Download App

तर्क नहीं आस्था का नतीजा : क्या हम आक्रामकता और स्वार्थ के गुलाम हो गए हैं?

महाराष्ट्र के पुणे शहर में इस 21 जनवरी को एक सिरफिरे आशिक ने प्यार का विरोध करने पर अपनी प्रेमिका की मां की गला घोंट कर हत्या कर दी. कत्ल के लिए उस ने कुत्ते की बेल्ट का इस्तेमाल किया. प्रेमिका की शिकायत के आधार पर पुलिस ने केस दर्ज कर के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है.

यह वारदात पुणे के पाषाण सुस रोड पर स्थित एक सोसायटी में हुई. वहां 58 साल की वर्षा अपनी 22 साल की बेटी मृण्मयी के साथ रहती थी. इसी महीने की पहली तारीख को वर्षा के पति की मौत हो गई थी. उस की बेटी एक कंप्यूटर इंजीनियर है लेकिन 1 जनवरी को पिता की मौत के बाद उस ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी. करीब 7 महीने पहले एक डेटिंग ऐप पर उस की मुलाकात शिवांशु के साथ हुई. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे. लेकिन कुछ महीने बाद लड़की को पता चला कि उस का प्रेमी डिलीवरी बौय का काम करता है.

मृण्मयी की मां उन के रिश्ते के खिलाफ थी. वह लड़के की नौकरी और आर्थिक स्थिति को अपनी हैसियत के बराबर नहीं समझती थी. इसलिए उस ने अपनी बेटी से इस रिश्ते से बाहर निकलने के लिए कहा था. पिता को खो चुकी मृण्मयी ने अपनी मां की बात मान ली और उस ने शिवांशु से ब्रेकअप कर लिया और उस से मिलना बंद कर दिया. इस बात से नाराज शिवांशु गुप्ता एक रात मृण्मयी के घर पहुंच गया.

उस की मां उसे पहले से जानती थी इसलिए उन्होंने दरवाजा खोल कर उसे अंदर बुला लिया. घर में घुसने के बाद शिवांशु ने पहले तो मां को शादी के लिए मनाने की कोशिश की लेकिन जब वो नहीं मानी तो कुसे की बेल्ट से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी.

इसी तरह दिल्ली में रोहिणी इलाके में एक 24 साल के लड़के ने अपनी 19 साल की प्रेमिका की गला रेत कर हत्या करने की कोशिश की. बाद में खुद की भी जान ले ली.

दरअसल अमित नाम का यह सिरफिरा आशिक उसी कार्यालय में काम करता था, जिस में लड़की काम करती थी. उसे लड़की से एकतरफा प्यार हो गया. परेशान हो कर लड़की ने अमित से बात करना बंद कर दिया. अमित यह बेरुखी सह नहीं सका. उस ने चाकू से लड़की पर हमला किया और उस का गला रेतने की कोशिश की. लेकिन औफिस के अन्य लोगों ने उसे बचा लिया. फिर अमित ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.

दरअसल आजकल हमारे पास तर्कपूर्ण सोच विकसित करने के लिए कोई जरिया नहीं है. न हमारे पास वैसे राइटर हैं जो तार्किक बातें कहते हों या जिन के लेखन में तर्क झलकता हो. न हमारे पास पढ़ने के लिए वैसी किताबें है जो हमें तर्कशील बनाएं. हम बस विश्वास यानी फेथ के सहारे चल रहे हैं. तभी हम कहते हैं कि धर्म ने ऐसा कहा इसलिए यही सही है या प्यार ऐसे ही होता है और हम ऐसे ही प्यार करेंगे. इसी पर हमारा विश्वास है.

आज हमारे पास देखने के लिए जो फिल्मी या सीरियल की कहानियां हैं. उन में आक्रामकता, स्वार्थ और जबरदस्ती दिखाई जाती है. कुछ गिनीचुनी किताबें जो हम पढ़ते हैं. उन की कहानियों में भी आज इसी तरह के किरदार दिखाई देते हैं. एक समय था जब डेसकार्टेस, नीत्शे, रसेल, इम्मानुएल कैंट, विलियम जेम्स जैसे लेखक थे जिन की कहानियों के किरदारों में या वर्णित घटनाओं और उदाहरणों में तर्कशीलता होती थी. वह हमें एक दिशा देते थे. हमारी सोच और हमारे चिंतन को एक तार्किक दृष्टिकोण देते थे.

आज हमारे पास पढ़ने को बचा क्या है ? ले दे कर एक मोबाइल है जो सब के हाथों में होता है. हम उस में आंखें गड़ाए रखते हैं. उस में जो भी बेसिरपैर की बातें पढ़ने को मिलती हैं वही हमारे अवचेतन में बैठता जाता है.

मोबाइल में ऐसी तर्कहीन चीजें होती हैं जिन का हमारी जिंदगी पर नेगेटिव असर पड़ता है. मगर हम उसे ही फौरवर्ड किए जाते हैं. इस में केवल फेथ को बढ़ावा दिया जाता है. बस इसी फेथ यानी विश्वास के आधार पर हमारी सोच विकसित होती है. हम वैसा ही करने लग जाते हैं जैसा हमें समझाया जा रहा है.

गलती हमारी नहीं बल्कि गलती है हमारे माहौल की. गलती है समाज के बदलते हुए नजरिए की जिस ने हमें आक्रामकता, स्वार्थ, बेईमानी जैसे गुण सिखाए हैं. हमारी सच्चाई, हमारा प्यार, हमारा नजरिया, हमारे तर्क और हमारी सोच बदल गई है. हमारी सोच में तर्क तो रह ही नहीं गया है. इसी वजह से आज इस तरह की घटनाएं अकसर देखने को मिलती हैं. हम परिणाम दिए बिना डालते हैं. जब तक हम इस पर काम नहीं करेंगे हम सही दिशा की ओर नहीं बढ़ पाएंगे.

आज कुछ पत्रिकाएं हैं जो तर्कशीलता को आधार मानती हैं. दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं ऐसी ही हैं मगर समस्या है कि हम पढ़ने के लिए समय नहीं निकालते. हम मोबाइल में लगे रहते हैं. जब तक हम मोबाइल के जंजाल से पीछा नहीं छुड़ाएंगे तब तक कुछ सही होने की आशा कैसे कर सकते हैं?

Karpoori Thakur को भारत रत्न : अपने सिद्धांतों की ‘वाशिंग मशीन’ है भाजपा

Bharat Ratna to Karpoori Thakur : कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग उन की जन्म शताब्दी समारोह में विपक्षी दलों ने करने की योजना बनाई थी. इस के पहले ही मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा कर दी. ठीक इसी तरह से उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया था. मुलायम को ऐसा सम्मान केंद्र की मोदी सरकार देगी समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों को ही यकीन नहीं था. उस की वजह भी थी. मुलायम की मृत्यु का कुछ ही समय अक्तूबर 2022 में हुई थी. अप्रैल 2023 में उन को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया.

देखा जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और भाजपा के बीच 36 का रिश्ता रहा है. भाजपा का एक बड़ा तबका और पूरा संघ परिवार अयोध्या आंदोलन में मुलायम सिंह यादव को सब से बड़ा खलनायक मानता था. राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जब शोर पूरे सोशल मीडिया पर था तब कई ऐसी पोस्ट थीं जिस में यह मांग की जा रही थी कि मुलायम की मूर्ति भी वहां लगे उस पर पत्थर मारे जाए. भाजपा के बड़े वर्ग ने इस मैसेज को तवज्जो नहीं दी. मोदी सरकार ने दक्षिणापंथी लोगों की भावनाओं के विपरीत मुलायम सिंह को पद्म विभूषण सम्मान दिया.

जिस समय मुलायम सिंह की मृत्यु हुई भाजपा के नेताओं ने मुलायम के पैत्रक गांव सैफई जा कर श्रद्वाजंलि दी. मुलायम की मृत्यु के बाद उन की लोकसभा सीट का जब उपचुनाव आया तो भाजपा ने वहां रघुराज साक्य को चुनाव लड़ाया जो मुलायम के भाई शिवपाल यादव का करीबी था. शिवपाल यादव को भाजपा में इसी लिए शामिल नहीं किया गया क्योंकि इस से ओबीसी बिरादरी में अच्छा संदेश नहीं जाता.

ओबीसी पर निशाना

भाजपा ने अपने सिद्धांतों की बलि क्यों दी ? असल में भाजपा की पूरी राजनीति अब ओबीसी दक्षिणाबैंक पर टिकी है. देश में सब से बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग का है. यह करीब 60 फीसदी के आसपास है. पिछड़े वर्ग के जो भी नेता हैं वह अपनी जाति के 7-8 फीसदी वोट बैंक को ही जोड़ पाते हैं. ऐसे में भाजपा ने अपनी सवर्ण राजनीति ब्राहमण, बनिया और ठाकुर को दरकिनार कर ओबीसी और दलित को जोड़ने के लिए अपने सिद्धांतों को वाशिंग मशीन में डाल दिया. मुलायम सिंह यादव के विरोध को भूल गई. यह काम एक बार नहीं किया बारबार इस को कर रही है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में विष्णुदेव साय और मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया.

2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया ब्लौक ने जातीय गणना को मुद्दा बनाया. इस के मुकाबले के लिए भाजपा ने अपने सवर्णवादी सिद्धांत को पीछे ढकेलते हुए बिहार में पिछड़ों के मसीहा कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दे कर सम्मानित कर दिया. बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर सामाजिक बदलाव की राजनीति में एक बड़ा नाम है.

64 साल की उम्र में उन का निधन 1988 में हुआ था. उस के बाद बिहार में राजनीति समीकरण बदले. लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने. इस के बाद राबड़ी देवी और नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने. यह सभी पिछड़े वर्ग से आते थे पर कभी इन लोगों ने कर्पूरी ठाकुर के नाम को आगे नहीं बढ़ाया. कर्पूरी ठाकुर केवल भाषणों का हिस्सा बन कर रह गए थे.

