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लोकसभा चुनाव आते ही नरेंद्र मोदी बांटने लगे मुफ्त रेवड़ियां

लोकसभा चुनाव का समर सजने वाला है, इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संरक्षण में देशभर में रेवड़ियां बांटने का काम शुरू हो गया है. एक समय में नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लक्ष्य कर के कहा था कि जिस तरह आम आदमी पार्टी मतदाताओं को रेवड़ियां बांट रही है वह देश के लिए नुकसानदायक है.
यहां याद करने वाली बात यह है कि उस दरमियां सारे देश में एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा था कि मतदाताओं को किसी भी तरीके का लाभ चुनावपूर्व देना हरेक दृष्टि से उचित नहीं है और मामला देश की सब से बड़ी अदालत में भी पहुंच गया था. मगर आश्चर्य की बात यह है कि मोदी की गारंटी का एक नया नारा दे कर के देशभर में वही सब नाटक शुरू कर दिया गया है जिसे रोकने की बात नरेंद्र मोदी ने की थी.

सचाई यह है कि देश की आर्थिक स्थिति इस वक्त डांवाडोल है. औसतन देश के एक नागरिक पर लगभग डेढ़ लाख रुपए का कर्ज चढ़ चुका है. ऐसे में अब महतारी वंदन के नाम पर हर महिला को प्रतिमाह 1,000 रुपए देने की शुरुआत कर के नरेंद्र मोदी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं.

महतारी बंधन के नाम पर प्रतिमाह 1,000 रुपए की यह शुरुआत आगे चल कर सुरसा के मुंह की तरह देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगी क्योंकि भाजपा 1,000 रुपए दे रही है तो हो सकता है कांग्रेस 2,000 रुपए, ममता बनर्जी 3,000 रुपए व आगे चल कर अरविंद केजरीवाल 5,000 रुपए देने की बात करें. ऐसे में देश की क्या स्थिति होगी, इस का आसानी से अंदाज लगाया जा सकता है.

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले छत्तीसगढ़ सरकार की महतारी वंदन योजना की शुरुआत करते हुए 70 लाख से अधिक महिलाओं के खाते में 655 करोड़ 57 लाख रुपए की राशि अंतरित कर अपने ही पूर्ववर्ती रेवड़ी संस्कृति के सवाल को धता बता दिया.

नरेंद्र मोदी ने बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी से रायपुर के साइंस कालेज मैदान में आयोजित कार्यक्रम से वर्चुअल रूप से जुड़ते हुए अपने संबोधन में कहा, “यह मोदी की गारंटी है. हमारी माताओंबहनों को छत्तीसगढ़ सरकार नियमित रूप से प्रतिमाह 1,000 रुपए की राशि प्रदान करेगी.”

नरेंद्र मोदी ने आगे कहा, “महतारी वंदन योजना के तहत छत्तीसगढ़ की 70 लाख से अधिक माताओंबहनों को हर महीने एक हजार रुपए देने का वादा किया गया था. सरकार ने अपना वादा पूरा किया. आज महतारी वंदन योजना के तहत 655 करोड़ रुपए की पहली क़िस्त सरकार ने जारी कर दी है. हमारी डबल इंजन सरकार की प्राथमिकता हमारी माताओंबहनों का कल्याण है.

“आज परिवार को पक्का घर मिल रहा है वह भी महिलाओं के नाम पर, उज्ज्वला का सस्ता सिलेंडर मिल रहा है वह भी महिलाओं के नाम पर. 50 प्रतिशत से अधिक जनधन खाते वह भी महिलाओं के नाम पर. 65 प्रतिशत से ज्यादा मुद्रा लोन भी महिलाओं ने लिया है, खासकर नौजवान बेटियों ने.”

लालच का अंधेरा कुआं

लोकतंत्र का मतलब यह नहीं है कि चुनी हुई सरकारें मतदाताओं को लौलीपौप दे कर वोट हासिल कर लें. लोगों को शिक्षित करना, स्वावलंबी बनाना, अपने पैरों पर खड़ा करना सरकार का अहम कर्तव्य है. मगर आजकल सरकारें सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में लोगों को भेड़बकरियां बनाने में लगी हुई हैं.

इस तारतम्य में नरेंद मोदी ने छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन कार्यक्रम में महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा, “चुनावों में हम ने छत्तीसगढ़ की खुशहाली की जो गारंटी दी थी उसे पूरा करने के लिए हमारी सरकार लगातार काम कर रही है. हम ने गारंटी दी थी कि 18 लाख पक्के घर का निर्माण करेंगे. सरकार बनने के दूसरे ही दिन श्री साय ने यह काम शुरू कर दिया.

“छत्तीसगढ़ के धान किसानों को 2 साल के बकाया बोनस की गारंटी दी थी. छत्तीसगढ़ सरकार ने अटलजी के जन्मदिवस के अवसर पर 3,716 करोड़ रुपए किसानों के खाते में बोनस की राशि पहुंचा दी. हम ने गारंटी दी थी कि किसानों से 3,100 रुपए प्रति क्विंटल धान की खरीदी करेंगे, यह वादा पूरा हुआ और 145 लाख मीट्रिक टन धान खरीद कर रिकौर्ड बना दिया.”

वादों, गारंटियों, रेवड़ियों आदि से यह साफ हो गया है कि देश एक अंधेरे युग की तरफ आगे बढ़ रहा है जहां कोई उजाला फैलता दिखाई नहीं दे रहा. आने वाले समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से ऐसे ही और भी रेवड़ियां बंटेंगी जिन के परिणामस्वरूप देश का आम आदमी अपने पैरों पर कभी खड़ा ही नहीं हो पाएगा. कुछ लोग तो यही चाहते हैं कि आमलोग हाथ फैलाए खड़े रहें और वे राज करते रहें.

मुझे नहीं जाना: क्या अलका अपने ससुरालवालों से दूर हुई?

शाम 7 बजे जब फोन की घंटी बजी तब ड्राइंगरूम में अलका, उस की मां गायत्री और पिता ज्ञानप्रकाश उपस्थित थे. फोन पर वार्तालाप अलका ने किया.

अलका की ‘हैलो’ के जवाब में दूसरी तरफ से भारी एवं कठोर स्वर में किसी पुरुष ने कहा, ‘‘मुझे अलका से बात करनी है.’’

‘‘मैं अलका ही बोल रही हूं. आप कौन?’’

‘‘मैं कौन हूं इस झंझट में न पड़ कर तुम उसे ध्यान से सुनो जो मैं तुम से कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हैं आप?’’

‘‘यही कि अपने पतिदेव को तुम फौरन नेक राह पर चलने की सलाह दो, नहीं तो खून कर दूंगा मैं उस का.’’

‘‘ये क्या बकवास कर रहे हो.’’

‘‘मैं बकवास न कर के तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं. अलका मैडम,’’ बोलने वाले की आवाज क्रूर हो उठी, ‘‘अगर तुम्हारे पति राजीव ने फौरन मेरे दिल की रानी कविता पर डोरे डालने बंद नहीं किए तो जल्दी ही उस की लाश को चीलकौवे खा रहे होंगे.’’

‘‘ये कविता कौन है मैं नहीं जानती… और न ही मेरे पति का किसी से इश्क का चक्कर चल रहा है. आप को जरूर कोई गलतफहमी…’’

‘‘शंकर उस्ताद को कोई गलतफहमी कभी नहीं होती. मैं ने पूरी छानबीन कर के ही तुम्हें फोन किया है. अगर तुम अपने आप को विधवा की पोशाक में नहीं देखना चाहती हो तो उस मजनू की औलाद राजीव से कहो कि वह मेरी जान कविता के साए से भी दूर रहे.’’

अलका कुछ और बोल पाती इस से पहले ही फोन कट गया.

अपने मातापिता के पूछने पर अलका ने घबराई आवाज में वार्तालाप का ब्योरा उन्हें सुनाया.

गायत्री रोने ही लगीं. ज्ञानप्रकाश ने गुस्से से भर कर कहा, ‘‘तो राजीव इस कविता के चक्कर में उलझा हुआ है. मैं भी तो कहूं कि साल भर अभी शादी को हुआ नहीं और 2 महीने से पत्नी को मायके में छोड़ रखा है. जरूर उस ने इस कविता से गलत संबंध बना लिए हैं.’’

‘‘उस अकेले को दोष मत दो, जी,’’ गायत्री ने सुबकते हुए कहा, ‘‘दामादजी ने तो दसियों बार इस मूर्ख के सामने वापस लौट आने की विनती की होगी, लेकिन इस की जिद के आगे उन की एक न चली.’’

‘‘अलका को कुसूरवार मत कहो. हमारी बेटी ने राजीव से प्रेमविवाह किया है. उसे सुखी रखना उस का कर्तव्य है. अगर अलका अलग घर में जाने की जिद पर अड़ी हुई है तो वह मेरी समझ से कुछ गलत नहीं कर रही,’’ कह कर ज्ञानप्रकाश अलका की तरफ देखने लगे.

‘‘पापा, आप ठीक कह रहे हैं. मैं ने नौकरानी बनने के लिए शादी नहीं की थी राजीव से,’’ अलका ने अपने मन की बात फिर दोहराई.

‘‘अलका, तुम राजीव को फोन कर के इसी वक्त यहां आने के लिए कहो. ऐसी डांट पिलाऊंगा मैं उसे कि इश्क का भूत फौरन उस के सिर से उतर कर गायब हो जाएगा,’’ ज्ञानप्रकाश की आंखों में चिंता व क्रोध के मिलेजुले भाव नजर आ रहे थे.

अलका राजीव को फोन करने के लिए उठ खड़ी हुई.

करीब घंटे भर बाद राजीव अपनी ससुराल पहुंचा. उस के पिता ओंकारनाथ और मां कमलेश भी उस के साथ आए थे. उन तीनों के चेहरों पर चिंता और तनाव के भाव साफ झलक रहे थे.

कुछ औपचारिक वार्तालाप के बाद ओंकारनाथ ने परेशान लहजे में ज्ञानप्रकाश से कहा, ‘‘बहू से फोन पर मेरी भी बात हुई थी. मुझे लगा कि वह किसी बात को ले कर बहुत परेशान है. इसलिए राजीव के साथ उस की मां और मैं ने भी आना उचित समझा.’’

