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क्यों का प्रश्न नहीं

सुबह के 10 बजे थे. डेरे के अपने औफिस में आ कर मैं बैठा ही था. लाइजन अफसर के रूप में पिछले 2 साल से मैं सेवा में था. हाल से गुजरते समय मैं ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि बाहर मिलने के लिए कौनकौन बैठा है. 10 और 12 बजे के बीच मिलने का समय था. सभी मिलने वाले एक पर्ची पर अपना नाम लिख कर बाहर खड़े सेवादार को दे देते और वह मेरे पास बारीबारी भेजता रहता. 12 बजे के करीब मेरे पास जिस नाम की पर्ची आई उसे देख कर मैं चौंका. यह जानापहचाना नाम था, मेरे एकमात्र बेटे का. मैं ने बाहर सेवादार को यह जानने के लिए बुलाया कि इस के साथ कोई और भी आया है.

‘‘जी, एक बूढ़ी औरत भी साथ है.’’

मैं समझ गया, यह बूढ़ी औरत और कोई नहीं, मेरी धर्मपत्नी राजी है. इतने समय बाद ये दोनों क्यों आए हैं, मैं समझ नहीं पाया. मेरे लिए ये अतीत के अतिरिक्त और कुछ नहीं थे. संबंध चटक कर कैसे टूट गए, कभी जान ही नहीं पाया. मैं ने इन के प्रति अपने कर्तव्यों को निश्चित कर लिया था.

‘‘साहब, इन दोनों को अंदर भेजूं?’’ सेवादार ने पूछा तो मैं ने कहा, ‘‘नहीं, ड्राइवर सुरिंदर को मेरे पास भेजो और इन दोनों को बाहर इंतजार करने को कहो.’’

वह ‘जी’ कह कर चला गया.

सुरिंदर आया तो मैं ने दोनों को कोठी ले जाने के लिए कहा और कहलवाया, ‘‘वे फ्रैश हो लें, लंच के समय बात होगी.’’

बेबे, जिस के पास मेरे लिए खाना बनाने की सेवा थी, इन का खाना बनाने के लिए भी कहा. वे चले गए और मैं दूसरे कामों में व्यस्त हो गया.

लंच हम तीनों ने चुपचाप किया. फिर मैं उन को स्टडीरूम में ले आया. दोनों सामने की कुरसियों पर बैठ गए और मैं भी बैठ गया. गहरी नजरों से देखने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘तकरीबन 2 साल बाद मिले हैं, फिर भी कहिए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

भाषा में न चाहते हुए भी रूखापन था. इस में रिश्तों के टूटन की बू थी. डेरे की परंपरा को निभा पाने में शायद मैं फेल हो गया था. सब से प्यार से बोलो, मीठा बोलो, चाहे वह तुम्हारा कितना ही बड़ा दुश्मन क्यों न हो. देखा, राजी के होंठ फड़फड़ाए, निराशा से सिर हिलाया परंतु कहा कुछ नहीं.

बेटे ने कहा, ‘‘मैं मम्मी को छोड़ने आया हूं.’’

‘‘क्यों, मन भर गया? जीवन भर पास रखने और सेवा करने का जो वादा और दावा, मुझे घर से निकालते समय किया था, उस से जी भर गया या अपने ऊपर से मां का बोझ उतारने आए हो या मुझ पर विश्वास करने लगे हो कि मैं चरित्रहीन नहीं हूं?’’

थोड़ी देर वह शांत रहा, फिर बोला, ‘‘आप चरित्रहीन कभी थे ही नहीं. मैं अपनी पत्नी सुमन की बातों से बहक गया था. उस ने अपनी बात इस ढंग से रखी, मुझे यकीन करना पड़ा कि आप ने ऐसा किया होगा.’’

‘‘मैं तुम्हारा जन्मदाता था. पालपोस कर तुम्हें बड़ा किया था. पढ़ायालिखाया था. बचपन से तुम मेरे हावभाव, विचारव्यवहार, मेरी अच्छाइयों और कमजोरियों को देखते आए हो. तुम ने कल की आई लड़की पर यकीन कर लिया पर अपने पिता पर नहीं. और राजी, तुम ने तो मेरे साथ 35 वर्ष गुजारे थे. तुम भी मुझे जान न पाईं? तुम्हें भी यकीन नहीं हुआ. जिस लड़की को बहू के रूप में बेटी बना कर घर में लाया था, क्या उस के साथ मैं ऐसी भद्दी हरकत कर सकता था? सात जन्मों का साथ तो क्या निभाना था, तुम तो एक जन्म भी साथ न निभा पाईं. तुम्हारी बहनें तुम से और सुमन से कहीं ज्यादा खूबसूरत थीं, मैं उन के प्रति तो चरित्रहीन हुआ नहीं? उस समय तो मैं जवान भी था. तुम्हें भी यकीन हो गया…?’’

‘‘शायद, यह यकीन बना रहता, यदि पिछले सप्ताह सुमन को अपनी मां से यह कहते न सुना होता, ‘एक को तो उस ने झूठा आरोप लगा कर घर से निकलवा दिया है. यह बुढि़या नहीं गई तो वह उसे जहर दे कर मार देगी,’’’ बेटे ने कहा, ‘‘तब मुझे पता चला कि आप पर लगाया आरोप कितना झूठा था. मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई. मैं ने मम्मी को भी इस बारे में बताया. तब से ये रो रही हैं. मन में यह भय भी था कि कहीं सचमुच सुमन, मम्मी को जहर न दे दे.’’

‘‘अब इस का क्या फायदा. तब तो मैं कहता ही रह गया था कि मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया. मैं ऐसा कर ही नहीं सकता था, पर किसी ने मेरी एक न सुनी. किस प्रकार आप सब ने मुझे धक्के दे कर घर से बाहर निकाला, मुझे कहने की जरूरत नहीं है. मैं आज भी उन धक्कों की, उन दुहत्थड़ों की पीड़ा अपनी पीठ पर महसूस करता हूं. मैं इस पीड़ा को कभी भूल नहीं पाया. भूल पाऊंगा भी नहीं.

‘‘मुझे आज भी सर्दी की वह उफनती रात याद है. बड़ी मुश्किल से कुछ कपड़े, फौज के डौक्यूमैंट, एक डैबिट कार्ड, जिस में कुछ रुपए पड़े थे, घर से ले कर निकला था. बाहर निकलते ही सर्दी के जबरदस्त झोंके ने मेरे बूढ़े शरीर को घेर लिया था. धुंध इतनी थी कि हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता था. सड़क भी सुनसान थी. दूरदूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था. रात, मेरे जीवन की तरह सुनसान पसरी पड़ी थी. रिश्तों के टूटन की कड़वाहट से मैं निराश था.फिर मैं ने स्वयं को संभाला और पास के

एटीएम से कुछ रुपए निकाले. अभी सोच ही रहा था कि मुख्य सड़क तक कैसे पहुंचा जाए कि पुलिस की जिप्सी बे्रक की भयानक आवाज के साथ मेरे पास आ कर रुकी. उस में बैठे एक इंस्पैक्टर ने कहा, ‘क्यों भई, इतनी सर्द रात में एटीएम के पास क्या कर रहे हो? कोई चोरवोर तो नहीं हो?’ मैं पुलिस की ऐसी भाषा से वाकिफ था.

‘‘‘नहीं, इंस्पैक्टर साहब, मैं सेना का रिटायर्ड कर्नल हूं. यह रहा मेरा आई कार्ड. इमरजैंसी में मुझे कहीं जाना पड़ रहा है. एटीएम से पैसे निकालने आया था. मुख्य सड़क तक जाने के लिए कोई सवारी ढूंढ़ रहा था कि आप आ गए.’

‘‘‘घर में सड़क तक छोड़ने के लिए कोई नहीं है?’ इंस्पैक्टर की भाषा बदल गई थी. वह सेना के रिटायर्ड कर्नल से ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता था.

‘‘‘नहीं, यहां मैं अकेले ही रहता हूं,’ मैं कैसे कहता, घर से मैं धक्के दे कर निकाला गया हूं.

‘‘इंस्पैक्टर ने कहा, ‘आओ साहब, मैं आप को सड़क तक छोड़ देता हूं.’ उन्होंने न केवल सड़क तक छोड़ा बल्कि स्टेशन जाने वाली बस को रोक कर मुझे बैठाया भी. ‘जयहिंद’ कह कर सैल्यूट भी किया, कहा, ‘सर, पुलिस आप की सेवा में हमेशा हाजिर है.’ कैसी विडंबना थी, घर में धक्के और बाहर सैल्यूट. जीवन की इस पहेली को मैं समझ नहीं पाया था.

‘‘स्टेशन पहुंच कर मैं सैनिक आरामगृह में गया. वहां न केवल मुझे कमरा मिला बल्कि नरमगरम बिस्तर भी मिला. तुम्हारे जैसे हृदयहीन लोग इस बात का अनुमान ही नहीं लगा सकते कि उस ठिठुरती रात में बेगाने यदि मदद नहीं करते तो मेरी क्या हालत होती. मैं खुद के जीवन से त्रस्त था. मन के भीतर यह विचार दृढ़ हो रहा था कि ऐसी स्थिति में मैं कैसे जी पाऊंगा. मन में यह विचार भी था, मैं एक सैनिक हूं. मैं अप्राकृतिक मौत मर ही नहीं सकता. मैं डेरे में पनाह मिलने के प्रति भी अनिश्चित था. पर डेरे ने मुझे दोनों हाथों से लिया. पैसे की तंगी ने मुझे बहुत तंग किया. डेरे के लंगर में खाते समय मुझे जो आत्मग्लानि होती थी, उस से उबरने के लिए मुझे दूरदूर तक कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. आप ने मुझे मेरी पैंशन में से हजार रुपया महीना देना भी स्वीकार नहीं किया तो मेरे पास इस के अलावा और कोई चारा नहीं था कि पहले का पैंशन डेबिट कार्ड कैंसिल करवा कर नया कार्ड इश्यू करवाऊं. मेरे जीतेजी पैंशन पर केवल मेरा अधिकार था.

‘‘मैं जीवनभर ‘क्यों’ के प्रश्नों का उत्तर देतेदेते थक गया हूं. बचपन में, ‘खोता हो गया है, अभी तक बिस्तर में शूशू क्यों करता हूं? अच्छा, अब फैशन करने लगा है. पैंट में बटन के बजाय जिप क्यों लगवा ली? अरे, तुम ने नई पैंट क्यों पहन ली? मौडल टाउन में मौसी के यहां दरियां देने ही तो जाना है. नई पैंट आनेजाने के लिए क्यों नहीं रख लेता? चल, नेकर पहन कर जा.’

‘‘काश, उस रोज मैं नेकर पहन कर न गया होता. मैं अभी भंडारी ब्रिज चढ़ ही रहा था कि साइकिल पर आ रहे लड़के ने मुझे रोका. ‘काम करोगे?’ मुझे उस की बात समझ नहीं आई, इसलिए मैं ने पूछा था, ‘कैसा काम?’ ‘घर का काम, मुंडू वाला.’ उस ने मेरे हुलिए, बिना प्रैस किए पहनी कमीज, बिना कंघी के बेतरतीब बाल, ढीली नेकर, कैंची चप्पल, बगल में दरियां उठाए किसी घर में काम करने वाला मुंडू समझ लिया था.

‘‘मैं ने उसे कहा था, ‘नहीं, मैं ने नहीं करना है, मैं 7वीं में पढ़ता हूं.’ फिर उस ने कहा था, ‘अरे, अच्छे पैसे मिलेंगे. खाना, कपड़ा, रहने की जगह मिलेगी. तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी.’ जब मैं ने उसे सख्ती से झिड़क कर कहा कि मैं पढ़ रहा हूं और मुझे मुंडू नहीं बनना है तब जा कर उस ने मेरा पीछा छोड़ा था. बाद में शीशे में अपना हुलिया देखा तो वह किसी मुंडू से भी गयागुजरा था. मेरे कपड़े ऐसे क्यों थे? मेरे पास इस का भी उत्तर नहीं था. बाऊजी के अतिरिक्त सभी मेरा मजाक उड़ाते रहे.

‘‘मेरे दूसरे उपनामों के साथ ‘मुंडू’ उपनाम भी जुड़ गया था. उस भाई से कभी ‘क्यों’ का प्रश्न नहीं पूछा गया जो गली की एक लड़की के लिए पागल हुआ था. अफीम खा कर उस की चौखट पर मरने का नाटक करता रहा. गली में उसे दूसरी चौखट मिलती ही नहीं थी. उस बहन से भी कभी क्यों का प्रश्न नहीं पूछा गया जो संगीत के शौक के विपरीत लेडी हैल्थविजिटर के कोर्स में दाखिला ले कर कोर्स पूरा नहीं कर सकी, पैसा और समय बरबाद किया और परिवार को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. उस भाई से भी क्यों का प्रश्न नहीं किया गया जो पहले नेवी में गया. छोड़ कर आया पढ़ने लगा, किसी बात पर झगड़ा किया तो फौज में चला गया. वहां बीमार हुआ, फौज से छुट्टी हुई, फिर पढ़ने लगा. पढ़ाई फिर भी पूरी नहीं की. सब से छोटे ने तो परिवार की लुटिया ही डुबो दी. मैं ने बाऊजी को चुपकेचुपके रोते देखा था. मैं पढ़ने में इतना तेज नहीं था. मुझ पर प्रश्नों की बौछार लगा दी जाती. पढ़ना नहीं आता तो इस में पैसा क्यों बरबाद कर रहे हो? इस क्यों का उत्तर उस समय भी मेरे पास नहीं था और आज भी नहीं है.

‘‘17 साल की उम्र में फौज में गया तो वहां भी इस क्यों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. सही होता तो भी क्यों का प्रश्न किया जाता और सही न होता तो भी. 11 साल तक तन, मन, धन से घर वालों की सेवा की. परिवार छूटते समय मेरे समक्ष फिर यह क्यों का प्रश्न था कि मैं ने अपने लिए क्यों कुछ बचा कर नहीं रखा. तुम से शादी हुई, पहली रात तुम्हें कुछ दे नहीं पाया, मुझे पता ही नहीं था कि कुछ देना होता है. पता होता भी तो दे नहीं पाता. मेरे पास कुछ था ही नहीं. 2 महीने की छुट्टी में मिले पैसे से मैं ने शादी की थी. मैं तुम्हें सब कैसे बताता और तुम क्यों सुनतीं? बताने पर शायद कहतीं, ऐसा था तो शादी क्यों की?

