Download App

रंग प्यार के : रिटायरमैंट के बाद रमेशजी के साथ क्या हुआ

आज रमेशजी के रिटायरमैंट के दिन औफिस में पार्टी थी. इस अवसर पर उन का बेटा वरूण बहू सीता और बेटी रोमी अपनी पति के साथ आई हुई थी. सभी खुश थे. उन की पत्नी उर्वशी की खुशी आज देखते ही बनती थी. रमेशजी की फरमाइश पर वह आज ब्यूटीपार्लर से सज कर आई थी. उन्हें देख कर कोई उन की उम्र का अंदाजा भी नहीं लगा सकता था. वह बहुत सुंदर लग रही थी.

विदाई के क्षणों में औफिस के सभी कर्मचारी भावुक हो रहे थे. यहां रमेशजी ने पूरे 30 बरस तक नौकरी की थी. वे हर कर्मचारी के सुखदुख से परिचित थे. यह उन के कुशल व्यवहार का परिणाम था कि वे औफिस के हर कर्मचारी के परिवार के साथ पूरी तरह जुड़े हुए थे. उन्होंने हरेक के सुखदुख में पूरा साथ दिया था. जैसाकि हरेक के साथ होता है, इस अवसर पर सब उन:की तारीफ कर रहे थे लेकिन अंतर इतना था कि उन की तारीफ झूठी नहीं थी. कहने वालों की आंखें बता रही थीं कि उन्हें रमेशजी के रिटायरमैंट पर कितना दुख हो रहा है.

हर कोई उन के बारे में कुछ न कुछ अपना अनुभव बांट रहा था. यह देख कर उर्वशी की आंखें फिर नम हो गई थीं. रमेशजी ने उन्हें कभी इतना कुछ नहीं बताया था जितना आज औफिस के कर्मचारी बता रहे थे. उन के साथ काम करने वाले आया फफकफफक कर रो पड़ी, “बाबूजी, आज लगता है जैसे मेरा यहां कोई नहीं रहा.”

“ऐसा नहीं कहते शांति. यहां पर इतने लोग हैं.”

“आप मेरे पिता समान हैं. आप के रहते मुझे लगता था मेरे ऊपर कोई परेशानी नहीं आएगी. आप सब संभाल लेंगे. अब क्या होगा?”

“तुम ऐसा क्यों सोचती हो ? कुदरत न करे तुम्हें परेशानी का सामना करना पड़े,” रमेशजी उसे समझाते हुए बोले.

ढेर सारे उपहारों के साथ देर रात तक बच्चों के साथ वे घर लौट आए थे. सभी थके हुए थे. कुछ देर बाद वे सो गए. उर्वशी को भी नींद आ रही थी. उसे सुबह जल्दी उठना था. रोज सुबह 5 बजे उठ कर वह सब से पहले रमेशजी को चाय थमाती और उस के बाद घर के और कामों में लग जाती. आज जैसे ही अलार्म बजा, उर्वशी ने देखा रमेशजी उस के लिए चाय ले कर खड़े थे.

“तुम कब उठे?”

“अभी थोड़ी देर पहले उठा हूं.”

“चाय बनाने की क्या जरूरत थी?”

“यह तुम नहीं समझोगी उर्वशी. मेरे दिल में बड़ी तमन्ना थी रिटायरमैंट के बाद मैं भी तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं.”

“आज सुबह चाय पिला कर तुम ने मेरा पूरा रूटीन खराब कर दिया.”

“वह कैसे?”

“मेरे दिन की शुरुआत तुम्हारे लिए कुछ करशके होती थी.”

“अब छोड़ो इस बात को और मेरे साथ बैठ कर आराम से चाय का आनंद लो. अभी बच्चे सो रहे हैं. तब तक हमतुम बातें करते हैं.”

“बातों के लिए सारा दिन पड़ा है.”

“अच्छा, बताओ चाय कैसी बनी है? मुझे एक ही काम आता है. इस के अलावा तुम ने मुझे कभी कुछ करने नहीं दिया.”

“तुम्हारे पास इन सब के लिए फुरसत कहां थी? सुबह से ले कर शाम तक परिवार के लिए काम करते रहते थे.”

“यह सब तुम्हारे सहयोग के कारण ही  संभव हो सका, उर्वशी वरना मेरे बस का कुछ नहीं था.”

“कैसे बातें करते हो? आज तुम्हारी  मेहनत की बदौलत दोनों बच्चे अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं. यह सब तुम्हारे कारण संभव हुआ है.”

“उर्वशी मैं ने जीवन में केवल काम पर ध्यान दिया. मेरी कमाई का सही उपयोग तुम ने किया. तुम्हीं ने बच्चों और उन की पढ़ाई पर ध्यान दिया. मुझे कभी इन बातों का एहसास भी नहीं होने दिया.”

“अब सुबह से मेरी ही तारीफ करते रहोगे या मुझे काम भी करने दोगे?”

“मेरा बड़ा मन था रिटायरमैंट के बाद तुम्हारे साथ काम में हाथ बंटाऊ.”

“रहने दो, तुम्हारे साथ काम करने में मुझे घंटों लग जाएंगे. घर पर बच्चे आए हैं. मुझे जल्दी से सारा काम निबटाना है.”

“जैसी तुम्हारी मरजी,” कह कर रमेशजी योगासन करने लगे और उर्वशी अपने काम पर लग गई.
उन्होंने सोच लिया था कि वे पत्नी को हर प्रकार का सुख देने का प्रयास करेंगे. नौकरी करते हुए उन्होंने कभी परिवार की जिम्मेदारी नहीं उठाई. वे एक ईमानदार और मेहनती इंसान थे. छुट्टी के एवज में काम करने के उन्हें रुपए मिलते थे इसीलिए उन्होंने कभी बेवजह छुट्टी तक नहीं ली. वे उर्वशी तथा बच्चों को घुमाने भी न ले जाते. उन की आय के साधन इतने नहीं थे कि वे बच्चों और पत्नी को आलीशान जिंदगी दे सकें. यह बात उन्हें बहुत खटकती थी लेकिन मजबूर थे.

इस उम्र में आ कर उन के पास समय और थोड़ेबहुत रुपए भी थे जो उन्हें रिटायरमैंट पर मिले थे. वे इस से उर्वशी की उन इच्छाओं को पूरा करना चाहते थे जिसे वे नौकरी में तवज्जो न दे सके थे. कुछ देर बाद बच्चे सो कर उठ गए. वे अभी तक कल की पार्टी की ही चर्चा कर रहे थे. 2 दिनों बाद वरूण और सीता को जाना था.

वरूण बोला,”पापा, आप दोनों हमारे साथ चलिए.”

कुछ दिन हमें घर पर सुकून से समय गुजारने दो बेटा.”

“मेरा घर भी आप का ही घर है.”

“यह बात तो है लेकिन इस घर पर इतने साल गुजारे हैं लेकिन कभी इसे इतना समय नहीं दे सका जितना देना चाहिए था.”

“आप यह बात दिमाग से निकाल दीजिए. आप ने जो किया वह अपनी क्षमताओं से बढ़ कर किया और हमें इस पद तक पहुंचाया.”

“इस में मेरा नहीं तुम्हारी मम्मी का योगदान ज्यादा है.”

“मम्मी आप की अर्धांगिनी हैं. उन्होंने हर सुखदुख में आप का पूरा साथ दिया है.”

“मैं चाहता हूं अब रिटायरमैंट के बाद उसे पहले कहीं घुमाने ले चलूं.”

“अच्छा सैकंड हनीमून मनाना चाहते हैं.”

“आजकल के जमाने में शायद बच्चे इसे यही कहते हैं लेकिन हम ने कभी परिवार के साथ रह कर अपना पहला हनीमून भी नहीं मनाया. घरगृहस्थी में ऐसे फंसे रहे कि इस बारे में सोचने की न तो फुरसत थी और न ही कोई आकांक्षा. तुम्हारी मम्मी ने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं मांगा. मैं अब उसे वह सब देना चाहता हूं जिस की वह हकदार थी.”

“ठीक है पापा, आप जो करना चाहें वह करें और जब फुरसत मिल जाए तब प्लीज हमारे पास चले आना. हम भी मम्मी को कुछ दिन के लिए आराम देना चाहते हैं.”

2 दिन मम्मीपापा के साथ घर पर बिता कर वरूण और सीता वापस चले गए थे .अगले दिन रोमी भी चली गई. उर्वशी और रमेशजी को घर सूना मसूना लग रहा था.

“उदास मत हो, उर्वशी. हम दोनों भी कहीं घूमने चलते हैं.”

“मुझे तो घर पर ही अच्छा लगता है.”

“अपना घर तो अपना होता है लेकिन बदलाव के लिए कभीकभी घर से बाहर घूमने भी जाना चाहिए. दुनिया बहुत बड़ी है. उस का अनुभव भी लेना चाहिए.”

“अब इस उम्र में अनुभव ले कर क्या करेंगे?”

“सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है? अपना सामान पैक कर लो. मैं ने घूमने के लिए 2 हवाई टिकट पहले ही बुक करा दी है.”

“मुझ से पूछे बगैर ही?”

“जानता था तुम इस के लिए राजी नहीं होगी इसलिए पूछने की जरूरत नहीं समझी.”

“हम कहां जा रहे हैं?”

“कश्मीर घूमेंगे. कुछ दिन ठंडी वादियों का मजा उठाएंगे. दिल में गुलमर्ग घूमने की बड़ी तमन्ना थी. अब जा कर पूरी होगी.”

उन के कहने पर उर्वशी ने अपनी तैयारी शुरू कर दी. यह उस की पहली हवाई यात्रा थी. उसे हवाई जहाज में बैठने में डर लग रहा था, यह बात रमेशजी महसूस कर रहे थे.

“डरो नहीं. मैं हूं न तुम्हारे साथ.”

“इतने रुपए खर्च करने की क्या जरूरत थी?”

“बस हर समय एक ही बात बोलती हो. अब रूपए बचाने की जरूरत क्या है? अपना घर है. बच्चे अच्छी नौकरी कर रहे हैं. हमारे पास जो कुछ है उसे घूमनेफिरने पर खर्च करेंगे.”

“मुझे फुजूलखर्ची पसंद नहीं.”

“ऐसा मत कहो उर्वशी. घूमनाफिरना कभी बेकार नहीं जाता. तुम यहां की सुंदर वादियों में घूम कर अपनेआप को तरोताजा महसूस करोगी.”

रमेशजी की बात सच थी. उर्वशी के मन में भी कब से कश्मीर देखने की इच्छा थी लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आतेआते वह मुरझा गई थी. रमेशजी के उत्साह ने उसे हवा दी तो वह फिर से तरोताजा हो गई. हफ्तेभर तक दोनों कश्मीर की वादियों में घूमते रहे. रमेशजी उन की हर इच्छा का सम्मान कर रहे थे. लगता ही नहीं था कि वे 60 बरस के हो गए हैं. वे दोनों अपनेआप को उम्र के इस पड़ाव पर भी युवा महसूस कर रहे थे.

1 हफ्ते बाद वे अपने साथ कश्मीर की ढेर सारी यादें ले कर वापस लौट आए थे.

रमेशजी बोले,”मेरी एक इच्छा तो पूरी हो गई.”

“और भी कोई इच्छा पूरी करना चाहते हो?”

“इच्छाओं का क्या है. एक पूरी होती है 10 सिर उठा लेती हैं. मैं तुम्हारे लिए बहुत कुछ करना चाहता हूं, उर्वशी.

अब हमारेतुम्हारे पास समय ही समय है. जब जी चाहेगा उन्हें पूरा कर लेंगे. काम को कभी टालना नहीं चाहिए. मौका मिलते ही उसे प्राथमिकता दे कर पूरा कर लेना चाहिए,” रमेशजी बोले.

अब वे अब उर्वशी की हर तरह से मदद करने के लिए तत्पर रहते. यह बात उर्वशी भी अच्छी तरह जानती थी. रिटायरमैंट के 2 महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला. वरूण बारबार फोन कर के उन्हें अपने पास बुला रहा था और रमेशजी इसे टाले जा रहे थे.

“एक बार वरूण और सीता के पास हो कर आ जाते हैं. उसे भी अच्छा लगेगा. कितना कह रहा है.”

” तुम जानती हो उस के पास जा कर क्या होगा? वह हमें ड्राइंगरूम में सजे शोपीस की तरह एक जगह पर बैठा देगा और कुछ नहीं करने देगा. मैं ऐसी जिंदगी नहीं जीना चाहता.”

“आजकल के जमाने में ऐसी औलाद कहां मिलती है जो मम्मी और पापा का इतना खयाल रखे.”

“जानता हूं फिर भी मैं अपने को उस माहौल में ढाल नहीं पाता. मैं ने इतने बरस बड़े बाबू की नौकरी की है. काम में मेरा दिल लगता है. खाली बैठे समय ही नहीं कटता. यह बात उसे कैसे समझाऊं?” रमेशजी बोले तो उर्वशी चुप हो गई.

वह जानती थी वरूण उन का बहुत खयाल रखता है. इसी कारण रमेशजी का समय काटे नहीं कटता था.

“तुम उसे समझा दो. हम कुछ समय बाद आएंगे.”

“ठीक है, कह दूंगी. एक बार उस की इच्छा का भी मान रख लो.”

रिटायरमैंट के बाद रमेशजी सही माने में जीवन का मजा ले रहे थे. एक शाम वे शहर के मशहूर लच्छू हलवाई से उर्वशी के लिए समोसे ले कर आ रहे थे. तभी वह घट गया जिस की उन्हें कल्पना तक नहीं थी. एक तेज मोटरसाइकिल सवार ने उन्हें टक्कर मार दी. वे इस टक्कर से दूर गिर पड़े. उन के दिमाग पर चोट आई थी और मोटरसाइकिल का पहिया पैर पर चढ़ गया था. उर्वशी धक रह गई. उस ने तुरंत वरूण और रोमी को खबर की. दूसरे दिन ही वे घर पहुंच गए. रमेशजी को अभी होश नहीं आया था. उर्वशी का रोरो कर बुरा हाल था. तीसरे दिन उन्हें होश आया.

“डाक्टर, पापा बोल क्यों नहीं रहे?”

“सिर पर चोट के कारण इन के दिमाग में खून का थक्का जम गया है. इस के कारण इन्हें पैरालिसिस अटैक पड़ा है. इसी वजह से ये जबान नहीं चला पा रहे हैं.”

“यह क्या कह रहे हैं डाक्टर?”

“वही जो मरीज की हालत बता रही है. इनका बायां हाथ और पैर भी काम नहीं कर रहा है और उसी पैर की हड्डियां भी टूट गईं जिस पर प्लास्टर चढ़ाना है.”

“ऐसा मत कहिए, डाक्टर. इन्हें चलने में कितने दिन लगेंगे?” वरुण ने पूछा.

“अभी कुछ कहना मुश्किल है. कुछ दिन इंतजार कीजिए. उस के बाद ही सही स्थिति सामने आ पाएंगी.”

उर्वशी के लिए एकएक पल बिताना मुश्किल हो रहा था. वरूण और रोमी मम्मी को ढांढस बंधा रहे थे.

” हिम्मत रखिए मम्मी, पापा ठीक हो जाएंगे.”

“कभी सोचा नहीं था कि ऐसी नौबत आएगी.”

“आप ही टूट जाएंगी तो पापा का क्या होगा?” रोमी बोली.

उर्वशी कुछ देर के लिए शांत हो गई लेकिन पति की हालत देख कर उसे रोना आ रहा था. 1 हफ्ते बाद भी रमेशजी बोलने की स्थिति में नहीं थे. उन का मुंह थोड़ा तिरछा हो गया था और जबान नहीं चल रही थी. डाक्टर ने पैर में प्लास्टर चढ़ा दिया था.
होश आने पर उर्वशी को देख कर रमेशजी की आंखों में आंसू बहने लगे. उर्वशी ने झट से उन्हें पोंछ दिया.

“मैं आप की आंखों में आंसू नहीं देख सकती. आप जल्दी ठीक हो जाएंगे. हिम्मत रखिए.”