नीतीश कुमार ने जातीय गणना का जो वार किया उस की ढाल के लिए भाजपा ने कर्पूरी ठाकुर को आगे कर दिया. अब यह सवाल बिहार के लोग भी पूछ रहे हैं कि यादव कुर्मी राजनीति में कर्पूरी ठाकुर को हाशिए पर क्यों ढकेला गया ?

कर्पूरी ठाकुर जंयती के पहले चला दांव

कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी समारोह के आयोजन के पहले भाजपा ने यह दांव चल दिया है. बिहार के भूतपूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर की जयंती इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 3 महीने बाद ही लोकसभा का चुनाव होना है. पिछड़े वोटरों पर पकड़ बनाने के लिए जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी के अलावा उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक जनता दल ने भी पूरी तैयारी की है. भाजपा ने जयंती समारोह की पूर्व संध्या पर ही मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है.

बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. वे दो बार बिहार के सीएम रहे. वर्ष 1952 से वे लगातार विधायक चुने जाते रहे. साल 1967 में वे बिहार के उप मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री भी रहे. पहली बार वे 1970 में मुख्यमंत्री बने, मगर उन की सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल पाई.

दूसरी बार उन्होंने 1977 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. उन का दूसरा कार्यकाल 1979 तक रहा. अपने राजनीतिक कैरियर में कर्पूरी ठाकुर सिर्फ एक बार चुनाव नहीं जीत पाए थे. वर्ष 1984 में वे लोकसभा चुनाव हार गए थे. इसलिए कि उसी साल इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. इस की वजह से कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर थी.

मुख्यमंत्री रहते कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया. उन की सादगी और ईमानदारी को आज भी लोग शिद्दत से याद करते हैं. जीवित रहते उन्होंने न कोई संपत्ति खड़ी की और परिवार के किसी व्यक्ति को राजनीति में कदम रखने दिया. उन के निधन के बाद ही परिवार का कोई सदस्य राजनीति में आ पाया. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने उन के बेटे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा भेजा. परिवारवादी राजनीति और भ्रष्टाचार के वे सख्त विरोधी थे.

सादगी की मिसाल थे कर्पूरी ठाकुर

कर्पूरी ठाकुर अपने राजनीतिक जीवन में विधायक से ले कर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, पर गांव के पैतृक मकान के अलावा उन के पास कोई दूसरा मकान नहीं था. गांव में भी उन का पुश्तैनी मकान भी कायदे का नहीं था.

बिहार में एक सीएम ऐसा भी रहा जिस ने अपने परिवार को इसलिए गांव में रखा कि उसे मिलने वाली तनख्वाह से यह संभव नहीं था. कर्पूरी ठाकुर अपने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद एक कार तक नहीं खरीद पाए. कर्पूरी ठाकुर सीएम बनने पर रिक्शे की सवारी करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करते थे.

एक दौर था विधानसभा में लालू यादव और कर्पूरी ठाकुर साथ बैठे थे. किसी काम से कर्पूरी ठाकुर को बाहर जाना था. उन के पास वाहन नहीं था इसलिए एक पर्ची लिख कर उन्होंने लालू की ओर बढ़ाई. जिस में उन की जीप मांगी थी. लालू ने पर्ची लिख कर वापस कर दी कि जीप में पेट्रोल नहीं है. आप खुद क्यों नहीं गाड़ी खरीद लेते हैं ?

पटना के कदमकुआं स्थित चरखा समिति भवन में जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन मनाया जा रहा था. वहां बड़े समाजवादी नेता शामिल होने के लिए आए थे. इन में भूतपूर्व पीएम चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख जैसे नेता वहां आए थे. कर्पूरी ठाकुर तब बिहार के मुख्यमंत्री थे. जब वे वहां पहुंचे तो उन के कुर्ते पर चंद्रशेखर की नजर पड़ी. कुर्ता फटा हुआ था. चप्पल भी टूटी हुई थी. अचानक चंद्रशेखर उठे और अपने कुर्ते को फैला कर सब से चंदा देने को कहा.

चंद्रशेखर ने कहा कि कर्पूरीजी के लिए कुर्ता फंड बनाना है. इस के बाद कुछ लोगों ने उन के कुर्ते में कुछ रुपए दिए. पैसा देते हुए चंद्रशेखर ने कहा ‘कर्पूरीजी, इन रुपयों से अपने लिए एक कायदे का कुर्ता-धोती खरीद लीजिए.’

कर्पूरी ठाकुर ने पैसा ले लिया और कहा कि इसे हम मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा देंगे. बिहार में ऐसा कोई नहीं होगा जो कर्पूरी ठाकुर का विरोधी हो. ऐसे में भाजपा ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दे कर विरोध कर राजनीति को क्लीन बोल्ड कर दिया है.

महापुरूष और मूर्तियों का सम्मान

भारत की राजनीति में महापुरूषों और मूर्तियों का अलग से स्थान रहा है. कांग्रेस ने गांधी की मूर्तियों को पूरे देश में लगवाया. मूर्तियों की विरोधी बहुजन समाज पार्टी ने दलित महापुरूषों की मूर्तियों के साथ ही साथ मायावती ने जिंदा रहते अपनी मूर्ति लगवाई.

समाजावादी नेताओं ने भी मूर्तियों और महापुरूषों के नाम पर सेमिनार और जन्म दिवस मनाए. इन सब की खास बात यह थी कि सब ने अपनी विचारधारा और पार्टी के नेताओं की मूर्तियां लगवाई. समाजवादी पार्टी ने डाक्टर राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण को तो याद रखा लेकिन कर्पूरी ठाकुर को कभी याद नहीं किया. बिहार में लालू और नीतीश ने कर्पूरी ठाकुर की याद में कोई बड़ा काम नहीं किया.

असल में कर्पूरी ठाकुर पिछड़ा वर्ग में अति पिछड़ी नाई बिरादरी से आते हैं. ऐसे में पिछड़ों में अगड़ी जातियां उन का उस तरह से सम्मान नहीं करती थी. भाजपा ने अपने सिद्धांतों को वाशिंग मशीन में डाल कर धुल दिया. सरदार पटेल की सब से बड़ी मूर्ति लगवाई. डाक्टर आंबेडकर के जन्म दिवस और परिनिर्वाण दिवस पर बड़ेबड़े आयोजन किए.

इस तरह से बसपा ने भी डाक्टर आंबेडकर को याद नहीं किया. महात्मा गांधी की दक्षिणापंथी का हमेशा विरोध करते थे. गांधी के हत्यारे गोडसे को सम्मान देते थे. अब भाजपा ने गांधी को भी अपना बना लिया है. बुद्ध और वाल्मीकी से भी कोई विरोध नहीं रह गया है.

देखा जाए तो भाजपा ने जिस तरह से अपने सिद्धांतों को वाशिंग मशीन में डाल कर धुला है उस से पार्टी दलबदल कानून के दायरे में आती है. इस के बाद भी वह खुले दिल से अपने दक्षिणाबैंक को भी साथ ले कर चल रही है. दक्षिणापंथी खामोशी से तेल और तेल की बदलती धार को देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं.

राजनीतिक दलों में ऐसे प्रयोग टीएमसी नेता ममता बनर्जी ही कर पा रही है. कांग्रेस की विरोधी पार्टी होने के साथ भी इंडिया ब्लौक का हिस्सा है. कभी वह भाजपा के एनडीए में भी रही है. पश्चिम बंगाल में सीपीएम के विरोध पर भी डटी है. इंडिया ब्लौक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के नाम को आगे कर के दलित राजनीति का पाला खीचने का काम ममता ने ही किया. राजनीति में हमेशा कुछ न कुछ करते रहना होता है. मुलायम सिंह यादव कहते थे कि ‘अगर नेता बनना है तो रोज 200 नए लोगों से मिलना चाहिए.’

Weight Loss Tips : कम करना चाहते हैं वजन, तो खाएं ये 4 तरह के आटे से बनी रोटियां

Flour for Reducing Weight : आज के समय में ज्यादातर लोग वजन बढ़ने की समस्या से परेशान है. तमाम उपाय अपनाने के बाद भी कुछ लोगों का वजन कम नहीं होता है. ऐसे में उन्हें सलाह दी जाती है कि वह अपनी डाइट को कम करें, जिसमें से सबसे पहले उनकी डाइट में से रोटी को कम करने को कहा जाता है. हालांकि, भातरीय खाना गरमागरम रोटी के बिना अधूरा माना जाता हैं, क्योंकि सब्जी और दाल के साथ जब तक रोटी न खाई जाए तो भोजन करने में स्वाद ही नहीं आता.

लेकिन क्या आपको ये बात पता है कि अलग-अलग आटे से बनी रोटियां खाने से वजन को भी कम किया जा सकता है. आइए जानते हैं आटे के उन हेल्दी ऑप्शन के बारे में, जिन्हें अपनी डाइट में शामिल करने से वजन घटाने (Weight Loss Tips) में काफी मदद मिल सकती है.

इन आटे से बनी रोटियों से कम करें वजन

बेसन का आटा

जिन लोगों को अपना वजन कम करना है, वो अपनी डाइट में बेसन के आटे (Weight Loss Tips) से बनी रोटियों को शामिल कर सकते हैं. दरअसल, बेसन में प्रोटीन और फाइबर का भंडार होता है. इसके अलावा इसमें फोलेट और आयरन का संतुलन होता है, जबकि कैलोरी बहुत कम मात्रा में होती है. ऐसे में वेट लॉस करने के लिए बेसन का आटा एक शानदार ऑप्शन है.

