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बच्चों की तुनकमिजाजी का हश्र

पिंटू बेंगलुरु में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. उस के मांबाप ने उस को ले कर बड़ेबड़े सपने देखे थे. बेटा इंजीनियर बनेगा. परिवार और गांव का नाम रोशन करेगा. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था कि पिंटू के भाई की हत्या कर दी गई. भाई की हत्या की खबर सुन कर वह घर आया. क्रियाकर्म होने के बाद पिंटू वापस बेंगलुरु नहीं जाने की जिद करने लगा. घर वालों ने उसे समझायाबुझाया लेकिन वह पढ़ाई करने के लिए जाने को तैयार ही नहीं हुआ. वह बस यही रट लगाता रहा कि उसे अपने बड़े भाई की हत्या का बदला लेना है.

इंजीनियर बनने का सपना देखने वाला पिंटू बदले की आग में जलने लगा और फिर एक दिन उस ने अपने भाई के हत्यारे की हत्या कर डाली. हत्या के आरोप में उसे जेल हो गई. पिंटू बताता है कि जेल में रहने के दौरान उस की जानपहचान कई अपराधियों से हुई. उसे लगा कि अब वह जेल से छूट ही नहीं पाएगा और उस की जिंदगी जेल में ही गुजर जाएगी. क्योंकि उस के पिता बब्बन सिंह ने गुस्से में कह दिया था कि वे उस का केस नहीं लड़ेंगे और न ही जमानत की कोशिश करेंगे. अपनी जिंदगी और कैरियर के बरबाद होने का दर्द अब पिंटू को महसूस हो रहा है. वह कहता है कि अगर वह कानून पर भरोसा कर अपने भाई के हत्यारे को सजा दिलाने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा देता तो कुछ और ही नतीजा होता. हत्यारे को सजा होती और उस की जिंदगी चौपट न होती.

पिंटू ने बताया कि जेल में अपराधियों से दोस्ती होने के साथ कई तरह के अपराधों की प्लानिंग होने लगी. उस ने छोटेछोटे अपराधियों का गैंग बना लिया. छोटीमोटी लूट, चोरी, डकैती आदि के मामलों के अपराधी जेल के अंदरबाहर होते रहते हैं. पिंटू बचपन से ही पढ़ाई में अच्छा था और उस की अंगरेजी बहुत अच्छी थी, इस वजह से जेल में बंद कैदी उस की काफी इज्जत करते थे और उस की बातों को सुनते थे. जेल में ही अपराधियों का गिरोह बना कर उस ने अपहरण और रंगदारी वसूली का काम चालू कर दिया. हत्या के साथसाथ अब उस के माथे पर बड़ीबड़ी कंपनियों से रंगदारी वसूलने के आरोप भी लग चुके हैं.

पिंटू के पिता ने भले ही गुस्से में उसे जेल से छुड़ाने की कोशिश न करने की धमकी दी हो पर समय के साथ उन का दिल पसीजा और उन्होंने उस का केस लड़ने के लिए वकील कर लिया. पिछले 4 सालों से पुलिस थाना, कचहरी और वकील के घर के चक्कर लगा कर थक चुके 65 साल के बब्बन बताते हैं कि अगर पिंटू उन की बात मान कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु लौट जाता तो उन के बुढ़ापे को थाना और कचहरी के जंजाल में नहीं फंसना पड़ता. एक बेटे की तो हत्या हो गई और दूसरे ने जीतेजी मौत से भी बदतर जिंदगी चुन ली.

जेल में बंद पिंटू जो कुछ भी झेल रहा है वह उस के बुरे कामों का नतीजा है, लेकिन पिंटू के बूढ़े पिता और घरपरिवार वाले अपने गांव, रिश्तेदारों व दोस्तों के सामने रोज जिल्लत व अपमान झेल रहे हैं. पिंटू का छोटा भाई संटू कहता है कि गांव में उस का रहना दूभर हो गया है. जहां भी जाओ, लोग फब्तियां कसते हैं, क्रिमिनल का भाई कहते हैं. पिताजी की जिंदगी का एक ही मकसद रह गया है, पिंटू का केस लड़ना. हर डेट को वे कचहरी में हाजिरी लगाते हैं. वहां उन की पिंटू से भेंट हो जाती है. वे बेटे को दिलासा देते हैं, समझाते हैं पर उन सब का पिंटू पर कोई असर नहीं होता है. जेल में वह ठाट से रह कर अपराध को अंजाम दे रहा है. उसी को अब उस ने अपना जीवन मान लिया है.

बच्चों में धैर्य की कमी

आज बच्चों की तुनकमिजाजी आम होती जा रही है. जरा सा उन के मन मुताबिक काम नहीं हुआ तो उन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचता है. कोई लड़की प्यार में धोखा खा कर गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से लटक जाती है तो कोई लड़का इम्तिहान में कम नंबर लाने की वजह से पिता से डांट खाने के बाद किसी पुल से नदी में छलांग लगा देता है. मांबाप ने प्रेमिका से विवाह की मंजूरी नहीं दी तो कोई अपार्टमैंट की छत से कूद कर जान दे देता है तो कोई लड़का महंगे मोबाइल फोन को पाने के लिए अपने ही दोस्त की जान ले लेता है. किसी बच्चे को अपने साथी का ज्यादा नंबरों से पास होने पर इतना गुस्सा आता है कि उसे मार कर अपने रास्ते से ही हटा डालता है.

इस तरह की ढेरों वारदातें हमारे आसपास घटित हो रही हैं. खेलने और पढ़ने की उम्र में बातबेबात किसी की जान लेने व खुदकुशी करने की वारदातें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि हर परिवार भय के माहौल में जीने लगा है. पता नहीं कब किस बात पर उन का बच्चा कोई गलत कदम उठा ले. मासूमों में आखिर इतना गुस्सा कैसे बढ़ गया है कि वे जान लेने या जान देने में जरा भी नहीं हिचकते?

आज के दौर में हम तकनीकी तौर पर भले ही मजबूत हो गए हैं पर बरदाश्त करने और धैर्य रखने की ताकत काफी कम होती जा रही है. समाजविज्ञानी अजय मिश्रा कहते हैं कि आसानी से किसी चीज को हासिल करने, जरा सा विरोध व डांट को प्रेस्टिज इश्यू बना लेने और समझौता करने की मानसिकता में कमी आने की वजह से ही मासूम गुस्सैल और अपराधी बनते जा रहे हैं. कोई भी गलत कदम उठने पर बदनामी के डर से युवा खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं, लेकिन खुदकुशी करने वाले यह सोचतेसमझते नहीं हैं कि खुद को मिटा कर वे क्या पा लेते हैं? खुदकुशी न तो किसी परेशानी का हल है और न ही यह हिम्मत वालों का काम है. यह तो साफसाफ कमजोरों की और गैरकानूनी हरकत है.

हर बड़ेछोटे शहर में खुदकुशी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इस के पीछे की सब से बड़ी वजह क्या है? कोई इसे कच्ची उम्र की वजह बताता है तो कोई तेजी से बदलती जीवनशैली को. कोई बच्चों के प्रति उन के गार्जियन्स की लापरवाही और उपेक्षा को दोष देता है तो कोई बच्चों में हर चीज को तुरतफुरत पाने के उतावलेपन को जिम्मेदार ठहराता है और कोईकोई तो परिवार के लोगों के बीच बढ़ती संवादहीनता को खुदकुशी की बड़ी वजह करार देता है.

मगध विश्वविद्यालय के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद का मानना है कि खुदकुशी करने से पहले अगर आदमी जरा सा सोचे कि खुदकुशी किसी भी समस्या का हल नहीं है. समस्या से लड़ कर ही उस का हल ढूंढ़ा जा सकता है, न कि उस से भाग कर. खुदकुशी करने वाले अपने परिवार वालों के लिए कई मुसीबतें और समस्याएं ही छोड़ जाते हैं.

पिछले साल 25 अक्तूबर को पटना के चित्रगुप्त नगर इलाके में 21 साल की लड़की आर्या की खुदकुशी के बाद उस के परिवार वाले पुलिस, अदालत, वकीलों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं. आर्या के मां और पिता दोनों नौकरी करते हैं और अब वे काम से छुट्टी ले कर थानाकचहरी के चक्कर लगा रहे हैं. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की तिरछी नजरों को और फब्तियों को अलग ही झेल रहे हैं. रिटायर्ड पुलिस अफसर आर के सिंह कहते हैं कि बच्चों और गार्जियन्स के बीच तालमेल की कमी से न बच्चे अपने मांबाप से खुल कर बातें कर पाते हैं न ही मांबाप के पास बच्चों की दिक्कतों को सुनने व समझने की फुरसत है. ऐसे हालात में बच्चे सही और गलत के बारे में सोचे बगैर ही कोई फैसला ले लेते हैं.

सच के पैर: भैया-भाभियों की असलियत जानकर क्या था गुड्डी का फैसला

लेखक- परम दत्त झा

बूआजी आएंगी फलमिठाई लाएंगी, नई किताबें लाएंगी सब को खूब पढ़ाएंगी…’ छोटी गा रही थी.

‘बूआजी आते समय मेरे लिए नई ड्रैसेज जरूर ले आना,’ दूसरी की मांग होती. इस तरह की मांगें हर साल गरमी की छुट्टियां आते ही भाइयों के बच्चों की होती. जिन्हें गुड्डी मायके जाते ही पूरा करती. मगर एक बार जब वह मायके गई, तो बड़े भैयाभाभी की बातचीत सुन उस के पांव तले की जमीन ही जैसे खिसक गई.

‘‘बड़ी मुश्किल से दोनों का तलाक कराया,’’ भाभी कह रही थीं.

‘‘और क्या, अगर तलाक नहीं होता तो क्या गुड्डी हमें इतना देती? देखना, बड़ी की शादी में कम से कम 10 लाख उस से लूंगा,’’ भैया कह रहे थे.

‘‘बदले में क्या देते हैं हम लोग? हर साल एक मामूली साड़ी पकड़ा देते हैं. वह इतने में भी अपना सर्वस्व लुटा रही है,’’ हंसते हुए उस की भाभी ने कहा तो वह जैसे धड़ाम से जमीन पर आ गिरी. सच में उस का शोषण तीनों भाइयों ने किया है. उसे याद आ गई 20 वर्ष पूर्व की घटना. उस के विवाह के लिए लड़का देखा जा रहा था. पिताजी तीनों बेरोजगार बेटों की लड़ाई व बहुओं की खींचतानी झेल न पाए और गुजर गए. फिर तो उस की शादी के लिए रखे क्व5 लाख वे सब खूबसूरती से डकार गए.

उस का विवाह उस से लगभग दोगनी उम्र के व्यक्ति रमेश से कर दिया गया और दहेज तो दूर सामान्य बरतनभांडे तक उसे नहीं दिए गए. यह देख मां से न रहा गया. वे बोल पड़ीं, ‘‘अरे थोड़े जेवर और जरूरी सामान तो दो, लोग क्या कहेंगे?’’ ‘‘आप चुप रहें मां. हमें अपनी औकात में शादी करनी है. सारा इसे दे देंगे, तो मेरी बेटियों की शादी कैसे होगी?’’ बड़ा भाई डांट कर बोला तो वे चुप रह गईं. फिर तो गुड्डी ससुराल गई और उस के बाद उस की पढ़ाई और नौकरी तक इन सबों ने कभी झांका तक नहीं. रमेश पत्नी को पढ़ाने के पक्षधर थे, इसलिए उन के सहयोग से उस ने बीए की परीक्षा पास की. उस के कुछ दिनों बाद बैंक की क्लैरिकल परीक्षा पास कर ली, तो बैंक में नौकरी लग गई. रमेश पढ़ीलिखी पत्नी चाहते थे परंतु कमाऊ पत्नी नहीं. अत: जैसे ही उस की नौकरी लगी उन्होंने समझाने की कोशिश की, ‘‘क्या तुम्हारा नौकरी करना इतना जरूरी है?’’

‘‘हां क्यों न करें. इतनी औरतें करती हैं. फिर बड़ी मुश्किल से लगी है,’’ उस ने सरलता से जवाब दिया.

‘‘फिर बच्चे होंगे, तो कौन पालेगा?’’

‘‘क्यों, दाई रख लेंगे. आजकल बहुत से लोग रखते हैं. मैं भविष्य की इस छोटी सी समस्या के लिए नौकरी नहीं छोड़ सकती.’’ इस दोटूक जवाब पर रमेश कुछ नहीं बोले. पर उन का जमीर इस बात को स्वीकार न कर सका कि लोग उन्हें जोरू का गुलाम या जोरू की कमाई खाने वाला कहें. इधर उस के मायके के लोग उस की नौकरी की खबर सुनते ही मधुमक्खी के समान आ चिपके. पतिपत्नी की लड़ाई में हमेशा मायके वाले फायदा उठाते हैं. यहां भी यही हुआ. मायके वालों के उकसाने पर वह तलाक का केस कर नौकरी पर चली गई. बाद में आपसी सहमति पर तलाक हो भी गया. इस के बाद इस दूध देती गाय का भरपूर शोषण सब ने किया. कभी बड़े भैया की लड़की का फार्म भरना है तो कभी किसी की बीमारी में इलाज का खर्च, तो कभी कुछ और. ऐसा कर के हर साल वे सब इस से अच्छीखासी रकम झटक लेते थे.