रमेशजी ने कुछ बोलना चाहा लेकिन जबान ने साथ नहीं दिया. दाएं हाथ के इशारे से उन्होंने कुछ कहा. उर्वशी ने उन का हाथ अपने हाथों में ले लिया और उन्हें हिम्मत बंधाने लगी. 2 हफ्ते हौस्पिटल में रहने के बाद वे घर आ गए थे. वरूण ने उन के लिए नर्स का इंतजाम कर दिया था. डाक्टर ने पहले ही बता दिया कि उन की स्थिति में सुधार बहुत धीरेधीरे होगा. किसी चमत्कार की उम्मीद मत रखिएगा.
डाक्टर की बात सही थी. 1 महीने बाद उन की जबान थोड़ीबहुत चलने लगी और वह हकलाते हुए अपनी बात कहने लगे. पापा की हालत में सुधार देख कर वरूण उन्हें अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन उर्वशी ने मना कर दिया.

“तुम चिंता मत करो, बेटा. यहां पर मैं हूं और हमारे बहुत सारे रिश्तेदार भी हैं. सब से बड़ी बात डाक्टर यहीं पर हैं जो उन्हें देख रहे हैं. कोई ऐसी बात होगी तो मैं तुम्हें इत्तिला कर दूंगी. तुम वापस काम पर जाओ. कब तक यहां रहोगे?”

“आप अकेले इतना सब कुछ कैसे संभालेंगी मम्मी?”

“तुम मेरी हिम्मत हो, बेटा. मेरी चिंता मत करना मैं उन्हें देख लूंगी,” कहते हुए उर्वशी की आंखें भर आई थीं.
वह जानती थी कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी उस ने जीवन में कभी नहीं उठाई. पहली बार किसी तरह हिम्मत जुटा कर उसे करने के लिए तैयार हो गई थी. भारी मन से वरूण काम पर चला गया. रोमी कुछ दिन पहले चली गई थी. अब घर पर रमेशजी और उर्वशी रह गए. डेढ़ महीने बाद पैर से प्लास्टर कट गया था लेकिन वे चलने की स्थिति में नहीं थे. उन के दाहिने हाथों और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था.

नर्स उन के सारे काम कर रही थी. रमेशजी उस के साथ अपने को असहज महसूस करते. जीवन में उन्होंने कभी किसी पराई स्त्री को छुआ नहीं था. यह बात उन्होंने उर्वशी को बता दी. उन की भावनाओं का खयाल करते हुए वह नर्स की जगह खुद ही उन के काम करने लगी. शुरू मे बड़ी परेशानी हुई लेकिन धीरेधीरे आदत पड़ गई. वह व्हीलचेयर में बैठाकर उन्हें बाथरूम तक ले जाती. उन्हें नहलाधुला कर बरामदे में बैठा देती. आतेजाते लोगों को देख कर रमेशजी का मन लगा रहता. उन की स्थिति बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह हो गई थी.

दिमाग में चोट आने की वजह से अकसर वे चुप ही रहते. मिलने आने वाले उन्हें अपने तरीके से समझाने की कोशिश करते. यह बात उन्हें बड़ी अखरती थी. वे खुद भी एक पढ़ेलिखे और जिम्मेदार इंसान थे. वे जानते थे कि इस उम्र में उन के लिए ऐसी हालत में क्या उचित है और क्या अनुचित. लेकिन जब शरीर का कोई अंग काम करने बंद कर दे तो वे क्या कर सकते थे. हर एक का नसीहत देना उन्हें चिड़चिड़ा बना रहा था. यह बात उर्वशी भी महसूस कर रही थी लेकिन वह किसी को कुछ कहने से रोक नहीं सकती थी.

एक दिन रमेश जी बोले,”उर्वशी, लोग मुझ से मिलने क्यों चले जाते हैं?”

“तुम्हारा हालचाल पता करने आते हैं.”

“मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता. मुझे हुआ क्या है? मैं तुम्हारे अलावा किसी पर बोझ नहीं हूं फिर लोगों को मुझ से इतनी सहानुभूति क्यों है?”

“सब का बात करने का अपना तरीका होता है. आप उन की बात का बुरा मत माना करो.”

“एक ही बात सब लोग कहें तो बुरी  लगती है. मुझे यह सब पसंद नहीं. तुम उन्हें यहां आने से मना कर दिया करो.”

“बात समझने की कोशिश कीजिए. हम दुनिया से कट कर नहीं रह सकते,” उर्वशी ने अपनी असमर्थता जाहिर की तो रमेशजी को अच्छा नहीं लगा.

ऐसी हालत में उन्हें किसी से सहानुभूति नहीं हिम्मत चाहिए थी. ऐसी हालत में हरकोई उन्हें सहानुभूति के साथ 2-4 बातें भी सुना रहा था. यह बात वे सहन नहीं कर पा रहे थे. एक झटके में उन के सारे सपने बिखर गए थे. क्या सोचा था और क्या हो गया? ऊपर से दुनियाभर की बातें यह सब उन के लिए असहनीय हो रहा था. उर्वशी भी मजबूर थी. हफ्ते में एक दिन डाक्टर घर आ कर देख जाते. दोपहर में एक नर्सिंगअसिस्टैंट आ कर जरूरी काम कर चला जाता. इस के अलावा उन की सारी जरूरतें उर्वशी पूरा कर रही थी.

वह महसूस कर रही थी कि रमेशजी दिनप्रतिदिन चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. आज तक उन्होंने किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी. अपशब्दों का इस्तेमाल करना तो दूर की बात थी. अब जरा सा मन की बात न होती तो वे अपना आपा खो देते और उर्वशी के लिए कुछकुछ बोलने लगते.

एक दिन तो हद ही हो गई. उर्वशी किचन में काम कर रही थी. रमेशजी ने उन्हें आवाज लगाई. शायद वह सुन न सकी. कुछ देर बाद जब वह उन के पास आई तो उन्होंने सामने मेज पर रखा हुआ खाली गिलास उठा कर उस पर दे मारा. संयोग था कि उर्वशी ने हाथ से गिलास रोक दिया वरना उस से उसे चोट लग सकती थी.

“यह क्या कर रहे हो?”

“कब से आवाज दे रहा हूं तुझे सुनाई नहीं देता. अब तुम्हारे लिए भी मैं एक बेकार की चीज हो गया?”

” कैसी बातें करते हो? मैं किचन में खाना बना रही थी. कुकर की सीटी में मुझे आप की आवाज नहीं सुनाई दी.”

“मैं तुम जैसी औरतों से तंग आ गया हूं. मैं तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहता. तुम मुझे छोड़ कर चली क्यों नहीं जाती?”

उन की कर्कश बात सुन कर उर्वशी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. उसे बहुत बुरा लगा फिर भी उन की तबीयत को ध्यान में रख कर उस ने इसे दिमाग से निकाल दिया और उन की खिदमत में लगी रही. उर्वशी का ठंडा व्यवहार रमेशजी को रास नहीं आया. उस दिन से वे हर समय उसे उकसाने की बात करते रहते. उर्वशी भी पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी जो उन की बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखा रही थी.

1 हफ्ते बाद डाक्टर गुप्ता से उर्वशी ने उन के बदले हुए व्यवहार की चर्चा की. वे बोले,”जैसाकि इन की रिपोर्ट बता रही है. इन की तबीयत में पहले से कोई गिरावट नहीं आई है.”

“फिर यह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?”

“यह बात मेरी समझ से परे है. दिमाग की सूजन भी धीरेधीरे कम हो रही है.”

“पता नहीं यह हर समय गुस्से में क्यों रहते हैं? मुझे अपने नजदीक बिलकुल सह नहीं पाते. ऐसीऐसी बात कहते हैं कि कई बार झेलना मुश्किल हो जाता है. वे मेरे पति हैं इसीलिए मैं उन्हें अनसुना करने की कोशिश करती हूं लेकिन मैं भी इंसान हूं. दिल पर उन की बातों का बहुत समय तक असर रहता है.”

“आप चिंता मत करें. मैं 2-3 दिनों में किसी मनोचिकित्सक को अपने साथ ले कर आऊंगा. वहीं उन से बातोंबातों में जानने की कोशिश करेंगे आखिरी इन्हें हुआ क्या है? घर में कोई ऐसीवैसी बात तो नहीं हुई जिस से उन का अहम आहत हो गया हो?”

“नहीं डाक्टर, यहां हम दोनों के अलावा कोई है भी नहीं. कभीकभी मिलने के लिए रिश्तेदार आ जाते हैं. इन्हें उन से भी बात करना पसंद नहीं आता.”

“रमेशजी के साथ जबरदस्ती न किया करें.”

“मिलने आने वालों को मैं नहीं रोक सकती लेकिन इन से दूर बैठाने की कोशिश जरूर करूंगी. इन के बदले व्यवहार से मैं बहुत आहत हो जाती हूं. प्लीज, कुछ कीजिए.”

2 दिन बाद डाक्टर गुप्ता अपने साथ मनोचिकित्सक विपिन को ले कर आ गए थे. उन्हें देख कर रमेशजी ने पूछा,”यह कौन है?”

“मरीजों को देखने मेरे साथ कभीकभी विपिनजी भी चले आते हैं. मैं उन का दवाई से इलाज करता हूं और यह बातों से. यह भी हमारे इलाज का एक हिस्सा है.” यह सुन कर रमेशजी ने उन के लिए हाथ जोड़ दिए.

“आप कैसे हैं?”

“एक अपाहिज आदमी कैसा हो सकता है?”

“मानता हूं तकलीफ आप के शरीर पर  है. उसे मन पर मत लगने दीजिए. मन स्वस्थ हो तो शरीर भी स्वस्थ होने  लगता है .”

“मेरी हालत अब मेरे जाने के बाद ही सुधरेगी.”

“आप अपनी सोच बदलने की कोशिश कीजिए रमेशजी.”

“यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल होता है,” रमेशजी बोले.

डाक्टर विपिन ने उन्हें अपनी बातों में उलझा दिया था. तभी वहां उर्वशी पानी ले कर आ गई. रमेशजी के चेहरे के भाव देख कर उन्हें समझते देर न लगी कि वे पत्नी को ले कर परेशान हैं.

” लगता है, घर वाले आप पर ध्यान नहीं दे रहे.”

“ऐसी बात नहीं है, उर्वशी मेरा जरूरत से ज्यादा खयाल रखती है. यही बात मैं पचा नहीं पा रहा हूं. इस औरत ने जीवनभर मेरे लिए इतना कुछ किया. अब जब मेरे करने का वक्त आया तो मेरी ऐसी हालत हो गई. मुझ से यह सब सहन नहीं होता.”

“क्या वे आप को ले कर परेशान रहती हैं?”

“कुदरत का धन्यवाद कि मुझे उर्वशी जैसी पत्नी मिली है. उस ने मेरी हालत को अपना भाग्य समझ कर स्वीकार कर लिया है. जरा सोचिए,  पति के रूप में उसे इस ढलती उम्र में क्या मिला? मैं अब उसे जीवन का कोई सुख नहीं दे सकता.”

“क्या वह आप से कुछ अपेक्षा रखती है?”

“वह आज भी मेरे लिए पूरी तरह समर्पित है. यही सोच कर मैं परेशान हूं. मेरे जीवन का अंत हो जाता तो कम से कम उर्वशी को कष्टों से मुक्ति मिल जाती.”

“ऐसा नहीं सोचते. कभी उस की नजरों से देखने की कोशिश कीजिए कि उन के लिए आप क्या हैं? उन्होंने आप से दिलोजान से प्रेम किया है. आप का भी फर्ज बनता है उस के प्यार का मान रखें.”

“प्यार एकतरफा हो तो उस से क्या हासिल हो जाएगा? मैं ने उस के मन में बहुत सारी उम्मीदें जगाई थीं. मुझे क्या पता था मेरी ऐसी हालत हो जाएगी. अब मैं उन्हें पूरा नहीं कर सकता. यह सोच कर मुझे बहुत कष्ट होता है. मैं चाहता हूं कि वह मुझे छोड़ कर चली जाए. तब उस के सारे कष्ट खत्म हो जाएंगे. मेरा क्या है? मैं  ऐसी हालत में किसी अस्पताल के कोने में भी पड़ा रह सकता हूं.”

“यह आप की सोच है उस की नहीं.”

दरवाजे पर खड़ी उर्वशी सबकुछ सुन रही थी. उस के लिए भी अपने को रोकना मुश्किल हो रहा था. किसी तरह मुंह में रूमाल ठूंस कर उस ने अपनी हिचकियां रोकीं. वह समझ गई रमेशजी उस से क्या चाहते हैं ? ऐसी हालत में भी उन्हें अपने से ज्यादा पत्नी की चिंता खाए जा रही थी. डाक्टर के समझाने का रमेशजी पर अच्छा असर पड़ा था. कुछ देर बाद डा गुप्ता विपिन को साथ ले कर चले गए.

उन के जाते ही उर्वशी उन के लिए पानी ले कर आ गई. डाक्टर के साथ बात कर के उन का गला सूख गया था. उस ने हौले से पानी का गिलास उठा कर उन के मुंह से लगाया तो रमेशजी अपनेआप को न रोक सके. उन्होंने उर्वशी का हाथ पकड़ लिया और फूटफूट कर रोने लगे. उर्वशी भी उन के गले लग कर रो पड़ी. कुछ देर बाद अपने को संयत कर रमेश जी बोले,”मुझे माफ कर दो उर्वशी, मैं स्वार्थी हो गया था.”

“माफी तो मुझे मांगनी चाहिए जो आप की भावनाओं को समझ न सकी.”

“तुम्हें मेरे कारण इस उम्र में कितनी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं.”

“ऐसा नहीं कहते. तुम्हारे अलावा मैं कुछ और सोच भी नहीं सकती. आइंदा कभी दूर जाने की बात मत कहना,” उर्वशी बोली तो रमेशजी ने उस का हाथ कस कर पकड़ लिया और बोले,”तुम ही मेरी दुनिया हो. मुझ से दूर मत जाना उर्वशी वरना मैं जी नहीं पाऊंगा.”

उर्वशी ने बड़े प्यार से उन के माथे पर हाथ फेरा. एक बच्चे की तरह रमेशजी ने उस का हाथ पकड़ कर चूम लिया. रमेशजी को लगा जैसे उर्वशी के रूप में उन की दिवंगत मां उसे सहला रही हैं. उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री के अनेक रूप में से उन्हें उर्वशी का वात्सल्य रूप स्पष्ट नजर आ रहा था.

आखिर हमें आना है जरा देर लगेगी

चेतनाजी सुबह से ही अनमनी सी थीं. कितनी खुश हो कर इतने दिनों से अपने बेटे के आने की तैयारियों में व्यस्त थीं. उन का बेटा विवान बहुत सालों पहले अमेरिका में जा कर रहने लगा था. एक बेटी थी नित्या, उस की भी शादी हो चुकी थी. जब से पता चला कि उन का बेटा विवान इतने सालों बाद अमेरिका से भारत आ रहा है, तब से उस की पसंद के बेसन के लड्डू, मठरी, उस की पसंद का कैरी का अचार, और भी न जाने क्याक्या बना रही थीं. भले शरीर साथ नहीं देता, पर बेटे के मोह में न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई थी.

महेशजी, उन के पति उन को इतना उत्साहित और व्यस्त देख चिढ़ कर कहते भी,”मैं जब तुम से कुछ बनाने को कहता हूं तो कहती हो मेरे घुटनों में दर्द है. अब कहां से इतनी ताकत आ गई?”

चेतनाजी बड़बड़ करती बोलीं,”अरे, अपनी उम्र और सेहत को तो देखो, जबान को थोड़ा लगाम दो. इस उम्र में सादा खाना ही खाना चाहिए.”

पर आज सुबह उन के बेटे विवान का फोन आया,”पापा, मैं नहीं आ पाऊंगा. इतनी छुट्टियां नहीं मिल रहीं और जो थोड़ी बची हैं उस में बच्चे यहीं घूमना चाहते हैं.”

अपने बेटे की बात सुन महेशजी ने कहा भी,”बेटा, तुम्हारी मां तो कब से तुम्हारा इंतजार कर रही है, उस को दुख होगा.”

“ओह पापा, आप तो समझदार हो न, मां को समझा दो, अगली बार जरूर आ जाऊंगा,” कहते हुए विवान ने फोन रख दिया.

इधर महेशजी खुद से ही बोले,’हां बेटा, मैं तो समझदार ही हूं, इसलिए तेरी मां को मना करता हूं. पर वह बेवकूफ पता नहीं कब अपना मोह छोड़ेगी, कब अक्ल आएगी उसे…’

चेतनाजी ने सब सुन लिया था. महेशजी ने जैसे ही उन्हें देखा, वे कुछ कहते उस से पहले ही चेतनाजी अपने आंसूओं को छिपाती बोलीं,”अरे, काम होगा उसे,अब कोई फालतू थोड़ी न है, आखिर इतनी बड़ी कंपनी में है और वैसे भी कोई पड़ोस में तो रहता नहीं, जो जब मन आया मुंह उठाए और चला आए.” वे नहीं चाहती थीं कि महेशजी अपने बेटे के खिलाफ कुछ भी बोले. इसलिए वे कुछ कहते उस से पहले खुद ही उस की सफाई में बोले जा रही थी.

