो कर मीनमेख न निकालें. रिश्ते बनाने में उम्र लग जाती है लेकिन मुंह से निकले अनचाहे शब्दों से रिश्ते दरक जाते है, पलभर में टूट जाते हैं.
कुछ कहना चाहें तो इस तरीके से कहें कि बिगड़ी बात बन जाए. अब देखिए न, मेरे घर में सुखशांति यदि मेरे और मेरे पति के खुशनुमा व्यवहार से रह सकती है तो क्यों मैं कड़वाहट घोलूं. समधीसमधिन से कभीकभार मुलाकात होती है. गले मिलें तो ही अच्छा है गले न पड़ें.’’
किसी ने सच ही कहा है, रिश्ते इन 2 बातों पर निर्भर करते हैं, पहला, आप के दिल में क्या है, और दूसरा, आप की जेब में क्या है. फिर यह रिश्ता बापबेटे, मांबेटी, दोस्ती या फिर समधियाने का क्यों न हो. ऐसा मानना है समाजसेविका उर्मिल पुरी का.
वे कहती हैं, ‘‘जहां कथनी और करनी में फर्क आया, समझो वहीं रिश्ते में बनावट आई और रिश्ता खोटा हो गया. मैं ने तो जब रिश्ते की बात की, दामाद को देखा, वहीं तय कर लिया था कि अपने समधियाने को प्यार दूंगी और बदले में प्यार लूंगी भी. अच्छी सोच से इस रिश्ते को पालूंगी. घर में बहू को लाऊंगी, सारे अरमान पूरे करूंगी. प्यार के हिंडोले में, रिश्तों की डोरी से इसे इस तरह झुलाऊंगी कि मेरी बहू की मां को मुझ पर भी प्यार आए और वह यह महसूस करे. जैसे उस की बेटी अपने घर में थी वैसी ही ससुराल में है. बहू को मर्यादा का पाठ भी पढ़ाऊंगी. परिवार की हर छोटीछोटी बात को पीहर में न बताने की सलाह दूंगी और तर्क भी. साफगोई से रिश्ते को मजबूत करूंगी ताकि किसी किस्म का संदेह न हो, बातचीत बनी रहे.’’
सेवानिवृत्त डिप्टी जनरल मैनेजर श्याम गर्ग की पत्नी शशी गर्ग गर्व से बताती हैं, ‘‘मुझे अपनी बहू की उस की मां द्वारा की गई परवरिश पर बड़ी खुशी होती है,’’ बात का खुलासा करते हुए वे कहती हैं, ‘‘मेरे बेटे की नईनई शादी हुई. पतिपत्नी दोनों हनीमून पर जा रहे थे. बहू ने मुझ से कहा, ‘‘मैं अपने कीमती आभूषण, जो शादी में मिले हैं, यहीं छोड़ जाऊं आप के पास?’’ मैं ने कहा, ‘‘नहींनहीं, आप रखो अपने पास, पहनो इन्हें या फिर अपनी मम्मी के पास रख लो.’’
इसी बीच मेरी समधिन का फोन आ गया, उन्होंने मेरी बहू से कहा, ‘‘नहीं बेटा, गहने मेरे पास नहीं, अपनी सास के पास रखो. अब यह उन की मरजी है, वे इन्हें आप को दें या लौकर में रखें. अब तुम हमारी बाद में, पहले उन की बेटी हो. बहू बनो, बहू के फर्ज पहचानो. पिछले घर की बातें, भूल कर नए घर के माहौल में ढलने की कोशिश करो.’
अब आप ही बताइए जो अपनी बेटी को इतने अच्छे संस्कार दे रही हैं, दखलंदाजी नहीं कर रहीं, रिश्ते में एक स्पेस दे रही हैं, मेरा रिश्ता उन से कैसे न अच्छा होगा.
यही बातें तो रिश्ते को पनपने में मदद करती हैं.’’ रिश्तों की उड़ान में- इस तरह यही सच है और यही सफल है कि समधियाने का इक धागा मेरा, इक तुम्हारा.
सवाल
मैं एक युवती से प्यार करता हूं. वह भी मुझे दिल से चाहती है और हम शादी करना चाहते हैं, पर वह धनी है जबकि मैं उस के जितना पैसे वाला नहीं हूं. क्या उस के परिवार वाले हमारे रिश्ते के लिए हां कर देंगे और शादी करने के बाद क्या मैं उस का खर्च उठा पाऊंगा? कृपया सलाह दें.
जवाब
लवर्स के सामने पैसा मिट्टी है. प्रैक्टिकली सोचें कि बिन पैसे सब असंभव है. ऐसा नहीं है कि रिच लोग ही रिच लोगों से प्यार के हकदार हैं. दिल कमबख्त किसी के भी हाथों मजबूर हो सकता है. आप उस युवती को अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताते हुए अपने परिवार की वित्तीय स्थिति की भी जानकारी दे दें. यह सच बताने में न झिझकें कि आप उस की सारी जरूरतें संभवतया न पूरी कर पाएं.
