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Parental Neglect : मातापिता की अनदेखी और नशे में डूबते बच्चे

Parental Neglect : नशे का व्यापार सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नरसंहार है. वह नरसंहार जो धीरेधीरे, चुपचाप, बिना गोली या बम के आज हमारे बच्चों की नसों में उतारा जा रहा है. यह चुपचाप, धीरेधीरे हमारे घरों, गलियों और स्कूलों में फैलता हुआ बच्चों की नसों में उतर रहा है. इस की भयावहता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस में मरने वाला शरीर नहीं, पूरा समाज होता है.

मयंक का बस्ता साफ करते समय उस की एक किताब से जब गुटके की खाली पन्नी निकल कर जमीन पर गिरी तो सोनाली का दिल धक्क से रह गया. अभी मयंक सिर्फ 11 साल का है और पांचवी कक्षा में पढ़ रहा है, उस के बस्ते में गुटका कैसे आया? सोचसोच कर सोनाली का सिर दुखने लगा.

मयंक उस वक्त अपने दोस्तों के साथ पार्क में क्रिकेट खेल रहा था. सोनाली का मन हुआ कि अभी बुला कर पूछे. फिर रुक गई. सोचा, इस के पापा को बताएगी. मगर शाम के बाद रात भी बीत गई, वो उन को बता नहीं पाई. क्योंकि जानती थी कि पति भी सारी की सारी तोहमत उस पर ही मढ़ देंगे. बच्चे के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझेंगे. ”तुम बच्चे की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रही हो. तुम सारा दिन घर में करती क्या रहती हो? बच्चे की हरकतों पर नजर क्यों नहीं रख पाती? तुम ने इस को सिर पर चढ़ा रखा है. तुम देखती ही नहीं कि यह किन बच्चों के साथ खेलता है?” आदिआदि जहरबुझी बातों से वे परेशानी के समाधान की जगह नई परेशानी खड़ी कर देंगे.

दूसरे दिन जब मयंक घर लौटा और बस्ता रख कर खेलने के लिए निकला तो सोनाली ने सारी किताबें उस के बस्ते से निकाल कर खंगाल डालीं. बस्ते के अंदर वाली पौकेट से गुटके की एक पुड़िया फिर निकली, जो आधी भरी हुई थी. कल सोनाली ने यह सोच कर मन को शांत किया था कि हो सकता है उस ने चमकदार पन्नी खाली पड़ी देख कर किताब के बीच रख ली हो, मगर आज तो नया पैकेट है और वह भी आधा भरा हुआ. अब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है.

मयंक खेल कर घर लौटा तो गुस्से से भरी बैठी सोनाली ने पुड़िया दिखा कर उस से पूछना शुरू किया. मयंक का चेहरा सफेद पड़ गया. पहले तो उस ने साफ इंकार कर दिया कि उसे नहीं पता ये क्या है. फिर जब चेहरे पर मां का एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा तो आंखों से झरझर बहते आंसुओं के बीच उस ने सारी बातें उगल दीं. स्कूल में उस की दोस्ती 8वीं में पढ़ने वाले दो लड़कों से है जो उस को अपने साथ क्रिकेट खिलाते हैं. स्कूल के पीछे वाले मैदान की बाउंड्रीवाल एक जगह से टूटी हुई है. उस टूटे स्थान से वे दोनों लड़के मयंक को बाहर भेज कर सामने की गुमटी से गुटका मंगवाते हैं. खुद भी खाते हैं और मयंक को भी चखाते हैं. कभीकभी मयंक अपनी पौकेटमनी से खुद भी खरीदता है.

बेटे की बातें सुन कर सोनाली सकते में आ गई. जाने कब से खा रहा है? गुटका खा कर इस की तबियत नहीं बिगड़ी? चक्कर नहीं आया? यह तो तंबाकू है. उस ने पूछा तो मयंक ने बताया कि जब पहली बार उस ने जरा सा खाया था तो उस को बड़ी जोर से चक्कर आने लगा था. वह गिर गया था. तब उन दोनों लड़कों ने ही उस को संभाला था और छुट्टी में घर तक छोड़ कर गए थे. मगर अब इस को खाने से वह काफी शक्तिशाली महसूस करता है. उस को खेलने में मजा आता है. थकान नहीं लगती. मस्ती लगती है.

मयंक ने बताया कि वह छह महीने से खा रहा है. बेटे की सारी बातें सुन कर सोनाली हतप्रभ सी हो गई. पता नहीं स्कूल के कितने बच्चों को तंबाकू की लत है? उस के मयंक जैसे न जाने कितने बच्चे होंगे जो अनजाने में ही इस के लती हो गए होंगे. स्कूल को बच्चों की चिंता ही नहीं है. ऐसी गुमटियां स्कूल के आसपास होती ही क्यों हैं? सोनाली ने तय किया कि वह कल ही स्कूल की प्रिंसिपल से मिल कर यह बात उठाएगी.

ये कोई काल्पनिक किस्सा नहीं है. भारत के 10 बड़े शहरों में किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि बच्चे बहुत कम उम्र में ही ड्रग्स डीलर्स के चंगुल में फंस कर ड्रग्स का सेवन शुरू कर रहे हैं. इस सर्वे के मुताबिक, बच्चे औसतन 12.9 साल की उम्र में पहली बार किसी नशीले पदार्थ को हाथ लगाते हैं, और कुछ तो 11 साल के भी पाए गए हैं. ‘नैशनल मैडिकल जर्नल औफ इंडिया’ में छपी सर्वे रिपोर्ट कहती है कि हर सात में से एक स्कूल जाने वाले बच्चे ने कभी न कभी कोई साइकोएक्टिव पदार्थ इस्तेमाल किया है.

इस सर्वे में करीब 14.7 साल के 5,920 छात्रों से जानकारी हासिल की गई है. यह सर्वे दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़, हैदराबाद, इम्फाल, जम्मू, डिब्रूगढ़ और रांची शहरों में हुआ है. सर्वे में पाया गया कि 15.1 फीसदी छात्रों ने कभी न कभी कोई नशीला पदार्थ इस्तेमाल किया है. वहीं, पिछले एक साल में 10.3 फीसदी और पिछले महीने में 7.2 फीसदी छात्रों ने नशीले पदार्थों का इस्तेमाल किया है.

चार फीसदी तंबाकू और 3.8 फीसदी शराब के बाद सब से ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पदार्थों में ओपिओइड्स (2.8%), भांग (2%) और इनहेलेंट्स (1.9%) शामिल हैं. खास बात यह है कि ओपिओइड्स का ज्यादातर इस्तेमाल बिना डाक्टर की पर्ची के मिलने वाली दवाइयों के रूप में हुआ है. गौरतलब है कि यह सर्वे इन शहरों के बड़े और नामी स्कूलों में किए गए हैं, ऐसे में छोटे शहरों, जिलों या कस्बों में छोटेबड़े सरकारी या प्राइवेट स्कूलों के बच्चों पर मंडरा रहे ड्रग्स के खतरे को समझा जा सकता है जहां स्कूलों की दीवारों से सटी गुमटियां और चाय के ठेले खड़े होते हैं.

हालिया सर्वे का नेतृत्व डा. अंजू धवन ने किया था जो एम्स दिल्ली के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर की प्रमुख हैं. उन के साथ चंडीगढ़, डिब्रूगढ़, लखनऊ, बेंगलुरु, श्रीनगर, इम्फाल, मुंबई, हैदराबाद और रांची के मेडिकल कालेजों के डाक्टर भी शामिल थे. इन की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसेजैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, वैसेवैसे नशे का इस्तेमाल भी बढ़ता जाता है. डाक्टर्स ने पाया है कि 11वीं-12वीं क्लास के बच्चे 8वीं क्लास के बच्चों की तुलना में दोगुने नशीले पदार्थ इस्तेमाल करते हैं. लड़कों में तंबाकू और भांग का इस्तेमाल ज्यादा पाया गया, जबकि लड़कियों में इनहेलेंट्स और बिना पर्ची वाली ओपिओइड दवाइयों का इस्तेमाल ज्यादा देखा जा रहा है. आधे से ज्यादा बच्चों ने कहा कि अगर उन से पूछा जाए तो वे नशे के इस्तेमाल को छिपाएंगे. इस से यह पता चलता है कि असल में नशे का इस्तेमाल करने वाले बच्चों की संख्या इस से कहीं ज्यादा हो सकती है.

सर्वे में नशे के इस्तेमाल और मानसिक परेशानी के बीच एक सीधा संबंध पाया गया है. जो बच्चे पिछले साल नशीले पदार्थ इस्तेमाल कर रहे थे, उन में से 31 फीसदी बच्चों में मानसिक परेशानी के लक्षण ज्यादा पाए गए हैं. खासकर व्यवहार संबंधी समस्याएं, अतिसक्रियता और भावनात्मक लक्षण इन बच्चों में ज्यादा देखे गए हैं.

बच्चों का इतनी कम उम्र में नशे की ओर बढ़ना एक गंभीर चेतावनी है. सड़क किनारे गुमटियों में आसानी से नशीले पदार्थ मिल जाना और बच्चों की भावनात्मक परेशानियों पर ध्यान न देना, उन्हें इन चीजों की ओर धकेल रहा है. खासकर किशोरावस्था में जब दिमाग बहुत नाजुक होता है, इनहेलेंट्स, ओपिओइड्स और भांग जैसी चीजें बच्चों के दिमाग को बहुत नुकसान पहुंचा रही हैं.

ड्रग्स और तंबाकू बेचने वाले लोगों को अपना धंधा बढ़ाने के लिए स्कूलकालेज के बच्चों को बहकाना और उन्हें नशे का लती बनाना आसान है. स्कूल के बड़े लड़के अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ये लत लगाते हैं. वे अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ‘कूल दिखने’, ‘बड़े बनने’ या ‘दोस्ती निभाने’ के बहाने नशा ट्राय करने को उकसाते हैं. उन से पुड़िया मंगवाई जाती है ताकि किसी को शक न हो फिर धीरेधीरे ‘मजे’ के नाम पर शुरू की गई यह आदत लत का रूप ले लेती है, और फिर वही बच्चे इस काले कारोबार की अनौपचारिक सप्लाई चेन बन जाते हैं.

भले सड़क किनारे की गुमटियों पर बड़ेबड़े अक्षरों में यह लिखा दिखाई दे कि 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को गुटका बेचना अपराध है, कागज़ों और कानूनों में भले ही लिखा है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को तंबाकू बेचना अपराध है, पर जमीनी हकीकत यह है कि हर गलीमहल्ले की पान गुमटी और चाय की दुकान इन नियमों का निर्भीक उल्लंघन कर रही हैं. गलीनुक्कड़ की दुकानें तो बाकायदा नशे की छोटीछोटी खिड़कियां बन चुकी हैं. पुलिस कार्रवाई छिटपुट होती है और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत इतनी गहरी है कि कोई स्थाई बदलाव दिखाई नहीं देता है.

पान की गुमटियों और चाय की दुकानों पर रजनीगंधा, दिलबर, तांबा कुथार, मंगलम, किंग, शुद्ध प्लस, मिस्टर राइट, सम्राट, चमन बहार, तिरंगा पान मसाला, शान पान मसाला, गोवा, पर्ल, प्रताप, वी-वन, राजू गुटखा, तुलसी गुटखा, दाना पान मसाला व गुटखा, पायल गुटखा, हंसा गुटखा, दिलबहार गुटखा, कमला पसंद, सरदार गुटखा, शिकारी गुटखा, पायल गोल्ड, जोधपुर गुटखा, नेवी कट, तम्बाकू राजा, रेड गोल्ड, सुपर 5000, किंग सुप्रीम, दिल्ली स्पेशल, रौयल गुटखा और मेघापान मसाला के नाम से बिकने वाली रंगबिरंगी पन्नियों में भरा नशे का सामान खरीदने वाले नन्हे हाथों की संख्या बहुत ज्यादा है.

मजदूर वर्ग के नन्हेनन्हे बच्चे जो अभी साफ बोलना भी नहीं सीख पाए हैं, अपनी नन्ही उंगलियों में पांच या दस का सिक्का दबाए अपने मांबाप या बड़े भाई चाचामामा के लिए इन गुमटियों से तंबाकू खरीदते दिखाई देते हैं. जरा उम्र बढ़ी तो यही गुटका उन के अपने मुंह में होता है. यानी पहले यह किसी बड़े के लिए खरीदी जाती है, फिर उत्सुकता में एक चुटकी खुद चख ली जाती है, और धीरेधीरे लती बनने की यात्रा शुरू हो जाती है. गरीबी, अभाव और अनदेखी इन बच्चों को और अधिक असुरक्षित बनाती है. जब पेट खाली हो, स्कूल दूर हो और घर में कोई देखभाल करने वाला न हो, तब नशे की दुनिया उन्हें अपने चंगुल में लेने में देर नहीं लगाती.

नशे का व्यापार सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नरसंहार है. वह नरसंहार जो धीरेधीरे, चुपचाप, बिना गोली या बम के हमारे बच्चों की नसों में उतारा जा रहा है. यह चुपचाप, धीरेधीरे हमारे घरों, गलियों और स्कूलों में फैलता हुआ बच्चों की नसों में उतर रहा है. इस की भयावहता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस में मरने वाला शरीर नहीं, पूरा समाज होता है. और यह कड़वी सच्चाई भी हमें स्वीकार करनी होगी कि इस विनाशक चक्र में सब से बड़ी जिम्मेदारी आज के मातापिता पर ही आती है, जो या तो अनजाने में या लापरवाही में अपने बच्चों को इस दलदल की ओर धकेल रहे हैं.

