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आधी तस्वीर: क्या मनशा भैया को माफ कर पाई?

वह दरवाजे के पास आ कर रुक गई थी. एक क्षण उन बंद दरवाजों को देखा. महसूस किया कि हृदय की धड़कन कुछ तेज हो गई है. चेहरे पर शायद कोई भाव हलकी छाया ले कर आया. एक विषाद की रेखा खिंची और आंखें कुछ नम हो गईं. साड़ी का पल्लू संभालते हुए हाथ घंटी के बटन पर गया तो उस में थोड़ा कंपन स्पष्ट झलक रहा था. जब तक रीता ने आ कर द्वार खोला, उसे कुछ क्षण मिल गए अपने को संभालने के लिए, ‘‘अरे, मनशा दीदी आप?’’ आश्चर्य से रीता की आंखें खुली रह गईं.

‘‘हां, मैं ही हूं. क्यों यकीन नहीं हो रहा?’’

‘‘यह बात नहीं, पर आप के इधर आने की आशा नहीं थी.’’

‘‘आशा…’’ मनशा आगे नहीं बोली. लगा जैसे शब्द अटक गए हैं.

दोनों चल कर ड्राइंगरूम में आ गईं. कालीन में उस का पांव उलझा, तो रीता ने उसे सहारा दे दिया. उस से लगे झटके से स्मृति की एक खिड़की सहसा खुल गई. उस दिन भी इसी तरह सूने घर में घंटी पर रवि ने दरवाजा खोला था और अपनी बांहों का सहारा दे कर वह जब उसे ड्राइंगरूम में लाया था तो मनशा का पांव कालीन में उलझ गया था. वह गिरने ही वाली थी कि रवि ने उसे संभाल लिया था. ‘बस, इसी तरह संभाले रहना,’ उस के यही शब्द थे जिस पर रवि ने गरदन हिलाहिला कर स्वीकृति दी थी और उसे आश्वस्त किया था. उसे सोफे पर बैठा कर रवि ने अपलक निशब्द उसे कितनी देर तक निहार कर कहा था, ‘तुम्हें चुपचाप देखने की इच्छा कई बार हुई है. इस में एक विचित्र से आनंद का अनुभव होता है, सच.’

मनशा को लगा 20-22 वर्ष बाद रीता उसी घटना को दोहरा रही है और वह उस की चुप्पी और सूनी खाली नजरों को सहन नहीं कर पा रही है. ‘‘क्या बात है, रीता? इतनी अजनबी तो मत बनो कि मुझे डर लगे.’’

‘‘नहीं दीदी, यह बात नहीं. बहुत दिनों से आप को देखा नहीं न, वही कसर पूरी कर रही थी.’’ फिर थोड़ा हंस कर बोली, ‘‘वैसे 20-22 वर्ष अजनबी बनने के लिए काफी होते हैं. लोग सबकुछ भूल जाते हैं और दुनिया भी बदल जाती है.’’

‘‘नहीं, रीता, कोई कुछ नहीं भूलता. सिर्फ याद का एहसास नहीं करा पाता और इस विवशता में सब जीते हैं. उस से कुछ लाभ नहीं मिलता सिवा मानसिक अशांति के,’’ मनशा बोली.

‘‘अच्छा, दीदी, घर पर सब कैसे हैं?’’

‘‘पहले चाय या कौफी तो पिलाओ, बातें फिर कर लेंगे,’’ वह हंसी.

‘‘ओह सौरी, यह तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा,’’ और रीता हंसती हुई उठ कर चली गई.

मनशा थोड़ी राहत महसूस करने लगी. जाने क्यों वातावरण में उसे एक बोझिलपन महसूस होने लगा था. वह उठ कर सामने के कमरे की ओर बढ़ने लगी. विचारों की कडि़यां जुड़ती चली गईं. 20 वर्षों बाद वह इस घर में आई है. जीवन का सारा काम ही तब से जाने कैसा हो गया था. ऐसा लगता कि मन की भीतरी तहों में दबी सारी कोमल भावनाएं समाप्त सी हो गई हैं. वर्तमान की चढ़ती परत अतीत को धीरेधीरे दबा गई थी. रवि संसार से उठ गया था और भैया भी. केवल उन से छुई स्मृतियां ही शेष रह गई थीं.

रवि के साथ जीवन को जोड़ने का सपना सहसा टूट गया था. घटनाएं रहस्य के आवरण में धुंधलाती गई थीं. प्रभात के साथ जीवन चलने लगा-इच्छाअनिच्छा से अभी भी चल ही रहा है. उन एकदो वर्षों में जो जीवन उसे जीना था उस की मीठी महक को संजो कर रखने की कामना के बावजूद उस ने उसे भूलना चाहा था. वह अपनेआप से लड़ती भी रही कि बीते हुए उन क्षणों से अपना नाता तोड़ ले और नए तानेबाने में अपने को खपा कर सबकुछ भुला दे, पर वह ऊपरी तौर पर ही अपने को समर्थ बना सकी थी, भीतर की आग बुझी नहीं. 20 वर्षों के अंतराल के बाद भी नहीं.

आज ज्वालामुखी की तरह धधक उठने के एहसास से ही वह आश्चर्यचकित हो सिहर उठी थी. क्या 20 वर्षों बाद भी ऐसा लग सकता है कि घटनाएं अभीअभी बीती हैं, जैसे वह इस कमरे में कलपरसों ही आ कर गई है, जैसे अभी रवि कमरे का दरवाजा खोल कर प्रकट हो जाएगा. उस की आंखें भर आईं. वह भारी कदमों से कमरे की ओर बढ़ गई.

कोई खास परिवर्तन नहीं था. सामने छोटी मेज पर वह तसवीर उसी फ्रेम में वैसी ही थी. कागज पुराना हो गया था पर रवि का चेहरा उतनी ही ताजगी से पूर्ण था. जनता पार्क के फौआरे के सामने उस ने रवि के साथ यह फोटो खिंचवाई थी. रवि की बांह उस की बांह से आगे आ गई थी और मनशा की साड़ी का आंचल उस की पैंट पर गया था. ठीक बीच से जब रवि ने तसवीर को काटा था तो एक में उस की बांह का भाग रह गया और इस में उस की साड़ी का आंचल रह गया.

2-3 वाक्य कमरे में फिर प्रतिध्वनित हुए, ‘मैं ने तुम्हारा आंचल थामा है मनशा और तुम्हें बांहों का सहारा दिया है. अपनी शादी के दिन इसे फिर जोड़ कर एक कर देंगे.’ वह कितनी देर तक रवि के कंधे पर सिर टिका सपनों की दुनिया में खोई रही थी उस दिन.

उन्होंने एमए में साथसाथ प्रवेश किया था. भाषा विज्ञान के पीरियड में प्रोफैसर के कमरे में अकसर रवि और मनशा साथ बैठते. कभी उन की आपस में कुहनी छू जाती तो कभी बांह. सिहरन की प्रतिक्रिया दोनों ओर होती और फिर धीरेधीरे यह अच्छा लगने लगा. तभी रवि मनशा के बड़े भैया से मिला और फिर तो उस का मनशा के घर में बराबर आनाजाना होने लगा. तुषार से घनिष्ठता बढ़ने के साथसाथ मनशा से भी अलग से संबंध विकसित होते चले गए. वह पहले से अधिक भावुक और गंभीर रहने लगी, अधिक एकांतप्रिय और खोईखोई सी दिखाई देने लगी.

अपने में आए इस परिवर्तन से मनशा खुद भी असुविधा महसूस करने लगी क्योंकि उस का संपर्क का दायरा सिमट कर उस पर और रवि पर केंद्रित हो गया था. कानों में रवि के वाक्य ही प्रतिध्वनित होते रहते थे, जिन्होंने सपनों की एक दुनिया बसा दी थी. ‘वे कौन से संस्कार होते हैं जो दो प्राणियों को इस तरह जोड़ देते हैं कि दूसरे के बिना जीवन निरर्थक लगने लगता है. ‘तुम्हें मेरे साथ देख कर नियति की नीयत न खराब हो जाए. सच, इसीलिए मैं ने उस चित्र के 2 भाग कर दिए.’ रवि के कंधे पर सिर रखे वह घंटों उस के हृदय की धड़कन को महसूस करती रही. उस की धड़कन से सिर्फ एक ही आवाज निकलती रही, मनशा…मनशा…मनशा.

वे क्षण उसे आज भी याद हैं जैसे बीते थे. सामने बालसमंद झील का नीला जल बूढ़ी पहाडि़यों की युवा चट्टानों से अठखेलियां कर रहा था. रहरह कर मछलियां छपाक से छलांग लगातीं और पेट की रोशनी में चमक कर विलीन हो जातीं. झील की सारी सतह पर चलने वाला यह दृश्य किसी नववधू की चुनरी में चमकने वाले सितारों की झिलमिल सा लग रहा था. बांध पर बने महल के सामने बड़े प्लेटफौर्म पर बैंचें लगी हुई थीं. मनशा का हाथ रवि के हाथ में था. उसे सहलातेसहलाते ही उस ने कहा था, ‘मनशा, समय ठहर क्यों नहीं जाता है?’

मनशा ने एक बहुत ही मधुर दृष्टि से उसे देख कर दूसरे हाथ की उंगली उस के होंठों पर रख दी थी, ‘नहीं, रवि, समय के ठहरने की कामना मत करो. ठहराव में जीवन नहीं होता, शून्य होता है और शून्य-नहीं, वहां कुछ नहीं होता.’

रवि हंस पड़ा था, ‘साहित्य का अध्ययन करतेकरते तुम दार्शनिक भी हो गई हो.’

न जाने ऐसे कितने दृश्यखंड समय की भित्ती पर बनते गए और अपनी स्मृतियां मानसपटल पर छोड़ते गए. बीते हुए एकएक क्षण की स्मृति में जीने में इतना ही समय फिर बीत जाएगा और जब इन क्षणों का अंत आएगा तब? क्या फिर से उस अंत को झेला जा सकता है? क्या कभी कोई ऐसी सामर्थ्य जुटा पाएगा, जीवन के कटु और यथार्थ सत्य को फिर से जी सकने की, उस का सामना करने की? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इसीलिए जीवन की नियति ऐसी नहीं हुई. चलतेचलते ही जीवन की दिशा और धारा मुड़ जाती हैं या अवरुद्ध हो जाती हैं. हम कल्पना भी नहीं कर पाते कि सत्य घटित होने लगता है.

मनशा के जीवन के सामने कब प्रश्नचिह्न लग गया, उसे इस का भान भी नहीं हुआ. घर के वातावरण में एक सरसराहट होने लगी. कुछ सामान्य से हट कर हो रहा था जो मनशा की जानकारी से दूर था. मां, बाबूजी और भैया की मंत्रणाएं होने लगीं. तब आशय उस की समझ में आ गया. मां ने उस की जिज्ञासा अधिक नहीं रखी. उदयपुर का एक इंजीनियर लड़का उस के लिए देखा जा रहा था. उस ने मां से रोषभरे आश्चर्य से कहा, ‘मेरी शादी, और मुझ से कुछ कहा तक नहीं.’

‘कुछ निश्चित होता तभी तो कहती.’

‘तो निश्चित होने के बाद कहा जा रहा है. पर मां, सिर्फ कहना ही तो काफी नहीं, पूछना भी तो होता है.’

‘मनशा, इस घर की यह परंपरा नहीं रही है.’

‘जानती हूं, परंपरा तो नई अब बनेगी. मैं उस से शादी नहीं करूंगी.’

‘मनशा.’

‘हां, मां, मैं उस से शादी नहीं करूंगी.’

जब उस ने दोहराया तो मां का गुस्सा भड़क उठा, ‘फिर किस से करेगी? मैं भी तो सुनूं.’

‘शायद घर में सब को इस का अंदाजा हो गया होगा.’

‘मनशा,’ मां ने उस का हाथ कस कर पक लिया, ‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. जातपांत, समाज का कोई खयाल ही नहीं है?’

मनशा हाथ छुड़ा कर कमरे में चली गई. घर में सहसा ही तनाव व्याप्त हो गया. शाम को तुषार के सामने रोरो कर मां ने अपने मन की व्यथा कह सुनाई. बाबूजी को सबकुछ नहीं बताया गया. तुषार इस समस्या को हल करने की चेष्टा करने लगा. उसे विश्वास था वह मनशा को समझा देगा, और नहीं मानेगी तो थोड़ी डांटफटकार भी कर लेगा. मन से वह भी इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि मनशा पराई जाति के लड़के रवि से ब्याह करे. वह जानता था, कालेज के जीवन में प्रेमप्यार के प्रसंग बन ही जाते हैं पर…

‘भैया, क्या तुम भी मेरी स्थिति को नहीं समझ सकते? मां और बाबूजी तो पुराने संस्कारों से बंधे हैं लेकिन अब तो सारा जमाना नईर् हवा में नई परंपराएं स्थापित करता जा रहा है. हम पढ़लिख कर भी क्या नए विचार नहीं अपनाएंगे?’