वास्तविकता से परिचित होने पर यदि उसे वास्तव में लगाव होगा तो वह कम में भी गुजारा कर लेगी वरना एक बार कड़वा घूंट भर कर अलगाव में ही बेहतरी है. अगर वह हर हाल में ओके कर देती है तो उस के परिवार वालों से बातचीत करें लेकिन उन्हें भी सब सच बताएं.
अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz
सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem
लखनऊ होटल ताज में खाने के तमाम तरह के स्वाद वाली डिश उपलब्ध थी. सब से अधिक लोग चाय के साथ पकौड़ी ही पंसद कर रहे थे. पकौड़ी भी तमाम अलगअलग स्वाद वाली थी. देशी फूड को प्रमोट करने और अपने यहां रूकने वालों को बताने के लिए फाइव स्टार होटल देश फूड के अलगअलग फेस्टिवल भी लगाते हैं. देशी फूड में चोखा बाटी से ले कर छोला भटूरा तक शामिल हो गया है. चाय के साथ पकौड़ी पंसद की जाने लगी है. हर होटल में चाट का कार्नर अलग से खुलने लगा है. यहां पानीपूरी, आलू टिक्की, मटर और दही भल्ले मिलने लगे हैं.
होटल ताज का अपना रेस्त्रां ही अवधयाना के नाम से है. इस के नाम से ही जाना जा सकता है कि यहां अवधी खाना मुख्यरूप से होता है. इस में नौनवेज और वेज दोनों ही तरह के खाने शामिल है. दाल चावल से ले कर लखनवी कबाब यहां मिलते हैं. यहां पपड़ी चाट, दही बडा, ठंडाई, मेवा लस्सी, कबाब और दाल तड़का जैसी देशी डिश का आनंद ले सकते हैं.
उत्तर भारत और पंजाबी फूड के साथ ही साथ दक्षिण भारत की इडली, सांभर, डोसा भी फाइव स्टार होटलों के मेन्यू का हिस्सा बन गया है. मुम्बई का वडापाव, पाव भाजी भी लोग पंसद कर रहे हैं.
इसी तरह से अब राजस्थानी और गुजराती डिश भी फाइव स्टार होटलों तक पहुंच गई है. वैसे यह सभी स्ट्रीट फूड का हिस्सा होती थी. आज भी सड़क किनारे चटखारे ले कर खाने वालों की संख्या कम नहीं है.
नोवाटेल होटल के जनरल मैनजर राहुल नामा कहते हैं ‘फाइव स्टार होटल में रुकने वाले अब अपने घर जैसा खाना पसंद करते हैं. ऐसे में जब उस को होटल में अपने घर जैसा खाना मिलता है तो वह उसे खाना पहले पंसद करते हैं. ऐेसे में हम इस बात का ख्याल रखते हैं कि हर राज्य का टेस्टी फूड अपन मेन्यू में शामिल करें. इस के साथ ही साथ सीजन के हिसाब से भी खाने को मेन्यू का हिस्सा बनाते हैं.’
नोवाटेल में जिमीकंद कबाब, दही कबाब जैसे कई स्वाद मेन्यू का हिस्सा बने हैं. ‘द ऐज’ होटल नोवाटेल के कैफे है. रूफ टौप रेस्त्रां है. खुले में खाने का अलग ही आनंद मिलता है. यहां पर चाय, दही के कबाब, पनीर टिक्का, मुर्ग मलाई टिक्का, गलावटी कबाब और कई तरह के देशी डिश है. ‘द स्क्वायर’ रेस्त्रां है. यहां पर डोसा, इडली, पराठा के साथ तमाम तरह के खाने का स्वाद लिया जा सकता है.
असल में पहले फाइव स्टार लोगों तक उन की ही पहुंच थी जो अमीर थे अब देशी फूड को गवंई खाना समझते थे. ऐसे में वह विदेशी फूड बहुत सम्मान के साथ खाते थे. अब देशी मिट्टी को पसंद करने वाले भी फाइव स्टार होटलों में रुकने लगे हैं. जो देशी खाने की मांग करते है. ऐसे में फाइव स्टार या उस जैसे छोटेबड़े होटल भी देशी खाने को अपन मेन्यू में केवल शामिल ही नहीं कर रहे, बड़े फक्र के साथ बताते भी हैं कि हमारे यहां देशी फूड भी है.
अगर स्वास्थ्य की नजर से देखें तो भी मैदा और मैदे से बनी चीजें लोग खाने में कम पसंद करने लगे हैं. यह लोग जब होटल पहुंचते हैं तो मोटे अनाज से बनी चीजें तलाश करते हैं.