उस वक्त गुड्डी का वेतन 30 हजार था. उस में से सिर्फ 10 हजार किराए के मकान में रहने, खानेपीने वगैरह में जाते थे. बाकी भाइयों की भेंट चढ़ जाता था. मगर उस दिन की भैयाभाभी की बातचीत ने उस के मन को हिला कर रख दिया. उस के बाद वह 4 दिन की छुट्टियां ले कर किसी काम से मधुबनी गई थी, तो वहां संयोगवश उस के पति साइकिल पर फेरी लगाते दिख गए. ‘‘ये क्या गत बना रखी है?’’ औपचारिक पूछताछ के बाद उस ने पहला प्रश्न किया.

‘‘कुछ नहीं, बस जी रहे हैं, तुम कैसी हो?’’ उन्होंने डबडबाई आंखों को संभालते हुए प्रश्न किया.

‘‘मैं ठीक हूं, आप की पत्नी और बच्चे?’’ उस का दूसरा प्रश्न था.

‘‘पत्नी ने मुझे छोड़ कर नौकरी का दामन थामा, तो बिन पत्नी बच्चे कहां से होते?’’ उन्होंने जबरदस्ती हंसने का प्रयास करते हुए कहा.

‘‘गांव में कौनकौन है?’’ पिताजी का निधन तुम्हारे सामने हो गया था. तुम्हारे जाने के 1 साल बाद मां गुजर गईं और सभी भाइयों ने परिवार सहित दूसरे शहरों को ठिकाना बना लिया,’’ उन का सीधा उत्तर था.

‘‘और आप?’’

इस प्रश्न पर वे थोड़ा सकुचा गए. फिर बोले, ‘‘मैं यहीं मधुबनी में रहता हूं. सुबह से शाम ढले तक कारोबार में लगा रहता हूं. सिर्फ रात में कमरे में रहता हूं.’’ ‘‘मुझे अपने घर ले चलिए,’’ कह कर वह जबरदस्ती उन के साथ उन के घर में गई. वहां एक पुरानी चारपाई, एक गैस स्टोव व जरूरत भर का थोड़ा सा सामान था. उसे बैठा कर वे सब्जी व जरूरी समान की व्यवस्था करने गए तब तक उस ने सारे समान जमा दिए. उन के लौट कर आते ही सब्जीरोटी बना कर उन्हें खिलाई और खुद खाई. उस रात वह उन के बगल में लेटी तो उन के सिर पर उंगलियां फेरते उस ने पूछा, ‘‘आप ने दूसरी शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘क्यों, क्या एक शादी काफी नहीं है? जब पहली पत्नी ने ही साथ नहीं दिया, तो दूसरी की बात मैं ने सोची ही नहीं.’’ इस जवाब से वह टूट गई. दोनों रात में एक हो गए. आंसुओं ने नफरत के बांध को तोड़ दिया.

अगले दिन चलते समय उस ने कहा, ‘‘आप मेरे साथ चल कर वहीं रहिए.’’ ऐसा न जाने किस जोश में आ कर वह बोल उठी थी. पर रमेश ने बात को संभाला, ‘‘यह ठीक नहीं होगा. हम दोनों तलाकशुदा हैं वैसी दशा में मेरा तुम्हारे साथ रहना…’’

‘‘ठीक है, मैं दरभंगा में रहती हूं. आप महीने में 1 बार वहां आ सकते हैं?’’ उस ने पूछा. ‘‘मिलने में कोई बुराई नहीं है,’’ रमेश ने फिर बात को संभाला. फिर बस स्टैंड तक जा कर बस में बैठा आए और हाथ में 200 रख दिए. प्यार की भूखी गुड्डी इस व्यवहार से गदगद हो गई. दूसरी ओर अपने सगे भैयाभाभी की कही बात उसे तोड़ रही थी. सच कड़वा होता है मगर यह इतना कड़वा था कि इसे झेल पाना मुश्किल हो रहा था. उस के यही सब सोचते जब उस के मोबाइल की घंटी बजी तो वह वर्तमान में लौटी.

‘‘क्यों इस बार छुट्टी में नहीं आ रही हो?’’ उस के बड़े भैया का स्वर था.

‘‘नहीं, इस बार आना नहीं हो सकता,’’ उस ने विनम्रता से जवाब दिया.

‘‘क्यों, क्या हो गया?’’

‘‘कुछ नहीं भैया, बस जरूरी काम निबटाने हैं.’’ इस जवाब पर फोन कट गया. इस के बाद वह कई महीने मायके तो नहीं गई पर हर माह मधुबनी हो आती थी. रमेश उसे प्यार से घर लाते, उस का पूरा ध्यान रखते और भरपूर सुख देते. उन के साथ रात गुजारने में उसे असीम सुख मिलता था. वह इस प्यार से गदगद रहती. उस के जाते वक्त हर बार रमेश 100-200 या साड़ी हाथ में अवश्य रखते. फिर प्रेम से बस में चढ़ा आते. सब से बड़ी बात यह कि उन्होंने आज तक यह नहीं पूछा था कि अब वह किस पद पर है वेतन कितना मिलता है?

‘‘क्यों आप को मेरे बारे में कुछ नहीं जानना?’’ एक बार उस ने पूछा था.

‘‘जानता तो हूं कि तुम बैंक में हो,’’ उन्होंने सहज भाव से जवाब दिया. उन की सब से बड़ी बात यह थी कि वे अपने ऊपर 1 पैसा भी नहीं खर्च करने देते थे, इसलिए स्वाभाविक रूप से वह उन की ओर झुकती चली गई. एक दिन अचानक बहुत दिनों से मायके न जाने पर उस की मां, बड़े, मझले और छोटे भैयाभाभी सभी आए. मझले को मैडिकल में लड़के का ऐडमिशन कराने हेतु 1 लाख चाहिए थे, वहीं बड़े भैया बड़ी लड़की की शादी हेतु पूरे 5 लाख की मांग ले कर आए थे. इसी प्रकार छोटा भी दुकान हेतु पुन: 2 लाख की मांग ले कर आया था. उन सब की मांग सुन कर वह फट पड़ी, ‘‘क्यों आप लोग अपना इंतजाम खुद नहीं कर सकते, जो जबतब आ जाते हैं? मेरी भी शादी हुई थी, तब आप तीनों ने क्या दिया था?’’

इस पर सब सकपका गए मगर छोटा बेहयाई से बोला, ‘‘हमारे पास नहीं था, इसलिए नहीं दिया. तुम्हारे पास है तभी न ले रहे हैं.’’ ‘‘कुछ नहीं, पहले पिछला हिसाब करो. मुझ से जो लिया लौटाओ. मेरे पास सब लेनदेन लिखा है.’’ तभी उस के पति का फोन आ गया. ‘‘क्यों क्या हुआ, कैसे हैं आप?’’

‘‘बस 2 दिन से थोड़ा सा बुखार है. तुम्हारी याद आ रही थी, इसलिए फोन कर दिया.’’ पति का थका स्वर सुन कर वह तुरंत बोली. ‘‘रात की बस पकड़ कर मैं आ रही हूं आप चिंता न करें.’’ फिर वह फोन रख कर जल्दीजल्दी जाने का समान पैक करने लगी.

‘‘क्या हुआ अचानक कहां चल दीं?’’ मां ने घबरा कर पूछा.

‘‘जा रही होगी गुलछर्रे उड़ाने,’’ मझला भाई बोला. ‘‘सुनो, अपनी औकात में रह कर बोला करो. ये मेरे पति का फोन था.’’ यह सुन कर सभी की आंखें फटी रह गईं.

‘‘तलाकशुदा पति से तेरा क्या मतलब?’’ उस की मां बोलीं.

‘‘मां, मतलब तो शादी के बाद भाइयों का भी बहन की आमदनी या जायदाद से नहीं होता पर मेरे भाई तो बहन को दूध देती गाय समझ पैसा लूटते रहे. जब वापस देने की बारी आई तो बहाने करने लगे.’’ उस का यह रूप देख सब भौचक्के थे.

‘‘और हां मां, आप सब ने मिल कर मेरी शादी इसलिए तुड़वाई ताकि मेरे पैसे पर ऐश कर सकें.’’

‘‘बेटा, तुम गलत समझ रही हो,’’ मां ने फिर समझाना चाहा. ‘‘सच क्या है मां यह तुम भी जानती हो. पूरे 5 लाख जो पापा ने मेरी शादी के लिए रखे थे, इन तीनों ने डकार लिए थे. एक फटा कपड़ा तक नहीं दिया था. फिर 4 साल तक हाल नहीं पूछा. लेकिन जैसे ही नौकरी मिली चट से आ कर सट गए और तुम मां हो कर हां में हां मिलाती रहीं.’’ यह कड़वा सच उन सब के कानों में सीसे की तरह उतर रहा था. ‘‘आप लोग जाएं क्योंकि मुझे रात की बस से उन के पास जाना है. जब मेरा पूरा पैसा देने लायक हो जाएं तो आइएगा.’’ इतना कह कर वह तैयार हो कर घर से निकली, तो वे सब हाथ मलते ऐसे पछता रहे थे जैसे कारूं का खजाना हाथ से निकल गया हो और वह तेजी से बस स्टैंड की ओर बढ़ती जा रही थी.

कही आप भी तो नहीं हैं पीसीओडी की शिकार

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में महिलाएं अपने स्वास्थ्य की अनदेखी कर देती हैं, जिस का खमियाजा उन्हें विवाह के बाद भुगतना पड़ता है. लड़कियों को पीरियड्स शुरू होने के बाद अपने स्वास्थ्य पर खासतौर से ध्यान देने की आवश्यकता होती है. महिलाओं के चेहरे पर बाल उग आना, बारबार मुहांसे होना, पिगमैंटेशन, अनियमित रूप से पीरियड्स का होना और गर्भधारण में मुश्किल होना महिलाओं के लिए खतरे की घंटी है.

चिकित्सकीय भाषा में महिलाओं की इस समस्या को पोलीसिस्टिक ओवरी डिजीज यानी पीसीओडी के नाम से जाना जाता है. इस समस्या के होेने पर महिलाओं, खासकर कुंआरी लड़कियों को समय रहते चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए. ऐसा नहीं करने पर महिलाओं की ओवरी और प्रजनन क्षमता पर असर तो पड़ता ही है साथ ही, आगे चल कर उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और हृदय से जुड़े रोगों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

आज करीब 30 प्रतिशत महिलाएं इस बीमारी से ग्रस्त हैं जबकि चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की शिकार महिलाओं की संख्या इस से कई गुना अधिक है. उचित ज्ञान न होने व पूर्ण चिकित्सकीय जांच न होने की वजह से महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं.

पीसीओडी बीमारी के बारे में गाइनीकोलौजिस्ट डा. शिखा सिंह का कहना है कि यह एक हार्मोनल डिसऔर्डर है. पीरियड्स के पहले और बाद में महिलाओं के शरीर में बहुत तेजी से हार्मोन में बदलाव आते हैं जो कई बार इस बीमारी का रूप ले लेते हैं.

डा. शिखा की मानें तो हर महीने महिलाओं की दाईं और बाईं ओवरी में पीरियड्स के बाद दूसरे दिन से अंडे बनने शुरू हो जाते हैं. ये अंडे 14-15 दिनों में पूरी तरह से बन कर 18-19 मिलीमीटर साइज के हो जाते हैं. इस के बाद अंडे फूट कर खुद फेलोपियन ट्यूब्स में चले जाते हैं और अंडे फूटने के 14वें दिन महिला को पीरियड शुरू हो जाता है लेकिन कुछ महिलाओं, जिन्हें पीसीओडी की समस्या है, में अंडे तो बनते हैं पर फूट नहीं पाते जिस की वजह से उन्हें पीरियड नहीं आता.

आगे उन का कहना है कि ऐसी महिलाओं को 2 से 3 महीनों तक पीरियड नहीं आने की शिकायत रहती है, जिस की सब से बड़ी वजह है कि फूटे अंडे ओवरी में ही रहते हैं और एक के बाद एक उन से सिस्ट बनती चली जाती हैं. लगातार सिस्ट बनते रहने से ओवरी भारी लगनी शुरू हो जाती है. इसी ओवरी को पोलीसिस्टिक ओवरी कहते हैं.

इतना ही नहीं, इस के कारण ओवरी के बाहर की कवरिंग कुछ समय बाद सख्त होनी शुरू हो जाती है. सिस्ट के ओवरी के अंदर होने के कारण ओवरी का साइज धीरेधीरे बढ़ना शुरू हो जाता है. ये सिस्ट ट्यूमर तो नहीं होतीं पर इन से ओवरी सिस्टिक हो चुकी होती है, जिस से अल्ट्रासाउंड कराने पर कभी ये सिस्ट दिखाई देती हैं तो कभी नहीं. दरअसल, अंडों के ओवरी में लगातार फूटने के चलते ओवरी में जाल बनना शुरू हो जाता है. धीरेधीरे ओवरी के अंदर जालों का गुच्छा बन जाता है. इसलिए सिस्ट का पूरी तरह से पता नहीं चल पाता है.

डा. शिखा के मुताबिक पीसीओडी होने के कारणों का पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है लेकिन चिकित्सकों की राय में लाइफस्टाइल में बदलाव, आनुवंशिकी व जैनेटिक फैक्टर का होना मुख्य वजहें हैं.

