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हाई हील: कहीं बदल न दें चाल

महिलाओं को ऊंची एड़ी के सैंडिलों या जूतों से खासा लगाव होता है. यह जान कर हैरानी होगी कि जिस हील को महिलाएं बड़े प्यार से पहनती हैं वह उन के घुटनों को कमजोर कर रही होती है. जर्नल औफ और्थोपैडिक्स रिसर्च के हालिया अध्ययन से सामने आया है कि जो महिलाएं 3.5 इंच या इस से ऊंची हील के जूते या सैंडिल पहनती हैं, उन्हें उम्र से पहले ही घुटनों के जोड़ों की समस्या हो सकती है या उन में औस्टियोआर्थ्राइटिस का जोखिम बढ़ सकता है.

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को आर्थ्राइटिस होने का खतरा ज्यादा रहता है. अधिक वजन और ऊंची एड़ी के जूते के प्रयोग जैसे कारक इस खतरे को और ज्यादा बढ़ा देते हैं.  साल 2011 में औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधान से पता चला कि घुटने की समस्या की शिकायत करने वाली 63 फीसदी से ज्यादा महिलाओं को आर्थ्राइटिस की मुख्य समस्या रही है.

सो ऊंची एड़ी के सैंडिल पहनने वाली महिलाओं को सतर्क होने की जरूरत है क्योंकि इस से घुटनों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है.

महिलाओं के मामले में ज्यादा व्यापक कूल्हे और थोड़े अंदर की तरफ मुड़े घुटने जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं.

इस के साथ महिलाएं पुरुषों की तुलना में अलग तरह से पैर की मांसपेशियों का इस्तेमाल करती हैं. इस से उन के घुटनों में चोट का खतरा बढ़ सकता है.

इस के अलावा, ऊंची एड़ी के सैंडिल या जूते घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं जिस से जोड़ों पर ज्यादा तनाव या ऐंठन होती है.

अकसर महिलाएं सेहत और आराम से बिलकुल अंजान होती हैं, इसलिए वे ऊंची एड़ी के सैंडिल जूते पहनना पसंद करती हैं. घुटने में आर्थ्राइटिस के कई कारकों में जीवनशैली से संबंधित कारक प्रमुख हैं.

टोटल नी रिप्लेसमैंट यानी घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी उन रोगियों को कराने की सलाह दी जाती है जिन के घुटने के जोड़ बिलकुल क्षतिग्रस्त हो चुके हों या विकृत हों ?या फिर रोगी को गंभीर दर्द हो और अन्य गैर सर्जिकल विकल्प काम न कर रहे हों.

राउंड नी या सिंगल रेडियस नी तकनीकों की मदद से टोटल नी रिप्लेसमैंट से लाखों लोगों को दर्द से मुक्ति मिली है और घुटने में आर्थ्राइटिस की समस्या से परेशान रोगियों के घुटने के जोड़ सामान्य तरीके से काम करने लगे हैं.

राउंड नी या सिंगल रेडियस नी सिस्टम

राउंड नी या गैटअराउंड नी विशिष्ट घुटने का सिस्टम है जिस से सर्जरी के बाद घुटने को प्राकृतिक व सहज गतिशीलता मिलती है. पारंपरिक अंडाकार नी सिस्टम की तुलना में सिंगल रेडियस या राउंड नी सिस्टम के कई फायदे हैं. गैटअराउंड नी प्राकृतिक मानव घुटने की तरह गोलाकार गतिशीलता करता है जिस से गतिविधियां स्थिर और सहज होती हैं.

राउंड नी सिस्टम में क्वाड्रिसेप्स (जांघ) मांसपेशियों पर कम जोर पड़ता है जिस से रिकवरी तेजी से होती है और दर्द कम होता है. टोटल रिप्लेसमैंट सर्जरी से महिलाएं वापस ऊंची एड़ी के सैंडिल पहन सकती हैं लेकिन सिर्फ कभीकभार.

हालांकि कई आधुनिक तकनीकों की वजह से जिंदगी आसान हो गई है लेकिन हमेशा स्टाइल और सेहत के बीच संतुलन बना कर रखना जरूरी होता है. अगर आप को ऊंची एड़ी के जूतों से प्यार है तो थोड़ा खयाल रखें. अपने शरीर की सुनें, कभी भी अपने शरीर की सहनशीलता के स्तर को पार न करें.

डा. एल तोमर. 

(लेखक मैक्स अस्पताल, पटपड़गंज, दिल्ली में जौइंट रिप्लेसमैंट के सीनियर कन्सल्टैंट हैं.)

रद्दी अखबारों को उपयोग करने के 15 टिप्स

समाचार पत्र लगभग प्रत्येक घर में आता है एक दिन के बाद आमतौर पर उसकी उपयोगिता भी नहीं रह जाती. डे बाय डे इनकी गड्डी मोटी होती जाती है और एक दिन हम इन्हें उठाकर रद्दी वाले को दे देते हैं. प्रतिदिन के समाचार पत्र को उसकी गड्डी में रखने से पूर्व यदि आपके उपयोग का कोई पृष्ठ है तो सर्वप्रथम आप उसे अलग कर लें. घर में नियमित रूप से आने वाले न्यूज पेपर को आप घरेलू कार्यो में कैसे उपयोग कर सकतीं हैं प्रस्तुत हैं ऐसे ही कुछ टिप्स-

1-घर की खिड़कियों, वाश बेसिन और ड्रेसिंग टेबल के कांच पर आप कुछ बूंदे लिक्विड सोप की डालकर पुराने पेपर से पोंछे कांच एकदम नया सा चमक उठेगा.

2-पेपर पर कुछ बूंदे पानी की छिड़कें और फिर खिड़की, दरवाजों, ड्रेसिंग टेबल, डायनिंग टेबल आदि की सनमाईका को साफ करें. सनमाईका एकदम दाग धब्बे मुक्त हो जाएगी.

3-जो पर्स और लेदर के जूते चप्पल आप कभी कभार प्रयोग करते हैं उनके अंदर पुराने पेपर भर दें और रद्दी पेपर में ही लपेटकर किसी पॉलीबेग या गत्ते के डिब्बे में रखने से आप जब भी इन्हें प्रयोग के लिए निकालेंगी नए ही लगेगें.

4-पूरे पेपर को सिंगल सिंगल पेज में अलग करके अपनी किचन में रखें, पूरी, परांठा, पकौड़ा और मठरी आदि बनाते समय इसे टिश्यू पेपर की तरह प्रयोग करें.

5-पपीता, आम, केले, चीकू जैसे कम पके फलों को रददी पेपर में लपेटकर रखने से वे जल्दी पक जाएंगे.

6-बरसात और सर्दी के दिनों में जब कई कई दिनों तक धूप नहीं निकलती तो डोरमैट आदि सूख नहीं पाते ऐसे में आप इन्हें पेपर में लपेटकर रात भर के लिए रखें इससे डोरमैट की नमी खत्म हो जाती है.

7-सर्दियों में भरपूर मात्रा में आने वाली पालक, बथुआ, मैथी जैसी हरी सब्जियों को धोकर छलनी में 1 घण्टे तक  रखें, फिर रात भर के लिए पेपर पर फैला दें. पेपर सब्जी के पूरे पानी को सोख लेगा. सुबह इसे बारीक काटकर एयरटाइट डिब्बे में भरकर रखें.

8-महंगी क्रॉकरी जिसे आप कभी कभार ही प्रयोग करतीं हैं, उसे प्रयोग करने के बाद पुराने पेपर में लपेटकर रखें, इससे क्रॉकरी पर स्क्रैच नहीं पड़ेंगे.

9-घर की आलमारियों, किचिन की कैबिनेट्स आदि में प्लास्टिक शीट्स के स्थान पर पेपर बिछाएं ये सस्ते भी पड़ेंगे और आपकी कवर्ड को सुरक्षित भी रखेंगे.

10-अपने प्रेस वाले को प्रेस के लिए कपड़े देते समय पुराने पेपर भी दें ताकि वह कपड़ों के बीच में पेपर लगा सके इससे प्रेस किया कपड़ा सलवटों से बच जाता है.

11-बारिश के दिनों में कार के मैट्स पर पेपर बिछाएं इससे कार कीचड़ और मिट्टी से सुरक्षित हो जाती है .

12-रोटी, परांठा पूरी आदि बनाते समय चकले के नीचे पुराना पेपर बिछाएं और बन जाने पर इसे कचरे में फेंक दें…इससे आपका प्लेटफॉर्म गन्दा होने से बच जाएगा.

13-घर  को पेंट करवाते समय पूरे कमरे में पेपर बिछाकर आपस में टेप से चिपका दें…पेंट हो जाने पर इसे उठाकर फेंक दें, इससे फर्श पर पेंट के धब्बे नहीं पड़ेंगे और फर्श साफ करने की आपकी मेहनत भी बच जाएगी.

14-पुराने पेपर को बारीक टुकड़ों में काटकर पानी में 3दिन के लिए भिगो दें. तीन दिन बाद मिक्सी में पीसकर एकसार कर लें, अब इसमें प्लास्टर आफ पेरिस या मुल्तानी मिट्टी मिलाकर क्ले जैसा तैयार कर लें और छोटे बच्चों को पेपर मैशी का काम सिखाएं, बच्चों को बहुत मजा आएगा.

15-पुराने पेपर्स का सदुपयोग अपने छोटे बच्चों को क्राफ्ट वर्क करने के लिए दें ….इससे आपका कोई खर्च भी नहीं होगा और बच्चों को मजा भी आएगा.

मैं झूठ नहीं बोलती : ममता को सच बोलना क्यों पड़ा भारी?

‘‘निधि रुक जा, कहां भागी जा रही है? बस निकल जाएगी, ममता ने गेट की ओर तेजी से जाती हुई निधि को पुकारा, पर निधि तो अपनी ही धुन में थी. उस ने ममता को वहीं रुकने का इशारा किया और गेट से बाहर निकल गई. तब तक बस आ गई और सभी छात्राएं उस में बैठने लगीं. ममता जानती थी कि यदि वह निधि के पीछे गई तो उस की बस भी निकल जाएगी. अत: वह बस में जा कर बैठ गई.