ज्वार, बाजरा, चना और मक्का से तैयार होने वाली डिश खाना पंसद करते हैं. फाइव स्टार होटल में यह ‘मिलेट फूड’ के नाम से मिलने लगा है. जो मजा जलेबी में है वह बेकरी फूड में नहीं होता है.
दुनिया की दूसरी सब से बड़ी आबादी वाले देश चीन में एक नई चिंता घर कर गई है. एक तरफ चीन की आबादी धीरेधीरे बूढ़ी होती जा रही है तो दूसरी ओर चीन की प्रजनन दर भी अपने सब से निचले स्तर पर है.
हालिया ट्रेंड में देखा गया है कि चीन की महिलाएं अब बच्चे पैदा करने से कतरा रही हैं. महिलाओं में बच्चे पैदा करने का खौफ है. वे वर्किंग वुमन बनना पसंद कर रही हैं. युवाओं का शादी से मोहभंग हो गया है. खासकर महिलाएं शादी करने से भी बच रही हैं. नतीजा चीन की आबादी बूढ़ी हो रही है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मामले को ले कर परेशान हैं और महिलाओं से घर बसाने व परिवार बड़ा करने का आग्रह कर रहे हैं.
2022 में चीन में नवजात शिशुओं की संख्या 10 मिलियन से भी कम रही जबकि 2012 में यह संख्या लगभग 16 मिलियन थी. कुछ अनुमानों के अनुसार चीन की वर्तमान जनसंख्या लगभग 1.4 बिलियन है जो वर्ष 2100 तक घट कर 500 मिलियन हो सकती है. चीन में 2022 में 6.8 मिलियन जोड़ों ने शादी के लिए पंजीकरण कराया जबकि 2013 में 13 मिलियन जोड़ों ने पंजीकरण कराया था.
2022 में चीन की कुल प्रजनन दर प्रति महिला एक बच्चे के करीब होगी जो कि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए आवश्यक आवश्यक 2.1 से काफी कम है. इस स्थिति का दोष महिलाओं पर मढ़ा जा रहा है कि वे बच्चे पैदा करने को तैयार नहीं हैं.
कई महिलाओं को लगता है कि शादी और बच्चे पैदा करने का स्थापित मौडल अनुचित है. जिन बुजुर्गों की एक ही संतान है और वह भी सिर्फ लड़की तो वह उन की देखभाल के लिए मुश्किल से समय निकाल पाती हैं. ऐसे में उस को लगता है कि अगर वह शादी करेगी तो अपने पति और बच्चे को समय नहीं दे पाएगी. इसलिए चीन में बड़ी तादाद में महिलाएं शादी नहीं कर रही हैं. सिर्फ चीन में ही नहीं, महिलाओं की सोच में आया यह बदलाव भारत में भी नजर आता है. महिलाएं शादीशुदा होने से कहीं ज्यादा कामकाजी होना पसंद करने लगी हैं.
आज कार्यबल में युवा महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है. लेकिन विवाहिताओं की संख्या घट रही है. माना जाता है कि घर, बच्चे और कामकाज को एकसाथ संभालने का बोझ बड़ा साबित होता है.
आज के तथाकथित मौडर्न जमाने में भी हमारे समाज में ज्यादातर लोगों का मानना है कि महिलाओं के लिए केवल घर और बच्चों की देखभाल का काम करना ही उचित है और उन्हें बाहर जा कर काम करने की जरूरत नहीं है. इस सामाजिक दबाव और प्रेरणा की कमी के कारण आज भी हमारे समाज में 80 प्रतिशत महिलाएं ऐसा ही कर रही हैं. आज भी हमारे देश में कामकाजी महिलाओं की आबादी कामकाजी पुरुषों की तुलना में आधे से भी कम है.
मगर क्यों? एक स्त्री केवल घरपरिवार संभालने के लिए ही बनी है? स्त्री के लिए शादी करना और बच्चे को जन्म देना अनिवार्य क्यों माना जाता है? यह तो व्यक्तिगत चौइस होती है. वह आत्मनिर्भर जिंदगी जीना चाहती है तो इस में गलत क्या है?
यदि स्त्री कामकाजी है, रुपए कमाती है और बच्चे पैदा करने के बजाय अपनी पहचान बनाना चाहती है तो इसे बुरा क्यों समझा जाए? जौब करने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं. सम्मानित जिंदगी जीती हैं. कुछ समय पहले की गई एक स्टडी में भी यह पाया गया था कि वर्किंग वुमन अपनी जिंदगी में ज्यादा खुश रहती हैं. आत्मनिर्भरता आप को अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का विकल्प देती है. आप को पैसे या चीजों के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है. अपने पैसे खुद कमा कर खर्च करने में जो खुशी, आत्मसम्मान और एक पावर फील होती है वह कोई और नहीं दे सकता चाहे आप का पति आप को कितना ही प्यार क्यों न करता हो.
