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Tere Ishq Mein Movie Review : “मसाले के साथ-साथ इमोशंस और ड्रामा भरपूर”

Tere Ishq Mein Movie Review : इश्क पर बौलीवुड में सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं. इश्क का जनून सभी फिल्मों में दिखाया गया है. कभी इश्क आंखों में छिपा दर्द बन कर दिखा तो कभी इश्क में प्यार और गुस्सा देखने को मिला. कभी इश्क में प्रेमीप्रेमिका दीवानों की तरह पागल हो जाते हैं तो कभी इश्क में वे मरनेमारने पर उतर आते हैं. उर्दू शायरी में ‘इश्क’ के महत्त्व को दर्शाया गया है. दो दिलों के धड़कने का नाम है इश्क, जज्बातों की आंधी है इश्क, एकदूसरे की चाहत में कुछ कर गुजरने का जज्बा है इश्क. बौलीवुड में इश्क पर बनी फिल्में बरसों तक याद रह जाती हैं.

अब तक इश्क पर आई सैकड़ों फिल्मों में एक और फिल्म जुड़ गई है ‘तेरे इश्क में’. यह हिंदी में बनी म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा फिल्म है. इस का निर्देशन आनंद एल रौय ने किया है. आनंद एल रौय रोमांटिक फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्हें 2011 में बनी रोमांटिक कौमेडी ड्रामा ‘तनु वेड्स मनु’ और इस के सीक्वल तथा 2013 में बनी ‘रांझणा’ के निर्देशन के लिए जाना जाता है. इस के अलावा कई पारिवारिक कौमेडी ड्रामा फिल्मों का भी उन्होंने निर्देशन किया है.

‘तेरे इश्क में’ एक लव स्टोरी है, जो जनूनी आशिकी और मरमिटने वाली मोहब्बत की दास्तान सुनाती है. इश्क की इसी तरह की दास्तान वे ऐक्टर धनुष के साथ फिल्म ‘रांझणा’ में दिखा चुके हैं. इस फिल्म के ‘मैं प्यार में पड़ गया तो दिल्ली फूंक दूंगा’ जैसे संवाद अग्रिम पंक्ति के दर्शकों को बहुत पसंद आ रहे हैं.

कहानी दिल्ली विश्वविद्यालय की है. विश्वविद्यालय के छात्रसंघ का अध्यक्ष शंकर (धनुष) अपने गुस्सैल और दबंगई के कारण कालेज में कोई न कोई कांड करता रहता है. उसी कालेज में पढऩे वाली मुक्ति देनी वाली एक रिसर्च स्कौलर है. समझदार मुक्ति अपनी रिसर्च द्वारा यह साबित करना चाहती है कि हिंसक इंसान के स्वभाव को भी बदला जा सकता है.

वह शंकर से दोस्ती बढ़ाती है. शंकर को उस से प्यार हो जाता है. अब शंकर का गुस्सा कम होने लगता है. मुक्ति का प्यार पाने के लिए वह खुद में बदलाव लाता है. मगर जब उसे पता चलता है कि मुक्ति उस से प्यार नहीं करती तो वह दुनिया को जला देने का आतुर हो जाता है. 7 साल बाद मुक्ति और शंकर जब मिलते हैं तब मुक्ति भी शंकर के इश्क में पूरी तरह डूब चुकी थी. उसे शंकर से इश्क हो गया था.

फिल्म की यह कहानी काफी दिलचस्प है. कहानी में मसाले के साथसाथ इमोशंस और ड्रामा भरपूर हैं. धनुष के जनून और कृति सेनन के प्यार ने ‘रांझणा’ वाले इश्क को दोहराया है. धनुष और कृति सेनन की कैमिस्ट्री ताजीताजी मोहब्बत जैसी लगती है. फिल्म के कई सीन पावरफुल हैं, जो दर्शकों को कुरसी से बांधे रखते हैं.

जैसेजैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्रेम कहानी में जनून की आग दिखने लगती है. मध्यांतर से पहले 2 विपरीत पृष्ठभूमि से आए नायकनायिका के बीच का टकराव, प्यार का पागलपन, दिल टूटना, मोहब्बत की हदें पार करना दिखाया गया है जबकि मध्यांतर के बाद कहानी बिखरने लगती है.

फिल्म थोड़ी और छोटी होती तो ठीक था. तकनीकी दृष्टि से फिल्म अच्छी है. कैमरावर्क बढ़िया है. ए आर रहमान से उम्मीदें ज्यादा थीं मगर ‘तेरे इश्क में…’ और ‘जिगर ठंडा…’ जैसे गाने ही याद रह पाते हैं.

धनुष और कृति सेनन दोनों ने बढिय़ा अभिनय किया है. मोहम्मद जीशान अय्यूब ने दिल जीत लिया है. प्रकाशराज और पैन्यूली ने भी अपनेअपने किरदार बढ़िया ढंग से निभाए हैं. Tere Ishq Mein Movie Review :

Dhurandhar Movie Review : “हिंसा, राष्ट्रवाद और गाली-गलौज से भरी”

Dhurandhar Movie Review : ‘धुरंधर’ भारतीय सेना के दिवंगत मेजर मोहित शर्मा पर आधारित समझी जा रही है. वे 1978 से 2009 तक भारतीय सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें मरणोपरांत भारत के सैन्य सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया था. 21 मार्च, 2009 को जम्मूकश्मीर के कुपवाड़ा सैक्टर के हकरुदा जंगल में हुई मुठभेड़ में उन्होंने 4 आतंकवादियों को मार गिराया था.

2019 में दिल्ली मैट्रो रेल कौर्पोरेशन ने गाजियाबाद में राजेंद्र नगर स्टेशन का नाम बदल कर मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर मैट्रो स्टेशन कर दिया. इस फिल्म को आदित्य धर ने निर्देशित किया है. जिस ने फिल्म ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ फिल्म के निर्देशन के साथसाथ कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी है. वह अभिनेत्री यामी गौतम का पति है.

यह एक ऐक्शन थ्रिलर फिल्म है. यह फिल्म भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रा) के कराची, पाकिस्तान के ल्यारी इलाके में स्थानीय गिरोहों और अपराध सिंडिकेट के साथ गुप्त अभियानों से प्रेरित है. फिल्म को 2 भागों में बनाया गया है. दूसरा भाग 2026 में रिलीज किया जाएगा. पहला भाग लगभग 3 घंटे 34 मिनट का है. इसे देखने के लिए काफी धैर्य की जरूरत है. यह अब तक की सब से लंबी भारतीय फिल्मों में से एक है.

इस फिल्म में काफी अरसे बाद रणवीर सिंह परदे पर गरम तेवरों में नजर आया है. हमजा के रूप में उस का किरदार काफी एनर्जेटिक, जोश और भावनाओं से भरा है. उस ने दर्शकों को चौंकाया है. निर्देशक ने फिल्म इतनी लंबी बनाई है कि बीच में खिंचीखिंची लगती है.

‘यह नया हिंदुस्तान है, घर में घुसेगा भी, मारेगा भी’ इसी कहानी को सिलसिलेवार दिखाया गया है. इस डायलौग को फिल्म के अंत में रणवीर सिंह के मुंह से कहलवाया गया है. कहानी एजेंट की है जिस पर अंतअंत तक सस्पैंस बनाया गया है. कहानी की शुरुआत कंधार हाईजैक की घटना से होती है. भारत के आईबी चीफ अजय सान्याल (आर माधवन) आतंकवादियों को तगड़ा जवाब देना चाहते हैं. परंतु सरकार ने उन की योजना को नकार दिया है. कुछ सालों बाद आतंकवादी संसद पर हमला करते हैं तब सरकार सान्याल के ‘धुरंधर’ प्लान पर काम करने को राजी होती है. प्लान के मुताबिक हमजा (रणवीर सिंह) को अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान भेजा जाता है जहां जा कर उसे ल्यारी के माफिया रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) के गैंग में शामिल होना है. किसी तरह वह रहमान डकैत के गैंग में शामिल हो जाता है. शामिल होने के लिए वह रहमान डकैत के बेटे को बचाने की नाकाम कोशिश करता है जिस पर खुश हो कर रहमान उसे अपने गैंग में शामिल कर लेता है. हालांकि, किसी गैंगस्टर के गैंग में शामिल होने का यह प्लौट कईयों बार फिल्मों में दिखाया जा चुका है.

हमजा आगे जा कर रहमान का ख़ास गुर्गा बन जाता है, कई बार तो रहमान हमजा से ही एडवाइस लेने लगता है. इस बीच वह अपने दुश्मन को मार कर शेर ए बलोच बन जाता है और अब अपनी राजनीतिक पारी खेलने की कोशिश में है. इस बीच हमजा हुकूमत के खास जमील यमाली (राकेश बेदी) की बेटी एलीना (सारा अर्जुन) को अपने प्यार में फंसा लेता है. हमजा और एलीना का निकाह हो जाता है, मगर उस का सामना आईएसआई चीफ मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) से होता है जो 26/11 में हमला करवाता है.

चौधरी असलम (संजय दत्त) बालूचों का सब से बड़ा दुश्मन है. वह करप्ट पुलिस वाला है जो नेताओं के इशारों पर काम करता है. अपनी कुरसी बचाने के लिए जमील यमाली असलम को रहमान डकैत को खत्म करने का औफर देता है. अब हमजा दुश्मन के किले तक पहुंच जाता है और उस के नैटवर्क को ध्वस्त कर देता है, मगर क्लाइमैक्स में फिल्म एक ऐसे मोड़ पर जा पहुंचती है जहां से पार्ट 2 का खुलासा होता है.

फिल्म एकदम काल्पनिक है, जिस में हकीकत के बड़े इंसिडैंट उठाए गए हैं. लेकिन असलियत और नकलियत का ऐसा घोल मिलाया गया है कि लोग समझ नहीं पाते कि यह रियल इंसिडैंट पर बनी फिल्म देख रहे हैं या फिक्शनल है. भारत, पाक पर और कंधार हाईजैक पर कई फिल्में पहले भी बन चुकी हैं. मगर लगभग 6 वर्षों बाद निर्देशन में लौटे आदित्य धर इसे बड़े लैवल पर प्रोजैक्ट करते हैं. फिल्म बीचबीच में खिंचीखिंची दिखाई देती है.

फिल्म में ढेरों कलाकार हैं, सभी खूंखार दिखाए गए हैं. पकिस्तान में आम इंसान तो दिखाई ही नहीं देता. निर्देशक ने पाकिस्तान में नकली नोट छापने का मुद्दा फिल्म में उठाया है. मुंबई हमले की टीवी रिपोर्टिंग देखते हुए आतंकियों का अलर्ट होना और भारतीयों को कमजोर करने के दृश्य विचलित करते हैं. लेकिन फिल्म मुंबई हमले के मास्टरमाइंड लश्कर ए तैयबा पर बात नहीं करती. इस में पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड हेडली का हलका सा जिक्र है, यह भी अखरता है. फिल्म में जम कर हिंसा है. गालीगलौज भी बहुत है. बहुत बार तो बेमतलब गालियां बकी गई हैं. फिल्म ए रेटेड है.