तभी निधि दौड़ती हुई बस की ओर आई और बोली, ‘‘ममता, मां पूछें तो कह देना कि मेरी ऐक्सट्रा क्लास है.’’

‘‘मैं क्यों झूठ बोलूं, दादीमां कहती हैं कि सब बुराइयां झूठ से ही शुरू होती हैं,’’ ममता ने चिढ़ कर उत्तर दिया.

‘‘सतयुग में एक राजा हरिश्चंद्र थे और कलियुग में तू, तेरे जो मन में आए कह देना. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ निधि झुंझलाते हुए बोली और देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गई. ममता उसे पुकारती ही रह गई, लेकिन उस ने पीछे मुड़ कर देखा भी नहीं. उधर बस में बैठी छात्राएं निधि और ममता की बातचीत के मजे ले कर खूब हंस रही थीं.

‘‘अब तो निधि ने भी आज्ञा दे दी है. आज ही जा कर निधि की मम्मी को सब सच बता देना. समझा देना कि आजकल उन की बेटी कक्षा में कम और कैंटीन में आशीष के साथ अधिक नजर आती है. तू ने इतना सा साहस दिखा दिया तो उस के घर वाले तुझे उपहारों से लाद देंगे,’’ रचना बोली तो बस में फिर से ठहाके गूंज उठे.

‘‘क्या हो रहा है ये सब? रचना, मैं ने तुम से सलाह मांगी है क्या?’’ ममता गुस्से से बोली.

हंसहंस कर दोहरी हो रही रचना पर ममता इतनी जोर से चीखी कि हवा जैसे थम सी गई.

‘‘तुम जानो और तुम्हारी सहेली. हमें क्या पड़ी है दूसरों के झमेलों में पड़ने की,’’ रचना ने बड़ी अदा से मुंह बनाया व अपनी अन्य सहेलियों के साथ गपें हांकने लग गई. अन्य छात्राएं भी शीघ्र ही निधि प्रकरण को भूल गईं और ममता ने चैन की सांस ली. पर असली समस्या तो अभी भी मुंहबाए खड़ी थी. सत्या आंटी ने अगर पूछ लिया कि उन की बेटी निधि कहां है तो वह क्या उत्तर देगी. न वह झूठ बोल सकती है और न ही सच. निधि उस की सब से प्यारी सहेली है. उस के राज को राज रखना उस का कर्तव्य भी तो बनता है.

निधि की मां, सत्या आंटी अपने गेट के पास निधि की प्रतीक्षा में खड़ी रहती थीं. आज उन्हें वहां खड़ा न देख कर ममता ने चैन की सांस ली और लपक कर अपने घर में घुस गई.

‘‘क्या हुआ, इस तरह दौड़ कर क्यों घर में घुस गई? मैं बाहर दरवाजे पर खड़ी तेरी प्रतीक्षा कर रही थी, मुझे देखा तक नहीं तू ने,’’ उस की मां निशा अचरज से बोलीं.

‘‘बात ही कुछ ऐसी है मां, मुझे लगा कहीं सत्या आंटी सामने मिल गईं तो मैं क्या करूंगी,’’ ममता ने अपनी मां को अपना स्वर नीचे रखने का इशारा किया.

‘‘क्यों, ऐसा क्या किया है तुम ने, जो सत्या से डर रही हो,’’ मां चकित स्वर में बोलीं.

‘‘मैं ने कुछ नहीं किया है मां पर निधि…’’

‘‘क्या हुआ निधि को?’’

‘‘कुछ नहीं हुआ उसे, पर आप ने क्या देखा नहीं कि निधि मेरे साथ बस से नहीं उतरी?’’

‘‘अरे, हां, कहां गई वह? घर क्यों नहीं आई?’’

‘‘यही तो मुश्किल है मां, वह अपने मित्र के साथ घूमने गई है. मुझ से कहा कि अगर उस की मम्मी पूछें तो कह दूं कि उस की आज ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’

‘‘पर गई कहां है वह?’’

‘‘उस का एक मित्र है, आशीष, आजकल उसी के साथ घूमती रहती है. कई बार तो कक्षा छोड़ कर भी चली जाती है.’’

‘‘आशीष? यह तो लड़के का नाम है.’’

‘‘वह लड़का ही है मां, आप भी न बस…’’

‘‘पर तुम्हारा स्कूल तो केवल लड़कियों के लिए है. वहां यह आशीष कहां से आ गया?’’

‘‘स्कूल तो लड़कियों के लिए है पर स्कूल के बाहर तो लड़के भी होते हैं, मां. हमारे स्कूल के आसपास तो लड़के कुछ अधिक ही मंडराते रहते हैं.’’

‘‘हो क्या गया है निधि को. 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली इतनी सी लड़की को डर नहीं लगता क्या? किसी के भी साथ चल पड़ती है.’’

‘‘निधि बहुत निडर और स्मार्ट है, मां. मेरी तरह डरपोक नहीं है.’’

‘‘क्या मतलब, तुम डरपोक नहीं होती तो किसी के साथ भी घूमने चल पड़ती,’’ मां तीखे स्वर में बोलीं.

‘‘मैं ने ऐसा कब कहा मां. आप हर बात का गलत अर्थ क्यों निकालती हो. कुछ खाने को दो न, बहुत भूख लगी है.’’

‘‘ड्रैस बदल कर और हाथमुंह धो कर आओ, तब तक खाना लगाती हूं,’’ मां रसोई में जातेजाते बोलीं.

‘‘पर मन में ममता की बातें गूंजती रहीं. किसी अनहोनी की आशंका से मन कांप उठा. खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है. कहीं निधि को देख कर ममता भी उसी राह पर चल पड़ी तो क्या करूंगी,’’ सोचतेसोचते निशा अपनी बेटी से बोली, ‘‘देख ममता, निधि तेरी मित्र है इसीलिए कह रही हूं, उस की मम्मी को सबकुछ सचसच बता दे नहीं तो बहुत बुरा मानेंगी वे.’’

‘‘और अगर सच बता दिया तो निधि मुझे कच्चा चबा जाएगी. वह मेरी सब से अच्छी मित्र है, मुझ पर विश्वास कर के ही वह अपने राज मुझे बताती है. 2 सहेलियों के बीच विश्वास ही नहीं रहा तो बचेगा क्या,’’ ममता कुछ ऐसे अंदाज में बोली कि मां अपनी हंसी नहीं रोक पाईं.

‘‘मांबेटी के बीच क्या गंभीर वार्त्तालाप चल रहा है हम भी तो सुनें,’’ तभी ममता की दादी ने कमरे में प्रवेश किया.

‘‘कुछ नहीं मांजी, यों ही स्कूल की बातें कर रही थी. कह रही थी कि दादी कहती हैं कि झूठ बोलने से बड़ा पाप और कोई नहीं है,’’ मां फिर हंस दीं.

‘‘अरे, वाह, मेरी गुडि़या तो बहुत सयानी हो गई है. जीवन में पढ़तेलिखते तो सब हैं पर गुनते बहुत कम लोग हैं और ममता गुनने वालों में से है. देख लेना यह एक दिन अवश्य तुम दोनों का नाम रोशन करेगी.’’

‘‘क्या नाम रोशन करेगी मांजी. आजकल नाम सच बोलने से नहीं पढ़नेलिखने से होता है. ममता को तो आप जानती ही हैं कि कभी 50% से अधिक अंक नहीं आए इस के.’’

‘‘अभी तो मुझे यह बताओ कि यह क्या बात थी जिस के लिए ममता झूठ बोलने से कतरा रही थी.’’

‘‘कुछ नहीं, पड़ोस में इस की सहेली निधि रहती है. एक लड़के से दोस्ती है उस की. स्कूल के बाद उस से मिलतीजुलती है, घूमने जाती है और ममता से कहती है कि उस की मम्मी पूछें तो कह देना कि स्कूल में ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’

‘‘यह तो बहुत गलत बात है. सच बोलने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता होती है. सत्य बोलना कायरों का काम नहीं है. तुम्हें अपनी सहेली के लिए झूठ बोलने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘वही तो रोना है मांजी, दोस्ती में न कुछ कहते बनता है न छिपाते. फिर ममता अपनी सहेली को खोना भी नहीं चाहती. पता नहीं किस ने उसे बता दिया है कि अपनी सहेली के राज को राज ही रखना चाहिए,’’ मां ने झिझकते हुए बताया.

‘‘अब जमाना बहुत बदल गया है. अब केवल सच बोलने से काम नहीं चलता. आज की दुनिया में बड़ा जोड़तोड़ करना पड़ता है.’’

‘‘कहना क्या चाहती हो तुम.’’

‘‘मेरा मतलब बस इतना है कि हमें दूसरों के झमेलों में पड़ने की क्या जरूरत है. मैं नहीं चाहती कि इन सब बातों का असर ममता की पढ़ाई पर पड़े.’’

‘‘सच नहीं बोलेगी तो उस पर असर पड़ेगा. हर बार अपनी सहेली के बारे में ही सोचती रहेगी ममता. तुम बच्चों के मनोविज्ञान को नहीं समझती हो,’’ दादीमां भी अपनी बात पर अड़ गईं.

‘‘आप दोनों शांत हो जाइए. मैं वादा करती हूं कि मैं किसी को भी शिकायत का अवसर नहीं दूंगी,’’ ममता नाराज हो कर अपने कमरे में चली गई.

थोड़ी ही देर में बात आईगई हो गई. ममता ही नहीं उस की मां और दादी भी सारे प्रकरण को भूल चुकी थीं, अचानक रात के 10 बजे घंटी बजी.

ममता की मां ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने निधि की मां सत्या खड़ी थीं.

‘‘जी, कहिए,’’ न चाहते हुए भी वह अचकचा गईं.