पति, घर, बच्चा, किचन यह हर औरत की लाइफ में होता है. इस में भी कुछ गलत नहीं है. लेकिन सिर्फ उतने को दुनिया मान लेना, यह सोच गलत है. बाहर जा कर काम करने और पैसा कमा कर लाने से एक तरह का आत्मसम्मान और एक सैल्फ वर्थ की फीलिंग आती है. आत्मविश्वास बढ़ता है.
आप समाज में अपनी स्किल्स का, अपनी एजुकेशन का सही उपयोग करती हैं. घर के कामों के लिए किसी औरत को आज तक कोई अवार्ड नहीं दिया गया है. लेकिन औफिस में अच्छा काम करने पर अवार्ड मिलता है. आप का अपना एक अलग वजूद, एक पर्सनैलिटी बनती है. आप के अंदर एक सैटिस्फैक्शन आता है. बुढ़ापे में आप को पैसों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है. आप के पास अपने दोस्तों का नैटवर्क होता है. आप खुद को कंप्लीट महसूस करती हैं.
यही नहीं, आप आत्मनिर्भर हैं तो अपने पेरैंट्स का खयाल रख पाती हैं. आप उन पर रुपए खर्च कर सकती हैं. उन की जरूरत की चीजें ला सकती हैं. हर सुखसुविधा मुहैया करा सकती हैं.
वर्किंग मौम को भले ही बच्चों को समय न दे पाने का एक गिल्ट होता है लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी मां के बच्चे कहीं ज्यादा कौन्फिडेंट, सैल्फ डिपेंडेंट और मैच्योर होते हैं. साथ ही, उन्हें एक बात अपने बचपन से ही सीखने को मिलती है कि मम्मियां सिर्फ घर का काम और परिवार की देखभाल ही नहीं बल्कि और भी बहुतकुछ संभाल सकती हैं.
हाल में एक शोध से भी यह साबित हुआ है कि वर्किंग मौम के बच्चे बड़े होने पर अधिक खुश रहते हैं. वे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चे की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं.
हार्वर्ड बिजनैस स्कूल के शोधकर्ताओं ने 29 देशों में 1,00,000 से अधिक पुरुषों और महिलाओं पर सर्वे किया. इस में भारत की महिलाएं भी शामिल थीं. इस सर्वेक्षण का उद्देश्य यह पता लगाना था कि वर्किंग मौम होने पर बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है. वे औफिस में काम करने पर घर के लिए कितना समय दे पाती हैं.
इस अध्ययन में यह बात सामने आई कि वर्किंग मौम के बच्चे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं. कामकाजी मांओं के पास समय की कमी होती है, यह बात बच्चे भी समझते हैं. इस तरह वे समय की क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं. बच्चे भी उन के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने के लिए तत्पर रहते हैं. वे उन की बातों और प्रयासों को हलके में नहीं लेते हैं. धीरेधीरे वे उन्हें अपना रोल मौडल मान लेते हैं.
वर्किंग मौम के साथ बड़ी होने वाली बेटियां अपने घर पर रहने वाली मांओं की बेटियों की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक कमाती हैं. वहीं यह भी पाया गया है कि जिन लड़कों की मां वर्किंग होती हैं, वे अपने औफिस में फीमेल कलीग के साथ अधिक सपोर्टिव होते हैं. वे जेंडर इक्वैलिटी में विश्वास करते हैं. वर्किंग मौम के ज्यादातर बच्चे डेकेयर में बड़े होते हैं. इसलिए उन में सोशलाइजेशन और कम्युनिकेशन स्किल अच्छी तरह डैवलप होता है.
किसी कलाकार को सफल देखने और उस की ग्लैमरस लाइफ को देख कर मन में उस की तरह ही जीने की इच्छा होती है. यही वजह है कि बौलीवुड में लाखों लोग ऐक्ट्रेस बनने का सपना ले कर देशविदेश से बिना सोचेसमझे चले आते हैं. उन के यहां तक पहुंचने के स्ट्रगल के बारे में कोई ध्यान नहीं देता. हर ऐक्ट्रेस के लिए बौलीवुड में जगह बनाना आसान नहीं होता. किसी भी कलाकार को सब से पहले उस के लुक, बातचीत के तरीके, भाषा का ज्ञान, ठगी आदि ऐसे कई बातें हैं जिन से उसे गुजरना पड़ता है. आज भले ही कलाकारों के लाखोंकरोड़ों फैन हों, लेकिन जब वे इंडस्ट्री में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें अपने लुक और हिंदी भाषा की जानकारी न होने के कारण काफी संघर्ष व उपहास के पात्र बनने पड़े. आइए जानें विदेशी हीरोइनों ने किस तरह से इसे फेस किया और आगे बढीं.
