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उत्तर प्रदेश के थाने में जली महिला

उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में कानून व्यवस्था सुधारने व औरतों के प्रति होने वाले अपराधों को कम करने के लिए जितनी कोशिश कर रही है, उत्तर प्रदेश पुलिस उस पर लगातार कालिख पोतने का काम कर रही है. पुलिस महकमे की करतूतें प्रदेश सरकार को शर्मसार कर रही हैं. बदायूं कांड के बाद बाराबंकी के कोठी थाने में आंगनबाड़ी में काम करने वाली नीतू द्विवेदी की जल कर मौत हो गई. नीतू की मौत अपने पीछे ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिन के जवाब देना सरकार के लिए नामुमकिन है. विरोधियों को एक बार फिर यह आरोप लगाने का मौका मिल गया है कि समाजवादी सरकार के कार्यकाल में पुलिस महकमा ज्यादा ही तानाशाह हो जाता है. बाराबंकी जिले के पुलिस अफसर लगातार इस कोशिश में हैं कि वे यह साबित कर दें कि नीतू को थाने में पुलिस ने नहीं जलाया, बल्कि उस ने खुद आग लगाई थी. दूसरी ओर जलने के बाद नीतू ने 2 दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया. वह बाराबंकी के जिला अस्पताल से लखनऊ के सिविल अस्पताल तक तड़पती रही. इस बीच उस ने मरने से पहले बयान दिया, जिस में बारबार कहा कि उसे कोठी थाने में एसओ यानी थानाध्यक्ष राय साहब यादव और एसआई अखिलेश राय ने जलाया.

अस्पताल में भरती नीतू ने बारबार कहा कि उस की मुलाकात मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से कराई जाए. वह उन को सच बताना चाहती है. वह मुख्यमंत्री से मांग करना चाहती थी कि उसे जलाने वालों को फांसी दी जाए. नीतू का इलाज लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में चल रहा था.  उस से केवल 500 मीटर दूर 5, कालीदास मार्ग पर मुख्यमंत्री का सरकारी आवास है. नीतू अपना दर्द मुख्यमंत्री को बिना सुनाए इस दुनिया से विदा हो गई.

पति को छुड़ाने गई थी थाने

बाराबंकी जिला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से मात्र 27 किलोमीटर दूर है. जिला हैडक्वार्टर से 25 किलोमीटर दूर कोठी थाना पड़ता है. कोठी थाना जिले के सब से पुराने थानों में से एक है. साल 1916 में यह थाना अंगरेजों के राज में बना था. तब से ले कर अब तक यहां ऐसी घटना नहीं हुई कि किसी औरत को थाने में ही जला दिया गया हो. इस से साफ पता चलता है कि पुलिस महकमा आज अंगरेजों के राज से भी ज्यादा शोषण करने वाला हो गया है. इस वारदात की शुरुआत 4 जुलाई, 2015 से हुई. शनिवार की शाम को सेमरावां गांव के रहीमपुर महल्ले के रहने वाले गंगाराम की पत्नी ने पड़ोसी नंदकिशोर तिवारी के बेटे दीपक पर छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया. इस बीच गंगाराम को गोली मार दी गई. गंगाराम को इलाज के लिए लखनऊ के मैडिकल कालेज भेजा गया. गंगाराम की पत्नी ने नंदकिशोर और उस के बेटे दीपक पर आरोप लगाया कि उन लोगों ने ही गंगाराम को गोली मारी है. पुलिस ने गंगाराम की पत्नी की तहरीर पर नंदकिशोर, दीपक और नौमीलाल पर हत्या की कोशिश का मुकदमा दर्ज किया. तलाश करने पर भी पुलिस को नंदकिशोर नहीं मिला. नंदकिशोर के न मिलने पर कोठी थाने की पुलिस ने नंदकिशोर के बहनोई रामनारायण द्विवेदी को पकड़ लिया और उसे थाने ले आई. रामनारायण बसंतपुर गांव के गहा पुरवा में रहते थे. पुलिस ने रामनारायण से कहा कि वह अपने रिश्तेदार नंदकिशोर को पुलिस के सामने हाजिर कराए.

रामनारायण को पुलिस रविवार, 5 जुलाई को थाने लाई थी. उसे रातभर थाने में रखा और उस पर अपने रिश्तेदार को हाजिर कराने का दबाव बनाया. सोमवार 6 जुलाई को सुबह 10 बजे रामनारायण की पत्नी नीतू द्विवेदी अपने पति को छुड़ाने थाने गई, तो पुलिस ने उस के साथ बदतमीजी की. नीतू का आरोप था कि थाने के एसओ राय साहब और एसआई अखिलेश राय ने उस के साथ बलात्कार करने की कोशिश की. जब वे इस में कामयाब नहीं हुए तो उस के जेवरात छीन कर उस के ऊपर मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा दी. बचने के लिए नीतू उन लोगों के चंगुल से छूट कर थाने से बाहर निकली और सड़क पार कर के बरगद के पेड़ के नीचे गिर गई, जहां राहगीरों ने आग बुझाई. बाद में कोठी थाने के 2 सिपाही हीरा यादव और पंकज द्विवेदी उसे ले कर पहले बाराबंकी अस्पताल गए और बाद में उसे लखनऊ के सिविल अस्पताल भेजा गया. वहीं पर 7 जुलाई को नीतू ने दम तोड़ दिया.

पुलिस की मनमानी

नीतू की थाने में जलने की घटना का पता चलते ही बाराबंकी पुलिस मामले की लीपापोती में लग गई. बाराबंकी के एसपी अब्दुल हमीद ने थाने पहुंच कर नीतू के बेटे आशीष को थाने बुलवाया और उस से मनमानी रिपोर्ट लिखने के लिए तहरीर ले ली. इस रिपोर्ट में पुलिस ने एसओ राय साहब और एसआई अखिलेश के खिलाफ सुसाइड के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया. पुलिस के दबाव में कोठी थाने के आसपास का कोई भी आदमी घटना की सही जानकारी देने को तैयार नहीं है. नीतू की लखनऊ में मौत के बाद गांव गहा मजरा बसंतपुर में पुलिस की इस दरिंदगी के खिलाफ लोगों का गुस्सा देखने वाला था. गांव में चारों ओर सन्नाटा फैला हुआ था. नीतू के 3 बेटे और एक बेटी हैं.

एक तरफ समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता और पुलिस यह मानती है कि नीतू ने खुद ही आग लगाई थी, दूसरी तरफ नीतू का परिवार और भारतीय जनता पार्टी की बाराबंकी से सांसद प्रियंका सिंह रावत और पूर्व विधायक सुंदरलाल दीक्षित का मानना है कि पुलिस सच को छिपाने के लिए घटना को गलत दिशा में ले जा रही है. आईजी, जोन लखनऊ, जकी अहमद कहते हैं कि घटना अमानवीय है, किसी को बख्शा नहीं जाएगा. जांच के बाद दोषियों को अरैस्ट किया जाएगा. मामले को सुलझाने में बाराबंकी के डीएम योगेश्वर राम मिश्रा, कमिश्नर सूर्य प्रकाश मिश्रा, डीआईजी वी के गर्ग ने हर पक्ष को समझाने का काम किया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दोषी पुलिस वालों को सस्पैंड करने और नीतू के परिवार को 5 लाख रुपए की मदद देने की बात की.  इस घटना ने एक सवाल खड़ा किया है कि पुलिस आरोपी को पकड़ने के लिए अभी भी उस के परिवार के सदस्यों व नातेरिश्तेदारों को पकड़ कर उन पर दबाव बना रही है. इस के जरिए वह कमाई भी करती है. पुलिस की इस बात को अगर मान भी लिया जाए कि नीतू को थाने में नहीं जलाया गया, उस ने खुद आग लगा ली, तब भी यह सवाल जवाब मांग रहा है कि ऐसे हालात पुलिस ने बनाए ही क्यों कि कोई आत्मदाह करने जैसा फैसला ले ले. एक तरफ प्रदेश सरकार औरतों की मदद के लिए उत्तर प्रदेश महिला सम्मान प्रकोष्ठ और 1090 महिला हैल्पलाइन जैसे कदम उठा चुकी है तो दूसरी ओर एक औरत थाने में जल रही है. पुलिस की यह करतूत प्रदेश सरकार पर भारी पड़ेगी.

