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सवालों के घेरे में धारा 498ए

मृतक के हाथ में एक छोटा सा फटेचिटे कपड़े का टुकड़ा था, जिस पर लिखा हुआ था, ‘दहेज उत्पीड़न के आरोप को सह न पाने के कारण मजबूरन मुझे यह रास्ता अख्तियार करना पड़ा.’ आत्महत्या करने वाले इस शख्स का नाम था प्रयाग सिंह. 1983 में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को ढाल के रूप में 498ए कानून सौंपा गया था. आज ज्यादातर मामलों में यह ढाल अब एक धारदार हथियार के रूप में तबदील हो चुकी है.

विवाहित महिलाओं को विशेष तरह की सुरक्षा देने वाली भारतीय दंड विधान की धारा 498ए के लागू होने के 3 दशक पूरे हो चुके हैं. वास्तविकता यह है कि सही माने में मुट्ठीभर मामलों को छोड़ कर न्याय देने और दिलाने में यह धारा कोसों दूर है. इस धारा का पुरुषों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है. इस का अंदेशा शुरू से ही था और समयसमय पर विभिन्न मोरचों पर इस को ले कर बहुत बहस भी हो चुकी है. इस में जो नया है वह यह कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि 498ए धारा के अंतर्गत अभियोजन पक्ष द्वारा महज शिकायत करने पर बगैर जांच के अभियुक्त/अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने पहले भी इस धारा के बेजा इस्तेमाल पर नाराजगी जाहिर की थी. एक बार तो इसे ‘कानूनी आतंकवाद’ का भी नाम दिया गया. लेकिन धारा के लागू होने के 3 दशक के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सी के प्रसाद की खंडपीठ ने घरेलू हिंसा के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि देखा जा रहा है धारा 498ए का इस्तेमाल ढाल के बजाय हथियार के रूप में कहीं अधिक हो रहा है. इसलिए पुलिस मामले की जांच किए बगैर अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं कर सकती है. थाना क्षेत्र के पुलिस जांच अधिकारी को मैजिस्ट्रेट के सामने अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए तर्क और तथ्य पेश करने होंगे. वहीं, न्यायाधीश सी के प्रसाद की खंडपीठ ने मजिस्ट्रेटों को भी ताकीद की है कि ऐसे मामले में वे भी मशीनी तौर पर अपना फैसला न सुनाएं.

नहीं होगा उत्पीड़न

जाहिर है सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने पुरुषों को बड़ी राहत दी है. अब तक होता यही रहा है कि इस धारा के तहत किसी महिला द्वारा शिकायत करने पर अभियुक्त ससुराल वालों की गिरफ्तारी तुरंत हो जाती थी और बेकुसूर साबित करने की जिम्मेदारी भी खुद अभियुक्तों की ही होती. मामले की जांच भी बाद में होती. गौरतलब है कि इस धारा के तहत अधिकतम सजा 3 साल की कैद है. पर फर्जी शिकायत के मामले में एक पूरा का पूरा परिवार पहले तो जेल की सलाखों के पीछे और फिर सामाजिक तौर पर उत्पीड़न का शिकार हो कर खत्म हो जाता है.

कोलकाता हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट भास्कर वैश्य का कहना है, ‘‘कुछ मामलों में पाया गया है कि महिलाएं पति या ससुराल से अपनी खुन्नस मिटाने के लिए इस धारा का प्रयोग हथियार के रूप में करती हैं. बहुत सारे मामलों में यह भी पाया गया है कि पति के बीमार या बिस्तर पर पड़े सास व ससुर, विदेश में रहने वाली ननद व ननदोई और यहां तक कि घर के किशोरों को भी केवल खुन्नस मिटाने के लिए इस धारा के लपेटे में महिलाओं द्वारा ले लिया जाता है.’’ वे कहते हैं कि इस धारा का सब से खतरनाक पहलू यह है कि अपनेआप को निर्दोष साबित करने का दायित्व केवल और केवल अभियुक्त का है. यही नहीं, इस धारा में आपसी समझौते से मामले को निबटाने की भी कोई गुंजाइश नहीं है. जाहिर है, इस में पुलिस को बंदरबाट का मौका मिल जाता है.

पुलिस की भूमिका

अकसर देखा जाता है कि पुलिस का जांच अधिकारी ही परिवार के बहुत सारे सदस्यों का नाम सूची में शामिल कर के उन्हें अभियुक्त बना देता है और मामला अदालत में पहुंचने पर कुछ सदस्यों से लेनदेन कर के उन के नाम हटा देता है. एक हद तक यह धारा पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार को भी न्योता देती है. इसीलिए कोई 10 साल पहले मल्लीनाथ समिति ने भी इस धारा में संशोधन की सिफारिश की थी. विवाहित महिलाओं को ससुराल पक्ष द्वारा दिए जाने वाले मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न से सुरक्षा देने वाली इस गैर जमानती धारा के बेजा इस्तेमाल की बढ़ती वारदातों के मद्देनजर 2012 में पूर्व न्यायाधीश पी वी रेड्डी ने तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को पत्र लिख कर इस में जरूरी संशोधन की बात कही थी. रेड्डी ने अपने पत्र में झारखंड की प्रीति गुप्ता बनाम राज्य के मामले का हवाला भी दिया था. रेड्डी के अलावा 2012 में कानून आयोग ने भी अपनी 234वीं रिपोर्ट में यही बात कही है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 498ए के तहत दर्ज होने वाले मामले में प्रति वर्ष 10 प्रतिशत का इजाफा हो रहा है. 2009 में देशभर में कुल 89,546 मामले इस धारा के अंतर्गत दर्ज हुए. जबकि केवल 7380 मामले यानी 2.3 प्रतिशत मामलों में दोष सिद्ध हुआ. साल 2012 के प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय दंड विधान की इस धारा के तहत कुल 1,97,762 लोगों की गिरफ्तारी हुई. इस में भी एकचौथाई संख्या महिलाओं की है, जो अभियोजन पक्ष की या तो सासननद या फिर देवरानीजेठानी हैं. वहीं, 93.6 प्रतिशत जमा की गई चार्जशीट्स में से महज 15 प्रतिशत कुसूरवार साबित होते हैं.

संशोधन की सिफारिश

कुछ महिलाएं इस धारा का गैरवाजिब इस्तेमाल कर के न केवल औरों की आजादी का हनन करती हैं, बल्कि सामाजिक उत्पीड़न के साथ पूरे परिवार के नाम के साथ कभी न मिटने वाला धब्बा भी चस्पां कर देती हैं. लेकिन अब कुछ मुट्ठीभर स्वार्थी महिलाओं के कारण इस धारा में संशोधन के लिहाज से हो सकता है इसे जमानतयोग्य धारा बना दिया जाए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी वी रेड्डी, कानून आयोग और मल्लीनाथ समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है. ऐसा किया जाएगा तो इस धारा का प्रभाव कुछ कम हो जाएगा. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि सही माने में जिन महिलाओं के लिए यह धारा मददगार साबित हो सकती है, उन को पुख्ता न्याय शायद नहीं मिल पाएगा. ऐसे में जहां से चले थे, हम वापस वहीं पहुंच जाएंगे और इन 3 दशकों में एक वृत्त पूरा हो जाएगा, जिस का हासिल सिफर होगा

तेल का खेल

पिछले कुछ महीनों से पैट्रोल व डीजल की कीमतें बारबार घट रही हैं. पहली नजर में यह अच्छी बात है. भारत जैसे विकासशील देश का आमजन इस पूरे प्रकरण से खुश है. एक तरफ आम आदमी को उम्मीद है कि इस से मुद्रास्फीति पर लगाम लगेगी तो दूसरी तरफ सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होगा. लंबे समय से मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था में एक हद तक सुधार होगा. लेकिन यह आशंका भी है कि तेल की कीमतों में यह उतारचढ़ाव कहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नए ‘औयल वार’ का आगाज न साबित हो.

हालांकि तेल को ले कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की राजनीति अब बीते जमाने की बात हो गई है. पिछले कुछ वर्षों से मंदी की मार झेलने के बाद दुनिया का सारा टंटा अर्थव्यवस्था पर केंद्रित हो कर रह गया है.फिलहाल इस तेल युद्ध में ओपेक और अमेरिका आमनेसामने हैं. खाड़ी युद्ध और क्षेत्र की राजनीतिक अस्थिरता के कारण तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था संकट में है. इस से एक हद तक ओपेक का प्रभाव कम हुआ है. अमेरिका द्वारा शैल गैस का उत्पादन शुरू कर देने के बाद उस की आयात पर निर्भरता कम हो गई है. ऐसे में अमेरिका तेल के खेल पर अपना नियंत्रण चाहता है. वहीं, सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देश इस खेल में किसी तरह अपनी हैसियत बनाए रखना चाहते हैं.

मोटेतौर पर देखा जाए तो पैट्रोल व डीजल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति पर बहुत ज्यादा निर्भर करती हैं. वहीं मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति पर नजर डालें तो कीमतों के घटने के बजाय बढ़ने के आसार ज्यादा लगते हैं. पिछले कुछ समय से तेल के मुख्य उत्पादक देश ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, नाइजीरिया आदि में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है.पूरे पश्चिम एशिया में सक्रिय आतंकी संगठन इसलामिक स्टेट्स औफ इराक ऐंड सीरिया को ले कर दुनिया भर में आतंक छाया हुआ है. फिर भी तेल की कीमत में उल्लेखनीय गिरावट आई है. जून 2013 से ले कर अब तक कमोबेश कीमत में 30-35 प्रतिशत की कमी आई है.

गौरतलब है कि पिछले साल जून में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत प्रति बैरल 115 डौलर तक पहुंची थी. आज कीमत प्रति बैरल 72 डौलर पर पहुंच चुकी है. पिछले 5 महीने में लगभग 40 प्रतिशत कीमत कम हुई है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में यह 50-65 डौलर प्रति बैरल तक घट सकती है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि तेल की कीमतों में लगातार गिरावट की आखिर वजह क्या है और इस का सुख कितने समय के लिए है?

तेल के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो कुछ घट रहा है उस पर हाल ही में एक साक्षात्कार में ओपेक के महासचिव अब्दुल्लाह सलेम अलबद्री ने सट्टेबाजी की भूमिका की ओर इशारा किया है. तेल व प्राकृतिक गैस राजनीति के विशेषज्ञ शांतनु संन्याल का मानना है कि मांग कम होने के पीछे एक बड़ा कारण यूरोप और जापान में मंदी है. वहीं, भारत समेत चीन, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, जापान और इंडोनेशिया जैसे बड़े तेल का आयात करने वाले बड़े देशों में विकास की गति धीमी पड़ने से उन की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते तेल की मांग घट रही है.