महेश जी बोले,”बन गई अपने बेटे की वकील, शुरू हो गई तुम्हारी दलील. और तुम जो इतने दिनों से उस के लिए तैयारी कर रही थी, कितनी बेचैन थी तुम्हारी ये आंखें उसे देखने के लिए.”

चेतनाजी फिर किसी कुशल वकील की तरह दलील देने लगीं,”अरे, मेरा क्या है, कुछ काम नहीं है इसलिए बना लिया, अब चुप रहो, काम करने दो मुझे,” कहती वे बिना बात कमरे की अलमारियों को साफ करने लगीं. आदत थी उन की यह. जब भी दुखी होतीं खुद को और ज्यादा व्यस्त कर लेतीं पर महेश जी से उन की उदासी, उन की छटपटाहट छिपी नहीं थी. उन्होंने चेतनाजी को कुछ नहीं बोला और खुद रसोई में जा कर 2 कप चाय बनाई और चेतनाजी को जबरदस्ती बुला कर कुरसी पर बैठाया और चाय का कप पकड़ाया. चेतनाजी महेशजी का सामना करने से कतरा रही थीं. डर था उन्हें, उन के अंदर जो गुबार था कहीं वह फट न पड़े. महेशजी उन की हालत समझ रहे थे. उन्होंने चाय पीते हुए कहा बोला,”मुझ से छिपाओगी अपने आंसू, बहने दो इन्हें, कर लो अपने दिल को हलका.”

महेशजी के इतना कहते ही चेतनाजी के सीने में दबा बांध टूट गया. वे बच्चों के जैसे फूटफूट कर रो पड़ीं. महेशजी ने अपनी चाय का कप टेबल पर रखा और चेतनाजी के हाथ में पकड़ा कप भी ले कर टेबल पर रख दिया और उन्हें सीने से लगा लिया,”कब तक अपने को दुखी करोगी.” चेतनाजी कुछ नहीं बोलीं, बस महेशजी के सीने में मुंह छिपाए सिसकती रहीं.

जाने कब तक वे आंसू बहा अपना मन हलका करने की कोशिश कर रही थीं. मन में भरा दुख कम भले न हो पर कुछ समय के लिए हलका तो होता ही है और जब आंसू बहाने को अपना कंधा हो तो कौन अपना दुख, अपना गम बांटना नहीं चाहेगा.

महेशजी ने भी आज उन्हें नहीं रोका, रो लेने दिया. काफी देर बाद जब चेतनाजी बहुत रो लीं, महेशजी ने उन्हें पानी पिलाया.

चेतनाजी पानी पी गिलास को रखती हुई बोलीं,”मेरी तो हमेशा से पूरी दुनिया ही बच्चे हैं पर उन की व्यस्त दुनिया में हमारे लिए समय ही नहीं. आप मुझे कितना समझाते थे, पर मैं ने आप की तरफ ध्यान ही नहीं दिया. सच कितनी खराब हूं मैं, कितने नाराज होंगे आप मुझ से. सब को प्यार देने के कारण आप को प्यार देने में भी कंजूसी करी. आप को सब से बाद में रखा. कभी दो घड़ी आप के लिए फुरसत नहीं निकाली.” चेतनाजी मानों आज पछता रही थीं.

महेशजी हंसते हुए बोले,”अरे, क्या मैं जानता नहीं तुम कितनी खराब हो…”

महेशजी के ऐसा बोलने से चेतनाजी ने उन्हें देखा तो उन की हंसी से समझ गई कि वे अभी भी उसे परेशान कर रहे हैं.

महेशजी मुसकराते हुए बोले,”तुम मुझे कितना प्यार करती हो यह बताने की जरूरत नहीं. हां, यह अलग बात है कि तुम ने कभी मुझे आई लव यू नहीं बोला,” कहते हुए उन्होंने चेतनाजी को हलकी सी आंख मारी. चेतनाजी इस उम्र में भी शर्म से लाल हो गईं.

महेशजी उन की आंखों में देखते हुए बोले,”पर तुम्हारे प्यार और त्याग के आगे बोलने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई. हमारे रिश्ते की यही खासियत तो इसे सब से अलग बनाती है, जहा कुछ कहने, सुनने, सफाई देने की जरूरत ही महसूस नहीं होती.”

चेतनाजी को महेशजी की बात से थोड़ा सुकून मिला. कप में पड़ी चाय ठंडी हो चुकी थी. वे कप उठाती बोलीं,”आप बैठो, तब तक मैं दूसरी चाय बना कर लाती हूं.”

जैसे ही वे उठने लगीं, एकदम से उन के घुटने में दर्द उठा. महेशजी ने उन्हें आंख दिखा चुपचाप बैठने को कहा और दर्द का तेल ले कर आए और उन के पास नीचे बैठ कर उन के घुटने की मालिश करने लगे. चेतनाजी ने मना भी किया पर महेशजी के गुस्से में छिपे प्यार के कारण कुछ नहीं बोलीं. चेतनाजी उन को देख रही थीं तो महेश जी बोले,”क्या देख रही हो?”

चेतना जी गहरी सांस लेती हुई बोलीं,”यही कि सारे रिश्तों के लिए जिस रिश्ते की परवाह नहीं करी फिर भी जिंदगी के हर मोड़ पर मेरा इतना साथ दिया.”

महेशजी जी बोले,”पगली, तेरामेरा रिश्ता है ही ऐसा. चाहे इस को हम रोज सीचें या न सीचें, यह तो किसी जंगली पौधे की तरह अपनेआप फलताफूलता है.”

महेशजी प्यार से चेतनाजी के घुटने की मालिश कर रहे. वे मालिश करते हुए बोले,”पूरी जिंदगी बच्चों और मेरे पीछे भागने का नतीजा है, जो आज इन घुटनों ने भी जवाब दे दिया.”

महेशजी के ऐसा बोलने से चेतनाजी जैसे अपनी यादों में कहीं खो गईंI वे महेशजी से बोलीं,”आप को याद है जब विवान घुटनों पर चलना सीख ही रहा था, कितना परेशान करता था मुझे. एक पल यहां तो एक पल वहां. मैं तो उस के पीछे भागतीभागती परेशान हो जाती थी.”

चेतनाजी की आंखों में आज भी बिलकुल वही चमक आ गई जैसी तब आई होंगी जब विवान घुटनों पर चलना सीख रहा था. महेशजी उन के घुटने में मालिश करते हुए बोले,”तभी तो उस के पीछे भागतेभागते खुद के घुटनों में दर्द करवा लिया और अब मालिश मुझ से करवा रही हो.”

चेतनाजी बनावटी गुस्से में बोलीं, “जाओ रहने दो, मालिश क्या कर रहे हो आप तो एहसान जता रहे हो.”

महेशजी हंसते हुए बोले,”गुस्सा तो तुम्हारी नाक पर बैठा रहता है पर आज भी सब का गुस्सा बस मुझ पर ही उतरता है. अरे बाबा, मैं तो मजाक कर रहा हूं. मेरा बस चले तो अपनी हीरोइन को पलकों पर बैठा कर रखूं.”

चेतनाजी उन्हें झिडकते हुए बोली,”कुछ तो शर्म करो, बुढ़ापा आ गया और यहां इन को दीवानगी सूझ रही है. अरे, किसी ने सुन लिया तो कहेगा कि बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम…”

महेशजी बोले,”बोलता है तो बोलने दो. अब मुझे किसी की परवाह नहीं. जवानी के दिनों तो हम ने घरगृहस्थी और जिम्मेदारियों में बिता दी, अब दो घड़ी फुरसत मिली तो ये पल भी गंवा दूं… सब की परवाह करते पहले ही बहुत कुछ गंवा चुका, अब गंवाने की भूल नहीं कर सकता,” कहते हुए वे चेतनाजी की गोद में किसी बच्चे की जैसे सिर रख लेट गए.

चेतनाजी को भी उन पर किसी बच्चे की ही तरह प्यार आया. वे उन के बालों में हाथ फिराने लगीं. महेशजी उन की गोद में लेटेलेटे ही बोले,”पता है, जब तुम विवान और बेटी नित्या में व्यस्त रहती, कितनी ही दफा मैं ने मूवी की टिकट, जो मैं कितना खुश हो ले कर आता था, बिना तुम्हें बताए फाड़ देता. घर पर मूड बना कर आता आज कैंडल लाइट डिनर करेंगे पर घर आता तो देखता कभी तुम बेटे की नैपी बदलने में व्यस्त हो तो कभी बेटी की पढ़ाई में.”

चेतनाजी को उन की आवाज में उन अनमोल पलों को खोने की कसक महसूस हो रही थी. उन्होंने उन के सिर को अपनी गोद से हटाया तो महेश जी बोले,”कभी तो 2 घड़ी मेरे पास बैठा करो, तुम को तो मेरे लिए फुरसत ही नहीं, अब कहां चल दीं?”

पर चेतनाजी बिना उन की सुने चल दीं. महेशजी तुनकते रहे. चेतनाजी जब आईं तो उन के हाथों में तेल था. महेश जी से बोलीं,”आप को तो उलटा पड़ने की आदत है. इधर आओ,” और वे कुरसी पर बैठ महेशजी के बालों में मालिश करने लगीं.

महेशजी बोले,”अरे, क्या कर रही हो, मुझे जरूरत नहीं. अभी तुम्हारे हाथों में दर्द हो जाएगा.

चेतना जी बोलीं,”अरे बाबा, मैं तो तुम्हारा कर्ज चुका रही हूं, नहीं तो सुनाते रहोगे.”

महेशजी रूठते हुए बोले,”बस, क्या इतना ही समझी मुझे?”

चेतनाजी उन्हें मनाती हुई बोलीं,”तुम भी न मजाक भी नहीं समझते. हर बात को गंभीरता से ले लेते हो और बच्चों की जैसे रूठ जाते हो. अब क्या बच्चों की जैसे मनाऊं भी…”

दोनों पतिपत्नी किसी बच्चे की तरह बेसाख्ता हंसने लगे. चेतनाजी उन के बालों में मालिश करती बोलीं,”याद है, जब मैं दोनों बच्चों के बालों में मालिश करती तो तुम कभीकभी गुस्सा हो कहते कि कभी तो मेरे बालों में भी कर दिया करो मालिश…और मुझे मलाल भी होता. मन बनाती आज तो इन की शिकायत दूर करूंगी और दोनों बच्चों से फ्री हो कर जब तुम्हारे पास तुम्हारे बालों में मालिश करने आती, तब तक तुम मेरे इंतजार में घोड़े बेच कर सो चुके होते. सच, जब तुम्हें देखती तो खुद पर गुस्सा भी आता.”

वे दोनों अपनी यादों में खोए थे, इतने में काली घटाएं छा गईं. चेतनाजी लड़खड़ाते कदमों से बाहर कपड़े उठाने को भागीं. मसाले भी धूप लगाने को रखे थे, वह भी उठाने थे. तब तक महेशजी रसोई में चाय बनाने लगे, साथ में विवान के लिए बनाए लड्डू और मठरी भी ले आए. अब तो चेतनाजी भी कुछ नहीं कहेंगी, नहीं तो उन को हाथ भी नहीं लगाने देतीं, कहतीं कि सब तुम ही खा जाओगे, कुछ विवान के लिए भी छोड़ोगे क्या?

पर अब जब विवान ही नहीं आ रहा तो किस के लिए बचाती. महेशजी ने चेतनाजी को चाय पकड़ाई और दोनों बरामदे में रखे झूले पर बैठ गए. बाहर बारिश शुरू हो गई थी.

महेशजी बोले,”याद है, तुम्हारा कितना मन था इस झूले को घर लाने का? इस पर हम दोनों बैठे, गप्पें लड़ाएं, चाय पिएं. मैं कितनी खुशी से यह झूला लाया था, तुम भी इसे देख कितना खुश थीं पर कसक मन में ही रह गई. कभी तुम बच्चों के टिफिन में व्यस्त, कभी चूल्हेचौके में. मैं अकेला चाय पी लेता और तुम भी ठंडी चाय एक घूंट में खत्म कर जाती और यह झूला हमारा और हमारी फुरसत में बिताए पलों का इंतजार ही करता रह गया.”

महेशजी मठरी खाते बोले,”तुम्हारे हाथों में तो आज भी जादू है,” कह उन्होंने चेतनाजी के हाथ चूम लिए. आज चेतनाजी ने भी अपना हाथ नहीं छुड़ाया. महेश जी उन के हाथों को अपने हाथ में ले बोले,”बेटे के बहाने सही, कम से कम मुझे लड्डू और मठरी तो खाने को तो मिल रहे हैं. नहीं तो मैं तो स्वाद ही भूल गया था.”

भले महेशजी ने यह बात मजिक में कही थी, पर आज चेतनाजी को भी बहुत दुख हुआ. आज उन्होंने भी महेशजी को खाने से नहीं रोका. उन को तो आज महेशजी को यों खाते देख तसल्ली सी मिल रही थी, साथ ही दुख भी था. हमेशा बच्चों की पसंद के आगे उन की पसंद पर ध्यान ही नहीं दिया. वे कुछ बनाने को कहते तो बस यही कहती कि बच्चों को यह सब पसंद नहीं. और महेशजी भी बच्चों की पसंद में ही खुश हो जाते.

बाहर बारिश जोर पकड़ चुकी थी. इधर महेशजी और चेतनाजी अपने यादों में डूब चाय की चुसकियां ले रहे थे. चेतना जी बोलीं,”मुझ से ही क्या कह रहे हो, इधर जब बच्चे बड़े हो रहे, अपनी अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गए और जब मुझे थोड़ा समय मिला तो तुम अधिकतर काम से बाहर रहने लगे.”

महेशजी भी उन दिनों को याद करते हुए बोले,”क्या करता चेतना, बच्चों की भविष्य के लिए काम भी तो ज्यादा करना था. उन की पढ़ाई, उनकी शादियां…”

चेतनाजी चाय के खाली कप और प्लेट रखते हुए बोलीं,”सच, आप के बिना न जाने कितनी रातें तकिए पर करवटें बदलते बिताई. बच्चों के पास जाती तो वे बेचारे अपनी पढ़ाई में व्यस्त. सच, कितनी बातें होतीं तुम से साझा करने को और ये बातें भी तो दगाबाज होती हैं. जब आप होते तो या तो याद ही नहीं रहती या बताने को समय नहीं होता और जब आप नहीं होते तो सोचती आप आओगे तो यह कहूंगी, आप आओगे तो वह कहूंगी. और जब आप आते तो या तो मैं व्यस्त या आप व्यस्त. सच, जिंदगी के कितने ही अनगिनत पल यों ही गंवा दिए. हर रिश्ते को संवारने में अपने रिश्ते को बेतरतीब कर दिया.”

महेशजी को चेतनाजी की आंखों में कसक और नमी साफ दिख रही थी. वे चेतनाजी का हाथ अपने हाथों में ले बोले,”फिर भी देखो, जब सारे रिश्ते बेतरतीब हो गए, तो हमारा रिश्ता ही सब से ज्यादा संवर गया. पहले तुम कितना भिनभिनाती थीं. 1 कप चाय भी नहीं बनाती थीं और अब हमारी महारानीजी को बैड टी के बिना उठने की आदत नहीं.”

दोनों बातों में मशगूल थे कि तभी चेतनाजी शरमाती हुई बोलीं,”पता है, आज गाने की ये पंक्तियां बिलकुल हमारे रिश्ते पर सटीक बैठती हैं…”

महेशजी ने आंखों से ही जैसे पूछा, कौनसा गाना?

चेतना जी महेशजी को देख कर गुनगुनाने लगीं,”आखिर तुम्हें आना है, जरा देर लगेगी…”

उस गाने को आगे बढ़ाते महेशजी बोले,”बारिश का बहाना है, जरा देर लगेगी…”

दोनों एकदूसरे से सिर सटा कर हंसने लगे. महेशजी हंसते हुए बोले,”सही कहा, देरसवेर ही सही, हमें एकदूसरे के पास ही आना है. इसी बात पर आज तो प्याज के पकोड़े हो जाएं. बारिश में मजा आ जाएगा.”