सरकारी नौकरियों का पागलपन

दरअसल, सरकारी नौकरियों और सरकारी नौकरी करने वालों में से ज्यादातर की कमोबेश यही कहानी है. इस का अंदाज इस एक उदाहरण से लगाया जा सकता है कि राजधानी दिल्ली में तकरीबन 3 लाख सरकारी अध्यापक हैं. लेकिन सरकारी स्कूलों का जो रिजल्ट है, रिजल्ट से भी ज्यादा सरकारी स्कूलों के बच्चों की जो बौद्धिक व मानसिक स्थिति है, उसे देख कर तरस आता है. दुख इस बात का है कि सरकार किन अध्यापकों पर इतना पैसा लुटा रही है? इस के उलट निजी और पब्लिक स्कूलों में 10 से 15 हजार रुपए मासिक तनख्वाह पाने वाले अध्यापक वह रिजल्ट दे रहे हैं जो रिजल्ट सरकारी अध्यापक देने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते. दरअसल, सरकारी कर्मचारी इस देश पर और किसी भी सरकार पर एक तरह का बोझ ही हैं. मगर हर सरकार को अपनी मौजूदगी और अपने वजूद के लिए एक तामझाम की जरूरत होती है, इसलिए निठल्ले सरकारी कर्मचारियों की यह फौज बदस्तूर न सिर्फ बनी हुई है, बल्कि बढ़ती जा रही है.

नकारात्मक पहलू

मुंबई स्थित एक निजी बैंक के सेल्स एक्जीक्यूटिव विश्वनाथ आचार्य कहते हैं, ‘‘मैं सुबह 7 बजे घर से निकलता हूं और रात में कब पहुंचूंगा, कुछ पता नहीं क्योंकि प्राइवेट बैंक महज उस के कर्मचारी होने के चलते मुझे तनख्वाह नहीं देता बल्कि मुझे हर समय परफौर्म कर के दिखाना होता है. मुझे वेतन और कमीशन उसी परफौर्मेंस के आधार पर मिलते हैं.’’ दूसरी तरफ मुंबई की ही मीरा रोड स्थित सरकारी बैंक की एक शाखा में आर मेहता क्लर्क हैं. उन के पास अगर आप किसी चैक या पासबुक से संबंधित काम के लिए जाएं तो कहेंगे नाम लिखा जाओ, कल आ कर देख जाना. अगर आप कहो कि आप ने बड़ी मुश्किल से आज का समय निकाला है और कल नहीं आ पाएंगे तो मेहता साहब कहेंगे फिर मत आना. उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि ग्राहक के मन में, उन के व्यवहार का क्या असर पड़ेगा? चूंकि सरकारी बैंक कर्मचारी की नौकरी और महीने में मिलने वाली उन की तनख्वाह ग्राहक की सुविधा व संतुष्टि से जुड़ी नहीं है. नतीजतन वे एक बार भी नहीं कहते कि ग्राहक आएं और बारबार आएं.

दरअसल, सरकारी कर्मचारी अगर पक्का है तो उसे इस बात का खौफ नहीं रहता कि उस की नौकरी छूट जाएगी. इस वजह से कभी भी नौकरी को ले कर फिक्रमंद नहीं होता. दूसरे शब्दों में, वह नौकरी बचाने के लिए, ग्राहकों को संतोषजनक सेवा देने की गरज नहीं समझता. जबकि दूसरी तरफ प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाला कोई भी शख्स इस बात को भलीभांति जानता है कि उस की नौकरी तभी तक सुरक्षित है जब तक वह अपनी कंपनी को कमा कर देगा और अपने कामकाज से ग्राहकों को खुश रखेगा. बस, यही एक ऐसी धारणा है जिस से दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का फर्क दिखाई पड़ता है. अगर कोई सरकारी कर्मचारी काम करना भी चाहता है तो उस के सहकर्मी, जो खुद काम नहीं कर रहे होते हैं, उसे भी नहीं करने देते हैं. उन्हें पता है कि अगर एक काम करता रहा तो बाकी सब लोगों की साख खराब होगी. इसलिए अच्छे से अच्छा और कामकाज का संकल्प रखने वाला सरकारी कर्मचारी भी एक बार नौकरी पाने के बाद काम नहीं कर पाता. यह सरकारी संस्थानों में कामकाज की नकारात्मक संस्कृति का नतीजा है.

बेरोजगारों की लंबी फौज

हमारे देश में 99.99 फीसदी आम आदमी सरकारी क्षेत्र में ही नौकरी पाना चाहता है क्योंकि वह शौर्टकट के जरिए रातोंरात अमीर होना चाहता है. सरकारी नौकरी से जुड़ी तमाम सुविधाएं उसे ललचाती हैं और वह इन के लिए घूस देने से ले कर कुछ भी करने को तैयार रहता है. यह एक किस्म का नशा है और हमारी तमाम पीढि़यों की कार्यक्षमता को यह नशा बरबाद कर रहा है. लोग समझते हैं अगर सरकारी नौकरी मिल गई तो कमाने का जरिया भी मिल जाएगा यानी घूस का जुगाड़ हो जाएगा. इसलिए प्राइवेट नौकरी कभी उस की प्राथमिकता में नहीं होती. वह बिना काम किए अच्छी तनख्वाह पाना चाहता है और ऊपर से कमाई का जरिया भी बरकरार रखना चाहता है, इसलिए सरकारी नौकरी चाहता है. यह सरकारी आंकड़ा है जिसे मौजूदा सरकार की कैबिनेट ने जारी किया है. वास्तविक आंकड़ा इस से भी ज्यादा भयावह होने की पूरी आशंका है. श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो द्वारा जारी ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक बीते वित्त वर्ष में बेरोजगारी की दर बढ़ कर 4.9 हो गई है जबकि पहले 4.7 प्रतिशत थी. सब से अधिक बेरोजगारी की दर सिक्किम में आंकी गई. महिलाओं में भी बेरोजगारी 7.2 से बढ़ कर 7.7 प्रतिशत हुई है.

औद्योगिक संगठन एसोचैम की 1 साल पहले आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में तकरीबन 10 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जितने बेरोजगार हैं, उन से भी 5 फीसदी ज्यादा योग्य कामगारों की भी दरकार है. मतलब यह कि एक तरफ जहां हमारे यहां रोजगार की भारी कमी है उस से भी कहीं ज्यादा कमी योग्य कामगारों की भी है. निसंदेह यह स्थिति पूरी तरह विरोधाभासी है. लेकिन अगर आप इस स्थिति का विश्लेषण करेंगे तो समझ जाएंगे कि यह आंकड़ा विरोधाभासी नहीं है बल्कि हमारी दयनीय आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है.