बाजरे का आटा

बाजरे के आटे में पौष्टिक गुणों की भरपूर मात्रा होती है. ऐसे में आप अपनी डाइट में बाजरे के आटे से बनी रोटियों को शामिल कर सकते हैं. इसमें जीआई की मात्रा कम होती है, जिससे वेट लॉस करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा इसके नियमित सेवन से पाचन भी स्वस्थ रहता है.

क्विनोआ का आटा

क्विनोआ के आटे से बनी रोटियों में आयरन, फोलेट, जिंक और मैग्नीशियम आदि की उच्च मात्रा होती है, जिससे लंबे समय तक पेट भरा-भरा रहता है. ऐसे में बार-बार भूख नहीं लगती है और वजन घटाने में मदद मिलती है.

ओट्स का आटा

ओट्स के आटे को सेहत के लिए खजाना माना जाता हैं. इसमें विटामिन, मिनरल, फाइबर आदि से लेकर सभी जरूरी पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती हैं. इसलिए वेट लॉस (Weight Loss Tips) करने में ओट्स के आटे से बनी रोटियां फायदेमंद होती हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

Green Coriander : स्वाद और सेहत का खजाना है हरा धनिया, सर्दियों में इसे खाने के हैं ढेरों फायदे

Green Coriander Benefits in Winter : सर्दियों के मौसम में ज्यादातर लोग अपने भोजन में हरे धनिये का इस्तेमाल करते हैं, जिससे खाने का स्वाद बढ़ता है. साथ ही शरीर की कई समस्याओं से छुटकारा मिलता है. अक्सर लोग हरे धनिया की चटनी खाना पसंद करते हैं, इसके अलावा इससे खाने की गार्निशिंग भी की जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं, हरा धनिया कई तरह की परेशानियों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है.

दरअसल, पौष्टिक तत्वों से भरपूर हरे धनिये को ठंड में खाने से शरीर स्वस्थ रहता है. इसमें विटामिन सी की भरपूर मात्रा होती है, जिससे सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहने आदि मौसमी बीमारियों से छुटकारा मिलता है. साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. आइए अब जानते हैं विंटर में अपनी डाइट में हरे धनिये (Green Coriander Benefits in Winter) को शामिल करने के अनगिनत फायदों के बारे में.

हरा धनिया खाने के फायदे

मौसमी बीमारियों से मिलेगा छुटकारा

आपको बता दें कि हरे धनिये (Green Coriander Benefits in Winter) में विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम आदि पौष्टिक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है. ऐसे में सर्दियों में इसके नियमित सेवन से सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहने जैसे मौसमी बीमारियों के होने का खतरा बहुत ज्यादा कम हो जाता है.

पाचन तंत्र होगा मजबूत

जिन लोगों को गैस, अपच, कब्ज और मतली आदि पाचन संबंधी समस्याएं रहती है, उनके लिए धनिया का सेवन करना फायदेमंद होता है. इसके नियमित सेवन से पाचन तंत्र सही रहता है.

आंखों की रोशनी बढ़ेगी

आंखों के लिए भी हरा धनिया फायदेमंद होता है. दरअसल, इसमें विटामिन ए की उच्च मात्रा होती है. ऐसे में इसे अपनी डाइट में शामिल करने से आंखों की रोशनी में इजाफा होता है. साथ ही आंखों में दर्द और पानी बहने की समस्या से भी छुटकारा मिल सकता है.

इम्युनिटी होगी बूस्ट

धनिये को अपनी डाइट में शामिल करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है, जिससे संक्रमण होने की संभावना बहुत कम हो जाती है.

स्किन रहेगी हेल्दी

सर्दियों के मौसम में बेजान और रूखी त्वचा से अधिकांश लोग परेशान रहते हैं. ऐसे में अपने खाने में हरे धनिये को शामिल करना लाभदायक होता है. इससे स्किन हेल्दी रहेगी. साथ ही त्वचा में नमी भी बनी रहेगी.

शुगर रहेगा कंट्रोल

सर्दियों में जिन लोगों की शुगर बढ़ जाती है, वो अपने खाने में हरे धनिये (Green Coriander Benefits in Winter) को शामिल कर सकते हैं. इससे उनकी डायबिटीज कंट्रोल में रहेगी.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डाक्टर से परामर्श लें.

होमियोपैथी दवाइयों को डाक्टर की सलाह के बिना ले सकते हैं ?

सवाल

होमियोपैथी दवाइयों का साइड इफैक्ट नहीं होता है, तो क्या डाक्टर की सलाह के बिना इनका सेवन कर लेना चाहिए ?

जवाब

किसी भी दवाई के बारे में एक बेसिक बात ध्यान रखिए. कोई भी दवाई आप की शारीरिक स्थिति, आप की बीमारी के लक्षणों और आप की उम्र आदि के हिसाब से डाक्टर द्वारा प्रिस्क्राइब की जाती है. एक डाक्टर को अपनी डिग्री पूरी करने के बाद प्रैक्टिस के साथ यह सीखने का मौका मिलता है कि कौन सी दवाई किस पेशेंट को कब दी जानी चाहिए. आप चाहे किसी भी पैथी से इलाज करवाएं. सही डाक्टर और सही दवाई का होना हमेशा जरूरी है.

पेट को न बनाएं बीमारियों का अड्डा

बदलती जीवनशैली और खानपान ने लगभग हर शख्स को किसी न किसी बीमारी से घेर रखा है. पेट भी शरीर का ऐसा ही भाग है जो लोगों के लिए बीमारियों का अड्डा बनता जा रहा है. अव्यवस्थित दिनचर्या, खानपान में लापरवाही, वसा का अधिक प्रयोग पेट की बीमारियों में इजाफा करता है. आइए जानते हैं कि पेट से जुड़ी और कौन सी बीमारियां हैं व उन के लक्षण और बचाव क्या हैं.

पेट के विभिन्न हिस्सों में दर्द

पेट में दर्द अलगअलग अंगों में अलग कारणों से होता है. कई बार कब्ज के कारण या अन्य किसी वजह से आंतों में विकार के कारण पेटदर्द होने लगता है. ऐसे में आप को कभी खुद से घरेलू उपचार नहीं करना चाहिए बल्कि तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए.

पेट में ऊपर की तरफ दर्द सामान्यतया गैस्ट्राइटिस, लिवर में खराबी, आमाशय में छेद होने के कारण होता है. पित्त की थैली में पथरी होने पर आमतौर पर पेट की दाईं तरफ दर्द होता है. पेट के बीचोंबीच दर्द का कारण अकसर पैंक्रियाज की खराबी होता है.

पेट के निचले भाग में दर्द यानी एपैंडिसाइटिस मूत्राशय में पथरी या संक्रमण के कारण होता है, लेकिन महिलाओं में पेट के निचले हिस्से में दर्द के कई कारक हो सकते हैं, जैसे गर्भाशय में किसी तरह की खराबी, फाइब्रायड, एंड्रियोमेट्रियोसिस, माहवारी या कोई अन्य बीमारी.

पेट के एक तरफ दर्द का कारण गुरदे में पथरी या गुरदे की अन्य कोई बीमारी हो सकती है. पेटदर्द के लिए अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी, एक्सरे, सीटी स्कैन और रक्त की जांच कराई जाती हैं जिस से कि सही समय पर सही इलाज किया जा सके.

कब्ज की शिकायत

कब्ज को हलके में लेना सही नहीं है. इसे कुछ लोग रोगों की जननी भी कहते हैं. जब भोजन आंतों में पहुंचता है तो आंतों में मरोड़ के साथ संकुचन पैदा होता है. इसे वैज्ञानिक लहजे में पेरिस्टाल्सिस कहते हैं. इस का मुख्य कार्य भोजन को आगे खिसकाने का होता है. इस तरह से जब मरोड़ के साथ शौच की इच्छा होती है तो कई बार हम किसी खास काम में बिजी होने के कारण शौच को टाल देते हैं. कुछ समय बाद फिर इसी तरह की मरोड़ उठती है. मगर अब इस की तीव्रता पिछली बार से अधिक होनी चाहिए वरना मल सख्त हो जाता है. इस तरह से हम कह सकते हैं कि कब्ज का प्रमुख कारण शौच की इच्छा को अधिक समय तक टालना है.

पेट का संक्रमण यानी फूड पौइजनिंग

फास्ट फूड से ले कर बाहर खाने की आदत पेट को संक्रमित कर देती है, जिस के कई नुकसान सामने आते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर 50 फीसदी पेट का संक्रमण खाद्य पदार्थों के माध्यम से होता है. पेट का संक्रमण बैक्टीरिया द्वारा तेजी से फैलता है, जो पेट की कई और बीमारियों को जन्म दे सकता है.

पेट के संक्रमण में कई बार जटिलताएं पैदा हो जाती हैं. किसी भी जटिलता की स्थिति में घबराएं नहीं बल्कि तुरंत डाक्टर से संपर्क करें. इस संक्रमण की वजह से कई बार गठिया, ब्लीडिंग की समस्या, किडनी में समस्या या सांस लेने संबंधी समस्या पैदा हो सकती है. खाना जरूरी है, लेकिन खाने में लापरवाही नुकसानदेह भी साबित होती है.

दस्त की समस्या

इस समस्या का सीधा संबंध आदमी के मानसिक तनाव से है. जब व्यक्ति तनावग्रस्त होता है तो शरीर की वेगस नाड़ी उत्तेजित हो कर आंतों के संकुचन और स्त्रावन को कई गुना बढ़ा देती है, जिस से व्यक्ति को बारबार शौचालय के लिए भागना पड़ता है और इस से पतले पानी जैसे दस्त होने लगते हैं. इस के अलावा संक्रमण से भी यह समस्या हो जाती है. किसी जीवाणु से जब आंतें संक्रमित होती हैं तो दस्त होने की संभावना बढ़ जाती है. संतुलित खानपान और संयमित जीवनशैली से पेट की बीमारियों पर काबू पाया जा सकता है.