‘‘तुम्हारे समक्ष मेरी इमेज क्या थी? मैं बड़ी अच्छी तरह जानता हूं. तुम ने इस इमेज को कभी सुधरने का मौका नहीं दिया, अफसर बनने पर भी. उलटे मुझे ही दोष देती रहीं. तुम्हारे रिश्तेदार मेरे मुंह पर मुझे आहत कर के जाते रहे, कभी तुम ने इस का विरोध नहीं किया. मुझे याद है, तुम्हारी बहन रचना की नईनई शादी हुई थी. रचना और उस के पति को अपने यहां बुलाना था. तुम चाहती थीं, शायद रचना भी चाहती थी कि इस के लिए मैं उस के ससुर को लिखूं.

‘‘मैं ने साफ कहा था, मेरा लिखना केवल उस के पति को बनता है, उस के ससुर को नहीं. जैसे मैं साहनी परिवार का दामाद हूं, वैसे वह है. मैं उस का ससुर नहीं हूं. बात बड़ी व्यावहारिक थी परंतु तुम ने इस को अपनी इज्जत का सवाल बना लिया था. मन के भीतर अनेक क्यों के प्रश्न होते हुए भी मैं तुम्हारे सामने झुक गया था. मैं ने इस के लिए उस के ससुर को लिखा था.

‘‘जीवन में तुम ने कभी मेरे साथ समझौता नहीं किया. हमेशा मैं ने वह किया जो तुम चाहती थीं. रचना और उस का पति आए तो मिलन के लिए वे रात तक इंतजार नहीं कर सके थे. हमें दिन में ही उन के लिए एकांत का प्रबंध करना पड़ा. मुझे बहुत बुरा लगा था.

‘‘मैं समझ नहीं पाया था कि ऐसा कर के वे हमें क्या बताना चाहते थे? यदि हम उन के यहां जाते तो क्या वे ऐसा कह और कर सकते थे?

‘‘तुम्हें याद होगा, अपनी सीमा से अधिक हम ने उन को दिया था. रचना ने क्या कहा था, वह अपने ससुराल में अपनी ओर से इतना और कह देगी कि यह दीदीजीजाजी ने दिया है. जिस का साफ मतलब था कि जो कुछ दिया गया है, वह कम था. मैं मन से बड़ा आहत हुआ था.

‘‘रचना को इस प्रकार आहत करने, बेइज्जत करने और इस कमी का एहसास दिलाने का कोई हक नहीं था. मैं ने तुम्हारी ओर देखा था, शायद तुम इस प्रकार उत्तर दो पर तुम्हें अपने रिश्तेदारों के सामने मेरे इस प्रकार आहत और बेइज्जत होने का कभी एहसास नहीं हुआ.

‘‘क्यों, मैं इस का उत्तर कभी ढूंढ़ नहीं पाया. रचना को मैं ने उत्तर दिया था, ‘तुम्हें कमी लगी थी तो कह देतीं, जहां इतना दिया था, वहां उसे भी पूरा कर देते पर तुम्हें इस कमी का एहसास दिलाने का कोई अधिकार नहीं था. तुम अपने ससुराल में अपनी और हमारी इज्जत बनाना चाहती थीं न? मजा तब था कि बिना एहसास दिलाए इस कमी को पूरा कर देतीं. पर इस झूठ की जरूरत क्या है? क्या इस प्रकार तुम हमारी इज्जत बना पातीं? मुझे नहीं लगता, क्योंकि झूठ, झूठ ही होता है. कभी न कभी खुल जाता. उस समय तुम्हारी स्थिति क्या होती, तुम ने कभी सोचा है?’

‘‘रचना मेरे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाई थी. जो बात तुम्हें कहनी चाहिए थी, उसे मैं ने कहा था. उन के जाने के बाद कई दिनों तक तुम ने मेरे साथ बात नहीं की थी. उस रोज तो हद हो गई थी जब मैं अपने एक रिश्तेदार की मृत्यु पर गया था. वे केवल मेरे रिश्तेदार नहीं थे बल्कि उन के साथ तुम्हारा भी संबंध था. उन्होंने किस तरह मुझ से तुम्हारे ब्याह के लिए प्रयत्न किया था, तुम भूल गईं. उसी परिवार ने बाऊजी के मरने पर भी सहयोग किया था.

‘‘वहां मुझ से 500 रुपए खर्च हो गए थे. उस के लिए तुम ने किस प्रकार झगड़ा किया था, कहने की जरूरत नहीं है. तुम ने तो यहां तक कह दिया था कि तुम मेरे पैसे को सौ जूते मारती हो. मेरे पैसे को सौ जूते मारने का मतलब मुझे भी सौ जूते मारना.

‘‘मैं तुम्हारे किन रिश्तेदारों की मौत के सियापे करने नहीं गया. उन्हीं रिश्तेदारों ने माताजी के मरने पर आना तो दूर, किसी ने फोन तक नहीं किया. किसी को डिप्रैशन था, किसी के घुटनों में दर्द था. तुम्हारी भाषा की कड़वाहट आज भी भीतर तक कड़वाहट से भर देती है. पर अब इन सब बातों का क्या फायदा? मैं तो केवल इतना जानता हूं कि आप लोगों के सामने मैं हमेशा गरीब बना रहा. किसी बाप को गरीब नहीं होना चाहिए. गरीब हो तो उस में ताने सुनने की ताकत होनी चाहिए. अगर सुनने की ताकत न हो तो उस की हालत घर के कुत्ते से भी बदतर होती है.

‘‘घर के कुत्ते को जितना मरजी दुत्कारो, वह घर की ओर ही आता है. घर को छोड़ कर न जाना उस की मजबूरी होती है. यह मजबूरी जीवनभर चलती है. काश, मैं पहले ही घर को छोड़ कर चला आया होता. मैं खुद ही अपने आत्मसम्मान को रख नहीं पाया था. यदि ऐसा करता तो मेरे उन कर्मों का क्या होता जो मुझे हर हाल में भुगतने थे.’’

‘‘गलतियां हुई हैं, मैं मानती हूं. क्या इन सब को भूल कर आगे की जिंदगी अच्छी तरह से नहीं जी जा सकती,’’ इतनी देर से चुप मेरी पत्नी ने कहा.

‘‘हर रोज यही कोशिश करता हूं कि सब भूल जाऊं. भूल जाऊं कि जिंदगी के हर मोड़ पर मुझे लताड़ा गया है. हर कदम पर मैं ने आत्मसम्मान को खोया है. भूल जाऊं कि हर गलती के लिए मुझे ही दोषी ठहराया जाता रहा है. चाहे वह सोफे के खराब होने की बात हो या कुरसियों के टूटने की. मैं कैसे कहता कि ये बच्चों की उछलकूद से हुआ है. अगर कहता भी तो इसे कौन मानता.

‘‘मैं ने बड़ी मुश्किल से अपनेआप को संभाला है, अपने ढंग से जिंदगी को सैट किया है. चाहे पहले की यादें मुझे हर रोज पीडि़त करती हैं तो भी मुझे यहां राजी के साथ से कोई एतराज नहीं है परंतु इसे अपनी जिंदगी के दिन दूसरे कमरे में गुजारने होंगे. इस की पूरी सेवा होगी. इस की सारी जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा. इस की तकलीफों के बारे में हर रोज पूछा जाएगा और इलाज करवाया जाएगा. इस ने चाहे मुझे हजार रुपया महीना देना स्वीकार न किया हो पर मैं इसे 5 हजार रुपए महीना दूंगा.

‘‘24 घंटे टैलीफोन इस के सिरहाने रहेगा, चाहे जिस से बात करे. पर मेरे जीवन में इस का कोई दखल नहीं होगा. मैं कहां जाता हूं, क्या करता हूं, इस पर कोई क्यों का प्रश्न नहीं होगा. मुझे कोई भी फौरमैलिटी बरदाश्त नहीं होगी. बस, इतना ही.’’

वे दोनों चुप रहे. शायद उन को मेरी बातें मंजूर थीं. मैं ने बेबे से कह कर राजी का सामान दूसरे कमरे में रखवा दिया.

बच्चों के मुख से

एक दिन हम अपने 2 साल के बेटे पर्व के साथ मार्केट गए. वहां एक जुलूस निकल रहा था जिस में लोग ‘हाय…हाय’ के नारे लगा रहे थे. लौटते वक्त वहां से पर्व कुछ खिलौने भी लाया. जब घर में सब ने उस से पूछा कि खिलौने कहां से लाए तो वह बोला, ‘हाय हाय से.’ घर वाले कुछ समझे नहीं पर जब उन्हें जुलूस में नारे वाली बात पता चली तो सब खूब हंसे.
पूजा, मेरठ (उ.प्र.)

*

मेरा 5 वर्षीय भतीजा पुलकित टीवी में विज्ञापनों को बहुत गौर से देखता है. एक दिन हम सभी परिवारजन बैठ कर भोजन कर रहे थे. अचानक मेरी बेटी से पानी से भरा गिलास गिर गया. इस पर वह जोर से चिल्लाया, ‘‘मम्मी, जल्दी से विस्पर ले आओ, दीदी से पानी गिर गया है. टीवी में दिखाता है कि यह बहुत तेजी से सोखता है.’’ उस की बातें सुन कर हम सभी का हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया.

अंजुला अग्रवाल, मीरजापुर (उ.प्र.)

*

मेरा बेटा जब दूसरी क्लास में था तभी से वह क्रिकेट खेलने का शौकीन था. उस के शौक को देखते हुए हम ने उसे कोच के पास भेजना शुरू कर दिया. जब वह 5वीं क्लास में पहुंचा तब आईपीएल क्रिकेट टूर्नामैंट शुरू हुआ. हम सब बैठ कर टीवी पर प्रसारित हो रही न्यूज में आईपीएल के बारे में जानकारी ले रहे थे कि तभी खबर आई, ‘सचिन तेंदुलकर और हरभजन सिंह को एक ही टीम ने खरीद लिया.’

उसी वक्त मेरा बेटा जोरजोर से रोने लगा. हम ने कहा, ‘‘बेटा, क्यों रो रहे हो?’’

‘‘मां, मुझे क्रिकेट नहीं खेलना, न मुझे बिकना है. मुझे हमेशा आप के पास रहना है.’’

उस का मासूम सा चेहरा देख कर हम सब जोरजोर से हंसने लगे.

इंद्रजीत कौर, जम्मू (जे ऐंड के)

*

मेरी 4 वर्ष की नातिन अदिती बहुत नटखट व चुलबुली है. एक बार मैं लखनऊ गया था. मैं ने एक गुलाबी रंग का चिकन के काम का कढ़ा हुआ कुरतापाजामाचुन्नी का सैट खरीद लिया. मेरे घर वापस लौटते ही अदिती ने पूछा, ‘‘नाना, मेरे लिए क्या ‘गिफ्ट’ लाए हो?’’

मैं ने उसे झट से कपड़ों का पैकेट दे दिया. अदिती तुरंत उसे पहन कर आई और पूछने लगी, ‘‘नाना, मैं कैसी लग रही हूं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बहुत सुंदर.’’ थोड़ी देर बाद अदिती नानी से पूछती है कि नाना फिर कब जाएंगे? यह सुन कर मैं और मेरी पत्नी अपनी हंसी नहीं रोक पाए.

सूर्यपाल सिंह जैन, कनाट प्लेस (न.दि.)

महायोग : 7वीं किस्त

अब तक की कथा : 

मां को देखते ही दोनों बेटे विचलित हो उठे. अब दिया के अतिरिक्त यशेंदु की चिंता भी थी. पापा की टांग कट जाने पर दिया व दादी कैसे सहज रह सकेंगी? दिया ने मां व भाइयों की बात सुन ली थी और वह दादी को तथा अपनेआप को इन परेशानियों का कारण मान रही थी. लंदन से उस के ‘स्पौंसरशिप’ के कागजात आ चुके थे परंतु वह पिता को इस हालत में छोड़ने के लिए तैयार न थी. फोन पर नील मीठीमीठी बातें बनाता और अपनी व्यस्तता का ढोल पीटता. दिया हादसों से घबरा गई थी. यश उसे बारबार नील के पास जाने के लिए कहते.

अब आगे…

दिया को समझ नहीं आ रहा था कि करें तो करें क्या? बहुत सोचविचार कर लगभग एक हफ्ते बाद दिया ने अपने पिता से ससुराल जाने की हामी भर ही दी. कितनी रौनक सी आ गई थी यश के चेहरे पर. उन का बनावटी पैर अब तक लग चुका था और नर्स उन्हें गार्डन में रोज घुमाने ले जाती थी. मां समझतीं कि उन का बेटा अपने पैर की कसरत करने गार्डन जाता है. पता नहीं उन्होंने कहांकहां से गंडेतावीज ले कर यश और दिया के बिस्तरों के नीचे रखने शुरू कर दिए थे. कामिनी ने घर के नौकरों को समझा रखा था कि दिया के कमरे में ऐसा कुछ मिले तो दिया को बिलकुल न बताएं और चुपचाप उसे ला कर दे दें. नौकर यही करते. परंतु एक दिन न जाने कैसे जब नौकरानी दिया का बिस्तर साफ कर रही थी, उस के हाथ में दिया ने डोरी जैसी कोई चीज देख ली. वह अचानक वाशरूम से निकल कर उस के सामने आ कर खड़ी हुई.

‘‘यह तुम्हारे हाथ में क्या है, छबीली?’’ नौकरानी सकपका गई.

‘‘क्या बीबी?’’ उस ने उस डोरी को छिपाने का भरसक प्रयास किया परंतु दिया की दृष्टि से छिपा न सकी.

‘‘दिखाओ, दो मुझे,’’ दिया ने कुछ इस प्रकार नौकरानी को डांटा कि उस से तावीज छिपाते न बना. उसे दिया को देना ही पड़ा. दिया डोरा ले दनदनाती हुई यश के कमरे में गई. रविवार का दिन था. सब घर में ही थे. कामिनी को बड़ी मुश्किल से कभीकभी आराम के लिए समय मिलता था. यश जागे हुए थे. नर्स उन्हें सहारा दे कर सुबह की हवा खिलाने के लिए गार्डन ले जाने के लिए व्हीलचेयर पर बिठा ही रही थी कि दिया की आवाज सुन कर पूरा वातावरण अशांत हो गया.

‘‘यह है क्या आखिर, पापा?’’ उस ने लाल डोरा फेंकते हुए यश से पूछा.

यश को मालूम था कि मां आजकल ये सब टोनेटोटके करवा रही हैं. उन का मुंह उतर गया. यश ने नर्स को वहां से जाने का इशारा किया, फिर जो दिया ने बवाल खड़ा किया कि पूरा परिवार ही हड़बड़ाते हुए यश के कमरे में आ पहुंचा. पंडितों के पाठ की आवाज धीमी पड़ गई. थरथराती हुई दादी भी यश के कमरे में आ गईं. उन्होंने दिया को पुचकारने का प्रयास किया परंतु दिया दनदनाती हुई कमरे से बाहर निकल गई और ऊपर अपने कमरे में जा कर दरवाजा जोर से बंद कर लिया.