रणवीर सिंह आक्रामक दिखा है, मगर उस के संवाद कम हैं. लंबे बालों का लुक उस पर जंचता है. अक्षय खन्ना का काम बढ़िया है, पूरी मूवी में वह छाया हुआ है. अर्जुन रामपाल को मुंबई हमले के बाद जश्न मनाते देख दर्शकों का खून खौल उठता है. अब तक कौमेडी वाली भूमिकाएं करने वाले राकेश बेदी ने इस बार मौकापरस्त नेता की भूमिका में चौंकाया है. संजय दत्त एसपी की भूमिका में है. सारा अर्जुन न भी होती फिल्म में तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.

सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. फिल्म की अवधि कम की जा सकती थी. बैकग्राउंड में चलते पुरानी फिल्मों के गाने सुनने में अच्छे लगते हैं. संगीत भी प्रभावशाली है. ऐक्शन, थ्रिलर और जासूसी फिल्में देखने वाले दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी. Dhurandhar Movie Review :

Religious Intolerance : मजहब ही तो सिखाता आपस में बैर रखना

Religious Intolerance : जबजब धर्म का राजनीति के साथ घालमेल हुआ है, तबतब हिंसा, कत्ल, दंगे, आगजनी की घटनाएं घटी हैं. धर्म की बुनियाद ही, आस्था के नाम पर, एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अलग करना है. यही कारण है कि आज देश ऐसी विकट स्थिति पर आ कर खड़ा है जहां लोग एकदूसरे को इंसान कम हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई अधिक सम   झने लगे हैं, जिस कारण देश में अलगअलग जगह हिंसा भड़क रही है.

मणिपुर का मामला ठीक से शांत भी नहीं हुआ था कि हरियाणा जलने की कगार पर है. नौबत यह है कि नूंह से भड़की इस हिंसा ने हरियाणा के मेवात, गुरुग्राम, फरीदाबाद व रेवाड़ी जिले में भी दंगे भड़कने के पूरे आसार बना दिए हैं.

इस की मुख्य वजह में जाएं तो सामने वे लोग दिख जाएंगे जो किसी खास राजनीतिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े हुए हैं, जो धर्मों के अनुसार एकदूसरे को मारनेकाटने में यकीन रखते हैं. फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि इस की लपटें कहां तक पहुंचेंगी पर यकीनन धर्म को कट्टरता से मानने वालों के उन्माद से आज देश के आम नागरिक हिंसा की चपेट में बुरी तरह फंस चुके हैं.

मार्क्स ने धर्म को अफीम का दर्जा देते वक्त सोचा नहीं होगा कि वे यूफेमिज्म (लाक्षविक्रता) का सहारा ले रहे हैं. मार्क्स की अफीम आज कोकीन, हशीश और हेरोइन से भी ज्यादा प्रसंस्कृत हो चुकी है. लिहाजा, अगर उन्होंने धर्म को नशे के बजाय सीधेसीधे नफरत फैलाने वाला कहा होता तो शायद गलत नहीं था. पूरी दुनिया में धर्मकेंद्रित आतंकवाद के उभरने से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि धर्म दिलों को जोड़ नहीं, बल्कि तोड़ रहा है.

जमीनी सचाई भी यही है कि विभिन्न धर्मों की जड़ता और कट्टरता की वजह से विश्व 21वीं सदी में पहुंच कर भी पाषाणयुग के मुहाने पर खड़ा दिखाई देता है. महाकवि इकबाल के फलसफे ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ से कोसों दूर धर्म आज वास्तविक धरातल पर मजहबी विद्वेष और अराजकता की आधारभूमि बना हुआ है.

पिछले 4 दशकों में अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पूरी तरह धार्मिक उन्माद और अलगाव की धुरी पर केंद्रित रहा है. विज्ञान और तकनीक के चमत्कारों को मजहबी विध्वंस की आंधी पूरी तरह लील गई. विश्व ने इसलामी आतंकवाद के खिलाफ मोरचा साधा तो भारत में हिंदूमुसलिम विद्वेष की खाई और गहरी हुई. जिन अर्थों में हम भारत को धर्मनिरपेक्ष और सद्भावपूर्ण राज्य का पर्याय मानते हैं, वे निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि सदियों से जिस धार्मिक महानता के गीत गाए जाते रहे थे वे कितने अर्थपूर्ण थे. आखिर धर्म तो आज भी समन्वय के बजाय वैमनस्य का पर्याय बना हुआ है.

एंगल्स ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि यह आदमी के दिमाग की ऐसी फुजूल उपज है जो प्राकृतिक क्रियाकलापों को दैवीय शक्ति का दरजा दे कर भ्रम पैदा करती है. नए परिप्रेक्ष्य में धर्म सिर्फ भ्रम ही नहीं, विनाश की स्थितियां भी पैदा कर रहा है.

भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ. भारतीय संविधान में सांप्रदायिक सद्भाव को सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयत्न किए गए. भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना. इस के बावजूद आजादी के बाद सांप्रदायिकता कम होने के बजाय बढ़ी है. अयोध्या, गुजरात, कश्मीर की घटनाएं इस का प्रमाण हैं. जाहिर तौर पर इसे राजकीय लिहाज से नीतिगत नाकामी का पर्याय ही कहा जाएगा.

दरअसल भारत में सभी सरकारों ने राज्य और धर्म को अलग रखने के बजाय इन के घालमेल का ही प्रयास किया. इसी वजह से कभी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की आवाजें उठीं तो कभी बहुसंख्यक आक्रामकता को कोसा गया. प्रजातंत्र में धर्म का अन्यथा महत्त्व विध्वंसकारी सिद्ध हो सकता है. भारत जैसी गतिवादी संरचना में यह खतरा और भी विकट रूप से सामने आया. यह इस देश में ही संभव है कि कथित रूप से नास्तिक सम   झी जाने वाली वामपंथी पार्टियां भी जाति और धर्म के समीकरणों के आधार पर चुनावी गणित बैठाती हैं. भाजपा और कांग्रेस ने अपनेअपने स्तर पर धार्मिक उन्माद को हवा दी है.

इस से अधिक हास्यास्पद बात क्या होगी कि आज राष्ट्रीय मुद्दे के नाम पर उग्र हिंदुत्व और नरम हिंदुत्व की व्याख्या बहस का विषय बनी हुई है. इस में शक नहीं कि भाजपा जैसी धार्मिक मुद्दों वाली पार्टी ने आज समूचे मुल्क को विचारधारा के स्तर पर धर्मकेंद्रित बहस के इर्दगिर्द खड़ा कर राज्य हासिल करने में सफलता पाई है.

उस का पानी पी कर विरोध करने वाले दरअसल उस की जमीन ही सींच रहे हैं. विपक्षी दल सांप्रदायिकता के पोषण में उतने ही सहायक सिद्ध हुए जितनी कि भाजपा. यदि शाहबानो प्रकरण, बंगलादेशी घुसपैठ, बाबरी मसजिद विध्वंस, गोधरा जैसी घटनाएं न घटतीं तो भाजपा को अपनी विचारधारा फैलाने में कभी सफलता नहीं मिल सकती थी.

बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का खात्मा अल्पसंख्यकवाद के जरिए संभव नहीं है. मूल तथ्य यह कि हम ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मप्रधान राज्यप्रणाली को ही गले लगाया है. शायद इसीलिए राहुल गांधी को इसलामी सैंटर में भाषण दे कर मुसलिमप्रियता सिद्ध करनी पड़ती है तो जगहजगह मंदिरों में मत्था टेक कर हिंदुओं को लुभाना पड़ता है. क्यों नहीं राजनेता पूरी तरह धर्म आधारित राजनीति से किनारा कर लेते. दरअसल भारत की वर्णवादी व्यवस्था को प्रश्रय देने के साथ धार्मिक विभेद को भी राजनीतिज्ञों ने अपने फायदे के लिए भुनाया है. सांप्रदायिकता भारतीय राजनीति की आनुशंगिक बन गई है.

हम मानें या न मानें, दुनिया के सारे धार्मिक समाजों में ‘अस एंड दे’ अपने और पराए का भाव अंतर्निहित है. इसलाम तो पूरी दुनिया को दारुल हरब और दारुल अमन (काफिर एवं इसलामी विश्व) की अवधारणा में बांट कर देखता है. इसलामी मुल्कों की उग्रवादी कार्यशैली इसी फलसफे पर आधारित है. ईसाई धर्म में कट्टरता का भाव न होते हुए भी विजातीय धर्मों के एनलाइटेनमैंट (धार्मिक जागरण) की गलतफहमी पलती रही.

हिंदू धर्म ने दूसरे धर्मों के साथ तो सर्वधर्म सद्भाव की बात कही पर अपने ही सजातीय हिंदू भाइयों के साथ जातीय आधार पर विद्वेष का रुख अपना लिया. दुनिया के इन 3 विशालतम धर्मों की अपेक्षा पारसी, बौद्ध, जैन जैसे अपेक्षतया छोटे संप्रदायों में वैमनस्य की भावना कम रही है. फिर भी सवाल जहां का तहां है कि आखिर मनुष्य को धर्म की जरूरत ही क्या है, खासकर जब, धार्मिक (तथाकथित) समाज ही सर्वत्र खूनखराबे और विद्वेष की जमीन तैयार कर रहे हैं.

अगर 21वीं सदी में पहुंच कर भी हम धर्म जैसी अर्थहीन परिकल्पना के मोहजाल से निकल नहीं सकते तो तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का औचित्य ही क्या है. दुनिया को धार्मिक उन्माद के दावानल से निकालने का एक ही उपाय है कि सारे देश मजहबी मान्यताओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाएं. सांप्रदायिक सद्भाव के खोखले नारों से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि संप्रदाय ही हैं जो सद्भाव बिगाड़ रहे हैं.

नए संसद भवन के उद्घाटन के समय दलित आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को निमंत्रण न दे कर और संविधान में कोई हैसियत न रखने वाले बीसियों भगवाधारी भारीभरकम मठों के स्वामियों को विशेष जहाजों से बुला कर यही सिद्ध किया गया है कि यह प्रायोजन केवल धार्मिक है और मौजूदा भाजपाई सरकार धर्म को प्रोत्साहित या स्वतंत्रता ही नहीं देती, धार्मिक संदेशों की वह गुलाम भी है.

भारतीय संविधान का जो कचरा हुआ है उसे तो छोडि़ए पर हर भारतवासी के मन में यह बैठा दिया गया है कि जब देश अब इन भगवाधारियों के अनुसार चल रहा है तो वे भी अपना हर काम इसी तरह करें.

हर नागरिक, हर परिवार, हर व्यापार, हर उद्योग को स्पष्ट संदेश है कि उस का हर काम इसी तरह धर्म की अफीम पिलाने वालों के हाथों से शुरू हो, उन्हें दानदक्षिणा दीजिए, उन का आदेश सिरमाथे पर रखा जाए. जब राष्ट्रपति संसद के उद्घाटन के समय अपने अपमान पर त्यागपत्र देने का साहस नहीं कर सकतीं तो आम गृहिणी की क्या बिसात कि वह गली में घूमते एयरकंडीशंड बस में सवार किसी स्वामी की बात को ठुकरा सके.