बहरहाल, बाजार विशेषज्ञों की राय है कि तेल की कीमत में गिरावट का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा. उधर, विश्व में प्रतिदिन के तेल उत्पादन में 20 लाख बैरल का इजाफा हो गया है. पर मांग घट रही है. ऐसा क्यों? अर्थशास्त्र के जानकार श्रीकुमार बनर्जी कहते हैं कि पिछले 3-4 सालों से तेल के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक बड़ा परिवर्तन आया है. अमेरिका अपने यहां बडे़ पैमाने पर तेल का उत्पादन कर रहा है और इस के बल पर अमेरिका जल्द से जल्द सऊदी अरब को पछाड़ कर तेल के अर्थशास्त्र का नियंत्रण अपने हाथों में ले लेना चाहता है.

वर्ष 2009 से कच्चे तेल के आयात पर अमेरिका की निर्भरता कम होने लगी और पिछले वर्ष जुलाई से नाइजीरिया से तेल का आयात अमेरिका ने एकदम बंद कर दिया है. अब अमेरिका खुद शैल गैस का उत्पादन कर रहा है. कनाडा भी इसी रास्ते चलने की तैयारी में है. इस के लिए बहुत बड़े पैमाने पर कनाडा ने निवेश भी कर रखा है. कनाडा औयल सैंड से तेल निकालने की कोशिश में काफी समय से लगा हुआ है.

फंडा तेल पर नियंत्रण का

वर्ष 1940 से 1960 की बात करें तो पहले विश्व बाजार में तेल की आपूर्ति और कीमत पर 84 प्रतिशत नियंत्रण का काम 7 संस्थाएं किया करती थीं, इन में से 6 अमेरिकी संस्थाएं ही थीं. इन बहुराष्ट्रीय संस्थाओं का प्रभाव कम करने के लिए 1960 में खाड़ी के 4 देशों ने मिल कर और्गेनाइजेशन औफ दी पैट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यानी ओपेक नामक संस्था बनाई, जिस का लक्ष्य तेल के उत्पादन को नियंत्रित करना था.ओपेक के सदस्य देश आपसी सहमति से उत्पादन कम या अधिक कर के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत पर नियंत्रण किया करते थे. आगे चल कर 9 और देश ओपेक के सदस्य बने. इस से तेल के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ओपेक मजबूत हुआ. तेल उत्पादक देशों ने इस के जरिए 1970 के दशकों तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार का 54 प्रतिशत नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जबजब कीमत कम होने का अंदेशा हुआ, ओपेक के सदस्य देशों ने उत्पादन और आपूर्ति कम कर के कीमत को ऊपर बनाए रखा.

लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. एक तरफ तेल का उत्पादन बढ़ा है तो दूसरी तरफ मंदी के प्रभाव के कारण मांग घटी है. जाहिर है तेल की कीमत लगातार गिर रही है. उधर, खाड़ी के देशों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण ओपेक अपने तमाम सदस्य देशों को उत्पादन कम करने के लिए राजी नहीं कर पाया. खासतौर पर सऊदी अरब समेत इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत जैसे खाड़ी के देशों ने इस का विरोध किया.वर्ष 1990 के दशक से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ओपेक का प्रभाव धीरेधीरे घटने लगा. इसी दौरान इराक और ईरान ने अपने यहां उत्पादित तेल का एक बड़ा हिस्सा डौलर के बदले यूरो में बेचने का फैसला किया. इस के बाद विश्व का सब से बड़ा तेल आयात करने वाला देश अमेरिका तेल की आपूर्ति का अन्य स्रोत ढूंढ़ने में लग गया.

चीन, अमेरिका और रूस के बाद भारत चौथा तेल का सब से बड़ा उपभोक्ता है. हमारे देश में पैट्रोल व डीजल की जितनी मांग है, उस का 20 प्रतिशत भी उत्पादन यहां नहीं होता है. यूपीए सरकार के पैट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि मांग का 80 प्रतिशत आयात करना पड़ता है. लेकिन इधर तेल की कीमत में बड़ी कमी हुई है. अकेले 2014 में पैट्रोल की कीमत में लगभग10 रुपए और डीजल की कीमत में लगभग 7 रुपए प्रति लिटर तक की कमी आई है. यहां तक कि बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर और विमान में भरे जाने वाले ईंधन की कीमत में भी बड़ी कमी आई है.

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल व प्राकृतिक गैस की कीमत में उतारचढ़ाव से आम आदमी अलग था. इस पर सरकार का नियंत्रण था. आम आदमी को पैट्रोल ईंधन कम कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार इस पर सब्सिडी दिया करती थी. लेकिन 2010 में सरकार ने पैट्रोल की सब्सिडी से हाथ खींच लिया. इस के बाद 19 अक्तूबर, 2014 से डीजल को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया. अब सरकार केवल केरोसिन और एलपीजी पर सब्सिडी देती है, लेकिन एलपीजी पर आंशिक तौर पर.

अर्थशास्त्र के जानकार श्रीकुमार बनर्जी का मानना है कि मौजूदा स्थिति का लाभ उठाने के लिए जल्द से जल्द रिलायंस और एस्सार जैसी कंपनियां पैट्रोल व डीजल के खुदरा कारोबार में उतरने के लिए कमर कस रही हैं. मौजूदा समय में हर 15 दिन में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पैट्रोल व डीजल की कीमतों की समीक्षा के बाद राज्य सरकार के हिस्से का राजस्व और पैट्रोलपंप मालिकों का कमीशन जोड़ कर कीमत तय होती है.इस समय सऊदी अरब समेत खाड़ी के देश चाहते हैं कि अमेरिका शैल गैस का उत्पादन बंद कर दे. इस समय सऊदी अरब को प्रति बैरल लगभग 30 डौलर का नुकसान हो रहा है. इस आधार पर आंकड़े बताते हैं कि इस समय सऊदी अरब के सालाना राजस्व में लगभग 9 हजार करोड़ डौलर का नुकसान हो रहा है. हालांकि माना यह भी जा रहा है कि यह नुकसान सऊदी शेखों के लिए कोई ज्यादा माने नहीं रखता क्योंकि तेल से हुई आमदनी का अकूत धन इन शेखों के पास है.

बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें

अमेरिका जिस फ्रैकिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है, वह खर्चीला है और इस से उत्पादन लागत अधिक हो जाती है. ऐसे में प्रति बैरल 72 से 75 डौलर पर बेचने पर ही शैल गैस का उत्पादन करने वाली अमेरिकी कंपनियों का खर्च निकल पाएगा. विशेषज्ञों का एक धड़ा यह भी मानता है कि ज्यादा दिनों तक तेल की कीमत प्रति बैरल 100 डौलर के नीचे घूमतीफिरती रहेगी तो तेल उत्पादन करने वाली बहुत सारी अमेरिकी कंपनियों पर ताला लगना ही है. इस से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति कम हो जाएगी और तब कीमत बेतहाशा बढ़ेगी पर अमेरिका अपना तेल उत्पादन बंद करने के लिए राजी नहीं होगा, क्योंकि वह इस में बहुत बड़ी पूंजी झोंक चुका है.

अगर शैल गैस का उत्पादन अमेरिका बंद कर देता है तो एक नए संकट से उस का सामना होगा, बहुतकुछ 2008 में लेहमैन ब्रदर के दिवालिया होने के बाद जैसी स्थिति होगी. और इस का प्रभाव पूरे विश्व पर होगा. जाहिर है अमेरिका इस रास्ते का रुख नहीं करेगा. तमाम रस्साकशी के बाद अब सऊदी अरब चाहता है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत प्रति बैरल 75 डौलर पर टिकी रहे

चंचल छाया

जेड प्लस

‘जेड प्लस’ आम आदमी (केजरीवाल जैसा नहीं) पर बनी फिल्म है, जिसे प्रधानमंत्री के आदेश पर ‘जेड प्लस’ सुरक्षा दी गई है. आम आदमी तो केजरीवाल भी था, मगर चुनाव जीतने और दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वह खास आदमी बन गया तो उसे भी जेड प्लस सुरक्षा औफर की गई थी. इस फिल्म का हीरो सूटेडबूटेड नहीं है. वह टायरों में पंचर लगाने का काम करता है. उस के टूटेफूटे घर में टौयलेट तक नहीं है. (केजरीवाल जैसे आम आदमी के पास तो 5-6 कमरों का सुसज्जित मकान तो था.) इस फिल्म का हीरो जब शौच के लिए खुले में जाता है और सुरक्षा में तैनात कमांडो भी उस के पीछेपीछे हाथों में लोटा उठाए खुले में जाते हैं तो बरबस होंठों पर हंसी आ जाती है.

जेड प्लस सिक्योरिटी मिलने के बाद एक आम आदमी की जिंदगी में किस तरह के बदलाव आते हैं, फिल्म में इसे गहराई से दिखाया गया है. निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी, जिस ने ‘चाणक्य’ जैसा धारावाहिक और बंटवारे पर ‘पिंजर’ जैसी मर्मस्पर्शी फिल्म बनाई, ने ‘जेड प्लस’ में सरकारी कामकाज पर कटाक्ष करने के साथसाथ देश के प्रधानमंत्री पर भी कटाक्ष किया है. ‘जेड प्लस’ में प्रधानमंत्री के किरदार को पूरी तरह अंधविश्वासी दिखाया गया है. वह अपनी कुरसी बचाए रखने के लिए दरगाह पर मत्था टेकने जाता है और पीपल वाले पीर के नाम का तावीज अपने गले में पहनता है. वैसे आप को बता दें कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी कम अंधविश्वासी नहीं रहे हैं. वे भी जगहजगह मंदिरों में मत्था टेकने पहुंच जाते हैं, कभी पशुपति मंदिर में तो कभी और कहीं. निर्देशक ने इस फिल्म में दिखाए गए प्रधानमंत्री के किरदार का मेकअप भी नरेंद्र मोदी से मिलताजुलता किया है. यह सब दिखा कर उस ने प्रधानमंत्री तक पर व्यंग्य कर डाला है.

हमारे प्रधानमंत्री चाहे कितना ही कहते फिरें कि वीवीआईपी के काफिले के गुजरने पर सड़कों पर चलने वाले आम नागरिकों को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए लेकिन यह सच है कि देश का कोई बड़ा नेता किसी छोटे इलाके में जाता है तो आम आदमी की जिंदगी बेहाल हो जाती है. आम आदमी को खुशहाल दिखाने और उस की गरीबी छिपाने की कोशिश की जाती है. ये सब बातें निर्देशक ने अपनी इस फिल्म में उठाई हैं. फिल्म की विशेषता है इस की कहानी और सशक्त पटकथा. रामकुमार सिंह ने ऐसा तानाबुना बुना है कि सभी किरदार अपने जैसे लगते हैं. हालांकि ये किरदार नामीगिरामी कलाकार नहीं हैं, फिर भी दिलों में जगह बना लेते हैं. आम आदमी की परेशानियों को दिखाती यह फिल्म एक बार देखने लायक तो बनती है.