पेट का कैंसर

पेट के कैंसर के कारणों को पूरी तरह से सम?ा नहीं जा सका है लेकिन कुछ उपाय संकेत देते हैं कि कुछ भोजन इस कैंसर की रोकथाम में मदद कर सकते हैं. ज्यादातर यह इस बात पर निर्भर करता है कि निदान के बाद यह कैंसर कितनी तेजी से विकसित होता है.

बचाव के लिए भोजन में ज्यादातर ताजे फलों और सब्जियों का सेवन करें. धूम्रपान न करें. शराब कम पिएं. धूम्रपान, मसालेदार भोजन, बेक किए हुए और नाइट्रेट्स द्वारा सुरक्षित किए गए खाद्य पदार्थों से बचें.

अल्सर (पेट में घाव)

अल्सर भी पेट की गंभीर समस्या है. यह पेट की दशा बुरी तरह से बिगाड़ देता है. जंकफूड सीधे तो अल्सर की वजह नहीं है लेकिन वह अल्सर से होने वाली कठिनाइयां बढ़ा जरूर देता है. इसलिए जंकफूड से बचना बेहद जरूरी है. अल्सर के अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं. यह असहनीय पेटदर्द की वजह तो बनता ही, साथ ही, इस से खून की उलटी एवं अल्सर के फटने जैसी जटिल परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं.

अल्सर से शुरू हुई ब्लीडिंग अगर नहीं रुकी तो वह जानलेवा भी हो सकती है. इसलिए डाक्टर के पास जाने में देरी कतई नहीं करनी चाहिए. समय से अगर अल्सर का पता चल जाए तो उस की जटिलताओं को हम बखूबी रोक सकते हैं. मरीज को इस बीमारी में पेनकिलर नहीं लेनी चाहिए. पेनकिलर के अलावा एच पायलोरी नामक कीटाणु बैक्टीरिया भी पेट में अल्सर का बड़ा कारक है. इसलिए इस के इलाज में कोताही कतई नहीं करनी चाहिए.

पेट में कीड़े

पेट में कीड़े होने पर जहां रोगी को अत्यधिक भूख लगती है वहीं स्वास्थ्य भी खराब होना शुरू हो जाता है. पेट के कीड़े अधिकतर बच्चों के अंदर पाए जाते हैं. पेट के कीड़े सामान्यतया कब्ज करने वाले भोजन, मांस और खट्टेमीठे पदार्थ अधिक खाने से पैदा होते हैं. बुखार, पेटदर्द, जी मिचलाना, चक्कर आना, दस्त लगना, गुदा में कांटे जैसा चुभना आदि इस के लक्षण होते हैं.

पेट के अंदर कीड़े होने पर कब्ज से बचना चाहिए. इस के लिए दोनों समय चावलदाल खाया जा सकता है. पुराने चावलों का भात, परवल, करेला, बकरी का दूध, नीबू का रस, साबूदाना आदि हलके पदार्थ खाने से पेट में कीड़े नहीं होते हैं. इस के अलावा चिकित्सकीय परामर्श भी जरूरी है.

(यह लेख मेडियोर अस्पताल, दिल्ली के गैस्ट्रोएंट्रोलौजिस्ट डा. एम पी शर्मा से बातचीत पर आधारित है.)

सिबलिंग एक बड़ी संपत्ति

आज भारत का फर्टिलिटी रेट 2.1 है जिस का मतलब औसत एक औरत 2.1 बच्चे पैदा कर रही है. दक्षिण कोरिया में यह 0.8 है जिस का अर्थ है कि औसतन एक औरत एक बच्चा भी पैदा नहीं कर रही. दुनिया के विकसित देशों में तेजी से जनसंख्या की वृद्धि रुक रही है और यह नई समस्याओं को जन्म दे रही है.

पियू रिसर्च के अनुसार, 1976 में केवल 1 बच्चे वाले सिर्फ 11 फीसदी परिवार थे और 2 बच्चे वाले 24 फीसदी, 3 बच्चे वाले 25 फीसदी व 4 या 4 से ज्यादा बच्चे वाले 40 फीसदी परिवार थे जबकि अब 2014 के (जो आंकड़े भी काफी पुराने हैं) 1 बच्चे वाले परिवार 22 फीसदी हो गए हैं, 2 बच्चे वाले 41 फीसदी, 3 बच्चे वाले 24 फीसदी और 4 बच्चों वाले 14 फीसदी परिवार हैं. इस का मतलब यह है कि आज भी जिन परिवारों में बच्चे हैं वहां 78 फीसदी के भाईबहन हैं.

जहां शादीशुदा मगर बिना बच्चे वाले या अकेले रहने वालों को छोड़ दें तो भी यह पक्का है कि जनसंख्या के साथ भाई या बहन वाले परिवारों की संख्या उतनी तेजी से घट नहीं रही है. इस का दूसरा मतलब यह है कि चाहे उन परिवारों की गिनती बढ़ रही हो जो बच्चे नहीं कर रहे लेकिन इकलौते बच्चों वाले परिवारों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही. जब एक बच्चा हो जाता है तो दूसरे की तैयारी करने का मन आसानी से बन जाता है.

दिक्कत यह है कि दुनिया के मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, नीतिनिर्धारक, कहानी लेखक, फिल्म निर्माता, भाईभाई, भाईबहन या बहनबहन रिश्तों पर कम ही विचार करते हैं जबकि औसतन भाईबहन शायद मांबाप से ज्यादा समय तक साथ रहते हैं.

यूरोपीय देशों में जहां तलाक आम है, जैसे पुर्तगाल में 94 फीसदी, रूस में 73 फीसदी, चीन में 44 फीसदी और टर्की में 25 फीसदी. वहां भी भाईबहन अगर हैं तो सभी ज्यादा साल एक छत के नीचे गुजारते हैं. हर देश में तलाक के बाद चाहे संपत्ति का बंटवारा हो जाए, बच्चों का बंटवारा शायद ही कहीं कोई समाज, सरकार या अदालत करने देती हो.

भारत में तो तलाक की दर ही कम है, इसलिए मांबाप के साथ ही भाईबहन रहते हैं पर उन के विवादों और उन के प्यार के शेयर पर कम ही लिखा या सोचा जाता है.

सिग्मंड फ्रायड दुनियाभर में काफी मशहूर मनोवैज्ञानिक हैं. अपनी 2 दर्जन पुस्तकों में उन्होंने केवल 5 बार भाईबहन रिश्तों पर कुछ लिखा है. अब जब बिछुड़ते दोस्तों और पड़ोसियों का जमाना बढ़ने लगा हैं, छुटपन से ले कर वयस्क होने तक लोग अपने भाई या बहन के साथ ज्यादा समय बिताते हैं बजाय दोस्तों, पड़ोसियों और यहां तक कि मातापिता के साथ.

आम घरों में जहां मां और बाप दोनों काम कर रहे होते हैं, वहां खाने की मेज पर या ट्रैवल टूर पर जाने पर ही ऐसा अवसर मिलता है जब बच्चे साथ होते हैं. घरों में खाना खाते ही बच्चे अपने कमरे या कमरों में बंद हो जाते हैं और उन का मांबाप से विचारों का आदानप्रदान कम ही होता है.

भाई या बहन जीवनभर एक अमिट छाप लोगों पर छोड़ जाते हैं. ये यादें आमतौर पर मीठी होती हैं पर जहां नाराजगी भी हो, तो भी लोग भूल नहीं पाते कि उन का कोई भाई या बहन कहीं है. जिस से मिलने की इच्छा न हो उस से भी मिला जाता है. जिस से संपत्ति या किसी और कारण से विवाद हो उस को भी कभीकभार मानमनौवल कर के बुलाया जाता है. आपत्ति पड़ने पर जो सब से आगे रहता है वह भाई या बहन होता है. जब दुर्घटनाएं या आस्कमिक मौत होती है तो पुलिस मांबाप, बच्चों के बाद भाई या बहन को ही खोजती है.

हारवर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक रौबर्ट वाल्डिंगर ने अपनी नई किताब ‘द गुड लाइफ’ में सिबलिंग : भाईबहन- के रिश्तों की अतिआवश्यकता की बात की है. 1938 के बाद यूनिवर्सिटी में रखे गए पुरुषों के मनोवैज्ञानिक मामलों के अध्ययन के बाद उन का निष्कर्ष है कि सिबलिंग रिलेशनशिप ही ज्यादा खुशी, स्वस्थ और लंबा जीने का रहस्य है.

जिन के अपने भाईबहन से संबंध ठीक नहीं होते वे डिप्रैशन, ड्रग्स, डाइवोर्स, डैजर्स के आदी हो जाते हैं. उन के खुशी के दिन कम होते हैं और 50 साल के होने तक वे बीमारियों से घिर जाते हैं, चाहे वे मानसिक हों या शारीरिक.

भाईबहन का मजबूत रिश्ता कैरियर को भी सफल बनाता है क्योंकि अवचेतन मन में रिस्क लेने पर सुरक्षा मिलने की गारंटी रहती है. जैसे, बचपन में हर मुसीबत में भाई या बहन साथ खड़ा रहा था, अगर संबंध अच्छा रहे तो दूर होते हुए भी लगता है कि वह साथ ही होगा.

बचपन में गरीबी, बीमारी, मांबाप के तलाक या एक या दोनों को खोने के बाद अगर सिबलिंग होता है तो वयस्क होने के बाद उस में पर्याप्त विवेक व काम के प्रति उत्तरदायित्व अपनेआप पैदा हो जाता है. जहां बचपन में छोटा सिबलिंग अपने से बड़े के होने के कारण सदा सुरक्षित महसूस करता है वहीं बड़ा सिबलिंग एक जिम्मेदार व्यक्ति व पिता जैसा होता है क्योंकि उसे छोटे का खयाल रखना आता है. दोनों में अकेलेपन का भाव नहीं रहता.