इसलाम जो अफगानिस्तान, तुर्की व पाकिस्तान में कर रहा है, जो ट्रंप के समर्थक मलयेशिया में कर रहे हैं, वही भारत में हो रहा है. सब जगह वैरभाव सिखाया जा रहा है. लोगों को जबरन हांका जा रहा है. इन सब जगह वही पढ़ने व सुनने को मिल रहा है जो धर्म को स्वीकार है. उस के लिए दानपुण्य सर्वोपरि है. Religious Intolerance :

Hindi Kahani : माफी – तलाक के बाद भी प्रमोद ने शिफाली से क्यों मांगी माफी ?

Hindi Kahani : शिफाली और प्रमोद को आज कोर्ट से तलाक के कागज मिल गए थे. लंबी प्रक्रिया के बाद आज कुछ सुकून मिला. शिफाली और प्रमोद तथा उनके परिजन साथ ही कोर्ट से बाहर निकले, उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे. चार साल की लंबी जदोजहद के बाद आज फैसला हो गया था.

दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ 6 साल ही रह पाए थे.

चार साल तो तलाक की कार्यवाही में ही बीत गये गए.

शेफाली के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी प्रमोद के घर से लेना था और प्रमोद के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो उसने शेफाली से लेने थे.

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि प्रमोद शेफाली को  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त देगा.शेफाली और प्रमोद दोनो एक ही  औटो में बैठकर प्रमोद के घर आये.  आज ठीक 4 साल बाद आखिरी बार ससुराल जा रही थी शेफाली, अब वह कभी इन रास्तों से इस घर तक नहीं आएगी. यह बात भी उसे कचोट रही थी कि जहां वह 4 साल तक रही आज उस घर से उसका नाता टूट गया है. वह  दहेज के सामान की लिस्ट लेकर आई थी, क्योंकि सामान की निशानदेही तो उसे ही करनी थी.

सभी रिश्तेदार अपनेअपने घर जा चुके थे. बस, तीन प्राणी बचे थे. प्रमोद,शेफाली और उस की मां. प्रमोद यहां अकेला ही रहता था, क्योंकि उसके पेरेंट्स गांव में ही रहते थे.

शेफाली और प्रमोद की इकलौती 5 साल की बेटी जो कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक शेफाली के पास ही रहेगी. प्रमोद महीने में एक बार उससे मिल सकता है.

घर में  घुसते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गईं. कितनी मेहनत से सजाया था शेफाली ने इसे. एक एक चीज में उसकी जान बसती थी. सबकुछ उसकी आंखों के सामने बना था. एकएक ईंट से उसने धीरेधीरे बनते घरौदे को पूरा होते देखा था. यह उसका सपनो का घर था. कितनी शिद्दत से प्रमोद ने उसके सपने को पूरे किए थे.

प्रमोद थकाहारा सा सोफे पर पसर गया और शेफाली से बोला, “ले लो जो कुछ भी तुम्हें लेना है, मैं तुम्हें नही रोकूंगा.”

शेफाली बड़े गौर से प्रमोद को देखा और सोचने लगी 4 साल में कितना बदल गया है प्रमोद. उसके बालों में  अब हल्की हल्की सफेदी झांकने लगी थी. शरीर पहले से आधा रह गया है. चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई थी.

शेफाली स्टोर रूम की तरफ बढ़ी, जहां उसके दहेज का समान पड़ा था. कितना था उसका सामान. प्रेम विवाह था दोनो का. घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे.

प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की. क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है.

बस एक बार पीकर बहक गया था प्रमोद. हाथ उठा बैठा था उस पर. बस तभी वो गुस्से में मायके चली गई थी.

फिर चला था लगाने सिखाने का दौर. इधर प्रमोद के भाईभाभी और उधर शेफाली की माँ. नौबत कोर्ट तक जा पहुंची और आखिर तलाक हो गया. न शेफाली लौटी और न ही प्रमोद लेने गया.

शेफाली की मां जो उसके साथ ही गई थीं,बोली, ” कहां है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता. बेच दिया होगा इस शराबी ने ?”

“चुप रहो मां,” शेफाली को न जाने क्यों प्रमोद को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा.

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट से मिलाया गया.

बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया.

शेफाली ने सिर्फ अपना सामान लिया प्रमोद के समान को छुआ तक नही.  फिर शेफाली ने प्रमोद को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया.

प्रमोद ने बैग वापस शेफाली को ही दे दिया, ” रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में .”

गहनों की किम्मत 15 लाख रुपये से कम नही थी.

“क्यों, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था.”

“कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, शेफाली. वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है.”

सुनकर शेफाली की मां ने नाकभों चढ़ा दीं.

“मुझे नही चाहिए.

वो दस लाख रुपये भी नही चाहिए.”

“क्यों?” कह कर प्रमोद सोफे से खड़ा हो गया.

“बस यूं ही” शेफाली ने मुंह फेर लिया.

“इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएंगे.”

इतना कह कर प्रमोद ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया. शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था.

शेफाली की मां गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी.

शेफाली को मौका मिल गया. वो प्रमोद के पीछे उस कमरे में चली गई.

वो रो रहा था. अजीब सा मुंह बना कर.  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने  की जद्दोजहद कर रहा हो. शेफाली ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था. आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला.

मग़र वह ज्यादा भावुक नही हुई.

सधे अंदाज में बोली, “इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक प्रमोद?”

“मैंने नही तलाक तुमने दिया.”

“दस्तखत तो तुमने भी किए.”

“माफी नही मांग सकते थे?”

“मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने. जब भी फोन किया काट दिया.”

“घर भी तो आ सकते थे”?

“मेरी हिम्मत नही हुई थी आने की?”

शेफाली की मां आ गई. वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई. “अब क्यों मुंह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया.”

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी.

शेफाली के भीतर भी कुछ टूट रहा था. उसका दिल बैठा जा रहा था. वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी. जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी. कैसे कैसे बचत कर के उसने और प्रमोद ने वो सोफा खरीदा था. पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था.”

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई. कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी. उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई.

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई. माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया. प्रमोद बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था. एक बार तो उसे दया आई उस पर. मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है.

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा. अस्त व्यस्त हो गया था पूरा कमरा. कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे थे.

कभी कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वह प्रमोद से लिपट कर मुस्करा रही थी.

कितने सुनहरे दिन थे वो.

इतने में मां फिर आ गई. हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई.

बाहर गाड़ी आ गई थी. सामान गाड़ी में डाला जा रहा था. शेफाली सुन सी बैठी थी. प्रमोद गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया.

अचानक प्रमोद कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया.

बोला,” मत जाओ…माफ कर दो.”

शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी. सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए. शेफाली ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया .

और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई प्रमोद से. साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे.

दूर खड़ी शेफाली की माँ समझ गई कि कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही.

काश, उनको पहले मिलने दिया होता?

अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच  जाएं, तो माफ़ी मांग लेनी चाहिए. Hindi Kahani :

Hindi Family Story : मन का घोड़ा – क्यों श्वेता को अपने रंगरूप पर इतना गुमान था ?

Hindi Family Story : ‘‘अंकुर की शादी के बाद कौन सा कमरा उन्हें दिया जाए, सभी कमरे मेहमानों से भरे हैं. बस एक कमरा ऊपर वाला खाली है,’’ अपने बड़े बेटे अरुण से चाय पीते हुए सविता बोलीं.

‘‘अरे मां, इस में इतना क्या सोचना? हमारे वाला कमरा न्यूलीवैड के लिए अच्छा रहेगा. हम ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट हो जाएंगे,’’ अरुण तुरंत बोला.

यह सुन पास बैठी माला मन ही मन बुदबुदा उठी कि आज तक जो कमरा हमारा था, वह अब श्वेता और अंकुर का हो जाएगा. हद हो गई, अरुण ने मेरी इच्छा जानने की भी जरूरत नहीं समझी और कह दिया कि न्यूलीवैड के लिए यह अच्छा रहेगा. तो क्या 15 दिन पूर्व की हमारी शादी अब पुरानी हो गई?

तभी ताईजी ने अपनी सलाह देते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम अपना कमरा क्यों छोड़ते हो? ऊपर वाला कमरा अच्छाभला है. उसे लड़कियां सजासंवार देंगी. और हां, अपनी दुलहन से भी तो पूछ लो. क्या वह अपना सुहागकक्ष छोड़ने को तैयार है?’’ और फिर हलके से मुसकरा दीं. पर अरुण ने तो त्याग की मूर्ति बन झट से कह डाला, ‘‘अरे, इस में पूछने वाली क्या बात है? ये नए दूल्हादुलहन होंगे और हम 15 दिन पुराने हो गए हैं.’’

ये शब्द माला को उदास कर गए पर गहमागहमी में किसी का उस की ओर ध्यान न गया. ससुराल की रीति अनुसार घर की बड़ी महिलाएं और नई बहू माला बरात में नहीं गए थे. अत: बरात की वापसी पर दुलहन को देखने की बेसब्री हो रही थी. गहनों से लदी छमछम करती श्वेता ने अंकुर के संग जैसे ही घर में प्रवेश किया वैसे ही कई स्वर उभर उठे, वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है.

‘‘कैसी दूध सी उजली बहू है, अंकुर की यही तो इच्छा थी कि लड़की चांद सी उजली हो,’’ बूआ सास दूल्हादुलहन पर रुपए वारते हुए बोलीं.

माला चुपचाप एक तरफ खड़ी देखसुन रही थी. तभी सविताजी ने माला को नेग वाली थाली लाने को कहा और इसी बीच कंगन खुलाई की रस्म की तैयारी होने लगी. महिलाओं की हंसीठिठोली और ठहाके गूंज रहे थे पर माला अपनी कंगन खुलाई की यादों में खो गई…

फूल और पानी भरी परात से जब माला ने 3 बार अंगूठी ढूंढ़ निकाली तब सभी ने एलान कर डाला, ‘‘भई, अब तो माला ही राज करेगी और अरुण इस का दीवाना बना घूमेगा.’’

पर माला तो अरुण का चेहरा देखने को भी तरसती रही. भाई की शादी की व्यस्तता व मेहमानों, दोस्तों की गहमागहमी में माला का ध्यान ही नहीं आया. माला के कुंआरे सपने साकार होने को तड़पते और मन में उदासी भर देते, फिर भी माला सब के सामने मुसकराती बैठी रहती.

शाम 4 बजे रीता ने आवाज लगाई, ‘‘जिसे भी चाय पीनी हो वह जल्दी से यहां आ जाए. मैं दोबारा चाय नहीं बनाऊंगी.’’ ‘‘ला, मुझे 1 कप चाय पकड़ा दे. फिर बाहर काम से जाना है,’’ अरुण ने भीतर आते हुए कहा.

‘‘ठहरो भाई, पहले एक बात बताओ. वह आप के हस्तविज्ञान व दावे का क्या रहा जब आप ने कहा था कि मेरी दुलहन एकदम गोरीचिट्टी होगी. यह बात तो अंकुर भाई पर फिट हो गई,’’ कह रीता जोरजोर से हंसने लगी.

‘‘अच्छा, एक बात बता, मन का लड्डू खाने में कोई बंदिश है क्या?’’ अरुण ने हंसते हुए कहा.

तभी ताई सास ने अपनी बेटी रीता को डपट दिया, ‘‘यह क्या बेहूदगी है? नईनवेली बहुएं हैं, सोचसमझ कर बोलना चाहिए… और अरुण तेरी भी मति मारी गई है क्या, जो बेकार की बातों में समय बरबाद कर रहा है?’’