‘‘ममता कहां है, कृपया उसे बुलाइए,’’ निधि की मम्मी बोलीं.

सत्या आंटी की आवाज सुन कर ममता स्वयं ही चली आई.

‘‘ममता, निधि कहां है अब तक घर नहीं आई.’’

‘‘क्या अब तक नहीं आई,’’ मां और ममता एकसाथ बोलीं.

‘‘कुछ कह कर गई थी क्या?’’

‘‘ऐक्स्ट्रा क्लास थी ऐसा कुछ कह कर तो गई थी पर अब तक उस का कोई अतापता नहीं है, इसी से चिंता हो रही है. तुम कितने बजे घर पहुंची,’’ उन्होंने ममता से पूछा.

‘‘मैं तो स्कूल बस से ही आ गई थी. आज कोई ऐक्स्ट्रा क्लास नहीं थी,’’ डरतेडरते बोली.

‘‘तुम्हारी नहीं रही होगी. निधि कह रही थी कि यह क्लास केवल 90त्न से अधिक वाली छात्राओं के लिए है जिन की 10वीं में मैरिट लिस्ट में आने की आशा है,’’ सत्या तनिक गर्व से बोलीं.

‘‘कोई फोन आदि,’’ ममता की मां ने दोबारा पूछा.

‘‘यही तो रोना है. स्कूल वाले फोन ले जाने की अनुमति कहां देते हैं. फिर भी निधि छिपा कर ले जाती थी, पर आज भूल गई, पता नहीं कहां होगी मेरी बच्ची?’’ सत्या रो पड़ी.

‘‘धीरज रखिए, मिल जाएगी,’’ ममता की मां ने उन्हें ढाढ़स बंधाना चाहा.

‘‘क्या धीरज रखूं? मैं ने सोचा था कि शायद ममता को कुछ पता हो पर यहां भी निराशा ही हाथ लगी.’’

‘‘आंटी, मुझे पता है. आज कोई ऐक्स्ट्रा क्लास नहीं थी. निधि तो आशीष के साथ डिस्को गई थी. वह नवीन जूनियर कालेज का विद्यार्थी है, निधि उस से अकसर मिलती है.’’

‘‘क्या, इतना घटिया आरोप मेरी बेटी पर? मैं ने तो सोचा था कि तुम निधि की मित्र हो. पर अब समझ में आया कि तुम मन ही मन उस से जलती हो.’’

‘‘नहीं यह सच नहीं है. मैं भला निधि से क्यों जलने लगी.’’

‘‘मां, जल्दी घर चलो. दीदी के स्कूल की प्राचार्या का फोन आया है. वह किसी के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही थी कि दुर्घटनाग्रस्त हो गई. वह निर्मल अस्पताल में भरती है,’’ तभी निधि के भाई ने सारी बात बताई और सत्या के साथ ममता के मातापिता भी अस्पताल के लिए रवाना हो गए. रह गई थीं केवल ममता और उस की दादी दमयंती.

ममता फूटफूट कर रो रही थी और दादी उसे समझा रही थीं कि सच बोलने वालों को तो इस तरह की हर बात के लिए तैयार रहना चाहिए. पर ममता के पल्ले उन की बात पड़ी या नहीं.

सफेद परदे के पीछे: जब मिताली की जिंदगी बनी नर्क 

‘‘देखी तुम ने अपने गुरू घंटाल की काली करतूतें? बाबा कृष्ण करीम… अरे, मुझे तो यह हमेशा ही योगी कम और भोगी ज्यादा लगता था… और लो, आज साबित भी हो गया… हर टीवी चैनल पर इस की रासलीला के चर्चे हो रहे हैं…’’ घर में घुसते ही देवेश ने पत्नी मिताली की तरफ कटाक्ष का तीर छोड़ा.

‘तुम्हें आज पता चला है… मैं तो वर्षों से यह राज जानती हूं… सिर्फ जानती ही नहीं, बल्कि भुक्तभोगी भी हूं…’ मन ही मन सोच कर मिताली को मितली सी आ गई. घिनौनी यादों के इस वमन में कितना सुकून था, यह देवेश महसूस नहीं कर पाया. उस ने फटाफट जूतेमोजे उतारे और टीवी औन कर के सोफे पर पसर गया.

‘‘एक और बाबा पर गिरी गाज… नाबालिग ने लगाया धार्मिक गुरु पर यौन दुराचार का आरोप… आरोपी फरार… पुलिस ने किया बाबा कृष्ण करीम का आश्रम सीज…’’ लगभग हर चैनल पर यही ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी. रसोई में चाय बनाती मिताली के कान उधर ही लगे हुए थे. देवेश को चाय का प्याला थमा वह बिस्तर पर लेट गई.

आज मिताली अपनेआप को बेहद हलका महसूस कर रही थी. एक बड़ा बोझ जिसे वह पिछले कई सालों से अपने दिलोदिमाग पर ढो रही थी वह अनायास उतर गया था. अब उसे यकीनन उस भयावह फोन कौल से आजादी मिल जाएगी जो उस की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाए थी, जिस के चलते हर इनकमिंग फोन कौल पर उस का दिल उछल कर हलक में आ जाता था.

आंखें बंद होते ही मिताली की पलकों के पीछे एक दूसरी ही दुनिया सजीव हो उठी. चुपचाप से खड़े लमहे मिताली के इर्दगिर्द लिपट गए जैसे धुंध एकाएक आ कर पेड़ोंपहाड़ों से लिपट जाती है और वे वहां होते हुए भी अदृश्य हो जाते हैं. ठीक उसी तरह मिताली भी अपने आसपास की दुनिया से ओझल हो गई. परछाइयों की इस दुनिया में उस के साथ सुदीप है… बाबा का आश्रम… और सेवा के नाम पर जिस्म से होने वाला खिलवाड़ है…

सुदीप से उस की दोस्ती कालेज के समय से ही थी. इसे दोस्ती न कह कर प्यार कहें तो शायद ज्यादा उपयुक्त होगा. उन का कालेज शहर के बाहरी कोने पर था और कालेज से कुछ ही दूरी पर बाबा कृष्ण करीम का आश्रम था. हरेभरे पेड़ों से घिरा यह आश्रम देखने में बहुत ही रहस्यमय लगता था. दोनों अकसर एकांत की तलाश में उस तरफ निकल जाते थे. इस आश्रम का ऊंचा और भव्य मुख्यद्वार मिताली को सम्मोहित कर लेता था. वह इसे भीतर से देखना चाहती थी, लेकिन आश्रम में सिर्फ बाबा के भक्तों को ही प्रवेश की अनुमति थी.

मिताली अकसर सुदीप से अपने मन की बात कहती थी. एक दिन सुदीप ने उस से आश्रम के अंदर ले जाने का वादा किया जिसे बहुत जल्दी उस ने पूरा भी किया.

हुआ यों था कि रिश्ते में सुदीप की भाभी सुमन बाबा की भक्त थी और अकसर वहां आश्रम में सेवा के लिए जाती थी. उसी के साथ सुदीप मिताली को ले कर आश्रम गया.

आश्रम के दरवाजे पर सुरक्षा व्यवस्था बहुत सख्त थी. कई चरणों में जांच से गुजरने के बाद वे अब एक बड़े से चौगान में थे. मिताली हर तरफ आंखें फाड़फाड़ कर देख रही थी. आश्रम के बहुत बड़े भाग में ताजा सब्जियां लगी थीं. एक हिस्से में फलदार पेड़ भी थे. बहुत से भक्त जिन्हें सेवादार कहा जाता है, वहां निष्काम सेवा में जुटे थे. कुछ लोग सब्जियां तोड़ कर ला रहे थे और कुछ उन्हें तोलतोल कर वजन के अनुसार अलगअलग पैक कर रहे थे. कुछ लोग फलों को भी इसी तरह से पैक कर रहे थे. सुमन ने बताया कि ये फल और सब्जियां बाबा के भक्त ही प्रसादस्वरूप खरीद कर ले जाते हैं. सुमन स्वयं भी अपने घर के लिए फलसब्जियां यहीं से खरीद कर ले जाती है.

एक बड़े से रसोईघर में कुछ महिलाएं आश्रम में मौजूद सभी लोगों के लिए खाना बनाने में जुटी थीं तो कुछ सेवादार जूठे बरतन मांज कर अपनेआप को धन्य महसूस कर रहे थे.

मिताली ने देखा कि वहां लोगों से किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं बरता जा रहा था. हर व्यक्ति को समान सुविधा उपलब्ध थी. शायद यही समभाव सब को जोड़े था और यही बाबा की लोकप्रियता का कारण था.

मिताली को दूर आश्रम के कोने में गुफा जैसा एक कमरा दिखाई दिया. सुमन ने बताया कि यह बाबा का विशेष कक्ष है. जब भी वे यहां आश्रम में आते हैं इसी कक्ष में ठहरते हैं… यहां किसी को भी जाने की अनुमति नहीं है.

सुमन के साथ होने के कारण उन दोनों को किसी ने नहीं टोका. मिताली और सुदीप ने पूरा आश्रम घूम कर देखा. घूमतेघूमते दोनों आश्रम के दूसरे कोने तक पहुंच गए. यहां घने पेड़ों के झुरमुट में घासफूस से बनी कलात्मक झोंपडि़यां बेहद आकर्षक लग रही थीं. जगह के एकांत का फायदा उठा कर सुदीप ने उसे चूम भी लिया था.

मिताली को आश्रम की व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया. उस ने आगे भी यहां आते रहने का मन बना लिया.

‘और कुछ न सही, सुदीप के साथ एकांत में कुछ लमहे साथ बिताने को मिल जाएंगे… शहर में तो लोगों के देखे जाने का भय हमेशा दिमाग पर हावी रहता है… आधा ध्यान तो इसी में बंट जाता है… प्यारमुहब्बत की बातें क्या खाक करते हैं…’ सोच मिताली का दिमाग आगे की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने की कवायद में जुट गया. उस ने सुदीप को अपनी योजना के बारे में बताया.