कहानी राजस्थान के एक छोटे से गांव फतेहपुर की है, जहां एक पीपल वाले पीर की दरगाह है. दरगाह के पास ही असलम (आदिल हुसैन) की पंचर लगाने की दुकान है. एक दिन उसे पता चलता है कि पीर की दरगाह पर चादर चढ़ाने प्रधानमंत्री आने वाले हैं. जिस दिन प्रधानमंत्री को चादर चढ़ाने आना है उस दिन दरगाह में खादिम की ड्यूटी असलम को देनी है. प्रधानमंत्री आते हैं. वे असलम से खुश हो कर उसे कुछ मांगने को कहते हैं. वह प्रधानमंत्री से अपने पड़ोसी हबीब (मुकेश तिवारी) से नजात पाने की गुहार करता है. प्रधानमंत्री उसे जेड सिक्योरिटी देने का आदेश देते हैं.

जेड सिक्योरिटी मिलने के बाद असलम की जिंदगी में मुश्किलों का दौर शुरू हो जाता है. उस का दबदबा देख प्रदेश के मुख्यमंत्री उसे पार्टी जौइन कर चुनाव लड़ने को कहते हैं. प्रधानमंत्री के सैक्रेटरी दीक्षित (के के रैना) को पता है कि असलम को जेड सिक्योरिटी देने के पीछे प्रधानमंत्री की गलतफहमी है. अंत में असलम प्रधानमंत्री से मिल कर जेड सिक्योरिटी हटाने की गुहार लगाता है. तभी उस पर जानलेवा हमला होता है. प्रधानमंत्री को भी अपनी गलती का एहसास होता है. उस की सिक्योरिटी हटाने का आदेश जारी होता है. तभी पता चलता है कि असलम चुनाव जीत गया है. मुख्यमंत्री उसे फिर से जेड प्लस सिक्योरिटी मुहैया करा देते हैं. फिल्म की कहानी व्यंग्यात्मक तरीके से सीधेसीधे कह दी गई है. फिल्म के संवाद दमदार हैं, मगर गालियां बहुत हैं.

सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा है. आदिल हुसैन ने एक आम आदमी का किरदार खूबसूरती से निभाया है. मोना सिंह कुछ दृश्यों में जमी है. मुकेश तिवारी और के के रैना तो वैसे ही अच्छे कलाकार हैं, इस फिल्म में भी उन्होंने अच्छा काम किया है. संजय मिश्रा का रोल घिसापिटा है. कुलभूषण खरबंदा ने प्रधानमंत्री का किरदार किया है. इस किरदार को हिंदी बोलना नहीं आता. ऐसा इसलिए शायद निर्देशक इस किरदार की तुलना नरेंद्र मोदी से परोक्ष रूप में नहीं करना चाहता हो. इस तरह की फिल्में में फिल्म का गीतसंगीत ज्यादा महत्त्व नहीं रखता. फिर भी पार्श्व संगीत अनुकूल है. छायांकन अच्छा है.

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हैप्पी ऐंडिंग

बौलीवुड में यह माना जाता है कि जिस फिल्म की हैप्पी ऐंडिंग हो यानी अंत सुखमय हो, वह फिल्म चल निकलती है और जिस फिल्म के अंत में हीरोइन या हीरो मर जाता है, यह माना जाता है कि उस फिल्म की भी मौत हो गई. फिल्मों की तरह हमारी जिंदगी में भी सबकुछ ठीकठाक रहा हो तो लाइफ की हैप्पी ऐंडिंग माना जाता है. लेकिन यहां तो सैफ अली खान की इस फिल्म की ऐंडिंग जिस तरह से की गई है उस से लगता है, निर्देशकद्वय फिल्म को और आगे संभाल पाने में खुद को असमर्थ पा रहे थे, इसलिए एकदम से हैप्पी ऐंडिंग कर डाला यानी हीरो भी खुश, हीरोइन भी खुश. निर्देशक तो पहले से ही खुश थे कि चलो कन्फ्यूजन से तो पीछा छूटा. लेदे कर हैप्पी ऐंडिंग देख कर दर्शक भी खुश हो गए.

यूडी (सैफ अली खान) एक लेखक है. प्रकाशक को उस की अगली किताब का इंतजार है, मगर यूडी अपनी पहली किताब से मिली रौयल्टी की रकम को मौजमस्ती में उड़ाता है. शादी में उस की बिलकुल दिलचस्पी नहीं. पहले वह दिशा (प्रीति जिंटा) से ब्रेकअप करता है. अब उस की दिलचस्पी विशाखा (कल्कि कोचलीन) में भी नहीं है. तभी उस की लाइफ में आंचल (इलियाना डिकू्रज) आती है. वह भी एक लेखिका है और रोमांटिक कहानियां लिखती है. इसी दौरान एक सुपरस्टार अरमान (गोविंदा) यूडी को अपनी फिल्म के लिए कहानी लिखने का औफर देता है. डील फाइनल हो जाती है. यूडी स्क्रिप्ट लिखता है परंतु स्क्रिप्ट हैप्पी ऐंडिंग पर अटक जाती है. अंत में वह आंचल को प्रपोज करता है तो उसे लगता है उस की स्क्रिप्ट पूरी हो गई और उस की ऐंडिंग भी हैप्पी हो गई.

इस फिल्म की कहानी कमजोर है, मगर फिल्म के संवाद काफी अच्छे हैं. कहानी सैफ अली खान की पिछली फिल्मों ‘हम तुम’, ‘सलाम नमस्ते’ और ‘कौकटेल’ जैसी है. निर्देशक ने फिल्म को रोमांटिक कौमेडी बनाने की कोशिश की है. सैफ अली खान पर उम्र का असर दिखने लगा है. उस पर लड़कपने से भरा किरदार सूट नहीं करता. इलियाना डिक्रूज ने ‘बरफी’ के बाद जितनी भी फिल्में की हैं, सभी में एकजैसा अभिनय किया है. गोविंदा एक बार फिर से फौर्म में नजर आया है. इस उम्र में भी उस ने कमीज खोल कर अपने 6 पैक्स दिखाए हैं. परेशान दोस्त की भूमिका में रणवीर शोरी का काम काफी अच्छा है. अरसे बाद परदे पर आई प्रीति जिंटा भी अच्छी लगी है.

फिल्म का निर्देशन कुछ हद तक ठीक है, मगर गति काफी धीमी है. इन्हीं निर्देशकों की सैफ अली को ले कर बनाई फिल्म ‘गो गोवा गौन’ नहीं चली थी.फिल्म का गीतसंगीत कुछ अच्छा है. फिल्म की फोटोग्राफी काफी अच्छी है. सैन फ्रांसिस्को और लास एंजिलस की सुंदर लोकेशनों पर शूटिंग की गई है.

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किल दिल

करीब 4 साल बाद गोविंदा ने एक बार फिर परदे पर वापसी की है. वह हीरोगीरी छोड़ कर विलेन बना है. लेकिन यह विलेन आतंकित नहीं करता, न ही इसे देख कर डर लगता है. गोविंदा को इस कमजोर किरदार में देख कर फैंन्स को निराशा ही होगी. जहां तक फिल्म की बात है, शाद अली की यह फिल्म 70 के दशक में आई फिल्मों जैसी है. कमजोर पटकथा और बेहद सुस्त रफ्तार वाली यह फिल्म दर्शकों के दिलों को किल ही करती नजर आती है. ‘बंटी और बबली’ तथा ‘साथिया’ जैसी फिल्में बनाने वाले शाद अली ने रुटीन मसाला फिल्म बनाई है. फिल्म में रणवीर सिंह अकेला ऐसा ऐक्टर है जो थोड़ाबहुत इम्प्रैस करता है. उस का किरदार बहुतकुछ फिल्म ‘लुटेरा’ से मिलताजुलता है.

फिल्म की कहानी दोस्ती पर आधारित है, ठीक वैसे ही जैसे रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर की फिल्म ‘गुंडे’ में दोनों किरदारों की दोस्ती थी. ‘किल दिल’ में देव (रणवीर सिंह) और टूटू (अली जफर) 2 दोस्त हैं. इन दोनों को बचपन में कचरे में से एक सुपारी किलर भैयाजी (गोविंदा) उठा लाया था.

बड़े हो कर दोनों भैयाजी के शूटर बन जाते हैं. एक दिन इन की मुलाकात डिस्को में दिशा (परिणीति चोपड़ा) से होती है. दिशा एक एनजीओ से जुड़ी है. दिशा और देव की नजदीकियां बढ़ने लगती हैं. टूटू को इस बात की चिंता है कि देव के इस प्यार के बारे में भैयाजी का रिऐक्शन न जाने क्या होगा. कहानी में मोड़ तब आता है जब दिशा को देव की असलियत और भैयाजी को देव के प्यार के बारे में पता चलता है. देव नकली डिगरी हासिल कर इंश्योरैंस कंपनी में नौकरी करता है. उधर, भैयाजी के दुश्मन उसे मार डालते हैं. देव को भी गोली लगती है, परंतु वह बच जाता है. अब वह सारे गलत काम छोड़ देता है और दिशा का हाथ थाम लेता है. टूटू भी गलत काम छोड़ कर इंश्योरैंस कंपनी जौइन कर लेता है.

इस कहानी में नयापन बिलकुल भी नहीं है. परिणीति चोपड़ा न तो बबली लगी है न ही बिंदास. अली जफर ने कुछ नया कर के नहीं दिखाया है. फिल्म का निर्देशन साधारण है. निर्देशक ने पूरी फिल्म को इसी चक्कर में उलझाए रखा है कि कहीं दिशा को पता न चल जाए कि देव बुरा आदमी है और कहीं भैयाजी को पता न चल जाए कि देव अच्छा आदमी है. फिल्म के कुछ संवाद अच्छे हैं मगर चालू हैं, जैसे ‘मूंगफली में छिलके और लौंडिया में नखरे न होते तो जिंदगी कितनी आसान होती’ और ‘लड़की आदमी को गन्ने से गुड़ बना देती है.’

फिल्म में मारधाड़ को जबरन ठूंसा गया है. कोई गाना जबान पर चढ़ने वाला नहीं है. एक गाने ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ में रणवीर और अली जफर दोनों परिणीति के साथ नाचे हैं. फिल्म का छायांकन ठीकठाक है. 

बिंब प्रतिबिंब

शादी के पहले बच्चे, बहुत कठिन है डगर

पिछले दिनों प्रदर्शित फिल्म ‘चारफुटिया छोकरे’ के चार दिन भी न चल पाने का गम सोहा को सता रहा है. इस बारे में वे कहती हैं कि मैं तो अपनी तरफ से बैस्ट देने की कोशिश करती हूं पर दर्शकों को क्या चाहिए, यह पता लगा पाना जरा मुश्किल होता है. अपने बौयफैंड कुनाल के साथ गुपचुप सगाई के बाद घर वाले उन के ऊपर जल्दी शादी करने के लिए दबाव डाल रहे हैं. शादी के मामले पर सोहा का कहना है कि हम लोगों से ज्यादा हमारी शादी की जल्दी हमारे घर वालों को है क्योंकि उन्हें अपने पोतेपोतियों को देखने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है. हम लोग उन की यह ख्वाहिश शादी के बाद ही पूरी कर पाएंगे क्योंकि बिना शादी के बच्चे, न बाबा न.