शादी के बाद अंकुर और श्वेता हनीमून पर ऊटी चले गए ताकि अधिकतम समय एकदूसरे के साथ व्यतीत कर सकें, क्योंकि 20 दिनों के बाद ही अंकुर को लंदन लौटना था. श्वेता तो पासपोर्ट और वीजा लगने के बाद ही जा पाएगी. हनीमून पर जाने का प्रबंध अरुण ने ही किया था. ये सब बातें माला को पिछले दिन रीता ने बताई थीं. घर के सभी लोग अरुण की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे पर माला के मन में कांटा सा गड़ गया. मन में अरुण के प्रति क्रोध की ज्वाला उठने लगी.

‘हमारा हनीमून कहां गया? अपने लिए इन्होंने क्यों कुछ नहीं सोचा? क्यों? रोऊं, लडं क्या करूं?’ ये सवाल, जिन्हें संकोचवश अरुण से स्पष्ट नहीं कर पा रही थी, उस के मन को लहूलुहान कर रहे थे.

समय का पहिया अंकुर को लंदन ले गया. ऐसे में श्वेता अकेलापन अनुभव न करे, इसलिए घर का हर सदस्य उस का ध्यान रखने लगा था. भानजी गीता तो उसे हर समय घेरे रहती. माला तो जैसे कहीं पीछे ही छूटती जा रही थी. तभी तो माला शाम के धुंधलके में अकेली छत पर खड़ी स्वयं से बतिया रही थी कि मानती हूं कि श्वेता को अंकुर की याद सताती होगी. पर सारा परिवार उसी से चिपका रहे, यह तो कोई बात न हुई. मैं भी तो 2 माह से यहीं रह रही हूं और अरुण भी तो दिल्ली से सप्ताह के अंत में 1 दिन के लिए आते हैं. मुझ से हमदर्दी क्यों नहीं?

तभी किसी के आने की आहट से उस की विचारधारा भंग हो गई.

‘‘माला, तुम यहां अकेली क्यों खड़ी हो? चलो, नीचे मां तुम्हें बुला रही हैं. और हां कल सुबह की ट्रेन से दिल्ली निकल जाऊंगा. तुम श्वेता का ध्यान रखना कि वह उदास न हो. वैसे तो सभी ध्यान रखते हैं पर तुम्हारा ध्यान रखना और अच्छा रहेगा…’’

अरुण आगे कुछ और कहता उस से पहले ही माला गुस्से से चिल्ला पड़ी, ‘‘उफ, सब के लिए आप के मन में कोमल भावनाएं हैं पर मेरे लिए नहीं. क्या मैं इतनी बड़ी हो गई हूं कि मैं सब का ध्यान रखूं और खुद को भूल जाऊं? मेरी इच्छाएं, मेरी कल्पनाएं, मेरा हनीमून उस का क्या?’’

अरुण हैरान सा माला को देखता रह गया, ‘‘आज तुम्हें यह क्या हो गया है माला? तुम श्वेता से अपनी तुलना कर रही हो क्या? उस के नाम से तुम इतना अपसैट क्यों हो गईं?’’

‘‘नहीं, मैं किसी से तुलना क्यों करूंगी? मुझे अपना स्थान चाहिए आप के दिल में… परसों कौशल्या बाई बता रही थी कि अरुण भैया तो ब्याह के लिए तैयार ही नहीं थे. वह तो मांजी 3 सालों से पीछे लगी थीं तब उन्होंने हामी भरी थी. तो क्या आप के साथ शादी की जबरदस्ती हुई है? और उस दिन रीता ने जो हस्तविज्ञान वाली बात कही थी, इस से लगता है कि आप की चाहत शायद कोई और थी पर…’’ माला ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘उफ, तुम औरतों का दिमागी घोड़ा बिना लगाम के दौड़ता है. तुम इन छोटीछोटी व्यर्थ की बातों का बतंगड़ बनाना छोड़ो और मन शांत करो. अब नीचे चलो. सब खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’’

वह दिन भी आ गया जब माला अरुण के साथ दिल्ली आ गई. यहां अपना घर सजातेसंवारते उस के सपने भी संवर रहे थे. अरुण के औफिस से लौटने से पहले वह स्वयं को आकर्षक बनाने के साथ ही कुछ न कुछ नया पकवान, चाय आदि बनाती. फिर दोनों की गप्पों व कुछ टीवी सीरियल देखतेदेखते रात गहरा जाती तो दोनों एकदूसरे के आगोश में समा जाते.

हां, एक बार छुट्टी के दिन माला ने दिल्ली दर्शन की इच्छा भी व्यक्त की थी तो, ‘‘ये रोमानी घडि़यां साथ बिताने के लिए हैं, हमारा हनीमून पीरियड है यह. फिर दिल्ली तो घूमना होता ही रहेगा जानेमन,’’ अरुण का यह जवाब गुदगुदा गया था.

शनिवार की छुट्टी में अरुण अलसाया सा लेटा था कि तभी मोबाइल बज उठा. अरुण फोन उठा कर बोला, ‘‘हैलो… अच्छा ठीक है, मैं कल स्टेशन पहुंच जाऊंगा. ओ.के. बाय.’’

‘‘किस का फोन था?’’ चाय की ट्रे ले कर आती माला ने पूछा.

‘‘श्वेता का. वह कल आ रही है. उसे मैं रिसीव करने जाऊंगा,’’ कह अरुण ने चाय का कप उठा लिया.

श्वेता के आने की खबर से माला का उदास चेहरा अरुण से छिपा न रह सका, ‘‘क्या हुआ? अचानक तुम गुमसुम सी क्यों हो गईं?’’ अरुण ने उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘अभी दिन ही कितने हुए हैं हमें साथ समय बिताते कि…’’

‘‘अरे यार, उस के आने से रौनक हो जाएगी, कितना हंसतीबोलती है. तुम्हारा भी पूरा दिन मन लगा रहेगा. सारा दिन अकेले बोर होती हो,’’ माला की बात बीच में ही काटते हुए अरुण ने कहा.

माला चुपचाप चाय की ट्रे उठा कर रसोई की ओर बढ़ गई.

‘फिर वही श्वेता. क्या वह अपने मायके या ससुराल में नहीं रह सकती थी कुछ महीने? फिर चली आ रही है दालभात में मूसलचंद. ‘खैर, मुसकराहट तो ओढ़नी ही होगी वरना अरुण न जाने क्या सोचने लगें.’ मन ही मन सोच माला नाश्ते की तैयारी करने लगी.

छुट्टी के दिन अरुण श्वेता और माला को एक मौल में ले गया. वहां की चहलपहल और भीड़ का कोई छोर ही न था. श्वेता की खुशी देखते ही बन रही थी, ‘‘भाभी, आप तो बस जब मन आए यहीं चली आया करो. यहां शौपिंग का मजा ही कुछ और है,’’ माला की ओर देख उस ने कहा.

‘‘मुझे तो अरुण, पहले कभी यहां लाए ही नहीं. यह सब तो तुम्हारे कारण हो रहा है,’’ माला उदासी भरे स्वर से बोली.

‘‘अच्छा,’’ श्वेता का स्वर उत्साहित हो उठा.

वहीं मौल में खाना खाते हुए श्वेता की आंखें चमक रही थीं. बोली, ‘‘वाह, खाना कितना स्वादिष्ठ है.’’

इस पर अरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मुझे मालूम था कि श्वेता तुम ऐंजौय करोगी. तभी तो यहां लंच लेने की सोची.’’

‘‘और मैं?’’ माला ने अरुण से पूछ ही लिया.

‘‘अरे, तुम तो मेरी अर्द्धांगिनी हो, जो मुझे पसंद वही तुम्हें भी पसंद आता है, अब तक मैं यह तो जान ही गया हूं. इसलिए तुम्हें भी यहां आना तो अच्छा ही लगा होगा.’’

बुधवार की सुबह अखबार थामे श्वेता बोली, ‘‘बिग बाजार में 50% की बचत पर सेल लगी है. भैया, मुझे 5,000 दे देंगे? 2000 तो हैं मेरे पास. मैं और भाभी ड्रैसेज लाएंगी. ठीक है न भाभी? लंदन में यही ड्रैसेज काम आ जाएंगी.’’

‘‘हांहां, क्रैडिट कार्ड ले लेगी माला… दोनों शौपिंग कर लेना.’’

माला अरुण को मुंह बाए खड़ी देखती रह गई कि क्या ये वही अरुण हैं, जिन्होंने कहा था कि पहले शादी में मिली ड्रैसेज को यूज करो, फिर नई खरीदना. तो क्या श्वेता को ड्रैसेज का ढेर नहीं मिला है शादी में? ये छोटीबड़ी बातें माला का मन कड़वाहट से भरती जा रही थीं.

उस दिन तो माला का मन जोर से चिल्लाना चाहा था जब श्वेता बिस्तर में सुबह 9 बजे तक चैन की नींद ले रही थी और वह रसोई में लगी हुई थी. तभी अरुण ने श्वेता को चाय दे कर जगाने को कह दिया. वह जानती थी कि अरुण को देर तक बिस्तर में पड़े रहना पसंद नहीं. फिर श्वेता से कुछ भी क्यों नहीं कहा जाता? मन में उठता विचारों का ज्वार, सुहागरात की ओर बहा ले गया कि मुझे तो प्रथम मिलन की रात्रि में प्यार के पलों से पहले संस्कार, परिवार के नियमों आदि का पाठ पढ़ाया था अरुण ने… फिर तभी चाय उफनने की आवाज उसे वर्तमान में ले आई.

मैं आज और अभी अरुण से पूछ कर ही रहूंगी, सोच माला बाथरूम में शेव करते अरुण के पास जा खड़ी हुई.

‘‘क्या बात है? कोई काम है क्या?’’ शेविंग रोक अरुण ने पूछा.

‘‘क्या मैं जबरदस्ती आप के गले मढ़ी गई हूं? क्या मुझ में कोई अच्छाई नहीं है?’’

अरुण हाथ में शेविंगब्रश लिए हैरान सा खड़ा रहा. पर माला बोलती रही, ‘‘हर समय बस श्वेताश्वेता. मुझ से तो परंपरा निभाने की बात करते रहे और इस का बिंदासपन अच्छा लगता है. आखिर क्यों?’’ माला का चेहरा लाल होने के साथसाथ आंसुओं से भी भीग चला था.

‘‘तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है. तुम्हारे मन में इतनी जलन, ईर्ष्या कहां से आ गई? श्वेता के नाम से चिढ़ क्यों हो रही है? देवरानी तो छोटी बहन जैसी होती है और तुम तो न जाने…’’

‘‘बस फिर शुरू हो गया मेरे लिए आप का प्रवचन. उस की हर बात गुणों से भरी होती है और मेरी बुराई से,’’ कह पांव पटकती माला अपने कमरे में चली गई.

अरुण बिना नाश्ता किए व लंच टिफिन लिए औफिस चला गया. उस दिन माला को माइग्रेन का अटैक पड़ गया. सिरदर्द धीरेधीरे बढ़ता उस की सहनशक्ति से बाहर हो गया. उलटियों के साथसाथ चक्कर भी आ रहा था. श्वेता ने मैडिकल किट छान मारी पर दर्द की कोई गोली नहीं मिली. उस ने अरुण को फोन किया तो सैक्रेटरी ने बताया कि वे मीटिंग में व्यस्त हैं.