‘‘यह आश्रम है कोई पिकनिक स्पौट नहीं कि जब जी चाहा टहलते हुए आ गए… देखा नहीं सुरक्षा व्यवस्था कितनी कड़ी थी…’’ सुदीप ने उस के प्रस्ताव को नकार दिया.

‘‘तुम ऐसा करो… सुमन भाभी के साथ बाबा के शिष्य बन जाओ… रोज न सही, कभीकभार तो आया ही जा सकता है… मिलने का मौका मिला तो ठीक वरना ताजा फलसब्जियां तो मिल ही जाएंगी…’’ मिताली ने उसे उकसाया.

बात सुदीप को भी जम गई और फिर एक दिन सुदीप विधिवत बाबा कृष्ण करीम का शिष्य बन गया.

मिताली और सुदीप कभी सुमन के साथ तो कभी अकेले ही आश्रम में आने लगे. अकसर दोनों सब की नजरें बचा कर उन झोंपडि़यों की तरफ निकल जाया करते थे. कुछ देर एकांत में बिताने के बाद प्रफुल्लित से लौटते हुए फलसब्जियां खरीद ले जाते.

आश्रम में आनेजाने से उन्हें पता चला कि इस आश्रम की शाखाएं देश के हर बड़े शहर में फैली हैं. इतना ही नहीं, विदेशों में भी बाबा के अनुयायी हैं, जो उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं. इन आश्रमों से कई अन्य तरह की सामाजिक गतिविधियां भी संचालित होती हैं. कई हौस्पिटल और स्कूल हैं जो आश्रम की कमाई से चलते हैं.

मिताली ने महसूस किया कि जितना वे बाबा के बारे में जान रहे थे उतना ही सुदीप का झुकाव उन की तरफ होने लगा था. अब उन की बातों का केंद्र भी अकसर बाबा ही हुआ करते थे.

मुख्य सेवादार ने उस की निष्ठा देखते हुए उसे आश्रम से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंप दी थीं. इन सब का प्रभाव यह हुआ कि अब मिताली बेरोकटोक आश्रम के हर हिस्से में आनेजाने लगी थी.

देखते ही देखते उन का कालेज पूरा होने को आया. फाइनल ऐग्जाम का टाइमटेबल आ चुका था.

‘‘अब पढ़ाई में जुटना होगा… ऐग्जाम से पहले एक आखिरी बार आश्रम चलें?’’ मिताली ने अपनी बाईं आंख दबाते हुए इशारा किया.

‘‘हां कल चलते हैं… बाबा का आशीर्वाद भी तो लेना है,’’ सुदीप ने कहा.

‘‘हाउ अनरोमांटिक,’’ वह भुनभुनाई.

‘‘कल का दिन तुम्हारी जिंदगी का एक यादगार दिन होने वाला है,’’ सुदीप ने शरारत से मुसकराते हुए उस का गाल खींच दिया.

वह दिन सचमुच ही उस की जिंदगी का एक यादगार दिन था. उस दिन मौसम भी कुछ आशिकाना सा ही था. आसमान में काले बादल छा रहे थे. हवा में बारिश की बूंदें तैर रही थीं.

हमेशा की तरह चलतेचलते दोनों झोंपडि़यों की तरफ निकल आए. तभी अचानक मौसम खराब हो गया. तेज हवा के साथ बिजली कड़की और मूसलाधार बारिश होने लगी. उन्हें वापस आश्रम लौटने तक का वक्त नहीं मिला और वे भाग कर एक झोंपड़ी में घुस गए.

कुछ मौसम की साजिश और कुछ कुंआरे से इंद्रधनुष… मिताली 7 रंगों में नहा उठी. सुदीप उस के कान में धीरे से गुनगुनाया, ‘‘रूप तेरा मस्ताना… प्यार मेरा दीवाना… भूल कोई हम से न हो जाए…’’

मिताली लाज से सिकुड़ गई. इंद्रधनुष के रंग कुछ और गहरा गए.

भीगे बदन ने आग में घी का काम किया और फिर वह सब हो गया जो उन्होंने पुरानी हिंदी फिल्म ‘आराधना’ में देखा था. बारिश खत्म होने पर दोनों घर लौट गए. इस रोमानी शाम के यादगार लमहों के बोझ से मिताली की पलकें झुकी जा रही थीं.

परीक्षा खत्म हो गई. 2 दिन नींद पूरी करने और परीक्षा की थकान उतारने के बाद मिताली ने सुदीप को फोन किया. लेकिन यह क्या? उस का फोन तो स्विचऔफ आ रहा था.

‘लगता है जनाब की थकान अभी उतरी नहीं है,’ मिताली सोच कर मुसकराई. लेकिन यह सिर्फ उस का वहम ही था. अगले कई दिनों तक भी जब सुदीप का फोन बंद मिला तो उसे फिक्र हुई. उस ने सुदीप के 1-2 दोस्तों से उस के बारे में पता किया, लेकिन किसी ने भी उसे ऐग्जाम के बाद से नहीं देखा था. मिताली ने आश्रम जा कर सुमन से बात की, लेकिन उसे भी कुछ मालूम नहीं था.

सप्ताहभर बाद उसे सुमन से पता चला कि सुदीप अचानक कहीं गायब हो गया. उस के घर वालों ने भी उस की बहुत तलाश की, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला. हार कर उन्होंने पुलिस को खबर कर दी और अब पुलिस उस की तलाश में जुटी है.

मिताली के सारे प्रयास विफल हो गए तो उस ने भी सबकुछ वक्त पर छोड़ दिया और आगे की पढ़ाई की तैयारी करने लगी. तभी एक दिन दोपहर को उस के मोबाइल पर एक प्राइवेट नंबर से कौल आई, ‘‘मिताली, मैं बाबा का खास सहयोगी विद्यानंद बोल रहा हूं. बाबा तुम से भेंट करना चाहते हैं. कल दोपहर 3 बजे आश्रम आ जाना.’’

मिताली भीतर तक सिहर गई. बोली, ‘‘माफ कीजिएगा, मेरी आप के बाबा और आश्रम में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’

‘‘तुम्हें न सही बाबा को तो है… और हां, जरा बाहर आओ, बाबा ने एक खास तोहफा तुम्हारे लिए भिजवाया है…’’ और फिर फोन कट गया.

मिताली दौड़ कर बाहर गई. मुख्य दरवाजे पर एक छोटा सा लिफाफा रखा था. मिताली ने खोल कर देखा. उस में एक पैन ड्राइव था. उस ने कांपते हाथों से उसे अपने फोन से कनैक्ट किया. उस में एक वीडियो क्लिप थी, जिसे देखते ही मिताली भय से पीली पड़ गई. यह उस के और सुदीप के उन अंतरंग पलों का वीडियो था जो उन्होंने आश्रम वाली झोंपड़ी में बिताए थे.

मरता क्या नहीं करता. मिताली अगले दिन दोपहर 3 बजे बाबा के आश्रम में थी. आज उसे उस विशेषरूप से बनी गुफा में ले जाया गया. भीतर ले जाने से पहले निर्वस्त्र कर के उस की तलाशी ली गई और उस के कपड़े भी बदल दिए गए. मोबाइल स्विचऔफ कर के अलग रखवा दिया गया. इतना ही नहीं उस की घड़ी और कानों में पहने टौप्स तक खुलवा लिए गए.

बाहर से साधारण सी दिखने वाली यह गुफा भीतर से किसी महल से कम नहीं थी. नीम अंधेरे में मिताली ने देखा कि उस के अंदर विलासिता का हर सामान मौजूद था. आज पहली बार वह बाबा से प्रत्यक्ष मिल रही थी. बाबा का व्यक्तित्व इतना रोबीला था कि वह आंख उठा कर उस की तरफ देख तक नहीं सकी. सम्मोहित सी मिताली 2 घंटे तक बाबा के हाथों की कठपुतली बनी उस के इशारों पर नाचती रही. शाम को जब घर लौटी तो लग रहा था जैसे पूरा शरीर वाशिंगमशीन में धोया गया हो.

2 साल तक यह सिलसिला चलता रहा. बाबा जब भी इस आश्रम में विश्राम के लिए आते, मिताली को उन की सेवा में हाजिर होना पड़ता. अपने प्रेम के राज को राज रखने की कीमत मिताली किश्तों में चुका रही थी.

सुदीप का अब तक भी कुछ पता नहीं चला था. आश्रम में कुछ दबे स्वरों से उसे सुनाई दिया था कि बाबा ने उसे अपने विदेश स्थित आश्रम में भेज दिया है. इसी बीच उस के लिए देवेश का रिश्ता आया. पहले तो मिताली ने इनकार करना चाहा, क्योंकि वह अपनी अपवित्र देह देवेश को नहीं सौंपना चाहती थी, पर फिर मन के किसी कोने से आवाज आई कि हो सकता है यह रिश्ता तुम्हें इस त्रासदी से आजादी दिला दे… हो सकता है कि तुम्हें आश्रम के नर्क से छुटकारा मिल जाए… और इस उम्मीद पर वह देवेश का हाथ थाम कर वह शहर छोड़ आई. शादी के बाद सरनेम के साथ उस ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया.

मगर कहते हैं कि दुख से पहले उस की परछाईं पहुंच जाती है… मिताली के साथ भी यही हुआ. शादी के बाद लगभग 6 महीने तो उस ने डर के साए में बिताए, लेकिन आश्रम से फोन नहीं आया तो धीरेधीरे पुराने दिनों को भूलने लगी थी कि इसी बीच एक दिन अचानक एक फोन आ गया, ‘‘हनीमून पीरियड खत्म हो गया होगा… कल दोपहर आश्रम आ जाना… बाबा ने याद किया है…’’

यह सुन कर मिताली डर के मारे सूखे पत्ते सी कांपने लगी. उस के मुंह से बोल नहीं फूटे.