‘मनशा,’ तुषार ने समझाना चाहा, ‘मैं बिना तुम्हारे कहे सब जानता हूं. यह भी मानता हूं कि रवि के सिवा तुम्हारी कोई पसंद नहीं हो सकती. पर यह कैसे संभव है? वह हमारी जाति का कहां है?’

‘क्या उस के दूसरी जाति के होने जैसी छोटी सी बात ही अड़चन है.’

‘तुम इसे छोटी बात मानती हो?’

‘भैया, इस बाधा का जमाना अब नहीं रहा. उस में कोई कमी नहीं है.’

‘मनशा…’ तुषार ने फिर प्रयास किया, ‘‘आज समाज में इस घर की जो प्रतिष्ठा है वह इस रिश्ते के होते ही कितनी रह जाएगी, यह तुम ने सोचा है? यह ब्याह होगा भी तो प्रेमविवाह अधिक होगा अंतर्जातीय कम. मैं सच कहता हूं कि बाद में तालेमल बैठाना तुम्हारे लिए बहुत कठिन होगा. तुम एकसाथ दोनों समाजों से कट जाओगी. मां और बाबूजी बाद में तुम्हें कितना स्नेह दे सकेंगे? और उस घर में तुम कितना प्यार पा सकोगी? इस की कल्पना कर के देखो तो सही.’

मनशा ने सिर्फ भैया को देखा, बोली कुछ नहीं. तुषार ही आगे बोलता रहा, ‘व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर जीवन के सारे पहलुओं पर जरा ठंडे दिल से सोचने की जरूरत है, मनशा. जल्दी में कुछ भी निर्णय ठीक से नहीं लिया जा सकता. फिर सभी महापुरुषों ने यही कहा है कि प्रेम अमर होता है, किसी ने ब्याह अमर होने की बात नहीं कही, क्योंकि उस का महत्त्व नहीं है.’ अपने अंतिम शब्दों पर जोर दे कर वह कमरे से बाहर चला गया.

मनशा सबकुछ सोच कर भी भैया की बात नहीं मान सकती थी. किसी और से ब्याह करने की कल्पना तक उस के मस्तिष्क में नहीं आ पाती थी. घर के वातावरण में उसे एक अजीब सा खिंचाव और उपेक्षा का भाव महसूस होता जा रहा था जो यह एहसास करा रहा था मानो उस ने घर की इच्छा के विरुद्ध बहुत बड़ा अपराध कर डाला हो. भैया से अगली बहस में उस ने जीवन का अंत करना अधिक उपयुक्त मान लिया था. उसे इस सीमा तक हठी देख तुषार को बहुत क्रोध आया था, पर उस ने हंस कर इतना ही कहा, ‘नहीं, मनशा, तुम्हें जान देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.’

घर के तनाव में थोड़ी ढील महसूस होने लगी, जैसे प्रसंग टल गया हो. तुषार भी पहले की अपेक्षा कम खिंचा हुआ सा रहने लगा. पर न अब रवि आता और न मनशा ही बाहर जाती थी. मनशा कोई जिद कर के तनाव बढ़ाना नहीं चाहती थी.

तभी सहसा एक दिन शाम को समाचार मिला कि रवि सख्त बीमार है और उसे अस्पताल में भरती किया गया है. मांबाप के मना करने पर भी मनशा सीधे अस्पताल पहुंच गई. देखा इमरजैंसी वार्ड में रवि को औक्सीजन और ग्लूकोज दिया जा रहा है. उस का सारा चेहरा स्याह हो रहा था. चारों ओर भीड़ में विचित्र सी चर्चा थी. मामला जहर का माना जा रहा था. रवि किसी डिनर पार्टी में गया था.

नाखूनों का रंग बदल गया था. डाक्टरों ने पुलिस को इत्तला करनी चाही पर तुषार ने समय पर पहुंच कर अपने मित्र विक्टर की सहायता से केस बनाने का मामला रुकवा दिया. यह पता नहीं चल पा रहा था कि जहर उसे किसी दूसरे ने दिया या उस ने स्वयं लिया था. रवि बेहोश था और उस की हालत नाजुक थी.

मनशा के पांव तले से धरती खिसकती जा रही थी. एकएक क्षण काटे नहीं कट रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा क्यों और कैसे हो गया. फिर सहसा बिजली की तरह मस्तिष्क में विचार कौंधा. कल शाम को भैया भी तो उस पार्टी में गए थे. फिर तबीयत इन्हीं की क्यों खराब हुई? बहुत रात गए वह लौट आई.

डाक्टर पूरी रात रवि को बचाने का प्रयत्न करते रहे पर सुबह होतेहोते वे हार गए. दाहसंस्कार बिना किसी विलंब के तुरंत कर दिया गया. मनशा गुमसुम सी कमरे में बैठी रही. न बोल सकी और न रो सकी. रहरह कर कुछ बातें मस्तिष्क की सूनी दीवारों से टकरा जातीं और उन के केंद्र में तुषार भैया आ जाते.

‘तुम्हें जान देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’ कोई महीनेभर पहले उन्होंने कहा था, फिर पार्टी में तुषार के साथ रवि का होना उस की उलझन बढ़ा रहा था. वहां क्या हुआ? क्या भैया से कोई बहस हुई? क्या भैया ने उसे मेरा खयाल छोड़ने की धमकी दी? क्या इसीलिए उस ने आत्महत्या कर ली कि मुझे नहीं पा सकता था? एक बार उस ने कहा भी था, ‘तुम्हारे बिना मैं नहीं जी सकता, मनशा.’ क्या यह स्थिति उस ने मान ली थी कि बिना उस से पूछे? या…उसे… नहीं…नहीं…कौन कर सकता है यह काम…क्या भैया… ‘नहीं…नहीं…’ वह जोर से चीखी. मां हड़बड़ा कर कमरे में आईं. देखा वह बेहोश हो गई है. थोड़ीथोड़ी देर में होश आता तो वह कुछ बड़बड़ाने लगती.

धीरेधीरे वह सामान्य होने लगी. उस ने महसूस किया, भैया उस से कतरा रहे हैं और इसी आधार पर उन के प्रति संदेह का जो सांप कुंडली मार कर उस के मन में बैठा वह भैया के जीवनपर्यंत वैसा ही रहा. उन की मृत्यु के बाद भी मन की अदालत में वह उन्हें निर्दोष घोषित नहीं कर सकी.

दुनिया और जीवन का चक्र जैसा चलना था चला. प्रभात से ही उस का ब्याह हुआ. बच्चे हुए और अब उन का भी ब्याह होने जा रहा था.

न जाने आंखों से कितने आंसू बह गए. रीता दरवाजे पर ही खड़ी रही. मनशा ने ही मुड़ कर देखा तो उस के गले लग कर फिर रो पड़ी. रवि की मृत्यु के बाद वह आज पहली बार रोई है. रीता कुछ समझ नहीं पा रही थी. हम सचमुच जीवन में कितना कुछ बोझ लिए जीते हैं और उसे लिए ही मर भी जाते हैं. यह रहस्य कोई कभी नहीं जान पाता है, केवल उस की झलक मात्र ही कोई घटना कभी दे जाती है.

वे दोनों ड्राइंगरूम में आ कर बैठ गईं. मनशा ने स्थिर हो कौफी पी और अपने बेटे की शादी का कार्ड रीता की ओर बढ़ा दिया. वह बेहद प्रसन्न हुई यह देख कर कि लड़की दूसरी जाति की है. रीता की जिज्ञासा फूट पड़ी, ‘दीदी, जो आप जीवन में नहीं कर सकीं उसे बेटे के जीवन में करते समय कोईर् दिक्कत तो नहीं हो रही है?’

‘हुई थी…भैया ने जैसे सामाजिक स्तर की बातचीत की थी वैसा तो आज भी पूरी तरह नहीं, फिर भी हम इतना आगे तो बढ़े ही हैं कि इतना कर सकें…प्रभात नहीं चाहते थे. बड़ेबुजुर्ग भी नाराज हैं, पर मैं ने मनीष और दीपा के संबंध में संतोषजनक ढंग से सब जाना तो फिर अड़ गई. मैं बेटा नहीं खोना चाहती थी. किसी तरह का खतरा नहीं उठाने की ठान ली. सोच लिया अपनी जान दे दूंगी पर इस को बचा लूंगी, मन का बोझ इस से हलका हो जाएगा.’ उस के चेहरे पर हंसी की रेखा उभर कर विलीन हो गई.

घरपरिवार की कितनी ही बातें कर मनशा चलने को उद्यत हुई तो बैग से एक कागज का पैकेट सा रीता के हाथ में थमा कर कहा, ‘इसे भी रख लो.’

‘यह क्या है दीदी?’

‘आधी तसवीर, जिसे तुम्हारे रवि भैया जोड़ना चाहते थे. जब कभी तुम सुनो कि मनशा दीदी नहीं रहीं तो उस तसवीर से इसे जोड़ देना ताकि वह पूरी हो जाए. यह जिम्मेदारी तुम्हें ही सौंप सकती हूं, रीता.’ वह डबडबाती आंखों के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. अतीत को मुड़ कर दोबारा देखने की हिम्मत उस में नहीं बची थी.

आफत: क्या वंदना अपना हक ले पाई?

Writer- सिद्धार्थ जायसवार

वंदना महतो को अचानक रविवार की सुबह अपने घर आया देख मानसी मन ही मन चौंक पड़ी. ‘‘मेरी एक सहेली का घर पास में है. उस के बीमार बेटे का हालचाल पूछने आई थी तो सोचा आप से भी मिलती चलूं,’’ वंदना सकुचाई सी नजर आ रही थी.

‘‘ये आप ने अच्छा किया,’’ मानसी ने अपने मन में बेचैनी को अपनी आवाज में झलकने नहीं दिया.

‘‘तुम्हारे राजीव सर को तो पता ही नहीं है कि मैं यहां आई हूं,’’ वंदना के होंठों पर छोटी सी मुसकान उभरी.

‘‘तो अब फोन कर के बता दीजिए.’’

‘‘नहीं, अगर संभव हो तो मैं चाहूंगी कि तुम भी हमारी इस मुलाकात की चर्चा उन से ना करो.’’

‘‘तुम ऐसा क्यों चाहती है?’’ मानसी उस के चेहरे को बड़े ध्यान से पढ़ रही थी.

‘‘असल में मैं आज तुम्हारे साथ अपने पति के बारे में ही बाते करने आई हूं, मानसी. हम जो चर्चा करेंगे, वो उन के कानों तक ना पहुंचे तो अच्छा है,’’ वंदना कुछ शर्मिंदा सी दिखने लगी.

‘‘मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि राजीव सर के बारे में आप ऐसी कौन सी गोपनीय बात की चर्चा मुझ से करना चाहती हैं?’’

‘‘तुम्हारे इस सवाल का जवाब मैं कुछ देर के बाद देती हूं, मानसी. फिलहाल तो मैं राजीव में आ रहे कुछ बदलावों को ले कर बहुत चिंतित हूं.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं, मैडम.’’

‘‘वो बहुत चिड़चिड़े और गुस्सैल हो गए हैं, मानसी. खासकर मेरे ऊपर तो बिना बात के चिल्लाते हैं. अपने दोनों बेटो के साथ पहले की तरह ना खेलते हैं, ना हंसतेबोलते हैं. उन के बदले स्वभाव के कारण घर में बहुत टैंशन रहने लगती है,’’ वंदना का अपना दुखदर्द बयान करते हुए गला भर आया.

‘‘लेकिन, हम लोगों ने औफिस में तो ऐसा कोई बदलाव सर के अंदर नहीं देखा है.’’

‘‘मुझे पता था कि तुम्हारा ऐसी ही जवाब होगा, लेकिन मैं सच बोल रही हूं,’’ वंदना कुछ और ज्यादा उदास नजर आने लगी,

‘‘देखो, मैं ना औफिस जाती हूं और ना किट्टी पार्टियों में मुझे अपनी घरगृहस्थी को ढंग से चलाने में सारी खुशियां, सारा सुख मिल जाता है. हम लोग साधारण घरों से आते हैं, जहां औरतों को बुरी तरह दबा कर रखा जाता रहा है. मेरे पति जैसे पढ़ने में तेज लोग कम ही होते हैं और उन्होंने मुझे इसीलिए चुना था कि मैं भी कुछ पढ़ चुकी हूं. मैं ने पूरे तनमन से उन की सेवा की. अब राजीव खुश नहीं रहते हैं तो मेरा मन बहुत दुखता है.’’

‘‘आप ने सर से इस बारे में बात की है?’’

‘‘नहीं, पर मुझे मालूम है कि वो क्यों इतने परेशान रहने लगे हैं.’’