सितारा देवी का निधन

बीते जमाने की विख्यात कत्थक डांसर सितारा देवी का 24 नवंबर की रात में मुंबई में निधन हो गया. 94 साल की ये अदाकारा पिछले कई दिनों से वेंटिलेटर पर थीं. इन्हें पेटदर्द की शिकायत के चलते अस्पताल में भरती कराया गया था. आज की नौजवान पीढ़ी भले ही सितारा देवी को न जानती हो लेकिन नृत्यकला के शौकीन उन का नाम अदब से लेते हैं. बता दें कि सितारा देवी ही इस विधा को हिंदी फिल्मों में ले कर आई थीं. 6 दशक से भी ज्यादा समय तक प्रतिष्ठित डांसर रहीं सितारा ने हिंदी फिल्मों के कई बड़े सितारों को डांस सिखाया था. वर्ष 1973 में उन को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजे जाने की घोषणा की गई थी, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया था. उन के निधन पर जहां कई फिल्मी हस्तियां शोक में हैं तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर के उन के निधन पर शोक व्यक्त किया.

शर्मिंदा हैं आमिर

इसे आमिर खान का पब्लिसिटी फंडा कहें या साफगोई, जो पिछले दिनों उन्होंने फिल्मों के करोड़ों के फर्जी आंकड़ों पर अपनी राय रखी तो वहीं हिंदी फिल्मों में महिलाओं के बेहूदा चित्रण पर दुख भी जताया. उन का कहना है, ‘‘हम अपनी फिल्मों में औरतों का चित्रण ठीक से नहीं करते. मैं भी जानेअनजाने इस तरह की फिल्मों का हिस्सा रहा हूं और मुझे इस बात को ले कर शर्मिंदगी है.’’ उन के मुताबिक, समय आ गया है कि हम सब सोचें कि अपनेअपने बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं. उन्होंने फूहड़, अश्लील आइटम गीतों को भी इन के लिए जिम्मेदार ठहराया. यह अलग बात है कि आमिर के इन विचारों से सब सहमत नहीं हैं लेकिन उन की इस बात में दम तो है.

सम्मानित हुए अजय

फिल्म अभिनेता अजय देवगन ऐक्शन स्टार के तौर पर जाने जाते हैं. उन की इसी इमेज को ध्यान में रखते हुए दक्षिण कोरियाई संस्था कोक्किवान्मे डैन ने उन्हें ब्लैक बेल्ट से सम्मानित किया है. बता दें कि अजय अपनी फिल्म ऐक्शन जैक्सन में ताइक्वांडो स्टाइल में ऐक्शन करते नजर आएंगे. जाहिर है उन्हें इस कला को बढ़ावा देने के लिए ही इस पुरस्कार से नवाजा गया है. सब जानते हैं कि अजय ने अपने कैरियर के शुरुआती दौर में कई ऐक्शन फिल्में की थीं लेकिन बाद में उन का रुझान हास्य फिल्मों की तरफ बढ़ गया. इस फिल्म के जरिए वे एक बार फिर ऐक्शन अवतार में नजर आएंगे.

सुखविंदर की नाराजगी

मशहूर गायक और संगीत निर्देशक सुखविंदर इन दिनों काफी नाराज नजर आ रहे हैं. उन की नाराजगी का कारण है आजकल के गाने, जिन में नशे को बढ़ावा दिए जाने वाली बातें होती हैं. उन के मुताबिक, अब फिल्मी गीतों में शराब के साथ दूसरे नशों से जुड़े शब्दों का भी इस्तेमाल किया जाता है. वे इस बात के लिए सैंसर बोर्ड को भी आड़े हाथों लेते हैं. वे कहते हैं कि जब इस तरह के गीत सामने आते हैं तब सैंसर बोर्ड कहां चला जाता है. वह इन पर कैंची क्योें नहीं चलाता. ‘छैंयाछैंया’ और ‘जय हो’ जैसे गीतों के लिए मशहूर सुखविंदर की शिकायत बिलकुल सही है. आजकल हर दूसरा गाना शराब, पार्टी और नशे की वकालत करता नजर आता है.

सोशल मीडिया में यकीन नहीं : सैफ अली खान

बतौर कलाकार सैफ अली खान का कैरियर सफलता के ऊंचे पायदान पर है. यह अलग बात है कि वे ‘हमशकल्स’ जैसी असफल फिल्म का हिस्सा रहे हैं. अदाकारी के साथ वे निर्माता के रूप में भी सफल हैं. हाल में उन की फिल्म ‘हैप्पी ऐंडिंग’ रिलीज हुई है. शांतिस्वरूप त्रिपाठी  ने उन से फिल्म निर्माण, सोशल मीडिया व लव जिहाद जैसे मुद्दों पर खुल कर बातचीत की. पेश हैं उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

जब आप ने फिल्म ‘हमशकल्स’ की तो क्या उस वक्त आप को यकीन था कि ‘हम तुम’ या ‘ओमकारा’ जैसी फिल्मों में आप को पसंद करने वाले लोग हमशकल्स में भी पसंद कर लेंगे?

लोगों को मुझ से शिकायत थी कि मेरी फिल्में 100 या 200करोड़ रुपए नहीं कमातीं. लोग मुझे सलाह दे रहे थे कि मुझे कोई मसाला फिल्म करनी चाहिए. उस निर्देशक के साथ काम करना चाहिए जिस की फिल्में 100-200 करोड़ रुपए कमाती हैं तो मुझे लगा कि ‘हाउसफुल’ जैसी सफलतम फिल्म जिस ने बनाई है उस के साथ काम किया जाए. इसलिए साजिद खान के साथ ‘हमशकल्स’ करने के लिए राजी हुआ.

आप ने ‘हमशकल्स’ की रिलीज के बाद साजिद खान के साथ कभी काम न करने की बात कही थी?

साजिद खान मेरे अच्छे दोस्त हैं. ‘हमशकल्स’ के दौरान वे किसी की सुन नहीं रहे थे. फिल्म बहुत खराब लगी थी, इसलिए ऐसा कह दिया था. पर वे मेरे दोस्त हैं और दोस्त रहेंगे.

आप को किस तरह की कौमेडी पसंद आती है?

मेरे लिए कौमेडी के माने हैं कि इंसान को हंसी आए. उस के चेहरे पर एक मुसकान आए. कौमेडी को हम डिफाइन नहीं कर सकते. अमिताभ बच्चन हों या गोविंदा, अच्छी कौमेडी करते रहे हैं. मुझे कौमेडी की समझ है, ऐसा मैं मानता हूं.

आप की पिछली फिल्म ‘गो गोआ गौन’ को भी बौक्स औफिस पर सफलता नहीं मिली थी, जिस का आप ने निर्माण भी किया था?

पहली बात तो सब को खुश करने वाली फिल्में अलग होती हैं. मेरी राय में ‘गो गोआ गौन’ इंटरवल से पहले अच्छी थी. कौमेडी फिल्म थी, लेकिन इंटरवल के बाद जब जौंबी आए तो भारतीय दर्शक उस से रिलेट नहीं कर पाए. हमारे यहां जौंबी का कोई कल्चर भी नहीं है. बाद में मुझे भी कुछ अजीब सा लगा पर मैं आप को बता दूं कि हम ‘गो गोआ गौन’ का सीक्वल बनाना चाहते हैं, मगर यह सीक्वल फिल्म जौंबी के बगैर बनेगी.

क्या आप को लगता है कि जौंबी पर ‘गो गोआ गौन’ जैसी फिल्म बनाने से पहले लोगों को जौंबी के प्रति प्रशिक्षित करना जरूरी था?

ऐसा नहीं है. शायद हमारे जौंबी कुछ अच्छे नहीं थे. जौंबी यूनिवर्सल होने चाहिए. जैसे कि बे्रट किप ने अपनी फिल्म में जौंबी इंट्रोड्यूस किया था, वह काफी अच्छा था. उन्होंने एक बीमारी दिखाई थी. पर हमारी फिल्म में ऐसे जौंबी थे जिन से लोग रिलेट नहीं कर सके.

आप के लिए सफलता क्या माने रखती है?

सफलता का मतलब होता है कि लोग आप की फिल्मों को पसंद करें और उस के साथ आप कुछ अच्छा काम भी कर रहे हों. यानी कि गुणवत्ता वाला काम होना चाहिए. मसलन, हम पटौदी खानदान से हैं पर टैगोर खानदान से भी हैं तो हमें इन दोनों खानदानों की मर्यादा को बनाए रखते हुए काम करना चाहिए. मेरे लिए सफलता के माने ये हैं कि हम अपनेआप से खुश हों. हम हर विभाग में अच्छा काम करें. अपने काम के साथसाथ हम अपने परिवार, अपनी पत्नी व बच्चों के साथ भी अच्छे ढंग से रहें. काम में भी विविधता होनी चाहिए, सिर्फ पैसों के लिए काम नहीं होना चाहिए बल्कि सिनेमा के लिए भी काम होना चाहिए.

आप के पापा बहुत बड़े क्रिकेटर रहे हैं पर आप क्रिकेट से बहुत दूर हैं. इन दिनों कई कलाकार क्रिकेट की टीम या दूसरी कोई टीम खरीद रहे हैं. आप ने इस दिशा में कुछ सोचा?

मेरा मानना है कि हर इंसान को वही खेल खेलना चाहिए जिस में वह माहिर हो. टीम खरीदने वाली बात मेरी समझ से परे है. मुझे लगता है कि हर काम का एक वक्त होता है. इन्वैस्टमैंट करने के लिए भी एक वक्त होना चाहिए. सही आइडिया होना चाहिए. जो लोग देर से इन्वैस्टमैंट शुरू करते हैं उन्हें उतना फायदा नहीं मिलता है. मेरे पास भी एक टैनिस टीम खरीदने का औफर आया है पर मुझे यह बात समझ में नहीं आई. जब लोग मुझे औफर देते हैं कि हम आप को 10 या 20 प्रतिशत देंगे और आप सिर्फ अपना नाम दीजिए या कुछ अपियरैंस दीजिए, तो मुझे ‘दाल में काला’ नजर आता है. उस वक्त मुझे लगता है कि मेरा नाम भुनाया जा रहा है और उसे फायदा हो रहा है. मुझे कोई फायदा नहीं हो रहा. जो लोग पैसा देने का वादा करते हैं, उन से तो मैं दूर रहता हूं.

फिल्मी दुनिया में कौर्पोरेट सिस्टम आने से रचनात्मकता पर कितना असर पड़ा है?

मेरी राय में तो फायदा हो रहा है. पुराने जमाने में सिर्फ फिल्म का निर्माता कंट्रोल करता था. यह बुरी बात है कि एक इंसान पूरी टीम को कंट्रोल करता है. उस वक्त निर्माता कलाकार को पैसे भी नहीं देता था. वह कहता था कि यह बहुत बड़ी बात है कि हम ने तुम्हें अपनी फिल्म में काम दिया है. वह गलत सिस्टम था. अब थोड़ी सी ईमानदारी आ गई है. पारदर्शिता आ गई है. जिस का जो हक है वह उसे मिल रहा है.