क्या हैं सिस्ट के लक्षण

ओवरी में बिना अंडों के न फूटने की वजह से जो सिस्ट बनती हैं उन में एक तरल पदार्थ भरा होता है. यह तरल पदार्थ पुरुषों में पाया जाने वाला हार्मोन एंड्रोजन होता है, क्योंकि लगातार सिस्ट बनती रहती हैं तो महिलाओं में इस हार्मोन की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है, जिस की वजह से युवतियों के शरीर पर पुरुषों की तरह बाल उगने लगते हैं. इसे हरस्यूटिज्म कहते हैं. इस तरह महिलाओं के चेहरे, पेट और जांघों पर बाल उगने लगते हैं.

एंड्रोजन की अधिकता के कारण शरीर की शुगर इस्तेमाल करने की क्षमता भी दिनप्रतिदिन कम होती जाती है, जिस की वजह से शुगर का स्तर भी बढ़ता चला जाता है, जिस से खून में वसा की मात्रा बढ़नी शुरू हो जाती है और यही वसा महिलाओं में मोटापे का कारण बनती है.

मोटापा अधिक होने के कारण महिलाओं में इस्ट्रोजन नामक हार्मोन ज्यादा बनने की संभावना बढ़ जाती है. इस स्थिति में लिपिड लेवल भी बढ़ा हुआ होता है जिस की वजह से ब्लड वैसल्स में फैट सैल्स बढ़ जाते हैं और ब्लड की नलियों में चिपक कर उन्हें संकीर्ण बना देते हैं. ये सैल्स ब्लड सप्लाई करने वाली नलियों को ब्लौक भी कर देते हैं.

महिलाओं में इस्ट्रोजन अधिक मात्रा में बनता है तो ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन भी ज्यादा बनता है, जिस की वजह से माहवारी में अनियमितता पाई जाती है. साथ ही, काफी दिनों तक इस्ट्रोजन ही बनता जाता है और उसे बैलेंस करने वाला प्रोजैस्ट्रोन बन नहीं पाता. यदि गर्भाशय में इस्ट्रोजन बहुत दिनों तक काम करता है, तो महिलाओं को यूटेराइन कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है.

अगर किसी महिला में पीसीओडी के लक्षण हैं तो उसे इस बीमारी की जांच के लिए पैल्विक अल्ट्रासाउंड कराना चाहिए. इस के अलावा हार्मोनल और लिपिड टैस्ट होते हैं. हार्मोन के सीरम स्तर पर ग्लूकोज टौलरैंस आदि की जांच की जाती है. इस से बौडी में ग्लूकोज की सही मात्रा की जानकारी मिल जाती है.

16 से 18 साल की लड़की के पीरियड अनियमित होने पर उस का इतना ही इलाज किया जाता है कि पीरियड्स नौर्मल हो जाएं. जिस तरह से हर महीने कौंट्रासैप्टिव दिए जाते हैं उसी तरह से उसे कौंबिनैशन हार्मोन की दवाएं दी जाती हैं. डा. शिखा ने बताया कि सामान्य रूप से एक लड़की को 11 साल की उम्र में पीरियड्स होने लगते हैं. पीरियड शुरू होने के 4-5 साल बाद यदि वह अनियमित होने लगे तो डाक्टरी सलाह और जांच करा लेनी चाहिए.

पीसीओडी से पीडि़त युवती की शादी हो जाने पर उसे पीरियड की अनियमितता और गर्भधारण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इस स्थिति में उस की माहवारी को नियमित करने और अंडा समय पर पक सके, इस का इलाज किया जाता है.

इस के अलावा इन महिलाओं की गर्भधारण के दौरान अन्य गर्भवती महिलाओं की तुलना में ज्यादा देखभाल करनी पड़ती है क्योंकि इन में गर्भपात की आशंका बहुत ज्यादा बनी रहती है. इसलिए गर्भधारण करने के 3 महीने तक यदि गर्भ ठहरा रहता है तो फिर वे एक सामान्य महिला की तरह रह सकती हैं. इस के बाद डिलीवरी में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं आती है.

पीसीओडी की शिकार महिलाओं में बारबार गर्भपात के आसार ज्यादा होते हैं. इसलिए यदि कोई बड़ी उम्र की महिला गर्भवती होती है तो हो सकता है वह प्रीडायबिटिक हो. ऐसी स्थिति में महिलाओं को चाहिए कि समयसमय पर डायबिटीज की जांच कराती रहें और यदि किसी महिला का वजन अधिक है तो उसे व्यायाम और अन्य शारीरिक कसरत से अपना वजन घटाना चाहिए ताकि गर्भधारण के दौरान महिला और उस के गर्भ में पल रहे शिशु को किसी भी प्रकार की शारीरिक समस्याओं से दोचार न होना पड़े.

इन महिलाओं को दिन में एक बार में ज्यादा खाना खाने से बचना चाहिए. ज्यादा खाना खाने के बजाय उन्हें बारबार थोड़ीथोड़ी मात्रा में खाना खाना चाहिए. वे कम कार्बोहाइड्रेट और वसायुक्त भोजन लें, मीठी चीजों से परहेज करें ताकि शरीर में इंसुलिन का स्तर अधिक न हो. ऐसी तमाम बातों का ध्यान रख कर पीसीओडी से ग्रस्त महिला गर्भवती हो कर मां बनने का सुख प्राप्त कर सकती है.

खाली समय न होइए अकेलेपन का शिकार, अपनाएं ये उपाय

56 साल की कविता शर्मा दिल्ली के साधारण से महल्ले में दो कमरे के मकान में रहती हैं. उन के पति की मृत्यु हो चुकी है और वह अपने बेटेबहू के साथ रहती हैं. उन की एक 2 साल की पोती भी है. वह पूरा दिन या तो पोती की देखभाल में या फिर बालकनी में बाहर आतेजाते लोगों को देखते हुए बिताती है. कभीकभी घर के छोटेमोटे काम में अपनी बहू का भी हाथ भी बंटाती रहती हैं. साथ ही दूसरों से बहू की शिकायतें करने या उस से झगड़ने में भी उन का समय जाता है. इस के अलावा उन की जिंदगी में और कोई खास काम नहीं.

आजकल उन की बहू अकसर मायके जाने लगी है. पोती भी साथ चली जाती है और बेटा भी कई बार बहू के घर चला जाता है. ऐसे में कविता अपने घर में बिल्कुल अकेली रह जाती हैं और यह अकेलापन उन्हें खाने को दौड़ता है. वह बालकनी से बाहर झांकती रहती हैं या सोती रहती हैं. बाकी उन के पास करने को कुछ भी नहीं होता. क्योंकि इस समय बहू नहीं है तो बहू की शिकायतें कैसे करें और उस से झगड़ा भी कैसे करे? बस महल्ले वालों को जरूर बहू की शिकायत करती नजर आती हैं कि जब देखो बहू मायके चली जाती है.

इधर उन्हीं की उम्र की एक महिला प्रज्ञा राज भी उसी मोहल्ले में रहती हैं. उन की आर्थिक स्थिति भी लगभग समान ही है. वह बिल्कुल अकेली हैं लेकिन फिर भी बहुत खुश रहती हैं. ना किसी की शिकायतबाजी और न लड़ाईझगड़ा. उन के पास समय ही नहीं होता कि वह यह सब कुछ करें. न ही वह बालकनी में ताकझांक का काम करती है. वह अपने में बिजी रहती हैं. उन के पास बहुत काम है. ऐसा नहीं है कि वह जौब करती हैं. लेकिन सुबह से शाम तक उन का एक रूटीन बना हुआ है.

सुबह उठते ही मौर्निंग वाक के लिए जाना, व्यायाम करना, अपनी फिटनेस का ख्याल रखना, अच्छा खानापीना और उस के बाद घर से राइटिंग का काम करना. इस में उन का आधा दिन चला जाता है. बाकी समय अच्छीअच्छी किताबें पढ़ती हैं. कभीकभी शौपिंग के लिए निकल जाती हैं और अपने लिए अच्छे ड्रैसेज खरीद कर लाती है. बाकी बचे समय में वह कुछ एक्साइटिंग करती हैं जैसे बैडमिंटन खेलना, दिलचस्प फिल्में देखना या मनोरंजक और ज्ञानवर्धक किताबें पढ़ना. कभीकभी घर की साफसफाई और अपने लिए कुछ अच्छा बनाने में भी समय लगाती हैं.

अब सोचिए इन दोनों की जिंदगी में क्या अंतर है ? अंतर यह है की कविता देवी अकेली न हो कर भी अकेलेपन से जूझती रहती हैं जबकि प्रज्ञा को उन का अकेलापन कभी सालता नहीं. परेशान नहीं करता. वह उस में बहुत खुश हैं. उसे एंजोय करती हैं.

दरअसल ऐसी परिस्थिति किसी की भी जिंदगी में आ सकती है कि उसे कुछ समय अकेला बिताना पड़े. जो शादीशुदा इंसान होते हैं यानी जिन के बेटेबहू हैं, पोते पोतियां हैं उन्हें भी कभीकभी अकेला रहना पड़ सकता है. मगर इस का मतलब यह नहीं कि वह उस समय को दुखी हो कर, परेशान हो कर या बोर हो कर गुजारे. अगर आप को समय मिला है, आप अकेले हैं तो उसे अच्छे से इस्तेमाल करें और एंजोय करें. बाकी समय आप पोतेपोतियों या बहू बेटों में बिजी रहती हैं. तो इस समय का उपयोग करें. वह सब करें जो आप उन लोगों के रहने में नहीं कर पाती थीं. अपने आप को समय दीजिए. अपने लिए भी कुछ कीजिए. जो आप को अच्छा लग रहा है उस में समय लगाइए. फिर आप बोर कैसे होंगे?

सच तो यह है कि अकेले रहना आप को शानदार मौका देता है यह पता लगाने के लिए कि वास्तव में कौन सी चीज आप को खुशी देती है और आप को अपनेआप को बेहतर तरीके से जानने का भी पूरा मौका मिलता है. अकेले रहने से आप को समय और स्वतंत्रता मिलती है. आप जो भी अपने स्वयं के हिसाब से करना चाहते हैं वो कर सकते हैं. जिन चीजों को दूसरे के होने के कारण आपको करने का समय नहीं मिलता था यही वह समय है जब आप उन सभी कामों को कर सकें. इस से आप को अकेले रहने पर भी खुशी महसूस होगी.

दरअसल कुछ लोगों को खुद के साथ वक्त बिताना बहुत पसंद होता है लेकिन कुछ लोगों के लिए दुनिया में इस से मुश्किल काम कोई नहीं हो सकता. ऐसे लोग अकेलेपन या अकेले रहने से दूर भागते हैं और हमेशा किसी न किसी की कंपनी तलाशते रहते हैं फिर चाहे वे बात करने के लिए हो या कहीं घूमने के लिए. मगर आप की यह निर्भरता आप के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकता है. हमेशा खुशियों के लिए दूसरों का सहारा ढूंढने वाले लोग अकसर भावनात्मक रूप से चोटिल होते रहते हैं और फिर तनाव के शिकार हो जाते हैं.

अगर आप भी अकेली हैं तो कुछ इस तरह के कामों में समय लगाएं और फिर देखें अकेलापन कितना बहाने लगेगा आप को.

अकेले होने पर खुद को व्यस्त रखें

दुनिया की फिक्र और तमाम तरह की तकलीफों से बचने के लिए सब से अच्छा उपाय खुद को व्यस्त रखना है. अकेले रहते हुए इंसान के दिमाग में तरहतरह की चीजें शुरू हो सकती हैं. इसलिए अकेलेपन की नकारात्मकता से बचने के लिए आप को खुद को व्यस्त रखना चाहिए. जब आप जिंदगी में अकेले हों तो खाली समय में खुद को व्यस्त रखने के लिए अपनी पसंदीदा एक्टिविटी करें, कहीं घूमने जाएं या कोई किताब पढ़ें.

व्यायाम करें फिट रहें

स्वस्थ तन एक स्वस्थ मन का घर होता है. जब आप अपने मन को खुश रखने के लिए तन को स्वस्थ रखते हैं तो आप के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. एक नया व्यायाम शेड्यूल बनाएं जो आप के शरीर को स्वस्थ आकार में लाने में मदद करेगा. व्यायाम करें, मौर्निंग वाक पर जाएं, डांस करें. इस से आप अपने शरीर के बारे में अच्छा महसूस करेंगी और आप में खुद को ले कर आत्मविश्वास पैदा होगा.

व्यायाम करने से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज होता है. यह आप के मस्तिष्क में उन न्यूरोट्रांसमीटर को रिलीज करने में मदद करता है जो आप को खुश महसूस कराता है. व्यायाम करने से आप के शरीर में एनर्जी आती है और आप दिनभर तरोताजा महसूस करते हैं.

अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलें

आप ज्यादा से ज्यादा उन चीजों को करने की कोशिश करें जो आपने पहले कभी नहीं की हैं. कोशिश करें कि आप पर कोई पाबंदी न हो और आप सभी संभावनाओं के लिए खुले रहें. अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का एक शानदार तरीका ये भी है कि आप हर हफ्ते कहीं न कहीं कुछ नया और मजेदार करें.

अपने पैशन को पहचानें और उस पर काम करें

ऐसा कुछ आप के मन में भी होगा जो हमेशा से करने की चाहत रखते थे. क्यों न उसे अब ट्राय करें? जब आप अकेले होते हैं तो आप के प्लान को बिगाड़ने वाला पास में कोई नहीं होता है. ऐसे में खुद को चैलेंज दें. चाहे वो जो भी हो. बस आप को यह सोचना है कि आप इस चीज को ले कर हमेशा से उत्साहित थे. यदि आप को डांस पसंद है तो डांस करें. आप का फोटोग्राफी में इंटरेस्ट है तो फोटोग्राफी करें. किसी एक काम में खुद को फंसा कर न रखें. बाहर निकलें और कला का आनंद लें. थिएटर, आर्केस्ट्रा, सिनेमा, शो और वार्ता में भाग लें.