‘‘अगर आप को उन की परेशानी का कारण समझ आ गया है तो उस कारण को ठीक कर लीजिए.’’

‘‘मैं इसीलिए तो तुम्हारे पास आई हूं.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं, मैडम,’’ मानसी तनावग्रस्त नजर आने लगी.

‘‘मैं अपने दिल पर लगे जख्मों को दिखाऊंगी तो सब समझ जाओगी,’’ वंदना की आवाज में पीड़ा के भाव उभरे, ‘‘मैं मोटी हो गई हूं… मुझे ढंग से सजनेसंवरने का तरीका नहीं आता. अब हमारी जाति में वे सुविधाएं नहीं हैं कि हम हर समय अच्छी लगें. मेरी मां ने लकड़ी के चूल्हे में और धूप में अपनी स्किन जलाई है और उस का गुस्सा मुझ पर है.

’’मैं कहीं ले जाने लायक नहीं रही हूं. मैं उन के सामने पड़ी नहीं और उन्होंने मेरे अंदर ऐसे दोष निकालने शुरू किए नहीं. मेरे लिए तो वो सबकुछ हैं. बहुत दुखता है मेरा दिल, जब वो ऐसी चुभती बातें मुंह से निकालते हैं.’’

‘‘तब आप अपनेआप को इतना बदल लीजिए कि वो ऐसी बात सुनानी बंद कर दें,’’ मानसी ने कुछ रूखे से अंदाज में उसे सलाह दी.

‘‘इस दिशा में मैं ने कुछ शुरुआत तो कर दी है, मानसी. रोज सुबहशाम घूमने जाती हूं. उन के औफिस से घर आने से पहले ढंग से तैयार हो जाती हूं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या, मैडम?’’

‘‘लेकिन, मुझे नहीं लगता कि इतना कुछ करने से मेरी समस्या का अंत हो जाएगा,’’ वंदना मायूस हो उठी, ‘‘उन्हें परेशान देख कर मैं खून के आंसू बहाती हूं. अगर मैं उन्हें सारी खुशियां और सुख नहीं दे पाई तो लानत है मुझ पर.’’

‘‘मैडम, आप प्लीज आंसू मत बहाइए.’’

‘‘मेरे आंसुओं को बहने से तुम रुकवा सकती हो, मानसी.’’

‘‘मैं… वो कैसे?’’ मानसी तनाव से भर उठी.

‘‘अब अभिनय मत करो, प्लीज,’’ वंदना ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं ने जरा सी छानबीन की, तो औफिस के कई लोगों ने मुझे बताया कि मेरे पति और तुम एकदूसरे के बहुत करीब आए हुए हो. उन के अंदर आए इस बदलाव की असली वजह तुम हो.”

‘‘ये गलत आरोप है, मैडम. आप को लोगों ने गलत जानकारी दी है.’’

‘‘मुखे मूर्ख मत समझो, मानसी और झूठ बोलने के बजाय मेरे दिल के दुखदर्द को समझने की कोशिश करो,’’ वंदना ने झटके से खड़े हो कर आवेश भरी ऊंची आवाज में उसे टोका, ‘‘वो चिड़चिड़े और गुस्सैल हो गए हैं और मैं उन की आंखों में चुभने लगी हूं तो इस का कारण तुम हो. वो मन ही मन तुम से मेरी तुलना करते हैं. अब तुम ही बताओ कि 2 बच्चों की मां का एक कुंआरी लड़की के साथ क्या मुकाबला हो सकता है?’’

‘‘तुम ने उन की जिंदगी में प्रवेश कर के हमारे विवाहित जीवन की खुशियों को नष्ट कर दिया है. तुम्हारी आकर्षक फिगर और सुंदर रंगरूप. तुम्हारा आत्मविश्वास से भरा सलीकेदार व्यवहार. तुम्हारे व्यक्तित्व का हर पहलू तो मुझ से बेहतर है. सीधी सी बात है कि जब तुम दूसरी औरत बन कर उन के करीब आ गई तो मैं उन की आंखों में चुभने लगी.’’

‘‘देखो, मैं अपने पति की खुशी की खातिर तुम दोनों के अवैध रिश्ते को स्वीकार करने को तैयार हूं, पर यह बात मेरे दिल को बहुत दुखाती है कि वो ऐसा कर के भी खुश नहीं हैं. मैं उन के मन की अशांति के लिए सीधेसीधे तुम्हें जिम्मेवार मान रही हूं, मानसी. तुम मेरे पति के साथ जुड़ी रहना चाहती हो तो खुशी से जुड़ी रहो, लेकिन साथ ही साथ ये भी सुनिश्चित करो कि वो घर में पहले की तरह खुश दिखें. हम सब से खूब हंसेंबोलें. पहले की तरह एक अच्छ पिता और पति बने रहें.

‘‘अगर तुम उन्हें मेरी तरह अपनी जान से ज्यादा चाहती हो तो उन्हें खुश और सुखी रखने में मेरा हाथ बांटो, मानसी. मेरे घर की सुखशांति व खुशियों को अब तुम्हें ही लौटाना होगा. तुम ऐसा नहीं कर सकती हो, या नहीं करना चाहती हो, तो तुम उन की सच्ची शुभचिंतक नहीं हो. तब या तो तुम्हें उन की जिंदगी से निकलना होगा, या फिर मैं तुम्हे अपना दुश्मन समझने लगूंगी. फिर मुझे इस की बिलकुल चिंता नहीं होगी कि मेरे हाथों तुम्हारा कितना बड़ा नुकसान हो रहा है. तब मैं ये नहीं देखूंगी कि तुम्हारा अहित कर के मुझे जेल हो रही है या फांसी लग जाएगी.’’

‘‘आप प्लीज यहां से चली जाओ. आप जबरदस्त गलतफहमी की शिकार हो और इस मामले में मैं आप की कोई सहायता नहीं कर सकती हूं,’’ वंदना का रौद्र रूप देख मानसी की आंखों से डर और चिंता के भाव झांक रहे थे.

‘‘ऐसा मत कहो, मानसी. तुम मेरे पति से प्रेम करती हो तो इस मसस्या को सुलझाने में मेरी सहायता भी करो.’’

‘‘आप चली जाओ मेरे घर से,’’ इस बार मानसी ने गुस्से से चिल्ला कर वंदना को दबानाडराना चाहा था.

‘‘मैं तुम्हें इतनी आसानी से पल्ला झाड़ कर अलग नहीं होने दूंगी. इस मामले में अपनी जिम्मेदारी को समझो,’’ वंदना उस से ज्यादा जोर से चिल्लाई थी.

‘‘मुझे इस मामले में आप से अब कोई बात नहीं करनी है.’’

‘‘शटअप,’’ वंदना उस के सामने तन कर खड़ी हो गई और गुस्से से कांपती आवाज में बोली, ‘‘तुम मेरे पति के साथ प्यार करने का खेल समझ सकती हो, पर मेरे लिए उन की खुशियां, उन का सुख अपनी जान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण व कीमती है. अरे, लानत है ऐसी पत्नी पर, जो अपने घर में पति को हर तरह से खुश ना रख सके.’’

‘‘आप मुझ से क्या चाहती हो?’’ वंदना की आंखों से झांक रहे अजीब से पागलपन के भाव ने मानसी को बहुत बुरी तरह से डरा दिया था.

‘‘ये मुझ से मत पूछो,’’ वो पागल की तरह से चिल्लाई, ‘‘मुझ से पूछ कर… मुझ से सलाह कर के तुम ने क्या इन के साथ इश्क करना शुरू किया था? मुझे हर हाल में इन की हंसीखुशी वापस चाहिए, बस. प्लीज, मेरी हैल्प करो,’’ वंदना ने उस के पास पहुंच कर हाथ जोड़ दिए, पर उसे अपने इतने पास देख कर मानसी और ज्यादा डर गई थी.

‘‘त… आप बैठ कर बात करो, प्लीज. आप को गलतफहमी…’’

‘‘बस, अब चुप हो जाओ,’’ वंदना ने अपना हाथ उठा कर उसे आगे बोलने से रोक दिया और कठोर लहजे में बोली, ‘‘मैं अपने बारे में तुम्हें सिर्फ दो बातें बताना चाहूंगी. पहली बात तो यह है कि मुझे झूठे और धोखेबाज लोग बिलकुल अच्छे नहीं लगते हैं और दूसरी बात यह कि मैं गुस्सा कम करती हूं, पर जब कभी मुझे गुस्सा आता है तो मैं उसे संभाल नहीं पाती और पागल सी हो जाती हूं. इसलिए मैं तुम्हें आखिरी बार चेतावनी दे रही हूं कि अब झूठ का सहारा ले कर इस मामले में अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश मत करो, नहीं तो पछताओगी.’’

‘‘आप मेरी कोई बात सुन तो रही नहीं.’’

‘‘मैं तुम्हें जान से मार दूंगी,’’ गुस्से से कांप रही वंदना ने मेज पर रखा भारी फूलदान हाथ में उठा लिया तो मानसी को लगा कि वो डर के मारे बेहोश ही हो जाएगी.

उस के बिलकुल पास आ कर वंदना ने भावावेश से कांपते स्वर में कहा, ‘‘मानसी, ये सब मेरे लिए खेल नहीं है, क्योंकि मेरे विवाहित जीवन की खुशियां, मेरे बच्चों का भविष्य और मेरे पति के मन की सुखशांति दांव पर लगी हुई है. तुम ने मेरे पति को अपने प्रेमजाल में फंसा कर मेरे घर में अशांति भरी है और अब तुम ही समस्या को सुलझाओ. अगर मैं ने राजीव के अंदर तुरंत ही बदलाव आता नहीं देखा तो मैं फिर लौटूंगी और तब मेरा निशाना चूकेगा नहीं.’’

वंदना ने वो शीशे का फूलदान मानसी के पैरों के पास फेंक कर मारा तो वो तेज आवाज के साथ टूट कर बिखर गया. उस के टूटने की आवाज में मानसी के चीखने की आवाज दब कर रह गई थी.

‘‘मुझ पर तरस खाना, मानसी… मैं तुम्हारी जितनी खूबसूरत और आकर्षक तो नहीं, पर मैं भी खुशी से जीना चाहती हूं,’’ वंदना की आंखों से अचानक आंसू बहने लगे और वो अपना पर्स उठा कर बाहर के दरवाजे की तरफ चल पड़ी थी.

उस के चले जाने के बाद भी मानसी बहुत देर तक अपनी जगह गुमसुम सी बैठी रही थी. बहुत धीरेधीरे उस के दिमाग का सुन्नपना कम हुआ और हाथपैरों में जान वापस लौटी थी.

कई बार उस ने मेज पर रखा अपना मोबाइल उठाया और वापस रखा. वो वंदना की शिकायत अपने प्रेमी राजीव से करना चाहती थी, पर ऐसा करने से उसे बहुत डर भी लग रहा था. बारबार उस के जेहन में वंदना की आंखों से झांक रहा पागलपन उभर आता और वो राजीव का नंबर मिलाने की हिम्मत खो बैठती. वह समझ गई कि वंदना मुश्किल से मिले सुखों को ऐसे ही हाथ से निकलने नहीं देगी और किसी भी हद तक जा सकती है.

‘‘मैं राजीव से वंदना की शिकायत करूंगी तो वो उसे यकीनन डांटेंगे. इस कारण वो पागल फिर मुझ से मिलने जरूर लौटेगी. फिर उस आफत से मैं कैसे निबटूंगी? मुझे नहीं करनी है शिकायत अब. मन में ऐसी हलचल के चलते मानसी ने फोन कर के वंदना की शिकायत उस के पति से नहीं की थी.

उस के मन में राजीव से अपना प्रेम संबंध तोड़ लेने का बीज बोने में वंदना पूरी तरह से सफल रही थी.

वंदना दबेकुचले परिवारों से चाहे आई हो, पर अब अपना हक पाने को पूरी कोशिश करेगी, यह बात साफ थी.

मेरे पति दूसरों के सामने मेरी बेइज्जती करते हैं, क्या करूं?

सवाल

मैं 38 वर्षीया हूं, शादी हुए 8 वर्ष हो गए हैं. शुरुआत में तो पति मेरी बहुत केयर करते थे लेकिन अब वे मुझे बातबात पर डांटा करते हैं, आनेजाने वालों के सामने मेरी बेइज्जती करते हैं. इस से मेरा मन बहुत दुखी होता है. आप बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

शादी के बाद के जीवन की शुरुआत में हम किसी के स्वभाव से उस के व्यक्तित्व को नहीं जान पाते, धीरेधीरे जब हम उस की आदतों से वाकिफ होते हैं तब उस के व्यक्तित्व की असली पहचान हो पाती है. आप के पति में शायद ईगो बहुत है और वे समझते हैं कि वे ही सबकुछ हैं. इसलिए वे आप को सब के सामने अपमानित करते हैं. उन्हें लगता है कि इस से दूसरों पर यह प्रभाव पड़ेगा कि उन की घर में कितनी चलती है.