इधर माला अपना सिर पकड़ रोए जा रही थी. तभी श्वेता 10 मिनट के अंदर औटो द्वारा मैडिकल स्टोर से दर्द की दवा ले आई और कुछ मानमनुहार तथा कुछ जबरदस्ती से माला को दवा खिलाई. माथे पर बाम मल कर धीरेधीरे सिरमाथे को तब तक दबाती रही जब तक माला को नींद नहीं आ गई.

करीब 2 घंटे बाद माला की आंखें खुलीं. तबीयत में काफी सुधार था. सिर हलका लग रहा था. उस ने उठ कर इधरउधर नजर दौड़ाई तो देखा श्वेता 2 कप चाय व स्नैक्स ले कर आ रही है.

‘‘अरे भाभी, आप उठो नहीं… यह लो चाय और कुछ खा लो. शाम के खाने की चिंता मत करना, मैं बना लूंगी. हां, आप जैसा तो नहीं बना पाऊंगी पर ठीकठाक बना लूंगी,’’ कह उस ने चाय का प्याला माला को थमा दिया.

माला श्वेता के इस व्यवहार को देख उसे ठगी सी देखती रह गई.

‘‘क्या हुआ भाभी?’’

‘‘मुझे माफ कर दो श्वेता, मैं ने तो न मालूम क्याक्या सोच लिया था… तुम्हें प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही थी. और…’’

‘‘नहींनहीं भाभी, और कुछ मत कहिए आप, अब मैं आप से कुछ भी नहीं छिपाऊंगी. सच में ही मुझे अपने रंगरूप पर अभिमान रहा है. मुझ में उतना धैर्य नहीं जितना आप में है. इसीलिए मैं आप को चिढ़ाने के लिए अपने में व्यस्त रही… आप की कोई मदद नहीं करती थी. भाभी, आप मुझे माफ कर दीजिए. आज से हम रिश्ते में भले ही देवरानीजेठानी हैं पर रहेंगी छोटीबड़ी बहनों की तरह,’’ और फिर दोनों एकदूसरे के गले से लग गईं.

‘‘सच श्वेता. मैं आज से अपने मन को गलत दिशा की तरफ भटकने से रोकूंगी और तुम्हारे भैया से माफी भी मांगूंगी.’’

अब श्वेता व माला एकदूसरे को देख कर मुसकरा रही थीं. Hindi Family Story :

Hindi Social Story : अंदाज – क्या रूढ़िवादी ससुराल को बदल पाई रंजना ?

Hindi Social Story : ‘‘जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया…’’

अपने सहयोगियों के दबाव में आ कर रंजना ने अपने पति मोहित को फोन किया, ‘‘ये सब लोग कल पार्टी देने की मांग कर रहे हैं. मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’’

‘‘मम्मीपापा की इजाजत के बगैर किसी को घर बुलाना ठीक नहीं रहेगा,’’ मोहित की आवाज में परेशानी के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘फिर इन की पार्टी कब होगी?’’

‘‘इस बारे में रात को बैठ कर फैसला करते हैं.’’

‘‘ओ.के.’’

रंजना ने फोन काट कर मोहित का फैसला बताया तो सब उस के पीछे पड़ गए, ‘‘अरे, हम मुफ्त में पार्टी नहीं खाएंगे. बाकायदा गिफ्ट ले कर आएंगे, यार.’’

‘‘अपनी सास से इतना डर कर तू कभी खुश नहीं रह पाएगी,’’ उन लोगों ने जब इस तरह का मजाक करते हुए रंजना की खिंचाई शुरू की तो उसे अजीब सा जोश आ गया. बोली, ‘‘मेरा सिर खाना बंद करो. मेरी बात ध्यान से सुनो. कल रविवार रात 8 बजे सागर रत्ना में तुम सब डिनर के लिए आमंत्रित हो. कोई भी गिफ्ट घर भूल कर न आए.’’

रंजना की इस घोषणा का सब ने तालियां बजा कर स्वागत किया था. कुछ देर बाद अकेले में संगीता मैडम ने उस से पूछा, ‘‘दावत देने का वादा कर के तुम ने अपनेआप को मुसीबत में तो नहीं फंसा लिया है?’’

‘‘अब जो होगा देखा जाएगा, दीदी,’’ रंजना ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अगर घर में टैंशन ज्यादा बढ़ती लगे तो मुझे फोन कर देना. मैं सब को पार्टी कैंसल हो जाने की खबर दे दूंगी. कल के दिन बस तुम रोनाधोना बिलकुल मत करना, प्लीज.’’

‘‘जितने आंसू बहाने थे, मैं ने पिछले साल पहली वर्षगांठ पर बहा लिए थे दीदी. आप को तो सब मालूम ही है.’’

‘‘उसी दिन की यादें तो मुझे परेशान कर रही हैं, माई डियर.’’

‘‘आप मेरी चिंता न करें, क्योंकि मैं साल भर में बहुत बदल गई हूं.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत बदल गई हो, रंजना? सास की नाराजगी, ससुर की डांट या ननद की दिल को छलनी करने वाली बातों की कल्पना कर के तुम आज कतई परेशान नजर नहीं आ रही हो.’’

‘‘टैंशन, चिंता और डर जैसे रोग अब मैं नहीं पालती हूं, दीदी. कल रात दावत जरूर होगी. आप जीजाजी और बच्चों के साथ वक्त से पहुंच जाना,’’ कह रंजना उन का कंधा प्यार से दबा कर अपनी सीट पर चली गई.

रंजना ने बिना इजाजत अपने सहयोगियों को पार्टी देने का फैसला किया है, इस खबर को सुन कर उस की सास गुस्से से फट पड़ीं, ‘‘हम से पूछे बिना ऐसा फैसला करने का तुम्हें कोई हक नहीं है, बहू. अगर यहां के कायदेकानून से नहीं चलना है, तो अपना अलग रहने का बंदोबस्त कर लो.’’

‘‘मम्मी, वे सब बुरी तरह पीछे पड़े थे. आप को बहुत बुरा लग रहा है, तो मैं फोन कर के सब को पार्टी कैंसल करने की खबर कर दूंगी,’’ शांत भाव से जवाब दे कर रंजना उन के सामने से हट कर रसोई में काम करने चली गई.

उस की सास ने उसे भलाबुरा कहना जारी रखा तो उन की बेटी महक ने उन्हें डांट दिया, ‘‘मम्मी, जब भाभी अपनी मनमरजी करने पर तुली हुई हैं, तो तुम बेकार में शोर मचा कर अपना और हम सब का दिमाग क्यों खराब कर रही हो? तुम यहां उन्हें डांट रही हो और उधर वे रसोई में गाना गुनगुना रही हैं. अपनी बेइज्जती कराने में तुम्हें क्या मजा आ रहा है?’’

अपनी बेटी की ऐसी गुस्सा बढ़ाने वाली बात सुन कर रंजना की सास का पारा और ज्यादा चढ़ गया और वे देर तक उस के खिलाफ बड़बड़ाती रहीं.

रंजना ने एक भी शब्द मुंह से नहीं निकाला. अपना काम समाप्त कर उस ने खाना मेज पर लगा दिया.

‘‘खाना तैयार है,’’ उस की ऊंची आवाज सुन कर सब डाइनिंगटेबल पर आ तो गए, पर उन के चेहरों पर नाराजगी के भाव साफ नजर आ रहे थे.

रंजना ने उस दिन एक फुलका ज्यादा खाया. उस के ससुरजी ने टैंशन खत्म करने के इरादे से हलकाफुलका वार्त्तालाप शुरू करने की कोशिश की तो उन की पत्नी ने उन्हें घूर कर चुप करा दिया.

रंजना की खामोशी ने झगड़े को बढ़ने नहीं दिया. उस की सास को अगर जरा सा मौका मिल जाता तो वे यकीनन भारी क्लेश जरूर करतीं.

महक की कड़वी बातों का जवाब उस ने हर बार मुसकराते हुए मीठी आवाज में दिया. शयनकक्ष में मोहित ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘किसी और की न सही पर तुम्हें कोई भी फैसला करने से पहले मेरी इजाजत तो लेनी ही चाहिए थी. मैं कल तुम्हारे साथ पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा.’’

‘‘तुम्हारी जैसी मरजी,’’ रंजना ने शरारती मुसकान होंठों पर सजा कर जवाब दिया और फिर एक चुंबन उस के गाल पर अंकित कर बाथरूम में घुस गई.

रात ठीक 12 बजे रंजना के मोबाइल के अलार्म से दोनों की नींद टूट गई.

‘‘यह अलार्म क्यों बज रहा है?’’ मोहित ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा.

‘‘हैपी मैरिज ऐनिवर्सरी, स्वीट हार्ट,’’ उस के कान के पर होंठों ले जा कर रंजना ने रोमांटिक स्वर में अपने जीवनसाथी को शुभकामनाएं दीं.

रंजना के बदन से उठ रही सुगंध और महकती सांसों की गरमाहट ने चंद मिनटों में जादू सा असर किया और फिर अपनी नाराजगी भुला कर मोहित ने उसे अपनी बांहों के मजबूत बंधन में कैद कर लिया.

रंजना ने उसे ऐसे मस्त अंदाज में जी भर कर प्यार किया कि पूरी तरह से तृप्त नजर आ रहे मोहित को कहना ही पड़ा, ‘‘आज के लिए एक बेहतरीन तोहफा देने के लिए शुक्रिया, जानेमन.’’

‘‘आज चलोगे न मेरे साथ?’’ रंजना ने प्यार भरे स्वर में पूछा.

‘‘पार्टी में? मोहित ने सारा लाड़प्यार भुला कर माथे में बल डाल लिए.’’

‘‘मैं पार्क में जाने की बात कर रही हूं, जी.’’

‘‘वहां तो मैं जरूर चलूंगा.’’

‘‘आप कितने अच्छे हो,’’ रंजना ने उस से चिपक कर बड़े संतोष भरे अंदाज में आंखें मूंद लीं. रंजना सुबह 6 बजे उठ कर बड़े मन से तैयार हुई. आंखें खुलते ही मोहित ने उसे सजधज कर तैयार देखा तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा.

‘‘यू आर वैरी ब्यूटीफुल,’’ अपने जीवनसाथी के मुंह से ऐसी तारीफ सुन कर रंजना का मन खुशी से नाच उठा.

खुद को मस्ती के मूड में आ रहे मोहित की पकड़ से बचाते हुए रंजना हंसती हुई कमरे से बाहर निकल गई.

उस ने पहले किचन में जा कर सब के लिए चाय बनाई, फिर अपने सासससुर के कमरे में गई और दोनों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया.

चाय का कप हाथ में पकड़ते हुए उस की सास ने चिढ़े से लहजे में पूछा, ‘‘क्या सुबहसुबह मायके जा रही हो, बहू?’’

‘‘हम तो पार्क जा रहे हैं मम्मी,’’ रंजना ने बड़ी मीठी आवाज में जवाब दिया.

सास के बोलने से पहले ही उस के ससुरजी बोल पड़े, ‘‘बिलकुल जाओ, बहू. सुबहसुबह घूमना अच्छा रहता है.’’

‘‘हम जाएं, मम्मी?’’

‘‘किसी काम को करने से पहले तुम ने मेरी इजाजत कब से लेनी शुरू कर दी, बहू?’’ सास नाराजगी जाहिर करने का यह मौका भी नहीं चूकीं.