आज के बच्चे एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां नशे का कारोबारियों ने स्कूलों और कालेजों को अपने लिए सब से उपजाऊ बाजार बना लिया है. बड़ी कक्षाओं के छात्र छोटे बच्चों को बहलाकर इस लत में धकेलते हैं, और खुद भी उसी जाल में फंसते जाते हैं. यह अपराध सिर्फ गलीकूचों की दुकानों तक सीमित नहीं; यह एक सुनियोजित रणनीति है जहां किशोरवय को सब से आसान शिकार माना गया है. एक से दूसरे को और फिर चौथेपांचवे तक कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है. दुःख की बात यह है कि इस पूरे खेल का पता मातापिता को सब से अंत में चलता है जब उन का बच्चा मानसिक या शारीरिक रूप से बीमार दिखने लगता है. आखिर अपने बच्चे के स्वास्थ्य और व्यवहार में बदलाव को मातापिता समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाते हैं?

दरअसल आज के मांबाप आर्थिक दौड़ में इतने उलझे हुए हैं कि उन के पास बच्चे के साथ बैठकर दो घड़ी बात करने तक का समय नहीं है. घरों में बातचीत की जगह स्क्रीन ने ले ली है, और संस्कार की जगह ‘कंटेंट’ ने. बच्चे बाहर क्या सीख रहे हैं, किस के साथ उठबैठ रहे हैं, कौन उन के दोस्त हैं? वह किस किस दोस्त के घर जा रहा है? किस के साथ खातापीता है? कौन उन के मन पर असर डाल रहा है, इन सवालों के कोई जवाब उन के पास नहीं हैं क्योंकि इस ओर उन की दृष्टि ही नहीं जा रही है.

मां-बाप की व्यस्तता

नौकरीपेशा मातापिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता है. अधिकांश तो अपने बच्चों के स्कूलों में होने वाली पैरेंटटीचर मीटिंग, एनुअल फंक्शन या स्पोर्ट्स-डे में भी नहीं जाते हैं. शाम को थकेहारे औफिस से लौटने वाले ज्यादातर कपल पूरी शाम अपने औफिस की टेंशन ही डिस्कस करते रहते हैं या घर के काम को ले कर आपस में झिकझिक करते दिखाई देते हैं. बच्चा अपने कमरे में बैठा क्या कर रहा है, किताबों में मुंह छिपाए क्या सोच रहा है, उस के पास अपने मातापिता से कहने के लिए कुछ है या नहीं, उस के स्कूल में आज क्या हुआ, उस के साथ किसी ने कोई गलत हरकत तो नहीं की, वह किसी तरह के तनाव में तो नहीं है, इन बातों को पूछनेजानने की फुर्सत मांबाप के पास नहीं है. ऐसे घरों के बच्चे जल्दी ही अराजक तत्वों के चंगुल में फंस जाते हैं.

बच्चों के दोस्तों की जानकारी नहीं

घर के आसपास, स्कूल में, जिम या स्टेडियम आदि में जहां भी बच्चे जा रहे हैं, वहां उन के दोस्त कौनकौन हैं, किस उम्र के हैं, किस तबके से हैं, इस की कोई जानकारी आजकल के मांबाप को नहीं होती है. चूंकि मांबाप को ये बातें जानने में इंटरेस्ट नहीं होता है तो बच्चा भी अपने दोस्तों के बारे में उन्हें कुछ नहीं बताता है.

देखा गया है कि जिन बच्चों की दोस्ती उन की उम्र से अधिक बड़े बच्चों के साथ होती है उन में से अधिकांश बच्चे नशे का शिकार हो जाते हैं. दोतीन दशक पहले तक परिवारों में बच्चे अपने दोस्तों को अपने जन्मदिन पर या त्योहारों आदि के अवसर पर बुलाया करते थे. मां को भी बच्चे के दोस्तों को अपने हाथ की बनी पूरीसब्जी, खीरहलवा खिला कर ख़ुशी मिलती थी. इस तरह मां की नजर उन सभी बच्चों पर रहती थी जो उस के बच्चे के दोस्त हैं. उन में किस का व्यवहार अच्छा है और किस का बुरा, यह मां एक नजर में जान लेती थी और बुरे लड़के से दूर रहने के लिए अपने बच्चे को हिदायत देती थी.

मगर आज के समय में लोग अपने बच्चों के जन्मदिन होटलोंरेस्त्रां में मनाने लगे हैं. जहां परिवार के कुछ सदस्य और मांबाप के कुछ नजदीकी दोस्तों को बुला कर केक कटिंग हो जाती है और बढ़िया डिनर दे कर मान लिया जाता है कि बच्चे ने भी एन्जौय किया होगा. बच्चे के चेहरे पर अपने लिए महंगे गिफ्ट देख कर भले कुछ समय के लिए मुस्कान आई हो पर सच पूछें तो भीतर से वह बिलकुल अकेला था क्योंकि उस पार्टी में उस का अपना ग्रुप तो था नहीं. मां को इतनी फुर्सत कहां कि घर पर उस के साथियों को बुला कर अच्छा खाना बना कर खिलाए. उस को तो बड़े होटल में बेटेबेटी की बर्थडे पार्टी मनाने की फोटो अपने फेसबुक पेज पर लगानी है. दिखावे की दुनिया में बच्चों की असली खुशी खो चुकी है.

बढ़ता स्क्रीन टाइम

तकनीक के विस्तार ने संबंधों को बर्बाद किया है. आज बड़ेछोटे सभी के हाथों में मोबाइल फोन है. मां अगर गृहणी है तो घर के काम निपटाने के बाद वह फोन पर रील देखने में व्यस्त है. बाप औफिस से लौट कर आने फोन में खोया हुआ है. बच्चों का बहुत सारा वक़्त स्क्रीन पर गुजर रहा है. सब के बीच एक गहरी चुप्पी पसरी हुई है. बच्चे अपनी एजुकेशन से जुड़ी सामग्री के अलावा फोन पर तमाम तरह के घटिया कंटेंट भी देख रहे हैं. समय से पहले व्यस्क हो रहे हैं और मांबाप को भनक तक नहीं लगती है.

अनेक बच्चे आज अपनी समस्याओं का समाधान चैटजीपीटी जैसी साइट्स पर ढूंढ रहे हैं. गूगल से पूछ रहे हैं. अवसाद में डूबे जा रहे हैं. फेसबुक के मकड़जाल में फंस कर नशे के सौदागरों तक पहुंच जाते हैं. एक कश…. दो कश…. के बाद जब उन की जिंदगी सचमुच धुंआ होने लगती है तब कहीं जा कर मातापिता को पता चलता है कि बच्चा नशे की गिरफ्त में है.

जरूरत से ज्यादा पौकेटमनी

दिखावा संस्कृति में डूबे मातापिता अपने बच्चों को पैसे का मूल्य नहीं समझा पाते हैं. जिन के पास पैसा है वे खुले हाथ से अपने बच्चों को पौकेटमनी देते हैं, साथ ही उन की आयदिन की ख्वाहिशें भी पूरी करते रहते हैं. जिन बच्चों की जेब में भरपूर पैसा होता है, वे नशे के कारोबारियों के जाल में जल्दी फंसते हैं. क्योंकि ऐसे ही बच्चे उन के धंधे को चार चांद लगाते हैं. इन बच्चों को वे अपनी सप्लाई चेन की कड़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं. ये इन के ड्रग पेडलर भी बनते हैं. जिन बच्चों को कभीकभार पौकेटमनी मिलती है या जरूरत भर का पैसा उन की जरूरत पूछ कर दिया जाता है, वे अपने पैसे का इस्तेमाल भी सोचसमझ कर करते हैं.

बच्चों को जिम्मेदार बनाना, अनुशासन देना, किसी गलत हरकत की समय से रोकथाम करना, ये सब मातापिता की प्राथमिक जिम्मेदारी है. लेकिन वर्तमान परिवार संरचना में यह जिम्मेदारी कहीं खोती जा रही है. समाज में संयुक्त परिवार अब ज्यादा बचे नहीं हैं, जहां दादादादी, बुआ या चाचा बच्चों पर नजर रखते थे. साथ खेलने के लिए चचेरे भाई बहनों की फौज होती थी.

सब एक दूसरे पर नजर रखते थे और साथ समय बिताते थे. अब एकल परिवार हो गए हैं. घर में एक या दो बच्चे अपने मांबाप के साथ हैं. और अगर मांबाप दोनों नौकरीपेशा हैं तो फिर अकेलेपन, उपेक्षा, तनाव, अपेक्षाओं का बोझ उठाए बच्चा जब दोस्ती और सहारे की तलाश में निकलता है तो अक्सर गलत हाथों में पड़ जाता है. Parental Neglect :

Religious Extremism : मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना

Religious Extremism : धर्म के नाम पर सड़कों पर भीड़ का तमाशा सिर्फ भारत में ही नहीं होता. धर्म के नाम पर पूरी दुनिया में ऐसे तमाशे होते हैं. 14 दिसंबर 2025 को औस्ट्रेलिया के सिडनी में यहूदी हनुक्का मना रहे थे. इस धार्मिक हुड़दंग के दौरान यहूदियों की भीड़ पर हमला हुआ. इस हमले में कम से कम 15-16 लोग मारे गए और 40 से ज्यादा घायल हुए. हमला करने वाले बापबेटे की जोड़ी थी. 50 साल का साजिद अकरम और उस का 24 साल का बेटा नवीद अकरम. दोनों गाजा का बदला लेने औस्ट्रेलिया पहुंचे थे. दोनों बापबेटों को जन्नत में सीट रिजर्वड करवानी थी सो उन्होंने यहूदियों को भून दिया. आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इस घटना को “एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलौजी” बताया.

एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलौजी का मतलब होता है यहूदी विरोधी भावना. 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उस के बाद इजरायल की कार्रवाई से आस्ट्रेलिया में एंटीसेमिटिक घटनाएं बढ़ीं. हमले से पहले बौन्डी इलाके में यहूदी बिल्डिंग्स पर हमले हुए. कोषर रेस्तरां में आगजनी और सिनेगाग पर फायरबौम्बिंग हुई.

हमलावरों के पास इसलामिक स्टेट के झंडे मिले. दोनों बापबेटे मिल कर दुनिया को इसलामिक स्टेट बनाने के रास्ते पर निकले थे. नवीद अकरम पहले से आस्ट्रेलियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस और्गेनाइजेशन की नजर में था लेकिन इंटेलिजेन्स से चूक हो गई और नतीजा यह हुआ की औस्ट्रेलिया में 1996 के बाद भय का ऐसा तांडव दूसरी बार देखा गया.

भारत के लिए भय का ऐसा तांडव कोई नई बात नहीं है. यहां धर्म के साथ जातियों का तांडव भी सनातन काल से जारी है. धर्म के नाम पर मौबलिंचिंग, जाती के नाम पर गांवों को फूंक देना आम बात है. बुलडोजर की दहशत अलग से पैदा हो गई है. यह सब आतंक के अलगअलग फ्लेवर हैं. भारत के दलित, ईसाई, आदिवासी और मुसलमान आतंक के इस फ्लेवर को रोज चखते हैं. वहीं पाकिस्तान के अहमदियों और ईसाईयों को इस आतंक की आदत सी हो गई है. आतंकवाद मजहबों की कोख से ही जन्मा है और पूरी दुनिया में आतंकवाद के अलगअलग बच्चे अपनेअपने तरीके से मौत का खेल खेल रहे हैं.

दुनिया में मजहबों के नाम पर बहुत तमाशा हुआ है और आज भी हो रहा है. कहने को मजहब सिखाता है हरामखोरी मत करो लेकिन दुनिया भर में सब से ज्यादा हरामखोरी और आरामखोरी मजहबों के नाम पर ही होती है. कहने को मजहब सिखाता है आपस में प्रेम रखना लेकिन यह भी कोरी बकवास बात है.
इंसानों के बीच सब से ज्यादा नफरत मजहब ही पैदा करता है. कहने को धर्म से शांति आती है लेकिन दुनिया के इतिहास में सब से ज्यादा अशांति धर्म ने ही फैलाई है. दुनिया भर में युद्ध, हिंसा, दंगे और अराजकता के पीछे मजहबों का बड़ा योगदान रहा है और आज भी तमाम मजहब अपने इस मिशन में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं.

यूरोप के इतिहास में यहूदियों के साथ ईसाईयों ने जुल्म ढाए. ईसाई और यहूदियों के बीच इस नफरत को बढ़ाने में चर्च ने बड़ी भूमिका अदा की. यहूदी ताकतवर हुए तो उन्होंने अपना मुल्क बना लिया और मुसलमानों पर जुल्म ढा कर अपनी कुंठा शांत कर ली. इतिहास में जब मुसलमानों का जोर था तो तलवार के दम पर पूरी दुनिया को फतह करने निकल पड़े थे लेकिन जब विज्ञान का दौर आया तब सारी हुकूमत चली गई. अब मुसलमानों के कुछ गिरोह तलवार की जगह आतंकवाद के रास्ते दुनिया फतह करने पर अमादा हैं.

धर्म और पूंजीवाद का चोली दामन का साथ हमेशा से रहा है इसलिए दोनों को ही इंसानियत की त्रासदी से कोई फर्क नहीं पड़ता. धर्म को बनाने और बेचने वाले जानते हैं की भक्तों की भीड़ से कैसे उल्लू सीधा किया जाता है? धर्म के नाम पर कोई भी मरे धर्म के धंधेबाजों को कोई फर्क नहीं पड़ता. धर्म के नाम पर लूटखसोट और हिंसा से धर्म को ऊर्जा मिलती है. इसी तरह हथियार बनाने और बेचने वाले जानते हैं कि उन के हथियार से इंसान ही शिकार बनेगा. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उन के हथियार कोई सरकार खरीदे या गिरोह. सरकार भी तो एक तरह का गिरोह ही है जो डैमोक्रेसी की आड़ में लूटखसोट और हिंसा करती है.