अगर मांबाप ने 2 सिबलिंगों (अफसोस है कि हिंदी में सिबलिंग का पर्याय शब्द नहीं मिलता. सहोदर शब्द है पर इस का उपयोग न के बराबर होता है. उस पर चर्चा बाद में.) में यदि प्रतियोगिता या भेदभाव के अवगुण नहीं रोपे तो वे आपस में खुद ही एकदूसरे के पूरक बन जाते हैं. यह मांबाप पर निर्भर करता है कि वे अपने 2 या उन से अधिक बच्चों के साथ ऐसी बराबरी का व्यवहार करें कि कोई भी अपनी अवहेलना महसूस कर किसी से भी जलने न लगे.

एक के होशियार होने पर भी दूसरे को बराबर का सम्मान व स्थान देना मांबाप के लिए जरूरी है. पेरैंट्स के लिए जरूरी है कि वे एक सिबलिंग को दूसरे के आने से पहले तैयार करें और दूसरे के होने पर पहले को यह न लगे कि उस का प्यार बंट रहा है.

वाल्डिंगर का मानना है कि वयस्क होने पर यदि सिबलिंग स्क्रीन पर टाइम बिताने से ज्यादा आपस में वरीयता टाइम बिताएं तो वे सफल रहेंगे, खुश रहेंगे. लंबी बात, साथसाथ (बिना अपनी पत्नियों या बच्चों के) टूर करना, कुछ प्रोजैक्ट करना, समाजसेवा करना हमेशा लाभदायक रहता है.

हमारे यहां भाईबहन के लिए एक शब्द भी नहीं क्योंकि हमारी संस्कृति इतनी पितृसत्तात्मक रही है कि बहनों को कभी अपना माना ही नहीं गया. पैदा होते ही बेटियां पराया धन मान ली जाती हैं और भाई हों तो वे जानते हैं कि बहन का उन के जीवन में कोई रोल नहीं और बहन हो तो उसे मालूम होता है कि उसे अपनी बहन व भाई से अलग किसी और घर में जाना पड़ेगा.

महाभारत में भाइयों के प्रेम पर बहुतकुछ कहा गया है. हालांकि कौरव किसी भी तरह से पांडवों के सिबलिंग नहीं थे पर जो बातें अर्जुन ने युद्ध में पहले कही थीं और जिन के उत्तर में कृष्ण ने उस गीता का उपदेश दिया था जिसे बारबार हमें पढ़ना चाहिए, उन से, पौराणिक युग में सिबलिंगों के आपसी संबंध कैसे थे और क्या वे उचितअनुचित पुराण रचयिताओं के अनुसार थे, का पता चलता है.

कई बार वादविवाद, समझतों, मारने की कोशिशों, जुए, वनवास, दूतों की मध्यस्थता के बावजूद बचपन में एक छत के नीचे रहने वाले दुर्योधन के भाई और युधिष्ठिर के भाई अपनी जुटाई सेनाओं के सामने जब आरपार करने के लिए आमनेसामने खड़े हो गए तो अर्जुन खिन्न हो गए, उन्हें अपने पर क्षोभ होने लगा. अर्जुन ने कहा, ‘‘मैं अपने कुल को मार कर परमकल्याण नहीं देखता हूं.’’ उन का कहना था, ‘‘इस युद्ध में आचार्य, ताऊ, चाचा, पोते, साले समस्त संबंधी हैं. मैं इन सब को नहीं मारना चाहता.’’

यह उन का सिबलिंग प्रेम था जो बचपन में साथ रहने से विकसित हुआ पर वयस्क होतेहोते वे अलगअलग हो गए. समझदारी का काम होता अगर भाईभाई मारने को तैयार न होते. पर ऐसा नहीं हुआ. कृष्ण ने गीता में जो उपदेश दिया वह सिबलिंग प्रेम के विरुद्ध ही था पर आज भी वही उपदेश हमारे लिए आदर्श है. गीता में अर्जुन को कहा गया है कि कोई तेरा सगा नहीं, कोई बंधु नहीं, कोई पिता नहीं. तू अपना कर्म कर, अपना अधिकार जता, युद्ध कर.

यह भाव आज सदियों बाद भी हमारे यहां घरघर में मौजूद है. हमारे यहां आज भी संयुक्त परिवार में, संपत्ति कानून के अनुसार, एक भाई के पैदा होते ही पहले हुए भाई या भाइयों का हिस्सा घट जाता है. जैसे ही बच्चे समझदार होने लगते हैं और उन्हें पिता चाचा, ताऊ के विवादों के बारे में पता चलने लगता है वैसे ही उन्हें एहसास होने लगता है कि संपत्ति के बंटवारे में एक ही मां के पुत्र एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, उन में महाभारत जैसा युद्ध होगा. हालांकि महाभारत में युद्ध एक ही मां के बेटों के बीच नहीं था पर उस का नाकाम भाव यही है कि दूसरे का हक छीनो और अपने हक के लिए लड़ो. आज भारत में भाईभाई के अधिकांश विवाद संयुक्त परिवार की संपत्ति को ले कर ही हैं.

हमारे यहां बेटियों को कभी परिवार का हिस्सा नहीं माना गया. इसीलिए सहोदर शब्द का इस्तेमाल बहुत कम होता है. मातृप्रेम होता है, बहन की रक्षा करना होता है पर भाईबहन दोनों को एक ही मां से एक सैक्सक्रिया से पैदा होने के बावजूद बराबर नहीं समझ जाता. सहोदर शब्द को शब्दकोशों में ढूंढें़गे तो इस का मतलब पहले सगा भाई बताया जाएगा, फिर बहन भी उस में जोड़ी जाएगी. अमरकोश हिंदी शब्दकोश सहोदर की अपनी परिभाषा देते हुए कहता है, ‘जो एक ही माता के गर्भ से उत्पन्न हुए हों. उदाहरण, संपत्ति ऐसी चीज है जो सगे भाइयों में खटास पैदा कर देती है’, ‘सदोहर’ शब्द में, शब्दकोश के अनुसार, बहन को चलतेचलते सम्मिलित किया जाता है.

यही आज के सिबलिंगों के आपसी मतभेदों की जड़ है. भाईबहन का प्रेम भाई को बहन की रक्षा करना है मानो वह संपत्ति है. भाई की भाई की रक्षा करने की जिम्मेदारी की कोई बात नहीं होती. बहनें एकदूसरे की रक्षा करें, ऐसी कहानियां नहीं सुनाई जातीं.

आज आवश्यकता है भाईबहन के प्रेम की परिभाषाएं लिखने की. अमेरिका में भी, जहां गीता का उपदेश एक मां के बच्चे भाइयों के प्रति प्रेम के ऊपर भाग्य, कर्म, आत्मा का जाल नहीं बुनता, मनोवैज्ञानिकों की शिकायत है कि भाइयों और भाईबहनों पर कम रिसर्च होती है. एक संभावना यह है कि बाइबिल की पहली ही कथा में स्वयं गौड एक बेटे को दूसरे बेटे से ज्यादा प्यार करता है जिस कारण केन और एबल के विवाद में एक, दूसरे को मार बैठता है. पश्चिम के ईसाई धर्म प्रचारक इस कहानी को बड़े गर्व से सुनाते हैं पर वे अपरोक्ष रूप में भाईभाई के प्रति एक प्रतियोगिता का भाव पैदा कर देते हैं जबकि आज के मनोवैज्ञानिक व समाजशास्त्री कहते हैं कि भाई या बहन सब से निकट रहते हैं.

असल में जो रिश्ता सहोदर भाईभाई, भाईबहन या बहनबहन में होता है, वह अपनी संतानों के अलावा किन्हीं दूसरों में नहीं हो सकता. जब लोग वयस्क होते हैं, जिम्मदारियां सिर पर आती हैं तब न मातापिता कुछ करने लायक रहते हैं, न अपनी संतान. उस समय अगर कोई काम आ सकता है तो वह सहोदर है, सिबलिंग है, हालांकि समाज आज उसे वह स्थान नहीं देता जो दिया जाना चाहिए.

एक सिबलिंग सब से बड़ी ह्यूमन संपत्ति है. यह ऐसा फिक्स्ड डिपौजिट है जो हर आपत्ति में भुनाया जा सकता है. इस संबंध को उत्तरदायित्व और प्रतिद्वंद्वी न समझ जाए, यह बनाया नहीं जाता, बनाबनाया मिलता है. पति या पत्नी चुने जाते हैं, बच्चे हों या न, यह अपनी इच्छा पर निर्भर है पर जब जनसंख्या घट रही हो, घर छोटे हो रहे हों तब ये सिबलिंग ही हैं जो सदा पुरानी यादों के सहारे एक स्थायी स्तंभ होते हैं, एक ऐसा ठोस सहारा जिस पर निर्भर रहा जा सकता है.

शिक्षा के नाम पर धर्मप्रचार क्यों ?

हाल ही में हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में भाजपा की स्टूडैंट्स शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तरफ से 3 पदाधिकारी चुने गए. उन्होंने गणेश चतुर्थी को हवनपूजन किया. आधुनिक शिक्षा के इस तार्किक और वैज्ञानिक पाठयक्रमों वाले विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की इस पाखंडबाजी को देख कर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि अब तो यह परपंरा बन गई है कि साइंस अधिवेशन की शुरुआत भी पूजन या अग्नि से की जाती है और सारे वैज्ञानिक नतमस्तक हो कर किसी देवी या देवता का आशीर्वाद मांगते हैं.