वे उठ कर रसोई में जा ही रही थीं कि तभी उन की बेटी नित्या का फोन का फोन आ गया,”पापा, मैं कल आ रही हूं, कुछ दिन आप के पास ही रहूंगी, मां से कहना कि अब रोज उन के हाथों का स्वादिष्ठ खाना चाहिए.”

फोन स्पीकर पर ही था. महेशजी अपनी बेटी से बोले,”बेटा, तेरी मां सब सुन रही है तू खुद ही बोल दे.”

नित्या बोली,”मां, तुम्हें तो मेरी पसंदनापसंद पता ही हैँ न…”

चेतनाजी हंसती हुई बोलीं, “हां बेटा, तू बस जल्दी आजा, सब तेरी पसंद का बनेगा.”

फोन कट चुका था, चेतना जी बोलीं,”सुनोजी, अब कोई पकोड़े नहीं. मैं कुकर में खिचड़ी चढ़ा रही हूं. कल से वैसे ही सब आप की बेटी की पसंद का खाना बनेगा और दोनों बापबेटी मेरी सुनोगे नहीं. थोड़ा अपनी सेहत का भी सोचो. और हां, अब काम करने दो, आप को तो कोई काम नहीं पर यहां तो 70 काम हैं,” यह कहती वे रसोई की तरफ बढ़ गईं. बेटी की आने की खुशी उन के चेहरे के साथ उन की चाल में भी झलक रही थी.

महेशजी चेतनाजी को जाते देख गाने लगे,”आखिर तुम्हें आना है…”

उन की बात काटती चेतनाजी बोलीं,”तुम्हें नहीं… हमें, आखिर हमें आना है…जरा देर लगेगी…”

दोनों की हंसी की आवाज से पूरा घर खनक रहा था. जो घर बेटे के नहीं आने से कुछ देर पहले उदास था, वही घर अब बेटी के आने से खुश था. इधर महेशजी के मोबाइल पर विवान का मैसेज आया,”पापा, अब तो मां खुश है न, दीदी को बताया तो वे बोलीं कि चिंता मत कर मैं हूं न…”

महेशजी ने विवान को खुश रहने का आशीर्वाद दिया और दिल की इमोजी भेजी. सच, बच्चों के इतनाभर करने से मांबाप झट से सब भूल जाते हैं.

तभी रसोई से चेतनाजी बोलीं,”अब यह मोबाइल में क्या खिचड़ी पका रहे हो, इधर आ कर जरा हाथ बंटा दो.”

महेशजी उठते हुए बोले,”खिचड़ी मैं नहीं तुम पका रही हो…” और दोनों फिर हंसने लगे.

मैं 4 साल छोटे लड़के से प्यार करती हूं, क्या करूं?

सवाल
मैं तलाकशुदा हूं. मेरे 3 बच्चे हैं. मैं 4 साल छोटे लड़के से प्यार करती हूं. हम दोनों ने चुपके से शादी की. अब वह मुझ से दूरदूर भागने लगा है जिस की वजह से मैं बहुत परेशान रहती हूं. मेरा दिल करता है कि आत्महत्या कर लूं मगर बच्चों के लिए जी रही हूं. मेरे पास जो कुछ था, जमीनजायदाद, पैसा, सबकुछ मैं उस को दे चुकी हूं. अब वह मुझ से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहा है. जबकि मैं उस से बहुत प्यार करती हूं. अब वह किसी और से शादी करने वाला है. दिनोंदिन मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है.

जवाब
आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं. यह सच है कि आप की समस्या की वजह स्वयं आप हैं, पर इस समस्या से निकलने और आगे बढ़ने का मार्ग भी आप को ही ढूंढ़ना पड़ेगा. सब से पहले तो यह समझ लीजिए कि प्रेम अंधा होता है. इस अंधे प्रेम में ही आप यह नहीं देख सकीं कि वह युवक आप से क्या चाहता है.

अब तक आप ने अपने दिल की बहुत सुन ली. अब आप को अपने बच्चों के बारे में सोच कर फैसले लेने चाहिए. उस लड़के का खयाल पूरी तरह से अपने दिल से निकाल दीजिए. आप ने उस लड़के से चुपके से शादी की थी तो जाहिर है कि आप उस पर किसी तरह का हक नहीं जता सकतीं. शुरुआत में ही कुछ भी देते समय आप को लिखित कागजी कार्यवाही करनी चाहिए थी. पर चूंकि आप ने ऐसा नहीं किया, तो अब अच्छा यही होगा कि उसे पूरी तरह भूल कर सिर्फ अपने बच्चों के लिए जीने का प्रयास करें और नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करें.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

हरी लाल चूड़ियां : कामवाली बाई सुन्दरी की कहानी

मेरी कामवाली बाई सुन्दरी हफ्ते में एकाध दिन तो काम से गायब ही रहती थी, मगर एक अच्छी बात उसमें थी कि जिस दिन वह नहीं आती थी, उस दिन अपनी बेटी या बहू को काम करने के लिए भेज देती थी. मेरा परिवार मेरठ शहर में नया आया था. पति सिंचाई विभाग में अधिकारी थे. सरकारी नौकरी थी. दो-तीन साल में ट्रांस्फर होता ही रहता था. पहले तो वे अकेले ही आए थे, फिर जब रहने के लिए ठीक-ठाक घर किराए पर मिल गया, तो मुझे और दोनों बच्चों को भी ले आए. बच्चे अभी छोटे थे. माधवी दो साल की थी और राहुल पांचवे साल में चल रहा था. दोनों बच्चों के साथ नए घर में सामान एडजेस्ट करना मुश्किल टास्क था. फिर झाड़ू-पोछा, बर्तन-खाना मेरे अकेले के बस की बात न थी. इसलिए नौकरानी की जरूरत तो थी ही. कई दिनों की खोजबीन के बाद पीछे की मलिन बस्ती से यह सुन्दरी मिली थी.

सुन्दरी नाम की ही सुन्दरी थी, रंग ऐसा कि छांव में खड़ी हो तो नजर ही न आए. हां, सज-संवर कर खूब रहती थी. माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी, लाल चटख सिंदूर से पूरी भरी हुई मांग, दोनों हाथों में दर्जन-दर्जन भर चूड़ियां, गले में लंबा सा मंगलसूत्र, पांव में बिछिया, पायल पूरे सोलह सिंगार के साथ काम पर आती थी. हम तो चाह कर भी सुहाग का पूरा श्रृंगार नहीं कर पाते थे. बस बिन्दी भर लगा ली. यही बहुत था.

सुन्दरी स्वभाव की नरम थी और काम में तेज. ऐसी ही उसकी बहू और बेटी भी थीं. सुन्दरी छुट्टी करती तो उसकी बेटी सुकुमारी ही ज्यादा आती थी. सुकुमारी सांवले रंग की भरी-भरी सी लड़की थी. उम्र यही कोई सत्रह-अट्ठारह बरस की होगी. सुन्दरी जितनी सजधज के साथ आती थी, उसकी बेटी सुकुमारी उतनी ही साधारण वेशभूषा में रहती थी. हल्के रंग का सलवार-कुरता, सीने पर ठीक से ओढ़ा हुआ दुपट्टा, तेल लगे बालों की कस की गुंथी हुई लंबी चोटी और श्रृंगार के नाम पर आंखों में काजल तक नहीं. सुन्दरी जितनी बकर-बकर करती थी, उसके उलट उसकी बेटी बड़े शांत स्वभाव की थी. चुपचाप पूरे घर का काम चटपट निपटा देती थी.

मैं नोटिस करती थी कि अक्सर झाड़ू-पोछा करते वक्त सुकुमारी मेरी ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने चंद सेकेंड रुक कर अपने को जरूर निहारती थी. मैं उसे देखकर मन ही मन मुस्कुरा देती थी. जवान लड़की थी, मन में भविष्य के रंगीन सपने डोलते होंगे. हर लड़की के मन में इस उम्र में सपनों की तरंगें डोलती हैं. ड्रेसिंग टेबल के कोने में रखे चूड़ीदान में लटकी रंग-बिरंगी चूड़ियों की तरफ भी सुकुमारी का विशेष आकर्षण दिखता था. कभी-कभी मैं सोचती कि सुन्दरी खुद तो इतनी साज-संवार के साथ रहती थी, उसकी बहू भी पूरा श्रृंगार करके आती थी, मगर बेटी के कान में सस्ती सी बाली तक नहीं डाली थी उसने.

एक दिन मैं कमरे में पलंग पर बैठी अपनी बेटी माधवी के साथ खेल रही थी. सुकुमारी फर्श पर पोछा लगा रही थी. पोछा लगाते हुए जब वह ड्रेसिंग टेबल के सामने पहुंची तो चूड़ीदान की चूड़ियों में उसकी नजर अटक गई. मैंने हौले से उसे पुकारा, ‘सुकुमारी…’

वह अचकचा कर खड़ी हो गई, ‘जी, मेमसाब…’

‘जरा वह ड्रॉर खोलना… देखो उसमें एक डिब्बा है… निकाल कर दो…’ मैंने ड्रेसिंग टेबल की ड्रॉर की तरफ इशारा करके कहा.

वह जल्दी से डिब्बा निकाल लायी. मैंने डिब्बा उसके हाथ में रख दिया. नई चूड़ियों का डिब्बा था. मंहगी लाख की चूड़ियां थीं, हरी-लाल जड़ाऊं चूड़ियां. मैंने सोचा पहनती तो हूं नहीं, उसे ही दे दूं. जब से खरीदी हैं, यूं ही डिब्बे में बंद पड़ी हैं.

सुकुमारी ने पहले तो डिब्बा लेने में आनाकानी की, मगर मेरे इसरार पर उसने रख लिया. जाते वक्त बड़ी प्यारी मुस्कान मुझ पर और बच्चों पर डाल कर गयी. मेरे दिल को खुशी हुई. किसी के होंठों पर मुस्कान लाने की खुशी और तसल्ली.

दूसरे दिन उसकी मां सुन्दरी आयी तो उसके हाथ में चूड़ियों का वही डिब्बा था. आते ही बोली, ‘मेमसाब, ये लीजिए अपनी चूड़ियों का डिब्बा…’

मैंने हैरानी जताते हुए कहा, ‘पर ये तो मैंने कल सुकुमारी को दिया था…’

‘मेमसाब, आप ये श्रृंगार की चीजें उसको कभी मत दीजिएगा, वह बाल-विधवा है, श्रृंगार करना उसके लिए पाप है. हमारे में विधवा इन्हें छू भी ले तो नरक में जाती है…’ कह कर वह डिब्बा ड्रेसिंग टेबल पर पटकर कर अपने काम में लग गयी. मैं जड़वत् खड़ी कभी डिब्बे को निहारती तो कभी सुन्दरी को… बहुत सारे सवाल मन में घुमड़ रहे थे… उन सब पर सुन्दरी एक जवाब ठोंक कर चल दी, ‘मेमसाब, उसे जीवनभर ऐसे ही रहना है बिना श्रृंगार के… आप इत्ता मत सोचो… ये उसकी तकदीर में लिखा है… ’

और मैं सोचती रह गई, ‘उम्र ही क्या है उसकी? क्यों मार दिये उसके सपने? क्यों खत्म कर दी उसकी जिन्दगी? किसने लिखी है उसकी तकदीर…?’

आपके बेली बटन से डिस्चार्ज निकलने का क्या कारण है?

आपने कभी कभार नोटिस किया होगा की आपकी नाभी में बिना कुछ किए भी इतना मैल या फिर रूई सी कहां से आ जाती है। ऐसा वातावरण में होने वाले प्रदूषण और धूल मिट्टी के कारण होता है। अगर आप नाभी को समय से साफ नहीं करते हैं तो इसमें से एक अलग सी बदबू आने लगती है और एक डिस्चार्ज भी निकलने लगता है। अगर आप इसे ऐसे ही रहने देते हैं तो इससे कई तरह के इन्फेक्शन का खतरा भी बढ़ सकता है। इस डिस्चार्ज का रंग अलग अलग होता है जैसे यह सफेद, ब्राउन, पिला या खून जैसा हो सकता है। आइए जानते हैं इसके बारे में।

बैली बटन डिस्चार्ज के क्या कारण हैं?
बैक्टिरियल इन्फेक्शन : आपकी नाभी में बहुत सारे बैक्टीरिया इकठ्ठे हो जाते हैं और इन्हें अगर समय से ठीक नहीं किया जाए तो यह इन्फेक्शन का कारण भी बन सकते हैं। अगर आपने यहां पियर्सिंग करा रखी है तो भी इन्फेक्शन हो सकता है। यह डिस्चार्ज पीला या फिर हरे रंग का हो सकता है। इसमें कभी कभार सूजन भी आ सकती है और इसमें दर्द भी हो सकता है।

यीस्ट इन्फेक्शन : कैंडिडा एक तरह की यीस्ट होती है जो शरीर के डार्क हिस्सों में इकठ्ठी हो सकती है और इसकी वजह से आपको इन्फेक्शन हो सकता है। अगर आप नाभी को साफ नहीं रखते हैं तो यहां भी यह इन्फेक्शन हो सकता है। इसकी वजह से आपको लाल रैश हो सकते हैं और इनमें खुजली होने के साथ साथ डिस्चार्ज भी निकल सकता है।
सर्जरी : अगर आपकी हाल ही में सर्जरी हुई है खास कर पेट से जुड़ी हुई कोई सर्जरी या फिर हर्निया आदि तो भी आपको नाभी के इन्फेक्शन का रिस्क ज्यादा हो सकता है। अगर आपको नाभी से एक फ्लूड निकलता हुआ दिखता है तो आपको तुरंत डॉक्टर को बताना चाहिए क्योंकि यह इन्फेक्शन के कारण भी हो सकता है।
एपिडर्मोईड सिस्ट : यह सिस्ट शरीर में सबसे ज्यादा आम पाया जाता है। यह आपकी नाभी में भी हो सकता है। इन सिस्ट की कैविटी में केराटिन भरा हुआ होता है। इस सिस्ट के बीच में आपको एक ब्लैक हेड भी देखने को मिल सकता है। अगर यह सिस्ट इंफेक्टेड हो जाता है तो इसमें से एक फ्लूड और डिस्चार्ज निकल सकता है।

इलाज
बैली बटन के डिस्चार्ज को ठीक करने के लिए आप एंटी फंगल क्रीम या फिर पाउडर का प्रयोग कर सकते हैं। आपको हर समय अपनी नाभी को क्लीन और ड्राई रखना होगा। अगर आपको बैक्टिरियल इन्फेक्शन हो गया है तो आपके डॉक्टर आपको एंटी बायोटिक दवाई भी दे सकते हैं। अगर आपको डायबिटीज जैसी स्थिति है तो अपने डॉक्टर को जरूर बता दें क्योंकि इसके लिए आपके डॉक्टर आपको दूसरी दवाई दे सकते हैं।

अगर आपको सिस्ट है और वह ज्यादा गंभीर होता जाता है तो उसे निकालने के लिए सर्जरी का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा आपको भी अपने शरीर के हाइजीन का ख्याल रखना पड़ेगा। आप नाभी को रोजाना साबुन और पानी से धो सकते हैं ताकि यह हमेशा साफ और सुखी हुई रह सके।

निष्कर्ष
तो यह थे कुछ ऐसे कारण जिनकी वजह से आपकी नाभी से डिस्चार्ज निकल सकता है। हालांकि इस के पीछे की वजह जान कर इसे ठीक करना भी काफी जरूरी होता है नहीं तो इन्फेक्शन और ज्यादा बढ़ सकता है। नहाने के बाद भी रोजाना नाभी को अच्छे से साफ करें और पोंछ लें।

प्रतिष्ठा की पराजय : रमादेवी को क्यों अपनी जिद को तिलांजलि देनी पड़ी

पूरा घर ही रमादेवी को अस्तव्यस्त महसूस हो रहा है. सोफे के कुशन बिखरे हुए, दीवान की चादर एक कोने से काफी नीची खिंची हुई मुड़ीतुड़ी और फर्श पर खुशबू व पिंकू के खिलौने बिखरे हुए थे. काम वाली महरी नहीं आई, इसीलिए घर की ऐसी हालत बनी हुई थी. वैसे, उन का दिल तो चाह रहा था कि उठ कर सब कुछ व्यवस्थित कर दें, लेकिन यह घुटने का दर्द…उफ, किसी दुश्मन को भी यह बीमारी न लगे. हड़बड़ाती सी सुलभा औफिस जाने के लिए तैयार हो कर आई. सामान सहेजते हुए वह निर्देश भी देती जा रही थी, ‘‘मांजी, खुशबू को दूधभात खिला दिया है और पिंकू को दूध पिला कर सुला दिया है. उसे याद से 3-3 घंटे बाद दूध दे देना. आया आज छुट्टी पर है. सब्जी मैं ने बना दी है, फुलके बना लेना. अब मुझे समय नहीं है.’’