राहुल सांस्कृतयायन ने लिखा था ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ यह सफेद झूठ है और इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना? अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटीदाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों हैं? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा हैं ? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है? असल बात यह है कि ‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना, भाई को सिखाता है भाई का खून पीना’. Religious Extremism :

Hindi Family Story : सुख की छैयां – उदास रहने वाली लड़की की कहानी

Hindi Family Story : बेटे की कामयाबी ने आज मां मीरा की सुख को  तरसती आंखों में नमी ला दी. बहुत बड़ी कंपनी में अच्छा पैकेज. कितना असीम सुख होता है अपने बच्चे को कामयाबी की सीढ़ी चढ़ते देखना. मातापिता कितनी मिन्नतें करते  हैं. व्रतउपवास करते  हैं. रातों को पढ़ते  बेटे के साथ अपने ही कमरे में उनींदी से जागते हैं. शायद बेटे को चाय या कौफ़ी की ज़रूरत पड़ जाए या भूख ही लग जाए. पिता भी गर्वित होते हैं. एक संतुष्टि उन के ह्रदय को तृप्त कर देती है पिता का दायित्व  पूरा करने की, जीवन सफल होने की. मातापिता के जीवन की सफलता बेटे के जीवन के सुखदुख की आहट से बंध जाती है.

अभिन्न ने मां के भावपूर्ण चेहरे को देख कर कहा, “अरे मां, अब क्यों आंख में आंसूं? अब तो हमारी सारी परेशानियां ही ख़त्म हो गई  हैं.”

“नहीं बेटा, ये दुख के नहीं, ख़ुशी के आंसूं हैं. तुम ने भी बहुत दुख देखे हैं. हम तेरी छोटी ख्वाहिशें भी हम पूरा नहीं कर पाते थे. तेरे पापा की सीमित आय और पापा पर अपने भाईबहनों की ज़िम्मेदारी…”

“हां मां, ये पापा और आप दोनों के अच्छे कर्मों का फल है जो कुदरत ने मुझे आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचाया है. “अब मेरी प्यारी मां, एक बात सुन लो, आप को  और पापा को अब कोई काम करने नहीं दूंगा. बहुत हुआ काम. अब आराम से बैठ कर हुक्म चलाना.“

मांपिता संग आज अभिन्न भी भावी जीवन की ख़ुशियों का तानाबाना बुन रहा था. सुख की दस्तक ने जीवन में रंग भरने शुरू कर दिए थे.

छोटे से शहर श्यामली से आज मुंबई के 5 बैडरूम वाले फ्लैट में बैठे थे. बहू अनिका नये फ़र्नीचर और सजावट की चीजें क़रीने से सजाती मुसकरा रही थी.

“मां, शाम होने को आई, आप लोगों को चाय लगवा दूं?” अनिका ने प्यार से गले में बांहें डालते हुए कहा.

सुख की निर्झरिणी  अनिका  हमेशा मुसकराती रहती. अभिन्न की तरह ही उस का भी प्रयास रहता कि सासससुर को किसी भी चीज की परेशानी न हो.

“हां बेटा, बनवा दे, तू भी सुबह से काम में लगी है, अपनी चाय भी हमारे साथ आ कर पी ले.“

“ओके मम्मा.“

अपनी जौब में आ कर अभिन्न अधिक ही व्यस्त हो गया. पर जब भी औफ़िस से घर आता, थोड़ी देर  मांपापा के साथ अवश्य बैठता.

अब घर भी व्यवस्थित हो चला था. मातापिता दोनों सुबह टहलने जाते, आ कर नहा कर पूजा करते. फिर साथ में बैठ कर मनपसंद ताश खेलते या टीवी देखते.

“मां आज दशहरा है. खाने में क्या बनेगा?“

“ निका बेटा, आज रायता-पूड़ी और सब्ज़ी बनेंगी. रायता ज़रूर बनता है.“

“ठीक है मां, मैं करती हूं.“

“अरे मां, आप रसोई मैं क्यों आ गईं? अभिन्न देखेंगे, तो ग़ुस्सा होंगे कि  मेरी मां से काम क्यों करवाया?“ मां को रसोई में देख अनिका ने कहा.

“तो उसे बताने कौन जा रहा है? आज ख़ाना मैं बनाती हूं.“

एक अनोखी लालसा मां के चेहरे पर तैर गई. आज वे अपने हाथ से ख़ाना बना कर सब को खिलाना चाहती थीं. वैसे भी, बहुत दिनों से उन्होंने रसोई में कदम ही नहीं रखा था. जब से यहां आई हैं, बहू अनिका आगे बढ़ कर सारा काम संभाल रही थी. उन्हें कुछ करने का मौक़ा ही न मिलता. मीरा ख़ुश भी थीं. दुर्दिन छंट गए हैं. प्यारसम्मान करने वाली बहू मिली थी और क्या चाहिए. वे जब भी रसोई में आतीं, अनिका उन्हें प्यार से पापा के पास ला कर बिठा देती, फिर कहती, “आप तो, बस, यहीं बैठ कर आराम करो और हमें आशीर्वाद दो,“

ऐसा अकसर होता कि जब भी मां कुछ काम करने की कोशिश करतीं, अनिका उन्हें वापस कर देती. उन का मन अब उदास होने लगा था. बिना काम किए लगता था जीवन का महत्त्व ही नहीं है.

मीरा  का मायका और ससुराल भरापूरा था. सुबह से शाम काम में ही बीतता  था. ख़ाना बनाना या कुछ करते रहना उन को आंतरिक ख़ुशी देता था. पर अब वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहीं थीं.

आज धूप में बैठे हुए मीरा ने सोचा, एक स्वेटर ही शुरू कर लेती हूं. वे फंदे डाल ही रहीं थीं कि  अनिका आ गई, “अरे मां, आप स्वेटर क्यों बना रही हैं, आप के कंधों में दर्द हो जाता है. रहने दीजिए. वैसे, आप किस के लिए बना रही हैं?“

“तेरे पापा के लिए बना रही थी.“

शाम को मीरा बाज़ार से एक गिफ्ट ससुर के लिए ले कर कर आई, “पापा देखिए, आप के लिए गिफ्ट है.“

“अरे, यह तो बहुत सुंदर है,“ ससुरजी ने पैकेट खोला तो एक सुंदर स्वेटर अपनी रंगत बिखेर रहा था.

पश्मीने की वूल का स्वेटर हाथ में लिए ससुरजी उसे सहला रहे थे. एक जमाने में उन की ऐसे स्वेटर की बहुत ख्वाहिश थी. लेकिन सीमित आय और बड़े परिवार की ज़िम्मेदारियों ने यह चाहत पूरी न होने दी. उन का ख़ुशी से चेहरा चमक रहा था.

मीरा सोच रही थी, कितनी ह्रदय से जुड़ी प्यारी लड़की है, ज़रा सी कोई इच्छा हो, उसे तुरंत पूरा करती है. लेकिन अब उन का मन भी चाहता था कुछ करें. यों ही बैठे रहना उन्हें निरर्थक लगता. कभी ऐसा लगता, अब वे बेकार हो गई हैं, उन से कुछ काम ही नहीं होगा. जैसे उन का ख़ुद पर से विश्वास ही ख़त्म होता जा रहा था. जिस भी काम को करने चलतीं, बहू हाथ से काम ले लेती या सहायक को कह कर करवा देती. वे बेमन से बैठी रह जातीं. उन का आत्मविश्वास डगमगाने लगा था. उन को  ह्रदय में सबकुछ होते हुए कुछ ख़ालीपन सा लगता. कुछ दिन इसी ऊहापोह में बीते. बहू से  उस के लाड़प्यार के आगे कुछ कह भी न पातीं. अब मीरा का मन अपने पुराने घर जाने को करने लगा. उन्हें अपनी रसोई, अपना घर याद आने लगा.

“ सुनो जी, कुछ दिनों के लिए घर वापस चलें?“ रात में सोने के पूर्व मीरा ने पति से कहा.

“क्यों, क्या हुआ? तुम्हें किसी ने कुछ कहा, कुछ परेशानी है क्या? यह भी तो अपना घर है. कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं तुम कुछ परेशान हो?“

“अरे, आप तो परेशान हो गए. मुझे कोई परेशानी नहीं. न ही किसी ने कुछ कहा. बहू तो ह्रदय से सम्मान देती है. बस, कुछ करने को नहीं है. सो, मन उदास हो जाता है. लगता है, मेरे जीवन का कोई मक़सद ही नहीं, अपने ही घर में मेहमान हो गई हूं.“

“होहोहो, बस, इतनी सी बात. ठीक है, अब तुम काम कर सकोगी लेकिन एक वादा करो, ख़ुद को थकाओगी नहीं, तुम्हारा बीपी बढ़ जाता है.“

सुबह नाश्ते के बाद महेश जी ने बोला, “अनिका, आज मुझे ख़ाना मेरी पत्नी के हाथ का चाहिए और कोई नहीं बनाएगा.“

अनिका  ने अचानक से पापाजी की आवाज़ सुन कर परेशान होते हुए कहा, “क्या हुआ पापा जी? खाने में कुछ गड़बड़ हो गई, मुझे बताइए.“

“हां, बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है. तुम ने अपनी सास को मेहमान बना दिया है,“ कह कर ज़ोर से खिलखिला कर हंस पड़े.

“पर पापा जी…”

महेश जी ने प्यार से हाथ सिर पर फेरते हुए कहा, “बेटा, आराम भी हिसाब से ही अच्छा लगता है. तेरी सास ने हमेशा किचन पर राज किया है. शायद, इसी में उस को तृप्ति मिलती है. कुछ काम कर संतुष्टि हर उम्र की ज़रूरत है.”

“तो, लेकिन मां को तो बीपी है, कहीं काम करने से…”

अनिका के वाक्य पूरा करने के पहले ही महेश बोले, “तुम्हारी चिंता स्वाभाविक है पर बेटा, हलकाफुलका काम नहीं थकाता, बल्कि स्फूर्ति देता है.”

तभी अनिका ने सासुमां का हाथ प्यार से पकड़ा और रसोई में ले चली, “आज आप खीर बनाएंगी, मुझे अभिन्न ने बताया था, आप खीर बहुत अच्छी बनाती हैं, हमेशा ही खीर खाते के समय वे कहते हैं.“

मां बच्चों को खीर देते मुसकरा रही थीं. उन के चेहरे पर असीम तृप्ति थी, जिसे देख अनिका भी ख़ुश थी. वह ख़ुद यही तो चाहती थी कि मां ख़ुश रहें.

“ये लो तुम्हारी खीर बनाई की साड़ी,“ कहते हुए पति महेश  ने  साड़ी दी, अनिका ने ऊन  सलाई और अभिन्न ने उन को मौर्निग वौक के शूज़.

“अरे, आप लोग ये सामान कब लाए और इन सब की क्या ज़रूरत थी?” बहुत दिनों बाद उन के मन का कोना उमंग में चंचल हो उठा. वे नईनवेली सी मुसकरा उठीं.

“ज़रूरत थी, इस घर में आज आप की पहली रसोई थी,” अभिन्न, अनिका और महेश ने एकसाथ कहा.

“मैं यह साड़ी एक हफ़्ते बाद करवाचौथ आ रहा है, उस के लिए लाया था,“ महेश जी ने कहा.

बच्चों और पति के प्यार से अविभूत  मीरा सुख की छैयां में गुनगुना उठीं. Hindi Family Story :

Hindi Romantic Story : मन के बंधन – दो दिलों की अधूरी प्रेम कहानी

Hindi Romantic Story : मैंने बहुत कोशिश की उस के नाम को याद कर सकूं. असफल रहा. इंग्लिश वर्णमाला के सभी अक्षरों को बिखेर कर उस के नाम को मानो बनाया गया था. यह उस का कुसूर न था. चेकोस्लोवाकिया में हर नाम ऐसा ही होता है. वह भी चैक नागरिक था. वेरिवी के शानदार शौपिंग कौंप्लैक्स की एक बैंच पर बैठा था. 70-80 वर्ष के मध्य का रहा होगा.

यह बात ज्यादा पुरानी नहीं. आस्ट्रेलिया आए मुझे एक माह ही तो हुआ था. म्यूजियम और घूमनेफिरने की कई जगहों की घुमक्कड़ी हो गई, तो परदेश के अनजान चेहरों को निहारने में ही मजा आने लगा. आभा बिखेरते शहर मेलबर्न के उपनगर वेरिवी के इस वातानुकूलित भव्य मौल में जब मैं चहलकदमी करतेकरते थक गया, तो बरामदे में पड़ी एक बैंच पर जा बैठा. पास में एक छहफुटा गोरा पहले से बैठा था. गोरे की आंखों की चमक गायब थी, खोईखाई आंखें मानो किसी को तलाश रही थीं.

आस्ट्रेलिया की धरती ने डेढ़ सौ साल पहले सोना उगलना शुरू किया था. धरती की गरमी को आज भी विराम नहीं लगा है. इस धरती में समाए सोने की चमक ने परदेशियों को लुभाने का सिलसिला सदियों से बनाए रखा है. शानदार और संपन्न महाद्वीप में लोग सात समंदर पार कर चारों दिशाओं से आ रहे हैं. नतीजा यह है कि सौ से ज्यादा देशों के लोग अपनीअपनी संस्कृतियों को कलेजे से लगाए यहां जीवन जी रहे हैं.

बैंच पर बैठा मैं इधर से उधर तेज कदमों से गुजरती गोरी मेमों को कनखियों से निहारतेनिहारते सोचने लगता था कि वे किस देश की होंगी. भारत, पाकिस्तान, लंका और चीन के लोगों की पहचान करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी. पर सैकड़ों देशों के लोगों की पहचान करना सरल काम न था. एकजैसी लगने वाली गोरी मेमों को देख कर जब आंखों में बेरुखी पैदा हुई तो बैंच पर बैठे पड़ोसी के देश की पहचान करने की पहेली में मन उलझ गया. स्पेन का हो नहीं सकता, इटली का है नहीं, तो फिर कहां का. तभी एक गोरे ने मेरे पड़ोसी बूढ़े के पास आ कर ऐसी विचित्र भाषा में बतियाना शुरू किया कि मेरे पल्ले एक शब्द न पड़ा. गोरा चला गया, तो मैं अपनेआप को न रोक पाया.

मैं ने बूढ़े की आंखों में आंखें डालते बड़ी विनम्रता से हिंदुस्तानी इंग्लिश में पूछा, ‘‘आप किस देश से हैं?’’