खुद को पैंपर करें

अपने व्यस्त जीवन में हमें शायद ही अपने लिए समय मिल पाता है. अपनेआप को समय देना और खुद को पैंपर करना बहुत जरूरी है. तो एक अच्छे स्पा सेशन के लिए जाएं या अपने पसंदीदा रेस्तरां में खाना खाएं. अपने शेड्यूल से थोड़ा ब्रेक लें. यकीनन आप को अच्छा लगेगा. अपनी अलमारी को व्यवस्थित ढंग से रखें. फैशन पत्रिका खरीदें और देखें कि लोग क्या पहन रहे हैं. लेकिन अपने फिगर के अनुसार स्टाइलिश पोशाक पहनें और ढेर सारे रंग जोड़ें.

प्रकृति के साथ समय बिताएं

प्रकृति के साथ कुछ समय बिताना खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका है. चाहे आप पार्क में टहलना पसंद करें या बैठना या व्यायाम करना. ऐसी कोई भी गतिविधि जो आप को प्रकृति के करीब लाती है आप के लिए अच्छी है. यात्रा करें और नई जगहें देखें. जीवन के प्रति थके हुए दृष्टिकोण को फिर से जीवंत करने के लिए यात्रा से बेहतर कुछ नहीं है. आप पुनः स्फूर्तिवान हो कर लौटेंगे और नई चीज़ों को आज़माने के लिए तैयार होंगे. साथ ही, आप के कई नए दोस्त भी बन सकते हैं और उन में से कुछ आपसे मिलने भी आ सकते हैं.

चीजों के प्रति अपना नजरिया बदलें

आप को इस बात का अहसास होना चाहिए कि कोई भी चीज आप को खुश या दुखी नहीं बना सकती. अपनी खुशी या गम के लिए आप ही जिम्मेदार हैं. खुशी हासिल करने के लिए आप को चीजों को देखने का अपना नजरिया बदलने की जरूरत है. सकारात्मक सोच और विचार आप को खुश रख सकते हैं.

दोस्त बनाएं

नएनए दोस्त बनाएं. ऐसे लोगों से दोस्ती करें जो आप की उम्र के करीब हों. उन के साथ समय बिताएं. इस के अलावा कम उम्र के लोगों से भी दोस्ती करें. वे आप के अंदर ताजगी भरेंगे. क्लबों और अन्य समूहों में शामिल हों. इस तरह आप जीवन के सभी क्षेत्रों से समान रुचियों वाले लोगों से मिलेंगे. जब आप दूसरों के साथ अपनी रुचि साझा करते हैं तो उम्र मायने नहीं रखती. इसलिए आप के पास विभिन्न आयु समूहों में मित्र बनाने और एकदूसरे से सीखने का मौका होता है. रिश्तेदारों, लंबे समय से खोए दोस्तों और अन्य लोगों से मिलें. उन लोगों से मिलें जिन्हें आपने कई वर्षों से नहीं देखा है.

किताबें पढ़ें

किताबों से बेहतर कोई दोस्त नहीं होता. पत्रिकाएं पढ़ें. अपने स्थानीय पुस्तकालय से अपना परिचय कराएं. यह सोने की खान है. आप विश्वास नहीं करेंगे कि लाइब्रेरी कितनी मजेदार हो सकती है. साथ ही लाइब्रेरी में बहुत सारे संभावित मित्र भी मिलेंगे.

जानवर पालें

एक पालतू जानवर पालने पर भी विचार कर सकती हैं. जब आप अकेले हों तो उस का साथ अमूल्य होगा. वे आप के सुख दुःख के साथी बनेंगे.

मई का दूसरा सप्ताह, कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार राज कुमार राव का नहीं चला जादू, दीपक तिजोरी भी डूबे

2024 में प्रदर्शित बड़े बजट की दो फिल्मों के बौक्स औफिस पर बुरी तरह से घुटने टेकने के बाद बौलीवुड में हाहाकार मचा हुआ है लेकिन फिल्म के निर्माता और उन की पीआर टीम सुधरने का नाम ही नहीं ले रही है. मई माह के दूसरे सप्ताह 10 मई को दीपक तिजोरी निर्मित व निर्देशित फिल्म ‘तिप्सी’ के अलावा तुशार हीरानंदानी निर्देशित फिल्म ‘श्रीकांत’ प्रदर्शित हुई. दोनों फिल्में अपनी लागत वसूलने में असफल रहीं जबकि अमरजीत निर्देशित और गिप्पी ग्रेवाल, गिप्पी के बेटे शिंडा ग्रेवाल व हीना खान के अभिनय से सजी पंजाबी फिल्म ‘शिंडा शिंडा नो पापा’ ने साढ़े 6 करोड़ कमा लिए. जबकि सभी को पता है कि पंजाबी फिल्मों का बजट काफी कम होता है. कहा जा रहा है कि ‘शिंडा शिंडा नो पापा’ ने तो कमाई में रिकौर्ड बना डाला.
तुशार हीरानंदानी निर्देशित फिल्म ‘श्रीकांत’ मशहूर बोलांत इंडस्ट्रीज’ के मालिक व जन्म से ही अंधे श्रीकांत बोला की बायोपिक फिल्म है. इस फिल्म में श्रीकांत बोला का किरदार राजकुमार राव ने निभाया है. इस के अलावा अन्य कलाकारों में ज्योतिका, अलाया एफ, शरद केलकर, जमाल खान जैसे कलाकारों का समावेश हैं.
फिल्म की लागत लगभग 50 से 60 करोड़ रूपए है, मगर यह फिल्म बौक्स औफिस पर महज 17 करोड़ 85 लाख रूपए ही एकत्र कर सकी, जिस में से निर्माता के हाथ में बामुश्किल 6 से 7 करोड़ ही आएंगे. वैसे निर्माता का दावा है कि उन की फिल्म ने पूरे 7 दिन में 23 करोड़ कमा लिए. यदि निर्माता की बात सच मान लें, तो भी निर्माता के हाथ में मुश्किल से 8 से 9 करोड़ ही आएंगे. कुल मिला कर यह फिल्म बौक्स औफिस पर बुरी तरह से बर्बाद हो चुकी है.
तुशार हीरानंदानी निर्देशित फिल्म ‘श्रीकांत’ की कहानी प्रेरणा दायक है. इंटरवल से पहले फिल्म अच्छी है, इंटरवल के बाद फिल्म जरुर थोड़ा गड़बड़ा गई है. मगर राज कुमार राव अपने अभिनय के बल पर दर्शकों को सिनेमाघरों तक नहीं खींच पाए. जबकि फिल्म के निर्माता ने लगातार दो दिन तक दोतीन अंगरेजी के बड़े अखबारों व सोशल मीडिया पर पूरे पेज के विज्ञापन छापे, जिस में फिल्म आलोचकों व उन के अखबार व पत्रिका के नाम के साथ बताया गया कि किस ने इस फिल्म को 4 से 5 स्टार दिए. मगर निर्माता के साथ साथ राज कुमार राव व फिल्म के सभी कलाकारों की गलती यह रही कि फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म को ठीक से प्रचारित नहीं किया.
फिल्म के पीआर ने दावा किया था कि कलाकार के पास ज्यादा पत्रकारों से बात करने के लिए समय नहीं है. सिर्फ ट्रेलर लांच व सांग लांच में पूरे प्रेस को बुलाया गया था. उस के बाद यह निर्माता व पीआर सिर्फ सोशल मीडिया के भरोसे रह कर फिल्म को डुबा दिया. यदि फिल्म का ठीक से प्रचार किया जाता तो यह फिल्म न डूबती. इस के बावजूद राज कुमार राव अभी भी हवा में उड़ रहे हैं और अपनी 31 मई को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस’ (फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस’ के निर्माता करण जोहर तो कैमरे पर कबूल कर चुके हैं कि वह पत्रकारों को पैसा दे कर स्टार खरीदते हैं) के लिए भी ठीक से प्रचार नहीं कर रहे हैं.
जबकि कुछ दिन पहले ही मुंबई के ‘मराठा मंदिर’ और ‘जी 7’ मल्टीप्लैक्स के मालिक मनोज देसाई, फिल्म वितरक राठी सहित कई लोग खुल कर अखबारों में बयान दे चुके हैं कि इन कलाकारों को पहले की तरह पत्रकारों के साथ बात करना चाहिए, इंटरव्यू देने चाहिए. तभी फिल्म इंडस्ट्री बच सकेगी.
बौलीवुड की हालत ‘भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय…’ जैसी है. बहरहाल, बौलीवुड में हालात ऐसे हैं कि आप यह नहीं कह सकते कि फिल्म का निर्माता, फिल्म के कलाकार और उन के पीआरओ आखिर क्या साबित करने पर तुले हुए हैं.
तो वहीं 10 मई को ही दीपक तिजोरी की फिल्म ‘तिप्सी’ भी प्रदर्शित हुई, जिस में दीपक तिजोरी के साथ ही अलंकृता जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है. इस फिल्म का भी प्रचार ठीक से नहीं हुआ. खुद दीपक तिजोरी ने भी फिल्म के प्रचार के लिए कुछ नहीं किया. परिणामतः यह फिल्म एक करोड़ भी नहीं कमा सकी.

न्यूजक्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की अवैध गिरफ्तारी से सरकार की मंशा पर उठते सवाल

न्यूजक्लिक के 74 वर्षीय प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ 6 महीने जेल में रहने के बाद आखिरकार जमानत पर रिहा हो गए. सुप्रीम कोर्ट ने उन की गिरफ्तारी को अमान्य करार दिया और कहा कि जब 4 अक्टूबर, 2023 को रिमांड आदेश पारित किया गया था, तो उस से पहले प्रबीर पुरकायस्थ या उन के वकील को रिमांड की कौपी क्यों नहीं दी गई? इस का मतलब यह है कि गिरफ्तारी का आधार उन्हें लिखित रूप में नहीं दिया गया. इस लिहाज से उन की गिरफ्तारी वैध नहीं है और इस वजह से प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को कोर्ट निरस्त कर उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश देता है.

न्यूजक्लिक एक स्वतंत्र मीडिया संगठन है जो अपने मिशन का वर्णन ‘प्रगतिशील आंदोलनों पर विशेष ध्यान देने के साथ, भारत और उस से परे समाचारों को कवर करने के लिए समर्पित’ के रूप में करता है. प्रबीर पुरकायस्थ इस के संस्थापक होने के साथसाथ प्रधान संपादक भी हैं. इस संस्था से अनेक वरिष्ठ पत्रकार जुड़े हुए हैं. अभिसार शर्मा, औनिंद्यो चक्रवर्ती, भाषा सिंह, उर्मिलेश, सुमेधा पाल, अरित्री दास, इतिहासकार सोहेल हाशमी और व्यंग्यकार संजय राजौरा जैसे न्यूजक्लिक से जुड़े अनेक पत्रकार उन लोगों में शामिल थे, जिन के ऊपर 3 अक्टूबर 2023 को पुलिस ने छापा मारा, उन के घरों की तलाशी ली और उन के कंप्यूटर, लैपटौप, फोन आदि जब्त कर लिए. आरोप था कि न्यूजक्लिक प्लेटफौर्म से ‘राष्ट्रविरोधी प्रचार’ के लिए चीनी फंडिंग हो रही है.

ये छापेमारी 17 अगस्त 2023 को न्यूयौर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के आधार पर की गई थी. रिपोर्ट में न्यूजक्लिक वेबसाइट पर आरोप लगाए गए थे कि उस ने चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए एक अमेरिकी करोड़पति से फंडिंग प्राप्त की है. उस समय दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने न्यूजक्लिक के खिलाफ केस दर्ज किया था. इस के बाद ईडी ने भी इस मामले में केस दर्ज किया था.

उक्त कार्रवाई गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और भारतीय दंड की धारा 153 ए (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 120 बी (आपराधिक साजिश के लिए सजा) के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट पर आधारित थी. हालांकि न्यूजक्लिक ने इन सभी आरोपों का खंडन किया था. न्यूजक्लिक से जुड़े पत्रकारों के खिलाफ यूएपीए की धाराएं इसीलिए लगाई गई थीं ताकि गिरफ्तारी के बाद वो जमानत पर आसानी से छूट न सकें.

पुलिस ने न्यूज वेबसाइट के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और एचआर हेड अमित चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया. इस के बाद पुलिस ने करीब 30 स्थानों की तलाशी ली और 46 लोगों से पूछताछ की. दक्षिण दिल्ली में संस्था के कार्यालय को सील कर दिया और तमाम डिजिटल उपकरणों, मोबाइल फोन व अन्य दस्तावेजों आदि को जब्त कर लिया. मजे की बात यह है कि दिल्ली पुलिस ने इस केस में सोशल एक्टिविस्ट गौतम नवलखा और अमेरिकी कारोबारी नेविल रौय सिंघम को भी नामित किया था. जबकि गौतम नवलखा एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में 4 साल से हाउस अरेस्ट थे और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत पर छूटे हैं.

प्रबीर पुरकायस्थ गिरफ्तारी के बाद से ही दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे और जमानत के लिए प्रयासरत थे. हाई कोर्ट से उन को पहले ही जमानत मिल जानी चाहिए थी मगर नहीं मिली और इस कवायत में सुप्रीम कोर्ट तक मामले को आतेआते 6 महीने का वक्त गुजर गया.