वास्तव में हिंदुस्तान में 80 फीसदी से ज्यादा आम लोगों की पहली ख्वाहिश सरकारी नौकरी करने की होती है. इस के बाद ही वे दूसरी नौकरियों के बारे में सोचते हैं. भारत में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले संगठनों, विशेषकर करप्शन वाच इंटरनैशनल के मुताबिक, सब से ज्यादा रिश्वतें सरकारी नौकरी पाने के लिए, अच्छे स्कूलों में ऐडमिशन हासिल करने के लिए, पुलिस से मामला सुलटाने के लिए और सरकारी अस्पतालों में अच्छी चिकित्सा सुविधा हासिल करने के लिए दी जाती हैं. यह सम्मिलित घूस कोई डेढ़ लाख करोड़ रुपए के आसपास है यानी हमारे कुल बजट का 8 से 9 फीसदी हिस्सा. इस में भी सब से बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरी पाने के लिए खर्च होता है. अलगअलग संगठनों के अनुमानों के मुताबिक, भारत में कोई 36 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा सरकारी नौकरियां पाने में बतौर घूस के रूप में खर्च होते हैं. कहने का मतलब यह कि सरकारी क्षेत्र की नौकरियों का इस कदर आकर्षण है कि लोग उन्हें हासिल करने के लिए कुछ भी करने और किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं.

बावजूद इस आकर्षण और मारामारी के, वास्तविकता यह है कि सभी तरह की सरकारी और अर्धसरकारी नौकरियां बमुश्किल 2 करोड़ के आसपास हैं. उन में भी अब इतने तकनीकी किंतुपरंतु लग गए हैं कि अगर हम विशुद्ध सरकारी नौकरियों की ही बात करें तो ऐसी नौकरियां मुश्किल से 1 करोड़ 80 लाख के आसपास होंगी. जबकि देश में काम करने के लिए तैयार कार्यबल 38 करोड़ से ज्यादा है और कार्य कर सकने की क्षमता रखने वाला कार्यबल (वर्कफोर्स) 59 करोड़ 80 लाख से ज्यादा है. भारत में तकरीबन 60 करोड़ नौकरियों की जरूरत है जबकि सरकारी, अर्धसरकारी और पब्लिक सैक्टर अंडरटेकिंग जैसे क्षेत्रों की कुल मिला कर 2 करोड़ के आसपास ही नौकरियां हैं.

कैसे बनेगा विकसित राष्ट्र

सरकारी नौकरियों के लिए पागलपन या इस के लिए दीवानगी कहां तक जायज है, यह अहं सवाल है. सरकारी नौकरियों के पागलपन के पीछे हमारी अकर्मण्य मनोस्थिति, दिलोदिमाग में सुरक्षित महसूस करने की कमजोरी और भ्रष्टाचार से फायदा उठाने का लालच जिम्मेदार है. जबकि आज की तारीख में 20 करोड़ से ज्यादा नौकरियां हर किस्म के निजी क्षेत्रों से मिला कर आती हैं. क्या सरकारी नौकरियों का लालच और निजी क्षेत्र के प्रति सरकार और प्रशासन का गैर दोस्ताना रवैया भारत को भी विकसित राष्ट्र बना सकता है? कभी नहीं. भारत को अगर 2020 तक विकसित राष्ट्र में तबदील होना है तो हमारी अर्थव्यवस्था के विकास की रफ्तार को सालाना 8 से 12 फीसदी तक पहुंचाना पड़ेगा और बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र में रोजगार विकसित करने पड़ेंगे. क्योंकि 2012 तक अगर हम ने 8 से 12 करोड़ के बीच नए रोजगार सृजित नहीं किए और पुराने रोजगारों को बनाए रखने में कामयाबी नहीं हासिल की तो भारत को विकसित राष्ट्र बनाए जाने का सपना टायंटायं फिस्स हो जाएगा.

यह तभी संभव है जब देश के सामाजिक स्वभाव और उस की मानसिकता में आमूलचूल परिवर्तन हो, सरकारी नौकरी का पागलपन खत्म हो. इस के लिए दी जाने वाली करोड़ों की घूस का खेल खत्म हो और निजी क्षेत्र में रोजगार बढ़ाए जाने व विकसित किए जाने का अनुकूल माहौल बने. निश्चित रूप से ये कई चीजें हैं और सभी चीजें जब एकसाथ काम करेंगी तब कहीं जा कर एक सकारात्मक नतीजा हासिल होगा. मगर इन कई चीजों में सब से बड़ी बात और चीज सरकारी नौकरियों के प्रति अंधआकर्षण ही है. अगर निजी क्षेत्र की नौकरियों के प्रति आम भारतीयों में यही आकर्षण पैदा हो जाए तो वह मन मार कर या यहां होने को अपनी तौहीन समझ कर काम न करें. वे ऐसा करेंगे तो इस से उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार का विस्तार होगा और देश का विकास होगा.

भारत के रोजगार परिदृश्य को 8 फीसदी की दर से विकसित होने के लिए हर साल 4 से 6 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत है. जाहिर है यह निवेश सरकारी क्षेत्र में संभव नहीं है. इसलिए सिर्फ सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के भरोसे न तो हमारा भला हो सकता है और न ही देश का. ऐसे में जरूरी है कि हम सरकारी क्षेत्र की नौकरियों के अलावा रोजगार के दूसरे विकल्पों को न सिर्फ तलाशें बल्कि उन में भरपूर रुचि लें और उस की संस्कृति विकसित करें तभी देश में मौजूदा कार्यबल को काम मिल सकता है और समृद्धि आ सकती है.

बलात्कार की परिभाषा

बलात्कार के बढ़ते मामलों की रिपोर्टों के साथसाथ आरोप सिद्ध न होने पर छूटने वाले बेचारे पुरुषों की गिनती भी बढ़ती जा रही है. बलात्कार के बहुत से मामले ऐसे आ रहे हैं जिन में महिला महीनों व सालों तक यौन संबंध रखने के बाद शिकायत करती है कि उस से विवाह का वादा कर के या उसे कोई धमकी दे कर साथ सोने को उकसाया गया था. अदालतें आमतौर पर इस तरह के मामलों में पेश की गई गवाही से संतुष्ट नहीं होतीं. अगर स्त्रीपुरुष दोनों सहमति से संबंध बनाएं तो उसे गुनाह नहीं कहा जा सकता. और यदि न धोखा हो, न ही जोरजबरदस्ती तो यौन संबंध को बलात्कार नहीं कहा जा सकता. काफी मामलों में तो शुरू में शिकायत करने वाली महिला ही मुकर जाती है कि उस के साथ बलात्कार हुआ. और वह स्वीकार कर लेती है कि संबंध सहमति के आधार पर बने थे. अब एक अदालत ने रोचक सवाल खड़ा किया है कि ऐसे पुरुष, जिस पर बलात्कार का आरोप सिद्ध न हुआ हो, को पीडि़त पक्ष कहा जाए या नहीं. आखिर उस ने महिला की गलत शिकायत के कारण महीनों जेल में गुजारे होंगे, समाज का अपमान सहा होगा, उस की नौकरी या व्यवसाय पर फर्क पड़ा होगा और भारी पैसा खर्चा हो गया होगा. ऐसे में इस तरह के पुरुष को पीडि़त न कहा जाए तो किसे कहा जाए?