मेलबर्न में बसे मेरे मित्र ने मुझे समझा दिया था कि परदेश में अपरिचितों से बिना जरूरत बात करने से बचना चाहिए. लेकिन पड़ोसी गोरे ने जिस सहजता और आत्मीयता से मेरे सवाल का जवाब दिया था उस से मेरे सवालों में गति आ गई. उस ने अपने देश चेकोस्लोवाकिया का नाम उच्चारित किया तो मैं ने उस का नाम पूछा. नाम काफी लंबा था. मेरे लिए उसे बोलना संभव नहीं. सच पूछो तो मुझे याद भी नहीं. सो, मैं उसे चैक के नाम से उस का परिचय आप से कराऊंगा.

उस की इंग्लिश आस्ट्रेलियन थी. पर वह संभलसंभल कर बोल रहा था ताकि मैं समझ सकूं.मेरे 2 सवालों के बाद चैक ने मुझ में दिलचस्पी लेनी शुरू की, ‘‘आप तो इंडियन हैं.’’ उस की आवाज में भरपूर आत्मविश्वास था.

मेरे देश की पहचान उस ने बड़ी सरलता से और त्वरित की, इसे जान कर मुझे गर्व हुआ और खुशी भी. मेरी दिलचस्पी बूढ़े चैक में बढ़ती गई, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘एल्टोना,’’ उस ने जवाब दिया. दरअसल, मेलबर्न में 10 से

15 किलोमीटर की दूरी पर छोटेछोटे अनेक उपनगर हैं. एल्टोना उन में एक है. उपनगर वेरिवी, जहां हम चैक से बतिया रहे थे, एल्टोना से 10 किलोमीटर दूर है.

चैक खानेपीने के सामान को खरीदने के लिए अपनी बस्ती के बाजार के बजाय

10 किलोमीटर की दूरी अपनी कार में तय करता है. पैट्रोल पर फुजूलखर्ची करता है. वक्त की कोई कीमत चैक के लिए नहीं क्योंकि वह रिटायर्ड जिंदगी जी रहा है. लेकिन सरकार से मिलने वाली पैंशन

15 सौ डौलर में गुजरबसर करने वाला फुजूलफर्ची करे, यह मेरी समझ से बाहर था. इस पराई धरती पर रहते हुए मुझे मालूम पड़ गया था कि यहां एकएक डौलर की कीमत है.

चैक की दरियादिली कहें या उस का शौक, मैं ने सोचा कि अपनी जिज्ञासा को चैक से शांत करूं.

तभी सामने की दुकान से मेरी पत्नी को मेरी ओर आते देख चैक बोला, ‘‘आप की पत्नी?’’

मैं ने मुसकराते कहा, ‘‘आप ने एक बार फिर सही पहचाना.’’

चैक अपने अनुमान पर मेरी मुहर लगते देख थोड़ी देर इस प्रकार प्रसन्न दिखाई दिया मानो किसी बालक द्वारा सही जवाब देने पर किसी ने उस की पीठ थपथपाई हो.

‘‘आप कितने समय से साथ रह रहे हैं?’’ उस ने पूछा.‘‘40 वर्ष से,’’ मैं ने कहा. वह बोला, ‘‘आप समय के बलवान हैं.’’

मुझे यह कुछ अटपटा लगा. पत्नी के साथ रहने को वह मेरे समय से क्यों जोड़ रहा था, जबकि यह एक सामान्य स्थिति है. इस के साथ ही मेरी जबान से सवाल निकल पड़ा, ‘‘और आप की पत्नी?’’

मेरा इतना पूछना था कि चैक के माथे पर तनाव उभर आया. चैक की आंखों ने क्षणभर में न जाने कितने रंग बदले, मुझे नहीं मालूम. पलकें बारबार भारी हुईं, पुतलियां कई बार ऊपरनीचे हुईं. मैं कुछ अनुमान लगाऊं, इस से पहले चैक के भरेगले से स्वर फूटे, ‘‘थी, लेकिन अब वह वेरिवी में किसी दूसरे पुरुष के साथ रहती है.’’

मैं चैक के और करीब खिसक आया. उस के कंधे पर मेरा हाथ कब चला गया, मुझे नहीं मालूम. चैक ने इस देश में हमदर्दी की इस गरमी को पहले कभी महसूस नहीं किया था. उस ने मन को हलका करने की मंशा से कहा, ‘‘हम 30 साल साथसाथ रहे थे.’’

मैं ने देखा, यह बात कहते चैक के होंठ कई बार किसी बहेलिया के तीर लगे कबूतर के पंखों की तरह फड़फड़ाए थे.

‘‘यह सब कैसे हुआ, क्यों हुआ?’’ मुझ से रुका न गया. शब्द उस के मुंह में थे, पर नहीं निकले. गला रुंध आया था. उस ने हाथों से जो इशारे किए उस से मैं समझ गया. मानो कह रहा हो, सब समयसमय का खेल है. मगर, मेरी जिज्ञासा मुझ पर हावी थी.

मैं ने अगला सवाल आगे बढ़ा दिया, ‘‘आप का कोई झगड़ा हुआ था?’’ ‘‘ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था,’’ वह बोला, ‘‘वह एक दिन मेरे पास आई और बोली, ‘चैक, आई एम सौरी, मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी. मैं ने और स्टीफन ने एकसाथ रहने का फैसला किया है.’ फिर वह चली गई.’’

‘‘आप ने उसे रोका नहीं?’’ ‘‘मैं कैसे रोकता, यह उस का फैसला था. यदि वह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रह कर ज्यादा खुश है तो मुझे बाधा नहीं बनना चाहिए.’’

मैं हैरानी से उसे देख रहा था. ‘‘लेकिन हां, आप से झूठ नहीं कहूंगा. मैं ने उस के लौटने का इंतजार किया था.’’ वह आगे बोला.

उस की आंखें नम हो रही थीं. वह फिर बोला, ‘‘आखिर, हम लोग 30 साल साथ रहे थे. मुझे हर रोज उसे देखने की आदत पड़ गई थी,’’ हाथ के इशारे से बैंच के सामने वाली दुकान की ओर संकेत करते हुए उस ने कहा, ‘‘इस दुकान में हम लोग अकसर आते थे. यह उस की पसंदीदा दुकान थी.’’

मैं समझ गया कि वेरिवी के शौपिंग कौंपलैक्स में वह उस दुकान के सामने की बैंच पर क्यों बैठता है.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘यहां उस से मुलाकात होती है?’’

‘‘मुलाकात नहीं कह सकते. वह स्टीफन के साथ यहां आती थी. बहुत खुश नजर आती थी. मैं उसे यहीं से देख लिया करता था. उसे देख कर लगता था कि उन दोनों को किसी तीसरे व्यक्ति की जरूरत नहीं है. वह खुश थी. लेकिन…’’ वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘पिछली बार मैं ने उसे देखा था तो वह अकेली थी.’’

मैं ने देखा कि रोजलिन के चेहरे पर गहरी उदासी उतर आई थी. कुछ परेशान लग रही थी. उस ने मुझे देख लिया था. हमारी नजरें मिलीं, मगर वह बच कर निकल जाना चाहती थी. मैं ने आगे बढ़ कर अनायास ही उस का हाथ थाम लिया था, पूछा था, ‘कैसी हो?’ उस ने मेरी आंखों में देखा था, मगर कुछ बोल नहीं पाई थी. उस के हाथ फड़फड़ा कर रह गए थे. वह हाथ छुड़ा कर चली गई थी. मैं सिर्फ इतना जानना चाहता था कि वह ठीक तो है. अब जब वह मिलेगी, तो पूछूंगा कि वह खुश तो है.’’

‘‘आप की यह मुलाकात कब हुई थी?’’ ‘‘करीब 2 साल पहले.’’

उस की आंखें डबडबा रही थीं और मैं हैरत से उसे देख रहा था. वह पिछले 2 साल से इस बैंच पर बैठ कर इंतजार कर रहा था ताकि वह उस से पूछ सके कि ‘वह खुश तो है.’

उस दिन मैं ने उस के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रख कामना की थी कि उस का इंतजार खत्म हो.

मैं अपने देश लौट आया था. मगर चैक मेरे दिमाग पर दस्तक देता रहा. बहुत से सवाल मेरे मन में कौंधते रहे. क्या उस की मुलाकात हुई होगी? क्या रोजलिन उस को मिल गई होगी या वह उसी बैंच पर आज भी उस का इंतजार कर रहा होगा? Hindi Romantic Story :

Genetic Muscle Disorder : क्या है नेमालाइन मायोपैथी? बचने के लिए जानें

Genetic Muscle Disorder : नेमालाइन मायोपैथी एक दुर्लभ और आनुवंशिक मांसपेशीय विकार है। इसमें व्यक्ति की मांसपेशियों में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगती है। इसका सबसे ज्यादा असर गर्दन, धड़ और रीढ़ के निचले हिस्से पर पड़ता है। गंभीर स्थिति में व्यक्ति व्हीलचेयर पर निर्भर हो जाता है। बीमारी बढ़ने पर खाना निगलने, चबाने और दैनिक गतिविधियाँ करने में कठिनाई होने लगती है।

इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर जन्म के समय या बचपन में ही दिखने लगते हैं। प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:
मांसपेशियों का पतला होना
गर्दन और चेहरे की मांसपेशियों की कमजोरी
हाथ-पैरों में कमजोरी या सुन्नपन
छाती का अंदर की ओर धँसना
अगर ये लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर नेमालाइन मायोपैथी की जांच करने की सलाह देते हैं।

जांच कैसे होती है?

इस बीमारी की पुष्टि के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:
मांसपेशियों की बायोप्सी
EMG (Electromyography)
जेनेटिक टेस्टिंग
MRI या CT स्कैन
इन सभी जांचों से बीमारी की गंभीरता और कारणों का पता लगाया जाता है।

इलाज क्या है?

वर्तमान में नेमालाइन मायोपैथी का कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है। लेकिन यदि समय रहते इसका पता चल जाए, तो इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।
इलाज में निम्नलिखित उपाय शामिल होते हैं:

नियमित फिजियोथेरेपी
रेस्पिरेटरी (श्वसन) सपोर्ट
आवश्यकतानुसार सर्जरी
सामान्य देखभाल और निगरानी
भावनात्मक सहारा और परिवार का सहयोग

यदि स्थिति अधिक गंभीर हो जाए तो रोगी को व्हीलचेयर की आवश्यकता पड़ सकती है। रोगी का मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत रहना भी उपचार का अहम हिस्सा होता है। Genetic Muscle Disorder

Road Safety Rules: सड़क पर दुर्घटना की स्थिति में क्या करें और क्या न करें ?

Road Safety Rules: बीते महीने रोहित अपनी कार से शिमला जा रहा था अचानक सामने से आती तेज़ स्पीड कार के साथ उसकी कार की टककर हो गई. पहले तो रोहित घबरा गया लेकिन अपनी सूझ बुझ से ना सिर्फ उसने अपनी बल्कि तेज़ स्पीड में आती कार में सवार लोगो की भी जान बचाई. उसने दोषी से बहस बाजी में ना फ़स कर पहले कार में रखे फर्स्ट ऐड बॉक्स को निकला और खुद की चोट पर डिटोल लगाने लगा व दुर्घटना स्थिल की जानकारी 108 पर कॉल कर एम्बुलेंस को बुला लिया जिससे उसने अपने साथ साथ दूसरी कार में सवार लोगो की जान भी बचा ली.

आजकल सड़क पर बढ़ता ट्रैफिक लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. आए दिन सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएँ सामने आती हैं. लेकिन ऐसी परिस्थिति में घबराने के बजाय हमें सूझबूझ और संयम से काम लेना चाहिए. यदि आप कम चोटिल हुए हैं तो सही कदम तुरंत उठाकर न केवल अपनी, बल्कि दूसरों की जान भी बचा सकते हैं. साथ ही कुछ ऐसी महत्वपूर्ण चीजे है जो आपको हमेशा अपने वाहन में रखनी चाहिए. क्योंकि पहले खुद को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है तभी हम किसी कि मदद कर सकेंगे.ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है.

क्या करें

1.अपने वाहन में फर्स्ट एड बॉक्स आवश्य रखें जिसमे प्राथमिक उपचार में काम आने वाली चीजे रखना ना भूले जैसे स्टरलाइज़्ड गॉज़ पैड और रोल,एंटीसेप्टिक सॉल्यूशन (जैसे Dettol, Savlon),बैंड-एड और मेडिकल टेप,दर्द कम करने की दवा (पैरासिटामॉल) ,बर्न ऑइंटमेंट (जैसे Burnol),रुई,साफ़ दस्ताने रखें.

2.अपना एक इमरजेंसी नंबर आवश्य रखें.यदि कोई घटना घट जाए तो घट वालो को सूचित किया जा सके.

3.अपने वाहन की समय-समय पर सर्विस अवश्य कराएं, ताकि ब्रेक, लाइट आदि सही स्थिति में रहें. दोपहिया वाहन चलाते समय हमेशा हेलमेट पहनें और चारपहिया वाहन में सीटबेल्ट लगाएँ.

4.यदि किसी कारणवश आपके द्वारा एक्सीडेंट हो जाता है या आप शिकार बन जाते हैं तो घबराएँ नहीं, तुरंत गाड़ी रोकें और इंजन बंद करें.

5. यदि आप गंभीर रूप से चोटिल नहीं हैं तो खुद को और यात्रियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाएँ और सामने वाले की भी मदद करें.

6. घायलों को प्राथमिक उपचार दें और तुरंत एम्बुलेंस (108/102) बुलाएँ. साथ ही पास के थाने या 112 नंबर पर सूचना दें.

7.अपने वाहन की इमरजेंसी लाइट/हैज़र्ड लाइट जलाएँ ताकि पीछे से आने वाले वाहन सतर्क हो सकें.

8. दुर्घटना स्थल की फोटो/वीडियो लें ताकि घटना का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे.

9. अपनी इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करें क्योंकि दावा (Claim) करने के लिए यह आवश्यक है.