‘‘तुम ने क्या सोचा था, शहर और फोन नंबर बदलने से तुम छिप जाओगी? अरे बाबा तो समुद्र में सूई खोजने की ताकत रखते हैं… तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अपनी औकात न भूलो… समझी?’’ एक धमकी भरी चेतावनी के साथ फोन कट गया.

फिर से वही पुराना सिलसिला शुरू हो गया. मिताली अब बुरी तरह से कसमसाने लगी थी. वह इस दोहरी जिंदगी से आजादी चाहने लगी थी. पानी जब सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो उस ने आरपार की लड़ाई की ठान ली.

‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? देवेश मुझे छोड़ देगा? ठीक ही करेगा… मैं भी कहां न्याय कर पा रही हूं उस के साथ… हर रात जैसे एक जूठी थाली परोसती हूं उसे… नहीं… अब और नहीं… अब मेरा चाहे जो भी हो… मैं अब आश्रम नहीं जाऊंगी… बाबा मेरे खिलाफ कोई कदम उठाए, उस से पहले ही मैं उस के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दूंगी,’ मिताली ने मन ही मन निश्चय कर लिया.

‘क्या तुम ऐसा कर पाओगी? है इतनी हिम्मत?’ उस के मन ने उसे ललकारा.

‘क्यों नहीं, बहुत सी महिलाएं ‘मीटू’ अभियान में शामिल हो कर ऐसे सफेदपोशों के नकाब उतार रही हैं… मैं भी यह हिम्मत जुटाऊंगी,’ मिताली ने अपनेआप से वादा किया.

अभी वह आगे की रणनीति तैयार करने की सोच ही रही थी कि किसी लड़की ने यह हिम्मत दिखा दी. बाबा और उस के आश्रम का काला सच समाज के सामने लाने का हौसला दिखा ही दिया.

‘‘अरे भई, आज खाना नहीं मिलेगा क्या?’’ देवेश ने कमरे में आ कर कहा तो मिताली पलकों के पीछे की दुनिया से वर्तमान में लौटी.

‘‘सिर्फ खाना नहीं जनाब. आज तो आप को विशेष ट्रीट दी जाएगी… एक ग्रैंड पार्टी… आखिर समाज को एक काले धब्बे से मुक्ति जो मिली है,’’ कह मिताली रहस्यमय ढंग से मुसकराई.

देवेश इस रहस्य को भेद नहीं पाया, लेकिन वह मिताली की खुशी में खुश था. मिताली मन ही मन उस अनजान लड़की को धन्यवाद देते हुए तैयार होने चल दी जिस ने उस में फिर से जीने की ललक जगा दी थी.

नायाब नहीं रहे खट्टर, नायब सिंह सैनी को मिली कमान

बात 1982 की है. केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. इंदिरा ने 1980 का लोकसभा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री के रूप में वापसी की थी. उत्तर प्रदेश कांग्रेस में उठापटख और गुटबाजी चल रही थी. इंदिरा गांधी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे चेहरे की तलाश थी जिस को ले कर कोई विवाद और गुटबाजी न हो. तलाशने के बाद इन में से एक नाम श्रीपति मिश्र का सामने आया.

19 जुलाई 1982 को इंदिरा गांधी ने श्रीपति मिश्र को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया. 2 साल यानि 1984 तक वह मुख्यमंत्री रहे. सुल्तानपुर जिले के सुरापुर कस्बे के रहने वाले श्रीपति मिश्र बेहद सरल, सज्जन और मृदुभाषी थे. ऐसे ही नारायण दत्त तिवारी का मसला भी था.

कुछ इसी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने मुख्यमंत्रियों को बदलने का काम करते हैं. जिस गुजरात के वह करीब 13 साल लगातार मुख्यमंत्री रहे उस गुजरात में अब मुख्यमंत्री ताश के पत्ते की तरह से फेंट कर बदल जाते हैं. 2001 से ले कर 2014 तक 13 साल नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद 2014 से 2022 के 8 सालों में आनंदी पटेल, विजय रूपाणी और भूपेन्द्र पटेल 3 मुख्यमंत्री बदले. 13 साल एक मुख्यमंत्री और 8 साल में 3 मुख्यमंत्री बनाए गए.

उत्तराखंड का उदाहरण भी काफी मजेदार है. 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तराखंड में भाजपा ने अपने बड़े नेताओं को दरकिनार कर त्रिवेन्द्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया. 2021 में त्रिवेन्द्र सिंह रावत को हटा कर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया और 2022 में पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया. नए नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया जिन को कोई अनुभव नहीं था. यही बात मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद देखने को मिली जब विधानसभा चुनाव जितवाने वाले षिवराज सिंह चौहान की जगह पर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया.

अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर के छत्तीसगढ़ विष्णुदेव साय और राजस्थान भजन लाल शर्मा को इसी तरह से मुख्यमंत्री बनाया गया. असल में मुख्यमंत्री बनाने में योग्यता नहीं देखी जाती. पहले कांग्रेस इसी तरह से मुख्यमंत्री बदलती थी अब भाजपा उसी राह पर है. विधायक अब पार्टी के गुलाम बन गए हैं. उन से जिन के नाम का प्रस्ताव कराना हो कर देते हैं. पार्टी अध्यक्ष से ले कर जिला अध्यक्षों तक सारे फैसले हाई कमान करता है. हर दल में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया है. संगठन में चुनाव नहीं नियुक्तियां होने लगी है.

जनता के नहीं पार्टी के प्रतिनिधि हो गए एमपी एमएलए

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट प्रताप चंद्रा कहते हैं, “असल में जब संविधान ने चुनाव की व्यवस्था बनाई तो लोकसभा सदस्य और विधानसभा सदस्य चुने जाने का विधान था. यह सदन में अपना नेता चुनते थे. 1967 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ. तो इंदिरा गांधी ने काग्रेस आई बनाई. जिस का निशान हाथ का पंजा था.
“इंदिरा गांधी ने चुनाव आयोग से इसी निशान को अपने लिए रिजर्व करने के लिए चुनाव आयोग से कहा. इस के बाद पार्टी तंत्र विकसित होने लगा. 1985 में राजीव गांधी ने जब बदलबदल कानून बनाया तब से विधायक सांसद पार्टी व्हिप के दबाव में आने लगे. 1989 के बाद राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ. धारा 29 ए मे पार्टी रजिस्टर्ड होने लगी. 29 बी चुनाव चिन्ह और 29 सी दलों की आय के बारे में नियम बन गया.

“इस के बाद विधायक और सांसद जनता के नहीं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि बन गए. वह जनता के हित के बजाए पार्टी हित में काम करने लगे. पार्टी व्हिप को न मानने से सदस्यता जाने का खतरा बढ़ गया था.”

पौराणिक कथाओं का प्रभाव

हमारे समाज की मूल भावना योग्यता की जगह परिपाटी को महत्व दिया जाता है. इस के तमाम उदाहरण हैं. संयुक्त हिंदू परिवारों में यह चलन था कि घर का बड़ा बेटा ही राज्य चलाएगा. वह योग्य न हो तो भी घर चलाने का अधिकार उस का होता था. छोटा भाई असहमति भी जाहिर नहीं कर सकता था. हमारे समाज में असहमति को विरोध समझ लिया जाता है.

महाभारत को भी जानते थे. धतराष्ट्र बड़े थे लेकिन अंधे होने के कारण उन को राजा नहीं बनाया गया इस के बाद भी वह खुद को राजा मानते रहे. उन के छोटे भाई पांडु की मृत्यू के बाद जब धतराष्ट्र ने राजपाट संभाला तब उन्होने तय कर लिया कि भले ही बड़े पुत्र युधिष्ठर हो राजा उन का बेटा दुर्योधन ही बनेगा.

पांडवों में भी यही भावना थी. पांचों भाइयों में युधिष्ठर सब से बड़े थे. इस कारण उन के ही आदेशों को माना जाता था. दुर्योधन के साथ जुआ खेलने के लिए युधिष्ठर ही आगे आए. जब महाभारत युद्ध हुआ तो योग्यता के हिसाब से सब से बड़ी जिम्मेदारी अर्जुन के कंधों पर आई. क्योकि वह सब से योग्य थे. उन को ही कृष्ण ने गीता सुनाई. अगर परिवार में बड़े होने के कारण युधिष्ठर ही युद्ध का संचालन करते तो महाभारत के युद्ध का नतीजा अलग हो जाता. योग्यता के अनुसार अगर जिम्मेदारी न दी जाए तो हार तय होती है. इतिहास में बहुत ऐसे उदाहरण हैं जहां बड़े बेटे को अयोग्य होने के बाद भी राजा बना दिया गया वह राज्य बरबाद हो गया.

इस को आज के दौर में घर परिवार के उदाहरण को समझें तो कई कारोबारी घराने, सामान्य परिवार इस कारण खत्म हो गए क्योंकि उन्होंने बड़े बेटे को जिम्मेदारी सौंप दी. धारणा, परिपाटी और रूढ़ीवादी सोच के कारण अगर अयोग्य होने के बाद भी बडे बेटे को ही अधिकार सौंप दिए जाएंगे तो परिवार का विनाश तय है.
राजनीति से ले कर घरपरिवार तक में यही कहा जाता है कि जो बड़ा है उसे ही असल अधिकार है. राजनीति दलों में इसी बड़े को हाई कमान कहा जाता है. जब हाई कमान योग्यता के आधार पर फैसले नहीं करता है तो वह पार्टी डूब जाती है. कांग्रेस इस का उदाहरण है.

एक ही रंग में रंग गए कांग्रेस-भाजपा

कांग्रेस की तरह से भाजपा में भी हाई कमान कल्चर बढ़ गया है. हिंदुत्व के पुट को अगर किनारे क दिया जाए तो इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की कार्यशैली एक जैसी है. प्रधानमंत्री रहते दोनों ही पार्टी और देश दोनों चला रहे हैं. चुनाव लड़ने के टिकट बंटवारे का मसला हो, मुख्यमंत्री बदलने का मसला हो प्रधानमंत्री का ही आदेश चलता है. दूसरे प्रधानमंत्रियों के जमाने में मंत्रिमंडल का फैसला होता था. अब मसला वित्त का हो तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं. विदेश का हो तो प्रधानमंत्री लेते हैं. रक्षा का हो तो प्रधानमंत्री लेते हैं. ऐसे में वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री को रखा ही क्यों गया है ?