बलात्कार के बहुत से मामले ऐसे ही होते हैं जहां महिला बदले की भावना से आरोप लगाती है भले ही उन दोनों में सहमति से यौन संबंध बने हों. जो वास्तविक अपराध के मामले होते हैं उन में तो बलात्कारी व पीडि़ता एकदूसरे को जानते ही नहीं और बलात्कारी चोरों की तरह इज्जत पर हमला करता है. मुसीबत वहां है जहां दोनों एकदूसरे को जानते ही नहीं, चाहते भी हैं. बलात्कार रबड़ की एक ऐसी रस्सी बन गई है जिसे ज्यादा खींचोगे तो पुरुष और सभी, पुराने जमाने की तरह अलगथलग रहने को मजबूर हो जाएंगे. अगर दोस्ती की स्वतंत्रता देनी ही है तो यौन स्वतंत्रता भी देनी होगी और बलात्कार की परिभाषा भी बदलनी होगी कि यह केवल जबरदस्ती वाले मामलों में ही होता है और इस का झूठा आरोप पुरुष को पीडि़त बना कर उसे उलटा शिकायत करने का हक देगा.

अमेरिका की बदलती सोच

अमेरिका में समलैंगिक विवाह को सुप्रीम कोर्ट से अनुमति यों ही नहीं मिल गई. उस के पीछे अमेरिका की बदलती सोच है. अमेरिका कहने को तो सदा ही नए विचारों का स्वागत करता रहा है पर वहां पुरातनपंथियों की कमी न थी जो चर्च की महत्ता, अमेरिका की धौंस के अधिकार, गर्भपात पर पाबंदी, समलैंगिकों को सामाजिक नासूर व अपराधी मानना जैसी विचारधाराओं पर विश्वास रखते थे. यह अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था का परिणाम रहा है और अमेरिकी सोचते रहे हैं कि उन के देश की प्रगति पूंजीवाद के कारण हुई है. पिछले 15 सालों से अमेरिका की सोच में फर्क आ रहा है. सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर अमेरिका अब अति पूंजीवादी नीति का समर्थन करने में कतराने लगा है. अमेरिका में गेप्राइड उत्सव, समलैंगिक विवाह, लिव इन रिलेशनशिप, अंतर्रंगीय विवाह, विदेशियों को जगह देने के बारे में कट्टरता कम हो रही है. अति पूंजीवाद के खिलाफ बात हो रही है. औक्युपाई वाल स्ट्रीट जैसा आंदोलन सफल हो रहा है.

अमेरिका में एक सर्वे के अनुसार, कट्टरपंथियों की गिनती 39 प्रतिशत से घट कर 31 प्रतिशत रह गई है और उदारपंथी वामपंथियों की संख्या पूरी जनता के 21 प्रतिशत से बढ़ कर 32 प्रतिशत हो गई है. यह बदलाव महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब अमेरिका की नीतियों का बदलाव दिखने लगा है. अमेरिका ने अपनी आर्थिक प्रगति की नींव को एक तरह से इंगलैंड की कट्टरता के विरुद्ध उदार चेहरे के तौर पर पेश किया था. अमेरिका ने व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को संविधान का हिस्सा बनाया. अश्वेतों को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए उस ने एक गृहयुद्ध लड़ा. अमेरिका ने यूरोप में घृणा से देखे जाने वाले यहूदियों को बराबर की जगह दी. जब मार्क्सवाद ने यूरोप में कदम जमाने शुरू किए और तानाशाही ताकतों ने फिर से शासन संभालना शुरू किया, तब लोकतंत्र को बनाए रखने के साथसाथ अमेरिका कम्युनिस्ट विरोधी होते हुए कट्टरपंथी भी बनने लगा था. जब दुनिया के दूसरे देशों में स्वतंत्रताएं मिलने लगीं तो अमेरिका का संवैधानिक ढांचा, वोट के जरिए शासकों को चुना जाना, न्यायपालिका व प्रैस की स्वतंत्रता के  ज्यादा माने नहीं रहे और कई मामलों में पिछली सदी के अंतिम दशकों में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, रौनाल्ड रीगन, जौर्ज बुश आदि की छत्रछाया में कट्टरपंथी फलेफूले.

वर्ष 2008 के स्टौक मार्केट गुब्बारे के फूटने के बाद अमेरिका को एहसास हुआ कि पूंजीवाद बेलगाम हो रहा है और उदारपंथियों को सक्रिय होना जरूरी है वरना 1 प्रतिशत लोग 99 प्रतिशत पर राज ही नहीं करेंगे, उन्हें लूट भी लेंगे. भारत में कट्टरपंथियों को हमेशा जगह मिलती रही है. इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ और समाजवाद के नारों के बावजूद कट्टरपंथी समाज को यथावत रखने के पक्ष में थीं. बाद में मंडल आयोग के आने के कारण राजनीति में आए नेताओं ने एक कट्टरपंथी सोच को दूसरी कट्टरपंथी सोच से बदला था. मूलभूत सोच अभी वही ही है. दहेज, कन्याभू्रण हत्या, किसानों की जमीन हथियाना, विचारों पर धार्मिक संस्थाओं के अंकुश का समर्थन, औनर किलिंग, बढ़ता जमीन संघर्ष उसी कट्टरपंथी सोच का नतीजा है. पिछड़े, दबेकुचले, गरीबों के मसीहा कम्युनिस्ट, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, मायावती, मुलायम सिंह यादव एक कट्टर सोच को दूसरी कट्टर सोच से हटाने मात्र का नाटक कर रहे थे और इसीलिए आज अति कट्टरपंथी हावी हो रहे हैं. यह असल में विस्फोटक स्थिति है. देश की प्रगति खुले विचारों की जमीन पर हो सकती है. पथरीली जमीन पर पेड़ नहीं उगते. अमेरिका एक राह दिखा रहा है. दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र क्या सर्वशक्तिमान लोकतंत्र से कुछ सीखेगा?

नवाज शरीफ की बेचारगी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कितने बेचारे हैं, यह उन की और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के उफा में हुई मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान के बाद उलटबाजी से साफ है. संयुक्त बयान में दोनों ने कश्मीर का मुद्दा नहीं उठाया था, 26 नवंबर, 2008 के मुंबई में हुए आतंकी हमले की जांच में सहयोग देने की कुछ बात की थी. पर इस्लामाबाद पहुंचते ही नवाज शरीफ को अपने कथन लगभग वापस लेने पड़े. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की जगहंसाई हुई तो नरेंद्र मोदी खिसिया कर रह गए कि बारबार मनाने की कोशिशों के बाद पाकिस्तान पहली सीढ़ी पर लुढ़क जाता है. भारत व पाकिस्तान के संबंध सांपसीढ़ी का खेल जैसे हो गए हैं. पाकिस्तान का वजूद भारत विरोध पर टिका है, इस में शक नहीं. पाकिस्तान के धार्मिक, सरकारी व सैनिक नेता जानते हैं कि अगर उन्होंने भारत बनाम पाकिस्तान आग को जला कर नहीं रखा तो उन के हाथ सुन्न पड़ जाएंगे. पाकिस्तान की जनता अपने कट्टरपंथी मुल्लाओं, रिश्वतखोर अफसरों व नेताओं तथा आतंकवाद को पनाह देने वाली सेना को झेल रही है तो केवल इसलिए कि उसे लगता है कि भारत, पाकिस्तान को हड़प कर लेना चाहता है. यह गलतफहमी हर मसजिद, हर विधानसभा व संसद और हर सैनिक परेड में दोहराई जाती है.