कुछ वर्षों पहले भाजपा की केंद्र में सरकार बनने से पहले मेरठ विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा विभाग की तरफ से व्यास समारोह किया गया था. इस की शुरुआत में मंदिर से शोभायात्रा निकाली गई थी. मंत्रों के साथ व्यास बने भगवा वेशधारी का तिलक किया गया था.

बाद में सती विवाह, पार्वती के तप की परीक्षा आदि शिवपुराण की कथाएं बांची गईं. कोटद्वार के सिद्धबली मंदिर में जा कर पूर्जाअर्चना की गई. ओम नम: शिवाय और नवधा भक्ति आदि के बारे में प्रवचन हुए और इस तरह से यह आयोजन पूरी तरह से धार्मिक रंग में रंगा रहा. आयोजक खुश हो कर अपनी पीठ खूब थपथपाते रहे. इस तरह का जलसा हर साल किया जाता है.

यह घटना किसी मदरसे की नहीं,  नामी यूनिवर्सिटी की थी. यदि अनपढ़, गंवार लोग पिछड़ेपन की हिमायत करें तो कोई हैरत नहीं होती क्योंकि उन का जेहन, उन की अक्ल व सोच ही पीछे होती है. अफसोस तो तब होता है जब पढ़ेलिखे, तरक्कीयाफ्ता भी रूढि़यों के शिकार होते दिखाई देते हैं और अनापशनाप सलाहमशवरे देने लगते हैं.

मेरठ में जैविक खेती बढ़ाने पर एक जलसा हुआ था. उस में कृषि के कई बड़ेबड़े माहिर आए थे. हवा, पानी, मिट्टी को खराबी से बचाने पर चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर के एक प्रोफैसर ने वहां कहा था, ‘‘रोज सुबहशाम हवन करने से आसपास की 800 घनफुट की हवा साफ व शुद्ध होती है.’’

तार्किकता की कमी

क्या ऐसी बातों से कभी रूढि़यां मिटेंगी, लोगों की सोच सुल?ोगी, उन का नजरिया बेहतर हो सकेगा या धर्म का प्रचार होगा? पुरानी धार्मिक मान्यताओं की वजह से चेचक को आज भी हमारे देश में माता कहा जाता है. रोगी को दवा की जगह शीतला माता का प्रसाद खिलाया जाता है, टोनाटोटका किया जाता है. प्रधानमंत्री नए संसद भवन का उद्घाटन दलित आदिवासी राष्ट्रपति से न करा कर पंडेपुजारियों से कराते हैं और संविधान की धज्जियां खुलेआम उड़ाते हैं.

नईनई तकनीकों के कारण शहरों में हुई तरक्की साफ दिखाई देती है. फिर भी साइंस की बातें ज्यादातर लोगों के गले आसानी से नहीं उतरतीं. यह कमी तो हमारी शिक्षा में कमजोरी की वजह से है. अब धीरेधीरे अस्पतालों में भी पूजापाठ जोरशोर से होने लगा है. इस में सारे डाक्टर भी भाग लेते हैं.

मदरसों में तो दीनी तालीम ही दी जाती है. कुरआन पढ़ना सिखाया जाता है. इसलिए गैरमुसलिम बच्चे वहां दाखिला नहीं लेते. बाकी के आम हिंदूमुसलिम मिश्रित स्कूलों में भी तो पढ़ाई की शुरुआत ईश्वर की प्रार्थना से ही होती है. पाठ्य पुस्तकों में धर्म की किताबों के हिस्से शामिल हैं. नई एजुकेशन पौलिसी में संस्कृति का नाम बारबार लिया गया है.

स्कूलकालेजों में धार्मिक गतिविधियां भी होती रहती हैं. ऐसेऐसे आयोजन होते हैं जिन का शिक्षा से कोई लेनादेना नहीं है. बरेली और मेरठ के 2 प्राइवेट कालेज ऐसे हैं जिन में एमबीए और इंजीनियरिंग आदि के कोर्स पढ़ाए जाते हैं. इन दोनों में कई दिनों तक लगातार धार्मिक कथा और प्रवचन कराए गए थे व इस के लिए कई नामी स्वामी बुलाए गए थे.

शिक्षा और धर्मप्रचार

राजकाज में लगे हमारे नेताओं व अफसरों को अब यह देखने की फुरसत ही फुरसत है कि हमारी शिक्षा को कैसे 110वीं सदी का बनाया जाए. पाठ्यक्रम की विषयवस्तु और उसे पढ़ाने का तरीका धर्म की घुसपैठ से भरा जा रहा है.

शिक्षा के जरिए धर्मप्रचार की घटनाएं बहुत होने लगी हैं. लेकिन उस से होने वाला जहरीला असर बहुत ज्यादा होता है और यह बहुत बाद में पता चलता है. शासन, प्रशासन व संघ ऐसे मुद्दों से अपनी आंखें हर समय चौकन्नी रखते हैं कि कहीं लोगों की धार्मिक भावनाएं कम न हो जाएं, वे तार्किक शिक्षा न पाने लगें. यही वजह है कि हमारे देश में अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी व गंदगी जैसी समस्याएं दूर होने का नाम ही नहीं लेतीं. शिक्षा दे रहे विद्यालयों की जिम्मेदारी बढ़ गई है, वे साइंस भी पढ़ाते हैं और अंधविश्वास भी सिखाते हैं.

शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले हमारे स्कूलकालेज धर्मप्रचार करने के स्थल भी बन गए हैं. हमारी शिक्षा से जुड़ी हुई तमाम बातें बच्चों व उन के मांबापों के मन में धार्मिक भाव पैदा कर रही हैं. उन्हें बढ़ावा दे रही हैं. हमारे विद्यालयों में भूमिपूजन, हवन आदि आयोजन किए जाते हैं ताकि धर्म का प्रचार होता रहे. मजहबी बातों की घुट्टी जोर से पिलाई जा रही है, ऐसी घुट्टी कि जिस से अंधविश्वासों को बढ़ावा मिलता रहे.

धर्म के नाम पर धंधा

धर्म और संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपना धंधा चलाने वाले भले ही कुछ कहें, सरकारें चलाएं, चुनाव पर चुनाव जीतें लेकिन यदि देखा जाए तो धर्म ने इंसान को दिया क्या है? आपसी भेदभाव, भाग्यवाद, लड़ाईझगड़े, मारकाट, अलगाव, गंडेतावीज, पुराने रीतिरिवाज, दिखावा, तंत्रमंत्र, ढोंग, पाखंड, टोनेटोटके, अंधविश्वास और कट्टरता धर्म के साथ जुड़े हैं.

हर आर्किटैक्ट वास्तु की बात करता है. पंडितों से शुभ समय दिखवा कर रौकेट छोड़े जाते हैं. धर्म के ठेकेदार अपनेअपने धर्म को सब से अच्छा व ऊंचा बताते हैं और वे अब महलों में, एयरकंडीशंड कमरों में रहते हैं. वे लोगों को भड़काते हैं, आपस में लड़ाते हैं और तरहतरह से धर्मप्रचार करते हैं. भारत और कनाडा का मतभेद इसी का नतीजा है. पढ़ने वाले बच्चों की रगरग में धार्मिकता भर दी गई है जिसे राष्ट्रीय जीवन मूल्यों की सीख का नाम देते हैं. सेना तक में धर्मशिक्षकों के पदों पर बाकायदा भरती की जाती है. पंडित, ग्रंथी व पादरी को नौकरी दी जाती है जो धार्मिक अनुष्ठान व धर्मग्रंथों का पाठ करते हैं व उपदेश देते हैं.

समाज में सदियों से फैली रूढि़यों, जहालत व नासमझ को दूर करने के लिए आज धर्मप्रचार की नहीं, शिक्षा और विज्ञान के प्रसार की जरूरत है, सफाई व सेहत की जरूरत है, कमाई व मेहनत की जरूरत है.

निकम्मे, निठल्ले तकदीर का रोना रोते रहते हैं. वे भगवान की कृपा और चमत्कारों की उम्मीद करते हैं, क्योंकि धर्मप्रचार कर के लगातार लोगों को यही बताया व सिखाया जाता रहा है. धर्मप्रचारक समाज का नहीं, अपना फायदा व मतलब देखते हैं. वे अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते, इस के लिए वे मीडिया में भी बने रहते हैं और शिक्षण संस्थाओं के इंतजाम व संचालन में भी. आजकल तो सारे टीवी चैनल भी धर्मप्रचार में लगे हुए हैं.

सिर्फ प्राइवेट टीवी चैनल ही नहीं, सरकारी दूरदर्शन भी तो धार्मिक सीरियल दिखाने में कभी पीछे नहीं रहा. 30 वर्ष पहले जब दूरदर्शन शुरू हुआ था तो इस के 3 मकसदों में शिक्षा पहले नंबर पर और सूचना व मनोरंजन उस के बाद थे.

चंद अपवादों को छोड़ कर हमारे समाज में धर्म पूरी तरह से रचाबसा है. इसलिए शिक्षा व संचार के माध्यम दूरदर्शन ने भी बहती गंगा में अच्छी तरह से खूब हाथ धोए और रामायण व महाभारत के बाद कईर् धार्मिक सीरियल दिखाए. तब तो कांग्रेसी सरकारें थीं. उन्होंने जो बीज बोए, उन के फल अब भाजपाई खा रहे हैं.

विज्ञापनों से संचार माध्यमों ने तगड़ी कमाई की. चाहे धर्म हो या उस का प्रचार, ये कमाई का जरिया तो हैं ही. इस से नुकसान धर्मप्रेमी भक्तों व अंधविश्वासी श्रद्धालुओं का होता है क्योंकि वे इसे ही तरक्की का एकमात्र रास्ता मानते हैं.