सारे देश के फैसले पीएमओ लेने लगे हैं. ऐसे में जनता के प्रतिनिधि होने को मतलब क्या रह गया? जब वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री जैसे दूसरे विभागों के फैसले पीएमओ को ही करने हैं तो इतने मंत्री रखने का जरूरत क्या है ? प्रदेश को चलाने के लिए मुख्यमंत्री की योग्यता को देखने का जरूरत नहीं है तो मुख्यमंत्री के तामझाम पर पैसा खर्च करने की जरूरत क्या है ? पीएमओ और अफसर प्रदेश भी चला सकते हैं. राम के खड़ाऊ रख कर राज चलाया जा सकता है तो पीएमओ देश को क्यों नहीं चला सकता ?

राजा और मुखिया में दिखते है भगवान

संविधान ने एमपी, एमएलए को जनता का प्रतिनिधि माना है. वह जनता के वोट से चुन कर जाते हैं. सदन में वह वहीं बात करेंगे जो उन की पार्टी यानि मुखिया का आदेश होगा. उस की असहमति को विरोध समझा जाएगा. जिस के फलस्वरूप उन की सदस्यता जा सकती है. एमपी, एमएलए जनता का प्रतिनिधि नहीं पार्टी का प्रतिनिधि हो गया है. पार्टी के मुखिया यानि हाईकमान का आदेश ही राजा का आदेश हो गया है.

जैसे घरपरिवार में पिता का राज होता है. बेटे का अधिकार नहीं होता कि वह अपनी मर्जी से शादी कर सके. अपनी बात न मानने पर पिता अपनी जायदाद से उस को बेदखल कर सकता है. परिवार और राजनीति दोनो ही एकदूसरे के उदाहरण दे कर अपनी बात को सही साबित करते रहते हैं. पिता भी राजा की तरह होता है राजा को भी पिता कहा जाता है. दोनों ही भगवान जैसे होते हैं भगवान का आदेश कौन टाल सकता है ?

मनोहर लाल खट्टर कितने भी योग्य हों राजा के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते. हाईकमान के रूप में नरेंद्र मोदी को लोग भगवान का अवतार बताते हैं. चुनावी टिकट से ले कर मुख्यमंत्री बदलने तक के सारे फैसले कबूल कर लिए जाते हैं.

जस्टिस अभय ओका की बेबाकी, न्यायपालिका से जुड़े कार्यक्रम में धार्मिक अनुष्ठान हों बंद

मौका था महाराष्ट्र के पिंपरी-चिंचवाड़ में नई कोर्ट बिल्डिंग के भूमिपूजन समारोह का जिस में जस्टिस अभय ओका और जस्टिस भूषण आर गवई भी आमंत्रित थे. आयोजन में इलाके के गणमान्य नागरिक और वकील भी मौजूद थे. जैसे ही जस्टिस अभय ओका के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा, “संविधान को अपनाए हुए 75 साल पूरे हो चुके हैं, इसलिए हमें सम्मान दिखाने और इस के मूल्यों को अपनाने के लिए इस प्रथा की शुरुआत करनी चाहिए. इस साल 26 नवंबर को हम बाबा साहब आम्बेडकर के जरिए दिए गए संविधान को अपनाने के 75 वर्ष पूरे करेंगे.

“मुझे हमेशा से लगता है कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में 2 बेहद जरूरी शब्द हैं. एक धर्मनिरपेक्ष और और दूसरा लोकतंत्र. कुछ लोग कह सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्व धर्म समभाव है, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि यह न्यायिक प्रणाली का मूल संविधान है. इसलिए कई बार जजों को भी अप्रिय बातें कहनी पड़ती हैं. मैं कहना चाहता हूं कि अब हमें न्यायपालिका से जुड़े हुए किसी भी कार्यक्रम के दौरान पूजापाठ या दीप जलाने जैसे अनुष्ठानों को बंद करना होगा. इस के बजाय हमें संविधान की प्रस्तावना रखनी चाहिए और किसी भी कार्यक्रम को शुरू करने के लिए उस के सामने झुकना चाहिए.”

अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि, “कर्नाटक में अपने कार्यकाल के दौरान मैं ने ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को रोकने की कोशिश की थी लेकिन मैं इसे पूरी तरह से रोक नहीं पाया था लेकिन कम करने में जरूर कामयाब रहा था.”

कर्नाटक में जन्मे 64 वर्षीय जस्टिस अभय ओका के पास अदालतों का लंबा तजुरबा है. अदालती कामकाज को ले कर उन्होंने कई अहम बयान भी वक्तवक्त पर दिए हैं. अपनी बेबाकबयानी के लिए पहचाने जाने वाले न्यायमूर्ति ने कुछ दिनों पहले यह भी कहा था कि न्यायपालिका में आम आदमी का भरोसा काफी कम हो गया है.
अदालत के बाहर किसी प्रोग्राम में ही नहीं बल्कि अदालत में भी सटीक फैसले देने के लिए भी विख्यात जस्टिस अभय ओका ने एक अहम फैसले में बीती 4 मार्च को यह कहा था कि जम्मूकश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की आलोचना और पाकिस्तान को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देना अपराध नहीं माना जा सकता. इस फैसले में उन की बैंच में जस्टिस उज्जवल भुइया भी थे.

इस फैसले ने हर किसी को चौंकाया था जिस में सब से बड़ी अदालत ने यह भी कहा था कि यदि राज्य या सरकार के कार्यों की हर आलोचना या विरोध को धारा 153-ए के तहत अपराध माना जाता है तो लोकतंत्र, जोकि लोकतंत्र की एक अनिवार्य विशेषता है, भारत का संविधान नहीं बचेगा.

गौरतलब है कि कश्मीरी मूल के कोल्हापुर कालेज में कार्यरत एक मुसलिम प्रोफैसर जावेद अहमद हाजम ने एक व्हाट्सऐप ग्रुप में अपने स्टेटस पर 5 अगस्त को जम्मूकश्मीर के लिए एक काला दिन बताते हुए 14 अगस्त को पाकिस्तान की आजादी के दिन की शुभकामनाएं दी थीं. प्रोफैसर के इस गुनाह` को सुप्रीमकोर्ट ने गुनाह न मानते हुए उन के खिलाफ दर्ज मामला खारिज कर दिया था.

इंसाफ और जोखिम

वैसे तो हमेशा से ही रहा है लेकिन इन दिनों देश का जो माहौल है उस पर दक्षिणपंथ और दक्षिणापंथियों की गिरफ्त कुछ इस तरह है कि आम और खास लोग कुछ बोलने से भी डरने लगे हैं खासतौर से धार्मिक अंधविश्वासों और पाखंडों के मामलों में जो इफरात से फलफूल रहे हैं. जिस भूमिपूजन पर उन्होंने पिंपरी-चिंचवाड़ में एतराज जताया वह सरकारी स्तर पर भी रोजरोज कहीं न कहीं हो रहा होता है.

हाल तो यह है कि सरकारी नीतियों के लिए भी धार्मिक कर्मकांडों का सहारा लिया जा रहा है और पूजापाठ को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 11 मार्च को जिस जल कलश यात्रा का शुभारंभ किया वह तो नाम से भी धार्मिक है. राज्य की सरकार तो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जमाने से ही धार्मिक पाखंडों का शिकार रही है.

भूमिपूजन बहुत बड़ा सरकारी पाखंड है जिस में जनप्रतिनिधि, अधिकारी, ठेकेदार सब मिल कर यह करते हैं और पंडे को दक्षिणा देते हैं. जहां भी नजर जाती है वहां हरकहीं मंदिर हैं. स्कूलकालेजों में, थानों में, अस्पतालों में, रेलवे स्टेशनों पर, और तो और अदालतों के बाहर भी मंदिर बने हैं जो यह साबित करते हैं कि असल राज तो आज भी धर्म का ही चलता है.

यह बात कहीं से संविधान के बुनियादी उसूलों से मेल नहीं खाती बल्कि सरेआम उन का मखौल उड़ाती है. और ऐसा दिनरात होता है. एक भूमिपूजन ही क्यों, सारा देश इन दिनों पूजापाठ में लगा है, खासतौर से सत्ता पक्ष को तो इस के अलावा कुछ और सूझता ही नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों ताबड़तोड़ तरीके से देशविदेश में मंदिरों का उद्घाटन किया तो सहज लगा कि अब इस देश का भगवान ही मालिक है बशर्ते वह कहीं हो तो.

संविधान और लोकतंत्र की बात अगर अब जजों को सार्वजनिक रूप से करना पड़ रही है तो सहज यह भी समझ आता है कि देश के अंदरूनी हालात बेहद विस्फोटक हो चले हैं. जिस की एक ताजी और चर्चित मिसाल दिल्ली का मामला है जिस में एक पुलिस सब इंस्पैक्टर ने सड़क पर नमाज पढ़ रहे मुसलिम को लात मार दी. लोगों के दिलोदिमाग में धर्म और जाति को ले कर किस कदर नफरत घर करती जा रही है, इस का अंदाजा लगाना अब मुश्किल नहीं रहा है.

उस से भी खतरनाक वैचारिक कट्टरता

संविधान जब लागू हुआ था तब उसे बिना पढ़े ही आम लोगों तक उस का यह मसौदा पहुंच गया था कि अब धार्मिक शोषण व भेदभाव, जातिगत अत्याचार, छुआछूत वगैरह से नजात मिल जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बहुत ज्यादा अंकुश भी संविधान और कानून धर्म के दुकानदारों पर नहीं लगा पाए.

ब्राह्मणों और दूसरी जतिवालों का देश के सिस्टम पर कब्जा बरकरार है. जिस संविधान से लोगों के दैनिक जीवन की 90 फीसदी गतिविधियां संचालित होती हैं उस का हाल तो यह है कि संविधान बदलने की मानसिकता तेजी से छूत की बीमारी की तरह फैल रही है.