भारत के लिए पाकिस्तान अब निरर्थक बन चुका है. कश्मीर में पाकिस्तान के हमदर्द चाहे कुछ मौजूद हों पर वे भी जानते हैं कि उन के बच्चों का भविष्य भारत में सुरक्षित है. भारतीय जनता पार्टी के कट्टर हिंदू चेहरे के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान को मनाने की जिस तरह कोशिश की है उस से वे बौखला रहे हैं. अब हमारे भगविए भी पाकिस्तान के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे और देश में छिटपुट घटनाओं के अलावा हिंदू-मुसलिम तनाव न के बराबर है. पाकिस्तान का उफा में हुई बातचीत को लगभग नकार जाना हमारे हितों के खिलाफ तो है ही, पाकिस्तान की आम जनता के खिलाफ भी है. पाकिस्तानी अब चैन चाहते हैं. उन्हें दुनियाभर में आतंकवाद का पिट्ठू मान लिया गया है. दुनियाभर में फैले पाकिस्तानी अब अपनेआप को भारतीय मुसलमान कहने को मजबूर होने लगे हैं. वे चाहते हैं कि दोनों देश वैसे ही रहें जैसे अमेरिका और कनाडा रहते हैं. सरकारें अलग पर रहनसहन, खानापीना, व्यापार, व्यवहार सब एक. इस गरीब, गंदे, पिछड़े भूभाग की उन्नति के लिए दोनों देशों में दोस्ती की नहीं, तो युद्धहीन माहौल की तो जरूरत है ही. अफसोस, नरेंद्र मोदी की पहल के बावजूद पाकिस्तान का शासनतंत्र नवाज शरीफ पर हावी हुआ है.

तमन्ना का कैरियर

वैजयंती माला से वहीदा रहमान, हेमामालिनी से श्रीदेवी तक बौलीवुड में दक्षिण भारतीय मूल की अभिनेत्रियों ने अपने अभिनय के जौहर दिखाए हैं. कई दशकों तक भारतीय फिल्मों में, खासकर हिंदी सिनेमा में, साउथ इंडियन फिल्मों से आयातित अभिनेत्रियों का कब्जा रहा है. लेकिन बीते कुछ सालों में बौलीवुड की टौप अभिनेत्रियों में साउथ इंडियन फिल्मों से आई अभिनेत्रियों का नाम नदारद है. बात चाहे श्रेया सरन की हो या चार्मी कौर की या फिर तमन्ना भाटिया की, लगभग सब की बौलीवुड पारी बुरी तरह फ्लौप रही है, खासकर तमन्ना भाटिया की. तमन्ना तमिल, तेलुगू फिल्मों का बड़ा नाम हैं. इस लिहाज से उन्हें हिंदी फिल्मों में बड़ा ब्रेक मिला. साजिद खान की फिल्म ‘हिम्मतवाला’ से अजय देवगन के साथ मिले बड़े ब्रेक का फायदा उन्हें नहीं हुआ, ‘हिम्मतवाला’ मजाक बन कर रह गई. उस के बाद साजिद की ही फिल्म ‘हमशकल्स’ से उन की बचीखुची इमेज भी धुल गई. अक्षय कुमार के साथ उन की फिल्म ‘इंटरटेनमैंट’ जरूर सेमीहिट कही जा सकती है लेकिन उस में तमन्ना का कोई खास योगदान नहीं रहा. कुल मिला कर तमन्ना का हिंदी फिल्म कैरियर लगभग डांवांडोल ही है. शायद इसीलिए उन के खाते में फिलहाल एक भी हिंदी फिल्म नहीं है. हां, तेलुगू फिल्म ‘बाहुबली’ जरूर डब हो कर हिंदी में रिलीज हुई. लेकिन इस मल्टीस्टार फिल्म में तमन्ना को बहुत ज्यादा फुटेज नहीं मिला.

दरअसल, तमन्ना ग्लैमरस तो खूब हैं लेकिन फिल्म ऐक्सपर्ट आज भी उन के अभिनय को ले कर सवाल उठाते हैं. सिर्फ चालू फिल्मों में मिली सफलता उन्हें सशक्त अभिनेत्री के तौर पर स्थापित नहीं कर सकती. 13 वर्ष की उम्र से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाली तमन्ना भाटिया को बचपन से अभिनय का शौक था. मुंबई की तमन्ना जब स्कूल के वार्षिक उत्सव में परफौर्म कर रही थीं तभी उन्हें अभिनय का औफर मिला. वह 1 साल तक पृथ्वी थिएटर से भी जुड़ी रहीं. फिल्मों के अलावा उन्होंने कई एलबम और विज्ञापनों में भी काम किया है. 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने हिंदी फिल्म ‘चांद सा रोशन चेहरा’ में काम किया. हालांकि फिल्म नहीं चली पर उन्हें तेलुगू फिल्म में काम करने का अवसर मिला. तमन्ना के पिता डायमंड मर्चेंट हैं. जब उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू किया था तो उन की मां हमेशा उन के साथ रहती थीं. पहली बार जब उन्होंने अभिनय की बात अपने मातापिता से कही तो सभी चौंक गए. लेकिन तमन्ना जानती थीं कि वे उन्हें सहयोग देंगे. फिल्म ‘बाहुबली’ को ले कर इस प्रतिनिधि ने उन से बात की तो तमन्ना का कहना था, ‘‘‘बाहुबली’ काफी अरसे से बन रही है. इस का सफल होना बेहद जरूरी है. वैसे तो हर फिल्म का मेरे लिए सफल होना आवश्यक होता है. कई बार फिल्म सफल नहीं होती क्योंकि उस में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन से दर्शक अपनेआप को जोड़ नहीं पाते. लेकिन  हर फिल्म में मेरी कोशिश रहती है कि वह सफल हो. जो काम मुझे दिया जाता है उसे मन से करती हूं. इस फिल्म में मैं ने ऐक्शन सीन किए हैं जो तलवार की लड़ाई है. इस से पहले कभी ‘फाइट सीन’ मैं ने नहीं किए. इस फिल्म में 1 साल तक प्री प्रोडक्शन पर काम किया गया है. छोटेछोटे अस्त्रशस्त्र, हैलमेट आदि सब कैसे इस्तेमाल करने हैं, इस बाबत सब को प्रशिक्षित किया गया. भारतीय सिनेमा में इतने बड़े पैमाने पर ऐसा पहली बार हुआ है. मैं ने तलवार चलाने की ट्रेनिंग ली है. मार्शल आर्ट सीखी है.’’

100 करोड़ वाले फिल्म के दौर में किसी भी फिल्म का प्रैशर आप पर कितना होता है, इस सवाल पर तमन्ना ने कहा, ‘‘दबाव तो रहता है पर मैं अधिक ध्यान नहीं देती. अब तक मैं ने कई भाषाओं में फिल्में की हैं. भाषा मेरे लिए कोई माने नहीं रखती. काम मैं ने मेहनत से किया है. दर्शकों को फिल्म अच्छी लगेगी. इस तरह की पीरियोडिकल फिल्में बौलीवुड में अधिकतर बनती हैं. अभी तक की हमारी भूमिकाओं में अलग भूमिका है.’’ आप के काम में परिवार वालों का सहयोग और फिल्मों में संघर्ष को ले कर आप क्या कहती हैं, ‘‘परिवार के सहयोग के बिना अभिनय करना संभव नहीं. मैं ने बहुत कम उम्र से अभिनय शुरू किया था. परिवार वालों का सहयोग हमेशा रहा, आज भी है.’’ यहां तक पहुंचने में काफी संघर्ष करना पड़ा? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘हिंदी फिल्मों में लोगों के मन को समझने में संघर्ष करना पड़ा. फिर साउथ में अच्छी स्क्रिप्ट मिली तो मैं वहां चली गई. मुंबई से दक्षिण में गई. मेरे लिए भाषा से अधिक महत्त्व काम रखता है. यहां कोई मेरा गौडफादर नहीं है जो मेरे अनुरूप फिल्में लिखे. अच्छी फिल्में करने की इच्छा हमेशा रहती है. मुझे अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी का काफी सहयोग मिला. मैं नई आई थी. मेरे पास कौस्ट्यूम डिजाइनर नहीं थी. उन्होंने अपनी डिजाइनर का नंबर दिया. इस के अलावा हिंदी फिल्मों में आने के बाद मुझे फैशन की जानकारी मिली, जो बहुत जरूरी थी.’’