सुप्रीम कोर्ट में प्रबीर पुरकायस्थ की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि 3 अक्टूबर 2023 को प्रबीर पुरकायस्थ को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उन के वकील को सूचित किए बिना दूसरे दिन सुबह 6 बजे ही जल्दबाजी में मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर रिमांड पर ले लिया और जेल भेज दिया. शीर्ष अदालत यह सुन कर आश्चर्यचकित रह गई कि प्रबीर पुरकायस्थ के वकील को उन की रिमांड अर्जी मिलने से पहले ही रिमांड आदेश पारित कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया जैसे कि गिरफ्तारी का आधार बताना, आरोपी को अपना वकील देने का मौका देने तक का इस मामले में पालन नहीं किया गया. कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि जब श्री पुरकायस्थ ने इस पर आपत्ति जताई, तो जांच अधिकारी ने उन के वकील को टेलीफोन के माध्यम से सूचित किया और रिमांड आवेदन उन्हें व्हाट्सऐप पर भेज दिया, जो कतई ठीक नहीं था, क्योंकि यह जानकारी लिखित में दी जाती है.

पुलिस की जल्दबाजी पर हैरानी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया को गैरकानूनी करार देते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली दो सदस्यों वाली बेंच ने यह भी कहा कि पुरकायस्थ की गिरफ्तारी और उस के बाद उन्हें हिरासत में रखा जाना कानून की नजर में पूरी तरह अवैध था. पुरकायस्थ की गिरफ्तारी के समय यह नहीं बताया गया कि इस का आधार क्या था. इस की वजह से गिरफ्तारी निरस्त की जाती है.

अब जबकि प्रबीर पुरकायस्थ और गौतम नवलखा को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, पत्रकार संगठनों ने दोनों की जमानत का स्वागत करते हुए राजनीति कारणों से की गई इन गिरफ्तारियों की कड़े शब्दों में निंदा की है. वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने एक्स पर लिखा – ‘माननीय न्यायमूर्ति गण, आपने भारत के पत्रकारों को थोड़ा और निर्भय बनाने का काम किया है. न्यूजक्लिक के प्रबीर पुरकायस्थ और भीमा कोरेगांव कांड में अभियुक्त गौतम नवलखा तथा उन के कई साथियों को जमानत दे कर सर्वोच्च न्यायालय ने प्रैस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों की रक्षा की है.

‘इन दोनों अलगअलग मामलों में जिस तरह सत्ता और कानूनों का घोर दुरुपयोग कर के आलोचक आवाजजों का दमन किया गया वह भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा था. इसी तरह के काम सरकार पर तानाशाही सोच और इरादों के आरोपों को सुदृढ़ बनाते हैं. सरकार की आलोचना, वैचारिक विरोध आतंकवाद नहीं हैं. उन के आधार पर मनगढ़ंत आरोप लगा कर आतंकवाद निरोधक कानून यूएपीए लगाना बुनियादी संवैधानिक स्वतंत्रताओं पर हमला करना है. आशा है सरकारें और जांच एजेंसियां इन फैसलों से सही सबक लेंगी.’

डिजिटल युग में एक स्वस्थ और मजबूत समाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण को सुनिश्चित करने में मदद करने के इरादे से डिजिटल मीडिया संगठनों द्वारा गठित डिजिपब (DIGIPUB) न्यूज इंडिया फाउंडेशन ने भी कहा, “हम न्यूजक्लिक के खिलाफ पुलिस और एजेंसी की कार्रवाई की लगातार निंदा करते रहे हैं, जहां पत्रकारों से पूछताछ की गई, उन के उपकरणों को जब्त कर लिया गया और उन के घरों पर छापे मारे गए.

“इसी तरह पिछले साल प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी हुई. लोकतंत्र में कोई सरकार स्वतंत्र प्रैस के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों को इस्तेमाल नहीं कर सकती, खासकर उचित प्रक्रिया के अभाव में. पत्रकारों के खिलाफ कानून को हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए, इस से उन का जीवन, स्वतंत्रता और आजीविका जोखिम में पड़ जाती है. हम खुश और आभारी हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार हस्तक्षेप किया है. हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह उन मीडिया घरानों के खिलाफ जानबूझ कर और उन्हें दबाने के लिए की जा रही कोशिशों में सावधानी और संयम बरते, जिन से वह (सरकार) सहमत नहीं हैं. हमें उम्मीद है कि प्रबीर के मामले में कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई होगी.”

उल्लेखनीय है कि 3 अक्टूबर 2023 को प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी के समय प्रैस क्लब औफ इंडिया ने न्यूजक्लिक के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि इस से प्रैस की स्वतंत्रता को बड़ा खतरा है. उसी दिन, एडिटर्स गिल्ड औफ इंडिया (ईजीआई) की कार्यकारी समिति ने वरिष्ठ पत्रकारों के आवासों पर की गई छापेमारी के संबंध में चिंता व्यक्त की थी, जिस में उन के इलैक्ट्रौनिक उपकरणों की जब्ती और दिल्ली पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए हिरासत में लिए जाने पर सवाल उठाया था. एडिटर्स गिल्ड ने उचित प्रक्रिया का पालन करने और कड़े कानूनों के तहत धमकी के माहौल से बचने, एक कामकाजी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया था.

नैशनल अलायंस औफ जर्नलिस्ट्स, दिल्ली यूनियन औफ जर्नलिस्ट्स और केरल यूनियन औफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (दिल्ली यूनिट) ने भी सामूहिक रूप से 3 अक्टूबर 2023 को पुलिस छापे और पत्रकारों की गिरफ्तारी की निंदा की थी. उन्होंने मीडिया कर्मियों को निशाना बनाने और इन कार्रवाइयों में अभूतपूर्व जल्दबाजी दिखाने की निंदा करते हुए इस बात पर जोर दिया था कि मोदी सरकार का उद्देश्य प्रैस की स्वतंत्रता को दबाना है, विशेष रूप से श्रम और कृषि मुद्दों पर न्यूजक्लिक की कवरेज के बाद से सरकार बौखलाई हुई है. उन्होंने प्रैस की स्वतंत्रता पर इस कथित हमले को तत्काल रोकने का आह्वान किया था और मीडिया बिरादरी से सरकार की धमकियों के खिलाफ एकजुट होने का भी आह्वान किया था. जाहिर है न्यूजक्लिक पर पुलिस और ईडी की कार्रवाई सरकार के आदेश पर ख़बरों का मुंह बंद करने के उद्देश्य से हुई थी.

प्रैस की आजादी : भारत की लगातार गिरती साख

पिछले कुछ वर्षों में ‘दैनिक भास्कर’, ‘न्यूजलौंड्री’, ‘न्यूजक्लिक’, ‘द कश्मीर वाला’ और ‘द वायर’ जैसे मीडिया संगठनों पर सरकारी एजेंसियों की छापेमारी के बाद यह बात लगातार उठ रही है कि भारत में लोकतंत्र का दमन हो रहा है. केंद्र की भाजपा सरकार की बलपूर्वक कार्रवाइयां केवल उन मीडिया संगठनों और पत्रकारों के खिलाफ जारी हैं जो सत्ता के सामने सच बोलते हैं. विडंबना यह है कि जब देश में नफरत और विभाजन को भड़काने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात आती है तो भाजपा सरकार पंगु हो जाती है.

वैश्विक मीडिया निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बौर्डर्स (आरएसएफ) की मई 2023 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक विश्व प्रैस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 180 देशों में से 161वें स्थान पर खिसक चुकी है. साल 2002 में भारत इस लिस्ट में 150वें पायदान पर था. आरएसएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में सभी मुख्यधारा मीडिया अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमीर व्यापारियों के स्वामित्व में हैं और सरकार के समर्थन में काम करते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी के पास समर्थकों की एक ऐसी फौज है जो सरकार की आलोचना करने वाली सभी औनलाइन रिपोर्टिंग पर नजर रखते हैं और स्रोतों के खिलाफ भयानक उत्पीड़न अभियान चलाते हैं. अत्याधिक दबाव के इन दो रूपों के बीच फंस कर कई पत्रकार, व्यवहार में, खुद को सेंसर करने के लिए मजबूर हैं. पत्रकार सौफ्ट टारगेट (जिन पर निशाना लगाना आसान हो) हैं, खासतौर पर वे जो छोटे न्यूज पोर्टल्स से आते हैं. उन के पास वह सुरक्षा नहीं है जो बड़े संगठनों में मौजूद लोगों के पास है. आज पत्रकारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ले कर अनेक गंभीर सवाल भारत में खड़े हैं, जिन का जवाब सरकार को देना ही होगा.

सरकार, बैंक और उद्योगपति

जब से भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने बैंकों के नौन परफौर्मिंग एसेट यानी डूबा हुआ पैसा अपने टैक्स देने वाली जनता के 30 लाख करोड़ रुपयों से पूरा कर दिया. इस से बैंकों के खाते में मुनाफे बढ़ गए हैं. बैंकों ने कर्ई सालों तक ऐसे लोगों को भरभर कर कर्ज दिया था जिन के सरकार से अच्छे संबंध थे. इन लोगों ने सरकार को खूब समर्थन भी दिया था. इस दरियादिली से आम आदमी को कोई लाभ नहीं हुआ पर बैंकों की बैलेंस शीट सुधर गईं और वे मुनाफे दिखाने लगे हैं.
इस का अर्थ यह नहीं है कि देश में बैंकिंग व्यवस्था सुधर गई है. बैंक चूसने वाले साहूकार थे और आज भी वैसे ही हैं. वे कर्ज, क्रैडिट कार्ड, होम लोन, एजुकेशन लोन, ट्रैवल लोन लेने को लोगों को उकसाते हैं और फिर वसूली के लिए घरदुकान नीलाम करते हैं. बैंकों के नियम हर रोज बदलते है. बैंक आज तमाम सुविधाओं का लालच दे कर लोगों से फिक्स्ड डिपौजिट या अन्य खाता खुलवाने को लुभाते हैं और लोग खाता खुलवा भी लेते हैं. लेकिन उन्हें हक़ रहता है कि अगले किसी भी क्षण वे रिजर्व बैंक के आदेश का हवाला दे कर उन सुविधाओं को कम कर सकते हैं या बंद कर सकते हैं जिन से प्रभावित हो कर ग्राहकों ने खाते खुलवाए.

बैंकों के मुनाफे बढ़ रहे है क्योंकि बैंकिंग व्यवस्था आज हर नागरिक का हर खाता, वह चाहे किसी भी बैंक में हो, खंगाल सकती है. सिबिल प्रणाली से किसी को भी बैंकिंग व्यवस्था से बाहर कर के उसे कंगाल बनाया जा सकता है. केवाईसी का बहाना बना कर किसी का भी पैसा जब्त किया जा सकता है. जब बैंकों के पास सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की शह पर हर तरह के हथियार होंगे तो सरकार की कैशलैस नीतियों और औनलाइन पेमैंट की व्यवस्था का लाभ उन्हें मिलेगा ही और फिर मुनाफा तो होगा ही.
बैंक कस्टमरफ्रैंडली होते हैं, यह सिर्फ कहने की बात है. बैंकों को ढंग से चलाने के नाम पर रिजर्व बैंक असल में बैंकों के ग्राहकों को शिकंजों में कसता है जिस से बैंकों का मुनाफा बढ़ रहा है पर आम ग्राहक पिस रहा है. सभी बैंकों ने मिल कर हर सुविधा की मोटी फीस लगानी शुरू कर दी है जो कभी भी बढ़ाई जा सकती है. केंद्र सरकार और उस के इशारे पर चलने वाला रिजर्व बैंक जनता को चूसने के नएनए तरीके अपना रहे हैं और यह पैसा सरकार के बहुत ही घनिष्ठ उन बड़े उद्योगपतियों के पास जा रहा है जो अरबोंखरबों के कर्ज में डूबे हैं लेकिन दुनिया के अमीरों में गिने जाते हैं.

यह बैंकिंग व्यवस्था की देन है कि भारत के 2 शहरों- दिल्ली व मुंबई- में दुनिया के अमेरिकी डौलर वाले बिलियनायर्स भरे पड़े हैं जो यूरोपीय व अमेरिकी बिलियनायर्स को चिढ़ा रहे हैं कि देखो, इस गरीब देश में बैंकों से मिलीभगत कर के कितना पैसा जमा किया जा सकता है.
बैंक व्यवसायों का साथ दें, उन के साथ मुनाफा कमाएं, इस पर किसी को एतराज नहीं. पर केंद्र सरकार की शह पर ‘वे’ सूदखोर महाजन बन गए हैं, यह देश की दुखद हालत है. देश के 2 लाख किसानों की आत्महत्याएं बैंकों के कर्ज के कारण होने वाली वसूली के जोखिम के कारण ही हुई हैं, यह न भूलें.

जुड़वा बच्चे और फिल्मों में इस के रूपांतरण में है कितना है अंतर, आइए जानें

आपने कई फिल्में जुड़वा बच्चों पर आधारित देखे होंगे जो अधिकतर कौमेडी फिल्में होती हैं. इन फिल्मों में बहुत ही अजीबोगरीब चीजें दिखाई जाती हैं जिसे आम जिंदगी में विश्वास कर पाना मुश्किल होता है, मसलन एक को मार पड़ती है तो दूसरे को चोट लगती है. एक बीमार होता है तो दूसरा भी बीमार हो जाता है.