जो बात ढकेमुंदे दबंगों के बीच होती थी उसे खुल कर भाजपा सांसद अनंत हेगड़े ने यह कहते उधेड़ कर रख दिया है कि हिंदुओं को फायदा पहुंचाने के लिए संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाया जा सकता है और यह सब बदलना है तो सिर्फ लोकसभा में बहुमत के वोटों से नहीं होगा, हमे लोकसभा के साथसाथ राज्यसभा में भी दोतिहाई बहुमत की जरूरत होगी.

इस बयान पर कांग्रेसियों और दूसरे विपक्षी दलों का यह एतराज जायज है कि भगवा गैंग संविधान हटा कर और मिटा कर मनुस्मृति थोपना चाह रहा है.
पूजापाठी होने की लत के अपने अलग नुकसान हैं लेकिन वैचारिक कट्टरवाद तो देश को अफगानिस्तान और पाकिस्तान बनाने की तरफ ले जा रहा है जिस की चिंता अब हर किसी को करना जरूरी हो चला है. इस का खमियाजा उन 15 फीसदी सवर्ण हिंदुओं को ज्यादा भुगतना पड़ेगा जो इन दिनों हिंदू राष्ट्र के सपने देखते सो और जाग रहे हैं.
दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी जब पूरी तरह तंग आ जाएंगे तब इन के निशाने पर यही हिंदू होंगे. यह सोचना बेमानी है कि गैरसवर्ण हिंदुओं ने यह शर्त स्वीकार ली है कि वे अपने पूर्वजों की तरह ऊंची जाति वालों की गुलामी और जीहुजूरी करते रहेंगे.

यह कोई काल्पनिक खतरा नहीं है बल्कि सदियों का ऐतिहासिक अनुभव है जिसे लोग भूल जाते हैं और बाद में पछताते रहते हैं और जब तक हालात थोड़े सुधरते हैं तब तक दक्षिणपंथी फिर धर्म की आड़ ले कर सत्ता हथिया लेते हैं और जोड़तोड़ कर फिर विध्वंस की वजह बनते हैं. लोकतंत्र कहनेभर की बात रह जाती है, धर्मतंत्र का तांडव फिर से पीढ़ियों को कमजोर कर देता है. खुद भारत इस का गवाह है जिस के सदियों पुराने नक़्शे को ले कर भगवा गैंग यह रोना रोता रहता है कि देखो, कभी अफगानिस्तान भी हमारा हिस्सा था, लंका भी, पाकिस्तान भी और बंगलादेश भी और फलांफलां भी.

अव्वल तो यह हर्ज की बात नहीं और जिन्हें लगती है उन्हें यह समझ नहीं आता कि इस सब का जिम्मेदार भी धर्म ही होता है जिस ने रोजमर्राई जिंदगी को अपने शिकंजे में ले रखा है. सुबह से ले कर अगली सुबह तक की जिंदगी धार्मिक पाखंडों की गुलाम हो कर रह गई है.

लोग विज्ञान और तकनीक का तो इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन उस का श्रेय भगवान और धर्म को देते हैं तो यह संभलने का वक्त है और यह नसीहत कोई जज अगर दे रहा है तो जिद और जनून में डूबे लोगों को यह समझना होगा कि धर्म बहुत बड़ा और क्रूर धंधा है जिस का मकसद कोई राष्ट्र विचार या फलसफा, जीवनशैली और संस्कृति भी नहीं, बल्कि पैसे कमाना है और जिन मुट्ठीभर लोगों के हाथों में यह स्थाई गारंटेड रोजगार वाला हथियार है वे ही इस का प्रचारप्रसार करते हैं. अनजाम चाहे कुछ भी हो, उस से इन परजीवियों को कोई सरोकार नहीं होता. इन की और खूबी यह है कि तमाम दोष अपनी पोल खोलने वालों के सिर मढ़ देते हैं.

जीने की आजादी है महिलाओं का बाइक चलाना

आज भी लोगों को एक बाइक चलाती महिला अगर सड़क पर दिखाई पड़ती है तो उन की निगाहें कुछ वक्त के लिए ठहर जाती हैं. बाइक चलाती महिला को देख कर हर किसी की नजर में आश्चर्य और सवाल उठते हैं पर स्कूटी चलाती हुई महिला पर किसी का ध्यान नहीं जाता.
असल में स्कूटी चलाना बाइक चलाने से आसान होता है, क्योंकि यह वजन में हलकी होती है. लेकिन गियर वाली बाइक भले ही हैवी होती हो लेकिन लौंग डिस्टेंस के लिए वही बेहतर होती है, महिला इसे चलाते हुए खुद की मजबूती को जाहिर करती है.

बाइक चलाना है फन

महाराष्ट्र में नए साल के उपलक्ष्य में मुंबई और अन्य जगहों पर महिलाएं पारंपरिक नववारी या नौ गज की साड़ी पहन कर बाइक की सवारी करती हैं, जो उन के मजबूत और दृढ़प्रतिज्ञ होने का प्रतीक है. इस के अलावा कर्नाटक, मध्य प्रदेश में भी महिलाएं बाइक की सवारी करती हैं और उसे वे फन मानती हैं. उन के हिसाब से अगर पुरुष बाइक चला कर अपनी मर्दानगी दिखाते हैं तो वे भी किसी से कम नहीं हैं. वे भी अपने मजबूत इरादों को दिखाने के लिए बाइक की सवारी कर सकती हैं.

दिखाती हैं स्ट्रैंग्थ

महिलाओं के बाइक चलाने के उदहारण कई हैं, मसलन गुजराती परिवार की डाक्टर सारिका मेहता बाइकिंग क्वीन मानी जाती हैं. बाइक राइड करने का जनून उन्हें तब सवार हुआ जब उन्हें उन के पति ने पहले बाइक चलाने से मना किया और हंसी उड़ाई थी. बाद में पति ने ही उन्हें बाइक राइड करना सिखाया था. इस के बाद वे 25 देशों में बाइक राइड कर कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं.

एक बार वे बिहार के नक्सली एरिया में फंस गई थीं. वहां उन्हें एक जगह पर रोक दिया गया. पर जैसे ही उन्होंने हैलमेट खोला, सभी चौंक गए थे कि वह एक लड़की है. फिर वहां काफी भीड़ उन्हें देखने पहुंच गई थी.

महाराष्ट्र की पहली फायर वुमन हर्शिनी कान्हेकर जब फायर फाइटिंग की पढ़ाई करने गई तो सभी लड़कों में वह एक लड़की थी. सभी सोचते थे कि इतनी कठिन पढ़ाई, वह भी लड़कों के बीच में पूरा नहीं कर पाएगी और कालेज छोड़ देगी. अपनी शक्ति और दृढ़ निश्चय को दिखाने के लिए हर्शिनी ने बाइक चलाना शुरू किया और बाइक से कालेज आनेजाने लगी. इस से उन की लगन को लड़कों ने समझ लिया था और उन्हें कभी किसी लड़के ने ताना नहीं मारा था. आज हर्शिनी बाइक कंपीटिशन में भाग लेती हैं.
भारत की सब से तेज बाइकर हरियाणा की समीरा दहिया हैं. उन्होंने शुरू में पल्सर 180 सीसी खरीद कर बाइक चलाना सीखा था. बाद में उन्होंने पहला लद्दाख ट्रिप रौयल इनफील्ड 350 क्लासिक से पूरा किया था. इस के अलावा साल 2020 में केपीएम 390 पर फास्टेस्ट रिकौर्ड राइड की. राइड बेंगलुरु से शुरू हई थी, 16,325 किलोमीटर की इस रेस को उन्होंने 24 दिन 9 घंटे में पूरा किया. इस में 28 राज्य, 6 केंद्र शासित प्रदेश को उन्होंने कवर किया था. इस के बाद इंडिया बुक औफ रिकौर्ड में यह रिकौर्ड दर्ज किया गया और उन्हें फास्टेस्ट फीमेल राइडर का ख़िताब मिला.

स्वतंत्रता का परिचायक

असल में बाइक चलाना एक कौशल है. जो कोई व्यक्ति बाइक के वजन को संभालने और गियर को समझ कर सीखता है, उसे बाइक चलानी आती है. लेकिन जब बात महिलाओं की आती है तो यह एक कौशल मात्र नहीं रहता, कौशल से आगे उन के लिए यह स्वतंत्रता है जिस के लिए वे लड़ती हैं और उन्हें साबित करना पड़ता है कि वे यह कर सकती हैं. महिलाएं बाइक चला कर अपने सपनों को उड़ान देती हैं. इस के अलावा बाइक चलाने के अनुभव अलगअलग जगहों पर जाने का होता है. सो, यह एक थेरैपी से कम नहीं होता.

पहनावा मुश्किल नहीं

इतना ही नहीं, महिलाओं को बाइक चलाते समय साड़ी पहनने में दिक्कत हो सकती है, लेकिन कुछ महिलाएं धोती पैटर्न की साड़ी पहन कर बाइक चलाती हैं. देखने वालों को अजीब लगने पर भी महिलाएं इस की परवा नहीं करतीं. महाराष्ट्र की हर्शिनी ने हमेशा पैंट पहन कर ही बाइक चलाई है और इसे वे किसी प्रकार की शर्म नहीं मानतीं, बल्कि आजादी मानती हैं. जब तक आप दृढ़ निश्चय न करें कि आप जो कर रहे है वह गलत नहीं है, तब तक आप अपनी खुशी के नए तरीके नहीं खोज सकते.

वोटबैंक में इजाफा करने की नीयत से लागू हुआ सीएए

केंद्रीय गृहमंत्रालय ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 यानी सीएए के लिए अधिसूचना जारी कर दी है. इस के साथ ही सीएए कानून देशभर में लागू हो गया है. केंद्र सरकार की मानें तो इस से पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान देशों से आए गैरमुसलिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हो गया है. तो क्या बाहरी लोगों को नागरिकता दे कर बीजेपी के वोटबैंक में कुछ इजाफा होगा? नि:संदेह.