अब तक तमन्ना साउथ की फिल्मों का बड़ा नाम बन चुकी हैं और हिंदी फिल्मों में भी संघर्ष कर रही हैं. ऐसे में वे साउथ और हिंदी फिल्मों में बड़ा अंतर देखती हैं. उन के मुताबिक, दोनों जगहों की ‘स्टोरी टैलिंग’ अलग है लेकिन आजकल वहां की फिल्में यहां और यहां की फिल्में वहां बनती हैं. इस के अलावा वहां फिल्मों की पब्लिसिटी केवल 1 दिन में कर ली जाती है जबकि बौलीवुड में फिल्म प्रमोशन पर अधिक जोर दिया जाता है. हालांकि दक्षिण भारतीय फिल्मों में अपेक्षाकृत कम टैलेंटेड अभिनेत्रियों को सफल होते देखा गया है, यहां तक कि कई बार बौलीवुड से नकारी गई कई अभिनेत्रियां साउथ फिल्म इंडस्ट्री में जम कर सराही गई हैं. उदाहरण के तौर पर तमन्ना हैं ही, साथ में हंसिका मोटवानी, नकुल प्रीत, नम्रता शिरोडकर, राधिका आप्टे, सयाली भगत और कई दूसरे नाम हैं जिन्होंने कैरियर तो बौलीवुड से स्टार्ट किया लेकिन असफलता हाथ लगने पर दक्षिण भारतीय फिल्मों का रुख किया और जबरदस्त कामयाबी हासिल की. तमन्ना को बतौर अभिनेत्री दक्षिण भारत में भले ही धुरंधर अभिनेत्री माना जाता हो लेकिन बौलीवुड में कामयाबी उन के लिए अभी दूर है.

शाहिद की शादी

अभिनेता शाहिद कपूर की शादी को ले कर मीडिया में खूब गौसिप होती रही है. कभी करीना के साथ तो कभी प्रियंका और आलिया के साथ उन की शादी की खबरें उड़ीं. लेकिन शाहिद ने दिल्ली के एक पारिवारिक मित्र के घर से अपने लिए दुलहन देखी और विवाहबंधन में बंध गए. दिल्ली में शादी कर शाहिद ने अपने फिल्मी मित्रों के लिए मुंबई में शानदार रिसैप्शन आयोजित किया जिस में बिग बी से ले कर फिल्म इंडस्ट्री के ढेरों कलाकारों ने शिरकत की. आयोजन की मेजबानी शाहिद कपूर के पिता पंकज कपूर कर रहे थे. जबकि उन की मां नीलिमा अजीज और सुप्रिया पाठक भी मौजूद थीं. अच्छी बात यही रही कि शाहिद ने अन्य बौलीवुड कलाकारों की तरह अपनी शादी को मीडिया की तमाशेबाजी से बचाए रखा. वैसे भी शादी बेहद निजी मामला होता है. उस को ले कर हंगामा क्यों?

नासा में हमारा एक दिन

अमेरिका प्रवास के दौरान हमारे पर्यटन स्थलों की सूची में नासा भी था. मैं व मेरे पति न्यूयार्क से फ्लोरिडा पहुंचे. वहां हमें लैक मेरी में अपने परिचित के घर रुकना था. दूसरे दिन वहां जाने के लिए हम ने बस में सीट बुक करा ली. बस को 8 बजे निकलना था. लगभग आधा घंटा पहले हम उस स्थान पर पहुंच गए जहां से बस को चलना था. वहां ग्रौसरी की अच्छी बड़ी शौप थी, सुबह ही वह खुल भी गई थी. अभी समय था इसलिए हम उस शौप में घुस गए. हम ने वहां से कुछ स्नैक्स के पैकेट यह सोच कर खरीद लिए कि पूरे दिन की घुमक्कड़ी में शायद वे हमारे काम आएं. बाहर आए तो सामने से बस आती दिखाई दी. हम ने नंबर चैक किया तो पाया, यह वही बस थी जिस से हमें जाना है. बस में बैठते ही वह चल पड़ी. यहां से सिर्फ हमें ही चढ़ना था. बीचबीच में कुछ जगहों पर रुक कर कुछ और यात्रियों को लिया. ड्राइवर कम कंडक्टर तथा गाइड हमें बीचबीच में पड़ते स्थानों के बारे में बताते जा रहे थे. लगभग डेढ़ घंटे बाद उस ने बस ‘एस्ट्रोनौट हौल औफ फेम’ के सामने रोकी तथा यात्रियों को घूमने के लिए 1 घंटे का समय दिया.

एस्ट्रोनौट हौल औफ फेम के अंदर प्रवेश करते ही एक बड़ी सी एस्ट्रोनौट अर्थात अंतरिक्षयात्री की मूर्ति दिखाई दी. अंदर एक बड़े हौल में उन के द्वारा समयसमय पर पहने जाने वाले कपड़े, स्पेस शटल के मौडल, पहली बार चंद्रमा पर उतरे मानव द्वारा वहां पहली बार चलाई गई गाड़ी का मौडल डिस्प्ले किया हुआ था. इस के साथ ही स्पेस की मिट्टी तथा अन्य कई तरह की जानकारियां वहां उपलब्ध थीं. हौल बहुत बड़ा नहीं था, इसलिए घूमने में बहुत समय नहीं लगा. वहां एक छोटे से रैस्टोरैंट के अतिरिक्त वाशरूम की भी सुविधा थी. हम तरोताजा हो कर बस में बैठ गए, धीरेधीरे सभी यात्री आ गए. बस चल दी. ड्राइवर ने हमें बताया कि अब हमारा अगला स्टौप कैनेडी स्पेस सैंटर होगा. कैनेडी स्पेस सैंटर जाने के लिए हमें इंडियाना रिवर को क्रौस करना पड़ा. ड्राइवर ने कैनेडी स्पेस सैंटर के पास बने पार्किंग स्थल पर बस पार्क की तथा शाम साढ़े 5 बजे तक लौट कर आने के लिए कहा. लगभग 12 बज रहे थे. हम आगे बढ़े, सामने नासा की भव्य इमारत देख कर रोमांचित हो उठे. जिस का नाम न जाने कितनी बार सुना था उसे आज देखने जा रहे थे. हम अंदर प्रविष्ट हुए तो हमें सूचना केंद्र दिखाई दिया. वहां उपस्थित सज्जन से हम ने बुकलेट लेते हुए पूछा, ‘‘पहले क्या देखें?’’ उस ने हम से आईमैक्स थिएटर देखने के लिए कहा.