‘‘मां, मैं ने आप से कितनी बार कहा कि आप अब ये सब करना बंद कर दें,’’ यश ने मां के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘यश, तुम भी ये सब अपनी मां से कह रहे हो. तुम दिया को क्यों नहीं समझा सकते कि जो कुछ भी अच्छा हो रहा है वह सब पूजापाठ और इन सब की वजह से ही हो रहा है. नहीं तो…’’ मां के पास बस एक ही अस्त्र था-आंसुओं का. उन के नेत्रों से गंगाजमुना बहने लगी.

‘‘क्या अच्छा हो रहा है, मां, बताइए? दिया के विवाह में आप को अभी तक क्या अच्छाई दिखाई दी है? जब वह ससुराल जा कर सुखी रहेगी तब असलियत पता चलेगी. मैं ने एक्सिडैंट में अपनी एक टांग खो दी, वह अच्छाई है या…आप ही बताइए, आखिर दिया के ब्याह के बाद कौन सी चीज हमारे साथ अच्छी हुई है? आप तो रो कर अपने मन को हलका कर लेती हैं, भजन करती और करवाती रहती हैं पर मैं तो इस सब पर नहीं बैठ सकता. मुझे तो लग रहा है जो इतने वर्षों की कमाई थी बच्चों के रूप में, धन के रूप में, इज्जत के रूप में, सब खत्म होती जा रही है और आज मैं अपंग बन कर बिस्तर पर पड़ा हूं.’’

पहले तो दादी को यश की बात समझ में ही नहीं आई, जब दोबारा यश ने अपंग कहा तो उन के आंसू निकलने बंद हो गए. उन की फटी आंखें यश की ढकी हुई टांग को घूरने लगीं. यश के पैरों से कपड़ा हटा कर देखने पर ‘हाय राम’ कह कर वे जमीन पर धम से बैठ गईं. कामिनी दौड़ कर आई. उस ने नर्स को आवाज लगाई. नर्स के आने पर दोनों ने मिल कर मांजी को उठा कर पलंग पर बैठाया. मां रोतेरोते बेहोशी की हालत में आ गई थीं. दीप, स्वदीप ने दौड़ कर दादी को हाथों में उठाया और गाड़ी में डाल कर अस्पताल की ओर भागे. दादी की सांस की गति बहुत तेज हो गई थी. दादीमां को अस्पताल में ऐडमिट करवा दिया गया. दिया शाम तक अपने कमरे में बंद रही. बाहर से कई बार कामिनी ने उसे दादी के अस्पताल पहुंच जाने की सूचना दी थी परंतु दिया बिलकुल गुमसुम बनी रही. नौकरानी कई बार नाश्ता, खाना ले कर गई परंतु दिया ने दरवाजा नहीं खोला. वह सोच रही थी कि दादी मां के जीवन की संध्या बेला है परंतु उस के तो प्रभातकाल में ही सबकुछ घटित होता जा रहा है. दिया लगभग 4-5 बजे यश के कमरे में आई.

‘‘पापा, नील के पास जाने की तैयारी करवा दीजिए,’’ दिया बोली तो यश ने चौंक कर उस की ओर देखा, फिर कुछ खंखार कर बोले, ‘‘दिया, बेटा, दादी अस्पताल में हैं.’’

‘‘मालूम है मुझे, पापा, ठीक हो जाएंगी. आप चिंता न करें. स्वदीप भैया से कह कर जितनी जल्दी हो सके मेरी जाने की तैयारी करवा दीजिए.’’

न जाने किस मिट्टी की बन गई थी दिया. दोनों भाई अस्पताल में चक्कर लगाते, कामिनी सुबहशाम सास को देखने अस्पताल पहुंचती परंतु दिया? उस का तो मन ही नहीं होता था दादी से मिलने का.

पूरा घर मानो बिखराव से तहसनहस हो गया. अभी तो कामिनी और बेटों ने काफी लंबे अरसे के बाद अपनाअपना काम शुरू किया था कि फिर से उस में जबरदस्त व्यवधान आ खड़ा हुआ. कामिनी अस्पताल और घर के बीच चक्कर लगातेलगाते थक गई थी. उधर, नील ने जल्दी मचानी शुरू कर दी थी. और…अब तो हद हो गई जब नील ने दिया का टिकट भेज दिया. अचानक ही एअरलाइंस से फोन आया कि दिया का टिकट भेजा जा रहा है. यह ठीक हुआ कि दिया मुंबई जा कर वीजा की फौरमैलिटीज पूरी कर आई थी. 2 दिन बाद का टिकट था. नील के फोन लगातार आते रहे और वह अनमनी सी उस से बात कर के पापा या मां को फोन पकड़ाती रही. नील शायद उस से कुछ रोमांटिक बातें करना चाहता पर वह बेमन से ही उस की बातों का उत्तर दे पाती. पता नहीं क्यों? उसे बारबार यही लग रहा था मानो वह एक लड़की से एक मदारी की बंदरिया में तबदील हो गई है.

दादी अस्पताल में थीं परंतु दिया अपनी लंदन जाने की तैयारी में खुद को व्यस्त दिखाती रही. दादी ने कई बार दिया के बारे में पूछा. इस में तो शक था ही नहीं कि दादी दिया से बहुत प्यार करती थीं. वे चाहती थीं कि अपनी पोती की विदाई खूब धूमधाम से करें. अपने पंडितजी से मुहूर्त निकलवा कर पूजाअर्चना के बाद ही दादी उसे विदेश विदा करें. जब भी घर का कोई सदस्य उन के पास आता तो बारबार यह पूछना न भूलती, अरे, पंडितजी को बुला भेजा है न? पूजा तो हो रही है न घर में? और हां, दिया को बिठाना है पूजा में. यश भी बैठ जाएगा. हे भगवान, कैसे समय में मुझे यहां फंसा दिया  मैं कुछ कर नहीं पा रही हूं अपने बच्चों के लिए.

जब वे बड़बड़ करने लगतीं तभी डाक्टर के आदेश से उन्हें इंजैक्शन दे दिया जाता और थोड़ी देर बाद ही वे खामोश हो जातीं. डाक्टर के अनुसार, उन के मस्तिष्क को शांत रखना आवश्यक था. दादी को इस बात की भी बहुत तकलीफ थी कि दिया उन से मिलने नहीं आई. उन्हें लगता कि दिया अपने पति के पास जाने के लिए बहुत उत्सुक है और तैयारियों में व्यस्त है. जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं. अपने कुछेक कपड़े एक अटैची में डाल कर दिया तैयार ही थी. जब ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसलों से क्या डरना. देखा जाएगा जो होगा. वह अधिकांश समय पापा के पास ही गुजारती परंतु बातबात में चहकने वाली दिया के मुख पर पसरी उदासी, आंखों में नीरवता और चाल में ढीलापन देख कर यश और कामिनी उस की मानसिक स्थिति से भली प्रकार अवगत थे. परंतु अब उन के पास भी प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था, केवल भविष्य की प्रतीक्षा, जिस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता. न मनुष्य को और न ही हाथ की रेखाएं पढ़ने वाले पंडितों को. इन लोगों के मस्तिष्क में एक ही बात थी कि किसी भी प्रकार उन की बिटिया सुखी रहे. उस की आंखों की चमक लौट आए, उस के पैरों में फिर से बिजलियां भर जाएं और चेहरे पर मुसकराहट.

दिया ने पिता से बहुत सख्ती से कह दिया था कि उसे मुंबई तक कोई भी छोड़ने नहीं जाएगा. आगे उसे अकेले ही जाना है, सो वह मैनेज कर लेगी. लाख समझाने पर भी वह टस से मस न हुई. ‘‘आप लोग चाहते हैं न कि मैं अपनी ससुराल जाऊं. तो जा रही हूं. वहां भी तो मुझे आप सब से दूर ही रहना है, अकेले ही, तो यहां क्यों नहीं? दूसरी बात, मुझे किसी की इतनी जरूरत नहीं है जितनी यहां पर भाई लोगों की. इसलिए पापा, मां, अब इस बात पर कोई बहस मत कीजिए प्लीज, आई विल मैनेज, कोई पहली बार तो हवाई जहाज में जा नहीं रही हूं. फिर वहां तो कोई मेरे साथ अंदर रह नहीं पाएगा. सो, कोई फायदा तो है नहीं मुंबई तक जाने का. भाई लोग यहां का संभालें, बस.’’

लेकिन भाइयों ने दिया की एक न सुनी और हवाई अड्डे तक साथ जाने के लिए दिया को राजी कर ही लिया. लेकिन कितनी बार कोशिश की गई कि दिया जाने से पहले एक बार दादी से मिल ले परंतु कोई समझाइश काम न आई. वह भी तो आखिर अपनी दादी की ही पोती थी. जो ठान लिया, बस. ऐसी परिस्थिति में भी वह कभीकभी स्वयं को ही कोसने लती, यदि नील से मिलने के समय वह इतनी दृढ़ रह पाती तो. आखिर क्यों ढीली पड़ी वह?

खैर, जो होना था, हो चुका था. मांपापा को रोते छोड़ वह भाइयों के साथ हवाईअड्डे पहुंच गई थी. वह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश कर गई कुछ इस अदा से मानो वह कोई सिपाही हो जो लाम पर जा रहा हो. प्रवेशद्वार पर एक बार ठिठक कर उस ने पीछे घूम कर दोनों भाइयों की आंखों में तैरती उदासी को भांपा, धीरे से उन की ओर हाथ उठा कर एक बार बाय का संकेत किया और आगे बढ़ गई. वह जानती थी कि जब तक हवाई जहाज उड़ान नहीं भरेगा, उस के दोनों भाई बाहर ही खड़े रहेंगे. लेकिन उस से फायदा क्या?

अपने ही विचारों में गुम वह फौरमैलिटीज पूरी करती रही और जा कर दूसरे यात्रियों के साथ बैठ गई.

अधिकतर यात्री चाय या कौफी ला कर अपनी कुरसियों या सोफों में धंस गए थे. पारदर्शी शीशे से रनवे पर खड़े हुए 2-3 हवाई जहाज नजर आ रहे थे.

नील ने दिया को बिजनैस क्लास का टिकट भेजा था. एअरहोस्टेस ने उस की सीट दिखा कर उस पर एक बड़ी सी मुसकराहट फेंक दी थी. वह भी उसे देख कर मुसकरा दी. थैंक्स कह कर वह सीट पर जा बैठी और खिड़की की ओर ताकने लगी. अपने दिलोदिमाग को शांत करने के प्रयास में वह भीतर से और भी अशांत होती जा रही थी. नया देश, नया परिवेश, नए लोग…हां, नए ही तो हैं. कहां समझ पाई है दिया नील को भी. एक नईनवेली की सी कोई भी उमंग उस के भीतर हलचल नहीं मचा रही थी. अब प्लेन में बैठ कर उसे अपनी सहेलियां याद आ रही थीं जिन से वह मिल कर भी नहीं आई थी. यही सोचेंगी न उस की सहेलियां कि दिया कैसी बेवफा निकली. यद्यपि यश के साथ हुई दुर्घटना का सब को पता चल गया था. एक तो शादी का कमाल हुआ था, दूसरा, अब होने जा रहा था और दिया इस कमाल को स्वयं ही झेलना चाहती थी. अचानक ही उस ने अपने कंधे पर किसी का मजबूत दबाव महसूस किया और झट से गरदन घुमा कर देखा.

– क्रमश:

इतने विवश नहीं हैं हम

कोयले की कालिख में न जाने
किसकिस का मुंह है काला
हिसाब में कमजोर हैं न
गिन रहे थे संख्या श्न्यों की

और अटक गए थे
अरबखरब पर जा कर
सोच रहे थे बेकार ही
कोसते हैं जमाने को-

कि मिलावट के इस दौर में
स्वास्थ्य बिगड़ रहा है-
नहीं, आदमी का हाजमा
दिन पर दिन बढ़ रहा है

देखो, इतना धन कहां चला गया
और तो और, आम आदमी भी
घोटाले हजम करना सीख गया है अब
इतने विवश क्यों हैं हम?

हो रहे सम्मानित वो लोग
सार्वजनिक मंचों पर
अपना ही सम्मानपत्र जो
स्वयं ही दे रहे हैं लिख कर

और हम बने हैं मूकदर्शक
खौलता तो है खून हमारा
किंतु लावा बन कर नहीं फूटता
बजा रहे हैं हम तालियां

इन काहिलों पर
इतने विवश क्यों हैं हम?
नहीं करते बरदाश्त एक भी क्षण
न बना हो जब नाश्ता समय पर

या फिर छोड़ दी हो बाई ने
चिकनाई चम्मच पर
उबल पड़ते हैं तुरंत
पढ़ाते हैं पाठ

समय की कीमत का पत्नी को
और कर्तव्यनिष्ठा का बाई को
सिखाते हैं बच्चों को
‘अन्याय को सहन करना है

बढ़ावा देना अन्याय को
फिर क्यों रह जाते हैं मौन जब
पढ़े जाते हैं कसीदे उन की शान में-
जो रखते हैं योग्यता

एकमात्र चापलूसी की
आखिर इतने विवश क्यों हैं हम?
क्या है ये तूफान से पहले की शांति
या फिर इस दक्ष प्रजापति के यज्ञ में

जब तक न होगी आहुति किसी सती की
जो उद्वेलित कर दे तन और मन
तभी जागेगा भीतर का क्रोध
और फिर इस जन तांडव में

तहसनहस हो जाएगा-
कपट का यह साम्राज्य
बांध तोड़ते जल का वेग-
नहीं देखेगा फिर कोई भी

सीमा और न कोई भेद
बह जाएंगी अट्टालिकाएं
और झोंपडि़यां एकसाथ
और जब उतरेगा सैलाब तो

रह जाएगी विस्तृत जमीन
फिर से होगा निर्माण जिस पर
एक नवीन सभ्यता का!
नहीं, इतने विवश नहीं हैं हम

चाहें तो दिखा सकते हैं औकात
इन आतताइयों को
एक चींटी भी सुंघा सकती है
जमीन-हाथी को

जागो-देखो-बढ़ो
छोड़ दो बहलना मीठी लौलीपौप से
उखाड़ फेंको उन सब को
जो डाल कर फूट आमजन में

राज कर रहे हैं शान से
आओ, एक हो जाओ
और बसाओ वो सभ्यता
न हो जहां कोई-विवश, लाचार, बेदम

नहीं, इतने विवश नहीं हैं हम
इतने विवश नहीं हैं हम!