हवा की गति से सुलभा कमरे से बाहर चली गई और पति आलोक के साथ अपने दफ्तर की ओर रवाना हो गई. रमादेवी सबकुछ देखतीसुनती ही रह गईं. बोलने का अधिकार तो वह स्वयं ही अपनी जिद के कारण खो चुकी थीं. सच, वे कितनी बड़ी भूल कर बैठीं. अपनी झूठी शान के लिए लोगों पर प्रभाव डालने के प्रयास में उन्होंने कितना गलत निर्णय ले लिया. विचारों के भंवर में डूबतीउतराती वे पिंकू के रोने की आवाज सुन कर चौंकीं. पलंग से उतरने की प्रक्रिया में ही उन्हें 2-3 मिनट लग गए. घुटने को पकड़ कर शेष टांग को दूसरे हाथ से धीरेधीरे मलते हुए वे पैर को जमीन पर रखतीं. बहुत दर्द होता था, कभीकभी तो हलकी सी चीख भी निकल जाती. पैर घसीटते हुए वे पिंकू के पास पहुंचीं. कहना चाहती थीं, ‘अरे, राजा बेटा, इतनी जल्दी उठ गया?’ लेकिन दर्द से परेशान खीजती हुई बोल पड़ीं, ‘‘मरदूद कहीं का, जरा आराम नहीं लेने देता, सारा दिन इस की ही सेवाटहल में लगे रहो.’’

पिंकू, दादी की गोद में बैठ कर हंसनेकिलकने लगा तो रमादेवी को अपने कहे शब्दोें पर ग्लानि हो आई, ‘इस बेचारी नन्ही जान का क्या कुसूर. दोष तो मेरा ही है. मेरे ही कारण बहू अपने नन्हे बच्चों को रोता छोड़ नौकरी पर जाती है. मेरी ही तो जिद थी.’ अपनी इकलौती संतान आलोक  की रमादेवी ने बहुत अच्छी परवरिश की थी. मांबाप के प्रोत्साहन से सफलता की सीढि़यां चढ़ते हुए इंजीनियरिंग की डिगरी प्राप्त  की थी. जल्दी ही उसे एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी मिल गई थी. आलोक की शादी के लिए रमादेवी ने जो सपने बुने थे उन में से एक यह भी था कि वह नौकरी करने वाली बहू लाएंगी. जब पति ने तर्क रखा कि उन्हें आर्थिक समस्या तो है नहीं, फिर बहू से नौकरी क्यों करवाई जाए, तो वे उत्साह से बोली थीं, ‘आप को मालूम नहीं, नौकरी करने वालों का बड़ा रोब रहता है. अपने महल्ले की सुमित्रा की बहू नौकरी करती है. सभी उसे तथा उस की सास को इतना सम्मान देते हैं मानो उन की बराबरी का हमारे महल्ले में कोई हो ही न.’

‘लेकिन उन की तो आर्थिक स्थिति कमजोर है. सुमित्रा के पति भी नहीं हैं तथा उन के बेटे की कमाई भी इतनी नहीं कि परिवार का खर्च आसानी से चलाया जा सके. मजबूरन आर्थिक सहायता के लिए उन की बहू नौकरी करती है. दोहरे कर्तव्यों के बोझ से वह बेचारी कितना थक जाती होगी. उस की कर्तव्यपरायणता के कारण ही सब उस की तारीफ करते हैं,’  पति ने समझाया था. ‘यह आप का खयाल है. मैं कुछ और ही सोचती हूं. हमारे खानदान में किसी की भी बहू नौकरीपेशा नहीं है. सोचो जरा, सभी पर हमारी धाक जमेगी कि हम कितने खुले विचारों वाले हैं, आधुनिक हैं, बहू पर कोई बंधन नहीं लगाते. इस का रोब लोगों पर पड़ेगा.’

‘तुम्हारी मति मारी गई है. लोगों पर रोब जमाने की धुन में अपने घर को कलह, तनाव का मैदान बना लें? सोचो, अगर बहू सारा दिन बाहर रहेगी तो तुम्हें उसे लाने का क्या फायदा होगा? न वह तुम्हारे साथ बैठ कर ठीक से हंसबोल सकेगी और न घर के कामों में मदद कर सकेगी,’ पति ने फिर से समझाने की कोशिश की. ‘घर के काम के लिए नौकरानी रख लेंगे. रही बात हंसनेबोलने की, तो शाम 6 बजे से रात तक क्या कम समय होता है?’

‘तुम से तो बहस करना ही व्यर्थ है’, कह कर पति चुप हो गए. आलोक के लिए लड़कियां देखने की प्रक्रिया जारी थी. रमादेवी ने कई अच्छी, शिक्षित लड़कियों को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे नौकरी नहीं करती थीं. आरंभ से ही घर में रमादेवी का दबदबा था, इसलिए पति व पुत्र उन के हर प्रस्ताव को मानने में ही अपनी खैर समझते थे. संयोग से जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत सुलभा सभी को पसंद आ गई. रमादेवी को तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई. खूबसूरत, कुलीन घर की बेटी और फिर अच्छी नौकरी पर लगी हुई. आननफानन बात पक्की कर दी गई. खूब धूमधाम से शादी हुई. सुलभा ने महीनेभर की छुट्टियां ली थीं. नवदंपती शादी के बाद 15 दिनों के लिए मधुमास मनाने पहाड़ों पर चले गए.

घर लौटने पर एक दिन रमादेवी ने कहा, ‘सुलभा, पहली तारीख से तुम अपनी ड्यूटी शुरू कर लो,’ उन के आदेश से सभी चौंक गए. सभी का विचार था, वे अपनी जिद भूल चुकी होंगी, लेकिन उन का सोचना गलत निकला. ‘मांजी, आप को तकलीफ होगी. मैं सवेरे 10 बजे से शाम 6 बजे तक बाहर रहूंगी. घर का सारा काम…आप के अब आराम के दिन हैं. मैं आप की सेवा करना चाहती हूं,’ पति के सुझाए विचार सुलभा ने व्यक्त कर दिए. आलोक व पिता ने सोचा, अब रमादेवी अपनी जिद छोड़ निर्णय बदल लेंगी लेकिन जब उन्होंने उन का उत्तर सुना तो मन मार कर रह गए. वे बोलीं, ‘बहू, तुम मेरी तकलीफ की चिंता मत करो. मैं घर के सारे कार्यों के लिए नौकरानी का प्रबंध कर लूंगी. तुम बेफिक्र हो कर नौकरी करो. आजकल तो अच्छी नौकरी प्रतिष्ठा का प्रतीक है. हमारा भी तो मान बढ़ेगा.’

सभी को हथियार डालने पड़े थे. सुलभा पूर्ववत नौकरी पर जाने लगी थी. ‘सुलभा, कमाल है. इतने संपन्न घराने में ब्याह होने के बाद भी तुझे नौकरी की जरूरत है, समझ नहीं आता,’ औफिस में एक दिन वीणा ने कहा. ‘हां भई, अब तो नौकरी का चक्कर छोड़ो और अपने मियां तथा सासससुर की सेवा करो. इकलौती बहू हो,’ कल्पना ने भी मजाक किया. जब सुलभा ने उन्हें असलियत बताई तो वे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकने लगीं कि अजीब सनकी सास है. लेकिन प्रत्यक्ष में वीणा बोली, ‘हाय सुलभा, तेरी सास तो बड़ी दिलेर है, जो सारी जिम्मेदारियां स्वयं उठा कर तुझे 8 घंटे के लिए आजाद कर देती है.’

‘हां, इस के तो मजे हैं…न खाना बनाना, न घर के कामों की चखचख. शान से औफिस आओ और घरवालों पर रोब जमाओ.’ लेकिन सुलभा को उन की बातों से कोई प्रसन्नता नहीं हुई. न चाहते हुए भी उसे मजबूरी में यह नौकरी करनी पड़ रही थी. शाम को थकहार कर जब वह लौटती तो दिल करता कि कुछ देर पलंग पर लेट कर आराम करे लेकिन संकोच के मारे ऐसा न कर पाती कि सास, पति क्या सोचेंगे? शादी से पहले वक्त काटने के लिए वह नौकरी करती थी. घर लौटते ही मां चाय की प्याली व कुछ नाश्ते से उस की दिनभर की थकान दूर कर देती थीं. कुछ देर आराम करने के पश्चात वह किसी भी सहेली के घर गपशप  के लिए चली जाती थी. मां ही सारी रसोई संभालती थी. लेकिन मायके तथा ससुराल के रीतिरिवाजों, कार्यप्रणाली वगैरा में काफी फर्क होता है, यहां तो 8 बजे ही रात का खाना भी खा लिया जाता था, सो रसोई में मदद करना जरूरी था.

शादी से पहले सुलभा का विचार था कि संपन्न घराने में तो उस से नौकरी करवाने का प्रश्न ही नहीं उठेगा. फिर वह अपने सारे शौक पूरे करेगी, घर को अपनी पसंद के अनुसार सजाएगी, बगीचे को संवारेगी, अपने चित्रकारी के शौक को उभारेगी. पति व सासससुर की सेवा करेगी. एक आदर्श पत्नी और बहू बन कर रहेगी. लेकिन यहां तो उसे किसी भी शौक को पूरा करने का समय ही नहीं मिलता था, फिर धीरेधीरे नौकरी की मजबूरी एक आदत सी बनती चली गई. खुशबू के जन्म के समय कंपनी की

ओर से 3 महीने की छुट्टियां मिली थीं, सुलभा का जी चाहता रहा कि मांजी कहें, ‘अब नौकरी को छोड़ो अपनी गृहस्थी को संभालो.’ लेकिन उस की आस दिल में ही रह गई, जब रमादेवी ने घोषणा की, ‘खुशबू के लिए आया का प्रबंध कर दिया है, वैसे मैं भी सारा दिन उस के पास ही रहूंगी.’ दिन सरकते गए. बेशक खुशबू  के लिए आया रखी गई थी, लेकिन उसे संभालती तो रमादेवी स्वयं ही थीं. आया तो उसे नहलाधुला, दूध पिला, घर का ऊपरी काम कर देती थी.

पोती को हर समय उठाए रमादेवी इधरउधर डोलती रहतीं. महल्ले में घूमघूम कर सब पर रोब डालतीं, ‘मेरी बहू तो हर पहली को 2 हजार रुपए मेरे हाथों में सौंप देती है. हम ने तो उसे बेटी की तरह पूरी सुखसुविधाएं और आजादी दे रखी है. आखिर बहू भी किसी की बेटी होती है. हम भी उसे क्यों न बेटी मानें?’ खुशबू के नामकरण के अवसर पर एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया गया था, जिस में शहर के प्रतिष्ठित लोगों के साथसाथ समाज, बिरादरी, महल्ले के तथा सुलभा के सहकर्मियों को भी आमंत्रित किया गया. रमादेवी समारोह में पूरी तरह से इस प्रयास में लगी रहीं कि उन की बहू की अच्छी नौकरी से अधिकाधिक लोग प्रभावित हों और उन का रोब बढ़े. सुलभा अब नौकरीपेशा जीवन की अभ्यस्त हो गई थी, बल्कि अब उसे नौकरी करना अच्छा लगने लगा था, क्योंकि सुबहशाम खाने का पूरा काम मांजी व आया मिल कर कर लेती थीं. घर लौटने पर चाय पी कर वह खुशबू के साथ मन बहलाव करती. उसे दुलारती, तोतली भाषा में उस से बतियाती, अपनी ममता उस पर लुटाती. घर में खुशबू एक खिलौना थी, जिस से सारे सदस्य अपना मन बहलाते.

2 वर्ष पश्चात पिंकू का जन्म हुआ तो जैसे घर दोगुनी खुशियों से आलोकित हो उठा. रमादेवी तो जैसे निहाल हो उठीं. पहले पोती और अब पोता, उन की मनोकामनाएं पूर्ण हो गई थीं. जैसे संसारभर की खुशियां सिमट कर उन के दामन में आ गई हों. सुलभा के औफिस जाने पर अब वे पोते को गोद में ले कर, खुशबू की उंगली पकड़ घूमतीं. उन्हें खिलातीपिलातीं, बतियातीं. कुछ उम्र का तकाजा और कुछ शारीरिक थकान, अधिक काम की वजह से अब रमादेवी जल्दी थकने लगीं. एक दिन दोनों बच्चों को लिए सीढि़यां उतर रही थीं कि पैर फिसल गया. यह तो गनीमत रही कि बच्चों को ज्यादा चोट नहीं आई, लेकिन उस दिन से उन के घुटने का दर्द ठीक नहीं हुआ. हर तरह की दवा ली, मालिश की, सेंक किया, लेकिन दर्द बना ही रहा. अब तो बच्चों को संभालना भी मुश्किल सा हो गया. आया आती तो थी लेकिन अपनी मनमरजी से ही कार्य करती थी. कभी पिंकू भूख से बिलबिलाता तो दूध ही नदारद होता. कभी खुशबू की खिचड़ी की मांग होती और आया आगे दलिया रख छुट्टी कर जाती. बच्चे चीखतेचिल्लाते तो रमादेवी स्वयं उठ कर उन्हें खिलाना चाहतीं लेकिन घुटने के दर्द से कराह कर फिर बैठ जातीं.

जिस दिन घर के काम के लिए महरी भी न आती उस दिन तो पूरा घर ही अस्तव्यस्त हो जाता. आया तो मुश्किल से बच्चों का ही काम निबटाती थी. उस की मिन्नतें कर के थोड़ाबहुत काम वे करवा लेतीं. शेष तो सुलभा को ही करना पड़ता. रमादेवी अब अकसर सोचतीं, ‘बहू बेचारी भी क्याक्या करे. दफ्तर संभाले, बच्चों की देखरेख या नौकरी करे?’ रमादेवी ने सोचा, अगर पति या बेटा कहे अथवा बहू खुद ही नौकरी छोड़ने की बात करे तो वे फौरन तैयार हो जाएंगी. लेकिन कोई इस प्रश्न को उठाता ही नहीं. शायद उन की परीक्षा ले रहे हैं या उन की जिद, झूठी प्रतिष्ठा का परिणाम उन्हें दिखाना चाहते थे. अब उन्हें स्वयं की भूल महसूस हो रही थीं. सुलभा के बच्चों की परवरिश ठीक ढंग से नहीं हो रही है, यह भी वे समझ रही थीं. मां के होते भी बच्चे उस का पूरा स्नेह, दुलार नहीं पा रहे थे. उस के औफिस से लौटने पर पिंकू अकसर सोया हुआ मिलता. खुशबू भी आया के साथ कहीं घुमने या बगीचे में गई होती. यह तो एक तरह से अन्याय था. बच्चों के प्रति मां को अपने कर्तव्यों से विमुख कराना अपराध ही तो था.

नहीं, अब और अन्याय वे नहीं होने देंगी. उन की तानाशाही के कारण ही सभी सदस्य चुपचाप अपने मानसिक तनावों में ही जबरन घुटघुट कर जी रहे हैं. उन के सामने कोई कुछ नहीं प्रकट करता, लेकिन वे इतने समय तक कैसे नहीं समझ पाईं? अचानक औफिस से लौटती सुलभा का कुम्हलाया चेहरा आंखों के सामने घूम गया. बेचारी को व्यर्थ ही नौकरी के जंजाल में फंसा दिया. यही तो उस के हंसनेखेलने के दिन हैं, लेकिन उन्होंने उसे बेकार के मानसिक तनावों में उलझा दिया. रमादेवी ने निर्णय ले लिया कि अब वे अपनी झूठी प्रतिष्ठा, रोबदाब को तिलांजलि देंगी. शाम सुलभा के औफिस से लौटने पर कह देंगी, ‘अब अपना घर, बच्चे संभालो. नौकरी की कोई आवश्यकता नहीं है.’ उन के निर्णय से सभी को आश्चर्य तो होगा ही, साथ ही शायद सभी सोचेंगे, वे हार गई हैं, उन का निर्णय गलत था. लेकिन इस हार से उन्हें कोई अफसोस या ग्लानि नहीं होगी, क्योंकि इस हार से सभी को लाभ होगा, उन्हें खुद भी.