शटल लौंच का अनूठा अनुभव

हमारा अगला दर्शनीय स्थल शटल का अनुभव था. हौल में जाने से पहले उन्होंने हम से हमारा बैग और अन्य चीजें रखने के लिए कहा. इस के लिए उन्होंने हमें एक लौकर दिया. उस में सामान रख कर हम अंदर गए. पहले हमें एक हौल में बिठा कर शटल लौंच ऐक्सपीरिएंस के बारे में जानकारी दी गई. इस के बाद हमें एक दूसरे हौल में ले जाया गया. वहां हमें ग्रुप में बांट दिया गया. उस के बाद कुछ निर्देशों के बाद हमें एक कुरसी पर बैठने का निर्देश दिया गया. 4-4 कुरसियों का एक रौकेटनुमा केबिन था. केबिन में घुसते ही दरवाजे लौक हो गए तथा हमें बैल्ट बांधने का आदेश दिया गया. इस में एक इंजीनियर था, एक नेवीगेटर, एक पायलट तथा एक कमांडर. हमें एनाउंसर के निर्देश के आधार पर अपना यान संचालित करना था. हम ने मोटर, सिमुलेटर थ्रिल राइड के द्वारा शटल लौंच का अनुभव किया. इस क्रम में हमारा यान कभी नदीनालों से होता हुआ पहाड़ से टकराता प्रतीत होता तो कभी स्पेस में चांदतारों के बीच घूमता महसूस होता. हमें पता था कि हमारा यान कहीं नहीं टकराएगा. हम स्पेस या अर्थ में वास्तव में नहीं घूम रहे हैं बल्कि एक केबिन में बैठे सिर्फ उस का एहसास कर रहे हैं पर फिर भी लाइट और साउंड इफैक्ट के कारण हमारी हार्टबीट बढ़ गई थी. जब शो समाप्त हुआ तब लगा हम ने बाहर बोर्ड पर लिखी वार्निंग की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया, जिस में लिखा था कि जिन को हार्ट प्रौब्लम हो, या जिन को ब्लडप्रैशर हो या बैक या नैक प्रौब्लम या कोई भी ऐसी बीमारी जो इस प्रकार के अनुभव से बढ़ जाए, वह इस में न बैठे. हम दोनों को ही ब्लडप्रैशर की समस्या थी. कुछ हुआ तो नहीं पर अगर कुछ हो जाता तो इस अनजान जगह में…सोच कर सिहर गए पर फिर लगा, जब घूमने निकले हैं तो डर क्यों?

शटल ऐक्सप्लोरर

हम शटल ऐक्सप्लोरर में गए जहां एक रौकेट का मौडल था. उस में रौकेट के अंदर के भागों को दर्शाया गया. उस के अंदर जाने के बाद ऐसा अनुभव हो रहा था कि मानो हम वास्तविक रौकेट के अंदर के भागों का अवलोकन कर रहे हैं.

स्पेस सैंटर टूर स्टौप

अब हम नासा के अन्य भागों को घूमने के लिए स्पेस सैंटर टूर स्टौप पर गए जहां से नासा के द्वारा चलाई जा रही बस में बैठ कर अन्य स्थानों के अवलोकनार्थ हमें जाना था. लंबी कतार थी, गरमी भी काफी थी. तभी एक हलकी सी बौछार ने हमें गरमी से राहत दी. ऊपर देखा तो पाया जगहजगह पर ऐसे फौआरे लगे हैं जो यात्रियों के ऊपर पानी का हलका सा छिड़काव करते हुए उन को गरमी से राहत पहुंचा रहे हैं. नंबर आने पर हम बस में सवार हुए. उसी समय हम ने देखा कि व्हीलचेयर को बस में चढ़ाने के लिए बस से एक स्लाइडर नीचे आया तथा व्हीलचेयर के चढ़ते ही वह अंदर चला गया. यह देख कर बहुत अच्छा लगा. वृद्ध और विकलांग लोगों के लिए वह बहुत अच्छी व्यवस्था थी. इस के द्वारा बिना किसी परेशानी के वे भी बस में सवार हो गए. सब के अंदर बैठते ही बस चल दी. उस ने हमें रौकेट लौंच कौंप्लैक्स ‘39 औब्जर्वेशन गैंट्री’ में उतारा.

39 औब्जर्वेशन गैंट्री

यहां पहले हमें एक फिल्म के जरिए रौकेट लौंच की जानकारी दी गई, उस के बाद हम लौंच पैड पर चढ़े जहां से हम ने क्राउलर वे तथा व्हीकल एसैंबली बिल्ंिडग देखने का आनंद लिया.

अपोलो सैटर्न फिफ्थ

39 औब्जर्वेशन गैंट्री को देखने के बाद हम ने बस पकड़ी तो उस ने हमें ‘अपोलो सैटर्न फिफ्थ’ पर उतारा. वहां हम ने एक बड़े हौल में प्रवेश किया. उस हौल में मशीनें लगी हुई थीं जिन के द्वारा लौंच किए रौकेट को कंट्रोल किया जाता है. वह फायरिंग रूम थिएटर था जिस के द्वारा अपोलो के लौंच का प्रसारण किया जा रहा था जो पहली बार चंद्रमा पर उतरा था. वैसे तो इस तरह के दृश्य टीवी पर मैं ने कई बार देखे हैं, लगभग हर बार जब भी किसी रौकेट को लौंच किया जाता है पर अपनी आंखों से उन मशीनों को देखना अपनेआप में अद्भुत था.

इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन सैंटर

अब हमारा दूसरा स्टौप ‘इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन सैंटर’ था. वहां बड़ीबड़ी मशीनें लगी हुई थीं. दरअसल, वहां रौकेट के विभिन्न भागों के निर्माण का काम चल रहा था. वह एक बड़ा प्रोजैक्ट था जो हमारे टूर प्रोजैक्ट का एक हिस्सा था. उन भागों को हम प्रोजैक्ट के चारों ओर बने पथगामी मार्ग से ही देख सकते थे, अंदर प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी. एक स्टौप से दूसरे स्टौप पर जाते हुए हम ने नासा हैडक्वार्टर भी देखा जिस में लगभग 6 हजार कर्मचारी काम करते हैं. वह काफी बड़ी एवं भव्य इमारत है. इस के साथ ही दूर से बस के द्वारा हम ने वे स्थान भी देखे जहां लौंचिंग पैड बने हुए हैं, जहां से स्पेस शटल को लौंच किया जाता है. पर्यटकों को वहां जाने की सुविधा नहीं थी. यह जगह एटलांटिक ओशन के पास बनी हुई है. अब हम वापस स्पेस सैंटर टूर स्टौप पर आ गए. इस समय तक भूख काफी लग आई थी. हम वहीं बने रैस्टोरैंट में बैठ गए. संतुष्ट मन से खापी कर तथा थोड़ा आराम करने के बाद बाहर आए तो एक जगह एस्ट्रोनौट के कपड़े पहना मौडल बना हुआ था पर सिर वाली जगह खाली थी, कुछ लोगों को फोटो खिंचवाते देखा तो हम ने भी एकदूसरे का फोटो खींच लिया. समय बाकी था. हम वहीं बने रौकेट गार्डन में चले गए. वहां पर एक बहुत बड़े स्पेस में रौकेट के विभिन्न मौडल बने हुए थे. कुछ देर वहां बैठे और घूमघूम कर देखते रहे. साढ़े 5 बज रहे थे. हम ने नासा पर अंतिम बार नजर डाली तथा बाहर निकल कर बस में बैठ गए.