‘‘आप नाराज न हुआ करो मुझ से, मम्मी. हम जल्दी लौट आएंगे,’’ किसी किशोरी की तरह रंजना अपनी सास के गले लगी और फिर प्रसन्न अंदाज में मुसकराती हुई अपने कमरे की तरफ चली गई.

वह मोहित के साथ पार्क गई जहां दोनों के बहुत से साथी सुबह का मजा ले रहे थे. फिर उस की फरमाइश पर मोहित ने उसे गोकुल हलवाई के यहां आलूकचौड़ी का नाश्ता कराया. दोनों की वापसी करीब 2 घंटे बाद हुई. सब के लिए वे आलूकचौड़ी का नाश्ता पैक करा लाए थे. लेकिन यह बात उस की सास और ननद की नाराजगी खत्म कराने में असफल रही थी. दोनों रंजना से सीधे मुंह बात नहीं कर रही थीं. ससुरजी की आंखों में भी कोई चिंता के भाव साफ पढ़ सकता था. उन्हें अपनी पत्नी और बेटी का व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आ रहा था, पर चुप रहना उन की मजबूरी थी. वे अगर रंजना के पक्ष में 1 शब्द भी बोलते, तो मांबेटी दोनों हाथ धो कर उन के पीछे पड़ जातीं.

सजीधजी रंजना अपनी मस्ती में दोपहर का भोजन तैयार करने के लिए रसोई में चली आई. महक ने उसे कपड़े बदल आने की सलाह दी तो उस ने इतराते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, आज तुम्हारे भैया ने मेरी सुंदरता की इतनी ज्यादा तारीफ की है कि अब तो मैं ये कपड़े रात को ही बदलूंगी.’’

‘‘कीमती साड़ी पर दागधब्बे लग जाने की चिंता नहीं है क्या तुम्हें?’’

‘‘ऐसी छोटीमोटी बातों की फिक्र करना अब छोड़ दिया है मैं ने, दीदी.’’

‘‘मेरी समझ से कोई बुद्धिहीन इनसान ही अपना नुकसान होने की चिंता नहीं करता है,’’ महक ने चिढ़ कर व्यंग्य किया.

‘‘मैं बुद्धिहीन तो नहीं पर तुम्हारे भैया के प्रेम में पागल जरूर हूं,’’ हंसती हुई रंजना ने अचानक महक को गले से लगा लिया तो वह भी मुसकराने को मजबूर हो गई.

रंजना ने कड़ाही पनीर की सब्जी बाजार से मंगवाई और बाकी सारा खाना घर पर तैयार किया.

‘‘आजकल की लड़कियों को फुजूलखर्ची की बहुत आदत होती है. जो लोग खराब वक्त के लिए पैसा जोड़ कर नहीं रखते हैं, उन्हें एक दिन पछताना पड़ता है, बहू,’’ अपनी सास की ऐसी सलाहों का जवाब रंजना मुसकराते हुए उन की हां में हां मिला कर देती रही.

उस दिन उपहार में रंजना को साड़ी और मोहित को कमीज मिली. बदले में उन्होंने महक को उस का मनपसंद सैंट, सास को साड़ी और ससुरजी को स्वैटर भेंट किया. उपहारों की अदलाबदली से घर का माहौल काफी खुशनुमा हो गया था. यह सब को पता था कि सागर रत्ना में औफिस वालों की पार्टी का समय रात 8 बजे का है. जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया.

‘‘तुम्हें पार्टी में जाना है तो हमारी इजाजत के बगैर जाओ,’’ उस की मां ने उस पर नजर पड़ते ही कठोर लहजे में अपना फैसला सुना दिया.

‘‘आज के दिन क्या हम सब का इकट्ठे घूमने जाना अच्छा नहीं रहता, भैया?’’ महक ने चुभते लहजे में पूछा.

‘‘रंजना ने पार्टी में जाने से इनकार कर दिया है,’’ मोहित के इस जवाब को सुन वे तीनों ही चौंक पड़े.

‘‘क्यों नहीं जाना चाहती है बहू पार्टी में?’’ उस के पिता ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘उस की जिद है कि अगर आप तीनों साथ नहीं चलोगे तो वह भी नहीं जाएगी.’’

‘‘आजकल ड्रामा करना बड़ी अच्छी तरह से आ गया है उसे,’’ मम्मी ने बुरा सा मुंह बना कर टिप्पणी की.

मोहित आंखें मूंद कर चुप बैठ गया. वे तीनों बहस में उलझ गए.

‘‘हमें बहू की बेइज्जती कराने का कोई अधिकार नहीं है. तुम दोनों साथ चलने के लिए फटाफट तैयार हो जाओ वरना मैं इस घर में खाना खाना छोड़ दूंगा,’’ ससुरजी की इस धमकी के बाद ही मांबेटी तैयार होने के लिए उठीं.

सभी लोग सही वक्त पर सागर रत्ना पहुंच गए. रंजना के सहयोगियों का स्वागत सभी ने मिलजुल कर किया. पूरे परिवार को यों साथसाथ हंसतेमुसकराते देख कर मेहमान मन ही मन हैरान हो उठे थे.

‘‘कैसे राजी कर लिया तुम ने इन सभी को पार्टी में शामिल होने के लिए?’’ संगीता मैडम ने एकांत में रंजना से अपनी उत्सुकता शांत करने को आखिर पूछ ही लिया. रंजना की आंखों में शरारती मुसकान की चमक उभरी और फिर उस ने धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘दीदी, मैं आज आप को पिछले 1 साल में अपने अंदर आए बदलाव के बारे में बताती हूं. शादी की पहली सालगिरह के दिन मैं अपनी ससुराल वालों के रूखे व कठोर व्यवहार के कारण बहुत रोई थी, यह बात तो आप भी अच्छी तरह जानती हैं.’’

‘‘उस रात को पलंग पर लेटने के बाद एक बड़ी खास बात मेरी पकड़ में आई थी. मुझे आंसू बहाते देख कर उस दिन कोई मुसकरा तो नहीं रहा था, पर मुझे दुखी और परेशान देख कर मेरी सास और ननद की आंखों में अजीब सी संतुष्टि के भाव कोई भी पढ़ सकता था.

‘‘तब मेरी समझ में यह बात पहली बार आई कि किसी को रुला कर व घर में खास खुशी के मौकों पर क्लेश कर के भी कुछ लोग मन ही मन अच्छा महसूस करते हैं. इस समझ ने मुझे जबरदस्त झटका लगाया और मैं ने उसी रात फैसला कर लिया कि मैं ऐसे लोगों के हाथ की कठपुतली बन अपनी खुशियों व मन की शांति को भविष्य में कभी नष्ट नहीं होने दूंगी.

‘‘खुद से जुड़े लोगों को अब मैं ने 2 श्रेणियों में बांट रखा है. कुछ मुझे प्रसन्न और सुखी देख कर खुश होते हैं, तो कुछ नहीं. दूसरी श्रेणी के लोग मेरा कितना भी अहित करने की कोशिश करें, मैं अब उन से बिलकुल नहीं उलझती हूं.

‘‘औफिस में रितु मुझे जलाने की कितनी भी कोशिश करे, मैं बुरा नहीं मानती. ऐसे ही सुरेंद्र सर की डांट खत्म होते ही मुसकराने लगती हूं.’’

‘‘घर में मेरी सास और ननद अब मुझे गुस्सा दिलाने या रुलाने में सफल नहीं हो पातीं. मोहित से रूठ कर कईकई दिनों तक न बोलना अब अतीत की बात हो गई है.

‘‘जहां मैं पहले आंसू बहाती थी, वहीं अब मुसकराते रहने की कला में पारंगत हो गई हूं. अपनी खुशियों और मन की सुखशांति को अब मैं ने किसी के हाथों गिरवी नहीं रखा हुआ है.

‘‘जो मेरा अहित चाहते हैं, वे मुझे देख कर किलसते हैं और मेरे कुछ किए बिना ही हिसाब बराबर हो जाता है. जो मेरे शुभचिंतक हैं, मेरी खुशी उन की खुशियां बढ़ाने में सहायक होती हैं और यह सब के लिए अच्छा ही है.

‘‘अपने दोनों हाथों में लड्डू लिए मैं खुशी और मस्ती के साथ जी रही हूं, दीदी. मैं ने एक बात और भी नोट की है. मैं खुश रहती हूं तो मुझे नापसंद करने वालों के खुश होने की संभावना भी ज्यादा हो जाती है. मेरी सास और ननद की यहां उपस्थिति इसी कारण है और उन दोनों की मौजूदगी मेरी खुशी को निश्चित रूप से बढ़ा रही है.’’ संगीता मैडम ने प्यार से उस का माथा चूमा और फिर भावुक स्वर में बोलीं, ‘‘तुम सचमुच बहुत समझदार हो गई हो, रंजना. मेरी तो यही कामना है कि तुम जैसी बहू मुझे भी मिले.’’

‘‘आज के दिन इस से बढिया कौंप्लीमैंट मुझे शायद ही मिले, दीदी. थैंक्यू वैरी मच,’’ भावविभोर हो रंजना उन के गले लग गई. उस की आंखों से छलकने वाले आंसू खुशी के थे. Hindi Social Story :

Succession Law : पति-पत्नी की मौत, कौन होगा कानूनी वारिस ?

Succession Law : क्या हो जब पतिपत्नी दोनों की ही मृत्यु हो जाए, और दोनों ने कोई वसीयत न कराई हो, तो उन की संपत्ति का संपत्ति का वारिस कौन होगा. जानने के लिए पढ़ें लेख.

लखनऊ के महानगर में रहने वाले पति पत्नी कपिल और उन की पत्नी रोमा की मौत उन के ही घर में अचानक हो गई थी. वह दौर कोरोना का था. ऐसे में दूसरे दिन महल्ले वालों के जरीए पुलिस को पता चला. कपिल ने मरने से पहले अपनी कोई वसीयत नहीं की थी. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पत्नी प्रथम श्रेणी की वारिस होती है. लेकिन एक साथ मौत होने पर जब यह पता नहीं होता कि पहले कौन मरा तो स्थिति जटिल हो जाती है. इस को ‘कौमोरिएंट नियम’ के आधार पर हल किया जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में रोमा ने अपनी वसीयत लिखवा कर रखी थी. वसीयत में रोमा ने अपनी भतीजी प्रभा को वारिस बना रखा था. कपिल और रोमा के अपनी कोई संतान नहीं थी. ऐसे में अगर रोमा की वसीयत सामने नहीं आती और कपिल की मौत बाद में होती तो यह संपत्ति कपिल के दूसरे श्रेणी के वारिसों यानि भतीजों को संपत्ति चली जाती.