सलमान खान की फिल्म जुड़वा ऐसी ही फिल्म है जिसे बौक्स औफिस पर काफी सफलता मिली, क्योंकि दर्शकों ने इस फिल्म को खूब एंजोय किया. इस के अलावा एक का किसी लड़की से प्यार होना तो उसी शक्ल सूरत का दूसरे का वहां पहुंच जाना, फिर न जाने कितने ही मजेदार चीजें उन की जिंदगी में घट जाना होता है.

गुलजार की 1982 की बनी फिल्म ‘अंगूर’ भी बौक्स औफिस पर हिट फिल्म रही. दर्शकों ने इसे खूब पसंद किया. इन फिल्मों की संख्या कई है मसलन अनहोनी (1952), हम दोनों (1961), राम और श्याम (1967), कलियां (1968), आराधना (1969), शर्मीली (1971), सीता और गीता (1972), डोन (1978), चालबाज (1989), संगीत (1992), जुड़वा 2 (2017) आदि. सालों से ऐसी फिल्में किसी न किसी रूप में बनाई जाती रही हैं और मनोरंजन की दृष्टि से इन फिल्मों को दर्शक अधिक पसंद भी करते हैं पर रियल लाइफ में जुड़वा बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि उन का जन्म और परवरिश दोनों ही बहुत अलग और कठिन होता है, आइए जानते हैं.

क्या  कहना है विज्ञान का

असल में जिन महिलाओं के जुड़वा बच्चे होते हैं उन पर जीन का प्रभाव रहता है. नीदरलैंड के व्रिजे यूनिवर्सिटी के बायोलौजिकल साइकोलौजिस्ट डोरेट बूमस्मा के मुताबिक यदि आप के वंश में किसी के जुड़वा बच्चे हुए हैं तो आप के भी हो सकते हैं. ये एक तरह की अनुवांशिक प्रक्रिया होती है.

अमेरिकन जर्नल औफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के तहत महिला और पुरुष के जीन एक साथ मिल कर कुछ विशेष क्रिया के होने से भी जुड़वा बच्चों का जन्म होता है, इस से शुक्राणु सक्रिय हो जाते हैं.

जुड़वा बच्चे भी दो प्रकार के होते हैं. पहला जिसे डायजाइगोटिक कहते हैं, इस में पैदा हुए बच्चे दो लड़के व दो लड़कियां व एक लड़का और एक लड़की हो सकते हैं, इन की आदतें तो काफी कुछ एक जैसी होती हैं, लेकिन इन की शख्ल में थोड़ा अंतर रहता है.

वहीं जुड़वा बच्चों का दूसरा प्रकार है मोनोजाइगोटिक. इस प्रक्रिया के तहत जन्म लेने वाले बच्चे हूबहू एक जैसे दिखते हैं, इन के नेचर से ले कर इन के लुक तक सब कुछ एक समान रहता है. इसलिए इन के बीच पहचान करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

डायजाइगोटिक जुड़वा बच्चों का निर्माण तब होता है जब स्त्री पुरुष के शुक्राणु से दो अलग अंडकोशिका में शुक्राणुओं को निषेचित करती है. वहीं कई बार हार्मोनल इंबैलेंस की वजह से भी स्त्री के गर्भ में दो अंडे बनते हैं.

इन अंडों के बनने की प्रक्रिया स्त्री और पुरुष के एक बार संबंध बनाते ही सक्रिय हो जाते हैं. डायजाइगोटिक प्रक्रिया के तहत जन्म लेने वाले बच्चों का जन्म कुछ सैकेंड व मिनट के अंतराल पर होता है, क्योंकि दोनों बच्चे दो अलगअलग अंडों में होते हैं. इसलिए पहले एक बच्चे का जन्म होता है, इस के बाद दूसरे बच्चे का.

मोनोजाइगोटिक बच्चों के जन्म के तहत एक शुक्राणु दो हिस्सों में बंट जाता है. इस कारण इन की शक्ल, कदकाठी और व्यवहार एक जैसा ही होता है, ऐसे बच्चों का जन्म अनुवांशिक असर की वजह से होता है, अगर परिवार में किसी के ऐसे जुड़वा बच्चे हैं, तो आप के भी ऐसे होने की संभावना रहती है.

अमेरिकन कालेज औफ अब्स्टेट्रिक्स एंड गाइनोकोलौजी में छपी एक स्टडी के मुताबिक जिन महिलाओं का बीएमआई 30 या उस से ज्यादा होता है. उन के भी जुड़वा बच्चे होने की संभावना रहती है. इस के अलावा उम्र बढ़ने पर भी महिलाओं के जुड़वा बच्चे होने की आशंका रहती है.

इस के अलावा गर्भधारण रोकने के लिए महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियां खाती हैं, लेकिन इन दवाइयों के सेवन से भी जुड़वा बच्चों का जन्म हो सकता है. दरअसल कुछ समय बाद इन दवाइयों को लेना बंद करने से कई बार हार्मोनल इंम्बैलेंस हो जाता है, जिस के चलते 2 बच्चे पैदा होते हैं.

मौडर्न तकनीक है जिम्मेदार

दुनिया भर में हर साल लगभग 1.6 मिलियन जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं, हर 42 बच्चों में से एक जुड़वां पैदा होता है. विलंबित प्रसव, आईवीएफ, आईसीएसआई कृत्रिम गर्भाधान आदि जैसी चिकित्सा तकनीकों के कारण 1980 के दशक के बाद से जुड़वां बच्चों के जन्म की दर में एक तिहाई की वृद्धि देखी गई है.

ह्यूमन रिप्रोडक्शन जर्नल में एक वैश्विक अवलोकन के अनुसार 30 वर्षों में सभी क्षेत्रों में जुड़वा बच्चों की दर में बड़ी वृद्धि आज शिखर पर है. एशिया में 32 प्रतिशत की वृद्धि से ले कर उत्तरी अमेरिका में 71 प्रतिशत वृद्धि हुई है.

जुड़वा बच्चों का पालनपोषण नहीं आसान

इन बच्चों के पालनपोषण में भी कई समस्याएं मां और परिवार को आती है. मसलन रश्मि 6 साल के जुड़वा दो बेटियों की मां है, दोनों के चेहरे एक जैसे हैं, इसे रश्मि ही पहचान पाती है कि कौन काव्या और कौन नव्या है. वह जौब भी करती है और साथ में इन दोनों बेटियों की देखभाल भी करती है. उन्हें पूरा दिन इन बच्चों के पीछे गुजारना पड़ता है हालांकि इस में उन की मां और पति दोनों ही सहयोग देते हैं लेकिन दोनों बच्चों को पालते हुए घरपरिवार को संभालना उन के लिए आसान नहीं होता, उन्हे हर रात अगले दिन की प्लानिंग करनी पड़ती है, ताकि सुबह से सभी काम ठीक से हो जाए.

सुमन भी दो जुड़वा बेटों रुद्रान्स और रेयान्स की मां है. इन दोनों के चेहरे काफी अलग हैं, दोनों के स्वभाव में भी काफी अंतर है, एक बहुत अधिक जिद्दी तो दूसरा शांत है. इस के अलावा जुड़वा बच्चों के शारीरिक बनावट में भी अंतर आता है, एक थोड़ा कमजोर तो दूसरा मजबूत. इस वजह से दोनों के मानसिक स्तर भी अलग हो सकता है, रश्मि की बेटी नव्या पढ़ाई में कमजोर है तो दूसरी थोड़ी काव्या तेज है.

फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि एक को चोट लगने पर दूसरे को उस की पीड़ा होती है, ऐसा रियल में कभी नहीं होता, क्योंकि 35 साल की लबीना और रुबीना दोनों जुड़वा है और दोनों अलगअलग शहरों में रहते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक को कुछ हुआ हो, तो दूसरे को भी उस का एहसास होता हो. दोनों बहने आम बहनों की तरह ही है, बचपन में जब दोनों छोटी थी, तब एकदूसरे के साथ रहने पर एक की बीमारी दूसरे को हो जाया करती थी, जो किसी भी छोटे भाईबहन के साथ हो सकता है.

जुड़वा बच्चों के पालनपोषण कैसे करें

वैसे तो जुड़वा बच्चे होने पर मातापिता की खुशी दुगुनी हो जाती है, लेकिन दोनों बच्चों का पालनपोषण में दोगुनी चुनौती और समस्याएं भी आती है, जिस का ख्याल पेरैंट्स को रखना पड़ता है, क्योंकि जुड़वा बच्चों के सीखने की क्षमता और आदतें अलगअलग हो सकती हैं, जिसे ले कर मातापिता परेशान रहते हैं. कुछ सुझाव निम्न हैं,

• जुड़वा बच्चों के पालनपोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा अच्छी तरह से समय की प्लानिंग करना होता है, ताकि बच्चों की आदतें और शेड्यूल अलग होने पर भी आप उन्हें नियंत्रित कर सकें. इस में महत्वपूर्ण होता है, बच्चों के खाने और सोने का सही शेड्यूल करना, इस से बच्चे की ग्रोथ सही होता है और बच्चे स्वस्थ रहते हैं.

• अपने पेरैंट्स, दोस्तों और पड़ोसियों से बच्चों के पालनपोषण में सहायता के लिए पूछना बहुत स्वाभाविक है, क्योंकि वे कई बार अधिक अनुभवी होते हैं और जानते हैं कि अलगअलग समय पर बच्चों से कैसे व्यवहार करना है, ऐसा करने पर बच्चों के लालनपालन का सही तरीका आप को पता चलता है.

• माताओं के लिए, दोनों बच्चों को एक ही समय पर स्तनपान की आदत विकसित करना महत्वपूर्ण होता है, इस से आप को जुड़वा बच्चों को एक साथ ब्रेस्ट फीडिंग में मदद मिलेगी और आप की समस्या भी कम हो जाएगी. स्तनपान के बाद एक साथ दो बच्चों को डकार दिलवाना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है, इसलिए आसपास में रह रहे बड़े बुजुर्ग या पति की सहायता लें.

• जुड़वा बच्चों वाले मातापिता से जुड़ कर उन की मदद लें, क्योंकि कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं, जिन में केवल जुड़वा बच्चों के मातापिता ही आप की मदद कर सकते हैं. जिन मातापिता को जुड़वा बच्चों को संभालने का अनुभव है, वे आप को बता सकते हैं कि उन्हें अधिक कुशलता से कैसे संभाला जाए, उन के अनुभव को सुनें.

• मातापिता के लिए सब से कठिन चीजों में से एक है अपने बच्चों को रोते हुए देखना. जुड़वा बच्चों के साथ यह और भी मुश्किल हो सकता है क्योंकि अगर दोनों जुड़वा बच्चे एक साथ रोते हैं, तो उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है. विशेषज्ञ के अनुसार, जुड़वा बच्चों को कुछ देर रोने देना चाहिए और देखना चाहिए कि उन्हें वास्तव में क्या चाहिए. पहले साल में तो यह और भी मुश्किल हो सकता है, जब वे कुछ बोल नहीं पाते. चिंता करने की कोई जरूरत नहीं होती है, इस अवस्था में बच्चों का रोना सामान्य होता है.

• जुड़वा बच्चों का आपस में एक बंधन होता है. इसलिए ऐसे बच्चों के पालनपोषण में यह एक महत्वपूर्ण सबक, थोड़ी सख्त होने की होती है.

• बच्चों की सही परवरिश करने के लिए, मातापिता को यह समझने की जरूरत होती है कि उन की अपनी विशिष्ट पहचान है, जिस का उन्हें सम्मान करना और बनाए रखना आवश्यक है. कई मातापिता अपने बच्चों को एक जैसे कपड़े पहनाते हैं, उन्हें एक जैसे खिलौने देते हैं और एक जैसी गतिविधियां कराते हैं. इस से किसी एक जुड़वा बच्चे के विकास में बाधा आ सकती है, जो समस्याग्रस्त हो सकता है. इसलिए उन की मांगों और आदतों को समझें और उस के अनुसार पर्याप्त दिशा निर्देश दें.

• जुड़वा बच्चों के बीच तुलना करना कोई स्वस्थ आदत नहीं है. इस से उन के स्वास्थ्य और मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. जिन जुड़वा बच्चों की विकास प्रक्रिया के हर चरण पर तुलना की जाती है, उन में एकदूसरे के बारे में नकारात्मक विचार विकसित होते हैं जो उन के बंधन और स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकते हैं. कई जुड़वा बच्चे इस समस्या से पीड़ित होते हैं और लगातार तुलना के कारण उन में दूसरे जुड़वा से नफरत की भावना विकसित हो जाती है. इसलिए बच्चों की समझ को सुनें और उस के अनुसार उन्हें प्रोत्साहित करें.

• प्रत्येक जुड़वां बच्चे के साथ व्यक्तिगत रूप से कुछ समय बिताने से मातापिता को अपने बच्चों की अलग पहचान विकसित करने में मदद मिल सकती है. इस से उन्हें बच्चों को बेहतर ढंग से समझने में भी मदद मिलेगी. वैज्ञानिक शोध के अनुसार, कुछ गुणवत्तापूर्ण समय की योजना बनाना, बैठ कर किताबें पढ़ना, बाजार जाना, गेम खेलना बहुत सकारात्मक प्रभाव डालता है. इस से दोनों बच्चों को भी ध्यान और उपस्थिति का एहसास होता है. उन के जीवन के अनुभव भी उन के व्यक्तिगत अर्थों में विकसित होते हैं, जो बड़े होने पर उन्हें विशिष्ट पहचान बनाने में मदद करते हैं.