यात्रियों के बैठते ही बस चल पड़ी. जहां हम सुबह एक आस ले कर चले थे उस आस से तृप्त हो जाने की खुशी तथा एक अनोखा एहसास ले कर लौट रहे थे. यद्यपि शरीर थक कर चूर हो गया था जबकि मन सारी यादों, बातों को मन ही मन दोहरा रहा था. बस ड्राइवर जहां सुबह से लगातार जानकारी देता जा रहा था, अब चुप था. अपनी मंजिल आने पर यात्री उतरते तथा अपरिचित बन जाते. हम भी संतुष्ट मन से अपने स्टौप पर उतरे. नई यादों और अनुभवों के साथ हमारा दिन खुशनुमा हो गया था.

यूनान समझौते से शेयर उछला

भारतीय शेयर बाजार ने यूनान समझौते को हाथोंहाथ लिया. चौतरफा खरीदारी से बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक13 जुलाई को 300 अंक चढ़ कर 27,961 पर बंद हुआ. निफ्टी 99 अंकों की बढ़त के साथ 8,460 पर बंद हुआ. इस से पहले पिछले पखवाड़े में मानसून के कमजोर रहने के पूर्वानुमान का बाजार पर बड़ा नकारात्मक असर रहा. सरकार ने भी कमजोर मानसून से निबटने की रणनीति तैयार कर के सभी को डरा दिया था. हालांकि बाद में मानसून अच्छा रहने की खबर आई और बाजार में निवेशकों का उत्साह बढ़ा. जुलाई की शुरुआत के पहले दिन सूचकांक ढाई माह बाद 28 हजार अंक के पार पहुंचा जिस से निवेशकों का भरोसा बढ़ा. इस का असर उस दिन रुपए पर भी पड़ा और रुपया लंबी छलांग लगाते हुए एकदिवसीय कारोबार में 29 पैसे मजबूत हुआ. भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़े अच्छे रहने और विकास दर बढ़ने के विदेशी एजेंसियों के अनुमान के साथ ही सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उन की जरूरत के अनुसार निधि उपलब्ध कराने की घोषणा की, जिस का बाजार पर अच्छा असर देखने को मिला. बाजार में तेजी का यह रुख जून के दूसरे पखवाड़े में लौट आया था, जो जुलाई में भी जारी है. हालांकि बीच में सूचकांक में थोड़ी सी गिरावट आई थी.

 

भारत भूमि युगे युगे

सैल्फी विद वाइफ

महिलाओं खासतौर से बेटियों का स्वाभिमान और सम्मान बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाकई नायाब तरीका सुझाया है कि बेटी के  साथ सैल्फी लो, पोस्ट कर दो. इस से साबित हो जाएगा कि भारत में नारी पूजी जाती है पर तरीका इलैक्ट्रौनिक हो गया है. आइडिया बुरा नहीं कहा जा सकता लेकिन सोशल साइट्स पर युवाओं के बराबर से ही अधेड़ और बुजुर्ग सक्रिय हैं जिन का पहला शौक पत्नी के साथ फोटो खींच कर पोस्ट करना और सैल्फी लेना होता है. ये लोग अपनी शादी की वर्षगांठ पर पत्नी संग 20-25 साल पहले या हाल में ही खिंचवाए फोटो डाल कर बच्चों जैसे खुश होते हैं. साथ ही, वे लिखते हैं, इतने साल कब, कैसे, गुजर गए, पता ही नहीं चला. इस पर उन्हें खूब लाइक और कमैंट्स भी मिलते हैं. नरेंद्र मोदी दांपत्य की इस प्रगाढ़ता, रोमांस और रोमांच को नहीं महसूस कर सकते जिन्हें अपनी जिद, कैरियर और उसूलों के चलते खुद उन्होंने ही खोया है.

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खानदानी घोटाला

छत्तीसगढ़ गरीब और पिछड़ा राज्य नहीं रह गया है, यह बताने के लिए वहां की सरकार के मुखिया रमन सिंह ने बजाय इश्तिहारों के, एक कथित घोटाले का सहारा लिया. कांग्रेस का आरोप है कि रमन सिंह ने धान घोटाले में 36 करोड़ रुपए का गालमाल किया है. घोटाले शाश्वत हैं और रहेंगे. हरएक घोटाले की अपनी खूबी होती है. छत्तीसगढ़ घोटाले की खूबी यह है कि इस में रमन सिंह की पत्नी और साली सहित रसोइए का भी नाम आया. गोया कि अब चावल पकाना भी गुनाह हो चला है. सच कुछ भी हो लेकिन दिलचस्प बात यह है कि घोटालों में अब परिवारजनों का नाम आना एक अनिवार्यता सी हो चली है. वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान के बाद रमन सिंह तीसरे भाजपाई मुख्यमंत्री हैं जिन का नाम घोटाले में सपरिवार लिया गया.

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क्रूर गर्ल

सड़क हादसे अकसर लापरवाही से होते हैं. सांसद व अभिनेत्री हेमा मालिनी की महंगी कार से दौसा में एक सस्ती कार टकराई तो उसे नतीजा भी मासूम बेटी को खो कर भुगतना पड़ा. हैरत की बात यह है कि कार हेमा मालिनी नहीं चला रही थीं. इस के बाद भी चोट उन्हें ही ज्यादा आई. वे ड्राइवर के पीछे बैठी थीं, इसलिए होना यह चाहिए था कि ड्राइवर को चोट आती. वजह, जोरदार टक्कर आमनेसामने से हुई थी. इस दुखद हादसे पर दुख जता चुकी हेमा मालिनी ने मुंबई पहुंचने के बाद 8 जुलाई को यह कहते पलटी मारी कि गलती उस पिता की थी जो ट्रैफिक नियमों की अनदेखी कर कार चला रहा था. जाहिर है, हेमा बचाव के लिए इतनी क्रूरता दिखा रही हैं. जिस मांबाप ने अपनी मासूम बच्ची खोई है उन का दर्द तो वे महसूस कर सकते हैं. ऐसे में हेमा का यह बयान जले पर नमक छिड़कने जैसा ही है.

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युद्धिष्ठिर का संकट

गजेंद्र चौहान कौन हैं, यह आमतौर पर लोग नहीं जानते. वजह, उन की थोड़ीबहुत पहचान टीवी धारावाहिक महाभारत के युधिष्ठिर की है. ये युधिष्ठिर दिक्कत में है, फिल्म ऐंड टैलीविजन इंस्टिट्यूट औफ इंडिया के नवनियुक्त अध्यक्ष गजेंद्र चौहान का विरोध इस संस्थान के छात्र यह कहते करते रहे कि वे इस पद के लिए नाकाबिल हैं और यह नियुक्ति भाजपा के भगवा एजेंडे का हिस्सा है. छात्रों की दलीलें हैं कि गजेंद्र को अध्यक्ष बनाए जाने से अभिव्यक्ति की आजादी बाधक होगी. इस बाबत छात्र वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले तो उन्होंने इन एकलव्यी चेलों को टरका दिया. इस उपेक्षा से छात्रों का गुस्सा तो और बढ़ा ही लेकिन अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने भी गवर्निंग काउंसिल के पद से इस्तीफा यह कहते दे दिया कि वे नहीं चाहतीं कि छात्र आधेअधूरे ज्ञान के साथ फिल्म उद्योग में पहुंचें. यानी यह महाभारत अभी कुछ एपिसोड और खिंचेगा.   

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