10. हमेशा अपने पास आवश्यक दस्तावेज रखें – ड्राइविंग लाइसेंस, आरसी, इंश्योरेंस और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट. साथ ही इनकी फोटोकॉपी घर पर भी सुरक्षित रखें.

क्या न करें

1. शांत रहकर स्थिति को संभालें. झगड़े या बहस से बचें.

2. पहले अपने उपचार पर ध्यान दे. आसपास के लोगो खडे लोगो की मदद ले.

3. घायल को गलत तरीके से न उठाएँ, विशेषकर रीढ़ की हड्डी की चोट के मामले में. पेशेवर मदद का इंतज़ार करें.

4. यदि आपने शराब या नशे में गाड़ी चलाई है तो इसे छिपाएँ नहीं. यह गंभीर अपराध है और पुलिस जाँच में साबित हो सकता है.

5. दुर्घटना की जानकारी तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बजाय कानूनी और मेडिकल मदद को प्राथमिकता दें.

6. यदि गलती आपकी नहीं है तो डर में अपनी गलती न मान लें. कानून निर्दोष को सजा नहीं देता.

7. पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को हमेशा सही और पूरी जानकारी दें.

संबंधित मुख्य अधिनियम और धाराएं

भारतीय दंड संहिता (IPC)

धारा 279 – लापरवाही से वाहन चलाना

धारा 304A – लापरवाह वाहन चलाने से मृत्यु होना

धारा 337/338 – लापरवाही से चोट पहुँचाना (साधारण या गंभीर)

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act)

धारा 134 – चालक का कर्तव्य (घायल को अस्पताल पहुँचाना व पुलिस को सूचना देना)

धारा 187 – दुर्घटना के बाद मदद न करना या भाग जाना अपराध

धारा 146 – थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का होना अनिवार्य होता है. Road Safety Rules

Law Awareness: पतिपत्नी की मौत – कौन होगा कानूनी वारिस ?

Law Awareness: लखनऊ के महानगर में रहने वाले पति पत्नी कपिल और उन की पत्नी रोमा की मौत उन के ही घर में अचानक हो गई थी. वह दौर कोरोना का था. ऐसे में दूसरे दिन महल्ले वालों के जरीए पुलिस को पता चला. कपिल ने मरने से पहले अपनी कोई वसीयत नहीं की थी. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पत्नी प्रथम श्रेणी की वारिस होती है. लेकिन एक साथ मौत होने पर जब यह पता नहीं होता कि पहले कौन मरा तो स्थिति जटिल हो जाती है. इस को ‘कौमोरिएंट नियम’ के आधार पर हल किया जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में रोमा ने अपनी वसीयत लिखवा कर रखी थी. वसीयत में रोमा ने अपनी भतीजी प्रभा को वारिस बना रखा था. कपिल और रोमा के अपनी कोई संतान नहीं थी. ऐसे में अगर रोमा की वसीयत सामने नहीं आती और कपिल की मौत बाद में होती तो यह संपत्ति कपिल के दूसरे श्रेणी के वारिसों यानि भतीजों को संपत्ति चली जाती.

कपिल और रोमा की मौत के बाद अचानक सवाल उठा कि जब दो लोगों की एक ही समय पर मृत्यु हो गई है तो संपत्ति का वारिस कौन होता है ? उत्तराधिकार के ऐसे मामलों में सबसे पहले यह देखा जाता है कि पहले किस की मृत्यु हुई थी. जो पहले मरता है उस की संपत्ति बाद में मरने वाले के नाम हस्तांतरित हो जाती है. उस के उत्तराधिकारी के नाम संपत्ति का दाखिला हो जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में पहले कपिल की उत्तराधिकारी रोमा मानी जाएगी. इस के बाद रोमा ने जिस को अपनी संपत्ति की वसीयत की उस को इस पर अधिकार होगा. इस तरह के सवाल तब भी खड़े होते हैं जब एक ही परिवार के कई लोग सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं. कई बार सड़क और दूसरे हादसों में मौत हो जाती है. तब ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं. इस में एक सवाल और खड़ा हो जाता है कि जब यह पता ही न चले कि एक साथ मरने वालों में कौन पहले मरा और कौन बाद में तो उत्तराधिकार कैसे तय होगा ?

उत्तराधिकार का निर्धारण संपत्ति कानून अधिनियम 1925 की धारा 184 द्वारा ऐसे मामलों के लिए दिशानिर्देश दिया गया है. यह अधिनियम बताता है कि जब दो व्यक्तियों की एक साथ मृत्यु हो जाती है और यह निर्धारित करना संभव नहीं होता कि पहले किस की मृत्यु हुई, तो छोटे व्यक्ति को बड़े व्यक्ति से अधिक समय तक जीवित माना जाता है. इस को ‘कौमोरिएंट्स नियम’ के नाम से जाना जाता है.

सामान्य तौर पर यदि पतिपत्नी दोनों की मृत्यु हो जाती है, तो बच्चों को मातापिता की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिलता है. वे प्रथम श्रेणी के वारिस होते हैं. एक साथ मौत होने पर, संपत्ति बच्चों या अन्य निकटतम कानूनी वारिसों में बंट जाती है. संयुक्त संपत्ति के मामले में भी ‘कौमोरिएंट नियम’ के कारण जीवित रहने का अधिकार लागू नहीं होता और संपत्ति बच्चों को मिलती है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में मिलती है. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई उत्तराधिकारी नहीं हैं संपत्ति महिला के माता पिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है.

जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है, तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. हिंदू पुरुषों के मामलो में जब किसी हिंदू पुरुष की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति उस की पत्नी, बच्चों और मां के बीच बराबरबराबर बांट दी जाती है. अगर इन में से कोई भी उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति पिता को मिल जाती है.

वरासत में कौन होते है उत्तराधिकारी:

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानि क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता, और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे पोतेपोतियां व विधवा शामिल हैं. यह सभी एक साथ संपत्ति के हकदार होते हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानि क्लास 2 के उत्तराधिकारियो में वह रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची, मामा मामी और इन के बच्चे भतीजे भतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाई बहन, माता के भाई बहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों, तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के कोई उत्तराधिकारी न हों, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुष वंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों, तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश पुरुष या महिला से जुड़े होते हैं. इन में मौसी, मामा, ममेरे भाई बहन शामिल होते हैं. अगर यह भी न हों, तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए वरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है. इसलिए यह जरूरी होता है कि लोग अपनी वसीयत कर के रखे जिस से उन के चाहने वालों को संपत्ति मिल सके. Law Awareness

Hindi Family Story : शगुन का लिफाफा

Hindi Family Story : अगर मुझ से कोई पूछे कि इस दुनिया में विवाह के दिनों का सब से मुश्किल काम क्या है तो आजकल मेरे मुंह से एक आह सी निकल जाती है, मैं कहती हूं, दूल्हादुलहन को स्टेज पर जा कर शगुन का लिफाफा देने से ज्यादा मुश्किल कुछ नहीं है.

पिछले हफ्ते जिस शादी में गई, उस की याद रातों को जगा जाती है. हम पतिपत्नी पास के ही एक रिसौट्र्स में एक रिसैप्शन में गए थे. कोरोना ने कई दावतें मारी थीं, कई खुशियां अपनों के बिना मजबूरी में मना ली गई थीं. इस त्रासदी की लंबी परेशानियों के बाद यह पहला इस तरह का फंक्शन था, बहुत से दोस्त वहां मिलने वाले थे. अति उत्साहित सी मैं भी सजधज कर वहां पहुंची. खूबसूरत से रिसौट्र्स की मनमोहक सजावट बाहर से ही बता रही थी कि बढ़िया पार्टी होने वाली है.

पर हाय, कहां गया पुराना जमाना, जब किसी शादी में जाने पर घर का कोई सदस्य हाथ जोड़ कर स्वागत करता था, मेहमान को स्पैशल फील होता था, यहां तो एक बंदा नहीं, और अंदर गए तो एक बहुत ज्यादा लंबी लाइन दिखी, जिस के आगेपीछे किसी और चीज पर नजर जा ही नहीं पा रही थी, लटके चेहरे, थकी, उबाऊ बौडी लैंग्वेज वाले लोगों की बेचैन लाइन, शानदार बने स्टेज पर खड़े दूल्हा, दुलहन, दोनों के परिवार तक पहुंचने के लिए लालायित लोग.

उस लाइन को देख कर हम ने एकदूसरे को देखा, पति कुछ कहें, इस से पहले मैं ने बाजी मारी, ‘न… यह नहीं हो पाएगा. मैं इस लाइन में नहीं खड़ी होने वाली.”

हम ने इधरउधर नजर डाली, एक दोस्त दिखा, देखते ही बोला, ‘मैं ने तो आते ही बबलू को लाइन में लगा दिया था, वो देखो, सुरेश की बेटी पिंकी भी लाइन में लगी है, वे दोनों खाना खा रहे हैं, बस ऐसे ही काम चलाना पड़ रहा है.”

मैं ने कहा, “भाई साहब, हम क्या करें… हमारे साथ तो कोई पिंकी, बबलू नहीं.”

“फिर तो भाभीजी, आप लोग एकएक कर के खा लो, और दूसरा लाइन में लगा रहे.”

“अरे, खाने का क्या है, खा ही लेंगे. ये तो सब स्टेज पर हैं, इन से तो मिलना ही मुश्किल लग रहा है, स्टेज पर गए बिना इन लोगों को पता भी नहीं चलेगा कि हम आए भी हैं. बड़ी मुश्किल है.”

“हां, आसान तो नहीं है. हम तो आते ही लाइन में लग गए थे.’’

इतने में हमारी बेटी झिलमिल का फोन आ गया, “आप लोग ठीक से पहुंच गए, मम्मी?”

“मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा है, औरों के बच्चे देखो. आ कर कैसे अपने पेरेंट्स की हैल्प कर रहे हैं, एक तुम हो कि घर में ही हो, पर साथ में नहीं आई, कुछ हैल्प हो जाती!”

“अरे, आप दोनों अपने सर्किल में शादी की पार्टी में गए हो, मुझ से वहां क्या हैल्प चाहिए थी?”

“अरे, आ कर कम से कम लाइन में लग जाती.”

“क्या…? कौन सी लाइन में…?”

मुझे अचानक लगा कि अब झिलमिल को कुछ भी कहूंगी तो बस अपना मजाक ही बनवाऊंगी. मैं ने कहा, ‘‘कुछ नहीं, घर आ कर बात करते हैं.’’

हम दोनों को भीड़ से बहुत ही परेशानी होती है, हम उस जगह जाते ही नहीं, जहां हमें इस तरह की भीड़ दिख जाती है. आधा ग्राउंड तो चेयर्स से भरा था, मैं ने कहा, “इतनी चेयर्स रखी  हैं, पर इन पर लोग बैठ ही नही रहे, बेचारे लाइन में खड़े रह कर शगुन का लिफाफा दे कर ऐसे घर भागेंगे कि आ कर गलती कर दी. चलो, हम बैठ कर सोचते हैं कि इस मुसीबत के पलों से कैसे निबटा जाए.”

“हद करती हो, किसी के बच्चे की पार्टी है, तुम्हें ये मुसीबत की घड़ी लग रही है.”

“न भाई, अपना तो जोश ठंडा हो गया, कोई दोस्त भी दिख रहा है तो बस या तो जल्दीजल्दी खाने में लगा है या लाइन में है. मैं तो सोच कर आई थी कि सब के साथ थोड़ी बातें करेंगे, बैठेंगे, यहां तो माहौल ऐसा है कि सब के जीवन का उद्देश्य इस समय है कि बस स्टेज तक पहुंच जाएं, बाकी सब चीजें भाड़ में जाएं.”

“क्या करें…? घर चलें…? कहीं रास्ते में डिनर कर लेंगे.”

“और शगुन का लिफाफा…”

“किसी दिन इन के घर ही चल कर दे आएंगे.”

अपने काम की बात सुनी तो पीछे खड़ा परिचित फौरन हम पतिपत्नी के आइडिया पर बीच में कूद पड़ा, “हां यार, ऐसा ही करते हैं, इन के घर जा कर शगुन दे आएंगे. पर, खाना खा लेते हैं.”

हम दोनों ने आंखों ही आंखों में ‘हां’ किया, अब खाने की लाइन देखी, यह लाइन शगुन वाली से छोटी  थी. हम ने इस लाइन में खड़े होने की हिम्मत की, पता नहीं एक महिला को किस बात की जल्दी थी, उस ने मेरे पीछे से हाथ बढ़ा कर अपनी प्लेट में सब्जी इस तरह से ली कि मुझे लगा, मेरी गरदन पर पीछे सब्जी का कुछ गीलापन है, मैं ने उसे पलट कर जरा घूरा, वो कहीं और देखने लगी, मुझे उस की जल्दबाजी पर गुस्सा आया था. मैं ने उस से साफसाफ पूछ लिया, “मेरी गरदन पर आप की प्लेट से कोई सब्जी लगी है?”

“जरा सी. मैं टिश्यू पेपर से साफ कर देती हूं,” कह कर उस ने मेरी ‘हां’ या ‘ना’ का इंतजार ही नहीं किया, जो भी निशान रहा होगा, झट से पोंछ दिया. मन में सोचा, ‘भई, तुम्हें इतनी जल्दी क्यों मची है, आगे खड़ी महिला का सुंदर ब्लाउज तुम्हें न दिखा…? उस पर गिर जाता तो…?’ फिर अपनेआप ही बोली, “सौरी, जरा शगुन वाली लाइन में खड़े होने की जल्दी है, पति को लाइन में खड़ा कर के आई हूं.”

उस के यह कहते ही मेरा मन उस के प्रति करुणा से भर गया. मैं ने उसे फौरन माफ कर दिया. मैं ने ‘इट्स ओके’ कहते हुए उसे एक प्यारी स्माइल दी. खाना खा कर हम ने फिर एक ठंडी सांस ले कर शगुन वाली भीड़ को देखा, अब तक हमारा आइडिया वायावाया घूम कर काफी लोगों को शांत कर गया था कि जिस का मनोबल कम है, जिस में जोश कम है, वह घर जा कर शगुन आराम से बाद में दे देगा. इतने में मेजबान दोस्त की बहन की नजर बहुत दूर से हम पर पड़ी, उस ने वहां से हाथ हिलाया, हम ने यहां से. उस ने स्टेज पर आने का इशारा किया, हम ने लाइन दिखाते हुए दूर से हाथ जोड़ दिए और इशारा किया कि बाद में मिलेंगे.