ऐसे में आप उन्हें समझाएं कि उन का ऐसा रवैया आप को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और अगर वे फिर भी न सुधरें तो आप सख्ती अपनाएं, न कि घुटघुट कर जिएं. अगर आप खुद को अबला दिखाएंगी तो हर कोई आप पर हावी होगा ही, इसलिए हिम्मत से इस परिस्थिति का मुकाबला कर पति को ट्रैक पर ले आइए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

मेहंदी लगी मेरे हाथ: क्या दीपा ने की अविनाश से शादी

शादी के बहुत दिनों बाद मैं पीहर आई थी. पटना के एक पुराने महल्ले में ही मेरा पीहर था और आज भी है. यहां 6-7 फुट की गलियों में मकान एकदूसरे से सटे हैं. छतों के बीच भी 3-4 फुट की दूरी थी. मेरे पति संकल्प मुझे छोड़ कर विदेश दौरे पर चले गए थे. साल में 2-3 टूअर तो इन के हो ही जाते थे.

मैं मम्मी के साथ छत पर बैठी थी. शाम का वक्त था. हमारी छत से सटी पड़ोसी की छत थी. उस घर में एक लड़का अविनाश रहता था. मुझ से 4-5 साल बड़ा होगा. मेरे ही स्कूल में पढ़ता था. मुझे अचानक उस की याद आ गई. मैं मम्मी से पूछ बैठी, ‘‘अविनाश आजकल कहां है?’’

‘‘मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानती हूं. तुम्हारी शादी से कुछ दिन पहले वह यह घर छोड़ कर चला गया था. वैसे भी वह तो किराएदार था. पटना पढ़ने के लिए आया था.’’

मैं किचन में चाय बनाने चली गई पर मुझे अपने बीते दिन अनायास याद आने लगे थे. मन विचलित हो रहा था. किसी काम में मन नहीं लग रहा था. कप में चाय छान रही थी तो आधी कप में और आधी बाहर गिर रही थी. मन रहरह कर अतीत के गलियारों में भटकने लगा था. खैर, मैं चाय बना कर छत पर आ गई. ऊपर मम्मी पड़ोस वाली छत पर खड़ी आंटी से बातें कर रही थीं. दोनों के बीच बस 3 फुट की दूरी थी. मैं ने अपनी चाय आंटी को देते हुए कहा, ‘‘आप दोनों पी लें. मैं अपने लिए फिर बना लूंगी.’’

मैं उन दोनों से अलग छत के दूसरे कोने पर जा खड़ी हुई. अंधेरा घिरने लगा था. बिजली चली गई, तो बच्चे शोर मचाते बाहर निकल आए. कुछ अपनीअपनी छत पर आ गए. ऐसे ही अवसर पर मैं जब छत पर होती थी, अविनाश मुझे देख कर मुसकराता था, तो कभी हवा में हाथ उठाता था. मैं उस वक्त 8वीं कक्षा में थी. मैं अकसर कपड़े सुखाने छत पर आती थी. अविनाश भी उस समय छत पर ही होता था खासकर छुट्टी के दिन.

एक दिन जब मैं छत पर खड़ी थी तो बिजली चली गई. कुछ अंधेरा था. अविनाश ने पास आ कर एक परची मुझे पकड़ा दी और फिर जल्द ही वहां से मुसकराता हुआ भाग खड़ा हुआ. मैं बहुत डर गई थी. परची को कुरते के अंदर छिपा लिया. बचपन और जवानी के बीच के कुछ वर्ष लड़कियों के लिए बड़े कशमकश भरे होते हैं. कभी मन उछलनेकूदने को करता है तो कभी बाली उम्र से डर लगता है. कभी किसी को बांहों में लेने को जी चाहता है तो कभी खुद किसी की बांहों में कैद होने को जी करता है.

मैं ने बाद में उस परची को पढ़ा. लिखा था, ‘‘दीपा, तुम मुसकराती हो तो बहुत सुंदर लगती हो और मुझे यह देख कर खुशी होती है.’’

ऐसे ही समय बीत रहा था. मेरी दीदी की शादी थी. मेहंदी की रस्म थी. मैं ने भी

दोनों हाथों में मेहंदी लगवाई और शाम को छत पर आ गई. अविनाश भी अपनी छत पर था. उस ने मुसकरा कर हाथ लहराया. न जाने मुझे क्या सूझा कि मैं ने भी अपने मेहंदी लगे हाथ उठा दिए. उस ने इशारों से रेलिंग के पास बुलाया तो मैं किसी आकर्षणवश खिंची चली गई. उस ने तुरंत मेरे हाथों को चूम लिया. मैं छिटक कर अलग हो गई.

अविनाश को जब भी मौका मिलता मुझे चुपके से परची थमा जाता था. यों ही मुसकराती रहो, परची में अकसर लिखा होता. मुझे अच्छा तो लगता था, पर मैं ने न कभी जवाब दिया और न ही कोई इजहार किया.

मैं ने प्लस टू के बाद कालेज जौइन किया था. एक दिन अचानक दीदी ने अपनी ससुराल से कोई अच्छा रिश्ता मेरे लिए मम्मीपापा को सुझाया. मैं पढ़ना चाहती थी पर सब ने एक सुर में कहा, ‘‘इतना अच्छा रिश्ता चल कर अपने दरवाजे पर आया है. इस मौके को नहीं गंवाना है. तुम बाकी पढ़ाई ससुराल में कर लेना.’’

मेरी शादी की तैयारी चल रही थी. अविनाश ने एक परची मुझे किसी छोटे बच्चे के हाथ भिजवाई. लिखा था कि शादी मुबारक हो. ससुराल में भी मुसकराती रहना. शायद तुम्हारी शादी की मेहंदी लगे हाथ देखने का मौका न मिले, इस का अफसोस रहेगा.

मैं शादी के बाद ससुराल इंदौर आ गई. पति संकल्प अच्छे नेक इंसान हैं, पर अपने काम में काफी व्यस्त रहते थे. काम से फुरसत मिलती तो क्रिकेट के शौकीन होने के चलते टीवी पर मैच देखते रहेंगे या फिर खुद बल्ला उठा कर अपने क्रिकेट क्लब चले जाएंगे. वैसे इस के लिए मैं ने उन से कोई गिलाशिकवा नहीं किया था.

मम्मी की आवाज से मेरा ध्यान टूटा, ‘‘दीपा, कल पड़ोसी प्रदीप अंकल की बेटी मोहिनी की मेहंदी की रस्म है और लेडीज संगीत भी है. तुम तो उसे जानती हो. तुम्हारे स्कूल में ही थी. तुम से 2 क्लास पीछे. तुम्हें खासकर बुलाया है. मोहिनी ने भी कहा था दीपा दी को जरूर साथ लाना. तुम्हें चलना होगा.’’

अगले दिन शाम को मैं मोहिनी के यहां गई. दोनों हाथों में कुहनियों तक मेहंदी लगवाई. कुछ देर तक लेडीज संगीत में भाग लिया, फिर बिजली चली गई तो मैं अपने घर लौट आई. हालांकि वहां जनरेटर चल रहा था. म्यूजिक सिस्टम काफी जोर से बज रहा था. मैं यह शोरगुल ज्यादा नहीं झेल पाई, इसलिए चली आई.

मैं अपनी छत पर गई. मुझे अविनाश की याद आ गई. मैं ने अचानक मेहंदी वाले दोनों हाथों को हवा में लहरा दिया. पड़ोस वाली आंटी ने अपनी छत से मुझे देखा. वे समझीं कि मैं ने उन्हें हाथ दिखाए हैं. रेलिंग के पास आ कर मुझे पास बुलाया और फिर मेरे हाथ देख कर बोलीं, ‘‘काफी अच्छे लग रहे हैं मेहंदी वाले हाथ. रंग भी पूरा चढ़ा है. दूल्हा जरूर बहुत प्यार करता होगा.’’

मैं ने शरमा कर अपने हाथ हटा लिए. रात में मैं लैपटौप पर औनलाइन थी. मैं ने अप्रत्याशित अविनाश की फ्रैंड रिक्वैस्ट देखी और तत्काल ऐक्सैप्ट भी कर लिया. थोड़ी ही देर में उस का मैसेज आया कि कैसी हो दीपा और तुम्हारी मुसकराहट बरकरार है न? संकल्प को भी तुम्हारी मुसकान अच्छी लगती होगी.’’

मैं आश्चर्यचकित रह गई. इसे संकल्प के बारे में कैसे पता है. अत: मैं ने पूछा, ‘‘तुम उन्हें कैसे जानते हो?’’

‘‘मैं दुबई के सैंट्रल स्कूल में टीचर हूं. संकल्प यहां हमारे स्कूल में कंप्यूटर और वाईफाई सिस्टम लगाने आया था. बातोंबातों में पता चला कि वह तुम्हारा पति है. उस ने ही तुम्हारा व्हाट्सऐप नंबर दिया है.’’

‘‘खैर, तुम बताओ, कैसे हो? बीवीबच्चे कैसे हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पहले बीवी तो आए, फिर बच्चे भी आ जाएंगे.’’

‘‘तो अभी तक शादी नहीं की?’’

‘‘नहीं, अब कर लूंगा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘हर क्यों का जवाब हो, जरूरी नहीं है. वैसे एक बार तुम्हारी मुसकराहट देखने की इच्छा थी. खैर, छोड़ो और क्या हाल है?’’

‘‘पड़ोस में मोहिनी की मेहंदी की रस्म में गई थी.’’

‘‘तब तो तुम ने भी अपने हाथों में मेहंदी जरूर लगवाई होगी.’’

‘‘हां.’’

‘‘जरा वीडियो औन करो, मुझे भी दिखाओ. तुम्हारी शादी की मेहंदी नहीं देख सका था.’’

‘‘लो देखो,’’ कह कर मैं ने वीडियो औन कर अपने हाथ उसे दिखाए.

‘‘ब्यूटीफुल, अब एक बार वही पुरानी मुसकान भी दिखा दो.’’

‘‘यह तुम्हारे रिकौर्ड की सूई बारबार मुसकराहट पर क्यों अटक जाती है.’’

‘‘तुम्हें कुछ पता भी है, एक भाषा ऐसी है जो सारी दुनिया जानती है.’’

‘‘कौन सी भाषा?’’

‘‘मुसकराहट. मैं चाहता हूं कि सारी दुनिया मुसकराती रहे और बेशक दीपा भी.’’ मैं हंस पड़ी.

वह बोला, ‘‘बस यह अरमान भी पूरा हो गया.’’

मुझे लगा मेरी भी सुसुप्त अभिलाषा पूरी हुई. अविनाश के बारे में जानना चाह रही थी. अत: बोली, ‘‘अपनी शादी में बुलाना नहीं भूलना.’’

‘‘अब पता मिल गया तो भूलने का सवाल ही नहीं उठता. इसी बहाने एक बार फिर तुम्हारे मेहंदी वाले हाथ और वही मुसकराता चेहरा भी देख लूंगा.’’

‘‘अब ज्यादा मसका न लगाओ. जल्दी से शादी का कार्ड भेजो.’’

‘‘खुशी हुई शादी के बाद तुम्हें बोलना तो आ गया. आज से पहले तो कभी बात भी नहीं की थी.’’

‘‘हां, इस का अफसोस मुझे भी है.’’

एक बार फिर बिजली चली गई. इंटरनैट बंद हो गया. अविनाश कितना चाहता था मुझे शायद मैं नहीं जान पाती अगर उस से आज बात नहीं हुई होती.

बहके माता पिता, बच्चों का टूटता विश्वास

एक प्रतिष्ठित अंगरेजी पाक्षिक पत्रिका के ‘पाठकों की समस्या’  स्तंभ में एक गंभीर समस्या पढ़ने को मिली. कालेज के एक छात्र ने लिखा था, ‘मैं अपने मातापिता का बहुत सम्मान करता हूं. उन्हें अपना आदर्श मान कर उन्हीं की तरह बनना चाहता हूं. लेकिन पिछले दिनों मैं यह देख कर हैरान रह गया कि मेरी मां पड़ोस के एक व्यक्ति से प्यार की पींगें बढ़ा रही हैं. मैं ने अपनी आंखों से उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में देखा है. बस, तब से ही इच्छा होती है कि उस पड़ोसी की हत्या कर डालूं.’

मन की गुत्थियों को व्यक्त करते हुए छात्र का कहना था कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस रहस्य को मैं किस तरह जाहिर करूं. यदि पिता को बताता हूं तो परिवार के बरबाद होने का खतरा नजर आता है और मां को कहता हूं तो डर लगता है कि शर्म से वे आत्महत्या न कर लें.