धर्म और राजनीति के वार, रिश्ते तार तार

मधु और अंजू की दोस्ती सात साल से ऐसी थी कि दोनों हर सुख दुःख में एक साथ होते, मन की हर बात एक दूसरे से शेयर करते, दोनों रहते भी एक ही सोसाइटी में थे, दो साल पहले मधु के पति की अचानक मृत्यु हो गयी तो अंजू मधु का और भी ध्यान रखने लगी, उसकी हर जरुरत के समय हाजिर रहती,मधु और अंजू दोनों अच्छी दोस्त जरूर थीं  पर दोनों के सोचने का ढंग एक दूसरे से बिलकुल मेल नहीं खाता था, जहाँ मधु हर बात में धर्म और राजनीति में गहरी रूचि रख कर बात करती, वहीँ अंजू विवेक से काम लेने वाली, तर्कसंगत बातों को सोचने वाली इंसान थी.  मधु की कई बातें अंजू को पसंद न आती, पर एक अच्छी दोस्त होने के नाते वह मधु की काफी बातों को इग्नोर कर देती. जबसे मधु के पति की डेथ हुई थी, मधु अपनी हेल्थ के प्रति काफी लापरवाह होती जा रही थी, एक दिन अंजू ने डांटा,” तुम्हे शुगर है, डॉयबिटीज है,न तो टाइम से सो रही हो, न टाइम से खा रही हो, न कहीं सैर के लिए जाती हो,करती क्या हो पूरा दिन?”

”नींद नहीं आती, फोन पर वीडिओज़ देखती रहती हूँ, ”मधु ने गंभीरता पूर्वक कहा.

अंजू को उससे सहानुभूति हुई, फिर कहा,” टाइम से सोने की कोशिश किया करो, धीरे धीरे नींद आने लगेगी.‘’

एक बात और थी कि अंजू और मधु अलग अलग राजनैतिक पार्टी को सपोर्ट करते, अंजू समझ चुकी थी कि मधु अपने सामने कोई भी तर्क, विचार नहीं सुनना चाहती इसलिए वह कभी अब पॉलिटिक्स की बात मधु से न करती, अंजू ने पूछ लिया,” पर कौनसे वीडिओज़ देखती हो?”

”पॉलिटिक्स से सम्बंधित, यू ट्यूब पर.‘’

”अरे, यार, तुम उन वीडिओज़ में अपनी रातें खराब कर रही हो? पता भी नहीं होता है कि क्या झूठ है,क्या सच! कितने सच छुपा दिए जाते हैं, कितने झूठ सामने रख दिए जाते है.”

अब तक अंजू और मधु बिगबॉस का हर सीजन देखती आयी थीं, दोनों सलमान खान की फैन थीं, दोनों इस प्रोग्राम को डिसकस करतीं,खूब हंसती, आनंद लेतीं, अंजू ने पूछ लिया,”एक बात बताओ, बिगबॉस देख रही हो न?”

मधु ने चिढ कर कहा,”नहीं, सलमान खान की न कोई मूवी देखूंगी,न कोई शो !’

”क्यों, भाई, क्या हुआ?”

”बस, नहीं देखूंगी.‘’

मधु के उखड़े स्वर के बाद अंजू ने फिर कुछ नहीं कहा. थोड़े दिन बाद फिर अंजू ने मधु को फोन कर उसके हालचाल लिए, और कहा, हेल्थ का ध्यान रख रही हो न?”

”सारी रात तो जागती हूँ, पर दिन में थोड़ा बहुत सो लेती हूँ.‘’

”रात में फिर क्या करती हो?”

”बताया था न, पॉलिटिक्स में इतना कुछ चल रहा है, सब जानकारी लेने के लिए यू ट्यूब पर वीडिओज़ देखती रहती हूँ, सुबह के पांच बज जाते हैं,पता ही नहीं चलता,” इसके बाद मधु ने बहुत कठोर सी आवाज में कहा,” और तुम मुझे समझाने की कोशिश भी न करना कि मुझे क्या देखना चाहिए, क्या नहीं, तुम्हारे विचार मेरी पार्टी से अलग रहते हैं, मैं समझ गयी हूँ,  मैं जिस पार्टी को सपोर्ट करती हूँ, मुझे उस पर विश्वास है.”

मधु के स्वर में एक अकड़ थी, कटुता थी, अंजू को अपना अपमान महसूस हुआ, वह दिल से मधु को प्यार करती थी, उसकी चिंता करती थी, वह हैरान भी थी कि यह कब होता गया, उनकी दोस्ती में राजनीति ने कब अपनी कड़वी घुसपैठ कर ली ! पता ही नहीं चला ! इससे पहले भी कई बार मधु ने पॉलिटिक्स को लेकर, दूसरों के धर्मों को लेकर  ऐसी बातें की थीं कि अंजू को अच्छा नहीं लगा था,उसने इग्नोर कर दिया था,विचार नहीं मिलते थे,यह तो पता था,पर ऐसी बात तो कभी नहीं हुई थी कि दिल दुखा  हो ! इसके बाद पंद्रह दिन पहली बार बीते कि दोनों ने एक दूसरे से कोई संपर्क नहीं किया, फिर यह अंतराल बढ़ता गया, फिर कभी तीज त्यौहार पर एक दूसरे को विश करने की औपचारिकता ही रह गयी, धीरे धीरे दोनों के बीच में एक दूरी  आती गयी, जिस दोस्ती पर दोनों इतराते थे, वह कहाँ गयी, पता ही नहीं चला !

तीस वर्षीया सबा खान का अनुभव  बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है, वे बताती हैं, ”जब मैं दूसरी क्लास में थी, स्कूल में  मेरी एक सहेली बनी, रचना खन्ना, आज इतने सालों बाद भी मैं यह अनुभव नहीं भूलती, रचना के साथ मैं स्कूल में खूब खेलती, अचानक उसने मुझसे बोलना छोड़ दिया, बाकी लड़कियों को भी कहा, कि कोई मुझसे न खेले, न बात करे, बहुत दिनों तक मैं चुपचाप बैठी रहती, मैंने रचना से पूछा कि वह मुझसे क्यों नहीं खेल रही है, उसने कहा,” मेरी मम्मी ने मना किया है.‘’

मैंने पूछा ,”क्यों?”

”क्योकि तुम मुस्लिम हो !”

मैं ऐसी हो गयी थी कि न मेरा पढ़ाई में मन लगता, न स्कूल जाने का मन करता, मेरा काम  अधूरा ही रह जाता, टीचर ने मेरे पेरेंट्स को बुलाया और मेरी शिकायत की, सबके सामने मुझसे पूछा गया कि मैं इतनी डल क्यों हो गयी हूँ,” मैंने कहा,”मुझसे न कोई खेलता है, न बात करता है. और उन्हें रचना की बात बताई. रचना को भी बुलाया गया और उसे बहुत समझाया गया कि ऐसी बातें नहीं करते, वह तो अच्छा हुआ कि उसी साल हमारा उस शहर से ट्रांसफर हो गया, अब तो पुरानी बात हो गयी पर मैं यह बात कभी भूलती नहीं.‘’

सबा का बाल मन कितना आहत हुआ होगा, इसका अंदाजा  लगाना मुश्किल नहीं है, उस बच्ची रचना की भी कोई गलती नहीं है, गलती है हमारे समाज की जो तीस साल पहले भी रिश्तों में, दोस्ती में धर्म को महत्त्व देता था, आज भी देता है, आज भी वही हो रहा है जो सालों से होता आ रहा है, मतलब समाज में इस बात में कोई बदलाव नहीं आया कि इंसान इंसानियत को अपना धर्म माने, दोस्ती में ये चीजें न आएं.

किटी पार्टी चल रही थी, एक आरती को छोड़ कर सब की सब महिलाएं राम मंदिर निर्माण पर चर्चा करने लगीं, सुधा ने कहा,” मैं तो मंदिर के लिए खूब चंदा दूँगी, चलो, एक ग्रुप बना कर चंदा लेने का काम करते हैं.‘’

आरती ने कहा,” मैं मंदिर के नाम पर एक पैसा नहीं दूँगी,हाँ, किसी स्कूल या हॉस्पिटल के नाम पर मैं अच्छी खासी रकम देने को तैयार हूँ.‘’

फिर क्या था, सब की सब उसके पीछे पड़ गयीं, सुधा सबमें उम्रदराज थीं, गुस्से से बोलीं,” तुम जैसी महिलाओं ने ही धर्म का सत्यानाश कर दिया है.‘’

आरती भी कब तक उम्र का लिहाज करती ! उसने भी कहा,” आप लोगों ने धर्म की कितनी सेवा कर ली ! इतनी नफ़रतें रखते हो एक दूसरे के लिए, समाज का बेड़ागर्क हुआ जा रहा है, कितने बुद्दिजीवी सताये जा रहे हैं, कोई अपने मन की बात नहीं कर सकता, किसी को तर्कसंगत बात नहीं सुननी, धर्म ने दिया क्या है?” फिर तो जो हुआ, कल्पना से परे था, बात कहाँ से कहाँ पहुँच गयी, सुधा और आरती के चेहरे गुस्से से लाल होते रहे, काफी अपमानजनक बातें सुनने के बाद आरती पानी की एक घूँट भी पिए बिना वहां से उठ  कर घर आ गयी, दस सालों से इस किटी पार्टी की सबसे इंटेलीजेंट, खुशमिजाज मेंबर ग्रुप छोड़कर चली गयी पर सब जरा सी भी गलती माने बिना अपनी बात को सही कहती रहीं.

एक बड़ी कंपनी में कार्यरत सुजय बताते हैं कि ‘आजकल ऑफिस में सबके साथ बैठ कर लंच करना मुश्किल होता जा रहा है, अजीब सी बहस चलती रहती है, कहाँ काम से ब्रेक लेकर आराम से खाना खाने का मन करता है, पर राजनीति पर चलने वाली बहस से सारा मजा खराब हो जाता है, आजकल साथ बैठ कर हंसना बोलना तो जैसे बंद ही होता जा रहा है. किसी के भी विरोध में बोल दो, सामने वाला लड़ने पर उतारू हो जाता है.’

साठ साल के  अनिल इस विषय पर अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं,” मैं बड़ा खुश था, जब हम साथ पढ़े हुए दोस्तों ने एक दूसरे को ढूंढ कर व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया, सब एक दूसरे से दोबारा जुड़कर बहुत ज्यादा  खुश थे, सारा  दिन ग्रुप पर खूब मन लगता, सब जैसे पुराने दिनों में पहुँच गये थे, पर फिर धर्म से जुड़े,राजनीति से जुड़े फ़ॉर्वर्डेड मेसेजस भेजे जाने लगे, किसी ने आपत्ति की कि यह दोस्तों का ग्रुप है, यहाँ धर्म और राजनीति बीच में नहीं आनी चाहिए क्यूंकि हर  मेंबर के अपने विचार होंगें, पर लोग नहीं माने और फिर आपस में एक दूसरे को तल्खी से जवाब देने लगे, कई बार इतने लम्बे लम्बे मैसेज में एक दूसरे  को कड़वा रिप्लाई करते कि पढ़ते पढ़ते ही लगता कि यह क्या हो रहा है,हम दोस्त हैं या दुश्मन? फिर ग्रुप पर कहा गया कि इन विषयों पर जिसने बहस की, उसे ग्रुप से हटा दिया जायेगा, इसका भी असर नहीं हुआ, शान्ति पसंद लोग धीरे धीरे ग्रुप से दूर होते चले गए, इन मुद्दों पर बहस करने वालों को हटा दिया गया तो ग्रुप की रौनक लौटी.‘’

मसूद  और आलोक एक ही ऑफिस में हैं, दोनों बहुत अच्छे दोस्त भी बन गए हैं,वे कभी किसी भी धर्म की बात ही नहीं करते, राजनीति पर उनके विचारों में काफी मतभेद हैं, दोनों इस विषय पर खूब बातेंकरते  हैं, अपने अपने पॉइंट्स रखते हैं, दोनों एक दूसरे के विचार बहुत ध्यान से सुनते हैं, सभ्य शब्दों में अपनी सहमति,असहमति दिखा काट टॉपिक चेंज कर देते हैं,पांच सालों में उनकी दोस्ती समय के साथ पक्की ही होती गयी है.

धर्म और राजनीति हमेशा से इंसान व समाज पर अपना गहरा प्रभाव डालते रहे हैं. इतिहास में भी धार्मिक केंद्रों को राजनीतिक सत्ता केंद्र के रूप में भी देखा जाता रहा है, दोनों का आपसी सम्बन्ध चर्चा का विषय बनता रहा है , कभी कभी इनकी मिथ्या प्रस्तुति के कारण विवाद भी पैदा होते रहे हैं पर आपसी रिश्तों में धर्म और राजनीति का आ जाना दुखद है न? हिन्दू,मुस्लिम, ईसाई,जैन, बौद्ध आदि के बारे में कहा जाता है कि ये धर्म नहीं, सम्प्रदाय हैं, धर्म तो हर मनुष्य का एक ही है, वह है मानव धर्म.आपस के रिश्तों को निभाने के लिए सभी को इस बात का ध्यान रखना होगा कि आपसी प्यार में धर्म और राजनीति को लेकर कोई कड़वाहट न आये, दोस्ती,प्यार में इन चीजों की जगह नहीं, दुनिया में वैसे ही नफ़रतें बढ़ती जा रही हैं, हर आम इंसान का अपनी ओर से समाज में इतना सा योगदान जरूर हो कि वह आपसी रिश्तों का मान रखे, एक दूसरे के विचार से सहमत न हों तो बहस से बचें, अपने विचार दूसरे पर थोपने से बचें.