           – डा. अंजु मोहिनी

ये पति

मेरे पति अच्छे स्वभाव के हैं. शादी के बाद उन का तबादला अंडमाननिकोबार हो गया. इस दौरान मैं प्रैगनैंट हो गई और मुझे उल्टियां बहुत आती थीं. मेरे पति ही घर का सारा काम और साफसफाई करते थे. एक दिन उन के एक दोस्त अचानक आए और बोले, ‘‘यार, इतनी सेवा क्यों करते हो.’’ मेरे पति ने उत्तर दिया, ‘‘शालू जिस बच्चे को जन्म देने वाली है वह हम दोनों का है. जब बच्चे के लिए वह शरीर से इतना कष्ट उठा सकती है तो क्या मैं थोड़ी उस की सेवा भी नहीं कर सकता.’’ उन के इस निश्छल व निस्वार्थ प्रेम को देख कर मेरा हृदय गद्गद हो उठा.

शालिनी बाजपेयी, चंडीगढ़ (यू.टी.)

*

मेरे पति बेहद हंसमुख और खुशमिजाज हैं. मुंबई में ही पलेबढ़े होने के कारण हिंदी भाषा से पूरी तरह अवगत नहीं हैं. कई बार जब वे हिंदी बोलते हैं, गलत शब्दों के प्रयोग के कारण घर में हंसी के ठहाके गूंज उठते हैं जिस में वे स्वयं भी शामिल हो जाते हैं. एक बार मेरे छोटे भाई ने बातचीत के दौरान उन से कहा, ‘‘जीजाजी, आजकल आप काफी अच्छी हिंदी बोल लेते हैं, लगता है हमारी दीदी का प्रभाव है.’’ उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, ‘‘अरे, हिंदी क्या, अब तो हम उर्दू भी बोल सकते हैं.’’ भाई ने अचंभे से पूछा, ‘‘उर्दू?’’ तो पतिदेव ने जवाब दिया, ‘‘तो फिर, आप क्या समझते हैं, हम ने उर्दू के कई इंतकाल दिए हैं.’’ यह सुनते ही सब के पेट में हंसतेहंसते बल पड़ गए. दरअसल, वे कहना चाहते थे कि उन्होंने उर्दू के कई इम्तिहान दिए हैं.     

स्वाती वर्तक, मुंबई (महा.)

*

मेरे पति अपनेआप को बहुत बड़ा कुक मानते थे. वे अकसर कहते थे, ‘‘उन को कम समय में स्वादिष्ठ खाना पकाने में महारत हासिल है.’’ उन की बड़बोलेपन की इस आदत से मैं परेशान रहती थी. एक शाम को घर में कुछ मेहमान आ गए. बस, फिर क्या था, पति महोदय ने किचन संभाल लिया और लगे अपने हुनर की फास्ट सर्विस दिखाने. जैसे ही मेहमानों को चाय सर्व की गई, उन का मुंह कसैला हो गया. दरअसल, पति महोदय को नमक को दाल वाले कुकर में डालना था और चीनी को चाय में. हड़बड़ी में उन से चीनी कुकर में डल  गई और नमक चाय में. इस घटना के बाद उन की अपनी तारीफ करने की यह आदत छूट गई.

सुनंदा गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

सुबूत मांगते हैं

मुझ से, मेरे जिंदा होने का

सुबूत मांगते हैं

सामने खड़ा हूं, मरा नहीं,

इस का सुबूत मांगते हैं

 

मरा होता, तो श्मशान में

जला दिया होता

आग में नहीं जला,

इस का सुबूत मांगते हैं

जमीनजायदाद के कागज

भी दिखा दिए

कागज झूठे नहीं,

इस का सुबूत मांगते हैं

 

गवाह भी एकएक कर

कई खड़े कर दिए

हर गवाह सच्चा है,

इस का सुबूत मांगते हैं

 

कागज पर लिख

‘मैं जिंदा हूं’ सही कर दिए

हैं ये हस्ताक्षर मेरे,

इस का सुबूत मांगते हैं

अंदर बड़े सा’ब से लिखवा लाओ

कहा उस ने

प्रमाणपत्र नहीं, दे दी घूस

इस का सुबूत मांगते हैं

 

कब तक सहता,

साफ कह दिया

हजार लेके मुकरोगे नहीं,

इस का सुबूत मांगते हैं.

            – अलोकार

फैसला

कौशल्या जिसे प्यार से सभी कोशी बुलाते थे. वह पढ़ना चाहती थी लेकिन कन्नू मौसी अकसर उस की मां को उकसाया करती थीं, ‘मनोरमा, कोशी बड़ी हो गई है. उस के हाथ समय रहते पीले कर. आगे परेशानी हो जाएगी. उम्र निकल जाने पर एक तो लड़के नहीं मिलेंगे, मिलेंगे भी तो वे जिन की किन्हीं कारणों से शादी नहीं हो पाती है. फिर समझौता करना पड़ेगा और कोशी को जहां तक मैं जानती हूं वह समझौता करने वालों में से नहीं है.’

‘दीदी, मैं समझती हूं, उस की उम्र हो गई है, सोचती भी हूं कि जल्द से जल्द कोई अच्छा सा लड़का देख कर हाथ पीले कर दूं लेकिन वह जिद पर अड़ी है कि एमएससी करने के बाद पीएचडी करेगी फिर शादी करेगी.’

एक दिन कौशल्या कहने लगी, ‘‘मम्मी, शादी के बाद मैं नौकरी करूंगी. जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं, केवल हाउसवाइफ बन खाना बना कर खिलाने वाली नहीं.’’

मैं ने समझाया, ‘‘देख बेटा, शादी के बाद ससुराल में तू बहू बन कर जाएगी, सास बन कर नहीं. तुझे वही करना है जो वे लोग चाहेंगे.’’

‘‘मां, मैं जब शादी इसी शर्त पर करूंगी तो वे कैसे रोक सकेंगे मुझे?’’ कौशल्या का कहना था.

‘‘खैर, मुझे तुझ से बहस नहीं करनी. मैं तो इतना जानती हूं कि परीक्षा के बाद तेरी शादी हम लोग हर हाल में कर देंगे. पीएचडी वीएचडी जो भी करना है बाद में भी तो कर सकती है?’’ फिर कई दिनों तक बात नहीं हुई. हां, मम्मीपापा की खुसुरफुसुर चलती रहती थी और वह जानती थी, यह उस के बारे में ही होती होगी.

एक दिन कालेज जाते समय पापा ने कोशी को रोका, ‘‘कोशी, तुझ से कुछ बात करनी है. थोड़ा रुक सकती है?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, पापा. बोलिए, क्या कहना चाहते हैं?’’

उसे ठीक से मालूम था कि वे क्या कहने वाले हैं. उस की शादी की चर्चा के अलावा कोई दूसरी बात हो ही नहीं सकती.

‘‘देख बेटा, तेरे लायक एक अच्छा लड़का देखा है. पुणे में एक बड़ी कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर है. एमबीए है. उस के घर वाले तैयार हैं. लड़के ने तुझे देख लिया है और उसे तू पसंद भी है. वेतन अच्छा है, घर भी संपन्न है. तू कहे तो बात चलाऊं?’’

‘‘पापा, मैं ने मम्मी को बता दिया है कि मैं क्या चाहती हूं.’’

‘‘हां बेटा, तेरी मम्मी ने मुझे बता दिया है लेकिन मैं चाहता हूं कि तू हां कर दे. लड़का दिखने में अच्छा है, हाथ से निकल जाएगा. फिर ऐसा लड़का मिले न मिले. सोच कर शाम तक जवाब देना.’’

कालेज में सहेलियों से चर्चा की तो उन का भी यही कहना था कि लड़का अच्छा है तो हां कर दे वरना बाद में न जाने कैसा लड़का मिले. घर आ कर उस ने हां कर दी. आखिर देखनेदिखाने की रस्म पूरी हुई. दहेज में उन की इच्छानुसार 1 लाख रुपए सगाई के अवसर पर नकद. शेष सामानों में मोटरसाइकिल, फ्रिज और बड़ा एलसीडी टीवी शादी के समय दिया जाना तय हुआ.

कोशी दहेज देने के पक्ष में नहीं थी लेकिन जब कोशी ने लड़के को देखा तो उस ने दहेज देने का विरोध इसलिए नहीं किया कि कहीं लड़के वाले इनकार न कर दें. गोराचिट्टा, तीखे नाकनक्श, स्वस्थ, हंसमुख. उसे लगा उस के सपनों का राजकुमार यही तो है. वह उसे इतना भा गया कि वह उस से शादी के बाद नौकरी करने की बात करना भूल ही गई. मनोज के जाने के बाद उसे अपनी शर्त याद आई लेकिन अब देर हो चुकी थी. खैर, ‘मना लूंगी’ सोच स्वयं को उस ने आश्वस्त किया. विवाह की तारीख तय भी हो गई, 15 अप्रैल. अभी तो दिसंबर चल रहा है. फिर भी विवाह की तैयारियां शुरू कर दी गईं.

मनोज एकदो बार घर भी आया, बातचीत में एकदो वाक्यों को छोड़ कर उसे हंसमुख और संस्कारित लगा. मनोज के जाते ही वह सुनहरे सपनों के रंगीन तानेबाने बुनने लग जाती. तभी उसे याद आया कि उस की सब से प्रिय सहेली मीनाक्षी के पिताजी का स्थानांतरण पुणे होने के कारण वह भी तो पुणे में है और वहीं से एमएससी कर रही है.

कोशी ने उसे फोन से खुशखबरी सुनाते हुए आग्रह भी कर डाला कि शादी में तुझे हर हालत में आना है वरना झगड़ा हो जाएगा और जिंदगीभर तुझ से बात नहीं करूंगी. शादी 15 अप्रैल को तय हुई है.

‘‘तू ने कैसे मान लिया कि मैं तेरी शादी में नहीं आऊंगी? आऊंगी और जरूर आऊंगी बाबा. लेकिन तू ने यह तो बताया ही नहीं कि श्रीमानजी हैं कहां के?’’

‘‘तू अभी जिस शहर में रह रही है, वहीं के हैं. उन का नाम और पता मैं मैसेज कर रही हूं.’’

‘‘तू नामपता भेज, मैं जल्द ही तुझे विस्तृत रिपोर्ट दूंगी.’’

बात खत्म होते ही कोशी ने सब से पहले मीनाक्षी को नामपते का मैसेज किया. फिर परीक्षा की तैयारियों में जुट गई लेकिन पढ़ाई में पहले जैसा मन कभी लगा ही नहीं. बीचबीच में मनोज के फोन और उस से होने वाली हलकीफुलकी प्यारभरी बातें. शादी के बाद हनीमून पर जाने के स्थान की चर्चा. उसे अपने भविष्य की दुनिया रंगीन व झिलमिलाती दिखाई देती. वह अकेले में मुसकराती और स्वयं शरमा जाती. कई बार अपनेआप में इतनी खोई रहती कि मांबाबूजी की आवाजें तक कान में आना बंद होने लगीं. मां कहतीं भी, ‘‘कोशी दिनरात क्या सोचती रहती है तू आजकल? कब से आवाज लगा रही हूं.’’

कोशी को लगा मानो चोरी करते जैसे पकड़ी गई हो. वह यह कह कर सफाई देती थी कि मां, पढ़ रही थी. ध्यान पढ़ाई में था, इसलिए सुनाई नहीं दिया.अप्रैल की 5 तारीख आ गई. शादी की तैयारियां और जोरशोर से चल ही रही थीं. कपड़े आभूषण आदि खरीद लिए गए. बरात के ठहरने का स्थान, खाना बनाने के लिए रसोइया, बिजली वाला, बैंडबाजा, दूल्हे के लिए बग्गी आदि सबकुछ अग्रिम दे कर तय कर दिए गए. डाक से भेजे जाने वाले विवाह के निमंत्रणपत्र पोस्ट किए जा चुके थे. स्थानीय निमंत्रणपत्र कुछ बंट चुके थे. कालेज की सहेलियां लगभग रोज ही मिलने आतीं. हंसीठिठोली खूब चलती. सहेलियों की हास्य और व्यंग्यभरी बातें उसे रोमांचित करतीं. उन की सलाह और सुझावों की उस पर बारिश हो रही थी.

आखिर विवाहबेला दरवाजा खटखटाने लगी. 12 अप्रैल हो गई थी. 14 को तो बरात आ जाएगी. 2 दिन ही तो बचे हैं. शादी के सपने बुनना जारी था. इन दिनों वह गाने कुछ ज्यादा ही गुनगुनाने लगी थी. शाम के लगभग 5 बजे थे. गाना गुनगुना रही थी, ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…’ एकाएक मोबाइल घनघना उठा. देखा, मीनाक्षी का फोन था.

‘‘कोशी, माफ करना एकडेढ़ महीना हो गया तुझ से बात ही नहीं हो पाई. सतीश की बूआ का अचानक देहांत हो गया था, इसलिए वहां जाना पड़ा. 4-5 दिन पहले ही पुणे पहुंचे हैं. तेरा काम भी तो करना था. तेरी होने वाली ससुराल की तलाश की. जानकारी निकाली. अब सोच रही हूं कि तुझे बताऊं कि नहीं. बताती हूं तो तुझे बहुत दुख होगा, नहीं बताती हूं तो तेरे साथ जो कुछ भी होगा उस के लिए मैं ही जिम्मेदार ठहराई जाऊंगी. शादी के 2 दिन ही बचे हैं, सुन कर तुझ पर क्या बीतेगी और तू क्या करेगी, यही सोच कर चिंतित हूं.’’

अप्रत्याशित आशंका से कोशी के रोंगटे खड़े हो गए. सांस रुकती सी लगी.

‘‘बता तो सही, क्या पता लगा है तुझे उन लोगों के बारे में? लगता है तू कुछ बहुत बुरा बताने वाली है, यह सोचसोच कर ही मेरा तो दिमाग सुन्न हुआ जा रहा है. जल्दी बता.’’

‘‘कोशी, समझ ले तेरी जिंदगी बरबाद होने जा रही है. ये बहुत झगड़ालू प्रवृत्ति के लोग हैं. महल्ले में अधिकांश परिवारों से इन की बातचीत ही नहीं है. बड़े भाई की शादी में दहेज कम मिला था, इसलिए 50 हजार रुपए की मांग करते हुए बहू को असहनीय यातनाएं दे रहे थे. तंग आ कर बिना बताए 3-4 महीने पहले वह पति को छोड़ कर बच्चे सहित अपने मायके चली गई. तलाक का केस चल रहा है. तुम्हारी होने वाली सास अनपढ़, लालची और झगड़ालू प्रकृति की महिला है. मनोज और बड़े भाई पवन के बीच आपस में बातचीत नहीं है. मनोज केवल दिखने में ही सुंदर है लेकिन अवगुणों और बुराइयों की टकसाल है. शायद ही कोई व्यसन ऐसा हो जो उस में न हो. शराब रोज पीता है.