कुछ कलाकार कौर्पोरेट सिस्टम में जा रहे हैं. हर माह एक फिल्म बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं?

सच कहूं तो ये सारे लोग कौर्पोरेट कौर्पोरेट चिल्ला रहे हैं पर यह कौर्पोरेट सिस्टम है नहीं. पहले बहुत गलत सिस्टम चल रहा था. किसी की समझ में सही बात आ नहीं रही थी. ब्लैक मनी, व्हाइट मनी, पता नहीं क्याक्या बातें हो रही थीं. अब फिल्म का बिजनैस नौर्मल हो गया है. वैसे अभी और नौर्मल होना चाहिए. कौर्पोरेट के नाम पर ही सही, सिस्टम से काम हो तो वह अच्छी बात है.

कुछ समय पहले ‘लव जिहाद’ को ले कर एक नया मसला खड़ा हुआ जिस पर आप ने किसी अखबार में एक पत्र भी लिखा. उस के बाद क्या हुआ?

‘लव जिहाद’ को ले कर लोगों ने मेरा मतलब समझ लिया. लोगों ने मान लिया कि मैं ने अच्छा काम किया है. पर एक कलाकार कुछ बोल रहा है, इस से क्या फर्क पड़ता है?

क्या आप मानते हैं कि ‘लव जिहाद’ का मुद्दा पूरी तरह से पौलिटिकल है?

हमारे देश में हर चीज पौलिटिकल बन जाती है. वहीं, भारत के बारे में यदि हम कहें कि यह हिंदुस्तानी मुसलिम या हिंदुस्तानी हिंदू है, तो इस के क्या माने हुए? यह विभाजन क्यों? यह सब नहीं होना चाहिए.

क्या आप को लगता है कि नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जो बौलीवुड के लोगों के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं? इस से पहले लोगों ने सिर्फ बौलीवुड का उपयोग करने का प्रयास किया?

मैं वही कह रहा हूं कि पहले किसी ने कुछ किया ही नहीं. हम ‘फादर फिगर’ को वोट करते हैं. मेरे हिसाब से नरेंद्र मोदी बेहतर फादर फिगर हैं. उन के कुछ साइंटिफिक विचार रोचक भी हैं.

आप सोशल मीडिया से दूर रहना चाहते हैं. इस की कोई खास वजह?

सब से पहली बात तो मैं इस भेड़चाल का हिस्सा नहीं बनना चाहता. हमारी फिल्म में गोविंदा ने अभिनय किया है. उन्हें तो पब्लिसिटी ही समझ में नहीं आती है. उस जमाने में कलाकार इतनी बातें नहीं किया करते थे. आप को पता होगा कि एक समय वह था जब अमिताभ बच्चन ने कुछ समय के लिए मीडिया को बैन कर दिया था. मैं सोशल मीडिया में यकीन इसलिए नहीं करता क्योंकि सभी कर रहे हैं. मुझे लगा कि मेरी अपनी अलग बात होनी चाहिए. फिर मुझे लगा कि मैं क्या ट्वीट करूंगा? मैं यह नहीं कहता कि ट्वीट करना जरूरी है. पर हर दिन कुछ ट्वीट करना जरूरी हो सकता है. फिर मुझे लगा कि ट्वीट शुरू करने के बाद फैन्स बढ़ेंगे, उन के ट्वीट का जवाब देना और फिर फैन्स को बढ़ाने की चूहादौड़… फेसबुक पर लाइक्स बढ़ाने की चूहादौड़…आखिरकार, मैं ने सोचा कि मुझे इस चक्रव्यूह में नहीं फंसना है.

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर दीपिका पादुकोण व कुछ दूसरे कलाकारों को काफी गालियां मिलीं. इस पर आप क्या कहेंगे?

गालियां तो मिलेंगी ही. यही तो खासीयत है सोशल मीडिया की. आप अच्छाबुरा जो कुछ बोलोगे, सबकुछ लोगों के पास जाएगा. लोग उस पर रिऐक्ट करेंगे. मुझे अच्छा लगा जब सोनम कपूर ने कहा, ‘आप क्या क्लीवेज के बारे में बात कर रहे हो? जब अभिनेत्रियां खुद दिखाएंगी, तो लोग लिखेंगे.’ यह सच कहने के बाद सोनम खुद फंस गई. मेरी राय में सोनम ने बहुत सही बात कही.

खेल खिलाड़ी

मुश्किल में श्रीनिवासन

जब श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष थे तब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर महासंघ के सीओओ इयान स्मिथ ने कहा था कि आईसीसी में श्रीनिवासन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत किसी में नहीं है. यह बात इयान स्मिथ ने हवा में नहीं कही थी, वे जानते थे कि श्रीनिवासन क्रिकेट की दुनिया में बहुत ताकतवर इंसान हैं. और श्रीनिवासन ने यह साबित भी कर दिखाया. सच आज सब के सामने है. वे मनमानी करते रहे लेकिन किसी की हिम्मत तक नहीं हुई कि उन के खिलाफ कोई क्रिकेटर या क्रिकेट के अधिकारी कुछ बोले. अब सुप्रीम कोर्ट ने श्रीनिवासन के खिलाफ तीखी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुद्गल समिति द्वारा दागी करार दिए गए प्रशासकों को बीसीसीआई के चुनाव लड़ने से क्यों न प्रतिबंधित कर दिया जाए. श्रीनिवासन पर स्पौट फिक्ंिसग मामले में गंभीर आरोप हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से श्रीनिवासन को जोर का झटका लगा है क्योंकि वे बीसीसीआई की कुरसी पर फिर से कुंडली मार कर बैठना चाहते थे. उन का नाम अध्यक्ष पद की रेस में सब से आगे था.

पूर्व क्रिकेटर मनिंदर सिंह ने कहा कि इस से श्रीनिवासन की ताकत कम होगी और हर तानाशाह का एक न एक दिन अंत होता ही है. मनिंदर सिंह सही कहते हैं क्योंकि महेंद्र सिंह धौनी की कप्तानी में भारत लगातार मैच हारता रहा लेकिन धौनी की कप्तानी बरकरार रही. धौनी की कप्तानी पर आंच इसलिए नहीं आई क्योंकि चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक हैं श्रीनिवासन और जो चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक की टीम का कप्तान हो उसे भला कैसे हटाया जा सकता है. लेकिन अगर कोई दूसरा खिलाड़ी होता तो उसे कब का बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता.

खिलाड़ी को तो छोडि़ए, पूर्व खिलाड़ी व चयनकर्ता मोहिंदर अमरनाथ के साथ क्या हुआ. उन्होंने क्रिकेट के हित के लिए आवाज उठाई तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसी तरह आईपीएल में सट्टेबाजी के मामले में गेंदबाज श्रीसंत का नाम आया तो उन पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया. इस तानाशाही ने क्रिकेट को बरबाद कर के रख दिया है. बड़ेबड़े उद्योगपति, कारोबारी, राजनेताओं ने बीसीसीआई को बुरी तरह से अपनी गिरफ्त में जकड़ रखा है. सुप्रीम कोर्ट की दखलंदाजी से हो सकता है बीसीसीआई के असली चरित्र का पता चले और क्रिकेट में फैली गंदगी कुछ हद तक हट सके और क्रिकेट के भी अच्छे दिन लौट सकें.

आखिर मिल गया सम्मान

जब किसी खिलाड़ी को सम्मान मिलता है तो उसे गर्व होता है. भारतीय मुक्केबाज मनोज कुमार को गर्व तो हुआ लेकिन मन में एक टीस जरूर रह गई. खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया. मनोज का कहना है कि अपने साथी खिलाडि़यों के बीच राष्ट्रपति के हाथों अगर यह सम्मान प्राप्त होता तो उस की बात ही कुछ और होती लेकिन हमें तो गुपचुप कमरे में यह सम्मान दे दिया गया. सम्मानित किए जाने के बाद उन्होंने कहा कि आज मैं कपिल देव को कह सकता हूं कि मैं मनोज कुमार हूं जिस ने वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीता था और अब अर्जुन अवार्ड मिला है.

वर्ष 2010 में मनोज राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक विजेता रहे हैं. वे 2 बार एशियाई मुक्केबाज चैंपियनशिप में कांस्य पदक भी जीत चुके हैं. बता दें कि मनोज को अर्जुन पुरस्कार समिति ने इस पुरस्कार के लिए पहले नहीं चुना था. समिति के अध्यक्ष पूर्व क्रिकेटर कपिल देव थे. लेकिन कपिल देव ने पुरस्कार पाने वाले खिलाडि़यों की लिस्ट में मनोज कुमार को शामिल नहीं किया. समिति के फैसले के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई और दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा जा खटखटाया जहां उन के पक्ष में फैसला आया.

मनोज का मानना है कि अपने हक के लिए लड़ना जरूरी है. चयन समिति ने इस पुरस्कार के लिए उन खिलाडि़यों का चयन किया जिन का प्रदर्शन उन से बेहतर नहीं था. तब मेरा मनोबल टूट गया और इस का असर इंचियोन एशियाई खेल में पड़ा लेकिन अब मेरा सारा फोकस रियो ओलिंपिक में है. मैं वहां से मैडल जीत कर लाऊंगा. मनोज जैसे बहुत कम ही खिलाड़ी होते हैं जो अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं. ज्यादातर खिलाडि़यों को डर होता है कि उन के आका कहीं उन के कैरियर को खत्म न कर दें. इसलिए वे ज्यादातर अपने आकाओं को खुश करने में लगे रहते हैं और उन की हां में हां मिलाते हैं. दूसरे खिलाडि़यों को मनोज से सीख लेनी चाहिए ताकि खिलाडि़यों की योग्यता व अधिकारों को खेल अधिकारी रौंद न सकें.

जीवन की कश्ती मस्ती में खुद भी जिएं औरों को भी जीने दें

विदेश में बसने का सुहाना सपना किस का नहीं होता. जब पूरा हो जाए तो इंसान बहुत खुशी महसूस करता है. धीरेधीरे मांबाप भी सपने संजोने लगते हैं, काश, वे भी विदेश देख लें. युवाओं के जीवन का यह बड़ा परिवर्तन कभीकभी उन्हें संघर्ष की भट्ठी में झोंक देता है. जो कदम अपनी जन्मभूमि पर ही पूरे नहीं टिकते थे, विदेशी धरती पर मंजिल से पहले राह या पगडंडियां तलाशते चूकने लगते हैं और समय के साथ सभी ढल जाते हैं. छोटा परिवार या न्यूक्लियर परिवार आज का मुख्य नारा है. और ऐसे परिवारों में मातापिता का स्थान थोड़ा संकुचित सा लगने लगता है. युवा पूरी नहीं तो काफी अधिक स्वतंत्रता तो चाहते ही हैं. समय बदल गया है.

युवा बच्चों के साथ रहते मांबाप आज इसी भावना को रखते हैं तो काम चल सकता है, वरना नहीं. कुछ दशक पहले युवा बच्चे मांबाप के साथ आजीवन रहते थे. पर आज बच्चों के यौवन को अपने साधन और बुद्धि के अनुसार सही दिशा दे कर आजाद कर देना अब अनिवार्य हो गया है. युवा बच्चों से उन के अपने गृहस्थ में पूरी तरह व्यस्त हो जाने पर आशाएं रखना अधिक उचित नहीं. बड़े यह मत सोचें कि हमारा समय ऐसा था, वैसा था. वह जैसा भी था, बीत चुका है.

सदी बदल गई. अपने विचार, सोच को बदलो. युवा बच्चों के लिए मन को छोड़, तन व धन को इतना लुटाओ कि तुम्हारे पास अपने लिए भी कुछ बच जाए. कारण स्पष्ट है, आप की सेहत अपनी है. इस के नायक आप हैं, ढलती उम्र से पहले ही सावधान हो जाओ. कारण कि अस्वस्थता या लंबी बीमारी के समय बच्चे हर पहलू से कितने लाचार हो जाएंगे, आप सोच भी नहीं सकते. 50 की आयु से पहले ही अपनी सेहत के सहज पहरेदार बन जाओ, बेहतरी इसी में है. आप का मेहनत से कमाया धन आप की धरोहर है. उसे कहीं भी खर्च करने में कोई पूछताछ या किसी को आपत्ति नहीं होगी, न होनी ही चाहिए. इसलिए अपने मुश्किल के दिनों के लिए जरूर थोड़ाबहुत बचा कर रखें.

वसीयत बनाने की नसीहत न भूलें ताकि आप के जाने के बाद आप की अमूल्य कमाई किसी अन्य की सौगात न बन जाए. दिन में अपने लिए समय निकालना एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है. देश हो या विदेश, घर के बुजुर्ग प्यार या मजबूरीवश ‘ब्याज’ से इतने अधिक समर्पित हो जाते हैं कि अपने लिए वे समय ही नहीं बचाते. आमतौर पर नई पीढ़ी उन की दयालुता के भाव का दुरुपयोग कर जरूरत से ज्यादा फायदा उठाना शुरू कर देती है. बेचारे मोहवश या दुनियादारी निभातेनिभाते चकनाचूर हो जाते हैं. यह उचित नहीं.

पड़ोस में मिसेज गिल हैं जिन की कमर दुहरी हो गई अपने बेटे के छोटे बच्चों की देखभाल करते लेकिन उन के अपने बेटों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी.

जीवन सार्थक व सफल बनाएं

सामाजिक तौर पर जैसा भी आप का रुझान हो लेकिन जब शारीरिक, मानसिक बल है तभी सतर्क हो जाएं. मित्रता का दायरा बहुत संकुचित न रखें. कभीकभी मुसीबत में खून के रिश्ते फीके, मित्रता के मीठे साबित होते हैं. दूरदर्शन या रेडियो से भी मधुर रिश्ता बनाए रखें, जैसी रुचि हो. स्वाध्याय का शौक पालें तो समाचारपत्रों, पत्रिकाओं को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं. मैं ने देखा है हमारी कालोनी में सीनियर्स ने टैक्सी का प्रबंध किया हुआ है. मिलजुल कर उस का बिल देने में उन्हें कोई संकोच नहीं पर इस से सुविधा बहुत है. एकाकी जीवन जीना या रहना पड़े, अपने को इस के लिए पहले से ही ढालना सीखें. मौत व उम्र तो निश्चित है, बहुत ही कम जोड़े हैं जो इकट्ठे आए और इकट्ठे गए. आप का सामाजिक परिपे्रक्ष्य यदि आज्ञा या निर्देश दे तो जरूरत के समय एकाकी जीवन का कोई ‘हल’ ढूंढ़ने के लिए मन बना कर रखें, किसी और से प्रेम भी पालें. सारांश में एक ही परिपक्व सुझाव है, आज वह समय आ गया है कि युवा को उन की जवानी का आनंद लेने दें और अपना बुढ़ापा खुशनुमा, आबाद, आजाद रखें. मानव जीवन सर्वोत्तम व दुर्लभ है. इसे यथासंभव सफल एवं सार्थक बनाने की चेष्टा करें.

जहां रहें स्वस्थ और सुखद रहें

बडे़ अपने समय की बातें करते नहीं भूलते, बच्चे वर्तमान समय की करते व दलील देते नहीं थकते. ऐसे में तनाव, कशमकश होना स्वाभाविक है. मिसेज वर्मा ने अपना सारा जीवन भारत में संयुक्त परिवार में व्यतीत किया. बड़ों का आदर, मान, दिशानिर्देश सब पालन किए, लेकिन कनाडा आ कर लगभग सब नदारद. पूछना तो दूर, बताना भी गवारा नहीं. एक अन्य मामला जो अत्यंत पेचीदा बन रहा है या बन गया है कि यदि मांबाप ने बेटे की शादी कर के बहू को घर की शोभा या सदस्य स्वीकारा है तो उन का रवैया अकसर रोबीला रहता है. यदि युवा ने मांबाप को स्पौंसर कर अमेरिका या कनाडा बुलाया है तो बहू या दामाद हावी रहते हैं. सप्ताह में अकसर 40-50 बुजुर्गों से मेरा वास्ता पड़ता है जिन में कुछ बोल कर, कुछ मौन भाषा में अपने दिल की बात कह देते हैं. हो सकता है भारतीय बहुएं भी विदेश में अपने बुजुर्गों के साथ रहती हुई अपने अंदर का दर्द किसी से साझा करती हों? वास्तव में यह जीवन सफर ही ऐसा है कि किसी के हिस्से संघर्ष, पीड़ा तो किसी के हिस्से सुख, समृद्धि, संतुष्टि और न जाने क्याक्या आया है. हमेशा यही सोचें, जितना भी जीवन मिले, निरोग तथा शांतिसुखद हो. मस्ती में खुद जिएं औरों को आजादी से जीने दें

पूंजी बाजार

शेयर बाजार का सूचकांक 28 हजार अंक को पार कर गया. उस के बाद भी ऊंचाई का रिकौर्ड लगातार बन रहा है. सरकार के ईंधन पर आयात शुल्क बढ़ाने की घोषणा के बाद बाजार नवंबर के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में 64 अंक गिर गया और फिर 28 हजार से नीचे उतर गया. हालांकि महंगाई की दर में लगातार गिरावट, औद्योगिक विकास के आंकड़े के 3 माह के उच्च स्तर पर पहुंचने, विश्व व्यापार संगठन में खास सब्सिडी के मसले पर अमेरिका के साथ समझौता होने और वित्त मंत्री अरुण जेटली के सुधार कार्यक्रमों में और तेजी लाने की घोषणा की वजह से निवेशकों में सकारात्मक रुख देखने को मिला और 19 नवंबर को मुनाफाखोरी तथा वैश्विक स्तर पर कमजोर संकेतों के कारण लगभग 2 सप्ताह की तेजी के बाद बाजार 129 अंक की गिरावट के साथ 28 हजार अंक के स्तर से नीचे लौट आया. बाजार में गिरावट का यह सिलसिला अगले कारोबारी सत्र में भी रहा.

आर्थिक विकास दर के अच्छे रहने के संकेतों के कारण फिर मामूली बढ़त के साथ 28 हजार के स्तर को पार कर गया. लेकिन 21 नवंबर को समाप्त सप्ताह के आखिरी कारोबार दिवस को बाजार फिर 265 अंक की लंबी छलांग लगा गया. मंत्रिमंडल के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ यानी दक्षेस देशों के साथ संपर्क बढ़ाने तथा देश के हर गांव व हर शहर को 24 घंटे बिजली सुविधा देने की सरकार की योजना का खुलासा होने के बाद बाजार में उत्साह बढ़ा और सूचकांक ने फिर नया रिकौर्ड कायम कर लिया.

कौर्पोरेट घरानों पर चलेगा डंडा

देश की कई शीर्ष कंपनियां बैंकों से ऋण ले कर लौटाने के बजाय स्वयं को घाटे में दिखा कर चुप बैठ जाती हैं. इन कंपनियों की अब खैर नहीं है. कई बड़ी कंपनियों पर बैंकों का सब से ज्यादा ऋण है. बैंक कर्मचारियों के संगठन औल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन यानी एआईबीईए के अनुसार इन कंपनियों में किंगफिशर एअरलाइंस, विन्सम डायमंड ऐंड ज्वैलरी, मोजर बायर इंडिया, एडुकौम, डैक्कन क्रौनिकल होल्ंिडग जैसी कंपनियां शामिल हैं. संगठन का मानना है कि ये सब कंपनियां रास्ता निकाल कर बैंकों का पैसा लौटाने की स्थिति में हैं लेकिन उन्होंने जैसे तय कर लिया है कि बैंकों का पैसा लौटाना नहीं है. इस तरह की मानसिकता वाले कर्जदारों से वसूली को ले कर बैंक गंभीर हो गए हैं. बैंक ऋण की वसूली की व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए कदम उठा रहे हैं ताकि वसूली का काम तेजी से किया जा सके.

सरकार का कहना है कि न्यायालय की लंबी प्रक्रिया के कारण उस के लिए वसूली के लिए बना कानून भी निष्प्रभावी हो रहा है. इस कानून के तहत कर्जदार के कर्ज नहीं लौटाने पर उस की संपत्ति की नीलामी की व्यवस्था है. लेकिन सबकुछ बेकार साबित हो रहा है. अब सरकार ने बैंकों से कह दिया है कि वे कौर्पोरेट घरानों से ऋणवसूली के लिए कड़ा कदम उठाएं. इस के अलावा बैंकों को ऋण वसूली के अपने प्रबंध तंत्र में फेरबदल के लिए भी अधिकृत किया गया है. बैंकों की गैरनिस्पादित राशि 2013-14 के दौरान 2,45,809 करोड़ रुपए हो गई है जो 2011-12 में 1,37,102 करोड़ रुपए थी.

स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ रहे औद्योगिक घराने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को राजनेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों और आम आदमी का ही साथ नहीं मिल रहा, बल्कि औद्योगिक घराने भी इस काम में सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं. इस काम में रिलायंस समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी, वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल जैसे प्रमुख उद्योगपतियों के साथ ही फिक्की और सीआईआई जैसे उद्योग मंडलों के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बढ़चढ़ कर आगे आ रही हैं. अनिल अंबानी कहते हैं कि वे अकेले नहीं बल्कि उन के साथ 9 अन्य प्रमुख उद्योगपति भी इस काम में जुड़ेंगे. अनिल अग्रवाल कहते हैं कि वे वेदांता के कार्यालय परिसर के साथ ही कालोनियों और समुदायों के परिसरों में सफाई करेंगे.

उद्योग व्यापार मंडल फिक्की का कहना है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही स्वयंसेवी संगठनों के साथ इस काम में हाथ बढ़ाएगा. दूसरे औद्योगिक संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई का कहना है कि वह अगले वित्त वर्ष तक 10 हजार स्कूलों के शौचालयों का निर्माण करेगा. सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी गेल इंडिया 1021 जैव शौचालयों का निर्माण करेगी.

स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ने के लिए तेजी से लोग आगे आ रहे हैं और यह अभियान धीरेधीरे एक आंदोलन का रूप ले रहा है. सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता अभियान से लोगों में जागृति आ रही है. इस का अच्छा उदाहरण रेलवे स्टेशनों और बस स्टेशनों के साथ ही अन्य सार्वजनिक स्थलों पर देखने को मिलता है जब गंदगी करने वाले लोगों को जन सामान्य द्वारा ही टोका जाता है. पहले गंदगी करते लोगों की हरकत की लोग अकसर अनदेखी करते थे लेकिन धीरेधीरे लोग जागृत हो रहे हैं. गंदगी करने वालों को टोका जा रहा है. यही नहीं, गंदगी करने वाला उलटा बोलता है तो उस स्थल पर खड़े लोग एकसाथ उस का विरोध करना शुरू कर देते हैं और यह इस अभियान की एक बड़ी उपलब्धि है.

औनलाइन खरीद और भुगतान का फैलता बाजार

मोबाइल का भारतीय बाजार आकर्षक है और इसी वजह से सभी मोबाइल निर्माता कंपनियां भारत में कारोबार कर के फायदा कमा रही हैं. इस का फायदा यह भी हो रहा है कि हर वर्ग की जरूरत के मुताबिक मोबाइल संबद्ध हाथों में पहुंच रहे हैं. अब कंप्यूटर, लैपटौप अथवा टैबलौइड का भी तेजी से विस्तार हो रहा है और इंटरनैट कारोबार बढ़ रहा है.

बाजार के जानकार कहते हैं कि औनलाइन बाजार में भुगतान और खरीदारी का काम तेजी से बढ़ रहा है. कारोबार को औनलाइन चला रही एटी केरनी के अनुसार, देश में आज 56 फीसदी औनलाइन खरीदार औनलाइन भुगतान करते हैं जबकि सिर्फ 44 फीसदी सामान की डिलीवरी पर नकद भुगतान कर रहे हैं. बोस्टन कंसल्टिंग समूह के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 37 फीसदी औनलाइन उपभोक्ता अपनी सुविधा के लिए औनलाइन खरीदारी को चुनते हैं जबकि 29 फीसदी लोग सामान की विविधता के लिए औनलाइन खरीदारी करते हैं, वहीं 30 फीसदी लोग ज्यादा दूरी की वजह से औनलाइन खरीदारी को पसंद करते हैं.

औनलाइन खरीदारी का बढ़ता प्रचलन देश में आ रहे बदलाव का नतीजा है और बदलाव की यह प्रक्रिया शहरों में ही नहीं, बल्कि कसबों और गांवों तक पहुंच रही है. शहरों के नजदीक के गांव तक खरीदारी औनलाइन की जा रही है और औनलाइन भुगतान का प्रचलन भी बढ़ रहा है. ये अच्छे संकेत हैं. इन सब से बाजार का परंपरागत स्वरूप बदलेगा और यह स्वरूप नए जमाने के अनुकूल होगा जो लोगों का कीमती समय बचाएगा.

जब औरत चाहे तलाक

मुसलिम महिला के अधिकारों को ले कर फोकस इसलाम द्वारा प्रदत्त निकाह को खत्म करने के अधिकार पर होता है जिसे ‘खुला’ कहते हैं. इस के द्वारा वह मर्द की तरह स्वयं विवाहविच्छेद कर सकती है. इस की रूपरेखा क्या है और क्या महिलाएं अपने इस अधिकार से भलीभांति परिचित हैं और वे इस का इस्तेमाल भी कर रही हैं या फिर भारत के पुरुषप्रधान समाज में उसे व्यावहारिक रूप में यह अधिकार हासिल है. आइए जानते हैं.

इसलाम में विवाह एक करार है जो निकाह द्वारा अंजाम पाता है. किसी कारणवश मियांबीवी में गुजारा संभव न हो तो उन्हें सम्मानपूर्वक अलग होने के लिए गुंजाइश है. मर्द को तलाक द्वारा निकाह को खत्म करने का अधिकार दिया गया है. मर्द को यह हिदायत दी गई है कि एकसाथ 3 तलाक न दी जाए बल्कि हर महीने की साइकिल के बाद 3 महीने में 3 तलाक दी जाए.

मुसलिम विवाह और तलाक

निकाह में एक मर्द एक औरत को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता है जिस की इजाजत वह औरत निकाह के समय देती है. वैसे यह इजाजत तो पहले से ली जाती है. इस लिहाज से मर्द पर उस औरत के पालनपोषण और खानपान का दायित्व होता है जिस का उसे निर्वाह करना होता है. इसी आधार पर मर्द को तलाक का अधिकार दिया गया है लेकिन यह अधिकार कुछ शर्तों के साथ है जिस का उल्लेख यहां किया गया है.

उधर, एक औरत जब अपने पति से किसी कारणवश अलग होना चाहे तो इस के लिए उसे ‘खुला’ का अधिकार दिया गया है जिस के माध्यम से वह पुरुष की तरह निकाह को खत्म कर सकती है. तलाक में जहां मर्द को आदेश दिया गया है कि वह औरत को भले तरीके अर्थात कुछ देदिला कर विदा करे वहीं खुला में एक औरत द्वारा मर्द को कुछ देदिला कर छुटकारा पाना होता है. तलाक के समय औरत को देदिला कर विदा करने की व्याख्या करते हुए देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने जो फैसले दिए हैं उन के अनुसार, तलाक दी गई बीवी को गुजाराभत्ता उस समय तक दिया जाए जब तक उस की दूसरी शादी न हो जाए या जब तक वह जीवित है. इस व्याख्या को ले कर औल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बौर्ड का मानना है कि यह इसलाम में हस्तक्षेप है लेकिन बोर्ड ने इस मामले में कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं की.

एक औरत अपने शौहर से यदि छुटकारा (खुला) चाहती है और शौहर भी इस के लिए तैयार है तो निश्चय ही इस में कोई समस्या नहीं है और यह आसानी से संभव हो जाता है. लेकिन यदि शौहर खुला के लिए तैयार नहीं है तब यह मामला काजी के पास जाएगा और काजी पूरी परिस्थिति को समझने के बाद फैसला करेगा. इसलामी न्यायविधियों (फिक्हा) के समीप काजी खुला से मना भी कर सकता है. काजी के इस अधिकार को ले कर यह खुला विवाद का विषय बना हुआ है.

यह सवाल किया जाता है कि यह कैसा अधिकार है जो काजी के विवेक से जुड़ा है जबकि मर्द द्वारा तलाक के अधिकार में कहीं भी काजी का विवेक शामिल नहीं होता. इस के चलते औरतें अपने इस अधिकार से वंचित हो रही हैं. ऐसी औरतें जो शौहरों के अत्याचार से तंग आ कर ‘खुला’ द्वारा छुटकारा हासिल करना चाहती हैं उन्हें काजी द्वारा शौहरों की उपस्थिति को अनिवार्य कर दिया जाता है जबकि चाहे वे विदेश में रहते हों, बुलाने पर न आते हों और जवाब न देते हों. इस तरह के मामलों के सालों लटकाए रखे जाने की घटनाएं अखबारों में आ चुकी हैं. ऐसे में फिर उन्हें अदालतों में जाने को कहा जाता है. अदालतों का हाल यह है कि वहां लाखों मुकदमों का बोझ है जिस के चलते किसी मुकदमे का फैसला होने में 5-7 साल लग जाते हैं जबकि जल्द इंसाफ दिलाना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारियों में से है.

औरत तलाक ले सकती है

पहले मुसलिम महिलाएं अपने इस अधिकार से पूरी तरह वंचित थीं. विख्यात कवि डा. मोहम्मद इकबाल ने अपनी किताब में मुसलिम महिलाओं की स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए लिखा है कि जब वे वकालत के पेशे से जुड़े तो उन्हें इस तरह की बहुत सी घटनाओं का सामना करना पड़ा. 20वीं सदी की शुरुआत में तो महिलाएं शौहरों से छुटकारा पाने के लिए यह करतीं कि वे अदालतों में हाजिर हो कर इसलाम त्यागने का ऐलान करतीं और इस तरह निकाह से आजाद हो जातीं. दारुल कजा के गठन के बाद इस तरह के मामले वहां हल किए जाते हैं. इसलामी फिक्ह एकेडेमी के अधिवेशन में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, दारुल कजा, इमारते शरिया फुलवारी शरीफ, पटना (बिहार) में गत 3 दारुल कजा के अधीन लगभग 50 सहायक दारुल कजा कायम हैं.

ध्यान रहे कि दारुल कजा में खुला की मांग का मुकदमा केवल एक पक्ष की मांग के आधार पर नहीं लिया जाता है. इस का तर्क दिया जाता है कि यदि औरत की ओर से खुला का आवेदन हो और शौहर तलाक देने पर तैयार न हो तो इस तरह का मुकदमा अर्थहीन हो कर रह जाता है जिसे दारुल कजा से खारिज करना पड़ता है. क्योंकि दारुल कजा कोई अदालत नहीं है जिस के फैसले को क्रियान्वित कराया जाए, यह एक तरह का पारिवारिक परामर्श केंद्र है जिस के फैसले को मानने के लिए दोनों पक्ष बाध्य नहीं हैं. यह अलग बात है कि इस आधार पर जिन मामलों में लोग कोर्ट गए, वहां कई मामलों में कोर्ट ने दारुल कजा के ही फैसले को सही ठहराया है.

तलाक की वजहें

शौहर का छोटा कद होना, काला होना, मियांबीवी दोनों की उम्र में बड़ा अंतर होना, औरत का शौहर से घृणा करना, मियांबीवी के बीच परिवार का फर्क इस तरह कि बीवी उच्च परिवार की जबकि शौहर ऐसे परिवार से हो जिस को बीवी कमतर समझे, शौहर का शादीशुदा होना जबकि औरत को इस की जानकारी न होना या सौतन के साथ रहने के लिए तैयार न होना जैसे कारणों को ले कर औरतों को खुला के लिए आवेदन करने का पात्र माना जाता है. जिन मामलों में शौहरबीवी तैयार हो जाते हैं वहां खुला की कार्यवाही आसानी से हो जाती है लेकिन जिन मामलों में शौहर जिद और अहं के चलते इस के लिए तैयार नहीं होता, उन मामलों में काजी गवाहों के बयान सुनने के बाद शरई दिशानिर्देश में छूट देते हुए सुधार हेतु बीवी को शौहर के साथ विदा करने का आदेश जारी करता है.

ऐसी परिस्थिति में सवाल है कि फिर महिलाओं को यह अधिकार कैसे हासिल हो? इस बाबत इसलामविदों का सुझाव है कि निकाह के समय निकाहनामे में औरत को तलाक लेने के हक की शर्त लगा दी जाए जिस से दोनों की जिंदगी अच्छी गुजरे और यदि दायित्वों के अदा करने में कोताही हो तो तलाक हो जाएगा. शौहर राजी हो या न हो, तलाक हो जाएगा. इस तरह की शर्त से शौहर भी बीवी से भयभीत रहेगा और शौहर के तलाक अथवा खुला के लिए तैयार न होने की सूरत में औरत आसानी से छुटकारा हासिल कर लेगी.

चूहों का उत्पात

सरकारी अस्पताल हों, रेलवे स्टेशन हों या फिर सरकारी दफ्तर, हर जगह चूहों ने सब को हलकान कर रखा है. कभी दफ्तरों की जरूरी फाइलें सफाचट कर जाते हैं तो कभी महंगे केबल वायर. हद तो तब हो जाती है जब अस्पतालों में इलाज कराने आए मरीज इन चूहों का शिकार बन जाते हैं. बात इंदौर की करें तो यहां के सरकारी अस्पताल महाराजा यशवंत राव में करीब 1 हजार मरीजों में 70 हजार चूहों ने बसेरा डाल रखा है. अस्पताल के लिए सिरदर्द बन चुके ये चूहे अस्पताल के कीमती उपकरणों के तार काट चुके हैं. बेहाल अस्पताल प्रशासन ने इन का सफाया करने के लिए करीब 55 लाख रुपए का बजट तय कर एक निजी कंपनी को हायर किया है. यह फर्म अलगअलग खाने में जहर मिला कर परोस रही है. इस प्रक्रिया के तहत करीब 2500 चूहे मारे जा चुके हैं.

मुश्किल यह है कि ये चूहे काफी चालाक हैं. एक बार किसी साथी चूहे की, जिस खाने को खा कर मौत हुई हो, उसे ये नहीं खाते. लिहाजा, हर बार इन के खाने की वैरायटी बदलनी पड़ती है. कोलकाता के ही सुपर स्पैशलिटी अस्पताल केपीजी, जो एसएसकेएम अस्पताल के नाम से भी जाना जाता है,  की बात करें तो यहां कुछ वर्ष पहले पेशाब करने में तकलीफ होने के कारण अरुण साधु खां को भरती कराया गया था, लेकिन चूहों ने रुई, पट्टी के साथसाथ मरीज का गुप्तांग भी काट खाया था जिस से उस की मौत हो गई थी. इसी अस्पताल के वीआईपी वार्ड में महिला मरीज शोभारानी के हाथ को चूहों ने कुतर खाया था. महिला की कलाई में ट्यूमर का औपरेशन हुआ था. औपरेशन का घाव अभी ताजा ही था, ट्यूमर को बायोप्सी के लिए भेजा गया था, शोभारानी बेहोशी में थी. इस बीच एक मोटा सा चूहा उन की कुहनी को नोच कर खा रहा था. तभी दर्द से शोभारानी की नींद खुल गई. लेकिन तब तक चूहे ने कुहनी को बुरी तरह जख्मी कर दिया था.

दरअसल, कोलकाता के सरकारी अस्पतालों में चूहों का उत्पात हमेशा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के दावे के अनुसार, इस मद में लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं. महानगर में 5 सरकारी अस्पताल हैं और यह रकम इन अस्पतालों में चूहों को मारने और उन को नियंत्रण में रखने के लिए खर्च की जाती है. हैरानी यह है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद अस्पतालों में चूहों का राज कायम है, ये अकसर मरीजों के आसपास ही नजर आते हैं. इस तरह का मामला अकेले एसएसकेएम का नहीं है, कोलकाता मैडिकल कालेज एवं अस्पताल, नीलरतन सरकारी मैडिकल कालेज एवं अस्पताल और आरजीकर अस्पताल में भी चूहों के उत्पात से मरीज परेशान हैं.

दरअसल, अस्पतालों के परिसरों में मैडिकल गंदगी का अंबार लगा रहता है. कचरों के ढेर के नीचे चूहों ने बड़ेबड़े गड्ढे बना रखे हैं. यही हाल देश के ज्यादातर मैडिकल कालेज एवं अस्पतालों का भी है. यहां भी कचरे और गंदगी के ढेर के नीचे चूहों की दुनिया बसती है. कुछ साल पहले उत्तर कोलकाता में चूहों ने इतना उत्पात मचाया कि एक मकान की नींव तक को खोखला कर दिया.

पश्चिम बंगाल के अलावा हाल में राजस्थान के जोधपुर में एक मरीज चूहे का शिकार हुआ तो अजमेर में चूहों ने एक शव को ही कुतर डाला था. जोधपुर में मथुरादास माथुर अस्पताल के आईसीयू में भरती 70 साल के लकवाग्रस्त मरीज को सांस लेने के लिए लगाई गई नली को कुतरने के साथसाथ चूहे ने मरीज के होंठ, कान और पलकों को भी कुतर दिया था. दरअसल, इन सभी सरकारी अस्पतालों में सफाई कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त नहीं है और जो कर्मचारी हैं वे ईमानदारी से अपनी ड्यूटी नहीं निभा रहे हैं. इस के लिए संबंधित अस्पताल के प्रशासन के साथ स्वास्थ्य विभाग भी कुसूरवार है. जब तक साफसफाई का इंतजाम ठीक से नहीं होगा, चूहे इसी तरह उत्पात मचाते रहेंगे.

ऐसा ही कुछ हाल अंबाला का है. चूहे यहां अस्पताल में नहीं बल्कि रेलवे स्टेशन में भी आतंक मचा रहे हैं. स्थिति यह है कि पार्सल सामान, फाइलें और रिटायरिंग रूम में मुसाफिर भी इन का निशाना बन रहे हैं. यहां चूहों ने जमीन को इस कदर खोखला कर दिया है कि पटरियों के नीचे से गिट्टी व मिट्टी खिसक चुकी है. रेलवे विशेषज्ञों की मानें तो मिट्टी व गिट्टी से पटरियों की पकड़ मजबूत बनाई जाती है. चूहों की इस करतूत के चलते कोई हादसा हो सकता है. मामला संजीदा है, इस के बावजूद अंबाला छावनी जैसे महत्त्वपूर्ण स्टेशन पर चूहों को पकड़ने का कोई टैंडर या ठेका जारी नहीं किया गया है.

राजधानी ऐक्सप्रैस व अन्य ट्रेनों में सफर करने वाले यात्री ही नहीं, हवाई जहाजों के यात्री भी आएदिन चूहों के उत्पात की शिकायत करते रहते हैं. चूहों से निबटने के लिए रेलवे, एअरलाइन कंपनियां लाखों रुपए खर्च भी करती हैं पर नतीजा कुछ भी नहीं निकलता. चूहों की धमाचौकड़ी यहीं नहीं थमती. पिछले कुछ सालों से इन की फौज ने नवी मुंबई के बेलापुर सैक्टर ए में करीब 160 करोड़ की लागत से बने महाराष्ट्र नगर पालिका यानी मनपा मुख्यालय पर भी कब्जा जमा रखा है. शानदार इमारत की कैंटीन, पार्किंग, लौबी और अधिकारियों के केबिन के भीतर तक ये घूमतेफिरते नजर आ जाते हैं. हालांकि इन पर नियंत्रण करने के लिए मनपा मुख्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों ने जहरीले खाने के सामान, रैट ट्रैप और रैट ग्लू लगाने जैसे तरीके आजमाए हैं लेकिन फिर भी इन का पूरी तरह सफाया नहीं हो सका.

केवल भारत में ही नहीं बल्कि चीन में भी चूहों ने उत्पात मचा रखा है. चीन के एक गांव में पिछले दिनों किसी ने हजारों चूहे छोड़ कर हंगामा मचा दिया था. बाद में स्वास्थ्य विभाग ने इन से निबटने के लिए काफी मात्रा में चूहे मारने की दवा भेजी. इन गंभीर मामलों का एक दिलचस्प या कहें हास्यास्पद पहलू यह भी है कि रांची में एक पुलिस थाने में पुलिस ने चूहों की बाकायदा रपट दर्ज की है. चूंकि सुखदेव नगर थाने के मालखाने के सामान को चूहों ने कुतर डाला था, लिहाजा, पुलिस ने तुरंत चूहों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. अब चूहों की गिरफ्तारी होगी या नहीं, यह तो इंस्पैक्टर फागुनी पासवान ही बता सकते हैं जिन्होंने शिकायत दर्ज कराई है.

बहरहाल, इन चूहों से नजात पाने के लिए पेस्ट कंट्रोल की कई निजी संस्थाओं समेत अन्य लोग लगे हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन चूहों से धार्मिक आस्था जोड़ कर इन को मारने की मुखालफत करते हैं, जैसा कि इंदौर के संत कर रहे हैं. गौरतलब है कि जब यशवंत राव अस्पताल में चूहों को मारने का अभियान चलाया जा रहा था तो वहां के संतों ने महामंडलेश्वर कंप्यूटर बाबा की अगुआई में एक बैठक कर यह निर्णय लिया कि वे इस हिंसा को बंद कराने के लिए कमिश्नर को ज्ञापन सौंपेंगे. दरअसल, ये तथाकथित संत चूहों को गौरी पुत्र गणेश का वाहन व पूजनीय बता कर इन्हें मारने के बजाय जंगल में छोड़ने की सिफारिश कर रहे हैं.

अब इन्हें कौन समझाए कि गणेश के ये वाहन आजकल सवारी के काम नहीं बल्कि जहांतहां गंदगी फैलाने और सरकारी व निजी संपत्ति को बरबाद करने का काम कर रहे हैं और अगर वे इन्हें धार्मिक जामा पहना कर जंगल में छोड़ने की बात कर रहे हैं तो वे खुद क्यों नहीं इस तरह की पहल करते. अभियान में टांग अड़ा कर वे सिर्फ प्रशासन का काम ही तो बिगाड़ेंगे.

सोचने वाली बात है कि इन्हें मारने के बावजूद इन की तादाद में कोई कमी नहीं आ रही. लेकिन अगर जरा सावधानी बरती जाए तो इस समस्या को कम जरूर किया जा सकता है. मसलन, ये उन जगहों पर ज्यादा पाए जाते हैं जहां राशनपानी का भंडारण होता है, जैसे बड़ी किराना दुकानें व माल भंडारण गृह. इन जगहों पर जरूरी एहतियात बरतने या दवा के इस्तेमाल से इन की बढ़ती संख्या पर काबू पाया जा सकता है. इस के अलावा अस्पतालों में खानपान के अड्डे बेहद करीब होने के चलते भी इन की संख्या बढ़ती है. उदाहरणस्वरूप, इंदौर के अस्पताल में दानकर्म के नाम पर काफी खानेपीने का सामान आता है जो यहांवहां बिखरने के चलते चूहों को आमंत्रण देता है. और यही चूहे, जो जरा सा खाना देख कर अस्पताल में घुस जाते हैं, जो मरीजों के हाथ, पांव व उंगलियां कुतरने से भी परहेज नहीं करते. इसलिए जब तक इन चूहों की समस्या को जड़ से खत्म करने का रास्ता न सूझे, जरा सी सावधानी व जागरूकता से ही काम चलाना हितकर होगा.

साथ में राजेश कुमार

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