नुकसान ही नुकसान

स्कूलकालेजों में पढ़ाने वाले ज्यादातर शिक्षक भी उन बातों की वकालत करते हैं जो साधुसंत बताते हैं या धर्म की किताबों में लिखी हैं. गुरु लोग तो खुद अंधविश्वासों को भुनाते रहे हैं. इसलिए आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी पुरानी जंजीरों में जकड़ा व उलझ हुआ है. रोशनी की मीनार कहे जाने वाले हमारे विद्यालयों में यदि धार्मिकता व धर्मग्रंथों के किस्से पढ़ाएसिखाए जाएंगे तो धर्मप्रचार तो होगा ही.

घरों में तो यह सब होता ही है. विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा में यह सब नहीं होना चाहिए क्योंकि इस से मन में अंधविश्वास की परतें मोटी होती हैं और फिर वे जल्दी से हट नहीं पाती हैं, क्योंकि जड़ें गहरी हो जाती हैं जो दिलदिमाग तक छा जाती हैं.

वैज्ञानिक माहौल तैयार करने की जरूरत

धर्मप्रचार में बढ़ोतरी इसलिए और भी ज्यादा गंभीर व खतरनाक है क्योंकि नई पीढ़ी का रुझन विज्ञान में घट रहा है. इस घटते झकाव से वैज्ञानिक संस्थानों में प्रतिभाओं की कमी रहती है. देश में आज भी विज्ञानी कैडर नहीं हैं. विज्ञानी संगठनों में बहुत अच्छे वेतनमान भी नहीं हैं. नतीजतन, विज्ञान में दिलचस्पी घट रही है. सो विज्ञान का माहौल तैयार करने की जरूरत है.

भौतिक रिसर्च लैब की 75वीं सालगिरह के मौके पर बोलते हुए 11 नवंबर, 2006 को तब के राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने अहमदाबाद में यह चिंता जाहिर की थी. हालांकि, वे खुद कम अंधविश्वासी नहीं थे और धर्मों की एक माला बनाने का सपना देख रहे थे, तभी भाजपा को प्रिय थे.

यदि चमकते शहरों सी दमकती तरक्की पिछड़े गांवों, कसबों तक पहुंचानी है तो धर्मप्रचार छोड़ कर शिक्षा और विज्ञान का उजाला फैलाना होगा. कथा,  सत्संगों,  तीर्थों,  मंदिरों में भोज व मौज करते मुफ्तखोरों से छुटकारा पाना होगा. सोच तभी सुधरेगी, तरक्की की राह के रोड़ेपत्थर हटेंगे व खाईगड्ढे भरेंगे भी. तब ही लोग दिमाग व मेहनत से काम करेंगे, खासा कमाएंगे व जिंदगी सुख से जिएंगे.

बेमतलब की बातों से सिर्फ मक्कारों, मतलबपरस्तों व मुफ्तखोरों का भला होता है. इसलिए धर्म की दुहाई दे कर बरसों राज करने का सपना देखने वालों की देश की जनता ने बुरी गत बना दी थी. बेहतरी के लिए धर्मप्रचार नहीं बल्कि शिक्षा, सूझबूझ, मेहनत व पैसा जरूरी है.

लेकिन फिलहाल लगता है कि प्रगति का मतलब मंदिर, मठ, घाट, गुरुद्वारे बनाना रह गया है. ईसाई और मुसलिम तो फिलहाल अपने पूजास्थलों को बस ठीकठाक कर पा रहे हैं जहां उन का राज है वहां का हाल ऐसा ही है. संघ जो यहां कर रहा है वही कैथोलिक देशों में किया जा रहा है और वही इसलामी मध्य एशिया में.

कानून बनाम कानून

इंग्लिश और हिंदी के नाम हटा व संस्कृत के नाम लगा कर भारतीय न्याय संहिता कानून, भारतीय सुरक्षा संहिता कानून और भारतीय साक्ष्य कानून को सरकार ने बिना बहस किए, बिना वकीलों और जजों की राय जाने और संसद में विपक्ष की गैरमौजूदगी में इंडियन पीनल कोड 1860, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड 1882 व इंडियन एविडैंस एक्ट 1872 की जगह बना कर ब्रिटिश राज की देन को समाप्त करने का वादा कर डाला है.

ये नए कानून कुछ महीनों बाद नोटीफाई होंगे जब इन के नियम भी बन जाएंगे. अगर नियम बनने में देर लगी तो कानूनों को लागू करने में महीनों की जगह वर्षों लग सकते हैं.

भाजपा सरकार द्वारा संसद में चाहे कुछ भी दावा किया गया हो, ये कानून किसी भी तरह ब्रिटिश राज में बने कानूनों से अलग नहीं हैं. छोटेमोटे बदलाव तो पहले भी होते रहे हैं पर अब नाम बदल कर भगवा सरकार ने साबित यह करना चाहा है कि नया युग आ गया है क्योंकि इन कानूनों के संस्कृतनिष्ठ भाषा में नाम ही अब इंग्लिश में भी इस्तेमाल किए जाएंगे.

इन कानून से क्रिमिनल न्याय में कोई खास बदलाव नहीं आएगा. अपराध भी उसी तरह होंगे, सजाएं भी उसी तरह से मिलेंगी. जजों के कुछ पद बदले गए हैं पर 90-95 फीसदी ये कानून पिछले कानूनों की तरह के हैं.

पिछले कानूनों की आलोचना करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि पिछले कानूनों, खासतौर पर क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में एक क्रांति लाई गई थी. तब ब्रिटिश सरकार ने अपने ही हाथ काट कर गोरे पुलिस अफसरों के हाथ काट दिए थे और उन कानूनों में पुलिस पर सैकड़ों पाबंदियां लगाई थीं. इंडियन पीनल कोड ने सजा को अपराध से जोड़ दिया था और कोतवाल, जिलाधीश, गवर्नर या गवर्नर जनरल की मनमानी पर रोक लगा दी थी.

अंगरेजों के कानूनों के पहले हमारे देश में अपराधों पर सजा देने का मनमाना हक इलाके के छोटे से राजा से ले कर सम्राट तक का होता था. उन के पास कोई किताब नहीं थी, कोई विधिवत अदालत नहीं थी जो राजा या ठाकुर की मनमरजी के खिलाफ जनता को न्याय दे सके.

एक तरह से पहले की अराजकता को अंगरेजों ने खुद ही अपने कानूनों से समाप्त कर अपराधों पर सजा देने का काम सुबूतों, गवाही और गवाहों के अनुसार करना शुरू कर दिया था. उन्होंने भीड़ का कानून या पंचायत का कानून या राजा का कानून नहीं, लिखित कानून लागू किया था. हमारे पौराणिक कानून में तो श्रवण कुमार की हत्या करने पर दशरथ को सजा नहीं मिली पर दुर्वासा को नाराज करने पर लक्ष्मण को सब से कठोर सजा मिली थी. पौराणिक कहानियों के हवाले से गांवगांव में वही कानून चलते थे.

जुर्म करने वालों को खौलते तेल में हाथ डालने या आग में गुजरने वाली अंतिम परीक्षा जैसे कानून गांवों के अनपढ़ चौधरी ही नहीं लागू करते थे, राजा भी ऐसा करते थे.

नए कानूनों में मूलभूत बदलाव नहीं लाया गया है क्योंकि वह बदलाव ही अच्छा होता जो पुलिस के अधिकार कम करता और जनता के, चाहे वह अपराधी क्यों न हो, अधिकार बढ़ाता. नाम बदलने, पुतले बैठाने की संस्कृति से ढोल पीटे जा सकते हैं पर जनता को सुखी नहीं किया जा सकता.

26 January Special : नागरिकता बिल- देश में क्यों हो रहा था विरोध ?

देश के कुछ हिस्सों में इस बिल का पुरजोर विरोध हुआ था और कुछ हिस्सों में जम कर स्वागत भी हो रहा था.

मीडिया वाले लगातार इस अहम खबर पर नजरें गड़ाए हुए थे और पिछले कई दिनों से वे इसी खबर को प्रमुखता से दिखा रहे थे.

रजिया बैठी हुई टैलीविजन पर यह सब देख रही थी. उस की आंखों में आंसू तैर गए. खबरिया चैनल का एंकर बता रहा था कि जो मुसलिम शरणार्थी भारत में रह रहे हैं, उन को यहां की नागरिकता नहीं मिल सकती है.

‘क्यों? हमारा क्या कुसूर है इस में… हम ने तो इस देश को अपना सम झ कर ही शरण ली है… इस देश में सांस ली है, यहां का नमक खाया है और आज राजनीति के चलते यहां के नेता हमें नागरिक मानने से ही इनकार कर रहे हैं. हमें कब तक इन नेताओं के हाथ की कठपुतली बन कर रहना पड़ेगा,’ रजिया बुदबुदा उठी.

रजिया सोफे से उठी और रसोईघर की खिड़की से बाहर  झांकने लगी. उस की आंखों में बीती जिंदगी की किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे.

तब रजिया तकरीबन 20 साल की एक खूबसूरत लड़की थी. उस की मां बचपन में ही मर गई थी. बड़ी हुई तो बाप बीमारी से मर गया. उस के देश में अकाल पड़ा, तो खाने की तलाश में भटकते हुए वह भारत की सरहद में आ गई और शरणार्थियों के कैंप में शामिल हो गई थी. भारत सरकार ने शरणार्थियों के लिए जो कैंप लगाया था, रजिया उसी में रहने लगी थी.

पहलेपहल कुछ गैरसरकारी संस्थाएं इन कैंपों में भोजन वगैरह बंटवाती थीं, पर वह सब सिर्फ सोशल मीडिया पर प्रचार पाने के लिए था, इसलिए कुछ समय तक ही ऐसा चला. कुछ नेता भी इन राहत कैंपों में आए, पर वे भी अपनी राजनीति चमकाने के फेर में ही थे. सो, वह सब भी चंद दिनों तक ही टिक पाया.