गठबंधन रिश्तों का

विश्वास रिश्तों में एक डोर की तरह होता है. आपसी विश्वास उतना ही मजबूत होना चाहिए जितना कि एक गठबंधन. जब हम किसी पर विश्वास करते हैं या कोई हम पर विश्वास करता है तो उस में पूरी ईमानदारी होनी चाहिए. 
ऐसे न जाने कितने किस्से हैं जो हमें बताते हैं कि किसी पर आंख मूंद कर कैसे भरोसा कर सकते हैं. और ऐसे किस्सों की भी कमी नहीं है जब  आप किसी के सामने अपना कलेजा निकाल कर रख दें तो भी उसे विश्वास नहीं होता कि आप वाकई उस के विश्वासपात्र हैं. वह आप पर हमेशा अविश्वास करता है.
आंख मूंद कर न करें विश्वास
किसी पर अंधविश्वास और किसी पर किसी हाल में विश्वास न होना ‘स्टेट औफ माइंड’ की करामात है यानी यह एक मनोदशा है और यह मनोदशा विश्वास से पैदा होती है और विश्वासघात से टूटती है. एक बार विश्वास बन जाए तो लोग आंख मूंद कर भरोसा करते हैं और एक बार किसी पर से विश्वास टूट जाए तो उस पर कभी भरोसा नहीं होता. 
दरअसल, विश्वास का धागा टूट जाने पर अगर उसे दोबारा जोड़ भी दिया जाए तो उस में गांठ तो पड़ ही जाती है. इसलिए प्यार में, आपसी संबंधों में और दांपत्य जीवन में आपसी विश्वास को कभी न टूटने दें क्योंकि एक बार आपसी विश्वास टूटा तो वह कभी नहीं जुड़ता. यदि जुड़ भी गया तो गांठ पड़ ही जाती है और रिश्तों में पहले जैसी मधुरतानहीं रहती.
विश्वास एकतरफा नहीं होता. पतिपत्नी के आपसी संबंधों का मामला हो, दोस्त से दोस्ती का मामला हो, प्रेमिका या प्रेमी से प्रेम का मामला हो, हर जगह आपसी विश्वास का आधार दोनों तरफ से होता है. संबंध कोई भी हो, उस की मजबूती पूरी तरह से विश्वास पर आधारित होती है, चाहे मामला दोस्त का हो, जीस्त का हो या जीवनसाथी का. जीवन का हर पहलू आपसी विश्वास से रचापगा होता है.
हद तो यह है कि आपसी विश्वास की जरूरत वहां भी पड़ती है जहां हम यह जान भी नहीं रहे होते कि यहां आपसी विश्वास की क्या उपयोगिता है. हम सफर कर रहे होते हैं और सफर में अपने पड़ोसी यात्री के साथ आपसी विश्वास का रिश्ता बनाते हैं. अगर यह खरा उतरता है यानी आप के उतरने तक पड़ोसी यात्री के साथ आप का आपसी विश्वास मजबूत रहता है तो कई बार सफर के ऐसे रिश्ते ताउम्र के रिश्ते बन जाते हैं और बिछड़ जाने के बाद भी दोस्तीयारी कायम रहती है.
विश्वास की डोर
आपसी विश्वास की ही डोर हमारे और पड़ोसी के बीच भी बंधी होती है. अगर हमारा आपसी विश्वास डगमगा जाता है तो फिर हम आह भर कर यही कहते हैं, ‘हम पड़ोसी चुन नहीं सकते.’ विश्वास शीशे की तरह नाजुक होता है जिस पर जरा सी चोट का प्रभाव काफी गहरा होता है. लेकिन विश्वास की डोर की मजबूती भी इस कदर होती है कि वक्त का बड़े से बड़ा तूफान भी इस को तोड़ नहीं पाता.
बरतें ईमानदारी
आपसी विश्वास न तो होशियारी से बनता है न समझदारी से. यह ईमानदारी से बनता है. यह सहजता से विकसित होता है. अगर आप किसी के प्रति ईमानदाराना झुकाव रखते हैं तो आप को कभी बताने की जरूरत नहीं पड़ती. उस के साथ आप के सहज विश्वासपूर्ण रिश्ते बन जाते हैं. लेकिन आपसी विश्वास को सजगता से भी विकसित किया जा सकता है. मगर इस के लिए सतत रूप से प्रयासरत व ईमानदार रहना होगा. बातबात पर शकशुबहे, गलतफहमियां, हिचकिचाहट संबंधों पर इस कदर हावी न हों कि आपसी विश्वास को दृढ़ बनाने, फलनेफूलने के लिए मौका ही न मिले. दरअसल, आपसी विश्वास बड़ी मेहनत और मशक्कत से हासिल किया जाता है. इसे पोषित करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. विश्वास को मजबूती देने के लिए धैर्य और समर्पण की जरूरत होती है. तभी रिश्तों का गठबंधन जीवनपर्यंत चलता है.
शीशे की तरह नाजुक
किसी के साथ आपसी विश्वास को मजबूत करने के लिए जरूरी नहीं है कि उस पर आप अपना ही नजरिया थोपें. साथी, हमसफर या पड़ोसी के साथ बेहतर आपसी संबंध बनाने का एक जरिया यह भी है कि उस के नजरिए को तवज्जुह दें. भले आप उस से सहमत न हों फिर भी उस की काट यों न करें कि उसे वह अपना अपमान समझे. हां, अपने नजरिए को साफतौर पर व्यक्त करें और यह संदेश देने की भी कोशिश करें कि आप उस के नजरिए से अपने तर्कों के चलते सहमत नहीं हैं. लेकिन व्यक्तिगत रूप से आप उस के प्रति न कटु विचार रखते हैं और न ही कोई निजी पूर्वाग्रह. इस से आप का प्रतिद्वंद्वी भी प्रभावित होगा. आप के नजरिए को समझेगा व अपने नजरिए की खामी को ईमानदारी से देखेगा और अगर वाकई उसे लगता है कि आप सही हैं तो वह आप के नजरिए को स्वीकार भी करेगा और आपसी रिश्तों को बनाने में सहयोग देगा.
संतुष्टि और सम्मान जरूरी
किसी के साथ संबंधों के मामले में आत्मसंतुष्टि का रवैया अपनाएं. क्योंकि एक आत्मसंतुष्ट व्यक्ति न केवल अपने प्रति ईमानदार होता है बल्कि अपने साथी की शारीरिक, मानसिक जरूरतों को भी समझने का जज्बा रखता है. आत्मसंतुष्टि के भाव से ही आपसी विश्वास का भाव मजबूत होगा, विशेषकर दांपत्य जीवन में मधुर और सार्थक संबंध आपसी विश्वास की बदौलत ही अधिक मजबूती से टिके होते हैं.
आपसी विश्वास मजबूत करने का एक जरिया यह भी है कि अपने सारे अहं त्याग कर पूर्ण समर्पण की भावना को अपने अंदर मजबूत करें. एकदूसरे के प्रति सम्मानभाव आपसी विश्वास को बढ़ाता है. अपनेआप में विश्वास भी आपसी संबंधों को मजबूती देता है. स्वयं को दूसरों के प्यार के काबिल समझना भी अपने प्रति एक बड़ा सम्मान है. संबंधों के विविध आयामों में निरंतरता द्वारा ही संबंधों की डोर को मजबूती मिलती है.

तेहरान के कसाई का दर्दनाक अंत

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का हैलिकौप्टर क्रैश में निधन हो गया. वे 63 साल के थे. अजरबैजान से सटी सीमा पर एक डैम का उद्घाटन करने के बाद लौटते समय उन का हैलिकौप्टर 19 मई की शाम करीब 7 बजे खराब मौसम के चलते लापता हो गया था. हैलिकौप्टर में इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री होसैन अमीर अब्दुल्लाहियन समेत पायलट और को-पायलट के साथ क्रू चीफ, हेड औफ सिक्योरिटी और बौडीगार्ड भी सवार थे. हैलिकौप्टर में मौजूद सभी 9 लोग मारे गए.

राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत पर जहां कुछ देशों ने अफसोस जाहिर किया तो कई बहुत खुश हैं. इजराइल के कई यहूदी धर्मगुरुओं ने रईसी की मौत पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की है. उन में से एक यहूदी धर्मगुरु मीर अबूतबुल ने राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को ‘तेहरान का जल्लाद’ कहते हुए अपनी फेसबुक पोस्ट में आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. अबुतबुल लिखते हैं, ‘वो यहूदियों को सूली पर लटकाना चाहता था, इसलिए ईश्वर ने एक हैलिकौप्टर क्रैश में उस के और इजराइल से नफरत करने वाले उस के सभी साथियों को सजा दी.’ अबुतबुल ने लिखा कि रईसी को ईश्वर का दंड मिला है.

राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हैलिकौप्टर हादसे में मौत पर सब से ज्यादा जश्न ईरान के कुर्दिस्तान इलाके में मनाया जा रहा है. वहां साकेज शहर में लोग आतिशबाजी कर के रईसी की मौत का जश्न मना रहे हैं. साकेज ईरान में हिजाब के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का चेहरा बनी मेहसा अमीनी का गृहनगर है. मेहसा अमीनी वह 22 साल की कुर्द लड़की जिस में जीवन जीने की चाह थी, मगर वह खुद को किसी के आदेश पर सिर से पांव तक लबादे में ढंक कर नहीं रखना चाहती थी.

आजादखयाल की मेहसा अमीनी ईरान की रूढ़िवादी सोच का शिकार हुई और मार डाली गई. मेहसा ने ईरान में हिजाब के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, जिस के चलते वह ईरान की मोरल पुलिस के निशाने पर आ गई थी. बिना हिजाब के बाहर निकलने पर रईसी की मोरल पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और बेरहमी से उस की पिटाई की. इतनी बेरहमी से की कि अमीनी ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. सिर्फ 22 साल की मेहसा अमीनी के लिए ईरान ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोगों ने अपनी आवाज उठाई. मेहसा अमीनी के शहर में ईरान के राष्ट्रपति रईसी के खिलाफ लोगों में काफी गुस्सा है, जो अब रईसी की मौत के बाद सामने आ रहा है.

दरअसल, धार्मिक रूढ़िवादिता से ग्रस्त, खुद को और खुद के धर्म को ही श्रेष्ठ समझने वाले लाखों इंसानों की मौत के जिम्मेदार तानाशाहों की मौतों पर मानवता अफसोस करने के बजाय संतोष का अनुभव करती है. बेनिटो मुसोलिनी, एडोल्फ हिटलर, जोसेफ स्टालिन, माओ त्से तुंग, मुअम्मर गद्दाफी, सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाहों का अंत दर्दनाक हुआ और दुनिया ने संतोष की सांस ली.

दुनिया में कई देश हैं जहां धर्म के अंधे तानाशाह लगातार मानवता का खून बहा रहे हैं और दुनिया उन के अंत का इंतजार कर रही है. उन्हें कभी भी किसी अच्छे काम के लिए याद नहीं किया जाएगा. जब भी उन की तसवीर सामने आएगी, वे मासूमों की लाशों के ढेर पर अट्ठास करते दिखाए जाएंगे. इस में शक नहीं कि इब्राहिम रईसी भी एक रूढ़िवादी अत्याचारी नेता था. उस का अति रूढ़िवादी इतिहास रहा है और वह अत्याचार के गंभीर आरोपों से घिरा रहा है. दुनिया उसे तेहरान के कसाई के नाम से जानती है.

इब्राहिम रईसी ने राष्ट्रपति बनने से पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनाई के अधीन न्यायपालिका के अंदर विभिन्न पदों पर काम किया. 1988 में ईरानइराक युद्ध के अंत में वे उस समिति का हिस्सा थे जिस ने हजारों राजनीतिक कैदियों को मौत की सजा सुनाई.

साल 1988 में राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए ईरान में 4 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था. इन 4 सदस्यों में इब्राहिम रईसी भी शामिल थे. इस कमेटी को ईरान में अनौपचारिक रूप से ‘डेथ कमेटी’ भी कहा गया. इस समयावधि में राजनीतिक कैदियों को फांसी देने का सिलसिला चला, जिस में, एक अनुमान के मुताबिक, करीब 5,000 राजनीतिक विरोधियों को फांसी दी गई, इन में स्त्री, पुरुष और बच्चे तक शामिल थे.

मारे गए लोगों में अधिकांश लोग ईरान के पीपुल्स मुजाहिदीन संगठन के समर्थक थे. फांसी के बाद इन सभी को अज्ञात सामूहिक कब्रों में दफना दिया गया. मानवाधिकार कार्यकर्ता इस घटना को मानवता के विरुद्ध अपराध बताते हैं. हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतारने के कारण इब्राहिम रईसी को ‘तेहरान का कसाई’ कहा जाने लगा. इब्राहिम रईसी की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिटलर की तरह उन्होंने मासूम बच्चों तक को फांसी का हुक्म सुनाया और प्रमुख मानवाधिकार वकीलों को कैद की सजा दी, जिस के चलते अमेरिका ने रईसी पर 2019 से प्रतिबंध लगाया था.

हालांकि, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति डा. सैयद इब्राहिम रईसी की मौत पर शोक जताया है. सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा है–“ईरान के राष्ट्रपति डा. सैयद इब्राहिम रईसी के दुखद निधन से गहरा दुख और सदमा लगा है. भारतईरान के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में उन के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा. उन के परिवार और ईरान के लोगों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना. दुख की इस घड़ी में भारत ईरान के साथ खड़ा है.”

इब्राहिम रईसी की छवि हमेशा एक कट्टरपंथी और तानाशाह नेता की रही है. भारत में भी बीते 10 सालों में धार्मिक कट्टरता बढ़ी है. यहां भी देश को तानाशाही की तरफ धकेलने के प्रयास बहुत तेजी से हो रहे हैं. इसलिए रईसी की मौत से भारत के शासक को झटका लगना स्वाभाविक है. मगर एकडेढ़ दशक पीछे चले जाएं तो तानाशाही की शुरुआत से पहले भारत और ईरान का रिश्ता काफी अच्छा रहा है. दोनों काफी सालों से बिजनैस करते रहे हैं. ईरान भारत को कच्चा तेल देता रहा है.

वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान भारतईरान व्यापार 13.13 अरब डौलर का था, जिस में 8.95 अरब डौलर का भारतीय इंपोर्ट शामिल था और उस में 4 अरब डौलर से ज्यादा का कच्चे तेल का आयात था. हालांकि, साल 2019-20 में ईरान के साथ भारत के व्यापार में तेज गिरावट देखने को मिली थी. विशेष रूप से क्रूड औयल का आयात 2018-19 में 13.53 अरब डौलर की तुलना में घट कर महज 1.4 अरब डौलर रह गया था. भारत ने 2018-19 में लगभग 23.5 मिलियन टन ईरानी कच्चे तेल का आयात किया था.

भारत ईरान से कच्चे तेल के अलावा सूखे मेवे, रसायन और कांच के बरतन भी खरीदता है. वहीं, भारत की ओर से ईरान को निर्यात किए जाने वाले प्रमुख सामान में बासमती चावल शामिल है. वित्त वर्ष 2014-15 से ईरान भारतीय बासमती चावल का दूसरा सब से बड़ा आयातक देश रहा है और वित्त वर्ष 2022-23 में 998,879 मीट्रिक टन भारतीय चावल खरीदा था. बासमती चावल के अलावा इंडिया ईरान को चाय, कौफी और चीनी का भी निर्यात करता है.

इब्राहिम रईसी की मौत से भारत और ईरान के ट्रेड बिजनैस पर कोई असर नहीं देखने को मिलेगा. उस का बड़ा कारण यह है कि भारत और ईरान का रिश्ता काफी पुराना है. हाल ही में रईसी के वक्त चाबहार डील भी हुई है. कहा जाता है कि ईरान काफी समय से भारत के साथ चाबहार डील करना चाह रहा था. इसलिए इस पर भी कोई खास असर नहीं देखने को मिलेगा. हालांकि अगर मिडिल ईस्ट में इस घटना को ले कर टैंशन होती है तब बिजनैस पर थोड़ा असर देखने को मिलेगा और चाबहार के मैनेजमैंट और औपरेशन का काम थोड़ा पिछड़ सकता है.

तानाशाहों को मिलती हैं दर्दनाक मौतें

जरमन का तानाशाह एडोल्फ हिटलर अपनी जाति-धर्म को दुनिया में सब से श्रेष्ठ समझता था. उस ने लिखा– “जरमन रेस सभी जातियों से श्रेष्ठ है, इसलिए उन्हें ही विश्व का नेतृत्व करना चाहिए.” फासिस्ट विचारधारा उग्र राष्ट्रवाद के समर्थक हिटलर के मन में साम्यवादियों और यहूदियों के प्रति घृणा थी.