ऐसी मनोदशा में कुछ दुर्घटना होने की संभावना है. मातापिता के दुराचरण को बच्चे जानने लगे, इस से अधिक त्रासद स्थिति और कुछ नहीं हो सकती. इस तरह की घटनाओं पर बड़े तो अपनेअपने तरीकों से प्रतिक्रियाएं जाहिर कर मन की भड़ास निकाल लेते हैं, किंतु बच्चे न विरोध के स्वर में बोल पाते हैं और न ही मातापिता का पक्ष ले सकते हैं.

पारंपरिक भारतीय परिवार में इस तरह का आचरण और भी असहनीय है. कई बार मन की बात कहने का उन का तरीका उपरोक्त छात्र की तरह होता है, बहुत बार उन्हें मानसिक आघात सहना पड़ता है. इस के अलावा बच्चों का मातापिता के प्रति विश्वास टूट जाता है. इस विश्वास के टूटने से बच्चे अकेले पड़ जाते हैं तथा इस पीड़ा को वे किसी दूसरे के साथ बांट भी नहीं सकते.

जानलेवा नतीजे

अकसर बच्चे मातापिता को दुनिया का सब से आदर्श चरित्र मानते हैं. व्यवहार में उन्हीं का अनुसरण करते हैं. मगर जब एक दिन अचानक ही उन्हें पता चलता है कि जिन को वे अपना आदर्श मानते हैं वे खुद गलत रास्ते पर जा रहे हैं तो बच्चे के मन को गहरा आघात लगता है.

इस चोट से बच्चा इतना विचलित होता है कि यदि उस का वश चले तो वह मातापिता से रिश्ता ही तोड़ ले. लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सकता. बच्चे को उन का नाम जीवन भर ढोना पड़ता है. इस के साथ ही उसे ढोनी होती हैं वे बातें जो मातापिता के गलत आचरण को ले कर समाज में जाहिर हो चुकी होती हैं.

कई बार ऐसी मजबूरी हिंसा का रूप ले लेती है. एक बार, एक बेटे ने पिता की हत्या कर दी और हथियार सहित थाने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया. पूछताछ से पता चला कि युवक की मां का बचपन में ही देहांत हो गया था. पिता ने बेटे की वजह से दूसरा विवाह नहीं किया. बेटे की निगाह में पिता का दर्जा सर्वोपरि था.

बेटे के बड़े होने पर एक विधवा मां की सुयोग्य बेटी के साथ बेटे का रिश्ता तय कर दिया. चूंकि उन के परिवार अधूरे थे, इसीलिए विवाह के पहले ही दोनों परिवारों के बीच आनाजाना शुरू हो गया. एक दिन लड़के को पता चला कि उस के पिता के दिल के तार मंगेतर की मां के साथ जुड़ गए थे. पहले तो उस ने इसे अपने मन का भ्रम समझा, लेकिन जब एक दिन लड़के ने पिता को अंतरंग क्षणों में अपनी आंखों से देख लिया तो वह सन्न रह गया. उसे लगा कि अब तो मंगेतर के साथ उस के संबंध भाईबहन जैसे बन कर रह गए हैं, वह उत्तेजित हो उठा. इसी उत्तेजना में उस ने पिता की अलमारी में से रिवौल्वर निकाली और उन की हत्या कर दी.

बच्चे चरित्र के मामले में दूसरों की कमजोरियों को तो नजरअंदाज कर सकते हैं, लेकिन अपने मातापिता में चरित्रहीनता का एहसास उन्हें विचलित कर देता है. बच्चों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन के मातापिता भी अन्य लोगों की तरह सामान्य व्यक्ति हैं. इसलिए बच्चों को चाहिए कि वे मातापिता को परिस्थितियों के अनुसार देखें और समझें.

इस का मतलब यह भी नहीं है कि मातापिता की कमजोरियों को नजरअंदाज कर उन्हें स्वीकार कर लिया जाए, पर यह जरूरी है कि जरूरत से अधिक संवेदनशील होने से बच्चों को बचना चाहिए. अधिकतर बच्चे इस चिंता से पीडि़त रहते हैं कि मातापिता की चरित्रहीनता से उठे प्रश्नों का वे क्या जवाब देंगे. उन की दूसरी परेशानी यह होती है कि मातापिता के बहक जाने से घर बरबाद हो जाएगा और वे कहां जाएंगे. इसीलिए उन का गुस्सा होना स्वाभाविक है. मगर बच्चों को यह नहीं भूलना चाहिए कि मातापिता की भी परिवार के प्रति जिम्मेदारी है, परिवार की चिंता उन्हें भी है. बदनामी को ले कर उठने वाले सवालों का जवाब पहले तो उन्हें ही देना है.

खुद को रखें संयत

बच्चों को चाहिए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने पर खुद को संयत रखें. मातापिता में से वे जिस के भी आचरण से दुखी हैं उन्हें अपनी बात दृढ़ता से पर विनम्र शब्दों में कहें. यदि बच्चे आमनेसामने अपनी बात कहने में असमर्थ हैं तो वही बात किसी कागज पर लिख कर कही जा सकती है.

प्रारंभ में बात कहना, बिना मतलब का बतंगड़ हो सकती है, क्योंकि यह भी संभव है कि जो देखा, समझा या सुना गया है वह शुरुआत हो, लेकिन इस से कम से कम स्थिति तो स्पष्ट हो जाएगी और यदि ऐसा है तो इस के बाद मातापिता के आचरण में सुधार अवश्य आएगा. यह कभी नहीं भूलें कि जिस तरह बच्चे, मातापिता को आदर्श मानते हैं वैसे ही मातापिता भी नहीं चाहते कि वे बच्चे की निगाहों से गिर जाएं.

इस के बावजूद मातापिता के चरित्रहीन होने की स्थिति आ जाए तो उस से घबराना नहीं चाहिए. परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करना चाहिए. सच है कि दुराचरण का मार्ग अंतत: पारिवारिक बरबादी तक जाता है, पर इस के लिए घर छोड़ना, पढ़ाई छोड़ना या आत्महत्या करने जैसे कार्य उचित नहीं हैं. यदि बच्चे चाहें तो मातापिता के दुराचरण व पारिवारिक बरबादी के खिलाफ, कानून का सहारा ले सकते हैं. बच्चे के भरणपोषण के लिए मातापिता उत्तरदायी हैं. बस, जरूरत इस बात की है कि दोषी मातापिता की औलाद सही कदम उठाए. बिना सोचेसमझे विरोध का बिगुल बजा देना भी ठीक नहीं.

सोनाक्षी सिन्हा की शादी, कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

यह गीत तो आप ने सुना ही होगा- ‘कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना…’ यह गीत अभिनेता व राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा पर एकदम सटीक बैठता है. अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा अपनी शादी की वजह से सुर्खियों में हैं. वे ऐक्टर जहीर इकबाल के साथ 23 जून को शादी के बंधन में बंधने जा रही हैं. इस कपल की शादी का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर शादी को ले कर उन्हें काफी ट्रौल किया जा रहा है.

ट्रौल करने का कारण क्या है

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की शादी का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि उन के होने वाले पति जहीर मुसलिम हैं. इस को ले कर बहुत बातें की जा रही हैं, जैसे ‘अब सोनाक्षी का नंबर है’, ‘अब देखो कितने टुकड़ो में अटैची में वे लौट कर आती हैं’ और न जाने क्याक्या कहा जा रहा है.

सिर्फ यही एक कारण नहीं है और भी बातें हैं जिन की वजह से उन की शादी का विरोध हो रहा है, जैसे कि जहीर सोनाक्षी के मुकाबले एक फ्लौप ऐक्टर हैं. जहीर इकबाल के पास फिल्म इंडस्ट्री में फिलहाल कोई काम नहीं है. फिल्म ‘डबल एक्सेल’ के बाद से उन्हें इंडस्ट्री में कोई दूसरी फिल्म नहीं मिली है. वहीं नैटवर्थ के मामले में भी सोनाक्षी, अपने होने वाले पति जहीर से काफी आगे हैं. ऐसे न जाने कितने रीजन हैं जिन वजहों से आम पब्लिक ने उन्हें कठघरे में खड़ा किया हुआ है जबकि इस मैटर से सीधेतौर पर उन का कोई लेनादेना नहीं है.

हालांकि, सोनाक्षी की फैमिली को इस शादी से कोई दिक्कत नहीं है. इस शादी पर उन के पिता ने कहा है, “अगर सोनाक्षी अपनी पसंद के लड़के से शादी करेगी तो मैं नाराज क्यों होंऊंगा. मैं ने खुद 40 वर्षों पहले अपनी पसंद की लड़की से शादी की थी. मैं ने भी अपना लाइफपार्टनर खुद चूज किया. बच्चों से अनरियलिस्टिक एक्सपैक्टेशन नहीं होनी चाहिए.”

37 साल की उम्र में सोनाक्षी ने शादी करने का फैसला लिया है तो कुछ सोचसमझ कर ही लिया होगा. सोनाक्षी ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा भी है कि, “सोशल मीडिया पर हर वक्त मेरी शादी को ले कर मुझे ट्रौल किया जाता है पर मैं ये बातें एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती हूं.”
उन का कहना है, “सब से पहले तो इस से किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए. यह मेरी लाइफ है और इस के साथ मैं जो मरजी करूं. दूसरे, यह मेरी अपनी पर्सनल चौइस है. पता नहीं लोगों को इस की इतनी चिंता क्यों है. मेरे पेरैंट्स से ज्यादा तो लोग मेरी शादी के बारे में जानना चाहते हैं और मुझ से तरहतरह के सवाल करते हैं. यह सब मुझे बहुत फनी लगता है और अब मुझे इस की आदत हो गई है. मैं कर ही क्या सकती हूं. लेकिन फिर भी सोशल मीडिया पर मुझे ट्रौल करने वालों की कमी नहीं है.”

शादी को दे रहे धार्मिक रंग

कुछ लोगों का कहना है कि शत्रुघ्न के बेटों का नाम लव, कुश हैं. उन के बंगले का नाम रामायण है. लेकिन बंगले का नाम रामायण रख देने से उस में रघुकुल के संस्कार नहीं आ सकते. शत्रुघ्न अपने बच्चों को संस्कार देने में पूरी तरह से विफल रहे हैं. इस का रीजन देते हुए लोगों का कहना है कि सोनाक्षी को शादी करने के लिए एक मुसलिम ही मिला था.

अब भाई यह तो दिल का मामला है. इस में हिंदूमुसलिम कहां से आ गया. सोनाक्षी को जिस से प्रेम हुआ, जो उन्हें पसंद आया वे उसी से शादी कर रही हैं. लेकिन यह बात धर्म के ठेकेदार बने इन दोगले लोगों को कौन समझाए. धर्म के ठेकेदारों को राम-शूर्पणखा संवाद और लंका विजय के बाद राम-सीता संवाद पढ़ने चाहिए. रावण पौराणिक कथाओं के अनुसार विधर्मी तो नहीं था पर उच्चकुल के राम के बराबर नहीं था तभी तो उस पर जीत की कहानी के पात्रों को ले कर हंगामे आज भी किए जाते हैं. भीम ने हिडिंबा से विवाह क्यों किया? शायद इसलिए कि तब ट्रौलर्स नहीं थे.

मैच्योरिटी से लिया हुआ डिसीजन

सोनाक्षी ने जहीर के साथ 7 साल डेटिंग करने के बाद यह फैसला लिया है तो सोचसमझ कर ही लिया होगा. 37 साल की उम्र में वे इतनी परिपक्व तो हो गई होंगी कि अपना अच्छाबुरा समझ सकें. इस उम्र में कोई भी लड़की अपना फैसला खुद ले सकती है. ऐसे में उन के फैसले पर सवाल उठाना किसी भी लिहाज से सही नहीं है. वैसे भी, वह लड़का उन के लिए सही है या नहीं, यह देखने का काम उन के परिवार का है न कि समाज का.

शादी न करने पर भी सवाल उठाते हैं लोग

शादी न करने पर भी यही लोग बातें बनाते हैं कि इतनी उम्र हो गई, अभी तक शादी नहीं की. शादी की एक उम्र होती है और भी न जाने क्याक्या बोलते हैं. और अब कर रही है, तो भी सवाल उठा रहे हैं. जबकि इन लोगों को अब तो खुश होना चाहिए कि, देर से सही, वे शादी कर तो रही हैं. लेकिन इन लोगों का कुछ नहीं हो सकता.

शादी करना मौलिक और मानवीय अधिकार है

अपनी पसंद के साथी से शादी करना संविधान से मिला मौलिक अधिकार है. मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 16 (1) के अनुसार : बालिग स्त्रीपुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या धर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार को स्थापन करने का अधिकार है. उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन तथा विवाहविच्छेद के विषय में समान अधिकार है. विवाह करने का अधिकार आंतरिक विषय है. इस अधिकार को संविधान में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत सुरक्षा प्रदान की गई है. फिर इस पर कोई भी कैसे सवाल उठा सकता है?