चंट बहन फौरन समझ गई कि लोग इस तरह जाने लगे, तो कहीं भाई का नुकसान न हो जाए, हमारे पास लपकी आई, मुझ से गले मिली, “आओ, चलो स्टेज पर.”

मैं ने कहा, “घर पास ही है, बाद में जा कर शगुन दे दूंगी. देखो मीता, इस लाइन में तो मैं खड़ी नहीं होने वाली. या एक काम करो, तुम यह लिफाफा रखो, हमारी तरफ से शगुन दे देना और बता देना कि हम आए थे.”

“अच्छा, चलो, मैं तुम्हें स्पैशल ऐंट्री दिलवाती हूं.”

“कैसे…?”

“अरे यार, एक सेकंड का काम है. जिस तरफ से लोग स्टेज से उतर रहे हैं, तुम लोग उधर से मेरे साथ आ जाओ, शगुन अपने हाथ से दो और वहीं सब से मिलो, फोटो खिंचवाओ, आओ.”

मुझे उस की यह चंट बहन नहीं, इस समय वह मुझे मुश्किलों से उबारने वाली देवदूत सी बहन लगी. हम उस के पीछेपीछे चल पड़े और वह बड़े आराम से हमें उतरने वाली साइड से स्टेज पर ले गई, मेजबान दोस्त अब कहीं जा कर गले मिले, हम ने शगुन का लिफाफा दिया, फाइनली इस लिफाफे का बोझ हमारे दिल से कम हो पाया था. हमारा संघर्ष खत्म हो गया था, पर हमें इस तरह से स्टेज पर जाते देख लाइन में खड़े लोगों ने नाराजगी भरा शोर सा मचाया. हम जल्दी से स्टेज से उतर कर अपनी राह हो लिए, मन में आया, ‘ऐ लोगो, कभी कहीं और भी गलत बातें देख आवाज उठा लिया करो. सब जगह चल रही धांधलेबाजी देख चुप रहते हो, यहां भी फिर चुप ही रहो, अपनी बारी आई तो जरा सी भी गलत बात बरदाश्त नहीं हुई.

हुंह, मैं इठलाती सी किला फतेह जैसी भावना से पति के साथ वापसी के लिए कार में बैठ गई.

“क्या सोच रही हो…?”

“भारत लाइन प्रधान देश बनता जा रहा है, कभी नोटबंदी की लाइन, कभी राशन की लाइन, शादी में शगुन की लाइन, खाने की लाइन, बस की लाइन… शादी के कार्ड में अब अकाउंट नंबर भी देने चाहिए, जिस से लोग कम से कम शादी में आ कर कुछ तो ऐंजौय कर लें, शगुन सीधे अकाउंट में डाल देना चाहिए. आजकल पेटीएम है, फोन पे है, कितना कुछ तो है. यह लाइन खत्म होनी चाहिए.”

“तुम और तुम्हारे आइडिया,” हंसते हुए कह कर उन्होंने कार स्टार्ट कर दी थी, पर आप बताइए कि यह आइडिया अच्छा है न. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : लोग क्या कहेंगे

Hindi Family Story : दरवाजे की घंटी की आवाज सुनते ही सुलोचना हड़बड़ा कर खड़ी हो गई.

‘’इतनी देर हो गई बातों में, समय का पता ही न चला. 6 बज गए और यह आ गए.’’

उन के साथ बैठी प्यारी ननद गीता ने आखें नचा कर कहा,”तो क्या हो गया? 6 ही तो बजे हैं, आप सब तो 9 बजे खाना खाने वालों में से हो.’’

“वह तो ठीक है लेकिन आज राजेश सीमा को ले कर आने वाला जो है. मैं ने तो अभी तक कोई तैयारी भी नहीं की है.”

राजेश सुलोचना का इकलौता लड़का है जो 5 साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर हैदराबाद नौकरी करने चला गया था और 6 महीने पहले ही ट्रांसफर ले कर अपने शहर इंदौर वापस आया था.

उस की उम्र 27 वर्ष की हो चुकी थी और न सिर्फ सुलोचना और उन के पति बल्कि उन के सभी रिश्तेदार और पड़ोसी राजेश के लिए एक पत्नी की तलाश में लगे हुए थे.

आजकल के बच्चों के विचारों से वाकिफ सुलोचना और मनोहरलाल राजेश पर अपनी पसंद नहीं लादना चाहते थे और इस कारण जब राजेश ने उन के सुझाए 10-12 प्रस्तावों को मना कर दिया तो उन्हें उन्होंने उस से सीधी तरह उस की अपनी पसंद के बारे में पूछ लिया.

राजेश ने बताया कि वह यहीं इंदौर में उस के औफिस में काम करने वाली अपनी जूनियर सीमा को पसंद करता है लेकिन अभी तक उस ने सीमा से इस बारे में कोई बात नहीं की है. सुलोचना ने राजेश को कहा कि वह सीमा को घर ले कर आए. यह पिछले हफ्ते की ही बात थी और आज राजेश सीमा को ले कर घर आ रहा था.

आज ही सवेरे सुलोचना की ननद गीता भी 3 महीने बाद भोपाल से आई थी और अपनी प्यारी भाभी के पिछले 3 महीनों का हिसाब विस्तारपूर्वक लेने में लगी हुई थी.

गीता सुलोचनाजी के पति मनोहरलाल की लाङली 8 साल छोटी बहन थी. सुलोचना, मनोहर लाल और राजेश के अलावा घर में सुलोचना की सास मनोरमा देवी भी रहती थीं. मनोरमा देवी ने काफी तकलीफों का सामना करते हुए मनोहरलाल और गीता का पालनपोषण किया था. वह बेहद मेहनती और दिखावेबाजी से दूर रहने वाली महिला थी. घर के सभी सदस्य उन का बहुत सम्मान करते थे.

सीमा के आने की बात सुनते ही गीता देवी तुरंत नहाने और तैयार होने को चल पड़ी और सुलोचना देवी ने किचन की राह संभाली.

किचन में सारा काम बिखरा पड़ा था. औफिस से घर आए पति को चाय बना कर देना भी आवश्यक था और यह सब करतेकरते घड़ी में 6:30 बज गए. सुलोचना फिर से बाहर ड्राइंगरूम में आई और सामान थोड़ा सजाया. फिर किचन की तरफ बढ़ी ही थी कि दरवाजे की घंटी फिर से बज गई.

दरवाजे पर राजेश एक शालीन संकोची दिखने वाली लड़की के साथ खड़ा था,”नमस्ते आंटी,” लड़की ने मीठी आवाज में सुलोचना का अभिनंदन किया.

“नमस्ते बेटी. अंदर आओ, अंदर आओ,” कहते हुए सुलोचना ने सीमा को बैठने का इशारा किया और राजेश से बोली,”अरे बेटा, रोज तो 7:15 – 7:30 घर आते हो, आज 6:45 बजे ही पहुंच गए. क्या सीमा को घर लाने की इतनी जल्दी थी?”

“नहीं, यह बात नहीं, रोज तो मैं शेयर टैक्सी से आता हूं पर आज सीमा के साथ इस की स्कूटी पर निकल पड़ा इसलिए जल्दी पहुंच गया.”

सीमा को देख कर सुलोचना को राजेश की पसंद पर गर्व हो आया. सीमा दिखने में तो आकर्षक थी ही उस की बातचीत और कपड़े पहनने के लहजे से शालीनता स्पष्ट नजर आ रही थी. सुलोचना सीमा से उस की पढाई, शौक और घरपरिवार के बारे में बात करने लगी. हालांकि सीमा काफी खुशमिजाजी से ही बात कर रही थी फिर भी सुलोचना को पता नहीं क्यों उस के चेहरे पर कई बार गंभीरता के लक्षण आतेजाते नजर आए, खासकर जब सुलोचना उस के परिवार के बारे में पूछ रही थी.

मनोहरलाल और गीता ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया और राजेश ने सीमा से उन का परिचय कराना आरंभ किया.
सुलोचना झटपट किचन में जा कर नाश्ते की तैयारी में लग गई.

कढ़ाई में समोसे डालने के बाद सुलोचना ने मिक्सी में चटनी पीसना शुरू किया ही था कि चीं… चीं…की आवाज के साथ मिक्सी बंद हो गई .

सुलोचना ने झल्लाते हुए मनोहरलाल को आवाज लगाई,”अजी जरा बिल्डिंग के इलैक्ट्रीशियन को तो बुलाओ, यह मिक्सी फिर से खराब हो गई.”

“अभी पिछले हफ्ते ही तो ठीक करवाई थी,” मनोहर लाल बोले,”अभी शाम को 7:00 बजे इलैक्ट्रिशियन कहां से मिलेगा. अब तो मिक्सी कल ही ठीक होगी.”

“पर बिना चटनी के तो समोसे का कोई मजा ही नहीं आएगा,” सुलोचना का मुंह लटक गया,”बेटा राजेश, तू एक बार देखेगा क्या?”

“मम्मी, आप को तो पता ही है कि यह सब काम मुझ से नहीं होते. आप चिंता न करो आप के हाथ के समोसे तो इतने बढ़िया होते हैं कि हम बिना चटनी के तो क्या बिना तले ही खा लेंगे.”

सुलोचना ने सीमा की ओर देखा और कहा,”इन दोनों बापबेटों से घर का कोई काम कहो तो इन का जवाब ऐसा ही होता है. हमारी बिल्डिंग का इलैक्ट्रिशियन भी बहुत ढीला काम करता है. चलो, अब टोमैटो सौस के साथ ही समोसे खा लेंगे.” यह सुन कर सीमा उठ खड़ी हुई और बोली, “आंटी, मैं एक बार देखूं ?”

“अरे नहीं बेटी, यह तो बिजली मिस्त्री का काम है. मिक्सी भी कितनी पुरानी है, कब से बदलने की सोच रही हूं.”

“कोई बात नहीं आंटी, एक बार मुझे देखने तो दीजिए,” सीमा ने किचन में पड़ा चाकू उठाया और तार के जले हुए हिस्से को साफ करने में जुट गई. उसे यह करता देख राजेश ने कहा “बहुत बढ़िया, तुम्हें यह काम भी आता है यह तो मुझे पता
ही न था. हमारी आयरन पर भी जरा एक नजर डाल लो.”

सीमा ने मुसकराते हुए कहा, “जरूर मैं वह भी कर दूंगी पर फिलहाल आप मुझे एक स्क्रूड्राइवर और थोड़ा टेप खोज कर दीजिए.” जब तक राजेश स्क्रूड्राइवर खोज कर लाता सीमा ने मिक्सी को उठा कर देखा और कहा “आंटी तार जलने में न तो मिक्सी का दोष है और ना इलैक्ट्रिशियन का. इस के हवा के सारे छेद बंद हो गए हैं और इस वजह से मिक्सी गरम हो कर खराब हो जा रही है. कोई पुराना टूथब्रश मिलेगा क्या?”

5 मिनट के अंदर सीमा ने तार का जला हुआ हिस्सा वापस जोड़ दिया और मिक्सी की पूरी सफाई कर डाली,“लीजिए, आंटी आप की मिक्सी फिर से सेवा में हाजिर है.”

सुलोचना ने जैसे ही मिक्सी का बटन दबाया मिक्सी चल पड़ी. “अरे मिक्सी की आवाज भी बहुत कम हो गई, बहुत बढ़िया.”

“और क्या आंटी, आज के जमाने में इतनी बढ़िया मिक्सी नहीं मिलती. आप इस का वजन तो देखो असली तांबे के तारों से इस की मोटर बनी है,”अपनी प्यारी मिक्सी की तारीफ सुन कर सुलोचना प्रसन्न हो गई. “चलो बेटी तुम बाहर सब के
साथ बैठो, मैं अभी आती हूं.”

“नहीं आंटी, मैं भी आप का साथ देती हूं. मुझे भी समोसे बनाना आ जाएगा,” सीमा के हाथों में गजब की फुरती थी और सुलोचना के बताए तरीके से उस ने फटाफट समोसे बना डाले. दोनों नाश्ते की प्लेटें ले कर बाहर आईं.

राजेश जा कर मनोरमा देवी को बुला लाया और सभी ने अच्छे से नाश्ता किया. मनोरमा देवी ने सीमा से बातें तो थोड़ी ही कीं लेकिन उसे लगातार देखती जरूर रहीं.

“अच्छा आंटी, 8:00 बज गए हैं, मैं चलती हूं. आप सभी के साथ बातों में सवा घंटा कैसे निकल गया पता ही न
चला.”

“क्या खाना नहीं खाओगी, सीमा?”

“नहीं आंटी, खाना तो मेरा घर पर तैयार पड़ा होगा. फिर कभी प्रोग्राम
बनाती हूं,” सब को नमस्कार कर सीमा निकल पड़ी.

सीमा के जाने के बाद सुलोचना और गीता ने एकसाथ उस की बढ़ाई करनी शुरू कर दी. वास्तव में दोनों ने अपनी आंखों से सीमा की कुशलता और सुंदरता को देख लिया था और अभी तक उन्होंने राजेश के लिए जितने भी रिश्ते देखे थे उन की तुलना में सीमा उन्हें बहुत ही बेहतर लगी.

गीता ने कहा,”दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी बन पड़ेगी मनोहर भैया, अब तो चट मंगनी पट ब्याह कर डालो.”

उन की बातें सुनकर राजेश ने कहा,”बुआजी, मैं आप को सीमा के बारे में कुछ और भी बताना चाहता हूं. ऐसा करें हम डिनर के बाद बात करते हैं, नहीं तो दादी को सोने में देर हो जाएगी.”