एडोल्फ हिटलर 20वीं सदी का सब से क्रूर तानाशाह था. 1933 में हिटलर जब जरमनी की सत्ता पर काबिज हुआ, उस ने 6 साल में करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या गैस चैंबर्स में डाल कर बड़े क्रूर तरीके से की. इन में 15 लाख तो सिर्फ बच्चे थे. मगर पूरी दुनिया में मौत का तांडव कर चुका हिटलर सोवियत सेनाओं से घिरने के बाद अंत में अपनी हार से इतना टूटा कि बर्लिन में जमीन से 50 फुट नीचे बने बंकर में अपनी प्रेमिका के साथ कई दिनों तक छिप कर रहने के बाद एक दिन उस ने गोली मार कर अपनी प्रेमिका इवा ब्राउन के साथ आत्महत्या कर ली. आत्महत्या करने से कुछ घंटे पहले ही अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन से शादी की थी.

29 अप्रैल, 1945. रविवार की सुबह, 4 बजे थे. इटली के मिलान शहर में भारी सन्नाटा था. एक पीले रंग का लकड़ी का ट्रक शहर के सब से मशहूर चौक ‘पियाजाले लोरेटो’ पर आ कर रुका. खाकी वरदी में 10 सिपाही एक दूसरी वैन से निकल कर ट्रक के पीछे चढ़े. उन्होंने ट्रक से कुछ भारी सामान निकाल कर चौक पर बने गोल चक्कर के अंदर फेंका. आसपड़ोस के जो लोग वहां थे, उन्हें अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया. जब सिपाही चले गए तो सामान को करीब से जा कर देखा. पता लगा ये 18 लाशें थीं. इटली में उस समय लाशें देखना कोई बड़ी बात नहीं थी. होती भी कैसे, दूसरा विश्व युद्ध जो चल रहा था और इटली इस में सक्रिय भूमिका में था. लेकिन इन लोगों की आंखें तब खुलीं रह गईं जब इन की नजर इन में से एक लाश पर गई. लाश थी उस तानाशाह की जिस ने इन लोगों पर 21 वर्षों तक शासन किया था- तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी. एक बौडी उस की प्रेमिका क्लारेटा पेटाची की भी थी. 16 अन्य लाशें मुसोलिनी के करीबी सैनिकों की थीं.

सुबह 7 बजे तक चौक पर 5 हजार लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो गई. भीड़ गुस्से में थी, नारे लगा रही थी, देखते ही देखते लाशों को पत्थर मारे जाने लगे. भीड़ में से 2 लोग मुसोलिनी की लाश के पास गए और उस के जबड़े में जोर से लात मारी. एक महिला ने अपनी पिस्टल को लोड किया और मुसोलिनी के शव पर एक के बाद एक 5 गोलियां मार दीं और बोली, ‘बेटों की मौत का बदला आज पूरा हुआ.’ 1935 में मुसोलिनी ने उस के 5 बेटों को विद्रोही करार दे कर मरवा दिया था.

अमेरिकी इतिहासकार ब्लेन टेलर लिखते हैं कि इस के बाद नारे लगाती भीड़ में से एक महिला चाबुक ले कर मुसोलिनी के पास जाती है. उस पर तड़ातड़ चाबुक चलाती है. इतनी तेज कि मुसोलिनी की एक आंख बाहर निकल आती है. एक आदमी मुसोलिनी के मुंह में मरा हुआ चूहा डालता है और बारबार चीखता है, ‘डूचे तुझे लैक्चर देने का बहुत शौक है, अब दे लैक्चर.’ बता दें कि इटली के लोग बेनिटो मुसोलिनी को डूचे भी कहा करते थे.

तभी एक 6 फुट का आदमी मुसोलिनी की लाश को पकड़ कर हवा में उठाता है. तभी भीड़ से आवाज आती है- और ऊंचा, और ऊंचा. फिर कुछ लोग आगे आते हैं और मुसोलिनी को सड़क के किनारे लगे एक स्टैंड पर उलटा लटका देते हैं. उस की प्रेमिका क्लारेटा के शव को भी उलटा लटकाया जाता है. लोगों ने उस की लाश पर अपना गुस्सा उतारा. उन पर पत्थर मारे, जूते और कोड़े मारे. तानाशाहों का अंत भयावह तरीके से ही होता है.

इराक के राष्ट्रपति रहे सद्दाम हुसैन को भी दुनिया ‘तानाशाह’ कह कर बुलाती है. ऐसा तानाशाह जिस ने जम कर कत्लेआम मचाया. 1980 का समय था, ईरान में इसलामिक क्रांति शुरू हो गई थी. इस क्रांति को कमजोर करने के लिए इराक ने पश्चिमी ईरान में सेना उतार दी और शुरू हुआ इराकईरान युद्ध. इसी बीच, जुलाई 1982 में सद्दाम हुसैन पर एक आत्मघाती हमला हुआ. इस में सद्दाम हुसैन बच तो गए लेकिन इस के बाद उस ने कत्लेआम मचा दिया. सद्दाम हुसैन ने शियाबहुल दुजैल गांव में 148 लोगों की हत्या करवा दी. ईरान के साथ इराक ने 8 वर्षों तक युद्ध लड़ा. इस युद्ध में लाखों लोगों की जानें गईं. 1988 में दोनों देशों के बीच युद्धविराम हुआ.

सद्दाम हुसैन की कहानी हेल बजा नरसंहार का जिक्र किए बिना अधूरी है. ईरानइराक युद्ध के दौरान ही यह नरसंहार हुआ था. हेल बजा इराकी शहर था जिस की सीमा ईरान से सटी हुई थी. यहां कुर्द लोग रहते थे. सद्दाम हुसैन को इन से नफरत थी. मार्च 1988 से ही हेला बजा में इराकी सेना तबाही मचाने लगी थी. उसी दौरान हेला बजा शहर पर कैमिकल अटैक हुआ. इस हमले में लोग बच न जाएं, इसलिए 2 दिनों पहले से इराकी सेना ने इतने बम बरसाए कि लोगों के घरों के खिड़कीदरवाजे टूट जाएं. उन के पास ऐसा कुछ न बचे जिस की आड़ में वे अपनी जान बचा सकें.

यह कैमिकल हमला इतना खतरनाक था कि यह शहर लाशों का शहर बन गया और जो बच गए वो बीमारियों की फैक्ट्री बन गए. कैमिकल अटैक के लिए हेला बजा चुनने की 2 वजहें थीं. पहली यह कि यहां कुर्द लोग रहते थे, दूसरी यह कि जब ईरानी सेना इराक में घुसी तो हेला बजा के कुर्दों ने उन का स्वागत किया. कैमिकल अटैक कर सद्दाम हुसैन को यह बताना था कि बगावत का अंजाम क्या होता है.

2003 में अमेरिका और ब्रिटेन की संयुक्त सेना ने इराक पर हमला कर सद्दाम को गिरफ्तार किया. उस वक्त वह एक बंकर में छिपा हुआ था और इसी के साथ इराक में तानाशाह सद्दाम के शासन का अंत हो गया. सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने बगदाद में फांसी पर लटकाया.

चीन का तानाशाह माओत्से तुंग लेनिन और कार्ल मार्क्स का प्रशंसक था. उस ने लेनिनवादी और मार्क्सवादी विचारधारा को सैनिक रणनीति में जोड़ कर एक नया सिद्धांत दिया, जिसे ‘माओवाद’ कहा जाता है. चीन की क्रांति को कामयाब बनाने के पीछे माओत्से तुंग का हाथ रहा. चीन में ‘माओ’ को क्रांतिकारी, राजनीतिक विचारक और कम्युनिस्ट दल का सब से बड़ा नेता माना गया. चीन का यह तानाशाह अपने विरोधियों को पसंद नहीं करता था. जो कोई भी उस का विरोध करता था उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था. मानवाधिकारों के हनन और चीन के लोगों पर उस के विनाशकारी नतीजों के लिए उस की नीतियों की आलोचना होती है. हालांकि, इस के बावजूद चीनी समाज और वहां की राजनीति पर माओ के प्रभाव को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है.

माओ 20वीं सदी के 100 सब से ज्यादा प्रभावशाली लोगों में शामिल था. उस ने जमीन और फसलों को ले कर कई तरह की योजनाएं शुरू कीं. छोटे कृषि समूहों का तेजी से बड़े सरमाएदार लोगों के समुदायों में विलय कर दिया. बहुत से किसानों को बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के साथ ही लोहे और स्टील के उत्पादन पर काम करने का आदेश दिया. निजी खाद्यान उत्पादन पर पाबंदी लगा दी, जानवरों और खेती के उपकरणों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया.

माओ की योजनाएं चीन के लिए घातक साबित हुईं. साथ ही, प्राकृतिक आपदाओं का असर इतना बढ़ा कि चीन में इतिहास का सब से बड़ा अकाल पड़ा. इस में 1958 से 1962 के बीच 4 साल के दौरान एक करोड़ से ज्यादा लोगों मौत के मुंह में समां गए. एक करोड़ से ज्यादा लोगों के मर जाने के बावजूद माओ के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. वह इतना ताकतवर था कि जो कोई भी उस का विरोध करने की हिम्मत करता, उसे जीवनभर के लिए जेल में डाल दिया जाता था.

माओ ने मीडिया पर ऐसा शिकंजा कसा था कि चीन का मीडिया आज तक उस शिकंजे से बाहर नहीं निकल पाया है. बाद में चीन के मीडिया की हालत यह हो गई थी कि जब साल 1976 में माओ की मौत के बाद देंग शियाओ पिंग ने चीन की सत्ता संभाली तो किसी को कानोंकान खबर तक न हुई.

अरमान आनंद की एक कविता है- ‘तानाशाह’. वे लिखते हैं-

तानाशाह

आदतन अमर होना चाहता है
और यह तब तक चाहता है
जब तक वह मर नहीं जाता
तानाशाह को डर हथियारों से नहीं लगता
तानाशाह को सब से ज्यादा डर
भीड़ में खड़े उस आखिरी आदमी के विचारों से लगता है
जिस के मुंह में इंकलाब बंद है
वही आखिरी आदमी उस का पहला निशाना है
लो,
मेरी खोपड़ी से निकाल लो मेरा दिमाग
शहर की जिस भी गली से गुजरता दिखे तानाशाह का टैंक
उस टैंक के नीचे डाल देना
मेरा यकीन है :

तानाशाह के चीथड़े उड़ जाएंगे.

दीप जल उठे : आखिर क्यों प्रतिमा की सासु मां उसे बहू नहीं बेटी मानने लगींं

दफ्तर से आतेआते रात के 8 बज गए थे. घर में घुसते ही प्रतिमा के बिगड़ते तेवर देख श्रवण भांप गया कि जरूर आज घर में कुछ हुआ है वरना मुसकरा कर स्वागत करने वाली का चेहरा उतरा न होता.

सारे दिन महल्ले में होने वाली गतिविधियों की रिपोर्ट जब तक मुझे सुना न देती उसे चैन नहीं मिलता था. जलपान के साथसाथ बतरस पान भी करना पड़ता था. अखबार पढ़े बिना पासपड़ोस के सुखदुख के समाचार मिल जाते थे. शायद देरी से आने के कारण ही प्रतिमा का मूड बिगड़ा हुआ है.

प्रतिमा से माफी मांगते हुए बोला, ‘‘सौरी, मैं तुम्हें फोन नहीं कर पाया. महीने का अंतिम दिन होने के कारण बैंक में ज्यादा काम था.’’

‘‘तुम्हारी देरी का कारण मैं समझ सकती हूं, पर मैं इस कारण दुखी नहीं हूं,’’ प्रतिमा बोली.

‘‘फिर हमें भी तो बताओ इस चांद से मुखड़े पर चिंता की कालिमा क्यों?’’ श्रवण ने पूछा.

‘‘दोपहर को अमेरिका से बड़ी भाभी का फोन आया था कि कल माताजी हमारे पास पहुंच रही हैं,’’ प्रतिमा चिंतित होते हुए बोली.

‘‘इस में इतना उदास व चिंतित होने कि क्या बात है? उन का अपना घर है वे जब चाहें आ सकती हैं.’’ श्रवण हैरानी से बोला.

‘‘आप नहीं समझ रहे. अमेरिका में मांजी का मन नहीं लगा. अब वे हमारे ही साथ रहना चाहती हैं.’’ प्रतिमा ने कहा.

‘‘अरे मेरी चंद्रमुखी, अच्छा है न, घर में रौनक बढ़ेगी, बरतनों की उठापटक रहेगी, एकता कपूर के सीरियलों की चर्चा तुम मुझ से न कर के मां से कर सकोगी. सासबहू मिल कर महल्ले की चर्चाओं में बढ़चढ़ कर भाग लेना,’’ श्रवण चटखारे लेते हुए बोला.

‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है और मेरी जान सूख रही है,’’ प्रतिमा बोली.

‘‘चिंता तो मुझे होनी चाहिए, तुम सासबहू के शीतयुद्ध में मुझे शहीद होना पड़ता है. मेरी स्थिति चक्की के 2 पाटों के बीच में पिसने वाली हो जाती है. न मां को कुछ कह सकता हूं, न तुम्हें.’’

कुछ सोचते हुए श्रवण फिर बोला, ‘‘मैं तुम्हें कुछ टिप्स देना चाहता हूं. यदि तुम उन्हें अपनाओगी तो तुम्हारी सारी परेशानियां एक झटके में उड़नछू हो जाएंगी.’’

‘‘यदि ऐसा है तो आप जो कहेंगे मैं करूंगी. मैं चाहती हूं मांजी खुश रहें. आप को याद है पिछली बार छोटी सी बात से मांजी नाराज हो गई थीं.’’

‘‘देखो प्रतिमा, जब तक पिताजी जीवित थे तब तक हमें उन की कोई चिंता नहीं

थी. जब से वे अकेली हो गई हैं उन का स्वभाव बदल गया है. उन में असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया है. अब तुम ही बताओ, जिस घर में उन का एकछत्र राज था वो अब नहीं रहा. बेटों को तो बहुओं ने छीन लिया. जिस घर को तिनकातिनका जोड़ कर मां ने अपने हाथों से संवारा, उसे पिताजी के जाने के बाद बंद करना पड़ा.

‘‘उन्हें कभी अमेरिका तो कभी यहां हमारे पास आ कर रहना पड़ता है. वे खुद को बंधन में महसूस करती हैं. इसलिए हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिस में उन्हें अपनापन लगे. उन को हम से पैसा नहीं चाहिए. उन के लिए तो पिताजी की पैंशन ही बहुत है. उन्हें खुश रखने के लिए तुम्हें थोड़ी सी समझदारी दिखानी होगी, चाहे नाटकीयता से ही सही,’’ श्रवण प्रतिमा को समझाते हुए बोला.

‘‘आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करने को तैयार हूं,’’ प्रतिमा ने आश्वासन दिया.

‘‘तो सुनो प्रतिमा, हमारे बुजुर्गों में एक ‘अहं’ नाम का प्राणी होता है. यदि किसी वजह से उसे चोट पहुंचती है, तो पारिवारिक वातावरण प्रदूषित हो जाता है यानी परिवार में तनाव अपना स्थान ले लेता है. इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि मां के अहं को चोट न लगे बस… फिर देखो…’’ श्रवण बोला.

‘‘इस का उपाय भी बता दीजिए आप,’’ प्रतिमा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘हां… हां… क्यों नहीं, सब से पहले तो जब मां आए तो सिर पर पल्लू रख कर चरणस्पर्श कर लेना. रात को सोते समय कुछ देर उन के पास बैठ कर हाथपांव दबा देना. सुबह उठ कर चरणस्पर्श के साथ प्रणाम कर देना,’’ श्रवण ने समझाया.

‘‘यदि मांजी इस तरह से खुश होती हैं, तो यह कोई कठिन काम नहीं है,’’ प्रतिमा ने कहा.

‘‘एक बात और, कोई भी काम करने से पहले मां से एक बार पूछ लेना. होगा तो वही जो मैं चाहूंगा. जो बात मनवानी हो उस बात के विपरीत कहना, क्योंकि घर के बुजुर्ग लोग अपना महत्त्व जताने के लिए अपनी बात मनवाना चाहते हैं. हर बात में ‘जी मांजी’ का मंत्र जपती रहना. फिर देखना मां की चहेती बहू बनते देर नहीं लगेगी,’’ श्रवण ने अपने तर्कों से प्रतिमा को समझाया.