‘‘उस के दोस्त नामीगिरामी बदमाश टाइप के हैं जो पीने के बाद महल्ले में ऊधम मचाते रहते हैं. कुछ दिन तेरे होने वाले महाशय जेल में रह चुके हैं. सालभर पहले इन्हीं आदतों के कारण उसे नौकरी से भी निकाल दिया गया. हां, एक बात और, वह एमबीए नहीं बीकौम है. यहां वह मार्केटिंग मैनेजर नहीं सेल्समैन था. अब हर जगह से दुत्कारा जा रहा है. हालफिलहाल बेरोजगार है.’’ये सब सुन कर कोशी पर तो जैसे आकाश ही टूट पड़ा. उस के कानों में आग सी लग गई, पूरे शरीर में सनसनी सी दौड़ गई.

मीनू हैलोहैलो करती रही लेकिन वह तो जैसे बहरी और गूंगी हो चुकी थी. उस की सारी इंद्रियां ही जैसे सो गई थीं. मस्तिष्क में उस के मानो बर्फ जम गई थी. पलभर में उसे लगा जैसे आसमान में उड़तेउड़ते उस के पंख किसी ने काट दिए हैं और वह बहुत तेजी से जमीन पर गिर कर खंडखंड हो कर बिखरने वाली है. उसे अपना अस्तित्व ही समाप्त होता सा लगा. मोबाइल बंद भी नहीं कर पाई और अचेत हो गई. होश आया तो मम्मीपापा सिरहाने खड़े थे. डाक्टर बुला लिया गया था. कुछ देर बाद वह ठीक हो गई. आंखें बंद कर अपने अंधकारमय भविष्य के बारे में सोचसोच कर वह कंपकंपा रही थी. स्वयं को वह असहाय सा महसूस करने लगी. मेरा क्या होगा? अब हो भी क्या सकता है? सारी तैयारियां तो हो चुकी हैं. शादी के निमंत्रणपत्र भी बंट चुके हैं. मांबाबूजी खुशी के झूले में झूल रहे हैं. सहेलियां विवाह समारोह के अवसर पर नियमित रूप से रोज ढोलक पर गाने, बजाने और फिल्मी गानों पर नाचनेगाने आ रही हैं.

मां ने चिंतित हो पूछा, ‘‘बेटा, क्या हो गया था तुझे?’’

‘‘कुछ नहीं, मम्मी, थोड़ा चक्कर आ गया था.’’

‘‘पहले तो ऐसा कभी हुआ नहीं, आज ऐसा क्यों हुआ, बेटा?’’ पिताजी ने भी चिंतित होते हुए पूछा.

‘‘बाबूजी, अब ठीक हूं.’’

लेकिन अंदर ही अंदर बरबाद होती जिंदगी सांयसांय कर रही थी. क्या करूं? किस से पूछूं. कैसे बचाऊं खुद को इस संकट से? कौन रास्ता दिखाएगा? शादी के निमंत्रणपत्र भी बंट चुके हैं. इनकार करती हूं तो मांबाबूजी पर क्या बीतेगी? समाज, रिश्तेदार, परिचित, महल्ले वाले, सहेलियां, कालेज के सहपाठी, कालेज के टीचर क्या सोचेंगे? कुछ भी तो तय नहीं कर पा रही थी वह. सोचतेसोचते रात गुजर गई. कल तो बरात आ जाएगी. कोशी यह सब सोच ही रही थी कि सुबहसुबह मीनाक्षी का फोन आ गया.

‘‘कोशी, क्या सोचा तू ने? कुछ किया कि नहीं? जानबूझ कर कुएं में धकेल रही है अपनेआप को. मैं कल पूरी रात सो नहीं पाई.’’

‘‘मीनू, मैं ही कहां सो पाई. तय ही नहीं कर पा रही हूं क्या करूं? इनकार अब कर नहीं सकती. यहां से भाग नहीं सकती. आत्महत्या करना नहीं चाहती. विवाह करने के बारे में सोच भी नहीं सकती. मीनू, मैं ऐसे चौराहे पर खड़ी हूं जिस के सारे रास्ते मेरी बरबादी के हालात बयां कर रहे हैं. तू ही बता, मैं क्या करूं?’’ बोलतेबोलते उस की आंखें भर आईं. शब्द उस के मुंह में लड़खड़ाने लगे.

‘‘देख कोशी, जो भी करना है तुझे ही करना है और जल्दी करना है. समय बहुत कम बचा है.’’ फोन रखने के बाद वह फिर से अंधेरे में छटपटाने लगी. अपने कमरे में जा लेटी और विभिन्न पहलुओं पर विचार करने लगी. कई विचार आए. लेकिन अंतिम निर्णय कर ही नहीं पाई. लेकिन यह जरूर तय कर लिया कि किसी भी हाल में खुद को बचाना है मुझे.

दूसरे दिन बरात आ गई. बैंडबाजों के बीच बराती नाचकूद रहे थे. महल्ले के मकानों की खिड़कियों से कई चेहरे बरात को देखते हुए हंस रहे थे. उन्हें कोशी के दूल्हे को देखने की उत्सुकता जो थी. बच्चे मस्ती करते हुए शोरगुल मचा रहे थे. मेहमानों के चेहरे खिलेखिले थे. लेकिन खुद कोशी के चेहरे पर खुशी और चमक गायब थी. मुख्यद्वार पर दूल्हे और बरात का स्वागत किया जा रहा था. दूल्हे को मंडप में लाया गया. पंडितजी ने आवाज लगाई, ‘‘दुलहन को लाइए.’’

वरमाला पहनाने की तैयारी पहले ही हो चुकी थी. उस के बाद सात फेरे होने थे. कोशी को अपने दिल की धड़कनें साफसाफ सुनाई दे रही थीं. कैसे अंजाम देगी अपने निर्णय को? कैसे बचा पाएगी खुद को?  पंडाल खुशी के वातावरण से लबरेज था. महिलाओं की ओर से हंसीठहाकों की आवाजें कुछ अधिक ही आ रही थीं. दूल्हेदुलहन को आमनेसामने खड़ा कर दिया गया. हाथों में वरमाला दे दी गई. कोशी को पहले वरमाला पहनानी थी. उस ने देखा, दूल्हे के बदमिजाज, दुबलेपतले मरियल से दोस्तों ने दूल्हे को पहले ही कंधों पर उठा लिया ताकि कोशी सरलता से हार न पहना सके. इस के साथ ही उन्होंने अपनी तुच्छ मानसिकता का परिचय देते हुए घटिया नारे लगाने शुरू कर दिए थे.

‘‘मनोज, संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं.’’

वह सोचने लगी, बेवकूफो, संघर्ष तो मुझे करना है, खुद को बचाने का. उस ने वरमाला पहनाने का कोई उपक्रम नहीं किया. आखिर कब तक उठा कर रखते. उस भारीभरकम शरीर को. थक गए. उतारना पड़ा. मंत्रोच्चार के बीच पंडितजी ने वरमाला पहनाने को कहा. वह गुमसुम खड़ी रही.

मां ने कान में कहा, ‘‘बेटा, दूल्हे को वरमाला पहना.’’

वह तब भी खड़ी रही. बरातियों और उपस्थित लोगों की उत्सुकता चरम पर थी. वरमाला पहनाते ही बैंड बजने के लिए तैयार था. आखिर कोशी वरमाला क्यों नहीं पहना रही है? इस बार बाबूजी बोले, ‘‘कोशी, हार पहनाओ, बेटा. मुहूर्त बीता जा रहा है.’’

उस ने एक क्षण के लिए मनोज की ओर देखा. आंखें मिलीं. उसे मनोज की आंखों में लाल डोरे तैरते दिखाई दिए. चेहरे पर वहशीपन. मुसकान कुटिल, जहरीली और व्यंग्यात्मक. उस के रोमरोम से गुस्सा उफनने लगा. उस की सूखी आंखों में जैसे आग भर आई थी. दूल्हे को लगा, शायद कोशी नाराज हो गई है, इसलिए उस ने अधखुली नशीली आंखों से, बेहद बेशर्मी से मुसकराते और घूरते हुए अपनी गरदन हार पहनाने के लिए एक हाथ सीने पर रखते हुए आगे झुका दी. फिर आंखें मिलीं. उस पल कोशी को वह इंसान बेहद शातिर और वीभत्स लगा.

कोशी को उस के वे वाक्य याद हो आए जो उस ने सगाई के अवसर पर अकेले में अत्यंत निम्न स्तर के शब्दों का प्रयोग करते हुए कहे थे :

‘अरे भाई, हमारी कोई सालीवाली है कि नहीं? हंसीमजाक और मन बहलाने के लिए बहुत जरूरी होती है साली. वैसे भी कहते हैं साली आधी घरवाली होती है.’ उस समय तो उस ने हंस कर टाल दिया था लेकिन आज याद कर उस का क्रोध उफनने लगा. वह अंदर तक झनझना उठी. उस के भीतर ही भीतर अस्फुट सा आर्तनाद गूंज उठा. एक पल के शतांश में उस ने साहस जुटाया और अनायास एक ऐसे अप्रत्याशित काम को अंजाम दे डाला जिस की उम्मीद किसी को भी न थी. उसे खुद को भी नहीं. एक ही झटके में वरमाला तोड़मरोड़ कर दूल्हे के मुंह पर मारते हुए वह जोर से चीखी, ‘‘मुझे नहीं करनी शादी तुझ से.’’

सभी अवाक्. हंसते चेहरे बुझ से गए. हौल में सन्नाटा पसर गया. बौखलाहटों का तूफान सब पर टूट पड़ा.

‘‘कोशी क्या कह रही है तू? दिमाग तो ठीक है तेरा? पागल तो नहीं हो गई है तू?’’ मां चिल्लाईं.

‘‘मां, न तो मेरा दिमाग खराब है और न मैं पागल हूं. इन लोगों के बारे में कैसी खोजबीन की आप लोगों ने? इस का पूरा परिवार झूठा, मक्कार, झगड़ालू, लालची और असंस्कारित है. ये महाशय बहुत बड़े नशेबाज हैं. शराब रोज पीते हैं. अभी भी ये पी कर आए हैं. ये जेल भी जा चुके हैं. ये एमबीए नहीं, केवल बीकौम हैं और पुणे में मार्केटिंग मैनेजर नहीं सेल्समैन थे. हालफिलहाल बेरोजगार हैं. इन लोगों ने सबकुछ झूठ बताया आप लोगों को और आप ने विश्वास भी कर लिया,’’ फिर मनोज की ओर मुड़ कर उस से पूछा, ‘‘बोल, क्या मैं झूठ कह रही हूं?’’

मनोज सिर झुकाए खड़ा रहा. मुंह में मानो बर्फ जम गई थी उस के. एक शब्द भी उस के मुंह से नहीं निकला.

कोशी मम्मी की ओर मुड़ कर बोली, ‘‘मम्मी, इस आदमी से शादी करने के बजाय मैं मर जाना ठीक समझूंगी,’’ फिर मनोज की ओर मुड़ी और दीर्घश्वास ले कर आग बरसाती आंखों से उसे संबोधित कर चीखी, ‘‘निकल यहां से. नहीं करनी तुझ से शादी. दहेज में मुंह फाड़फाड़ कर जो मांगा और जो लिया, 7 दिनों में लौटा देना,’’ कह कर दौड़ते हुए अपने कमरे में बिस्तर पर जा गिरी. बाहर तूतू मैंमैं शुरू हो चुकी थी.

बरातियों में से कोई बाबूजी को कह रहा था, ‘‘ये आप ने ठीक नहीं किया, प्रमोदजी. बहुत बेइज्जती की है आप ने हमारी.’’

प्रत्युत्तर में प्रमोदजी बोले, ‘‘मैं क्या कर सकता हूं नरेशजी, लड़की बालिग है, पढ़ीलिखी है. वह जब शादी नहीं करना चाहती तो मारपीट कर जबरन तो मंडप में नहीं बैठाया जा सकता न? वैसे मुझे भी लड़की की बातें सही लग रही हैं. बताइए, जो भी उस ने कहा, क्या वह गलत है? आप लोगों ने कितना बड़ा झूठ बोला हम से और हम ने आप पर विश्वास भी कर लिया. बेइज्जती हम ने नहीं, आप लोगों ने की है हमारी. वह तो मेरी बेटी बहादुर है जो उस ने इनकार करते हुए खुद को बचा लिया. आप के लिए यही ठीक होगा कि आप लोग चुपचाप लौट जाएं. यह शादी नहीं हो सकती.’’

सुन कर सब के सिर झुक गए. बरातियों में से कोई एक शब्द तक नहीं बोल पाया. मानो गूंगे हो गए थे वे लोग. बोलने के लिए उन लोगों के पास कुछ था भी नहीं. किस मुंह से बोलते और क्या बोलते. आमंत्रित लोगों के बीच खुसुरफुसुर की आवाजें बढ़ने लगीं. पिताजी और मां सब से हाथ जोड़ कर असुविधा के लिए क्षमा मांगते हुए लौट जाने का अनुरोध कर रहे थे. कोशी कमरे में सुबक रही थी लेकिन खुश थी कि उस ने अपने साहसिक फैसले के बलबूते खुद को बरबाद होने से बचा लिया था.

सामान्य होते ही आंसू पोंछे और तुरंत मीनाक्षी को फोन लगाया, ‘‘हैलो, मीनू, मैं बोल रही हूं, कोशी. आभारी हूं तेरी. मीनू, कुएं की मुंडेर पर खड़ी हो भी गई थी मैं लेकिन कुएं में गिरने से पहले बचा लिया अपनेआप को,’’ कुछ रुक कर पूछा, ‘‘तुझे खुशी हुई न?’’

‘‘बहुत. लेकिन कोशी, इतनी जल्दी कैसे किया यह सब तू ने?’’

‘‘फुरसत में बताऊंगी सबकुछ.’’

बाहर दालान में वातावरण बोझिल था जबकि भीतर कमरे में कोशी की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ने के पहले की खामोशी थी लेकिन उस के भीतर का रेशारेशा खुशी से झूम रहा था.