कपिल और रोमा की मौत के बाद अचानक सवाल उठा कि जब दो लोगों की एक ही समय पर मृत्यु हो गई है तो संपत्ति का वारिस कौन होता है ? उत्तराधिकार के ऐसे मामलों में सबसे पहले यह देखा जाता है कि पहले किस की मृत्यु हुई थी. जो पहले मरता है उस की संपत्ति बाद में मरने वाले के नाम हस्तांतरित हो जाती है. उस के उत्तराधिकारी के नाम संपत्ति का दाखिला हो जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में पहले कपिल की उत्तराधिकारी रोमा मानी जाएगी. इस के बाद रोमा ने जिस को अपनी संपत्ति की वसीयत की उस को इस पर अधिकार होगा. इस तरह के सवाल तब भी खड़े होते हैं जब एक ही परिवार के कई लोग सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं. कई बार सड़क और दूसरे हादसों में मौत हो जाती है. तब ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं. इस में एक सवाल और खड़ा हो जाता है कि जब यह पता ही न चले कि एक साथ मरने वालों में कौन पहले मरा और कौन बाद में तो उत्तराधिकार कैसे तय होगा ?

उत्तराधिकार का निर्धारण संपत्ति कानून अधिनियम 1925 की धारा 184 द्वारा ऐसे मामलों के लिए दिशानिर्देश दिया गया है. यह अधिनियम बताता है कि जब दो व्यक्तियों की एक साथ मृत्यु हो जाती है और यह निर्धारित करना संभव नहीं होता कि पहले किस की मृत्यु हुई, तो छोटे व्यक्ति को बड़े व्यक्ति से अधिक समय तक जीवित माना जाता है. इस को ‘कौमोरिएंट्स नियम’ के नाम से जाना जाता है.

सामान्य तौर पर यदि पतिपत्नी दोनों की मृत्यु हो जाती है, तो बच्चों को मातापिता की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिलता है. वे प्रथम श्रेणी के वारिस होते हैं. एक साथ मौत होने पर, संपत्ति बच्चों या अन्य निकटतम कानूनी वारिसों में बंट जाती है. संयुक्त संपत्ति के मामले में भी ‘कौमोरिएंट नियम’ के कारण जीवित रहने का अधिकार लागू नहीं होता और संपत्ति बच्चों को मिलती है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में मिलती है. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई उत्तराधिकारी नहीं हैं संपत्ति महिला के माता पिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है.

जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है, तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. हिंदू पुरुषों के मामलो में जब किसी हिंदू पुरुष की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति उस की पत्नी, बच्चों और मां के बीच बराबरबराबर बांट दी जाती है. अगर इन में से कोई भी उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति पिता को मिल जाती है.

वरासत में कौन होते है उत्तराधिकारी :

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानि क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता, और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे पोतेपोतियां व विधवा शामिल हैं. यह सभी एक साथ संपत्ति के हकदार होते हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानि क्लास 2 के उत्तराधिकारियो में वह रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची, मामा मामी और इन के बच्चे भतीजे भतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाई बहन, माता के भाई बहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों, तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के कोई उत्तराधिकारी न हों, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुष वंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों, तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश पुरुष या महिला से जुड़े होते हैं. इन में मौसी, मामा, ममेरे भाई बहन शामिल होते हैं. अगर यह भी न हों, तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए वरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है. इसलिए यह जरूरी होता है कि लोग अपनी वसीयत कर के रखे जिस से उन के चाहने वालों को संपत्ति मिल सके. Succession Law :

SC on Gambling Game : भारत अजीब देश है- सुप्रीम कोर्ट

SC on Gambling Game : एक कहावत है कि जुआ किसी का न हुआ. जुआ सिर्फ उसी का हुआ जिस ने जुआरियों को जुआ खेलने की जगह दी. भारत में जुए की परंपरा रही है. पहले चार लोग किसी कोने में बैठ कर जुआ खेलते थे. जुए में कुछ लोग जीतते थे कुछ बर्बाद होते थे. आज औनलाइन का जमाना है. जुआ खेलने का तरीका बदला है लेकिन जुए के प्रति जूनून नहीं बदला.

आज पूरी दुनिया में औनलाइन गेमिंग के चक्कर में बहुत से लोग बर्बाद हो रहे हैं. इस के उलट बहुत से लोग और कंपनियां जो जुआरियों को औनलाइन जुआ खेलने का प्लेटफार्म मुहैया करवा रही हैं वो मालामाल हो रही हैं. जुए के इस मार्किट को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने अगस्त 2025 में औनलाइन गेमिंग को रोकने के लिए क़ानून बनाया जिस से औनलाइन गेमिंग से जुड़े बहुत से लोग और कम्पनियां रातों रात बर्बाद हो गईं.

“प्रमोशन एंड रेगुलेशन औफ औनलाइन गेमिंग एक्ट, 2025” यह कानून “औनलाइन मनी गेम्स” रियल मनी वाले गेम्स जैसे फैंटेसी स्पोर्ट्स, ई-स्पोर्ट्स और ऐसे गेम्स को प्रमोट करने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए बना है.

इस क़ानून के खिलाफ एक व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दी. इस आदमी का कहना है कि यह क़ानून स्किल बेस्ड गेम्स पर भी रोक लगाता है जो कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है. याचिका दाखिल करने वाला आदमी औनलाइन टूर्नामेंट्स से रुपए कमाता था और अपना ऐप लौन्च करने वाला था. इस क़ानून के बनने से उस की जिंदगी तबाह हो गई.

4 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “India is a strange country. You are a player, you want to play, and it’s your only source of income…” भारत एक अजीब देश है. आप खिलाड़ी हैं, खेलना चाहते हैं यहां तक तो ठीक हैं लेकिन क्या यही आप की एकमात्र आजीविका है यह बहुत अजीब है.

औनलाइन गेमिंग को रोकने का कानून अगस्त 2025 में पारित हुआ. तब से भारत के अलग अलग राज्यों के हाई कोर्ट में इस क़ानून के खिलाफ ढेरों याचिकायें दाखिल कि गईं. इसी को लेकर दिल्ली, कर्नाटक व मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर किया ताकि विरोधाभासी फैसले न हों. याचिकाकर्ताओं में कुछ कंपनियां भी शामिल हैं जो कहती हैं कि इस क़ानून से उन का कारोबार ठप हो गया है और लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं. SC on Gambling Game 

Pandit Nain Singh Rawat : भारत के मारको पोलो, पंडित नयन सिंह रावत

Pandit Nain Singh Rawat : 13वीं सदी के इब्ने बतुता ने अरब से चीन तक की लम्बी यात्राएं की थीं. 13वीं सदी के ही यूरोपियन यात्री मारको पोलो भी सिल्क रूट के सहारे चीन तक पहुंचे थे. इन दोनों यात्रियों को दुनिया जानती है लेकिन भारत के पंडित नैन सिंह रावत के बारे में ज्यादा कुछ लिखापढ़ा नहीं जाता. पंडित नैन सिंह रावत वो शख्शियत हैँ जिन्होंने 19वीं शताब्दी में बिना किसी आधुनिक उपकरण की मदद के पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार कर लिया था.

नयन सिंह रावत के इस काम के लिए अंग्रेजी हुकुमत से उन्हें सर्वेक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाले सब से ऊंचा सम्मान ‘पेट्रोन गोल्ड मैडल’ मिला था. यह पुरस्कार पाने वाले नैन सिंह इकलौते भारतीय हैं.

अंगरेजों के लिए पहाड़ों के बीच बसे तिब्बत का नक्शा बनाना कठिन था. उन्हें एक ऐसे पहाड़ी आदमी की तलाश थी जो पहाड़ों पर मीलों लम्बी दूरी तय कर तिब्बत की सीमा को माप सके. उत्तराखंड के एक गांव के रहने वाले नयन सिंह रावत को पहाड़ों पर लम्बी दूरी तय करने का अच्छा खासा अनुभव था. अंग्रेजों ने नयन सिंह को इस महत्वपूर्ण काम के लिए चुना. आज से डेढ़ सौ साल पहले वह भारत की सुदूर सीमा से लगे एक गांव से, तिब्बत की ओर निकले. नयन सिंह का काम था तिब्बत का नक्शा बनाना, लेकिन कोई उपकरण तो था नहीं इसलिए उन्होंने एक कमाल का रास्ता निकाला.

पंडित नैन सिंह के हाथों में एक माला रहती थी. यूं तो माला में 108 मनके होते हैं, लेकिन इस माला में 100 मनके थे और 100वां मनका बाकी मनकों से कुछ बड़ा था. हर 100 कदम चलने पर एक मनका वह खिसका देते थे और इस तरह 100 मनकों पर 10 हजार क़दमों की दूरी तय हो जाती थी. 10 हजार कदम यानी ठीक 5 मील. अब हर कदम बराबर हो ये जरूरी तो नहीं, इसलिए पंडित नैन सिंह अपने पैरों के बीच एक रस्सी बांधते थे और कुछ इस तरह चलते थे कि एक कदम ठीक 31.5 इंच का हो और ऐसा करते हुए उन्हें सिर्फ सपाट रास्तों पर ही नहीं बल्कि तिब्बत के पठारों और उबड़ खाबड़ दर्रों पर भी चलना था. ऐसा करते हुए पंडित नैन सिंह 31 लाख 60 हजार कदम चले और एकएक कदम का हिसाब रखा.

21 अक्टूबर 1830 को उत्तराखंड के भटकुरा नाम के गांव में जन्मे पंडित नैन सिंह रावत ने अपने जीवन काल में 6 यात्राएं कीं, जिन की कुल लम्बाई 42 हजार किलोमीटर थी. इन यात्राओं में उन्होंने लद्दाख से ल्हासा का नक्शा बनाया. ल्हासा की ऊंचाई नापने वाले वो पहले व्यक्ति थे. इस के अलावा तारों की स्थिति देख कर उन्होंने ल्हासा के लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड की भी गणना की, जो आज की आधुनिक मशीनों से की गई गणना के बहुत करीब है. सांगपो नदी के किनारे 800 किलोमीटर चलते हुए उन्होंने पता लगाया कि सांगपो और ब्रहमपुत्र एक ही हैं. नैन सिंह ने सतलज और सिन्धु के उद्गम भी खोजे. 16 साल तक घर नहीं लौटने पर लोगों ने उन्हें मृत तक मान लिया था, लेकिन पत्नी को विश्वास था कि वह लौटेंगे. वह हर साल उनके लिए ऊन कातकर एक कोट व पैजामा बनाती थीं. जब 16 साल बाद वह वापस लौटे, तो पत्नी ने उन्हें एक साथ 16 कोट व पैजामे भेंट किए. Pandit Nain Singh Rawat :

Relationship Issues : रिलेशनशिप में अजीब वो

Relationship Issues : रिलेशनशिप के बारे में जहां औरतें औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों हमारे समाज में कोई जगह नहीं. समाज ऐसे रिश्तों को बर्दास्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मज़ाक उड़ाने वाली ढेरों फिल्में बनी लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिललताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फिल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

दो दिलों के बीच तीसरे की घुसपैठ कोई नई बात नहीं है. साहित्य और सिनेमा के लिए यह मुद्दा सब से रोमांचक रहा है. दिल टूटने वाले गाने, बेवफाई के तराने, तीसरे के लिए ठुकराए जाने का गम, किसी तीसरे के आने से आंसुओं से भरे नग्मे और वापस लौट के आने की फरियादें. तीसरे के आने के वियोग पर पूरी म्यूजिक इंडस्ट्री ख़डी हुई है. गायक लेखक और अदाकार पैदा हुए. इसी वियोग को भुनाने के लिए कभी बौलीवुड का पूरा बिजनेस चला करता था लेकिन अब समय थोड़ा बदल गया है. लड़कियां पहले से ताकतवर हुई हैं. अब अगर उस के रिलेशनशिप के बीच कोई तीसरा आ भी जाता है तो वह वियोग में तड़पती नहीं बल्कि ऐसे रिश्ते को खुद से ठुकरा कर आगे बढ़ जाती है और खुद किसी नये रिश्ते में चली जाती है. ऐसे में लड़के भी अब जुदाई के गीत नहीं गाते, दिल चीर कर प्रेमिका का नाम नहीं लिखते, खून से खत नहीं लिखते और रात रात भर जग कर माशूका की याद में शराब नहीं पीते बल्कि गुलाब का फूल ले कर अगले इश्क का इंतजार करते हैं.