दखलंदाजी करना गलत है

जिस को जिस से शादी करनी है, वो करे. यह उस की अपनी आजादी है. लेकिन ट्रौल करने वाले ये लोग वही हैं जिन के अपने बच्चे शादी के बाद मातापिता को बताते हैं कि उन्होंने शादी कर ली है और ये लोग तब चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते. शायद यही वजह है कि इन का गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन सोशल मीडिया पर निकलता है.

सलाह

ऐसी आंटियां और अंकल से हमारा यही कहना है कि दूसरों पर उंगली उठाने से पहले जरा आप अपने घर की सुध ले लें. कहीं आप के बच्चे ही तो आप को सरप्राइज देने की तैयारी न कर रहें हो. इसलिए जरा बाहर ताकझांक बाद में कर लेना, पहले अपना घर संभालें.

लगातार होती आतंकवादी घटनाएं चिंताजनक, क्या सरकारी प्रयास काफी हैं?

आगामी सितंबर में कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं. दूसरी तरफ वहां आतंकवादी घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं. ऐसे में आज देश और दुनिया में स्वर उठ रहा है कि तीसरे डब्बे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर की ओर पीठ कर के क्यों खड़े हो गए हैं.

मौजूदा भारत सरकार के प्रयास करने के बाद भी एक बार फिर ऐसा लग रहा है मानो कश्मीर आतंकवाद की राह पर आगे बढ़ता जा रहा है जिसे रोकना अपरिहार्य है. एक ओर जहां आतंकवादी अपनी गतिविधियों से बाज नहीं आ रहे हैं वहीं सरकार शिकंजा कसती चली जा रही है. शायद यही कारण है कि नैशनल कौन्फ्रैंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी हमलों के बाद लोगों की कथित गिरफ्तारी और परेशान करने को ले कर जम्मूकश्मीर प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर सरकार आतंकवाद को खत्म करना चाहती है तो उसे स्थानीय लोगों को अपने साथ लेना होगा.”

अब्दुल्ला ने आगे कहा, “अक्षम जम्मूकश्मीर प्रशासन सिर्फ आम लोगों को गिरफ्तार करना, हिरासत में लेना और परेशान करना जानता है. वह बारबार एक ही गलती करता है और फिर भी अलग नतीजे की उम्मीद करता है. आतंकवाद को खत्म करने के लिए आप को स्थानीय लोगों को अपने साथ मिलाने की जरूरत है, न कि अलगथलग और नाराज करने की. वे अपनी पार्टी नैशनल कौन्फ्रैंस की एक पोस्ट पर टिप्पणी कर रहे थे, जिस में दावा किया गया था कि पिछले कुछ दिनों में हुए आतंकवादी हमलों के मद्देनजर चिनाब घाटी और पीर पंजाल क्षेत्र में आम लोगों को परेशान किया जा रहा है, हिरासत में लिया जा रहा है और गिरफ्तार किया जा रहा है.
“जम्मूकश्मीर नैशनल कौन्फ्रैंस हमेशा शांति के लिए और चरमपंथी ताकतों के खिलाफ खड़ी रही है. इस ने आतंकवाद के कारण अपने हजारों कार्यकर्ताओं को खोया है और उन के दर्द को गहराई से समझती है. मगर चिनाब और पीर पंजाल से आम लोगों को परेशान करने के लिए हिरासत में लेने और गिरफ्तार किए जाने की खबरें आ रही हैं जो बेहद दुखद हैं. इन घटनाओं के बीच देखना होगा कि लंबे समय से कश्मीर में जो प्रतिरोध बना हुआ है, लोकतंत्र बहाली की तरफ लोगों की निगाह है, वह कब पूरी होगी.”

हमला दर हमला

जम्मूकश्मीर में आतंकवाद बढ़ता जा रहा है. इस का एक उदाहरण है रियासी जिले में हाल में तीर्थयात्रियों से भरी एक बस पर हुए आतंकवादी हमले की जांच के सिलसिले में 50 लोगों को हिरासत में लिया गया है. पुलिस ने कहा, “समग्र जांच सुनिश्चित करने के वास्ते आतंकवादियों की धरपकड़ के लिए तलाशी अभियान का दायरा रियासी जिले के अरनास और माहौर जैसे दूरदराज के क्षेत्रों तक बढ़ाया गया है जो 1995 और 2005 के बीच आतंकवादियों के गढ़ हुआ करते थे.”

तीर्थयात्रियों को ले कर शिवखोड़ी मंदिर से ले कर माता वैष्णोदेवी जा रही एक बस पर 9 जून, 2024 को आतंकवादियों ने हमला कर दिया था. इस गोलीबारी के बाद बस खाई में गिर गई, जिस से 9 लोगों की मौत हो गई थी तथा 49 अन्य घायल हो गए. बस में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के तीर्थयात्री सवार थे. पुलिस प्रवक्ता ने 50 संदिग्धों को हिरासत में लिए जाने की पुष्टि करते हुए कहा, “पुलिस समग्र जांच कर रही है. अहम सुराग सामने आए हैं जिन से उन लोगों की पहचान एवं गिरफ्तारी में मदद मिल रही है जिन का इस हमले की साजिश में हाथ हो सकता है. उन्होंने कहा, “इन अभियानों का लक्ष्य अधिक से अधिक सबूतों को जुटाना तथा उन आतंकवादियों को पकड़ना है जो इन सुदूर इलाकों में छिपे हो सकते हैं.”

जम्मूकश्मीर के पुलिस महानिदेशक आर आर स्वैन ने पाकिस्तान पर अपने भाड़े के सैनिकों के जरिए यहां का शांतिपूर्ण माहौल बिगाड़ने की कोशिश करने का आरोप लगाया और कहा, “भारतीय सेना दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए दृढ़ संकल्पित है और ‘दुश्मन एजंटों’ को चेतावनी दी कि वे आतंकवाद का समर्थन करने के अपने फैसले पर पछताएंगे.” उन्होंने यह भी कहा कि उन के पास परिवार, जमीन और नौकरियां हैं, जबकि पाकिस्तानी आतंकवादियों के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. डीजीपी ने रियासी जिले में कहा कि जम्मूकश्मीर में आतंकवाद का प्रारंभिक बिंदु सीमापार है.

विरोधी पक्ष का स्पष्ट इरादा यह है कि यदि वे कश्मीर में शांतिपूर्ण माहौल बिगाड़ने के लिए स्थानीय लोगों को विध्वंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित नहीं कर सकते तो पाकिस्तानियों को वहां भेज कर उन की भरती करें और उन्हें जबरन इस दिशा में धकेलें. पुलिस प्रमुख मां वैष्णो देवी मंदिर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए आधार शिविर कटरा में थे. उन्होंने जिले में सुरक्षा की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की. इसी जिले के शिवखोड़ी में आतंकियों ने 9 जून को शाम को एक बस पर हमला किया था, जिस में 9 लोग मारे गए और 41 घायल हो गए.

इस बैठक में अन्य लोगों के अलावा रियासी के पुलिस उपायुक्त विशेष पाल महाजन, उधमपुर-रियासी रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक रईस मोहम्मद भट और रियासी की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मोहिता शर्मा शामिल हुए. पुलिस प्रमुख ने कहा कि, “दुश्मनों के एजेंट पैसे और नशीले पदार्थों के लिए विदेशी आतंकियों की मदद कर रहे हैं. उन की पहचान की जाएगी और उन से सख्ती से निबटा जाएगा.

“हम उन्हें चेतावनी देना चाहते हैं कि आतंकवादी मारे जाएंगे. लेकिन जो लोग उन का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें पछताना पड़ेगा. विदेशी आतंकियों के पास कोई नहीं है, चाहे उन के बच्चे हों या नहीं. हमें नहीं पता कि वे जेलों से उठा कर किसे यहां भेज रहे हैं, लेकिन जो लोग आतंकियों का यहां समर्थन कर रहे हैं, उन के पास यहां जमीन, बच्चे और नौकरियां हैं और उन्हें नुकसान उठाना होगा.”

मोदी 3.0 की 7 महिला सांसदों की दी गई ये जिम्मेदारी

कोई सरपंच थीं, तो कोई पति की मृत्यु के बाद राजनीति में आईं, कोई साधारण परिवार से थीं, तो कोई राजनीतिक घराने से, मंत्रिमंडल में शामिल 7 महिला मंत्री कौन हैं, उन्हें कौन सा पदभार मिला है जानें

मोदी मंत्रिपरिषद के इन महिला चेहरों में कुछ से लोग बहुत वाकिफ नहीं हैं। 16वीं लोकसभा मोदी 1.0 में महिला मंत्रियों की संख्या 8 थी. 17 वीं लोकसभा मोदी 2.0 में यह संख्या 6 हो गई और इस बार पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार में सात महिला मंत्री हैं। आइए एक-एक कर इनसे परिचय करें और जानें कि जनसेवा के लिए इन्हें कौन सा पद सौंपा गया है.

1 निर्मला सीतारमण: मोदी सरकार में निर्मला सीतारमण जैसा किस्मत का धनी शायद ही कोई हो. 2014 में पहली बार मोदी मंत्रिमंडल में उन्होंने रक्षा मंत्री का पदभार संभाला, वहीं दूसरी बार वित्त मंत्री का कार्यभार सौंपा गया. इस बार फिर वित्त मंत्रालय संभाल रही हैं. संसद का मानसून सेशन 22 जुलाई को शुरू होगा और तब फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण 2024-25 फाइनेंशिअल ईयर के लिए पूर्ण बजट पेश करेंगी. इस यूनियन बजट को पेश करने के साथ ही वह लगातार 7 बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री बन जाएगीं. इनके पहले मोरारजी देसाई ने 5 पूर्णकालिक और एक अंतरिम बजट पेश किया था.
ये भी जानें – 2019 में जब मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आई, तो निर्मला सीतारमण ने ट्रेडिशनल ब्रीफकेस को बही खाते से रिप्लेस किया.

 

2 अनुप्रिया पटेल  –
अनुप्रिया पटेल मोदी सरकार में पहले भी केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। इस बार उनको दो मंत्रालयों में केंद्रीय राज्यमंत्री का दायित्व दिया गया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री के साथ अनुप्रिया को रसायन और उर्वरक मंत्रालय में भी राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। अनुप्रिया पटेल, अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी हैं. साइकोलौजी में मास्टर्स की डिग्री के साथ अनुप्रिया ने एमबीए भी किया है. यूपी के मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया को तीसरी बार राज्यमंत्री का पदभार मिला है. वर्तमान सरकार में उनको पहली बार दो मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली है।
ये भी जानें  –अपना दल प्रमुख अनुप्रिया पटेल ज्यादा चर्चा में रहने से बचती हैं. लेकिन फिर भी कुछ विवाद उनका पीछा नहीं छोड़ते, जैसे 2014 में विधानसभा उपचुनाव को लेकर उनका मां कृष्णा पटेल से विवाद हो गया था. इसके बाद मां ने बेटी और उसके समर्थकों को पार्टी से निकाल बाहर किया. उसके बाद अपना दल पार्टी दो धड़ों में बंट गई. अपना दल (एस) अनुप्रिया पटेल की पार्टी है.  2014 में बीजेपी के साथ गठबंधन करने के बाद वह यूपी के मिर्जापुर से पहली बार सांसद बनी थी. 

3 अन्नपूर्णा देवी  –
मोदी 3.0 की महिला मंंत्रियों में से एक अन्नपूर्णा देवी का नाम कुछ लोगों के लिए नया हो सकता है. झारखंड के कोडरमा से सांसद अन्नपूर्णा देवी को नई सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है . पिछली सरकार में वे केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री थी.
ये भी जानें – अन्नपूर्णा देवी ने पति विजय यादव की मृत्यु के बाद राजनीति का रुख किया.  राजनीतिक कैरिअर की शुरुआत इन्होंने राष्ट्रीय जनता दल से की थी. आरजेडी में रहते हुए वे 5 बार विधायक बनी. साल 2019 में बीजेपी में शामिल हुई. 

4 रक्षा खड़से – 9 जून 2024 को आयोजित मोदी 3.0 शपथ ग्रहण समारोह में शपथ लेने वाली महिला मंत्रियों में रक्षा खड़से सबसे युवा महिला मंत्री हैं, इन्हें युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है. रक्षा खडसे 23 साल की थीं, तभी सरपंच बन गई थीं. महाराष्ट्र के रावेर से सांसद रक्षा मजबूत पर्सनालिटी की महिला मानी जाती हैं. इनकी एक फोटो काफी वायरल हुई थी, जिसमें वे अपने दो बच्चों को गोद में लिए हुए थीं.
ये भी जानें –  शरद पवार गुट के एनसीपी नेता एकनाथ खड़से की बहू हैं रक्षा खड़से. एकनाथ खड़से भाजपा में शामिल हो गए थे. रक्षा के पति का नाम निखिल खड़से था. निखिल खड़से ने खुद को गोली मार ली थी।

5 सावित्री ठाकुर – वर्तमान मोदी मंत्रिपरिषद में सबसे चौंकानेवाला नाम सावित्री ठाकुर का रहा. आदिवासी समाज से आनेवाली सावित्री ठाकुर को राज्यमंत्री बनाया गया है. मप्र के धार से चुनाव जीतकर केंद्रीय मंत्रालय तक पहुंचीं सावित्री ठाकुर को महिला और बाल विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है.
ये भी जानें – सावित्री देवी को मप्र में भाजपा का आदिवासी चेहरा माना जाता है.

6 निमूबेन बंभाणिया
कोली समाज से संबंध रखनेवाली निमूबेन बंभाणिया ने गुजरात के भावनगर से चुनाव जीता है. मोदी सरकार में उनको उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है.निमूबेन तीन बार पार्षद रहीं, दो बार मेयर रही हैं. भावनगर सीट से जब आम आदमी पार्टी ने कोली कार्ड खेलकर अपने प्रत्याशी को उतारा तो बीजेपी ने इसके जबाव में निमूबेन को वहां से टिकट दिया.
ये भी जानें – निमूबेन टीचर रह चुकी हैं. उनके पति भी शिक्षक हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि वह आदर्शवादी हैं. जब वह मेयर थीं तो उनके फैमिली मेंबर सरकारी वाहन का उपयोग नहीं करते थे.

7 शोभा करंदलाजे
शोभा करंदलाजे के पास समाजशास्त्र में एम और मास्टर ऑफ सोशलवर्क की डिग्री है. बीजेपी की ओर से शाेभा करंदलाजे को बेंगलुरू की उत्तरी लोकसभा सीट से उतारा गया था. शोभा को कांग्रेस प्रत्याशी के विरुद्ध जीत हासिल हुई. उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय में राज्य मंत्री और श्रम और रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है. पिछली लोकसभा में उन्हें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था.
ये भी जानेंमोदी मंत्रिपरिषद में शामिल शोभा साल 2012 में बीजेपी को छोड़कर कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा की पार्टी केजीपी में शामिल हो गई थी. 2014 में केजीपी का बीजेपी में विलय होने से वह फिर भाजपा में आ गईं

नीट एग्जाम में गड़बड़ी और उठते सवालों के बीच अधर में लाखों छात्रों के सपने

‘एक देश एक परीक्षा’ भी ‘एक देश एक चुनाव’, ‘एक देश एक टैक्स’ जैसा ही है. जिस तरह ईवीएम पर सवाल उठे, उसी तरह से नीट की ओएमआर शीट भी सवालों के घेरे में है. ईवीएम को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद भी शंका बरकरार है. नीट आयोजित कराने वाली नैशनल टैस्टिग एजेंसी (एनटीए) कहती है, ‘परीक्षा की ओएमआर शीट में छेड़छाड़ संभव नहीं है.’ नीट में गड़बड़ी की दूसरी राहें भी हैं. ग्रेस मार्क्स और पेपर लीक सवालों के घेरे में हैं. नीट की तरह ही इंजीनियरिंग में ‘जेईई’ और विश्वविद्यालय परीक्षाओं के लिए ‘क्यूट’ भी आयोजित की जाती हैं. ये भी ‘एक देश एक परीक्षा’ जैसी हैं.

नीट में एक लाख 50 हजार सीटों के लिए 24 लाख छात्र परीक्षा देते हैं. नैशनल लैवल की जगह स्टेट लैवल पर यह परीक्षा क्यों नहीं आयोजित की जाती? क्या सरकार सभी छात्रों के लिए सरकारी मैडिकल कालेज नहीं खोल सकती? छात्र प्राइवेट कालेज में पढ़ने क्यो जाएं? समय से 10 दिनों पहले परीक्षा परिणाम क्यों आया? जबकि 4 जून को लोकसभा का चुनाव परिणाम भी आना था? ग्रेस मार्क्स देने का फार्मूला क्या था? क्या केवल 1,563 छात्रों को ही ग्रेस मार्क्स दिए गए?

ग्रेस मार्क्स वाले छात्रों की दोबारा परीक्षा लेने से मैरिट पर क्या असर पड़ेगा? एनटीए की गलती पकड़ी जा चुकी है. ऐसे में उस के द्वारा आयोजित परीक्षा पर भरोसा कैसे हो? क्या इस परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों का खर्च सरकार उठाएगी? बहुतेरे ऐसे सवाल हैं जिन के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं. सरकार ‘एक देश एक परीक्षा’ कराने को आतुर है. नीट में दिखने वाली गड़बड़ियों के बाद अब इस तरह की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं. ऐसे में जरूरी है कि स्टेट लैवल पर परीक्षा हो. अगर ऐसा होगा तो गड़बड़ी के मौके कम होंगे.

सरकार को एक देश एक परीक्षा की जिद छोड़नी होगी. जितनी बड़ी परीक्षा होगी, उस में गड़बड़ी की संभावना उतनी ही अधिक होगी. ऐसे में पहले की ही तरह से जिले और राज्य स्तर पर पीएमटी और सीपीएमटी परीक्षा आयोजित हों. सब की अलग योग्यता हो. योग्यता से अधिक वालों को परीक्षा से अयोग्य ठहराया जाए. तभी सही आकलन हो सकेगा व योग्य अभ्यर्थी का ही चुनाव हो सकेगा.

छात्र चाहे स्नातक की पढ़ाई करना चाहें या इंजीनियरिंग की, सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पढ़ाई की व्यवस्था करे. शिक्षा का बाजारीकरण रुकना चाहिए. इसी वजह से गड़बड़ी होती है. सरकारी कालेज एलौट होने की चाह में छात्र कोचिंग संस्थानों के मोहपाश में पड़ते हैं. कोचिंग संस्थानों में छात्रों पर मानसिक दबाव डाला जाता है. जिस वजह से छात्र आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर होते हैं.

सवालों से घिरी नीट

नीट यूजीसी का आयोजन 5 मई, 2024 को देशभर में 4,750 केंद्रों पर किया गया. जिस में 24 लाख से अधिक बच्चे शामिल हुए थे. इस के बाद रिजल्ट 14 जून को आना था. लेकिन यह 4 जून को ही जारी कर दिया गया. इस में 67 स्टूडैंट्स को 720 में से 720 अंक मिले. 2 स्टूडैंट्स को 717 और 719 अंक मिले. सारा विवाद यहां से शुरू हुआ. विवाद के 3 प्रमुख कारण थे. एक तो लोगों को यह समझ नहीं आया कि 67 छात्रों को 720 में से 720 नंबर कैसे मिले?
दूसरा सवाल यह उठ रहा है कि जब परीक्षा का परिणाम 14 जून को आना था तो उसे अचानक 10 दिनों पहले 4 जून को ही क्यों घोषित कर दिया गया. 4 जून को देश के लोकसभा चुनाव का परिणाम आना था. विरोधियों का तर्क है कि एनटीए को यह लग रहा था कि चुनावी शोर में यह विवाद छिप जाएगा. लेकिन लोकसभा चुनावों में भाजपा को हार मिलने के बाद विरोध के स्वर मुखर हो गए और नीट परीक्षा में गड़बड़ी मुद्दा बन गया. दूसरा सवाल यह उठ रहा है कि किसी छात्र के 717, 718 और 719 अंक कैसे आ सकते हैं?

3 नंबरों ने खोला राज

नीट परीक्षा में 720 नंबर का पूरा पेपर होता है. अगर छात्र एक सवाल छोड़ता है तो उस के 4 नंबर कट जाएंगे, जिस के बाद छात्र को 716 नंबर मिल सकते है. अगर एक सवाल गलत करता है तो उस के 4 नंबर गलत जवाब देने के काटेंगे और 1 नंबर माइनस मार्किग का कटेगा यानी उस के कुल 5 नंबर काटेंगे तो उस को 715 नंबर मिलेंगे. ऐसे में यह समझ नहीं आ रहा कि 717, 718 और 719 किस तरह से नंबर मिले हैं. यही वह सूत्र था जिस से नीट में गड़बड़ी का राज खुला. नीट ने अपनी सफाई में तर्क दिया कि ग्रेस मार्क्स के कारण ये नंबर आए. तब सवाल उठा कि ग्रेस मार्क्स क्या है? ये क्यों दिए गए? किस को दिए गए? ग्रेस मार्क्स देने का फामूर्ला क्या था? ये सभी सवाल एनटीए के गले की हड्डी बन गए हैं.

छात्रों पर रहता है परीक्षा का दबाव

हमारे समाज में आईएएस के बाद सब से अधिक सम्मान वाला पेशा डाक्टरी को माना जाता है. ऐसे में आईएएस के बाद सब से अधिक छात्र मैडिकल में कैरियर बनाना चाहते हैं. 2023-24 के लिए आईएएस परीक्षा में 13 लाख छात्रों ने प्रवेशपरीक्षा दी थी. इन में से केवल 14 हजार ही मेंस के लिए परीक्षा में आगे बढ़ पाए. मैडिकल के लिए 24 लाख छात्रों ने इस साल नीट की परीक्षा दी थी.

मैडिकल की पढ़ाई के लिए नीट में अच्छा स्कोर लाए बिना अच्छे संस्थान में प्रवेश नहीं मिल सकता. नीट क्वालीफाई उम्मीदवार ही विदेश से कोर्स करने के बाद भारत में प्रैक्टिस के लिए पात्र होंगे. इस के लिए उन को भी एफएमजीई परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी. बिना नीट क्वालीफाई किए उम्मीदवार पहले की तरह अब विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई कर भारत में प्रैक्टिस नहीं कर पाएंगे.

नीट का कटऔफ स्कोर परीक्षा के बाद बनता है, उस आधार पर ही सरकारी कालेज और प्राइवेट कालेज एलौट किए जाते हैं. सरकारी कालेज की मांग 2 वजहों से होती है. इन की रैंक पढ़ाई के हिसाब से बेहतर होती है. दूसरे सरकारी कालेज मे फीस कम होती है. ऐसे में नीट देने वाले हर छात्र का सपना होता है कि उसे सरकारी कालेज मिल जाए.

मेरिट में आने के लिए ही छात्र कोचिंग की मदद लेता है. औनलाइन क्लास लेता है और सैल्फ स्टडी करने के लिए बाजार से किताबें व गाइड भी खरीदता है. किताबों, कोर्स और कोचिंग की फीस हर साल बढ़ती जाती है. कोचिंग की सालाना फीस 2 लाख रुपए होती है. इस के कोचिंग वाले हर माह मौक टैस्ट के नाम पर परीक्षा कराते हैं.
इस में छात्रों को सिखाया जाता है कि परीक्षा के निर्धारित समय में कैसे अधिक से अधिक सवालों के जवाब दें. सही सवालों के जवाब दें. गलत जवाब देने में नंबर कटने का खतरा रहता है. ऐसे में अधिक से अधिक नंबर पाने के लिए छात्र कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. पेपर लीक भी होता है. ऐसे मे नीट आयोजित करने वाली एनटीए सवालों के घेरे में है.

पटना से गोधरा तक पेपर लीक

केंद्र सरकार भले ही दावा करे कि नीट में पेपर लीक नहीं हुआ लेकिन सवाल उठता है कि पटना से ले कर गोधरा तक पेपर लीक पर बवाल क्यों मचा है. परीक्षा से एक रात पहले कई छात्रों को एक ही कमरे में पेपर सौल्व कराए गए. कई हजार किलोमीटर दूर से छात्र गोधरा के सैंटर में परीक्षा देने क्यों और कैसे आए? नीट परीक्षा द्वारा 40 हजार सीटें सरकारी कालेज में होती हैं. सारा झगड़ा इन 40 हजार सीटों में जगह बनाने की होती है. प्राइवेट कालेज में 5 साल के एमबीबीएस कोर्स की फीस 1 करोड़ 25 लाख से 2 करोड़ के बीच होती है. सरकारी कालेज में एक साल में 2 लाख का खर्च आता है. ऐसे में 10 लाख में डाक्टरी की पढ़ाई हो जाती है. गोधरा के अलावा पटना के शास्त्रीनगर सैंटर पर भी 13 छात्रों को हिरासत में ले कर पेपर लीक की जांच की जा रही है. अगर पेपर लीक का मसला नहीं है तो इन को गिरफ्तार क्यों किया गया?