सब से अधिक संघर्ष पोर्नस्टार सनी लियोनी को करना पड़ा. आज सनी लियोनी एक सफल मुकाम पर हैं. उन्हें हिंदी बोलना आता है. उन्होंने हिंदी फिल्मों के तौरतरीके को सीख लिए हैं. शुरुआत में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा है, “मैं पहली बार केवल 2 हफ्ते के लिए मुंबई आई थी और वापस लौसएंजिलिस चले जाने की बात सोची थी. लेकिन आज मैं कई फिल्में कर चुकी हूं और कई ब्रैंड्स एंडोर्स करती हूं. खुद को इंडस्ट्री में जमाना आसान नहीं था. पुराने दिनों को याद करें, तो हर दिन सुबह उठ कर प्रोफैशनल की तरह होंठों पर स्माइल लिए प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाना, हमेशा खुश रहने की ऐक्टिंग करना, जो भी काम मिले उसी को कर लेना, इसी से मुझे स्थापित करने का मौका मिलता गया.
“मैं न तो एक अच्छी अभिनेत्री हूं, न ही एक अच्छी डांसर, पर मैं ने हर काम को दिनरात मेहनत द्वारा सिद्ध किया. मैं जानती हूं कि लोग मेरे बारे में बहुत बुराभला कहते हैं, पर उस का असर मुझ पर नहीं पड़ता. मैं अब इंडस्ट्री का हिस्सा बन चुकी हूं. मेरे फैन्स और दर्शक यहां बहुत हो चुके हैं जिस की मुझे ख़ुशी है. अमेरिका में काम करने का तरीका अलग होता है. यहां अभिनय के साथसाथ इमोशन भी होते है, जिन में मुझे एडजस्ट करना पड़ा, क्योंकि बौलीवुड किसी के साथ एडजस्ट नहीं करता. यहां कोई काम समय पर नहीं होता.”
विक्की कौशल से शादी करने के बाद कैटरीना इन दिनों अपनी मैरिड लाइफ को एंजौय कर रही हैं. उन्हें बौलीवुड की सब से हौट अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है. उन के लिए बौलीवुड में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था. दरअसल, उन का लुक और लैंग्वेज दोनों ही विदेशी थे, जिस के कारण उन्हें कास्ट करने में निर्मातानिर्देशक हिचकिचाते थे. उन्होंने एक जगह कहा है कि जब वे पहली बार मुंबई आईं, तो उन की इच्छा एक मौडल बनने की थी.
उन की आदर्श सुपरमौडल मधु सप्रे, लक्ष्मी मेनन और मलायका अरोड़ा थीं. इसलिए कैटरीना ने मुंबई में मौजूद विज्ञापन एजेंसियों की एक सूची बनाई और उन में से किसी में काम पाने की उम्मीद में वे उन सभी से टैक्सी कर मिलने जाती थीं. उस दौरान उन्होंने कई नकली साबुन के विज्ञापन किए. वही विज्ञापन उन्हें हमेशा मिलते रहे. जो विज्ञापन उन्हें नहीं मिला वह था कबड्डी खेलने का विज्ञापन, जो उन्हें पता नहीं था कि कबड्डी क्या होती है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने के लिए उन्होंने हिंदी बोलना सीखा, अपने लुक को बदला ताकि उन्हें काम मिल सके.
दिलबर गर्ल और अभिनेत्री नोरा फतेही ने अपने फिल्मी कैरियर और संघर्ष को ले कर भी ढेर सारी बातें की हैं. उन्होंने एक जगह कहा है कि उन्होंने अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई अजीबोगरीब काम किए और जब वे हुक्का बार में काम कर रही थीं तो उन्होंने अपने डांस में काफी सुधार किया था.
इस के अलावा उन्हें जबजब जो भी काम के मौके मिले, वे करती गईं. शुरुआत में वे बाहर नहीं जाती थीं और दूसरी लड़कियों की तरह ग्रुप बना कर पार्टी नहीं करती थीं और कभी नहीं सोचा कि उन का एक बौयफ्रैंड होगा. वे हर दिन खुद को एक कमरे में बंद कर लेती थीं और हिंदी भाषा सीखती थीं, टीवी देखती थीं और अपने कमरे में प्रैक्टिस करती थीं. उन दिनों उन्होंने भाई की शादी, उस के जन्मदिन सबकुछ मिस किया था. इस के अलावा उन दिनों उन्हें 8-9 लड़कियों के साथ रहना पड़ा, जो बहुत शातिर थीं. उन का पासपोर्ट भी चुरा लिया गया था. इतना सब होने के बावजूद नोरा वापस कानाडा नहीं लौटीं.
नोरा ने बताया कि एक कास्टिंग डायरैक्टर ने उन्हें औडिशन के लिए बुलाया था और वह जानता था कि वे इंडियन नहीं हैं. उस ने उन्हें हिंदी की लाइन बोलने को दिया, नोरा सही से नहीं बोल पाई और आसपास बैठे सभी नोरा पर हंसने लगे. नोरा को उस दिन बहुत दुख हुआ था कि लोग इतने बुरे भी हो सकते हैं, कम से कम उन के जाने का इंतज़ार तो कर लिया होता. ये सारी बातें नोरा को कभीकभी याद आती हैं. आज वे सफल हैं और अपने कैरियर से खुश हैं, जबकि वह दिन था जब नोरा 5,000 डौलर ले कर कनाडा के मोरक्को शहर से मुंबई अभिनय के लिए आई थीं और काफी मेहनत के बाद आज सफल हुई हैं.
अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीज ने फिल्म उद्योग में 10 साल से अधिक समय बिताया है और यह यात्रा उन के लिए आसान नहीं थी. हालांकि वे वर्ष 2006 की ‘मिस श्रीलंका यूनीवर्स’ रह चुकी हैं. उन के गैरभारतीय दिखने और नाम की वजह से उन्हें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा. साल 2009 में अलादीन से डैब्यू करने के बाद जैकलीन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वेह युवाओं के बीच सब से लोकप्रिय महिला अभिनेताओं में से एक बन गईं और अपने अब तक के 10 साल के कैरियर में जैकलीन ने अधिकांश प्रमुख प्रोडक्शन हाउस के साथ काम किया है.
जैकलीन को भी नाक की सर्जरी करवाने और अपना नाम बदल कर मुसकान रखने के लिए कहा गया था, क्योंकि ‘जैकलीन फर्नांडीज’ नाम में देसीपन नहीं था. जैकलीन इन सब बातों को नजरअंदाज कर असली नाम के साथ ही आगे बढीं. उन्हें लोग कहते थे कि उन्हें एक खास तरह का बनना होगा. वे चाहते थे कि वे अपनी भौंहों को गहरी कर लें, जो उन्होंने नहीं किया. जैकलीन को बचपन से उन की नाक पसंद थी, ऐसे में नाक को बदलने के लिए अगर कोई कहे, तो उन्हें वह बात बिलकुल भी पसंद नहीं थी. इतना ही नहीं, उन के कई पुरुष सहकलाकार उन से कहते थे कि साड़ी पहन कर इंडियन लुक में ‘फिट’ होने की कोशिश न करें. ये सारी बातें उन्हें मायूसी देती थीं. पर वे इन से निकलना भी जान चुकी थीं. इन सारी बातों को नजरअंदाज कर आज जैकलीन सफल अदाकारा बन चुकी हैं और अपनी जर्नी से काफी खुश हैं.
रचनात्मकता को पैसे के बल पर कमतर नहीं किया जा सकता, इस बात को एक बार फिर तेलुगु फिल्म ने साबित कर दिखाया है.12 जनवरी, शुक्रवार के दिन टिप्स कंपनी की कैटरीना कैफ,विजय सेतुपति व संजय कपूर के अभिनय से सजी 60 करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ के साथ ही दक्षिण भारत की 3 फिल्में प्रदर्शित हुईं. जिस में से क्लीरंजन निर्मित व प्रशांत वर्मा निर्देशित तथा तेजा सज्जा के अभिनय से सजी मैथोलौजिकल सुपर हीरो वाली फिल्म ‘हनु मान’ है.
दूसरी तेलुगु फिल्म ‘गुंटूर कारम’ है. इस फिल्म के साथ दक्षिण के अभिनेता मोहन बाबू ने निर्देशक त्रिविक्रम श्रीनिवास के साथ 12 साल बाद जोड़ी बनाई है. तीसरी फिल्म रजनीकांत के दामाद धनुष की तमिल फिल्म ‘‘कैप्टन मिलर’’ प्रदर्शित हुई है. तेलुगु और हिंदी दोनों भाषाओं में बनी फिल्म ‘हनु मान’ ने हिंदी भाषी क्षेत्रों में कैटरीना कैफ की फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ और दक्षिण भारत में ‘गंटूर कारम’ के साथ ही ‘कैप्टन मिलर’ को बौक्सऔफिस पर धूल चटा दी.
फिल्मकार प्रशांत वर्मा की मैथोलौजिकल सुपर हीरो फिल्म ‘हनु मान’ की मूल लागत महज 8 करोड़ रुपए है लेकिन फिल्म बनने के बाद निर्माता और निर्देशक दोनों को एहसास हुआ कि यदि वह कुछ पैसे वीएफएक्स व सीजेआई पर खर्च कर दें,तो यह फिल्म ज्यादा बेहतर हो जाएगी. तब ‘हनु मान’ के वीएफएक्स पर 9 करोड़ रूपए खर्च किए गए. 3 करोड़ रूपए प्रचार पर खर्च किए गए. इस तरह जब फिल्म ‘हनु मान’ सिनेमाघरों में पहुंची,तो इस की कुल लागत 20 करोड़ रुपए पहुंच चुकी थी.