‘‘आप देखना, इस बार मैं मां को शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी.’’

‘‘बस… बस… उन को ऐसा लगे जैसे घर में उन की ही चलती है. तुम मेरा इशारा समझ जाना. आखिर मां तो मेरी ही है. मैं जानता हूं उन्हें क्या चाहिए,’’ कहते हुए श्रवण सोने के लिए चला गया.

प्रतिमा ने सुबह जल्दी उठ कर मांजी के कमरे की अच्छी तरह सफाई करवा दी. साथ ही उन की जरूरत की सभी चीजें भी वहां रख दीं.

हम दोनों समय पर एयरपोर्ट पहुंच गए. हमें देखते ही मांजी की आंखें खुशी से चमक उठीं. सिर ढक कर प्रतिमा ने मां के पैर छुए तो मां ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया.

पोते को न देख कर मां ने पूछा, ‘‘अरे तुम मेरे गुड्डू को नहीं लाए?’’

‘‘मांजी वह सो रहा था.’’ प्रतिमा बोली.

‘‘बहू… आजकल बच्चों को नौकरों के भरोसे छोड़ने का समय नहीं है. आएदिन अखबारों में छपता रहता है,’’ मांजी ने समझाते हुए कहा.

‘‘जी मांजी, आगे से ध्यान रखूंगी,’’ प्रतिमा ने मांजी को आश्वासन दिया.

रास्ते भर भैयाभाभी व बच्चों की बातें होती रहीं.

घर पहुंच कर मां ने देखा जिस कमरे में उन का सामान रखा गया है उस में उन की

जरूरत का सारा सामान कायदे से रखा था. 4 वर्षीय पोता गुड्डू दौड़ता हुआ आया और दादी के पांव छू कर गले लग गया.

‘‘मांजी, आप पहले फ्रैश हो लीजिए, तब तक मैं चाय बनाती हूं,’’ कहते हुए प्रतिमा किचन की ओर चली गई.

रात के खाने में सब्जी मां से पूछ कर बनाई गई.

खाना खातेखाते श्रवण बोला, ‘‘प्रतिमा कल आलू के परांठे बनाना, पर मां से सीख लेना तुम बहुत मोटे बनाती हो,’’ प्रतिमा की आंखों में आंखें डाल कर श्रवण बोला.

‘‘ठीक है, मांजी से पूछ कर ही बनाऊंगी.’’ प्रतिमा बोली.

मांजी के कमरे की सफाई भी प्रतिमा कामवाली से न करवा कर खुद करती थी, क्योंकि पिछली बार कामवाली से कोई चीज छू गई थी, तो मांजी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया था.

अगले दिन औफिस जाते समय श्रवण को एक फाइल न मिलने के कारण वह बारबार प्रतिमा को आवाज लगा रहा था. प्रतिमा थी कि सुन कर भी अनसुना कर मां के कमरे में काम करती रही. तभी मांजी बोलीं, ‘‘बहू तू जा, श्रवण क्या कह रहा सुन ले.’’

‘‘जी मांजी.’’

दोपहर के समय मांजी ने तेल मालिश के लिए शीशी खोली तो प्रतिमा ने शीशी हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘लाओ मांजी मैं लगाती हूं.’’

‘‘बहू रहने दे. तुझे घर के और भी बहुत काम हैं, थक जाएगी.’’

‘‘नहीं मांजी, काम तो बाद में भी होते रहेंगे. तेल लगातेलगाते प्रतिमा बोली, ‘‘मांजी, आप अपने समय में कितनी सुंदर दिखती होंगी और आप के बाल तो और भी सुंदर दिखते होंगे, जो अब भी कितने सुंदर और मुलायम हैं.’’

‘‘अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, हां तुम्हारे बाबूजी जरूर कभीकभी छेड़ दिया करते थे. कहते थे कि यदि मैं तुम्हारे कालेज में होता तो तुम्हें भगा ले जाता.’’ बात करतेकरते उन के मुख की लालिमा बता रही थी जैसे वे अपने अतीत में पहुंच गई हैं.

प्रतिमा ने चुटकी लेते हुए मांजी को फिर छेड़ा, ‘‘मांजी गुड्डू के पापा बताते हैं कि आप नानाजी के घर भी कभीकभी ही जाती थीं, बाबूजी का मन आप के बिना लगता ही नहीं था. क्या ऐसा ही था मांजी?’’

‘‘चल हट… शरारती कहीं की… कैसी बातें करती है… देख गुड्डू स्कूल से आता होगा,’’ बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मांजी नवयौवना की तरह शरमा गईं. शाम को प्रतिमा को सब्जी काटते देख मांजी बोलीं, ‘‘बहू तुम कुछ और काम कर लो, सब्जी मैं काट देती हूं.’’

मांजी रसोईघर में गईं तो प्रतिमा ने मनुहार करते हुए कहा, ‘‘मांजी, मुझे भरवां शिमलामिर्च की सब्जी बनानी नहीं आती, आप सिखा देंगी? ये कहते हैं, जो स्वाद मां के हाथ के बने खाने में है, वह तुम्हारे में नहीं.’’

‘‘हां… हां… क्यों नहीं, मुझे मसाले दे मैं बना देती हूं. धीरेधीरे रसोई की जिम्मेदारी मां ने अपने ऊपर ले ली थी. और तो और गुड्डू की मालिश करना, उसे नहलाना, उसे खिलानापिलाना सब मांजी ने संभाल लिया. अब प्रतिमा को गुड्डू को पढ़ाने के लिए बहुत समय मिलने लगा. इस तरह प्रतिमा के सिर से काम का भार कम हो गया था.’’

साथसाथ घर का वातावरण भी खुशनुमा रहने लगा. श्रवण को प्रतिमा के साथ कहीं घूमने जाना होता तो वह यही कहती कि मां से पूछ लो, मैं उन के बिना नहीं जाऊंगी. एक दिन पिक्चर देखने का मूड बना. औफिस से आते हुए श्रवण 2 पास ले आया. जब प्रतिमा को चलने के लिए कहा तो वह झट से ऊंचे स्वर में बोल पड़ी, ‘‘मांजी चलेंगी तो मैं चलूंगी अन्यथा नहीं.’’ वह जानती थी कि मां को पिक्चर देखने में कोई रुचि नहीं है. उन की तूतू, मैंमैं सुन कर मांजी बोलीं, ‘‘बहू, क्यों जिद कर रही हो? श्रवण का मन है तो चली जा. गुड्डू को मैं देख लूंगी.’’ मांजी ने शांत स्वर में कहा.

‘अंधा क्या चाहे दो आंखें’ वे दोनों पिक्चर देख कर वापस आए तो उन्हें खाना तैयार मिला. मांजी को पता था श्रवण को कटहल पसंद है, इसलिए फ्रिज से कटहल निकाल कर बना दिया. चपातियां बनाने के लिए प्रतिमा ने गैस जलाई तो मांजी बोलीं, ‘‘प्रतिमा तुम खाना लगा लो रोटियां मैं सेंकती हूं.’’

‘‘नहीं मांजी, आप थक गई होंगी, आप बैठिए, मैं गरमगरम रोटियां बना कर लाती हूं.’’ प्रतिमा बोली. ‘‘सभी एकसाथ बैठ कर खाएंगे, तुम बना लो प्रतिमा,’’ श्रवण बोला.

एकसाथ सभी को खाना खाते देख मांजी की आंखें नम हो गईं. श्रवण ने पूछा तो मां बोलीं, ‘‘आज तुम्हारे बाबूजी की याद आ गई. आज वे होते तो तुम सब को देख कर बहुत खुश होते.’’

‘‘मां मन दुखी मत करो,’’ श्रवण बोला.

प्रतिमा की ओर देख कर श्रवण बोला, ‘‘कटहल की सब्जी ऐसे बनती है. सच में मां… बहुत दिनों बाद इतनी स्वादिष्ठ सब्जी खाई है. मां से कुछ सीख लो प्रतिमा…’’

‘‘मांजी सच में सब्जी बहुत स्वादिष्ठ है… मुझे भी सिखाना…’’

‘‘बहू… खाना तो तुम भी स्वादिष्ठ बनाती हो.’’

‘‘नहीं मांजी, जो स्वाद आप के हाथ के बनाए खाने में है वह मेरे में कहां?’’ प्रतिमा बोली.

श्रवण को दीवाली पर बोनस के पैसे मिले तो देने के लिए उस ने प्रतिमा को आवाज लगाई. प्रतिमा ने आ कर कहा, ‘‘मांजी को ही दीजिए न…’’ श्रवण ने लिफाफा मां के हाथ में रख दिया. मांजी लिफाफे को उलटपलट कर देखते हुए रोमांचित हो उठीं. आज वे खुद को घर की बुजुर्ग व सम्मानित सदस्य अनुभव कर रही थीं. श्रवण व प्रतिमा जानते थे कि मां को पैसों से कुछ लेनादेना नहीं है. न ही उन की कोई विशेष जरूरतें थीं. बस उन्हें तो अपना मानसम्मान चाहिए था.

अब घर में कोई भी खर्चा होता या कहीं जाना होता तो प्रतिमा मां से जरूर पूछती. मांजी भी उसे कहीं घूमने जाने के लिए मना नहीं करतीं. अब हर समय मां के मुख से प्रतिमा की प्रशंसा के फूल ही झरते. दीवाली पर घर की सफाई करतेकरते प्रतिमा स्टूल से जैसे ही नीचे गिरी तो उस के पांव में मोच आ गई. मां ने उसे उठाया और पकड़ कर पलंग पर बैठा कर पांव में मरहम लगाया और गरम पट्टी बांध कर उसे आराम करने को कहा.

यह सब देख कर श्रवण बोला, ‘‘मां मैं ने तो सुना था बहू सेवा करती है सास की, पर यहां तो उलटी गंगा बह रही है.’’

‘‘चुप कर, ज्यादा बकबक मत कर, प्रतिमा मेरी बेटी जैसी है. क्या मैं इस का ध्यान नहीं रख सकती,’’ प्यार से डांटते हुए मां बोली.

‘‘मांजी, बेटी जैसी नहीं, बल्कि बेटी कहो. मैं आप की बेटी ही तो हूं.’’ प्रतिमा की बात सुनते ही मांजी ने उस के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, ‘‘तुम सही कह रही हो बहू, तुम ने बेटी की कमी पूरी कर दी.’’

घर में होता वही जो श्रवण चाहता, पर एक बार मां की अनुमति जरूर ली जाती. बेटा चाहे कुछ भी कह दे, पर बहू की छोटी सी भूल भी सास को सहन नहीं होती. इस से सास को अपना अपमान लगता है. यह हमारी परंपरा सी बन चुकी है. जो धीरेधीरे खत्म भी हो रही है. मांजी को थोड़ा सा मानसम्मान देने के बदले में उसे अच्छी बहू का दर्जा व बेटी का स्नेह मिलेगा, इस की तो उस ने कल्पना ही नहीं कीथी. प्रतिमा के घर में हर समय प्यार का, खुशी का वातावरण रहने लगा. दीवाली नजदीक आ गई थी. मां व प्रतिमा ने मिल कर पकवान बनाए. लगता है इस बार की दीवाली एक विशेष दीवाली रहेगी, सोचतेसोचते श्रवण बिस्तर पर लेटा ही था कि अमेरिका से भैया का फोन आ गया. उन्होंने मां के स्वास्थ्य के बारे में पूछा और बताया कि इस बार मां उन के पास से नाराज हो कर गई हैं. तब से मन बहुत विचलित है.

यह तो हम सभी जानते हैं कि नंदिनी भाभी और मां के विचार कभी नहीं मिले, पर अमेरिका में भी उन का झगड़ा होगा, इस की तो कल्पना भी नहीं की थी. भैया ने बताया कि वे माफी मांग कर प्रायश्चित करना चाहते हैं अन्यथा हमेशा उन के मन में एक ज्वाला सी दहकती रहेगी. आगे उन्होंने जो बताया वह सुन कर तो मैं खुशी से उछल ही पड़ा. बस अब 2 दिन का इंतजार था, क्योंकि 2 दिन बाद दीवाली थी.

इस बार दीवाली पर प्रतिमा ने घर कुछ विशेष प्रकार से सजाया था. मुझे उत्साहित देख कर प्रतिमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं?’’

अपनी खुशी को छिपाते हुए मैं ने कहा, ‘‘तुम सासबहू का प्यार हमेशा ऐसे ही बना रहे बस… इसलिए खुश हूं.’’

‘‘नजर मत लगा देना हमारे प्यार को,’’ प्रतिमा खुश होते हुए बोली. दीवाली वाले दिन मां ने अपने बक्से की चाबी देते हुए कहा, ‘‘बहू लाल रंग का एक डब्बा है उसे ले आ.’’ प्रतिमा ने जी मांजी कह कर डब्बा ला कर दे दिया. मां ने डब्बा खोला और उस में से खानदानी हार निकाला.  हार प्रतिमा को देते हुए बोलीं, ‘‘लो बहू,

ये हमारा खानदानी हार है, इसे संभालो. दीवाली इसे पहन कर मनाओ, तुम्हारे पिताजी की यही इच्छा थी.’’  हार देते हुए मां की आंखें खुशी से नम हो गईं.

प्रतिमा ने हार ले कर माथे से लगाया और मां के पैर छू कर आशीर्वाद लिया. मुझे बारबार घड़ी की ओर देखते हुए प्रतिमा ने पूछा तो मैं ने टाल दिया. दीप जलाने की तैयारी हो रही थी तभी मां ने आवाज लगा कर कहा, ‘‘श्रवण जल्दी आओ, गुड्डू के साथ फुलझडि़यां भी तो चलानी हैं. मैं साढ़े सात बजने का इंतजार कर रहा था, तभी बाहर टैक्सी रुकने की आवाज आई. मैं समझ गया मेरे इंतजार की घडि़यां खत्म हो गईं.

मैं ने अनजान बनते हुए कहा, ‘‘चलो मां सैलिब्रेशन शुरू करें.’’

‘‘हां… हां… चलो, प्रतिमा… आवाज लगाते हुए कुरसी से उठने लगीं तो नंदिनी भाभी ने मां के चरणस्पर्श किए… आदत के अनुसार मां के मुख से आशीर्वाद की झड़ी लग गई, सिर पर हाथ रखे बोले ही जा रही थीं… खुश रहो, आनंद करो… आदिआदि.’’

भाभी जैसे ही पांव छू कर उठीं तो मां आश्चर्य से देखती रह गईं. आश्चर्य  के कारण पलक झपकाना ही भूल गईं. हैरानी से मां ने एक बार भैया की ओर एक बार मेरी ओर देखा. तभी भैया ने मां के पैर छुए तो खुश हो कर भाभी के साथसाथ मुझे व प्रतिमा को भी गले लगा लिया. मां ने भैयाभाभी की आंखों को पढ़ लिया था. पुन: आशीर्वचन देते हुए दीवाली की शुभकामनाएं दीं मां की आंखों में खुशी की चमक देख कर लग रहा था दीवाली के शुभ अवसर पर अन्य दीपों के साथ मां के हृदयरूपी दीप भी जल उठे. जिन की ज्योति ने सारे घर को जगमग कर दिया.

पत्नी की खूबसूरती के कारण मुझे चिढ़ होने लगी है, क्या करूं?

सवाल

मेरी पत्नी काफी खूबसूरत है और जब भी कोई हमारे घर आता है तो वह मेरी पत्नी की खूबसूरती की तारीफ किए बिना नहीं रह पाता. मुझे पत्नी से चिढ़ होने लगी है, क्योंकि उस के कारण कोई मेरी तरफ देखता भी नहीं है. समझ नहीं आ रहा है कि मेरी सोच सही है या नहीं?

जवाब

आप को तो खुश होना चाहिए था कि आप की वाइफ इतनी खूबसूरत है. असल में ऐसी भावना मन में तब आती है जब दोनों में से एक कम खूबसूरत होता है और हम उसे देख कर बस, यही सोचते हैं कि काश, हम भी इतने खूबसूरत होते कि सैंटर औफ अट्रैक्शन बन पाते. लेकिन आप को यह समझना होगा कि यह सब कुदरत का दिया हुआ होता है जिस पर हमारा बस नहीं चलता. इसलिए इसे पौजिटिव लेते हुए खुशी से जिएं.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें