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ऐसा भी होता है

मैं अपनी पड़ोसिन की आदत से परेशान थी क्योंकि वह बहुत झूठ बोलती थी. अगर दूध 40 रुपए लिटर होता तो वह कहती, 45 रुपए लिटर, यानी हरेक चीज का दाम बढ़ा कर बताती. कभी कहती, हम तो सबकुछ फ्रैश खाते हैं.  
एक दिन मैं और मेरी पड़ोसिन एकसाथ मछली लेने के लिए गए. एक जगह मछली 80 रुपए प्रति किलो मिल रही थी और दूसरी जगह 120 रुपए प्रति किलो. मैं ने 80 रुपए प्रति किलो वाली मछली ली पर उस ने 120 रुपए वाली.
उस ने मुझ से पूछा, ‘‘आप ने कितने रुपए वाली मछली ली?’’
मैं ने कहा, ‘‘80 रुपए.’’
‘‘आप ने मुझे 80 रुपए वाली मछली क्यों नहीं बताई?’’
तब मैं ने कहा, ‘‘आप तो सब फ्रैश ही खाती हो.’’
इस घटना के बाद से मेरी पड़ोसिन ने मुझ से झूठ बोलना कम कर दिया.
मृदुला कुमारी, सिकंदराबाद (आंध्र प्रदेश)

*
देशविदेश के कई सितारा होटलों के औपचारिक स्वागत के अभ्यस्त मन पर, अमृतसर के एक होटल में हुए आत्मीयता से ओतप्रोत स्वागतसत्कार ने, एक अमिट छाप छोड़ दी. हाल ही में भ्रमण के दौरान हम अमृतसर में एक होटल में ठहरे. अगले दिन जब चैकआउट कर रहे थे, शाम के 7 बज चुके थे. हम औपचारिकताओं को पूरा करने में व्यस्त थे कि तभी होटल की ओर से चायनाश्ता आ गया.
समय कम होने के कारण यह तय किया कि रात का खाना स्टेशन पर ही खाएंगे. जब होटल मालिक को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने टे्रन की पैंट्रीकार के भोजन की खराब क्वालिटी के बारे में बताते हुए होटल में ही खाना खाने की सलाह दी.
समयाभाव के कारण हम वहां खाना खाने के पक्ष में नहीं थे. यह जान कर होटल मालिक ने तत्काल हम 5 व्यक्तियों के लिए खाना पैक करा दिया. हमारे बहुत कहने के बावजूद उन्होंने नाश्ते व खाने के पैसे लेने से इनकार कर दिया. इतना ही नहीं, मेवावाला अमृतसरी गुड़, जो हम ने उन से कह कर मंगवाया था, ला कर दिया और उस के भी पैसे लेने से इनकार कर दिया. जब हम ने बिना पैसे गुड़ लेना स्वीकार नहीं किया तब कहीं उन्होंने पैसे लिए. होटल के गेट तक आ कर हमें विदा किया. ऐसा लगा मानो हम होटल से नहीं बल्कि किसी अपने के घर से विदा हो रहे हैं, एक सुखद याद लिए.
सतीश चंद्र रस्तौगी, साहिबाबाद, (उ.प्र.)

इन्हें भी आजमाइए

  1. अपने परिचितों को दफ्तर में आमंत्रित न करें. दफ्तर आप का कार्यस्थल है इसलिए दफ्तर के समय अपने परिचितों और मित्रों को वहां बुलाना, चाय आदि पिलाना कार्यालय की मर्यादा के अनुकूल नहीं है. आप का यह व्यवहार गलत ही होगा. दोएक बार तो अधिकारी व सहयोगी इसे अनदेखा कर देंगे पर हमेशा नहीं.
  2. जब आप अस्पताल में रोगी का हाल पूछने जाएं तो उतनी ही देर रुकें जितना कि आवश्यक हो. कई बार मरीज के संबंधी अस्पताल में भी खानेपीने जैसी स्वागतसत्कार की औपचारिकता में फंस जाते हैं, यह उचित नहीं है. इस तरह का अवसर घर वालों के विवश करने पर भी टाला जाए.
  3. आप चाहें तो रसोई की शोभा दीवार पर खूबसूरत पेंटिंग लगा कर व ताजे फूलों का गुलदस्ता सजा कर बढ़ा सकती हैं. खिड़की और दरवाजे पर जालीदार परदे लगा दें तो चारचांद लग जाएंगे परंतु ध्यान रखें कि परदे ऐसे बांधें कि वे हवा से उड़ें नहीं.
  4. आप जब मेहमान के तौर पर जा रहे हैं तो मेजबान के बच्चों के लिए कुछ उपहार या मिठाई इत्यादि ले जाना न भूलें. उपहार चाहे कीमती न हो परंतु ऐसा अवश्य हो जो बच्चों के काम आने वाला और पसंद आने वाला हो. इस से मेजबान और उन के बच्चे आप को याद रखेंगे.

सफर अनजाना

मैं और मेरी पत्नी अपने एक करीबी रिश्तेदार की बेटी की शादी से अपने घर के लिए वापस लौट रहे थे. रात का सफर था और हमें टाटानगर रेलवे स्टेशन से पटना जंक्शन के लिए ट्रेन पकड़नी थी. हमारे पास 2 ट्रौली बैग में कीमती सामान व 75 हजार के आसपास नकद रुपए थे. हमें काफी चिंता हो रही थी. खैर, हम लोग ट्रेन में चढ़े और सारा सामान बर्थ के पास ही चैन से बांध कर रख दिया ताकि सामान चोरी न हो सके और हम आराम से सो सकें. देर रात तक सामने के यात्रियों से बातें करतेकरते हमें नींद आने लगी.
रात्रि 3.30 बजे मेरी नजर जब सामान पर पड़ी तो सामान चोरी हो चुका था. होहल्ला मचाने पर एक व्यक्ति, जो कोच के पास ही था, ने बताया कि 2-3 व्यक्तियों के पास 2 ट्रौलियों वाले बैग थे जो पिछले स्टेशन पर उतर गए थे. किसी को भी यह आभास नहीं हुआ कि वह चोरों का गिरोह था. अब तक ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी और कुछ भी कर पाना संभव नहीं था. ट्रेन के कोच में सुरक्षा बल या कोच अटेंडैंट नहीं थे.
इस घटना को शातिर चोरों द्वारा अंजाम दिया गया था. पटना जीआरपी से पता चला कि इस रूट पर अटैची चोरों का गिरोह सक्रिय है, जिन्हें अभी तक कंट्रोल नहीं किया जा सका है. उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि कोई भी सूचना मिलने पर जीआरपी उन्हें सूचित करेगी. पर आज तक हमें कोई सूचना नहीं मिली है और न ही मिलने की उम्मीद है. इस तरह हमें हजारों का चूना लग गया.
विनय कुमार श्रीवास्तव, पटना (बिहार)


*
अक्तूबर का महीना था. मैं और मेरी पत्नी स्वारघाट बस स्टौप के पास खड़े थे. चंडीगढ़ से मनाली जाने वाली 2-3 बसें वहां से गुजरीं परंतु किसी भी ड्राइवर ने बस नहीं रोकी. हमें बिलासपुर पहुंचना था और शाम के 7 बज चुके थे.
तभी एक ट्रक वाला हमारी परेशानी समझ कर हम से कहने लगा, ‘उसे मंडी जाना है,’ हम उस ट्रक में बैठ गए. ट्रक ड्राइवर सरदार था, उसे देख कर हमें थोड़ा डर लगा. पूरे रास्ते में उस ड्राइवर ने हमें बताया कि किस प्रकार धर्म ने आम आदमी को बरगला कर जेहादी बना दिया है.  मानव का मानवता से रिश्ता खत्म हो रहा है. अब कोई किसी पर विश्वास नहीं करता है.
उस ड्राइवर ने हमें सहीसलामत सही स्थान पर पहुंचा दिया. हम ने उसे बतौर किराया कुछ रुपए देने चाहे तो वह कहने लगा, ‘‘भाईसाहब, आप घर पहुंच गए, यही मेरा किराया है.’’ यह घटना जब याद आती है तो दिल खुश हो जाता है कि संसार में ऐसे भी नेकदिल लोग हैं.
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर, (हि.प्र.)

मौसम रुलाएगा हमें

किसी की आंख से आंसू
नहीं निकले तो क्या निकले
समंदर से मोती
नहीं निकले तो क्या निकले

किसी को दे दिया कुछ तो
इसे एहसान मत मानो
जबां से बोल दो मीठे
नहीं निकले तो क्या निकले

भले ही मंजिलों तक तुम
किसी के साथ मत जाओ
तुम साथ हमदम के
नहीं निकले तो क्या निकले

बहुत खुश हो बहारों में
खिजाएं भी रुलाएंगी
हवा के साथ बागों में
नहीं निकले तो क्या निकले

बहुत कुछ ढूंढ़ते हो
कहीं आंखें नहीं टिकतीं
निगाहों से किसी की गर
नहीं फिसले तो क्या फिसले

अकेले हो सफर में
दूर तक रुलाएगा मौसम
‘भ्रमर’ के साथ राहों में
नहीं निकले तो क्या निकले.
– राकेश भ्रमर
 

मर्सिडीज ई 200 सीजीआई

अगर आप नई लग्जरी कार खरीदने का मन बना रहे हैं तो पेश है मर्सिडीज बेन्ज का नया अवतार ई 200 सीजीआई. आइए, नजदीक से जानें इस लुभावनी कार को.

भारतीय बाजार में एक से बढ़ कर एक शानदार कारों को पेश करने वाली जरमनी की प्रमुख कार निर्माता कंपनी मर्सिडीज बेन्ज ने सीडान कार ई क्लास के नए अवतार को उतारा है. आकर्षक लुक और दमदार इंजन क्षमता से लैस मर्सिडीज की यह कार कई माने में शानदार है. 4 सिलैंडर, टर्बोचार्ज के फीचर्स से सजी यह कार भीड़भाड़ वाले इलाके व हाइवे पर आसानी से हवा से बात करने में सक्षम है.

अगर आप एक अच्छी शोफर ड्रिवन कार में बैठने का अनुभव लेना चाहते हैं तो इस कार को अपनी कार बना सकते हैं. 10.4 किलोमीटर प्रति लिटर की फ्यूल इकोनौमी वाली इस कार के पीछे की सीट में हर वेस्ट साइज के लिए पूरा स्पेस है.

ब्लूटूथ कनैक्टिविटी, संचालित सीटें, पार्किंग सैंसर, इलैक्ट्रिक स्टीयरिंग, मल्टीलिंक सस्पैंशन और 5.65 मीटर का टर्निंग रेडियस इस लग्जरी कार की खूबियां हैं. कार का नया इंजन बेहतर माइलेज देता है. इस के साथ ही, नई इंटैलीजैंस असिस्टैड प्रणाली और नई डिजाइन शैली के माध्यम से ई क्लास की इस श्रेणी को स्पोर्टी लुक दिया गया है. पैट्रोल वैरिएंट में ई 200 का सीजीआई का इंजन इस कार को स्पैशल बनाता है. हालांकि यह कार वैकल्पिक एमएमजी किट के साथ नहीं आती जिस में 18 इंच के बड़े व्हील होते हैं फिर भी इस की टैस्ट ड्राइव स्मूथ है.

इस कार के पैट्रोल वैरिएंट में 2 लिटर का इंजन लगा है जो कार को 184 बीएचपी की जबरदस्त पावर देता है. मर्सिडीज की इस लग्जरी कार में रिवर्स कैमरा, ईको स्टार्ट सिस्टम के साथ 8 एयर बैग दिए गए हैं. अगर आप बाजार में 50 लाख तक की लग्जरी कार खरीदने निकले हैं तो आकर्षक फीचर्स वाली पेनौरेमिक वैरायटी के बजाय रेगुलर साइज के सनरूफ वाली यह कार आप को अवश्य लुभाएगी.

-दिल्ली प्रैस की अंगरेजी पत्रिका बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग से

बाल बाल बचे

बात मेरी शादी के 4 दिन बाद की है. हम लोग घूमने गए थे. एक जगह एक सर्किल पर, जहां गांधीजी की मूर्ति बनी हुई थी, उस की मुंडेर पर बैठ गए. उस समय रात के 8 बजे थे. सड़क पर लोग आजा रहे थे. मैं सैंडिल उतार कर मुंडेर पर पैर लटका कर बैठ गई. थोड़ी देर बाद मेरे पति बोले, ‘‘चलो उठो, घर चलें.’’
मैं सैंडिल पहनने लगी, तभी मैं ने देखा कि एक लंबाचौड़ा आदमी कुरता व तहमत पहने हमारी तरफ आ रहा था. वह हम से बोला, ‘‘तुम लोग यहां क्यों बैठे हो?’’ और हमारे ऊपर जोरजोर से चिल्लाने लगा.
मेरे पति ने उस से कहा कि हम अभी फौरन यहां से जा रहे हैं. मगर उस ने चाकू निकाल लिया और मेरे गले पर हाथ मारा. मैं ने सोने का सैट पहन रखा था. इस पर मेरे पति व उस में कहासुनी होने लगी. मेरे पति ने मुझ से कहा, ‘‘तुम भाग जाओ,’’ मैं भागने लगी.
तब वह आदमी चिल्लाया, ‘‘कहां भागेगी. वहां मेरे 2 आदमी और खड़े हैं.’’ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किस दिशा में भागूं. भागतेभागते घबराहट में गिर भी पड़ी. इतने में मेरे पति भी मौका देख कर भाग आए और मुझे उठा कर सही दिशा में ले भागे क्योंकि उन्होंने भी उन 2 आदमियों को देख लिया था. वे तीनों आदमी ट्रक से एकसाथ उतरे थे. उस दिन पति की सूझबूझ से हम बालबाल बचे.
आशा गुप्ता, जयपुर (राजस्थान)

मेरे भांजे की शादी थी. हम 20 लोग शादी में सम्मिलित होने नागपुर गए थे. शादी अच्छी तरह से संपन्न हुई. नागपुर से हम लोग सभी टे्रन से वापस हावड़ा के लिए रवाना हुए. दूसरे दिन सुबह 6 बजे के आसपास ट्रेन में बहुत जोरदार आवाज हुई. लगभग सभी सो रहे लोग हड़बड़ा कर उठे. देखा कि ट्रेन की 3-4 बोगियां पटरी से उतर कर टेढ़ी हो गई हैं.
हम लोग जिस डब्बे में थे वह भी टेढ़ा हो गया था. चारों ओर अफरातफरी मच गई. टे्रन जहां रुकी थी, वह जंगल का इलाका था. धीरेधीरे सभी यात्री उतरे.
गनीमत यह थी कि कोई भी गंभीर रूप से जख्मी नहीं हुआ था. थोड़ी देर में राहत सामग्री ले कर एक वैन पहुंच गई. अपनेअपने सामान के ऊपर बैठे सब लोग अंत्याक्षरी खेलने लगे. हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई थी. जंगल में मंगल हो रहा था. करीब 3 घंटे बाद एक दूसरी टे्रन आई. उस में सब यात्री चढ़े. जमशेदपुर में रेलवे की तरफ से सब को गरमागरम खाना दिया गया. जब हम हावड़ा पहुंचे, सब के परिजन स्टेशन पर खड़े थे. सब को सकुशल देख कर रिश्तेदारों ने राहत की सांस ली.
सुमंत मोहंता, कोलकाता (प. बंगाल)

स्वस्थ जीवनशैली बने जीवन का आधार

खुशहाल जिंदगी के लिए स्वास्थ्य से बढ़ कर कुछ नहीं, इस बात को जीवन का आधार बना कर दैनिक जीवन में छोटीछोटी बातों में बदलाव ला कर कैसे पाएं बेहतर स्वास्थ्य, जानें इस लेख में.

आज की जटिल जीवनशैली व खानपान की बदलती आदतों के कारण स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना एक जरूरी जरूरत बन गई है. दैनिक जीवन में छोटीछोटी बातों में बदलाव ला कर स्वस्थ रहा जा सकता है क्योंकि स्वस्थ रहना काफी हद तक स्वयं हमारे हाथ में होता है. दिल्ली के कौंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित परफैक्ट हैल्थ मेले में मौजूद तकरीबन सभी विशेषज्ञों ने माना कि जीवनशैली में बदलाव से सिर्फ हृदय संबंधी बीमारियों से ही नहीं बचा जा सकता है, बल्कि मधुमेह, ब्लडप्रैशर, डिप्रैशन और कैंसर जैसी बीमारियों से भी बचा जा सकता है.

मेले में मेदांता अस्पताल के न्यूरोलौजिस्ट डा. विपुल गुप्ता, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के डा. विनय गोयल और मूलचंद अस्पताल के सीनियर कार्डियोलौजिस्ट कृष्ण कुमार अग्रवाल ने संयुक्त रूप से कहा कि स्ट्रोक को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यदि लकवा मार जाए तो साढ़े 4 घंटे से कम समय के अंदर अगर मरीज अस्पताल पहुंच जाएं तो लकवे का सही इलाज किया जा सकता है. 40 की उम्र के बाद पहली बार एसिडिटी और अस्थमा के अटैक को नजरअंदाज न करें. ब्लैक टी और ब्लैक कौफी स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती हैं, अगर इन में दूध या चीनी न मिलाई जाए. अपना ब्लडप्रैशर 120/80 से कम रखें. ध्वनि प्रदूषण से बच कर रहें. हृदय रोगों का खुलासा होने में 10-20 साल लग जाते हैं. व्हाइट राइस, व्हाइट मैदा व व्हाइट शुगर के साथ ट्रांसफैट लेना भविष्य में हृदय रोगों का कारण बनता है.

सीपीआर यानी 10 मिनट के अंदर (जितनी जल्द संभव हो सके) मरे हुए आदमी की छाती पीटना चाहिए इस तकनीक से रोजाना केवल दिल्ली में 30 जिंदगियों को बचाया जा सकता है.

स्वास्थ्य के लिए ज्यादा वजन हानिकारक होता है. 18 की उम्र के बाद पुरुष और 20 की उम्र के बाद महिलाएं अपना वजन न बढ़ाएं, इस बात पर जोर देते हुए विशेषज्ञों ने हिदायत दी कि व्यक्ति को चाहिए कि वह 1 दिन में 15 मिलीलिटर से ज्यादा तेल, मक्खन या घी का सेवन न करे. एस्कोर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट के डा. समीर श्रीवास्तव ने कहा कि डाक्टरों को मौडर्न इनवैस्टीगेशन की अपडेटेड जानकारी रखनी चाहिए. आज सोशल मीडिया, एप्स के माध्यम से इमरजैंसी उपचार संभव है और लोगों को इस का लाभ उठाना चाहिए.   

बच्चों में खुद को बेहतर साबित करने की होड़

रेवती की परेशानी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. पहले तो उस की बेटी बबली काम के साथसाथ बड़ों का आदर करती थी, गलती हो जाने पर किसी से माफी भी मांग लेती थी, लेकिन कुछ समय से न जाने क्या हुआ है कि समझना और मानना तो दूर, डांटनेफटकारने, यहां तक कि पिटाई करने के बावजूद वह न तो मेहमानों को नमस्ते कहती है और न ही अपनी गलती पर किसी से माफी मांगती है.

शिखा बेटे की कारगुजारियों से परेशान है. वह कुछ ज्यादा ही बिगड़ चुका है. न जाने क्यों उस ने चोरी करनी भी शुरू कर दी है. एक बार पकड़े जाने पर शिखा ने उस की पिटाई भी की थी, लेकिन अपनी गलती के लिए उस ने माफी नहीं मांगी. क्या आप भी बच्चों के ऐसे व्यवहार से परेशान हैं? समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें?

परिवार की संरचना

समाज में न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ता जा रहा है, जहां बच्चे केवल मातापिता का साथ पा कर पलबढ़ रहे हैं. ऐेसे परिवारों में पेरैंट्स अपने बच्चों को ले कर ओवरकंसंर्ड हो जाते हैं. बच्चों का जरूरत से ज्यादा ध्यान रखते हैं. उन की हर चाहीअनचाही मांग पूरी करते हैं. जिस से बच्चों में  छोटीबड़ी हर डिमांड की पूरी होने की आदत हो जाती है. कुछ समय बाद उन्हें इस बात का घमंड होने लगता है कि वे जो भी चाहते हैं वह पूरा हो जाता है.

चाइल्ड साइकोलौजिस्ट डा. धीरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘बच्चों को गर्व और घमंड के बीच का अंतर मालूम नहीं होता और उन्हें यह अंतर समझा पाना आसान भी नहीं होता. व्यस्त दिनचर्या की वजह से पेरैंट्स उन्हें ज्यादा समय नहीं दे पाते या पेरैंटिंग स्किल्स की कमी की वजह से बच्चों को वे इस बारे में समझा नहीं पाते. टीचर्स की नैतिक जिम्मेदारी होती है या यों कहें कि उन का कर्तव्य होता है कि बच्चों को इस बारे में समझाएं, लेकिन लापरवाही या फिर क्लास में बच्चों की अधिक संख्या की वजह से शिक्षक इस ओर ध्यान नहीं दे पाते.’’

क्या करें

मातापिता को पेरैंटिंग स्किल्स की क्लासेस लेनी चाहिए या चाइल्ड साइकोलौजिस्ट से मिल कर अपनी परेशानियों का हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए. इस से बच्चों की मानसिकता को न सिर्फ समझने में उन्हें आसानी होगी बल्कि वे उन्हें अच्छी तरह हैंडल भी कर पाएंगे. शिक्षकों को चाहिए कि समयसमय पर स्कूल में लाइफ स्किल्स प्रोग्राम चलाएं. ऐसे कार्यक्रमों के दौरान एक ही क्लास के बच्चों को कई अलगअलग ग्रुप्स में बांट दिया जाता है ताकि हर बच्चे पर वे पूरापूरा ध्यान दे सकें.

मीडिया

आज टैलीविजन, रेडियो, इंटरनैट व पत्रपत्रिकाओं के जरिए बच्चों को इतना मीडिया ऐक्सपोजर दिया जाने लगा है कि उन्हें पढ़ने और देखने वाले पेरैंट्स अपने बच्चों को भी ऐसी ही जगह देखने की चाहत पालने लगे हैं. डा. धीरेंद्र कुमार आगे कहते हैं, ‘‘ऐसी चाहत मातापिता को अपने बच्चों को हर तरह की जानकारी से लबरेज कर देने की कोशिश में लगा देती है क्योंकि इस से समाज में उन्हें वैल्यू मिलती है. कम उम्र में ही बच्चों को बड़ों की तरह व्यवहार करने के लिए उन के साथ जबरदस्ती भी की जाने लगती है. नतीजतन, कम उम्र में ही बच्चे बड़ों की तरह व्यवहार करने लगते हैं, जो कभी तो हमें आश्चर्यजनक खुशी देता है लेकिन कभीकभार बुरी तरह से परेशान भी कर देता है.’’

इस बाबत जानेमाने मनोवैज्ञानिक डा. समीर पारिख कहते हैं, ‘‘बच्चे कहीं न कहीं बड़ों से ही सीखते हैं या फिर आसपास के माहौल से. मीडिया भी इस में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. कई बार हमें मालूम भी नहीं होता, लेकिन टैलीविजन पर प्रसारित किए जा रहे कार्यक्रमों या फिल्मों से बच्चे बहुतकुछ सीखने लगते हैं.

यहीं से कब उन में घमंड की प्रवृत्ति आ जाती है, हमें पता भी नहीं चल पाता. घमंड की वजह से इस कारण धीरेधीरे उन के दोस्त भी कम होते जाते हैं. किसी से उन की बनती नहीं और ज्यादातर लोगों से उन का झगड़ा हो जाता है.

‘‘घमंड की वजह से बच्चा ओवरकौन्फिडैंट होता जाता और मेहनत कम करने लगता है. यही वजह है कि काफी हद तक आज के बच्चों के घमंडी होने के लिए मैं फिल्मों को दोषी मानता हूं. बच्चों में फिल्में देखने की प्रवृत्ति को भी मैं सही नहीं मानता.’’

क्या करें

बच्चों से बातचीत करें. उन का व्यवहार रियलिस्टिक बनाएं. उन्हें सहीगलत का अंतर समझाएं, बताएं कि उन से कहां और क्या गलती हुई है. गलतियों से बचने के उपाय सुझाएं और गलती हो जाने पर क्या करें, यह भी बताएं.

दोहरी प्रवृत्ति

मीडिया ऐक्सपोजर के परिणामस्वरूप पेरैंट्स खुद अपने बच्चों में बनावटीपन भरने लगे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक समाज के इस बदलते स्वरूप की वजह से अपने बच्चों को हम आज के माहौल के मुताबिक बनाने की जुगत में भिड़ गए हैं. कम उम्र में ही बच्चों को बड़ों की तरह व्यवहार करना सिखाने लगे हैं, जैसे कैमरे या दूसरों के सामने सीधे खड़े रहना, जोर से मत बोलना, दांत दिखा कर नहीं हंसना वगैरह. जबकि घर पर सभी लोग इस अंदाज से अलग मस्त हो कर रहते हैं और रिलैक्स हो कर जीते हैं. बच्चों को यह दोगलापन कुछ उलझा देता है.

इस तरह ज्यादा या बेहतर दिखाने की कोशिश में मातापिता अपने बच्चों से कई चीजें छिपाने के लिए कहते हैं. ये बातें बच्चों के मन में घर करने लगती हैं. उन्हें समझते देर नहीं लगती कि सिचुएशन के हिसाब से उन्हें कभी कुछ तो कभी कुछ और नजर आना सीखना या जानना है.

डा. धीरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘ऐसी बातों का असर उन पर इतना ज्यादा होता है कि 2 अलगअलग जगहों पर वे 2 अलगअलग तरीके से व्यवहार करने लगते हैं, जो अपनेआप में डिफरैंट टास्क हैं. उन्हें यह बात समझ आ चुकी होती है कि उन्हें खुद को दूसरों से बेहतर साबित कर के दिखाना है. नतीजतन, अपने नए स्कूल, नए दोस्त या किसी भी नई जगह पर वे खुद को औरों से बेहतर दिखाने की कोशिश में कई बार कुछ गलत काम करने से भी नहीं हिचकते. इस तरह अपने आत्मसम्मान यानी इमेज को बचाए रखने के लिए बच्चे खुद को ओवरशो करने लगते हैं. वे कुछ इस तरह से व्यवहार करने लगते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए जिस का कई बार परिणाम घातक देखने को मिलता है.

‘‘बच्चों में धीरेधीरे घमंड आने लगता है. खुद को कहीं भी कमतर आंकना उन्हें रास नहीं आता. मुश्किलें तब आती हैं जब पहली बार कोई दूसरा उन्हें कमतर साबित कर देता है, चाहे परीक्षा में उन से ज्यादा नंबर्स ला कर हो या फिर गेम्स में उन से बेहतर कर के. अपनी इमेज को इतना बड़ा धक्का लगता देख वे खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाते, जिस के दो बहुत बुरे परिणाम देखने को मिलते हैं, या तो वे आत्महत्या तक कर लेते हैं या फिर मारपीट और झगड़े पर उतारू हो जाते हैं.’’

खुद को सब से बेहतर साबित करने की होड़ में औरों के बीच वे इतना झूठ बोल चुके होते हैं कि कभीकभार उन्हें शक होने लगता है कि किस के पास उन्होंने कौन सा झूठ कहा था या फिर अपनी साख बचाए रखने के लिए वे सभी झूठ को अच्छी तरह याद रखना शुरू कर देते हैं.

दरअसल, कहीं न कहीं वे असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहते हैं. उन्हें डर रहता है कि उन की पोल न खुल जाए. इस वजह से अकसर उन का दिमाग कुछ भी क्रिएटिव करने के बजाय गलत चीजों या बातों को व्यवस्थित करने में ही व्यस्त रहने लगता है. कहीं न कहीं इस का प्रभाव उन की पर्सनैलिटी डैवलपमैंट और लाइफ पर भी देखने को मिलता है.

भारत भूमि युगे युगे

गर्व की राजनीति
हर एक औसत भारतीय की तरह राहुल गांधी को भी हक है कि वे अपने पूर्वजों व परिवार के साथ अपने गोत्र तक पर भी गर्व करें. राजस्थान के चूरू में राहुल ने बड़े इमोशनल अंदाज में कहा कि ‘उन्होंने’ मेरी दादी व पिता को मार डाला. मैं भी मौत से घबराता नहीं हूं. सार्वजनिक रूप से व्यक्त किए गए इस गर्व व त्याग का मतलब साफ था कि इस के बदले हमें वोट दो.
आजकल जनता पहले सी भावुक नहीं रही. उस के सामने बड़ी झंझटें हैं. प्याज खरीदना तक रोजमर्राई चुनौती बन गई है. ऐसे में गांधी परिवार की शहादत पर गर्व करने में आंसू आएं न आएं, आंखें तो भर ही आती हैं. लोग भोर से ले कर देर रात तक कमाने में लगे हैं, बचाखुचा वक्त टीवी खा जाता है. यानी फख्र करने के लिए भी वक्त का टोटा है. फिर भी राहुल अपनी खानदानी कुर्बानी की याद दिलाने में कामयाब रहे. असर भले ही चंद घंटे रहा हो, क्या फर्क पड़ता है.


कानूनी प्रतिशोध
तथाकथित बड़े लोगों की बेइज्जती भी बड़ी होती है. वरिष्ठ भाजपाई नेता और अधिवक्ता राम जेठमलानी को मई के महीने में भाजपा ने बाहर किया था. उन पर आरोप अनुशासनहीनता का था. यह निष्कासन, दरअसल, अपमान है, इस की अनुभूति 5 महीने बाद जेठमलानी को अक्तूबर के तीसरे हफ्ते में हुई. उन्होंने आव और ताव दोनों देख कर भाजपा संसदीय बोर्ड पर 4.5 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया.
12 सदस्यीय बोर्ड में से जेठमलानी ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को शायद सीनियर सिटीजन होने का डिस्काउंट दे दिया और नरेंद्र मोदी को इसलिए बख्श दिया कि उन्होंने ही उन के हक में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के खिलाफ बयानबाजी की थी. मामला दिलचस्प है. अदालत शायद ही किसी राजनीतिक दल के संविधान में दखल देना पसंद करे और दिया तो आइंदा किसी
को पार्टी से निकालने से पहले उन अधिवक्ताओं की राय महत्त्वपूर्ण हो जाएगी जो बैठेठाले मुकदमामुकदमा का प्रिय खेल वक्त गुजारने के लिए खेला करते हैं.


नोटों का गद्दा
नोटों के बिस्तर पर सोने की इच्छा हर किसी की होती है. इस का अपना अलग मनोविज्ञान है. त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता समर आचार्य ने अपनी यह हसरत पूरी कर ली तो उन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया.
समर ने, देखा जाए तो गलत कुछ नहीं किया था, उन्होंने अपने बैंक खाते से 20 लाख रुपए निकाले और बिस्तर पर बिछा कर सो गए. अगर यह पैसा कालानीला नहीं था तो यह उन का हक है. कई नेता मंच पर और शादी के वक्त दूल्हा भी नोटों की माला पहनता है, गले में पड़ी सोने की चैन भी नोटों से ही आती है. निकाले जाने के बाद समर ने एक कायदे की बात कह ही डाली कि वे उन ढोंगी नेताओं में से नहीं हैं जिन के पास अकूत दौलत है पर वे गरीब होने का दिखावा करते हैं. मामला आयागया हो गया पर मेट्रैस कंपनियों को संदेशा छोड़ गया कि वे स्प्रिंग और फोम के साथसाथ नोटों के गद्दे भी बना कर बेच सकती हैं.


तो कहां मांगें वोट
5 राज्यों के विधानसभा चुनाव पर इस बार चुनाव आयोग ने इस तरह लगाम कस रखी है कि उम्मीदवार भयभीत हैं कि कहीं सपने में भी आचारसंहिता का उल्लंघन न हो जाए. शादीविवाह, लंगर और मृत्युभोज में वे वोट नहीं मांग सकते.
आजकल पारिवारिक समारोहों पर भी चुनाव आयोग नजर रखेगा तो दिक्कत तो नेताओं को होगी जो पूरे 5 साल ऐसे समारोहों में शिरकत महज वोटों की गरज से ही करते हैं. हालत कुछ ऐसी है कि गंगाजी तक जाओ पर डुबकी मत लगाओ.
बेहतर तो यह होगा कि चुनाव आयोग अब राजस्व बढ़ाने के लिए वोट मांगने वालों से फीस वसूलनी शुरू कर दे, जिस से आम आदमी पर चुनावी खर्चे की मार कम पड़े. मसलन, श्मशान में श्रद्धांजलि भाषण देने के प्रति नेता शुल्क 21 हजार रुपए रखा जाए तो तमाम आयोजनों से तगड़ी आमदनी होगी.

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