छात्रों ने उठाए एनटीए पर सवाल

जब नीट आयोजित कराने वाली संस्था एनटीए ने टौपर्स के नाम अपनी वैबसाइट पर अपलोड किए तो छात्रों ने सवाल करने शुरू कर दिए. छात्रों ने एजेंसी से पूछा कि जहां हर साल एक या अधिकतम 2 टौपर निकलते हैं, वहीं इस साल कुल 67 टौपर हैं और इन सभी को परफैक्ट 720 अंक मिले हैं,ये कैसे हुआ ? इन में एक ही एग्जाम सैंटर से 6 टौपर्स होने की बात भी सामने आई. इस बार के बहुत से नीट टौपर्स एक ही सैंटर से हैं और परीक्षा से पहले कई सैंटरों पर पर्चा लीक होने की खबर भी आई. सरकार ने बिना किसी जांच के ही पेपर लीक के आरोप को नहीं माना है.

छात्रों ने एनटीए पर दूसरा आरोप लगाते हुए कहा कि खास सैंटर्स के स्टूडैंट्स को ही ग्रेस मार्क्स दिए गए हैं जबकि पेपर लेट कई सैंटर्स पर हुए थे. छात्रों ने आरोप लगाते हुए कहा कि इस रिजल्ट में 2 छात्रों, जिन की रैंक भी 68 और 69 आई है, को 718 और 719 नंबर दिए गए जोकि नीट की मार्किंग स्कीम के हिसाब से संभव नहीं है. इस के बाद नीट के छात्रों ने देशभर में प्रदर्शन करने शुरू कर दिए.

परीक्षा सैंटर पर भी तमाम तरह की धांधलियों की शिकायत मिलती है. एक बड़ी शिकायत यह मिली कि परीक्षा निरीक्षक को एनटीए की तरफ से 1,800 रुपए दिए जाते हैं. कालेज वाले इस में से 800 रुपए वापस ले लेते हैं. परीक्षा सैंटर काफी दूरदूर होने के कारण छात्रों को रात खुले में गुजारनी पड़ती है. इन के रहने खाने की व्यवस्था नहीं होती है. इस से इन को परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

जिन कालेजों में परीक्षा केंद्र बनाए जाते हैं उन की अलग सांठगांठ होती है. इसी तरह से कोचिंग संस्थाओं की भी सांठगांठ होती है. पेपर आउट से ले कर परीक्षा में गड़बड़ी तक बहुत ऐसे मसले हैं जिन की वजह से परीक्षाओं पर से भरोसा घटा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नीट में गड़बड़ी से परीक्षा की पवित्रता प्रभावित हुई है. अब यह सवाल सड़क से ले कर संसद तक उठना तय है.

छात्रों के सपने चूरचूर

लखनऊ की रहने वाली आयुषी का नीट रिजल्ट गलत एप्लीकेशन नंबर के साथ जारी कर दिया गया जिस में उस के अंक सिर्फ 355 दिखाए जा रहे हैं. नीट परीक्षा में 715 अंक लाने का दावा करने वाली आयुषी पटेल लगातार सुर्खियों में हैं. अब एक नए विवाद के अनुसार एनटीए ने आयुषी का रिजल्ट गलत एप्लीकेशन नंबर के साथ जारी कर दिया है जिस में उस के अंक सिर्फ 355 दिखाए जा रहे हैं. सवाल यह उठता है कि अगर आयुषी को उस के सही एप्लीकेशन नंबर और आंसर की के मुताबिक 715 अंक मिले हैं तो उस का रिजल्ट गलत रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ कैसे जारी कर दिया गया.

आयुषी पटेल का कहना है कि पहले एनटीए ने उस का रिजल्ट रोक दिया. फिर जब उस ने ईमेल किया तो एनटीए ने उसे फटी हुई ओएमआर शीट भेज कर कारण बता दिया. जब यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उठा तो कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने इस पर ट्वीट किया. इसी बीच, एक यूजर ने दावा किया कि आयुषी पटेल का रिजल्ट जारी कर दिया गया है. जांच में पता चला कि नैशनल टैस्टिंग एजेंसी ने लखनऊ की नीट छात्रा आयुषी पटेल का रिजल्ट गलत एप्लीकेशन नंबर के साथ अपलोड कर दिया है.
आयुषी के अनुसार, एडमिट कार्ड पर उस का आवेदन क्रमांक 240411840741 था और एनटीए ने फटी हुई ओएमआर शीट के कारण रिजल्ट जारी करने से मना कर दिया था. लेकिन जब आयुषी का आवेदन क्रमांक 240411340741 डाला गया तो उस का रिजल्ट सामने आया, जिस में उस के 355 अंक थे.

आयुषी ने दावा किया कि उस की आंसर-की में 715 अंक थे. एनटीए ने इस त्रुटि पर कोई जवाब नहीं दिया है. आयुषी ने 4 जून को देर शाम जब रिजल्ट औनलाइन देखा तो उस में रिजल्ट जारी नहीं किया गया था. आंसर-की के अनुसार उस का केवल एक प्रश्न गलत था, इसलिए उसे 720 में से 715 अंक मिल रहे थे.

एनटीए से मेल पर संपर्क करने पर उसे फटी हुई ओएमआर शीट के बारे में बताया गया. आयुषी को समझ में नहीं आया कि उस की ओएमआर शीट कैसे फट गई, जबकि उस ने परीक्षा में बहुत सावधानी से ओएमआर शीट भरी थी. परीक्षा केंद्र पर तैनात लोगों ने भी सावधानी बरतते हुए उस की ओएमआर शीट जमा कर दी. आयुषी के मामा, जो पेशे से हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में अधिवक्ता हैं, ने 4 जून को ही एनटीए को 3 लीगल नोटिस और 7 ई-मेल भेज कर आयुषी की ओएमआर शीट मेल पर मांगी थी. 24 घंटे बाद जब एनटीए का मेल नहीं आया तो आयुषी और उस के परिजन हैरान रह गए.

मेल पर भेजी गई ओएमआर शीट वाकई फटी हुई थी. आयुषी द्वारा भरी गई ओएमआर शीट के गोले भी साफ दिखाई दे रहे थे. आयुषी ने मांग की कि ओएमआर शीट फटी होने के लिए वह जिम्मेदार नहीं है और अगर ओएमआर शीट फटी भी है तो उस का रिजल्ट न रोका जाए. आयुषी ने इस मांग को ले कर हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में याचिका दायर की है. जब तक हाईकोर्ट उस की ओएमआर शीट को ले कर कोई फैसला नहीं देता, तब तक नीट के जारी रिजल्ट पर आगे की प्रक्रिया रोकी जाए.

नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऔर्डर , समय पर इलाज नहीं तो खतरनाक

प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथाओं में नार्सिसस की कहानी बताई गई है. नार्सिसस एक शिकारी था. वह बहुत ही अहंकारी व्यक्ति था. उस ने जंगल की अप्सरा इको के प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.

एक दिन जब वह जंगल में शिकार कर रहा था तो उसे एक तालाब मिला. उस ने अपनी प्यास बुझाने का फैसला किया. जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुका, पानी में पहली बार खुद को देखा और अपनी सुंदरता से अभिभूत हो गया. समय बीतता गया और उस की प्यास बढ़ती गई लेकिन वह वहीं बैठा रहा और धीरेधीरे खुद को देखता रहा व अपने ही प्रतिबिंब से प्यार करने लगा. नार्सिसस वहीं बैठा रहा जब तक कि उस की मृत्यु नहीं हो गई और वह तालाब के किनारे एक सुनहरे फूल में बदल गया.

कहीं आप भी तो खुद को सब से बेहतर नहीं समझते और अपने को नार्सिसस की तरह सब से ज्यादा प्यार तो नहीं करते. अगर ऐसा है तो यह एक बड़ी समस्या का कारण बन सकता है. हमारे आसपास ही बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते. ये लोग हमारे फैमिली मैंबर्स, हमारे दोस्त भी हो सकते हैं. जैसे कि आभा का कहना है की मेरी सासुमां को लगता है, वह द बेस्ट है, हर काम उस से अच्छा कोई कर ही नहीं सकता. अपनी इसी सोच के चलते वह हर बात में मुझे नीचे दिखाती है. पहले मुझे बहुत बुरा लगता था पर अब मैं समझ गई हूं कि वह बीमार है. लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी मैं उसे यह बात नहीं समझा पाई की वह बीमार है. इस समस्या के शिकार आप भी हो सकते हैं. इसलिए आइए जानें कि यह समस्या क्या है.

यह एक मैंटल प्रौब्लम है

खुद की तारीफ सुनना भला किसे पसंद नहीं होता. हम सभी यही चाहते हैं कि हमारे अपने हमारी तारीफ करें. लेकिन दूसरी तरफ इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि तारीफ उसी की होती है जो तारीफ के काबिल हो और उस ने कुछ ऐसे काम किए हों जो लोगों द्वारा पसंद किए गए हों. जबकि इस के उलट, जिस के काम अच्छे न हों, तो लोग उस की बुराई करने से भी पीछे नहीं हटते. यह सामाजिक नियम है और बस, समस्या की शुरुआत भी यहीं से होती है.

क्या है नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऔर्डर

‘नार्सिसिस्ट’ वह मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है जिसे नार्सिसिस्ट पर्सनैलिटी डिसऔर्डर (एनपीडी) कहा जाता है. यह डिसऔर्डर कई तरह के पर्सनैलिटी डिसऔर्डरों में से एक है. इस में व्यक्ति खुद को इतनी अधिक अहमियत देते हैं कि उन्हें अपने आगे कोई और नज़र ही नहीं आता. वे खुद को ही सर्वोत्तम मानते हैं. बस, खुद में आत्ममुग्ध रहना उन की प्राथमिकता होती है.

ऐसे लोग जो भी बोलते हैं और करते हैं उस में उन की मंशा होती है कि सामने वाला उन से पूरी तरह प्रभावित हो कर आकर्षित हो जाए. खुद को सर्वश्रेष्ठ मानना और बुराई सुनने पर झगड़ पड़ना, यह मैंटल डिसऔर्डर की निशानी है. इसे मैडिकल भाषा में पर्सनैलिटी डिसऔर्डर कहा जाता है. इस का समय पर इलाज न किया जाए तो नतीजे घातक हो सकते हैं.

कब होती है समस्या

ऐसे व्यक्ति चाहतें है कि लोग हर वक्त उन की तारीफ करें, उन के कहे अनुसार चलें. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो ये लोग नाराज हो जाते हैं, बुरा मान जाते हैं, अपने ईगो पर ले लेते हैं. सामने वाले से झगड़ा करने में भी पीछे नहीं रहते. सामान्य रिश्ते निभाने में भी उन्हें तकलीफ होती है और दूसरों के लिए उन के मन में सहानुभूति की कमी होती है.

बीमारी घेर लेती है कुछ इस तरह

अपने व्यवहार की वजह से जब इन लोगों को समाज की उपेक्षा मिलती है, तो ये लोग बिखर जाते है. इन का कौन्फिडेंस लैवल जीरो हो जाता है. ऐसे लोग जीवन में दुखी और अधूरे रहते हैं. निराशा होने पर शर्म, अपमान और खालीपन की भावना इन में घर कर जाती है. हार के डर से कुछ भी करने की अनिच्छा भी इं में पैदा हो जाती है और इसी वजह से इन में डिप्रैशन और एंग्जायटी के लक्षण भी साथ में आ जाते हैं.

लक्षण क्या है

-इन लोगों को खुद की बुराई बरदाश्त नहीं होती.
-ये लोग उम्मीद करते है कि इन्हें हर जगह स्पैशल ट्रीटमैंट मिले और जब ऐसा नहीं हो पाता, तो ये लोग बहुत जल्दी चिढ़ जाते हैं.
-ये लोग बहुत मूडी होते हैं. अपना मन होता है तो ठीक से बात करतें हैं, मूड नहीं है तो बात नहीं करते.
-ये जिद्दी और घमंडी भी होते हैं.
-सैल्फसैंटर्ड होते हैं.
-ऐसे लोगों को लगता है कि जीवन में इन्होंने बहुतकुछ पा लिया है. जबकि, जितना वे शोऔफ करते हैं उतना उन्होंने अपनी लाइफ में कुछ खास हासिल नहीं किया होता.
-ये लोग दूसरों को बातबात में नीचा दिखाते हैं.

इस का इलाज कैसे करें

* मैडिटेशन करने से मन शांत होता है और बेकार की बातें मन में कम आती हैं.
* खुद अपने को परखें, अपने पौजिटिव और नैगेटिव का आकलन खुद करें.
* सिर्फ अपनी अपनी न कहें बल्कि दूसरे लोग जो कह रहे हैं उस को ध्यान से सुनें भी.
* दूसरों से अपनी तुलना न करें.
* खुद की प्रशंसा सुनने की सनक से बचें.
* अगर आप में कुछ गलत है तो उसे स्वीकार करें.
* अगर आप के रिश्तेदार लोग डाक्टर के पास जाने की सलाह दे रहे हैं, तो इसे अना का मसला न बनाएं बल्कि उन की बातों को समझें और उन का सहयोग करें.

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