‘‘ये अच्छा ही हुआ कि आप दोनों साथ आए हैं राजीव के. सारी बात आप दोनों को भी मालूम होनी चाहिए. शाम को 7 बजे हमारे यहां एक फोन आया था. फोन करने वाले ने हमें राजीव के बारे में बड़ी गलत व गंदी तरह की सूचना दी है,’’ ज्ञानप्रकाश ने नाराज अंदाज में राजीव को घूरना शुरू कर दिया था.

‘‘फोन किसी शंकर नाम के आदमी का था?’’ कमलेश के इस सवाल को सुन कर अलका और उस के मातापिता बुरी तरह से चौंक उठे.

‘‘आप को कैसे मालूम पड़ा उस का नाम, बहनजी?’’ गायत्री अचंभित हो उठीं.

‘‘क्योंकि उस ने शाम 6 बजे के आसपास हमारे यहां भी फोन किया था. राजीव और उस के पिता घर पर नहीं थे, इसलिए मेरी ही उस से बातें हो पाईं.’’

‘‘क्या कहा उस ने आप से?’’

‘‘उस ने आप से क्या कहा?’’ कमलेश ने उलट कर पूछा.

गायत्री के बजाय ज्ञानप्रकाश ने गंभीर हो कर उन के प्रश्न का जवाब दिया, ‘‘बहनजी, शंकर ऐसी बात कह रहा था जिस पर विश्वास करने को हमारा दिल तैयार नहीं है, लेकिन वह बहुत क्रोध में था और राजीव को गंभीर नुकसान पहुंचाने की धमकी भी दे रहा था. इसलिए राजीव से हमें पूछताछ करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘क्या वह किसी कविता नाम की लड़की से मेरे अवैध प्रेम संबंध होने की बात आप को बता रहा था?’’ राजीव गहरी उलझन और परेशानी का शिकार नजर आ रहा था.

अलका ने उस के चेहरे पर

पैनी नजरें गड़ा कर कहा, ‘‘हां,

कविता की ही बात कर रहा था वह. कौन है ये कविता?’’

‘‘मैं तो सिर्फ एक कविता को ही जानता हूं, जो मेरे विभाग में मेरे साथ काम करती है. तुम्हें याद है शादी के बाद हम एक रात नीलम होटल में डिनर करने गए थे. तब एक लंबी सी लड़की अपने बौयफैं्रड के साथ वहां आई थी. मैं ने तुम्हें उस से मिलाया था, अलका.’’

अलका ने अपनी सास की तरफ मुड़ कर कहा, ‘‘मम्मी, मैं ने आप से उस लड़की का जिक्र घर आ कर किया था. वह राजीव से बहुत खुली हुई थी. उसे ‘यार, यार’ कह कर बुला रही थी. वह अपने बौयफ्रैंड के साथ न होती तो राजीव से उस के गलत तरह के संबंध होने का शक मुझे उसी रात हो जाता. मेरा दिल कहता है कि राजीव जरूर उस के रूपजाल में फंस गया है और उस के पुराने प्रेमी शंकर ने क्रोधित हो कर उसे जान से मारने की धमकी दी है,’’ बोलते- बोलते अलका की आंखें डबडबा आईं, चेहरा लाल हो चला.

‘‘बेकार की बात मुंह से मत निकालो, अलका,’’ राजीव को गुस्सा आ गया, ‘‘घंटे भर से अपने मातापिता को यह बात समझाते हुए मेरा मुंह थक गया है कि कविता से मेरा कोई चक्कर नहीं चल रहा है. अब तुम भी मुझ पर शक कर रही हो. क्या तुम मुझे चरित्रहीन इनसान समझती हो?’’

‘‘अगर दाल में कुछ काला नहीं है तो ये शंकर क्यों जान से मार देने की धमकी तुम्हें दे रहा है?’’ अलका ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस का दिमाग खराब होगा. वह पागल होगा. अब मैं कैसे जानूंगा कि वह क्यों ऐसी गलतफहमी का शिकार हो गया है?’’ राजीव चिढ़ उठा.

‘‘अगर वह सही कह रहा हो तो तुम कौन सा अपने व कविता के प्रेम की बात सीधेसीधे आसानी से कुबूल कर लोगे?’’ अलका ने जवाब दिया.

‘‘तब मेरे पीछे जासूस लगवा कर मेरी इनक्वायरी करा लो, मैडम,’’ राजीव गुस्से से फट पड़ा, ‘‘मैं दोषी नहीं हूं, लेकिन मैं एक सवाल तुम से पूछना चाहता हूं. तुम 2 महीने से मुझ से दूर यहां मायके में जमी बैठी हो. ऐसी स्थिति में अगर मैं किसी दूसरी लड़की के चक्कर में पड़ भी जाता हूं तो तुम्हें परेशानी क्यों होनी चाहिए? जब तुम्हें मेरी फिक्र ही नहीं है तो मैं कुछ भी करूं, तुम्हें क्या लेनादेना उस से?’’

‘‘मेरा दिल कह रहा है कि तुम ने मुझ पर लौटने का दबाव बनाने के लिए ही शंकर वाला नाटक किया है. लेकिन तुम मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. जब तक तुम मेरे मनोभावों को समझ कर उचित कदम नहीं उठाओगे तब तक मैं तुम्हारे पास नहीं लौटूंगी,’’ अलका झटके से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

चायनाश्ता ले कर मेहमान अपने घर लौटने लगे. चलतेचलते ओंकारनाथ ने स्नेह भरा हाथ अलका के सिर पर रख कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने कुछ प्रापर्टी डीलरों से कह दिया है तुम दोनों के लिए किराए का मकान ढूंढ़ने के लिए. तुम दोनों का साथसाथ सुखी रहना सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. किराए का मकान मिलने तक अगर तुम घर लौट आओगी तो हम सब को बहुत खुशी होगी.’’

जवाब में अलका तो खामोश रही लेकिन गायत्री ने कहा, ‘‘ये आगामी इतवार को पहुंच जाएगी आप के यहां.’’

मेहमानों के चले जाने के बाद अलका ने कहा, ‘‘मां, एक तो मुझे इस कविता के चक्कर की तह तक पहुंचना है. दूसरे, अगर मैं राजीव के साथ रहूंगी तो उस पर मकान जल्दी ढूंढ़ने के लिए दबाव बनाए रख सकूंगी. इन बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ससुराल लौट रही हूं.’’

शुक्रवार की दोपहर में एक अजीब सा हादसा घटा. अलका अपने कमरे में आराम कर रही थी कि खिड़की का कांच टूट कर फर्श पर गिर पड़ा. वह भाग कर ड्राइंगरूम में पहुंची. तभी उस के पिता ने घबराई हालत में बाहर से बैठक में प्रवेश किया और अलका को देख कर कांपती आवाज में उस से बोले, ‘‘शंकर दादा के 2 गुंडों ने पत्थर मार कर शीशा तोड़ा है. पत्थर पर कागज लिपटा है…उसे ढूंढ़. उस में हमारे लिए संदेश लिख कर भेजा है शंकर दादा ने.’’

पत्थर पर लिपटे कागज में टाइप किए गए अक्षरों में लिखा था :

‘अलका मैडम,

अपने पति राजीव की करतूतों का फल भुगतने को तैयार हो जाओ. आज शीशा तोड़ा गया है, कल उस का सिर फूटेगा. कविता सिर्फ मेरी है. उस पर गंदी नजर डालने वाले के पूरे खानदान को तबाह कर दूंगा मैं, शंकर दादा.’

पत्र पढ़ने के बाद गायत्री, ज्ञानप्रकाश व अलका के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पूरी घटना की खबर दोपहर में ही ओंकारनाथ के परिवार तक भी पहुंच गई. खबर सुन कर सभी मानसिक तनाव व चिंता का शिकार हो गए. सब से ज्यादा मुसीबत का सामना राजीव को करना पड़ा. हर आदमी उसे कविता से अवैध प्रेम संबंध रखने का दोषी मान रहा था. वह सब से बारबार कहता कि कविता से उस का कोई गलत संबंध नहीं है, पर कोई उस की बात पर विश्वास करने को राजी न था.

रविवार की सुबह अलका अपने पिता के साथ ससुराल पहुंच गई.

रात को शयनकक्ष में पहुंच कर उन दोनों के बीच बड़ी गरमागरमी हुई. राजीव अपने को दोषी नहीं मान रहा था और अलका का कहना था कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है जो शंकर उस्ताद यों गुस्से से फटा जा रहा है.

आखिरकार राजीव ने अलका को मना ही लिया. तभी उस ने अपनेआप को राजीव की बांहों के घेरे में कैद होने

दिया था.

पूरा एक सप्ताह शांति से गुजरा और फिर शंकर दादा की एक और हरकत ने उन की शांति भंग कर डाली. किसी ने रात में उस की मोटरसाइकिल की सीट को फाड़ डाला था. हैंडिल पर लगे शीशे फोड़ दिए थे. ऊपर से उस पर कूड़ा बिखेरा गया था.

उस के हैंडिल पर एक चिट लगी हुई थी जिस पर छपा था, ‘अब भी अपनी जलील हरकतों से बाज आ जा, नहीं तो इसी तरह तेरा पेट फाड़ डालूंगा.’

राजीव चिट उखाड़ कर उसे गायब कर पाता उस से पहले ही ओंकारनाथ वहां पहुंच गए. उन के शोर मचाने पर पूरा घर फिर वहां इकट्ठा हो गया. जो भी राजीव की तरफ देखता, उस की ही नजरों में शिकायत व गुस्से के भाव होते.

शंकर दादा का खौफ सभी के दिल पर छा गया. दिनरात इसी विषय पर बातें होतीं. राजीव को उस के घर व ससुराल का हर छोटाबड़ा सदस्य चौकन्ना रहने की सलाह देता.

शंकर दादा का अगला कदम न जाने क्या होगा, इस विषय पर सोचविचार करते हुए सभी के दिलों की धड़कनें बढ़ जातीं.

लगभग 10 दिन बिना किसी हादसे के गुजर गए. लेकिन ये खामोशी तूफान के आने से पहले की खामोशी सिद्ध हुई.

एक रात राजीव और अलका 10 बजे के आसपास घर लौटे. एक मारुति वैन उन के घर के गेट के पास खड़ी थी, इस पर उन दोनों ने ध्यान नहीं दिया.

राजीव की मोटरसाइकिल के रुकते ही उस वैन में से 3 युवक निकल कर बड़ी तेज गति से उन के पास आए और दोनों को लगभग घेर कर खड़े हो गए.

‘‘क…कौन हैं आप लोग? क्या चाहते हैं?’’ राजीव की आवाज डर के मारे कांप उठी.

‘‘अपना परिचय ही देने आए हैं हम तुझे, मच्छर,’’ बड़ीबड़ी मूंछों वाले ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘और साथ ही साथ सबक भी सिखा कर जाएंगे.’’

फिर बड़ी तेजी व अप्रत्याशित ढंग से एक अन्य युवक ने अलका के पीछे जा कर एक हाथ से उस का मुंह यों दबोच लिया कि एक शब्द भी उस के मुंह से निकलना संभव न था. बड़ीबड़ी मूंछों वाले ने राजीव का कालर पकड़ कर एक झटके में कमीज को सामने से फाड़ डाला. दूसरे युवक ने उस के बाल अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लिए.

‘‘हमारे शंकर दादा की चेतावनी को नजरअंदाज करने की जुर्रत कैसे हुई तेरी, खटमल,’’ मूंछों वाले ने आननफानन में 5-7 थप्पड़ राजीव के चेहरे पर जड़ दिए, ‘‘बेवकूफ इनसान, ऐसा लगता है कि न तुझे अपनी जान प्यारी है, न अपने घर वालों की. कविता भाभी पर डोरे डालने की सजा के तौर पर क्या हम तेरी पत्नी का अपहरण कर के ले जाएं?’’

‘‘मैं सौगंध खा कर कहता हूं कि कविता से मेरा कोई प्रेम का चक्कर नहीं चल रहा है. आप मेरी बात का विश्वास कीजिए, प्लीज,’’ राजीव उस के सामने गिड़गिड़ा उठा.

2 थप्पड़ और मार कर मूंछों वाले ने क्रूर लहजे में कहा, ‘‘बच्चे, आज हम आखिरी चेतावनी तुझे दे रहे हैं. कविता भाभी से अपने सारे संबंध खत्म कर ले. अगर तू ने ऐसा नहीं किया तो तेरी इस खूबसूरत बीवी को उठा ले जाएंगे हम शंकर दादा के पास. बाद में जो इस के साथ होगा, उस की जिम्मेदारी सिर्फ तेरी होगी, मजनू की औलाद.’’ फिर उस ने अपने साथियों को आदेश दिया, ‘‘चलो.’’

एक मिनट के अंदरअंदर वैन राजीव व अलका की नजरों से ओझल हो गई. वैन का नंबर नोट करने का सवाल ही नहीं उठा क्योंकि नंबर प्लेट पर मिट्टी की परत चिपकी हुई थी.

पूरे घटनाक्रम की जानकारी पा कर ज्ञानप्रकाश व ओंकारनाथ के परिवारों में चिंता और तनाव का माहौल बन गया. 3 दिन बाद अलका के मातापिता ने सब को रविवार के दिन अपने घर लंच पर आमंत्रित किया.

कुछ मीठा ले आने के लिए ज्ञानप्रकाश और ओंकारनाथ बाजार की तरफ चल दिए. रास्ते में ज्ञानप्रकाश ने तनाव भरे लहजे में अपने समधी से पूछा, ‘‘अलका कैसी चल रही है?’’

ओंकारनाथ ने मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. कल मैं ने राजीव से कहा कि जा कर वह मकान देख आओ जिस का पता प्रापर्टी डीलर ने बताया है. अलका ने मेरी बात सुन कर फौरन कहा कि वह किसी किराए के मकान में जाने की इच्छुक नहीं है. उस का ऐसा ‘मुझे नहीं जाना’ वाला कथन सुन कर मुझे अपनी मुसकान को छिपाना बहुत मुश्किल हो गया था दोस्त. हमारी योजना सफल रही है.’’

‘‘यानी कि अलका की अकेले रहने की जिद समाप्त हुई?’’ ज्ञानप्रकाश एकाएक प्रसन्न नजर आने लगे थे.

‘‘बिलकुल खत्म हुई. सुनो, हमारा कितना नुकसान हुआ है कुल मिला कर?’’ ओंकारनाथ ने जानना चाहा.

‘‘छोड़ो यार,’’ ज्ञानप्रकाश ने कहा, ‘‘मेरी बेटी अलका का जो खून सूख रहा होगा आजकल उस की कीमत क्या रुपयों में आंकी जा सकती है समधी साहब.’’

‘‘ज्ञानप्रकाश, हमतुम अच्छे दोस्त न होते तो अलका की अलग रहने की जिद से पैदा हुई समस्या का समाधान इतनी आसानी से नहीं हो पाता. अब बहू सब के बीच रह कर घरगृहस्थी चलाने के तरीके बेहतर ढंग से सीख जाएगी और चार पैसे भी जुड़ जाएंगे उन के पास,’’ ओंकारनाथ ने अपने समधी के कंधे पर हाथ रख कर अपना मत व्यक्त किया.

‘‘आप का लाखलाख धन्यवाद कि उस के सिर से अलग होने का भूत उतर गया,’’ ज्ञानप्रकाश ने राहत की गहरी सांस ली.

‘‘मुझे धन्यवाद देने के साथसाथ अपने दोस्त के बेटे को भी धन्यवाद दो,  जिस ने शंकर उस्ताद की भूमिका में ऐसी जान डाल दी कि उस की आवाज व हावभाव को याद कर के अलका के अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.’’

‘‘नाटकों में भाग लेने का उस का अनुभव हमारे खूब काम आया.’’

‘‘उस को हिदायत दे देना कि जो उस ने किया है हमारे कहने पर, उस की चर्चा किसी से न करे.’’

‘‘मेरे बेटे व बहू को अगर कभी पता लग गया कि उन की रातों की नींद उड़ाने वाला नाटक हमारे इशारे पर खेला गया था तो मेरा तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा. मैं कभी एक शब्द नहीं मुंह से निकालूंगा,’’ ओंकारनाथ ने संकल्प किया.

‘‘हम ने जो किया है, सब के भले को ध्यान में रख कर किया है, समधीजी. कांटे से कांटा निकल गया है. अब शंकर दादा गायब हो जाएंगे तो धीरेधीरे राजीव व अलका सामान्य होते चले जाएंगे. नतीजा अगर अच्छा निकले तो कुछ गलत कार्यशैली को उचित मानना समझदारी है,’’ ज्ञानप्रकाश की बात का सिर हिला कर ओंकारनाथ ने अनुमोदन किया और दोनों अपने को एकदूसरे के बेहद करीब महसूस करते हुए बाजार पहुंच गए.

उस की डायरी: आखिर नेत्रा की पर्सनल डायरी में क्या लिखा था

वही नेत्रा, जिसे उस ने गंवारू और चरित्रहीन कह कर तलाक दिया था.

यह घर मेरा भी है: शादी के बाद समीर क्यों बदल गया?

मैं और मेरे पति समीर अपनी 8 वर्षीय बेटी के साथ एक रैस्टोरैंट में डिनर कर रहे थे, अचानक बेटी चीनू के हाथ के दबाव से चम्मच उस की प्लेट से छिटक कर उस के कपड़ों पर गिर गया और सब्जी छलक कर फैल गई.

यह देखते ही समीर ने आंखें तरेरते हुए उसे डांटते हुए कहा, ‘‘चीनू, तुम्हें कब अक्ल आएगी? कितनी बार समझाया है कि प्लेट को संभाल कर पकड़ा करो, लेकिन तुम्हें समझ ही नहीं आता… आखिर अपनी मां के गंवारपन के गुण तो तुम में आएंगे ही न.’’

यह सुनते ही मैं तमतमा कर बोली, ‘‘अभी बच्ची है… यदि प्लेट से सब्जी गिर भी गई तो कौन सी आफत आ गई है… तुम से क्या कभी कोई गलती नहीं होती और इस में गंवारपन वाली कौन सी बात है? बस तुम्हें मुझे नीचा दिखाने का कोई न कोई बहाना चाहिए.’’

‘‘सुमन, तुम्हें बीच में बोलने की जरूरत नहीं है… इसे टेबल मैनर्स आने चाहिए. मैं नहीं चाहता इस में तुम्हारे गुण आएं… मैं जो चाहूंगा, इसे सीखना पड़ेगा…’’

मैं ने रोष में आ कर उस की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘यह तुम्हारे हाथ की कठपुतली नहीं है कि उसे जिस तरह चाहो नचा लो और फिर कभी तुम ने सोचा है कि इतनी सख्ती करने का इस नन्ही सी जान पर क्या असर होगा? वह तुम से दूर भागने लगेगी.’’

‘‘मुझे तुम्हारी बकवास नहीं सुननी,’’ कहते हुए समीर चम्मच प्लेट में पटक कर बड़बड़ाता हुआ रैस्टोरैंट के बाहर निकल गया और गाड़ी स्टार्ट कर घर लौट गया.

मेरी नजर चीनू पर पड़ी. वह चम्मच को हाथ में

पकड़े हमारी बातें मूक दर्शक बनी सुन रही थी. उस का चेहरा बुझ गया था, उस के हावभाव से लग रहा था, जैसे वह बहुत आहत है कि उस से ऐसी गलती हुई, जिस की वजह से हमारा झगड़ा हुआ. मैं ने उस का फ्रौक नैपकिन से साफ किया और फिर पुचकारते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, गलती तो किसी से भी हो सकती है. तुम अपना खाना खाओ.’’

‘‘नहीं ममा मुझे भूख नहीं है… मैं ने खा लिया,’’ कहते हुए वह उठ गई.

मुझे पता था कि अब वह नहीं खाएगी. सुबह वह कितनी खुश थी, जब उसे पता चला था कि आज हम बाहर डिनर पर जाएंगे. यह सोच कर मेरा मन रोंआसा हो गया कि मैं समीर की बात पर प्रतिक्रिया नहीं देती तो बात इतनी नहीं बढ़ती. मगर मैं भी क्या करती. आखिर कब तक बरदाश्त करती? मुझे नीचा दिखाने के लिए बातबात में चीनू को मेरा उदाहरण दे कर कि आपनी मां जैसी मत बन जाना, उसे डांटता रहता है. मेरी चिढ़ को उस पर निकालने की उस की आदत बनती जा रही थी.

हम दोनों कैब ले कर घर आए तो देखा समीर दरवाजा बंद कर के अपने कमरे में था. हम भी आ कर सो गए, लेकिन मेरा मन इतना अशांत था कि उस के कारण मेरी आंखों में नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं ने बगल में लेटी चीनू को भरपूर दृष्टि से देखा, कितनी मासूम लग रही थी वह. आखिर उस की क्या गलती थी कि वह हम दोनों के झगड़े में पिसे?

विवाह होते ही समीर का पैशाचिक व्यवहार मुझे खलने लगा था. मुझे हैरानी होती थी यह देख कर कि विवाह के पहले प्रेमी समीर के व्यवहार में पति बनते ही कितना अंतर आ गया. वह मेरे हर काम में मीनमेख निकाल कर यह जताना कभी नहीं चूकता कि मैं छोटे शहर में पली हूं. यहां तक कि वह किसी और की उपस्थिति का भी ध्यान नहीं रखता था.

इस से पहले कि मैं समीर को अच्छी तरह समझूं, चीनू मेरे गर्भ में आ गई. उस के बाद तो मेरा पूरा ध्यान ही आने वाले बच्चे की अगवानी की तैयारी में लग गया था. मैं ने सोचा कि बच्चा होने के बाद शायद उस का व्यवहार बदल जाएगा. मैं उस के पालनपोषण में इतनी व्यस्त हो गई कि अपने मानअपमान पर ध्यान देने का मुझे वक्त ही नहीं मिला. वैसे चीनू की भौतिक सुखसुविधा में वह कभी कोई कमी नहीं छोड़ता था.

वक्त मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता गया और चीनू 3 साल की हो गई. इन सालों में मेरे प्रति समीर के व्यवहार में रत्तीभर परिवर्तन नहीं आया. खुद तो चीनू के लिए सुविधाओं को उपलब्ध करा कर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझता था, लेकिन उस के पालनपोषण में मेरी कमी निकाल कर वह मुझे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था.

धीरेधीरे वह इस के लिए चीनू को अपना हथियार बनाने लगा कि वह भी

मेरी आदतें सीख रही है, जोकि मेरे लिए असहनीय होने लगा था. इस प्रकार का वादविवाद रोज का ही हिस्सा बन गया था और बढ़ता ही जा रहा था. मैं नहीं चाहती थी कि वह हमारे झगड़े के दलदल में चीनू को भी घसीटे. चीनू तो सहमी हुई मूकदर्शक बनी रहती थी और आज तो हद हो गई थी. वास्तविकता तो यह है कि समीर को इस बात का बड़ा घमंड है कि वह इतना कमाता है और उस ने सारी सुखसुविधाएं हमें दे रखी हैं और वह पैसे से सारे रिश्ते खरीद सकता है.

मैं सोच में पड़ गई कि स्त्री को हर अवस्था में पुरुष का सुरक्षा कवच चाहिए होता है. फिर चाहे वह सुरक्षाकवच स्त्री के लिए सोने के पिंजरे में कैद होने के समान ही क्यों न हो? इस कैद में रह कर स्त्री बाहरी दुनिया से तो सुरक्षित हो जाती है, लेकिन इस के अंदर की यातनाएं भी कम नहीं होतीं. पिछली पीढ़ी में स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती थीं, इसलिए असहाय होने के कारण पति द्वारा दी गई यातनाओं को मनमार कर स्वीकार लेती थीं. उन्हें बचपन से ही घुट्टी पिला दी जाती थी कि उन के लिए विवाह करना आवश्यक है और पति के साथ रह कर ही वे सामाजिक मान्यता प्राप्त कर सकती हैं, इस के इतर उन का कोई वजूद ही नहीं है.

मगर अब स्त्रियां आत्मनिर्भर होने के साथसाथ अपने अधिकारों के लिए भी जागरूक हो गई हैं. फिर भी कितनी स्त्रियां हैं जो पुरुष के बिना रहने का निर्णय ले पा रही हैं? लेकिन मैं यह निर्णय ले कर समाज की सोच को झुठला कर रहूंगी. तलाक ले कर नहीं, बल्कि साथ रह कर. तलाक ही हर दुखद वैवाहिक रिश्ते का अंत नहीं होता. आखिर यह मेरा भी घर है, जिसे मैं ने तनमनधन से संवारा है. इसे छोड़ कर मैं क्यों जाऊं?

लड़कियों का विवाह हो जाता है तो उन का अपने मायके पर अधिकार नहीं रहता, विवाह के बाद पति से अलग रहने की सोचें तो वही उस घर को छोड़ कर जाती हैं, फिर उन का अपना घर कौन सा है, जिस पर वे अपना पूरा अधिकार जता सकें? अधिकार मांगने से नहीं मिलता, उसे छीनना पड़ता है. मैं ने मन ही मन एक निर्णय लिया और बेफिक्र हो कर सो गई.

सुबह उठी तो मन बड़ा भारी हो रहा था. समीर अभी भी सामान्य नहीं था. वह

औफिस के लिए तैयार हो रहा था तो मैं ने टेबल पर नाश्ता लगाया, लेकिन वह ‘मैं औफिस में नाश्ता कर लूंगा’ बड़बड़ाते हुए निकल गया. मैं ने भी उस की बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

चीनू आ कर मुझ से लिपट गई. बोली, ‘‘ममा, पापा को इतना गुस्सा क्यों आता है? मुझ से थोड़ी सब्जी ही तो गिरी थी…आप को याद है उन से भी चाय का कप लुढ़क गया था और आप ने उन से कहा था कि कोई बात नहीं, ऐसा हो जाता है. फिर तुरंत कपड़ा ला कर आप ने सफाई की थी. मेरी गलती पर पापा ऐसा क्यों नहीं कहते? मुझे पापा बिलकुल अच्छे नहीं लगते. जब वे औफिस चले जाते हैं, तब घर में कितना अच्छा लगता है.’’

‘‘सब ठीक हो जाएगा बेटा, तू परेशान मत हो… मैं हूं न,’’ कह कर मैं ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और सोचने लगी कि इतनी प्यारी बच्ची पर कोई कैसे गुस्सा कर सकता है? यह समीर के व्यवहार का कितना अवलोकन करती है और इस के बालसुलभ मन पर उस का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.

समीर और मुझ में बोलचाल बंद रही. कभीकभी वह औपचारिकतावश चीनू से पूछता कहीं जाने के लिए तो वह यह देख कर कि वह मुझ से बात नहीं करता है, उसे साफ मना कर देती थी. वह सोचता था कि कोई प्रलोभन दे कर वह चीनू को अपने पक्ष में कर लेगा, लेकिन वह सफल नहीं हुआ. समीर की बेरुखी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी, मनमानी भी धीरेधीरे बढ़ रही थी. जबतब घर का खाना छोड़ कर बाहर खाने चला जाता, मैं भी उस के व्यवहार को अनदेखा कर के चीनू के साथ खुश रहती. यह स्थिति 15 दिन रही.

एक दिन मैं चीनू के साथ कहीं से लौटी तो देखा समीर औफिस से अप्रत्याशित जल्दी लौट कर घर में बैठा था. मुझे देखते ही गुस्से में बोला, ‘‘क्या बात है, आजकल कहां जाती हो बताने की भीजरूरत नहीं समझी जाती…’’ उस की बात बीच में काट कर मैं बोली, ‘‘तुम बताते हो कि तुम कहां जाते हो?’’

‘‘मेरी बात और है.’’

‘‘क्यों? तुम्हें गुलछर्रे उड़ाने की इजाजत है, क्योंकि तुम पुरुष हो, मुझे नहीं. क्योंकि…’’

‘‘लेकिन तुम्हें तकलीफ क्या है? तुम्हें किस चीज की कमी है? हर सुख घर में मौजूद है. पैसे की कोई कमी नहीं. जो चाहे कर सकती हो,’’ गुलछर्रे उड़ाने वाली बात सुन कर वह थोड़ा संयत हो कर मेरी बात को बीच में ही रोक कर बोला, क्योंकि उस के और उस की कुलीग सुमन के विवाहेतर संबंध से मैं अनभिज्ञ नहीं थी.

‘‘तुम्हें क्या लगता है, इन भौतिक सुखों के लिए ही स्त्री अपने पूर्व रिश्तों को विवाह की सप्तपदी लेते समय ही हवनकुंड में झोंक देती है और बदले में पुरुष उस के शरीर पर अपना प्रभुत्व समझ कर जब चाहे नोचखसोट कर अपनी मर्दानगी दिखाता है… स्त्री भी हाड़मांस की बनी होती है, उस के पास भी दिल होता है, उस का भी स्वाभिमान होता है, वह अपने पति से आर्थिक सुरक्षा के साथसाथ मानसिक और सामाजिक सुरक्षा की भी अपेक्षा करती है. तुम्हारे घर वाले तुम्हारे सामने मुझे कितना भी नीचा दिखा लें, लेकिन तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. तुम मूकदर्शक बने खड़े देखते रहते हो… स्वयं हर समय मुझे नीचा दिखा कर मेरे मन को कितना आहत करते हो, यह कभी सोचा है?’’

‘‘ठीक है यदि तुम यहां खुश नहीं हो तो अपने मायके जा कर रहो, लेकिन चीनू तुम्हारे साथ नहीं जाएगी, वह मेरी बेटी है, उस की परवरिश में मैं कोई कमी नहीं रहने देना चाहता. मैं उस का पालनपोषण अपने तरीके से करूंगा… मैं नहीं चाहता कि वह तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारे स्तर की बने,’’ समीर के पास जवाब देने को कुछ नहीं बचा था, इसलिए अधिकतर पुरुषों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला अंतिम वार करते हुए चिल्ला कर बोला.

‘‘चिल्लाओ मत. सिर्फ पैदा करने से ही तुम चीनू के बाप बनने के अधिकारी नहीं हो सकते. वह तुम्हारे व्यवहार से आहत होती है. आजकल के बच्चे हमारे जमाने के बच्चे नहीं हैं कि उन पर अपने विचारों को थोपा जाए, हम उन को उस तरह नहीं पाल सकते जैसे हमें पाला गया है. इन के पैदा होने तक समय बहुत बदल गया है.

‘‘मैं उसे तुम्हारे शाश्नात्मक तरीके की परवरिश के दलदल में नहीं धंसने दूंगी…

मैं उस के लिए वह सब करूंगी जिस से कि वह अपने निर्णय स्वयं ले सके और मैं तुम्हारी पत्नी हूं, तुम्हारी संपत्ति नहीं. यह घर मेरा भी है. जाना है तो तुम जाओ. मैं क्यों जाऊं?

‘‘इस घर पर जितना तुम्हारा अधिकार है, उतना ही मेरा भी है. समाज के सामने मुझ से विवाह किया है. तुम्हारी रखैल नहीं हूं… जमाना बदल गया, लेकिन तुम पुरुषों की स्त्रियों के प्रति सोच नहीं बदली. सारी वर्जनाएं, सारे कर्तव्य स्त्रियों के लिए ही क्यों? उन की इच्छाओं, आकांक्षाओं का तुम पुरुषों की नजरों में कोई मूल्य नहीं है.

‘‘उन के वजूद का किसी को एहसास तक भी नहीं. लेकिन स्त्रियां भी क्यों उर्मिला की तरह अपने पति के निर्णय को ही अपनी नियत समझ कर स्वीकार लेती हैं? क्यों अपने सपनों का गला घोंट कर पुरुषों के दिखाए मार्ग पर आंख मूंद कर चल देती हैं? क्यों अपने जीवन के निर्णय स्वयं नहीं ले पातीं? क्यों औरों के सुख के लिए अपना बलिदान करती हैं? अभी तक मैं ने भी यही किया, लेकिन अब नहीं करूंगी. मैं इसी घर में स्वतंत्र हो कर अपनी इच्छानुसार रहूंगी,’’ समीर पहली बार मुझे भाषणात्मक तरीके से बोलते हुए देख कर अवाक रह गया.

‘‘पापा, मैं आप के पास नहीं रहूंगी, आप मुझे प्यार नहीं करते. हमेशा डांटते रहते हैं… मैं ममा के साथ रहूंगी और मैं उन की तरह ही बनना चाहती हूं… आई हेट यू पापा…’’ परदे के पीछे खड़ी चीनू, जोकि हमारी सारी बातें सुन रही थी, बाहर निकल कर रोष और खुशी के मिश्रित आंसू बहने लगी. मैं ने देखा कि समीर पहली बार चेहरे पर हारे हुए खिलाड़ी के से भाव लिए मूकदर्शक बना रह गया.

मैं देर रात औफिस से लौटता हूं, जिसकी वजह से मुझे नींद नहीं आती हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 26 वर्षीय नवयुवक हूं. नैशनल लौ यूनिवर्सिटी से लौ की डिग्री पूरी करने के बाद अब एक बड़ी लौ कंपनी में ऐसोसिएट के रूप में काम कर रहा हूं. अकसर देर रात तक काम करना होता है, जिस से मेरी स्लीप क्लौक बिगड़ गई है. बिस्तर में लेटने पर भी देर तक नींद नहीं आती. दिनभर की घटनाएं दिमाग में छाई रहती हैं. कृपया कुछ ऐसे व्यावहारिक उपाय बताएं जिन से कि मुझे फिर से पहले जैसी बढ़िया नींद आने लगे.

जवाब
सच दुनिया में नींद जैसी प्यारी दूसरी कोई चीज नहीं. उस के आगोश में सिर रखने से मनमस्तिष्क ताजगी से भर उठता है, शरीर स्फूर्त हो जाता है और जब सुबह आंख खुलती है तो रंगों में नई उमंग अंगड़ाई ले रही होती है. वयस्क जीवन में 6 से 8 घंटे की नींद अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए जरूरी है.

आप की यह विवशता है कि आप को देर रात तक काम करना पड़ता है. अच्छी नींद के लिए ये उपाय आजमाना लाभकारी हो सकता है:

तनाव की दुनिया पीछे छोड़ आएं: नींद आने के लिए जरूरी है कि मन शांत हो. उस पर किसी चीज का बोझ न हो. दफ्तर से लौटने के बाद मौजमस्ती करें, मन को खुला छोड़ दें, ताकि दिन भर का तनाव दूर हो जाए.

मन में शांति के स्वर जगाएं:  सोने से पहले कुछ ऐसा करें कि भीतर सुखशांति के स्वर गूंजने लगें. चाहें तो कोई रिलैक्सिंग म्यूजिक सुनें, कोई पुस्तक या पत्रिका पढ़ें और फिर जब पलकें भारी होने लगें तब सो जाएं.

टीवी और कंप्यूटर नींद के साथी नहीं: सोने से पहले देर रात तक टीवी देखना या कंप्यूटर पर काम करना नींद में बाधक बन सकता है. इन के तेज प्रकाश से मस्तिष्क का सर्किट जाग्रत अवस्था में चला जाता है. मीठी नींद पाने के लिए सोने से घंटा डेढ़ घंटा पहले इन्हें बंद कर दें.

हलका भोजन ही ठीक: सोने से पहले हलका भोजन लेने में ही अच्छाई है. पेट ऊपर तक भरा हो और शरीर उसे पचाने में लगा हो तो भला नींद कैसे आ सकती है.

चाय और कौफी से बचें: देर शाम में चाय और कौफी पीने से भी नींद भाग सकती है. इन में मिली कैफीन मस्तिष्क को आराम नहीं लेने देती.

स्नान करें: बिस्तर में जाने से 1 घंटा पहले स्नान करने से शरीर की सिंकाई हो जाती है और पेशियां रिलैक्स हो जाती हैं. यह थकान दूर करने का आसान उपाय है.

योगनिद्रा है तनावमुक्ति की उमदा दवा: सोने से पहले कुछ मिनट योगनिद्रा में बिताने से विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकते हैं. ऐसा करने से शरीर और मनमस्तिष्क शांत अवस्था में पहुंच जाते हैं और आसानी से नींद आ जाती है.

सोच रचनात्मक रखें. दिन में कुछ समय व्यायाम के लिए भी जरूर निकालें. वजन पर कंट्रोल रखें. जहां तक हो सके सोने का समय तय कर लें. यह सब करने पर यकीनन आप फिर से पहले जैसी मीठी नींद का सुख पाने लगेंगे.

अंधविश्वास के कलश ढोती महिलाएं, उन्हें कमजोर करने की साजिश

भारत में नारी के सम्मान में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता. अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां भगवान का वास होता है. भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में नए मुकाम हासिल कर रही हैं. आज के दौर में भारतीय नारी देश को सशक्त बनाने में अपना अहम योगदान दे रही है, साथ ही, विश्व पटल पर भारत का नाम रोशन कर रही है. भारतीय नारी ने राजनीति, विज्ञान, रक्षा, अंतरिक्ष जैसे कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अपना नाम रोशन किया है.

8 मार्च के आयोजनों और भाषणों का अपना, तात्कालिक ही सही, महत्त्व तो होता है जो उस वक्त एक साजिश में सिमटा नजर आता है जब हर कोई यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते… टाइप बातें कर यह जताने की कोशिश करता है कि महिलाओं की दौड़ धर्म से शुरू होती है और धर्म पर ही खत्म होती है. इस जर्नी के बीच में उसे जो कुछ भी हासिल होता है वह भी धर्म की ही देन है. यह उस के सतीत्व, व्रत त्योहारों और कर्मकांडों का फल होता है. कोई भी धर्म से इतर महिलाओं की उपलब्धियों का विश्लेषण करने की बात नहीं करता क्योंकि महिलाओं का पूजापाठी बने रहना ही धर्म की दुकानदारी के चलते रहने का परिणाम है जिस से दक्षिणापंथियों को तगड़ा प्रौफिट होता है.
8 मार्च को ही शिवरात्रि थी. उस दिन भी देशभर में कलश यात्राओं का आयोजन किया गया था. आइए, कुछ पर नजर डालें.

– शिवरात्रि के अवसर पर बेगुना स्थित शिव मंदिर में कलश यात्रा निकाल कर पूजापाठ शुरू किया गया. उस दौरान गांव की महिलाओं ने बेगुना तालाब से कलश उठा कर गांव का भ्रमण किया. कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा, मेदिनापुर के अलावा खरसांवा तेरा की हरि संकीर्तन मंडली के कलाकार भाग ले रहे हैं.
– शिवरात्रि पर्व पूरे भारत वर्ष में धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस मौके पर पूर्णिया चित्रवानी सेवा समिति विश्वामित्र सेवा संघ द्वारा भव्य कलश यात्रा निकाली गई. जिस में 251 महिलाओं व कुमारी कन्याओं ने भाग लिया. विधिवत पूजापाठ के साथसाथ महिलाओं ने शिव मंदिर के पांच फेरे ले कर भगवान भोले से मनोकामना पूर्ण होने की अर्जियां लगाईं.
– महाशिवरात्रि को ले कर बरमसिया मृत्युंजय महादेव मंदिर से भव्य कलश यात्रा निकाली गई. इस कलश यात्रा में काफी संख्या में महिलाएं व युवतियां सिर पर कलश लिए शामिल हुईं.
– इटारसी शहर के पशुपतिनाथ धाम मंदिर में आज से रुद्राक्ष रूद्र महायज्ञ संगीतमय श्री शिव महापुराण कथा का आयोजन किया जा रहा है. इस अवसर पर आयोजित कलश यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं सिर पर कलश ले कर चल रही थीं.

बहुत बड़े देश के बहुत छोटे इलाकों की ये खबरें बताती हैं कि सशक्तीकरण एक खास दिन कहने भर की बात है. नहीं तो लाखोंकरोड़ों महिलाएं कलश यात्रा की आड़ में छली जा रही होती हैं और यह साजिश महानगरों में और बड़े पैमाने पर रची जाती है.

– 7 मार्च को ग्रेटर नोएडा में कोई 500 महिलाएं सिर पर कलश लिए चल रही थीं. यह आयोजन गायत्री परिवार का था. शिक्षित और संभ्रांत महिलाएं भी कलश यात्राओं में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं, यह बात आएदिन बड़े शहरों से उजागर होती रहती है. इसी ग्रेटर नोएडा में 22 जनवरी के अयोध्या इवैंट के दौरान भी सैकड़ों महिलाओं ने कलश यात्रा में शिरकत की थी.

पिछले साल जुलाई में एक नए ब्रैंडेड बाबा बागेश्वर ने जब जैतपुर गांव में अपना दिव्य दरबार सजाया था तब भी हजारों महिलाएं पीली ड्रैस पहने सड़कों पर दिखी थीं. खास बात यह थी कि महिलाओं में कलश यात्रा में हिस्सा लेने की होड़ कुछ इस तरह मच गई थी कि वे एक दिन पहले ही आयोजन स्थल सिटी पार्क वैष्णो माता के मंदिर पहुंच गई थीं.

– कलश यात्रा के मामले में भोपाल भी कभी पीछे नहीं रहता. शिवरात्रि पर नेपाली समाज की कलश यात्रा में सैकड़ों नेपाली महिलाएं सड़कों की शोभा बढ़ाती नजर आई थीं. बाबाओं का भोपाल आनाजाना बेहद आम बात है. उन के आयोजनों का श्रीगणेश ही कलश यात्राओं से होता है. जितनी ज्यादा महिलाएं कलश यात्रा में आती हैं उतनी ही गारंटी दुकान के चलने की होती है. इस बाबत आयोजक घरघर जा कर महिलाओं को चावल व पीली साड़ियां देते हैं जो कलश यात्राओं का घोषित ड्रैसकोड है. अब तो भोपाल में चुनरी यात्राओं का नया चलन शुरू हो गया है. बीती 17 फरवरी को नर्मदा जयंती के मौके पर 1,100 मीटर लंबी चुनरी यात्रा निकाली गई थी.
– 4 मार्च को लखनऊ में एक धर्मगुरु उमाकांतानंद सरस्वती की श्रीराम कथा के आयोजन के पहले निकली कलश यात्रा में पीले कपड़े पहने हजारों महिलाएं बैंडबाजे के साथ सड़कों पर दिखी थीं. ये महिलाएं देररात तक कथा में भी बैठी रही थीं जिस से भीड़ दिखाई जा सके. 22 जनवरी के अयोध्या इवैंट के दौरान तो न केवल लखनऊ बल्कि पूरे उत्तरप्रदेश में मंगल कलश यात्राओं की बाढ़ सी आ गई थी. सड़कों पर महिलाएं झूमती नजर आई थीं.

और इस में भी भेदभाव

कलश यात्राएं जाहिर है धर्म का सार्वजनिक फूहड़ प्रदर्शन हैं, जिन का भार महिलाओं को ही उठाना पड़ता है. इन यात्राओं का बड़ा मकसद महिलाओं को पिछड़ा और अशक्त बनाए रखना होता है लेकिन इस में भी भेदभाव बहुत अप्रिय तरीके से होने लगा है जो यह बताता है कि अब देश लगभग हिंदू राष्ट्र बन गया है. इस की कभी भी लालकिले से आधिकारिक घोषणा होना ही बाकी है.
2 दिनों पहले ही दिल्ली के इंद्रलोक इलाके में सड़क पर नमाज पढ़ रहे कुछ मुसलिम युवकों को एक पुलिसकर्मी ने लात मारी थी, जिस पर कुदरती तौर पर अभी तक हल्ला मच रहा है. मुसलिम समुदाय दहशत में भी है और गुस्से में भी. लेकिन लाख टके का सवाल अब यह खड़ा हो रहा है कि सड़कों पर कलश यात्राएं धड़ल्ले से निकाली जा सकती हैं लेकिन नमाज नहीं पढ़ी जा सकती.

कलशयात्रा का भी सरकारीकरण

कलश यात्रा ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है जिस का उल्लेख किसी धर्मग्रंथ में नहीं मिलता. धर्मगुरुओं के बाद अब सरकार भी इस टोटके को भुनाने से नहीं चूक रही. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने केन बेतबा लिंक प्रोजैक्ट की शुरुआत ही जल कलश यात्रा टाइटल से की है. यह यात्रा प्रदेश के 3 हजार गांवों से हो कर गुजरेगी.
घोषित तौर पर इस में महिलाएं नहीं होंगी लेकिन अघोषित तौर पर होंगी क्योंकि कलश ढोने जैसा मेहनतवाला काम पुरुष नहीं करते. सरकार की मंशा के मुताबिक जल कलश यात्रा से महिलाओं और स्कूली बच्चों को ही जोड़ा जाएगा.
शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते नल जल योजना में धर्म का दखल बेहद आम था. 30 मार्च, 2022 को यह बात साबित भी हुई थी जब मंदसौर के सुवासरा में तत्कालीन मंत्री हरदीप सिंह डग ने जल नल योजना के लोकार्पण के दौरान महिलाओं के सिर पर कलश रखे थे और कन्यापूजन भी किया था. अब यही सबकुछ जल कलश यात्रा में दिखे, तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

सशक्तीकरण या अशक्तीकरण

दक्षिणापंथी करें या दक्षिणपंथी करें, कलश यात्राएं दरअसल महिलाओं को पिछड़ा बनाए रखने की साजिश का हिस्सा हैं जिन में महिलाओं को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है. वे घंटों भूखीप्यासी, नंगेपांव, तपती धूप में अपने तलुवे जलाती कई किलोमीटर तक पैदल चलती हैं. इस से उन्हें क्या मिलता है, यह बताने को कोई तैयार नहीं सिवा इस चलताऊ वक्तव्य के कि कलश में देवताओं का वास होता है और जो इसे ले कर चलता है उसे पुण्य मिलता है.
इसी पुण्य के दूसरे सब्जबाग हैं. सैकड़ों तरह के व्रत-उपवास जो महिलाओं को ही करने पड़ते हैं. रही बात कलश यात्राओं की, तो महिलाएं उन में भेड़-बकरी जैसी ही नजर आती हैं. घंटों वे भजनकीर्तन करते अपना वक्त बरबाद करती हैं, डीजे की धुनों पर सड़कों पर नाचतीगाती हैं, बाबाओं के प्रवचन सुनती हैं और शाम या देररात आयोजकों से मिली सवा सौ रुपए वाली पीली साड़ी के पल्लू में प्रसाद लपेट कर घर आ कर खाना बनाने में जुट जाती हैं.
यह कैसा सशक्तीकरण हो रहा है, इस पर अब हर किसी को सोचना चाहिए.

चरित्रहीन कौन- भाग 2: कामवाली के साथ क्या कर रहा था उमेश

आयुषी ने जब एक दिन रूपा से पूछा कि तुम्हारा पति क्या करता है, तो बोली, ‘‘दीदी, मेरा मर्द मजदूरी करता है. हमारी शादी के अभी 2 साल ही हुए हैं.’’

रूपा अपने मायके, ससुराल, नातेरिश्तेदारों सब के बारे में बताती रहती थी. आयुषी अब रूपा पर भरोसा करने लगी थी, परंतु उसे अपने पति पर कतई भरोसा न था.

रूपा को आयुषी के घर काम करते हुए करीब 7 महीने हो चुके थे. अब तो रूपा कभीकभार लेट भी आती, तो आयुषी कुछ नहीं कहती थी. उसे लगता था कि अगर रूपा ठीक है, तो उमेश कुछ नहीं कर सकता है.

रूपा अब बड़े सलीके से सजधज कर रहने लगी थी. आयुषी ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘रूपा, आज तो तुम बहुत अच्छी लग रही हो और यह तुम्हारा सलवारसूट भी. कहां से खरीदा? बहुत ही सुंदर रंग है.’’

रूपा कहने लगी, ‘‘दीदी, मेरी मां ने दिया था.’’

रूपा का चेहरा कुछ दिनों से बड़ा ही खिलाखिला सा लगने लगा था. आयुषी ने पूछा भी, ‘‘रूपा आजकल बड़ी खुश नजर आ रही है… कोई बात है क्या?’’ तब रूपा ने मुसकरा कर कहा, ‘‘नहीं दीदी.’’

रूपा कुछ महीनों से काम करने लेट से आने लगी थी. पूछने पर कहने लगी ‘‘मेरी सास बीमार हैं, इस कारण देर हो जाती है,’’

आयुषी कुछ नहीं कहती, उस पर घर छोड़ कर औफिस चली जाती थी. आयुषी को इस बात की हैरानी होती थी कि उमेश इतना कैसे सुधर गया, रूपा उसे चाय देने भी जाती, तो नजर उठा कर भी नहीं देखता है. आयुषी को लगा कि शायद उसे उस दिन का थप्पड़ याद है और फिर मुसकरा उठी.

रूपा को काम पर न आए आज हफ्ता हो गया. आयुषी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, किस से पूछे कि रूपा क्यों नहीं आ रही है. फिर याद आया कि वैशाली से पूछती हूं.

वैशाली ने कहा कि उस के घर भी रूपा कई दिनों से नहीं आ रही है. उस ने यह भी कहा कि रूपा का घर आयुषी के घर से थोड़ी दूर पर ही है. जा कर पूछ ले. आयुषी को लगा कि वैशाली सच कह रही है. उसे जा कर देखना चाहिए कि क्यों नहीं आ रही है और वह काम पर आएगी भी या नहीं.

संकरी सी गली में 1 कमरे का घर, 1 खटिया पर कांता बाई लेटी थी. बाहर से ही सब दिख रहा था.

‘‘कांता बाई,’’ आयुषी की आवाज सुनते ही कांता बाई बाहर आ गई.

‘‘रूपा कई दिनों से नहीं आ रही है, तो देखने आ गई, तबीयत तो ठीक है न उस की? आयुषी ने कांता बाई से पूछा.

कांता बाई अपना सिर पीटते हुए कहने लगी, कर्मजली मर जाए तो अच्छा है.’’

‘‘कांता बाई ऐसा क्यों कह रही… कोईर् बात हो गई क्या?’’ आयुषी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैडमजी, तो और मैं क्या बोलूं?’’ पता नहीं ये कलमुंही कहां से अपना मुंह काला करवा कर आई है… किस का पाप अपने पेट में लिए घूम रही है… यह देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई. अपने बेटे को क्या जवाब दूंगी. कांता बाई ने बिलखते हुए कहा.

‘‘आप को अपने बेटे को क्यों जवाब देना पड़ेगा… रूपा के पेट में तो आप के बेटे का ही बच्चा…’’

कांता बाई बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘मेरा बेटा तो साल भर से गुजरात में है. वहां कमाने गया है, तो उस का बच्चा कैसे हो सकता है मैडमजी?’’

आयुषी को जोर का झटका लगा. वह रूपा से मिले बिना ही घर आ गई. उस ने तो रूपा को एक अच्छी और सुलझी हुई औरत समझा था, पर वह तो चरित्रहीन निकली.

आयुषी को यह भी डर सताने लगा कि पता नहीं रूपा किस के बच्चे की मां बनने वाली है. कहीं मेरे पति? फिर अपने दिमाग को झटका देती हुई अपनेआप को ही समझाने लगी कि नहींनहीं ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा तो मेरे सामने ही रोज काम कर के चली जाती थी. हां कुछ दिन लेट आई थी, पर उमेश तो उसे देखता भी नहीं था… फिर वह तो कितने घरों में काम करती है… कोई भी हो सकता है. मगर आयुषी को अंदर ही अंदर कोई अनजाना डर सताने लगा था.

आयुषी को यह भी समझ नहीं आ रहा था कि दूसरी बाई कहां से ढूंढ़ेगी और अगर मिल भी गई तो फिर वह कैसी होगी? ये सब सोचसोच कर ही आयुषी का दिमाग चकराने लगता था. उसे अब बाई के नाम से ही डर लगने लगा था.

आयुषी ने औफिस से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली, क्योंकि घर और बाहर दोनों जगह काम करना उस के लिए मुश्किल हो गया था.

आयुषी को काम करते देख कर एक दिन उमेश ने कहा, ‘‘लगता है तुम्हारी बाई भाग गई.’’

आयुषी ने कहा, ‘‘उस की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए नहीं आ रही है.’’

‘‘अरे, यह तबीयत खराब तो एक बहाना है पैसे बढ़वाने का. जानती है कि तुम औरतों का उस के बिना काम नहीं चलने वाला, इसलिए नखरे दिखाती है,’’ एक कुटिल मुसकान के साथ उमेश ने कहा.

‘‘जब तुम्हें कुछ पता नहीं है, तो बकबक क्यों करते हो?’’ आयुषी ने उमेश को झिड़कते हुए कहा, लेकिन उमेश को टटोलना भी था कि कहीं रूपा की इस हालत का जिम्मेदार उमेश तो नहीं है.

‘‘कांता बाई कह रही थी कि रूपा पेट से है, पर ताज्जुब की बात है कि उस का पति साल भर से उस से दूर है… फिर वह पेट से कैसे रह गई? खैर, जो भी हो पर कांता बाई तो रोरो कर कह रही थी कि जिस ने भी उस की बहू के साथ यह कुकर्म किया, उसे वह छोड़ेगी नहीं… यह भी कह रही थी कि पुलिस को सच बता देगी,’’ आयुषी उमेश को देख कर बोल रही थी और उस का चेहरा भी पढ़ने की कोशिश कर रही थी.

‘‘तो तुम मुझे क्यों सुना रही हो?’’ हकलाते हुए उमेश ने कहा, ‘‘और वैसे भी आज मुझे जल्दी औफिस के लिए निकलना है, तो नाश्ता लगा दो,’’ उमेश अपनेआप को ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहा था कि ये फालतू की बातों से उसे क्या लेनादेना. मगर आयुषी को उमेश पर शक होने लगा था.

आयुषी सोचने लगी कि रूपा ही बता सकती है कि कौन है वह इंसान, जिस ने उस के साथ ये सब किया. पर मैं क्यों पूछूं. कहीं उस ने उमेश पर ही झूठा इलजाम लगा दिया तो? आयुषी मन ही मन बड़बड़ा रही थी.

कांता बाई को अचानक अपने घर आए देख कर आयुषी डर गई. बोली, ‘‘क्या बात है कांता बाई?’’

‘‘मैडमजी, मैं ने अपनी बहू को बहुत मारापीटा कि बताओ कौन है इस का जिम्मेदार वरना तुझे तेरी मां के घर भेज दूंगी.’’

आयुषी के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. बोली, ‘‘तो मुझे क्यों सुना रही हो कांता बाई?’’ फिर एक सवालिया नजरों से वह कांता बाई को देखने लगी.

‘‘मैडमजी, मुझे माफ कीजिए पर रूपा ने आप के साहब का ही नाम बताया.’’

‘‘कांता बाई, पागल हो गई हो क्या, जो ऐसी बातें कर रही हो… और आप की बहू… उसे मैं ने क्या समझा था और क्या निकली… किसी और का पाप मेरे पति के सिर मढ़ने की कोशिश कर रही है,’’ आयुषी ने तैश में आते हुए कहा.

‘‘मैडमजी, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. रूपा ने जो कहा वही बता रही हूं और मैं उसे डाक्टर के पास भी ले कर गई थी गर्भपात करवाने, पर डाक्टर ने कहा कि अब गर्भपात नहीं हो सकता है. टाइम ज्यादा हो गया है. आप ही कुछ करो मैडमजी, नहीं तो मुझे सब को आप के पति की करतूत बतानी पड़ेगी,’’ एक तरह से कांता बाई ने धमकी देते हुएकहा. वह भी बेचारी क्या करती. जो उसे समझ आया कह कर चली गई.

कांता बाई तो चली गई, पर आयुषी को ढेरों टैंशन दे गई. अपने पति का चरित्र तो उसे पहले से पता था. बेशर्म कहीं का… सुधरने का ढोंग कर रहा था… और मेरे पीछे छि: अपना ही सिर पकड़ कर आयुषी चीखने लगी कि अब क्या करूं.

जब शाम को उमेश घर आया तो आयुषी ने उसे कांता बाई की कही सारी बातें बता दीं.

उमेश कहने लगा, ‘‘झूठ बोल रही है वह औरत. एक रोज मुझ से ही पैसा मांगने लगी कि मेरी सास बीमार है, डाक्टर को दिखाना है. मुझे दया आ गई तो दे दिए, फिर तो वह हमेशा पैसे की मांग करने लगी. तब मैं ने मना कर दिया. शायद इसलिए मुझ पर गंदा इलजाम लगा रही है,’’ सफाई देते हुए उमेश ने कहा, पर उस के चेहरे से झूठ साफ झलक रहा था.

‘‘कांता बाई तो अपनी बहू का गर्भपात भी कराने गई थी, लेकिन डाक्टर ने यह कह कर मना कर दिया कि समय ज्यादा हो गया है, जान को खतरा हो सकता है फिर अब तो एक जांच से पता चल जाता है कि बच्चे का बाप कौन है,’’ अपनी नजरें उमेश पर गड़ाते हुए आयुषी ने कहा.

‘‘मुझे ये सब क्यों सुना रही हो? मैं ने कहा न कि मैं ने कुछ भी नहीं किया… बारबार मुझे ये बातें न सुनाओ,’’ उमेश ने अपनी नजरें चुराते हुए कहा.

आयुषी रात भर करवटें बदलती रही. देखा तो उमेश भी नहीं सोया था. आयुषी को अपने दोनों बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता नजर आ रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे.

दोनों बच्चों को स्कूल भेज कर और उमेश के औफिस जाने के बाद आयुषी ने कांता बाई के घर का रुख किया.

‘‘कांता बाई, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?’’ बाहर से ही आयुषी ने आवाज देते हुए कहा.

कांता बाई आयुषी को अंदर अपनी कोठरी में ले गई.

आयुषी ने कहा, ‘‘रूपा अगर तुम सब सचसच बताओगी, तो मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हूं.’’

‘‘दीदी, पहले तो आप मुझे माफ कर दो.’’

आयुषी ने कहा, ‘‘हां कर दिया. अब बोलो.’’

चरित्रहीन कौन- भाग 3: कामवाली के साथ क्या कर रहा था उमेश

‘‘आप को याद होगा, जब मैं पहली बार आप के घर लेट आई थी… जैसे ही मेरा काम खत्म हो गया और मैं अपने घर जाने लगी, तो साहब ने कहा कि 1 कप चाय बना दो, फिर चली जाना. चाय दे कर मैं जाने लगी, तो वे बोले कि रूपा थोड़ी देर बैठो. फिर मेरी बनाई चाय की तारीफ करने लगे. फिर कहने लगे कि तुम्हारी दीदी (यानी आप) इतनी अच्छी चाय नहीं बना पाती है. चाय क्या उस के बनाए खाने में भी स्वाद नहीं होता है. फिर कहने लगे कि मैं आप को कुछ न बताऊं. वे अब रोज मेरी तारीफ करने लगे,’’  बोलतेबोलते रूपा चुप हो गई.

रूपा फिर कहने लगी, ‘‘साहब ने एक रोज मुझ से कहा कि तुम्हारा पति यहां नहीं है, तो तुम्हारा कभी मन नहीं करता है?’’

उन की नजरों और उन की कही बातों को मैं समझ गई.

फिर कहने लगे, ‘‘देखा रूपा, यह कोई शर्म की बात नहीं है. यह तो शरीर की जरूरत है और सभी को चाहिए ही… तुम्हारी दीदी तो मेरे साथ बैठना भी पसंद नहीं करती है.’’

‘‘साहब रोज मुझे पैसे पकड़ा देते थे… कहते थे कि अपनी दीदी को कुछ न बताना… कभी भी किसी चीज या पैसे की जरूरत हो तो मुझ से मांग लेना. बिलकुल संकोच मत करना… तुम जरा लेट ही काम करने आया करो… इसी बहाने तुम्हारे हाथों की बनी चाय पीने को मिल जाया करेगी…साहब की सारी बातें मुझे सच्ची लगने लगी थीं और रूपा की आंखों से आंसू बह निकले.

आयुषी ने कहा, ‘‘आगे क्या हुआ वह बताओ.’’

‘‘मैं साहब की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गई और फिर… मुझे माफ कर दो दीदी, मुझे नहीं पता था कि इस का अंजाम ये सब होगा,’’ कह कर रूपा फफकफफक कर रो पड़ी.

‘बेचारी, अभी इस की उम्र ही क्या है?’ आयुषी सोचने लगी.

‘‘मैडमजी, कल साहब भी आए थे. माफी मांग रहे थे. कहने लगे कि वह एक डाक्टर को जानते हैं और फिर मुझे वहां ले गए. मगर डाक्टर ने गर्भपात करने से यह कह कर मना कर दिया कि मेरी जान को खतरा है. साहब उसे पैसों का लालच भी देने लगे कि डाक्टर आप आराम से सोचना, हम परसों फिर आएंगे.’’‘‘रूपा, तुम कल जाओ, मैं भी पीछे से आती हूं… साहब को मत बताना कि तुम ने मुझे कुछ बताया है,’’ रूपा को समझा कर आयुषी अपने घर वापस आ गई.

‘‘उमेश, सुबह औफिस की कह कर घर से जल्दी निकल गया. आयुषी तो इसी ताक में थी. उस ने उमेश का पीछा किया. देखा तो उमेश ने अपनी गाड़ी एक क्लीनिक के पास रोक दी. रूपा वहां पहले से खड़ी थी. जैसे ही दोनों क्लीनिक के अंदर गए, आयुषी भी उन के पीछे चल पड़ी.

‘‘मैं ने आप को पहले भी कहा था कि यह गर्भपात अब नहीं हो सकता है… इन की जान को खतरा है,’’ डाक्टर उमेश से कह रहा था.

आयुषी दंग थी कि उमेश पहले भी रूपा को यहां ले कर आ चुका है गर्भपात करवाने और मुझे बेवकूफ बना रहा था कि उस ने कुछ नहीं किया है.

‘‘डाक्टर, आप जितना पैसा कहेंगे दूंगा, पर आप को यह गर्भपात किसी भी तरह करना ही पड़ेगा,’’ उमेश गिडगिड़ाते हुए डाक्टर से कहे जा रहा था.

पैसा है ही ऐसी चीज कि पाप भी पुण्य लगने लगता है. अत: डाक्टर रूपा का गर्भपात करने के लिए तैयार हो गया. आयुषी अब अपनेआप को नहीं रोक पाई. नर्स रोकती रही, वह दनदनाते हुए क्लीनिक के अंदर चली गई.

आयुषी को देखते ही उमेश के पसीने छूटने लगे और डाक्टर कहने लगा, ‘‘कौन हैं आप? ऐसे बिना परमिशन के अंदर कैसे आ गईं?’’

‘‘जैसे आप बिना परमिशन के एक औरत का गर्भपात करने जा रहे हैं डाक्टर. क्या आप को पता है कि इस का अंजाम क्या होगा?’’ आयुषी ने गुस्से में कहा.

डाक्टर, तुरंत गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मुझे माफ कर दो मैडम… मैं तो कब से इस आदमी को यही समझाने की कोशिश कर रहा हूं, पर…’’

उमेश भी कहने लगा, ‘‘आयुषी, इस में मेरी कोई गलती नहीं है. यह चरित्रहीन औरत है. मैं तुम्हें बताने ही वाला था कि इस ने मुझे कैसे…?’’

उमेश की बात पूरी होने से पहले ही आयुषी ने एक जोरदार तमाचा उमेश के गाल पर जड़ दिया, ‘‘चुप एकदम चुप… अब और नहीं… छल, फरेब, धोखेबाजी सब कुछ तो तुम में भरा पड़ा है… चरित्रहीन रूपा नहीं तुम हो तुम. तुम ने इस की गरीबी का फायदा उठाया है… अब इस का अंजाम भी तुम्हीं भुगतोगे.’’

‘‘आयुषी, मुझे माफ कर दो. अब कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा… अंतिम बार मेरा भरोसा कर लो,’’ उमेश ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘भरोसा और तुम्हारा? वह तो इस जन्म में नहीं होगा… अपनी गलती को सुधारने का एक ही उपाय है कि इस बच्चे को अपना नाम दे दो वरना उम्र भर सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाओ,’’ आयुषी ने दोटूक शब्दों में कहा.

फिर वह थोड़ा रुक कर बोली, ‘‘अब मैं जो कह रही हूं वह करो. तुम इस बच्चे को अपना लो. यही एक रास्ता है तुम्हारे पास.’’

दोनों ने सहमति से तलाक लिया और उमेश रूपा को ले कर एक कमरे के मकान में रहने लगा. आयुषी को पता चला कि रूपा अब ठाट से रहती है और उमेश का सारा पैसा ऐंठ लेती है.

एक रोज सुबह दरवाजे पर खटखट हुई. देखा बढ़ी दाढ़ी, बिखरे बालों वाला एक आदमी खड़ा था.

‘‘आयुषी मैं उमेश, तुम्हारा गुनाहगार…’’

इस से पहले कि वह कुछ और कहता, आयुषी गरज उठी, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे दरवाजे पर आने की… चले जाओ यहां से. न मैं और न ही मेरे बच्चे तुम्हारी सूरत देखने को तैयार हैं.’’

उमेश गिड़गिड़ाया, ‘‘आयुषी रूपा गली के एक ड्राइवर के साथ भाग गई. वह मेरा पैसा भी ले गई. अब तुम्हीं मेरा आसरा हो. प्लीज मुझे माफ कर दो.’’

आयुषी ने बेरुखी से दरवाजा बंद कर दिया पर घंटे भर तक वह दरवाजे पर ही सिसकती रही. उमेश से कभी वह कितना प्यार करती थी. आज वह धोखेबाज गिड़गिड़ा रहा है. पुराने प्यार का हवाला दे रहा है पर वह कुछ नहीं कर सकी. बच्चों से भी नहीं कह सकती कि उन का पिता आया था. यह जहर तो उसे अकेले ही पीना होगा.

मेरे पति काम के चक्कर में रोमांस पर ध्यान नहीं देते, क्या करूं?

सवाल

हम दोनों ही वर्किंग हैं. मेरी उम्र 25 साल है और पति 28 के हैं. हम एमएनसी में जौब करते हैं और दोनों ही वर्क फ्रौम होम करते हैं. अभी हमारा कैरियर पीक पर है, इसलिए बच्चे का अभी प्लान नहीं कर रहे. लाइफ बहुत मजे में चल रही है. लेकिन बस एक बात की कमी मु?ो आजकल कुछ ज्यादा खलने लगी है कि पति काम में इतना ज्यादा व्यस्त रहते हैं कि रोमांस करना भूल जाते हैं.

मुझ पर इतना वर्कलोड नहीं है. मेरा मन करता है कि मैं पति संग रोमांस करूं लेकिन इन्हें काम करता देख मैं अपना मन मार कर बैठ जाती हूं. जब ये काम से थोड़ा फ्री होते हैं तो आराम करने के लिए लेट जाते हैं और लेटते ही इन्हें नींद आ जाती है. मैं फिर इन्हें डिस्टर्ब नहीं करती.

कई बार जब मैं काम में उलझी होती हूं तो मेरा सोच कर ये मेरे पास नहीं आते. इस तरह हमारा रोमांस खटाई में पड़ जाता है. खैर, काम तो कभी खत्म नहीं होगा, लेकिन मैं चाहती हूं कि ये जब फ्री हों तो ऐसा करूं कि रोमांस करने के लिए ये बेताब हो जाएं. मुझे पता है कि मेरे पति बहुत रोमांटिक हैं. बस, आजकल वर्क प्रैशर के कारण हमारे बीच रोमांस कम हो गया है.

जवाब

आप की दिक्कत हम समझ पा रहे हैं. वर्क फ्रौम होम में काम करने का कोई निश्चित टाइम नहीं रह जाता और कभी भी अर्जेंट वर्क आ जाता है. लेकिन घर में रहते हुए भी पतिपत्नी रोमांस से महरूम रहें तो यह ठीक नहीं. वैवाहिक जीवन की गरमाहट बनी रहे, इस के लिए आप को कुछ कदम उठाने पड़ेंगे, जिस से आप इशारों ही इशारों में उन्हें बेचैन कर सकती हैं और अपनी सैक्सुअल लाइफ को रोमांटिक और रोमांचक बना सकती हैं.

जब भी आप देखें कि अब वे काम से फ्री होने वाले हैं तो पति के गले पर धीमे से बाइट कर के उन्हें उकसाएं, या गले पर किस कर के उन्हें अपनी इच्छा जता सकती हैं. देखिएगा, वे भी पीछे नहीं रहेंगे.

पति काम से फ्री हो कर यदि बैड पर लेट जाएं तो बातोंबातों में उन की मसाज करना शुरू दें. मसाज से बौडी रिलैक्स महसूस करती है, मूड फ्रैश होता है और कामोत्तेजना को जगाने में भी यह कारगर है. पति चाहे काम के सिलसिले में लैपटौप पर उलझे पड़े हों, उन्हें ज्यादा डिस्टर्ब किए बिना उन की वेस्ट और चेस्ट को टच कीजिए. बालों में हाथ फेरें. इस से उन में उत्तेजना बढ़ेगी, साथ ही उन्हें आप के प्यार की गहराई का भी एहसास होगा.

एक आखिरी खास टिप. जैसे ही वे फ्री हों उन्हें गले से लगा लें. इस में कोई शक नहीं कि जब महिलाएं अपने दिल की बातों को खुल कर पुरुषों के सामने रखती हैं तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है. अपने अंगों को उन्हें धीरेधीरे टच करवाती रहें. पुरुषों को यह एक्साइटिंग लगता है कि उन की लेडी-लव उन के सामने इस तरह उन्हें उकसा रही है. इस से प्यार का माहौल रंगीन हो जाता है. आप ये सब ट्राई कर के देखिए, जरूर वर्क करेगा.

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