पर एक सप्ताह में ‘हनु मान’ ने सिर्फ हिंदी में 20 करोड़ रुपए से अधिक कमा लिए. जबकि दक्षिण भारत में इस फिल्म ने 100 करोड़ रुपए कमा लिए. इस तरह फिल्म ने अपनी लागत वसूलने के साथ ही लाभ कमा रही है. फिल्म अभी भी सिनेमाघरों में दर्शक खींच रही है. फिल्म के निर्माताओं ने अपनी तरफ से प्रचार कर फिल्म के प्रति दर्शकों में उत्सुकता जगाने में कामयाब रहे थे, फिर माउथ पब्लिसिटी के बल पर इस का बौक्सऔफिस कलैक्शन हर दिन बढ़ता जा रहा है. अनुमान है कि यह फिल्म लाइफ टाइम कमाई 150 करोड़ रुपए से अधिक करेगी.
भारत में वैसे भी दानदक्षिणापंथी फिल्में खूब चलती हैं. यह फिल्म भी ऐसी है जिस में अंधविश्वास कूटकूट कर भरा हुआ है. फिल्म में हनुमान को माध्यम बना कर पैसा कमाया जा रहा है. साथ में लोगों को छिपे तौर दक्षिणापंथी बनाया जा रहा है, ताकि वे मंदिरों में जा कर पैसा लुटाएं.
टिप्स कंपनी और दिल्ली के 2 व्यवसायी संजय सोत्री व केवल गर्ग निर्मित तथा ‘अंधाधुन’ फेम श्रीराम राघवन निर्देशित फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ में कैटरीना कैफ, विजय सेतुपति, संजय कपूर हैं. पहले इस फिल्म में विजय सेतुपति की जगह सैफ अली खान होने वाले थे. इस फिल्म के ट्रेलर से फिल्म के अच्छी होने की उम्मीद बढ़ी थी. मगर इस फिल्म को इस का खराब पीआर दर्शकों तक इसे नहीं पहुंचा सका. परिणामतः पहले दिन के सुबह के तमाम शो रद्द हो गए और इस का बुरा असर फिल्म पर पड़ा.
फिल्म की पीआरटीम ने किसी भी कलाकार को पत्रकारों से बात नहीं करने दिया. फिल्म प्रचार कंपनी के मालिक ने पत्रकारों से साफसाफ कह दिया कि कलाकारों का पत्रकारों को इंटरव्यू देने में यकीन नहीं रहा. पीआर टीम कलाकारों के साथ शहरों का भ्रमण करती रही. किसी भी शहर में किसी इवेंट में कलाकारों से दोचार मिनट के नृत्य या कुछ संवाद बुलवा कर फिल्म को सफलता दिलाने का दावे हर बार धूल चाटते नजर आए हैं, पर निर्माता को समझ में नहीं आता कि इस तरह पीआर पैसे की बर्बादी करा रहा.
ऊपर से कैटरीना कैफ ने हद कर दी. मुंबई से बाहर चाहे जिस शहर में जाना रहा हो, कैटरीना हमेशा चार्टर्ड प्लेन से ही गई. परिणामतः 20 करोड़ रुपए से अधिक प्रचार पर खर्च हो गए और फिल्म का बजट हो गया 80 करोड़ रुपए. जबकि यह फिल्म एक सप्ताह में महज 14 करोड़ रुपए ही कमा सकी.
फिल्मकार श्रीराम राघवन तो फ्रांसीसी साहित्य के दीवाने हैं. इस बार ‘मेरी क्रिसमस’ भी वह एक फ्रांसीसी उपन्यास पर ही ले कर आए हैं, जिस का नाम वह अंत तक छिपाते रहे. पर फिल्म के अंत में उस उपन्यास का नाम दिया है, पर वह नाम इतनी जल्दी गायब हो जाता है कि दर्शक पढ़ नहीं सकता.
श्रीराम राघवन की पिछली फिल्मों के मुकाबले ‘मेरी क्रिसमस’ काफी कमजोर फिल्म है. इस का बजट भी बेवजह के मदों में पैसे खर्च कर बढ़ाया गया. अन्यथा यह फिल्म बामुश्किल 30 करोड़ रुपए में बनी होगी.
कैटरीना कैफ या संजय कपूर अपने अभिनय से प्रभावित नहीं करते जबकि कैटरीना की बेटी एनी के किरदार में 6 वर्ष की बाल कलाकार परी शर्मा जरूर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती है. एक सप्ताह की कमाई के आधार पर कहा जा सकता है कि ‘मेरी क्रिसमस’ की लाइफ टाइम कमायी 20 करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी. यानी कि यह फिल्म सिनेमाघरों का किराया भी नहीं चुका सकती.
जब तक फिल्म के निर्माता अपनी फिल्म के बजट व प्रचार पर ध्यान नही देंगें, तब तक फिल्में इसी तरह बौक्सऔफिस पर डूबती रहेंगी. इस का खामियाजा पूरे बौलीवुड को भुगतना होगा और यह रवैया सिनेमा की बर्बादी का कारण बनता जा रहा है.