किताबों के बाजार में विवादों पर टिके अंगरेजी बैस्टसैलर्स

पूर्व कांगे्रसी और गांधी परिवार के करीबी नेता नटवर सिंह की आत्मकथा की शक्ल में आई किताब ‘वन लाइफ इज नौट एनफ’ औपचारिक तौर पर रिलीज भी नहीं हुई थी फिर भी किताब की 50 हजार प्रतियां बुक हो चुकी थीं. ऐसा भी नहीं था कि नटवर सिंह बहुत बड़े साहित्यकार या बैस्टसैलर हों. बावजूद इस के उन की इस किताब की डिमांड समकालीन लेखकों को काफी पीछे छोड़ गई. कुछ इसी अंदाज में पिछले दिनों क्रिकेटर और भारतरत्न सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के साथ हुआ. ‘प्लेइंग इट माइ वे’ नाम की उन की किताब औपचारिक तौर पर बाजार में आने से पहले अपने कुछ अंशों, जिन्हें प्रकाशक कंपनी ने लीक किया था, के चलते न सिर्फ चर्चा में आई बल्कि रातोंरात उस की प्रीबुकिंग भी बढ़ी.

ऐसा ही कुछ पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की किताब ‘जिन्ना : इंडिया पार्टिशन इंडिपैंडेंस’ के साथ हुआ. उन्हें इस किताब के लिए भले ही अपनी ही पार्टी की आलोचना झेलनी पड़ी हो, लेकिन किताब के कुछ अंशों को विवादित बना कर इस की 3 सप्ताह में ही करीब 49 हजार प्रतियां बिक गई थीं, जिन में 13 हजार प्रतियां अकेले पाकिस्तान में बिकी थीं. इसी तरह कुलदीप नैयर की विवादित किताब ‘बियौंड द लाइन्स’ की भी 1 माह से कम समय में 20 हजार से अधिक प्रतियां बिकी थीं. दरअसल, इन तमाम किताबों की जोरदार बिक्री व चर्चा के पीछे जिस रसायन ने उत्प्रेरक का काम किया वह था कंट्रोवर्सी पैदा करना. इन किताबों की तरह, यह फार्मूला इस से पहले कई प्रकाशक कंपनियां अपना चुकी हैं और हर बार उन का तीर निशाने पर लगा है. सचिन ने जहां अपनी किताब में तत्कालीन भारतीय क्रिकेट टीम के कोच गे्रग चैपल के सौरभ गांगुली जैसे सीनियर प्लेयर के अपमान, राहुल द्रविड़ की कप्तानी पर नजर, मंकी गेट विवाद और टीम को तोड़ने जैसे खुलासे किए तो वहीं नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के पीएम न बनने के फैसले पर खुलासा कर हंगामा मचा दिया.

यही हंगामा हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द ऐक्सीडैंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर मचा, जब संजय बारू ने किताब में मनमोहन सिंह को कमजोर पीएम और सोनिया गांधी को ताकतवर बताया. स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की एक किताब ‘द रैड साड़ी’ (एल सारी रोजो) भी ऐसी ही किताब थी. सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित इस किताब में दावा किया गया था कि राजीव गांधी की मौत ने सोनिया को झकझोर कर रख दिया और उस के बाद ही वे सबकुछ समेट कर वापस अपने मुल्क जाने की सोचने लगीं.

भारत में आने से पहले ही विवादों में घिर गई किताबों में स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब ‘द रैड साड़ी’, रिकी पोंटिंग की आत्मकथा ‘पोंटिंग ऐट द क्लोज औफ प्ले’, मैथ्यू हेडन की ‘स्टैंडिंग माया ग्राउंड’, डोनिगर की पुस्तक ‘द हिंदूज : ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’, तसलीमा नसरीन की आत्मकथा ‘निर्वासन का बुधवार’ और भारतीय मूल के कनाडाई लेखक रोहिन्टन मिस्त्री की किताब ‘सच ए लौंग जर्नी’ के नाम लिए जा सकते हैं. इन सभी किताबों ने बाजार में आने से पहले विवादों की पब्लिसिटी चखी और खासी बिक्री की.

मार्केटिंग और प्लानिंग का खेल

जैसे टीवी को टीआरपी और फिल्मों को बौक्स औफिस के पैमाने पर तौला जाता है वैसे ही किताबों की दुनिया में बैस्टसैलर नाम के टर्म ने मार्केटिंग रूपी सांड को खुला छोड़ दिया है. किताब अच्छी हो या बुरी, उसे बेचने के लिए हर तरह की रणनीति बनाई जाती है. मसलन, संबंधित धर्म की आड़ ले कर. सारा ध्येय सिर्फ किताब की बिक्री को बढ़ाने को ले कर होता है. यहां नैतिकता की कोई जगह नहीं होती. यही वजह है आज लेखक किताब लिखने से पहले प्रकाशक फर्म से ले कर पब्लिक रिलेशन के दफ्तरों के चक्कर लगाता है, फिर उन के बनाए मार्केटिंग प्लान्स के आधार पर लिखता है. कई बार तो ये फर्में लिखीलिखाई किताब में अपने हिसाब से काटछांट तक कर देती हैं.

अगर किसी बड़ी शख्सीयत ने अपनी जिंदगी की किताब लिखी है तो उस के विवादित अंशों को सब से पहले जारी किया जाता है. इस से नए पाठक तो मिलते ही हैं, विवाद को सुर्खियां बना कर किताब की बिक्री को भी बढ़ा लिया जाता है. प्रकाशक को फायदा होता है वह अलग. पहले जब नई किताब बाजार में आनी होती थी तो रिलीज के वक्त तक गुप्त रखी जाती थी. तब लेखक की प्रतिभा और बाजार में उस की साहित्यिक छवि के मुताबिक अमुक किताब बिकती थी. प्रचार के नाम पर पाठकों के बीच साहित्य के गलियारों में पोस्टरबाजी हो जाती थी. अब किताबों के बाजार में मार्केटिंग का खेल शुरू हो गया है जिस की किताब पर जितना हंगामा, वही बैस्टसैलर्स बन जाता है.

क्रिकेटरों की कंट्रोवर्सी

सचिन तेंदुलकर की किताब को ले कर कई लोगों का मत है कि उन्होंने रिटायरमैंट के बाद इसे बेचने के लिए वे खुलासे किए जो उन्हें पहले करने चाहिए थे. उन की इस कवायद को पब्लिसिटी स्टंट मानते हुए आस्ट्रेलिया में फौक्स स्पोर्ट्स पर छपे लेख में रौबर्ट क्रेडौक ने सचिन को खुदगर्ज और ‘पौलिटिकल एनिमल’ कह डाला. हालांकि इस तरह की आलोचना किताब की डिमांड बढ़ा ही रही है. इस से पहले भी कई क्रिकेटरों ने किताबें लिखीं और कंट्रोवर्सी का तड़का लगाया. जहां इंगलैंड क्रिकेटर केविन पीटरसन की आत्मकथा में पूर्व कोच और खिलाडि़यों पर बदसलूकी का आरोप लगा वहीं आस्टे्रलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग ने अपनी आत्मकथा में मंकी गेट विवाद पर बीसीसीआई और भारतीय टीम की आलोचना की. शोएब अख्तर ने अपनी आत्मकथा में पाक क्रिकेट की पोल खोली तो हर्शल गिब्स ने अपनी किताब ‘टू द पौइंट’ में सीनियरों पर गुटबाजी के आरोप से ले कर टीम होटल में लड़कियों के बेरोकटोक आने की कहानी लिखी. मैथ्यू हेडन ने आत्मकथा के जरिए बताया कि कैसे स्लेजिंग आस्ट्रेलिया क्रिकेट का एक बड़ा हिस्सा रहा है. आस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एडम गिलक्रिस्ट ने ‘ट्रू कलर्स’ में लिखा कि सचिन तेंदुलकर में खेलभावना की कमी है. जौन राइट ने ‘इंडियन समर्स’ नाम की किताब में इंडियन टीम के ड्रैसिंगरूम की कई बातें जगजाहिर कर दीं.

धार्मिक विवाद बेचती किताबें

सिर्फ खेल के मैदान के खिलाड़ी ही किताबों को विवादों में लपेट कर नहीं बेच रहे हैं बल्कि राजनेता भी अपने आखिरी दिनों में अपने अनुभव का इस्तेमाल कर सियासी राज खोल कर बैस्टसैलर बन जाते हैं. संजय बारू ने ‘द ऐक्सीडैंटल प्राइम

मिनिस्टर’ उस वक्त लिखी जब वे मनमोहन सिंह के बेहद करीब थे. जाहिर है, उन्होंने काफी कुछ देखा होगा. स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब ‘द रैड साड़ी’ के लेखक को कांगे्रस की तरफ से कानूनी नोटिस भेजा गया है. विवादों ने इसे भी बाजार में गरम कर दिया. लिहाजा, किताब का इतालवी, फ्रैंच और डच भाषा में अनुवाद भी हुआ. यह किताब अंतर्राष्ट्रीय बैस्टसैलर का मुकाम हासिल कर रही है.

इसी तरह पेंगुइन द्वारा प्रकाशित डोनिगर की पुस्तक ‘द हिंदूज : ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ भी ऐसे ही विवादों के चलते सुर्खियों में रही. बीच में ज्यादा विरोध होता देख इस का कवरपेज बदल दिया गया. गौरतलब है कि शिक्षा बचाओ आंदोलन संगठन ने इस किताब पर हिंदू भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था. बाद में दोनों ने अदालत के बाहर समझौता कर लिया था. मामला मुनाफे को ले कर था, लिहाजा सब शांत हो गए.

विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन तो धर्म और पोंगापंथियों की पोल खोल कर सब से विवादित लेखिका बन गईं. उन की लिखी ‘लज्जा’ दुनियाभर में मशहूर हुई और उस ने उन का कद बढ़ाया. पिछले दिनों उन की आत्मकथा ‘निर्वासन का बुधवार’ भी इसी तरह विवादों से घिरी और नतीजा देखिए कि विवादों के बीच विमोचन होने के बाद इस की बिक्री आसमान छू रही है. भारतीय मूल के कनाडाई लेखक रोहिन्टन मिस्त्री की किताब ‘सच ए लौंग जर्नी’ भी ऐसी ही किताब रही. इस मसले पर नटवर सिंह कह चुके हैं कि आलोचनाओं से उन की किताब को काफी फायदा मिला.

प्रचार और विदेशी रुझान

सूचना और प्रौद्योगिकी के आगमन से देश में सिर्फ स्मार्टफोन, कंप्यूटर और डिजिटल मीडिया ही पैदा नहीं हुआ बल्कि इस ने जंग लग चुके किताबों के बाजार को भी औनलाइन प्लेटफौर्म में ला कर उसे जिंदा कर दिया है. आज कोई भी किताब लेने के लिए बुक स्टाल जाना नहीं पड़ता बल्कि औनलाइन बाजार में कोई भी किताब और्डर कीजिए और घर बैठे पढि़ए. इस का एक फायदा यह भी है कि पहले यदि किसी किताब पर बैन के चलते उसे पढ़ना मुश्किल होता था तो अब बैन होने पर भी पाठक औनलाइन उन्हें पढ़ सकते हैं.

मैडबुक्स डौट कौम, सैकंडहैंड बुक्स इंडिया डौट कौम, इन्फीबीम डौट कौम, बुक अड्डा डौट कौम और फ्लिप्कार्ट, अमेजन जैसी न जाने कितनी वैबसाइटें सस्ते दामों पर देशविदेश की किताबें मुहैया कराती हैं. देश के बड़े पब्लिशर्स, किताब के बाजार में आने से पहले औनलाइन बुकिंग और बिक्री शुरू कर देते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, भारत में किताबों का कारोबार करीब 2 अरब डौलर का है जो करीब 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. इस पूरे उद्योग में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा पुरानी किताबों का होता है. एक आंकड़े के मुताबिक, अमेरिका में वर्ष 2008 में 24.3 अरब डौलर और ब्रिटेन में 3 अरब पाउंड मूल्य की किताबों की बिक्री हुई लेकिन वर्ष 2007 की तुलना में यह क्रमश: 6 और 2.5 फीसदी कम थी, जबकि बीते सालों में भारत के पुस्तक बाजार में उत्साहजनक वृद्धि हुई है.

इंगलिशविंगलिश की डिमांड

भारत की राष्ट्रभाषा भले ही हिंदी हो लेकिन यहां के लिटरेचर बाजार में अंगरेजी की किताबों और लेखकों का ही बोलबाला है, फिर चाहे वे भारतीय लेखक हों या विदेशी. अंगरेजी भाषा की किताब ही बिक्री में अव्वल रहती हैं. चेतन भगत, सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन, शोभा डे, किरण मेहता जैसे नाम अंगरेजी नौवेल्स के दम पर खास मुकाम पा चुके हैं. इस के पीछे के कारणों की बात करें तो पहली वजह, भारतीयों का अंगरेजी के प्रति बढ़ता रुझान है और दूसरी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का व्यावसायिक कारणों से भारतीय बाजार में पुस्तकों के प्रकाशन और विक्रय में रुचि लेना है.

यूके ट्रेड ऐंड इन्वैस्टमैंट के शोधकर्ताओं द्वारा लंदन बुक फेयर में किए गए शोध के मुताबिक, पब्लिशर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि वर्ष 2007 में भारत में पुस्तक बाजार लगभग 1.25 अरब मूल्य का था जिस में आधे से अधिक अंगरेजी पुस्तकों का था. किताबों के बढ़ते बाजार में फिल्में भी अहम भूमिका निभा रही हैं. आएदिन किसी न किसी किताब पर आधारित फिल्म रिलीज हो ही जाती है. अंगरेजी फिल्मों में लगभग हर दूसरी फिल्म किसी किताब पर आधारित होती है, जैसे ‘लाइफ औफ पाई’, हैरी पौटर’, ‘लौर्ड औफ द रिंग्स’ आदि. इन फिल्मों के रिलीज होते ही मूल किताबों की बिक्री में जबरदस्त उछाल देखा गया था.

अगर हिंदी फिल्मों की बात करें तो चेतन भगत अंगरेजी के ऐेसे लेखक हैं जिन के लगभग सभी उपन्यासों पर या तो फिल्में बन चुकी हैं या बन रही हैं. जैसे ही इन के किसी नौवेल पर फिल्म बनने की खबर आती है, उस की बिक्री एकदम से बढ़ जाती है, फिर चाहे वह ‘फाइव पौइंट समवन’, ‘थ्री मिस्टेक्स औफ माई लाइफ’, ‘टू स्टेट्स’ और ‘वन नाइट इन कौलसैंटर’ हो या हालिया रिलीज ‘हाफ गर्लफ्रैंड’ हो, सब बैस्टसैलर्स हैं. भारत इस समय एक बड़ा बाजार है जहां बहुराष्ट्रीय प्रकाशक कंपनियां पुस्तकों के प्रकाशन और विक्रय में रुचि ले रही हैं. इस कारण भारत में प्रकाशन अब एक बहुत बड़ा व्यवसाय बन गया है.