शादीशुदा लोगों के बीच अगर तीसरा आ जाए तो भी अब पहले जैसा गम नहीं होता इसलिए तलाक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. यह पहले से बेहतर स्थिति है. तलाक के बढ़ते ट्रेंड का सब से ज्यादा फायदा औरतों को ही है. औरतें सक्षम हुई हैं तो वह पति की ज़्यादती सहने को तैयार नहीं हैं. तलाक के बढ़ते मामलों में एक सब से बड़ी वजह दोनों के बीच तीसरे की घुसपैठ ही है. शादीशुदा औरत का एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर मर्द बर्दाश्त नहीं कर पाते तो औरतें भी अब पहले की तरह अबला नारी नहीं रह गई हैं जब पति घर में दूसरी ले आता था और औरत कुछ नहीं बोल पाती थी. अब पति के एकस्ट्रा मेरिटल को भी औरतें बर्दाश्त नहीं कर पाती और मामला तलाक तक पहुंच जाता है. पत्नी के पुरुष दोस्तों को पति बर्दाश्त नहीं करता तो पति की महिला मित्र, पत्नी के लिए हमेशा संभावित सौतन ही ही होती हैं. कई बार मामला थोड़ा पेचीदा भी हो जाता है जब यह तीसरा या तीसरी क्या है, यही समझ नहीं आए.

श्वेता गुप्ता अपने पति के साथ लखनऊ के आलमबाग में रहती थी. श्वेता के पति राकेश गुप्ता की मार्किट में हार्डवेयर की शौप थी. शादी को अभी दो साल ही हुए थे दोनों के कोई बच्चा नहीं हुआ था. श्वेता अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी. एक दिन श्वेता के घर उस की सहेली पूनम आ गई. पूनम को लखनऊ के एक पैरा मेडिकल इंस्टिट्यूट से 6 महीना का कोर्स करना था इसलिए वो लखनऊ आ गई. उस ने श्वेता से सम्पर्क किया ताकि वह पीजी ढूंढने में उस की मदद कर सके. श्वेता ने अपने पति राकेश से बात की और पूनम को अपने घर में ही रहने की जगह दे दी.

दोनों स्कूल के वक़्त की सहेलियां थी इसलिए राकेश को भी इस बात में कोई बुराई नहीं नजर आई. कुछ महीने बीते. राकेश को अपने और श्वेता के बीच दूरियां बढ़ती हुई नजर आईं. श्वेता और पूनम सिर्फ दोस्त नहीं थी दोनों के बीच दोस्ती से ज्यादा भी कुछ था. राकेश को यह सब अच्छा नहीं लगा तो वह पूनम को पीजी में भेजनें की बात करता तो उस की पत्नी श्वेता इस बात पर नाराज हो जाती. एक रात राकेश को श्वेता और पूनम के रिश्ते की असलियत पता चल गई. दोनों सिर्फ सहेलियां नहीं थी बल्कि एक दूसरे की जान थी. राकेश के लिए यह बेहद चौंकाने वाली बात थी. दो औरतें कैसे एक दूसरे के साथ इंटिमेट हो सकती हैं? राकेश को तो यह बात सोच कर ही घिन आती थी.

राकेश ने श्वेता से सख़्ती से कह दिया की अब पूनम इस घर में नहीं रह सकती. राकेश के गुस्से को देखते हुए श्वेता ने पूनम को घर से विदा कर दिया और कुछ दिनों बाद खुद भी लखनऊ से गायब हो गई. राकेश ने थाने में अपनी बीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई और एफ आई आर में पूनम का भी नाम दर्ज करवाया. पुलिस ने पूनम के इंस्टिट्यूट में पता किया तो वह भी गायब थी. कुछ दिनों बाद राकेश के वाट्सअप पर वीडियो आया की श्वेता और पूनम ने चार दोस्तों के साथ हिंदू विवाह का मंडप किसी के घर बना कर, एक कुंड में आग जला कर और एक दोस्त को पंडित की वेशभूषा पहना कर शादी कर ली और दोनों अब ख़ुश हैं.

राकेश के लिए यह सदमे से कम नहीं था. उस के लिए सब से बड़ी हैरानी की बात यह थी कि वह इतने दिन एक लेस्बियन औरत के साथ रह रहा था.

किसी भी जेंडर के दो लोग अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं. ऐसे मामलों में पुलिस और क़ानून भी कुछ नहीं कर सकते.

तबस्सुम के घर उस के पति का दोस्त फैजान अकसर आता जाता. फैजान पड़ोस में ही रहता था और तबस्सुम के हजबैंड के साथ एयरपोर्ट पर नाइट शिफ्ट में काम करता था. तबस्सुम ब्यूटी पार्लर चलाती थी. उस के पति शादाब दिन में जब भी घर में रहते तो फैजान भी घर आ जाता. दोनों दोस्त शाम तक घर में रहते. सिलसिला कई महीनो तक यूँही चलता रहा. तबस्सुम को फैजान का घर पर रहना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन अपने पति का सब से करीबी दोस्त होने की वजह से वह फैजान को बर्दाश्त करती थी. फैजान की ड्यूटी दिन की हो गई तो अब वह रात को घर पर रहने लगा. तबस्सुम थोड़ी हैरान थी कि उस का पति उसे कैसे अपने दोस्त के साथ अकेले छोड़ कर चला जाता है. ज्यादा हैरानी यह थी फैजान हमेशा अदब से पेश आता और एक दो बार तबुस्सम ने फ्लर्टिंग करने की कोशिश की तो वह कन्नी काट गया. वह इस बात से बेहद खुश थी लेकिन उस की यह ख़ुशी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई. एक रात फैजान घर आया तो तबस्सुम को मालूम चला की फैजान ने भी अपनी ड्यूटी दिन की करवा ली है. फैजान ने शादाब को घर का ऊपर वाला कमरा रहने को दे दिया. अब रात को खाना खाने के बाद फैजान अपने दोस्त के पास चला जाता और देर रात तक वहीं पड़ा रहता. तबस्सुम को शक हुआ तो एक रात उस ने चुपके से फैजान और शाहिद के बीच के रिश्ते की गहराई को अपनी आंखों से देख लिया. नीचे आ कर उस ने उल्टियां की और अगली सुबह ही अपने मायके के लिए निकल गई. तबस्सुम किसी से बता भी नहीं पा रही थी की उस के पति का किसी मर्द से जिस्मानी संबंध है. आखिरकार उस ने अपने पति से तलाक ले लिया.

इस तरह के रिलेशनशिप के बारे में जहां औरतें औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों हमारे समाज में कोई जगह नहीं. समाज ऐसे रिश्तों को बर्दास्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मज़ाक उडाने वाली ढेरों फिल्में बनी लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिललताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फ़िल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

ऐसे ही रिश्तों पर मनोज बाजपेयी की सब से चर्चित फिल्म अलीगढ़ है. जिस में वे एक गे प्रोफैसर का किरदार निभाते हैं. यह फिल्म अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास की सच्ची कहानी पर आधारित है. श्रीनिवास को उन की सैक्शुअल ओरिएंटेशन की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था.

प्रोफैसर सिरास (मनोज बाजपेयी) एक शांत और विद्वान व्यक्ति हैं, जो अपनी निजी जिंदगी में समलैंगिक रिश्ते में होते हैं. एक स्टिंग औपरेशन के बाद उन की प्राइवेसी उजागर हो जाती है, जिस से उन्हें सामाजिक और संस्थागत उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. राजकुमार राव एक पत्रकार की भूमिका में हैं जो प्रोफैसर सिराज की कहानी को उजागर करने की कोशिश करते हैं.

मनोज बाजपेयी को इस रोल के लिए खूब सराहना मिली. उन्होंने प्रोफैसर की नरमी, अकेलापन और मजबूती को इतनी बारीकी से निभाया कि फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला. ये फिल्म समलैंगिकता पर एक संवेदनशील नजरिया पेश करती है.

समलैंगिक औरतों को लेस्बियन और ऐसे पुरुषों को गे कहा जाता है. सदियों से समलैंगिकता को बुराई माना जाता रहा. कई देशों में समलैंगिकता का पता चलने पर लोगों को मार दिया जाता था लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान, विज्ञान और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से इसे स्वाभाविक और सामान्य माना जाता है. यह एक व्यक्ति की यौनाचार स्थिति (सैक्सुअल ओरियंटेशन) का हिस्सा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक संगठन इस कंडीशन को सामान्य स्थिति मानते हैं. यही वजह है की दुनिया के ज्यादातर देशों में समलैंगिकता गैरकानूनी नहीं है पर इसे सामाजिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली है.

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में धारा 377 को निरस्त कर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया. यह कानूनी स्वीकृति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ लेकिन समाज में आज भी ऐसे रिश्तों के लिए कोई जगह नहीं है हालांकि नई जेनरेशन के बीच समलैंगिकता को ले कर स्वीकृति धीरेधीरे बढ़ रही है. यूरोप अमेरिका में कैथोलिक चर्चों के पादरियों में यह बुरी तरह से फैला हुआ है क्योंकि वे शादी प्रेम या चर्च के नियमों के कारण सैक्स नहीं कर सकते.

समलैंगिकता एक सामान्य स्थिति है लेकिन यह स्थिति जनसंख्या अनुपात में बेहद कम लोगों में होती है. विभिन्न वैश्विक सर्वेक्षणों के आधार पर, विश्व स्तर पर समलैंगिक (गे/लेस्बियन) लोगों का प्रतिशत लगभग 2-4% है. यदि LGBTQ+ (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर आदि) को शामिल करें तो यह 5-9% तक हो सकता है.

सामाजिक धारणाएं, धर्म और परम्पराएं हमेशा बहुसंख्यक का समर्थन करती हैं और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती हैं लेकिन कंस्टीटूशन सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा देता है इसलिए नागरिकों की उन्नति के लिए कंस्टीटूशन का मजबूत होना बेहद जरुरी है. किसी के सेक्सुअल बिहेवियर या सैक्सुअल इंट्रेस्ट के आधार पर उससे भेदभाव या नफरत करना जायज नहीं है. कोई किसी भी जेंडर, नस्ल, जाती या धर्म से हो हर व्यक्ति को सम्मान और स्वतंत्रता का अधिकार मिलना चाहिए. समलैंगिक अपने सामान्य व्यवहार में दूसरों की तरह के ही दिखते हैं और समाज को उनसे कोई परेशानी नहीं होती पर पंडित पादरी चिढ़ते हैं क्योंकि इन संबंधों से उन की रोजी रोटी मारी जाती है. खुद करते हों तो ठीक है पर भक्त करें तो उन का बस चले तो फांसी पर चढ़ा दें. Relationship Issues :

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