तेलुगु फिल्म ‘हनु मान’ ने न सिर्फ 600 करोड़ रुपए से अधिक की लागत में बनी तमाम बौलीवुड फिल्मों को आइना दिखाया है, बल्कि हौलीवुड की ‘स्पाइडरमैन’, ‘आयरनमैन’ व ‘सुपरमैन’ को भी जबरदस्त टक्कर दिया है. ‘हनु मान’ के निर्माता व निर्देशक ने साबित कर दिखाया कि अगर इंसान के अंदर रचनात्मकता हो, एक अच्छी व ईमानदार सोच हो तो कम से कम खर्च में भी ऐसी फिल्म बन सकती है, जिसे बौलीवुड हजार करोड़ रुपए खर्च करके भी नहीं बना पा रहा है.
‘हनु मान’ का वीएफएक्स और सीजेआई, बौलीवुड की हर फिल्म को टक्कर दे रहा है. कमाल का वीएफएक्स है. फिल्म के कलाकार तेजा सज्जा और अमृता अय्यर की जोड़ी के अभिनय के सामने बौलीवुड के दिग्गजों का अभिनय कोई मायने नहीं रखता. बौलीवुड के हर निर्माता,निर्देशक व कलाकार को ‘हनु मान ’ से सीखना चाहिए.
कम से कम शाहरुख खान को, जिन की अपनी वीएफएक्स कंपनी है. इस के बावजूद वह ‘पठान’, ‘जवान’ या ‘डंकी’ में अच्छा स्पैशल इफैक्ट्स नहीं दे पाए. ‘ब्रम्हास्त्र’ के निर्देशक अयान मुखर्जी व निर्माता करण जोहर को भी सीखना चाहिए. फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज‘ के सर्जकों को भी सबक लेना चाहिए.
200 करोड़ रुपए के बजट में बनी दक्षिण के सुपर स्टार महेश बाबू की फिल्म ‘गुंटूर करमा’ महज 100 करोड़ रुपए ही कमा सकी है. इस में से निर्माता के हाथ में महज 30-35 करोड़ रुपए ही आएंगे. उधर धनुष की लगभग 100 करोड़ रुपए की फिल्म ‘कैप्टन मिलर’ बौक्सऔफिस पर 63 करोड़ रुपए ही एकत्र कर पाई है.
Diet Tips For 40 Years Women : आज के समय में हर किसी का फिट रहना बहुत जरूरी हो गया है. खासकर 40 की उम्र के बाद महिलाओं को अपनी सेहत का विशेष ख्याल रखना चाहिए. ज्यादातर महिलाएं अपने घर-परिवार की देखभाल और बच्चों की परवरिश के चक्कर में खुद का ही ख्याल नहीं रख पाती हैं, जिस की वजह से बढ़ते उम्र के पड़ाव में उन्हें कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है.
शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज और दिल की तमाम बीमारियां आदि होने का खतरा भी बढ़ जाता है. हालांकि हैल्दी लाइफस्टाइल और प्रॉपर डाइट को फौलो करने से इन परेशानियों से बचा जा सकता है. इसलिए जरूरी है कि 40 की उम्र के बाद महिलाएं अपनी डाइट (Diet Tips for 40 years Womens) में कुछ खास चीजों को शामिल करें.
अक्सर महिलाओं के शरीर में 40 की उम्र के बाद कौलेस्ट्राल की कमी होने लगती है, जिस से हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक आने का जोखिम बना रहता है. ऐसे में ड्राई फ्रूट्स (Diet Tips for 40 years Womens) और नट्स खाना फायदेमंद होता है. इन में हैल्दी फैट और अन्य पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है, जो शरीर में खराब कोलेस्ट्राल की मात्रा को कम करने में मदद करते हैं.
40 की उम्र के बाद ज्यादातर महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और उन्हें जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है. ऐसे में उन्हें अपनी डाइट में कैल्शियम युक्त चीजों को शामिल करना चाहिए. इस के लिए वह अंडे खा सकती है. एक बड़े अंडे में लगभग 25 से 30 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. हालांकि अंडे की जर्दी की बजाए अंडे के छिलके खाना ज्यादा फायदेमंद होता है, क्योंकि अंडे के छिलकों में मुख्य रूप से कैल्शियम पाया जाता है.
बढ़ती उम्र के साथसाथ मांसपेशियों में अकड़न, रूखी त्वचा, दांतों में दर्द और शुगर आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे में आप अपनी डाइट में पालक, गोभी, गाजर, मूली, तोरी और आदि हरी पत्तेदार सब्जियों (Diet Tips for 40 years Womens) को शामिल करें. इस के अलावा इस उम्र में दाल, केला, सेब, दूध, सोयाबीन और पनीर खाना भी लाभदायक होता है.
अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डाक्टर से परामर्श लें.