माना जा रहा है कि इस कानून के लागू होने से बंगलादेश से आए मतुआ, राजवंशी और नामशूद्र समुदाय के हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी और बीजेपी इस को अपने वोटबैंक में बदल सकेगी. बंगलादेश से लगी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास के जिलों में इन समूहों का जबरदस्त बसाव है और वे लंबे समय से भारतीय नागरिकता की मांग करते रहे हैं.

देश का बंटवारा होने और बाद के वर्षों में बंगलादेश से आ कर बंगाल के सीमाई इलाकों में बसे मतुआ समुदाय की आबादी राज्य की आबादी की 10 से 20 फीसदी है. राज्य के दक्षिणी हिस्से की 5 लोकसभा सीटों में उन की खासी आबादी है, जहां से 2 सीटों- गोगांव और रानाघाट- पर 2019 में भाजपा को जीत हासिल हुई थी. 2019 के चुनाव से ऐन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने मतुआ समुदाय के लोगों के बीच पहुंच कर उन्हें संबोधित किया था.

इसी तरह उत्तरी बंगाल के जिस इलाके में राजवंशी और नामशूद्र की आबादी का बसाव है, वहां भी भाजपा ने 2019 में 3 सीटों पर जीत दर्ज की थी. जलपाईगुड़ी, कूचविहार और बालुरघाट संसदीय सीटों के इलाकों में इन हिंदू शरणार्थियों की आबादी 40 लाख से ऊपर है. इस बड़े वोटबैंक का बड़ा फायदा उठाने की नीयत से ही मोदी सरकार ने सीएए का दांव खेला है.

राज्य के दक्षिणी क्षेत्र में करीब 30-35 विधानसभा क्षेत्रों में मतुआ समुदाय की आबादी 40 फीसदी के करीब है. ये विधानसभा इलाके 5 से 6 लोकसभा क्षेत्रों के तहत आते हैं. यानी, इतनी सीटों पर मतुआ समुदाय हारजीत का आंकड़ा तय कर सकता है. इन को भारतीय नागरिकता मिलने पर नि:संदेह इन का वोट बीजेपी की झोली में जाएगा.

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा लोकसभा चुनाव से पहले 11 मार्च, 2024 को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 की अधिसूचना जारी की गई. केंद्र सरकार का कहना है कि दिसंबर 2014 से पहले 3 पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से भारत में आने वाले 6 धार्मिक अल्पसंख्यकों- हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई व्यक्तियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी.

गौरतलब है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019, दिसंबर 2019 में संसद में पारित किया गया था. गृहमंत्री अमित शाह ने 9 दिसंबर को इसे लोकसभा में पेश किया था. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 (सीएए) संसद में 11 दिसंबर, 2019 को पारित किया गया था.

सीएए के पक्ष में 125 वोट पड़े थे और 105 वोट इस के खिलाफ गए थे. 12 दिसंबर, 2019 को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी. मगर राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद देश के विभिन्न राज्यों में सीएए को ले कर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ, खासतौर पर पश्चिम बंगाल में, जिस के चलते इसे लागू नहीं किया जा सका.

सीएए के साथ ही केंद्र सरकार ने देशभर में एनआरसी लागू करने की बात भी कही थी. एनआरसी के तहत भारत के नागरिकों का वैध दस्तावेज के आधार पर रजिस्ट्रेशन होना था. सीएए के साथ एनआरसी को मुसलमानों की नागरिकता खत्म करने के रूप में देखा गया था. लेकिन फिलहाल केवल सीएए को ही लागू किया गया है. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राम मंदिर का मुद्दा ठंडा पड़ने के बाद चूंकि बीजेपी के हाथ अब खाली हो गए थे, लिहाजा काफी सोचसमझ कर सीएए पर दांव खेला गया है.

दरअसल, बीजेपी को सब से बड़ा खतरा बंगाल में ममता बनर्जी से है, जिन्हें किसी भी कीमत पर वह सत्ता से हटाना चाहती है. ममता से मोदी को बड़ी असुरक्षा रहती है. मोदी के बाद यदि कोई प्रधानमंत्री पद पर बैठने के काबिल नजर आता है तो वह ममता बनर्जी हैं. ममता बनर्जी भी बीजेपी की इस साजिश के चलते ही सीएए के खिलाफ भड़क रही हैं.

बता दें कि सीएए के लिए आवेदन की प्रक्रिया औनलाइन रखी गई है. आवेदकों को बस इतना बताना होगा कि वे भारत कब आए. उन्हें भारतीय नागरिकता बिना वैध पासपोर्ट और बिना भारतीय वीजा के मिल सकती है. नागरिकता दिए जाने के लिए पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान के पासपोर्ट और भारत की ओर से जारी रिहायशी परमिट की आवश्यकता को बदला गया है. इस के बजाय जन्म या शैक्षणिक संस्थानों के सर्टिफिकेट, लाइसैंस, सर्टिफिकेट, मकान होने या किराएदार होने के दस्तावेज पर्याप्त होंगे. ऐसे किसी भी दस्तावेज़ को सबूत माना जाएगा.

उन दस्तावेजों को भी मान्यता दी जाएगी जिन में मातापिता या दादादादी के 3 में से एक के देश के नागरिक होने की बात होगी. इन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा, फिर चाहे ये वैधता की अवधि को पार ही क्यों न कर गए हों.

इस से पहले नागरिकता हासिल करने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती थी, वो थे- वैध विदेशी पासपोर्ट, रिहायशी परमिट की वैध कौपी, 1,500 रुपए का बैंक चालान, सैल्फ एफिडेविट, 2 भारतीयों की ओर से आवेदक के लिए लिखा एफिडेविट, 2 अलग तारीखों या अलग अखबारों में आवेदक की नागरिकता हासिल करने की मंशा. लेकिन सीएए में नियम बहुत साधारण कर दिए गए हैं. सरकार ने उस नियम को भी हटा दिया है जिस के तहत किसी शैक्षणिक संस्थान से संविधान की 8वीं सूची की भाषाओं में से एक का ज्ञान होने का दस्तावेज जमा करना होता था.

पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के हजारों गैरमुसलिमों, जो भारत की नागरिकता चाहते हैं, को सीएए का फायदा मिलेगा क्योंकि अब तक ये प्रवासी भारत में अवैध रूप से या लंबी अवधि के वीजा पर रह रहे थे. अधिनियम में पिछले 2 वर्षों के दौरान 9 राज्यों के 30 से अधिक जिला मजिस्ट्रेटों और गृह सचिवों को नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने की क्षमता प्रदान की गई है.

सरकार का कहना है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 से भारतीय नागरिकों का कोई सरोकार नहीं है. संविधान के तहत भारतीयों को नागरिकता का अधिकार है. सीएए कानून भारतीय नागरिकता को नहीं छीन सकता. फिलहाल सरकार दावा कर रही है कि इस कानून से देश के करोड़ों भारतीय मुसलिम बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होंगे. यह कानून किसी भी मुसलिम की नागरिकता नहीं छीनने वाला है. सिर्फ गलतफहमियों के कारण पहले विरोध प्रदर्शन हुए थे. मगर मुसलिम तबकों में एक डर जरूर कायम है और इस डर का फायदा भी बीजेपी लोकसभा चुनाव में उठाना चाहती है.

विपक्ष शासित कई राज्यों ने घोषणा की है कि वे अपने प्रदेश में सीएए लागू नहीं होने देंगे लेकिन नागरिकता के मामले में राज्यों के पास अधिकार बहुत कम होता है. कानून में ऐसे बदलाव किए गए हैं कि नागरिकता दिए जाने की प्रक्रिया में राज्य सरकारों की भूमिका कम होगी. इस बदलाव से राज्य सरकारों के इस कानून के विरोध करने से निबटा जा सकेगा.

पहले नागरिकता हासिल करने का आवेदन जिलाधिकारी के पास देना होता था. जिलाधिकारी राज्य सरकार के अंतर्गत आते हैं. नए नियमों में एम्पावर्ड कमेटी और जिला स्तर पर केंद्र की ओर से ऐसी कमेटी बनाई जाएगी जो आवेदनों को लेगी और प्रक्रिया शुरू करेगी. एम्पावर्ड कमेटी का एक निदेशक होगा, डिप्टी सैक्रेटरी होंगे, नैशनल इंफौर्मेटिक्स सैंटर के स्टेट इंफौर्मेटिक्स औफिसर, राज्य के पोस्टमास्टर जनरल बतौर सदस्य होंगे. इस कमेटी में प्रधान सचिव, एडिशनल चीफ सैक्रेटरी और रेलवे से भी अधिकारी होंगे.

जिला स्तर की कमेटी के प्रमुख ज्यूरिस डिक्शनल सीनियर सुपरिटेंडैंट या सुपरिटेंडैंट होंगे. इस कमेटी में ज़िले के इंफौर्मेटिक्स औफिसर और केंद्र सरकार की ओर से एक नामित अधिकारी होगा. इस में 2 और लोगों को जगह दी जाएगी, जो तहसीलदार या जिलाधिकारी के स्तर के होंगे. नए नियमों के तहत, नए कानून के तहत रजिस्टर्ड हर भारतीय को एक डिजिटल सर्टिफिकेट दिया जाएगा. इस सर्टिफिकेट पर एम्पावर्ड कमेटी के अध्यक्ष के हस्ताक्षर होंगे.

नागरिकता संशोधन नियम में यह मान कर चला जा रहा है कि पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के जो अल्पसंख्यक भारत में आए वे धार्मिक रूप से सताए जाने के कारण आए थे. 31 दिसंबर, 2014 से पहले जो भी गैरमुसलिम इन तीनों देशों से भारत आए थे, वे मानवीय दृष्टिकोण से सीएए के तहत नागरिकता हासिल करने के योग्य हैं.

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