राजेश की बात सुन कर सुलोचना और गीता चकरा गए फिर भी उन्होंने कहा,”ठीक है, तुम लोग चेंज कर के आओ. 9:00 बजे खाना टेबल पर तैयार रहेगा.”

खाना बनाते बनाते सुलोचना और गीता देवी के दिमाग में प्रश्न ही प्रश्न चक्कर लगा रहे थे. एक बात तो स्पष्ट थी कि बात गंभीर ही है और राजेश दादी के सामने इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाहता है. खाने का काम 9:30 बजे पूरा हुआ और मनोरमा देवी अपने कमरे में चली गई.

“हां बेटा राजेश, बोलो क्या सरप्राइज़ दे रहे हो ?” मनोहरलाल ने जबरन अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए वातावरण को हलका करने की चेष्टा की हालांकि उन का मन भी अंदर से धकधक कर रहा था कि राजेश पता नहीं क्या बात बताने वाला है. वास्तव में राजेश ने जो कहा वह सुन कर सब का दिमाग घूम गया.

राजेश ने कहा, “मां सीमा एक विधवा है. आज से 2 साल पहले इस का विवाह यहीं इंदौर में धूमधाम से एक व्यवसायी परिवार में हुआ था. देर रात तक विवाह की रस्में पूरी करने के बाद बारात सवेरे ग्वालियर पहुंची. बहू का ग्रहप्रवेश करवाया गया. बाराती अपनेअपने सामान को सजाने में जुट गए और लड़कियां सीमा से बातें करने में.

सीमा का पति भी वहीं बारबार आजा रहा था और लड़कियां उस का मजाक उड़ा रही थीं,“अरे भैया कुछ देर हम भी तो बातें कर लें, आप के पास तो यह हमेशा रहने वाली है, आप को इतनी क्या जल्दी है?”

इतने में सीमा की सास ने सीमा के पति को आवाज दी,”अरे बेटा, शादी की मिठाई ले कर ज्ञानदेव बाबा के आश्रम चला जा.”

उस परिवार में ज्ञानदेव बाबा को जीताजागता देवता माना जाता था और घर का हर काम उन के आदेशों पर ही होता था.

“मां, मैं तो बहुत थका हुआ हूं. क्या अभी जाना जरूरी है? शाम को तो सीमा को ले कर वहां बाबा का आशीर्वाद लेने जाना ही है.”

सीमा की सास ने गरम होते हुए कहा,”और अगर ज्ञानदेव बाबा को पता चल गया कि बारात सवेरे आई लेकिन मिठाई उन के यहां शाम को पहुंची है तो क्या वह बासी मिठाई पर नजर भी डालेंगे? बैठ जा मुन्नू के पीछे मोटरसाइकिल पर और मिठाई पहुंचा कर आजा.”

पीछे से लड़कियों ने आवाज लगाई,”हां ताई, भैया को तो भाभी से बातें करनी है इसलिए इन्हें आलस आ रहा है.”

सीमा का पति झेंपते हुए मिठाई के थैले ले कर अपने चचेरे भाई के पीछे मोटरसाइकिल पर बैठ गया. घंटे बाद दरवाजे पर काफी आवाज हुई. जब लोगों ने दरवाजे पर पुलिस को खड़ा देखा तो सब के होश गुम हो गए.
पता चला कि आधी नींद में मोटरसाइकिल चलाता हुआ मुन्नू ज्ञानदेव बाबा के आश्रम के बाहर एक ट्रक से टकरा गया था.

मुन्नू बुरी तरह घायल हो गया था और सीमा का पति जिस ने अपनी नवविवाहिता पत्नी की शक्ल तक ठीक से नहीं देखी थी, आश्रम के दरवाजे के सामने निर्जीव पड़ा था. घर में हाहाकार मच गया. चारों ओर रोनेधोने की आवाज गूंजने लगी. सीमा तो यह खबर सुनते ही बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो उस के आसपास कोई नहीं था. किसी ने यह देखने की जरूरत नहीं समझी कि सीमा पर क्या गुजर रही होगी.

दोपहर तक सीमा कमरे में एक जिंदा लाश की तरह पड़ी रही. करीब 3:00 बजे उस के भाई ने कमरे में कदम रखा. भाई को देखते ही सीमा चीख कर भाई से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. पता चला कि सीमा के पति की मृत्यु की खबर मिलते ही सीमा के ससुर ने उन के घर फोन किया और कहा कि वह आ कर
सीमा को ले जाएं.

रोतीबिलखती सीमा जब घर से निकल रही थी तब घर का कोई सदस्य न तो उसे संभालने आया न किसी के मुंह से उस के लिए सहानुभूति के 2 शब्द निकले. गनीमत यही थी कि किसी ने उसे कोसा नहीं, कम से कम उस के सामने तो नहीं कुछ नहीं कहा.

अगले दिन सीमा की ससुराल वालों ने उस का सारा सामान वापस भेज दिया और हमेशा के लिए रिश्ता खत्म कर लिया. सुनने में आया कि ज्ञानदेव बाबा ने इस हादसे की जिम्मेदारी सीमा के सिर पर थोपी थी नकि सीमा की सास की बेवकूफी पर जिस ने बच्चों को जिद कर कर बाबा को मिठाई पहुंचाने भेजा था जबकि वह पूरी रात सोए नहीं थे और थके हुए थे.

धीरेधीरे सीमा ने खुद को संभाला. किसी तरह उसे अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई जिस से उस का समय गुजरने लगा और बीती बातों को भूलने में मदद मिली. अकलमंद और मेहनती तो वह थी ही, जल्दी ही कंपनी में उसका कंफर्मेशन भी
हो गया. कहते हैं न कि समय सब घावों को भर देता है. राजेश जब हैदराबाद से इंदौर वापस आया तो संयोगवश उस की पोस्टिंग उसी डिपार्टमैंट में हुई जहां सीमा काम करती थी. वह सीमा की मेहनत से बहुत प्रभावित हुआ क्योंकि सीमा अकेले ही उस के 2 मातहतों के जितना काम कर लेती थी और उसे कभी सीमा के काम में गलतियां नहीं मिलीं.

काम के मामले में सीमा से उस की रोज ही बात हो जाती थी. धीरेधीरे उसे सीमा अच्छी लगने लगी और वह उसे भावी जीवनसंगिनी के रूप में देखने लगा. तब तक उसे भी सीमा के जीवन का यह अध्याय पता नहीं था. जब उस ने सीमा के प्रोमोशन की सिफारिश एचआर डिपार्टमैंट से की तब उसे सीमा के जीवन में घटी इस दुर्घटना का पता चला.

यह सब बता कर राजेश ने कहा, “पापा, मम्मी, बुआजी, अब निर्णय आप के हाथों में है. मुझे जो कुछ पता था वह मैं ने आप को साफसाफ बता दिया है. बाकी आप किसी भी तौर पर देखें तो सीमा मेहनती है, गुणवती है और मुझे बहुत पसंद भी है. उस का छोटा सा परिवार उस से बहुत स्नेह करता है और उस के भाईभाभी उसे बहुत अच्छी तरह रखते हैं. उस
पर दूसरी शादी करने का परिवार वालों की तरफ से कोई दबाव नहीं है और आर्थिक रूप से भी वह स्वतंत्र है.”

“नहीं बेटा, यह तू क्या कह रहा है. यह कैसे हो सकता है?” सुलोचना और गीता दोनों के मुंह से यही शब्द साथ साथ निकले.

गीता ने कहा,”हमारा इकलौता बेटा एक विधवा से शादी करेगा? अरे बेटा दुनिया में लड़कियों की क्या कमी है? मैं एक से एक रिश्ते तेरे लिए खोज कर लाऊंगी. मानती हूं कि सीमा बहुत सुंदर भी है और गुणवती भी, लेकिन दुनिया में और भी ऐसी लड़कियां मिलेंगी और वह भी कुंआरी.”

सभी ने मनोहरलाल की तरफ देखा तो उन का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. उन्होंने लगभग गुर्राते हुए कहा,”हरगिज नहीं, यह कभी नहीं होगा. तुझे कुछ हो गया तो?“ मनोहरलाल का रुख गीता और सुलोचना से भी ज्यादा कड़ा था.

“पर पापा…“ राजेश कुछ कहना चाहता था पर उस की बात काटते हुए मनोहरलाल बोले, “और तुम ने यह सोचा है नालायक कि मां क्या कहेगी? मां की उम्र का पता है तुझे? अगर यह बात उन्होंने सुन भी ली तो उन की तबीयत बिगड़ सकती है. अगर उन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने हाथों से तेरा गला दबा दूंगा.”

“अरे आप धीरे तो बोलिए. आप की आवाज से ही मांजी की नींद खुल जाएगी,” सुलोचना ने कहा.

राजेश और गीता कुछ बोलने लगे इतने में मनोरमा देवी के कमरे का दरवाजा खुला. सभी लोग बोलतेबोलते चुप हो गए.

“राजेश इधर मेरे कमरे में आओ. तुम सब यहीं बैठो और हमारा इंतजार करो,” मनोरमा देवी ने बहुत पहले की कड़क आवाज में जब यह कहा तो किसी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला.

करीब 15 मिनट बाद मनोरमा देवी राजेश के साथ बाहर निकलीं और आ कर सब के साथ सोफे पर बैठ गईं. राजेश के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. गीता, सुलोचना और मनोहरलाल एकटक मनोरमा देवी की ओर देख रहे थे.

मनोरमा देवी ने कहा,“ राजेश की शादी सीमा के साथ ही होगी. मुझे यह जान कर बहुत खुशी है कि राजेश ने अपने लिए बिलकुल उपयुक्त पत्नी खोज ली है, जो हम सब मिल कर भी कभी न कर पाते.”

“मां आप क्या कह रहे हो?” मनोहरलाल बोले “आप को पता है सीमा एक विधवा है? हम एक विधवा को बहू बना कर लाएं, यह कैसे हो सकता है? लोग क्या कहेंगे? आप दुनिया की बातें, शगुनअपशगुन, रीतिरिवाज का कुछ तो खयाल करो,” मांबेटे के विरोधी विचार देख सुलोचना और गीता को चुप रहने में ही भलाई लगी.

मनोहरलाल की बात सुन कर मनोरमा देवी 2 मिनट बिलकुल शांत रहीं. इस के बाद उन्होंने जो कहा वह घर के सभी सदस्यों के लिए राजेश की बातों से भी ज्यादा चौंकाने वाला था, “ बेटा, मनोहर तू भी एक विधवा मां की संतान है.”

मां की बात सुन कर मनोहरलाल को लगा कि मनोरमा देवी अपने खुद के बारे में बोल रही हैं.

“मां, पिताजी का 72 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था तो वह बिलकुल अलग बात है.”

“नहीं बेटा, मैं यह नहीं कह रही. मैं आज तुझ से जो कहने वाली हूं यह सचाई मैं तुझे अपने जीतेजी नहीं बताने वाली थी. पर आज मुझे बोलने पर मजबूर होना पड़ा नहीं तो तुम बहुत बड़ा अनर्थ कर बैठते.”

“कैसा अनर्थ, कैसी सचाई? मां, तुम क्या कह रही हो मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा?” गीता के मुंह से बरबस निकल पड़ा. मनोरमा देवी ने कहा, “तुम सब विमला चाची के बारे में क्या जानते हो?”

विमला मनोरमा की देवरानी थी और उन का घर में अकसर आनाजाना लगा रहता था. बचपन से ही मनोहरलाल और गीता ने उन को स्नेह की प्रतिमूर्ति के रूप में जाना था. मनोरमा देवी के दोनों बच्चों से वह उतना ही स्नेह करती थीं जितना अपने बच्चों से.

“बेटा ,तुम्हारी चाची बनने से पहले विमला का एक विवाह और हुआ था और सीमा की ही तरह शादी के कुछ दिनों बाद उस का पहला पति बीमार हो कर गुजर गया. यह बात आज से 55 वर्षों पहले की है. विमला तुम्हारे दादाजी के घनिष्ठ मित्र की पुत्री थी और उस का दुख देख कर उन्होंने तुम्हारे चाचाजी से उस का पुनर्विवाह करने का निर्णय लिया.

घर के सदस्यों ने जब उन का विरोध किया तब उन्होंने भूख हड़ताल कर दी और 3 दिनों तक अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं लिया. आखिरकार घर वालों को उन की बात माननी पड़ी और विमला तुम्हारी चाची बन कर हमारे घर आ गई. बहुत थोड़े ही समय में विमला ने अपने अच्छे व्यव्हार से घर में सभी को अपना बना लिया और हमारा परिवार बहुत
अच्छे से चलने लगा. हमारी चिंता के विपरीत 1-2 सालों में ही लोगों ने इस बात को आयागया कर दिया.

विमला को मुझ से थोड़ा ज्यादा ही लगाव था क्योंकि जब तुम्हारे दादाजी ने इस रिश्ते का प्रस्ताव किया था तब पूरे घर में सिर्फ मैं ने इस का समर्थन किया था और तुम्हारे चाचा को भी इस के लिए प्रेरित किया था. शादी के 2 साल बाद विमला ने तुम्हें जन्म दिया.

मेरी गोद तब तक सूनी ही थी हालांकि मेरी शादी को 5 वर्ष हो चुके थे. अस्पताल से घर आने के बाद विमला सीधे मेरे पास आई और तुम्हें मेरी गोद में डाल दिया. मैं चकित हो कर उस की तरफ देखने लगी. बहुत मना भी किया पर विमला ने मेरी एक न मानी. उस के बाद विमला की 2 संताने और हुईं और मैं ने भी गीता के रूप में संतानसुख प्राप्त किया. तो बेटा, अब यह बताओ तुम्हें विमला चाची में क्याक्या खामियां, दोष और गलतियां दिखाई पड़ती हैं? तुम तो
उन्हें बचपन से देखते आ रहे हो. क्या तुम्हें कभी यह लगा कि विमला की वजह से तुम्हारे चाचा पर या तुम बच्चों पर किसी किस्म की आंच आई है? तुम्हें तो पता है कि तुम्हारा ब्लड ग्रुप इतना रेयर है कि लाखों में एक इंसान ही तुम्हें खून दे सकता है. जब तुम्हें कालेज में चोट लगी थी तब विमला ने 2 बोतल खून दे कर तुम्हारी जान बचाई थी. नहीं तो पूरे मध्य प्रदेश में डोनर खोजतेखोजते बहुत देर हो जाती. क्या तुम ने कभी सोचा कि उन का खून तुम से इतनी आसानी पूर्वक कैसे मैच कर गया?”