लिहाजा, प्रकाशक हर पुस्तक को बैस्टसैलर बनाने के साम, दाम, दंड, भेद सभी तरीके अपनाने से गुरेज नहीं करते. इस के लिए भले ही किसी की छवि खराब की जाए, पोल खोली जाए, धार्मिक विवादों को हवा दी जाए या फिर गड़े मुरदे उखाड़े जाएं. ‘जो दिखता है वह बिकता है’ की बाजारू मानसिकता यहां भी काम कर रही है.

बेखबर न रहें औरत समझ कर

दीवाली का समय था. लखनऊ के भूतनाथ बाजार की हर दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगी थी. सेल्समैन हर ग्राहक को बड़ी लालसाभरी नजरों से देख रहा था. उसे उम्मीद थी कि हर ग्राहक कुछ न कुछ खरीदारी जरूर करेगा, जिस से न केवल दुकानदारी होगी बल्कि उसे भी ज्यादा कमीशन मिलेगा. तभी एक ज्वैलरी शौप में 3 महिलाएं दाखिल होती हैं. तीनों महिलाएं पहाड़ी वेशभूषा में हैं. सिर पर टोपी भी लगा रखी है. आमतौर पर धारणा होती है कि पहाड़ी लोग मेहनती और ईमानदार होते हैं. ऐसे में उन पर शंका की गुंजाइश कम होती है. तीनों महिलाएं सोने के जेवर देखने लगीं. कई तरह के जेवर देखे. मोलतोल किया. कुछ देर बाद जेवर पसंद न आने की बात कह कर वे दुकान से बाहर चली गईं.

जेवर दिखाने वाले सेल्समैन ने जब अपने जेवर रखने शुरू किए तो उसे पता चला कि 2 जोड़ी कंगन यानी 4 कंगन गायब हो चुके थे. सेल्समैन उन तीनों महिलाओं के झांसे में आ चुका था. मामला पुलिस तक गया. पुलिस की जांच में दुकान में लगे सीसीटीवी फुटेज में पाया गया कि कंगन उन महिलाओं ने ही चोरी किए थे. कुछ समय पहले इसी तरह एक ज्वैलरी शौप में एक लड़का और एक लड़की आए. सोने की चेन खरीदने की बात की. सेल्समैन ने सोने की चेन दिखानी शुरू की. लड़की ने मुसलिमों वाला बुरका पहन रखा था. कई तरह के जेवर देखने के बाद उन लोगों ने 10 हजार रुपए की एक चेन खरीदी और चले गए. सेल्समैन को उस समय तक कुछ पता ही नहीं चल पाया था. बुरका पहने उस लड़की ने सोने के तमाम जेवर अपने पास रख लिए थे. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज को देख कर उस को पकड़ा. लड़की लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले की रहने वाली थी. उस का नाम ज्योति था. वह अपने प्रेमी के साथ मुंबई भाग गई थी. मुंबई जा कर जब पैसों की जरूरत महसूस हुई तो उस ने अपने प्रेमी के साथ इस तरह की घटनाएं करनी शुरू कीं. वह अपनी वेशभूषा बदलबदल कर अलगअलग शहरों में ऐसी घटनाओं को अंजाम देने लगी.

सोच का लाभ उठाने की कोशिश

अपराध की दुनिया में छोटीबड़ी तमाम तरह की ऐसी घटनाएं घटने लगी हैं जिन में महिलाएं शामिल होती हैं. ऐसे में जरूरी है कि महिला समझ कर बेखबर न रहें. महिलाएं भी वैसे ही अपराध की घटनाओं को अंजाम दे सकती हैं जैसे कोई दूसरा अपराधी देता है. दरअसल, महिलाओं को ले कर एक सोच बनी हुई है कि वे गलत काम नहीं कर सकतीं, क्रूर नहीं हो सकतीं और आपराधिक घटनाओं में हिस्सेदारी नहीं कर सकतीं. ऐसे तमाम मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘‘महिलाएं अगर काम करने की ठान लें तो वे अपराध की हर गतिविधि में शामिल हो सकती हैं. महिला अपराधियों से घटना की सचाई कुबूल करवा पाना ज्यादा कठिन होता है. वे अपनी मार्मिक बातों के साथ ही साथ आंसुओं से भी जांच की दिशा को भटकाने का काम करती हैं. महिलाओं के प्रति समाज में जो सोच बनी है उस का वे लाभ लेने की कोशिश करती हैं.’’

बात केवल साधारण चोरी और धोखा देने की नहीं है. हत्या, अपहरण और देहधंधा चलाने जैसे गंभीर अपराधों में भी महिलाओं की भूमिका दिखती रही है. खासकर अवैध संबंधों के खुलने पर जिस तरह से वे आक्रामक  हो कर अपराध करती हैं, यह सोचने की बात है. 

न रहें बेखबर

औरत अपराध नहीं कर सकती, यह धारणा बनानी गलत है. जिस तरह से समाज की सोच और नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है, उस का प्रभाव महिलाओं पर भी पड़ रहा है. गुस्से और जरूरत के चलते वे भी अपराध की दलदल में धंसती जा रही हैं. ऐसे में इन से बेखबर रहने की जरूरत नहीं है. समाजशास्त्री डा. प्रभावती राय कहती हैं, ‘‘महिलाएं जब तरक्की की राह में आगे बढ़ रही हैं तो दुनियाभर की बुराइयां भी उन में आने लगी हैं. वे पहले जैसी संवेदनशील सोच से बाहर निकल रही हैं. वे वैसे ही अपराध कर रही हैं जैसे कोई पुरुष करता है. अपराध करने वाले इंसान की सोच एक जैसी ही होती है, उस में आदमी और औरत का फर्क खत्म हो चला है.’’

महिला अपराधों पर अध्ययन करने वाली वकील कीर्ति जायसवाल कहती हैं, ‘‘कई बार तो अपराध का ग्लैमर भी महिलाओं को लुभाता है. दूसरे, अब महिलाओं की जरूरतें भी बढ़ गई हैं. चोरी, लूट और धोखाधड़ी जैसे अपराधों में तो ज्यादातर महिलाएं पुरुषों के कहने पर ही आती हैं. पुरुष अपराधी महिलाओं की छवि का लाभ उठाने के लिए उन को आगे कर देते हैं जिस से उन का काम करना सरल हो जाए. महिलाएं शुरुआत में थोड़े से लालच में इस तरह के काम करने लगती हैं. लेकिन एक बार अपराध की दलदल में फंसने के बाद वे इस से दूर नहीं जा पाती हैं और  अपराधियों का मोहरा बन कर रह जाती हैं.’’

कीर्ति बताती है, ‘‘हम ने कई ऐसे मामले भी देखे हैं जहां महिलाएं शातिर अपराधियों की तिकड़म का शिकार हो जाती हैं. उन को जबरन अपराध में फंसा दिया जाता है. यह बात सच है कि अपराध में औरतों की भूमिका बढ़ती जा रही है. यह समाज के लिए सोचने की बात है.’’

बचना सरल नहीं

अपराध करने से पहले औरतों को यह लगता है कि वे अपराध कर के बच सकती हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं है. जिस तरह से पुलिस की जांच से ले कर मीडिया की रिपोर्ट तक में महिला अपराधी होने पर मामला बढ़ जाता है. महिला अपराधी के शामिल होने से घटना पर मीडिया का रुख अलग ही हो जाता है. उस घटना को स्पैशल दरजा हासिल हो जाता है. जिस से पुलिस पर दबाव पड़ता है और उसे घटना की तहकीकात जल्द से जल्द करनी होती है. यह बात ठीक है कि कुछ अपराधों में यदि महिला की उम्र कम है तो उस की पहचान को छिपाने की कोशिश मीडिया द्वारा की जाती है लेकिन उस के बाद भी महिला अपराधी के शामिल होने से घटना को ज्यादा कवरेज मिलने लगती है.

इसलिए अब यह नहीं सोचना चाहिए कि औरत होने का लाभ मिल सकेगा. महिलाओं को ऐसे अपराधों में शामिल होने से बचने की कोशिश करनी चाहिए. अपराध में शामिल होने से अपराधी के परिवार को तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. अगर अपराधी महिला हो तो ये मुश्किलें और बढ़ जाती हैं. इस से न केवल उस को बल्कि उस के घर वालों को भी समाज के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है. आज भी समाज में पुरुषप्रधान सोच है. यहां पर औरत के अपराध करने को अलग नजर से देखा जाता है. उस की अलग आलोचना होती है. औरत की आलोचना करते समय उस के घरपरिवार और बच्चों को भी शामिल कर लिया जाता है. महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील होती हैं इसलिए उन को अपराध के लिए सरलता से उकसाया जा सकता है. जरूरी है कि महिलाएं किसी भी तरह की आपराधिक घटना में पड़ने से पहले अपने घरपरिवार, बच्चों और खुद के बारे में जरूर सोचें. अपराध कर के बचना सरल नहीं है.

समाज में होती बेइज्जती

महिलाओं के अपराधी होने से समाज में घरपरिवार की इज्जत को बहुत नुकसान होता है. उन को सही निगाह से नहीं देखा जाता. थानाकचहरी और अस्पताल में जब जांच और पूछताछ के नाम पर महिलाओं को पेश किया जाता है तो उन को गिरी हुई नजर से देखा जाता है. महिलाओं के करीबी से करीबी दोस्त तक उन से पल्ला झाड़ने लगते हैं. बहुत मजबूरी में घर के लोग ही उन का साथ देते हैं. ऐसी महिलाओं को कचहरी से जेल और अस्पताल लाने, ले जाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली महिला सिपाही दुर्गेश कुमारी कहती हैं, ‘‘जेल में पहले से बंद महिला अपराधी नई आने वाली महिला अपराधी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती है. जब उन को कचहरी में पेश किया जाता है तो वहां वकील से ले कर दूसरे लोग भी ऐसी महिलाओं को अच्छी नजरों से नहीं देखते हैं.’’पुलिस के एक अधिकारी कहते हैं ‘‘हत्या के एक मामले में जांच करते समय हम ने महिला आरोपी के परिवार वालों को भी बुलाया था. उन के  सामने महिला आरोपी ने अपना अपराध कुबूल किया. जिस समय महिला अपराधी ने अपराध कुबूल किया, उस के घर वाले बाहर टीवी पर देख रहे थे. वे रोने लगे. महिला आरोपी के परिवार की महिलाएं तो उसे बुराभला भी कहने लगी थीं. ऐसे में अगर बाद में महिला आरोप से मुक्त भी हो जाए तो भी उस की सचाई को कोई महसूस नहीं करता.’’  

महिला के अपराध में शामिल होने का सब से बड़ा प्रभाव उस के बच्चों पर पड़ता है. वे घरपरिवार, गलीमहल्ले से ले कर स्कूल तक में अलगथलग पड़ जाते हैं. एक ऐसे ही बच्चे ने मां के जेल जाने के बाद स्कूल जाना बंद कर दिया. उस के घर वालों ने उसे बहुत समझाया. इस के बाद भी वह स्कूल नहीं गया. उस ने कहा, ‘मुझे स्कूल के सभी बच्चे चिढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि मेरी मां ने अपराध किया है.’ बहुत प्रयासों के बाद भी जब यह बच्चा स्कूल नहीं गया तो उस की एक साल की पढ़ाई खराब हो गई. अगले साल उस का ऐडमिशन दूसरे शहर के स्कूल में कराया गया. इस के बाद भी वह बच्चा हमेशा गुमसुम सा रहता और दूसरे बच्चों के बीच जाने से बचता रहता.

एक स्कूल की पिं्रसिपल कहती हैं, ‘‘हमें ऐसे बच्चों को संभालने में बड़ा प्रयास करने की जरूरत होती है. बच्चे मां के सब से करीब होते हैं. इस कारण से उन पर मां के कामकाज का सब से अधिक प्रभाव पड़ता है. देश की कानून व्यवस्था ऐसी है कि जिस में न्याय देर से होता है. ऐसे में अगर महिला अपराध से मुक्त भी हो जाए तो उस के खोए हुए मानसम्मान को वापस नहीं लौटाया जा सकता है. मीडिया और दूसरी जगहों पर उन खबरों को जगह कम ही दी जाती है जिन में महिला अपराध से मुक्त हो जाती हैं. ऐसे में समाज को सच का पता ही नहीं चल पाता है.’

महिलाओं को अपराध से खुद को अलग रखना चाहिए.  किसी के बहकावे और षड्यंत्र में शामिल नहीं होना चाहिए. महिलाओं के अपराध में शामिल होने से केवल उन का भविष्य ही खराब नहीं होता, उन के  घरपरिवार और बच्चोंका भविष्य भी प्रभावित होता है. ऐसे में जरूरी है कि  महिलाएं खुद ही अपराधों से दूर रहें ताकि उन का जीवन सुखमय रहे, घरपरिवार का मानसम्मान बना रहे और बच्चों का भविष्य उज्ज्वल रहे, साथ ही समाज व वातावरण भी खुशनुमा बना रहे.

नसबंदी मामला जानलेवा औपरेशन

नसबंदी का औपरेशन अब केवल गरीब लोग कराते हैं इसलिए यह अभियान भी उन्हीं के इर्दगिर्द सिमट कर रह गया है. कंडोम और गर्भ निरोधक गोलियों के चमचमाते इश्तिहार, नई तकनीकें और सुविधाएं उन ग्राहकों के लिए रह गए हैं जिन की जेब में पैसा है, वे इन्हें खरीदते भी हैं. मुख्यधारा से कटे गरीबों के हिस्से में हमेशा ही सरकारी सेवाएं आती हैं जिन की घटिया क्वालिटी किसी सुबूत की मुहताज नहीं.

जागरूक वर्ग को परिवार नियोजन की महत्ता के साथसाथ यह भी मालूम है कि इसे कब और कैसे अपनाया जाना है. यह 25 फीसदी वर्ग सरकारी अभियानों से काफी दूर है. उलट इस के, 75 फीसदी लोग, जिन्हें परिवार सीमित रखने में पैसा आड़े आता है, पूरी तरह सरकार पर निर्भर हैं. यह वर्ग भी छोटे परिवार की अहमियत को जानतासमझता है लेकिन अस्थायी तरीके नहीं अपना पाता. एक तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो न तो परिवार नियोजन की अहमियत समझते हैं और न ही जरूरत. लिहाजा, बच्चे पैदा करने में वे हिचकिचाते नहीं हैं. इस वर्ग, जो कुल आबादी का तकरीबन 40 फीसदी है, को थाम पाना दुष्कर काम है.

इस वर्ग को बेहतर जिंदगी मिले और परिवार नियोजन भी लोग अपनाते रहें, इस बाबत सरकार ने नसबंदी औपरेशनों का जो लक्ष्य तय कर रखा है उसे पूरा कर पाना आसान काम कहीं से नहीं लगता. देश की बहुसंख्यक आबादी दूरदराज के इलाकों में रहती है जहां पहुंच कर लोगों को जागरूक करना, समझा पाना बेहद खर्चीला काम है. इसलिए अघोषित तौर पर सरकार ने यह तय कर लिया है कि जैसे भी हो, नसबंदी के ज्यादा से ज्यादा औपरेशन किए जाएं. चिंताजनक बात परिवार नियोजन और नसबंदी में फर्क खत्म हो जाना है.

प्रदेशों से ले कर ग्राम पंचायतों तक का लक्ष्य तय है कि चालू वर्ष में इतने औपरेशन होने ही हैं. इस लक्ष्य से कोई समझौता सरकार नहीं करती. अरबों रुपए नसबंदी शिविरों पर सालाना खर्च किए जाते हैं और जो राज्य, जिला या पंचायत अपना लक्ष्य पूरा कर लेते हैं उन की पीठ भी सार्वजनिक रूप से थपथपाई जाती है. जो कर्मचारी और सर्जन अपना कोटा वक्त रहते पूरा कर लेते हैं उन्हें सम्मानित तो किया ही जाता है, इनाम भी दिया जाता है. अब यह मान लिया गया है कि पढ़ालिखा मध्यवर्ग तो परिवार नियोजन के अस्थायी साधनों को अपनाते हुए 1 या 2 बच्चे ही पैदा करेगा लेकिन गांवदेहातों, जहां निम्न और उस से भी नीचे का वर्ग रहता है, में जागरूकता के अभाव में इकलौता रास्ता नसबंदी का औपरेशन है. बात सच भी है इसलिए नसबंदी औपरेशन के शिविर रोजमर्रा की बात हैं जिन से मुख्यधारा से जुड़े लोगों का कोई लेनादेना नहीं होता.

यह कैसा शिविर

छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर शहर से लगे पिंडारी गांव के नेमीचंद जैन हौस्पिटल में 8 नवंबर को एक ऐसा ही शिविर लगा था जिस में 83 आदिवासी महिलाओं ने नसबंदी औपरेशन कराया था. महिलाओं की उम्र 20 से 28 वर्ष के बीच थी. एक ट्रस्ट के अधीन संचालित होने वाला यह अस्पताल यानी शिविरस्थल मुद्दत से बंद पड़ा है, जिस के परिसर में आवारा मवेशियों ने बसेरा कर लिया है. इस के चारों तरफ गंदगी और बदबू का साम्राज्य है जिस की साफसफाई की कभी जरूरत ही नहीं समझी गई. औपरेशन कराने वाली 83 महिलाओं को झोलाछाप दाइयां घेर कर लाई थीं. इन महिलाओं को नसबंदी औपरेशन के एवज में 1,400 रुपए नकद मिलने का लालच दिया गया था. यह प्रोत्साहन राशि आमतौर पर दी भी जाती है.

स्वास्थ्य सहित तमाम सरकारी विभागों में झोलाछाप दाई, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और नौन मैडिकल असिस्टेंट जैसे दर्जनभर नामों से कर्मचारियों की भरमार है जिन का मुख्य काम गांव में घरघर जा कर नसबंदी के मामले लाना है. ये औपरेशन एक मशहूर सर्जन डा. आर के गुप्ता को करने थे जो 50 हजार से भी ज्यादा नसबंदी औपरेशन करने का रिकौर्ड बना चुके हैं. इस उपलब्धि के चलते 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था. कहने की जरूरत नहीं कि इस सर्जन के पास पर्याप्त अनुभव था और इतना था कि इस ने महज 6 घंटे में सभी महिलाओं के औपरेशन कर डाले यानी 5 मिनट से भी कम वक्त में एक औपरेशन हुआ. यह सरासर स्वास्थ्य अधिनियम को धता बताती बात थी जो यह कहता है कि एक सर्जन को 1 दिन में 32 से ज्यादा नसबंदी के औपरेशन नहीं करने चाहिए.

दूसरे सरकारी शिविरों की तरह यह शिविर भी खामियों से लबरेज था. इस सर्जन ने न तो अस्थायी औपरेशन थिएटर को स्टरलाइज किया, न ही औपरेशन के पहले की जाने वाली अनिवार्य हिदायतों पर अमल किया था. जानवरों की तरह आदिवासी महिलाओं को लिटा कर एक ही सूई से टांके सिले गए और एक ही कैंची से बगैर स्प्रिट का इस्तेमाल किए वे टांके काटे गए. ये व ऐसे और कई सच उजागर न होते अगर औपरेशन के दूसरे दिन इन 83 महिलाओं की हालत इतनी न बिगड़ी होती कि उन्हें उन के परिजन गंभीर हालत में बिलासपुर इलाज के लिए लाते. औपरेशन के चंद घंटे बाद देर रात इन्हें दवाएं दे कर चलता कर दिया गया था जबकि औपरेशन के 24 घंटे बाद तक इन्हें चिकित्सकीय देखरेख में रखा जाना चाहिए था. पैसे भी 1,400 रुपए की जगह 600 रुपए ही दिए गए. आदिवासी इलाकों में सरकारी पैसे की किस तरह लूटखसोट होती है, यह हकीकत भी उजागर हुई.

एकएक कर जब ये महिलाएं जिला अस्पताल, बिलासपुर आईं या लाई गईं तो लोग चौंक उठे. इन्हें लगातार उल्टीदस्त हो रहे थे और चक्कर भी आ रहे थे. यह बात सामने आ चुकी थी कि इन तमाम महिलाओं ने बीती रात नसबंदी शिविर में औपरेशन कराया है. 9 नवंबर की देर रात तक 16 महिलाएं इलाज के दौरान दम तोड़ चुकी थीं, 2 ने दूसरे दिन आखिरी सांस ली.

इन की मौत की वजह सस्पैंस बन गई थी. पहला अंदाजा यह लगाया गया कि ये संक्रमण से मरीं लेकिन यह बात एकदम से गले उतरने वाली नहीं थी क्योंकि इन्फैक्शन के लक्षण अलग होते हैं और औपरेशन के तुरंत बाद से दिखने लगते हैं. जैसे ही आदिवासी औरतों की मौत की खबर विदेशयात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिली, उन्होंने तुरंत फोन पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के कान उमेठे. रमन सिंह फौरन बिलासपुर पहुंचे और पीडि़ताओं के हालचाल जाने. मृतिकाओं के परिजनों से भी उन्होंने मुलाकात की और उन्हें 4-4 लाख रुपए का मुआवजा देने का एलान कर डाला.

लेकिन सूबे के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को हटाए जाने पर वे यह कहते हुए मुकर गए कि औपरेशन स्वास्थ्य मंत्री नहीं, डाक्टर करता है. कहतेकहते उन्होंने डा. आर के गुप्ता को न केवल निलंबित कर दिया बल्कि गैर इरादत हत्या के आरोप में गिरफ्तार भी करवा डाला. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों की एक टीम जांच के लिए बिलासपुर रवाना कर दी. चिकित्सक हैरान थे और यह बात भी सभी को समझ आ गई थी कि मौतें इन्फैक्शन से नहीं हुई हैं, लिहाजा, विशेषज्ञों का ध्यान दी गई दवाओं पर गया, जिन की जांच बिलासपुर के साइंस कालेज प्रयोगशाला में की गई तो पता चला कि सिप्रोसिन 500 मिलीग्राम वाली गोली में खतरनाक चूहानाशक जहर जिंक फौस्फाइड मिला हुआ था.

रिपोर्ट आते ही दवा बनाने वाली कंपनी महावर, फार्मा के निदेशकों, रमेश और सुमित महावर, को भी गिरफ्तार कर लिया गया. इन दोनों ने साफ कहा कि हमें फंसाया जा रहा है और अगर हम मुंह खोलेंगे तो कई बड़े लोगों के नाम उजागर होेंगे. अहम सवाल जो अब तक मुंहबाए खड़ा है वह यह है कि फिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है, डा. आर के गुप्ता ने तो यह भी कहा कि औपरेशन नहीं, बल्कि नकली दवाएं इन मौतों की जिम्मेदार हैं. इस सर्जन ने यह भी माना कि उस पर टारगेट पूरा करने का दबाव था. इसी दबाव के चलते उन्होंने चिकित्सा मानकों का उल्लंघन करते हुए ताबड़तोड़ जरूरत से ज्यादा आपरेशन कर डाले.

लक्ष्य का जानलेवा दबाव

इस में कोई शक नहीं कि न केवल स्वास्थ्य, बल्कि दूसरे विभागों, मसलन, पंचायत, कृषि ग्रामीण विकास और राजस्व के भी कर्मचारियों को सरकार ने लक्ष्य दे रखा है कि उन्हें इतने लोगों को औपरेशन के लिए तैयार कर शिविर तक लाना ही है. डा. आर के गुप्ता जैसे सर्जनों की खिंचाई और बेइज्जती जिले की समीक्षा बैठकों में कलैक्टर द्वारा की जाती है. मीटिंगों से तनाव ले कर आते हैं तो सर्जन और मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी इसे ब्याज सहित अपने मुलाजिमों में बांट देते हैं. हर एक की नौकरी पर टारगेट की तलवार लटकती रहती है. टारगेट यानी लक्ष्य के पूरा न होने पर वेतनवृद्धि रोक दी जाती है और दूसरे कई तरीकों से भी परेशान किया जाता है. छोटे मैदानी कर्मचारी गांवों में जाते हैं तो लक्ष्य पूरा करने के लिए धौंसधपट का भी सहारा लेते हैं. आदिवासी बाहुल्य इलाकों में वे आदिवासियों को धमकाने से नहीं चूकते कि औपरेशन कराओ वरना नतीजा अच्छा नहीं होगा.

अगर परिवार नियोजन अभियान यही है तो इसे बंद होना चाहिए. भोपाल के एक पटवारी की मानें तो, हां हम पर दबाव रहता है और जो किसान नसबंदी का औपरेशन नहीं करवाते, हम नामांतरण, सर्वे वगैरह के उन के काम नहीं करते ताकि वे परेशान हो कर नसबंदी करवाने को तैयार हो जाएं और वे होते भी हैं. यह सच बिलासपुर की मौतों के बाद भी उजागर हुआ यानी खामी सरकारी तरीके में है, हालात तकरीबन आपातकाल जैसे हैं जब इंदिरा गांधी की सरकार ने ताबड़तोड़ नसबंदी औपरेशन जबरिया करवाए थे. उस वक्त बगैर टिकट यात्रा करने वालों से जुर्माना नहीं वसूला जाता था बल्कि उन्हें किसी कोने में ले जा कर उन का औपरेशन कर दिया जाता था.

आज भी धड़ल्ले से यह हो रहा है पर सामने नहीं आता क्योंकि पीडि़त मुख्यधारा से कटे होते हैं और इतने गरीब होते हैं कि उन्हें 1,400 रुपए भी बहुत ज्यादा लगते हैं. बिलासपुर में बेगा समुदाय की महिलाओं के भी औपरेशन कर दिए गए जिन की तादाद  लगातार घट रही है. 1993 में केंद्र सरकार एक आदेश जारी कर चुकी है कि बैगा आदिवासियों के नसबंदी औपरेशन न किए जाएं. गौरतलब यह है कि केंद्र सरकार बैगा प्रोजैक्ट के तहत बैगाओं के संरक्षण के लिए काफी पैसा खर्च कर रही है. एक बैगा ही नहीं, बल्कि दर्जनभर जातियों के लिए नसबंदी औपरेशन की मनाही है.

बिलासपुर के ही एक ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी का कहना है, मैं मध्य प्रदेश में भी रह चुका हूं, हर जगह हालात एक जैसे हैं. हमें अफसरों द्वारा कहा जाता है कि जो औपरेशन के लिए तैयार न हो उसे जितना हो सके, जैसे हो सके परेशान करो. कई बार तो हमें जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं. हमें लगता है हम सरकारी मुलाजिम नहीं, जल्लाद और कसाई हैं जो इन आदिवासियों की नस काटने के लिए दिनरात दौड़ा करते हैं, उन्हें लालच देते हैं, समझाते हैं.

घटते आदिवासी

बिलासपुर नसबंदी कांड ने किसी को नहीं झकझोरा है सिवा उन 5 फीसदी पढ़ेलिखे आदिवासियों के जो पढ़लिख कर शहरों में बसे मुख्यधारा से जुड़ गए हैं. इस वर्ग की स्थिति ‘न घर के न घाट के’ जैसी हो गई है. सबकुछ जानते हुए भी वह सरकारी तंत्र के सामने बेबस है.

भोपाल में रह रहे आदिवासी समुदाय के समाजशास्त्र के एक प्राध्यापक  का कहना है कि इस नसबंदी कांड के बाद इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि आदिवासी क्षेत्रों में नसबंदी औपरेशन किए जाएं या नहीं. किसी का ध्यान आदिवासियों की घटती आबादी की तरफ नहीं जा रहा. कम होते बैगा आदिवासियों का उदाहरण सामने है. अब गौंड, कोरकू और भीलों की आबादी भी कम हो चली है. आज जो सरकार अरबों रुपए इन की नसबंदी पर खर्च कर रही है वही कल को चिंतित हो कर कहेगी कि अरे, आदिवासी कम हो गए हैं. उन्हें बढ़ाओ, उन के औपरेशन मत करो, हम इन्हें संरक्षित घोषित करते हैं.

बात सच है. दरअसल, शहरी लोगों के नसबंदी न कराने की जिद का खमियाजा देहातियों और आदिवासियों को भुगतना पड़ रहा है. मैदानी मुलाजिम टारगेट पूरा करने के लिए इन्हें बहलातेफुसलाते और डराते हैं. वे आंकड़ेबाजी में जुटे हैं. घटिया मिलावटी दवाएं इन्हें दी जाती हैं. इन के इलाज के लिए घटिया उपकरणों की खरीद की जाती है. इन की सेहत तो दूर की बात है, इन की जान की भी किसी को परवा नहीं. ऐसे में इस नसबंदी कांड की सीबीआई जांच की जाए तो कई और चौंका देने वाली बातें सामने आएंगी. लग नहीं रहा कि ऐसा कुछ होगा.

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