मैं जरा रो लूं : डॉक्टर के पास अकेले क्यों जाना चाहती थी वो?

सुबह जैसे ही वह सो कर उठी, उसे लगा कि आज वह जरूर रोएगी. रोने के बहुत से कारण हो सकते हैं या निकाले जा सकते हैं. ब्रश मुंह में डाल कर वह घर से बाहर निकली तो देखा पति कुछ सूखी पत्तियां तोड़ कर क्यारियों में डाल रहे थे.

‘‘मुझे लगता है आज मेरा ब्लडप्रैशर बढ़ने लगा है.’’

पत्तियां तोड़ कर क्यारी में डालते हुए पति ने एक उड़ती सी निगाह अपनी पत्नी पर डाली. उसे लगा कि उस निगाह में कोई खास प्यार, दिलचस्पी या घबराहट नहीं है.

‘‘ठीक है दफ्तर जा कर कार भेज दूंगा, अपने डाक्टर के पास चली जाना.’’

‘‘नहीं, कार भेजने की जरूरत नहीं है. अभी ब्लडप्रैशर कोई खास नहीं बढ़ा है. अभी तक मेरे कानों से कोई सूंसूं की आवाज नहीं आ रही है, जैसे अकसर ब्लडप्रैशर बढ़ने से पहले आती है.’’

‘‘पर डाक्टर ने तुम से कहा है कि तबीयत जरा भी खराब हो तो तुम उसे दिखा दिया करो या फोन कर के उसे घर पर बुलवा लो, चाहे आधी रात ही

क्यों न हो. पिछली बार सिर्फ अपनी लापरवाहियों के कारण ही तुम मरतेमरते बची हो. लापरवाह लोगों के प्रति मुझे कोईर् हमदर्दी नहीं है.’’

‘‘अच्छा होता मैं मर जाती. आप बाकी जिंदगी मेरे बिना आराम से तो काट लेते.’’ यह कहने के साथ उसे रोना आना चाहिए था पर नहीं आया.

‘‘डाक्टर के पास अकेली जाऊं?’’

‘‘तुम कहो तो मैं दफ्तर से आ जाऊंगा. पर तुम अपने डाक्टर के पास तो अकेली भी जा सकती हो. कितनी बार जा भी चुकी हो. आज क्या खास बात है?’’

‘‘कोई खास बात नहीं है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.

‘‘सो कर उठने के बाद दिमाग शांत होना चाहिए पर, मधु, तुम्हें सवेरेसवेरे क्या हो जाता है.’’

‘‘आप का दिमाग ज्यादा शांत होना चाहिए क्योंकि  आप तो रोज सवेरे सैर पर जाते हो.’’

‘‘तुम्हें ये सब कैसे मालूम क्योंकि तुम तो तब तक सोई रहती हो?’’

‘‘अब आप को मेरे सोने पर भी एतराज होने लगा है. सवेरे 4 बजे आप को उठने को कौन कहता है?’’

‘‘यह मेरी आदत है. तुम्हें तो परेशान नहीं कर रहा. तुम अपना कमरा बंद किए 8 बजे तक सोती रहती हो. क्या मैं ने तुम्हें कभी जगाया? 7 बजे या साढ़े 7 बजे तक तुम्हारी नौकरानी सोती रहती है.’’

‘‘जगा भी कैसे सकते हैं? सो कर उठने के बाद से इस घर में बैल की तरह काम में जुटी रहती हूं.’’

खाना बनाने वाली नौकरानी 2 दिनों की छुट्टी ले कर गई थी पर आज भी नहीं आई. दूसरी नौकरानी आ कर बाकी काम निबटा गई.

नाश्ते के समय उस ने पति से पूछा, ‘‘अंडा कैसा लेंगे?’’

‘‘आमलेट.’’

‘‘अच्छी बात है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.’’

पति ने जल्दीजल्दी आमलेट और 2 परांठे खा लिए. डबलरोटी वे नहीं खा सकते, शायद गले में अटक जाती है.

उस ने पहला कौर उठाया ही था कि पति की आवाज आई, ‘‘जरा 10,000 रुपए दे दो, इंश्योरैंस की किस्त जमा करानी है.’’ चुपचाप कौर नीचे रख कर वह उठ कर खड़ी हो गई. अलमारी से 10,000 रुपए निकाल कर उन के  सामने रख दिए. अभी 2 कौर ही खा पाई थी कि फिर पति की आवाज आई, ‘‘जरा बैंक के कागजात वाली फाइल भी निकाल दो, कुछ जरूरी काम करने हैं.’’ परांठे में लिपटा आमलेट उस ने प्लेट में गुस्से में रखा और उठ कर खड़ी हो गई. फिर दोबारा अलमारी खोली और फाइल उन के हाथ में पकड़ा दी और नौकरानी को आवाज दे कर अपनी प्लेट ले जाने के लिए कहा.

‘‘तुम नहीं खाओगी?’’

‘‘खा चुकी हूं. अब भूख नहीं है. आप खाने पर बैठने से पहले भी तो सब हिसाब कर सकते थे. कोई जरूरी नहीं है कि नाश्ता करते समय मुझे दस दफा उठाया जाए.’’

‘‘आज तुम्हारी तबीयत वाकई ठीक नहीं है, तुम्हें डाक्टर के पास जरूर जाना चाहिए.’’

11 बजे तक खाना बनाने वाली नौकरानी का इंतजार करने के बाद वह खाना बनाने के लिए उठ गई. देर तक आग के पास खड़े होने पर उसे छींकें आनी शुरू हो गईं जो बहुत सी एलर्जी की गोलियां खाने पर बंद हो गईं.

 

उस ने अपने इकलौते बेटे को याद किया. इटली से साल में एक बार, एक महीने के लिए घर आता है. अब तो उसे वहां रहते सालों हो गए हैं. क्या जरूरत थी उसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बाहर भेजने की? अब उसे वहां नौकरी करते भी कई साल हो गए हैं. एक महीना मां के पास रह कर वह हमेशा यही वादा कर जाता है, ‘अब की बार आऊंगा तो शादी जरूरी कर लूंगा, पक्का वादा रहा मां.’

झूठा कहीं का. हां, हफ्ते में एक बार फोन पर बात जरूर कर लेता है. उस की जिंदगी में बहुत खालीपन आ गया है. बेटे को याद कर के उसे हमेशा रोना आ जाता है पर आज नहीं आया.

लखनऊ से कितने दिन हो गए, कोई फोन नहीं आया. उस ने भी नहीं किया. पता नहीं अम्माजी की तबीयत कैसी है. वह अपने मांबाप को बहुत प्यार करती है. वह कितनी मजबूर है कि अपनी मां की सेवा नहीं कर पाती. बस, साल में एक बार जा कर देख आती है, ज्यादा दिन रह भी नहीं सकती है. क्या यही बच्चों का फर्ज है?

उस ने तो शायद अपनी जिंदगी में किसी के प्रति कोई फर्ज नहीं निभाया. अपनी निगाहों में वह खुद ही गिरती जा रही थी. सहसा उम्र की बहुत सी सीढि़यां उतर कर अतीत में खो गई और बचपन में जा पहुंची. मुंह बना कर वह घर की आखिरी सीढ़ी पर आ कर बैठ गई थी, बगल में अपनी 2 सब से अच्छी फ्राकें दबाए हुए. बराबर में ही अब्दुल्ला सब्जी वाले की दुकान थी.

‘कहो, बिटिया, आज क्या हुआ जो फिर पोटलियां बांध कर सीढ़ी पर आ बैठी हो?’

‘हम से बात मत करो, अब्दुल्ला, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

अब्दुल्ला हंसने लगा, ‘अभी बाबूजी आएंगे और गोद में उठा कर ले जाएंगे. तुम्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है, तभी जरा सी डांट पड़ने पर घर से भाग पड़ती हो.’

‘नहीं, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

‘नहीं जाओगी तो तुम्हारे कुछ खाने का इंतजाम करें?’

‘नहीं, हम कुछ नहीं खाएंगे,’ और वह कैथ के ढेर की ओर ललचाई आंखों से देखने लगी.

‘कैथ नहीं मिलेगा, बिटिया, खा कर खांसोगी और फिर बाबूजी परेशान होंगे.’

‘हम ने तुम से मांगा? मत दो, हम स्कूल में रोज खाते हैं.’

‘कितनी दफा कहा है कि कैथ मत खाया करो, बाबूजी को मालूम पड़ गया तो बहुत डांट पड़ेगी.’

‘तुम इतनी खराब चीज क्यों बेचते हो?’ अब्दुल्ला चुपचाप पास खड़े ग्राहक के लिए आलू तौलने लगा. सामने से उस के पिताजी आ रहे थे. लाड़ली बेटी को सीढ़ी पर बैठा देखा और गोद में उठा लिया.

‘अम्माजी ने डांटा हमारी बेटी को?’

बहुत डांटा, और उस ने पिता की गरदन में अपनी नन्हीनन्ही बांहें डाल दी.

बचपन के अतीत से निकल कर उम्र की कई सीढि़यां वह तेजी से चढ़ गई. जवान हो गई थी. याद आया वह दिन जब अचानक ही मजबूत हाथों का एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर आ पड़ा था. वह चौंक कर उठ बैठी थी. उस के हाथ अपने गाल को सहलाने लगे थे. बापबेटी दोनों जलती हुई आंखों से एकदूसरे को घूर रहे थे.

पिता ने नजरें झुका लीं और थके से पास में पड़ी कुरसी पर बैठ गए. उन्होंने अपनी लाड़ली बेटी को जिंदगी में पहला और आखिरी थप्पड़ मारा था. सामने खड़े हो कर अंगारे उगलती आंखों से

उस ने पिता से सिर्फ इतना ही पूछा, ‘क्यों मारा आप ने मुझे?’

‘तुम शादी में आए मेहमानों से लड़ रही थी. मौसी ने तुम्हारी शिकायत की है,’ बहुत थके हुए स्वर में पिता ने जवाब दिया.

‘झूठी शिकायत की है, उन के बच्चों ने मेरा इसराज तोड़ दिया है. आप को मालूम है वह इसराज मुझे कितना प्यारा है. उस से मेरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं.’

‘कुछ भी हो, वे लोग हमारे मेहमान हैं.’

‘लेकिन आप ने क्यों मारा?’ वह उन के सामने जमीन पर बैठ गई और पिता के घुटनों पर अपना सिर रख दिया. अपमान, वेदना और क्रोध से उस का सारा शरीर कांप रहा था. पिता उस के सिर पर हाथ फेर रहे थे. यादों से निकल कर वह अपने आज में लौट आई.

कमाल है इतनी बातें याद कर ली पर आंखों में एक कतरा आंसू भी न आया. दोपहर को पति घर आए और पूछा, ‘‘क्या खाना बना है?’’

‘‘दाल और रोटी.’’

‘‘दाल भी अरहर की होगी?’’

‘‘हां’’

वे एकदम से बौखला उठे, ‘‘मैं क्या सिर्फ अरहर की दाल और रोटी के लिए ही नौकरी करता हूं?’’

‘‘शायद,’’ उस ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘जो बनाऊंगी, खाना पड़ेगा. वरना होटल में अपना इंतजाम कर लीजिए. इतना तो कमाते ही हैं कि किसी भी बढि़या होटल में खाना खा सकते हैं. मुझे जो बनाना है वही बनाऊंगी, आप को मालूम है कि नौकरानी आज भी नहीं आई.’’

‘‘मैं पूछता हूं, तुम सारा दिन क्या करती हो?’’

‘‘सोती हूं,’’ उस ने चिढ़ कर कहा, ‘‘मैं कोईर् आप की बंधुआ मजदूर नहीं हूं.’’

पति हंसने लगे, ‘‘आजकल की खबरें सुन कर कम से कम तुम्हें एक नया शब्द तो मालूम पड़ा.’’

 

खाने की मेज पर सारी चीजें पति की पसंद की ही थीं – उड़द की दाल, गोश्त के कबाब, साथ में हरे धनिए की चटनी, दही की लस्सी और सलाद. दाल में देसी घी का छौंक लगा था.

शर्मिंदा से हो कर पति ने पूछा, ‘‘इतनी चीजें बना लीं, तुम इन में से एक चीज भी नहीं खाती हो. अब तुम किस के साथ खाओगी?’’

‘‘मेरा क्या है, रात की मटरआलू की सब्जी रखी है और वैसे भी अब समय ने मुझे सबकुछ खाना सिखला दिया है. वरना शादी से पहले तो कभी खाना खाया ही नहीं था, सिर्फ कंधारी अनार, चमन के अंगूर और संतरों का रस ही पिया था.’’

‘‘संतरे कहां के थे?’’

‘‘जंगल के,’’ उस ने जोर से कहा.

उन दिनों को याद कर के रोना आना चाहिए था पर नहीं आया. अब उसे यकीन हो गया था कि वह आज नहीं रोएगी. जब इतनी बातें सोचने और सुनने पर भी रोना नहीं आया तो अब क्या आएगा.

हाथ धो कर वह रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि उस ने देखा, सामने से उस के पति चले आ रहे हैं. उन के हाथ में कमीज है और दूसरे हाथ में एक टूटा हुआ बटन. सहसा ही उस के दिल के भीतर बहुत तेजी से कोई बात घूमने लगी. आंखें भर आईं और वह रोने लगी.

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