मनोहर लाल, गीता और सुलोचना के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला. राजेश सोफे से उठ कर अपनी दादी के पावों के पास बैठ गया और तीनों की तरफ देखने लगे. मनोहर लाल उठे और अपने कान पकड़ते हुए बोले,“मां, आज आप ने मुझे बहुत बड़ी गलती करने से बचा लिया. आप जो कह रही हैं वही होगा. दुनिया की मुझे कुछ नहीं पड़ी, जो जिसे जो कहना है वह कहता रहे. सीमा ही इस घर में बहू बन कर आएगी. हमें उस के जीवन में घटी दुखद घटना के बारे में उसे एक शब्द भी कभी नहीं कहना है.”

मनोरमा देवी ने कहा, “एक और बात बेटा, अभी जो कुछ मैंने तुम्हें बताया वह राज हमारे बीच में ही रहे. तुम में से कोई इस का जिक्र विमला से कभी न करना और न ही विमला के प्रति तुम्हारे व्यवहार में कोई परिवर्तन आए.”

मनोहरलाल जोरजोर से सिर हिला कर सहमति जता रहे थे क्योंकि शब्द उन के गले में अटक गए थे. गीता और सुलोचना की आंखों से जारजार आंसू बह रहे थे पर यह आने वाली खुशियों के स्वागत के आंसू थे. Hindi Family Story :

Hindi Social Story : धैर्यवान बनने के 7 नायाब नुसखे

Hindi Social Story : जीवन के हर क्षेत्र में धैर्यवान लोग ही आगे बढ़ते हैं. शेयर मार्केट हो या नौकरी का मार्केट, धैर्य के अभाव में कुछ हासिल नहीं होता. एक शेयर हो सकता है कि 3 वर्षों तक हिले ही न. जो धैर्य नहीं रख सकते वे इसे निकाल देंगे. शेयर को निकालते ही वह चढ़ना शुरू हो जाता है. तीनचार साल की तैयारी में प्रतिस्पर्धी मुश्किल से यूपीएससी निकाल पाते हैं. कईकई तो इस से अधिक समय तक साधना करते हैं. जो बीच में धैर्य खो देते हैं वे असफल हो जाते हैं.

विवाह के लिए जीवनसाथी के रूप में अच्छे मैच के लिए भी बहुत धैर्य रखना पड़ता है वरना सालोंसाल मन को जो पसंद नहीं उसी से ताउम्र काम चलाने को एक शख्स मजबूर होता है.

आखिर धैर्य की वह पाठशाला है कहां जहां आमजन इस गुण को तराशें. यह कहीं और नहीं है, हमारे ही आसपास रोजमर्रा की चीजों व घटनाओं में विद्यमान है. कुछ बानगियां हैं.

आप अपने कंप्यूटर को हर बार जब चालू करते हैं तो यह काफी वक्त लेता है. डिस्पले आएगा कि ’डोंट शट डाउन, अपडेटस आर अपलोडिंग’, आप थोड़ा धैर्यवान बन कर थोड़ा और इंतजार करते हैं. यह फिर संदेश देता है कि ’अपडेटस 30 प्रतिशत कंपलीट, डोंट स्विच औफ’.  फिर यह थोड़ी ही देर में बढ़ कर 50, फिर 70 व फिर 98 प्रतिशत कंपलीट दिखाने लगता है. आप सोचते हैं कि अपडेटस का काम खत्म और अब कंप्यूटर शुरू हुआ, लेकिन यह फिर से पुराना राग अलापने लगता है कि ’अपडेटस आर अपलोडिंग, प्लीज वेट’. और फिर ‘बैक टू स्क्वैयर वन’ की तर्ज पर मात्र 30 प्रतिशत कंपलीट  डिस्प्ले होने लगता है. यह एक तरह से आप को धैर्य का पाठ पढा़ना चाह रहा है.

दुनिया में बहुत तनाव है. लोगों में धैर्य नहीं बचा है. दरअसल, कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियां भी अनजाने में ही उपयोगकर्ता में धैर्य के गुण को बढ़ाने का काम अपनी स्वार्थसिद्धि के साथ ही साथ कर गई हैं. आखिर हर कंपनी को सीएसआर के रूप में अपने कुछ सामाजिक दायित्वों का निर्वहन वैसे भी  करना ही है.

राजनीतिक दल भी इसी तरह से आम मतदाता को धैर्यवान बनाते हैं. वोट मांगने द्वारेद्वारे आते हैं. लेकिन एक बार जब सत्ता सुंदरी कब्जे में आ गई, फिर वोटर को अपने नेता से मिलने के लिए एक तरह से समय की भीख सी मांगनी पड़ती है. उसे उन के बंगले पर ’मंत्री जी प्रवास पर हैं’ का बोर्ड मुंह चिढ़ाता है. यदि वे हों भी मंत्रालय में, तो बैठक में रहते हैं या फिर किसी अन्य जरूरी काम में व्यस्त रहते हैं. उसे घंटों इंतजार करना पड़ता है. मतदाता यह समझता नहीं. इस तरह से वे धैर्य का गुण, जो कि जिंदगी में सफल होने के लिए बहुत जरूरी है, विकसित करने का विराट कार्य करते हैं. यह सच्ची जनसेवा है. मतदाता को इस के लिए उन का धन्यवाद अदा करना चाहिए.

हमारे सिनेमा ने भी हमें धैर्यवान बनाने का बीड़ा अलग तरह से उठा रखा है. असल मूवी शुरू होने के पहले के ट्रेलर आप को दनादन झेलने पड़ते हैं. एकदो के बाद आप सोचते हैं कि बस, अब सैंसर बोर्ड का बहुप्रतीक्षित पलक झपकते गायब होने वाला काला सफेद सर्टिफिकेट स्क्रीन पर दिखेगा. गंगाधर को आज तक यह समझ नहीं आया कि कलर मूवी का सर्टिफिकेट आज तक कलर्ड क्यों नहीं हुआ. उस के बाद, बस, आप की वो हिट मूवी. पर तीसरा व चौथा ट्रेलर किसी फिल्म का या उत्पाद का विज्ञापन आ जाता है. अब आप सोचते हो कि हो गया. लेकिन 5वीं विज्ञापन फिल्म आप को हिट करती है. सातआठ विज्ञापनों के बाद ही आप की पसंदीदा मूवी, अब इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं, की तर्ज पर आती है. सिनेमा वालों का यह  एक तरह का अपना सीएसआर है दर्शकों में धैर्य का गुण विकसित करने का.

धैर्य के गुण को विकसित करने का एक और तरीका है कि आप लोक सेवा आयोग की परीक्षा दें. आप प्रारंभिक देंगे तो 3 बार उस की तारीख बढ़ेगी. एक बार पेपरआउट होने पर, दूसरी बार पेपर में गलत प्रश्न आने के चलते कोर्ट में याचिका लगने पर और तीसरी बार किसी अन्य कारण से. देरी का कारण तो अपनेआप पैदा हो जाएगा. तो, दोतीन साल तो प्रारंभिक परीक्षा देने में निकल जाएंगे. फिर मुख्य की तारीख ही नहीं आएगी क्योंकि किसी पेंच के कारण प्रारंभिक का परिणाम अटका रहेगा और आप को बेरोजगारी का झटका लगता रहेगा. सालछहमाह और ऐसे ही निकल जाएंगे. फिर मुख्य परीक्षा 2 बार टलेगी. उस का परिणाम भी 2 बार टलेगा. कहीं आरक्षण का या डोमिसाइल का पेंच फंस जाएगा, तो मुख्य का परिणाम अटक जाएगा. इस तरह हो गए होंगे 3 साल. तब तक बाद की 2 और परीक्षाओं का भी कुछकुछ शेडयूल शुरू हो गया होगा. पता ही नहीं चलेगा कि कौन सी पहले हो रही और कौन सी बाद में.

धैर्यवान बनने का एक और आसान देशी तरीका है. यातायात जाम में फंस जाएं, इस के लिए वह सड़क चुनें जहां कि अकसर जाम लगता हो. यहां एक एक इंच आगे बढ़ने में जो मशक्कत करनी होगी, जो तूतूमैंमैं होगी उस से आप खुद धैर्यवान बन जाएंगे. हां, एक बार, 2 बार नहीं, ऐसी सड़क से आप रोज गुजरें. आप में कूटकूट कर धैर्य का गुण विकसित हो जाएगा.

अभी की पीढी़ बहुत धैर्यवान होती जा रही है, खासकर वे जिन के कोई अपने दूसरी लहर में कोरोना से संक्रमित हुए हों. तो ये कैसे धैर्यवान बन गए. औक्सीजन बैड लेने या सिंपल बैड लेने को इन को पच्चीसों अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े. रोज सुबह से शाम हो जाए, तब मुश्किल से कहीं बैड मिले, वरना एक बैड पर ही 2 मरीज हो गए. इस शर्त पर कि औक्सीजन सिलैंडर आप अपने कंधे पर या कंधा मजबूत न हो तो लुढ़का कर ले जाओ. फैक्ट्री से खुद भरवा कर लाओ. वहां जो आदमी दोपहर में लाइन में लगा, तो दूसरे दिन शाम तक नंबर आया. सोचिए, कितने अधिक धैर्यवान होंगे ये लोग. परंतु भाईसाहब, वह क्या दौर था, यमराज की डिक्शनरी में धैर्य नहीं रहता, वह तो पलक झपकते आ जाता था.

किसी स्पैशल ट्रेन में किसी यात्री से ’आप की यात्रा शुभ हो’ कहें. वह पहले 4 घंटे लेट होगी. 4 घंटे तो इस के लिए  सब से कम हैं. फिर  6 व 8 घंटे हो जाएगी. फिर 10, फिर 14 और आखिरकार असीमित लेट हो कर कैंसिल ही हो जाएगी. तो आखिर, धैर्य का गुण आप में कैसे विकसित न होगा.

धीरज पत्नी भी सिखाती हैं. पत्नी के साथ वैवाहिक या ऐसे ही किसी कार्यक्रम में जाएं. यकीन मानिए, आप को तैयार हुए आधा घंटा, फिर एक घंटा हो चुका होगा लेकिन पत्नी अभी तैयार होने की तैयारी ही चल रही होगी. साड़ी, ज्वैलरी छांट रही होगी, अपने गेसुओं को ड्राअर से सुखा रही होगी. इस में आप की जान सूख रही होगी तो सूख जाए. वैसे भी, शादीशुदा आदमी जिम्मेदारियों के बोझ में चुसे आम सा 2 बार साल में ही हो जाता है. आप को कौन सोलहश्रंगार करना होता है. और फिर आप के पास सोलहश्रंगार के लिए है क्या? आप उन की समस्या भी तो समझिए. ऐसे माह में कम से कम तीनचार मौके हो जाएं तो आप इतने धैर्यवान बन जाएंगे कि क्या बताएं. वैसे, आप इस अनुभव से दोचार हो चुके होंगे. जरूरत है तो इसे थोड़ा और निखारने की. आप के घर के पास सिनेप्लैक्स हो, तो आप तो तैयार हो कर मूवी देखने चले जाएं, लौट के आने के बाद भी उसे 15 मिनट और लगेंगे. इस तरह से धैर्य का अभ्यास करने से मौकेबेमौके आप को काफी सहारा मिलेगा. वैसे, एक बात है जिस ने विवाह कर लिया है वह धैर्यवान अपनेआप बन जाता है. कैसे? हमेशा पत्नी ही बोलती है, आप को मौका नहीं मिल पाता है. आप बोलना चाहें कि वह बोलने लगती है. आप मन मसोस कर रह जाते हैं. इस तरह आप अपनेआप धैर्यवान बन जाते हैं.

धैर्यवान बनने के 7 उपाय हो गए हैं. एक और उपाय बोनस के तौर पर आप की खिदमत में पेश है. बेवजह के कार्य से ही किसी सरकारी अधिकारी से मिलने चले जाएं. अपने साथ करीब दोचार घंटे का फालतू समय ले कर जाएं क्योंकि आप फालतू में जिन से मिलने जा रहे हो, वे फालतू नहीं हैं. पहली बार तो वे मिलेंगे ही नहीं, दौरे पर होंगे. दूसरी बार स्वास्थ्य लाभ के कारण वे घर में हो सकते हैं. तीसरी बार किसी जरूरी मीटिंग में होंगे. जिस दिन अगर होंगे तो वे जनसुनवाई कर रहे होंगे. लेकिन आप की सुनवाई नहीं होगी.

हम खालिस प्रेमी हैं तो धैर्य की चलतीफिरती पाठशाला के बारे में बताना बहुत जरूरी है. उन सरकारी अधिकारी महोदय को आप हलका करवाने को बाहर भर ले जाएं. वे यहांवहां इतना सूंघासांघी करते रहेंगे कि आप परेशान हो जाओगे. रास्ते में पड़ने वाले सारे चौपहियादोपहिया पर अपना ककड़ी सा पैर उठाएंगे. आप को लगेगा कि अब हलके होने ही वाले हैं. लेकिन कहां, वे तो अभी मिनी वाश में बिजी हैं. बहुत बड़ी जिम्मेदारी इन की पूछ पर है. सारी गाड़ियों में फिर मिनी वाश सेवा. आप को वे इतना यहां से वहां घुमाएंगे कि आप थक जाओगे. तब कहीं यदि उन का मन आप की तकलीफ महसूस कर पसीज गया तो वे पिछवाड़े को अदा से झुका कर हलके होंगे. एक डौगी धैर्य सिखाने की ये चलतीफिरती पाठशाला हैं.

आइडिया तो गंगाधर के पास और भी हैं, बाकी फिर कभी! Hindi Social Story :

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