शरणार्थियों को आभास हो चुका था कि उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा. जिन के पास कुछ पैसा था, वे रेहड़ीखोमचा लगाने लगे, तो कुछ रैड सिगनलों पर भीख मांगने लगे. कुछ तो घरों में नौकर बन कर अपना गुजारा करने लगे.

एक दिन शरणार्थी शिविर में एक नेताजी अपना जन्मदिन मनाने पहुंचे. उन के हाथों से लड्डू बांटे जाने थे. लड्डू बांटते समय उन की नजर सिकुड़ीसिमटी और सकुचाई रजिया पर पड़ी, जो उस लड्डू को लगातार घूरे जा रही थी.

नेताजी ने रजिया को अपने पास बुलाया और पूछा, ‘लड्डू खाओगी?’

रजिया ने हां में सिर हिलाया.

‘मेरे घर पर काम करोगी?’

रजिया कुछ न बोल सकी. उस ने फिर हां में सिर हिलाया.

‘विनय, इस लड़की को कल मेरा बंगला दिखा देना और इसे कल से काम पर रख लो. सबकुछ अच्छे से सम झा भी देना,’ नेताजी ने रोबीली आवाज में अपने सचिव विनय से कहा.

‘आखिरकार जनता का ध्यान हम नेताओं को ही तो रखना है,’ कहते हुए नेताजी ने एक आंख विनय की तरफ दबा दी.

विनय को नेताजी की बात माननी ही थी, सो वह अगले दिन रजिया को उन के बंगले पर ले आया और उसे साफसफाई का सारा काम सम झा दिया.

रजिया इतने बड़े घर में पहली बार आई थी. चारों तरफ चमक ही चमक थी. वह खुद भी आज नहाधो कर आई थी. कल तक जहां उस के चेहरे पर मैल की पपड़ी जमी रहती थी, वहां आज गोरी चमड़ी दिख रही थी. विनय को भी यह बदलाव दिखाई दिया था.

विनय ने रजिया को खाना खिलाया. पहले तो संकोच के मारे रजिया धीरेधीरे खाती रही, पर उस की दुविधा सम झ कर जैसे ही विनय वहां से हटा, रजिया दोनों हाथों से खाने पर जुट गई और उस ने अपना मुंह तब ऊपर किया, जब उस के पेट में बिलकुल जगह न रह गई. उस का चेहरा भी अब उस के पेट के भरे होने की गवाही दे रहा था.

अब रजिया नेताजी के बंगले पर दिनभर काम करती और शाम ढले कैंप में वापस चली जाती.

यों ही दिन बीतने लगे. रजिया का काम अच्छा था. धीरेधीरे उस ने शाम को शरणार्थी कैंप में जाना भी छोड़ दिया. वह शाम को नेताजी के बंगले में ही कहीं जमीन पर सो जाती थी.

आज नेताजी के घर में जश्न का माहौल था, क्योंकि चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की थी. नीचे हाल में चारों तरफ सिगरेट के धुएं की गंध थी. शराब के दौर चल रहे थे. जश्न देर रात तक चलना था, इसलिए विनय ने रजिया से खाना खा कर सो जाने के लिए कहा और खुद नेताजी के आगेपीछे डोल कर अपने नमक का हक अदा करने लग गया.

नेताजी के कई दोस्त उन से शराब के साथ शबाब की मांग कर रहे थे. जब इस मांग ने जोर पकड़ लिया, तो नेताजी ने धीरे से रजिया के कमरे की तरफ इशारा कर दिया.

ऊपर कमरे में रजिया सो रही थी. देर रात कोई उस के कमरे में गया, जिस ने उस का मुंह दबाया और अपने शरीर को उस के शरीर में गड़ा दिया.

बेचारी रजिया चीख भी नहीं पा रही थी. एक हटा तो दूसरा आया. न जाने कितने लोग थे, रजिया को पता ही न चला. वह बेहोश हो गई और शायद मर ही जाती, अगर विनय सही समय पर न पहुंच गया होता.

विनय ने रजिया को अस्पताल में दाखिल कराया. वह गुस्से से आगबबूला हो रहा था, पर क्या करता, नेताजी के अहसान के बो झ तले दबा जो हुआ था.

‘इन के पति का नाम बताइए?’ नर्स ने पूछा.

‘जी, विनय रंजन,’ विनय ने अपना नाम बताया.

नाम बताने के बाद एक पल को विनय ठिठक गया था.

‘मैं ने यह क्यों किया? पर क्यों न किया जाए?’ उस ने सोचा. आखिर उस की शरण में भी पहली बार कोई लड़की आई थी.

विनय उस समय छोटा सा था, जब उस के मम्मीपापा एक हादसे में मारे गए थे. तब इसी नेता ने उसे अनाथालय में रखा था और उस की पढ़ाई का खर्चा भी दिया था.

नेताजी के विनय के ऊपर और बहुत से अहसान थे, पर उन अहसानों की कीमत वह इस तरह चुका तो नहीं सकता.

रजिया की हालत में सुधार आ रहा था. वह कुछ बताती, विनय को इस की परवाह ही नहीं थी, उस ने तो मन ही मन एक फैसला ले लिया था.

अपने साथ कुछ जरूरी सामान और रजिया को ले विनय ने शहर छोड़ दिया.

बस में सफर शुरू किया तो कितनी दूर चले गए, उन्हें कुछ पता नहीं था. वे तो दूर चले जाना चाहते थे, बहुत दूर, जहां शरणार्थी कैंप और उस नेता की गंध भी न आ सके.

और यही हुआ भी. वे दोनों भारत के दक्षिणी इलाके में आ गए थे और अब उन को अपना पेट भरने के लिए एक अदद नौकरी की जरूरत थी.

विनय पढ़ालिखा तो था ही, इसलिए उसे नौकरी ढूंढ़ने में समय न लगा. नौकरी मिली तो एक घर भी किराए पर ले लिया.

रजिया भी सदमे से उबर चुकी थी, पर विनय उस से कभी भी उस घटना का जिक्र न करता और न ही उस को याद करने देता.

रजिया का हाथ शिल्प वगैरह में बहुत अच्छा था. एक दिन उस ने एक छोटा सा कालीन बना कर विनय को दिखाया.

वह कालीन विनय को बहुत अच्छा लगा और उस ने वह कालीन अपने बौस को गिफ्ट कर दिया.

‘अरे… वाह विनय, इस कालीन को रजिया ने बनाया है. बहुत अच्छा… घर में आसानी से मिलने वाली चीजों से बना कालीन…

‘क्यों न तुम ऐसे कालीनों का एक कारोबार शुरू कर दो. भारत में बहुत मांग है,’ बौस ने कहा.

‘अरे… सर… पर, उस के लिए तो पैसों की जरूरत होगी,’ विनय ने शंका जाहिर की.

‘अरे, जितना पैसा चाहिए, मैं दूंगा और जब कारोबार चल जाएगा, तब मु झे लौटा देना,’ बौस जोश में था.

विनय ने नानुकर की, पर उस का बौस एक कला प्रेमी था. उस ने खास लोगों से बात कर विनय का एक छोटा सा कारखाना खुलवा दिया.

फिर क्या था, रजिया कालीन का मुख्य डिजाइन बनाती और कारीगर उस को बुनते. कुछ ही दिनों में विनय का कारोबार अच्छा चल गया था और जिंदगी में खुशियां आने लगीं.

डोरबेल की तेज आवाज ने रजिया का ध्यान भंग किया. दरवाजा खोला तो सामने विनय खड़ा था. उसे देखते ही रजिया उस के सीने से लिपट गई.

‘‘अरे बाबा, क्या हुआ?’’ विनय ने चौंक कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं विनय. मैं इस देश में शरणार्थी की तरह आई थी, उस नेता ने मु झे सहारा दिया. वहां भी तुम ने साए की तरह मेरा ध्यान रखा, पर उस जश्न वाली रात को नेता के साथियों ने मेरे साथ बलात्कार किया. न जाने कितने लोगों ने मु झें रौंदा, मु झे तो पता भी नहीं, फिर भी तुम ने इस जूठन को अपनाया. तुम महान हो विनय. मु झ से वादा करो कि तुम मु झे कभी नहीं छोड़ोगे.’’

‘‘पर, आज अचानक से यह सब क्यों पगली. मेरा भी तो इस दुनिया में तुम्हारे सिवा कोई नहीं है. उस नेता के कई अहसान थे मुझ पर, सो मैं सामने से उस से लड़ न सका, पर तुम को उन भेडि़यों से बचाने के लिए मैं ने नेता को भी छोड़ दिया, लेकिन आज अचानक बीती बातें क्यों पूछ रही हो रजिया?’’ विनय ने रिमोट से टैलीविजन चालू करते हुए पूछा.

‘‘वह… दरअसल, नागरिकता वाले कानून के तहत भारत में सिर्फ हिंदू शरणार्थियों को ही नागरिकता मिल सकती है और मैं तो हिंदू नहीं विनय. आज यह कानून आया है, अगर कल को यह कानून आ गया कि जो शरणार्थी जहां के हैं, उसी देश वापस चले जाएं तब तो मु झे तुम को छोड़ कर जाना होगा. इस मुई राजनीति का कुछ भरोसा नहीं,’’ कहते हुए रजिया रो पड़ी.

‘‘अरे पगली, तुम इतना दिमाग मत लगाओ. अब तुम्हें मेरी जिंदगी ने नागरिकता दे दी है, तब किसी देश के कागजी दस्तावेज की जरूरत नहीं है तुम्हें. जोकुछ होगा, देखा जाएगा और फिर जब हम दोनों शादी कर लेंगे, तो भला तुम को यहां का नागरिक कौन नहीं मानेगा,’’ कहते हुए विनय ने रजिया की पेशानी चूमते हुए कहा.

उस समय रजिया और विनय की आंखों में आंसू थे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें